गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण
Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
शिक्षा का ध्येय
देश की सही प्रगति का मूलाधार शिक्षा है। शिक्षा में चरित्र निर्माण करने की, मोक्षलक्ष्यी होने की और आसुरी बलों पर विजय पाने की क्षमता होनी चाहिए। वर्तमान सरकार के लिए प्रगति का मापदंड हिंसा, भ्रष्टाचार और शोषण द्वारा साध्य विशिष्ट वर्ग की आर्थिक उन्नति ही हैं।
इतिहास शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। इतिहास द्वारा प्रजा का चरित्र निर्माण होता है। गलत इतिहास से हीनग्रंथि पैदा की जा सकती है। प्रजा विदेशियों की मुहताज ही बनी रहे, उसे इतनी कायर भी बनायी जा सकती है। हमारी प्रजा भी इसी बात का दृष्टान्त है।
अँधेरे में जाती भारत की शिक्षा प्रणाली
A photograph showing a large group of school children sitting on the ground in an outdoor area, possibly a school courtyard or a temporary classroom. They are arranged in rows, facing towards the left. Some children are looking towards the camera, while others are looking towards the teacher. A teacher in a blue shirt is standing on the left side of the frame, near a brick wall. There are some books and bags on the ground near the children. A large, leafy tree is visible in the background, providing shade. The setting appears to be a rural or semi-rural area.
भाषा द्वारा मानस परिवर्तन
ट्रेवेलियन के मतानुसार अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से मुक्त रहे हिन्दू और मुसलमान भी अंग्रेजों को अपवित्र राक्षस समझते थे और उन्हें हटा देने के षड्यन्त्र बनाते थे। लेकिन जहाँ-जहाँ अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव फैलता गया वहाँ-वहाँ भारतवासियों का मानस परिवर्तन होता गया। वे अंग्रेजों को अपने महान उपकारक, उद्धारक और बलवान मित्र समझने लगे हैं। उन्हें संकीर्णता के लिए अंग्रेजों के प्रति वफादारी और भक्तिभाव रखने लगे हैं। देश का नसीब केवल
अंग्रेजों की सहायता और रक्षा से ही उदीयमान होगा, ऐसी मान्यता का प्रचार करते हैं।
आगे चलकर सर चार्ल्स ट्रेवेलियन बताते हैं कि जो युवक हमारी शाला में शिक्षा लेते हैं, वे अपने पूर्वजों और अभिभावकों का तिरस्कार करने लगे हैं। तदुपरांत वे अपनी राष्ट्रिय संस्थाओं को अंग्रेजियत का स्वरूप दिलाने के लिए कटिबद्ध होने लगे हैं। अंग्रेजों को उखाड़ कर समुद्र में फेंकने के बजाय भारत के लिए अंग्रेजों की शिक्षा और रक्षा दोनों बातें अनिवार्य बन गई हैं, ऐसी मान्यता के समर्थक बन गये हैं।
ट्रावेलियन कहते हैं –‘मैंने हिन्दुस्तान के ऐसे प्रदेश में वर्षों का समय गुजारा है, जहाँ अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का प्रारंभ नहीं हुआ। वहाँ के लोग अंग्रेजों का कट्टर दुश्मन मानते हैं और उन्हें खत्म कर देने के उपाय सोच करते हैं।’
‘परंतु मैं जब बंगाल में गया तब वहाँ हमने अंग्रेजियत से रंग देने के कारण वहाँ के शिक्षित भारतवासी अंग्रेजों का गला घोटने के बदले अंग्रेजों के साथ ज्यूरी में बैठने में और बैंच मजिस्ट्रेट बनने में धन्यता का अनुभव करते हैं।’
पुरानी प्रणालियों की ताकत का भय
आगे ट्रेवेलियन लिखते हैं कि ‘यदि भारत की प्राचीन रीतियाँ व नीतियाँ एवं उनकी शिक्षा और साहित्य के अस्तित्व को यथाशीघ्र नामशेष न कर दिया तो संभव है कि कभी क्षणमात्र में ही भारत से हमारा अस्तित्व मिट जायेगा।’
शोध समिति के अध्यक्ष ने ट्रेवेलियन से पूछा था कि, ‘आप की योजना का अंतिम ध्येय भारत और इंग्लैण्ड के बीच राजनैतिक संबंध का विच्छेद करना है या हमेशा के लिए उसे सुदृढ़ करना है?’
ट्रेवेलियन ने इसका उत्तर दिया था कि, 'मुझे पूर्ण विश्वास है कि भारतवासियों को अंग्रेजी शिक्षा देने से आखिरी परिणाम यह निकलेगा कि उनके इंग्लैण्ड से अलग हो जाने का काम अनंतकाल तक असंभव बन पाएगा'।
'इसके विपरीत मेरा दृढ़ ख्याल यह है कि यदि भारतवासियों की शिक्षा प्रणाली को यथावत् छोड़ दिया जाए तो किसी भी दिन हम यहाँ से बहुत जल्द खदेड़ दिये जायेंगे'।
'मैंने बारह साल तक भारत में निवास किया है। प्रथम छह साल उत्तर भारत में गुजारे, जहाँ अंग्रेजी शिक्षा का इतना बोलबाला न था, लेकिन उनकी प्राचीन परंपराएं और शिक्षा कार्य जारी थे, जिससे वे अंग्रेजों को अपना जानी दुश्मन मानते और उन्हें हटा देने के लिये षड्यन्त्रों का आयोजन करते। जहाँ तहाँ भारत में से हमें खदेड़ देने की ही बातें सुनाई देती'।
'लेकिन मैं कलकत्ता आया। वहाँ अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव के कारण दूसरे ही हालात देखने को मिलें। लोग हमें उखाड़ फेंकने के बजाय, स्वतंत्र अखबार निकालने का, नगरपालिकाओं की स्थापना और अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार कर अधिकाधिक सरकारी नौकरियाँ प्राप्त करने आदि के बारे में ही सोचते थे। वे वास्तव में पूरे अंग्रेज-परस्त बन गये थे'।
वह प्रसिद्ध पत्र – (Sir Charles Trevelyan before parliamentary Committee of 1853)
ई.स. 1853 की इस सर्वांगीण सोच विचार के बाद इस कंपनी के नियामकों ने 16 जुलाई, 1854 के रोज 'एज्युकेशनल डिस्पेच' के नाम से प्रसिद्ध हुआ पत्र गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी पर भिजवाया।
इस पत्र में नियामकों ने लिखा था कि 'शिक्षा की इस नई योजना का आशय शासनतंत्र के प्रत्येक विभाग को विश्वसनीय और काबिल नौकर-कलर्क दिलवाने का है। उसका दूसरा हेतु यहा है कि इंग्लैण्ड के उद्योग-धंधों के लिए जिन अनेक
कच्चे मालों की आवश्यकता है और जिनकी इंग्लैण्ड के प्रत्येक वर्ग के लोगों में बहुत खपत है, वे सभी पदार्थ अधिक मात्रा में और पूरी निश्चितता के साथ हमेशा इंग्लैण्ड पहुंचाते रहे और उसके साथ इंग्लैण्ड के तैयार माल की भारत में लगातार मांग बनी रहे, उसके लिए योग्य परिस्थिति और उसका अमल करने वाले लोगों को तैयार करना हैं।
150 वर्षों से चूर-चूर हुआ भारत
आज से दो सौ साल पूर्व तक जो देश विश्व में शिक्षित माने जाने वाले देशों में अग्रसर था, जो विश्व का अग्रगण्य कृषिप्रधान और प्रथम स्तर का उद्योगप्रधान देश था, वही अंग्रेजों के 150 साल के शासन के बाद शिक्षा की दृष्टि से सबसे पिछड़ गया। औद्योगिक रूप से वह टूट गया, बेकारों और बीमारों से भरा देश बन गया। हम अपनी मातृभाषा में शिक्षा देने के बजाय अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने में गौरव महसूस करते हैं। अपने प्रदेश की भाषाओं की लड़ाई में एक दूसरे का गला घोंटने या भारत संघ में से अलग हो जाने के लिए उतारू हो गए हैं। विदेशियों से प्राप्त कर्ज आदि को विदेशियों की सहानुभूति, सद्भावना और सहायता के रूप में स्वीकृत करते हैं। विदेशियों की सहायता बिना कुछ भी कर पाने में असमर्थ प्रमाणित हुए हैं।
मेकॉलेद्वारा भारतको गुलाम बनानेका षडयंत्र © Hindujagruti.org
परिस्थिति को पलटने के दो रास्ते
इस अत्यंत शोचनीय परिस्थिति को पलटने के केवल दो रास्ते हैं, या तो विशाल समुदाय के अशिक्षित भारतवासी विद्रोह कर इस अल्पसंख्यक शिक्षित सेक्यूलरिस्टों को शासन के पदों से हटा दें अथवा जो थोड़े बहुत शिक्षित हैं, जो अंग्रेजी शिक्षा, विचारधारा या अर्थव्यवस्था से भ्रमित चलित नहीं हुए हैं, अपितु उन्हें आपदा या बाधा समझते हैं और भारत के प्राचीन ज्ञान, साहित्य और विचारधारा में अनंत श्रद्धा रखते हैं, वे खुले मैदान में आकर भारतीय विचारधारा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और मोक्षलक्षी विज्ञान को आगे बढ़ाकर गाँव-गाँव उसकी ज्योति प्रज्वलित करें।
A young girl with dark hair tied in pigtails, wearing a blue school uniform, is holding a small blackboard with a red border. The blackboard has the words 'RIGHT To EDUCATION' written on it in white chalk. The background is a textured, greyish wall.
दूसरा रास्ता ज्यादा स्वीकार्य और कार्यक्षम हैं।
स्वाधीन भारत में शिक्षा के उद्देश्य, विषय और पद्धति, तीनों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता थी। उसके बदले मैकॉले की परंपरा को जारी रखकर शिक्षा को संपूर्णतया नौकरीलक्षी, पश्चिम परस्त और विदेशी प्रभाव से चकाचौंध वाली बना दी गई हैं।
सबसे करुण घटना तो यह है कि अंग्रेजों द्वारा लिखे गए झूठे इतिहास को भी चालू रखा गया। विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जो स्वाधीन होने के बाद भी विदेशियों द्वारा लिखित झूठा और भारतीय प्रजा के बीच अन्दरूनी द्वेषभाव पैदा करें, ऐसा इतिहास अपने बच्चों को पढ़ाता है। इसका कारण शायद यह भी हो कि विदेशियों ने भारतीय शासन को इतिल्ला दे रखी हो कि वे इतिहास में परिवर्तन न करें। भारत एक ऐसी सार्वभौम प्रजा है, जो अपने निजी
व घरेलू मामलों में भी विदेशी सलाह स्वीकार करती है और विदेशी दबाव के वश में बनी रहती है।
निश्चित मन से वापस गया आयोग
भारत स्वतंत्र हुआ उसके तुरंत बाद 'यू.एन.ओ.' का एक आयोग यह जाँच करने आया था कि मैकॉले द्वारा तैयार किये गए शैक्षणिक ढांचे से बाहर निकलकर, कहीं हम हमारी उत्तम प्राचीन प्रणाली को पुनः आरम्भ तो नहीं कर रहें। कमीशन के सदस्य सभी स्थानों पर घूम-फिर कर पूरी छानबीन कर के इस संतोष के साथ वापस लौट गए कि भारत अपनी निजी गौरवशाली संस्कृति के प्रति प्रयाण करने को सावधान या तत्पर नहीं हुआ है। वह अब भी अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति वापस लौट कर पाश्चात्य संस्कृति के साथ जो संबंध जुड़े हैं, उन्हें काट कर अपनी भव्यता के प्रभाव से, विश्व को चकाचौंध कर दें, ऐसी हालत में नहीं है। इस विश्वास के साथ निश्चित होकर कमीशन वापस लौट गया।
The logo of the United Nations, featuring a blue globe with latitude and longitude lines, surrounded by two olive branches.
UNITED NATIONS
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी न हमने अपनी शिक्षा का ढाँचा बदला, न ही अपने सही इतिहास का पुनर्लेखन किया, न ही विद्यार्थियों में अपनी मातृभाषा के प्रति भाव पैदा किया। वास्तव में हम जिस तेज रफ़्तार से पश्चिम की हिंसक और शोषक अर्थव्यवस्था के प्रति आँख मूंद कर दौड़ गए और अरबों रूपयों का खर्च कर कारखाने खड़े करने लगे, उतनी ही तेजी से कारखानों को चलाने के लिए, मूलभूत कच्चे माल जितने ही आवश्यक हिसाबनबीश, संशोधक, खरीदी
और विक्री करने वाले अधिकारी और तकनीकी ज्ञान वाले कारीगर पैदा हो पाएँ, ऐसे परिवर्तन भी शिक्षा में किए।
छोटी उम्र के बच्चों पर क्रूरता से थोपा गया शिक्षा का बोझ
हम ऐसी शोषक और हिंसक अर्थव्यवस्था के प्यादे बन पायें, ऐसे विद्यार्थी जल्द तैयार करने के लिए बच्चों की शक्ति की परवाह किए बिना उनका पाठ्यक्रम बढ़ा दिए। अभ्यास के समय में कांट-छांट कर कम समय में ज्यादा विषय सीखने का बोझ उनके दिमाग पर लाद कर बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बना दिए।
हमारा खंडित गौरव
कारखाने बढ़ते गए, ग्राम्य उद्योग टूटते चले गये, जानवर कटते रहे, शिक्षार्थियों और विद्यार्थियों की तादात बढ़ती गई, परंतु सभी का समावेश हो सके, उसके लिए पर्याप्त शालाएँ नहीं बना सके। उन्हें शिक्षा देने के लिए आवश्यक योग्य शिक्षक भी तैयार न कर पाए। परिणामस्वरूप शालाएँ मानो औद्योगिक फैक्ट्रियाँ हों, इस प्रकार उनमें पहली पाली, दूसरी पाली, तीसरी पाली की रचना कर शालाओं के गौरव को खत्म कर दिये।
अंग्रेज इतिहासकार का प्रमाण
अंग्रेज इतिहासकार लडलॉन ‘भारत का इतिहास’ नामक अपनी पुस्तक में जिक्र करता है कि – ‘जिस गाँव में पुराना संगठन (पंचायतें) टिका हुआ है वहाँ प्रत्येक बालक लेखन, पठन और गणित कार्य अच्छी तरह जानता हैं लेकिन जहाँ-जहाँ हमने पंचायतों को बर्बाद किया है वहाँ ग्राम पंचायतों के साथ शालाओं का भी विनाश हो गया हैं। वहाँ बच्चों की लेखन, पठन और गणित कार्य सीखने की सुविधाएं नष्ट हो गई हैं।’
भारत पर विजय पाने से पूर्व अंग्रेजों ने हमारी समाज व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, राज्य पद्धति, युद्ध पद्धति, धार्मिक व्यवस्था, प्रजा के रीति रिवाज, वैद्यकीय व्यवस्था, कृषि यातायात व्यवस्था आदि तमाम प्रकार के विषयों का भिन्न-भिन्न अधिकारियों द्वारा अध्ययन किया कराय़ा था। हमारी
इन तमाम व्यवस्थाओं को कैसे तहस-नहस कर दी जाए, समग्र राष्ट्र पर अधिकार प्रभुत्व स्थापिक कर इस देश की अपार सम्पत्ति का किस प्रकार शोषण किया जाये और समूची प्रजा कैसे ईसाई बना दी जाए, उसकी व्यवस्थित योजनाएं तैयार की गई थीं। इन योजनाओं के षडयंत्रों में हम फंस गए और हमारी अधोगति हुई।
क्यों सबको एक ही शिक्षा?
एक विश्व की रचना में तथाकथित देशी अंग्रेजों का सहयोग
अंग्रेज यहाँ से विदा हुए इससे पूर्व अंग्रेजी शिक्षा द्वारा जिन तथाकथित अंग्रेजों को तैयार करते गए, उनके हाथों हमारे धर्म, संस्कृति, समाज व्यवस्था आदि का सत्यानाश बड़ी तेजी से होता जा रहा हैं। भारतीयों को यथाशीघ्र, शराब, मांसाहार और विदेशी रहन-सहन के प्रति प्रवृत्त किए जाते हैं, जिससे उनका ‘One World’ यानी ‘एक ही विश्व’ (गोरोँ का राज्य) और ‘One Religion’ अर्थात् ‘एक ही धर्म’ (ईसाई धर्म) का स्वप्न पूरा हो पाए। ‘One World’ यानी किसी एक ही सत्ता का समस्त विश्व पर शासन नहीं, लेकिन वर्तमान युग की बदली हुई परिस्थिति में विश्व बैंक तमाम अश्वेत प्रजाओं पर, सहायता के नाम पर कर्ज का बोझ लाद कर अपना प्रभुत्व जमा दे। अर्थात् एशिया और अफ्रीका की तमाम प्रजाओं पर विश्व बैंक का प्रभुत्व स्थापित हो जाए। गोरी ईसाई राज्य सत्ताएँ इस विश्व बैंक की साझेदार हैं। विश्व की तमाम अश्वेत प्रजाओं पर प्रभुत्व स्थापित कर उनके ‘One World’ यानी ‘एक विश्व’ राज्य के लक्ष्य के प्रति बड़ी तेजी से गति किये जा रहे हैं।
आज विश्व बैंक की सबसे मजबूत पकड़ विश्व के दूसरे नंबर के बड़े गैर-श्वेत और गैर ईसाई देश भारत पर हैं, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। अंग्रेजी शिक्षा देकर तैयार किए गए तथाकथित भारतीय अंग्रेज ही इस स्थिति के सर्जक हैं।
अंग्रेज भले ही यहाँ से चले गए हों, लेकिन उन्होंने अंग्रेजी भाषा, शिक्षा, रहन-सहन, आचार-विचार आदि के जो विषैले बीज बोये हैं, उसका परिणाम हम आज भुगत रहे हैं।
भारतीय शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम थी
भारतीय शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम और मोक्षदायिनी थी। उसका प्रसार प्रत्येक घर में था। हमारी शिक्षा के विषय में पूरी जानकारी इकट्ठा करने के बाद, उसे खत्म कर, उन्होंने हिंसक, जुगुप्साप्रेरक, शोषक और विकासलक्षी शिक्षारूपी शस्त्र का हम पर एक प्रयोग किया है जिसे 'मोहाश्व' कह सकते हैं। हम उससे मोहित होकर उसके चक्कर में फँस गए हैं फिर भी उसमें गौरव मानते हैं।
प्राचीन भारत के निवासियों की शिक्षा-संस्थाओं के बारे में ई.स. 1823 के कंपनी शासन के एक विवरण में बताया गया है कि 'शिक्षा की दृष्टि से भारत के अनेक गाँवों की जो उन्नत स्थिति है, वैसी स्थिति दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं।'
(Report of Select Committee on the Affairs of the East India Co.
Vol.1.Page 409 Published in 1832)
इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि अंग्रेजों ने भारत पर अपना प्रभुत्व जमाने से पूर्व की हमारी शिक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी प्राप्त कर ली थी।
इंग्लैण्ड द्वारा अपनायी गई हमारी शिक्षा-पद्धति
डॉ एण्डबेल नामक एक प्रसिद्ध अंग्रेज शिक्षाशास्त्री ने भारत की शिक्षा व्यवस्था का अभ्यास कर इंग्लैण्ड में उस पद्धति का अमल किया था। उसके अच्छे परिणाम देखकर ईस्ट इण्डिया कंपनी के नियामकों ने 3 जून 1814 के रोज बंगाल के गर्वनेर जनरल को एक पत्र लिखा कि 'शिक्षा की जिस पद्धति का प्रयोग भारत के आचार्यों द्वारा पूर्व से जारी है, उसी पद्धति के आधार पर हमारी शालाओं में भी शिक्षा दी जानी चाहिए, क्योंकि उससे शिक्षा-पद्धति अति सरल और सुगम हो पाती हैं।'
(Letters from the Court Of Directors of Governor General
in Council of Bengal, Dated 3rd, June 1814)
शिक्षा की यह व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि भारत में हजारों वर्षों से शासनों का उलटफेर होते रहने पर भी इन शिक्षा-संस्थाओं को कोई हानि नहीं पहुँच पाई, क्योंकि सल्तनतों के उलटफेर के पीछे हिन्दू धर्म और संस्कृति के विनाश का उद्देश्य नहीं था, अपितु राजसत्ता की लालसा थी। यदि हिन्दू धर्म और हिन्दी संस्कृति के विनाश की भावना भी हो तो उसके लिए पशुबल उपयोग के सिवा अन्य कोई चारा न था।
लेकिन भारत के जिन इलाकों पर अंग्रेजों ने प्रभुत्व जमाया, वहाँ उनकी घुसपैठ बल प्रयोग द्वारा न थी, बल्कि भेदी षड्यंत्रों के साथ धोखाधड़ी और भारतवासियों की बफादारी के गलत इस्तेमाल के कारण हुई थी। सत्ता-प्राप्ति के बाद हमारे धर्म संस्कृति के सर्वनाश के लिए और हमारी शिक्षा-संस्थाओं एवं शिक्षा-पद्धति को खत्म कर, लोगों को अनपढ़ और निरक्षर रखना उनका उद्देश्य था।
पोषक बलों का खात्मा कर दिया
भारत की सुव्यवस्थित प्रख्यात विद्यापीठों और गावों कि शिक्षा संस्थाओं को देखते – ही – देखते खात्मा कर दिया गया। तलवार से नहीं, बल्कि जहाँ से उनका पोषण प्राप्त करने के स्रोत बह रहे थे, वहीँ सुरंगे दाग दी। इसका सही ख्याल हमें तत्कालीन बेलारी जिले के कलेक्टर ए.डी केम्पबेल के ई.स. 1823 के एक विवरण से होता है। वे लिखते हैं कि ‘इस समय ऐसे अंसख्य परिवार हैं, जो अपने बच्चों को जरा भी शिक्षा नहीं दे पाते।..... मुझे यह बताते हुए दुःख होता है कि देश क्रमशः निर्धन होता जा रहा है।’
भारतवासियों को शिक्षा देने के विरुद्ध उग्र विरोध
किसी भी प्रजा का सर्वनाश करना हो तो उसे उसके धर्म, संस्कृति और भाषा से अलग कर देना चाहिए। भाषा ही तो धर्म और संस्कृति की बाहक है। अतः भाषा के विनाश द्वारा धर्म और संस्कृति अपने आप ही नष्ट हो जाती है। भाषा का नाश करने के लिए विद्या-अध्ययन, पठन-पाठन कराने वाली संस्थाओं और साधनों का नाश कर देना चाहिए।
इस सिद्धान्त के आधार पर ई.स. 1757 से ही अंग्रेज शासक भारतवासियों की शिक्षा संस्थाओं को हिन्दवासियों के शिक्षा देने के सवाल पर ब्रिटिश शासकों द्वारा उग्र विरोध किए जाने के बाद उनमें से कुछेक को ही अपने (ब्रिटिश) प्राचीन साहित्य और विज्ञान की जानकारी दी जाए, ऐसे प्रस्ताव के समर्थन में उसने कहा- 'अंग्रेजी शिक्षा द्वारा हिन्दू समाज में एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना चाहिए, जो जिन पर हम शासन करते हैं ऐसे असंख्य भारतीय लोग और हमारे बीच समन्व का काम करें। वह वर्ग ऐसा होना चाहिए कि जो हमारी शिक्षा प्राप्त करने के बाद केवल वर्ण और खून से ही भारतीय हो, लेकिन रुचि, भाषा, विचार और भावना की दृष्टि से अंग्रेज बन गया हो'।
तन मन और धन की बर्बादी
चौथी पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के लिए 7 अरब 83 करोड़ 31 लाख रुपये निश्चित किए गए थे। जिससे निम्नानुसार विद्यार्थी संख्या उस योजना की समावधि में होगी, ऐसा अंदाज लगाया गया था।
| कक्षा एक से पाँच | - | 689 लाख |
|---|---|---|
| कक्षा छह से आठ | - | 176 लाख |
| कक्षा नौ से ग्यारह | - | 98 लाख |
| कक्षा विश्वविद्यालय अभ्यास | - | 27 लाख |
कुल संख्या 990 लाख
उपर्युक्त विवरण के अनुसार प्रथम कक्षा में दाखिल हुए 689 लाख विद्यार्थियों में से केवल 27 लाख विद्यार्थी कालेजों में प्रवेश पा सकते थे। वे नौकरी के अलावा शायद ही दूसरा कोई काम कर सकते थे। सरकार और बड़ी-बड़ी औद्योगिक कंपनियाँ, दोने साथ मिलकर भी इन लाखों उपाधि-धारकों को नौकरी दे नहीं पाती।
A hand in a suit sleeve holds a fan of Indian currency notes. The notes are engulfed in bright orange and yellow flames, with smoke rising from the top. This image serves as a metaphor for the wastefulness of money and the loss of its value.
तो फिर उद्योगों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए गिनती के शिथिलताओं को पाने हेतु लाखों युवकों को कॉलेजों और शालाओं में खींच कर उनके मन, तन एवं उनके मां-बाप के धन की बर्बादी ही की जाती रही है। वास्तव में यह शिक्षा नहीं हैं, लेकिन राष्ट्र के उत्तम बुद्धिधन का उद्योगों द्वारा किया जाने वाला अपहरण ही हैं।
पाँचवी कक्षा तक पहुँचते पहुँचते ही 513 लाख बच्चों को पढ़ाई छोड़कर मजदूरी के लिए भटकना पड़ता है। यह प्राप्त नहीं होती तो अधिकतर संख्या बेकार होकर पूरक मजदूरी की खोज में भागदौड़ मचाती रहती है। थोड़े से लोग समाजविरोधी प्रवृत्तियों में भी लग जाते हैं।
A photograph showing a group of children, some carrying large sacks on their heads, standing in front of a large orange truck. The children are dressed in simple, worn clothing. The ground is dusty and uneven. The truck is a large commercial vehicle, likely used for transporting goods. The scene depicts the harsh reality of child labor in India.
शिक्षा क्षेत्र के इस षड्यंत्र को बंद करें।
शिक्षा के इस समूचे षड्यंत्र पर रोकथाम लगाकर, यदि इसमें परिवर्तन न लाया गया तो भयानक परिस्थिति से देश बर्बाद हो जाएगा। 1853 में अंग्रेजों को अनपढ़ भारतवासियों की ओर से जो खतरा महसूस हो रहा था, वही खतरा अब अर्धशिक्षित भारतवासी देश की सुरक्षा के लिए पैदा कर रहे हैं।
हम ऊपर देख चुके हैं कि चौथि पंचवर्षीय योजना में शिक्षा पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के लिए 7 अरब रुपये अलग निकाले गए थे, जबकि उद्योगों में 1671-72 तक, सार्वजनिक क्षेत्र में कारखाने खड़े करने के पीछे 552 अरब रुपये लगाए गए, जबकि निजी क्षेत्र में 9864 करोड़ रुपयों की लागत से 13084 फैक्ट्रियाँ स्थापित की जा चुकी थीं, जिनके पीछे केवल 41 लाख लोगों को रोजगार मिला।
देश में 5,75,721 गाँव हैं, उनमें 3,18,1611 गाँवों में 500 से भी कम आबादी है। 1,32,873 गाँवों में 1000 से भी कम लोग बसते हैं। 10 हजार से अधिक आबादी वाले नगर तो केवल 1800 ही हैं।
उद्योग बेकारी दूर करने में सहायक नहीं बन पाए हैं।
हमारा देश आजाद हुआ, तब देश में 40 लाख लोग बेकार थे। उसके बाद लोगों को रोजगार देने के नाम पर 14,916 करोड़ रूपयों की लागत से कारखाने बनाए गए। बेकारों की संख्या 40 लाख से बढ़कर 4 करोड़ तक पहुँच गई। इन फैक्ट्रियों में मानव संसाधन पूरा करने के लिए समग्र प्रजा पर शिक्षा का राक्षसी और निर्थक बोझ डाला गया। देश के लाखों आशावान् युवकों को आज भी हताश बनाकर बेकारी, बीमारी, अपराध और मंहगाई से पीड़ित समाज में धकेल दिया जाता है।
बढ़ती हुई बेकारी के इस प्रवाह का कारण जनसंख्या वृद्धि बताकर आत्म-प्रवंचना करना सरकार का पुराना शगल है। क्योंकि आबादी में बढ़ावा 50 प्रतिशत है जबकि पब्लिक सैक्टर के ही औद्योगिक कारखानों में पूंजी लगाने का वृद्धि प्रमाण 358 प्रतिशत और बेकारी की वृद्धि 900 प्रतिशत है।
और, फिर वर्तमान शिक्षा द्वारा प्रजा के चारित्र्य का स्तर भी ऊँचा नहीं उठा है। भ्रष्टाचार और सामाजिक अपराधों में जिस प्रकार लगातार वृद्धि होती जा रही है, वह हमारी नैतिक गिरावट की सूचक हैं। बेकारी बेहद बड़ी है। जो वर्ग मानसिक रूप से भारत विरोधी था, उसके दिमाग को हम भारत-
उन्मुख नहीं बना पाए। देश में जगह-जगह पर होने वाले कौमी दंगे इसके सबूत हैं। स्वाधीनता के पन्नीस सालों तक जो राष्ट्रीय भावना थी उसका बहुत जल्द वाष्पीकरण हो गया और उसके स्थान पर प्रादेशिक भावना बलवती होने लगी हैं। राष्ट्रीय एकता को हड़प कर लेने वाली इस स्थिति का कारण है- अंग्रेजों द्वारा लिखित भारत का बेहद झूठा, आधारहीन परिकथाओं जैसा कल्पित इतिहास। इस इतिहास ने विभिन्न कौमों और प्रान्तों के बीच वैमनस्य पैदा किया है। इसी जहर के कारण प्रत्येक राज्य में और केन्द्र में भी कुर्सी-युद्धों का अंत नजर नहीं आता।
यह परिस्थिति किसी भी सयाने आदमी को चिंतित बना दे ऐसी हैं।
ग्रामीण बच्चों को डिग्रियों के पीछे न दौड़ाएं
ग्रामीण बच्चों का अधिकांश वर्ग किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण कारीगरों द्वारा बना हुआ है। उन्हें अपने पैतृक धंधे करने होते हैं। इन धंधों को छोड़कर व उन उपाधियों के पीछे दौड़ेंगे तो बेकारी का बोलबाला हो जाएगा और कृषि, पशुपालन और ग्रामीण उद्योग नष्ट हो जाएंगे, जो अंधेरगर्दी में परिणत हो सकता है और राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। राष्ट्र को पालने, पोषने और प्रजा की जीवन-जरूरतें पूरी करने का कर्तव्य इन बच्चों को ही निभाना होगा। इस कार्य में उन्हें कॉलेज की उपाधियाँ किसी काम में की नहीं आती।
उन्हें कृषि और पशुपालन सीखना हो तो B.Ag. या Veterinary Surgeon की उपाधि लेने की कोई आवश्यकता नहीं हैं।
यदि सत्रे मन से शुद्ध हृदय से मानवजाति को संकटपूर्ण स्थिति से उबार कर विश्व को शांति और कल्याणकारी, मंगलमयता प्रदान करना है, तो भारतीय ऋषि-मुन-महात्माओं द्वारा मोक्ष चार पुरुषार्थों की सनातन संस्कृति को आत्मसात् करना होगा। जिसके आधार पर यह विश्वशांति, मानवता का कल्याण एवं मंगलमय स्वरूप टिका हुआ है, यह शाश्वत सत्य हैं।
भारत में एक बहुत बड़ी क्रान्ति शुरू हुई है कि गुरुकलों का पुनः प्रस्थापन युगानुकूल रूप में हो रहा है।
क्योंकि जहाँ पर सर्वांगीण और समग्र शिक्षा मिलेगी वही पर बच्चा आगे जाएगा।
जब तक समाज शिक्षा का दायित्व अपने हाथ में नहीं लेता, सरकार चाहकर भी परिवर्तन नहीं कर सकती।
स्वाभिमान और समृद्धि की कुंजी है
स्थानीय संसाधन और स्थानीय कौशल - अतुल जैन
(लेखक दीनदयाल शोध संस्थान के सचिव हैं, लेकिन इस लेख में उनके विचार निजी हैं।)
पूरे विश्व में इस समय हाहाकार मचा हैं, मंदी का एक भंयकर दौर चल रहा हैं, पश्चिम की सभी अर्थव्यवस्थाएँ एक-एक कर इस दल-दल में धंसती चली जा रही है। अपना देश अगर अभी तक इस भयानक परिस्थिति से बचा हुआ है तो सिर्फ इसलिए कि वैश्वीकरण की चकाचौंध के बावजूद उसका एक बहुत बड़ा वर्ग अभी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और इसके अधिष्ठान में है, हमारे किसान, हमारे कारीगर, हमारी परिवार व्यवस्था और परंपराओं में हमारी आस्थआ व उनके प्रति हमारा प्रेम। ये परम्पराएँ सिर्फ सामाजिक स्तर पर ही नहीं, आर्थिक रूप से भी हमें मजबूत बनाए हुए हैं।
शहरों ने, शहरीकरण की प्रवृत्ति ने परंपराओं को तोड़ने की कोशिश जरूर की है, लेकिन हमारी सामाजिक व्यवस्थाओं ने कम से कम गांवों में तो उन्हें अभी थामे रखा है। इसका हमें गर्व होना चाहिए, परंतु यह भी सच है कि गाँवों से बड़ी तादाद में शहरों की तरफ पलायन हो रहा है, हजारों की संख्या में बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में रोजाना शहरों की ओर कूच करने लगे हैं, इसके लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार है, तो हम स्वयं भी उतने ही जिम्मेदार हैं, समाज ने अपनी आवश्यकताएं, पसंद- नापसंद, इच्छाएं-अनिच्छाएँ, सभी शहरों के समान ढालने शुरू कर दिए, अपने संसाधनों की अनदेखी कर, अपने कौशल को तुच्छ समझ कर हम नौकरी पर आश्रित होने लग गए हैं।
गाँव के लोहार का बेटा अगर स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ अपने दादा और पिता से उनके हुनर के कुछ राज समझता है, उन्हें काम करते हुए देखता है, उन्हें सुनता है और कभी-कभी हाथ बटाता है तो यह कोई तथाकथित बाल-श्रम के कानून में नहीं आता, यह तो वांछित है, होना ही चाहिए, गलीचे बनाने वाले किसी परिवार के बच्चे अगर उस खानदानी पेशे में शुरू से ही दिलचस्पी लेने लगते हैं तो क्या वे वर्तमान, दिशाहीन स्कूली शिक्षा से बेहतर शिक्षा प्राप्त नहीं कर रहें होते?
चरखा स्वयं एक कीमती मशीन है, हाथ कताई ही दरिद्रता को भगाने का और धन के अभाव को असंभव बनाने का एक मात्र सुलभ उपाय है। - गांधी जी
आधुनिक शिक्षा को कड़ी चुनौती
अमेरीका के हॉवर्ड विश्वविद्यालय से लेकर भारत के आई.आई.टी. तक में क्या कोई ऐसी शिक्षा दी जाती है कि छात्र की आँखों पर रूई रखकर पट्टी बांध दी जाए और उसे प्रकाश की किरण भी दिखाई न दे, फिर भी वह सामने रखी हर पुस्तक को पढ़ सकता है! है न चौँकाने वाली बात? पर इसी भारत में किसी हिमालय की कंदरा में नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के गृहराज्य गुजरात के महानगर अहमदाबाद में यह चमत्कार आज साक्षात् हो रहा है। तीन हफ्ते पहले मुझे इस चमत्कार को देखने का सुअवसर मिला। मेरे साथ अनेक वरिष्ठ लोग और थे। हम सबको अहमदाबाद के हेमचन्द्रचार्य संस्कृत गुरुकुल में विद्यार्थियों को अद्भुत मेधा शक्तियों का प्रदर्शन देखने के लिए बुलाया गया था। निमंत्रण देने वालों के ऐसे दावे पर यकीन नहीं हो रहा था, पर वे आश्चर्य थे कि अगर एक बार हम अहमदाबाद चले जाएं, तो हमारे सब संदेह स्वतः दूर हो जाएंगे और वही हुआ, छोटे-छोटे बच्चे इस गुरुकुल में आधुनिकता से कोसों दूर पारंपरिक गुरुकुल शिक्षा पा रहे हैं, पर उनकी मेधा शक्ति किसी भी मंहगे पब्लिक स्कूल के बच्चों की मेधा शक्ति को बहुत पीछे छोड़ चुकी है।
दूसरा नमूना उस बच्चे का है, जिसे आप दुनिया के इतिहास की कोई भी तारीख पूछें, तो वह सवाल खत्म होने से पहले उस तारीख को क्या दिन था, ये बता देता है। इतनी जल्दी तो कोई आधुनिक कम्प्यूटर भी जवाब नहीं दे पाता। तीसरा बच्चा गणित के 50 मुश्किल सवाल मात्र ढाई मिनट में हल कर देता है। यह विश्व रिकॉर्ड है। ये सब बच्चे संस्कृत में वार्ता करते हैं, शास्त्रों का अध्ययन