हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
हम्मीररासो २१ कटाछं करैं मंद हासं प्रसारैं¹। तहाँ पद्म अंगं लगै ना निहारैं ॥ ११४ ॥ दोहरा छंद पावस हारि बिचारि जिय, ऋपि न तज्यो तप आप। तब सु मैन मन मैं कहिय, उपजे सरद सुताप ॥ ११५ ॥ शरद ऋतु वर्णन छंद त्रोटक तजिये तप पावस बित्ति सबं। ऋतु² सारद बादर दीस अचं ॥ सरिता सर निम्मल नीर³ बहैं। रस रंग सरोज सु फुल्लि रहैं ॥ ११६ ॥ बहु खंजन रंजन भृंग भ्रमैँ। कलहंस कलानिधि बेदि* भ्रमैँ ॥ बसुधा सब उज्ज्वल रूप कियं। सित बासन जानि बिछाय दियं ॥ ११७ ॥ बहु भाँति चमेलिय फूलि रही। लखि मार सुमार सुदेह दही ॥ बन रास बिलास सुवास भरैं। तिय काँम⁴ कमाँन सुतानि धरै ॥ ११८ ॥ समर्गों⁵ पर तैं नर काँम जगै। बिरही सुनि कै उर ध्याव⁶ खगै ॥ घर अंबर दीपग जोति जगी। १ प्रहारैं । २ रति । ३ बारि । ५ बाँन । ५ श्रमगे । ६ घाव । * बेदि-( बेधि )=बेधकर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
२२ हम्मीररासो नर नारि लखैं उर प्रीति पगी ॥ ११६ ॥ ऋषि पास त्रिया सर न्हान रच्यौ । जल केलि अनेक१ प्रकार मच्यौ ॥ बिन चीर अधीर लखै नर वै । कुच पीन नितंब सुकाँम तबै ॥ १२० ॥ कबरी छुटि नागनि सी दरसै । सुर संग भ्रमै रस सों सरसै ॥ ऋषिराज महा उर धीर अयं । रितु सारद हारि सुजात रयं ॥ १२१ ॥ दोहरा छंद हारि मानि सारद् गइय, उठि हेमंत सकोपि । महासीत प्रगटिय जगत, सवै लाज तजि लोपि ॥ १२२ ॥ हेमंत ऋतु वर्णन छप्पय छंद तब सुहेम करि कोप सीत अति जगत प्रकास्यौ । बिखम तुषार अपार मार उपचार सुभास्यौ२ ॥ कंपत ३ चैतन रूप कहा जर जरत समूरे । तिय हिय लगि लगि बचन चरत मुख सैन सरूरे ॥ तिहिं समय जीव सब जगत के भए इक्क नर नारि सब । उरबसी आय ऋषि निकट तँक४ हिये लाय मौंहिं५ सरन६ अब ॥१२३॥ दोहरा छंद खुली न कठिन समाधि ऋषि, चली हिमंत सुहारि । सिसिर परस मन बरनि करि, उठी सुकाँम जुहारि ॥१२४॥ १ अपुब्ब । २ सुभाष्यौ । ३ नचौ । ४ तैं,लौं । ५ मुहिं । ६ सरनि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो २३ शिशिर ऋतु वर्णन छंद मोतीदाम कियौ तब मार हुकम्म सु हेरि। उठी सिसिरौ¹ तव आयसु फेरि ॥ किये नव पल्लव जे तरु वृंद। प्रफुल्लित अंब कदंव स्वच्छंद ॥ १२५ ॥ बहैं बहु भाँति त्रिबिद्धि समीर । रहै नहिं धीरज होत अधीर ॥ लता तरु भेंटत² संकुल भूरि । भए तृण गुल्म हरे जड़ मूरि ॥ १२६ ॥ मिटै जग सीत न ताप न तोय । सवै सुखदायक जोवन सोय ॥ झुके फल फूल लता बर भार । भ्रमैं बहु भृंग जगावत मार ॥ १२७ ॥ लगी लखि बायु सबै तिहिं बार । सुने डफ लाज तजैं नर नार ॥ बजावत गावत नाचत³ संग । अबीर गुलालरु केसरि रंग ॥ १२८ ॥ भए मतवार सु खेलत⁴ फाग । महा सुख संग सँजोगगनि⁵ भाग ॥ बियोग्गनि जारत मारत मार । अनेक सुगंध अनेक बिहार ॥ १२६ ॥ १ ससियौ । २ भिंटत । ३ नच्चहिं । ४ खिल्लत । ५ सँजुग्गनि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
२४ हम्मीररासो वसंत ऋतु वर्णन छंद लघुनाराच असंत संत मोहियं, बसंत खोलि जोहियं । बजंत¹ बीन बाँसरी, मृदंग संग आँसुरो ॥ १३० ॥ लियं सुबाल बृंदयं, जगत्त कामँ द्वंदयं । अनेक रूप सुंदरी, मनोज राव की छुरी ॥ १३१ ॥ स्वबेस केस पासयं, मनो कि मैन फाँसयं । गुही त्रिबिद्धि बैनियं, कि मोह किन्न² सैनयं ॥ १३२ ॥ महा सुघट्ट पट्टियं, सृँगार भूमि फट्टियं । बिचै सुमंद³ रेखयं, महा बिसुद्ध देखयं ॥ १३३ ॥ बिसाल भाल सोमियं, छपा सु नाथ लोभियं⁴ । सु मध्य सीस फूलयं, दिनेस तेज तूलयं५ ॥ १३४ ॥ भरी सु मुक्त मंगयं, मनो नक्षत्र संगयं । बिसाल लाल बिंदयं, मिले सु भोम चंदयं ॥ १३५ ॥ जराव आड भाइयं⁶, मनो मिलन्न आइयं । दिनेस भोम बुद्धयं, ससि गृहे सु सुद्धयं । १३६ । कपोल गोल आह्नसं, कि भौंह भौर साहसं । प्रफुल्ल कंज लोचनं, मृगाखिख⁷ गर्ब मोचनं ॥ १३७॥ त्रिबिद्ध रंग गातयं, सु स्याम स्वेत राजयं८ । बनी कि कीर नासिका, सु गत्थ नत्थ भासिका ॥ १३८॥ मनो सु काम ओपयं९, दयौ सुचक्र१० कोपयं । करन्न फूल राजयं, उभै कि भाँन साजयं ॥ १३९ ॥ १ सुढंग ताल खंजरी । उपंग संग श्रंसुरी । २ कीन । ३ सुमंग, माँग । ४ लोपियं । ५ तुल्यं । ६ भालय । ७ मृगासि । ८ रातयं । ६ वोपयं । १० चक्र । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो २५ सुहंत स्याँम अलकं, भ्रमत्त भौर वल्लकं । अरुन्न रेख बेसरं, पियूष कोस देखयं ॥ १४० ॥ अनार दंत कुंदयं, लसंत बज्र दंतयं¹ । बुलंत बाणि कोकिला, बिपंच की सुरं मिला ॥ १४१ ॥ कपोति पोति कंठयं, सुधार हार कंठयं² । छप्पय छंद कुच कंचन घट प्रगट, नाभि सरवर वर सोहै । त्रिबली पापहुँ ललित, रोम राजी मन मोहै ॥ पंचानन मधि देस, रहत सोभा हियहारी । मनहुँ काम के चक्र, उलटि दुंदुभि दोउ डारी³ ॥ दोउ⁴ जंघ रंभ कंचन दिपत⁵, घरी कमल हाटक⁶ तनै । गति हंस लखत मोहत जगत, सुर नर मुनि धीरज हनै ॥१४२॥ जिती उब्बरसी संग, सकल सम्मूह मिलिय वर । बिचि सु मैन सह सैन गए, ऋषि निकट मरूकर ॥ गावत बिबिधि प्रकार, करत लीला मन भाइय । हाव भाव परभाव, करत आश्रम मैं आइय ॥ ऋषि निकट आय होरिय रचो, बर्षत रंग अनंग गति । नन⁷ चलै चित्त ज्यों ज्यों⁸ अचल, करत कृया त्यों त्यों अमित॥१४३॥ दोहरा छंद. करि बिचार त्रिय कृत कृया, कुसुम कुंद गहि⁹ लीन । लीला ललित सु ब्रिथ्थरिय,¹⁰ चंचल बयसु नवीन ॥ १४४॥ ससि मुख बृंद¹¹ स्वच्छंद मिलि, रति सम रूप अनूप । ऋषि समीप क्रीड़ा करत, हरत धीर मुनि भूप ॥१४५ ॥ १ द्वंदयं । २ तंठयं । ३ निस्साँन सुधारी । ४ दुहुँ । ५ उलटि । ६ हारक । ७ चन । ८ मौ । ९ कहि । १० विस्तरी । ११ वोइ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
२६ हम्मीररासो चौपाई छंद बर्षत रंग अनंग सु बाला । मनहुँ¹ अनेक कमल की माला ॥ चंचल नैन चलैं चहुँ आसा । रूप सिंधु मनु मीन सु पासा ॥१४६॥ घूँघट ओट दुरत प्रगटत यौं । मनौं संसि घटा दबत उघटत ज्यौं ॥ बिलुलित बसन अंग दुति सोहै। निरखत सुर नर मुनि मन मोहै ॥१४७॥ अलक सलक² अतिसै चटकारी । अमी पियत³ ससि नागनि कारी ॥ छुटै गुलाल मुठी मृदु मुसकै । चूवै अधर⁴ बिंब रस चमकै ॥ १४८ ॥ करैं गान पसु पच्छी⁵ मोहैं । कहो जगत इन पटतर को है ॥ लै लै गेंद परस्पर मेलैं । बाल बृंद मिलि मिलि सुख मेलैं ॥ १५० ॥ अध ऊरध⁶ चहुँ ओर सुमारैं । लजति खिजति लगि⁷ प्रेम प्रहारैं । मंद पवन लगि चीर परयो धर । कुच अंकुर⁸ उर मनहुँ उभे हर ॥ १५० ॥ दमकति दिपति सलौंनी दीपति । कामलता बिहरैं मनु गज गति९ ॥ १ मनौं । २ चिलक । ३ पीवत, पवत । ४ अधर बिंब रसकै चसकै । ५ पच्छिय, पच्छी । ६ अद्ध उद्द । ७ मिलि । ८ अंबर । ६ झीन लंक अंग झलकत बर । नाभि गंभीर त्रिबलि अति सुंदर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
[Page Header] हम्मीररासो २७
लगत गेंद कंपित उर भागी । मंद मुसुकि ऋषि निकट सुपागी १ ॥ १५१ ॥ सुमन बूंद सौरभ उठि भारी । भ्रमर पुनीत२ गुँजार३ उचारी४ ॥ सरद उन्मद्५ संधाँन सु किन्हौ । अति रिसि तानि स्त्रवन उर दिन्हौ ॥ १५२ ॥ छुटि समाधि ऋषि नैन उघारे । अति सकोपि सम्मर उर मारे ॥ चहुँ दिसि चितै६ चक्रित ऋषि भयऊ । लखि तिय बृंद अनंद सु भयऊ ॥१५३॥ लीला गेंद फागु मिसि७ दौरी । हो हो करत उठी बर जोरो८ ॥ बन अकेलि तिय पुरुष न कोऊ । लीला अमित देखि दृग दोऊ ॥१५४॥ रंग अपार डारि ऋषि ऊपर । कल कल हंस बजत पद नूपर ॥ करैं९ कटाक्ष अनेक सु बाला । नैन सैन सर लगि चित चाला ॥१५५॥ अंग अंग गहि फाग१० सु मगै । परसि गात तब कॉंम सु जगै११ ॥
१ सुनि बादित्र गाँन कल लीला । कॉंम कोपि सर धनुष सुमीला । २ पुनिच । ३ गुंजार । ४ त्रिबिधि समीर सुहावन जानी । प्रफुलित नूत बैठि धनु पानी । ५ उन्माद । ६ चित । ७ मिलि । ८ कंदुक केलि और मिसि होरी । भोरी निपट लेत चित चोरी । डारि मोहिनिय मोहिव जाला । माया बसि भौ ऋषि तिहिं काला । ९ करत । ११ फाग सुमागै । ११ जागै ।
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२८ हम्मीररासो मुख मीँडत$^१$ अंजन गहि दिन्नौ । जग्यौ काँम ऋषि काँम सु भिन्नौ ॥१५६॥ लाख मुसक्यानि भई मति भोरी । जीति सरस$^२$ ऋषि काँमनि हेरी ॥१५७॥ ——— अथ तुलसीदास पूर्व पक्ष$^३$ दोहरा छंद का नहिं पावक जरि सकै, का न समुद्र समाय । का न करै अबला प्रबल, किहिं$^४$ जग काल न खाय ॥१५८॥ कबि लखन$^५$ अबला कहत, सबला जोध कहंत । दुर्बिला$^६$ तन मैं प्रगट जिहिं, मोहत संत असंत$^७$ ॥१५६॥ जीति सिसिर बित्तिय$^८$ तबै, फिरि आयव ऋतुराज । मिले उर्बसी पद्म ऋषि, सरे सक्र के काज ॥१६०॥ बिवस भए$^९$ मुनि अच्छरा$^{१०}$, भुलिय तप व्रत नेम । निसि बासर क्रीड़ा करत$^{११}$, वढ्यौ जु तन मन प्रेम ॥१६१॥ सुरति बढ़ी चित मैं चढ़ी, मढ़ी मोह मति भूरि । छिन छिन तिय ऋषि रजत$^{१२}$ दोउ, भयउ$^{१३}$ प्रेम परिपूरि ॥१६२॥ हृदय पुरंदर त्रास गनि, गइय$^{१४}$ उर्वसी त्यागि । बिन माया ऋषिराज तब, मन सुत्तो$^{१५}$ सो जागि$^{१६}$ ॥१६३॥ जाय जुहारे इंद्र कौ, काँम उर्वसी संग । कज्ज$^{१७}$ सँबारयौ रावरौ, करयौ कठिन तप भंग ॥१६४॥ —————————— १ माडत । २ ससिर । ३ अथ तुलसीदास रामायने पूरब पच्छि । ४ को । ५ लाखन । ६ द्विर्बिला, द्रुबिला । ७ अनंत । ८ बीती । ६ भयौ । १० अच्छरिय । ११ करै । १२ राज । १३ भरे । १४ गई । १५ सोवत सो । १६ लागि । १७ काज । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो २९ ( बचनिका ) बार्त्तिक तब इन्द्र कामादिक कौ सत्कार कियौ । यहाँ ऋषि पद्म सूतो सो जाग्यौ । मन महँ बिचार करन लाग्यौ । मैं तो माया मैं पाग्यौ तप खोयौ औ कलंक लाग्यौ । और अब दोनों गईंँ तपस्या तो खंडित भई, अरु उर्वसी हू जात रही अब यातैँ यह सरीर राखनो योग्य नहीं और मन की बासना भौत ठौर भई तातैं एक सरीर सूँ कछू बनि आवै नही । जब ऋषि होम करि सरीर त्यागौ । जहाँ जहाँ बासना रही तहाँ तहाँ१ पाग्यौ ॥ दोहरा छंद तिय बियोग ऋषि तन तज्यौ, ग्यारा सै चालीस । माघ सुक्ल द्वादसि सु तिथि, बार बरनि रजनीस ॥१६५॥ छंद पद्धरी तन पात किन्न ऋषि पदूम आप । उर्वसी बिरह तन मन सु ताप ॥ ग्यारा सौ चालोस जानि । नृप बिक्रम संबत. ताहिं मानि ॥१६६॥ तप२ सिद्धि मास अरु बहुत पच्छि । ऋतु सिसिर द्वादसी तिथि सु रच्छि ॥ सिवबार सोम जान्यौ प्रसिद्ध । जित प्रीति योग बिच३ करन अद्ध ॥१६७॥ रबि अयन४ अंस अठ बीस मानि । ससि जन्म त्रियोदस अंस जानि ॥ सुध मीन लग्न बिगृह सु त्यागि । करि हवन जवन सुख हृदय पागि ॥१६८॥ १ ही । २ तपसि । ३ बिव । ४ एण । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
३० हम्मीररासो निजं प्रथम अंग पंचांग होम । जित रही बासना सरस धोम X ॥ ऋषि मुद्गल गोती सिखाहीन । वहि तिलक हृदय आयौ नवीन ॥१६९॥ सिर भयौ पृथ्वीपति जवन ईस । जिहिं राज्य करचौ १ पूरण दिलीस ॥ वह रहौ तिलकै दिय परि अनूप । तहँ भौ २ हमीर चहुवाँन भूप ॥१७०॥ दोउ बाद कर्म्म किन्नौ सु चाहि । दोउ भए भीर महिमा सु साहि ॥ अरु लग्न उर्वसी चरन संग । यह भए पंच ऋषि पद्म अंग ॥१७१॥ ( वचनिका ) वार्तिक ऋषि पद्म उर्वसी को बिरह तन त्याग्यौ । माह सुक्ल १२ द्वादसी सोमवार आद्रा नक्षत्र प्रीति योग बवकर्ण, सूर्य्य २८ अठाईस, चंद्रमा मिथुन को तेरा १३ अंस, मीन लग्न मैं देह होमी । पाँच अंग होम्याँ जितनी बासना जितनी जायग हुई । ताहीं सों पाँच स्वरूप एक सरीर का हुवा ॥ ❖ अथ राव हम्मीर को जन्म ३ वर्णन दोहरा छंद ससि बेद् रुद्र संबत गिनो, अंग खाअ षित साक । दक्षण अयन सु सरत ऋतु, उपजे गए न नाक ॥१७२॥ १ करयउ । २ भयौ । ३ जन्म समयो, जन्म समय्यो । X धोम=धूम्र । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ३१ गजनी गौरो साह सुत, भय अलावदी साय । ताहीं दिन रणथंभ, गढ़, जन्म हमीर सु आय ॥१७३॥ यह हमीर नृप जैत कै, अमर करण आचार । मीणा भारू बंधु दोउ भई नारि तिहिँ बार ॥१७४॥ छंद पद्धरी ससि रुद्र बेद संबत सुजाँन । षट सहस इक्क साको प्रमाँन ॥ रबि जाँम अयन दक्षण सुगोल । ऋतु सरद सुभ्र सुंदर अमोल ॥ १७५ ॥ तिथि भाँन उंर्ज बल पच्छि जानि । रबि घटो तीस अरु दोय मानि ॥ हिर वुध्न बेद घटि घटिय साठ । व्याघात योग मुनि घटी आठ ॥ १७६ ॥ बालव्व नाम सोइ कहत कर्ण । यहि भाँति कह्यउ पंचांग बर्ण ॥ रबि उदय इष्ट घटिका छतीस । पल सून्य पंच जान्यूँ सदीस ॥ १७७ ॥ पल षोड़स अट्ठावीस दंड । दिनमाँन जाँन तिहिं दिन सुमंड ॥ इकतीस चवाली रात्रि मानि । सब घटिय साठि दिन राति जानि¹ ॥१७८॥ भौ² जन्म लग्न मिथुनेस आय । द्वादसह अंस गंस भए बताय ॥ तुलभाँन सप्तदस अंस मानि । सरि रुद्र³ अंस झख रासि मानि⁴ ॥१७९॥ १ मानि । २ भयौ । ३ सर रुद । ४ जानि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
३२ हम्मीररासो मंगल सुआल धरि एक अंस। बुध बारह वृश्चिक मैं प्रसंस ॥ घटि जीव एक अंसह सुसुद्ध । भृगु कन्या विद्या सुभग उद्दु ॥१८०॥ संसि मीन तीस कटि एक अंस । तिय राशि कह्यौ सुरभानुत्तंस ॥ सोइ कहे अंस चौबीस पूर । यह जन्म लग्न हम्मीर सूर ॥१८१॥ सुनि राव जैत मन हर्ष किन्न । भंडार अमित सब खोलि दिन्न ॥ गुरु बिप्र मंत्र मंत्री सु बोलि । बड़ भीर भइय नृप आय पौलि ॥१८२॥ किय स्राद्ध नंदि मुख बेद वृद्धि १ । सब जात कर्म किन्नौ सु सुद्धि ॥ गो भुम्मि अन्न कंचन सु दिन्न । द्विजराज सकल संतुष्ट किन्न ॥१८३॥ लिय बोलि सकल जाचक सु वृंद । हय हेम सुखासन दीन बंद ॥ बहु भूषन वाहन बिबिध रंग । जिहिं चाह लही सो दियौ संग ॥१८४॥ दधि दूब हरद भरि कनक थाल । बहु गाँन करत प्रबिसंत बाल ॥ दुंदुभि बजंत घर घरन बार । ध्वज कनक पताका द्वार द्वार । १८५॥ औछाह राजमंदिर अनूप । १ बिद्धि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासा ३३ आनंदमग्न नर नारि भूप ॥ सब दाँन देत घर घर उछाह। सब भय अजाचि जाचत सु ताह ॥१८६॥ बहु मंगल गावत अति अनूप । जय जयति कहत चहुवाँन भूप ॥१८७॥ वचनिका राव जैत कै गढ़ रणथंभवर तहाँ जैत घर हम्मीर जन्म्यौ संबत ११४१ साकौ १००६ दक्षणायन सरद ऋतु कार्तिक सुक्ला १२ द्वादसी रविवार घटी ३२ उत्तरा भाद्रपद घटी ६ पल ५६ । कछु घर को घरचौ पायौ । एक सेवक लोह पत्र पाथर सों घस्यौ तहाँ लोह सोनो ( सुवर्ण ) भयौ राव जैत कौं आणि दयौ ब्याघात योग घटी १६ पं० बालव कर्ण घटी २८ इष्ट घटी २६ पल ५ दिनमाँन घटी २८ पल १६ रात्रिमाँन घटी ३१ पल ४४ तुला संक्रांति गतांस १७ भोगांडस १३ चंद्रमा मीन को ११ अंस मंगल कन्या को १ अंस बुध वृस्चिक को १२ अंस वृहस्पति कुंभ को १ अंस सुक्र कन्या को १४ अंस सनि मीन को २६ अंस राहु कन्या को २४ अंस राव हम्मीर असी घड़ी जन्म लियौ । सब को मनोरथ पूर्ण कियौ । सर्ब वंस मैं हर्ष हुवो और अजमेर चित्तोड़ जु बोलि बिप्र पोष्या जाचक संतोख्या १ मंगल गाए बधावा २ बजाया ॥ ——— १ सरबस मैं (सर्वस्व मैं) दान दीन्हौं जग जस लीन्हौं । २ भए मन भाए। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
३४ हम्मीररासो अथ हम्मीरराव को और अलाउद्दीन पातसाह को बैर समय्यो बर्णन दोहा इक्क¹ समय पातसाह बन, मृगया कहि मन किन्न² । सबै खाँन उमराव चढ़ि, हय गय बृंद सु लिन्न³ ॥ १८८ ॥ हरम सबै पतसाह को, जो सिकार के जोग । साज बाज बनि बनि सकल, अरु अंदर के लोग ॥ १८६ ॥ सुंदरता सुकुमार निधि, वहै अपछरा अंग⁴ । ताके गुन गन तैँ बँध्यौ, निमिष न छाँड़त⁵ संग ॥ १६० ॥ छंद भुजंगप्रयात चले साह आखेट⁶ बज्जे निसाँनं । सबै भूप सथ्थं सुपथ्थं⁷ सुजाँनं ॥ सजे डंबरं अंबरं साज बाजं । बनी पख्खरं बाजि सांजं समाजं ॥ १६१ ॥ किते बीर बाने अमाने अपारं । किते मीर धीरं सजे सार धारं ॥ नफीरी बजी भेरि बज्जे रवहं । वहै उर्वसी संग लिन्नी समहं ॥ १६२ ॥ जके रूप सौं साह बंध्यौ सुजाँनं । जथा चंद्र की कांति चकोर माँनं ॥ जथा पंकजं⁸ वै दुरैफैं लुभाए । तथा साह बंध्यौ सनेहं सुभाए ॥ १६३ ॥
१ एक। २ कीन। ३ लीन। ४ अच्छरी अंग। ५ छंडहिं। ६ आलादि (अलाउद्दीन)। ७ समत्थं सुखाँनं। ८ पंकजं पै दुरैफै लुभाए।
हम्मीररासो ३५ चले हयदलं पयदलं सत्थ रक्थं¹ । किते स्वाँन चीता मृगं संग जुध्थं ॥ चले साह गोसं सरोसं सुभाँनं । बजे नद्द नीसाँन नठन्नीन² चावं ॥१६४॥ उठी रेणु आकास छायौ सुहद्दं । मनो पावसं मेघ गज्जे सबद्दं³ ॥ चले तेज ताजी सुबाजी अपारं । सबै खाँन सुलतानं संगं जुझारं ॥१६५॥ करैं बीर लीला सुकीली⁴ बिधाँनं । धरैं बाँन कम्माँन संधाँन पाँनं ॥ लखे जीव जेते सु केते जिहाँनं । भ्रमै जंत्र तंत्रं सु पावै न जाँनं ॥१६६॥ बनै⁵ बेहरं गोत्र गंभीर नारी⁶ । बहैं नीर नद्दं सुभद्दं उन्हारी ॥ झरैं निज्झरं⁷ नाद भारी असारं⁸ । रहे फूलि संकूल बृक्षं अपारं ॥१६७॥ जहाँ अंब नीबू भए और केलं । सबै बृच्छ⁹ फुल्ले फले भार मेलं ॥ भरी भार साखा¹⁰ रही भुम्मि लग्गी । लता संकुलं पाद पंतैं उमग्गी ॥१९८॥ भ्रमै भृंग पुंजं सुगुंजं अपारं । मिली बेलि केती महीरूह¹¹ डारं ॥ मनौं मार अप्पार ताँने बिताँनं । १ हत्थं । २ वानै सुचावं । ३ सुमंद्दं, सुसद्दं । ४ सकेली । ५ बनं । ६ भारी । ७ नीझरं, निर्झरं । ८ पहारं । ६ बृक्ष फूले । १० सारं । ११ महीरोह । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
३६ | हम्मीररासो
तिहूँ काल हेरै लखै नाहिं भाँनं ॥१९९॥ रमै कोकिला कीर नच्चै मयूरं । कहैं बैन मानो बजै कामँतूरं ॥ बहै सीत मन्दं सुगंधं पवन्नं । करै काम उद्दीपनं देखि बन्नं ॥२००॥ सुरं^१ सुंदरं पंकजं बन्न फुल्ले । करैं गुंज भारी भ्रमै भ्रमर मुल्ले ॥ चहूँ ओर कुमोदनी चारु फुल्ली^२ । महा मोद सौं भार आनंद झुल्ली ॥२०१॥ किते जीव संमूह देखंत भज्जैं । मृगं व्याघ्र चीते रिछं जत्र गज्जैं^३ ॥ कहूँ कौलपुंजं कहूँ लीलगाहं । कहूँ चीतलं पांडुलं^४ ब्याघ्र नाहं ॥२०२॥ कहूं भिल्ल बंके^५ बसैं ताङस्थाँनं^६ । भखैं सिंह स्यार ससाझोन पाँनं ॥ करै सिंह गुंजार भारी भयाँनं । सुने प्राँनहारी डरैं जीव हाँनं ॥२०३॥ तहाँ साह की सेन किन्हौं प्रबेसं । तजे खाँन^७ पाँनं लए जो असेसं ॥ करैं बीर जेते सु केते उपावं । हनैं जीव जे साहि को बाज^८ पावं^९ ॥२०४॥ तहाँ साह कै यूँ भए जाय डेरा । चहूँ ओर को खाँन केते अनेरा ॥
पाद-टिप्पणी: १ सरं सुन्दरं पंकजं पुंज । २ फूली । ३ मृगं भार चीते वृकंजत्र गज्जैं । ४ पाडलं । ५ भील बाँके । ६ तास स्थानं । ७ जाँन । ८ बाच । ९ उपायं, जपायं (अंत्यानुप्रास) । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ३७ कहूँ¹ बीन बादित्र बाजंत ऐसी। सुने राग मोहं² मृगं माल बैसी ॥२०५॥ करैं गान ताँनं पसू पच्छि मोहैं। सुनै जीव आवंत³ जानैं न को हैं॥ सुने बीन पब्बीन⁴ सुर नाय रागैं। रहे मोहि कै माल डारे न भागे ॥२०६॥ कहूँ राग ऐसो करैं मेघ आवैं। तबै साह ताको बड़ी मौज चावैं ॥ असी भाँति आखेट कै रंग भीनो। निसा घौस जातंन काहू न चीनो ॥२०७॥ तिहीं ठौर बित्यौ सुसारौ बसंतं। रमै पातसाहं मनौ र्तिकंतं ॥ तिहीं ठौर ग्रीखम्म किन्नौ प्रबेसँ। महा संकुलं बृक्ष राजं सुदेसं ॥२०८॥ तहाँ तेज भाँनं न जाँनं न जाँनं। तिहीं हेत साहं रहे तास थानं⁵ ॥ समौ एक ऐसो तहाँ रौद्र आयौ। महा पौन प्रचंड औ मेघ छायौ ॥२०९॥ कहूँ ओर पतसाह खेलैं सिकारं। करैं केलि जेती जलं बाल लारं* ॥ भयौ अंधकारं महाघोर ऐनं। गई सुद्धि सुझै नहीं अप्प⁶ नैनं ॥२१०॥ १ बहू। २ मोहे। ३ आनंद। ४ पर्वीन। ५ तिहीं तेज भाँनंन जाँनं नं जातं। तिहीं हेत साहं रहे संक वातं। ६ आप। *लार (लाल)=जो क्रीड़ा में अन्यों के पूर्व विजय प्राप्त करती हो। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
३८ हम्मीररासो फुरथ्यौ¹ साह को सत्थ भोजत्थ तत्थं । भयौ घोर अंधार सुझै न हत्थं ॥ तजी बालकीड़ा जलं त्यागि भग्गी । जहीं ओर दौरी भयौ मुख अग्गी ॥२११॥ किहूँ ओर दासी किहूँ ओर खोजा* । कहूँ ओर हुरमैं कहूँ ओर कोजा ॥ जसो होनहारं बन्यौ आय जैसो । करो लाख कोऊ टरै नाहिं तैसो ॥२१२॥ लिखे लेख जो नाहिं मिट्टै सुकोई । यही बात निश्चै सुनो सर्व सोई ॥ सरं त्यागि चल्ली सुहुरमैं सुभीत । कँपै गात ताको रह्यौ व्यापि सीतं ॥२१३॥ तिहीं ठौर महिमा मिले सेख आई । महा साहसी सूर उद्धारताई ॥ निजं धर्म साधै तजै नाहिं राचं । कहै जो कछू² तो निवाहंत बाचं ॥२१४॥ मिली बाल ताकौं कही दीन बाँनी । समै³ बाम सेखं मनौं⁴ आप जानी ॥ डरो ना कहो आप हौ कौन कोई । कहूँ जो उढ़ावो यहाँ बैठि मोही ॥२१५॥ तवै बाजि तैं सेख भू पै जुआयौ । कछू वस्त्र हो अंग ताको उढ़ायौ ॥२१६॥ दोहरा छंद महिमा उतरे बाजि तैं, दियौ वस्त्र तिहिँ हत्थ । १ फुत्र्यौ । २ कहूँ । ३ उमै । ४ मनं । +खोजा=सेवक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ३९ सीत भीत ता ना मिटी, कही हुरम यह गत्थ ॥२१७॥ पुच्छिय महिमा-साहि तब, को तू आप बताय । मैं घरनी पतिसाह की, रूपबिचित्रा नाय ॥२१८॥ जलक्रीड़ा हम करत सब, आयौ पौन प्रचंड । तब डेरन को भजि चलीं, तामैं मेघ सुमंड ॥२१९॥ भयौ भयानक तिमिर बन, सबै संत्थ गय भूल । मै इकली वन महँ यहाँ, डरति फिरति दुख मूल ॥२२०॥ छप्पय छंद तब महिमा कर जोरि हुरम कूँ सीस नवायौ१ । चढ़यौ अस्व की पिठ्ठि दैव पहुँचाव सुभायौ ॥ कहै हुरम सुन सेख देह कंपत है मोरी । छिनक बैठि यहिं ठौर सरन मैं लिन्नी (लीनी) तोरी । कहै सेख यह बीत नहिं, तुम साहिब मैं दास तुव । यह धरम नाहिं उलटी कहो, सरन सदा सेवक सुमुव ॥२२१॥ सेख समो पहिचानि स्वामि सेवग न बिचारौ । काम रूप तुम पुरुष बीर बानैत उदारौ ॥ बहुत काल अभिलाष रही जिय मैं यह भारी । कौन समो वह होय मिलै महिमा गुनबारी ॥ सुइ करिय आज साहिब सहल, सकल मनोरथ सिद्ध हुव । दै योग भोग संयोग यह, कौन दोस जग देहु तुव ॥२२२॥ चौपाई छंद कहै सेख तुम बेगम सच्चिय । ऐसी बात कहो मति कच्चिय ॥ मैं अब लों तिय जग मैं जानत । भगनी मात .सुत। सम माँनत ॥२२३॥ १ हुरम कहि कहि सन बोयौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
४० हम्मीररासो ता महिं तुम हजरत की बाला । सब कै एक वहै हकताला ॥ तातैं कहा धर्म मैं हारूँ । यह तो कबहुँ जिय न बिचारूँ ॥२२४॥ सुनहु सेख बेगम तिय सबहीं । तुम हूँ धर्म्म सुन्यौ है कबही ॥ तिय तजि लाज कहत रति जाचन । को नहिं धर्म जो पुरुष अराचन ॥२२५॥ तन मन धन जाचे तैं दिज्जिय । कह कुराँन पूरन सोइ किज्जिय१ ॥ पुरुष धर्म यह मूर न होई । तिय जाचत कौ नाटत कोई ॥२२६॥ सोरठा छंद तब जिय सोचि बिचारि, मनहीं मन महिमा समुझि । साँची है यह नारि, धर्म उभै जग महँ प्रगट ॥२२७॥ तब महिमा मुसकाय, कर गहि आलिंगन दियौ । इक तरु कौं तर जाय, दियौ तुरंगम बंधि तब ॥२२८॥ जीनपोस तर डारि, सस्त्र खुल्लि रखिय निकट । करी सुमार सुमार, उत्कंठा तिय मिलन की ॥२२६॥ छप्पय छंद महा मोद मन बढ़्यौ परस्पर तन मन फुल्लिव । मिटिव बंक मन संक निसँक ह्वै आसन भुल्लिव ॥ मानो कोक चकोर चंद लब्भव रबि लंबे । घन दामिनि मनु मिलिय काँम रति पति सुख फंवे ॥ १ दीजे, कीजे ( अंत्यानुप्रास ) CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri