हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो —————— दोहा सिंधुर बदन अमंद दुति, बुद्धि सिद्धि वरदाय। सुमिरत पद-पंकज तुरत, बिघ्न अनेक विलाय ॥ १ ॥ छप्पय दुरद* वदन बुधि-सदन चंद्र लल्लाट बिराजै । भुजा च्यारि आयुद्ध तेज फरसो+ कर राजै १ ॥ इक्क दंत छवि-धाम अरुण सिंदुरमय सोहैं । मनो प्रात रबि उदित कहन उपमा कबि को है ॥ कर-कमल माल मोदक लिये उर उदार उपबीत बर । सिव सिवा सुवन गणराज तुम देहु सदा वरदाँन वर २ ॥२॥ पुंडरीक सुत सुता तासु पद-कमल मनाऊँ ॥ बिसद÷ बरण ३ बर वसन बिसद भूषण हिय ध्याऊँ ॥ बिसद जंत्र सुर सुद्ध तंत्र तुबरजुत सोहै । बिसद ताल इक भुजा द्वितिय पुस्तक मन मोहै ॥ गति राजहंस हंसह चढ़ा रटी सुरन कीरति बिमल । जय मात बिमल ४ वरदायिनी देहु सदा वरदाँन बल ॥३॥
१ वर साजै । २ वरदायक वरदान बर । ३ बसन । ४ सदा ।
- दुरद=द्विरद, गज । + फरसो=परशु । ÷ बिसद=बिमल, सुंदर ।
२ हम्मीररासो छंद पद्धरी जय विन्नराज गणईसदेव । जय जगदंय जननी सएव१ * ॥ गुरु - पाद - पद्म वंदन सुकीन । सब सज्जन पद मन२ लीन कीन ॥ ४ ॥ प्रथिराज राज जग भौ प्रसिद्ध । भृगु वंस मध्य प्रगटे सुसिद्ध ॥ नृप चंद्रभाँन तिहिं बंस मध्य । किरवाँन+ दाँन दोऊ प्रसिद्ध ॥ ५ ॥ पिच निंवराण जग गाँम नाँम । जुत बर्णाश्रम निज धर्म्म धाँम ॥ जय कीरति भुवमंडल उदार । अरु तेज प्रतापी बल अपार ॥ ६ ॥ सब कहैं राठ कौ पातस्याह । जस श्रवन सुनन को सदा चाह ॥ द्विजराज गौड़कुल जग - प्रसिद्ध । बिद्या - बिनीत हरि - धर्म्म - वृद्ध ॥ ७ ॥ सब दया दाँन उद्दार बीर । गुण - सागर नागर परम धीर ॥ कुल पंच बृत्त कै मूल जाँन । द्विज आदि गौड़३ जानत जहाँन४ ॥ ८ ॥ सौ चौदह सै चालीस च्यार । जन - सासन-सागर अति उद्दार ॥ अब सब को किंकर मोहिं जानि । १ सहेव । २ हुलसन । ३ सोइ आदि गोर । ४ जानि ।
- सएव ( सहेव ) = स्वामिनी । * किरवाँन ( किरपान ) = कृपाण ।
हम्मीररासो ३ ऋषि अत्रि गोत्र मैं जन्म मानि ॥ ९ ॥ डिडवरिया राव कहि बिरद ताहिं । सुभ राठ देस मैं उदित आहि ॥ तिहिं नाँम गाँम भल बीजवार । सब प्रजा सुखी जुत बरण च्यार ॥ १० ॥ जहाँ बालकृष्ण सुत जोधराज । गुन जोतिष पंडित कवि समाज¹ ॥ नृप करी कृपा तिहिं पर अपार । धन धरा बाजि² गृह बसन सार ॥११॥ बाहन अनेक सत्कार भूरि । सब भाँति अजाची कियौ मूरि ॥ नृप एक³ समय दरबार माहिं । रासो हमीर कहि⁴ सुन्यौ नाहिं ॥१२॥ नृप प्रस्न⁵ करिय यहु उभे बात । सब कहो बंस उत्पति सुतात । अरु कहो साहि हम्मीर बैर । किहिं भाँति⁶ कंक= बड्ढ्यौ सु फेर ॥१३॥ तब कही प्रथम यह कल्प आदि । जल सेष सैन जब है अनादि ॥ नहिं धरणि चंद्र सूरज अकास । नहिं देव दनुज नर बर प्रकास ॥१४॥ सब बीज बृक्ष⁷ हरि संग मेलि । करि आप जोग निद्रा सकेलि ॥ करि सैन अंत निज सक्ति जानि । १ उदार । २ बास । ३ इक । ४ कह्यौ । ५ प्रश्न । ६ बत्त । ७ जुक्त । =कंक=ससिश्रु ।
४ हम्मीररासो ऊरण* सु तंत्र करि सूत्र मानि ॥१५॥ द्व माया ईस्वर उभै नाँम । करि महततत्व† गुण÷ प्रगट जाँम+ ॥ यह धरि चरित्र¹ लीला अपार । हरि नाभिकोस पंकज प्रचार² ॥१६॥ तिहिं-प्रगट भए ब्रह्मा सु आदि । बाराहकल्प यह कहि अनादि ॥ बहु काल ब्रह्म-चिंता सु कीन । मैं कौन, करौं का, कर्म कीन³ ॥१७॥ अध उद्ध० भम्यौ बहु कमलि-नाल । नहिं पार लह्यौ तदपि मुहाल⁴ ॥ करि ध्याँन स्वयंभू लख्यौ आप । तप करयौ सृष्टि उपजै •अमाप ॥१८॥ तप करयौ स्वयंभूं अति प्रचंड । तब भयउ प्रजापति बिधि अखंड ॥ मानसी सृष्टि कीनी उदार । सब बृक्ष बीज किन्हे अपार ॥१९॥ जल गगन तेज भुव बायु मानि । १ धरी चित्त । २ वढ्यौ पंकज अपार प्रसार । ३ कर्मचीन, कर्महीन । ४ मुझाय । * ऊरण (ऊर्णा)=ऊन । † महततत्व (महत्तत्त्व)—सांख्य के मतानुसार प्रकृति का प्रथम विकार, बुद्धि । ÷गुण—सांख्य के मतानुसार सत्त्व, रज तथा तम गुण । इस शास्त्र में इन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा गया है । इसी प्रकृति से सृष्टि का विकास होता है । + जाम=प्रहर, काल । ० उद्ध (ऊर्ध्व)=ऊपर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ५ सनकादि भए सुत च्यारि आनि¹ ॥ तप-पुंज भये नृहिं सृष्टि भोग । तहाँ मध्य भए तब रुद्र जोग ॥२०॥ भन तैं मरीचि भय तव सु आय । उपजे पुलस्त ऋषि श्रवण पाय ॥ इमि भए नाभि तैं पुलह और । कृत भए ब्रह्म कर तैं जु मौर ॥२१॥ भृगु भए स्वयंभू त्वचा ठाँन । भय प्राण नात बासिट्ठ माँन ॥ अंगुष्ठ दक्ष उपजे सु ब्रह्म । नारद जु भए उतसंग* अह्म ॥२२॥ भय छाया तैं क़रदम ऋषीस । अरु भए प्रष्टि+ अद्धरम दीस ॥ अरु हृदय भए कामा उदार । करदन तैं भौ धरमावतार ॥२३॥ भय लोम अधर² तैं अति वलिष्ठ । बानी जु विमल मुख तैं प्रतिष्ठ ॥ पद निरत मिंड³† तैं सिंधु जानि । यहिं बिधि जु प्रजापति ब्रह्म मानि ॥२४॥ अब सुनहु बंस तिनकै अपार । यह भयय सृष्टि चहुँ खाँ (चहुँधा?) निवार ॥ सिव कै जु सती त्रिय बिन प्रसूत । दिय दक्ष श्राप तातैं न पूत ॥२५॥ इक कला नाम त्रिय धर मरीच । १ मानि । २ अधुर । ३ मींड, मिड्डु । *उतसंग (उत्संग)=गोद । +प्रष्टि (पृष्ठ)=पीठ । †मिंड (मीढ)=मूत्र ।
६ हम्मीररासो द्वै पुत्र भए ताकै जु बीच ॥ इक भए प्रथम कस्यप सुजाँन । फिर उपजि धरम जहँ पूर्णमाँन ॥२६॥ भय कस्यप कै सूरज सु आय । सो भयौ वंस सूरज सुगाय ॥ अरु सुनो अत्रि कै पुत्र तीन । इक दत्त सोम जान्यौ प्रबीन ॥२७॥ ऋषि भए अपर दुरबास नाँम । सोइ¹ सुनो श्रवण तिहिं वंस जाँम ॥ सुत भयौ सोम कै बुद्ध आय । पुरुरवा पुत्र ताकै सुभाय ॥२८॥ षट पुत्र भए ताकै प्रसिद्ध । भए सोम वंस तिनकै जु सिद्ध ॥ भृगु वंस सुनो अतिसै उदार । चहुवाँन भए तिनतैं अपार ॥२९॥ इक ख्यात नाँम तिय अति अनूप । भय उभै पुत्र ताकै जु भूप ॥ इक कह्यौ प्रथम धाता जु नाँम । फिर भए विधाता धर्म-धाँम ॥३०॥ इक² अपर प्रिया भृगु कै कनिष्ठ । ए पुत्र भए ताकै प्रतिष्ठ ॥ भय सुक्र जेष्ठ गुरु-असुर जानि । तिहिं अनुज चिमन³ तप-पुंज मानि ॥३१॥ भृगु कै जु भए जग अति बिख्यात । जिहिं सुक्र नाम बल तेज तात ॥ १ सुई । २ एक । ३ च्यवन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ७ तिनकैँ रिचीक भए पुत्र आय। जमदग्नि भए तिनकै सुभाय ॥३२॥ ऋषि जामदग्नि सुत परसराँम। हनि छत्र सकल द्विज तेजधाँम ॥३३॥ दोहरा छंद ब्रह्मा कै सुत भृगु भए, भार्गव भृगु कै गेह। ऋषि रिचिचक ताकै भए; तेज-पुंज तप-देह ॥३४॥ जामदग्नि तिनकै भए, परसराँम सुत जाहिं। छत्र मेटि विप्रन दइय, भुंमि किती वर ताहिं ॥३५॥ कमलासन कुल मैं प्रकट, परसराँम रणधीर। सहस्रारजुन बैर तैं, हने जु क्षत्री वीर ॥३६॥ बार इक्कीस जुद्धि जिन, दिन्नौ^१ उर्बीराज। बच्यौ न छत्रो जगत तब, आए तप कै काज^२ ॥३७॥ छंद मुक्तादाम हने क्षिति कै सब बीर अपार। भरे बहु कुंड जु शोणित धार ॥ करे तिहिं पितृन तरपन नोर। भए सब हरषित पित्र सधीर ॥३८॥ दए तब आसिष प्रेम समेत। चले ऋषिराज तपःकृत हेत ॥ रह्यौ नहिं क्षत्रिय जाति बिसेष। भए निरमूल जु छत्र अशेष^३ ॥३९॥ बचे कछु दीन मलीन सुवेस। कहूँ तिनकै अब रूप अशेष ॥ १ दीनौ। २ अप्प (आप) गए तप काज। ३ विसेपु। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
८ हम्मीररासो धरे तृणदंत¹ कि दीन बयन्न² । . किये नियरूप लखे जु नयन्न ॥४०॥ नपुंसक बालक बृद्ध सु दीन । धरे मुख नक्ख सुबैन सहीन ॥ तजे तिन आयुध पिट्ठि दिखाय । गहे तिन आय सुभाय सुपाय ॥४१॥ मिले सब पित्र सु³ दीन असीष । भए सुअ निरभय पित्र जगीस ॥ तजो अब उग्ग⁵ असेष सुभाव । करो सब⁶ उप्पर क्षोभ सु चाव ॥४२॥ तजे तब क्रोध भए सु दयाल । चले पद बंदि पिता पद⁷ हाल ॥ भई कछु काल क्षत्री बिन भुंमि । नहीं जग रक्ष रह्यौ सोइ पुंमि⁸ ॥४३॥ बढ़े⁹ रजनोचर बृंद अनेक । मिटे जप तप्प जु वेद बिबेक ॥ करे उतपात सुघात अपार । तजे कुल-धर्म्म सु आश्रम च्यार¹⁰ ॥४४॥ मिटी मरजांद रहे सब भीत । तबै ऋषिराजन बढ़्ढत¹¹ चीत ॥ जुरे ऋषि-बृंद सु अरबुद आय । जहाँ ऋषि चाय बसैं सत भाय ॥४५॥ सुर नर नाग मिले सह आय । १ तनदंत । २ नयन्न । ३ जु । ४ अनिरिय । ५ उग्र । ६ बन । ७ पहु,पट्ट । ८ नहीं जग रच्छिक यो जग पूमि । ६ वचे । १० चार । ११ बाढत, बाढन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ६ रचे रजनीचर मेटि उपाय¹ ॥ मिले कमलासन और बसिष्ठ। कियौ² सुचि कुंड अनङ्ग³ सुइष्ट ॥४६॥ दोहरा छंद चाय आय अरबुद सुनग⁴, मिलिय⁵ सकल ऋषिराय । तब आराधिय संभु तिन , दिन्नौ दरसन आय⁶ ॥४७॥ जटा मुकट बिभूूति अँग , सीस गंग अहि अंग⁷ । भूत संग अनभंग मन , हरषित अधिक उमंग ॥४८॥ ऋषिसमूह अस्तुति करत⁸, करव (करो)⁹ अचल नग¹⁰ आय। बास करो तिहिं पर अचल, यज्ञ करें तव पाय ॥४९॥ छप्पय छंद तब भव भये¹¹ प्रसन्न बास अरबुद सिरं किन्मिव । कियव यज्ञ आरंभ विप्र सम्मूह¹² सुलिन्निव ॥ द्वैपायन, बासिष्ठ, लोम, दाल्भि,¹³ सम्र आए। जैमिनि हरषन, धौम्य, भृगू, घटयोनि¹⁴, सुभाए ॥ कौसिकह+, बत्स, मुद्दल मिलिउ, उदालीक, मातंग, भनि । स्वर मिलिय स्वयंभुव संभुजुत लगे करन मख मुदित मन ॥५०॥ पुलह, अत्रि, गौतम सम्, गरग, संडिलि महामुनि । भरद्वाज, जाबालि, मारकंडेय, इष्ट गुनि ॥ . १ मेटन पाय । २ किये । ३ अनिल । ४ गन । ५ मिले । ६ धाय । ७ संग । ८ करिव, करथव । ६ करत । १० मन । ११ भयउ । १२ सम्मुहँ सुइ लिन्निव । १३ दालिंभ सु । . १४ जोनि ।
- पुलह अत्रि गौतमहिं गरग सांडिल्ल महामुनि । भरद्वाज जाबालि मारकंडेय उध्म ( उद्दम ) गुनि । ये दो चरण एक प्रति में अधिक हैं सो दूसरी प्रति में दूसरे छप्पय में आए हैं । ६
१० हम्मीररासो जरतकार जाजुल्लिय परासुर परम पुनीतव । चिमन १ चाइसुर आइ, पिप्पलायनहिं, सुरचि २ सब ॥ बोटा अनेक बरनूँ किते, पंचसिखा पिक्खिय प्रगट । तप तेज पुंज झलहलत तहँ, दरसन तैं पातक सुघट ॥५१॥ सिद्धि औषधिय सकल, सकल ३ तीरथ जल आनिवं । जिते यज्ञ कै योग्य तिते, द्रव् ४ सब मन मानिव ॥ जजन ५ जानि ६ अध्याय होम ध्वनि होम सु उठ्ठे । सकल वेद कै मंत्र बिप्र मुख सुर जुत जुठ्ठे ७ ॥ ध्वनि सुनत असुर आए तुरत करन यज्ञ उच्छिष्ट थल । उत्पात अमित किन्ने ८ तबै तहाँ बृष्टि किन्निय ९ सबल ॥५२॥ पवन चलत परचंड घोर घन वारि सु वु(उ)ठ्ठे । रुहिर १० माँस तृण पत्र अगि ११ रज देखत उठ्ठे ॥ गए तहाँ बासिष्ट यज्ञ बहु बिघ्न सुनायौ । करै १२ प्रथम वध असुर होय तब यज्ञ सुभायौ ॥ बासिष्ट कुंड किन्हौ सुरुचि करन असुर र्निमल तब । धरि ध्याँन होम बेदी बिमल बेद मंत्र आहूति जब ॥५३॥ दोहरा छंद ऋषि वसीष्ठ बेदिय बिमल, साम बेद स्वर साधि । प्रगट कियउ क्षत्रिय पहुभि, बेदमंत्र आराधि ॥५४॥ तीन पुरुष उपजे तहाँ, चालुक प्रथम पँवार । दूजै तीजै ऊपजे, छत्र १३ जाति पहिहार १४ ॥ ५५ ॥ कियउ १५ जुद्ध अतुलित तिनहिं, नहिं खल जीते मूरि । १ च्यवन । २ सुरख्यिय । ३ सकल तीर्थनु जल आन्यौ, तित्यौदक आन्यौ । ४ द्रव्य तितने मत मानिव, दर्व्य जितने मन मान्यौँ । ५ यजन । ६ जाप । ७ वुठ्ठे । ८ कीने । ६ कीनी । १० रुधिर । ११ अग्नि । १२ करो । १३ चतुरजाति १४ पारिहार । १५ कियौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो ११ तब चतुरानन जज्ञ थल, कियौ तुरत वह दूरि ॥ ५६ ॥ आबू गिरि अग्नेव दिसि, चायस्थल सब आय। आराधे तिहिं फरस धरि, आए सीघ्र सुभाय ॥ ५७ ॥ कमलासन ब्रह्मा भए, होता भृगु मुनि कीन। आचारज वासिष्ठ भौ, ऋत्वज बत्स प्रचीन ॥ ५८ ॥ परसराँम जजमाँन करि, होम करन मुनि लाग। महासक्ति आराधि करि, अनलकुंड पटि¹ जाग ॥ ५९ ॥ छंद पद्धरी विधि करी² परसधर, बोलि ठौर। जजमाँन कियउ भृगुकुल सुमौर ॥ वरदेव सक्ति आराधि ताँम । चहुँ वेद वदन उच्चार जाँम ॥ ६० ॥ निज वारि कमंडल अग्नि सींच । रज संख पानि होमे स वीच ॥ चहुँ³ वेद मंत्र-बल सक्ति पाय । तब अग्नि रूप प्रगटे सुभाय ॥ ६१ ॥ उत्तंग अंग सुचि तेज-धाँम । झलहलत कांति तन प्रभा काँम ॥ भलहलत मुकट भ्रुकुटी करूर* । पलहलत नेत्र आरक्त मूर ॥ ६२ ॥ हलहलत दनुज वह त्रास मानि । भुज च्यारि दिग्घ⁴ आयुध सजानि⁵॥ जम जज्ञ पुरुष प्रगटे अजौनि । १ पदि । २ करे फरसधर । ३ चउ । ४ दोर्घ । ५ मान जान— अंत्यानुप्रास । *करूर (सं० कुरुल)—मस्तक पर बिखरी बाल की लट ।
१२ हम्मीररासो कर खग¹ धनुष कटि लसै तोनि ॥ ६३ ॥ कर जोरि ब्रह्म सों कह्यौ धाय । मैं करूँ कहा लोकेस आय ॥ जब कह्यौ कमलभू सुनहु तात । भृगुनाथ कहैं सुइ करो बात ॥ ६४ ॥ भृगुनाथ कही खल हनूँ धाय । सँग सक्ति दइय नृप कै सहाय ॥ दसबाहू उग्र आयुध बिसाल । आरूढ़ सिंह उर² कमल माल ॥ ६५ ॥ मुनिदेव मिले अभिसेष कीन । नृप अनल नाँम कह तासु दीन ॥ नृप कियौ जुद्ध तिनतैं अखंड । हनि जंत्रकेत करि खंड खंड ॥ ६६ ॥ हनि धूम्रकेत जो सक्ति आय । नृप हरष सहित परसे सुपाय ॥ बहु दैत्य नृपति मारे अपार । उठि चली खेत तैं रुहिर³ धार ॥ ६७ ॥ उबरे सु गए पाताललोक । भय दनुजहीन सब मृत्युलोक⁴ ॥ ६८ ॥ दोहरा छंद आसा पूरण सबन की, करी सक्ति तिहिं बार । याही तैं आसापुरा, धरयौ नाँम निरधार ॥ ६६ ॥ चहुवाँनन⁵ कै वंस मैं, परम इष्ट कुलदेवि । सकल मनोरथ सिधि तहाँ, पूजत पावै सेवि⁶ ॥ ७० ॥
१ खड्ग । २ गला। ३ रुधिर धार । ४ मर्त्यलोक । ५ चाहुव्वान। ६ देव, सेव—अंत्यानुप्रास । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १३ परसराँम अवतार भौ१, हरन सकल भुव-भार । जैत राव तिहिं बंस मैं, जन्म्यौ परम उदार ॥ ७१ ॥ छप्पय छंद जैत राव चहुवाँन सकल बिद्याजुत सोहै। दाँन कृपाँन बिधाँन अखिल भूपति मन मोहै॥ अमित थाट रजपूत बंस छत्तीस अमानो। सूर बीर उद्दार२ बिरद बंदी जु बखानो ॥ दिन प्रत्ति तेज बड्ढिय३ नृपति, सत्रु संक निसि दिन रहैं। बिस्सलह४ भूप अवतंस भुव, अरथिन् मिलि दारिद दहँै ॥७२॥ इक्क समय आखेट, राव खेलन बन आए५ । सकल सुभट थट संग, बीर बानै जु बनाए ॥ लखव६ इक्क बाराह, बाजि पिच्छै नृप दिन्निव । रहे७ संग तैं दूरि, सध्य बिन राव सु किन्निब ॥ बन बिखम वंक भूधर बिरह, सुथल पदम भव तप करत । मृग त्यागि भागि मिल्ले सुऋषि, बंदि चरण सचा धरत ॥७३॥ छंद लघुनाराच करे प्रणाम रावयं, सुदिन्न पद्म पावयं । उभै सुपाणि जोरि कै, बिनै सु कीन कोरि कै ॥ ७४ ॥ खुले सुभाग्य मोरयं, लह्यो दरस तोरयं । अखंड जोग भूपयं, नमः सजीव मोखयं* ॥ ७५ ॥ त्रिकाल ज्ञान धाँमयं, रटंत नाँम राँमयं । समस्त योग धाँमयं, त्रिलोक पूर काँमयं ॥ ७६ ॥ १ भयौ । २ उदार । ३ बढ़तो, बड्डिग । ४ बीसलह । ५ आयउ, बनायउ । ६ लखिव । ७ रह्यउ ।
- मोखयं—मोक्ष ।
१४ हम्मीररासो समीप स्वामि संकरं, गणेशयं सुधं करं । धरौ सुसीस हथ्थयं, प्रभू¹ सदा समथ्थयं ॥ ७७ ॥ दोहरा छंद प्रसन भए ऋषि पद्म तब, अस्तुति सुनत प्रमाँन² । जैत राज यहिँ थल करो, राव राखि सिव ध्याँन ॥ ७८ ॥ हर प्रसन्न भय राव पहँ, मुनिबर पद्म प्रसाद । मिले भील-कुल सकल तहँ, हरषित मिटे बिषाद् ॥ ७९ ॥ छंद पद्धरी ऋषिराज पद्म आज्ञा सुपाय । नृप जैत मित्र मंत्रिय बुलाय ॥ बड़ वणिक गणक कोबिद सुजाँन । तिन पुच्छि मंत्र वास्तव प्रमाँन ॥ ८० ॥ सुभ दिए मुहूरत नीब हेत । रणथंभ नाँम औ गढ़ समेत ॥ सव ग्यारह सै दस बरष और । सुइ संबत बिक्रम कहत मौर ॥ ८१ ॥ इषु अर्द्ध अरंगा को प्रसिद्ध । रबि अयन सौम्य जान्यौ प्रसिद्ध ॥ सत्र कला पाँच जानो सुइष्ट । त्रिय पुरुष लग्न गढ़ कीन इष्ट ॥ ८२ ॥ गत इक अंस वृषभाँनु जानि । ससि बेद् सार्द्ध मिथुनेस मानि ॥ तृन अंस वृस्चिक कै इलानंद । ससि बीस³ नंद अज अंस मंद ॥ ८३ ॥ १ प्रभु सदा सर्थयं । २ अमाँन । ३ अंश । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १५ जष* रासि जानि नव अंस सुद्ध । तम तीन अंस मूरति समुद्ध x ॥ त्रिय धूमकेतु गुण अंस जानि । भृगु सप्त गुरू¹ सत्रा सु मानि ॥ ८४ ॥ तन लग्न उभै जानो सु जानिं । फल कह्यौ वरष सत आयु मानि ॥ षय भाव भौंन तिहिं भवनहीन । कछु घटे बरष तिन मैं प्रवीन ॥ ८५ ॥ तिहिं समय अटल थूणी सथप्प । गणनाथ पूजि सुभ मंत्र जप्प ॥ करि होम देव पुज्जे अपार । गो भुंमि रत्न हाटक सुढार ॥ ८६ ॥ दिय दाँन द्विजिन बहु विधि अनेक । नृप जैत सकल पुज्जे विवेक ॥ तिय करत गाँन मंगल सरूप । धुनि दुंदभि बज्जत अति अनूप ॥ ८७ ॥ सब करहिं हरष नर नारि बृंद । यहि भाँति नीम रचना सुछंद ॥ ८८ ॥ दंहरा छंद ग्यारा सइ दस अगरो, संवत माधव मास । सुक्कु तीज शनिवार कें, चंद्र रक्ष अनयास ।'८६॥ थूणीगढ़ रणथंभ की, रोपी पदम् प्रताप । सुमरि गणेस गिरीस कौ, नगर बसायौ आप² ॥९०॥ १ सतम गुरु । २ आय ।
- जष ( झष )=मीन ( राशि ) X समुद्ध=समृद्ध । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१६ हम्मीररासो वार्ता ( वचनिका ) राव जैत पदमं ऋषि की आज्ञा तैं गढ़ रणथंभ की नीम दिवाई। ताही समय सहर बसावन की मन मैं आई। ( रणथंभ की नीम का लग्न ) ग्यारा सै दसोत्तरा कौ संवत् बैसाख की आखै तीज (अक्षय त्रितिया) मैं सनिस्रचर मैं घड़ी पाँच दिन चढ़े मिथुन लग्न मैं नीम दीनी। गणेश पूजकर सिवजी की और पद्म ऋषि की आज्ञा पाय अनेक उछाह करि धन दीनौ। चौपाई जैत राव थिर थूणी रुंधिय × । भूसुर बृंद वंदि पद उत्थिय ॥ ध्वजा पताक कलस अरु तोरन। मंगलरूप सुरूप निचोरन ॥९१॥ इष्ट लग्न सू० ५ ॥ २ । ८ ॥ १ । ०० चं० ३ । ४ । मं० ७ । ३०० । २० । वृ० ८ । १७ । शु० २ । ७ श० ११ । १ । रा० २ । ६ के० । ३ छंद भुजंगप्रयात पुरं मंदिरं चौहटं औ गवाक्ष्यं + । भुजंगप्रयातं सुंदरं प्रबंधं सुभाष्यं ॥ पुरी इंद्र की सीस वै सुभ्र देखी। सबै मंदिरं सुंदरं उच्च लेखी । ९२ ॥ पड़द्दा जरी बाफतं * कै बनाए। × रुंधिय=रुँधा, स्थिर किया। + गवाक्ष्यं (गवाक्ष)=झरोखा।
- बाफतं (बाफता)=एक प्रकार का रेशमी वस्त्र जिसपर कलाबत्तू और रेशमी बूटियाँ होती हैं। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १७ ध्वजा तोरणं सर्व कै गेह छाए ॥ कपाटं सिरीखंड हाटक ÷ सोहैं । सबै चित्र सा चित्र सूचित्त मोहैं ॥ ९३ ॥ बिदाँनं छए झल्लरी सोभसाँनी । सबै ठौर सोहै मनो कामरानी ॥ गृहं द्वार गोखा झरोखा सुहाए । सुगंधं चुवा इत्र महकंत भाए । ९४ ॥ यसो नग्र रम्यं रच्यौ भूप केरो । किते चारु चौकंत भावंत हेरो ॥ बसैं वर्ण च्यारचौ जथासंखि बासं । चहूँ आश्रमं औ तजं लोभ आसं ॥ ९५ ॥ सबै आय आयं रहै धर्म माहीं । छिमासील दाँनं वृतं नीत १ आहीं ॥ ९६ ॥ छप्पय छंद महा वंक गढ़ दृड्ढ़ बुरजि २ कंगुर बर सोहैं । चहूँ कोढ़ ३ अग अगम चारु दरवाजे मोहैं ॥ घाटी चतुरासीति ४ बिषम अति ५ पच्छि न पावैं । वनचर वंकट वेस पाय लगि यों गुन ६ गावैं ॥ तुम नाथ हमारे ७ कृपाकरि ८ गढ़ लज्जा यह ९ धारिये । परबेस मनहुँ रवि को प्रकट यह गढ़ हम प्रति पारिये ॥९७॥ दोहरा छंद च्यारि दरा चहुँ १० ग्राम बसि, घाटी किती जु और । चहूँ ओर पर्वत अगम, बिचरण थंभ सु जोर ॥९८॥ १ नित्य । २ सुदृढ़ गुरजि । ३ कोध । ४ घाटी चोइससाठि । ५ अति, गति । ६ मुख । ७ हमार । ८ करी । ६ हम । १० चउ । ÷हाटक( हाटक )=सोना । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१८ हम्मीररासो अथ पद्मऋषि तपपात प्रसंग छप्पय रणतभँवर ऋषिद्म उग्रतप तेज कराए१। इंद्रासन डिगमगिय२ देवपति३ संका खाए॥ तब कामादिक बोलि सक्र ऋषि पास पठाए। करो बिघ्न तब जाय भंग पर काज नमाए४। तब चल्यव मार निज सेन जुत५ ऋतु वसंत प्रगटिय तुरत। बह त्रिविध पवन अद्भुत महा करहिं६ गान रंभा सुरति ॥९९॥ बसंत ऋतु वर्णन छंद पद्धरी तिहिं समय काम प्रेरयौ सुरिंद्र। जुहारि इंद्र उठि पाव वंदि॥ सब परिकर बोले७ चढ़ि सुमार। ऋतु छहूँ संग धनु सुमन हार ॥ १०० ॥ रति परम प्रिया ऋतुराज जानि। नित रहत निरंतर रूप मानि॥ बहु किन्नर गावत देवनारि। गंधर्व संग अति बल उदार ॥ १०१ ॥ संगीत भाव गावैं अनंत। सुर नर सुनंत बसि होत मंत॥ बन उपबन फुल्लहिं अति कठौर। रहे जौर मौर रस अंबमौर ॥१०२ ॥ १ करायौ । २ डगमग्यौ । ३ इन्द्र मन माहिं ( माँझि ) डरायौ । ४ नठाए । ५ जुरि । ६ करति । ७ बुल्ले । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १६ कल कूजत कोकिल ऋतु बसंत । सुनि मोहत जहँ तहँ सकल जंत ॥ नर नारि भए कामंध अंध । तजि लाज काज परि काम-फंद ॥ १०३ ॥ पहुँचे सुमारि ऋषि निकट आय । प्रेरेचौ सु परम भंट अग्ग जाय ॥ ऋषि लखे सुभट सेना सुकाम । ऋषि कह्यौ कहा करिहै सुबाम ॥ १०४ ॥ करि कठिन आप लाई समाधि । तिहिं रहत काम क्रोधारि व्याधि ॥ ग्रीष्म ऋतु वर्णन ऋतु ग्रीषम कौ आज्ञा सु दिन्न । तिहिं अति प्रताप जाज्वल्लि किन्न ॥ १०५ ॥ रबि तपै बिखम अति किरन धूप । रवि नै १ खुल्लि दिक्खिय अनूप ॥ वट इक्क महा गह्नर सुजानि । तिहिं निकट सरोवर सुरस मानि ॥ १०६ ॥ इक आश्रम सुंदर अति अनूप । तिय गान करत सुंदर सरूप ॥ सौरभ अपार मिलि मंद पौन । मृगमद कपूर मिलि करत गौन ॥ १०७ ॥ श्रीखंड *मेद १ केसर उसीर । तिहिं परसि ताप मिट्टत सरीर ॥ १ मेरु ।
- मेद=कस्तूरी । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri