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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० २२ ] भाषाटीकासमेता । ( १११ ) द्वाविंशोऽध्यायः २२.

अथ जलचरोंका मांसवर्ग । प्रथम हंस आदि जलके पक्षियोंकें मांसका गुण । हंसः श्लेष्मकरो बलातिरुचिदो वृष्योगुरुः शीतलस्त द्वत्कण्ठ सु- जाड्यशुक्रजननो वृष्योऽतिरुच्यो मृदुः ॥ ज्ञेयः सारसकः कफा- निलहरो वृष्यो गुरुश्चोच्यते वृष्यो वीर्यविवर्द्धनः कफहरः कङ्क- स्तथा भासकः ॥ १ ॥ हंसका मांस कफको करता है, बलको और अति रुचिको देता है, वीर्यमें हित है, भारी है और शीतल है । और सारसका मांस हंसके मांसके समान गुणोंवाला है, कंठमें जडपनेको और वीर्यको करता है, वीर्यमें हित है, रुचिमें हित है और कोमल है, और कंक पक्षीका मांस कफ- को और वातको हरता है, वीर्यमें हित है और भारी है और भासपक्षीका मांस वीर्यमें हित है और वीर्यको बढ़ाता है, कफको नाशता है ॥ १ ॥ आडी आदि पक्षीक मांसका गुण । आडी वातविकारकासहननी बल्या वृषा दीपनी क्रौञ्ची चासुरि- शुक्रदोषहननी तुल्यस्तथा कर्कटः ॥ दात्यूहो मरुतस्यनाश- नकरो वृष्यो बलः शुक्रदश्चैष श्रेष्ठगुणः श्रमोपशमनः शुक्रप्रदो वातहा ॥ २ ॥ आड़ीका मांस, बातका विकार और खाँसीको हरता है, बलमें और वीर्यमें हित है और अग्निको जगाता है । क्रौंचका मांस और आसुरीका मांस वीर्यके दोषको हरता है, और इसीके समान गुणोंवाला कांकडपक्षीका मांस है और करढोंक पक्षीका मांस वातको नाशता है, वीर्यमें हित है, बलको और वीर्यको देता है और यह श्रेष्ठ गुणोंवाला है, परिश्रमको शांत करता है॥२॥ अथ मकर मच्छके मांसका गुण । मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो दीपनो वातनाशनः ॥ रुचिप्रदः शुक्रकरश्चाश्मरीदोषनाशनः ॥ ३ ॥ सब प्रकारके मच्छोंके मांसोंमें मकरमच्छका मांस श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है,वातको नाशता- है, रुचिको देता है, वीर्यको करता है और पथरीदोषको नाशता है ॥ ३ ॥

( ११२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- .अथ मच्छके मांसका गुण । शृङ्गी वातविनाशनो रुचिकरो वृष्यः कफघ्नो मतस्तस्माद्रोहित- को हितो बलकरो वातात्मकः श्लेष्मकः ॥ ४ ॥ श्लेष्माकरी तु शफरी नलमीनः कफात्मकः ॥ शकुली च विशाला च ज्ञेयौ वातकफात्मकौ॥बिलं विमत्स्यं ज्ञेयं च वातपित्तकफाकरम्॥५॥ शृङ्गी मछलीका मांस वातको नाश करता है, रुचिकर है,वीर्यमें हित है और कफको नाश करनेवाला माना गया है। रोहू मछलीका मांस शृङ्गीसे अधिकहित करनेवाला है,बल करता है, वात प्रकृतिवाला है और कफको बढ़ाता है ॥४॥ शफरी मछली कफ करती है, नल मछली कफ प्रकृतिवाली है, शकुली मछली वातप्रकृतिवाली है, विशाला मछलीका मांस कफस्वभाव वाला है, बिल और विमत्स्य नामक मछलीका मांस वात, पित्त,कफ इन तीनोंको करता है॥५॥ अथ कछुवाके मांसका गुण । कच्छपो मधुरः स्वादुःशुक्रवृद्धिकरो मतः ॥ वातश्लेष्मप्रजननो बृंहणो रूक्ष एव च ॥ ६ ॥ कछुवेका मांस मधुर है, स्वादु है, वीर्यको बढ़ाता है ,वात और कफको उपजाता है, धातु- ओंको पुष्ट करता है और रूखा है ॥ ६ ॥ अथ केकड़ाके मांसका गुण । कुलीरोऽतिबलो वृष्यः पाण्डुक्षयविनाशनः ॥ शोफातिसारग्रहणीस्थविराणां स्त्रियां हितः ॥ ७ ॥ केकड़ाका मांस अधिक बलको करता है वीर्यमें हित है,पाण्डु और क्षय रोगको नाश करता है और शोजा,अतीसार,संग्रहणी दोष,इनसे पीडित और बूढे और स्त्रियोंको हित है ॥ ७ ॥ अथ मांसविशेषता । मकरो दीपनो हृद्यो ग्राही चोष्णविकारहा ॥ मूत्राश्मरीणां शमनो गुल्मातीसारनाशनः ॥ ८ ॥ मकर मच्छका मांस अग्निको जगाता है, सुन्दर है, कब्जको करता है, गरम विकारको ना- शता है, मूत्ररोग और पथरीको शांत करता है, गुल्म और अतीसारको नाशता है ॥ ८ ॥ अथ वर्जनाय मांसका गुण । काकश्येनखगारिसारसशुका यूकाः कलिङ्गा बकाः । भल्लूकोष्ट्रवराहधेनुतनयव्यालास्तथा गर्दभाः ॥ १ अस्मिन् श्लोके शार्दूलविक्रीडितस्य चरणद्वयमेवास्ति ।

मण्डूकादिसरीसृपादिगणा येऽन्ये मता ईदृशस्ते भक्ष्या न शुभावहा ननु नृणां वर्ज्या भिषग्भिर्बुधैः ॥ ९ ॥ गृहचटकच- कोराः काकजात्याः खगाश्च पिकशुकमघशारीभृङ्गदात्यूहमा- ङ्गाः ॥ जलकरंटकपोताः पोटकीखअरीटाः कुकुरमघमलिङ्गन यूकपिङ्गादयश्च ॥ १० ॥ एते भक्ष्या नैव भक्ष्या नचेष्टा ये चान्येऽप्यज्ञातनामाण्डजाश्च ॥ अन्ये चापि श्वापदा ये च निंद्यास्ते खाद्ये वै वर्जिताश्चात्र सर्वे ॥११॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मांसवर्गो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ काक, बाज, शिकरा, सारस, तोता, यूक, कलिङ्ग और बक पक्षी तथा रीछ, ऊंट, सूकर, बैल, भेडिया और गर्दभ तथा मण्डूक आदि सरीसृप जीवोंका समूह तथा और भी जो इन्हींकी भांति माने गयेहैं वे सब भक्ष्य मनुष्योंका कल्याण करनेवाले नहीं इसी लिये पंडित वैद्योंको अवश्य इनका त्याग करना चाहिये ॥ ९ ॥ घरमें रहनेवाली चिड़िया, चकोर, काककी जातिके पक्षी, शिकराकी जातिके पक्षी, कोयल, तोताकी जातिके पक्षी, मघा, शारी, भंवरा, करढौकपक्षी, मांग, शंखका जीव, कबूतर, पोटकी, खंजना कुत्ता, मघ, मलिंग, जूम, पिंगापक्षी ॥१०॥ इनके मांस खानेके योग्य नहीं हैं और श्रेष्ठ भी नहीं हैं तथा जो जो हिंसक तथा निंदित जीव हैं उनके भी मांस वर्जने चाहिये॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम द्वाविंशोध्यायः ॥ २२ ॥ त्रयोविंशोऽध्यायः २३. ———————— अथ अन्नपानवर्ग । प्रथम मँडका गुण । मण्डः परिस्रवो भक्तस्तर्पणो वातनाशनः ॥ मूत्रमेहसमीरघ्नो रुचिकृन्मूत्रलो मतः ॥ १ ॥ आशुमण्डो भवेद्ग्राही मधुरो वा कफात्मकः ॥ तर्पणः क्षयदोषघ्नः शुक्रवृद्धिकरः परः ॥ २ ॥ मण्ड झरनेवाला है, खानेयोग्य हैं तृप्तिको करता है, वातको नाशता है, मूत्र, मेह और वातको नाशता है, रुचिको करता है और मूत्रको उपजाता है ॥१॥ शीघ्र किया मण्ड कब्जको करता है, मधुर है, कफकी प्रकृतिवाला है, तृप्तिको करता है, क्षय दोषको नाशता है और वीर्यको बढ़ाता है २ ८

( ११४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

अथ भातका गुण । अप्रसाधितभक्तो युगन्धराणां भक्तश्च घनो विशदमधुरश्च ॥ कफे त्रिदोषशमनश्च कथ्यते कासश्च श्वासात्मक एव स स्मृतः॥३॥ नहीं साधित किया ऐसा युगन्धर चावलोंका भात कठिन है, सुन्दर है, मधुर है, कफमें हित है, त्रिदोषको नाशता है, खांसीको और श्वासरोगको हरता है ॥ ३ ॥ अथ यवागूका गुण । सन्दीपनो स्वेदकरा यवागूः सम्पाचनी दोषमलामयानाम् ॥ सन्तर्पणी धातुबलेन्द्रियाणां शस्ता भवेत्स्याज्ज्वररोगिणां च॥४॥ यवागू पसीनाको लाती है, अग्निको जगाती है, दोष, मल और रोग इनको पकाती है और धातु, बल और इन्द्रियोंको तृप्त करती है और ज्वररोगवालोंको श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ अथ यवागूका लक्षण । भागैकञ्च भवेद्द्रव्यं द्विभागन जलं क्षिपेत् ॥ चित्रकं पिप्पली- मूलं पिप्पलीचव्यनागरम् ॥५॥ धान्यकस्य समांशानि पिष्ट्वा श्वेतांश्च तण्डुलान्॥संशुद्धा शिथिला किञ्चित् सा यवागूर्निग- द्यते ॥ ६ ॥ यवागूमुपभुञ्जानो जनो नारुचिमाचरेत्॥ शाक- माषफलैर्युक्ता यवागूः स्याच्च दुर्जरा ॥ ७ ॥ एक भाग द्रव्य और दो भाग पानी मिलावे और चीता, पीपलामूल, पीपल, चव्य, सोंठ ॥ ५ ॥ धनियां ये सब समभाग लेने, सफेद और दूसरे रंगके चावल इन सबोंको पीस मिलाके पकावे कुछ पतली रहे तिसको यवागू कहते हैं ॥ ६ ॥ यवागूका भोजन करता हुआ मनुष्य अरुचिको नहीं प्राप्त होता और शाक, उड़द, फलसे युक्त यवागू दुर्जर होती है ॥ ७ ॥ अथ मंडका गुण । पञ्चकोलैकधान्याकैर्युक्तो रास्नान्वितः पुनः ॥ मण्डस्त्रिदोषशमनो ज्वराणां पाचनः परः॥ ८ ॥ पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, धनिया, रायसनसे युक्त किया मंड त्रिदोषको नाशता है और ज्वरोंको पकाता है ॥ ८ ॥ अथ खीरका गुण । पायसं गुरु विष्टम्भजननं श्लेष्मवातलम् ॥ पित्तसंशमनं बल्यं वृष्यं श्रेष्ठं रसायनम् ॥ ९॥ खीर भारी है, विष्टंभको करती है, कफ और वातको करती है, पित्तको शांत करती है, बलमें और वीर्यमें हित है, श्रेष्ठ है और रसायन है ॥ ९ ॥


१ “पिप्पली चव्य विश्वाह्वा पिप्पलीमूलचित्रकैः। पञ्चकोलमिति ख्यातं सद्यो दीपनपाचनम्”॥ शार्ङ्गधरे ।

अ० २३ ] भाषाटीकासमेता । (११५) अथ खीचडीका गुण । गुर्वीविष्टम्भजननो वातश्लेष्मकरः स्मृतः ॥ पित्तसंशमनो बल्यो वृष्यश्चैव बलप्रदः ॥ १० ॥ मुहुस्तण्डुलसंयुक्तो माषतण्डुल- वान् पुनः ॥ अन्यथा धान्यगुणवांल्लक्ष्यते च भिषग्वर ॥११॥ तिलानां संयुतो हृद्यो धातुपुष्टिविवर्द्धनः ॥ गुरुर्विष्टम्भमलकृद् दुर्जरः श्लेष्मकोपनः ॥ १२ ॥ खीचडी भारी है, विष्टम्भको करती है, वातको और कफको करती है, पित्तको शांत करती है, बलमें और वीर्य्यमें हित है और बलको देती है ॥ १० ॥ फिर चावलोंसे युक्त हुई अथवा चावल और उड़दोंसे युक्त हुई खीचडीके भी वही गुण हैं। अन्य तरहकी खीचडी अन्नके गुणको देती है ॥ ११ ॥ तिलोंकी खीचडी सुंदर है, धातुओंकी पुष्टिको बढाती है, भारी है, विष्टंभको और मलको करती है, दुर्जर है, कफको कोपती है ॥ १२ ॥ अथ दालका गुण । सूपश्चोक्तस्त्रिदोषघ्नो व्यञ्जितश्चैव सर्पिषा ॥ धातुपुष्टिकिरः श्रेष्ठो बृंहणो बलवर्द्धनः ॥ १३ ॥ दाल त्रिदोषको नाशती है और घृतमें भूनी अथवा छोंकी हुई दाल धातुओंकी पुष्टिको करती है, श्रेष्ठ है, धातुओंको और बलको बढ़ाती है ॥ १३ ॥ अथ खलका गुण । कफवातकरो हृद्यः खलको बलकारकः ॥ १४ ॥ तिलोंका खल वातको और कफको करता है, सुन्दर है और बलको करता है ॥ १४ ॥ अथ अनारका पना । कफानिलहरो हृद्यो दीपनो दाडिमाम्लकः ॥ १५ ॥ अनारका पना कफको और वातको हरता है, सुन्दर है और अग्निको जगाता है ॥ १५ ॥ अथ पापड़का गुण । पर्पटस्तैलसम्भृष्टो दोषाणां च ज्वरापहः ॥ रुचिकृद्बलकृच्चैव दाहशोषतृषापहः ॥ १६ ॥ तेलमें भुना हुआ पापड दोषोंसे उपजे ज्वरको नाशता है, रुचिको और बलको करता है, दाह, शोष, तृषाको नाशता है ॥ १६ ॥ अथ संड़ाकीका गुण । सण्डाकी च गुरुः स्निग्धा दुर्जरा अतिशीतला ॥ पित्तश्लेष्मकरा बल्या धातूनां च बलप्रदा ॥ १७ ॥

( ११६ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- संडाकी भारी है, चिकनी है, दुर्जर है, अति शीतल है, पित्तको और कफको करती है, बलमें हित है और धातुओंके बलको देती है ॥ १७ ॥ अथ उड़द आदिके बड़ोंका गुण । दुर्जरा मधुरा रुच्या वटिका माषकादिभिः ॥ १८ ॥ उड़द आदिके बड़े दुर्जर हैं, मधुर हैं, रुचिमें हित हैं ॥ १८ ॥ अथ शिखरनका गुण । गुडदधिप्रमुदिता हिता शिखरिणी नृणाम् ॥ धातुवृद्धिकरा वृष्या वातपित्तविनाशिनी ॥ १९ ॥ गुड़ और दहीसे बनी हुई शिखरन मनुष्योंको हित है, धातुओंको बढ़ाती है, वीर्यमें हित है, वातको और पित्तको नाशती है ॥ १९ ॥ अथ घृतयुक्त दहीके पतले शिखरनके गुण । शीतलः पित्तशमनो भ्रममूर्च्छातृषापहः ॥ खण्डेन संयुक्तः श्रेष्ठो घृतयुक्तो जलाधिकः॥ २० ॥ यह शीतल है, पित्तको शांत करता है और भ्रम, मूर्च्छा, तृषाको नाशता है, खांड तथा घृतसे संयुक्त और पानीकी अधिकतासे संयुक्त ऐसा शिखरन श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ अथ मन्थका लक्षण और गुण । सक्तवः सर्पिषाभ्यक्ताः शीतवारिपरिप्लुताः॥ नातिद्रवा नाति- सान्द्रा मन्थ इत्यभिधीयते॥२१॥ मन्थः सद्यो बलच्छर्दिपि- पासादाहनाशनः॥साम्लस्नेहश्च सगुडो मूत्रकृच्छ्रस्य साधनः२२ घृतमें भुने हुए सत्तूओमें पानी मिलाके ऐसा बनावे जो न अति पतला और न अति कठिन हो तिसको मन्थ कहते हैं ॥२१॥ तत्कालका बनाया मन्थ बल, छर्दि, पिपासा और दाहको नाशता है, तेल, खटाई और गुड़युक्त मन्थ मूत्रकृच्छ्रको साधता है ॥ २२ ॥ अथ सिद्धमांसका गुण । सिद्धं मांसं वेसवारेण युक्तं बाल्यं श्रेष्ठं स्वादु संदीपनं च ॥ त्रिदोषशमनं गुरु लवणस्नेहयुक्तं दुर्जरं दीपनं स्मृतम् ॥ २३ ॥ सिद्ध किया और वेसवारसंज्ञक मसालासे संयुक्त किया मांस बलमें हित है, श्रेष्ठ है, स्वादु है, अग्निको जगाता है, त्रिदोषको शांत करता है, भारी है, नमक और स्नेहसे संयुक्त किया मांस दुर्जर है और अग्निको जगाता है ॥ २३ ॥ १ आर्षत्वेनात्र छंदोभङ्गत्वदोषो नास्ति ।

अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११७) अथ मांसकी श्रेष्ठता । नहि मांससमं किञ्चिदन्यद्देहमहत्त्वकृत् ॥ मांसादमांसं मांसेन संभृतत्वाद्विशिष्यते ॥ २४ ॥ शरीरके बढानेके वास्ते मांससरीखा दूसरा कोई पदार्थ नहीं है, उस मांसमें भी जो प्राणी मांस खाते हैं उन प्राणियोंका मांस मांससे भरा रहता है, इसलिये वह बहुत अच्छा होता है ॥ २४ ॥ अथ भूंजेहुए मांसका गुण । अङ्गारैः परिपक्वं च दीपनं श्लेष्मनाशनम्॥ बल्यं च स्नेहसंयुक्तं घनं घनगुणात्मकम् ॥ २५ ॥ शूल आदिके द्वारा अंगारोंसे पकाया मांस दीपन है, कफनाशक है, बलमें हित है, स्नेह- युक्त रहता है कड़ा है, और कड़े गुणवाला है ॥ २५ ॥ अथ मंडका गुण । अत्युष्णं मण्डकं पथ्यं लघु चैव यथोत्तरम् ॥ त्रिकशूलपार्श्वशू- लपरिणामापहं तथा॥तृष्णामारुतछर्द्दिघ्नमामाशयकरं तथा॥२६॥ मंड अति गर्म है, पथ्य है और हलका है, यह त्रिकशूल, पसलीशूल, परिणामशूलको नाशता है, तृष्णा, वायु, छर्दि इनको नाशता है, आमको बढ़ाता है ॥ २६ ॥ अथ मांडका गुण । तप्तकर्परपक्वा या रोचनी मधुरा घना ॥ कफवृद्धिकरी बल्या पित्तरक्तप्रदायिनी ॥ २७ ॥ तप्त किये तवेपर पकाया मांडा रुचिको करता है, मधुर है, कठिन है, कफको बढ़ाता है, बलमें हित है, पित्त और रक्तको देता है ॥ २७ ॥ अथ पूरी और घेवरका गुण । पूरिका घृतपूरन्तु त्रिदोषशमनं परम् ॥ वृष्यं संबृंहणं स्वादु क्षतक्षयनिवारणम् ॥ २८ ॥ पूरी और घेवर त्रिदोषको शांत करता है, वीर्यमें हित है, धातुओंको पुष्ट करता है, स्वादु है, क्षत और क्षयको नाशता है ॥ २८ ॥ अथ मालपुवाका गुण । गुरूष्णो दुर्जरो ज्ञेयो वातश्लेष्मकरो गुरुः ॥ पूपकः श्लेष्मको हृद्यो वृष्यो वातानुलोमकः ॥ २९ ॥ १ मांसमत्ति भक्षयति असौ मांसादः तस्य मांसमिति मांसभक्षकस्य मांसम् ।

( ११८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- मालपुआ भारी है, दुर्जर है, वातकफको करता है और कफको करता है, सुंदर है, वीर्यमें हित है, वातको अनुलोम करता है ॥ २९ ॥ अथ सोमालिकाका गुण । सोमालिका घना स्वादू रोचनी बलवर्द्धनी ॥ दुर्जरा दोषशमनी वृष्यानुकरणी मता ॥ ३० ॥ सोमालिका (पक्वान्न) कठिन है, स्वादु है, रुचिको उपजाती है, बलको बढ़ाती है, दुर्जर है, दोषको शांत करती है और वीर्यमें हित है ॥ ३० ॥ अथ फेनिका गुण । बृंहणी वातपित्तघ्नी पथ्या लघुतरा मता ॥ फेनिका रोचनी बल्या सर्वधातुबलप्रदा ॥ ३१ ॥ फेनी बल बढाती है, वात पित्तको शांत करती है, पथ्य है, बहुत हलकी है, रुचिको उप- जाती है, बलमें हित है और सब धातुओंमें बलको देती है ॥ ३१ ॥ अथ भिन्न वड़ाका गुण । विष्टम्भी मधुरो हृद्यो घनो वातकफात्मकः ॥ ससिक्तो वा त्रिदोषघ्नो दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३२ ॥ भिन्न किया बड़ा विष्टंभको करता है, मधुर है, सुंदर है, कठिन है,वातकी और कफकी प्रकृ- तिवाला है, सेचित किया बड़ा त्रिदोषको नाशता है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३२ ॥ अथ अभिन्न वड़ाका गुण । अभिन्नो दुर्जरो बल्यो घनतृष्णाप्रदः स्मृतः ॥ तीक्ष्णो विपाके विष्टम्भी दुर्जरो जायते पुनः ॥ ३३ ॥ नहीं भिन्न किया बड़ा दुर्जर है, बलमें हित है, अधिक तृषाको देता है, तेज है, पाककालमें विष्टंभी है, फिर दुर्जर हो जाता है ॥ ३३ ॥ अथ लड्डूकां गुण । कटुकास्तर्पणा बल्या दुजराः शोषकारकाः॥ मन्दाग्नौ न प्रश- स्यन्ते मोदका बहुवर्णकाः ॥ द्रव्यं गुणविशेषेण सारस्वादेन वा पुनः॥ ३४ ॥ लड्डू चर्चरे हैं, तृप्तिको करते हैं,बलमें हित हैं,दुर्जन हैं,शोषको करते हैं और मन्दाग्निमें हित नहीं हैं, बहुत वर्णवाले हैं, अथवा द्रव्यका गुणविशेष करके व सारस्वाद करके लड्डू कहे हैं ३४

अ० २३] भाषाटीकासमेता । (११९) अथ यवपोलिकाका गुण । पोलिका कथिता बल्या कफदोषकरी मता ॥ वृष्या वीर्य्यप्रदा ज्ञेया दोषला वीर्य्यवर्द्धिनी ॥ ३५ ॥ विदलान्नस्य या पर्णा सिद्धा कर्परकेण तु ॥ रुच्या वान्नविशेषेण दोषान् सर्वान् विभावयेत् ॥ ३६ ॥ जवोंकी पोली बलमें हित है, कफदोषको करती है, वीर्यमें हित है, वीर्यको देती है, दोषोंको उपजाती है और वीर्य्यको बढ़ाती है ॥ ३५ ॥ और तंदूरपर पकायी हुई रोटी रुचिमें हितहै, ऐसे ही अन्नके दोषके अनुसार सब पदार्थोंको विचारे ॥ ३६ ॥ अथ अन्नके गुणोंका उपसंहार । अन्यानि चान्नपानानि नैवोक्तानि महामते ॥ ग्रन्थविस्तारभीरुश्च लोको वक्तुं न च क्षमः ॥ ३७ ॥ हे महामते ! अन्य अन्न और पान नहीं कहे हैं, क्योंकि ग्रन्थके बढ़ जानेसे संसारके लोक विचारनेको समर्थ नहीं हो सकेंगे ॥ ३७ ॥ अथ थके हुए मनुष्यका भोजननिषेध । श्रमात्तु भोजनं यस्तु पानं वा कुरुते नरः ॥ ज्वरः संजायते तस्य छर्दिर्वा तत्क्षणाद्भवत् ॥ ३८ ॥ जो मनुष्य परिश्रम करके शीघ्र भोजनको अथवा पानको करता है, उसके शीघ्र ही ज्वर अथवा छर्दि उपजती है ॥ ३८ ॥ अथ भोजनके उपरांत मेहनत और सुरतका निषेध । कृत्वा तु भोजनं सद्यो व्यायामं सुरतं तथा ॥ यः करोति विपत्तिः स्यात्तस्य गात्रस्य निश्चितम्॥ ३९॥ जो मनुष्य भोजनको करके तत्काल कसरतको अथवा मैथुनको करता है उसके शरीरमें निश्चय दुःख हो जाता है ॥ ३९ ॥ अथ ठंडा और गरम भोजनका निषेध । न चातिशीतं भुञ्जीत नात्युष्णं भोजने हितम् ॥ कुर्य्याद्वातकफौ शीतमुष्णं भवति सारकम् ॥ ४० ॥ अतिशीतल पदार्थको खावे नहीं और अति गरम भोजन भी हित नहीं है, क्योंकि शीतल भोजन वातको और कफको करता है, गरम भोजन दस्तावर है ॥ ४० ॥ श्रमित आदिकोंके भोजनका निषेध । न श्रान्तो भोजनं कुर्य्यान्न व्यायामसमाकुलः ॥ विषमासने न भोक्तव्यं करोति विविधान्गदान् ॥ ४१ ॥

( १२० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- परिश्रमसे थका हुआ और कसरतसे थका हुआ मनुष्य भोजनको करे नहीं और विषम आसनपर बैठके भोजनको करे नहीं ये अनेक प्रकारके रोगोंको करते हैं ॥ ४१ ॥ भोजनमें फलादिकोंका नियम। आदौ फलानि भुञ्जीत वर्जयित्वा तु कर्कटीम् ॥ न नक्तं दधि भुञ्जीत भोजनाद्धे न धावनम् ॥४२ ॥ काकडीके बिना सब फलोंको आदिमें खावे रात्रिमें दहीको नहीं खावे और भोजनके बीचमें उठकर नहीं भागे ( अर्थात् आधा भोजन करके उठना फिरना फिर भोजन करना उचित नहीं ) ॥ ४२ ॥ भोजनके पीछे बैठनेका नियम । भोक्तोपविशति स्थौल्यं बलमुत्तानशायिनः ॥ आयुर्वामकटिस्थितस्य मृत्युर्धावति धावतः ॥ ४३ ॥ जो भोजनको करके बैठता है वह स्थूलपनेको प्राप्त हो जाता है और भोजन करके सीधा शयन करनेवालेका बल बढ़ता है, भोजन करके बायें करवट शयन करनेसे आयु बढता है और भोजन करके दौड़नेसे मृत्यु दौड़ती है ॥ ४३ ॥ भोजनमें पानीका नियम । नचादौ सलिलं पेयं भोजने पानमाचरेत्॥अर्द्धाहारेण भुञ्जीत तृ- तीयं व्यञ्जनेन तु॥४४॥चतुर्थं तोयपानेन पूर्णाहारःसुजायते॥४५॥ भोजनके आदिमें पानीको नहीं पीवे भोजन करते हुए पानीको पीवे दो भागके कोष्ठको भोजनसे पूरित करे और तीसरे भागको व्यंजनसे पूरित करे ॥ ४४ ॥ और चौथे भागको पानीसे पूरित करे ऐसे पूर्ण भोजन होता है ॥ ४५ ॥ भोजनके ऊपर व्यायाम । भोजनोध्वं चंक्रमेत शतपादं शनैः शनैः ॥ पश्चादुत्तानशयनं ततो वामे क्षणं स्वपेत् ॥ ४६ ॥ और भोजन करके सौ १०० पैर हौले हौले चले, पीछे सीधा शयन कर पीछे बायें करवट दो घडी शयन करे ॥ ४६ ॥ अथ भोजनके उपरांत नेत्रादिकोंका मार्जन। भुक्त्वोपरि समाचम्य मार्जयेद्दक्षिणाकरैः ॥ पुनर्दक्षिणहस्तेन मार्जयेदुदरं सुधीः ॥ ४७ ॥ भोजन करके पीछे आचमन ले, दाहिने हाथसे मुखको शुद्ध कर पीछे दाहिने हाथ करके बुद्धिमान् पेटको शोधित करे ॥ ४७ ॥

अ० २३ ] भाषाटीकासमेता । ( १२१ ) अथ अङ्कारका नियम । उद्गीरयेत्समुद्गारं न चोद्गारस्य धारणा ॥ ४८ ॥ अङ्कारको अच्छी तरह लेवे, क्योंकि अङ्कारको धारित करना अच्छा नहीं ॥ ४८ ॥ अथ व्यायामादिकोंका नियम । व्यायामं च व्यवायं च धावनं पानमेव च ॥ युद्धं गीतं च पाठं च क्षणमुक्तो विवर्जयेत् ॥ ४९ ॥ न सद्यः पीते पठनं गमनं च न कारयेत् ॥ न वा वाहनमारोहं विवादं न च कारयेत् ॥ ५० ॥ और भोजन करके दो घडीतक कसरत, मैथुन, दौडना अदि शुद्धि, जलआदिका पान और कुस्ती आदि युद्ध, गाना, पढ़ाना, इनको वर्जे ॥ ४९ ॥ और तत्काल पानीको पीके पठन और गमनको न करे । बोझाको उठावे नहीं, सवारी आदिपर चढ़े नहीं, विवादको करेनहीं ॥५०॥ अथ दिनमें शयन करनेका निषेध । दिवास्वापं न कुर्य्यात्तु भुक्त्वोपरि च विश्रमेत् ॥ अकालशय- नाच्छ्लेष्मा प्रतिश्यायः प्रपीनसः ॥५१॥ क्षयशोफशिरोऽर्त्तिश्च जायते चाग्निमान्द्यता ॥ ५२ ॥ और दिनमें शयनको करे नहीं किंतु भोजनकरके विश्राम करे, अकालमें शयन करनेसे कफ, जुकाम, पीनसरोग ॥ ५१ ॥ क्षय, शोजा, शिरमें पीड़ा, मंदाग्नि ये उपजते हैं ॥ ५२ ॥ अथ दिनमें शयन कराने लायक मनुष्य । मद्यपीते परिश्रान्ते हिक्काश्वासाहुरेषु च ॥ भयशोकक्षुधार्त्तानां पठानान्मैथुनेन च ॥ ५३ ॥ तथैव वृद्धबाले च भाराक्रान्ते तथातुरे ॥ अतीसारे च शोफे च तृष्णापानात्ययेऽपि च ॥ ५४ ॥ ग्रीष्मे बाल्ये निशाह्रस्ते दिवा स्वप्नं हितं भवेत् ॥ ५५ ॥ इति आ- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे अन्नपानवर्गो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ प्रथमस्थानं समाप्तम् ॥ १ ॥ मद्यपान करनेमें, परिश्रमसे थकनेमें, हिचकी और श्वासकी पीड़ामें, भय, शोक और भूख इनमें, पठन और मैथुनमें ॥ ५३ ॥ वृद्धपना, बालकपना इनमें, बोझेसे थकनेपर, रोगमें अतीसार और शोजामें, तृषा और पानात्यय रोगमें ॥ ५४ ॥ ग्रीष्मऋतुमें, बाल्यावस्थामें, रात्रि- के जागनेमें दिनको शयन करना हित है ॥ ५५ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरवि- दत्तशाह्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने अन्नपानवर्गो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः २३ यहां प्रथमस्थान समाप्त हुआ ।

अथ द्वितीयस्थानम् । प्रथमोऽध्यायः १. आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि द्वितीयस्थानमुत्तमम् ॥ शुभाशुभानि स्वप्नानि स्वास्थ्यारिष्टानि मानुषे ॥ १ ॥ शृणु पुत्र समासेन यथा वत्स प्रकाश्यते ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं—अब उत्तम द्वितीयस्थानको कहता हूं । मनुष्योंके शुभ- अशुभ, स्वप्न, स्वस्थपना, अरिष्ट ॥ १ ॥ इनको हे पुत्र ! विस्तारसे सुनो । जैसे हे वत्स ! प्रकाशित किया जाता है ॥ २ ॥ हारीत उवाच ॥ ज्ञातं मया महाप्राज्ञ अन्नपानं तथोत्तमम् ॥ इदानीं ज्ञातुमिच्छामि रोगाणां रोगविज्ञताम् ॥ ३ ॥ कर्मजा व्याधयो य च तान्वद त्वं महामते ॥ ४ ॥ हारीत बोले—हे महाप्राज्ञ ! अन्नपानकी विधि मैंने जानी । अब रोगवालोंके रोगोंको जाननेकी इच्छा करता हूं ॥ ३ ॥ हे महामते ! कर्मसे जो व्याधियां उपजतीं हैं उन्हें आप कहें ॥ ४ ॥ आत्रेय उवाच ॥ कर्मजा व्याधयः सर्वे भवन्ति हि शरीरिणाम्॥ सर्वे नरकरूपाः स्युः साध्यासाध्या भवन्त्यमी ॥५॥ अज्ञातं यत्कृतं पापं पश्चात्कृच्छ्रं समाचरेत्॥प्रायश्चित्तबलेनापि साध्य- रूपो भवेद्गदः ॥६॥ क्रियते ज्ञातरूपेण यत्पश्चात्कृच्छ्रमाचरेत्॥ प्रायश्चित्तेन प्रान्ते तु कष्टसाध्यो भवेद्गदः ॥७॥ ब्रह्मघ्नगोध्न- धरणीपतिघातकश्च आरामतोयधरनाशकपारदाराः ॥ स्वाम्य- ङ्गनागुरुवधूकूलजामिगामी एते त्रयोदशविधाः प्रबला गदाश्च ॥८॥ पाण्डुः कुष्ठं राजयक्ष्मातिसारो मेहो मूत्रं चाश्मरी मूत्र- कृच्छ्रम् ॥ शूलः श्वासः कासशोफव्रणाश्च दोषाश्चैते पापरूपा

अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२३ )

नृणां स्युः ॥९॥ ज्वरो जीर्णं तथा छर्दिभ्रममोहाग्निमान्द्यताः॥ यकृत्प्लीहार्शःशोषाश्च एते चैवोपदूषकाः ॥ १० ॥ व्रणं शूलं शिरःशूलं रक्तपित्तं तथोर्द्धगम्॥एते रोगा महाप्राज्ञ अभिशा- पाद्भवन्ति हि ॥११॥ अन्येऽपि बहुधा रोगा जायन्ते दोषस- म्भवाः ॥ अतो वक्ष्य समासेन शृणु त्वं च महामते ॥१२ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-शरीरधारियोंके कर्मसे उपजनेवाली सब व्याधियां हैं और सब दुःखरूप हैं साध्य और असाध्य होती हैं ॥५॥ बिना जाने जो किये हुए पापके पीछे कृच्छ्र चांद्रायण करे, क्योंकि प्रायश्चित्तके बलसे वह पाप साध्य हो जाता है॥६॥जानके पाप करनेके पीछे कृच्छ्रचांद्रायण करनेसे कष्टसाध्य रोग हो जाता है ॥ ७ ॥ ब्राह्मणको मारनेवाला, गायको मारनेवाला, राजाको मारनेवाला और बाग तथा जलके स्थानको नाशनेवाला और पराई स्त्रीको अपनी स्त्री बनानेवाला और स्वामीकी भार्या, गुरुकी भार्या,अपने कुलमें उपजी ऐसी स्त्रियोंसे भोग करनेवाला ऐसे मनुष्योंके तेरह प्रकारके रोग होते हैं॥ ८ ॥ पांडु, कुष्ठ, राजरोग, अतीसार, प्रमेह, मूत्ररोग, पथरीरोग, मूत्रकृच्छ्र, शूल, श्वास, खांसी, शोजा, घाव ये पापरूपरोग उन मनुष्योंके उपजते हैं ॥ ९ ॥ और ज्वर,अजीर्ण छर्दि,भ्रम,मोह,मंदाग्नि, यकृतरोग,तिल्लीरोग, बवासीर, शोष ये उपरोग कहाते हैं ॥ १० ॥ घाव,शूल, शिरका शूल, शरीरके ऊपरले अंगोंमें प्राप्त हुआ रक्तपित्त ये रोग हे महाप्राज्ञ ! अभिशापसे होते हैं ॥ ११ ॥ अन्य भी बहुतसे रोग दोषोंसे उपजते हैं इसवास्ते विस्तारसे मैं कहूँगा । हे महामते तुम सुनो ॥ १२ ॥ अथ कर्मविपाक । ब्रह्मघ्नो जायते पाण्डुः कुष्ठी गोवधकारकः॥राजघ्नो राजयक्ष्मी स्यादतिसार्योपघातकः ॥ १३ ॥ स्वाम्यङ्गनाभिगमने मेहा रोगा भवन्ति हि॥गुरुजायाप्रसङ्गेन मूत्ररोगोऽश्मरीगदः ॥१४॥ स्वकुलजाप्रसङ्गाच्च जायते च भगंदरः॥शूली परोपतापी च पैशू- न्याच्छ्वासकासिनः॥१५॥मार्गे विघ्नकरा ये तु जायन्ते पादरो- गिणः ॥ अभिशापाद्व्रणोत्पत्तिर्यकृद्धापि प्रजायते ॥ १६ ॥ सुरालये जले चापि शकृद्दृष्टिं करोति यः॥गुदरोग़ा भवन्त्यस्य पापरूपातिदारुणाः ॥१७॥ परतापिद्विजानां च जायन्ते हि

( १२४ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- महाज्वराः॥परान्नविघ्नजननादजीर्णमपि जायते ॥१८॥ गरद्- श्चर्दिरोगी स्यात्पादाष्टविभ्रमी तथा॥धूर्त्तोऽपस्माररोगी स्या- त्कदन्नदेऽग्निमान्द्यकम्॥१९॥यकृत्प्लीहो भवेद्रोगो भ्रूणपातकपा- तकात्॥व्रणं शूलं शिरःशूलं परतापोपकारणात्॥२०॥अपेयपा- नरतको रक्तपित्ती प्रजायते ॥ दावाग्निदायको यस्तु जायते च विसर्पवान्॥२१॥बहुवृक्षोपच्छेदी च जायते च बहुव्रणः ॥ पर- द्रव्यापहाराच्च जायते ग्रहणीगदः ॥२२ ॥ कुनखी स्वर्णस्तेयाच्च प्रसूतिस्तस्य जायते ।। रौप्यस्तेयाच्चित्रकुष्ठं ताम्रचौराद्विपा- दिका ॥२३॥ त्रपुश्चौरः सिध्मलश्च मुखरोगी च सीसहृत्॥वर्वरो लोहचौरः स्यात्क्षारचौरोऽतिमूत्रलः ॥२४॥ घृतचौरोऽन्तरोगी च तैलचौरोऽतिकण्डुकः॥एतैश्चिह्नैस्तु काणाक्षो वक्रोक्तो वक्र- लोचनः॥२५॥ दोषवान्स्याच्छ्यावदन्तो दुष्टवाक्कुष्ठदूषणः ॥ रसनाशाज्जिह्वारोगी गोत्रहा लूतिकाव्रणी॥२६॥एते चैव महा- दोषा अतो वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥कृच्छ्रेण येन सिध्यन्ति पाप- रूपा इमे गदाः ॥ २७ ॥ ब्राह्मणको मारनेवाला पांडुरोगी होता है,गायको मारनेवाला कुष्ठी होता है, राजाको मारने- वाला राजरोगी होता है, मनुष्यको मारनेमें सलाह देनेवाला अतीसाररोगी होता है ॥१३॥ स्वामीकी स्त्रीसे भोग करनेसे प्रमेह रोग उपजता है और गुरुकी स्त्रीसे भोग करनेमें मूत्ररोग और पथरी रोग उपजता है॥१४॥ अपने कुलसे उपजी स्त्रीके संग भोग करनेसे भगंदर रोग उपजता है, पराये सुखको देख दुःख पानेवालेको शूलरोग होता है, चुगली करनेसे श्वास रोग और खांसी उपजती है ॥१५॥ मार्गमें विघ्न करनेवालोंके पैरोंमें रोग उपजता है,अभिशापसे घावकी उत्पत्ति अथवा यकृत् रोग उपजता है ॥ १६ ॥ देवताओंके स्थानमें और पानीमें जो विष्ठाको गेरता है उसके पापरूपी और दारुण ऐसे गुदाके रोग उपजते हैं ॥१७॥ ब्राह्मणको दुःख देनेसे महा- ज्वर उपजता है और पराये भोजनमें विघ्नको करनेसे अजीर्ण रोग उपजता है ॥ १८॥ विषको देनेवालेके छर्दिरोग उपजता है अथवा वह रोगी घुटनोंसे आठ दिशातक भ्रमनेवाला होता है, धूर्त मनुष्यके मृगीरोग उपजता है और कुत्सित अन्नको देनेवाला मन्दाग्निसे पीडित होता है ॥ १९ ॥ गर्भको गिरानेवाला यकृत्रोगसे और तिल्लीरोगसे पीडित होता है, ॥ दूसरेको देख दुःख पानेसे घाव, शूल, शिरका शूल ये उपजते हैं ॥२०॥ नहीं पीनेके योग्य चीजको पीनेवाला रक्तपित्तसे पीडित होता है और वनमें अग्निको

अ० १ ] भाषाटीकासमेता । ( १२५ ) लगानेवाला विसर्परोगी हो जाता है ॥ २१ ॥ बहुतसे वृक्षोंको छेदनेवाला बहुत घावोंसे पी- ड़ित होता है और पराये द्रव्यको हरनेसे ग्रहणी रोग उपजता है ॥ २२ ॥ सोनेकी चोरी कर- नेसे कुत्सित नखोंवाला हो जाता है, चांदीको चोरनेसे चित्रकुष्ठ उपजता है, तांबको चुरानेसे वि- पादिका कुष्ठ उपजता है ॥ २३ ॥ रांगको चुरानेसे सेपरोग होता है, सीसाके चुरानेसे मुखरोग उपजता है, लोहाको चुरानेसे बर्बर संज्ञक रोगको प्राप्त होता है, क्षारको चोरनेवालेको अति- मूत्ररोग उपजता है ॥ २४ ॥ घृतको चोरनेसे आंतरोग होता है, तेलको चोरनेसे खाजरोग उप- जता है, दूसरोंमें छिद्रको काढ़नेवाला नेत्रोंसे काणा होता है और टेढ़ा बोलनेवाला टेढ़े नेत्रों- वाला होता है ॥ २५॥ दोषवालेके काले दंत होते हैं, दुष्टकर्मको करनेवाला कुष्ठरोगी होता है, रसको नाशनेवाला जीभरोगी होता है, गोत्रके मनुष्योंको नाशनेवाला भूत और घावसे पीड़ित होता है ॥ २६ ॥ ये सब महादोष हैं इसलिये इनकी निष्कृतिको कहता हूँ जिस कृच्छ्रसे ये पापरूपी रोग सिद्ध होते हैं ॥ २७ ॥ अथ पाप दोषोंका प्रतिकार । गोदानं भूमिदानं च स्वर्णदानं सुरार्चनम् ॥ कृत्वा पश्चात्प्रती- कारं कुर्यात्पाण्डूपशान्तये ॥२८॥ महापापेषु सर्वस्वं तदर्द्ध- मुपदोषजे॥ आत्रेयाद्दशषष्ठांशात्कल्प्यं व्याधिबलाबलम्॥२९॥ नवषष्टिकृतं कर्म कुष्ठरोगोपशान्तये ॥ गोभूहिरण्यदानं च तथा मिष्टान्नभोजनम् ॥ ३० ॥ चतुर्विधं दानमिदं दत्त्वा कुर्यात्प्र- तिक्रियाम्॥ कदाचिदपि सिध्येत आयुषश्च बलक्रियाम्॥३१॥ मेहे सुवर्णदानं च शूले श्वासे भगन्दरे॥आश्वानडुहदानेन श्वास- कासाद्विमुच्यते॥३२॥ज्वरे चेश्वरपूजा च रुद्रजाप्यं समाचरेत् ॥ अतिपानान्नदानं च शस्त्रदानं अमातुरे ॥ ३३ ॥ अग्निहोमं चाग्निमान्द्ये कन्यादानं च गुल्मके॥ मेहाश्मरीविनाशाय लवणं च प्रदीयते ॥ ३४ ॥ बहुभोजनदानेन शूलरोगाद्विमु- च्यते ॥ महाज्वरे शान्तिकं च सहस्रं गण्डुकं शिवम् ॥३५ ॥ स्नापयेत्तेन सिद्धिः स्याज्ज्वररोगाद्विमुच्यते॥ घृतमधुप्रदानेन रक्तपित्तं प्रशाम्यति ॥ ३६ ॥ वनस्पतिसिञ्चनेन विसर्पात्परि- मुच्यते ॥ विटपिसिञ्चनेनाथ नात्र याति बहुव्रणः ॥ ३७ ॥ चतुर्विधेन दानेन साध्यः स्याद्ग्रहणीगदः ॥ सुवर्णदानात्कुनखी

( १२६ ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- श्यावदन्तः सुखी भवेत् ॥ ३८ ॥ रौप्यदानाच्चित्रकुष्ठं साध्यं वापि प्रदिश्यते॥सिध्मले त्रपुदानं च बर्बरे लोहदानकम्॥३९॥ मुखव्रणे नागदानं गोदानं बहुपुत्रके॥नेत्ररोगे घृतं दद्यात्सुगन्धं नासिकागदे ॥४० ॥ तैलदानं च कण्डूके रसदानं च जिह्वके॥ श्यावदन्तेन देवानां सत्कृतिः प्रविधीयते॥ ओष्ठरोगेऽपि तद्वच्च लूतारोगे ददेत गाः ॥ ४१ ॥ गोदान,पृथिवीदान,सोनादान, देवताओंकी पूजा इनको करके पीछे पांडुरोगकी शांतिके लिये चिकित्साको करे ॥ २८ ॥ महापापोंमें सर्वस्वका दान करे और उपदोषमें घरके धनसे आधा दान करे । आत्रेयके मतसे व्याधिके बल और अबलको देख घरके धनसे सोलहवां हिस्सा दानको करे ॥ २९ ॥ कुष्ठरोगकी शांतिके लिये उनहत्तर ६९ प्रकारका कर्म्म करना लिखा है परंतु गाय भूमि सोनेका दान और मिष्टअन्नका भोजन ॥ ३० ॥ इन चार प्रकारके दानोंको देकर पीछे कुष्ठकी चिकित्सा करनी,क्योंकि आयुकी शेषतासे कदाचित् चिकित्सा सिद्ध भी हो जाती है ॥ ३१ ॥प्रमेह,श्वास रोग, खांसी,भगंदर इन रोगोंमें सोनेका दान करना, घोड़ा और बैलके दानको करनेसे मनुष्य श्वासरोग और खांसीसे छुट जाता है॥ ३२॥ ज्वररोगमें महादेवकी पूजा और महा- देवके स्तोत्रका पाठ करावे और भ्रमरोगमें पानीका और अन्नका दान श्रेष्ठ है ॥ ३३॥ मंदाग्नि में अग्निमें होम करे, गुल्मरोगमें कन्याका दान करे और प्रमेह तथा पथरीरोगको दूर करनेके लिये नमकका दान करना ॥ ३४ ॥ बहुतसे भोजनका दान कर- नेसे मनुष्य शूलरोगसे मुक्त होता है, महाज्वरमें शांतिकर्म करावे और हजारधारावाले कलशेसे शिवको स्नान करावे ॥ ३५ ॥ इससे सिद्धि होती है और महाज्वर दूर होता है, घृत और शहदके दानसे रक्तपित्त दूर होता है ॥ ३६ ॥ वनस्पतिको सींचनेसे विसर्परोग दूर होता है, वृक्षको सींचनेसे घावरोग दूर होता है ॥ ३७॥ चार प्रकारके दानसे ग्रहणी रोग साध्य हो जा ता है, सोनेके दानसे कुनखी और काले दांतोंवाला सुखी होता है ॥ ३८ ॥ चांदीके दानसे श्वित्रकुष्ठ साध्य कहा है, सीपरोगमें रांगका दान और बर्बररोगमें लोहेका दान श्रेष्ठ है ॥ ३९ ॥ मुखके घावमें हस्तीका दान हित है और पापडीरोगमें गौका दान हित है, नेत्ररोगमें घृतको देवे,नासिकाके रोगमें सुगंधका दान करना ॥ ४० ॥ खाजमें तेलका दान और जीभके रोगमें रसका दान करना, कालें दांतोंके रोगमें देवताओंका सत्कार करना और ओष्ठरोगमें भी यही विधि है और लूतारोगमें गौका दान देना ॥ ४१॥ अथ अन्यान्य रोगोंका कारण । अन्यांश्च कथयिष्यामि मनुष्याणां शरीरगान्॥लज्जितः परनिं- न्दायां परतर्केण काणगः ॥ ४२ ॥ खरहा स्याद्वक्रनासः पक्षा-

अ० २ ] भाषाटीकासमेता । ( १२७ ) घातेन पक्षहा ॥ वामनः स्वप्रशंसायां परद्वेष्टातिपिङ्गलः ४३ ॥ परस्य कृत्यकर्त्ता च जायते विकृतात्मकः॥ एते महारोगाश्चान्ये जायन्ते पापसम्भवाः ॥४४॥ यदि वात्र न सिध्येत्तु परभावो भवेन्न च ॥ अतो हि प्रायश्चित्तं तु कारयेद्भिषजां वरः ॥४५॥ भूयो जन्मान्तरे यावत्पापं रोग्यथ भुञ्जति ॥ प्रायश्चित्ते कृते वापि न पुनर्जायते भवे ॥ ४६ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतो- त्तरे द्वितीयस्थाने पापदोषप्रतीकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ मनुष्योंके शरीरमें प्राप्त हुए अन्य रोगोंको भी कहूँगा । परायी निंदा करनेवाला मनुष्य लाज- वाला होता है, दूसरेको तर्क करनेवाला मनुष्य काणा होता है ॥४२॥ गधाको मारनेवाला टेढ़ी नासिकासे संयुक्त होता है, दूसरेके पक्षको काटनेवाला मनुष्य अर्द्धांगरोगसे पीड़ित होता है, अपनी प्रशंसा करनेमें मनुष्य वामनाकी योनिको प्राप्त होता है, दूसरोंसे वैर करनेवाला मनुष्य अतिपिंग शरीरवाला होता है ॥ ४३ ॥ दूसरेके कृत्यको करनेवाला मनुष्य विकृत शरीरवाला होता है ये सब और भी अन्य महारोग पापसे उपजनेवाले हैं ॥४४॥ यदि रोग सिद्ध न होवें तो वैद्यवर रोगीको प्रायश्चित्त करावे ॥ ४५ ॥ किये हुए पापको दूसरे जन्ममें भी रोगी भोगता है परन्तु प्रायश्चित्तके करनेमें फिर वह पापरूपी रोग नहीं उपजता है ॥ ४६ ॥ इति वेरीनिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयस्थाने पापदोषप्रतीकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः २. अथ स्वप्नाध्यायका वर्णन । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र समासेन यथा वत्स प्रकाश्यते ॥ तथारिष्टपरिज्ञानं भेषजं संप्रवक्ष्यते ॥ १ ॥ आत्रेय जी कहते हैं-हें पुत्र ! विस्तारसे जैसे प्रकाशित किया जाता है वैसे ही अरि- ष्टके परिज्ञानको और औषधको सुनो ॥ १ ॥ अथ वर्ज्य स्वप्न । वातिकाः पैत्तिकाश्चैव भयाद्धीनबलादपि ॥ मूत्रान्विष्टे सपित्ते च षट्स्वप्नानि च वर्जयेत् ॥ २ ॥

(१२८) हारीतसंहिता। [द्वितीयस्थाने- वात, पित्त, भय, हीनबल, मूत्रकी शंका, पित्तका संयोग इनके संयोगसे उपजे ये छः स्वप्न वर्जित हैं ॥ २ ॥ अथ कालसे स्वप्नफल । संवत्सरेण फलदो हि भवेन्निशायां स्वप्नोऽशुभस्य प्रहरे च शुभस्य वाद्ये ॥ स्याद्वत्सरार्द्धमतियाममथ द्वितीये मासत्रयेण फलदो भवति तृतीये ॥ ३ ॥ निशावसाने प्रवदन्ति किञ्चिद- शाहकः स्यात्फलदो मनुष्ये॥वर्षादिने स्यात्तमुशन्ति शान्ताः षाण्मासिको मध्यदिने प्रदिष्टः॥ ४ ॥ रात्रिके प्रथम पहरमें आया स्वप्न एक वर्षमें शुभ फलको देता है और दूसरे पहरमें आया स्वप्न छः महीनोंमें फलको देता है और तीसरे पहरमें आया स्वप्न तीन महीनोंमें फलको देता है ॥ ३ ॥ रात्रिके अन्तमें आया स्वप्न दश दिनमें फलको देता है और वर्षामें दुपहरीके समय आया स्वप्न छः महीनोंमें फलको देता है ॥ ४ ॥ अथ स्वप्नमें शुभ द्रव्य । स्वप्नेषु शुभ्राणि शुभानि धीराः सर्वाणि चेमानि विवर्जयित्वा ॥ कार्पासभस्मास्थिकपालशूलं कुर्यान्नराणां विपदं रुजं वा॥५॥ सब श्वेत पदार्थ स्वप्नमें दीखे शुभ कहे हैं,कपास, भस्म,हड्डी, खोपरी छोड़कर इनका दर्शन स्वप्नमें होवे तो मनुष्योंको दुःख अथवा रोग उपजता है ॥ ५ ॥ अथ अशुभद्रव्य । सर्वाणि कृष्णानि विनिन्दितानि स्वप्ने नराणां विपदं रुजं वा ॥ कुर्वन्ति चैतानि हि वर्जयित्वा गोवाजिराजद्विजहस्तिमत्स्यान्६॥ और स्वप्नमें सब प्रकारकी काली चीज निंदित है, जो स्वप्नमें काली चीज दीख जावे तो सिवाय इनके काली गौ, घोडा, राजा ब्राह्मण, हाथी और मत्स्य मनुष्योंको दुःख अथवा रोग उपजता है ॥ ६ ॥ अथ शुभ स्वप्नोंका वर्णन । मुकुरकुसुमशृङ्गारातपत्रं ध्वजं वा दधि फलमथ वस्त्रं चान्नताम्बू- लवस्त्रम्। कमलकलशशंखं भूषणं काञ्चनस्य भवति सकलसंप- च्छ्रेयसे रोगिणां च॥ ७ ॥ शीशा, फूल, श्रृंगार, छत्र,ध्वजा, दही, फल, वस्त्र, अन्न, नागरपान, कमल, कलश,शंख, सोनेका गहना इनको स्वप्नमें देखना सब प्रकारका सुख और रोगियोंको कल्याण देता है ॥७॥

अ० २] भाषाटीकासमेता । (१३९) अथ शुभ स्वप्न । दिनकरनिशिनाथ मण्डलं तारकस्य विकचकमलकुञ्जः पूर्णप- द्माकरं वा ॥ तरति सलिलराशिप्रौढनद्याश्च पारं घनसुखविभ- वाप्तिर्व्याधिनां रोगमुक्तिः ॥ ८ ॥ देवो द्विजो वा पितरो नृपो वा स्वप्नेषु वाक्यं वदते यथैव ॥ तथैव नान्यच्च भवेन्मनुष्ये यद्यस्य सौख्यं विपदो रुजो वा ॥ ९ ॥ गोवाजिकुञ्जरनृपाः सुमनः प्रशस्तं स्वप्नेषु पश्यति नरः सरुजः सुखाय ॥ रोगान्वि- तश्च रुजनाशनसम्भवाय बद्धोऽपि वै सपदि बन्धविमोचनाय॥ ॥१०॥ यो भूषणं पश्यति मन्दिरं वा कन्यां दधि मीनकु- मारकं वा ॥ सपुष्पवल्लीफलितं द्रुमं वा स्वस्थे धनार्त्ति रुजना- शनाय ॥ ११ ॥ स्वप्ने पयःपानमतिप्रशस्तं पानं सुराया अज- भोजनं वा॥घृतं यवागूः कृसरोदनं वा क्षैरेयिकं भोजनकं सुखाय ॥ १२॥ सितो भुजङ्गो दशति कराग्रे नरस्य सुप्तस्य शरीरके- षु॥ पुत्रस्य लाभं वदते धनं वा नाशं विदध्यादचिराद्रुजां वा ॥१३॥ सश्वेतवस्त्रां रमणीं सुरम्यां स्वप्ने समालिङ्गति यो मनुष्यः ॥ तस्य प्रकर्षेण सुखं श्रियः स्यात्सुपुत्रलाभश्च रुजां विनाशः ॥१४॥ यो धान्यपुञ्जं तिलतण्डुलानां गोधूमसिद्धा- र्थयवादिकानाम् ॥ धान्याप्तिरस्यामयनाशहेतुः स्वप्नेषु शीघ्रं मनुजे सुखाय ॥१५॥ सफले धनसम्पत्तिर्दीप्ते रोगविनाशनम्॥ सुखं च पुष्पिते ज्ञेयं सम्पूर्णे वाञ्छितं फलम् ॥ १६ ॥ सूर्य, चंद्रमा, तारागण इनके मंडलको देखे और खिले हुए कमलोंके समूहसे पूरित हुए तालाबको देखे और पानीके समूहसे भरी हुई नदीको तरे और नदीसे पार हो तो धन तथा सुखकी प्राप्ति हो और रोगको गया जानना ॥ ८ ॥ देवता, पंडित, पितर, राजा, ये सब जैसे स्वप्नमें वाक्यको कहदेवें तैसे ही मनुष्यको होता है चाहे सुख हो, चाहे दुःख हो या रोग हो ॥ ९ ॥ गौ, घोड़ा, हस्ती, राजा, फूल, इनके जो मनुष्य स्वप्नमें देखता है उस रोगीको सुख होता है और इस स्वप्नको देखनेस बंधमें प्राप्त हुआ मनुष्य शीघ्र छूट जाता ॥ १० जो मनुष्य स्वप्नमें गहनाको और मंदिरको देखता है अथवा १ अत्र छन्दोभंगः । २ अत्रापि । ९

( १३० ) हारीतसंहिता । [ द्वितीयस्थाने- कन्या, दही, मछली, बालक इनको देखता है अथवा फूल और बेलसे फलित हुए वृक्ष- को देखे ये स्वप्न स्वस्थ मनुष्यकों आवे तो धनकी प्राप्ति होगी और रोगीमनुष्यके रोगका नाश होवे ॥ ११ ॥ स्वप्नमें दूधका पीना अतिश्रेष्ठ है, मदिराका पीना अथवा बकराके मांसका भोजन, घृत, गुंडयाणी, खीचड़ी, चावल, दूधका भोजन इनको स्वप्नमें देखे तो सुखकी प्राप्ति होवे ॥ १२ ॥ मनुष्यके दाहिने हाथके अग्रभागको अथवा शरीरको सफेद सर्प सोते- हुए डसता है ऐसे स्वप्नसे पुत्रका और धनका लाभ होता है अथवा शीघ्र ही रोगका नाश होता है ॥ १३ ॥ सफेद वस्त्रोंवाली और रमणीक और सुन्दर ऐसी स्त्रीसे जो मनुष्य मिलाप करता है उसको अत्यंत स्त्रीसुख और धनकी प्राप्ति होती है और पुत्रका लाभ और रोगोंका नाश होता है ॥ १४ ॥ जो मनुष्य तिल, चावल, गेहूं, सरसों, जव, अन्न- का समूह स्वप्नमें देखता है, उसको अन्नकी प्राप्ति और रोगका नाश होता है और सुख भी मिलता है ॥ १५ ॥ जो मनुष्य स्वप्नमें फल सहित वृक्षको देखे, तो उसको धनसंपत्ति प्राप्त होती है और जलता हुआ देखे तो रोगका नाश होता है, पुष्पकारिके युक्त वृक्षको देखे तो सुख होता है और पत्र, पुष्प, फल और शाखा आदिकोंकारके युक्त वृक्षको देखे तो मनवांछित फल मिलता है ॥ १६ ॥ अथ अशुभ स्वप्नोंका वर्णन । काकैः कंकैः करभभुजगैः सूकरोलूकगृध्रैर्जम्बूकेर्वा वृकखरमहि- ष्यातिऋक्षैः श्वभिश्च ॥ व्याघ्रैर्ग्राहैर्मकरकपिभिर्भक्ष्यमाणं स्व- कायं पश्येद्योऽसौ भजति नितरां हानिमापद्रुजं वा ॥ १७ ॥ योऽभ्यञ्जितं स्वं मनुजः प्रपश्येत्सर्षिपैस्तैलविशेषणेन ॥ शीघ्रं रुजार्तिर्भवतीह तस्य वदन्ति धीरा निपुणं विधेयम् ॥ १८ ॥ व्याघ्रोष्ट्रखरसंयुक्ते रथे सौरभसंयुते ॥ उह्यमानो दिशं याम्यां गच्छेद्व स मृतिं भजेत् ॥१९॥ रक्तवस्त्रां कृष्णवस्त्रां मुक्तकेशां विसर्पिणीम् ॥ याम्यां स्थितां रुदन्तीं वा गायन्तीमथ पश्यति ॥ २० ॥ अथाह्वयति संक्रुद्धां समालिङ्गति चर्वति॥ यः पश्य- ति सुखी स स्याद्व्याधितो मृत्युमृच्छति ॥२१॥ यस्य स्वप्ने च निष्कुष्टदन्तपातः प्रदृश्यते ॥शीय्यन्ते केशरोमाणि स सुखी चापदं व्रजेत् ॥२२॥ यस्य खड्गा प्रभज्येत तोमरादिप्रहारतः॥ रक्तं च दृश्यते देहे स स्वस्थो व्याधिमृच्छति ॥२३॥ शून्यागारं