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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

११२ हर्षचरितम् आयातः कथमप्ययं स्मृतिपथं शूनीभवच्चेतसां नागेन्द्रः सहते न मानसगतानाशागजेन्द्रानपि ॥ तदेहि । पुनरप्येनं द्रक्ष्यसि । पश्य तावद्देवम्' इत्यभिधीयमानश्च तेन मदजलपङ्किलकपोलपट्टपतितां मत्तामिव मदपरिमलेन मुकुलितां कथमपि तस्माद्दृष्टिमाकृष्य तेनैव दौवारिकेणोपदिश्यमानवर्त्मा समतिक्रम्य भूपालकुलसहस्रसंकुलानि त्रीणि कक्षान्तराणि चतुर्थे भुक्तास्थानमण्ड- पस्य पुरस्तादजिरे स्थितम्, दूरादूर्ध्वस्थितेन प्रांशुना कर्णिकारगौरेण व्यायामठवायतवपुषा शस्रिणा मौलेन शरीरपरिवारलोकेन पङ्क्ति- स्थितेन कार्तस्वरस्तम्भमण्डलेनेव परिवृतम्, आसन्नोपविष्टविशिष्टेष्ट- देवाह—सहत इत्यादि । मानसं मनः, सरोभेदोऽपि । आशा दिशः, अभिलाषोऽपि । देवमिति इत्यादौ । चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीदिति संबन्धः । मदजलेन पङ्किले कपो- लपट्टे पतिताम् । मत्तामिवेति । मत्तश्च पतति, मुकुलितदृष्टिश्च भवति, गतिवैकल्या- दन्येन कृष्यते । भोजनं भोक्तव्यम् । भुक्ते सत्यास्थानं लोकदर्शनं तदर्थं मण्डप- स्तस्य । ऊर्ध्वस्थितेत्यादि साधारणम् । प्रांशुनोन्नतेन; अन्यत्र, प्रकृष्टा अंशवो यस्य तेन । कर्णिकारमारग्वधपुष्पम् । व्यायामः श्रमः । व्यायतं विभक्तावयवम्, विशे- षेण दीर्घं च । शस्रिणा सायुधेन, स्तम्भा अपि शस्रेण वध्यन्ते । मौलभृतकश्रेणि- मित्रामित्राटविकभेदेन षट्प्रकाराः सहाया भवन्ति । अन्यत्र,—मूले बुध्ने भवं मौलम् । बुध्नप्रतिष्ठमित्यर्थः । पङ्क्तिस्थितेनेति साधारणम् । कार्तस्वरं सुवर्णम्, यस्योदूप्यमानस्य सतः कुङ्कुमस्येव रागो जायते; सौगन्ध्यं च तद्वरिचन्दनम् । से प्राप्त करने के सैकड़ों मनोरथों की चिन्तापूर्ण कल्पना करने लगते हैं, पर किसी प्रकार जब उन्हें दर्पशात का स्मरण हो जाता है तब अत्यन्त निराश हो जाते हैं । इस प्रकार यह गजराज मन के आशारूपी गजेन्द्रों को भी सह नहीं पाता ।' तो चलो, फिर इसे देखना । तब तक महाराज के दर्शन करो । दौवारिक के इस प्रकार कहने पर बाण ने दर्पशात के मदजल से पंकिल गण्डस्थल पर पड़ी हुई मतवाली और मद के सौरभ से कुछ अलसाई हुई अपनी दृष्टि को किसी प्रकार फेर लिया और उसके द्वारा बताये मार्ग से चलकर हजारों राजाओं से भरी ड्योढ़ियों को पार करते हुये चौथी में पहुंच कर चक्रवर्ती महाराज हर्ष को देखा । वे भुक्तास्थानमण्डप के सामने आंगन में बैठे हुए थे । कुछ दूर पर दृढ़ होकर खड़े हुए, कर्णिकार के समान गौर वर्ण वाले, व्यायाम से गठीले शरीर वाले, शस्त्रधारी पुश्तैनी अंगरक्षक उनके चारों ओर सोने के स्तम्भ के समान पंक्ति में खड़े थे । उनके समीप विशिष्ट और प्रेमी जन

द्वितीय उच्छ्वासः ११३ श्लोकम्, हरिचन्दनरसप्रक्षालिते तुषारशीकरशीतलतले दन्तपाण्डुरपादे शशिमय इव मुक्ताशैलशिलापट्टशयने समुपविष्टम्, शयनीयपर्यन्तविन्यस्ते समर्पितसकलविग्रहभारं भुजे, दिङ्मुखविसर्पिणि देहप्रभावित्ताने विततमणि- मयूखे घर्मसमयसुभगे सरसीव मृदुमृणालजालजटिलजले सराजकं रम- माणम्, तेजसः परमाणुभिरिव केवलैर्निर्मितम्, अनिच्छन्तमपि बलादा- रोपितमिव सिंहासनम्, सर्वावयवेषु सर्वलक्षणैर्गृहीतम्, गृहीतब्रह्मचर्य- मालिङ्गितं राजलक्ष्म्या, प्रतिपन्नासिधाराधारणव्रतमविसंवादिनं राजर्षिम्, शशिमय इति वक्ष्यमाणाभिप्रायेण । तुषारेत्यादिना शीतत्वममुष्य दर्शयति । दन्ते तद्वच्च पाण्डुरे पादे । रश्मयोऽपि पादाः । मुक्तेत्यादिना शुक्कतयापि शशिमय इवेत्येतदेव पोषयति । विग्रहः कायः, रणश्च । घर्मेत्यादि । मणीनां स्वभावत एव शीतत्वात्तदीया मयूखा अपि ह्लादयन्ति । यो हि बलवानारोप्यते स सर्वाङ्गेषु गृह्यते । गृहीतब्रह्मचर्यमिति । स्वदारसंतुष्ट ऋतुकालगामी । 'गृहस्थोचितव्यापारो ब्रह्मचर्यमेव' इति श्रुतेः । यत्त्वेवमनुश्रूयते—'यावन्मया न सकला जिता भूमिस्ता- वन्मे ब्रह्मचर्यम्' इति श्रीहर्षः प्रतिज्ञातवान् । द्वादशभिश्च वर्षेर्जित्वा तां महिषीम- ब्रवीत्—'प्रतिज्ञा मे निर्व्यूढा' इति । ततो रोषात् 'अहमपि द्वादशवर्षं ब्रह्मचर्यं चरामि' इति सा प्रतिज्ञामकरोत् । इति ब्रह्मचर्येणाज्ञाकालोऽतिवाहितः । यश्च गृहीतब्रह्मचर्यः स कथं योषितालिङ्ग्यत इति विरोधः । असिधारा खड्गधारा, व्रतविशेषश्च । यत्र स्त्रीपुंसावकपटौ ब्रह्मचर्येण तिष्ठतः । यश्च प्रतिपन्नेषु विश्वा- सितेषु खड्गधारां पातयति स कस्मान्न विसंवदते; नान्यथा भवति कथं च राज- र्षिरसावुच्यत इति विरोधः । यश्च राजर्षिरुत्तममुनिर्गृहीतासिधारो ब्रह्मचारी च बैठे थे । संगमरमर की चौकी पर वे विराजमान थे जो हरिचन्दन के रस से धुली हुई, बर्फ के फुहारे की तरह ठंडी, एवं हाथीदाँत के बने उजले गोड़ों वाली थी, मानों चन्द्र को गढ़ कर बन ई गई हो । शयन के सिरे की ओर टिकी हुई भुजा पर वे सारे शरीर का भार डाले थे । उनके शरीर का प्रभा-वितान दिशाओं में फैल रहा था, मानों वे कोमल मृणालों से भरे तालाब में ग्रीष्म के समय उन राजाओं के साथ स्नान का आनन्द ले रहे थे, मानों केवल तेज के परमाणुओं से उनका निर्माण हुआ था । ऐसा लगता था कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें सिंहासन पर बैठने के लिए बाध्य किया गया था । उनके समस्त अंगों में सब के सब लक्षण दिखाई दे रहे थे । ब्रह्मचर्य ग्रहण करके भी राजलक्ष्मी से आलिङ्गित थे १ । उन्होंने असिधाराव्रत लिया था और वे सदा १. हर्ष ने राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मैं सम्पूर्ण भूमि को दिग्विजय न कर लूंगा तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा । ८ ह० च०

११४ हर्षचरितम् विषमराजमार्गविनिहितपदस्खलनभियेव संलग्नं धर्मे, सकलभूपालपरि- त्यक्तेन भीतेनेव लब्धवाचा सर्वात्मना सत्येन सेव्यमानम्, आसन्नवार- विलासिनीप्रतियातनाभिश्चरणनखपातिनीभिर्दिग्भिरिव दशभिर्विग्रहावर्जि- ताभिः प्रणम्यमानम्, दीर्घैर्दिगन्तपातिभिर्दृष्टिपातैर्लोकपालानां कृताकृतमिव प्रत्यवेक्षमाणम् मणिपादपीठपृष्ठप्रतिष्ठितकरेणोपरिगमनाभ्यनुज्ञां मृग्य- माणमिव दिवसकरेण, भूषणप्रभासमुत्सारणबद्धपर्यन्तमण्डलेन प्रद- क्षिणीक्रियमाणमिव¹ दिवसेन, अप्रणमद्भिर्गिरिभिरपि² दूयमानं, शौर्यो- ष्मणा फेनायमानमिव चन्दनधवलं लावण्यजलधिमुद्वहन्तमेकराज्यो- र्जितेन, निजप्रतिबिम्बान्यपि नृपचक्रचूडामणिधृतान्यसहमानमिव, दर्पदुःखासिकया चामरानिलनिभेन बहुधेव श्वसन्तीं राजलक्ष्मीं दधानम्, स कयाचिदालिङ्गयेत । विषमोऽशक्यानुष्ठानो नतोन्नतरूपः । मार्गो व्यवहारः, पन्थाश्च । विषमे पथि च स्खलति येन क्वचित्सुलभेन भूयते । लब्धवाचेति । सत्यस्य वागेवाश्रयणीयश्च । सर्वैस्त्यक्तः सन्भीतः संस्थां त्यजामीति वाचं लब्ध्वान्यं सेवते, वारविलासिनी शरीरोपचारचतुरा मुख्यललनाप्रतिबिम्बम् । दशभिरिति । नखानां दिशां च दशसंख्याकत्वात् । मणिपादेति । मणिसंबन्धप्र- तिष्ठानमेव पोषयति । करो हस्तोऽपि । फेनायमानमिति । जलं संतापेन सफेनं एकरस रहने वाले राजर्षि थे। टेढ़े-मेढ़े राजमार्ग (राजा के पद) पर पैर फिसलने के भय से मानों उन्होंने धर्म का आश्रय लिया था। मानों सत्य दूसरे राजाओं से तिरस्कृत होकर डरते-डरते वचन लेकर सब प्रकार से उन्हीं की सेवा में तत्पर था। पास में एक वेश्या (चामरग्राहिणी) खड़ी थी जिसकी परछाइयाँ उनके चरण के नखों पर पड़ रही थीं, मानों दसो दिशाएं शरीर धारण करके उनको प्रणाम कर रही हों। वे दूर तक लम्बे दृष्टिपात करते हुए मानों लोकपालों की गलती-सही देख रहे थे। सूर्य की किरणें उनके मणिमय पादपीठ पर पड़ रही थीं मानों वह आकाश में दूर जाने के लिए सम्राट् की अनुमति पाने की इच्छा से प्रार्थना कर रहा था। आभूषणों की प्रभा से उनके चारों ओर मंडल-सा बन गया था मानों दिन उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। उन्नत होने के कारण न झुकने वाले पर्वत भी मानों उनसे प्रभावित थे। वह उस चन्दन के सदृश उज्ज्वल लावण्य के समुद्र को धारण कर रहे थे जो उनके ऐकाधिपत्य के बढ़े शौर्य के प्रताप से खौल कर फेनिल हो रहा था। अपने ही प्रतिबिम्बों को जो राजाओं की चूड़ामणियों में पड़ रहे थे, सहन नहीं कर पाते थे। चंवर की हवा के १. मिव गलितोष्मणा दिवसेन । २. भूभृद्भिर्दूयमानं ।

सकलमिव चतुःसमुद्रलावण्यमादायोत्थितया श्रिया समुपश्लिष्टम्, आभरणमणिकिरणप्रभाजालजायमानानीन्द्रधनुःसहस्राणीन्द्रप्राभृतप्रहि- तानि बिभ्रमानमिव, राज्ञां संभाषणेषु परित्यक्तमपि मधु वर्षन्तम्, काव्यकथास्वपीतमप्यमृतमुद्वमन्तम्, विश्रम्भभाषितेष्वनाकृष्टमपि हृदयं दर्शयन्तम्, प्रसादेषु निश्चलामपि श्रियं स्थाने स्थाने स्थापयन्तम्, वीरगोष्ठीषु पुलकितेन कपोलस्थलेनानुरागसंदेशमिवोपांशु रणश्रियः शृण्व- न्तम्, अतिक्रान्तसुभटकलहालापेषु स्नेहवृष्टिमिव दृष्टिमिष्टे कृपाणे पातय- न्तम्, परिहासस्मितेषु गुरुप्रतापभीतस्य राजकस्य स्वच्छमाशयमिव दशनांशुभिः कथयन्तम्, सकललोकहृदयस्थितमपि न्याये तिष्ठन्तम्, भवति । असहमानमिवेति । कथं सामान्येन समान इति । सकलमित्यादि । सकल- पदेन चतुःशब्देन च शौरेरस्य विशेषमाह । यतो लवणत्वस्य तत्राद्यापि शिष्यमा- णत्वात् । अलं लावण्यमादाय । एकस्माच्च समुद्रादुत्थाय लक्ष्म्या शौरिः समुप- श्लिष्टः । लावण्यं लवणता, सौन्दर्यं च । प्राभृतं ढौकनिकम् । मधु मद्यम्, अमृतं च। विश्रम्भ आश्वासः । उपांश्वप्रकटम् । अतिक्रान्ते कलहे रणे शस्त्राणां स्नेहो दीयते रुधिरादिसलिलनिवारणाय । स्वच्छं निर्मलम् । सुप्रसादमाशयं भावं, प्रकृष्टतापभी- तस्य च स्वच्छो निर्मल आशयो जलाधारो दृश्यते । अत्र प्रतापेत्यादि प्रकरणसाह- चर्यात्स्वच्छतान्यथानुपपत्त्या च जलशब्दं विना जलाशय एव प्रतीयते । न्याये तिष्ठन्तम् । न्यायमनुरुन्धन्तमित्यर्थः । य सर्वेषां हृदयस्थितः स एकस्मिन्नेव तिष्ठ- बहाने दर्प के दुःख से बार-बार साँस ले छोड़ती हुई राजलक्ष्मी को धारण कर रहे थे, मानों चारों समुद्रों के लावण्य को लेकर निकली हुई श्री ने उनका आलिंगन किया था, मानों उपहार के रूप में इन्द्र द्वारा भेजे गए उनके आभरणों की प्रभा से हजारों इन्द्रधनुष बन गए थे, मानों उपहार के रूप में इन्द्र ने भेजा हो। राजाओं के साथ बातचीत के प्रसंग में छुटे हुए भी मधु (मदिरा अथवा मधुरस) की मानों वर्षा कर रहे थे। कविता की गोष्ठियों में न पिए हुए अमृत को भी मानों उगल रहे थे। विस्रंभालाप करते हुए अपने अनाकृष्ट हृदय को मानों दिखा रहे थे। प्रसन्न होकर स्थान-स्थान में अपनी निश्चल श्री को भी अर्पित कर रहे थे। वीरगोष्ठियों में उनके कपोल रोमांच से भर आए थे मानों एकान्त में रणश्री द्वारा भेजे गए अनुरागसंदेश को सुन रहे थे। बड़े-बड़े योद्धाओं की बातचीत के प्रसंग के बाद अपने प्रिय कृपाण पर दृष्टिपात कर रहे थे। हँसी-मजाक में मुस्कुराते हुए वे अपने प्रचंड प्रताप से भीत राजाओं के प्रति दाँत की किरणों से अपने स्वच्छ मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे। सारे जन-समूह के हृदय में स्थित होकर भी न्याय में स्थिर थे। उनमें लक्ष्मी का

अगोचरे गुणानामभूमौ सौभाग्यानामविषये वरप्रदानानामशक्य आशि- षाममार्गे मनोरथानामतिदूरे दैवस्यादिश्युपमानानामसाध्ये धर्मस्या- दृष्टपूर्वे लक्ष्म्या महत्त्वे स्थितम्, अरुणपादपल्लवेन सुगतमन्थरोरुणा वज्रायुधनिष्ठुरप्रकोष्ठपृष्ठेन वृषस्कन्धेन भास्वद्विम्बाधरेण प्रसभावलो- कितेन चन्द्रमुखेन कृष्णकेशेन वपुषा सर्वदेवतावतारमिवैकत्र दर्श- यन्तम्, अपि च मांसलमयूखमालामलिनितमहीतले महति महार्हे माणि- क्यमालामण्डितमेखले महानीलमये पादपीठे कलिकालशिरसीव सलीलं विन्यस्तवामचरणम्, आक्रान्तकालियफणाचक्रवालं बालमिव पुण्ड- रीकाक्षम्, क्षौमपाण्डुरेण चरणनखदीधितिप्रतानेन प्रसरता महीं महादेवीपट्टबन्धेनेव महिमानमारोपयन्तम्, अप्रणतलोकपालकोपने-

तीति विरोधः। अरुणो लोहितः, अनूरुश्च। शोभनं गमनं ययोस्तौ मन्थरावूरू यस्य । बुद्धश्च सुगतः। वज्राख्यमायुधं तद्वन्निष्ठुरं कठोरं प्रकोष्ठस्य पृष्ठं यस्य तेन। इन्द्र- श्चास्य वज्रमायुधम् । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । वृषो दान्तः, धर्मश्च । भास्वद्भास्वरम्, रविश्च भास्वान्। बिम्बं फलभेदः, मण्डलं च। अवलोकितं वीक्षि- तम्, बुद्धिभेदश्चावलोकितः। कृष्णः कालः, हरिश्च कृष्णः। कलिकालेति । कलिका- लस्य मलिनत्वादेवमुत्प्रेक्षा । वामपादेन पराभवनीयत्वमेव पोष्यते। कालियो

उत्कर्ष था जो गुणों का अगोचर, सौभाग्य का अभूमि, वरदान का अविषय, आशीर्वचनों का अशक्य, मनोरथों का अमार्ग, भाग्य से भी अतिदूर, उपमानों का अविषय, एवं धर्म का असाध्य था। अपने आप को समस्त देवताओं के अवतार के रूप में प्रकट कर रहे थे, उनके पादपल्लव अरुण (लाल, सूर्य का सारथी अरुण), सुगत (बुद्ध) अर्थात् सुन्दर गमन करने वाले और मन्दगामी दोनों ऊरु, हाथ के गट्ट वज्र के समान (वज्रायुध = इन्द्र) कड़े, वृष (बैल, धर्म) के समान कंधे, चमकते हुए (भास्वत = सूर्य) बिम्बाधर, दृष्टिपात (अवलोकितेश्वर) प्रसन्न, चन्द्र के सदृश मुख एवं केश काले (कृष्ण) थे। सम्राट् का बायाँ पैर महानीलमणि के बहुमूल्य, विविध रत्नों से मंडित पादपीठ पर रखा हुआ था जिसकी गहरी कृष्ण वर्ण की आभा चारों ओर फैल रही थी मानों उन्होंने कलिकाल के सिर पर अपना पैर रख दिया हो। अथवा बालक श्रीकृष्ण ने कालिय नाग के फनों पर आक्रमण किया हो। क्षौम वस्त्र के समान उनके चरणों के नखों की रश्मियाँ फैलती थीं मानों पृथिवी को पट्टबंध द्वारा राजमहिषी के पद पर प्रतिष्ठित कर रहे थे। सम्राट् के दोनों चरण प्रणत होने वाले लोकपालों पर क्रोध के कारण मानो लाल हो रहे थे, राजाओं के मुकुट में पद्मराग

द्वितीय उच्छ्वासः ११७ वातिलोहितौ सकलनृपतिमौलिमालास्वतिपीतं पद्मरागरत्नआतपबिंबं वमन्तौ सर्वतेजस्विमण्डलास्तमयसंध्यामिव धारयन्तावशेषराजककुसुम- शेखरमधुरसस्रोतांसीव स्रवन्तौ समस्तसामन्तसीमन्तोत्तंसस्रक्सौरभ- भ्रान्तैर्भ्रमरमण्डलैरमित्रोत्तमाङ्गैरिव मुहूर्तमप्यविरहितौ संवाहनतत्परायाः श्रियो विकचरक्तपङ्कजवनवासभवनानीव कल्पयन्तौ जलजशङ्खमीन- मकरसनाथतलतया कथितचतुरम्भोधिभोगचिह्नाविव चरणौ दधा- नम्, दिङ्नागदन्तमुसलाभ्यामिव विकटमकरमुखप्रतिबन्धबन्धुराभ्यामु- द्वेल्ललावण्यपयोधिप्रवाहाभ्यामिव फेनाहितशोभाभ्यां कूलाचन्दनद्रुमा- भ्यामिव भोगिमण्डलशिरोरत्नरश्मिरज्यमानमूलाभ्यां हृदयारोपितभूभार- धारणमाणिक्यस्तम्भाभ्यामूरुदण्डाभ्यां विराजमानम्, अमृतफेनपिण्ड- पाण्डुना मेखलामणिमयूखखचितेन नितम्बबिम्बव्यासङ्गिना विमल- पयोधौतेन नेत्रसूत्रनिवेशशोभिनाधरवाससा वासुकिनिर्मोकेणेव मन्दरं द्योतमानम्, अघनेन सतारागणेनोपरिकृतेन द्वितीयाम्बरेण भुव- नागभेदः। पुण्डरीकाक्षमिवि राज्ञो विशेषणम्। तेजस्विनो वीराः, आदित्याश्च। जलजेत्यादीनि महाराजविशेषणानि लक्षणानि। एवमादि च संभवति। मकर- मुखं जानुसंधिः, मकरमुखवच्चिह्नित्तान्तकपोलश्च। उद्वेलतया लावण्यस्य समु- च्छलद्रूपत्वमाह। फेनो रससंतानः, डिण्डीरश्च। भोगिनो नृपाः, सर्पाश्च। फेनवत्तैश्च पाण्डु। मेखला रशना, पर्वतमध्यभूमिश्च। पयो जलम्, क्षीरं च। नेत्रसूत्रं पट्टसूत्रम, मन्थनरज्जुश्च। अघनेन छातेन, अनभ्रेण च। ताराः सूत्रबिन्दवः मणि का आतप वमन कर रहे थे, मानों समस्त तेजस्वियों के अस्त हो जाने के कारण संध्याराग को धारण कर रहे थे, समस्त राजाओं के सिर की पुष्परचित माल के मधुरस बरस रहे थे, सामन्तों के केशविन्यास की माला की सुगन्ध में लुभाए हुए भौरे शत्रुओं के सिर के रूप में चरणों को नहीं छोड़ते, सेवा में लीन लक्ष्मी के निवास के लिए खिले हुए लाल कमलों के भवनों को मानों बना रहे थे, तलवे में कमल, शंख, मछली और मकर के चिह्न थे जिनसे व्यक्त होता था कि उन्होंने चारों समुद्रों के उपभोग के चिह्नों को प्राप्त किया था। उनको दोनों जांघें दिग्गजों के मूसल जैसे दांतों के समान थीं, मकर के विकट मुह के प्रतिबंध से ऊपर-नीचे तरंगित होते हुए लावण्य- समुद्र के दो प्रवाह के सदृश थीं, जिसमें फेनों द्वारा शोभा बढ़ गई थी, कला के चन्दनवृक्ष की भाँति थीं जो भोगिमण्डल (धनिकसमूह, सर्पमण्डल) के सिर के रत्नों की रश्मियों से मूल में रंजित हो रही थीं, मानों हृदय पर पृथिवी के भार को धारण करने के लिए दो बड़े बड़े खम्भे गाड़ दिए गए हों। वासुकि सर्प के केंचुल से मंदराचल

११८ हर्षचरितम् नाभोगमिव भासमानम् , इभपतिदशनमुसलसहस्रोल्लेखकठिनमसृणे- नापर्याप्ताम्बरप्रथिम्ना विविधवाहिनीसंक्षोभकलकलसंमर्दसहिष्णुना कैला- समिव महता स्फटिकतटेनोरुणोरःकपाटेन विराजमानम् , श्रीसरस्वत्यो- रुरोवदनोपभोगविभागसूत्रेणेव पतितेन शेषेणेव च तद्भुजस्तम्भविन्य- स्तसमस्तभूभारलब्धविश्रान्तिसुखप्रसुप्तेन हारदण्डेन परिवलितकन्धरम् , जीवितावधिगृहीतसर्वस्वमहादानदीक्षाचीरेणेव हारमुक्ताफलानां किरण- निकरेण प्रावृतवक्षःस्थलम् , अजजिगीषया बालैर्भुजैरिवापरैः प्ररोहद्भि- र्बाहूपधानशायिन्याः श्रियाः कर्णोत्पलमधुरसधारासंतानैरिव गलद्भिर्भु- वजन्मनः प्रतापस्य निर्गमनमार्गैरिवाविर्भवद्भिररुणैः केयूररत्नकिरणदण्डै- रुभयतःप्रसारितमणिमयपक्षवितानमिव माणिक्यमहीधरम् , सकल- नक्षत्राणि च । अम्बरं वासः, नभश्च । इभपतीत्यादि साधारणम् । अपर्याप्तमम्बरं वासो यस्य तादृक्प्रथिमा यस्य, अम्बरं च खम् । वाहिनी सेना, नदी च । अन्यपर्वतसाधारण्येऽपि छायावत्त्वादुन्नतत्वाच्च कैलासमिवेत्युक्तम् । हारेत्यादिना उरुत्वं काठिन्यमाह । परिवलिता । 'परिवेष्टिता-' इति पाठे व्याप्तेत्यर्थः । अजो हरिः । भुजेत्यादिना सेनादिकृतं नयादिकृतं च प्रतापं व्यवच्छिनत्ति । माणिक्य- पर्वत की शोभा होती है उसी प्रकार उनका अधोवस्त्र अत्यन्त महान्, श्वेत फेन की तरह, मेखलामणि की किरणों से खचित, नितम्बों से सटा हुआ था और उसके ऊपर रेशम का पटका लगा हुआ था। दूसरा वस्त्र उत्तरीय था जिसमें जामदानी की भाँति छोटे छोटे तारे या सूत्रबिन्दु कढ़े हुए थे, वह सम्राट् को उस प्रकार शोभित कर रहा था जैसे तारों-भरा आसमान भुवनाभोग को। जैसे कैलास-पर्वत का स्फटिक तट ऐरावत के दाँतों के हजारों प्रहार से कठिन और चिकना हो गया है और आकाश के लिए जिसका विस्तार पर्याप्त नहीं, एवं विविध नदियों के कोलाहलपूर्ण संमर्द को जो सहता है उसी प्रकार सम्राट् का उरःकपाट भी गजों के दशनों के घात-प्रतिघात से कठिन और कोमल, एवं विविध सेनाओं के कोलाहल में भी क्षुब्ध न होने वाला था। उनका हारदंड कंधे से घिर कर लटक रहा था, मानों वह लक्ष्मी और सरस्वती के क्रम से वक्ष और मुख के उपभोग का विभाग-सूत्र था, अथवा मानों शेषनाग सम्राट् की भुजाओं पर सारे पृथिवी के भार को रख कर विश्राम की नींद ले रहे हों। हार में पिरोई हुई मुक्ताओं की किरणे फैलकर उनके वक्ष में लिपट रही थीं मानों सम्राट् ने जो प्रति पाँचवें वर्ष सर्वस्वदक्षिण महादान दिए हैं उन्हीं के दीक्षावस्त्र हों। उनके बिजाइठ के रत्नों की दंडाकार किरणें उनके दोनों ओर फैल रही थीं, मानों चतुर्भुज

द्वितीय उच्छ्वासः ११६ लोकालोकमार्गार्गलेन चतुरुदधिपरिचेपखातशातकुम्भशिलाप्राकारेण सर्वराजहंसबन्धवज्रपञ्जरेण भुवनलक्ष्मीप्रवेशमङ्गलमहामणितोरेणना- तिदीर्घदोर्दण्डयुगलेन दिशां दिक्पालानां च युगपदायतिमपहरन्तम्, सोदर्यलक्ष्मीचुम्बनलोभेन कौस्तुभमणेरिव मुखावयवतां गतस्याधरस्य गलता रागेण पारिजातपल्लवरसेनेव सिञ्चन्तं दिङ्मुखानि, अन्तरान्तरा सुहृत्परिहासस्मितैः प्रकीर्यमाणविमलदशनशिखाप्रतानैः प्रकृतिमूढाया राजश्रियाः प्रज्ञालोकमिव दर्शयन्तम्, मुखजनितेन्दुसन्देहागतानि कुमुदिनीवनानीव प्रेषयन्तम्, स्फुटस्फटिकधवलदशनपङ्किकृतकुमुद- वनशङ्काप्रविष्टां शरज्ज्योत्स्नामिव विसर्जयन्तम्, मदिरामृतपारिजात- गन्धगर्भेण भरितसकलककुभा मुखामोदेनामृतमथनदिवसमिव सृज- मुत्कृष्टो मणिः । चतुर्णामुदधीनां संबन्धी परिचेप एव खातं परिखा यस्य स तादृग्दाढ्र्याच्छिलाप्राकार इव तेन । परिखां कृत्वान्तरे प्राकारो दीयते इति स्थितिः। विष्णु को जीतने की इच्छा रखने वाले सम्राट् के दो और हाथ वृद्धिंगत हो रहे हों, अथवा विष्णुतुल्य सम्राट् की भुजाओं को उपधान बना कर सोने वाली लक्ष्मी के कर्णोत्पल का मधु रस धारारूप में प्रवाहित होकर चू रहा हो, मानों उनकी भुजाओं से उत्पन्न होने वाले प्रताप के निकलने के लिए वे मार्ग हों, इस प्रकार वे उन किरण- दण्डों से मणिमय पक्षवितान को फैलाए हुए माणिक्यपर्वत के समान विराजमान थे। वे अपने दोनों अतिदीर्घ भुजदंडों से दिशाओं के विस्तार और दिक्पालों के प्रताप को एक काल में हर ले रहे थे, मानों उनके वे भुजदंड सारे संसार के ( वीर्यशाली लोगों के ) तेजमार्ग को अवरुद्ध कर देने वाले अर्गलादंड हों, मानों चारों समुद्रों के घेरे की खाई में सुवर्ण के चट्टानों को जोड़कर बनाए गए प्राकार हों; समस्त राजसमूह रूपी हंसों के रहने के लिए वज्र के पिंजड़े हों; भुवनलक्ष्मी के स्वागत के अवसर पर मंगलार्थ लगाए जाने वाले बड़े बड़े मणिमय तोरण हों। मानों उनका कौस्तुभ मणि के समान अधर अपनी बहन लक्ष्मी को चूमने के लिए मुख का अवयव बन गया हो; वैसे अधर से पारिजातपल्लव के रस के समान द्रवित होते हुए राग से मानो वे दिशाओं को सींच रहे थे। बीच-बीच में मित्रों के साथ हँसी मजाक के प्रसंग में सम्राट् हँस पड़ते तो उनके दाँतों की निर्मल किरणें चारों ओर फैल जातीं मानों प्रकृतिमूग्धा राजलक्ष्मी की श्रद्धा के आलोक हों, अथवा उन किरणों के रूप में मुख को चन्द्र समझ कर पहुँचे हुए कुमुदवनों को मानों वे लौटा रहे थे; स्फटिक के समान जड़े हुए दाँतों को कुमुद- वन समझ कर प्रविष्ट हुई शारदी ज्योत्स्ना को मानों वापिस कर रहे थे। उनके मुख से मदिरा, अमृत और पारिजात के मुखवास की मिली हुई सुगन्ध . निकल रही थी

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१२० हर्षचरितम्

न्तम्, विकचमुखकमलकर्णिकाकोशेनानवरतमापीयमानश्वाससौरभमि- वाधोमुखेन नासावंशेन, चक्षुषः क्षीरस्निग्धस्य धवलिम्ना दिङ्मुखान्यपूर्व- वदनचन्द्रोदयोद्वेलक्षीरोदोत्प्लावितानीव कुर्वाणम्, विमलकपोलफलकप्रति- बिम्बितां चामरग्राहिणीं विग्रहिणीमिव मुखनिवासिनीं सरस्वतीं दधानम्, अरुण्रेन चूडामणिशोचिषा सरस्वतीर्ष्याकुपितलक्ष्मीप्रसादनलग्नेन चरणालक्तकेनेव लोहितायत ललाटतटम्, आपाटलांशुतन्त्रीसंतानवल- यिनीं कुण्डलमणिकुटिलकोटिबालवीणामनवरतचलितचरणानां वाद्य- तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: तामु Turn into: त

द्वितीय उच्छ्वासः १२१ मालागुणेन परिकलितकेशान्तम्, शिखण्डाभरणभुवा मुक्ताफलालोकेन मरकतमणिकिरणकलापेन चान्योन्यसंवलनवृजिनेन प्रयागप्रवाहवेणि- कावारिणेवागत्य स्वयमभिषिच्यमानम्, श्रमजलविलीनबहलकृष्णागुरु- पङ्कतिलककलङ्ककल्पितेन कालिम्ना प्रार्थनाचाटुचतुरचरणपतनशत- श्यामिकाकिणेनेव नीलायमानललाटेन्दुलेखाभिः क्षुभितमानसोद्गतै- रुत्कलिकाकलापैरिव हारैरुल्लसद्भिरवष्टभ्यमानाभिर्विलासवलानचटुलै- र्भ्रूलताकल्पैरैर्य्या श्रियमिव तर्जयन्तीभिरायामिभिः श्वसितैरविरल- परिमलैर्मलयमारुतमयैः पाशैरिवाकर्षन्तीभिर्विकटबकुलावलिवराटक- वेष्टितमुखैर्बृहद्भिः स्तनकलशैः स्वदारसंतोषरसमिवाशेषमुद्धरन्तीभिः दयति । स्वरव्याकरणविशारदमित्यादिना गानं दर्शयति । परिवेषः परिधिः । वृजिनेन शकलेन, कलुषेण वा । प्रयागो गङ्गायमुनासंगमः । तत्प्रवाहस्य वेणिका- रूपेण वारिणेव । श्रमजलेत्यादौ वारविलासिनीभिः सर्वतो विलुप्यमानसौभाग्य- मिवेति संबन्धः । प्रार्थनाचाटूत्थियादौ प्रार्थनादीनि सर्वाणि श्रीहर्षविषयाणि ज्ञेयानि । मानसं सरः, चेतश्च । उत्कलिका, रुहरुहिकाः, वीचयश्च । अविरले- त्यादिना धारणं आकर्षणं वशीकरणम्, समीपप्रापणं च । विकटेत्यादिनोद्दीपनभाव- मेव पोषयति । वराटकों रज्जुः । बृहद्भिरिति । बृहत्त्वेन हृद्यत्वमेषामाह । बृहत्त्वादेव च वक्ष्यति—अशेषमिति । स्तनकलशैरिति । कलशैः किल रज्जुवेष्टितमुखै रसो जलमु- भरण में मोती और मरकत दोनों लगे थे, दोनों की किरणें परस्पर मिल कर उन पर पड़ रही थीं, मानो प्रयाग से गंगा और यमुना के जल स्वयं आकर उनका अभिषेक कर रहे हों । वहाँ गणिकाएँ थीं जो उनके सौभाग्य को बढ़ा रही थीं । उनके ललाट की चन्द्रलेखा पसीने से पसीज कर बहते हुए कृष्णागुरु की धार से काली पड़ गई थी, मानों प्रिय वचन बोलकर प्रार्थना करने में चतुर होने के कारण सैकड़ों बार प्रिय के चरण पर सिर पटकने से वहाँ दाग पड़ गया हो । उनके वक्ष पर हार उल्लसित हो रहे थे मानों वे उनके उथल-पुथल होते हुए मानस की वीचियाँ हों । वे इस प्रकार विलास के साथ अपनी भौंहें मटकाती थीं मानों जैसे ईर्ष्या से लक्ष्मी पर तरक रही हों । मलयानल की तरह निरन्तर निकलती हुई सुगन्धित लम्बी साँसें लेतीं तो मालूम होता कि साँसों की डोर से कुछ खींच रही हों । बकुलमाला की लम्बी-लम्बी डोर से उनके स्तन रूपी कलश बँधे हुए थे जिनसे अपनी पत्नियों में होने वाले सम्राट् के सन्तोष-रस को मानों वे रिक्त कर रही थीं । हाँफने से हिलते हुए उनके स्तन पर हार की तरल मणियों की किरणों से मानों वे सम्राट् के हृदय को खींच कर हठात् अपने में प्रविष्ट

१२२ हर्षचरितम् कुचोत्कम्पिकाविकारप्रेक्षितानां हारतरलमणीनां रश्मिभिराकृष्य हृदय- मिव हठात्प्रवेशयन्तीभिः प्रभामुचामाभरणमणीनां मयूखैः प्रसारितै- र्बहुभिरिव बाहुभिरालिङ्गन्तीभिर्जृम्भानुबन्धबन्धुरवदनारविन्दावरणी- कृतैरुत्तानैः करकिसलयैः सरभसप्रधावितानि मानसानीव निरुन्धती- भिर्मदनान्धमधुकरकुलकीर्यमाणकर्णकुसुमरजःकणकूर्णतकोणानि कुसुम- शरशरनिकरप्रहारमूर्च्छामुक्कुलितानीव लोचनानि चतुरं संचारयन्ती- भिरन्योन्यमत्सरादाविर्भवद्भङ्गुरभ्रुकुटिविभ्रमक्षिप्तैः कटाक्षैः कर्णेन्दी- वराणीव ताडयन्तीभिरनिमेषदर्शनसुखरसराशि मन्थरितपक्ष्मणा चक्षुषा पीतमिव कोमलकपोलपालीप्रतिबिम्बितं वहन्तीभिरभिलाषलीलान्नि- र्निमित्तस्मितैश्चन्द्रोदयानिव मदनसहायकाय संपादयन्तीभिरङ्गभङ्गवल- नान्योन्यघटितोत्तानकरवेणिकाभिः स्फुटनमुखराङ्गुलीकाण्डकुण्डली- क्रियमाणनखदीधितिनिवहनिभेनाकिंचित्करकामकार्मुकाणीव रुषा भङ्ग- दध्रियते। रसोऽभिलाषः, जलं च। बन्धुरं हृद्यम्। कूर्णितः संकोचितः। मदनादि- शब्दे विद्यमानेऽपि मदनान्धेत्यभिप्रायेण कुसुमसरग्रहणम् । अत्रपक्षे कर्णपदं त्य- ज्यते। अनिमेषदर्शनसुखरसराशिमिव श्रीहर्षम्। प्रतिबिम्बितमिति। अथ च रसो जलादिः विमले मणिभाजनावान्तर्वर्त्यपि प्रतिबिम्बितो लक्ष्यते। करवेणिका कर रही थीं। उनके चमचमाते हुए आभूषणों की किरणें इस प्रकार फैल रही थीं मानों वे सम्राट् के आलिङ्गन के लिए अनेक भुजाएँ पसार रही हों। जंभाई लेते हुए अपने उत्तान हाथों से मुँह ढँक कर मानों वे वेग से निकल भागते हुए अपने चित्त को रोक रही थीं। वे बड़ी चतुरता से आँखें मटका रही थीं, मानों मदांध भौरें उनके कर्ण- फूल की रज उड़ाकर आँखों में भरते या मानों काम के निरन्तर प्रहार से मूच्छित होकर वे अपनी आँखें मुकुलित करतीं। आँखों से परस्पर मत्सर के कारण भौंहें ऐंच कर छोड़े गए कटाक्षों से मानों अपने कर्णोत्पलों का ताड़न कर रही हों। सम्राट् के निरन्तर दर्शन-सुख की राशि जिसे उन्होंने अपनी निश्चल आँखों से पी रखा था उनके कपोल पर प्रतिबिम्बित हो रही थी। मानों काम की सहायता करने के लिए अभिलाषाओं के कुतूहल से निर्निमित्त हँसी हँसकर बहुत से चन्द्रों को उदित कर रही थीं। कभी कभी अपने अङ्गों की तोड़-मरोड़ करते हुए हाथों की उँगलियाँ एक दूसरे में फँसाकर हथेली ऊपर उठाए हुए नाचती थीं। उँगलियाँ चटका कर नखों की किरणों को कुंडलाकार बनाते हुए मानों काम की निकम्मी धनुहियों को क्रोध से तोड़ रही थीं। सम्राट पास में खड़ी चामरग्राहिणी को जो घाम के पसीने से हाथ के भीग जाने और काँपने के कारण

द्वितीय उच्छ्वासः १२३ न्तीभिर्वारविलासिनीभिर्विलुप्यमानमसौभाग्यमिव, सर्वतःस्पर्शस्विन्न- वेपमानकरकिसलयगलितचरणारविन्दां चरणग्राहिणीं विहस्य कोणेन लीलालंलं शिरसि ताडयन्तम्, अनवरतकरकलितकोणतया चात्मनः प्रियां वीणामिव श्रियमपि शिक्षयन्तम्, निःस्नेह इति धनैः, अनाश्रयणीय इति दोषैः, निग्रहरुचिरितीन्द्रियैः, दुरुपसर्प इति कलिना, नीरस इति व्यसनैः, भीरुरित्ययशसा, दुर्नग्रहचित्तवृत्तिरिति चित्तभुवा, स्त्रीपर इति सरस्वत्या, षण्ढ इति परकलत्रैः, काष्ठामुनिरिति यतिभिः, धूर्त इति वेश्याभिः, नेय इति सुहृद्भिः, कर्मकर इति विप्रैः, सुसहाय इति परस्परानुबन्धस्थितकरद्वयाङ्गुलिविन्यासः । विलुप्यमानसौभाग्यादिना ताः इत्यर्थः । कोणो वीणादिवादनभाण्डम् । प्रियामिति । वीणायाः शियाश्च विशेषणम् । निःस्नेह इत्यादौ । एतैरैकमप्यनेकधा गृह्यमाणमिति संबन्धः । षण्ढः प्रजनना- क्षमः । काष्ठा पराधारा, तत्प्रधानो मुनिः काष्ठामुनिरतिशयवांस्तपस्वी । नेयः परवशः । शन्तनुर्नाम राजा भीष्मस्य पिता वाहिन्या गङ्गायाः पतिः, अयं तु तस्मादपि महतीनां वाहिनीनां सेनानां पतिः शन्तनुरीति । 'पञ्चमी विभक्ते' इति पञ्चमी । भीष्मो जितकाशी जितेन्द्रियः । यतस्त्वयि त्वत्पुत्रे वा सत्यस्मद्दौहित्रस्य कुतो राज्यमिति । यदा हि दाशाधिपतिना स्वसुता मत्स्योदरोद्गता मत्स्यावती नामास्मै पित्रर्थमर्थयते न दत्ता, तदैतेन प्रतिज्ञातम्-'नाहं राज्यं विवाहं वा करिष्यामि' इति । अत एव ब्रह्मचार्यैवाभूत् । राजा च ततोऽपि जितकाशितमः, जितकाशी वा । जितेन जयेन काशते शोभते यः । तथा हि भीष्मेन रामो जितः। सर्वराजमहितं काशिराजं च जित्वा भ्रात्रर्थमम्बादिकन्यात्रयमनेषीत् । राजा तु उनके चरणों पर गिरता जा रहा थी, हँसत हुए अपन बाणादण्ड द्वारा उसके सिर पर धीरे से ठोंका । निरन्तर वे अपने वीणादंड को अपने हाथ में लिए रहते थे, इस प्रकार अपनी प्रिया वीणा के समान श्री को भी शिक्षा देते रहते थे । धन उन्हें समझते कि इनमें हमारे प्रति स्नेह कुछ भी नहीं; दोष कहते कि हमारे ये आश्रय के योग्य नहीं हैं; इन्द्रियाँ कहतीं कि सम्राट हमें निगृहीत रखना चाहते हैं; कलि कहता कि इनके समीप जाना कठिन है; व्यसन कहते कि ये नीरस हैं; अयश चिल्लाता कि सम्राट डरपोंक हैं; काम समझता कि इनकी चित्तवृत्ति दुर्ग्रह है; सरस्वती कहती कि ये स्त्रैण हैं; परकीया स्त्रियाँ कहतीं कि ये नपुंसक हैं; यती लोग कहते कि ये पहुँचे हुए तपस्वी हैं; वेश्याएँ उन्हें धूर्त कहतीं; सुहृद्वर्ग कहता कि ये नेय हैं अर्थात् इनकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, ब्राह्मण कहते कि ये हमारे भृत्य हैं; शत्रु कहते कि बहुत से दूसरे इनके सहायक हैं । इस प्रकार एक ही सम्राट को लोग अनेक प्रकार से

१२४ हर्षचरितम् शत्रूयोधैः, एकमप्यनेकधा गृह्यमाणम्, शन्तनोर्महावाहिनीपतिम्, भीष्माजितकाशितमम्, द्रोणाच्चापलालसम्, गुरुपुत्रादमोघमार्ग णम्, कर्णान्मित्रप्रियम्, युधिष्ठिराद्बहुक्षमम्, भीमादनेकनागायुतबलम्, धनंजयान्महाभारतरणयोग्यम्, कारणमिव कृतयुगस्य, बीजमिव विबुधसर्गस्य, उत्पत्तिद्वीपमिव दर्पस्य, एकागारमिव करुणायाः, प्रातिवेशिकमिव पुरुषोत्तमस्य, खनिपर्वतमिव पराक्रमस्य, सर्वविद्या- संगीतगृहमिव सरस्वत्याः, द्वितीयामृतमन्थनदिवसमिव लक्ष्मी- समुत्थानस्य, बलदर्शनमिव वैदग्ध्यस्य, एकस्थानमिव स्थितीनाम्, सर्वस्वकथनमिव कान्तेः, अपवर्गमिव रूपपरमाणुसर्गस्य, सकलदुश्च- रितप्रायश्चित्तमिव राज्यस्य, सर्वबलसंदोहावस्कन्दमिव कन्दर्पस्य, ततोऽपि जितकाशितमः। द्रोणश्चापाचार्यः। स हि चापे धनुषि लालसः। चापलं न करोतीत्यर्थः। यद्वा चः समुच्चये। अपगता लालसा यस्य सोऽपलालसः। निर- भिलाष इत्यर्थः। गुरुपुत्रोऽश्वत्थामा तस्य सफलशरता। तथा शस्त्रोपसंहारो- ऽश्वमया याचितोऽपि कस्यचिदेकस्य मारणमन्तरेण न तदुपसंजहार। तत उत्तराया उदरस्थे परीक्षिति पातिते तस्मिंस्तदुपसंहृतवान्। अन्यत्र,-अमोघा मार्गणा याचका यस्येति। मित्रः सूर्यः, सुहृच्च मित्रम्। क्षमा क्षान्तिः, भूश्च। अनेकानि बहूनि, अनन्यसदृशानि च। एकशब्दस्य च साधारणार्थ तृच्। बलं सामर्थ्यम्, सैन्यं च। धनंजयोऽर्जुनः। महाभारतानां कुरूणां यो रणः संग्रामः। अन्यत्र,- महतो भारस्य कार्यधुरायास्तरणं निर्वाणम्। प्रातिवेशिकं प्रतिबिम्बम्। खनि- राकरः। अपवर्गः समाप्तिः। संदोहः समूहः। अवभृथो यज्ञान्तः। गम्भीरं प्रसन्नं चेति परस्परापेक्षं बोद्धव्यम्। तथा च सति गम्भीरत्वे प्रसन्नत्वं ऋजुत्वं चेन्न स्यात्ततो ग्रहण करते थे। शान्तनु केवल वाहिनीपति (अर्थात् गंगा के पति) थे, उनकी अपेक्षा ये सम्राट महावाहिनी (अर्थात् महासेना) के पति थे। भीष्म की अपेक्षा ये अधिक जितेन्द्रिय थे। द्रोण की अपेक्षा वे अधिक चापलालस (अर्थात् धनुष के प्रेमी अथवा चपलता से शून्य या निरभिलाष) थे। अश्वत्थामा की अपेक्षा वे अधिक बाण चलाने में निपुण (अमोघमार्गण) थे। कर्ण की अपेक्षा अधिक वे अपने मित्रों के प्रिय थे। युधिष्ठिर की अपेक्षा अधिक क्षमावान् थे अथवा विस्तृत पृथिवी के स्वामी थे। भीम की अपेक्षा अधिक हाथियों का उनमें बल था। अर्जुन की अपेक्षा अधिक वे महाभारत के युद्ध के योग्य थे, अथवा कार्य के बड़े बोझ को सम्हालने में निपुण थे। मानों वे सतयुग के कारण, विद्वानों की सृष्टि के बीज, दर्प के उत्पन्न होने के द्वीप, करुणा के एकागार, पुरुषोत्तम विष्णु के पड़ोसी, पराक्रम की

द्वितीय उच्छ्वासः १२५ उपायमिव पुरंदरदर्शनस्य, आवर्तनमिव धर्मस्य, कन्यान्तःपुरमिव कलानाम्, परमप्रमाणमिव सौभाग्यस्य, राजसर्गसमाप्त्यवभृथस्नान- दिवसमिव सर्वप्रजापतीनाम्, गम्भीरं च, प्रसन्नं च, त्रासजननं च, रमणीयं च, कौतुकजननं च, पुण्यं च, चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चानुगृहीत इव निगृहीत इव साभिलाष इव तृप्त इव रोमाञ्च- मुचा मुखेन मुञ्चन्नानन्दबाष्पवारिबिन्दून्दूरादेव विस्मयस्मेरः सम- चिन्तयत्—'सोऽयं सुजन्मा, सुगृहीतनामा, तेजसां राशिः, चतुरुदधि- केदारकुटुम्बी, भोक्ता ब्रह्मस्तम्भफलस्य, सकलादिराजचरितजयज्येष्ठ- जिह्मप्रकृतित्वं प्रसज्येत । एवं त्रासेत्यादौ बोद्धव्यम् । तथा च कालिदासः 'भीम- कान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः ॥' इति दिलीपं प्रति वर्णितवान् । कौतुकजननपुण्यत्वादपि संभाव्यते । अत आह— पुण्यमिति । गम्भीरं च प्रसन्नं चेत्यादौ सर्वत्र विरोध उद्भाव्यः । गम्भीरं सतमिस्रं प्रसन्नं निर्मलं न भवतीति । अनुगृहात इवेत्यादि । एवंविधमहीपतिप्रसादवशात् । निगृहीत श्वेति । संकोच- वशात् । साभिलाष इवेति । तस्य दर्शनीयत्वात् । तृप्त इवे.ते । तथैव तस्य कृतार्थ- त्वात् । विरोधो ह्यत्र सुबोधः । केदारं क्षेत्रम् । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । फलं रत्नादि । यच्च स्तम्भस्य फलं धान्यादि, तद्भोक्ता कर्षको भवति, राजन्वती प्रशस्तराजयुता । खान वाले पर्वत, सरस्वती का समस्त विद्या वाला संगीतकभवन, लक्ष्मी के उदय का दूसरा अमृतमथनदिवस, विदग्धता के बल का दर्शन, मर्यादाओं के एक ही स्थान, कान्ति के सर्वस्वकथन, रूपपरमाणुओं की सृष्टि के मोक्ष, राज्य के समस्त दुश्चरितों के प्रायश्चित्त, काम के सारे बलों के सहित आक्रमण, इन्द्र के दर्शनार्थ उपाय, धर्म के आवर्तन, कलाओं के कुमारीअन्तःपुर और सौभाग्य के परम प्रमाण थे। समस्त प्रजापतियों ने मानों उन्हीं का निर्माण करके राजाओं की सृष्टि का यज्ञ समाप्त कर अन्त में अवभृथस्नान कर लिया। इस प्रकार सम्राट हर्ष गम्भीर, हँसमुख, भय उत्पन्न करने वाले और रमणीय, आह्लाद उत्पन्न करने वाले और पवित्र थे। बाण ने सम्राट हर्ष को देखकर अपने आपको अनुगृहीत, निगृहीत, साभिलाष और तृप्त-जैसा अनुभव किया। उसके मुख के रोंगटे खड़े हो गए, आँखों में आनन्द के आँसू छल-छला उठे। उसने दूर ही से चकित और प्रसन्न होते हुए मन में सोचा— 'ये ही शोभन जन्मवाले, सुगृहीतनामा, तेजोराशि, चारों समुद्रों तक फैले हुए कुटुम्ब वाले, जगत् के रत्नादि फलों का उपभोग करने वाले एवं समस्त प्राचीन राजाओं के

१२६ हर्षचरितम् मल्लो देवः परमेश्वरो हर्षः । एतेन च खलु राजन्वती पृथिवी । नास्य हरेरिव वृषविरोधीनि बालचरितानि, न पशुपतेरिव दक्षजनोद्वेगकारीण्यै- श्वर्यविलसितानि, न शतक्रतोरिव गोत्रविनाशपिशुनाः प्रवादाः, न यमस्येवातिवल्लभानि दण्डग्रहणानि, न वरुणस्येव निस्त्रिंशग्राहसहस्र- रक्षिता रत्नालयाः, न धनदस्येव निष्फलाः सन्निधिलाभाः, न जिनस्ये- वार्थवादशून्यानि दर्शनानि, न चन्द्रमस इव बहुलदोषोपहताः श्रियः । वृषो धर्मः, अरिष्टासुरो दान्तरूपश्च । बालेति । बाला हि विवेकहीनत्वादधर्मविरुद्धमा- चरन्ति । अस्य तु तस्यामपि दशायां धर्मविरोधाभावः । दक्षः कुशलः, प्राजापति- भेदश्च । महेश्वरपक्ष ऐश्वर्यशब्दो मुख्यवृत्तिः, इतरत्र गौणः । गोत्रं कुलम्, कुल- पर्वताश्च गोत्राः । अतिवल्लभानीति । अतिशब्देन युक्तदण्डत्वमाह । दण्डः करः, यमायुधं च । निस्त्रिंशग्राहाः खङ्गहस्ताः; अन्यत्र,-जलचरभेदाश्च । रत्नालया भाण्डा- गाराणि, समुद्राश्च । निष्फला ऐश्वर्यादिफलप्राप्तिशून्याः, दानादिविनाकृताश्च । सन्निधिः सन्निधानम् । एतस्य दर्शनं सर्वस्य फलदायि भवतीत्यर्थः । अन्यत्र,-संनि- धयः शोभनानि निधनान्यस्य । दर्शनानि जिनस्येव नार्थवादशून्यानि । अर्थो धनं तस्य वादः, अनेनेदं लब्धमिति, तेन शून्यानि । सर्वे तद्दर्शिनोऽर्थेन युज्यन्ते । जिनस्य पुनरर्थवादशून्यानि महायानयोगाचारमाध्यमिकदर्शनानि । बहुलाः प्रभूता दोषा रागाद्याः, बहुलदोषाश्च कृष्णपक्षरात्रयः । श्रियः समृद्धयः, शोभाश्च । .चरितों को जीतने वाले, ज्येष्ठ मल्लदेव परमेश्वर हर्ष हैं। इनसे धरती राजन्वती है (अर्थात् प्रशस्त राजा से शासित है)। विष्णु के समान इनके ऐसे बालचरित नहीं जिनमें वृष (अर्थात् धर्म, विष्णुपक्ष में अरिष्टासुर) का विरोध हो। इनमें पशुपति शिव के समान ऐसे ऐश्वर्य के विलास नहीं, जिनसे दक्षजनों (चतुर जन, शिवपक्ष में दक्षप्रजापति) के मन में जरा भी उद्वेग हो। इन्द्र के समान इनके विषय में ऐसा कोई प्रवाद नहीं कि ये गोत्रों (कुलों, इन्द्रपक्षमें कुलपर्वतों) का विनाश कर डालते हैं। यम के समान दण्ड-ग्रहण (कर लेना, यमपक्षमें दण्ड नामक आयुध का ग्रहण) इन्हें अतिप्रिय नहीं। ये वरुण के समान अपने रत्नालयों (रत्न के खजाने, वरुणपक्ष में समुद्र) की रक्षा हजारों की संख्या में तैनात निस्त्रिंशग्राह (खङ्गधारी सैनिक, वरुणपक्ष में जलचारी खूंखार जीव) द्वारा नहीं करते। जैसे कुबेर का सन्निधान प्राप्त करना निष्फल अर्थात् ऐश्वर्य आदि फलों से रहित एवं प्राप्ति से शून्य है उसी प्रकार इनका सन्निधान फलशून्य नहीं। जैसे बुद्ध के दर्शन (महायान के योगाचार और माध्यमिक दर्शन) सर्वथा अर्थवाद (प्राशस्त्यमूलक वाक्य) से शून्य हैं, वैसे ही इनके दर्शन धन आदि की प्राप्ति से शून्य नहीं होते। चन्द्र जैसे बहुलदोष (कृष्ण

द्वितीय उच्छ्वासः १२७ चित्रमिदमत्यमरं राजत्वम् । अपि चास्य त्यागस्यार्थिनः, प्रज्ञायाः शास्त्राणि, कवित्वस्य वाचः, सत्त्वस्य साहसस्थानानि, उत्साहस्य व्यापाराः, कीर्तेर्दिङ्गाखानि, अनुरागस्य लोकहृदयानि, गुणगणस्य संख्या, कौशलस्य कला, न पर्याप्तो विषयः । अस्मिंश्च राजनि यतीनां योग- पट्टकाः, पुस्तकर्मणां पार्थिवविग्रहाः, षट्पदानां दानग्रहणकलहाः, वृत्तानां पादच्छेदाः, अष्टपदानां चतुरङ्गकल्पना, पन्नगानां द्विजगुरुद्वेषाः, वाक्य- विदामधिकरणविचाराः इति समुपसृत्य चोपवीती स्वस्तिशब्दमकरोत् । पर्याप्तः परिपूर्णः । योगपट्टका यतीनामुपकरणं पर्यङ्कबन्धनाथंम् । ते यतीनां चतु- र्थाश्रमिणामेव, न पुनर्यागेन युक्ताः पट्टकाः कूटप्रधानानि लेख्यपत्राणि केषाञ्चित् । एवमन्यत्रापि । पुस्तकर्म लेप्यम् । पार्थिवविग्रहा मृन्मयशरीराणि, राजभिः सह वैराणि च । दानग्रहणं मदजलं दानम्, ऋणव्यवहारश्च । वृत्तानां गुरुलघुनियमात्म- कानां । समाश्च समविषमानां पादच्छेदा भागविरामाः, चरणकर्तनानि च । अष्टा- पदानां चतुरङ्गफलकानाम् । 'चत्वार्यङ्गानि सेनाया हस्त्यश्वरथपत्तयः' । तेषां कल्पना रचना, चतुर्णामङ्गानां पाणिपादस्य च छेदः । द्विजगुरूंगरुडोऽपि । वाक्यविदां मीमांसकाना मधिकरणविश्रान्तिस्थानानि । राज्ञां च धर्मनिर्णयस्थानानि । अधिक- बलो वा रणः सङ्ग्राम इति केचित् । उपवीती दक्षिणावीती करः । उक्तं च---'उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः' इति । पक्ष की रातों) में श्रीहत हो जाता है उस प्रकार ये राग आदि बहुल दोषों के कारण श्रीहत या समृद्धिहीन नहीं हुए। इस प्रकार देवताओं से भी बढ़ा-चढ़ा इनका प्रभुत्व है यह देख कर आश्चर्य होता है। और भी- इनका त्याग इतना है कि पर्याप्त याचक नहीं मिलते, इनकी प्रज्ञा इतनी है कि शास्त्र के विषय पर्याप्त नहीं। इस प्रकार कवित्व के सामने वाणी, बल के सामने साहस के स्थान, उत्साह के सामने व्यापार, गुणों के सामने संख्या और कौशल के सामने कला आदि पर्याप्त नहीं ठहरते । इनके शासन में यती लोग ही पर्यङ्कबन्ध आदि आसन में योगपट्ट नामक वस्त्रविशेष धारण करते थे, न कि इनके राज्य में जाली बनाए हुए ताम्रपत्र थे । इनके शासन में मूर्तियाँ ही मिट्टी की बनाई जाती थीं, न कि परस्पर पार्थिवविग्रह अर्थात् राजाओं के साथ लड़ाई-झगड़े होते थे । भौंरे ही हाथियों के दानजल के ग्रहण में झगड़ते, याचक लोग दान लेने के अवसर पर नहीं झगड़ते थे । वृत्त अर्थात् छन्दों के ही चरण में सम-विषम या भाग और विराम आदि छेद होते, न कि किसी पाप-विशेष के होने से पैर काट दिए जाते थे । शतरंज के खेल में ही सेना के चार अंग हस्ती-अश्व-रथ-पैदल की कल्पना थी, न कि अपराधी के दोनों हाथ और दोनों पैर काट लिए जाते थे । सर्प ही

१२८ हर्षचरितम् अथोत्तरे नातिदूरे राजधिष्ण्यस्य गजपरिचारको मधुरमपरवक्त्र- मुच्चैरगायत्— 'करिकलभ विमुञ्च लोलतां चर विनयव्रतमानताननः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्षमते न तेऽङ्कुशः' ॥ राजा तु तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा च तं गिरिगुहागतसिंहबृंहितगम्भीरेण स्वरेण पूरयन्निव नभोभागमपृच्छत्—'एष स बाणः ?' इति । 'यथा ज्ञापयति देवः । सोऽयम्' इति विज्ञापितो दौवारिकेण । 'न तावदेनमकृतप्रसादः पश्यामि' इति तिर्यङ्नीलधवलांशुकाशारां तिरस्करिणीमिव भ्रमयन्न- पाङ्गनीयमानतरलतारकस्यायामिनीं चक्षुषः प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठस्य पृष्ठतो गजपरिचारक इति । अन्यगजपरिचारकस्य स्वजातिसमुचितं वस्तु राज्ञः प्रकृत- स्मारकं जातम् । तत्र करिणां स्वभावत एव रागित्वादस्यापि रागविश्वा- दुजंगता स्मृतिः संजातेति । भङ्गुरो वक्रः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुर इति । स्पष्टा व्याख्या । गुरुर्भारः, शासिता च । उपरि पृष्ठदेशे, प्रभुभावे च अङ्कुश इवाङ्कुश इत्यपि । अत आह—तच्छ्रुत्वेति । बृंहितं गर्जितम् । अंशव एवांशूकाः । अंशुकं च द्विजगुरु गरुड से द्वेष रखते थे, न कि प्रजा के लोग ब्राह्मण और गुरु से द्वेष करते । मीमांसक लोग ही अधिकरणों अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकरणों में विचार-विमर्श करते थे, न कि धर्मनिर्णय के स्थान (फौजदारी और दीवानी की अदालतें) लगते थे ।' यह सोच बाण ने आगे बढ़ कर दाहिना हाथ उठाए हुए 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । उसी समय दिशा की ओर कुछ ही दूर पर राजभवन के किसी महावत ने मधुर और ऊँचे स्वर में अपरवक्त्र का गान किया— 'अरे हाथी के बच्चे, तू अपनी चंचलता छोड़ दे, सिर नीचा करके नम्रतापूर्वक रह । यह अंकुश जो शेर के नखाग्र के समान टेढ़ा और कठोर है, तेरे दोषों को नहीं सह सकता ।' उसे सुनकर हर्ष ने बाण की ओर देखा और पर्वत की कन्दरा में बैठ कर दहाड़ते हुए सिंह की आवाज के समान गम्भीर स्वर से नभोभाग को भरते हुए पूछा—'वही यह बाण है ?' तब दौवारिक बोला उठा—'देव का कथन सत्य है, ये वही हैं ।' 'मैं तब तक इसे नहीं देखता जब तक यह मिलने-जुलने की अनुकूलता नहीं प्राप्त कर ले' यह कह कर सम्राट् ने मुह फेर लिया, अपाङ्ग की ओर दौड़ते हुए चंचल तारों वाली आँखों की फैलती हुई प्रभा इस प्रकार इधर से उधर हुई जैसे नील और उज्ज्वल वस्त्र की बनी हुई जवनिका एक ओर से दूसरी ओर घुमा दी जाती है । सम्राट् ने घूमकर

द्वितीय उच्छ्वासः १०६ निषण्णस्य मालवराजसूनोरकथयत्—‘महानयं भुजङ्गः’ इति। तूष्णीं- भावेन त्वगमितनरेन्द्रवचसि तस्मिन्मूके च राजलोके मुहूर्तमिब तृष्णीं स्थित्वा बाणो व्यज्ञापयत्—‘देव ! अविज्ञाततत्त्व इव, अश्रद्दधान इव, नेय इव, अविदितलोकवृत्तान्त इव च कस्मादेवमाज्ञापयसि ? स्वैरिणो विचित्राश्च लोकस्य स्वभावाः प्रवादाश्च । महद्भिस्तु यथार्थ- दर्शिभिर्भवितव्यम् । नार्हसि मामन्यथा संभावयितुमविशिष्टमिव । ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम् । यथाकाल- मुपनयनादयः कृताः संस्काराः सम्यक्पठितः साङ्गो वेदः । श्रुतानि च यथाशक्ति शास्त्राणि । दारपरिग्रहादभ्यागारिकोऽस्मि । कामे भुजङ्गता । वक्षम् । तिरस्करिणी जवनिका । प्रेष्ठस्यातिप्रियस्य । नेयः परवशः । स्वैरिणः स्वतन्त्राः । सोमपायिनां सोमपानाम् । 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं छन्दोविचितिः' इति षडङ्गानि वेदस्य । अभ्यागारिको गृहस्थः, सम्यग्वृत्तिस्थितो वा । कामे भुजंगता । कामभुजंगता शृङ्गारित्वम् । कामे मदने भुजंगता ज्ञेया, न मादृशेषु । नहि मे काचिद्भजं बाहुं गता प्राप्तेत्यर्थः । लोकद्वयेत्यादिना त्रिवर्ग- स्यानुपघातं दर्शयति । शास्त्रविरोधप्रसङ्गात । 'शतायुर्वे पुरुषः'; कालमन्योन्यानु- पीठ की ओर बैठे हुए मालवराज के पुत्र से कहा—'यह भारी भुजंग (गुंडा या लम्पट) है।' मालवराज के पुत्र तो चुप रहे जैसे उन्हें हर्ष की बात समझ में न आई और राजसमूह भी सुनकर गुम हो गया । तब क्षणभर चुप रह कर बाण बोला—'हे देव, आप इस प्रकार की बात ऐसे कहते हैं जैसे आप को मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, या आप की बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बातें मनमानी और तरह-तरह की होती हैं । किन्तु श्रेष्ठ जनों को ठीक-ठीक देखना चाहिए । मुझे साधारण समझ कर अनाप-सनाप कल्पना न कीजिए । सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में मैं जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं । मैने अङ्गों के साथ वेदों का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है । अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण किया है । विवाह के क्षण से लेकर मैं नियमित गृहस्थ हूँ । तो मुझ में क्या भुजंगपना है १? मेरी नई अवस्था की कुछ १. का मे भुजङ्गता-मेरे जीवन में कौन-सी ऐसी बात है जिसे भुजंगता कहा जाय ? भुजंगता उस व्यक्ति में रहती है जो कामी है, मुझमें नहीं, मैंने किसी स्त्री को भुजंगता नहीं की अर्थात् अपनी भुजाओं में आलिंगन नहीं किया । ४ ह० च०

१३० हर्षचरितम् लोकद्वयाविरोधिभिस्तु चापलैः शैशवमशून्यमासीत् । अत्रानपला- पोऽस्मि । अनेनैव च गृहीतविप्रतीसारमिव मे हृदयम् । इदानीं तु सुगत इव शान्तमनसि मनाविव कर्तरि वर्णाश्रमव्यवस्थानां समवर्तिनीव च साक्षाद्दण्डधृति देवे शासति सप्ताम्बुराशिरशनामशेषद्वीपमालिनीं महीं क इवाविशङ्कः सर्वव्यसनबन्धोरविनयस्य मनसाप्यभिनयं कल्पयिष्यति । आसतां च तावन्मानुष्यकोपेताः । त्वत्प्रभावादलयोऽपि भीता इव मधु पिबन्ति । रथाङ्गनामानोऽपि लज्जन्त इवाभ्यनुवृत्तिव्यसनैः प्रियाणाम् । कपयोऽपि चकिता इव चपलायन्ते । शरारवोऽपि सानुक्रोशा इव श्वाप- दगणाः पिशितानि भुञ्जते । सर्वथा कालेन मां ज्ञास्यति स्वामी स्वयमेव । अनपाचीनचित्तवृत्तिग्राहिण्यो हि भवन्ति प्रज्ञावतां प्रकृतयः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । भूपतिरपि 'एवमस्माभिः श्रुतम्' इत्यभिधाय तूष्णीमेवा- भवत् । संभाषणासनदानादिना तु प्रसादेन नैनमन्वग्रहीत् । केवलममृत- बद्धं परस्परस्यानुपघातेन त्रिवर्गं सेवत इत्यत एवाह—शैशवमिति । अशून्यमिति । अनेन तदेकासक्तत्वं परिहरति । अनपलापो निरपह्नवः विप्रतीसारः पश्चात्तापः । सुगतो बुद्धः । समवर्ती यमः । मनुष्यस्य भावो मानुष्यकम् । रथाङ्गनामानश्चक्रवाकाः चपलायन्ते चपलत्वमाचरन्ति । शरारवो हिंस्त्राः । श्वापदगणाः प्राणिसमूहाः । पिशितं मांसम् । अनपाचीनाऽमृष्टा । अविपरीतेत्यर्थः निर्दोषा वा । चपलताएँ अवश्य हैं पर ऐसा नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो, मैं इस बात को इनकार नहीं करता । मेरे हृदय में इसी का बहुत बड़ा पश्चात्ताप है । हे देव, आप भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रम मर्यादा के रक्षक और यम के समान दण्डधर हैं । सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी पर आपका एकछत्र शासन है । तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुखद अभिनय करने की मन से भी कल्पना करता है ? मनुष्यों की तो बात जाने दीजिए, आपके, प्रभाव से भौंरे भी डरते-डरते मधुपान करते हैं, चक्रवाक पक्षी भी अपनी पत्नी के प्रति अतिशय आसक्ति रूप व्यसन से लज्जित होते हैं, वानर भी शंकित होकर चपलता करते हैं, बाघ आदि हिंसक जानवर भी दयावान् होकर पश्चात्ताप करते हुए मांस का भक्षण करते हैं । समय से स्वयं आप मेरे विषय में सब कुछ जान लेंगे क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में भी विपरीत हठ नहीं रखते ।' इतना कह कर बाण चुप हो गए । सम्राट ने भी 'मैंने ऐसा ही सुना था' बस इतना ही कहा । लेकिन परस्पर बातचीत, आसनदान आदि

द्वितीय उच्छ्वासः १३१ वृष्टिभिः स्नपयन्निव स्नेहगर्भेण दृष्टिपातमात्रेणान्तर्गतां प्रीतिमकथयत् । अस्ताभिलाषिणि च लम्बमाने सवितरि विसर्जितराजलोकोऽभ्यन्तरं प्राविशत् । बाणोऽपि निर्गत्य धौतारकूटकोमलातपत्विषि निर्वाति वासरे, अस्ताचलकूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभांसि तेजांसि मुञ्चति वियन्मुचि मरीचिमालिनि, अतिरोमन्थमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमानम्रदिष्ठगोष्ठी- नपृष्ठास्वरण्यस्थलीषु, शोकाकुलकोककामिनीकूजितकरुणासु तरङ्गिणीतटीषु, वासविटपोपविष्टवाचाटचटकचक्रबालेष्वालवालावर्जितसेकजलकुटेषु नि- ष्कुटेषु, दिवसविहृतिप्रत्यागतं प्रस्रुतस्तनं स्तनंधये धयति धेनुवर्गमुद्गतक्षीरं क्षुधिततर्णकव्राते, क्रमेण चास्तधराधरधातुधुनीपूरप्लावित इव लोहिताय- मानमहसि मज्जति सन्ध्यासिन्धुपानपात्रे पातङ्गे मण्डले, कमण्डलुजल- बाणोऽपीत्यादौ । बाणोऽप्यस्मिन्सति निवासस्थानमगादिति संबन्धः । 'रीतिः स्त्रियामारकूटम्' इत्यमरः । निर्वाति शाम्यति । निचुलॊ वेतसवृक्षः । भुक्तोद्गी- र्णाहारचर्वणं रोमन्थः । म्रदिष्ठं मृदुतमम् । गोष्ठीपूर्वं गोष्ठीनम् । 'गोष्ठात्खञ्भूत- पूर्वे' । उक्तं च—'गोष्ठं गोस्थानकं तत्तु गोष्ठीनं भूतपूर्वकम्' इति । कोकाश्चक्रवाकाः । तरङ्गिणी नदी । आलवालमावापः । कुटा घटाः । निष्कुटाः स्वगृहारामाः । स्तनं- के प्रसाद से उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से उसको नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्ताचल की ओर लटकने लगे तो सम्राट राजसमूह से विदा लेकर महल के अन्दर चले गए। बाण भी वहाँ से निकल कर अपने निवासस्थान स्कन्धावार में लौट आया। ढलते हुए दिन के आतप का तेज साफ-सुथरे पीतल के समान मंद पड़ गया। अस्ताचल के मुकुट के सदृश सूर्य वेतस की मंजरी जैसे अपने तेजसमूह को छोड़ कर आकाश से हट रहे थे। वनभूमियों के मुलायम बथानों में झुण्ड के झुण्ड मृग बैठ कर धीरे धीरे पगुरी करने लगे। नदी के तटों पर प्रियविरह से शोकाकुल होकर चक्रवाक की पत्नियां करुण आवाज में टर्राने लगीं। गृह के पास वाले उपवनों में चटक नामक छोटे छोटे पक्षी पेड़ों पर बैठ कर चहचहाने लगे और वृक्ष के थल्हों में सींचने के काम में आने वाले घड़े औंध कर रख दिए गए। दिन भर चरने के बाद शाम को टहर कर आई हुई दुधार गायों के स्तन को उनके बछड़े चुभलाने लगे। क्रम से अस्ताचल की गेरू आदि धातुओं के झरनों में डुबकी लगाने से लाल होकर सूर्य संध्या के समुद्र रूपी