हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
हित चौरासी • • २०५ एक राधा प्रियतम ही हैं। इसका कारण यह है कि आचार्य्य पाद के इष्टाराध्य श्रीराधावल्लभ लाल—श्रीकृष्ण, एक नारी व्रती पति और दक्षिण नायक है किन्तु श्रीमद्भागवत के श्रीकृष्ण जार, उपपति बहुनायक और प्रेमास्पद हैं। चूँकि यहाँ पर श्रीआचार्य्य पाद ने महा रास का वर्णन श्रीमद्भागवतानुसार ही किया है किन्तु फिर भी एक बात लक्ष्य में रखने की है कि सर्वत्र आपका लक्ष्य रस और रसिकता ही है। यहाँ तक कि आप उस रसिकता को रस विलास को मार्ग और अपमार्ग में भी खोज निकालते हैं तथा उसके प्रमाण भी ले लेते हैं मूढ़ पशु पक्षी कीट पतङ्गों से तब फिर ब्रज लीला या महारास में उन्हें रस का दर्शन नहीं होगा क्या ऐसा सम्भव है ? उन्होंने रस को कहाँ तक नीचे उतर कर देखा है; आप देखिये— प्रीति न काहु की कानि विचारै। मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै।। ज्यौं साँवन सरिता जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै। ज्यौं नादहि मन दिये कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।। जै श्री हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहिं जारै। फिर जो लोग महाप्रभु के सिद्धान्त पर ब्रज और निकुञ्ज का झगड़ा (विवाद) खड़ा करते हैं उन्होंने शायद श्रीहिताचार्य्य के मर्म बेधन की ओर लक्ष्य नहीं किया है। वे व्यासजी के इस वाक्य को समझें— "हुतौ रस रसिकन कौ आधार" स्वयं आचार्य्य पाद इस पद की वर्णना में जो शब्द रखते हैं वे दृष्टव्य हैं, साथ साथ लक्ष्य में लाने योग्य हैं— (१) रसिक रस सागर रास रच्यौ बन माँहीं। (२) अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली। (३) रसिक सचु पावत............... पद का अन्तिम वाक्यांश 'रसिक सचु पावत' स्पष्ट कर रहा है कि यह महा रास केलि रसिक जनों के रस आस्वादनार्थ है, उनकी अपनी वस्तु है।
२०६ • • हित चौरासी
इसका वर्णन भी रस आस्वादनार्थ किंवा रस वर्णन के लिये है कोई व्रज लीला वर्णन इसका लक्ष्य नहीं। यह तो निर्विवाद है कि लक्ष्य की गति पर से ही वर्णन की गति जानी जाती है। अब यहाँ यह जानना चाहिये कि महारास का वर्णन होने पर भी इस पद में रस का ही वर्णन है। श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीमद्भागवत में से भी अपनी इष्ट वस्तु रस कैसे और कहाँ से खोज निकाली है ? उसे देखिये, यहाँ प्रसङ्गानुसार यथा क्रम श्रीमद्भागवत से इस पद के भावों का सामञ्जस्य प्रकट किया जाता है- (१) 'मौंहन बैंनु बजावै' इस भाव का प्रकाश निम्न चरण से मिलता है- जगौ कलं वाम दृशां मनोहरम्। श्रीमद्भागवत १०/२९/३ अर्थात् "वंशी में वाम दृशा गोपियों के मन का हरण करने वाला गीत (श्याम सुन्दर ने) गाया।" जिसे सुनकर ब्रज बालाएँ आ गयीं। (२) "आईं व्रज नारि सुनत वंसी रव" अब इसका भाव साम्य श्रीमद्भागवत में किस प्रकार है उसे देखिये- निशम्य गीतं तदनङ्ग वर्द्धनं व्रजस्त्रियः कृष्ण गृहीत मानसाः। आजग्मु रन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जव लोल कुण्डलाः॥ १०/२९/४ अर्थात् "उस कामोद्दीप गान के कान में पड़ते ही समस्त व्रज बालाएँ श्रीकृष्ण में आसक्त चित्त होकर एक दूसरे से अपनी चेष्टा छिपाती हुईं अपने कान्त के पास आयीं। उस समय अत्यन्त वेग के कारण उनके कानों के कुण्डल हिलते जाते थे।" इस आगमन के समय उन व्रज बालाओं को उनके भ्राता, पति, बन्धु वर्गों ने रोका तो सही पर वे किसी प्रकार भी न रुकीं। उनकी अवहेलना करके भी श्रीकृष्ण से जा मिलीं। आचार्य्य पाद कहते हैं-
हित चौरासी • • २०७ (आई ब्रज नारि सुनत बंसी रव) गृहपति बंधु विसारे- अब श्रीमद्भागवत में देखिये- ता वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिर्भ्रातृ बन्धुभिः। गोविन्दापहृतात्मानो न न्यवर्त्तन्त मोहिताः।। श्रीमद्भा. १०/२९/८ अर्थात् उनके पति, पिता भ्राता और बन्धुओं ने उन्हें बहुत कुछ रोका किन्तु श्रीगोविन्द ने उनके चित्तों को ऐसा कुछ खींच लिया था कि वे मुग्ध बालाएँ उनके रोके न रुक सकीं।" उन्होंने आकर मदन मोहन का दर्शन किया और उनके विरह जन्य काम ताप की शान्ति हो गयी। महाप्रभु और श्रीमद्भागवत का भाव साम्य देखिये- (४)"दरसन मदन गुपाल मनोहर मनसिज ताप निवारे" - और सर्वास्ता केशवालोक परमोत्सव निर्वृताः। जहुर्विरहजं तापं प्राज्ञं प्राप्य यथा जनाः।। श्रीमद्भाग. १०/३२/९ अर्थात् "जैसे मुमुक्षु जन ब्रह्मवेत्ता को पाकर संसार ताप से छूट जाते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्ण दर्शन के परमोल्लास से आनन्दित होकर उन समस्त गोप बालाओं का विरह ताप दूर हो गया।" पश्चात् रास क्रीड़ा प्रारम्भ हुई- "रास रच्यौ बन माँही" और तत्रारभत गोविन्दो रास क्रीडामनुव्रतैः। रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपी मण्डल मण्डितः।। श्रीमद्भा. १०/३३/२-३ अर्थात् "फिर वहाँ गोविन्द ने रास क्रीड़ा प्रारम्भ की वे गोपियों के मण्डल में शोभित होकर रास के महोत्सव में सम्प्रवृत्त हुए।" इसी प्रकार दोनों प्रसङ्गों में रास नृत्य का सरस वर्णन मिलाइये-
२०८ • • हित चौरासी (६) "अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं" -हित चौरासी एवं- वलयानां नूपुराणां किङ्किणीनां च योषिताम्। सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रास मण्डले।। -श्रीमद्भा. १०/३३/६ अर्थात् "रास मण्डल में नृत्य करती हुई गोपियों के कङ्कण नूपुरों एवं किङ्किणियों का तुमुल शब्द होने लगा।" इस रास नृत्य का दर्शन करके देवताओं की सुन्दरियाँ मोहित हो गयीं। आचार्यपाद लिखते हैं- (७) "मोहे मृग धैनु सहित सुर सुंदरि प्रेम मगन पट छूटे। उडगन चकित थकित ससि मण्डल कोटि मदन मन लूटे॥" यही भाव श्रीमद्भागवत में भी- कृष्ण विक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहुः खेचर स्त्रियः। कामार्दिताः शशाङ्कश्च सगणो विस्मितोऽभवत्।। -श्रीमद्भां. १०/३३/१९ अर्थात् "श्रीकृष्ण के इस विक्रीड़न को देखकर देवताओं की स्त्रियाँ कामातुरा होकर मोहित हो गयीं और चन्द्रमा भी अपने गणों (उडगण आदि) के सहित चकित हो गया।" रास ने सबको चकित तो कर दिया। और ब्रज बालाओं ने जो सुख लूटा उसका भी वर्णन करते हैं दोनों व्यास नन्दन- (८) अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली। यह तो हुआ 'हित चौरासी में अब श्रीमद्भागवत में व्यासनन्दन शुकदेव जी क्या कहते हैं-
हित चौरासी • • २०६ काचिद्रास परिश्रान्ता पार्श्वस्थस्य गदाभृतः। जग्राह बाहुना स्कन्धं श्लथ वलय मल्लिका।। तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पल सौरभम्। चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह।। कस्याश्चिन्नाट्य विक्षिप्त कुण्डल त्विष मण्डितम्। गण्डं गण्डे संदधत्या अदात्ताम्बूल चर्वितम्।। नृत्यन्ती गायती काचित्कूजन्नूपुर मेखला। पार्श्वस्थाच्युत हस्ताब्जं श्रान्ताधात्स्तनयोः शिवम्।। श्रीमद्भागवत-१०/३३/११,१२,१३,१४ अर्थात् “कोई गोपी नृत्य करते करते थक गयी उसकी कलाइयों से कङ्कण और केशों से मल्लिका के पुष्प खिसकने लगे तब उसने श्रीकृष्ण के कन्धों को अपनी भुजाओं से पकड़ लिया। एक गोपी ने अपने कन्धे पर रखी हुई कमल कुसुम से सुगन्धित श्रीकृष्ण की चन्दन लिप्त भुजा को सूँघ कर आनन्द पुलकित होकर चूम लिया। एक गोपी ने नाचने से हिलते हुए कुण्डलों की कान्ति से सुशोभित अपना कोमल कपोल श्रीकृष्ण चन्द्र के कपोल से मिलाया तब श्रीकृष्ण ने उसके मुख में अपना चबाया हुआ पान दे दिया। कोई गोपी नूपुर और मेखला की झनकार करती हुई नाच और गा रही थी जब वह विशेष थक गयी, तो उसने अपनी बगल में विराजमान् श्रीकृष्ण चन्द्र का शीतल कर कमल अपने स्तन पर रख लिया।” 'इत्यादि; उक्त सभी प्रमाण बता रहे हैं, कि श्रीहिताचार्य्य पाद ने इस पद में महारास वर्णन की शैली से अपना लक्ष्य-इष्ट रस का गान किया है। दूसरी बात यहाँ पर यह भी जान लेने की है कि जैसे अन्यत्र रास वर्णन में श्रीहिताचार्य्य ने श्रीप्रियाजी की उपस्थिति प्रत्येक रास प्रसङ्ग में आवश्यक समझी और वर्णन की है, वैसी यहाँ नहीं समझी और की भी नहीं क्योंकि श्रीमद्भागवत की यही शैली है। रसज्ञ जन जानते हैं कि महारास वर्णन को श्रीमद्भागवत के अनुसार वर्णन करके श्रीहिताचार्य्य ने उसमें आदि से अन्त तक रस-केवल रस की धारा बहायी है। वेणु वादन, गोपी आगमन, नृत्य, आलिङ्गन, एवं चुम्बन आदि
२१० • • हित चौरासी सभी रस पूर्ण क्रियाएँ हैं। मेरी मान्यता है कि वर्णन में महाप्रभु पाद का उद्देश्य महारास वर्णन न होकर रस प्रक्रिया वर्णन है। – ६४ – अवतरण-श्रीवृन्दावन में सदा शरद एवं वसन्त का साम्राज्य छाया रहता है। निरन्तर श्रीलालजी अपनी मधुर मुरली की तान भी छेड़ा करते हैं और रस एवं भावों से परिपूर्ण अनेक लीलाओं की रचना योजना करते रहते हैं। वैसे ये हैं तो मुनियों के ध्यान में भी न आने वाले पर प्रेम परवश अपने अनन्य प्रेमी जनों के लिये श्रीवन में नित्य प्रकट हैं। इसी बात को श्रीहिताचार्य पाद प्रकट करते हैं- गौरी मूल-बैनु माई बाजै बंसीवट। सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट।। जटिल क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट। दसननि कुंद कली छबि लज्जित सज्जित कनक समान पीत पट।। मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट। दास अनन्य भजन रस कारन हित हरिवंश प्रकट लीला नट।।६४।। भावार्थ-(श्रीहित अलि ने सखियों से कहा) "हे सखी ! वंशीवट में वेणु तो बजती ही रहती है और यमुना के तट स्थित पवित्र एवं सुन्दर पुलिन पर; श्रीवन में सदा सर्वदा वसन्त भी रहा ही आता है। (ये वेणु बजाने वाले श्रीकृष्ण भी कितने सुन्दर हैं ? उनके श्रीअङ्गो में) मणियों से जड़ा हुआ किरीट और मकराकार कुण्डल शोभित हैं, मुख कमल पर अलकें क्या हैं मानों भ्रमर। दाँतों की पङ्क्ति से तो कुन्द की कलियों की छबि भी लजा उठी है। उनके शरीर पर स्वर्ण के जैसा पीत पट शोभा पा रहा है।" श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि जिन्हें अपने मन में ध्यान करते हुए मुनि जन (ध्यान तक में) नहीं पा सकते, वही बालकवत उन्नत किशोर 'सुरत रण शूर श्रीराधावल्लभ लाल निरन्तर श्रीवन में आमोद प्रमोद पूर्वक
हित चौरासी • • २११ क्रीड़ा करते रहते हैं। (अतएव निश्चय है,) ये लीला नटवर केवल अपने दासों के रस भजन के लिये ही प्रकट हैं। टिप्पणी- "दास अनन्य" प्रथम एक पद में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने "यह जु एक मन बहुत ठौर करि कहि कौनैं सचु पायौ" इस उपदेश से साधक प्रेमियों के लिये अपने मन को एक जगह लगाने का उपदेश दिया। एक मन को अनेक स्थलों में लगाने से जार युवती (वेश्या) की तरह अशान्ति ही मिलती है शान्ति नहीं; जिसे श्रीराधावल्लभ लाल का एकान्तिक प्रेम इष्ट हो वह नितान्त रूप से अपने मन को एक मुख करे-अनन्य बने। अनन्य का अर्थ है केवल अपने प्रभु का हो रहना और उससे अतिरिक्त सारे विश्व प्रपंच को भूल जाना। अनन्यता में अपने प्रियतम से तल्लीन होने का आदेश निहित है; किन्तु किन्हीं देवी-देवताओं की निन्दा या विरोध का नहीं। यह अनन्यता इतनी एक मेक हो जाय अपने प्रियतम से कि (उससे छान कर न्यारी न किया जा सके) सर्वत्र केवल अपने इष्ट का दर्शन ही हो एवं और कुछ अन्य कहा जाने वाला रह ही न जाय वह बोल उठे- दर दिवार दरपन भये, जित देखौं तित तोहिं। कंकर पत्थर ठीकरी, भये आरसी मोहिं।। अथवा सर्वत्र अपने प्राण प्रियतम श्याम का दर्शन करने वाली गोपियों की भाँति वह अनन्य होकर गा उठे- जित देखौं तित स्याम मयी है। स्याम कुंज बन जमुना स्यामा मनहु स्यामता बेलि बई है।। श्रुति कौ अक्षर स्याम देखियत दीप सिखा पर स्याम तई है। हौं बौरी कै लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है।। चंद्र सार मृग सार स्याम है सब स्याम काम बिजई है। नर देवन की कहा कथा है अलख ब्रह्म छबि स्याम मई है।। अनन्यता का अर्थ बताते हुए इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है-
२५२ • • हित चौरासी सो अनन्य जाके असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप रासि भगवंत॥ समस्त चराचर में भी अपने रूप राशि इष्ट देव का दर्शन करना ही अनन्यता है। यही है अनन्य साधना की सिद्धावस्था, जिसका सङ्केत श्रीहिताचार्य चरण कर रहे हैं- सद्योगीन्द्र सुदृश्य सान्द्र रसदानन्दैक सन्मूर्त्तयः सर्वेप्यद्भुत सन्महिम्नि मधुरे वृंदावने सङ्गताः। ये क्रूरा अपि पापिनो न च सतां सम्भाष्य दृश्याश्च ये; सर्वान्वस्तुतया निरीक्ष्य परम स्वाराध्य बुद्धिर्मम॥ श्रीराधा सुधानिधि २६४ अर्थात् "जिनका सङ्ग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महान् योगीन्द्र गणों के भी लिये सुन्दर दर्शनीय, सघन रसदायी और एकमात्र आनन्द की मूर्तियाँ हैं। उनको वस्तुतया (यथार्थ दृष्टि से) देखकर उनमें मेरी अपनी स्वाराध्य बुद्धि है-वे मेरे लिये इष्टदेव के रूप हैं।" इस अनन्य साधना के दो दृष्टि कोण हैं एक सर्व दर्शन और दूसरा एकान्त दर्शन। ऊपर के प्रसङ्ग में अनन्यता का सर्वदर्शन (अर्थात् सर्वत्र अपने प्रियतम प्रभु का ही दर्शन करना अन्य का न देखना) का दिग्दर्शन कराया गया है अब अनन्यता के एकान्त दर्शन का नीचे के प्रसङ्ग में दिग्दर्शन कराया जाता है जिसका सूत्र श्रीहिताचार्यपाद निर्विरोध भाव से प्रकट करते हैं- रसना कटौ जु अन रटौं निरखि अन फुटौ नैन। श्रवन फुटौ जु अन सुनौं विनु राधा जस बैन॥ अर्थात् "श्रीराधा के सिवाय अन्य कुछ कहने बकने वाली जीभ कट कर गिर जाय, अन्य कुछ देखने वाले नेत्र फूट जायँ, और अन्य कुछ सुनने वाले कान भी फूट जायँ।" यह दृष्टि ऐकान्तिक, एक देशीय किसी एक रूप, नाम के प्रति भी हो सकती है और यही सर्वत्र, सर्व देशीय सब नाम रूपों के प्रति भी हो सकती है।
हित चौरासी • • २१३ जब प्रेमी की दृष्टि में सर्वत्र अपना इष्ट देव ही है तब अन्य है ही कहाँ ? तब उसका विरोध भी किससे और कहाँ रहा ? वह तो सर्वत्र उसे ही देखता है- जहँ देखौं तहँ आपनों इष्ट नाम गुरु धाम। ऐसे दृष्टि प्राप्त महात्मा के लिये विरोध करने के लिये कोई स्थल रह ही नहीं जाता। वह श्रीविहारिन देव जी के शब्दों में कहता है- अब हौं कासौँ बैर करौं। निजु मुख कहत पुकारत प्रभु हैं घट घट हौं विहरौं॥ इसी सर्वत्र इष्ट दर्शन की ऐकान्तिक साधना का मार्ग श्रीहरिराम 'व्यास' इस प्रकार प्रकट करते हैं- जाकी है उपासना, ताही की वासना; ताही कौ नाम रूप लीला गुन गाइये। यहै अनन्य धर्म परपाटी यहै; श्रीवृन्दावन तजि अनत न जाइये।। सोई व्यभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखें दारुन दुख पाइये। 'व्यास' होइ उपहास त्रास कियें आस अछत कत दास कहाइये।। कितना स्पष्ट है इन व्यासजी की अनन्य धर्म परिपाटी ! जिसमें जिसकी उपासना उसी की वासना के साथ उसीके नाम रूप लीला गुणों का गान है। अपनी वस्तु से प्रीति है। अन्य किसी से विरोध का लेश भी नहीं। नित्य विहार का नित्य दर्शन करने वाले, सदा विहार की ऐनक लगाये हुए श्रावण के सूर परम रसिक श्रीभगवत रसिक जी के भी शब्द कुछ ऐसे ही हैं- नैननि देखौं और नहिं, श्रवन सुनौं नहिं और। घाँन न सूघौं और कछु, रसना कहौं न और।। रसना कहौं न और त्वचा परसौँ नहिं औरे। कुंज विहारी केलि झेलि इन्द्रिनु सब ठौरे।।
२१४ • • हित चौरासी भगवत रसिक अनन्य कोक उपदेसों सैननिं। बैननि मैंन जगाई रैन दिन देखौं नैननिं।। अनन्य श्रीभगवत रसिकजी अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से सदा, सर्वत्र श्रीकुअ विहारी की केलि का दिव्य रस ही झेलते रहते हैं। यह है रसिकों की रसिक अनन्यता। अनन्यता का स्थूल अर्थ करने वाले लोग जो प्रायः अन्य देवी देवताओं की निन्दा, विरोध, एवं उपेक्षा आदि जो कुछ करते हैं वे अपने प्रभु के व्यापक रूप विस्तार को भूलकर किसी सङ्कीर्ण दायरे में आ जाते हैं। वे श्रीहित ध्रुवदासजी के नीचे लिखे सिद्धान्त को भूल जाते हैं- अपने अपने इष्ट कौं भजहिं जीव ते धन्य। किसी की निन्दा या विरोध करते समय हम अपनी स्थिति से-अनन्यता से उसी क्षण पतित हो जाते हैं जब हमें अपने इष्ट को छोड़कर किसी अन्य की स्मृति भी हो आती है। अनन्यता तो वह है जहाँ उपासक की स्मृति, तन, मन प्राण और आत्मा के कण कण में अपने प्रियतम का रूप समाया रहे इस प्रकार- आओ प्यारे मोहना पलक झाँपि तोहिं लेऊँ। ना मैं देखौं और कौं ना तोहिं देखन देऊँ।। इस अनन्यता की साधना का पथ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती पाद इस तरह बता रहे हैं- स्वान्तर्भाव विरोधिनी व्यवहृतिः सर्वाः शनैस्त्यज्यतां, स्वान्तश्चिन्तित तत्वमेव सततं सर्वत्र संधीयताम्। तद्भावेक्षणतः सदा स्थिरचरेऽन्यादृग्तिरोभाव्यतां, वृन्दारण्य विलासिनो निशि दिवा दास्योत्सवे स्थीयताम्।। अर्थात् “अन्तर्भावों के विरोध करने वाले सभी व्यवहारों को धीरे धीरे त्याग दें, अपने अन्तः करण के नित्य चिन्तनीय तत्व को ही सदा सर्वत्र खोजता रहे। (उसी अन्तः करण चिन्तित तत्व श्रीराधावल्लभलालजी के) भाव को स्थिर चर सब में सर्वत्र देखा करे, अन्य दृष्टियों का ही त्याग कर दे और श्रीवृन्दारण्य विलासी श्रीराधा मुरली मनोहर के दास्य सुख में ही दिन रात लगा रहे।”
४. पद ७१-८४: नित्य-विहार, युगल-केलि एवं ग्रन्थ उपसंहार
हित चौरासी • • २१५ और जब तक इस प्रकार विशाल भाव पूर्ण अनन्यता न होगी तब तक- "पंथ पावनो कठिन है कीन्हें कहा बनाव ?" इस अनन्यता के बिना सारी उपासना, प्रेम, परमार्थ, भक्ति, सभी व्यर्थ हैं दुःख रूप हैं। श्रीभगवत रसिकजी ने कहा है- असन वसन परिवार पुत्र विनु सब जग दुखिया। भगवत रसिक अनन्य विना कोऊ नहिं सुखिया।। इस अनेक वासना रूप दुःखों से मुक्त अनन्य रसिक दासों के लिये ही लीला नट प्रकट है। अतः प्रत्येक को अनन्य भावेन इस लीला नट का चरणाश्रय लेना प्रथम धर्म है। – ६५ – अवतरण-मानवती श्रीप्रियाजी को रासोत्सव में ले चलने के लिये श्रीहित सखीजी उन्हें प्रोत्साहन दे रही हैं। उन्होंने मानिनि से कहा- गौरी मूल-मदन मथन घन निकुंज खेलत हरि, राका रुचिर सरद रजनी। यमुना पुलिन तट सुरतरु के निकट, रचित रास चलि मिलि सजनी।। बाजत मृदु मृदंग नाचत सबै सुधंग; तैं न श्रवन सुन्यौ बैंनु बजनी। (जै श्री) हित हरिवंश प्रभु राधिका रमन, मोकौं भावै माई जगत भगत भजनी।।६५।। भावार्थ – (श्रीहित सजनी ने मानिनि श्रीराधा से कहा- हे मानिनि राधे!) देखो, पूर्ण चन्द्र मयी शरद की रुचिर सुन्दर रात्रि में कामदेव को मथित कर देने वाले श्रीहरि सघन लता भवन में (अलौकिक रास रस) खेल रहे हैं। हे सखी ! यमुना तट-पुलिन पर कल्पवृक्ष के ही निकट श्रीहरि ने रास की रचना की है; तुम भी चलकर उसमें मिलो ! अरी माई ! वहाँ कैसे मधुर-मधुर स्वर
२१६ • • हित चौरासी में मृदङ्ग बज रहे हैं और सब (सखियाँ) सुधङ्ग गति से नाच रही हैं क्या तुमने अपने कानों उनका मधुर वंशी वादन नहीं सुना ? श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी भाव से) कह रहे हैं- "हे सखी ! ये प्रभु राधिका रमण-आपके प्रियतम हैं और समस्त विश्व के (प्रेमी) भक्तों के भी भजनीय तत्व हैं। (तुम भले ही मान किये बैठी रहो, जाने तुम्हें ये कैसे लगते हैं पर) मुझे तो ये बहुत अच्छे लगते हैं, (अर्थात् मुझे और समस्त विश्व को ये अच्छे लगते हैं पर तुम्हें नहीं; क्योंकि तुम मान किये बैठी हो। यदि मान का त्याग कर दो तो तुम्हें भी वे अच्छे लगने लगे। वैसे तो सदा ही तुम्हें भी अच्छे लगते हैं पर अभी मान ने इतना अन्तर डाल दिया है। जो मान अपने प्यारे में बुराई का भ्रम उत्पन्न कर दे वह अवश्य और शीघ्र त्याज्य है; अतः आप अब शीघ्र मान का त्याग करके अपने परम प्रियतम से चल कर मिलें।) टिप्पणी— "जगत भगत भजनी" जीवों की रुचियाँ अनेक हैं और विचित्र हैं। इसलिये जीव उन रुचियों के अनुसार विषय, अर्थ, धर्म काम मोक्ष और भक्ति अनेक स्थलों से चिपटा है। उपासना के क्षेत्र में यदि किसी की रुचि, प्रेत, पितृ देवता या ब्रह्मा शिव आदि में है तो रही आवे, अलग बात है, वह तो "ऊधौ ! मन माने की बात !" है पर तत्व विचार या विवेक जन्य निर्णय से पूछा जाय तो यही उत्तर होगा कि जीवों के एकमात्र भजनीय केवल भगवान् श्रीकृष्ण हैं। ये परात्पर ब्रह्म हैं, सर्वेश्वर हैं और जीवों की एक मात्र गति हैं। समस्त जीव इनके सनातन अंश हैं। केवल यही ब्रह्म हैं; शेष इनके अतिरिक्त ब्रह्मा से लेकर स्तम्ब पर्यन्त सब जीव हैं चाहे उनके लिये पुराण और शास्त्रों की रचना ही क्यों न कर डाली गयी हो महत्ता प्रदर्शन के लिये। वेद पुराण एवं समस्त सच्छास्त्रों का यही निर्णीत मत है। प्रत्येक अकामी, सर्वकामी सकामी, एवं मोक्ष कामी के लिये यही भजनीय हैं अन्यत्र देवी देवताओं का भजन व्यर्थ भटकन है। श्रीमद्भागवत इसका निर्णय देता है— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकामो उदार धीः। तीव्रेण भक्ति योगेन यजेतपुरुषः परम्॥ श्रीमद्भा. २/३/१०
हित चौरासी • • २१७ अर्थात् "कुछ भी न चाहने वाले, सब कुछ चाहने वाले, अथवा मोक्ष चाहने वाले उदार बुद्धि व्यक्तियों को चाहिये कि वे (अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिये अन्य किन्हीं देवी देवताओं का यजन न करके) तीक्ष्ण भक्ति योग के द्वारा केवल परम पुरुष (भगवान् श्रीकृष्ण शुद्ध सत्व ब्रह्म) की ही आराधना करें।" परम मुमूर्षु राजा परीक्षित के लिये जीवन के अन्तिम दिनों में गङ्गा तट पर परम हंस शिरोमणि भगवान् शुक देव ने राजा के इस प्रश्न पर कि इस समय मेरा क्या कर्त्तव्य है ? यही उत्तर दिया था- तस्मात्भारत सर्वात्मा भगवान्हरिरीश्वरः। श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च स्मर्त्तव्यश्चेच्छता भयम्।। एतावान्सांख्य योगाभ्यां स्वधर्म्म परिनिष्ठया। जन्मलाभः परं पुंसामन्ते नारायण स्मृतिः।। प्रायेण मुनयो राजभिवृता विधिषेधतः। नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः।। श्रीमद्भागवत. २/१/५,६,७ अर्थात् "अतः हे भारत ! जिसे अभय पद की आवश्यकता हो उसे सबके आत्म स्वरूप भगवान् श्रीहरि का ही श्रवण कीर्त्तन और स्मरण करना चाहिये। सांख्य, योग तथा स्वधर्म्म निष्ठा आदि समस्त साधनों से अन्त काल में भगवान् का स्मरण रहे यही मनुष्य जन्म का परम लाभ है। हे राजन् ! जो मुनि जन त्रिगुणातीत भाव में स्थित होकर विधि निषेध मर्यादा से परे हो गये हैं, वे भी प्रायः श्रीहरि के गुण गान में ही रमण करते रहते हैं।" अब जिन भगवान् श्रीकृष्ण के भजन स्मरण और कीर्त्तन के ही लिये सत् शास्त्र आज्ञा देते हैं; वही शास्त्र उनकी सर्वोपरिता का भी निरूपण करते हैं; देखिये- एते चांशकला पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्। श्रीमद्भाग. १/३/२८ अर्थात् "अन्य सभी अवतार आदि तो अंश कलाएँ हैं पर ये श्रीकृष्ण तो परिपूर्णतम् ब्रह्म-भगवान हैं स्वयं भगवान् ! "
२१८ • • हित चौरासी ये भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त जीवों के भक्तों के, ज्ञानियों के, योगियों के और चराचर के एकमात्र भजनीय हैं। — ६६ — अवतरण—परम रमणीय एवं सर्वकाल सुखमय किसी एकान्त नव निकुञ्ज मन्दिर में श्रीयुगल किशोर की रस पूर्ण रति क्रीड़ा का प्रारम्भ होने जा रहा है। विहार के अवसर पर अत्यन्त प्रेमातुर श्रीलालजी के हृदय का इस पद में बड़ा ही सरस चित्र अङ्कित है साथ ही साथ उनकी प्रेमाधीनता और रस लोलुप वृत्ति का भी। दूसरे पक्ष में श्रीप्रियाजी की रस रूप गर्वोक्ति, गम्भीरता, कोमलता, उदारता, दान शीलता आदि उत्तम नायिकोचित गुणों का प्रकाश करने वाले भावों का समावेश है। विहार की एक रस धारा में काल का बोध भी न हो पाना त्रुटि मात्र में पुनः सायं काल आ जाना रस विहार अत्यन्त रमणीयता का द्योतक है। सम्पूर्ण पद दिव्य एवं अनिर्वचनीय रसमय भावों और शब्द मणियों से गुम्फित हार की तरह है जो युगल रसिक किशोर का हृदय हार बन रहा है। सुज्ञ रसिक जनों के लिये यह पद कितना मादक है अनुभवी ही जानते हैं। श्रीहित संखीजी साक्षी भाव से दर्शन करतीं और अपनी निकट सखियों को उस केलि का वर्णन करके सुनाती हैं- कल्याण मूल-विहरत दोऊ प्रीतम कुंज। अनुपम गौर स्याम तन सोभा वन वरषत सुख पुंज॥ अद्भुत खेत महा मनमथ कौ दुंदुभि भूषन राव। जूझत सुभट परस्पर अँग अँग उपजत कोटिक भाव॥ भर संग्राम भ्रमित अति अबला निद्रायत कल नैन। पिय के अंक निसंक तंक तन आलस जुत कृत सैन॥
हित चौरासी • • २१६ लालन मिस आतुर पिय परसत उरु नाभि उरजात। अद्भुत छटा विलोकि अवनि पर विथकित वेपथ गात॥ नागरि निरखि मदन विष व्यापित दियौ सुधाधर धीर। सत्वर उठे महामधु पीवत मिलत मीन मिव नीर॥ अबहीं मैं मुख मध्य विलोके बिंबाधर सु रसाल। जागृत ज्यौं भ्रम भयौ पर्यौ मन सत मनसिज कुल जाल॥ सकृदपि मयि अधरामृत मुपनय सुंदरि सहज सनेह। तव पद पंकज कौ निजु मंदिर पालय सखि मम देह॥ प्रिया कहति कहु कहाँ हुते पिय नव निकुंज वर राज। सुंदर वचन रचन कत वितरत रति लंपट बिनु काज॥ इतनौ श्रवन सुनत मानिनि मुख अंतर रह्यौ न धीर। मति कातर विरहज दुख व्यापित बहुतर स्वास समीर॥ (जै श्री) हित हरिवंश भुजनि आकरषे लै राखे उर माँझ। मिथुन मिलत जु कछुक सुख उपज्यों त्रुटि लव मिव भई साँझ॥६६॥ भावार्थ – दोनों प्रियतम (श्रीराधा एवं श्रीलालजी) कुञ्ज में विहार कर रहे हैं; दोनों की देह प्रभा अनुपम गौर एवं श्याम है; (दानों के अनुपम विहार से) वन में सुख पुञ्ज बरस सा रहा है। (युगल क्रीड़ा में) प्रचण्ड काम (मन्मथ) ही अद्भुत खेत (युद्ध का मैदान) है, भूषण ध्वनि ही मानो दुन्दुभि वाद्य हैं। (युगल किशोर के) अङ्ग प्रत्यङ्ग से उत्पन्न कोटि कोटि भावों का प्रकाश ही (दोनों योद्धाओं का) परस्पर जूझना है। भीषण युद्ध से अत्यन्त थकित हो जाने के कारण अवला श्रीप्रियाजी की सुन्दर आँखें नींद से भर गयीं और वे कृशाङ्गी आलस्य से भर प्रियतम की गोद में निः शङ्क भाव से सो गयीं। उस समय प्रेम और दुलार के बहाने प्रेमातुर प्रियतम उनके उरू, नाभि एवं उरोजों का स्पर्श करने लगे। (उस समय प्रियाजी के श्री अङ्गों की छबि देखकर उनका शरीर काँपने लगा और वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। (उनके मूर्च्छित होकर गिरने पर) नागरी श्रीप्रियाजी ने देखा, इनके मदन विष व्याप्त हो गया है, तब उन्होंने (प्रियतम को) अपनी अधर सुधा दी।
२२० • • हित चौरासी उस महामधु का पान करते ही प्रियतम शीघ्रता पूर्वक ऐसे उठ बैठे जैसे मीन को पानी मिल गया हो। (फिर अर्ध चेतन की सी अवस्था में कहने लगे-) "अहो ! अभी अभी तो मैंने अपने मुख के मध्य (किन्हीं) रसमय अधर बिम्बों का अनुभव किया था।" (इतनी स्मृति आते ही) फिर उन्हें पूर्ववत् जागृत की ही भाँति भ्रम हो गया कि मैं श्रीप्रियाजी के आलिङ्गन से वञ्चित हूँ; इसलिए उनका मन पुनः शत-शत कामदेवों के जाल में पड़ गया-वे अधिकाधिक व्यथित हो गये। (मन्मथ-व्यथा से व्यथित होकर श्रीलालजी दीनता पूर्वक श्रीप्रियाजी से विनय सी करने लगे; वे बोले-) "हे सुन्दरि ! आप स्वाभाविक स्नेह के साथ केवल एक ही बार सही अपने अधरों के अमृतका दान मुझे दीजिये ! हे सखि ! अब कृपा पूर्वक आप अपने श्रीचरण कमलों के निवास भवन रूप मेरे इस देह को (कामाग्नि में जलने से) बचाइये- इसका पालन कर लीजिये ?" प्रियतम के इन शब्दों को सुनकर) श्रीप्रियाजी ने कहा-"हे नव निकुञ वर राज ! हे प्रियतम !! तुम तब कहाँ थे ? (जब मैंने अधरामृत दिया था।) अरे रति लम्पट ! अब क्यों व्यर्थ इस (चाटुकारी पूर्ण) वचन रचना का विस्तार कर रहे हो ?" मानिनि प्रिया के मुख से अपने कानों ये शब्द सुनते ही (प्रियतम के) हृदय में धैर्य नहीं रह गया, उनकी बुद्धि कातर हो गयी और विरह जनित दुःख व्याप्त हो गया वे लम्बी लम्बी साँसे लेने लगे। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि श्रीलालजी की ऐसी प्रेम विह्वल दशा देखकर उदार हृदया श्रीप्रियाजी ने उन्हें अपनी भुजलताओं से आकर्षित करके अपने हृदय के बीच ले लिया। उस समय दोनों के मिलन में जो भी कुछ आनन्द उत्पन्न हुआ, (वह अवर्णनीय है, उसका केवल इतने से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि) उस सुख की विस्मृति में सन्ध्या तो त्रुटि लव मात्र समय जैसी हो गयी, (अर्थात् काल जाते पता न लगा और बहुत सा समय बीत कर फिर से दूसरी सन्ध्या आ लगी।) टिप्पणी – यह पद रति विहार भावना का बड़ा ही सूक्ष्म एवं गम्भीर परिचायक है। इसमें वर्णित रस युगल किशोर रसिक सखि गण एवं रसिक उपासक जनों का जीवन प्राण है। यों तो सम्पूर्ण 'हित चौरासी' के पद इसी एक
हित चौरासी • • २२१ रस से ओत प्रोत हैं किन्तु इसमें जितने स्पष्ट और सरस रूप से किसी छटा की झाँकी कराई गयी है वह व्यञ्जना बड़ी ही अनोखी और अभूत पूर्व है। इस पद में रस के प्रकाश एवं विकास में श्रीहिताचार्य्य चरण ने जिस कुशल शैली का अनुवर्त्तन किया है वह अद्वितीय है। अस्तु; इसमें वर्णित विषय गोप्य है अतः इसका वर्णन कथन, श्रवण सब कुछ मौन में ही है। यह हृदय में ही अनुभव करने की वस्तु है. श्रीनागरीदासजी कहते हैं- चरचा करी कैसे जाय? बात जानत कछुक हम पै कहत जिय थरराय।। मौन में ही कहनि ताकी सुनत श्रोता नैन। सोऽब नागर लोग बूझत कहि न आवत बैन।। कितनी अटपटी है इस रस की भाषा? मौन में कथन और नयन हैं श्रोता ? जिस प्रकार यह गोप्य है, उसी प्रकार गूढ़ भी इतना है कि इसे प्रकाश करने में श्रोत्रिय और रस निष्ठ सभी महानुभाव असमर्थ हैं, किसी न किसी कारण से। फिर भी कृपालु महानुभावों ने अभिलाषी उपासकों को प्रकाश अवश्य दिया है। श्रीहित ध्रवदासजी ने इस रस विलास की ओर जो इङ्गित किया है उससे इस रस के हृदयङ्गम करने में सहायता मिलेगी अवश्य। वे कहते हैं- प्रेम मदन के सिंधु द्वै बहत रहत दिन हीय। कबहुँ विवस चेतत कबहुँ छिन छिन प्यारी पीय।। छिन छिन प्यारी पीय मधुर रस बिलसत ऐसे। सूच्छम प्रेम की बात कहौ कोऊ बरनै कैसे।। यह सुख सखियन बाँट पर्यौ भूले ध्रुव सब नेम। इक रस फूलीं फिरतिं सँग पाइ माधुरी प्रेम।। अस्तु; इस रस की दुरूहता, गम्भीरता, उत्कृष्ट्ता, अलौकिकता, एवं लोक वेदातीत भावना को लक्ष्य में रखकर प्रकाशन करने में समर्थ रहने पर
२२२ • • हित चौरासी भी प्रकाशित न करने की ही आज्ञाएँ सर्वत्र हैं। एक स्थल पर चाचा श्रीहित वृन्दावन दासजी ने आज्ञा दी है- होइ भावना सिद्ध ताहि उर अंतर राखै। मरमी हू सौं बात कछू मित ही की भाखै।। धरमी मरमी बिना कहै तो टोटो परिहै। विमुख करें उपहास चित्त-भावुक जु विगरिहै।। प्रानन प्यारी वस्तु दुरायें डोलैं जतननि। विमुख कूँजरनि हाथ गहावै जनि रस रतननि।। अतः रसिक उपासक का धर्म है कि इस दिव्य रस सार रति विहार का अपने हृदय में अनुभव करके गोप्य ही रखे, बिना अधिकारी के किसी अन्य को इसे न दे, न दे। — ६७ — अवतरण-श्रीहित सजनी अपनी सखियों से परम सौन्दर्यमयी, रूप लावण्यमती श्रीप्रियाजी के नख शिख शृङ्गार का वर्णन करती हैं- कल्याण मूल- रुचिर राजत वधू कानन किसोरी। सरस षोडस कियें, तिलक मृगमद दियें, मृगज लोचन उबटि अंग सिर खोरी।। गंड पंडीर मंडित चिकुर चंद्रिका, मेदिनि कबरि गुंथित सुरंग डोरी। श्रवन ताटंक कै, चिबुक पर बिंदु दै, कसूँभी कंचुकी दुरै उरज फल कोरी।। वलय कंकन दोति, नखन जावक जोति, उदर गुन रेख पट नील कटि थोरी। सुभग जघन स्थली क्वनित किंकिनि भली, कोक संगीत रस सिंधु झक झोरी।।
हित चौरासी • • २२३ विविध लीला रचित रहसि हरिवंश हित; रसिक सिरमौर राधा रमन जोरी। भृकुटि निर्जित मदन मंद सस्मित वदन, किये रस विवस घन स्याम पिय गोरी॥६७॥ भावार्थ - "हे सखि ! श्रीवृन्दा कानन की नव वधू किशोरी बड़ी भली शोभित हो रही है। उनके अङ्ग उबटन से उवट कर रस पूर्ण सोलहों शृङ्गार से पूर्ण किये गये हैं। ललाट पर कस्तूरी का तिलक और सिर पर खोरी शोभित हैं उनके स्वाभाविक सुन्दर मृग छौने से लोचन हैं। युगल किशोर पण्डीर (केशर कस्तूरी पङ्क) से आभूषित-सज्जित हैं। केशों की चन्द्रिका मेदिनि के पुष्पों से गूँथी गयी है तथा कबरी सुरङ्ग डोरी से आबद्ध (बँधी) है। उन्होंने अपने कानों में कर्णफूल धारण करके, ललित चिबुक पर (श्याम) विन्दु धारण किया है; और उनकी कसूँभी चोली में परम सुन्दर उरज फलों की किनारे मात्र ही ढँकी हैं। (बाहुओं में) बाजूबन्द, कलाइयों में कङ्कण की प्रभा और नख मणियों में महावर (जावक) की ज्योति छा रही है। उदर में वलखाती हुई तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, उन्होंने अपनी अत्यन्त क्षीण कटि पर नील पट धारण कर रखा है एवं सुन्दर सुभग जघन प्रान्त में कोक राग रागनियों की गायिका जैसी झनकार वाली करधनी शोभा पा रही है। स्पष्ट है कि यह किङ्किणि सुरत रस के समुद्र में अवश्य सराबोर हो चुकी है।" • श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद सखी रूप से) कहते हैं- यह श्रीराधा रमण श्रीलालजी की, रसिक शिरोमणि जोड़ी है। यह (एकान्त कुञ्ज में) अनेक अनेक रस लीलाओं की रचना करती रहती है और इसने अपनी भृकुटियों से तो मदन को जीत लिया है और मन्द मुसकान से इस युवती (गोरी) ने प्रियतम घनश्याम (श्रीकृष्ण) को रस विवश कर रखा है। टिप्पणी-"सरस षोडस" शृङ्गार रस में सोलह शृङ्गारों का स्थान बहुत ऊँचा है। इनका वर्णन विद्वानों के मतों में कुछ अन्तर से पाया जाता है। पिछले प्रसङ्ग में केशव कवि के मत से सोलह शृङ्गार लिखे गये हैं। यहाँ रसिक महात्मा श्रीभगवत रसिक जी के मतानुसार सोलह शृङ्गारों के केवल नाम मात्र दिये जाते हैं-
२२४ • • हित चौरासी सुचिता, सील, सनेह गति, चितवन, हास, विलास। कच गूँथनि, सीमंत सुभ, भाल तिलक सुख रास॥ भाल तिलक सुख रासि, दृगनि अंजन अति सोहै। बीरी वदन, सुदेस चिबुक मुसिकन मन मोहै॥ जावक, मँहदी, अंग राग, भगवत, नित रुचिता। ये सोरह श्रृंगार मुख्य तामैं वर सुचिता॥
- ६८ - अवतरण-इस पद में युगल किशोर के एकान्तिक रास नृत्य का वर्णन किया गया है। शरद की सुन्दर रात्रि में रसिक युगल किशोर ने रास क्रीड़ा की योजना की है। नाना प्रकार के वाद्य बज रहे हैं और युगल किशोर आनन्द मग्न होकर नृत्य कर रहे हैं। नृत्य की विविध प्रकार की गतियाँ लेते और घन दामिनि की भाँति एक मेक हो जाते हैं। श्रीहिताचार्य्य महाप्रभु इस रास रसोत्सव का वर्णन करते हैं- कल्याण मूल- रास में रसिक मोहन बने भामिनी। सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन, मत्त मधुकर निकर सरद की जामिनी॥ त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमनि दवन, तहाँ ठाढ़े रमन संग सत कामिनी। ताल बीना मृदंग सरस नाचत सुधंग; एक ते एक संगीत की स्वामिनी॥ राग रागिनि जमी विपिन वरसत अमी, अधर बिंबनि रमी मुरलि अभिरामिनी। लाग कट्टर उरप सप्त सुर सौं सुलप लेति सुंदर सुघर राधिका नामिनी॥ तत्त थेई थेई करत गतिव नौतन धरत, पलटि डगमग ढरति मत्त गज गामिनी।