ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९७
प्राणः= (वह) प्राण; पायूपस्थे= गुदा और उपस्थमें; अपानम् [ नियुङ्क्ते ] = अपानको रखता है; स्वयम्= स्वयं; मुखनासिकाभ्याम्= मुख और नासिकाद्वारा (विचरता हुआ); चक्षुःश्रोत्रे= नेत्र और श्रोत्रमें; प्रातिष्ठते= स्थित रहता है; तु मध्ये= और शरीरके मध्यभागमें; समानः= समान (रहता) है; एषः हि= यह (समान वायु) ही; एतत् हुतम् अन्नम्= इस प्राणाग्निमें हवन किये हुए अन्नको; समम् नयति= समस्त शरीरमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है; तस्मात्= उससे; एताः सप्त= ये सात; अर्चिषः= ज्वालाएँ (विषयोंको प्रकाशित करनेवाले ऊपरके द्वार); भवन्ति= उत्पन्न होती हैं॥ ५॥
व्याख्या— यह स्वयं तो मुख और नासिकाद्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्रमें स्थित रहता है तथा गुदा और उपस्थमें अपानको स्थापित करता है। उसका काम मल-मूत्रको शरीरके बाहर निकाल देना है; रज, वीर्य और गर्भको बाहर करना भी इसीका काम है। शरीरके मध्यभाग—नाभिमें समानको रखता है। यह समान वायुको ही प्राणरूप अग्निमें हवन किये हुए—उदरमें डाले हुए अन्नको अर्थात् उसके सारको सम्पूर्ण शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें यथायोग्य समभावसे पहुँचाता है। उस अन्नके सारभूत रससे ही इस शरीरमें ये सात ज्वालाएँ अर्थात् समस्त विषयोंको प्रकाशित करनेवाले दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएँ और एक मुख (रसना)—ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं; उस रससे पुष्ट होकर ही ये अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं॥ ५॥
सम्बन्ध— अब व्यानकी गतिका वर्णन किया जाता है—
हृदि ह्येष आत्मा अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां
द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु
व्यानश्चरति ॥ ६ ॥
एषः हि= यह प्रसिद्ध; आत्मा= जीवात्मा; हृदि= हृदयदेशमें रहता है; अत्र= इस (हृदय) में; एतत्= यह; नाडीनाम् एकशतम्= मूलरूपसे एक सौ नाडियोंका समुदाय है; तासाम्= उनमेंसे; एकैकस्याम्= एक-एक नाडीमें; शतम् शतम्= एक-
१९८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
एक सौ (शाखाएँ) हैं (प्रत्येक शाखा-नाडीकी); द्वासप्ततिः द्वासप्ततिः = बहत्तर-बहत्तर; प्रतिशाखानाडीसहस्राणि = हजार प्रतिशाखानाडियाँ; भवन्ति = होती हैं; आसु = इनमें; व्यानः = व्यानवायु; चरति = विचरण करता है॥ ६॥
व्याख्या— इस शरीरमें जो हृदयप्रदेश है, जो जीवात्माका निवासस्थान है, उसमें एक सौ मूलभूत नाडियाँ हैं; उनमेंसे प्रत्येक नाडीकी एक-एक सौ शाखा-नाडियाँ हैं और प्रत्येक शाखा-नाडीकी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा-नाडियाँ हैं। इस प्रकार इस शरीरमें कुल बहत्तर करोड़ नाडियाँ हैं; इन सबमें व्यानवायु विचरण करता है॥ ६॥
सम्बन्ध— अब उदानका स्थान और कार्य बतलाते हैं, साथ ही आश्वलायनके चौथे प्रश्नका उत्तर भी देते हैं—
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७॥
अथ = तथा; एकया = जो एक नाडी और है, उसके द्वारा; उदानः ऊर्ध्वः = उदानवायु ऊपरकी ओर; [ चरति ] = विचरता है; [ सः ] पुण्येन = वह पुण्यकर्मोंके द्वारा; [ मनुष्यम् ] = मनुष्यको; पुण्यम् लोकम् = पुण्यलोकोंमें; नयति = ले जाता है; पापेन = पापकर्मोंके कारण (उसे); पापम् [ नयति ] = पापयोनियोंमें ले जाता है (तथा); उभाभ्याम् एव = पाप और पुण्य दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा (जीवको); मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीरमें; [ नयति ] = ले जाता है॥ ७॥
व्याख्या— इन ऊपर बतलायी हुई बहत्तर करोड़ नाड़ियोंसे भिन्न एक नाडी और है जिसको ‘सुषुम्णा’ कहते हैं, जो हृदयसे निकलकर ऊपर मस्तकमें गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीरमें ऊपरकी ओर विचरण करता है। (इस प्रकार आश्वलायनके तीसरे प्रश्नका समाधान करके अब महर्षि उसके चौथे प्रश्नका उत्तर संक्षेपमें देते हैं—) जो मनुष्य पुण्यशील होता है, जिसके शुभकर्मोंके भोग उदय हो जाते हैं, उसे यह उदानवायु ही अन्य सब प्राण और इन्द्रियोंके सहित वर्तमान शरीरसे निकालकर पुण्यलोकोंमें अर्थात् स्वर्गादि उच्च लोकोंमें ले जाता
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् १९९
है। पापकर्मोंसे युक्त मनुष्यको शूकर-कूकर आदि पाप-योनियोंमें और रौरवादि नरकोंमें ले जाता है तथा जो पाप और पुण्य—दोनों प्रकारके कर्मोंका मिश्रित फल भोगनेके लिये अभिमुख हुए रहते हैं, उनको मनुष्य-शरीरमें ले जाता है*॥७॥ **सम्बन्ध—**अब दो मन्त्रोंमें आश्वलायनके पाँचवें और छठे प्रश्नका उत्तर देते हुए जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी बात भी स्पष्ट करते हैं—
**आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः।**
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः॥८॥
**ह=**यह निश्चय है कि; **आदित्यः वै=**सूर्य ही; **बाह्यः प्राणः=**बाह्य प्राण है; **एषः**
**हि=**यही; **एनम् चाक्षुषम्=**इस नेत्रसम्बन्धी; **प्राणम्=**प्राणपर; **अनुगृह्णानः=**अनुग्रह करता हुआ; **उदयति=**उदित होता है; **पृथिव्याम्=**पृथ्वीमें; **या देवता=**जो (अपानवायुकी शक्तिरूप) देवता है; **सा एषा=**वही यह; **पुरुषस्य=**मनुष्यके; **अपानम्=**अपान वायुको; **अवष्टभ्य=**स्थिर किये; [वर्तते]=रहता है; **अन्तरा=**पृथ्वी और स्वर्गके बीच; **यत् आकाशः=**जो आकाश (अन्तरिक्षलोक) है; **सः समानः=**वह समान है; **वायुः व्यानः=**वायु ही व्यान है॥८॥ **व्याख्या—**यह निश्चयपूर्वक समझना चाहिये कि सूर्य ही सबका बाह्य प्राण है। यह मुख्य प्राण सूर्यरूपसे उदय होकर इस शरीरके बाह्य अङ्ग- प्रत्यङ्गोंको पुष्ट करता है और नेत्र-इन्द्रियरूप आध्यात्मिक शरीरपर अनुग्रह
* एक शरीरसे निकलकर जब मुख्य प्राण उदानको साथ लेकर उसके द्वारा दूसरे शरीरमें जाता है, तब अपने अङ्गभूत समान आदि प्राणोंको तथा इन्द्रिय और मनको तो साथ ले ही जाता है, इन सबका स्वामी जीवात्मा भी उसीके साथ जाता है (गीता १५।८) यह बात यहाँ कहनी थी; इसीलिये पूर्व मन्त्रमें जीवात्माका स्थान हृदय बतलाया गया है एवं इसका स्पष्टीकरण १० वें मन्त्रमें किया गया है।
२०० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
करता है—उसे देखनेकी शक्ति अर्थात् प्रकाश देता है। पृथ्वीमें जो देवता अर्थात् अपानवायुकी शक्ति है, वह मनुष्यके भीतर रहनेवाले अपानवायुको आश्रय देती है—टिकाये रखती है। यह इस अपानवायुकी शक्ति गुदा और उपस्थ इन्द्रियोंकी सहायक है तथा इनके बाहरी स्थूल आकारको धारण करती है। पृथ्वी और स्वर्गलोकके बीचका जो आकाश है, वही समानवायुका बाह्य स्वरूप है। वह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंको अवकाश देकर इसकी रक्षा करता है और शरीरके भीतर रहनेवाले समानवायुको विचरनेके लिये शरीरमें अवकाश देता है; इसीकी सहायतासे श्रोत्र-इन्द्रिय शब्द सुन सकती है। आकाशमें विचरनेवाला प्रत्यक्ष वायु ही व्यानका बाह्य स्वरूप है, यह इस शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गको चेष्टाशील करता है और शान्ति प्रदान करता है; भीतरी व्यानवायुको नाडियोंमें संचारित करने तथा त्वचा-इन्द्रियको स्पर्शका ज्ञान करानेमें भी यह सहायक है॥८॥
तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥
ह तेजः वै = प्रसिद्ध तेज (गर्मी) ही; उदानः = उदान है; तस्मात् = इसीलिये; उपशान्ततेजाः = जिसके शरीरका तेज शान्त हो जाता है, वह (जीवात्मा); मनसि = मनमें; सम्पद्यमानैः = विलीन हुई; इन्द्रियैः = इन्द्रियोंके साथ; पुनर्भवम् = पुनर्जन्मको (प्राप्त होता है) ॥ ९ ॥
**व्याख्या—**सूर्य और अग्निका जो बाहरी तेज अर्थात् उष्णत्व है, वही उदानका बाह्य स्वरूप है। वह शरीरके बाहरी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंको ठंडा नहीं होने देता और शरीरके भीतरकी ऊष्माको भी स्थिर रखता है। जिसके शरीरसे उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर गरम नहीं रहता; अतः शरीरकी गर्मी शान्त हो जाते ही उसमें रहनेवाला जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके साथ-साथ दूसरे शरीरमें चला जाता है (गीता १५।८) ॥ ९॥
**सम्बन्ध—**अब आश्वलायनके चौथे प्रश्नमें आयी हुई एक शरीरसे निकलकर दूसरे शरीरमें या लोकोंमें प्रवेश करनेकी बातका पुनः स्पष्टीकरण किया जाता है—
प्रश्न ३ ] प्रश्नोपनिषद् २०१
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
एषः=यह (जीवात्मा); यच्चित्तः=जिस संकल्पवाला होता है; तेन=उस संकल्पके साथ; प्राणम्=मुख्य प्राणमें; आयाति=स्थित हो जाता है; प्राणः=मुख्य प्राण; तेजसा युक्तः=तेज (उदान) से युक्त हो; आत्मना सह=अपने सहित (मन, इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको); यथासंकल्पितम्= उसके संकल्पानुसार; लोकम्=भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें; नयति=ले जाता है ॥ १० ॥
व्याख्या—मरते समय इस आत्माका जैसा संकल्प होता है, इसका मन अन्तिम क्षणमें जिस भावका चिन्तन करता है (गीता ८।६), उस संकल्पके सहित मन, इन्द्रियोंको साथ लिये हुए यह मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदानवायुसे मिलकर अपने सहित मन और इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उस अन्तिम संकल्पके अनुसार यथायोग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनिमें ले जाता है। अतः मनुष्यको उचित है कि अपने मनमें निरन्तर एक भगवान्का ही चिन्तन रखे, दूसरा संकल्प न आने दे, क्योंकि जीवन अल्प और अनित्य है, न जाने कब अचानक इस शरीरका अन्त हो जाय। यदि उस समय भगवान्का चिन्तन न होकर कोई दूसरा संकल्प आ गया तो सदाकी भाँति पुनः चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़ेगा ॥ १० ॥
सम्बन्ध—अब प्राणविषयक ज्ञानका सांसारिक और पारलौकिक फल बतलाते हैं—
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
यः विद्वान्=जो कोई विद्वान्; एवम् प्राणम्=इस प्रकार प्राण (के रहस्य) को; वेद=जानता है; अस्य=उसकी; प्रजा=संतानपरम्परा; न ह हीयते=कदापि नष्ट नहीं होती; अमृतः=(वह) अमर; भवति=हो जाता है; तत् एषः=इस विषयका यह (अगला); श्लोकः=श्लोक (है) ॥ ११ ॥
२०२ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ३
**व्याख्या—**जो कोई विद्वान् इस प्रकार इस प्राणके रहस्यको समझ लेता है, प्राणके महत्त्वको समझकर हर प्रकारसे उसे सुरक्षित रखता है, उसकी अवहेलना नहीं करता, उसकी संतानपरम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य अमोघ और अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है। और वह यदि उसके आध्यात्मिक रहस्यको समझकर अपने जीवनको सार्थक बना लेता है, एक क्षण भी भगवान्के चिन्तनसे शून्य नहीं रहने देता, तो सदाके लिये अमर हो जाता है अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है। इस विषयपर निम्नलिखित ऋचा है— ॥ ११॥
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा। अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृत- मश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥
**प्राणस्य=**प्राणकी; **उत्पत्तिम्=**उत्पत्ति; **आयतिम्=**आगम; **स्थानम्=**स्थान; **विभुत्वम् एव=**और व्यापकताको भी; **च=**तथा; [ बाह्यम् ] **एव अध्यात्मम् पञ्चधा च=**बाह्य एवं आध्यात्मिक पाँच भेदोंको भी; **विज्ञाय=**भलीभाँति जानकर; अमृतम् अश्नुते=(मनुष्य) अमृतका अनुभव करता है; **विज्ञाय अमृतम् अश्नुते इति=**जानकर अमृतका अनुभव करता है। यह पुनरुक्ति प्रश्नकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है॥१२॥
**व्याख्या—**उपर्युक्त विवेचनके अनुसार जो मनुष्य प्राणकी उत्पत्तिको अर्थात् यह जिससे और जिस प्रकार उत्पन्न होता है—इस रहस्यको जानता है, शरीरमें उसके प्रवेश करनेकी प्रक्रियाका तथा इसकी व्यापकताका ज्ञान रखता है तथा जो प्राणकी स्थितिको अर्थात् बाहर और भीतर—कहाँ-कहाँ वह रहता है, इस रहस्यको तथा इसके बाहरी और भीतरी अर्थात् आधिभौतिक और आध्यात्मिक पाँचों भेदोंके रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, वह अमृतस्वरूप परमानन्दमय परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है तथा उस आनन्दमयके संयोग-सुखका निरन्तर अनुभव करता है॥ १२॥
॥ तृतीय प्रश्न समाप्त ३ ॥
चतुर्थ प्रश्न
अथ हैनं सौर्वायणी गार्ग्यः पप्रच्छ भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वप्नन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्यशयति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन् सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥
अथ=तदनन्तरः; ह एनम्=इन प्रसिद्ध महात्मा (पिप्पलाद मुनि) से; गार्ग्यः=गर्गगोत्रमें उत्पन्न; सौर्वायणी पप्रच्छ=सौर्वायणी ऋषिने पूछा; भगवन्=भगवन्!; एतस्मिन् पुरुषे=इस मनुष्य-शरीरमें; कानि स्वप्नन्ति=कौन-कौन सोते हैं; अस्मिन् कानि जाग्रति=इसमें कौन-कौन जागते रहते हैं; एषः कतरः देवः=यह कौन देवता; स्वप्नान् पश्यति=स्वप्नोंको देखता है; एतत् सुखम्=यह सुख; कस्य भवति=किसको होता है; सर्वे=(और) ये सब-के-सब; कस्मिन्=किसमें; नु=निश्चितरूपसे; सम्प्रतिष्ठिताः=सम्पूर्णतया स्थित; भवन्ति इति=रहते हैं, यह; (मेरा प्रश्न है) ॥ १ ॥
व्याख्या—यहाँ गार्ग्य मुनिने महात्मा पिप्पलादसे पाँच बातें पूछी हैं—(१) गाढ़ निद्राके समय इस मनुष्य-शरीरमें रहनेवाले पूर्वोक्त देवताओंमेंसे कौन-कौन सोते हैं? (२) कौन-कौन जागते रहते हैं? (३) स्वप्न-अवस्थामें इनमेंसे कौन देवता स्वप्नकी घटनाओंको देखता रहता है? (४) निद्रा-अवस्थामें सुखका अनुभव किसको होता है? और (५) ये सब-के-सब देवता सर्वभावसे किसमें स्थित हैं? अर्थात् किसके आश्रित हैं? इस प्रकार इस प्रश्नमें गार्ग्य मुनिने जीवात्मा और परमात्माका पूरा-पूरा तत्त्व पूछ लिया ॥ १ ॥
तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तंजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्मृशते नाभिवादते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥
२०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ प्रश्न ४ ]
तस्मै सः ह उवाच=उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षिने कहा; गार्ग्य=हे गार्ग्य!; यथा=जिस प्रकार; अस्तम् गच्छतः अर्कस्य=अस्त होते हुए सूर्यकी; सर्वाः मरीचयः=सब-की-सब किरणें; एतस्मिन् तेजोमण्डले=इस तेजोमण्डलमें; एकीभवन्ति=एक हो जाती हैं (फिर); उदयतः ताः=उदय होनेपर वे (सब); पुनः पुनः=पुनः-पुनः; प्रचरन्ति=सब ओर फैली रहती हैं; ह एवम् वै=ठीक ऐसे ही (निद्राके समय); तत् सर्वम्=वे सब इन्द्रियाँ (भी); परे देवे मनसि=परम देव मनमें; एकीभवति=एक हो जाती हैं; तेन तर्हि एषः पुरुषः=इस कारण उस समय यह जीवात्मा; न शृणोति=न (तो) सुनता है; न पश्यति=न देखता है; न जिघ्रति=न सँघता है; न रसयते=न स्वाद लेता है; न स्पर्शते=न स्पर्श करता है; न अभिवदते=न बोलता है; न आदते=न ग्रहण करता है; न आनन्दयते=न मैथुनका सुख भोगता है; न विस्जते=न मल-मूत्रका त्याग करता है (और); न इयायते=न चलता ही है; स्वपिति इति आचक्षते=उस समय 'वह सो रहा है' यों (लोग) कहते हैं ॥ २ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें महात्मा पिप्पलाद ऋषिने गार्ग्यके पहले प्रश्नका इस प्रकार उत्तर दिया है—'गार्ग्य! जब सूर्य अस्त होता है, उस समय उसकी सब ओर फैली हुई सम्पूर्ण किरणें जिस प्रकार उस तेजःपुञ्जमें मिलकर एक हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार गाढ़ निद्राके समय तुम्हारे पृष्ठे हुए सब देवता अर्थात् सब-की-सब इन्द्रियाँ उन सबसे श्रेष्ठ जो मनरूप देव है, उसमें विलीन होकर तद्रूप हो जाती हैं। इसलिये उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न चलता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न मैथुनका सुख ही भोगता है। भाव यह है कि उस समय दसों इन्द्रियोंका कार्य सर्वथा बंद रहता है। केवल लोग कहते हैं कि इस समय यह पुरुष सो रहा है।* उसके
- यहाँ सुषुप्तिकालमें मनका व्यापार चालू रहता है या नहीं, इस विषयमें कुछ नहीं कहा। सब इन्द्रियोंका मनमें विलीन हो जाना तो बताया गया; किंतु मन भी किसीमें विलीन हो जाता है—यह बात नहीं कही गयी। महर्षि पतञ्जलि भी निद्राको चित्तको एक वृत्ति मानते हैं (पा० यो० १।१०)। इससे तो यह जान पड़ता है कि मन विलीन नहीं होता। परंतु अगले मन्त्रमें पञ्चवृत्यात्मक प्राणको ही जागनेवाला बतलाया गया है, मनको नहीं; अतः मनका लय होता
प्रश्न ४ ]
प्रश्नोपनिषद्
२०५
जागनेपर पुनः वे सब इन्द्रियाँ मनसे पृथक् होकर अपना-अपना कार्य करने लगती हैं—टीक वैसे ही जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेपर उसकी किरणें पुनः सब ओर फैल जाती हैं ॥ २ ॥
सम्बन्ध— अब गार्यके प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर देकर दो मन्त्रोंद्वारा यह भी बतलाते हैं कि सब इन्द्रियोंके लय होनेपर मनकी कैसी स्थिति रहती है—
प्राणाग्रय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥
एतस्मिन् पुरे =इस शरीररूप नगरमें; प्राणाग्रयः एव =पाँच प्राणरूप अग्नियों ही; जाग्रति =जागती रहती हैं; ह एषः अपानः वै =यह प्रसिद्ध अपान ही; गार्हपत्यः =गार्हपत्य अग्नि है; व्यानः =व्यान; अन्वाहार्यपचनः =अन्वाहार्यपचन नामक अग्नि (दक्षिणाग्नि ) है; गार्हपत्यात् यत् प्रणीयते =गार्हपत्य अग्निसे जो उठाकर ले जायी जाती है (वह); आहवनीयः =आहवनीय अग्नि ; प्रणयनात् =प्रणयन (उठाकर ले जाये जाने) के कारण ही; प्राणः =प्राणरूप है ॥ ३ ॥
व्याख्या— उस समय इस मनुष्य-शरीररूप नगरमें पाँच प्राणरूप अग्नियों ही जागती रहती हैं। यह गार्यद्वारा पूछे हुए दूसरे प्रश्नका संक्षेपमें उत्तर है। यहाँ निद्राको यज्ञका रूप देनेके लिये पाँचों प्राणोंको अग्निरूप बतलाया है। यज्ञमें अग्निकी प्रधानता होती है, इसलिये यहाँ संक्षेपतः प्राणमात्रको अग्निके नामसे कह दिया। परंतु आगे इस यज्ञके रूपकमें किस प्राणवृत्तिकी किसके स्थानमें कल्पना करनी चाहिये, इसका स्पष्टीकरण करते हैं। कहना यह है कि शरीरमें जो प्राणकी अपान वृत्ति है, यही मानो उस यज्ञकी 'गार्हपत्य' अग्नि है; 'व्यान' दक्षिणाग्नि है, गार्हपत्य अग्निरूप अपानसे प्राण उठते हैं, इस
है या नहीं— यह बात स्पष्ट नहीं होती; क्योंकि पुनः चतुर्थ मन्त्रमें मनको यजमान बताकर उसके ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही गयी है। इससे यह कहा जा सकता है कि मनका भी लय हो जाता है।
२०६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
कारण मुख्य प्राण ही इस यज्ञकी कल्पनामें आहवनीय अग्नि है; क्योंकि यज्ञमें आहवनीय अग्नि गार्हपत्यसे उठाकर लायी जाती है। पहले तीसरे प्रश्नके प्रसङ्गमें भी प्राणको ‘अन्नरूप आहुति जिसमें हवन की जाती है’ इस व्युत्पत्तिद्वारा आहवनीय अग्नि ही बताया है (३।५)॥३॥
यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः। मनो ह वाव यजमानः। इष्टफलमेवोदानः। स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति॥४॥
यत् उच्छ्वासनिःश्वासौ=जो ऊर्ध्वश्वास और अधोश्वास हैं; एतौ=ये दोनों (मानो); आहुती=(अग्निहोत्रकी) दो आहुतियाँ हैं; [एतौ यः]=इनको जो; समम्=समभावसे (सब ओर); नयति इति सः समानः=पहुँचाता है इसलिये जो ‘समान’ कहलाता है, वही; [होता]=हवन करनेवाला ऋत्विक् है; ह मनः वाव=यह प्रसिद्ध मन ही; यजमानः=यजमान है; इष्टफलम् एव=अभीष्ट फल ही; उदानः=उदान है; सः एनम्=वह (उदान) ही इस; यजमानम् अहः अहः=मनरूप यजमानको प्रतिदिन (निद्राके समय); ब्रह्म गमयति=ब्रह्मलोकमें भेजता है अर्थात् हृदयगुहामें ले जाता है॥४॥
व्याख्या— यह जो मुख्य प्राणका श्वास-प्रश्वासके रूपमें शरीरके बाहर निकलना और भीतर लौट जाना है, वही मानो इस यज्ञमें आहुतियाँ पड़ती हैं। इन आहुतियोंद्वारा जो शरीरके पोषक-तत्त्व शरीरमें प्रवेश कराये जाते हैं, वे ही हवि हैं। उस हविको समस्त शरीरमें आवश्यकतानुसार समभावसे पहुँचानेका कार्य समान वायुका है; इसलिये उसे समान कहते हैं। वही इस रूपकमें मानो ‘होता’ अर्थात् हवन करनेवाला ऋत्विक् है। अग्निरूप होनेपर भी आहुतियोंको पहुँचानेका कार्य करनेके कारण इसे ‘होता’ कहा गया है। पहले बताया हुआ मन ही मानो यजमान है और उदानवायु ही मानो उस यजमानका अभीष्ट फल है; क्योंकि जिस प्रकार अग्निहोत्र करनेवाले यजमानको उसका अभीष्ट फल उसे अपनी ओर आकर्षित करके कर्मफल भुगतानेके
प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २०७
लिये कर्मानुसार स्वर्गादि लोकोंमें ले जाता है, उसी प्रकार यह उदानवायु मनको प्रतिदिन निद्राके समय उसके कर्मफलके भोगस्वरूप ब्रह्मलोकमें परमात्माके निवासस्थानरूप हृदयगुहामें ले जाता है। वहाँ इस मनके द्वारा जीवात्मा निद्राजनित विश्रामरूप सुखका अनुभव करता है; क्योंकि जीवात्माका निवासस्थान भी वही है, यह बात छठे मन्त्रमें कही है। यहाँ 'ब्रह्म गमयति' से यह बात नहीं समझनी चाहिये कि निद्राजनित सुख ब्रह्मप्राप्तिके सुखकी किसी भी अंशमें समानता कर सकता है; क्योंकि यह तो तामस सुख है और परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका सुख तीनों गुणोंसे अतीत है॥४॥
सम्बन्ध— अब तीसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं—
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति॥ ५॥
अत्र स्वप्ने= इस स्वप्न-अवस्थामें; एषः देवः= यह देव (जीवात्मा); महिमानम्= अपनी विभूतिका; अनुभवति= अनुभव करता है; यत् दृष्टम् दृष्टम्= जो बार-बार देखा हुआ है; अनुपश्यति= उसीको बार-बार देखता है; श्रुतम् श्रुतम् एव अर्थम् अनुशृणोति= बार-बार सुनी हुई बातोंको ही पुनः-पुनः सुनता है; देशदिगन्तरैः च= नाना देश और दिशाओंमें; प्रत्यनुभूतम्= बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको; पुनः पुनः= पुनः-पुनः; प्रत्यनुभवति= अनुभव करता है (इतना ही नहीं); दृष्टम् च अदृष्टम् च= देखे हुए और न देखे हुएको भी; श्रुतम् च अश्रुतम् च= सुने हुए और न सुने हुएको भी; अनुभूतम् च= अनुभव किये हुए और; अननुभूतम् च= अनुभव न किये हुएको भी; सत् च असत् च= विद्यमान और अविद्यमानको भी; (इस प्रकार) सर्वम् पश्यति= सारी घटनाओंको देखता है; (तथा) सर्वः [सन्]= स्वयं सब कुछ बनकर; पश्यति= देखता है॥ ५॥
व्याख्या— गार्ग्य मुनिने जो यह तीसरा प्रश्न किया था कि कौन देवता
२०८ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
स्वप्नोंको देखता है? उसका उत्तर महर्षि पिप्पलाद इस प्रकार देते हैं, इस स्वप्न-अवस्थामें जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियोंद्वारा अपनी विभूतिका अनुभव करता है। इसका पहले जहाँ-कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा, सुना और अनुभव किया हुआ है, उसीको यह स्वप्नमें बार-बार देखता, सुनता और अनुभव करता रहता है। परंतु यह नियम नहीं है कि जाग्रत्-अवस्थामें इसने जिस प्रकार, जिस ढंगसे और जिस जगह जो घटना देखी, सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्नमें भी अनुभव करता है। अपितु स्वप्नमें जाग्रत्की किसी घटनाका कोई अंश किसी दूसरी घटनाके किसी अंशके साथ मिलकर एक नये ही रूपमें इसके अनुभवमें आता है; अतः कहा जाता है कि स्वप्नकालमें यह देखे और न देखे हुएको भी देखता है, सुने और न सुने हुएको भी सुनता है, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी अनुभव करता है। जो वस्तु वास्तवमें है, उसे और जो नहीं है, उसे भी स्वप्नमें देख लेता है। इस प्रकार स्वप्नमें यह विचित्र ढंगसे सब घटनाओंका बार-बार अनुभव करता रहता है और स्वयं ही सब कुछ बनकर देखता है। उस समय जीवात्माके अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती॥ ५॥
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति॥ ६॥
सः यदा = वह (मन) जब; तेजसा अभिभूतः = तेज (उदानवायु) से अभिभूत; भवति = हो जाता है;* अत्र एषः देवः = इस स्थितिमें यह जीवात्मारूप देवता; स्वप्नान् = स्वप्नोंको; न पश्यति = नहीं देखता; अथ = तथा; तदा = उस समय; एतस्मिन् शरीरे = इस मनुष्य-शरीरमें (जीवात्माको); एतत् = इस; सुखम् = सुषुप्तिके सुखका अनुभव; भवति = होता है॥ ६॥
* पहले तीसरे प्रश्नोत्तर (३।९-१०) में बतला आये हैं कि उदानवायुका नाम तेज है। इस प्रकरणमें भी कहा गया है कि उदानवायु ही मनको ब्रह्मलोकमें अर्थात् हृदयमें ले जाता है, अतः यहाँ तेजसे अभिभूत होनेका अर्थ मनका उदानवायुसे आक्रान्त हो जाना है—यह बात समझनी चाहिये।
प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २०९
**व्याख्या—**गार्ग्य मुनिने चौथी बात यह पूछी थी कि 'निद्रामें सुखका अनुभव किसको होता है? उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—जब निद्राके समय यह मन उदानवायुके अधीन हो जाता है, अर्थात् जब उदानवायु इस मनको जीवात्माके निवासस्थान हृदयमें पहुँचाकर मोहित कर देता है, उस निद्रावस्थामें यह जीवात्मा मनके द्वारा स्वप्नकी घटनाओंको नहीं देखता। उस समय निद्राजनित सुखका अनुभव जीवात्माको ही होता है। इस शरीरमें सुख-दुःखोंको भोगनेवाला प्रत्येक अवस्थामें प्रकृतिस्थ पुरुष अर्थात् जीवात्मा ही है (गीता १३। २१)॥ ६॥
स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७॥
सः=(पाँचवीं बात जो तुमने पूछी थी) वह (इस प्रकार समझनी चाहिये); सोम्य=हे प्रिय; यथा=जिस प्रकार; वयांसि=बहुत-से पक्षी (सायंकालमें); वासोवृक्षम्=अपने निवासरूप वृक्षपर (आकर); सम्प्रतिष्ठन्ते=आरामसे ठहरते हैं (बसेरा लेते हैं); ह एवम् वै तत् सर्वम्=ठीक वैसे ही वे (आगे बताये जानेवाले पृथिवी आदि तत्त्वोंसे लेकर प्राणतक) सब-के-सब; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=सुखपूर्वक आश्रय पाते हैं॥ ७॥
**व्याख्या—**गार्ग्य मुनिने जो यह पाँचवीं बात पूछी थी कि 'ये मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और प्राण—सब-के-सब किसमें स्थित हैं—किसके आश्रित हैं।' उसका उत्तर महर्षि इस प्रकार देते हैं—प्यारे गार्ग्य! आकाशमें उड़नेवाले पक्षिगण जिस प्रकार सायंकालमें लौटकर अपने निवासभूत वृक्षपर आरामसे बसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले पृथ्वीसे लेकर प्राणतक जितने तत्त्व हैं, वे सब-के-सब परब्रह्म पुरुषोत्तममें, जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं; क्योंकि वे ही इन सबके परम आश्रय हैं॥ ७॥
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं
२१० ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ४
च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्श- यितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च॥ ८॥
पृथिवी च = पृथिवी और; पृथिवीमात्रा च = उसकी तन्मात्रा (सूक्ष्म गन्ध) भी; आपः च आपोमात्रा च = जल और रसतन्मात्रा भी; तेजः च तेजोमात्रा च = तेज और रूप-तन्मात्रा भी; वायुः च वायुमात्रा च = वायु और स्पर्श-तन्मात्रा भी; आकाशः च आकाशमात्रा च = आकाश और शब्द-तन्मात्रा भी; चक्षुः च द्रष्टव्यम् च = नेत्र-इन्द्रिय और देखनेमें आनेवाली वस्तु भी; श्रोत्रम् च श्रोतव्यम् च = श्रोत्र- इन्द्रिय और सुननेमें आनेवाली वस्तु भी; घ्राणम् च घ्रातव्यम् च = घ्राणेन्द्रिय और सूँघनेमें आनेवाली वस्तु भी; रसः च रसयितव्यम् च = रसना-इन्द्रिय और रसनाके विषय भी; त्वक् च स्पर्शयितव्यम् च = त्वक्-इन्द्रिय और स्पर्शमें आनेवाली वस्तु भी; वाक् च वक्तव्यम् च = वाक्-इन्द्रिय और बोलनेमें आनेवाला शब्द भी; हस्तौ च आदातव्यम् च = दोनों हाथ और पकड़नेमें आनेवाली वस्तु भी; उपस्थः च आनन्दयितव्यम् च = उपस्थ-इन्द्रिय और उसका विषय भी; पायुः च विसर्जयितव्यम् च = गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा परित्यागयोग्य वस्तु भी; पादौ च गन्तव्यम् च = दोनों चरण और गन्तव्य स्थान भी; मनः च मन्तव्यम् च = मन और मननमें आनेवाली वस्तु भी; बुद्धिः च बोद्धव्यम् च = बुद्धि और जाननेमें आनेवाली वस्तु भी; अहङ्कारः च अहङ्कर्तव्यम् च = अहंकार और उसका विषय भी; चित्तं च चेतयितव्यम् च = चित्त और चिन्तनमें आनेवाली वस्तु भी; तेजः च विद्योतयितव्यम् च = प्रभाव और उसका विषय भी; प्राणः च विधारयितव्यम् च = प्राण और प्राणके द्वारा धारण किये जानेवाले पदार्थ भी (ये सब-के-सब परमात्माके आश्रित हैं) ॥ ८॥
व्याख्या— इस मन्त्रमें यह बात कही गयी है कि स्थूल और सूक्ष्म
प्रश्न ४ ] प्रश्नोपनिषद् २११
पाँचों महाभूत, दसों इन्द्रियाँ और उनके विषय, चारों प्रकारके अन्तःकरण और उनके विषय तथा पाँच भेदोंवाला प्राणवायु—सब-के-सब परमात्माके ही आश्रित हैं। कहना यह है कि स्थूल पृथ्वी और उसका कारण गन्ध-तन्मात्रा, स्थूल जल-तत्त्व और उसका कारण रस-तन्मात्रा, स्थूल तेज-तत्त्व और उसका कारण रूप-तन्मात्रा, स्थूल वायु-तत्त्व और उसका कारण स्पर्श-तन्मात्रा, स्थूल आकाश और उसका कारण शब्द-तन्मात्रा—इस प्रकार अपने कारणोंसहित पाँचों भूत तथा नेत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा देखनेमें आनेवाली वस्तुएँ, श्रोत्र-इन्द्रिय और उसके द्वारा जो कुछ सुना जा सकता है वह सब, घ्राणेन्द्रिय और उसके द्वारा सूँघनेमें आनेवाले पदार्थ, रसना-इन्द्रिय और उसके द्वारा आस्वादनमें आनेवाले खट्टे-मीठे आदि सब प्रकारके रस, त्वचा-इन्द्रिय और उसके द्वारा स्पर्श करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, वाक्-इन्द्रिय और उसके द्वारा बोले जानेवाले शब्द, दोनों हाथ और उनके द्वारा पकड़नेमें आनेवाली सब वस्तुएँ, दोनों पैर और उनके गन्तव्य स्थान, उपस्थ-इन्द्रिय और मैथुनका सुख, गुदा-इन्द्रिय और उसके द्वारा त्यागा जानेवाला मल, मन और उसके द्वारा मनन करनेमें आनेवाले सब पदार्थ, बुद्धि और उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले सब पदार्थ, अहंकार और उसका विषय, चित्त और चित्तके द्वारा चिन्तनमें आनेवाले पदार्थ, प्रभाव और प्रभावसे प्रभावित होनेवाली वस्तु एवं पाँच वृत्तिवाला प्राण और उसके द्वारा जीवन देकर धारण किये जानेवाले सब शरीर—ये सब-के-सब इसके कारणभूत परमेश्वरके ही आश्रित हैं॥ ८॥
एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९॥
एषः=यह जो; द्रष्टा स्प्रष्टा=देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला; श्रोता घ्राता=सुननेवाला, सूँघनेवाला; रसयिता मन्ता=स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला; बोद्धा कर्ता=जाननेवाला तथा कर्म करनेवाला; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप; पुरुषः=पुरुष (जीवात्मा) है; सः हि=वह भी; अक्षरे=अविनाशी; परे आत्मनि=परमात्मामें; सम्प्रतिष्ठते=भलीभाँति स्थित है॥ ९॥
| २१२ | ईशादि नौ उपनिषद् | [ प्रश्न ४ |
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**व्याख्या—**देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघनेवाला, स्वाद लेनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनके द्वारा समस्त कर्म करनेवाला जो यह विज्ञानस्वरूप पुरुष—जीवात्मा है, यह भी उन परम अविनाशी सबके आत्मा परब्रह्म पुरुषोत्तममें ही स्थिति पाता है। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर ही इसे वास्तविक शान्ति मिलती है; अतः इसके भी परम आश्रय वे परमेश्वर ही हैं॥ ९॥
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य। स सर्वज्ञः सर्वो भवति। तदेष श्लोकः॥ १०॥
ह यः वै=निश्चय ही जो कोई भी; तत् अच्छायम्=उस छायारहित; अशरीरम्=शरीररहित; अलोहितम्=लाल, पीले आदि रंगोंसे रहित; शुभ्रम् अक्षरम्=विशुद्ध अविनाशी पुरुषको; वेदयते=जानता है; सः=वह; परम् अक्षरम् एव=परम अविनाशी परमात्माको ही; प्रतिपद्यते=प्राप्त हो जाता है; सोम्य=हे प्रिय!; यः तु [एवम्]=जो कोई ऐसा है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ (और); सर्वः भवति=सर्वरूप हो जाता है; तत् एषः=उस विषयमें यह (अगला); श्लोकः=श्लोक है॥ १०॥
**व्याख्या—**यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि जो कोई भी मनुष्य उन छायारहित, शरीररहित, लाल-पीले आदि सब रंगोंसे रहित, विशुद्ध अविनाशी परमात्माको जान लेता है, वह परम अक्षर परमात्माको ही प्राप्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हे सोम्य! जो कोई भी ऐसा है, अर्थात् जो भी उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है, वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है। इस विषयमें निम्नलिखित ऋचा है॥ १०॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः
प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र।
प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१३
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य
स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥
यत्र=जिसमें; प्राणाः=समस्त प्राण (और); भूतानि च=पाँचों भूत तथा; सर्वैः देवैः सह=सम्पूर्ण इन्द्रिय और अन्तःकरणके सहित; विज्ञानात्मा=विज्ञानस्वरूप आत्मा; सम्प्रतिष्ठन्ति=आश्रय लेते हैं; सोम्य=हे प्रिय!; तत् अक्षरम्=उस अविनाशी परमात्माको; यः तु वेदयते=जो कोई जान लेता है; सः सर्वज्ञः=वह सर्वज्ञ है; सर्वम् एव=(वह) सर्वस्वरूप परमेश्वरमें; आविवेश=प्रविष्ट हो जाता है; इति=इस प्रकार (इस प्रश्नका उत्तर समास हुआ) ॥ ११ ॥
व्याख्या—सबके परम कारण जिन परमेश्वरमें समस्त प्राण और पाँचों महाभूत तथा समस्त इन्द्रियाँ और अन्तःकरणके सहित स्वयं विज्ञानस्वरूप जीवात्मा—ये सब आश्रय लेते हैं, उन परम अक्षर अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है तथा सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह चतुर्थ प्रश्न समास हुआ ॥ ११ ॥
॥ चतुर्थ प्रश्न समाप्त ४॥
पञ्चम प्रश्न
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ। स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत। कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥
अथ ह एनम्=उसके बाद इन ख्यातनामा महर्षि पिप्पलादसे; शैब्यः सत्यकामः=शिबिपुत्र सत्यकामने; पप्रच्छ=पूछा; भगवन्=भगवन्; मनुष्येषु=मनुष्योंमेंसे; सः यः ह वै=वह जो कोई भी; प्रायणान्तम्=मृत्युपर्यन्त; तत् ओंकारम्=उस ओंकारका; अभिध्यायीत=सदा भलीभाँति ध्यान करता है; सः तेन=वह उस
२१४ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५
उपासनाके बलसे; कतमम् लोकम्=किस लोकको; वाव जयति=निस्संदेह जीत लेता है; इति=यह (मेरा प्रश्न है)॥ १॥
**व्याख्या—**इस मन्त्रमें सत्यकामने ओंकारकी उपासनाके विषयमें प्रश्न किया है। उसने यही जिज्ञासा की है कि जो मनुष्य आजीवन सदा ओंकारकी भलीभाँति उपासना करता है, उसे उस उपासनाके द्वारा कौन-से लोककी प्राप्ति होती है, अर्थात् उसका क्या फल मिलता है॥ १॥
तस्मै स होवाच एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः। तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥ २॥
तस्मै सः ह उवाच=उससे उन प्रसिद्ध महर्षिने कहा; सत्यकाम=हे सत्यकाम; एतत् वै=निश्चय ही यह; यत् ओंकारः=जो ओंकार है; परम् ब्रह्म च अपरम् च=(वही) परब्रह्म और अपरब्रह्म भी है; तस्मात्=इसलिये; विद्वान्=इस प्रकारका ज्ञान रखनेवाला मनुष्य; एतेन एव=इस एक ही; ायतनेन=अवलम्बसे (अर्थात् प्रणवमात्रके चिन्तनसे); एकतरम्=अपर और परब्रह्ममेंसे किसी एकका; अन्वेति=(अपनी श्रद्धाके अनुसार) अनुसरण करता है॥ २॥
**व्याख्या—**इसके उत्तरमें महर्षि पिप्पलाद 'ओम्' इस अक्षरकी उसके लक्ष्यभूत परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ एकता करते हुए कहते हैं—सत्यकाम! यह जो 'ॐ' है, वह अपने लक्ष्यभूत परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। इसलिये यही परब्रह्म है और यही उन परब्रह्मसे प्रकट हुआ उनका विराट्स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है।* केवल इसी एक ओंकारका जप, स्मरण और चिन्तन करके उसके द्वारा अपने इष्टको चाहनेवाला विज्ञानसम्पन्न मनुष्य उसे पा लेता है। भाव यह है कि जो मनुष्य परमेश्वरके विराट्स्वरूप—इस जगत्के ऐश्वर्यमय किसी भी अङ्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे ओंकारकी उपासना करता है, वह अपनी भावनाके अनुसार विराट्स्वरूप परमेश्वरके किसी एक अङ्गको प्राप्त
* कठोपनिषद् १। २। १६ में भी यही बात कही है, वहाँ 'अपरम्' विशेषण नहीं दिया है।
प्रश्न ५ ] प्रश्नोपनिषद् २१५
करता है और जो इसके अन्तर्यामी आत्मा पूर्ण ब्रह्म पुरुषोत्तमको लक्ष्य बनाकर उनको पानेके लिये निष्कामभावसे इसकी उपासना करता है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तमको पा लेता है। यही बात अगले मन्त्रोंमें भी स्पष्ट की गयी है॥ २॥
स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते। तमृचो मनुष्यलोकमपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति॥ ३॥
सः यदि = वह उपासक यदि; एकमात्रम् = एक मात्रासे युक्त ओंकारका; अभिध्यायीत = भलीभाँति ध्यान करे तो; सः तेन एव = वह उस उपासनासे ही; संवेदितः = अपने ध्येयकी ओर प्रेरित किया हुआ; तूर्णम् एव = शीघ्र ही; जगत्याम् = पृथ्वीमें; अभिसम्पद्यते = उत्पन्न हो जाता है; तम् ऋचः = उसको ऋग्वेदकी ऋचाएँ; मनुष्यलोकम् = मनुष्य-शरीर; उपनयन्ते = प्राप्त करा देती हैं; तत्र सः = वहाँ वह उपासक; तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नः = तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न होकर; महिमानम् = महिमाका; अनुभवति = अनुभव करता है॥ ३॥
व्याख्या— ओंकारका चिन्तन करनेवाला मनुष्य यदि विराट् परमेश्वरके भूः, भुवः और स्वः—इन तीनों रूपोंमेंसे भूलोकके ऐश्वर्यमें आसक्त होकर उसकी प्राप्तिके लिये ओंकारकी उपासना करता है तो वह मरनेके बाद अपने प्रापणीय ऐश्वर्यकी ओर प्रेरित होकर तत्काल पृथ्वीलोकमें आ जाता है। ॐकारकी पहली मात्रा ऋग्वेदस्वरूपा है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध है; अतः उसके चिन्तनसे साधकको ऋग्वेदकी ऋचाएँ पुनः मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट करा देती हैं। वह उस नवीन मनुष्य-जन्ममें तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धासे सम्पन्न उत्तम आचरणोंवाला श्रेष्ठ मनुष्य बनकर अतिशय ऐश्वर्यका उपभोग करता है, अर्थात् उसे नीची योनियोंमें नहीं भटकना पड़ता, वह मरनेके बाद मनुष्य होकर पुनः शुभ कर्म करनेमें समर्थ हो जाता है और वहाँ नाना प्रकारके सुखोंका उपभोग करता है॥ ३॥
२१६ ईशादि नौ उपनिषद् [ प्रश्न ५
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥
अथ यदि=परंतु यदि; द्विमात्रेण=दो मात्राओंसे युक्त (ओंकारका); [ अभिध्यायीत ]=अच्छी प्रकार ध्यान करता है तो (उससे); मनसि=मनोमय चन्द्रलोकको; सम्पद्यते=प्राप्त होता है; सः यजुर्भिः=वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षमें स्थित; सोमलोकम्=चन्द्रलोकको; उन्नीयते=ऊपरकी ओर ले जाया जाता है; सः सोमलोके=वह चन्द्रलोकमें; विभूतिम्=वहाँके ऐश्वर्यका; अनुभूय=अनुभव करके; पुनः आवर्तते=पुनः इस लोकमें लौट आता है॥ ४॥
व्याख्या— यदि साधक दो मात्रावाले ओंकारकी उपासना करता है; अर्थात् उस विराट्स्वरूप परमेश्वरके अङ्गभूत भूः (मनुष्यलोक) और भुवः (स्वर्गलोक)—इन दोनोंके ऐश्वर्यकी अभिलाषासे—उसीको लक्ष्य बनाकर ओंकारकी उपासना करता है तो वह मनोमय चन्द्रलोकको प्राप्त होता है; उसको यजुर्वेदके मन्त्र अन्तरिक्षमें ऊपरकी ओर चन्द्रलोकमें पहुँचा देते हैं। उस विनाशशील स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके ऐश्वर्यका उपभोग करके अपनी उपासनाके पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाता है। वहाँ उसे अपने पूर्वकर्मानुसार मनुष्य-शरीर या उससे कोई नीची योनि मिल जाती है॥ ४॥
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा। विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥
पुनः यः=परंतु जो; त्रिमात्रेण=तीन मात्राओंवाले; ओम् इति=ओमरूप; एतेन अक्षरेण एव=इस अक्षरके द्वारा ही; एतम् परम् पुरुषम्=इस परम पुरुषका;