ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
अ.-२, आ.-३, का.-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२९ सौगतैः पञ्चावयवत्वादि दूष्येते तदाग्रहमात्रं, षोडशसु हि पदार्थेषु निरूप्यमाणेषु सम्यक् प्रतिपाद्यं परः प्रतिपद्यते, 'हिताहितप्राप्तिपरिहारयोः' इत्यादिना च ग्रन्थेन । परस्य किं प्रयोजनं, तद्धि तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह ये सोलह पदार्थ दिखाये हैं वे सभी परमार्थ सद्रूप ही हैं। जिनमें सौगतों ने पञ्च अवयवों ( प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण-उपनयन- निगमन ) का खण्डन किया है वह तो उन लोगों का आग्रह मात्र है; क्योंकि षोडश प्रमाणादि पदार्थों के निरूपण करने पर ही पदार्थों की यथार्थता भली भाँति अर्जित कर सकता है। जिसे कि 'हिताहितप्राप्तिपरिहारयोः' इत्यादि प्रतीक ग्रन्थ से प्रारम्भ किया जाता है। दूसरे का क्या प्रयोजन है ? दूसरे का प्रयोजन तो ज्ञान करना ही है और वह परार्थ अनुमान से ही संभव हो सकता है उसमें पाँचों अवयवों का प्रयोजन आता ही है, प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण आदि का उपयोग दूसरे के पक्ष का खण्डन होता है वही जल्प है। १२. अपने पक्ष की स्थापना से रहित केवल परपक्ष का खण्डन वितण्डा कहलाता है । १३. जो हेतु नहीं है उसमें हेतु की तरह आभासित होनेवाले का नाम हेत्वाभास है। १४. वादी के वचन का विरोध कर वादी के अभीष्ट अर्थ की विपरीत कल्पना कर देना छल कहलाता है। १५. साध्य साधनरूप व्याप्ति का विचार न कर केवल समान तथा विरुद्ध धर्मों से प्रतिपक्षी का खण्डन करनेवाले असदुत्तर को जाति कहा जाता है । १६. वादी प्रतिवादी का पदार्थों के प्रति असत्यज्ञान अथवा विपरीतज्ञान निग्रहस्थान नाम से जाना जाता है। १. बौद्धों के सिद्धान्त में सब कुछ क्षणिक होने के कारण पञ्चावयव की अपेक्षा नहीं रहती है। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण, इन्हीं तीनों को व्याप्ति ज्ञान के लिए पर्याप्त मानते हैं वह ठीक नहीं है। परो मद्रचनादेव तमर्थं बुध्यतामिति । वक्ता स्वप्रत्ययेनेदं नहि वाक्यं प्रयुज्यते ॥ किन्त्वेनमनुमानेन बोधयामीति मन्यते । सोऽपि तद्वचनान्नैव तमर्थमवबुध्यते ॥ किन्तु व्याप्तिमतो लिङ्गात् स्वयं तत्तु न पश्यति । तत्प्रतीत्यभ्युपायतवात् परार्थमिदमुच्यते ॥ दूसरे लोग मेरे वाक्य से ही उस अर्थ को भली-भाँति अवगत कर ले अपने ज्ञान से वक्ता इस वाक्य को नहीं प्रयुक्त करता है। किन्तु अनुमान से उस व्यक्ति को अवगत करता हूँ ऐसा मानता है। वह भी मेरे वचन से ही उस अर्थ को जान लेता है किन्तु व्याप्ति वाले लिङ्ग ( हेतु ) से स्वयं उस अर्थ को नहीं देखता है। व्याप्तिवाले लिङ्ग की प्रतीति में साधक होने के कारण यह परार्थ अनुमान कहा जाता है। इसलिए प्रतिज्ञादि पञ्चावयव वाक्य अपरिहार्य है । हित-अहित अर्थात् हित अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति करने की इच्छा करता हुआ एवं अहित वस्तु को छोड़ने की इच्छा रखता हुआ कार्य में प्रवृत्त होना ही प्रयोजन है 'यमर्थमुद्दिश्य पुरुषः प्रवर्तते तत्प्रयोजनम्' अर्थात् जिस अर्थ को लक्ष्य कर पुरुष क्रिया करने के लिए प्रवर्तित होता है वही प्रयोजन कहलाता है । तब तो वह स्वार्थ ही हुआ, न कि परार्थ-ऐसा कहा गया है, इसमें दूसरे का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? ऐसा प्रतिवादी आक्षेप करता है। दूसरे को अच्छी तरह ज्ञान हो जाना ही प्रयोजन है। यह कहा गया है कि प्रयोजन से ज्ञान होता है और ज्ञान से प्रवृत्ति देखी जाती है । प्रतिपादन किये गये सोलह पदार्थों में हेय उपादेता की सिद्धि परार्थ अनुमान के कारण होने से शास्त्र में परार्थ अनुमान कहा जाता है ।
परस्य प्रतिपत्तयै, सा च परार्थानुमानात्, तत्र च प्रतिज्ञादेरुपयोगः, — इति, तत् परिपूर्णपरप्रति- पत्तिकारि परमार्थतः सकलमेव शास्त्रं परार्थानुमानम् आगमव्यतिरिक्तं न्यायनिर्माणवेधसाक्षपादेन निरूपितम्, — इति । अत्रापि पूर्वोक्तमेव 'किन्तु मोहवशात्' (१।१।३) इति स्मारयितुमाह — अप्रवर्तितपूर्वोऽत्र केवलं मूढतावशात् । शक्तिप्रकाशेनेशादिव्यवहारः प्रवर्त्यते ॥ १७ ॥ इह परमेश्वरस्येदमेव परं स्वातन्त्र्यं — यत् अस्मादृशे प्राच्यपशुदशाविशेषासम्भाव्यमानाति दुष्करवस्तुसम्पादनं नाम । इतश्च किम् अतिदुष्करं भविष्यति, — यत्प्रकाशात्मनि अखण्डित- ताद्रूप्ये एव प्रकाशमाने प्रकाशननिषेधावभासः प्रकाशमानः । तस्मात् परमेश्वरस्येदं तत्परं स्वातन्त्र्यं यत् तथाभासनं पशुरूपतावभासनं नाम ग्राहकांशसमुत्थापनं, तद्वारेण च ग्राह्योल्ला- सनमपि । सैषा भगवतो मायाशक्तिरुच्यते । यथोक्तम् — 'माया विमोहिनी नाम............' इति । तदेवं-भूतान्मायाशक्तिरूपात् स्वातन्त्र्यात् या मूढता विनष्टपूर्णचेतनता स्वात्मवर्तिन इच्छास्पन्दो- दयस्फुटस्फुरितविश्वभाव निर्भरितात्मनः पूर्णत्वस्य, स्मृत्यादिशक्त्यात्मनः स्वातन्त्र्यस्य, देशकाल- संकोचवैकल्यात् अयत्नसिद्धवैभवनित्यतार्थमस्य च प्रकाशमानस्यापि यदप्रकाशमानतया अभि- मननं, तस्या वशात् सामर्थ्यात् पूर्वं यो न प्रवर्तितः समनन्तरश्लोकद्वयोक्तस्वरूपे प्रमातरि भगवति ईश्वरत्वादिना उक्तेनैव पूर्णत्वादिना व्यवहारो यः खलु 'अहम्' इति भाति स पूर्णः विभुः स्वतन्त्रो भी होता है; क्योंकि इसमें तो दूसरे को ठीक-ठीक ज्ञान करना है। सारा का सारा शास्त्र परार्थ अनुमान के रूप में ही है जिसका आगम से भिन्न न्यायनिर्माण के प्रणेता अक्षपाद गौतम ने निरूपण किया है, यह भी पहले कह चुके है 'किन्तु मोहवशात्' (१-१-३) उसीका स्मरण कराने के लिए कहते हैं— जब कि पहले मूढ़ता के कारण यहाँ पर नहीं है वही सम्प्रति शक्तिपात हो जाने से ईश्वर इत्यादि का व्यवहार प्रवर्तित किया जाता है ॥ १७ ॥ यही परमेश्वर का परम स्वातन्त्र्य है जो कि हमलोगों के जैसे पहले पशु दशा विशेष में नहीं होनेवाले दुष्कर पदार्थ का सम्पादन करना। और इससे बढकर दुष्कर अन्य क्या हो सकता है ? अखण्डित सद्रूप प्रकाशमान ईश्वर के प्रकाशित होने पर भी अप्रकाश की कल्पना करते रहना, परमेश्वर का यही सर्वश्रेष्ठ स्वातन्त्र्य है कि अपने में पशुरूपता का अवभास करना और ग्राहक अंश का उत्थान करना एवं उसी के द्वारा ग्राह्य भाग का भी उत्थान करना यही भगवान् की माया-शक्ति है, इस विषय में कहा है कि—'माया विमोहिनी नाम......।' इस प्रकार माया-शक्ति के रूप में ईश्वर का जो स्वातन्त्र्य है उससे प्राणी को मूढ़ता प्राप्त होती है जिसमें चेतना का विनाश हो जाता है। और इच्छा-स्पन्द का उदय प्रस्फुटित होकर सारे विश्वभाव को निर्भासित करता रहता है। उस पूर्णता का और स्मृति आदि शक्तिरूप स्वातन्त्र्य का एवं देश-काल के सङ्कोचरूपी विकलता से बिना किसी प्रयास से, स्वाभाविक नित्यता रूप धर्म का प्रकाश बना रहता है और उसकी भी मूढता के कारण ही अप्रकाशमानता हो जाती है। जो पहले नहीं था, उसे दो श्लोकों से कह दिये। ईश्वररूप प्रमाता में जिस पूर्णता और ईश्वरता का व्यवहार होता था एवं पूर्ण 'अहं' का स्वतन्त्रपूर्ण नित्य प्रकाश था, जिसके लिए कहा जाता था
नित्यः, – इत्येवमादिरूपः, तं प्रवर्तयन्तु व्यवहारं लोका इति । एतेन शक्तीनाम् इच्छाज्ञानक्रियाणां प्रकाशकेन प्रत्यभिज्ञारूपेण व्यवहारसाधनपरार्थानुमानात्मना शास्त्रेण तं व्यवहारं प्रवर्तयतां तत्समर्थाचरणं क्रियते । ‘प्रवर्त्यते’ इति द्वौ णिचौ । केवलमिति न तु किंचिदपूर्वं क्रियते, नापि तत्त्वतोऽप्रकाशमानं प्रकाश्यते, प्रकाशमान एव यत् ‘न प्रकाशते’ इत्यभिमननं तदपसार्यते । तदपसरणमेव हि परमेश्वरतालाभो मुक्तिः, तदनपसरणमेव संसारः, अभिमननमात्रसारं हि एतद्द्वयं, उभयमपि चेदं भगवद्विजृम्भितमेव । एतदुक्तं भवति–यथा भौतस्य भासमाने एवात्मनि ‘अपहारितोऽहम्’ इति मोहान्मन्यमानस्य मोहोऽपसार्यते, –कः खलु त्वं ?, यस्येदृशं वस्त्रं मुखमी- दृशम्,–इति चेत्, पश्य तदस्ति भवतः–इति पुनः पुनरभिदधता न च अस्य अपूर्वं किंचन रचितं, तथा पशुलोकस्य भासमान एव आत्मनि ‘नाहमीश्वरः’ इत्यादि मोहादभिमन्यतो मोहोऽपोह्यते । यो हि ज्ञानक्रियास्वातन्त्र्ययुक्तः स ईश्वरो यथा सिद्धान्तपुराणादिषु प्रसिद्धः तथा च त्वम्–इति । यदि वा यस्मिन् यदायत्तं स तत्रेश्वरो राजेव स्वमण्डले, तथा च त्वयि विश्वम्,– इति ईश्वरताव्यवहारो नान्यनिमित्तकः,–इति व्याप्तिः । यत् खलु यल्लग्नं भाति तत्तेन पूर्णं निधानमिव मणिभिः, त्वल्लग्नं च विश्वम्,–इति । यस्य यदन्तर्वर्ति भाति, स तावति व्यापकः समुद्ग इव मणिषु, त्वयि च संविद्रूपे धरादिसदाशिवान्तं शास्त्रप्रक्रियोक्तं विश्वम्,–इति । कि लोग उस व्यवहार को करें और उसीसे इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन शक्तियों के प्रत्यभिज्ञारूप प्रकाश से व्यवहार साधन अनुमानरूप शास्त्र से व्यवहारकरनेवाले के साथ समुचित आचरण किया जाता है । ‘प्रवर्त्यते’ इसमें दो ‘णिच्’ दिये गये हैं । इसमें कोई नया विषय नहीं उत्पन्न हो रहा है । किन्तु केवल पूर्व का प्रवर्तन ही होता है, इसलिए ठीक-ठीक अप्रकाशमान प्रकाशित भी नहीं है ! प्रकाशमान ही प्रकाशित होता है, नहीं प्रकाशित होता है इस अभिमान को दूर कर दिया जाता है; क्योंकि उसका दूरीकरण करना ही परमेश्वर प्राप्तिरूप मुक्ति है और दूरीकरण न करना ही संसार माना जाता है, ये दोनों ही अभिमान पर निर्भर करते हैं और ये दोनों ही परमेश्वर के विलास हैं । इसका निष्कर्ष यह होगा कि जब पदार्थों का भास होता है ‘अपहारि- तोऽहम्’ सचमुच मैं ठगा गया हूँ । जैसे भूत से ग्रस्त आत्मा जब भासित होगा तब मैं अपने रूप में नहीं हूँ–इस प्रकार मोह वशात् जो उस समय अपने आपको मुग्ध समझता है, उसके मोह को दूर कर देने पर तुम कौन हो बताओ ? जिसका ऐसा मुख है और इस तरह का वस्त्र है, देखो, वह है तुम्हारे जैसा; जब कहा जाता है तब कोई नयी चीज नहीं होती । पूर्व का ही विषय पुनरावर्तन करता है कि ‘मैं ईश्वर नहीं हूँ’ इत्यादि इस प्रकार मोह से ग्रस्त हुए का मोह दूर कर दिया जाता है; क्योंकि जो ज्ञान-क्रियारूप स्वातन्त्र्य है, उससे युक्त रहता है, वही ईश्वर कहलाता है । जैसा कि शास्त्र सिद्धान्त पुराणों में दिखलाया गया है वैसा ही तुम हो, जैसे राजा अपने राज्यमण्डल का स्वामी रहता है, उसी प्रकार तुम्हारे में यह सारा विश्व भरा हुआ है । तुम उसके स्वामी हो, अपने को ईश्वर समझो, इसमें दूसरा कोई निमित्त नहीं है । जिसमें संलग्न हुआ वह सोचता हुआ है उसी से पूर्ण होता है । जैसे–मणियोँ से आकर, उसी प्रकार तुम्हारे में भी यह सारा विश्व है । जिसका जितना ही आन्तर आभास है, वह उतना ही व्यापक होता है । जैसा–मणियोँ का डिब्बा और तुम्हारे में भी पृथ्वि से लेकर शिवतत्त्व पर्यन्त शास्त्रीय संविद्रूप प्रक्रिया से प्रतिपादित सारा का सारा तत्त्व विद्यमान है । जिसके रहने पर ही उदय
२३२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-३, का.-१७
यस्मिन् स्थिते यदुदेति लीयते च तत् तत्पूर्वापरभागव्यापि यथा भूमावङ्कुरः, तथा च त्वयि प्रकाशरूपे विश्वम्,—इति । एवम् अन्येऽपि धर्माः सहस्रशोऽपि आगमादिसिद्धा योज्याः । तदेवं व्यपोहिते व्यामोहे, स्थितेऽपि तत्संस्कारमात्रविधृते शरीरादौ अनात्मताभिमानपुरःसर एवात्मता- भिमाने, घटादौ च प्रकाशमान एवानात्मताभिमाने ज्ञातेन्द्रजालतत्त्वस्य पश्यतोऽपि इन्द्रजालं यथा न तत्त्वतो व्यामोहः तथा प्रत्यभिज्ञातात्मस्वरूपस्य, ततो निवृत्ते प्रयाणप्रापितपर्यन्ते देहे परमेश्वरतैव । अभ्यासभावनाबलेन तु शिवशासनोपदिष्टेन देहघटादावेव परमेश्वरतासमावेशभिनि- विश्यपश्यत इहैव शरीरे पारमेश्वर्यांशधर्मोद्गमः, न तु वस्तुतः पूर्णता, देहत्वस्यैव संकोचप्राणस्य गलने यथास्थितविश्वात्मकतापत्तेः । यस्य तु व्यवहारसाधने हेतुकलापेऽपि असिद्धताभिमानः, तस्य तत्रापि व्यवहारसाधनैरेव व्यामोहोपसार्यः । यस्य तु सर्वथा नापसरति, तत्रेश्वरशक्ति- बलान्मूढतैव, तस्यापि कर्णपथगमनात् संस्कारपाकेनावश्यं कदाचिद्भविष्यत्येव स्वरूपलाभः ।
और लय होता है वही उसके पूर्व-अपर भाग में व्याप्त रहता है। जैसा कि पृथ्वी में अङ्कुर रहता है, वैसा ही प्रकाशरूप तुम्हारे में यह विश्व रहता है। इस प्रकार आगम आदि से सिद्ध अन्य बहुत से सहस्रसंख्यक कर्मों को भी जोड़ देना चाहिए। इसी प्रकार व्यामोह को हटा देने पर उसके भी संस्कारमात्र शरीरादि में रह जाने से अनात्मता को भी जानते हुए आत्मता का अभिमान करना और भासमान घटादि में इसप्रकार अनात्मा का अभिमान रहते हुए ज्ञात इन्द्रजालतत्त्व का अभिमान करना और यथार्थ इन्द्रजाल को भी देखने पर यथार्थ व्यामोह नहीं होगा; इसीप्रकार अपने स्वरूप को जान लेने पर वह देहाभिमान से दूर हो जाता है एवं परमेश्वर तत्त्व की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। उस परमेश्वरता के अभ्यास बल से शिवशासन (तन्त्रशास्त्र) के द्वारा उपदिष्ट देह एवं घटादि में भी ईश्वरतत्त्व का भान होने लगता है। सर्वत्र परमेश्वर का अभिमान करनेवाले को इसी पञ्च भौतिक शरीर में परमेश्वर सम्बन्धी अणिमादि सिद्धियों का उद्गम हो जाता है, किन्तु उन सिद्धियों से पूर्णता की प्राप्ति नहीं होती है। देहभान के संकोच के प्राप्त होने पर ही और संकुचित प्राण के गल जाने से ठीक-ठीक बोध होने लगता है। जिसको व्यवहार साधन में, हेतुसमूह में असिद्धता का अभिमान होता है। उसका व्यामोह व्यवहार साधनों से दूर करना चाहिए। जिसका किसी प्रकार व्यामोह दूर न हो सके तो वहाँ पर समझना होगा कि ईश्वर की शक्ति के बल से मूढ़ता ही बनी रहेगी, कदाचित् कान में भनक पड़ने पर संस्कार के परिपक्वता से कभी न कभी एक दिन अवश्य स्वरूप लाभ हो जायेगा, इसी को 'कर्तरि'
१. अष्टसिद्धि—अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व । नवनिधि—पद्म, महापद्म, शंख, पकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, खर्वी । २. निष्कम्प आत्मसंवित्तौ जीवन्मुक्तोऽभिधीयते । तत्त्वे विकल्पमानस्तु पिण्डपाताच्छिवं व्रजेत् ॥' आत्मज्ञान में अचल स्थिति हो जाने पर जीवन्मुक्त कहलाते हैं। किन्तु तत्त्वस्वरूप के विषय में अभी आंशिक विकल्पमानता बनी हुई है उसका शरीर गिरने तक ही विकल्पमानता रहती है बाद में तो शिव स्वरूप में स्थिति हो ही जाती हैं। इसको अन्यत्र आचार्य ने भी कहा है। संसारजीर्णतरुमूलकलापकर्म संकल्पसान्तरतया परमार्थवह्नेः । स्युर्विस्फुलिङ्गकणिका अपि चेत्तदन्तर्देदीप्यते विमलबोधहुताशराशिः ॥
अ.-२, आ.-४, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३३ तदेवं 'कर्तरि' ( १।१।२ ) इत्यादिश्लोकद्वयेन यदुक्तं 'तदेव 'विश्ववैचित्र्य' इत्यादिश्लोकत्रयेणो- पस्कृत्य पुनर्निंरूपितम्, एवं-भूतं तावत् प्रमाणं तदेवं-भूते भगवति कथमुपपद्यताम् । ततश्च युक्तमुक्तं शास्त्रादाविति भङ्ग्यन्तरेण इदानीं तदेव निर्वाहतिम्, —इति शिवम् ॥ १७ ॥ आदितः १२० ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचितायां प्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां क्रियाधिकारे मानतत्फल-मेयनिरूपणं नाम तृतीयमाह्निकम् ॥ ३ ॥ अथ द्वितीये क्रियाधिकारे कार्यकारणतत्त्वनिरूपणाख्यं चतुर्थमाह्निकम् भावानाभासयन् कर्ता निर्मले स्वात्मदर्पणे । कार्यकारणभावं च यश्चित्रं तं स्तुमः शिवम् ॥ क्रियाशक्तिस्फारप्रायसम्बन्धाभिधानप्रसङ्गात् ज्ञाप्यज्ञापकभावस्य तत्त्वं प्रसाध्य, कार्य- कारणभावस्य तत्त्वं प्रसाधयितुं श्लोकैर्विंशत्या आह्निकान्तरमारभ्यते, —'एष च' इत्यादि 'एवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया' इत्यन्तम् । तत्र श्लोकेन स्वमते कर्तृकर्मभाव एव कार्यकारण- भावः, —इत्युपक्षिप्यते । ततः श्लोकत्रयेण जडस्य कारणत्वं पराक्रियते । ततः श्लोकषट्केन चेतनस्यैव कर्तृतारूपा कारणता प्रसाध्यते । ततः प्रसङ्गादनुमाने नियतिशक्तिरवश्योपजीव्या,— इति श्लोकत्रयेणोच्यते । सौगतोक्तकार्यकारणभावपरमार्थोऽपि अस्मत्पक्षमेवावलम्बते, नो चेत् न किञ्चित्, —इति त्रिभिः श्लोकैः; सांख्योपदर्शितोऽपि कार्यकारणभावो नोपपद्यते, यद्यस्मदुक्तं ( १-१-२ ) इत्यादि दो श्लोकों से कहा गया है । 'विश्ववैचित्र्य' इत्यादि तीन श्लोकों से स्पष्ट करके फिर से निरूपित किया गया है, ऐसा प्रमाण इस स्वरूप में रहनेवाले भगवान् में कैसे घट सकता है । इसलिए समुचित ही शास्त्रादि में 'कर्तरि-ज्ञातार' इस रूप में दूसरी भङ्गी से कहा है —इसीका निर्वाह किया गया है ॥ १७ ॥ तृतीय आह्निक समाप्त जो सदाशिव अपने शुद्ध संविद्रूप दर्पण में पदार्थभावों को भासित करते हुए कार्य-कारण- भाव को भी अपने में भासित करते हैं—ऐसे विचित्र शिव की हम स्तुति करते हैं । क्रिया-शक्ति का विस्तार सम्बन्ध के कथन के प्रसंग से ज्ञाप्य-ज्ञापकभाव तत्त्व को प्रकाशित करके, कार्य-कारणभाव के तत्त्व को सिद्ध करने के लिए इक्कीस श्लोकों से दूसरा आह्निक प्रारम्भ करते हैं, —'एष च' इत्यादि से लेकर 'एवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया' यहाँ तक । उसमें प्रथम श्लोक से अपने सिद्धान्त में कर्तृ-कर्मभाव का कार्य-कारणभाव दिखायेंगे । इसके पश्चात् तीन श्लोकों से जड वस्तु की कारणता का निषेध करेंगे । अनन्तर चेतन की ही कर्तृतारूप कारणता को छः श्लोकों से सिद्ध करेंगे । प्रसंग से नियति-शक्ति का अनुमान में अवश्य उपयोग करना चाहिए, यह तान श्लोकों से दिखाया जायेगा । अनन्तर सौगत के द्वारा प्रति- पादित कार्य-कारणभाव की परमार्थता हमारे ही सिद्धान्तपक्ष को सिद्ध करता है । यदि नहीं संसाररूपी जीर्णतरु का मूलसमूह जो कर्म संस्कार-संकल्प है उससे व्यवहित = अवकाश युक्त होने के कारण यदि परनार्थवह्नि की चिनगारियां दिखती भी हो, तो भी अन्तर भाग में विमल बोध- रूपी अग्निराशि जाज्वल्यमान ही रहती है । ३०
२३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-२ चेतनस्य कर्तृत्वं नाङ्गीक्रियते, — इति त्रिभिः; चेतनस्यापि अनीश्वरतायां नैतत् घटते, — इति द्वाभ्यामिति संक्षेपार्थः । ग्रन्थार्थस्तु व्याख्यायते । एवं क्रियाशक्तिमुखेन प्रमात्रैकरूपतां भगवति व्यवहर्तव्यां प्रसाध्य, कर्तृरूपतापि तत एवायत्नसिद्धा, — इति दर्शयितुमाह— एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमूर्न् । भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥ १ ॥ चोऽवधारणे । एष एव पुराणः प्रमाता अमून् भावान् आभासितपूर्वान् आभासमानान् आभासयति अविच्छिन्नेन प्रबन्धेन । कथम्, इच्छया ईशितुरभिन्नाया अविकल्परूपाया अक्रमाया वशेन सामर्थ्येन । कुत्रास्य ते भावाः स्थिताः, ? आह, 'अनन्तशक्तित्वात्' इति । विश्वे हि भावा- स्तस्यैव शक्तिरूपेण स्वरूपात्मत्वेन स्थिताः, — इत्युक्तं 'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य.........।' (१।५।१०) इत्यत्र । यदेतदाभासनं या साविच्छा, सा क्रिया, अस्य भगवतो निर्मातृत्वम् ॥ १ ॥ ननु बीजादङ्कुर उद्भवन् दृश्यते, न च अत्र कश्चिच्चेतनोऽनुप्रविशन् दृष्टः, तत्कथमे- तदुक्तम् ?, — इत्याशङ्क्याह— करतो तो वह कुछ भी नहीं है, इस विषय को तीन श्लोकों से सिद्ध करेंगे । इसके बाद सांख्यकारों के द्वारा निरूपित भी कार्य-कारणभाव नहीं घटता है, यदि हमारे कहे गये चेतन की कर्तृता नहीं मानते तो जड वस्तु की कार्य-कारणता नहीं सिद्ध हो सकती । इसे तीन श्लोकों से बतलायेंगे; यदि चेतन भी अनीश्वर है तो, यह बात भी नहीं घट सकती है । यह दो श्लोकों से सिद्ध करेंगे ! यही संक्षेप में इस आह्निक का सारांश है । अब ग्रन्थ के अर्थ का व्याख्यान करते हैं । इस प्रकार भावान् में क्रिया-शक्ति को प्रधान मान कर प्रमाता में एकरूपता का व्यवहार करना चाहिए, कर्तृता तो उसमें अयत्न ही सिद्ध है, इसे दिखाने के लिए कहते हैं— भगवान् परमशिव अनन्त-शक्ति सम्पन्न होने के कारण इन पदार्थों को आभासित करते हैं । यह निर्माणरूपी क्रिया भगवान् की इच्छा के अधीन होती है । जब चाहे तब करते हैं, न चाहे तो नहीं करते ॥ १ ॥ यहाँ पर 'चकार' निश्चित अर्थ में है । यही पुराण प्रमाता पूर्व में आभासित होनेवाले इन पदार्थों को अविच्छिन्नरूप से भासित किया करते हैं । वह कैसे ? इसका उत्तर देते हैं कि इच्छा करनेवाले से अभिन्न इच्छा के द्वारा अविकल्प अक्रमरूप के सामर्थ्य बल से करते हैं । वे भाव-पदार्थ कहाँ रहते हैं ? उत्तर देते हैं कि 'अनन्तशक्तित्वात्' अर्थात् चिदात्मा अनन्त-शक्तिवाले होने के कारण अपनी इच्छा अनुसार रखते हैं; क्योंकि सारे भाव-पदार्थ उन्हीं की शक्तिरूप से उन्हीं में रहते हैं—ऐसा कहा भी गया है—'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य ॰॰।' (१-५-१०) अपने में रखनेवाले स्वामी का इत्यादि । यह जो आभासन है, वही इच्छा है और वही सृष्टृत्वरूप क्रिया कहलाती है । यही भगवान् का निर्माण भी है ॥ १ ॥ अच्छा तो, बीज से अंकुर उत्पन्न होता हुआ दिखाई देता है और उसमें कोई चेतन तो प्रविष्ट हुआ नहीं दिखाई देता । तब फिर, कैसे कहते हो कि चिद्रूप ही इस विश्व का अवभासक है ? इस पर आशङ्का कर कहते हैं—
अ.-२, आ.-४, का.-३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३५ जडस्य तु न सा शक्तिः सत्ता यदसतः सतः । कर्तृकर्मत्वतत्तत्त्वैव कार्यकारणता ततः ॥ २ ॥ जडस्य बीजस्यैवं भूतं सामर्थ्यं नास्ति यत् असद्रूपं सद्रूपं वाङ्कुरं परिदृश्यमानसत्तावन्तं करोति । बीजादङ्कुरो जायते, -इति नाङ्कुरस्य महिमा असत्त्वात्; अङ्कुरो जायत, -इति च महिमा कथं बीजस्य, ततोऽङ्कुरादन्यत्वात्; यत एवं तस्मात् कार्यं क्रियाशक्त्या अवभास्यमानं कर्मैव,- इति कृत्येनैव आविष्कृतम्, कार्यते अनेन कर्ता तत्समर्थचरणेन, -इति कारणमपि कर्तरि चेतने विश्राम्यति । असतः सतः इति असद्रूपस्य सत इत्यर्थः । वार्थो वात्र गर्भीकृतः, असतोऽङ्कुरस्य सतो वा बीजस्य, -इति; अङ्कुरस्य सतोऽसतो वा, -इत्येवं वा ॥ २ ॥ ननु जडस्य कथमेषा शक्तिर्न भवति, - इत्याह- यदसत्तदसद्युक्ता नासतः सत्स्वरूपता । सतोऽपि न पुनः सत्तालाभेनार्थः.............. सद्धा कार्यमसद्वा संभाव्यते; उभयात्मकम्, अनुभयात्मकमनिर्वाच्यम्, -इति तु स्ववाचैव विरुध्यते; तत् किमनेन । यदि असन् घटः, तर्हि तस्यासद्रूपतैव परमार्थतः, -इति कथं स्वरूप- विरुद्धं सत्त्वमभ्युपगच्छेत्, नहि पादपतनशतैरपि नीलमात्मनि पीतमानं मृष्यते । अथ सन्नेव असत् और सत् की जो सत्ता है वह जड की शक्ति नहीं है । इसलिए कर्तृता और कर्मता ही कार्य-कारणता है ॥ २ ॥ जडरूप बीज का ऐसा सामर्थ्य नहीं होता है—जो कि असद्रूप अङ्कुर को दृश्यमान सत्तावाला बना सके । बीज से अङ्कुर निकलता है, इसमें कोई अङ्कुर का महत्त्व नहीं है; क्योंकि उस समय वह भी उत्पन्न नहीं हुआ रहता है । अङ्कुर जब स्वतः अङ्कुरित होता है तब फिर बीज का कौन सा महत्त्व रहा ? क्योंकि वह अङ्कुर से तो भिन्न हो गया; इसलिए जब ऐसी बात है तो कार्य क्रिया-शक्ति से अवभास्यमान होकर कर्म ही कहा जाता है, इस कृत्य ने प्रकट कर दिया, जो कर्ता से किया जाय, उसे कार्य कहा जाता है, कारण भी कर्तृरूप चेतन में ही विश्रान्ति लेता है । असद्रूप जो सत् है—ऐसा समझना चाहिए या विकल्प अर्थ मान लो; असद्रूप अङ्कुर का या सद्रूप बीज का यह अर्थ कर लो; चाहनेवाला या नहीं चाहनेवाला अङ्कुर का यह भी अर्थ हो सकता है ॥ २ ॥ जड की ऐसी शक्ति कैसे हो सकती है ? इस पर कहते हैं कि— जो असद्रूप है, वह असद्रूप में ही रहेगा और असत् सत् नहीं हो सकता और असत् से सत्स्वरूपता भी सम्भव नहीं है । सत् को सत्ता के लाभ से कोई प्रयोजन नहीं है...... कार्य सद्रूप है या असद्रूप है अथवा सद्रूप और असद्रूप ये दोनों हैं या दोनों नहीं हैं; क्योंकि एकत्र दोनों का समावेश होना असंभव है इसलिए अनिर्वचनीय ही कहा जाय, ऐसा कहना तो अपने वचन से ही विरुद्ध होगा, उससे क्या होगा ? यदि असद्रूप में ही घट को माना जाय तो उसकी असद्रूपता ही सचमुच रहती है, तो फिर अपने स्वरूप को विरुद्धता कैसे (पदार्थ) सत्त्व स्वीकार करोगे, सैकड़ों बार पैर पटकने पर भी नीलरूप में पीतत्व नहीं ढूँढ सकते हैं। अब यदि कहो कि सद्रूप में ही घट को सत्ता है—ऐसा मान लिया जाय तो दण्ड, चक्र और सूत्र की
२३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-४ घटस्तर्हि किमन्यत् उपायाच्यते दण्डचक्रसूत्रात् । अभिव्यक्तिविषयत्वस्फुटत्वादयोऽपि सदसद्रूपतया चिन्त्याः । नन्वेवं तूष्णीमास्यतां, नैतदपि युक्तम्,—इत्याह— ........................'अथ चोच्यते—॥ ३ ॥ तदवश्यसमर्थ्योऽयमर्थ इति यावत् ॥ ३ ॥ ततश्च इत्थमुपपाद्यत,—इति दर्शयति— कार्यकारणता लोके सान्तर्विपरिवर्तिनः । उभयेन्द्रियवेद्यत्वं तस्य कस्यापि शक्तिः ॥ ४ ॥ कुम्भकारहृदये अन्तर्मनोगोचरत्वात् पूर्वमपि स्वसंविदेकात्मतया विचित्रत्वेन विश्वस्य भेदाभेदात्मना परिवर्तमानस्य स्पन्दनेन स्फुरतो यत् अन्तःकरणबहिष्करणद्वयवेद्यत्वमाभास्यते, एषैव सा कार्यकारणता । उभयग्रहणमुपलक्षणम्, यस्य यावति पूर्णार्थक्रियासमाप्तिरिति यावत् । सुखादीनाम् अन्तःकरणैकवेद्यतापादनमेव निर्माणं, न च कुम्भकारे प्राणपुर्यष्टकबुद्धिशून्यदेहप्राये तदेतत् स्थितं, तस्यापि जडत्वात्; ततः संविदेव विश्वमात्मनि भासयति शक्तिवैचित्र्यात् । तस्य कस्यापि इति पूर्वमुक्तस्य अचिन्त्यापर्यनुयोज्यमहिम्न इत्यर्थः । न च वाच्यम्—उभयेन्द्रिय- क्या आवश्यकता रहेगी ? घट तो, पहले से ही विद्यमान है । घट की अभिव्यक्ति होने का अर्थ यह है कि साफ-साफ अत्यन्त आँखों के सामने आ जाना आदि, सद्रूप और असद्रूप ये दोनों ही विचारणीय हैं । अच्छा जब ऐसा ही है तो फिर शान्त होकर बैठे रहो, यह कहना भी तो उचित नहीं है—इस पर ग्रन्थकार कहते हैं— इसका प्रतिपादन इस प्रकार किया जाता है—॥ ३ ॥ यदि तुम विचार करके हमें कहने का अवसर देते हो तो सुनो लोक में कार्य-कारणता अवश्य समर्थनीय हैं ॥ ३ ॥ अब कार्य-कारणभाव का निर्वचन करते हैं, इसको दिखाया जाता है— बीच-बीच में बाधा दे देकर हुआ करता है। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों से वेद्य होकर किसी एक की भी शक्ति से हो सकते हैं ॥ ४ ॥ कुंभकार के हृदय में ज्ञेय होने से पहले भी वह ज्ञान का विषय था; विश्व की विचित्रता के कारण भेद और अभेद रूप से विद्यमान स्पन्दन से स्फुरित होनेवाला आन्तर और बाह्य इन दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर भासित होते हैं, इसी का नाम कार्य-कारणभाव है, दोनों का ग्रहण करना उपलक्षण मात्र है, एक से भी कार्य सम्पन्न हो सकता है जिसकी आवश्यकता हो उसको ले लेना चाहिए, जिसको जितने अंशों में अर्थक्रिया की समाप्ति होती हो अर्थात् इसी से पूर्ण अर्थक्रिया की समाप्ति हो जाती है । सुख-दुःखादि को अन्तःकरण में बैठा लेना ही निर्माण कहा जाता है। कुंभकार में प्राण, पुर्यष्टक, बुद्धि, शून्य और देह आदि, ये सब नहीं रहते हैं; क्योंकि देहादि पदार्थ जडरूप होते हैं; इससे सिद्ध होता है कि संविद्रूप ज्ञान ही स्वातन्त्र्य-शक्ति की विचित्रता से सबों में भासित होता है । 'तस्य कस्यापि' इसका पूर्व में प्रतिपादन कर दिया है कि उस अचिन्त्य के ऊपर सत् है या असत् है इस विषय में प्रश्न नहीं खड़ा करना चाहिए। यह नहीं हो सकता है कि दोनों इन्द्रियों से वेद्य होकर सद्रूप या असद्रूप
अ.-२, आ.-४, का.-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३७ वेद्यत्वमपि सदसद् वा, — इति; यतोऽयमत्र परमार्थः—यथा दर्पणान्तः कुम्भकारनिर्वर्त्यमान- घटादिप्रतिबिम्बे दर्पणस्यैव तथाभासनमहिमा, तथा स्वप्नदर्शने संविदः, तथापि तन्महिम्नैव एतेन,इदं बहिः स्फुटरूपं क्रियत, —इत्यभिमान उल्लसति । एवं संविन्महिम्ना कुम्भकृति दण्ड- चक्रादौ घटेऽवस्थिते तन्महिम्नैव अभिमानो जायते; यथा मया इदं कृतम्, अनेन इदं कृतं, मम हृदये स्फुरितम्, अस्य हृदये स्फुरितमिति । तत्र जडस्य मृदादेर्दूरापेतोऽभिमान, —इति संवित्स्व- भावे कर्तृत्वं व्यवस्थाप्यते । ननु भावरूपमेव इत्थं भास्यतां किं द्वयेन्द्रियवेद्यत्वेनोक्तमत्र, स्फुटमर्थ- क्रियाक्षमं रूपमनेनोक्तम्, —इति को विरोधः ॥ ४ ॥ अनेन च विचारेण प्रकृतमपि क्रियास्वरूपं सिद्धं भवति, —इति दर्शयति— एवमेका क्रिया सैषा सक्रमान्तर्बहिःस्थितिः । एकस्यैवोभयाकारसहिष्णोरुपपादिता ॥ ५ ॥ सैषेति, यस्याः ‘स्वरूपत आश्रयतश्च नोपपद्यते' इति उपालम्भः कृतः, सा उपपत्त्या स्थापिता । यतः संविद्रूपादान्तरात् प्रभृति इन्द्रियगोचरतया बहिष्पर्यन्ततया स्थितिराभासरूपा, तत एव वेद्यात्मककर्मालिङ्गनेन सक्रमा तावदुपपन्ना, कर्तृकर्मैकाश्रयतादात्म्याच्च एका । स च में ही रहें; क्योंकि यहाँ पर यही परमार्थ है । जैसे की दर्पण में कुंभकार और बनाये जानेवाला घटादि का प्रतिबिम्ब होना दर्पण का ही महत्त्व माना जाता है, उसी प्रकार स्वप्न में ज्ञान का ही महत्त्व रहता है, फिर भी उसकी महिमा से बाहर भी स्फुटरूप से किया जाता है—ऐसा अभिमान होता है, इस प्रकार ज्ञान की महिमा से ही घट को बनानेवाले दण्ड-चक्रादि में और घट में रहनेवाले महत्त्व से ही अभिमान यह होता है कि मैंने यह घट बनाया, इसने यह किया, मेरे हृदय में स्फुरित हुआ, इसके हृदय में स्फुरित हुआ । इसलिए जडरूप जो मृदादि में ऐसा अभिमान नहीं हो सकता है। उससे तो यह दूर ही रहता है, इसी से ज्ञान में कर्तृता की व्यवस्था होती है। अच्छा तो, भावरूप ही ऐसा ( बाह्यरूपतया ) भासित होता रहे, फिर दोनों इन्द्रियों से वेद्य होता है—ऐसा क्यों कहा ? प्रत्यक्ष अर्थक्रिया में समर्थ को ही इसमें कहा है, इसमें कौन-सा विरोध है ॥४॥ इस विचार से प्रकृत-प्रसङ्ग में क्रियास्वरूप की भी सिद्धि हो जाती है, इसे दिखाते हैं— इस प्रकार वह एक क्रिया सक्रम होकर बाहर एवं भीतर आभासरूप से रहती है । एक के ही दोनों आकार को सहनेवाले का वर्णन किया हुआ है ॥ ५ ॥ 'सैषेति', यह जो कहा गया है इसका अर्थ यह होता है कि स्वरूप और आश्रय ये दोनों रूपों में नहीं बन सकते—इस प्रकार उपालम्भ किया है वह उपपत्ति से स्थापित है; क्योंकि दूसरे संविद्रूप ज्ञान से इन्द्रिय गोचर होने के कारण बाहर तक की स्थिति आभासरूप से होती है, इसी हेतु से वेद्यात्मक कर्म के संपर्क से क्रिया सक्रमा उत्पन्न होती है, कर्ता और कर्म ये दोनों आश्रय के तादात्म्य से एक हो जाते हैं। वह एक आश्रय संविद्रूप होने के कारण स्वच्छता और १. शङ्का करते हैं कि कर्ता का जो व्यापार है वही क्रिया है इस प्रकार कर्ता की आश्रयरूप हो क्रिया कही गयी है । कैसे फिर कर्म की आश्रयरूप भी कह दिया ? इस विषय में आचार्य का कथन है—सब क्रियाएँ कर्तृस्वभाववाली ही होती हैं, कोई कर्म में भी विशेषज्ञान की अधिकता के कारण देखी जाती
२३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-६-७ एक आश्रयः संविद्रूपत्वेन स्वच्छत्वस्वतन्त्रत्वाभ्यामुभयमप्यन्तर्बहिरूपं सहत इति ॥ ५ ॥ ननु भवतु घटादावेवं, यत्र तु बीजाङ्कुरादौ चेतनानुप्रवेशो न दृश्यते तत्र कथं बीजस्यै- वाङ्कुरः कार्यो न भवति ? इत्याशङ्क्याह— बहिस्तत्तस्यैव तत्कार्यं यदन्तर्यदपेक्षया । प्रमात्रपेक्षया चोक्ता द्वयी बाह्यान्तरस्थितिः ॥ ६ ॥ मातैव कारणं तेन स चाभासद्वयस्थितौ । कार्यस्य स्थित एवैकस्तदेकस्य क्रियोदिता ॥ ७ ॥ अन्तर्राभासमानस्य तथारूपापरित्यागेनैव बहिराभासनं निर्माणं, ततश्च यद् वस्तु यमपेक्ष्य अन्तरित्युक्तं तद् वस्तु तस्यैव आन्तरवस्तुरूपविपरिवृत्तिमात्रस्य बहिष्करणाहँ भवति, संविद्रूपं स्वतन्त्रता इन्हीं दोनों रूपों से बाहर एवं भीतर के स्वरूप को सह लेती है ॥ ५ ॥ अच्छा तो, घटादि में ऐसा भले ही रहें, किन्तु यहाँ बीज-अङ्कुर में तो चेतन का प्रवेश नहीं देखा जाता है फिर वहाँ बीज का अङ्कुर कार्य क्यों नहीं होता है ? इस प्रकार आशङ्का का उत्तर देते हैं— बाहर में भी उसीका कार्य है जिसको अपेक्षा से अन्तर्मुखी कार्य होता है और प्रमाता की अपेक्षा से बाहर और भीतर की दोनों स्थिति बनी रहती है ॥ ६ ॥ बाहर और भीतर इन दोनों की आभास स्थिति में प्रमाता ही कारण होता है। कार्य की स्थिति में एक ही रहता है उसी से एक की ही क्रिया होती है—ऐसा कहा भी है ॥ ७ ॥ अन्तर में आभासित होनेवाले अपने रूप का त्याग न करने के कारण उसका बाहर में आभास होता है, उसी को निर्माण कहते हैं, इससे जिस वस्तु की अपेक्षा करके अन्तःकरण में भासित होता है, उस आन्तर भासितरूप का अपरित्याग करने के कारण बाहर की ओर करने योग्य ऐसा अर्थ होता है, संविद्रूप प्रमाता की अपेक्षा करके अन्तःकरण में आभासित होनेवाले है इसलिए वह कर्मस्थभाववाली कहलाती है। जबकि भाष्यकार का कथन है कि पचति, गच्छति, इन सभी में कर्मत्व रहता है किन्तु ज्ञानात्मक प्रमातृ-साररूप होने के कारण समकक्षतयता कर्तृस्था और कर्मस्था क्रिया कहलाती है, इस प्रकार कर्तृस्था और कर्मस्था क्रिया प्रसिद्ध हैं, कर्तृस्थरूप और कर्मस्थरूप द्वारा कर्म भी बाहर एवं भीतर उभयरूप से परामर्श की एकता के कारण बना रहता है। इस विषय में भर्तृहरि का कथन है— कर्मस्थः पचतेर्भावः कर्मस्था च भिदेः क्रिया। असासिभावः कर्तृस्थः कर्तृस्था च गमेः क्रिया ॥ 'पच्' धातु का भाव कर्म में रहता है और 'भिद्' धातु की क्रिया भी कर्म में रहती है। 'आस्' एवं 'अस्' धातु का भाव कर्त्ता में रहता है और 'गम्लृ गतौ' धातु की क्रिया भी कर्त्ता में रहती है। इस प्रकार पचति गच्छति, इत्यादि क्रियाओं में स्वरूप से अनेकता होनेपर भी आश्रय की एकता होने के कारण एकता बनी रहती है।
अ.-२, आ.-४, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २३९ च प्रमातारमपेक्ष्य अन्तरभासिनो भावास्तदपेक्षयैव बाह्याभासाः, —इति तेनैव तेषां बहिष्कर- णावभासनं युक्तं; ततश्च१ प्रमातैव कारणं भवति न जडः । ह्यर्थे चः । यस्मात् स प्रमाता कार्य- स्यान्तर्बहिराभासनद्वयनिमित्ततया स्थितस्तेन विना तदपेक्षस्याभासद्वयस्यानुपपत्तेः; तस्मादेकस्य प्रमातुरेव न तु कथञ्चित् जडस्य उदिता प्रसाधितरूपा क्रिया निर्मातृता भवतीति ॥ ६-७ ॥ एतदेव द्रढयति— अत एवाङ्कुरेऽपीष्टो निमित्तं परमेश्वरः । तदन्यस्यापि बीजादेर्हेतुता नोपपद्यते ॥ ८ ॥ यत एवं चेतन एव निर्माता, अत एक नैयायिकादिभिरङ्कुरादौ बुद्धिमानेव परमेश्वरो हेतुत्वेन इष्टः । ननु तैः निमित्तकारणतास्य अङ्गीकृता क्रियाविभागादिक्रमायातापरमाणुवादिद्वार- कतया; समवायिकारणनिजावयवारम्भपरम्परया तु तत ईश्वरादन्यस्यापि बीजभूमिजलादेर्हेतुता कथिता । सत्यम्; कथिता, सा तु नोपपद्यते, उक्तयुक्त्या जडस्य हेतुतायोगात्; ततश्चेश्वर एव बीजभूमिजलाभाससाहित्येनाङ्कुरात्मना भासते, —इतीयानत्र परमार्थः ॥ ८ ॥ ननु परिदृष्टबीजादिव्यतिरिक्तबुद्धिमत्कारणकल्पनेन विना किमुपरुध्यत, —इति परस्थ सब पदार्थ-भाव उसी की अपेक्षा से हो ये बाह्य आभास कहलाते हैं, उसी से उनका बाहर में आभासित होना सिद्ध होता है; इसलिए यह सिद्ध होता है कि प्रमाता ही कारण है जडभाव की इनमें कारणता नहीं होती, यहाँ पर 'चकार' शब्द को 'हि' अर्थ में लिया गया है। जिससे वह प्रमाता कार्य के बाहर एवं भीतर दोनों आभासों में निमित्त होकर विद्यमान रहता है, उसके बिना अपेक्षित दोनों आभासों की उपपत्ति न होने के कारण एक ही प्रमाता से उदित क्रियाओं प्रसाधन होता है जड की तो कारणता किसी प्रकार से भी नहीं होती ॥ ६-७ ॥ इसी बातको दृढ करते हैं— अत एव अङ्कुर होने में भी परमेश्वर ही निमित्त माना जाता है। उससे भिन्न बीज आदि में हेतुता नहीं बन पाती है ॥ ८ ॥ क्योंकि चेतन को ही निर्माता माना गया है, इसलिए नैयायिकों के द्वारा अङ्कुरादि में बुद्धिमान् परमेश्वर ही हेतु है और हेतुरूप से अनुमान भी किया जाता है। इस पर शङ्का की जाती है कि उन लोगों ने ईश्वर को निमित्तकारण माना है; क्रिया का विभाग के द्वारा क्रम से प्राप्त अणु-परमाणु आदि अपने अवयव को समवायिकारण मानने से सिद्ध होता है कि ईश्वर से भिन्न जल, भूमि और अङ्कुर आदि की भी हेतुता होती है—ऐसा कहा हुआ है। ठीक है, किन्तु वह हेतुता ईश्वर में घटती नहीं है, उक्त युक्ति से तो जड को ही हेतुता सिद्ध होती है, इसलिए कहना होगा कि ईश्वर ही बीज, भूमि, जल आदि साहित्य के माध्यम से अङ्कुररूप होकर भासता है, इतना ही यहाँ उत्तम है ॥ ८ ॥ अच्छा तो, परिदृष्ट बीजादि से भिन्न बुद्धिमान् ईश्वर को कारण न मानने से क्या क्षति १. जबकि जड वस्तु का कार्य नहीं देखा जाता है इसलिए कारण भी जड नहीं है। इसी कारण नियति- शक्ति को आगे करके जड शरीर में जैसे चेतन की कारणता के रहने पर ही गमनादि क्रिया करते रहते हैं वैसे ही जड बीजादि में उपचार मात्र है कि यही सब कुछ सम्पन्न करता है, वस्तुतः जड वस्तु में किञ्चित् भी सामर्थ्य नहीं रहता है ।
२४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-९ भ्रान्तिं भिन्दन्नाह— तथा हि कुम्भकारोऽसावैश्वर्येण व्यवस्थया । तत्तन्मृदादिसंस्कारक्रमेण जनयेद् घटम् ॥ ९ ॥ ‘तथा हि’ इति निदर्शनोपक्रमेण व्याप्तिरेवंभूतैव दृष्टा, —इति द्रढयति । जडा हेतवश्चेतन- प्रेरिताः कार्यं कुर्वन्ति, मृदादयो यदि सन्निधिमात्रेण विदध्युः कुम्भकारेण किमत्र कृत्यम्; शिवि- कस्तूपकादिपरम्परया ते जनयन्ति; सा च कुम्भकारायत्ता, —इति चेत् सिद्धं नः साध्यम् । शिविकसंपादनेऽपि ते चेतनप्रेरणामपेक्षन्ते, —इति । तज्जडकारणानां चेतनप्रेरणामन्तरेण न क्वचित् कार्यकारित्वम्; यदि हि स्यात् मृदादीनामपि स्यात्, —इति एकान्त एषः । ततश्च यत् अचेतनं कार्यकारि तत् चेतनापेक्षं मृदादय इव, तथा च बीजादि, —इति स्वभावः । अचेतनकार्य- कारित्वं हि कादाचित्कत्वात् सनिमित्तम्, न चान्यदस्य निमित्तमुपपद्यते अनुपलम्भात्, —इति चेतनप्रेरणं यदि न निमित्तीकुर्यात् व्यापकविरुद्धमन्यनिमित्तकत्वं प्रसज्येत; न च युक्तं तत्, मृदादावपि तस्य प्रसङ्गात्, —इति सिद्धा व्याप्तिः; अतश्च कुम्भकृदेव तत्रेश्वरः । तदेतदाह— ईश्वररूपा या व्यवस्था, तया यः स स मृद्दण्डचक्रादीनां संस्कारः, मृदो मर्दनं, दण्डस्य प्रगुणत्वं, चक्रस्य परिवर्तनम्, —इत्यादिः, तदारम्भो यः क्रमः शिविकस्तूपकादिरूपः, तेन घटं नियोगतो जायेगी ? ऐसी जो दूसरे लोग भ्रान्ति करते हैं उसे दूर करते हैं । देखो; जहाँ पर साक्षात् बुद्धिमान् कुंभकार भी ईश्वर की व्यवस्था से ही उन-उन मृदादि ( दण्ड चक्र-सूत्र ) के संस्कार क्रम से घट का निर्माण करता है, इस प्रकार चेतन ही तो कारण बना ॥ ९ ॥ ‘तथाहि’ दृष्टान्त का उपक्रम बना करके व्याप्ति ऐसी ही देखी गयी है, इस बात को दृढ करते हैं । जड हेतु चेतन से प्रेरित होकर कार्य करते रहते हैं, यदि मिट्टी-चीवरादि ये सभी जितने भी हैं, वे आपस में संमिलित होकर कार्य कर डाले तो फिर कुंभकार का कौन सा कृत्य रह जायेगा; और दण्डादि परम्परा से वे सभी आपस में मिल करके घट का निर्माण करते हैं और वह क्रिया कुंभकार के अधीन हो तब तो हमारा कार्य सिद्ध ही हो गया, फिर इसमें कहने को बात ही नहीं रहती । घट के निर्माण में चेतन को ही प्रेरणा की अपेक्षा रखते हैं, जड कारणों से चेतन की प्रेरणा के बिना बीजादि में कार्यकारिता नहीं रह जाती यह कहना पड़ेगा। यदि इनकी कार्यकारिता को मानते हो, तो मृदादि की भी माननी ही होगी। इसमें गुञ्जाइश नहीं होगी और यह आवश्यक भी है। इससे सिद्ध हुआ कि जो भी अचेतन जड कार्य करेगा वह चेतन तत्त्व की सहायता से ही कर सकेगा । जैसा कि मृदादि का कार्य । अचेतन जड आदि जो कुछ भी कार्य करते हैं उसमें चेतन की ही निमित्तता होती है इसके अतिरिक्त दूसरा कोई भी निमित्त नहीं होता; क्योंकि दूसरा कोई इसमें दिखाई नहीं देता, यदि चेतन को निमित्त न मानते हो तो व्यापक के विरुद्ध अन्य किसी की निमित्तता माननी होगी; जबकि यह उचित नहीं है; क्योंकि मृदादि में भी उसकी प्राप्ति हो जायेगी । इसलिए कुंभकार ही उसमें ईश्वर है यह मानना पड़ेगा। इसे बताते हैं कि ईश्वर के द्वारा बनी हुई व्यवस्था से उस-उस मिट्टी, दण्ड, चक्रादि का संस्कार होता है, जैसे—मिट्टी का मर्दन करना, दण्ड को चक्र में लगा कर चक्र की गति को वेग देना इत्यादि ।
अ.-२, आ.-४, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ २४१ जनयति, नान्यथा, —इति नियोगे लिङ् । किं च यदि न क्रुध्येत वस्तुतः कुम्भकारोऽपि ऐश्वर्येव स्वतन्त्रविश्वात्मतारूपया व्यवस्थया मृदादिसंस्कारापेक्षया प्रदर्शितनियत्यभिधाननिजशक्ति- विजृम्भातो घटं जनयेत्; अन्यथा अचेतना मृदादयः कथं कुम्भकारेच्छामनुरुध्येरन्, तन्तवोऽपि वा पटसंपादनेच्छां किं नाद्रियेरन् । तदेतदपि उक्तम् अनेनैव सूत्रेण 'तथा हि' इति । नन्वेवं कुम्भकृतो नास्ति कर्तृत्वम्, —इति समुत्सीदेत् धर्माधर्मव्यवस्था । यदि प्रत्येषि युक्त्यागमयोः, तत् एवमेव; तथापि समस्तेतरनिर्माणमध्य एव इदमपि परमेश्वरेणैव निर्मितं, यदविच्वलस्तस्य कुम्भकारपशो- र्मिथ्या कर्तृत्वाभिमानः प्रतिभुव इव अधमर्णताभिमानः, यदि पुनर् ईश्वरस्येच्छैव इयमीदृशी 'मा अस्य अभियानोऽयम् उद्गमत्' इति, तदा नासौ कर्ता कश्चित् । तदिदमपि उक्तं सूत्रेणैव 'तथा हि' इति । कुम्भकारस्यापि 'मृदादिसंस्कारक्रमेण किं घटं जनयामि, उत न जनयामि' इति य एक- पक्षनिश्चयाय संप्रश्नात्मा विचारः, स ईश्वरसम्बन्धिन एव विविधात् स्वरूपावच्छादनतत्तत्प्रका- शनरूपात् अवस्थानात्, —इति संप्रश्ने लिङ् । तस्मात् वस्तुत 'ईश्वर एव सर्वत्र कर्ता, अहं च स एव' इति न परिमिते कर्ता, अपि तु सर्वत्र कर्ता, —इति एतावति सर्वथा हृदयेन अवधातव्यम्,— इति स्थितम् ॥ ९ ॥ दृश्यते चास्य चेतनस्य स्वातन्त्र्यमेव सर्वत्र जृम्भमाणं जडानपि यत् स्वात्मतामापादयति, न तु जडानां वस्त्वन्तराविष्करणे सामर्थ्यम्,—इति यदुक्तं, तत् सर्ववादिप्रसिद्धनिदर्शनेन द्रढयति— उससे आरम्भ होनेवाले जो क्रम हैं वह शिविकस्तूपकादिरूप है, जिससे कि घट ईश्वरीय नियम से निर्मित होता है, दूसरे प्रकार से नहीं होता, इसलिए यहाँ पर नियोग अर्थ में 'लिङ्' लकार दिया है । यदि ईश्वर नहीं कहते हो तो कुंभकार क्रुद्ध होगा और घट का निर्माण नहीं होगा; चाहे तो अपनी स्वतन्त्र-शक्ति से मृदादि के संस्कार न करके भी घट बना ले और अचेतन मृदादि भी कुंभकार की इच्छा का अनुरोध करके कार्य कर ले, इस प्रकार तन्तुओं से भी पट बना ले । इसलिए 'तथाहि' इसी सूत्र में हमलोग कह भी आये हैं । अब शङ्का करते हैं कि कुंभकार की कर्तृता नहीं होती, यदि होती है तो धर्माधर्म की व्यवस्था बन्द हो जायेगी । इसलिए यह ईश्वर ने बनाया है पशुरूप जो कुंभकार है उसका मिथ्या अभिमान है। जैसा कि प्रतिवादी का प्रतिभूमात्र होता है, इसलिए कुंभकार का मृदादि संस्कार क्रम से घट बनाऊँ या न बनाऊँ यह एक पक्षीय प्रश्नात्मक विचार होगा, इस प्रकार उस ईश्वर सम्बन्धी अनेक प्रकार के रूपों का आच्छादन करना और प्रकाशन कर स्थापन करना, इसी प्रश्न में लिङ् लकार है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुतः ईश्वर ही सर्वत्र कर्त्ता है । 'अहं च स एव' और मैं भी वही हूँ । वह परिमिति कर्त्ता नहीं है, अपितु सर्व कर्तृता ईश्वर की ही रहती है। इस बात को सब प्रकार से सर्वदा हृदय में दृढतापूर्वक धारण रखनी चाहिए ॥ ९ ॥ चेतन की स्वातन्त्र्य-शक्ति सर्वत्र बढ़ती हुई जड-भावों को भी आत्मरूप बना लेती है— यह देखा जाता है। जड-भावों में अन्य पदार्थ को उत्पन्न करने का सामर्थ्य नहीं होता, यह कहा है, वह सभी वादियों के सिद्ध दृष्टान्त से घटता भी है इसे दृढतापूर्वक सिद्ध करते हैं— १. स्वप्न और मनोराज्य में चेतन का ही कार्य-कारणभाव देखा गया है। इस विषय में भट्ट दिवाकरवत्स का कथन है—न दृश्यते त्वत्प्रतिभासशक्तेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमित्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैवा विश्व- ३१
२४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१० योगिनामपि मृद्बीजे विनैवेच्छावशेन तत् । घटादि जायते तत्तत्स्थिरस्वार्थक्रियाकरम् ॥ १० ॥ यत् इह चेतनप्रेरितं कारणम्,—इति प्रसिद्धं मृदादि, यच्च तदनपेक्षं बीजादि घटादेरङ्कु- रादेश्च जनकं, तदेव यदि परमार्थतः कारणं स्यात् तत् तद्व्यतिरेकेण घटाङ्कुरादेः कथं योगीच्छा- मात्रेण जन्म स्यात्, अकारणत्वप्रसङ्गात् तेषां वा अकारणत्वापत्तेः। यथोच्यते—अन्ये एव ते घटाङ्कुरादयो मृद्बीजादिजन्याः, अन्ये एव च योगीच्छादिजन्याः,—इति, तत्रापि प्रबोध्यसे— विमर्शाभेदात् तावदभेद,—इति पूर्वमेव उक्तम्; तत्रापि योगी खलु अप्रतिहतेच्छः तस्य च इच्छा- तादृगेव घटो भवतु यो मृदादिकृतकुम्भसंभवभूर्यर्थक्रियाकरणचतुरवृत्तिरिति। तदेतदाह—तस्य स्थिरस्य अर्थक्रियाम्, रानुबन्धिनः कालान्तरानुबन्धिनश्च स्वस्य आत्मीयस्य अर्थक्रियाविशेषस्य करणे हेतुतच्छीला नुकूलरूपं घटादि जायते,—इति। ये त्वाहुः—नोपादानं विना घटाद्युत्पत्तिः, योगी तु इच्छया परमाणून् पश्यन् संघट्टयतीति। ते वाच्याः —यदि खलु अन्वयव्यतिरेकागमादि- परिदृष्टः कार्यकारणभावो योगिषु न विपर्येति,—इति हृदयमावर्जयति वः, तत् किं परमाणुग्रहेण; नो चेत् घटस्य कपालादि शरीरस्य स्वावयवाः, तेषां निजं निजं प्रसिद्धं तृणशस्तिलशोऽपि अन्यथा- योगियों के द्वारा मिट्टी और बीज के सम्बन्ध में बिना इच्छा के ही अङ्कुर अङ्कुरित हो जाते हैं। उसी प्रकार उन-उन अपनी क्रिया करनेवाले घटादि भी होंगे ॥ १० ॥ यह जो चेतन से प्रेरित प्रसिद्ध मृदादि कारण है, वह मृदादिरूप कारण बिना किसी अपेक्षा के बीजादि अकुरादि का एवं मृदादि घटादि का जनक नहीं होता है। यदि वही परमार्थतः होता तो कैसे उसके बिना भी घटादि और अंकुरादि चेतन की इच्छा से उत्पन्न हो जाते हैं। उसके बिना घटादि एवं अंकुरादि का कैसे योगी की इच्छामात्र से जन्य हो सकता है। उनकी कारणता नहीं होने से उनमें कारणता की प्राप्ति भी नहीं होती। यदि दूसरे लोग कहें कि घटादि और अंकुरादि क्रमशः मृदादि एवं बीजादि से उत्पन्न होते हैं और योगी की इच्छा से होनेवाले दूसरे ही अंकुरादि होते हैं, क्रम को तो बनाया जाता है, जब कि इन दोनों में विमर्श का भेद नहीं है, यह अभेद ही है इस बात को हम पहले भी कह चुके हैं। वहाँ पर भी योगी की इच्छा अप्रतिहत होती है और उसकी इच्छा जैसी होती है वैसा ही घट का निर्माण हो जाता है। जैसा कि कुंभकार मिट्टी से घट बना लेता है, तो भी उसी प्रकार का ही घट स्थिर अर्थ क्रिया करने- वाला घट कालान्तर में अपनी अर्थक्रिया विशेष को करनेवाला हेतु और उसके शील के अनुसार उत्पन्न होता ही है और जो लोग कहते हैं कि बिना उपादान के ही योगी की इच्छा से घटादि की उत्पत्ति होती है—यह बात नहीं है। योगी अपनी इच्छा से परमाणु आदि को संघटित कर लेता है। अन्वय-व्यतिरेक से होनेवाले कार्य-कारणभाव यदि योगी में विपरीत न होता तो तुम लोगों के हृदय को कौन आकर्षित करता, परमाणु के ग्रहण करने से क्या होगा और घट के प्रपञ्चप्रथनै कहेतुः ॥ हे भगवन् ? आपकी प्रतिभास-शक्ति के अतिरिक्त दूसरा कोई कारण स्वप्न में पदार्थों की विचित्र-रचना करने के लिए दिखायी नहीं देता है। विश्व प्रपञ्च के विस्तार करने में एकमात्र निमित्त संविद्रूप यह शक्ति ही है।
अ.-२, आ.-४, का.-१०] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४३ भवनमसहमानं लौकिकमेव कारणम्, — इति घटे मृद्दण्डचक्रादि, देहे स्त्रीपुरुषसंयोगादि सर्वम- पेक्ष्यं परिदृष्टदीर्घतरकालपरिवासमिति । योगीच्छया तु समनन्तरोदिघटदेहादिसंभवो दुःसमर्थ एव । चेतन एव तु तथा तथा भवति भगवान् भूरिभगो महादेवो नियत्यनुवर्त्तनोलङ्घनतर- स्वातन्त्र्यः, — इत्यत्र पक्षे नियत्यनुवर्तिनि लौकिके प्रसिद्धे कार्यकारणभावे स्वातन्त्र्यं, तदुल्लङ्घन- माद्रियमाणस्य तु योगिप्रायप्रसिद्धे लोकोत्तरे, — इति न कश्चित् विरोधः । इयान् च लोक एव, परमार्थतस्तु स एव क्रमाक्रमरूपविश्वसृष्ट्यादिकृत्यपञ्चकप्रपञ्चस्वभावः प्रकाशते; चेतनो हि स्वात्मदर्पणे भावान् प्रतिबिम्बवदाभासयति, — इति सिद्धान्तः । यदाह पूर्वगुरुः— 'निरुपादान- संभारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ।।' ( स्तवचि० ९ श्लो० ) इति ॥ १० ॥ ननु यदि प्रसिद्धकारणोल्लङ्घनेनापि तत्कारणजन्यकार्यविशेषतुल्यवृत्तान्येव कार्याणि जायन्ते, भग्नास्तर्हि अनुमानकथाः । तथा हि कथमप्यदन्यत्र नियमवद्भवेत् ?, — इत्याशङ्क्य प्रामाणिकतरम्मन्यैस्तादात्म्यतदुत्पत्ती नियमनिदानमुपगते; नहि निःस्वभावं वस्तु भवति, नापि भिन्नस्वभावं स्वभावभेदेन भेदात्; पर्यायशस्तत्स्वभावद्वयाभावे च निःस्वभावताप्रसङ्गात् । एवं लिए कपालादि उनके अवयवों का क्या प्रयोजन होता, उनके लिए अपना-अपना प्रसिद्ध छोटे-छोटे अवयवों के मिलाने का लौकिक व्यापार करना सब व्यर्थ हो जाता है । जैसा कि घट में मिट्टी, दण्ड, चक्रादि । पुरुष के शरीर होने में स्त्री-पुरुष संयोगादि सब की भी तो अपेक्षा रहती है वह व्यर्थ जाता । योगी की इच्छा से सब घटादि एवं अंकुरादि की उत्पत्ति हुआ करती और सबों का संयोग तो दुःसमर्थन ही होगा, इसलिए जिसके गर्भ में सारा विश्व रहता है, ऐसे भगवान् चेतन ही नियति का भी अतिक्रमण कर सकते हैं, यही उनका घनतर स्वातन्त्र्य है । इस प्रसिद्ध लौकिक निरन्तर कार्य-कारणभाव में ईश्वर की स्वतन्त्रता को भी अतिक्रमण करनेवाले के मत में योगी की प्रसिद्ध लोकोत्तर सृष्टि में कोई विरोध नहीं है । ये तो सब लौकिक ही बातें हैं, परमार्थतः क्रम एवं अक्रमपूर्वक विश्व सृष्टि के पञ्चकृत ( उत्पत्ति-स्थिति-लय-निग्रह-अनुग्रह ) स्वभाववाले चेतन भगवान् अपने में संपूर्ण भाव-पदार्थों को रखते हुए अपने से ही अवभासित करते हैं और उत्पन्न करते हैं । यही सिद्धान्त है । जिसका कि पूर्व गुरुवर्यों ने प्रतिपादन किया भी है—उपादान कारण के बिना ही अपने में ही सारे विश्व को भगवान् शूलपाणि प्रकाशित करते हैं । जैसा कि बिना भित्ति का चित्र । ( स्तवचि० ९ श्लोक में ) ॥ १० ॥ अच्छा तो, यदि प्रसिद्ध कारण का अतिक्रमण करने पर भी उसके कारण से होनेवाले कार्य विशेष ही होता है, इससे फिर अनुमान करने का कोई आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी । दूसरी जगह नियम से क्यों होगा ? ऐसी आशंका कर कहते हैं कि अपने को दृढ़ प्रामाणिक मानने- वाले तादात्म्य उससे उत्पत्ति को नियम का कारण मानने पर कोई वस्तु निःस्वभाव ( स्वभाव- शून्य ) नहीं हो सकती, भिन्न स्वभाववाली भी नहीं हो सकती; क्योंकि स्वभाव में भिन्नता होती है, इसलिए उसका भी भेद हो जायेगा । इस प्रकार यदि क्रमशः एक-एक को मानते हो तो दो स्वभाव के अभाव होने के कारण निःस्वभावत्व प्राप्त हो जायेंगे । इस प्रकार निर्हेतुक और भिन्न
२४४ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-११ निर्हेतुके भिन्नहेतुके च कार्ये वाच्यम् । उभयत्रापि च हेतुकृतैव व्यवस्था; स्वहेतुत एव हि शिंशपा वृक्षस्वभावाव्यभिचारिणी जाता, स्वहेतुतश्च हुतभुग्धूमजननस्वभावः, तदिदानीं नियत्युल्लङ्घिनि कार्यकारणभावे सर्वमिदं विघटेत । योगीच्छया हि शिंशपापि अवृक्षस्वभावा भवेत्, धूमे तु द्विगुणं चोद्यम्; अग्न्यादिसामग्री योगीच्छोद्भूता धूमं न जनयेत्, योगीच्छा वा अनग्निकं धूमम्,—इति न स्यादनुमानम्, अस्ति च तल्लोके, इत्याशङ्कयाह— योगिनिर्माणताभावे प्रमाणान्तरनिश्चिते । कार्यं हेतुः स्वभावो वात एवोत्पत्तिमूलजः ॥ ११ ॥ योगीच्छापि सर्वथा तादृशमेव न तु वृश्चिकगोमयादिसंभूतवृश्चिकादिन्यायेन कथंचित् रसवीर्यादिना भिन्नं कार्यं जनयति,—इति यत् कथितमत एवास्मादेव हेतोः कार्यं वा धूमादि अग्न्यनुमाने, शिंशपात्वादित्वस्वभावो वा वृक्षत्वाद्यनुमाने एवं हेतुर्भवति, यदि प्रमाणान्तरेण लोक- प्रसिद्ध्या योगिनिर्माणत्वस्याभावो निश्चितो भवति नान्यथा; अत एवानुमाने जन्मान्तराभ्यास- लोकप्रसिद्ध्यादिकमवश्योपजीव्यम् । सा च श्रुतानुमानप्रज्ञयोर्बीजम्,—इति च ऋतंभराविषयमु- हेतुक के कार्य में ऐसा ही कहना पड़ेगा । दोनों स्थलों में हेतु के द्वारा ही व्यवस्था होगी; अपने हेतु से ही शिंशपा वृक्ष स्वभाव को छोड़ सकती है, धूम में यही दूना कह सकते हैं, योगी की इच्छा से उत्पन्न होनेवाली अग्नि इत्यादि सामग्री धूम नहीं उत्पन्न कर सकती और यह अनुमान भी नहीं बन सकता है । लोक में तो यह होता है कि अग्नि से धूम निकलता है, ऐसी आशङ्का करके कहते हैं कि— योगी की इच्छा से निर्माण न होने पर दूसरे प्रमाण से ही कार्य निश्चित होता है । इसलिए कार्य हेतु या स्वभाव मूल उत्पत्ति से उत्पन्न होता है ।। ११ ।। इस प्रकार योगी की इच्छा भी सर्वथा ऐसी नहीं होती है । जैसा कि गोबर से वृश्चिक उत्पन्न होता है, उसी प्रकार रस-वीर्यादि से भिन्न वृश्चिक को उत्पन्न कर देते हैं, हमारे कहे हुए हेतु से धूमादि कार्य अग्नि के अनुमान में एवं वृक्षत्व के अनुमान में शिंशपादि स्वभाव हेतु होता है, यदि दूसरे प्रमाण से लोक सिद्धिपूर्वक ही वस्तु का निर्माण हो जाय तो उसमें योगी की इच्छा का अभाव ही रहता है । अन्यथा नहीं होता; इसलिए दूसरे जन्म में लोक प्रसिद्धि के द्वारा किये हुए अभ्यासों के संस्कार का उपभोग अवश्य करना चाहिए । वह श्रुतानुमान और प्रज्ञा का बीज है, इसलिए योगसूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' समाहित चित्त की जो प्रज्ञा है वह ऋतम्भरा प्रज्ञा बुद्धि है । उस दशा में वस्तु की यथार्थता को देनेवाली बुद्धि का उदय होता है । इन्द्रियों के साथ अर्थों का सम्बन्ध होकर जो प्रत्यक्ष विषय होता है, उसको माननेवाले दूसरे १. ऋतम्भरा समाधि प्रज्ञा 'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' । तस्मिन् समाहितचित्तस्य या प्रज्ञा जायते तस्या ऋतम्भरेति संज्ञा भवति अन्वर्था च सा सत्यमेव बिभर्ति न च तत्र विपर्यासगन्धोऽप्यस्तीति तथोक्तम्— 'आगमेनानुमानेन तथाभ्यासरसेन च । त्रिधा प्रकल्पयन् प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ।।' सा पुनः 'श्रुतानुमान- प्राज्ञभ्यामन्यविषया विशेषार्थविषयत्वात्' श्रुतमागमविज्ञानं तत्सामान्यविषयं नहि आगमेन शक्यो विशेषोऽभिधातुं कस्मात् नहि विशेषेण कृतसंकेतः शब्दः तथानुमानं सामान्यविषयमेव यत्र प्राप्तिस्तत्र गतिः यत्र न प्राप्तिस्तत्र गतिरपि न भवतीति तस्मात् श्रुतानुमान-विषये विशेषो न कश्चिदस्तीति । न
अ.-२, आ.-४, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४५ वाच पतञ्जलिः । अन्ये च यौक्तिका योगिप्रत्यक्षकल्पप्रत्यक्षसद्भावं समस्तवस्तुग्रहणाय कल्पित- वन्तः । सांव्यवहारिके च प्रमाणे नास्माकं भरः; प्रकृतं हि अस्माकमीश्वरस्वरूपं, तच्च स्वप्रका- शमेवान्यप्रमेयोपरोधेऽपि नोपरुध्यत, — इत्युक्तमसकृत् । ननु स्वभावहेतौ किमनया चिन्तया ?, लोग हैं, योगी प्रत्यक्ष के सदृश्य प्रत्यक्ष प्रमाण को भी सब वस्तु पदार्थों के ग्रहण में कल्पना करते हैं । इस प्रकार छः सन्निकर्षों से प्रत्यक्षादि विषय दृष्टिगत होता है, इस विषय में हम लोगों का कोई भार नहीं है; क्योंकि हमें तो प्रकृत ईश्वर स्वरूप ही मान्य है और वह तो अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित ही रहता है । किसी अन्य प्रमेय से अवरोध होने पर भी नहीं रुकता, ऐसा चास्य विशेषस्या प्रामाणिकस्याभावोऽस्तोति समाधिप्रज्ञातिग्राह्य एव स विशेषो भवति भूतसूक्ष्मगतो वा पुरुषगतो वा, न चास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टस्य वस्तुनो लोक प्रत्यक्षेण ग्रहणं तस्माच्छु तानुमानप्रज्ञाभ्या- मन्यविषया सा प्रज्ञा विशेषार्थत्वादिति । यह पातञ्जल योग दर्शन में दिखाया गया है कि उस समाहित चित्त की अवस्था में जो बुद्धि पैदा होती है उसे शास्त्र में ऋतम्भरा नाम से कहा जाता है तथा वह बुद्धि यथार्थ ज्ञानवाली मानी जाती है, एवं सत्य को ही पालन करती है उसमें विपरीत ज्ञान की गन्ध थोड़ी सी भी नहीं मिलेगी अर्थात् अविद्या से इसका कोई लगाव नहीं होता । आगमशास्त्र, अनुमान और ध्यानाभ्यास के बल से उत्पन्न रस द्वारा विचार विमर्श करता हुआ उत्तमयोग की गति को प्राप्त कर लेता है । श्रुतिज्ञान और अनुमानज्ञान से व्यतिरिक्त विषयक वह बुद्धि होती है । इसकी विशेषता है कि यह बुद्धि अर्थ को साक्षात् करने में समर्थ होती है । श्रुतिजन्य ज्ञान सामान्यरूप से तो पदार्थ का ज्ञान करानेवाला ही होता है । श्रुति ज्ञान अर्थात् आगम से यथार्थ स्वरूप को बुद्धि धारण करने में असमर्थ है । क्यों ? विशेषरूप से अर्थ का शब्द के साथ संकेत नहीं हुआ होता है वैसे ही अनुमान भी सामान्य विषयक बन जाता है । जहाँ तक हेतु की प्राप्ति है वहाँ तक ही अनुमान की गति देखी जाती है उससे आगे नहीं हो सकती; क्योंकि हेतु से ही हेतुमान् का बोध होता है । इसलिए श्रुत और अनुमान इन दोनों विषयों में विशेष अर्थ कुछ भी काम नहीं कर सकता है । लौकिक वस्तु के प्रत्यक्ष से सूक्ष्म, आवृत्त [ ढका हुआ ] जो कि अत्यन्त परिश्रम से जानने योग्य आत्मज्ञान का ग्रहण करना कठिन हो है और अनुमान तथा आगम प्रमाण से शून्य विशेष पदार्थ-वस्तु का अभाव भी नहीं दिखता । समाहित बुद्धि के द्वारा निश्चय किया गया अर्थ ही विशेषार्थ माना जाता है फिर वह ज्ञान सूक्ष्मभूतों का ही क्यों न हो अथवा पुरुष स्वरूप का हो । इसीलिए श्रुत और अनुमान की बुद्धि से तो वह बुद्धि दूसरे अर्थ को विषय करनेवाली ही होती है जबकि यह यथार्थता को ग्रहण करती है । १. नियम का ज्ञान सामान्य होता है, धूम और वह्नि के सहचार का प्रत्यक्ष और वह्नि के बिना धूम की स्थिति नहीं पायी जाती है इन दोनों की सहायता से धूम वह्नि का व्याप्य है—ऐसा ज्ञान मन से होता है । जबकि इस विषय में कहा भी गया है— मनश्च सर्वविषयं केन वा नाभ्युपेयते । असंनिहितमप्यर्थमवधारयितुं क्षमम् ॥ मन तो जो असंहित विषय है उसका भी ग्रहण कर लेता है इसलिए उस सर्वविषयक मन को कौन नहीं मानेगा अर्थात् सब को मानना ही पड़ेगा ।
२४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-११
आह-वृक्षत्वाव्यभिचारिण्याः शिंशपाया उत्पत्तेर्यन्मूलं कारणं तत एव स तन्मात्रानुबन्धी स्वभावो जायते,-इति; ततश्च-'एकसामग्र्यधीनस्य रूपादे रसतो गतिः । हेतुधर्मानुमानेन धूमेन्धन- विकारवत् ।।' इति स्वभावहेतुर्न्यायः । ननु च वृश्चिकादीनां कीटगोमयाद्यनेककारणस्त्वं तावत् दृष्टं, रसवीर्यादिभेदस्तु तत्र,-इत्यन्यदेतत् । तद्योगिजन्यत्वमवह्निकस्यापि धूमस्य सह्यं नाम, स्वभावस्य तु कथं विपर्याससंभावना । न हि नीलं सदेवानीलं योगीच्छया भवति,-इति कश्चित् प्रामाणिकः प्रतीयात् । उच्यते । इह द्विविधो हि स्वभावहेतुरन्तर्लीनकार्यकारणभावस्तद्विपरीतश्च; वह्निमानयं पर्वतो धूमवत्त्वात् इति, अनित्योऽयं कृतकत्वात् इति । तत्र आद्यस्य तावत् कार्यकारणभाव एव मूलम्,-इति किं तत्रोच्यते । अपरस्तु विचार्यते, यदि तावत् कृतकत्वस्य कारणायत्तत्वं नाम स्वभावः कथम् अभवनपरिच्छिन्नभवनस्वभावता नामानित्यत्वं स्वभावः स्यात् ? आभासभेदात् । अभेदे तु आभासस्य हेतुसिद्धावेव साध्यस्य सिद्धत्वात्, यदि परं व्यवहारः साध्यते, तरुरयं वृक्षत्वात्,-इति न्यायेन व्यवहारश्च ज्ञानाभिधानात्मा कार्य एव, तत्रैव नियतिशक्तिरङ्गीकृता हमने अनेक बार कहा भी है । अच्छा तो, इस पर शङ्का होती है कि इसमें स्वभाव ही हेतु है तो अन्य चिन्ताओं से क्या प्रयोजन ? ऐसी आशङ्का कर कहते हैं कि वृक्षत्व युक्त शिंशपा की उत्पत्ति में जो मूल कारण है उसी से शिंशपा मात्र सम्बन्ध रखनेवाला स्वभाव ही उत्पन्न होता है, इस विषय में कहते भी हैं। एक सामग्री के अधीन होनेवाले रूपादि की रस से उत्पत्ति होती है। हेतु धूम के अनुमान द्वारा जैसा कि धूम लकड़ी का विकार है । यही स्वभाव हेतु का न्याय है । पुनः शङ्का करते हैं कि वृश्चिकादि की उत्पत्ति में भी कीट-गोबर आदि बहुत से कारण देखे गये हैं, रस-वीर्यादि का भी भेद वहाँ पर होता है ये सब दूसरी बातें हैं । योगी से धूम उत्पन्न होता है वह बिना अग्नि के भी हो सकता है, किन्तु स्वभाव का परिवर्तन नहीं होता । योगी की इच्छा से नील पदार्थ है वह अनील नहीं हो सकता है; कोई भी प्रामाणिक व्यक्ति इस पर विश्वास नहीं रखेगा । इसका उत्तर देते हैं कि यहाँ पर स्वभाव के भी दो हेतु होते हैं; एक अन्तर्लीन कार्य- कारणभाव और दूसरा उसके विरुद्ध जैसा कि यह पर्वत वह्निवाला है धूमवाला होने से, यह अनित्य है उत्पत्ति शील होने के कारण । उसमें आद्य कार्य-कारणभाव ही मूल है-वहाँ फिर क्या कहना । दूसरे पर विचार करते हैं, यदि कृतकत्व कारण के अधीन है तो वही स्वभाव हुआ नहीं होने का स्वभाववाला वह होने को स्वभाववाला अनित्य कैसे होगा ? क्योंकि दोनों में आभास का भेद है । अभेद में तो आभास का हेतु सिद्ध ही रहता है; क्योंकि सिद्ध में ही साध्य की सिद्धि होती है, यदि दूसरा व्यापार सिद्ध करना हो, तो यह वृक्ष है, वृक्षत्व होने के कारण । इस न्याय १. अभावेन हि धर्मेण तद्वत्ता धर्मिणः कथम् । अभावग्रहवेलायां धर्मिणोऽनुपलम्भनात् ॥ अभावरूप धर्म से धर्मी को अभाववाला नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि अभाव के ज्ञान काल में धर्मी का ज्ञान नहीं होता है अर्थात् अभाव ज्ञानकाल में धर्मी का ज्ञान नहीं होने के कारण यह अभाववान् है ऐसा कहना असंभव हो जाता है । २. साध्या नुमिति वेलायां न चास्ति नियमग्रहः । नियमग्रहकाले च न साध्यमनुमी तया॥
अ.-२, आ.-४, का.-११] विमर्शिनीटीकोपेता [ २४७
भवतापि । तस्मात् सर्वेषु स्वभावहेतुष्वाभासभेदं विना व्यवहारमात्रसाधनमेव, हेत्वाभासमयत्वा- देवानधिको हि तत्र साध्याभासो, व्यावृत्तोनामेषैव वार्ता, सामान्यानामियमैव सरणिः। तस्मात् नियतिशक्त्यायत्तः शिंशपाभासवृक्षाभासयोः पूर्बनीत्या सामानाधिकरण्याभासो हेतुबलात् । ततः स्वभावोऽयं हेतुहेतुमद्भावमूल एव, तत एव सामान्येनेदमुक्तं द्रष्टव्यं—सर्वः स्वभावहेतुरुत्पत्ति- मूलजः,—इति । आभासा एव च वस्तु,—इति च समर्थितं प्राक् । ततश्च शिंशपायामेकस्यामेव सृज्यमानायां शाखादिपदार्थान्तराणामसृष्टेर्वृक्षाभासस्य सामान्यात्मनः साध्यस्य नामापि नास्ति,— इति संभाव्यत एव । यत्तु तदेकरूपं विशिष्टं वृक्षत्वं तत् खलु शिंशपात्वमेव तच्च सिद्धम्,—इति से व्यवहार भी ज्ञानाभिधानरूप होकर कार्य के रूप में ही सिद्ध हो जायेगा, वहाँ पर ही नियति- शक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा, यह तो आप को भी अभीष्ट है । इसलिए सभी स्वभाव हेतुओं में आभास भेद के बिना ही व्यवहार मात्र के लिए साधन माना जाता है, [ अभेद में भी आभास का व्यवहार मात्र के लिए ही भेद का व्यपदेश किया हुआ होता है ] हेत्वाभासमय होने के कारण साध्याभास कोई अधिक नहीं होता, विशेष पदार्थों में अभेद भासित होने पर भी भेद की कल्पना व्यवहार साधनार्थ मात्र होतो है, सामान्य पदार्थों के लिए भी यही मार्ग है । इसलिए नियति शक्ति के अधीन ही शिंशपाभास और वृक्षाभास इन्हीं दोनों की पूर्व नीति के अनुसार सामानाधिकरण्य आभास हेतु के बल से होता है। इसलिए यह स्वभाव हेतुहेतु- मद्भावमूलक ही होता है। इसी कारण सामान्यरूप से कहे हुए को ही देखना चाहिए कि स्वभाव हेतु उत्पत्तिपूर्वक ही होता है, आभास पदार्थ ही वस्तु हैं। इसका हमने पूर्व में ही समर्थन कर दिया है इससे जब एक शिंशपा में बनायी जायेगी तब तो शाखा प्रभृति अन्य पदार्थों और वृक्षाभास में सामान्यतः साध्य का नाम भी नहीं रहता है, यह ठीक ही है। एक रूप विशिष्ट वृक्ष तेन गृहीतपूर्वः सन्निदानों स्मृतिगोचरः । नियमः प्रतिप्रत्यङ्गं तथावगतिदर्शनात् ॥ साध्य [ वह्निरूप ] की अनुमिति काल में व्याप्ति ज्ञान [ यत्र-यत्र धूमस्तत्र-तत्र वह्निरिति साहचर्य-नियमो व्याप्तिः ] के काल में अनुमान नहीं होता है । इसी कारण पहले से ग्रहण की हुई होने पर अभी इस समय स्मर्यमाण विषयक जो व्याप्ति है वही अनुमिति में कारण होती है; क्योंकि वैसी अवगति देखी भी जाती है । १. इस विषय में नैयायिकों ने कहा है— तस्मिन्सत्येव भवनं न विना भवनं ततः । अयमेवाविनाभावो नियमः सहचारिता ॥ किं कुतो नियमोऽस्यास्मिन्निति चेन्नैवमुत्तरम् । तदात्मतादिपक्षे तु नैष प्रश्नो निवर्तते ॥ ज्वलनाज्जायते धूमो न जलादिति का गति । तर्कस्य यावान् विषयः स तावति निरूप्यते ॥ वस्तुस्वभावभेदे तु न तस्य प्रभविष्णुता । अयं च विषयो युक्तं यदुक्तं नियमाद्विना ॥ नार्थादर्थान्तरे ज्ञानमतस्तस्य प्रकल्पनम् ।
४. तत्त्व-संग्रह अधिकार: प्रत्यभिज्ञा-फल, जीवन्मुक्ति एवं महाभाष्य उपसंहार
२४८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-२, आ.-४, का.-१२ न साध्यम् । कारणायत्तमिदम्,–इत्याभासेऽपि न स्यादनित्यताभासः। एवमर्थक्रियाकारित्वा- भावेऽपि क्षणिकत्वाभासाभावः,–इति नियत्यपेक्षयैव सर्वे स्वभावहेतवो नान्यथा,–इत्येकान्त एषः ॥ ११ ॥ नन्वाभासवस्तुत्ववादेऽनाभातस्य अग्नेरवस्तुत्वम्,–इत्यनाभातेन कथं धूमो जन्यते, ततश्च धूमादग्नेः कारणस्य कथमनुमानम् ? इत्याशङ्क्य समर्थयितुमाह– भूयस्तत्तत्प्रमात्रेकवह्नयाभासादितो भवेत् । परोक्षादप्यधिपतेर्धूमाभासादि नूतनम् ॥ १२ ॥ कार्यमव्यभिचार्यस्य लिङ्गम्············ का स्वरूप है, वह तो सिद्ध शिंशपात्व ही है, किन्तु वह साध्य नहीं है । यह तो कारण के अधीन रहता है, इस प्रकार आभास में भी अनित्यता का आभास नहीं होता । एवं अक्षणिकवादी तार्किकों के मत में नियति-शक्ति का समर्थन कर क्षणिकवादी के मत में भी प्रसंग वशात् समर्थन करते हैं कि अर्थक्रियाकारिता के न रहने पर भी क्षणिकत्व के आभास का अभाव ही रहेगा । सभी स्वभावों के हेतु नियति-शक्ति की अपेक्षा से ही होते हैं अन्यथा नहीं होते, यह एक दृढ पक्ष है ॥ ११ ॥ अब शङ्का करते हैं कि जब आभास ही वस्तु है तो इस पक्ष में जो अनाभातरूप अग्नि है वह भी अवस्तु हो जायेगी । अत एव अनाभात अग्नि से कैसे धूम उत्पन्न होंगे और इसके बाद धूम से अग्नि का अनुमान कैसे करोगे ? ऐसी आशङ्का कर समर्थन के लिए अब कहते हैं— उन-उन प्रमाताओं के द्वारा एक ही वह्नि के आभास से धूम का अनुमान भूयो व्याप्ति के इसलिए यह सिद्ध होता है— पञ्चलक्षणकाल्लिङ्गाद्गृहीतान्नियमस्मृतेः । परोक्षे लिङ्गिनि ज्ञानमनुमानं प्रचक्षते ॥ उसके रहने पर ही यह उत्पन्न होता है, न रहने पर नहीं होगा इसी का नाम अविनाभाव नियम है जैसे मिट्टी के बिना घट का निर्माण नहीं हो सकता । इसमें हेतु क्या है—कारण के रहने पर ही कार्य का उत्पन्न होना और न रहने पर नहीं होना यही नियम है । यह क्यों है ? इस आशङ्का का उत्तर देते हैं—इस नियम में वस्तु अपना स्वभाव छोड़कर कोई दूसरा कारण नहीं बन जाती है । आप जो तादात्म्य को इस नियम का कारण मानते हैं । वह ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष में अग्नि से धूम का उत्पन्न होना तो संगत भी है किन्तु जल से धूम का उत्पन्न होना कहीं नहीं देखा जाता है, क्यों ? इसका कोई समाधान नहीं हो सकता है । जितना तर्क का विषय होता है उतना ही किया जा सकता है इससे आगे तर्क न करना ही अच्छा होता है; वस्तु के स्वभाव भिन्न-भिन्न होते हैं यही मात्र तर्क का विषय नहीं है, इसमें फिर तर्क कुण्ठित हो जायेगा—यह तर्क का विषय नहीं है; अतः इस पर तर्क का प्रभुत्व नहीं हो सकता । उस नियम की कल्पना तो इसलिए की जाती है कि नियम के बिना दूसरे पदार्थ से किसी अन्य पदार्थ का ज्ञान अयुक्त होता है अतः निष्कर्ष यह है कि पञ्चलक्षणवाले हेतु से गृहीत नियम के द्वारा ही स्मृति होने पर परोक्ष वस्तुओं का जो ज्ञान होता है उसको अनुमान कहते हैं ।