जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
१२८ सटीकजातकपारिजाते- परन्तु स्मरण रखिये कि यहां उनका पापवाला कार्य नहीं है अर्थात् आधा भाग घटेगा पूरा भाग नहीं घटेगा, ऐसा सत्याचार्यने कहा है ॥ ९-१० ॥ अथ क्रूरोदयहरणम् । सार्द्धोदितोदितनवांशहतात्समस्ताद् भागोऽष्टयुक्तशतसंख्य उपैति नाशम् । क्रूरे विलग्नसहिते विधिना त्वनेन सौम्येक्षिते दलमतः प्रलयं प्रयाति ॥ ११ ॥ लिप्तीभूतैर्लग्नभागैर्निहन्यादायूर्दायं खेचराणां पृथक्स्थम् । व्योमाकाशग्विन्दुपक्षैर्भजेत्तत् स्वायुर्दायाच्छोध्यमब्दादि लब्धम् ॥ १२ ॥ एतत् क्रूरे लग्नके सौम्यदृष्टे तस्मिन्पापे तत्फलाद्धं विशोध्यम् । एतद्दायनांशसञ्ज्ञे विधेयं पिण्डायुर्वत् कर्म नैसर्गिके च ॥ १३ ॥ इदानीं लग्नस्थे पापग्रहे हरणमाह । क्रूरे = पापग्रहे विलग्नसहिते = लग्ने विद्यमाने [L
अतः—लग्नांशलिप्तिका हत्वा प्रत्येकं विहगायुषा। भाज्या मण्डललिप्ताभिरिति कल्याणवर्मोक्तमप्युपपद्यते ॥ ११-१३ ॥ अब और संस्कार इसका इस प्रकार है कि—लग्नके जितने नवांश भुक्त हुए हों वे उदित नवांशके नामसे कहे जाते हैं। जिस नवांशमें जन्म है वह जितना भुक्त हुआ हो उसपरसे त्रैराशिक द्वारा जो फल मिले उसको उदित नवांशमें जोड़नेसे सार्द्धोदित उदित नवांश होता है इसकी कला करके लग्नमें यदि पापग्रह हैं तो इष्ट ग्रहकी दशापिंडसे गुणन कर उसमें १०८ का भाग देनेसे जो लब्धि मिले वह उस ग्रहके वर्षादिमें हीन करे यदि उस लग्नस्थित पापग्रहपर शुभग्रह की पूर्ण दृष्टि हो तो उस लब्ध फलका आधा ही घटावे। इस संस्कारमें ऐसा भी अर्थ कोई २ आचार्य करते हैं कि लग्नमें पापग्रह हों तो सार्द्धो- दित उदित नवांशसे सब ग्रहोंके आयुयोगको गुणे फिर उसमें १०८ का भाग देनेसे जो मिले उसे सम्पूर्ण पिंडमें घटावे यदि लग्नमें शुभग्रह हो तो उस लब्धि फलका आधा घटाने से जो बचे वह समस्त ग्रहोंकी दशा होती है। बाद दशाकी गणना से सब ग्रहोंकी दशा वर्षादि लेवे ॥ ११ ॥ लग्नके भुक्त अंशोंकी कला बनाकर उससे ग्रहोंकी अपनी २ आयुको अलग २ गुण दे और २१६०० से भाग दे, जो लब्धि मिले उसे ग्रहोंकी गणितागत आयुमें घटावे, शेष ग्रह की स्पष्टायु होती है। परन्तु यह क्रिया यदि पापग्रह लग्नमें हो तभी करनी चाहिये। यदि उस लग्नस्थित पापग्रहके ऊपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो ऊपर की क्रियासे जो वर्षादि लब्धि मिले उसका आधा ही ग्रहोंकी आयुमें घटाना चाहिये। परन्तु यह प्रकार अंशायुमें नहीं होता। पिण्डायुकी तरह निसर्गायुकी भी प्रक्रिया करनी चाहिये ॥ १२-१३ ॥ अथ लग्नायुःसाधनम्। आयुस्तथैतेषु बलाढ्यलग्ने विहाय राशीन् कृतलिप्तिकेऽत्र । भक्ते द्विशत्या फलमब्दपूर्व यत्स्याद्विलग्नायुषि तच्च योज्यम् ॥ १४ ॥ लग्नराशिसमाश्वाब्दास्तन्मासाद्यनुपाततः । लग्नायुर्द्वायमिच्छन्ति होराशास्त्रविशारदाः ॥ १५ ॥ अथाधुना लग्नायुः साध्यते । आयुस्तथैतेषु = यथा किल ग्रहाणामायुः साध्यते तथा एतेषु पिण्डादिषु लग्नस्याप्यायुः साध्यमिति भावः । तत्र बलाढ्यलग्ने स्वषड्बलेन सहिते लग्ने लग्नस्य राशीन् विहाय भुक्तभागानां कृतलिप्तिके = कलीकृतेऽत्र द्विशत्या भक्त अब्द- पूर्वं वर्षार्थं फलं यत्स्यात् तच्च लग्नायुषि लग्नायुर्दाये योज्यं वाच्यमित्यर्थः । लग्नस्य पिण्डायुर्मानं यथा ग्रहाणामुक्तं तथा नोक्तम् "होरात्वंशप्रतिममपरे राशितुल्यं वदन्तीति" श्रवणात् । अत्र लग्नस्य भुक्तभागाः कलीकृताः शतद्वयेन विभक्ता नवांशा लभ्यन्तेऽतो लग्ने नवांशतुल्यमेवायुर्वर्षार्यामिति होरात्वंशप्रतिमं सङ्गच्छते । अथापरे राशितुल्यं वद- न्तीति द्योत्यते । लग्नेन यावन्तो राशयो मेषादयो भुक्तास्तावन्ति वर्षाणि, तथाऽनुपातत- स्तनमासादिः लग्नायुर्दायो भवति । तत्र मासाद्यर्थमनुपातो यथा यद्यष्टादशशतकलाभिर्द्वा- दशमासास्तदा लग्नस्य भुक्तकलाभिः क इति लब्धं मासादि राशितुल्यवर्षे संयोज्य लग्ना- युर्ज्ञेयम् । अथात्र केशवेन । "स्याल्लिप्ताः खनखोद्धृता विभतनोर्वर्षादि पैण्ड्यत्रिके लग्नायुर्निखिलाँस्तदंशकसमं कैश्चिद्भतुल्यं स्मृतम् । यस्येशोऽधिवलस्तदेन हि परैस्तेनान्त्यमन्येऽदं शायुर्वत् त्वय चांशतुल्यमखिलोकं ग्राह्यमेवादिरुम्" ॥ इत्युक्तत्वाद्ब्रह्मांशतुल्यमेव लग्नस्यायुर्ग्राह्यमिति ममापि मतम् ॥ १४-१५ ॥
' has the top left circle, and the matra is 'ु' (curving left). In line 26, the letter looks like 'म' with a 'ू': "ग्रहमूक्त"! The typesetter definitely made an error: they used 'म' with 'ू' instead of 'भ' with 'ु'! Wait, let me look closer at line 26: could it be 'भ'? No, look at the top horizontal bar: it completely covers the letter from left to right without any break! A 'भ' ALWAYS has a break in the top bar in Devanagari fonts (like in "बहुसाम्यं" right next to it, where 'ब' is followed by 'हु', and in "भदन्तभाषिते" line 30 where both 'भ' have an open top). Here, the bar is completely unbroken! And the letter has a straight left side with a bottom loop, exactly like 'म'. So the typesetter misprinted it as "ग्रहमूक्त"! Wait, could it be "ग्रहभुक्त" with a font where 'भ' sometimes has a full bar? No, all other 'भ' have broken bars. So it's a typo in the print: "ग्रहमूक्तनवांशराशितुल्यं".
Let's check line 27: "सत्योक्ते ग्रहमिष्टं लिप्तीकृत्या शतद्वयेनाप्तम् ।" Wait, is it "लिप्तीकृत्या"
आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १३१ मध्येऽनुपातः स्यादानयनं शेषमत्र यत्किञ्चित् । पिण्डायुष इव कार्यं तत्सर्वं गणिततत्त्वज्ञैः ॥ इति ॥ अतोऽनेन जीवशर्मणा आयुः स्पष्टीकरणादि सर्वं कर्म तुल्यमेवाकारि केवलं वर्षपाठे विशेषः । परमस्मिन्नायुषि न कस्याप्यभिमतम् । इति । अथ सत्याचार्यमतमुच्यते । ग्रह- भुक्तनवांशराशितुल्यं यत्र तत्र राशौ ग्रहो यस्मिन्नवांशे भवेत्तन्नवांशराशिसङ्ख्यातुल्यानि वर्षाणि तस्य ग्रहस्यायुर्भवति । यथा कुत्रापि राशौ ग्रहो सिंहनवांशे तदा ५ वर्षाणि, मक- रनवांशे १० वर्षाण्येवं सर्वत्र ज्ञेयम् । एतत् सत्याचार्यस्य वाक्यं बहुसाम्यं = बहूनामाचा- र्याणां वाक्येन सादृश्यमुपैति । यथा वचनम्— “आयूंषि राश्यंशकचारयोगात्” इति यवनेश्वरस्य । सत्यवाक्यं बहुसाम्यमुपैतीत्यनेन वराहस्यापि सत्यमत
१३२ सटीकजातकपारिजाते- युता' इति लक्षणलक्षिता भवेत् तदा राशिसमं = लग्नेन यावन्तो राशयो मेषादयो भुक्तास्ता- वन्ति वर्षाण्यायुर्दायं ददाति । तत्रापि मासाद्यं भुक्तांशवशाज्ज्ञेयम् । तथोक्तं बादरायणेन- होरादयोऽप्येवं बलयुक्तान्यानि राशितुल्यानि । वर्षाणि संप्रयच्छन्त्यनुपाताच्चांशकादि फलम् ॥ इति । अत्र = सत्यमतांशायुर्दाये क्रूरोदये सार्द्धोदितोदितेत्यादिना यः अपचयः पूर्वाचार्यमतेन क्रियते स न कार्यः । तथा प्रथमोपदिष्टैः 'नवेन्दवो बाणयमा' इत्यादि पूर्वोत्तरैरेवं 'ग्रहदायं परमायुषः स्वरांशमिति' च तैरायुषः स्पष्टीकरणं न कर्त्तव्यमिति ॥ अथात्रायुर्विषये सत्यमताङ्गीकरणमाह-सत्येति । अत्रास्मन्नायुःसाधनेऽन्या- चार्यापेक्षया सत्योपदेशो वरं = समीचीन इति । किन्तु वरमपि सत्यमतं बहुवर्गणाभिः = स्वतुङ्गवक्रोपगतैस्त्रिसङ्गुणमित्यादिभिरनेकगुणनाभिरयोग्यङ्कुर्वन्ति=विनाशयन्ति । यथा कश्चि- द्व्रहः स्वीय एव षड्वर्गादौ भवेत्तदा तस्य स्वगृहगतत्वादायुर्द्विगुणं कुर्वन्ति । तस्यैव स्वद्रे- ष्काणे गतत्वात्पुनर्द्विगुणमेवं तस्यैव स्वोच्चगतत्वात् त्रिगुणमेवं पुनः पुनर्गुणनाभिरनवस्था भवति । तथा हि- वर्गोत्तमे स्वरांशौ द्रेष्काणे स्वे नवांशके द्विगुणम् । वक्रोच्चगते त्रिगुणं द्विगुणं कार्यं यथासङ्ख्यम् ॥ इत्येवं बहुवर्गणाभिः सत्यमतमयोग्यं कुर्वन्ति । अत एव बहुघ्नतायां = पुनः पुनर्गुणनायां यदेकं भूरि = बहुतरं तदेव कार्यम् । पुनः पुनः द्विगुणे सकृदेव द्विगुणम् । यत्र द्विगुणत्वं त्रिगुणत्वं च प्राप्तं तत्र सकृत्त्रिगुणम् । पुनः पुनस्त्रैगुण्ये सकृदेव त्रिगुणमिति । एतदाचार्यक- माचार्याभिमतमिति । तथाऽऽहाचार्यः स्वल्पजातके वराहः- वर्गोत्तमे दृकाणे स्वनवांशके सकृद् द्विगुणम् । वक्रोच्चयोर्द्विगुणितं द्वित्रिगुणत्वे सकृत् त्रिगुणम् ॥ इति ॥ अत्र यथा बहुघ्नतायामेकैव महती गुणना क्रियते तथैव बहुवारं हानिष्वपि प्राप्तास्वेकवा- रमेवापहानिः प्रकर्त्तव्या । तथा च भगवान् गार्गिः- .........'ततोऽन्यासु बहुष्वपि । प्राप्तास्वेकैव कर्त्तव्या या स्यात्तासु महत्तरा । ततोऽपि गुणना कार्याऽप्येकैव महती सकृत् ॥ इत्याह ॥ १७-२१ ॥ इस अध्यायके तीसरे श्लोकमें सूर्यकी १९ वर्ष, चन्द्रमा की २५ वर्ष इत्यादि क्रमसे ग्रहायु कही है । परन्तु जीवशर्माजीका मत है कि मनुष्योंके परमायु का प्रमाण १२० वर्ष ५ दिन हैं, और सूर्यादि सात ग्रह हैं इन सबकी बराबर आयु उच्चमें १७ वर्ष, १ मास, २२ दिन, ८ घटी, ३४ पल, १७ विपल हैं और नीचमें इसका आधा वर्षादि ८।६।२६।४।१७।८।३० है, बीचमें अनुपातसे कहा है । और कर्म चक्र पातादि पहले ही के प्रकार कहा है । इस बात को केवल जीव शर्माने अपनी युक्तिसे कहा है । इसमें किसी की सम्मति नहीं है । यवनेश्वर सत्याचार्यादिके मतानुसार वराहमिहिरने जो प्रमाण कहा है वही ठीक है । किसी भी राशिमें ग्रह जिस राशिके नवांशमें हों उसके बराबर वर्ष ग्रहायु जाने । जैसे जहाँ तहाँ मेषके नवांशमें होने से १ वर्ष, वृष नवांशमें २ वर्ष, यों वृद्धि क्रमसे मीनके नवांशमें १२ वर्ष ग्रहायु होती है
आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १३३
से गुणाकर दो सौका भाग देनेसे लब्ध दिन होते हैं । शेष को ६० से गुणाकर दो सौका भाग देने से लब्ध घटी होती है, शेष को ६० से गुणा कर २०० का भाग देने से लब्ध पल होते हैं ॥ उदाहरण संस्कृत टीका में देखिये । ( सु० शा० कार ) ॥ १८ ॥ इसकी उपपत्ति यह है कि-'ग्रहभुक्तनवांशराशितुल्यम्' के अनुसार ग्रह जिसके नवांश- पर हों उतने वर्ष होते हैं । इसलिये ग्रहभुक्तराशियों तथा अंशादिकों की कलामें २०० का भाग देनेसे लब्धि नवांश होते हैं । ∵ १ नवांशमें २०० कलायें होती हैं । ∵ ग्र. भु. क ÷ २०० = नवाँशा = वर्ष । यहां राशिसङ्ख्या १२ ही होनेके कारण १२ से अधिक नवांशसंख्या ( वर्ष) होने पर १२ से भाग देना उचित है । शेष परसे २०० कलामें यदि १ वर्ष ( १२ महीने ) तो शेषकलामें क्या (१२ × शे)/२०० इस अनुपातसे मासादि आते हैं । ( सु. शा. कार ) ॥ १८ ॥ सत्याचार्यके मतमें इतना विशेष है कि जो ग्रह अपनी उच्च राशिमें है, अथवा वक्री है उसकी आयु वर्षादि जो मिले उसको तिगुना करे, और जो ग्रह वर्गोत्तम नवांश वा स्वन- वांश या अपने द्रेष्काणमें हो वा अपनी राशिमें हो उसको द्विगुण करे और सब कर्म पूर्वोक्त प्रकारसे करे । जो ग्रह शत्रु राशिमें है उसका तीसरा भाग घटता है और शुक्र, शनि के बिना अस्तंगत ग्रहका आधा घटता है तथा "सर्वार्धेति” इस श्लोक के अनुसार चक्र पात करे ॥ १९ ॥ यहां सत्याचार्यके मतमें लग्न भुक्तनवांशके बराबर आयु देता है । यदि लग्न बलवान् ( स्वामिगुरुज्ञवीक्षितयुता ) हो तो भुक्त राशिके तुल्य वर्ष आयु देता है । सत्याचार्यके मतमें क्रूरोदय ( सार्द्धोदितोदितोक्त ) प्रकारसे जो हरण करते हैं वह नहीं करना चाहिये । तथा पूर्वोक्त पिण्डायु तथा निसर्गायु इत्यादि परसे आयुकी स्पष्टी क्रिया नहीं करनी चाहिये॥ मथ आदिके तथा जीवशर्माके मतसे सत्याचार्य का मत श्रेष्ठ है । परन्तु शंका यह है कि कोई ग्रह स्वगृहमें है तो द्विगुण हुआ, वही स्वनवांशमें है तो फिर द्विगुण हुआ, फिर स्वद्रेष्काणमें होनेसे फिर द्विगुण, और वर्गोत्तमांशमें होनेसे फिर त्रिगुण वही ग्रह वक्री हो तो त्रिगुण और उच्चराशिमें हो तो पुनः त्रिगुण इस प्रकार इसकी अनवस्था होती है । इस शङ्काकी निवृत्ति इस श्लोकके उत्तरार्धमें है कि बहुत बार द्विगुण की प्राप्ति हो तो भी एक ही बार द्विगुण करे । बहुत बार त्रिगुणकी प्राप्ति हो तो भी एक वार त्रिगुण करे, और जहां द्विगुण त्रिगुण दोनों की प्राप्ति हो वहां एक वार त्रिगुण करे । घटनेके क्रममें भी बहुतकी प्राप्तिमें एकही बार घटेगा ( चक्रं पात भिन्न है वह सबका होता है ) अर्थात् दो भाग तीन भाग घटनेमें दो भाग ही घटेगा । जहां किसी प्रकारसे घटता है और किसी प्रकारसे बढ़ता है वहां पहले घटनेका मुख्य भाग घटा करके तब वृद्धिके मुख्यभागसे वृद्धिकरे । घटानेमें पहले चक्रपातसे हानि करले पश्चात् और क्रमसे घटावे इसके बाद वृद्धि करे । यह अंशायु- दशा है । आचार्यने पिण्डायु निसर्गायुको छोड़कर अंशायुको ही प्रमाणित माना है । औरोंके मतमें लग्नके अधिक बल होनेसे अंशायु, सूर्य अधिक बली हो तो पिण्डायु और चन्द्रमा विशेष बलवान् हो तो निसर्गायु होती है ॥ २१ ॥ अथ रश्मिजायुः । दशगोशरबाणाद्रिवसुसायकरश्मयः । दिननायकमुख्येषु निजतुङ्गगतेषु च ॥२२॥ स्वोच्चोनमिष्टखचरं यदि षड्गृहीनं चक्राद्विशोध्य कृतलिप्तकमंशुमानैः ॥ हत्वा भचक्रकलिकाहृतमन्दपूर्वं रव्यादिरश्मिजनितायुरिति ब्रुवन्ति ॥ २३ ॥ इदानीं ग्रहाणां रश्म्वानयनमुच्यते । निजतुङ्गगतेषु दिननायकमुख्येषु = सूर्यादिग्रहेषु १२ जा०
१३४ सटीकजातकपारिजाते- दशादिसङ्ख्यका रश्मयः सन्ति । सूर्यस्य दश । चन्द्रस्य गावः = नव । भौमस्य शराः पञ्च । बुधस्य बाणाः = पञ्च । गुरोरद्रयः = सप्त । शुक्रस्य वसवः = अष्टौ । शनेः सायकाः = पञ्चरश्मयो ज्ञेयाः । नीचगता ग्रहा रश्मिरहिताः, नीचाद्भ्रष्टा ग्रहा अभिमुखरश्मयः, उच्चा- द्भ्रष्टाः पराङ्मुखा उच्यन्ते । तथोक्तं सारावल्याम्— “स्वोच्चस्थे दश सूर्ये, नव चन्द्रे, पञ्च भूमितनये च । पञ्चेन्दुजे, सुरेज्ये सप्ताष्टौ भार्गवे, शनौ पञ्च ॥ एवं महेन्द्रशास्त्रे मणित्थमयवादरायणप्रोक्तौ । सप्त प्रत्येकस्था निर्दिष्टा रश्मयो ग्रहेन्द्राणाम् ॥ सर्वे प्रमाणमेते मुनिवचनात् किन्तु सप्तसङ्ख्यैव । बहुवाक्यादस्माकं नीचगतः स्याद्विगतरश्मिः ॥ अभिमुखरश्मिर्नीचाद् भ्रष्टः, स्वोच्चात्पराङ्मुखो ज्ञेयः” इति ॥ अथोच्चनीचयोर्मध्ये ग्रहस्य रश्म्यानयनम् । इष्टखचरं स्वकीयोच्चेनोनं कृत्वा यदि षड्गृहोनेोऽर्थाद्राशिषट्कादूनो भवेत्तदा तं चक्रात् ( १२ ) विशोध्य कृतलिप्सकं = कलीकृतं तं स्वकीयैरंशुमानैरुक्तपठितरश्मिप्रमाणैः हत्वा = सङ्गुण्य भचक्रकलाभिः २१६००' हृतं = भक्तं लब्धमब्दपूर्वं = वर्षाद्यं रव्यादीनां रश्मिजनितमायुर्भवति, इति विज्ञा ब्रुवन्ति । अत्र प्रकृतग्रन्थकृता पिण्डायुर्वदुच्चगते ग्रहे पूर्णा रश्मिस्तथा नीचे तदर्धमुररीकृत्य नीचोच्चान्तरे षड्राशिमिते रश्मेरर्द्धमवशिष्यते तदेष्टग्रहोच्चान्तरे किमित्यनुपातागतं फलं पठित- पूर्णरश्मिमानाच्छोध्येष्टरश्मिसाधनं कृतम् । र. — (र. / २) × (अं / ६) = (र. × १२ - र. × अं) / १२ = र. ( १२ - अं ) / १२ = इ. र. । परञ्च सारावलीकारेण नीचगते ग्रहे शून्या रश्मिरभिहिता-‘नीचगतः स्याद्विगतरश्मिः’ इति । तथा तेनैवेष्टस्थाने रश्मिसाधनपद्यमुक्तम्— “नीचविहीनः शोध्यश्चक्रात्षड्भवनतो यदाभ्यधिकः । आत्मीयरश्मिगुणितात्षड्भक्ताद्रश्मयस्तस्मात्” इति । एतन्मते उच्चे पूर्णरश्मिस्तत उभयदिशि क्षीणत्वमुपगता नीचे शून्यत्वमुपयाति । नीचे रश्म्यभाव उच्चे परमरश्मिरिति षड्राशिमिते ग्रहनीचान्तरे पूर्णा रश्मिस्तदाऽभीष्टग्रहनीचा- न्तरे किमित्यनुपातेन रश्म्यानयनमुपपद्यते । तत्र षड्भाधिके ( उच्चादग्रे ) ग्रहनीचान्तरे चक्राच्छुद्धं कार्यमुच्चादुभयत्र रश्मेस्तुल्यमेवापचयत्वादिति ॥ २२-२३ ॥ सूर्यादि ग्रहोंके अपनी उच्च राशिमें होनेसे दश आदि रश्मिआयु हैं । सूर्य की १०, चन्द्र की ९, मंगल की ५, बुधकी ५, बृहस्पतिकी ७, शुक्रकी ८ और शनिकी ५ रश्मिआयु हैं ॥ २२ ॥ इष्ट ग्रहमें उसके उच्च को हीन करे, यदि उच्चोन ग्रह ६ राशि से ऊन हो तो चक्र ( १२ ) में घटाकर कला बनाकर रश्मि मानसे गुणाकर भचक्र ( २१६०० ) का भाग देने से वर्षादि होते हैं । यह आचार्य लोग सूर्यादि के रश्मिआयु कहते हैं । यहां विशेष संस्कृत टीकामें देखिये ॥ २३ ॥ अथ रश्मेर्ह्रसनम् । स्वराशितुङ्गातिसुहृद्गृहस्थे वक्रोपगे तद्द्विगुणीकृतांशुः । वक्रावसानेऽष्टमभागवर्ज्या सपत्नगे द्वादशभागहानिः ॥ २४ ॥
आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १३५ अस्तङ्गतेषु द्युचरेषु चार्द्धं हित्वा शनिं दानवपूजितं च । तद्रश्मियोगे ग्रहदत्तमायुर्महेन्द्रशास्त्रोदितमाहुरार्याः ॥ २५ ॥ स्वराशौ, स्वोच्चे, अतिमित्रस्य गृहे, वक्रत्वे च स्थिते ग्रहे गणितागता रश्मयो द्विगु- णिता भवन्ति । वक्रावसानेऽष्टमभागवर्ज्या अष्टमांशेन रहिता रश्मयो भवन्ति । सपत्ने = शत्रुराशौ द्वादशभागहानिः कार्या । शनिं, दानवपूजितं=शुक्रं, च हित्वा अस्तङ्गतेषु द्युचरेषु चार्द्धं ह्रसति । शनिशुक्रयोरस्तङ्गतयोरपि न हानिर्भवति । तथोक्तं— मित्रद्वादशभागे द्विगुणास्त्रिगुणाः स्वके च दीधितयः । वक्रे पुनस्तथोच्चे स्वराशिगे तद्वच्चक्रत्वे ॥ द्विगुणाः स्युर्दीधितयो वक्रस्थेऽप्येवमेव स्युः । वैरिद्वादशभागे नीचे च भवन्ति षोडशांशोनाः ॥ अस्तं गतो विरश्मिः शनिसितवर्ज्यं ग्रहो ज्ञेयः ॥ इति सारावल्याम् । अनेन विधिना लब्धा ये ग्रहाणां रश्मयस्तेषां योगे ग्रहदत्तं रश्मिजमायुः (रश्मियोगतु- ल्यवर्षकमायुः ) महेन्द्रशास्त्रोदितं=महेन्द्रनामाचार्यकथितमार्या आहुः । तत्र रश्मियोगसङ्- ख्याफलानि सारावल्यां ३६ अध्याये द्रष्टव्यानि । बाहुल्यभयादत्र नाङ्कितानि ॥ २४-२५ ॥ यदि ग्रह अपनी राशिमें, उच्चमें, अतिसुहृद्के गृहमें, वक्रमें गणितागत रश्मि दूनी करे । वक्रके अवसानमें अष्टमांश हीन करे । शत्रु स्थानमें हो तो १२ वां भाग घटावे । शनि और शुक्रको छोड़कर अस्त ग्रह हो तो आधा त्याग दे । सब रश्मियोंके योगतुल्य ग्रहोंके रश्मिजायु होती है यह महेन्द्रशास्त्रका कहा हुआ श्रेष्ठ विद्वान् कहे हैं ॥ २४-२५ ॥ अथ चक्रायुः । रव्यादिसप्तग्रहतारकांशभुक्तावशेषाब्दसमूहमायुः । सव्यापसव्योपगवाक्यजं वा वदन्ति चक्रायुरिनादिकानाम् ॥ २६ ॥ अधुना चक्रायुरुच्यते-रव्यादीति । चक्रायुषो विशेषविवरणं १७ अध्याये द्रष्टव्यम् । इह दिङ्दर्शनमात्रमेव क्रियते । रव्यादिसप्तग्रहैस्तारकांशानां भुक्तावशेषा ये तैः साधितमब्दसमूहं वर्षसङ्कुलमायुः । अत्रेदमुक्तं भवति। सूर्यादिसप्तग्रहैः पृथक् पृथग् भुक्तस्य नक्षत्रस्य ये भागा अवशिष्टास्तेभ्योऽनुपातेनोर्वारितान्यायुर्वर्षाणि समानीय तेषां योगश्चक्रायुर्भवति । तत्रानुपातः यदि नक्षत्रमानैः ( भभोगैः ) पठितमायुस्तदा भोग्यघटीभिः किमिति सर्वेषामायुः पृथक् पृथक् भवति । तत्र १७ अध्याये पठितायूंषि-“भूतेकंविशदिरियो नवदिक्सूषोडशाब्धयः सूर्या- दीनां क्रमादब्दाः” इति । एतदेवायुः सव्यापसव्योपगवाक्यजं ( वक्ष्यमाणम् ) इनादिकानां ग्रहाणां चक्रायुरार्या वदन्ति ॥ २६ ॥ सूर्यादि सप्तग्रहका तारकांशभुक्तसे अवशिष्ट वर्षोंका जो समूह वही आयु है, वा सूर्या- दि की आयु सव्यापसव्यसे जो प्राप्त हो वही चक्रायु है ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥२६॥ अथ दशायुः । आदित्यमुख्यनवखेचरयोगताराभुक्तावशिष्टघटिकाजनिवत्सराद्यम् । आयुर्दशाजनितमष्टकवर्गजातं यत्प्रोक्तमेव सकलं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ २७॥ एतेन दशायुरुच्यते । दशायुषो विवरणं १८ अध्याये द्रष्टव्यम् । इह किञ्चिदुच्यते । आदित्यमुख्यनवखेचराणां=सूर्यादिनवग्रहाणां योगताराभुक्तावशिष्टघटिकाजनिवत्सराद्यम् । एतदुक्तं भवति । सूर्यादयो नवग्रहाः पृथक् पृथक् येषु नक्षत्रेषु भवेयुस्तेषां भोग्यघटीभ्योऽ- नुपातवशाज्जायमानं वर्षाद्यं यत्तत्तेषां दशाजनितमायुः ( दशायुः) स्यात् । अथ अष्टकवर्गजातं यदायुः प्रोक्तं तत्सकलमेवाहुः तज्ज्ञा आयुर्विषयज्ञाः प्रवदन्ति । नाष्टकवर्गायुषि भुक्तभोग्या-
नयनं कर्त्तव्यमिति भावः । अथ पराशराद्यैर्दशायुरेव नक्षत्राशुरपरनाम्ना व्यवह्रियते । तत्र कृत्तिकादिनवनक्षत्राणां प्रथमावृत्तौ, उत्तरफल्गुनी प्रभृतिनवनक्षत्राणां द्वितीये पर्यये, उत्तरा- षाढादिनक्षत्रनवकानां तृतीये पर्यये सूर्यादयो नव ग्रहाः स्वामिनो भवन्ति । कृत्तिकायां जन्म चेत् तदा सूर्यस्य दशा । रोहिण्यां चन्द्रस्यैवं क्रमेण । ते च क्रमिका ग्रहास्तथा तेषां वर्षप्रमाणानि च पराशरोक्तानि— रवीन्द्वाराहिजीवार्किबुधकेतुसिताः क्रमात् । आग्नेयाद्भगणेशाः स्युः स्वामिनो वत्सराः क्रमात् ॥ षडाशाः सप्त धृतयो नृपा एकोनविंशतिः । अत्यष्टिः सप्त च नखा उच्चे नीचेऽर्धमुच्यते ॥ सू०=६। चं०=१०। मं० = ७। रा० = १८ । वृ० = १६ । श०=१९ । बु० = १७ । के०=७। शु० = २० । एतान्युच्चे । एवम् ३।५।३½।९
अस्मादन्येष्वपि (२६-३२) श्लोकोक्तयोगेषु पिण्डायुः ग्राह्यम्। अथ च जन्मकाले सूर्ये बलवति (सर्वापेक्षया बलिनि) पिण्डायुः। चन्द्रे बलिनि निसर्गायुुरेवं बुधे रश्मिजा- युः। भौमेऽष्टकवर्गायुः (वक्ष्यमाणम्) शुक्रे कालचक्रायुः। देवाचार्ये दशायुः। शनौ समु- दायजम्। लग्ने बलवति अंशायुर्भवति। इति प्राचीना आचार्यप्रवरा आहुः ॥ २९-३३ ॥ सुधाशालिनीकर्त्ता, पूर्वकथित आयुर्दायोंमें कौनसी आयु लेनी चाहिये इसका निर्णय करते हैं। जन्मसमयमें लग्नेश, सूर्य और चन्द्रमा इन तीनोंमें यदि लग्नेश सबसे बली हो और शुभग्रहसे दृष्ट हो तो अंशायु लेनी चाहिये। यदि सूर्य बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमाके बली होनेपर निसर्गायु लेनी चाहिये। यदि दो ग्रहोंकी तुल्यता हो तो दोनोंकी आयुका योगार्द्ध याने सूर्य और लग्नेशके तुल्य बल होनेपर अंशायु तथा पिण्डायुका योगार्द्ध। सूर्य, चन्द्रमाके तुल्य होनेपर पिण्डायु तथा निसर्गायुका योगार्द्ध। लग्नेश और चन्द्रमाके तुल्य बलमें अंशायु-निसर्गायुका योगार्द्ध लेना चाहिये। यदि तीनों तुल्यबल हों तो तीनों आयुर्दायोंके योगका तृतीयांश ग्रहण करना चाहिये ॥ २८ ॥ सूर्य उच्चमें हो, अन्य ग्रह बलयुक्त हों, केन्द्र (१।४।७।१०) या कोण (५।९) में हों या सभी ग्रह उत्तमभावमें हों, या बलयुक्त, शशयोग और हंसयोग हो, तथा दीर्घायु योगोंके अनेक भेदोंमें, चन्द्रयोगों (सुनफा, अनफा, दुरधुरा) में, तथा चौथे चन्द्रयोग (केमद्रुम) में, चन्द्रमाके बली होनेपर, महापुरुषयोगोंमें, प्रत्येक राजयोगोंमें पराशर ने पिण्डायु लेनेको कहा है॥ २९-३१॥ गुरु लग्नमें हो, सूर्य १० वें भावमें हो, चन्द्रमा ४ थे, या ७ वेंमें बली हो, शुभग्रह केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (५।९) उपचय (३।६।११।१०) में हों, पापग्रह आपोक्लिम (३।६।९।१२) में हों तो पिण्डायु लेनी चाहिये ॥ ३२ ॥ और भी प्रकारान्तर देखिये-जन्मसमय यदि सूर्य बली हो तो पिण्डायु, चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु, बुध बली हो तो रश्मिजायु, मङ्गल बली हो तो अष्टकवर्गायु, शुक्र बली हो तो अंशायु लेनी चाहिये। यहां आठों में सबसे बली ग्रहकी आयु ग्रहण करनी चाहिये। बलकी समतामें उनके योगमें उतनेसे भाग देकर आयु लेनी चाहिये। ऐसा आचार्यों ने कहा है ॥ ३३ ॥ अथायुषः स्पष्टीकरणम्। आयुरब्दादिकं सर्वं निश्छलेन गुणीकृतम्। मातङ्गेन हृतं लब्धं सौरमानायुरुच्यते ॥ ३४ ॥ इदानीं पूर्वानीतस्य क्षेत्रात्मकस्यायुषः सौरमानेन वर्षादिकरणमुच्यते। पूर्वमानीतमायुः क्षेत्रात्मकं राश्यादिवशादानीतत्त्वात्। अपेक्षितं तु सौरकालात्मकम्। वर्षायनर्तुयुगपूर्वक- मत्र सौरादित्युक्तत्वात्। अतोऽब्दादिकं सर्वमायुः निश्छलेन गुणीकृतम्। अत्र 'क ट प य वर्गैर्भवेरिह, इति पूर्वोक्तसंख्याबोधकसङ्केतेन निश्छल = ३६०, तेन गुणितं कृत्वा, मातङ्गेन = (३६५) हृतं = भक्तं च कुर्यात् तदा लब्धं सौरमानेन वर्षाद्यमायुर्भवेदित्युच्यते विद्भिः। अत्र द्वादशराश्यात्मके (सौरे) एकस्मिन्वर्षे ३६० भवन्ति। तथैकस्मिन्सौरवर्षे ३६५ दिनानि सावनानि भवन्ति। अर्थात् ३६० अंशाः सूर्येण ३६५ दिनैर्भुज्यन्ते। तेनायुर्वर्ष- सङ्ख्याः ३६० गुणिताः, ३६५ भक्ताश्च सौरवर्षाणि भवन्तीत्युपपन्नं यथोक्तम्। परश्चैत- त्स्थूलं, प्रत्यब्दं १५।३०।२२।३० घट्यादेस्त्यागात् ॥ ३४ ॥ आयुके वर्षादिको ३६० से गुणाकर उसमें ३६५ से भाग देनेसे जो लब्धि मिले वह सौरमान आयु होती है ॥ ३४ ॥ आयुषोऽधिकारिणः । ये धर्ममार्गनिरता द्विजदेवभक्ता ये पथ्यभोजनरता विजितेन्द्रियाश्च।
orत्स? Wait, look at त्सर्पाणां: wait, look at the letter before सर्पाणां: It has त्on top andसbelow? Orत्स? Wait, it's त्attached toस? No, it's त्स! And before त्स, what is that? ङ्क्षorङ्घृ? Wait, could it be: गृध्रोलूकशुकध्वाङ्क्षत्सर्पाणां च सहस्रकम् ।? Wait, count the syllables: गृ(1) ध्रो(2) लू(3) क(4) शु(5) क(6) ध्वाङ्(7) क्ष(8) त्सर्(1) पा(2) णां(3) च(4) स(5) ह(6) स्र(7) कम्(8) Wait! If it is ध्वाङ्क्षत्सर्पाणां: Then त्सर्पाणां` is only:
त्सर् - पा - णां = 3 syllables!
3 + च(1) + सहस्रकम्(4) = 8 syllables!
Wait! "सर्पाणां" has 3 syllables: सर्-पा-णां!
Adding 'त्' to सर्पाणां does NOT add a syllable! 'त्' is just a consonant!
Wait, look at what
आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १३५ वृषमाहिषयोश्चैव चतुर्विंशतिवत्सराः ॥ ४२ ॥ विंशत्यायुर्मयूराणां छागादीनां च षोडश । हंसस्य पञ्चनवकं द्वादशाब्दाः पिकाः शुकाः ॥ ४३ ॥ तद्वत्पारावतानां च कुक्कुटस्याष्टवत्सराः । बुद्बुदानामेडजानां सप्तसङ्ख्याः समाः स्मृताः ॥ ४४ ॥ सरलार्थः श्लोकाः । वियोनिजन्मनां जन्मकालं विज्ञाय तस्मान्मनुष्यायुर्र्वदायुः समा- नीय मनुष्यपरमायुषोऽनुपातेन तत्तत्परमायुष्यायुरानयेत् । यथा मनुष्यपरमायुषि ( १२० व०।५दि० ), एतदायूस्तदा वियोनिपरमायुषि किमिति तत्तद्वियोनेरायुर्भवति ॥ ४०-४४ ॥ गिद्ध-उल्लू-शुक-काक और सर्पों की हजार वर्षकी आयु है। बटेर-वानर-भालू-मेघा की तीन सौ वर्षकी आयु है। राक्षसोंकी १५० वर्षकी आयु है। मनुष्योंकी और हाथियों की १२० वर्षकी आयु है। घोड़ेकी आयु ३२ वर्षकी है। गदहा-ऊंटकी आयु २५ वर्षकी है। बैल भैंसेकी आयु २४ वर्षकी है। मोरकी २० वर्षकी आयु है। बकरा-मेंढ़ा आदिकी १६ वर्षकी आयु है। हंसकी आयु १४ वर्षकी है। कोकिल-शुककी १२ वर्षकी आयु है। और कबूतरकी भी आयु १२ वर्षकी है। मुरगेकी आयु ८ वर्षकी है। बुलबुलोंकी ७ वर्ष की आयु कही है ॥ ४०-४४ ॥ अरिष्टदशा । त्रिमण्डलेष्वथैकस्मिन् पापस्तिष्ठति दुर्बलः । न सौम्यग्रहसंयुक्तस्तद्दशान्ते मृतिं वदेत् ॥ ४५ ॥ राशिसन्धिस्थखेतानां दशा रोगप्रदा भवेत् । त्रिंशाद्भागमनुक्रान्तदशायां मरणं नृणाम् ॥ ४६ ॥ षष्ठाष्टमस्थो रिपुदृष्टमूर्तिः पापग्रहः पापगृहोपगश्चेत् । स्वान्तर्दशायां मरणं नराणां वदन्ति युद्धे विजितस्य दाये ॥ ४७ ॥ पञ्चम्यारदशा मृत्युं दद्यात्षष्ठी गुरोर्दशा । शनेश्चतुर्थी मृत्युः स्याद्दशा राहोस्तु पञ्चमी ॥ ४८ ॥ नीचारातिविमूढस्य विपत्प्रत्यरिनैधनाः । दशा दद्युर्मृतिं तस्य पापयुक्ता विशेषतः ॥ ४९ ॥ तत्तद्भावार्थकामेशदशास्वान्तर्दशासु च । तत्तद्भावविनाशः स्यात् तद्युक्तेक्षितकारकैः ॥ ५० ॥ अष्टमस्य त्रिभागांशपतिस्थितगृहं शनौ । तदीशनवभागर्क्षे गते वा मरणं भवेत् ॥ ५१ ॥ अथाधुना स्थितिवशेनारिष्टदशोच्यते- त्रिमण्डलेष्वथेत्यादि । त्रिमण्डलेषु = लग्नपञ्च- मनवमेषु यद्येकस्मिन्नपि ( लग्ने वा पञ्चमे वा नवमे ) दुर्बलः पापग्रहस्तिष्ठति तथा स पापग्रहः सौम्यग्रहेण = शुभग्रहेण केनचित् संयुक्तो न भवेत् तदा तस्य पापग्रहस्य दशान्ते तस्य जातकस्य मृतिं = मरणं वदेत् । अत्र त्रिमण्डले चतुराद्यैर्ग्रहैः क्रमाद्दीर्घमध्याल्पजी- वित्वमुक्तं जातकादेशे- “लग्नपञ्चमभाग्यादिभावेष्वेकत्र संस्थितैः । चतुराद्यैर्ग्रहैर्जाता दीर्घमध्याल्पजीविनः” इति ॥ राशिसन्धिगतग्रहाणां दशासु जातको रोगी भवति । तथा यो ग्रहो राशेस्त्रिंशत्तमं भागमनुक्रान्तो भवति तस्य दशायां नृणां मरणं भवति । पापगृहोपगः = पापग्रहराशिगतः कश्चित्पापग्रहश्चेत् लग्नात् षष्ठेऽष्टमे वा स्थितो भवेत्तथाभूतश्च रिपुदृष्टमूर्तिः = स्वशत्रुणा
२. अध्याय ५-८: आयुर्दाय, अरिष्ट-भंग एवं राजयोग विचार
१४० सटीकजातकपारिजाते- निरीक्षितो भवेत्तदाऽसौ पापग्रहो युद्धे = ग्रहयुद्धे विजितस्य=पराजितस्य ग्रहस्य दाये=महा- दशायां स्वान्तर्दशां प्राप्य तस्यां नराणां मरणं करोतीति विज्ञा वदन्ति । इदमुक्तं भव- ति । प्रत्येकस्य ग्रहस्य दशायां सर्वेषामन्तर्दशा भवन्ति । तत्काले कथितलक्षणलक्षितः पापग्रहः युद्धे विजितस्य ग्रहस्य दशायामात्मीयावान्तर्दशायां पुरुषस्य मरणं करोतीति । आरस्य = भौमस्य पञ्चमी दशाऽर्थाद्यद्दशायां जन्म भवेत्ततः पञ्चमी दशा यदि मङ्ग- लस्य स्यात्तदा जातस्य भौमदशायां मृत्युं दद्यात् = मरणं कुर्यादित्यर्थः । एवं गुरोः षष्ठी, शनेश्चतुर्थी, राहोः पञ्चमी दशा मृत्युप्रदा भवति । तथा नीचारातिविमूढस्य क्रमेण विप- त्प्रत्यरिनैधना दशा मृत्युं दद्युः । नीचगतस्य ग्रहस्य विपत्तृतीया दशा, अरातिः = शत्रु- स्तद्गृहं गतस्य प्रत्यरिः = पञ्चमी दशा, विमूढोऽस्तङ्गतस्तस्य नैधनाऽष्टमी दशा मृत्युकारणं भवति । तद्दशायां म्रियत इत्यर्थः । ता एव दशा यदि पापयुक्ता अर्थात्पापग्रहसम्बन्धिन्यो भवेयुस्तदा विशेषतो निश्चयेन मरणं कुर्वन्तीति । यस्य यस्य भावस्य विचारोऽपेक्षितस्तत्तद्भावानामर्थेशो द्वितीयेशः, कामेशः = सप्तमे- शश्च, यो भवति तद्दशासु तथा तदन्तर्दशासु च तत्तद्भावस्य विनाशः स्यात् । यथा तृतीयस्य विचारोपस्थिते चतुर्थेशनवमेशयोर्दशायामान्तर्दशायां च तृतीयभावस्य विनाशो वाच्यः । एवमेव सर्वत्र विचारणीयम् । अत्र न केवलं द्वितीयेशसप्तमेशदशाऽन्तर्दशासु मरणं वाच्यम- पितु तेन द्वितीयेशेन सप्तमेशेन वा युक्ता ईक्षिता वा तत्तद्भावकारका ग्रहा यदि भवेयुरिति । कारका ग्रहा पूर्वमेवोक्ताः ( द्वितीयाध्याये ५१ श्लोके ) । अष्टमस्य = जन्मलग्नादष्टमभावस्य त्रिभागांशपतिः = द्रेष्काणेशः । एतदुक्तं भवति । जन्मकाले लग्ने यो द्रेष्काणस्तेनैव द्रेष्काणेनाष्टमभावेऽपि भवितव्यम् । यदि लग्ने प्रथमो द्रेष्काणस्तदाऽष्टमेऽपि प्रथम एव द्रेष्काणो ग्रहीतव्यः । द्वितीये द्वितीयस्तृतीये तृतीय इति । 'उदयाद् द्वाविंशतितमं द्रेष्काणं कारणं मृत्योरिति' वक्ष्यमाणवचनात् । तद्द्रेष्काणपतिर्य- स्मिन् गृहे तिष्ठति तद्गृहं शनौ प्राप्ते सति ( गोचरेण ), अथवा तद्द्रेष्काणस्य यः स्वामी स यस्मिन्नवांशे स्थितो भवेत्तन्नवांशराशिमुपगते शनौ ( गोचरेण ) जातस्य मरणं भवेत् । अत्र राशिनवांशयोर्बलवतो ग्रहणं कर्त्तव्यमिति ॥ ४५-५१ ॥ तीन मण्डलों में से एकमें भी यदि दुर्बल पापग्रह हो और शुभग्रहसे युक्त न हो तो उसकी दशाके अन्त्यमें मृत्युको कहे ॥ ४५ ॥ राशियोंकी सन्धिमें स्थित ग्रहोंकी दशा रोग देनेवाली होती है । ३० वें अंशको अति- क्रमण करनेवाले ग्रहोंकी दशामें मनुष्योंका मरण होता है ॥ ४६ ॥ षष्ठ, अष्टम भवनमें स्थित शत्रु-दृष्ट-मूर्ति पापग्रह पापग्रहकी राशिमें प्राप्त हों तो अपनी अन्तर्दशामें युद्धमें विजितग्रहकी दशामें मनुष्योंके मरणको करते हैं ॥ ४७ ॥ जिस ग्रहकी दशामें जन्म हो उससे मङ्गलकी दशा यदि ५ वीं हो, गुरु की दशा ६ ठीं हो, और शनि की दशा ४ थी हो एवं राहुकी दशा ५ वीं हो तो ये दशायें मृत्यु देनेवाली होती हैं। जो ग्रह अपने नीचमें हो उसकी ३ री दशा, जो शत्रु गृहमें हो उसकी ५ वीं दशा, जो सूर्यके साथ अस्त हो उसकी ८ वीं दशा मृत्यु देती है। यदि वे दशा पापग्रह सम्बन्धी हों तो निश्चय ही मरण होता है। विचारणीय भावसे २ रे और ७ वें भावके स्वामीकी दशा तथा अन्तर्दशामें उस २ भाव की हानि कहनी चाहिये । यदि उस भावके द्वितीयेश या सप्तमेशसे उस भावका कारक ग्रह युक्त या दृष्ट हो । जन्मकालिक अष्टम भावमें जो द्रेष्काण हो उसका स्वामी जिस राशिमें स्थित हो उस राशिमें चार वश शनिके जानेपर अथवा वह द्रेष्काणेश जिसके नवांशमें हो उस नवांश- राशिमें शनिके जानेपर मरण कहना चाहिये ॥ ४८-५१ ॥
आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १४१ अथ छिद्रग्रहाः । रन्ध्रेश्वरो रन्ध्रयुक्तो रन्ध्रद्रष्टा खरेश्वरः । रन्ध्राधिपयुतश्चैव चतुःषष्ट्यंशनायकः ॥ ५२ ॥ रन्ध्रेश्वरातिशत्रुश्च सप्त छिद्रग्रहाः स्मृताः । तेषां मध्ये बली यस्तु तस्य दाये मृतिं वदेत् ॥ ५३ ॥ तत्तद्भावाद्व्ययस्थस्य तद्भावाधीशवरस्य वा । वीर्योपेतस्य खेटस्य पाके मृत्युर्न संशयः ॥ ५४ ॥ अथाधुना मारकग्रहा उच्यन्ते । रन्ध्रेश्वरो लग्नादष्टमभावपतिः (१), रन्ध्रयुक्तोऽष्ट- मभावस्थितो ग्रहः (२), रन्ध्रद्रष्टा = अष्टमभावे यस्य सर्वाधिका दृष्टिर्भवेत् (३), खरेश्वरो जन्मलग्ने यो द्रेष्काणस्तस्माद्द्वाविंशो द्रेष्काणः खरस्तस्येशः (४), रन्ध्राधिपयुतश्चैवा- ष्टमेशेन सहितो ग्रहो वाऽष्टमेशाधिष्ठितराशीशः (५), चतुःषष्ट्यंशनायकः = जन्मकाले चन्द्रो यस्मिन्नवांशे भवति तस्माच्चतुःषष्टितम—(६४) नवांशेशोऽर्थाद्यावन्मिते नवांशे यस्मिन् राशौ चन्द्रो भवेत्तावन्मितो नवांशस्तस्मादष्टमभावस्य चतुःषष्टितमो भवति तत्पतिः (६), रन्ध्रेश्वरातिशत्रुश्च = अष्टमेश्वरस्यातिशत्रुर्यो ग्रहो भवेत्सोऽपीत्येते (७) सप्त छिद्रग्रहा उच्यन्ते । तेषां सप्तग्रहाणां मध्ये यो ग्रहो बलीयान् भवति तस्य दाये = दशायां नरस्य मृति = मरणं वदेत् । एवं प्रत्येकस्य भावस्य विचारः कर्त्तव्यः । पक्षान्तरमुपदिशति- वा तत्तद्भावात् = यस्य यस्य भावस्य विचारः क्रियते तत्तद्भावात् व्यये = द्वादशे स्थितस्य ग्रहस्य, तद्भावाधीशवरस्य = तद्भावव्ययाधीशवरस्य चानयोः मध्ये वीर्योपेतस्य = बलीयतः खेटस्य पाके=दशायां तद्भावस्य मृत्युर्भवतीत्यत्र संशयो नेति । अथ तत्तद्भावादित्यत्र श्लोके पाठान्तरं फलदीपिकायाम्— 'तत्तद्भावाद् व्ययस्थस्य तद्भावव्ययपस्य च । वीर्यहीनस्य खेटस्य पाके मृत्युमवाप्नुयात्' इति ॥ ५२-५४ ॥ अष्टमेश १, अष्टममें स्थित २, अष्टमको देखनेवाला ३, खरेश्वर ४, अष्टमेशसे युत ग्रह ५, चतुःषष्टि अंशका स्वामी ६, रन्ध्रेश्वरका अतिशत्रु ७ ये सात छिद्रग्रह हैं। इन सातों में जो बली हो उसकी दशामें मृत्युको कहे। उस उस भावका व्ययस्थ वा उस उसभावके व्ययेश इन दोनोंमें बलवान् ग्रहकी दशामें मृत्यु होती है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५२-५४ ॥ अथ दृक्काणस्वरूपम् । कुलीरमीनालिगता दृगाणाः मध्यावसानप्रथमा भुजङ्गाः । अलिद्वितीयो मृगलेयपूर्वः क्रमेण पाशो निगडो विहङ्गः ॥ ५५ ॥ विलग्नजन्मद्रेक्काणाद्यस्तु द्वाविंशतिः खरः । सुधाकरोपगांशात्तु चतुःषष्ट्यंशको भवेत् ॥ ५६ ॥ अथाधुना द्रेक्काणानां स्वरूपाण्युच्यन्ते-कुलीरेत्यादिना । कुलीरमीनालिगता मध्याव- सानप्रथमा दृगाणा भुजङ्गा उच्यन्ते । कुलीरस्य ( कर्कस्य ) मध्यो द्वितीयो द्रेष्काणः, मीन- स्यावसानोऽन्तिमो द्रेष्काणः, अलेर्वृश्चिकस्य प्रथमो द्रेष्काणश्चेति त्रयो द्रेष्काणा भुजङ्गाः सर्पाख्या भवन्ति । अलिद्वितीयो मृगलेयपूर्वः क्रमेण पाशः, विहङ्गः ज्ञेयः । यथा वृश्चिकस्य द्वितीयः पाशसंज्ञः । मकरस्य प्रथमो निगडाख्यः । सिंहस्य प्रथमो विहङ्गः = पक्षी द्रेष्काण उक्तः । अतोऽपि विशेषा बृहज्जातके द्रेष्काणाध्याये द्रष्टव्याः । प्रयोजनं पूर्वमुक्तं 'खगे दृगाणै' तथा 'लग्नत्रिभागेऽण्डजसर्पकोलाः' इत्यादि । अन्यच्च, षट्पञ्चाशिकायाम्—
१४२ सटीकजातकपारिजाते- “अंशाफाज्ज्ञायते द्रव्यं द्रेष्काणैस्तस्कराः स्मृताः । राशिभ्यः कालदिग्देशा वयो जातिश्च लग्नपात्” इति । अथ खरः परिभाष्यते । जन्मकाले लग्ने यो द्रेष्काणस्तस्माद् द्वाविंशतिसङ्ख्यको द्रेष्काणः खरसंज्ञक उच्यते । यदि लग्ने प्रथमो द्रेष्काणः स्यात्तदा लग्नादष्टमभावस्य प्रथम- द्रेष्काणः खरः । एवं लग्ने द्वितीयो द्रेष्काणस्तदाऽष्टमस्य द्वितीयो द्रेष्काणः खरः इति । स खरो जन्मकाले सुधाकरश्चन्द्रो यस्मिन्नवांशे स्थितो भवेत्तस्माच्चतुः षष्ठ्यंशकः (६४) भवेत् । चन्द्रो यस्य भावस्य यस्मिन्नवांशे भवेत्तस्मादष्टमभावस्य तावन्मितो नवांशः खरः । प्रति- राशि नव नवांशालयो द्रेष्काणाश्चेति ७ x ९=६३ नवांशाः । तथा ७ x ३=२१ द्रेष्काणाः । वर्त्तमानश्चैक इति योगे तथात्वमुपपद्यते । खरस्य प्रयोजनमुक्तं ‘खरेश्वरो मारकग्रहः’ । तथैव बृहज्जातकेऽपि— द्वाविंशः कथितस्तु कारणं द्रेष्काणे निधनस्य सूरिभिः । तस्याधिपतिर्भूपोऽपिवा निर्याणं स्वगुणैः प्रयच्छति ॥ इति ॥ ५५-५६ ॥ अब द्रेष्काणोंके स्वरूप कहते हैं। कर्कराशिका २ रा, मीनका ३ रा, वृश्चिका १ ला, द्रेष्काण भुजङ्ग ( सर्प ) कहलाता है। वृश्चिकका २ रा पाश, मकर का १ ला, निगड़ और सिंहका १ ला, विहङ्ग कहलाता है। लग्नके जिस द्रेष्काणमें जन्म हो उससे २२ वां द्रेष्काण याने ८ वें भावका उस तुल्य द्रेष्काण 'खर' कहलाता है। वह 'खर' चन्द्रमा जिस नवांशपर हो उससे ६४ वां नवांश भी होता है। (सु० शा० कार) ॥ ५५-५६ ॥ अथ जीवदेहमृत्युसंज्ञाः । लग्नं पञ्चहतं च मान्दिसहितं प्राणस्फुटं प्राणिनाम् चन्द्रस्य स्फुटमष्टकेन गुणितं देहं समान्दिस्फुटम् । सप्तघ्नं गुलिकस्फुटं सह दिवानाथेन मृत्युर्भवेत् तस्माज्जीवकलेवरैक्यविपुले जातश्चिरं जीवति ॥ ५७ ॥ लग्नं तात्कालिकं पञ्चभिर्हतं=गुणितं कार्यं, ततो मान्दिसहितं = गुलिकेन युक्तञ्च कार्यं तदा तत् प्राणिनां प्राणस्फुटं = जीवाख्यं भवति । अथ चन्द्रस्य स्फुटं राश्यादिकं अष्टकेना- ष्टसंख्यया गुणितं, समान्दिस्फुः = गुलिकस्पष्टराश्यादिना सहितञ्च कार्यं तत् देहं=देहसंज्ञकं भवति । अथ च गुलिकस्फुटं = गुलिकस्य राश्यादि सप्तघ्नं=सप्तगुणितं कृत्वा दिवानाथेन= स्पष्टसूर्येण सह युक्तं कार्यं तदा तन्मृत्युसंज्ञकं भवति । तस्मान्मृत्युसंज्ञकात् जीवकलेवरैक्य- विपुले = जीवदेहयोर्योगेऽधिके ( मृत्यु < जीव + देह ) जातश्चिरं जीवति=दीर्घायुर्भवति । अर्थादेव मृत्युमानात् जीवदेहयोगे न्यूनेऽल्पायुः ( मृत्यु > जीव + देह ) इति ॥ ५७ ॥ लग्नको ५ से गुणाकर उसमें स्पष्ट गुलिक जोड़नेसे प्राणियोंका स्पष्ट ‘प्राण’ ( जीव ) होता है। स्पष्ट चन्द्रमाको ८ से गुणाकर उसमें गुलिक जोड़नेसे 'देह' स्पष्ट होता है। स्पष्ट गुलिकको ७ से गुणा कर स्पष्ट सूर्य जोड़ने से 'मृत्यु' स्पष्ट होता है। इन प्राण, देह, और मृत्युओंका प्रयोजन कहते हैं—उससे याने मृत्युसे जीव और देहका योग यदि अधिक (मृत्यु < जीव + देह) हो तो प्राणी चिरजीवी (दीर्घायु) होता है। यदि मृत्युसे जीव और देहका योग कम (मृत्यु > जीव + देह) हो तो अल्पायु कहनी चाहिये। (सु.शा.कार) ॥ अथ निर्याणसमयाः । जीवमृत्युतनुयोगराशिगे गोचरेण रविजे धनक्षयः । तन्त्रिकोणगृहगेऽथवा नृणां तन्नवांशकयुते मृतिं वदेत् ॥ ५८ ॥
आयुर्दायाध्यायः ॥५॥ १४३ भावत्रिकोणगे मन्दे भावनाशं वदेद्बुधः । भावाधिपतिकोणे वा गुरौ प्राप्ते मृतिर्भवेत् ॥ ५६ ॥ पूर्वानीतानां जीव-मृत्यु-देहानां योगराशौ गते गोचरेण=चारवशात् रविजे = शनैश्चरे धनक्षयो धनस्य नाशो वाच्यः । अथ तत्तत्त्रिकोणगृहगे=तस्माज्जीवमृत्युतनुयोगराशेस्त्रिकोण- ( ५।९ ) राशौ गतवति रविजे, अथवा तस्मिन्योगे यस्य राशेर्नवांशो भवेत्तद्राशियुते रवि- जे (चारवशादागते शनौ ) नृणां = जनिमतां मृतिं = मरणं वदेत् ॥ ५८ ॥ भावात् त्रिकोणे ( ५।९ ) गतवति मन्दे तस्य भावस्य नाशं बुधो वदेत् । धनभावस्य विचारे षष्ठे वा दशमे भावे गते शनैश्चरे धनस्य नाशं ब्रूयादेवं सर्वत्र । तथा भावाधिपतियंत्र तिष्ठति तस्मात्कोणे ( ६।५ ) प्राप्ते गुरौ तद्भावस्य मृतिर्भवेत् । तत्र लग्नेशात् कोणे गते गुरौ जातस्य मरणं, धनेशाद्धनस्य कुटुम्बस्य च हानिः, सहनेशात् भ्रातृमरणमेवं प्रत्येकस्य विचारः कर्त्तव्यः ॥ ५९ ॥ पूर्वोक्त जीव, मृत्यु और देहका योग करनेपर जो राशि हो उस राशिमें जब गोचरसे शनि पहुंचे तब धनका नाश कहना चाहिये । अथवा उस योग राशिसे ५।९। भावमें वा उस योगराशिमें जिसका नवांश हो उस राशिपर जानेसे (शनिके) मनुष्योंका मरण करता है ॥ ५८ ॥ भावसे त्रिकोणमें शनि हो तो भावका नाश होना पण्डितोंने कहा है, वा भावाधिपके कोणमें गुरुके पहुचनेपर मृत्यु होवे ॥ ५९ ॥ लग्नाकंमान्दिस्फुटयोगराशेरधीश्वरो यद्भवनोपगस्तु । तद्राशिसंस्थे पुरुहूतवन्द्ये तत्कोणे वा मृतिमेति जातः ॥ ६० ॥ स्फुटे विलग्ननाथस्य विशोध्य यमकण्टकम् । तद्राशिनवभागस्थे जीवे मृत्युर्न संशयः ॥ ६१ ॥ मान्दिस्फुटे भानुसुतं विशोध्य राश्यंशकोणे रविजे मृतिः स्यात् । धूमादिपञ्चग्रहयोगराशित्रैकाणयातेऽर्कसुते च मृत्युः ॥ ६२ ॥ जन्मकाले स्पष्टलग्नं, स्पष्टसूर्यः, स्पष्टमान्दिरिति त्रयाणां योगतुल्यराशेर्योऽधीश्वरः = पतिः स यद्भवनं ( राशिं ) उपगतस्तस्मिन् राशौ चारवशात् संस्थे पुरुहूतवन्द्ये = गुरौ, वा तस्माद्योगराशिपतिस्त्रिकोणे गुरौ जाते जातो मृतिमेति ॥ ६० ॥ विलग्ननाथस्य = जन्मलग्नेशस्य स्फुटे = स्पष्टराश्यादिमानतो यमकण्टकं विशोध्य शेषं यत् तद्राशौ यस्य नवांशो भवेत्तस्मिंश्चारादागते जीवे = गुरौ जातस्य मृत्युर्भवति । तत्र न संशयः कश्चिदिति । अत्र प्रसङ्गाद्यमकण्टकज्ञानमुच्यते— दिवसानष्टधा कृत्वा वारेशाद्गणयेत्क्रमात् । अष्टमांशो निरीशः स्याच्छन्यंशे गुलिकः स्मृतः ॥ रात्रिरप्यष्टधा भक्ता वारेशात्पञ्चमादितः । गणयेदष्टमः खण्डो निष्पतिः परिकीर्तितः ॥ शन्यंशे गुलिकः प्रोक्तो गुर्वंशे यमकण्टकः । भौमांशे मृत्युरादिष्टो रव्यंशे कालसंज्ञकः ॥ सौम्यांशेऽर्धप्रहरकः स्पष्टकर्मप्रदेशकः ॥ इत्यनेन यथा गुलिकेष्टज्ञानं कृत्वा गुलिकसाधनं लग्नवत् क्रियते तथैव प्रतिदिनं यम- 11 कण्टकेष्टज्ञानं कृत्वा ततो लग्नवद्यमकण्टकसाधनं कर्त्तव्यम् ॥ ६१ ॥
१४४ सटीकजातकपारिजाते- यमकण्टकगुणकध्रुवाङ्काः । | र. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रहाः | | ५ | ४ | ३ | २ | १ | ७ | ६ | दिवा | | १ | ७ | ६ | ५ | ४ | ३ | २ | रात्रौ | मान्दिस्फुटे (स्फुटगुलिकात्) भानुसुतं=शनिं विशोध्योनं कृत्वा शेषमितराशौ यस्यां- शको भवेत्तस्मात्कोणे (९।५) चारवशादागते रविजे=शनौ मृत्युः स्यात् । अथ च धूमा- दयो ये पञ्च उपग्रहास्तेषां योगप्रमिते राशौ यस्य द्रेष्काणो भवेत्तत्र यातेऽर्कसुते = शनौ मृत्युः स्यात् । तावत्प्रसङ्गात् धूमादीनां साधनप्रकारः- चत्वारो राशयो भानौ युक्तभागास्त्रयोदश । धूमो नाम महादोषः सर्वकर्मविनाशकः ॥ धूमो मण्डलतः शुद्धो व्यतीपातोऽत्र दोषदः । सषड्भेऽत्र व्यतीपाते परिवेषस्तु दोषकृत् ॥ परिवेषश्च्युतश्चक्रादिन्द्रचापश्च दोषकृत् । अत्यष्टषट्शयुते चापे केतुखेटः परोः विषम् ॥ एकराशियुते केतौ सूर्यः स्यात्पूर्ववत्समः । अप्रकाशग्रहाश्चैते दोषाः पापग्रहाः स्मृताः ॥इति॥ लग्न, सूर्य, गुलिक स्पष्टके योग राशिका स्वामी जिस गृहमें प्राप्त हो उस राशिमें बृह- स्पति के जानेपर या उससे कोण (५।९) में जानेपर मनुष्य मृत्युपाता है ॥ ६० ॥ स्पष्ट लग्नेशमें यमकण्टकको घटाकर शेष जो राशि हो उसके नवांशराशिमें गोचरीय गुरुके जानेपर मृत्यु होती है इसमें सन्देह नहीं । यमघण्टके लानेका प्रकार संस्कृत टीका में देखिये ॥ ६१ ॥ स्पष्ट गुलिकमें स्पष्ट शनिको घटाकर जो शेष हो उस राशिके नवांशवाले राशिसे ९।५ राशिमें गोचरीय शनिके जानेपर मृत्यु होती है । धूम वगैरह पांच उपग्रहोंके योग करनेसे जो राशि हो उसमें जिसका द्रेष्काण हो उस राशिमें शनिके जानेपर भी मृत्यु कहनी चाहिये ॥ ६२ ॥ मान्दिस्फुटोदितनवांशगतेऽमरेज्ये तद्द्वादशांशसहिते दिननाथसूनौ । द्रेष्काणकोणभवने दिनपे च मृत्युर्लग्नेन्दुमान्दियुतभेऽशगतोदये स्यात् ॥ ६३ ॥ मान्दिस्फुटोदितनवांशगते=स्पष्टगुलिके यस्य राशेर्नवांश उदितो भवेत्तस्मिन् गतेऽम- रेज्ये = गुरौ, तथा तस्मिन्स्पष्टगुलिके यस्य द्वादशांशो भवेत्तस्मिन्सहिते = प्राप्ते दिननाथ- सूनौ = शनौ मृत्युः स्यात् । तत्र मृत्युमास उच्यते । तस्मिन्नेव मान्दिस्फुटे यस्य द्रेष्काणो भवेत्तस्मात्कोण-(५।९) भवने दिनपे = सूर्ये गते मृत्युः । अंशमुपदिशति । लग्नं, इन्दु- श्चन्द्रः मान्दिर्गुलिक इति त्रयाणां योगतुल्ये भे = राशौ यावानंशस्तद्गतस्य दिनपस्योदये मृत्युर्वाच्यः ॥ ६३ ॥ गुलिकस्पष्टके उदित नवांशमें गुरुके प्राप्त होनेपर, उसके द्वादशांशमें शनि होनेपर, द्रेष्काण कोण भवनमें सूर्य प्राप्त होनेपर, लग्न-चन्द्र-गुलिकयुत राशि अंशगत सूर्यमें मृत्यु होवे ॥ ६३ ॥ विलग्नमान्दिस्फुटयोगभांशं निर्याणमासं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः । निर्याणचन्द्रो गुलिकेन्दुयोगे लग्नं विलग्नार्किसुतेन्दुयोगम् ॥ ६४ ॥ अत्र निर्याणस्य मासः चन्द्रो लग्नश्चोक्तम् । श्लोकः सरलार्थः ॥ ६४ ॥ स्पष्ट लग्न और गुलिकका योग करनेसे जो राशि हो उसमें जिस राशिका नवांश हो उस राशिकी सङ्ख्याके बराबर मृत्युका मास जानना चाहिये । जैसे योग राशिमें मेषके
आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १४५ नवांश होनेसे १ मास, वृष होनेसे २ रा, एवं सिंहसे ५ वां इत्यादि । इसी तरह गुलिक और चन्द्रमाके योगसे निर्याणका चन्द्रमा याने योग-तुल्य राशिमें जब चन्द्रमार हे तो मरण हो । एवं लग्न, गुलिक और चन्द्रमाके योगवाले राशिका लग्न निर्याणका लग्न जानना चाहिये । ( सु. शा. कार ) ॥ ६४ ॥ गुलिकं रविसूनुं च गुणित्वा नवसङ्ख्यया । उभयोरैक्यराश्यंशगृहे रविजे मृतिः ॥ ६५ ॥ षष्ठावसानरन्ध्रेशस्फुटैक्यभवनं गते । तन्त्रिकोणोपगे वाऽपि मन्दे मृत्युभयं नृणाम् ॥ ६६ ॥ स्फुटार्थौ श्लोकौ ॥ ६५-६६ ॥ गुलिक और शनिको नवसे गुणा करके दोनोंके योगके राश्यंश गृहमें शनिके प्राप्त होने- पर मृत्यु होवे ॥ ६५ ॥ षष्ठेश, द्वादशेश और अष्टमेशके स्पष्ट राश्यादिका योग करनेसे जो राशि हो उस राशिमें [L14
१४६ सठीकजातकपारिजाते- सुतेशसंयुक्तनभश्चराणां दशाब्दसङ्ख्यया दिननायकाप्ताः । तच्छेषिते मासि मृतिं नराणां वदन्ति लग्नेशयुतग्रहैर्वा ॥ ६९ ॥ जन्मकाले सुतेशन = पञ्चमभावेशेन संयुक्तानां नभश्चराणां दशाब्दसङ्ख्यया दिननायकेन ( द्वादशसङ्ख्यया ) आप्ताः = भक्ताः कार्यास्तच्छेषिते=शेषतुल्ये मासि नराणां मृतिं वदन्ति । अथवा लग्नेशेन युतैर्ग्रहैरेवं मृत्युमासो ज्ञेयः । लग्नेशेन संयुक्ता ये ग्रहास्तेषां दशावर्षाण्ये- कत्रीकृत्य द्वादशभिर्भक्तशेषतुल्ये मासि मृत्युर्वाच्यः । यदि लग्नेशेन पञ्चमेशेन वा न केचित् खेटाः संयुक्ताः स्युस्तदा केवलं लग्नेशदशातः पञ्चमेशदशातो वा मासानयनमुक्त- वत्कार्यमिति ॥ ६९ ॥ पुत्रेशसे युत ग्रहोंकी दशाकी वर्ष संख्यामें १२ से भाग देकर शेषित मासमें मनुष्यों की मृत्यु आचार्य लोग कहते हैं वा लग्नेश युत ग्रहसे इसी तरह मनुष्योंकी मृत्यु कहते हैं ॥६९॥ चन्द्रस्फुटे नवकसङ्गुणिते तु मान्दिं मन्दं च नन्दहृतमिन्दुवियोजनीयम् । कृत्वा पुनर्नवहर्ताकसुतं समेतं यत्तन्नवांशकशशी मरणप्रदः स्यात् ॥ ७० ॥ श्लोकेनानेन निर्याणकालिकं चन्द्रानयनं कृतम् । व्याख्या ६७।६८ श्लोकवज्ज्ञेया । गणितञ्च ( १० × चं. ) + ( १८ × श. ) + ( ९ × गु. ) । लब्धराशौ यन्नवांशकस्तद्गते चन्द्रे मरणमिति ॥ ७० ॥ स्पष्ट चन्द्रमाको ९ से गुणा करके शनि और गुलिकको ९ से गुणाकर एकत्र जोड़कर पुनः ९ से गुणित गुलिकको युक्तकर जो हो उस नवांशका चन्द्रमा मृत्युको देनेवाला होता है ॥७०॥ जातोऽह्नि चेदर्कशनिस्फुटैक्यतारादिनिर्याणदशा प्रकल्प्या । तारेशराहुस्फुटयोगतारापूर्वा दशाऽनिष्टकरा रजन्याम् ॥ ७१ ॥ इदानीं निर्याणदशाज्ञानमुच्यते-जात इति । चेद्यदि अह्नि जातः = दिने जन्म भवेत् तदा अर्कशनिस्फुटैक्यतारा = स्पष्टसूर्यशनैश्चरयोर्योगे कृते या तारा ( यन्नक्षत्रम् ) लभ्यते तदादिनिर्याणदशा प्रकल्प्या । तस्यां तारायां यस्य ग्रहस्य दशा भवति तदादिग्रहदशा निर्याणदशा नाम्नी भवति । रजन्यां = रात्रौ जन्म चेत्तदा तारेशराहुस्फुटयोगतारा = चन्द्र- राह्वोर्योगे कृते या तारा तत्पूर्वा दशाऽनिष्टकरा = निर्याणस्य दशा भवति । तत्र स्पष्टग्रहव- शान्नक्षत्रानयनम् । स्पष्टग्रहं कलोकृत्याष्टशतैर्भागमपहृत्य लब्धमितं गतनक्षत्रं, शेषादनुपातेन वर्त्तमाननक्षत्रस्य भुक्तमानमिति ( ६० × शे. / ८०० = वर्त्तमाननक्षत्रभुक्तमानम् ) । तस्मिन्वर्तमानन- क्षत्रे यस्य ग्रहस्य दशा भवति तदादिनिर्याणदशेति । तत्र नक्षत्रपरत्वेन ग्रहाणां दशाज्ञा- नार्थं चक्रमवलोक्यम् ॥
| सू. | चं. | मं. | रा. | बृ. | श. | बु. | के. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० | वर्षाणि |
| कृ. | रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | मं. | पू. फ. | नक्षत्राणि |
| उ. फ. | ह. | चि. | स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू. षा. | |
| उ. षा. | श्र. | ध. | श. | पू. भा. | उ. भा. | रे. | अ. | भ. | |
| एतद्दशायाः स्पष्टीकरणं १८ अध्याये दशाप्रकरणे द्रष्टव्यम् ॥ ७१ ॥ | |||||||||
| यदि दिनमें जन्म हो तो स्पष्ट सूर्य और शनिके योगसे जो नक्षत्र हो वही निर्याणकी | |||||||||
| प्रथम दशा होती है, अर्थात् उस नक्षत्रमें जिस ग्रहकी दशाहो तदादि निर्याणकी दशा जानना |
" (split as उदयात् इति -> उदयादिति). There is definitely NO 'र' there grammatically! But what does the print have? It is a tiny speck or smudge below the vertical stem of 'या'. It's best written as "यादिति ।".
Let's double check L25: "राजशासनकर्त्तृकं मरणं ( फांसी ) स्यात् ।" Is there space around फांसी? "( फांसी )" or "(फांसी)"? There is a space: "( फांसी )".
Let's check L27: “मान्द्यारूढनवांशकामगृहगाः सौम्याः सुमृत्युप्रदाः, Double quote at start.
Let's check L30: राहुः पन्नगदंशनान्मरणदो यद्वा विषस्पर्शनात् ॥” इति ॥ ७३ ॥ End quote before इति.
Let's check L12-13: “द्वाविंशः कथितस्तु कारणं द्रेष्काणो निधनस्य सूरिभिः । तस्याधिपतिर्भपोऽपि वा निर्वाणं स्वगुणैः प्रयच्छति ॥” इति ॥ ७२ ॥
All looks very accurate and faithful to the original print.आयुर्दायाध्यायः ॥ ५ ॥ १४७ चाहिये। रात्रिके जन्ममें चन्द्रमा और राहुके योगसे जो नक्षत्र मिले उसकी दशा निर्वाणकी प्रथम दशा जाने