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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

जैसे मनुष्योंके समीप कीड़े मकोड़े ऐसेही उनके समक्ष मनुष्य क्या वस्तु हैं। बरन् इससे भी तुच्छ है इन सभोंका अन्त है, अनन्त कैसे जाना जावे ?

वेदके सिवा दूसरी पुस्तकोंकी सामर्थ्य नहीं कि, इन सूक्ष्म बातोंको प्रगट करें सूक्ष्म बातोंकी उनको तनिकभी सुध नहीं। साधुओंमेंभी कदाचितही कोई ऐसा होगा जो इन बातोंको समझे और सोचे, ये बातें बड़ी सूक्ष्म हैं। इन बातोंके समझनेवाले केवल हंस कबीर हैं, दूसरेकी ऐसी बुद्धि नहीं कि, भली प्रकार इसको जान सके। इन अहंकारी और नौ कोषोंमें सब कौतुक क्रीड़ा होरही है।

मनुष्यके सोचने समझने तथा कार्य करनेके लिये यह सब सूक्ष्म बातें दिखाई गई हैं। जो मनुष्य हो वो इन बातोंपर ध्यान देकर विचार करे। जिस किसीकी समझमें ये बातें ठीक मालूम होंगी अपनेको अन्धकारमें फँसा देखेगा वह अवश्यही प्रकाशमय पथको ढूँढ़ेगा। इन पांचों अहंकारों तथा नौ कोषोंसे बाहर निकालनेवालेका उपदेश जब पावेगा तब यह सब बातें जो लोक और वेदमें प्रबलित हैं सभी यथार्थ रूपसे जैसीकी तैसी दिखाई देंगी।

उनपर अत्यन्त खेद है जिनके कि, विचारमें इन पांचों अहंकारों और नौ कोषकी बातें नहीं आईं। फिरभी वो आपको पण्डित तथा ज्ञानी समझते हैं। अपने बन्धनपर तनिक भी ध्यान नहीं करते और दूसरेके छुटकारेके लिये उद्योग किया करते हैं। जिसका गुरु स्वयम् राह भूला हो तो उसका शिष्य किधर जायगा ? ऐसा कौन भाग्यवान् है जो पारख गुरुको ढूँढ़कर उसके चरणकी धूल हो जावे ? संसारकी गन्दगियोंसे विशुद्ध हो जावे ? धन्य वह मनुष्य है जिसने पारख गुरुको शीघ्रातिशीघ्र पा लिया।

वासनाओंकी बाढ़से कोई विशुद्ध तथा स्वच्छ हो नहीं सकता। सब गुरु पुकारते हैं कि, विषय वासना नरककी राह है, इनसे दूर भागो। परन्तु तो भी गुरु तथा शिष्य विषय वासनाके बन्धनमेंही फँसे हुए हैं बिना पारखगुरुके किसीमें छुडानेका सामर्थ्य नहीं। वैद्य तो रोगीसे कहता है कि, तुम संयमसे रहो नहीं तो मर जाओगे। वैद्यका कहना सुनते तो हैं पर उसपर कोई स्थिर नहीं है। इसपर मैं एक दृष्टांत लिखता हूँ।

एक राजाने आम खाया वो उस आमके खानेसे बीमार हो गया तब वैद्यने बहुत औषधि की अत्यन्त कठिनाईसे आरोग्य हुआ वैद्यने राजासे कह दिया कि, अब आप भविष्यमें फिर कभी आम न खाना, यदि आम खाओगे तो मर जाओगे। आपका यह रोग ऐसाही है। राजाने यह जान ली। एक दिवस राजा अपने बागमें सैरके लिये गया बगीचेका माली अच्छे अच्छे भीठे आम राजाके सामने लाया।

मंत्रियों तथा निकटवर्तियोंने मना किया कि, महाराज ! आप इसको मत खाओ क्योंकि, वैद्यने मना किया है पर राजाने कहा कि, मैं खाता नहीं देखता हूँ जब देखा और बास लिया तब राजाके मनमें इच्छा हुई और आमको खागया अमीरों का कहना न माना । दो चार आम जो मनमें आया खालिया और बीमार हो गया । फिर बहुत कुछ औषध की गई पर आरोग्य न हुआ अन्तमें मर करही पीछा छूटा ।

इसी प्रकार सब गुरु मना करते हैं पर विषय वासनाओंसे कोई बच नहीं सकता, इसने सबको मार लिया है । हृदयसे लेकर ये सब बन्धनके कारण हैं, बिना इन सब पर विजय पाये बन्धन नहीं कट सकता ।

अध्याय १८

पुनर्जन्म

भवसागरमें चारों खानके जीव चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं । इस कारण अब मैं पुनर्जन्मका वर्णन करता हूँ । यह सत्यगुरु कबीर साहब का कथन है कि, सब जीवोंको आवागमन हुआ करता है । समस्त भारतवासी इस बातको स्वीकार करते हैं । कदाचित्ही कोई इस बातको स्वीकार न करे पर मूसई, ईसाई तथा मुसलमान इस बातको नहीं मानते । कोई कोई उनमेंसे भी मान लेते हैं । इस कारण मैं पुनर्जन्मको उनकी पुस्तकोंसे प्रमाणित किया चाहता हूँ जिसमें उनकी अज्ञानता नष्ट हो वे इस बातको मानें । विशेषतः जिस बातको स्वसंवेद स्पष्ट कहता है उस बातके ऊपर शंका करनेवाला सच्चा कैसे ठहर सकता है ?

नज्रम-तनासुख कहें सत्य साहब कबीर ।

मिहर जिसके इनसां हो रोशन ज़मीर ॥

मुकद्दस स्वसंवेद उसका कलाम ।

बर्रा नस्त नामे अलेहुस्ललाम ॥

तीनों धम्मोंके महाशयगण और सिद्ध साधु तथा समस्त पृथिवीके विद्वानों और समस्त पुनर्जन्म न माननेवालों को विदित हो कि, बिना पुनर्जन्मके माने एवं आवागमनके अस्वीकार किये पापोंकी अधिकता और वासनाओं पर कभी भी विजय नहीं पासकते । जीवोंपर दया दृष्टि न होगी, विवेक विचार तथा सोचनेकी बुद्धि न होगी तो बन्ध और कण्ठही रहेगा ।

गज़ल-बकौले सतगुरु सच है तनासुख ।

कि चौरासी करे जीव तँ तनासुख ॥

करे परवाज जब इस कालबुदसे ।
हो सदहा बार पै दरपै तनासुख ॥
कभी छूटे न इस खुमकी खुमारी ।
जो फिर फिर नोश करता मैं तनासुख ॥
जो बदखसमी अमलकी हो रही है ।
तो करता बारहा यह कैं तनासुख ॥
न सूझे और न यह रह रास्त बूझे ।
रही है घेर हर रुख दिये तनासुख ॥
जो खींच और धुवाँ दिलसे उठावे ।
कि पीता शौकसे यह नय तनासुख ॥
बहर सिमतो बहर सूरत बहर हाल ।
बहर जानिव नगर हर शय तनासुख ॥
कि वरकत मिहवां मुरशि इसे आजिज ।
हुआ लारेव तू निर्भय तनासुख ॥

पश्चिमके देशवासी जिनका कि, कामही मांसाहार तथा निर्दयताका है, वे जीवके पुनर्जन्मको अस्वीकार करते हैं। इसका कारण यह है कि, उस देशके पैगम्बरोंमें से किसीको आवागमनका ज्ञान मालूम नहीं था। यद्यपि प्रकाशकी हलकी झलक कभी कभी उनके मनपर भी आजाती थी परंतु उस प्रकाशकी स्थित नहीं होती थी। बिजलीके समान प्रकाशका प्रागटच हुआ और फिर अतर्धनि हो गया। सभी नबियोंमें हजरत आदम सबसे बड़े थे। अब पहले में उनके ज्ञानका वृत्तान्त लिखता हूँ। इसके साथही पश्चिम देशके पैगम्बरोंके आवागमनका हाल न जाननेके कारण सभी बात सप्रमाण लिखूंगा।

हजरत आदम—परमेश्वरके पुत्र थे। उनकी कांति तथा तेज सारे पैगम्बरोंसे बढ़ चढ़कर था कबीर साहबने कहा है कि, आदम ब्रह्माके औतार थे। इस खुदाके प्यारे पुत्रके साथ स्वयम् खुदा तथा फिरिश्ते वार्तालाप किया करते थे। हजरतको अनेक बार खुदाका दर्शन हुआ था। आपको लड़नी विद्या नहीं थी, न आपको खुदाकी पहचान थी। खुदासे जो आज्ञा पाते उसको व्यवहारमें लाते थे आपको खुदाका दर्शन तो मिलताही था परन्तु खुदाकी पहचान नहीं थी, क्योंकि, अन्तर प्रकाश बिना खुदाकी पहचान असम्भव है। आपको केवल शारीरिक दर्शन प्राप्त था, मानसिक दर्शन नहीं था। क्योंकि जिसको मानसिक दर्शन होता है वह वार्तालापके अधीन नहीं होता ऐसे प्रकाशित हृदयवालेको कोई धोखा भी नहीं दे

१७ अध्याय । बन्धनके कारण

सकता । यदि आपको खुदाकी पहचान होती तो आपको सांपकी सूरतमें शैतान कद पि न बहका सकता तौरीतमें उत्पत्तिके तीसरे बाबकी आठ आयत पर्यन्त लिखा है कि, सर्पके स्वरूपमें शैतान आया और आदम तथा हौवाको बहकाया । जिस फलके लिये खुदाने मना किया था, दोनोंने उसी फलको खाया इसी कारण दोषी होकर वैकुण्ठसे निकाला गया । यहांतक कि, इस सापने अपने विचित्र रङ्ग ढङ्ग दिखाये अनुमानसेभी मालूम नहीं किया कि, यहां तो दालमें काला है, खुदाकी आजोललंघन करके फल खालिया ।

लिखा है कि, पहले शैतानने हौवाको बहकाया । भला यदि हजरतको आत्मिक प्रकाश तथा भीतरी विद्या होती तो इतना भी न जानते कि, शैतान मेरी पत्नीको बहकाने आता है मैं इसकी रक्षा करूँ उसके पाजीपनेसे विज्ञ करूँ उसको आपत्तिसे सचेत करूँ । नबियोंके प्रतिष्ठित नबीको इतनी दूरदर्शिता एवं अन्तर-दृष्टि नहीं थी । फिर आपको आवागमनकी सुधि कैसे मिले, जान बूझकर भी कोई धोखा खाता है ? अपनेको तथा अपनी सन्तानको दीनता तथा दुर्बस्थामें डालता है ? यदि आप सर्परूपी शैतानको नहीं पहचान सके तो मनुष्यरूपी खुदाको कैसे पहचान लिया कि, वह वास्तवमें खुदा था अथवा अन्य न जाने कौन था ।

कुरान शरीफके टीकाकारोंने लिखा है कि, जब प्रथम बार गर्भिणी हुई तब शैतान उसके समीप जाकर पूछने लगा कि तेरे पेटमें यह क्या है किस पथसे बहिर्गत होगा । यह बात सुनकर हौवाने उत्तर दिया कि, मैं नहीं जानती । तब शैतानने कहा कि, कदाचित तेरे पेटमें कोई पशु हो वो तेरा पेट फाड़कर निकले । इतनी बात कहकर शैतान तो चला गया । हौवाने आदमसे सब हाल कहा । दोनों बहुत चिन्तित हुये । दोनों इसी चिन्तामें पड़े थे कि, कुछ दिवसोंके पीछे पुनः शैतान आया पूछा कि, तुम दोनों चिन्तित क्यों हो ? उन्होंने अपने दुःखका हाल कहा, तब शैतानने कहा कि भयभीत मत हो, मैं इसमें आजम जानता हूँ मेरी प्रार्थना स्वीकार हुआ करती है । मैं खुदासे प्रार्थना करूँगा कि हौवाके पेटसे तुम्हारे स्वरूप का पुत्र उत्पन्न हो, एवं सुखसे बाहर आवे । परन्तु बात उतनी है कि, तुम उस पुत्रका नाम अब्दुलहारिस रखना । आदम और हौवाने शैतानके धोखेको न जाना जब उनका प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ तब उसका नाम वही (अब्दुलहारिस) रखा और कुफ्रके भागी हुये ।

हसनकी तफसीरमें लिखा हुआ है कि, जिस समय शैतान वैकुण्ठमें था; उस समय उसका नाम अब्दुलहारिस था । जानना चाहिये कि, वही हजरत आदम हैं जिसके कि भीतर खुदाने अपनी रूह फूँककर अपने स्वरूपका बनाया और

समस्त फिरिश्तोंने दण्डवत किया, वे तनिकभी शैतानी धोखेको नहीं समझ सके उसके बहकानेसे धोखेमें आ गये ।

हजरत नूह-हजरत आदमके पीछे हजरतनूह (जो दूसरे आदम कहलाते हैं) बड़े प्रतिष्ठित नबी हुये । उनको भी खुदाका दर्शन हुआ करता था एवं खुदासे वार्तालाप भी हुआ करता था । खुदाके आज्ञानुसार बाढ़के समय (जल प्रलयके समय) आप नावपर सवार हुये ।

तौरीतमें उत्पत्तिके पुस्तकका (८) बाब (३ स १३) आयत पर्यन्त लिखा है कि, बाढ़के उपरान्त आपका नाव अरारात पर्वतपर ठहरी । नूहने खिड़की खोल देखकर जानना चाहा कि, पृथ्वीका जल शुष्क हुआ अथवा नहीं, इस अभिप्रायसे आपने नावपरसे एक कौवा उड़ाया और वह उड़कर गया । जबतक पृथ्वी का जल शुष्क न हुआ वह काग आया जाया करता था । फिर नूहने एक कबूतर उड़ाया जिसमें मालूम करें कि पृथ्वीका जल अभीतक सूखा है वा नहीं । कबूतर पृथ्वीपर अपने पंज्जे लगानेका स्थान न पाकर फिर नावमें आया । क्योंकि, समस्त पृथ्वीपर जल था, उस कबूतरके आनेपर नूहने उसको अपने हाथोंपर ले लिया उसने सात दिवसोंतक सन्तोष किया । आगे फिर कबूतरीको उड़ाया वह सौझके समय जैतून की पत्ती मुँहमें दबाकर फिर उसके पास पलट आयी । तब नूहने जान लिया कि, अब पृथ्वीपर जल कम हुआ है । इसके पीछे कबूतरीको उड़ाया । वह फिर कभी न आयी तब नूहने जान लिया कि, अब पृथ्वी सूख गयी, तब और भी सात दिन ठहरा । इसके पीछे उसने नावकी छत खोलकर देखा कि, भूमि शुष्क हो गई अथवा नहीं । खुदाकी आज्ञासे नूह समस्त मनुष्यों और जीवोंसहित पृथ्वीपर आ खेतीमें लग गया ।

समीक्षा-अब जानना चाहिये कि, जिस मनुष्यको परमेश्वरका दर्शन हो उससे वार्तालाप हुआ करे उसमें इतना सामर्थ्य भी न हो कि, बिना पशुओंके सहायताके वह पृथ्वीका सूखा और गीला होना जान सके, यदि तीक्ष्ण दृष्टिवाला मनुष्य पर्वतसे पृथ्वीकी ओर देखे तो पृथ्वीकी तरी और उसका सूखापन देख सकता है । यदि नङ्गी आंखोंसे नहीं देखे तो दूरबीनसे तो अवश्यही देख लेगा । जिसको पृथिवीके गीला और सूखा होनेका हाल न मालूम हो उसको आवागमन की विद्या कैसे ज्ञात हो सकती है ।

३ हजरत इबराहीम-नूहके पीछे खुदाके प्यारे और श्रेष्ठ नबी हुए । आप भी खुदाका दर्शन किया करते थे । आपसे खुदा वार्तालाप किया करता हुआ मिहमानी कबूल किया करता था । जब खुदा आपके घर मिहमान आया तब

हृदय हृदयकी व्याख्या

आपने बड़ी मिहमानी दिखाई । देखो तौरीतमें उत्पत्तिके (३८) बाब (१) से (८) आयत पर्यन्त लिखा है कि, इबराहीमको मनुष्यके स्वरूपमें तीन फिरिश्ते मिले जब हजरतने उन फिरिश्तोंको देखा तब आपने पृथ्वी पर्यन्त झुककर दण्डवत् करके कहा कि, ऐ मेरे खुदा ! ऐ मेरे खुदा ! ! और आपने तीनों खुदाओंकी बड़ी आवभगत की । एक बछरा मारकर तला मांस रोटी लिया । तीनों खूदाओं ने इबराहीमको आशीर्वाद दिया अपना भेद प्रगट किया कितने ईसाई समझते हैं कि इन तीनों फिरिश्तोंमें दो फिरिश्ते थे तीसरा स्वयम् यह बाह् था जिसका कि नाम अत्यन्त प्रतिष्ठापूर्वक लिया जाता है ।

फिर कुरानके (१४) सिपारा सूरे कहफके सातवें स्कूअमें लिखा है कि, अब इब्राहीमके समीप तीन रिफिश्ते आये तब आपने मिहमान समझकर एक बछरेको मारकर तला इन तीनों मेहमानोंके सामने धर दिया । उन्होंने भोजनसे अपना हाथ खींच लिया न खाया तब इबराहीमने अनुमान किया कि, वे तीनों चोर हैं क्योंकि, उस देशकी यह परिपाटी थी कि, जो कोई किसीका धन अपहरण किया चाहता था वह उसका नमक न खाता था । यदि नमक खाये तो उसके घर चोरी न करे । इबराहीमके पास माल तथा पशु अधिक थे इससे जाना कि, ये तीनों निस्सन्देह चोर हैं । इस कारण मेरा नमक नहीं खाते हैं । जब इबराहीमके मनमें यह सन्देह हुआ तब उन तीनोंने जान लिया और बोले कि, ऐ इबराहीम ! हम तीनों फिरिश्ते हैं चोर नहीं । सद्मम तथा अमूरा दोनों नगरोंका नाश करने आये हैं । इससे इबराहीमने विश्वास कर लिया कि, ये निश्चयही फिरिश्त हैं । जब तीनोंने अपना भेद कहा तब फिरिश्ता जाना, नहीं तो चोरही समझा था । यह बात उस समयकी है जब इबराहीम वय एक सौ बीस वर्षका था । आपके पहिले उम्रके वृत्तान्त कुरानमें इस प्रकार लिखा है कि, आप लड़कपनमें जब दिनको देखते थे तब आप कहते थे कि, यह मेरा खुदा है, जब दिन बीतकर रात आती थी तब कहते थे कि, वह तो मेरा खुदा नहीं था पर यह मेरा खुदा है । जब रातभी बीतजाती तब कहते कि, यह तो मेरा खुदा नहीं, जब सूर्य को देखते तब उसको अपना खुदा बताते । जब वह छिप जाता तब कहते कि, वह मेरा खुदा नहीं, कारण यह कि, वह तो अस्त होगया । जब चन्द्रमाको देखते तब कहते कि, यह मेरा खुदा है जब वह भी छिप जाता तब उससे भी निराश होते । फिर तारोंको खुदा कहते । फिर उनसे भी निराश होजाते ।

रोजतुस्सफामें हजरतकी अन्तिम वयका विवरण इस प्रकार लिखा है । इबराहीमने खुदासे प्रार्थनाकी थी कि, ऐ खुदा ! मेरी इच्छा बिना मेरे प्राण नाश

न हों मैं स्वेच्छा पूर्वक मरूँ। खुदाने आपकी प्रार्थना स्वीकार की। जब आपकी मृत्युका समय आया तब आपकी आत्मा निकालने, अत्यन्त बृद्ध मनुष्यका स्वरूप धारण करके इजराईल फिरिश्ता आया। आपने उस मनुष्यको देखा तो बड़ी प्रतिष्ठा और सम्मानसे बैठ गया। बड़ी मय्यर्था सहित उसके समक्ष भोजन रखे, खाना खानेको कहा। वह बृद्ध जब भोजन करने लगा तब उसका हाथ बहुत कौपता था। जब वह कोई ग्रास उठाता और मुँहकी ओर ले जाता तो कैंपकैंपीके कारण कभी वह ग्रास उसके कानमें जा पड़ता कभी आँखोंमें कभी नाकपर यदि कभी कोई ग्रास मुँहमें पड़ जाता तो उसी समय वह पायखाना फिर देता था। इस बूढ़े की यह अवस्था देखकर इबराहीमने उससे पूछा कि, आपका वय क्या है, तब वह बोला कि, तुमसे मेरा वय दो वर्ष अधिक है। यह बात सुनकर इबराहीमके मनमें बड़ी चिन्ता हुई कि, दो वर्षके उपरान्त मेरी भी यही दशा होगी। इस जीवनसे तो मरनाही उत्तम होगा। तब आपने भयभीत होकर खुदासे प्रार्थना की "हे खुदा ! अब मेरी आत्मा मेरे शरीरसे निकाल"। उसी समय इजराईलने कपट करके इबराहीमकी जान निकाल ली। इबराहीम इजराईलके छलसे पूर्णतया अनभिज्ञ रहे अन्त तक उसको न पहचान सके ?

४ हजरत इसहाक-इबराहीमके पीछे उनके पुत्र इसहाकको पेंगम्बरकी पदवी मिली। देखो तौरीतमें उत्पत्ति के (२७) और (२८) बाबमें लिखा है कि, जब हजरत इसहाकके बुढ़ापेका समय था। आपको आँखोंसे दिखाई न देता था आपके दो पुत्र थे, बड़ेका नाम ईसू और छोटे का नाम याकूब था। एक दिन बड़े बेटे ईसूसे कहने लगे कि, ऐ बेटे ! आज तू मेरे वास्ते भोजन लेआ जिसमें मैं भोजन करके तुझे बरकत दूँ। यह बात सुनकर ईसू शिकारके लिये चला। कारण यह कि, ईसूको शिकारका मास प्रिय था और वह बड़ा शिकारी भी था।

५ हजरत याकूब या इसराईल इसहाककी स्त्री रबका थी उसने जाना कि, आजके दिन इसहाक ईसूको बरकत देगा। रबका अपने छोटे पुत्र याकूबको ईसूसे अधिक चाहती थी। उसने याकूबसे कहा कि, ऐ पुत्र ! आजके दिवस तुम्हारा पिता ईसूको बरकत देगा इस कारण तू जा और बकरीका एक बच्चा ले आ क्योंकि, याकूब एक चरवाहा था। याकूब तुरन्त ले आया, रबकाने तुरन्तही उस बकरीके कें बच्चेको मार कर पका डाला। बड़ा स्वादिष्ट मांस बनाया अच्छे स्वादिष्ट भोजन बनाये। याकूबको ईसूका वस्त्र पहनाया, ईसूके शरीरमें बाल थे, याकूबका शरीर साफ था इस कारण याकूबकी देह जहाँ खुली थी हाथ और गरदन इत्यादि उस जगह पर रबकाने बकरीके बच्चेकी खाल लपेट दी। जिसमें

ईसूकीसी देह मालूम हो । फिर याकूबके हाथमें खाना देकर कहा कि, अब तू अपने पिताके निकट जाकर कह दे कि, ऐ पिता ! मैं तेरा पुत्र ईसू हूँ भोजन ले, खाकर मुझको बरकत दे । तब इसहाकने उसको अपने समीप बुलाया उसके समस्त शरीरको टटोला और कहा कि, बोली तो याकूबकीसी है पर शरीर ईसूकासा है । तब इसहाकने भोजन किया याकूबको बरकत दी । इधर तो याकूब अपने पिताको भोजन कराके और बरकत लेकर चला गया । इधर ईसूभी आखेट मारकर लाया बहुत स्वादिष्ट भोजन पकाकर अपने पिताके निकट लेकर गया कहा कि, ऐ पिता ! भोजन कर और मुझे बरकत दे । यह बात सुनकर इसहाक बोला कि, ऐ पुत्र ! अभी तो तू बरकत लेकर गया था । अब पुत्रः कैसे पलट कर आया । फिर अफसोससे कहने लगा कि, तेरा भाई याकूब धोखा देकर तेरे नामसे बरकत ले गया । यह बात सुनकर ईसू चिल्ला चिल्लाकर रोया और कहा ऐ पिताजी ! मुझको भी बरकत दो । उसका रोना तथा चिल्लाना किसी काम न आया दोनों भाइयोंमें बड़ा विरोध उत्पन्न हुआ ईसूने याकूबको मार डालनेका विचार किया । आगे रक्काकी सलाहसे याकूब घर छोड़कर भाग गया अपने मामू लाबनके घरमें रहने लगा ।

याकूबका व्याह—जब अपने मामू लाबनके घर गया तब लाबनने कहा कि, यदि तू सातवर्षतक मेरी सेवा करेगा तो मैं तुझको अपनी पुत्री दे दूंगा । याकूब अपने मामू लाबनकी सात वर्षतक भेड़ बकरियां चराता रहा । सातवर्ष बीतनेके बाद लाबनने अपनी बड़ी पुत्री, जो कि, आँखोंसे चौँधली थी, रातको धोखा देकर याकूबसे विवाहदी जबरान्तबीत गई और सबेरा हुआ तब याकूबने देखा तो मालूम किया कि, मेरे मामूने तो मेरे साथ धूर्तता की अपनी चौँधरी पुत्री मुझको दी । राहील जो सुन्दरी थी, जिसकी आशापर मैंने सेवा की थी वह नहीं दी । इस बातसे अत्यन्त दुःखी होकर लाबनसे शिकायत प्रगट की । तब लाबनने कहा कि, यदि तू सातवर्षतक मेरी सेवा और करे तो मैं तुझको अपनी दूसरी बेटीभी विवाह दूंगा । तब हजरत सातवर्षतक और अपने मामूकी सेवाकी भेड़ियां चराते रहे । तब उसने अपनी दूसरी पुत्री राहिलको भी याकूबके हवाले किया, इन दोनों पत्नियोंके लिये याकूबने अपने मामूकी चौदह वर्षतक भेड़ें चराई थी । याकूबका ग्यारहवां पुत्र बड़ा सुन्दर था । उसके भाइयोंने उसे ईर्षा वश मारकूटकर कुएँमें डाल दिया । उसका वस्त्र रक्त्तसे भिगोकर याकूबके समीप लेजाकर कहा कि, तेरे पुत्र यूसुफ को किसी हिंसक जन्तुने फाड़ खाया, यह रक्त्तसे भीगा हुआ उसका कुरता देखो । यह बात सुनकर याकूब बधाई मार मारकर रोने लगा हाय हाय करते और रोते

रोते अन्धा होगया । क्योंकि, वह यूसुफको बहुत ज्यादा प्यार करता था । उसे यह तनिक भी ज्ञात नहीं हुआ कि, उसका पुत्र मारकूटा निकटही कूएमें पड़ा है । बिल्कुल नहीं जान सका कि, उसपर कैसी आपत्ति आयी । उनको भी खुदाका दर्शन होता था, खुदासे बातें भी हुआ करता थीं, आप खुदाके प्रियपत्र थे । आपका दूसरा नाम इसराईल था । आपके बारह पुत्रोंसे बारह सरदार, बनीइसराईलके नामसे प्रख्यात हुये । बारहोंकी बहुतेरी सन्ताने हुई । तौरीतमें उत्पत्तिके (३२) बाब(२४) से (३१) आयत पर्यन्त लिखा है कि, याकूब अकेला रह गया था । वहां प्रातःकाल तक एक मनुष्य उससे कुशती लड़ता रहा जब इसने देखा कि वह मनुष्य उसपर विजय नहीं, हुआ, तब इसने उसकी जाँघको भीतरकी ओरसे छुआ और याकूबकी जाँघ उससे कुशती लड़नेमें चढ़ गयी । तब वह बोला कि, मुझको जाने दो सबेरा हो गया । तब वह बोला कि, जब तक तू मुझे बरकत नहीं देगा तबतक मैं तुझको न जाने दूंगा । उससे इसने पूछा कि, तेरा नाम क्या है, वह बोला याकूब वह बोला कि, भविष्यमें तेरा नाम याकूब न रहेगा बरन् इसराईल होगा कि, तून खुदा और सृष्टिमें प्रतिष्ठा पाई । विजयी हुआ । याकूबने कहा कि, मैं तेरी प्रार्थना करता हूँ तू अपना नाम मुझे बता । वह बोला कि, तू मेरा नाम क्यों पूछता है ? उसने उसको वहां बरकत दी । याकूबने उस जगहका नाम फनीआईल रखा कहा कि, मैंने परमेश्वरको स्पष्ट देखा मेरे प्राण बच रहे हैं । जब वह फनी-आईलसे जा रहा था तब सूर्य्य उसपर प्रकाशित हुये, वह लँगड़ा था । इसी कारण बनी इसराईल उस नसको जो जाँघमें भीतरकी ओर है आजतक नहीं खाते क्यों कि, उसने उसको छुआ था जो कि, याकूबके जाँघकी नसके भीतरवाली है । नज्म-नबी ऐसे और ऐसा परवरदिगार । तो फिर क्यों न हों पैरुवा रुस्तगार ।। भरो पेट अपना करो ऐशा जैश । कि, चूँ और चिंगूसे तुझे क्या है कार ।

६ हजरत मूसा-हजरत याकूबके पीछे हजरत मूसाको पैगम्बरीकी पदवी मिली । यद्यपि इस बीचमें दूसरे दूसरे नबी भी हुये, पर हजरत मूसाको अन्यान्य नबियोंसे अधिक श्रेष्ठता है । खुदाने सीना पर्वतपर आपसे वार्तालाप की । जितना खुदा कहता था उतनाही मूसा जानता था । अपने भीतरी प्रकाशका बल कुछ भी नहीं रखता था ।

अहादीससहीहा और सूर किसीमें लिखा है कि, दस वर्षतक मूसा, शईब पैगम्बरकी पुत्रीके साथ विवाह करनेके लिये उसकी भेड़ बकरियां चराता हुआ सेवा करता रहा । उसने अपनी पुत्री सफूराके साथ मूसाका विवाह कर दिया । तौरीतमें लिखा है कि, जब मूसा सीना पर्वतपर खुदासे बातें कर रहा था, उस

समय सब यहूदी सोनेका बछड़ा बनाकर पूज रहे थे । जब वह पर्वतसे नीचे उतरा कुछ पटिया लिखकर लाया । यहूदियोंको बछड़ा पूजता देखकर क्रुद्ध हुआ । और उन पटियोंको पटक दिया वे फूट गयीं अपने बड़े भाई हारूनकी दाढ़ी पकड़कर खींची ।

कुरानमें लिखा है कि, जब मूसाने झाड़ीमें आग लगी देखी तब उसने अपने घरवालोंसे कहा कि, मैं जाता हूँ इस झाड़ीसे आग लाता हूँ जब वह उसके समीप गया तब उसमेंसे आवाज आयी “ऐ मूसा ! मैं तेरा तेरे बाप दादोंका खुदा हूँ” । मूसा अनभिज्ञ था कि, वह खुदा था या आग थी ।

हजरत मूसा और खयाजा खिज्ज—फिर कुरानके सूरै कहफके (१५) सिपारः (९) रूकूअकी (५९) आयतसे (८१) आयत तक मूसा और खयाजा खिज्जका किस्सा बराबर चला है, मूसाने खिज्जसे कहा है कि, मैं तेरे साथ चलूंगा । तब खिज्जने कहा कि, मेरे साथ न चल. क्योंकि, तू मेरे साथ चलने योग्य नहीं । कारण यह कि, तेरी बुद्धि शुद्ध नहीं है, तू मेरे काय्योंमें हस्तक्षेप करेगा । तब मूसाने उत्तर दिया कि, मैं तेरे कार्यमें कदापि हस्तक्षेप न करूँगा । तू मुझे अपने साथ चलने दे । खिज्जने मूसाको अपने साथ लिया कहा कि सावधान, तू मेरे काय्योंमें कभी हस्तक्षेप न करना जबतक मैं स्वयम् तुझसे कुछ न कहूँ । तब कुछ दूर चलकर दोनों एक नावपर सवार हुए । खिज्जने उस नावको फाड़ डाला । मूसाने कहा कि यह तूने क्या किया यह काम अच्छा नहीं किया । नाव फाड़कर तू लोगोंको डुबाया चाहता है तब खिज्जने कहा कि, क्या मैंने तुझसे पहले नहीं कहा था कि, तू मेरे, साथ चलने योग्य नहीं । क्योंकि, तू मेरे काय्योंमें हस्तक्षेप करेगा । तब मूसाने प्रार्थना की कि, अबकी बार तो तू मेरा अपराध क्षमाकर, फिर मैं हस्तक्षेप न करूँगा । अबका प्रथमही अपराध हुआ है क्षमा करने योग्य है ।

फिर दोनों आगे चले । एक बस्तीमें एक लड़का मिला उसको खिज्जने मार डाला । फिर मूसा बोला कि, यह तूने क्या काम किया कि, एक निरपराध बालकको मार डाला । खिज्जने कहा कि, क्या मैंने तुझसे पहलेही नहीं कहा था कि, तू मेरे साथ चलने योग्य नहीं फिर मूसाने विनय भी कि, अबकी बार तो मेरा दोष क्षमा करो, अब मैं तेरे काय्योंमें हस्तक्षेप न करूँगा ।

फिर दोनों आगे चले । एक गांवमें पहुँचे । वहाँके मनुष्योंसे भोजन माँगा, किसीने न दिया । फिर खिज्जने उस गांवमें एक दीवार बनाई जो जीर्ण होकर गिरा चाहती थी । खिज्जने भली भाँति परिश्रम करके उस दीवारको उठा सुदृढ़ कर दिया । मूसाने कहा कि, यदि तू चाहता तो अपनी मजदूरी लेता । खिज्जने कहा

कि, यह तीसरी बार है अब मेरी तेरी जुदाई है। अब जो जो काम मैंने किये हैं उसका तात्पर्य मुझसे सुन। जो नाव मैंने फाड़ डाली उसका तात्पर्य यह था कि, वह नाव मोहताजोंकी थी जो लोग परिश्रम करके अपना पेट पालते हैं। मैंने चाहा कि, मैं इसमें बाधा डालूँ, क्योंकि, उनसे परे एक बांदशाह है जो नावोंको छीन लेता है। इस कारण मैंने उसकी नाव फाड़ डाली कि, फटी नाव देखकर उसको छोड़ देगा, उस नावसे उस गरीबको बड़ा लाभ हुआ क्योंकि, सब आनेवाले मनुष्य उसकी नावपर चढ़कर पार हो गये। मैंने जिस बालकको मार डाला था उसका कारण यह है कि, इसके माता पिता भले थे। लड़का दुष्ट होकर भविष्यमें उनको बदनाम करता इस ध्यानमें मैंने उसका वध किया, जिसमें उसके माता पिता जो धर्मिष्ठ हैं सुख पावें। वह दीवार जिसको परिश्रम पूर्वक मैंने उठाया वह अनाथ बालकोंकी थी। उस दीवारके नीचे खजाना गड़ा था और वह दीवार गिरा चाहती थी। इस दीवारको परिश्रम पूर्वक मैंने इसलिये उठाया जिसमें वे लड़के जब युवावस्थाको पहुँचे तब उस गड़े खजानेको खोदकर निकालकर सुख पावें। क्योंकि, उन लड़कोंके माता पिता सुकम्मी थे। इन लड़कोंपर ईश्वरी कृपा थी, यह समस्त कार्य मैंने खुदाकी आज्ञासे किये थे। अपनी इच्छासे नहीं किया। खिज्जको परमेश्वरी बुद्धि सागरका एक बूँद मिला था पर मूसाको कुछ नहीं मिला था। मूसा मिश्री भाषामें पुस्तकें पढ़ाया। सुन्दर सुदृढ़ तथा बलिष्ठ था।

मूसा और मौत—मैंने किसी मुहम्मदी पुस्तकमें पढ़ा था कि, मूसाकी मृत्युका संदेशा लेकर मलकुलमौत उनके पास आया। मूसासे कहा कि, मैं तुम्हारी जान निकालने आया हूँ। तब मूसाने एक तमोंचा खींचकर उस इजराईल फिरिस्ते को ऐसा मारा कि, एक आँख फूट गयी। वह खुदाके समीप दोहाई मचाता गया कि मूसाने मेरी एक आँख फोड़ दी।

मुहम्मदसाहिब और मुहम्मदे गिजाली

मुहम्मद गिजालीको मुहम्मद साहब लाहूत स्थान ले चले। पहले मलकूत स्थानको गये। वहाँ मूसासे साक्षात् हुए मुहम्मद गिजालीने मूसासे कहा कि हजरत आपने जो खुदाको आकाशके रङ्गका बताया खुदा की वह मूर्ति कहाँ है, यह बात सुनकर मूसाने मुहम्मद गिजालीको भी एक तमोंचा खींचकर मारा कोई उत्तर नहीं दिया। अतः मूसा शूर वीर तो था सोटे की विद्या तो मूसाको अवश्यही थी। वह अन्तर्यामी नहीं था इसलिये आवागमनका भेद भी नहीं जानता था।

७ हजरत दाऊद नबी—मूसाके पीछे दाऊद नबी प्रख्यात हुये। देखो दूसरी समवाईलके (११) बावसे दाऊदका सारा हाल लिखा है। एक दिवस आप

छतपर फिर रहे थे । उस समय एक सुन्दरीरमणी आपको दिखाई दी । वह उरबाह नामक मनुष्यकी स्त्री थी । उसको देखकर हजरतने आसक्त हो अपने नौकरको भेजकर उसे अपने पास बुलवाया । उसके साथ सम्भोग किया । निवृत्ति होनेके पीछे उस स्त्रीको बिदा किया । वह स्त्री अपने घरको चली गयी । कुछ दिनोंके पीछे उस स्त्रीने आपसे कहला भेजा कि मुझे तेरा गर्भ रह गया है । यह बात सुन कर दाऊदने उस स्त्री के पति उरबाहको एक लड़ाईमें भेजकर मरवा डाला । जब वह मारा गया तो उसकी स्त्रीको आपने महलमें डाल दिया । जब दाऊदने ऐसा किया तब खुदा दाऊदपर अति क्रुद्ध हुआ । खुदाके क्रोधसे दाऊद बहुत घबराया वह रात दिन रोया करता था । खुदासे प्रार्थना किया करता था कि तू मेरे पापोंको क्षमा कर । जब वह बहुत रोया तब खुदात आला उसपर दयालु हुआ मुहम्मदी हदीसमें आया है और कुरानमें सूरत (स्वाद) की तफसीरमें लिखा है कि, जब दाऊदके ऊपर खुदा दयालु हुआ तब उससे कहा कि हे दाऊद ! मैंने तेरे समस्त पाप तो क्षमा कर दिये पर उरियाहके साथ जो तूने गुनह किया है मैं उसको क्षमा नहीं कर सकता क्योंकि वह पाप तो जो स्वयम् उरियाह क्षमा करे तो क्षमा किया जावे । तू उसीसे क्षमा प्रार्थना कर । तब दाऊदने कहा कि उरियाह तो मर गया अब मैं किससे क्षमा प्रार्थना करूँ ? तब खुदाने कहा कि मैं तेरे लिये उरियाहको फिर जीवित करूँगा । तू उसकी कब्र पर जा क्षमा प्रार्थना कर । दाऊद उरियाहकी कब्रपर जाके पुकारा उरियाह उरियाह, वह बोला कौन है जिसने मुझे सोते हुयेको जगाया, मैं सुखपूर्वक सो रहा था । वह बोला कि मैं दाऊद हूँ । उसने कहा कि, हजरत आपने कैसे कष्ट उठाया और यहाँतक पधारे । वह बोला कि ऐ उरियाह । मैंने तुझे लड़ाई पर भेजा वहाँ तू मारा गया । तू मेरा यह अपराध क्षमा कर । तब उरियाहने उत्तर दिया कि हजरत इसमें आपका कोई दोष नहीं नौकरका तो यही कार्य है कि अपने स्वामीके लिये प्राण दे, मैंने आपको क्षमा कर दिया । तब दाऊद प्रसन्न होकर पलट आया । फिर खुदाकी ओरसे दाऊदको यह आवाज आई कि ऐ दाऊद ? अपराध क्षमा करानेमें धूर्तता और कपट नहीं चाहिये । वरन् अपने पापोंको उरियाहसे स्पष्ट रूपसे कहो कि, मैं दयामान तथा न्यायी हूँ । दाऊद पुनः उरियाहकी कब्र पर गया कहा कि, ऐ उरियाह ! तू मेरा अपराध क्षमा कर । तब उरियाहने उत्तर दिया कि, मैंने तो पहलेही क्षमा कर दिया था आपने फिर यहाँ आनेका क्यों कष्ट उठाया । दाऊदने कहा कि, मैंने तेरी स्त्रीके साथ कुकर्म किया, उसको प्राप्त करनेके लिये तुझको लड़ाई पर भेजकर मरवा डाला तेरी स्त्रीको अपने महलमें डाल लिया । तू मेरा यह अपराध क्षमाकर ।

तब उरियाहने सुना कि, मेरी स्त्रीसे सम्भोग करनेके लिये उसने मुझे भरवा डाला था। तब वह निस्तब्ध होरहा कुछ न बोला। यद्यपि दाऊदने बहुत पुकारा रोया गाया पर वह फिर न बोला। तब दाऊद उसकी कन्न पर चिल्लाने रोने अपनेको धिक्कार देने लगा कि, खेद है तुझ दाऊद पर कि, अब तुझको पापिष्टियोंके साथ नरकको ले चलेंगे।

एक दूसरी कहावत है कि दाऊदके पास मनुष्य स्वरूप धारण कर दो फिरिश्ते आये। दाऊदसे पूछा कि, ऐ दाऊद बादशाह! हम दोनों भाई हैं, मेरे पास केवल एक भेड़ थी, मेरे इस भाईके पास निज़ानबे भेड़ें थी सो इसने बलपूर्वक मुझसे वह एक भेड़ भी छीनली। तू बादशाह है मेरा न्याय कर तब दाऊदने कहा कि, वस्तुतः तेरा भाई अत्याचारी है और निस्संदेह इसने अत्याचार किया। जब दाऊदने इतनी बात कही तब वे दोनों फिरिश्ते अन्तर्धान होगये। दोनों फिरिश्तोंके विलोपित होने पर दाऊद जान गया कि, वे दोनों फिरिश्ते थे। मनुष्य नहीं थे। खुदाने मेरी परिक्षा ली, मुझे अत्याचारी ठहराया। क्यों कि, दाऊदकी निज़ानबे स्त्रियां थीं उरियाह जिसकी एकही स्त्री थी उसको भी उसने छीन लिया था। बादशाहतके बलसे दाऊद तथा मूसाने बड़ाही रक्तपात किया।

समीक्षा—यह दाऊद आवागमनको प्रगट करता है अपने पूर्वजन्मको स्वीकार करता है। देखो जम्बूरका (५१) बाब (५) (६) आयत देख मैंने बुराइम सूरत पकड़ी और पापके साथ मेरी माताने मुझको अपने पेटमें लिया। अर्थात् दाऊद कहता है कि,—मैंने पाप किया था इस कारण मेरी माता ने मुझे गर्भमें लिया पापोंके कारण मैं मातृगर्भमें आया अर्थात् मैं अपनी उत्पत्तिके पूर्वसे पापिष्टी था ऐसा दाऊदके कथनसे प्रगट होता है कबीरजीने भी पिछले पापोंका इस निम्न साखीसे वर्णन किया है कि—

कबीर साहबकी साखी

उर्दूसीस उर्दूहि चरण, यह पिछली तकसीर।

कुम्भी नरक पठाइयां, जड़ियां भरम जँजीर ॥

८ सुलेमान—दाऊदके पीछे अपने पिता दाऊद बादशाहका सत्वाधिकारी हुआ। उसकी सातसौ स्त्रियां तथा तीनसौ रखैलें थीं। सहस्रों स्त्रियोंके साथ भोग विलास किया करता था। यह सुलेमान बादशाह अपने पिताके स्थानपर नबी भी था। आपका हाल पुराने अहदनामें तथा इतिहासोंमें लिखा हुआ है। वह स्त्रियोंके बहकानेसे भूसाका नियम तोड़कर मूर्तिपूजामें संलग्न हुआ उसका ईमान फिर गया। इस कारण उसपर खूदाई क्रोध उपस्थित हुआ। उसको दण्ड

देकर कहा कि, तेरे वंशसे बादशाही विलुप्त हो जायगी क्योंकि, तू यहवाहको छोड़कर अन्यान्य परमेश्वरोंकी पूजा किया करता है ।

सलातीनकी किताबमें देखो । यद्यपि सुलेमान बादशाहको खुदाने दो बार दीदार दिया बरकत देकर कहा कि, ऐ सुलेमान ! मैंने तुझको विद्या, राज्य तथा पैगम्बरी तीनों प्रदान की तुझसा बुद्धिमान् न कभी हुआ न भविष्यमें होगा, न इस समय है । इस सुलेमान को काम क्रोधादिकने ऐसा दबाया कि कितनेही कार्यमें उसने बुद्धिके विरुद्ध किये ।

किताब तोहफतुल इस्लाममें लिखा है कि, एक दिवस सुलेमानके पास बहुमूल्य घोड़े आये उनके विषयमें आपको वार्तालाप करते २ सौझ हो गयी, सूर्यास्त होनेके कारण सौझके समयके निमाजका समय भी जाता रहा । इस बातसे सुलेमानको अत्यन्त क्रोध आगया घोड़ोंकी गर्दन उनके तनसे जुड़ा की । व्यर्थही उन निर्दोषोंका रक्तपात करके अपने हाथोंको निर्दोषोंके रक्तसे रंगा ।

कुरानके सूर : (स्बाद) और हदीसोंमें लिखा है कि, जैदून नामक एक बादशाह समुद्रके टापुओंमें रहता था । उसको मारकर उसकी पुत्री जरावाको सुलेमानने अपनी स्त्री बनाई, वह अपने पिताके शोकमें रोया करती थी, सुलेमानने मूर्ति बनानेके लिये कहा । उस स्त्रीके घरमें वह मूर्ति रखी गई, चालीस दिवस तक बराबर मूर्तिपूजा होती रही सुलेमान तौहीदको छोड़कर बुतपरिस्त हो गया ।

यह भी लिखा है कि, सुलेमान बादशाह एक दिन पायखाने गया (जिसकी बदौलत जिनपरी आदि उसके अधीन थे उस अंगूठी) को अपने गुलामको दे गया, क्योंकि पायखानेके समय उस पवित्र अंगूठीको वह पहनना नहीं चाहता था । इसी अवसरमें एक देव सुलेमानके स्वरूपमें आया उस गुलामसे अंगूठीको लेगया, सुलेमानके सिंहासनपर बैठकर आज्ञा दी कि, मेरे पीछे एकदेव मेरे स्वरूप का आता है वह तुम लोगोंसे कहेगा कि, मैं सुलेमान हूँ, तुम कदापि उसका विश्वास न करना, उसको भलीप्रकार मारपीटकर निकाल देना । इसके पीछे ऐसाही हुआ. सुलेमान जब शौचसे निवृत्त होकर आया तब तो गुलामको उसकी जगह न पाया न वह अंगूठी मिली । अपने मकानमें जाकर अपने को सुलेमान बादशाह कहा, पर उसके सेवकोंने उसको मारकूटकर निकाल दिया । सुलेमान बादशाह मारा मारा फिरने लगा ढाढ़ें मार मारकर रोता था । भूखा फिरा करता था एक स्थानपर गया जहाँ एक मल्लाह मछली मार रहा था । उसने पूछा तू कौन है ? यदि तू मेरी नौकरी करे तो मैं तुझको एक मछली नित्य प्रति खानेको दे दिया करूँगा । सुलेमान मछुवेका नौकर हो गया । एक मछली प्रतिदिवस पाया करता था, उसकी

सेवा किया करता था। एक दिवसकी बात है कि, सुलेमान सो गया था एक सौपने आकर सुलेमानके सिरपर अपना फण पसार दिया था। यह हाल उस मल्लाहकी बेटीने देख लिया। तब उसने जान लिया कि, यह हमारा नौकर कोई प्रतिष्ठित तथा बड़ी ममर्यादाका मनुष्य है। तब उसने अपने पितासे कहा कि, पिता ! मेरा विवाह इसके साथ कर दो। मल्लाहने कहा कि, हे बेटी ! यह तो हमारा सेवक है इसके साथ तू क्यों विवाह किया चाहती है ? अनेक मल्लाह हैं किसी अच्छे मल्लाहके पुत्रके साथ कर दूँगा। उस लड़कीने यह बात अस्वीकार की उसका विवाह सुलेमानके साथ हुआ, विवाह हो गया। तब उसदिनसे वह मल्लाह दो मछलियाँ दिया करता। एक सुलेमान और दूसरी अपनी पुत्रीको, वह मल्लाह भड़ भूजेका कामभी करता था। उसकी लड़की भाड़ झोंकती थी। सुलेमान भी झोंका करता था। एक दिवस ऐसी घटना हुई कि, उसने अपनी पुत्री तथा दामादको दो मछलियाँ दीं। जब उन्होंने मछलियोंको चौरा तो जो उस लड़कीके भागकी मछली थी उसके पेटसे सुलेमानकी वही अंगूठी निकल पड़ी सुलेमानने उस अंगूठीको पहचानकर अपनी उँगलीमें पहनली।

अब इधरका हाल सुनो कि, जब वह देव मुलेमानका स्वरूप धारण करके बादशाहत करने लगा, तो कुछ दिवसोंतक तो उसने राज्य किया। इसके पीछे शाही चाकरों तथा बेगमोंने उसकी आदतें सुलेमान बादशाहकी आदतों विरुद्ध पाईं, तो जान लिया कि, यह हमारा बादशाह नहीं है बरन जिसको हमने मारकूटकर निकाल दिया था वही सुलेमान बादशाह था, यह कोई देव वा धूर्त है जो सुलेमानका स्वरूप धारण कर सिंहासनारूढ़ हुआ है। सब कारबारी सुलेमान को दूँढ़ने लगे। जब उस दुष्ट देवने देखा कि, यह सब सुलेमानको दूँढ़ रहे हैं मेरी धूर्तताको सब जान गये हैं, तो सिंहासन छोड़कर भाग गया। अंगूठीको नदीमें डाल दी। नदीमें पड़ते उसी समय उस अंगूठीको एक मछली निगल गयी। सब कर्मचारी तो सुलेमानको दूँढ़ते रहे वह देव कहीं छिप रहा। उधर जब सुलेमानने वह अंगूठी पा उसे अपने हाथमें पहना तो उसी समय जिन तथा परियों उसकी चाकरी में आ उपस्थित हुईं। शाही सिंहासन आया, सुलेमान को बैठाया। सुलेमानने उस मल्लाहकी छोकड़ीको अपने साथ सिंहासनपर बैठाया, वह आकाशको उड़ा, उसकी राजधानीमें जा पहुँचा। जब सुलेमान अपनी राजधानीमें पहुँचा तो पहिलेकी तरह राज्य करने लगा।

घृणाकी दृष्टिसे देखनेका फल सुलेमान बादशाहका सिंहासन एक समय आकाशमें उड़ा जाता था, उस समय उसने मल्लाहकी लड़कीको कुरूपा

देखकर अपने मनमें ख्याल किया कि, हे खुदा ! ऐसी कुरूपता के साथ कौन विवाह करना पसन्द करेगा । अतः वह लड़की सुलेमानकेही गले पड़ी उस लड़कीकेही हिस्सेकी मछलीके पेटसे वह अंगूठी निकली, जिससे सुलेमान पुनः अपने राजा सनपर आसीन हुआ था । सुलेमानने उस लड़कीके साथ विवाहभी किया, उसके साथ भाड़भी झोंका, इन बातोंको सुलेमानोंकी हदीसोंमें दृढ़ना चाहिये । इस जगह मुझको एक उदाहरण याद आया है कि—

जब रामचन्द्र बनमें फिरते हुए दण्डकारण्यमें आये तो शिवरी भीलनीके हाथके बैर खाकर लक्ष्मणजीसे भी कहा कि, तुम भी इनको खाओ । लक्ष्मणने कहा कि, महाराज ! मैं तो भीलनीके हाथ कान खाऊँगा, रामचन्द्र चुप होरहे । जब मेघनादने बाण मारा और लक्ष्मणजी अचेत होगये उनके जीवनकी कोई आशा नहीं रही । तब हनुमानजी सञ्जीवनी बूटी लाये वह लक्ष्मणके मुंहमें दी उसी बूटीसे लक्ष्मणके प्राण बचे । तब रामचन्द्रने कहा कि, हे लक्ष्मण ! जिससे तुम घृणा करते थे उसी बेरके बीजसे यह सञ्जीवनी बूटी हुई है जिससे तुम्हारे प्राण बचे हैं । इस कारण किसीको घृणाकी दृष्टिसे देखना और अपनेको अच्छा जानना परमेश्वरका कोप अपने ऊपर उपस्थित करना है । ईश्वरोंके लिये भक्तों का आदर ही उचित है ।

सुलेमान बादशाहकी प्रशंसा मुसलमानी पुस्तकोंमें बहुत लिखी हुई है । पुराने अहदनामसे भी प्रमाणित है कि, खुदाने सुलेमानको विज्ञान, पैगम्बरी और बादशाहत तीनों प्रदान करके कहा कि, तुम्हारे समान दूसरा न होगा । इस सुलेमानका हाल पढ़कर संसारकी बादशाही पैगम्बरी और हिकमत सभी तुच्छ और जान निकृष्ट पड़ती हैं ।

९—योहन्सानवी—सुलेमान नबीके पीछे योहन्ना नबी जिकरियाका पुत्र बड़ा प्रेमी हुआ है जब वह अपनी माताके गर्भमें आया तो (इञ्जीलके अनुसार) गर्भमेंही नूरैल्लाहीसे भरपूर होगया था । यह मनुष्य ईश्वरी भयसे सदैव रोया करता था । हजरत ईसाने निज मुखसे प्रशंसा की कि, जितने नबी पूर्वसे अब-तक पृथ्वीपर आये-योहन्नासे बढ़कर कोई नहीं है । मतीके (११) बाबकी (११) आयतको देखो कि, योहन्ना जब कैंदमें था तब मसीहके पास उसने अपने दो शिष्योंको भेजा । जिसमें जाने कि, आप वही मसीह है जिसकी कि हम आशा करते थे, या हम किसी अन्य मसीहकी प्रतीक्षा करें । तब ईसाने उन शिष्योंके द्वारा कहला भेजा कि, जो कुछ तुम देखते हो उससे जानो मेरी लीलाओंसे मुझको पहचानो । यह स्पष्ट रूपसे नहीं कहा कि, मैं वही मसीह हूँ और न

मनके पांच अहंकार

योहन्नाको जान पड़ा कि यह वही मसीह है। योहन्ना उजाड़में रहा करता था। उसका भोजन मधु और टिंडी था। वह ऊँटोंके रोंएकी पोशाक पहनता था, खालकी कमरबन्द कमरमें बाँधता था।

१०-हजरत ईसा-फिर इस पश्चिम देशमें हजरत ईसा सबसे श्रेष्ठ पैगम्बर उत्पन्न हुए। आपके विषयमें योहन्नाने कहा है कि, मैं ईसूके जूतेका तस्मा खोलने योग्य भी नहीं, सब पैगम्बरोंसे इतना मसीह श्रेष्ठ हैं।

मरकतका (१) बाब (७) आयत देखो। उन हजरतको भी कभी कभी कुछ प्रकाश होकर अन्तर्धान हो जाता था, सुतरां मतीके (२१) बाबके (१८) आयतसे (२०) आयततक और मरकसके (११) बाबके (१२) से (१४) आयत तक लिखा है कि, प्रातःकाल जब वह बैठ-‘अँना से बाहर आया तब मसीहको भक लगी उसने दूसरे इञ्जीरका एक वृक्ष देखा जो पत्तोंसे लदा था। उसके नीचे मसीह दौड़कर गया कि, कदाचित् उसमें कुछ फंस पावें, परन्तु वहाँ पत्तोंके सिवा और कुछ नहीं पाया। क्योंकि, वह इञ्जीरके फलनेका समय नहीं था, निराश होकर उसने इञ्जीरके वृक्षको शाप दिया कि तेरा फल महाप्रलय तक कोई न खावेगा उसके शापसे वह वृक्ष वहीं सूख गया।

समीक्षा—इससे तीन बातें प्रमाणित हुईं, पहले तो उन हजरत को फला और बिन फला वृक्ष मालूम नहीं था। दूसरे आपको इञ्जीरके फलनेका समय मालूम नहीं था। तीसरे उस वृक्षको व्यर्थही शाप दिया। क्योंकि उसका कुछ भी दोष नहीं था। हजरत मसीहमें वह प्रकाश था कि, जिससे आप अपने आवा-गमनको जानते थे सुतरां योहन्नाकी इञ्जीलका (९) बाब (५६-५८) आयत देखो आप आज्ञा करते हैं कि “तुम्हारा पिता इब्राहीम उत्सुक था कि, मेरा दिन देखे सुतरां उसने देखा और प्रसन्न हुआ” तब यहूदियोंने कहा कि, तेरी उम्र तो पचास बरस की भी नहीं? क्या तूने इबराहीमको देखा है। तब ईसाने कहा कि, मैं तुमसे सत्य सत्य कहता हूँ कि, इबराहीमके होनेके पहले मैं हूँ।

११ मुहम्मद मुस्तफा—जो अन्तिम पैगम्बर कहलाते हैं। मशकातके बाब किस्से अबिन सैयादके दूसरे फसिलमें आपका हाल इस प्रकार लिखा है, कि मुहम्मदसाहबने सुना कि, मदीनामें किसी यहूदिनके एक लड़का उत्पन्न हुआ है। उसकी एक आँख नहीं है, वह मादरजाद काना है। यह बात सुनकर आपको यह भय हुआ कि, कदाच यह लड़का मसीहहुज्जाल होगा। तात्पर्य यह कि, हजरत उमर सहित मुहम्मद साहब इस लड़केका वृत्तान्त जानने गये। उसको

वर।

मनकी विषय वासना

भली प्रकार देखा। उसका हाल पूछा। हजरत उमरने मुहम्मद साहबसे निवेदन किया कि, यदि आप आज्ञा दें तो मैं इस बालकको मार डालूँ। आपने फरमाया कि, यदि यह लड़का मसोहुद्दज्जाल है तो इसका मारनेवाला मसीह है। बिना मरियमके पुत्र ईसाके इसका मारनेवाला और कोई नहीं। जबतक मुहम्मद जीवित रहेगा तबतक उससे डरा करते थे कि, कदाचित् यही मसोहुद्दज्जाल हो एवं बगावत कर बैठे। आपको जम्मभर उसका भय रहा मनकी धड़क कभी भी न गयी।

सफरुसआदतमें लिखा है कि, एक दिन एक यहूदी स्त्रीने आपका (मुहम्मद साहबका) निमन्त्रण किया और कबाबमें विषमिलाकर लाई, जब वह कबाब आपके सामने रखा तो आपने उसमेंसे आपके सभीप बैठे हुए एक अमीरको कुछ दिया। उसने खाया, उसने जान लिया कि, कबाबमें विष है। उसने पुकारकर कहा कि, हजरत आप इस कबाबको न खाइये इसमें विष है। यह बात सुनकर मुहम्मद साहबने अपना हाथ भोजनसे खींच लिया। वह अमीर जिसने कबाब खालिया उसी समय मर गया, परन्तु मुहम्मद साहबने जो तीन ग्रास खाये थे उसका प्रभाव हजरतके शरीरपर थोड़ाही हुआ, जिससे प्राण बच गये। आपने उस स्त्रीको बुलाकर पूछा कि, तूने ऐसा कार्य क्यों किया। उसने कहा कि, मैंने आपकी परीक्षाके लिये यह कार्य किया था कि, आप सच्चे पैगम्बर हैं या नहीं। अब मुझे जान पड़ा कि, आप सच्चे नबी हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं। मुहम्मद साहबने उस स्त्रीका वध कराया। वह तीन ग्रास जो आपने खाये थे उसका उद्देग उस समयसे प्रतिवर्ष हुआ करता था जिस समयसे आपने उस कबाबको खाया था। उस समय आपको बड़ा कष्ट हुआ करता था, जब वह कबाब खानेका समय आता था तब आप बीमार हो जाया करते थे। तीन वर्षके पीछे उसी विषसे आपकी मृत्यु होगई।

हजरत अपने भीतरी प्रकाशसे कुछ नहीं जान सकते थे। कभी कोई कोई बात जान भी लेते थे। जैसे बिजलीका चमक पड़ना, अधिक तो जिबराईल द्वारा कर्माकर्मसे बिज होकर उसीके अनुसार काय्य किया करते थे।

बैजावी तथा मदारक इत्यादिमें लिखा है कि, जिबराईल हजरतके निकट खुदाका हुकुम लेकर आया करते थे उस समय, वही (खुदाके हुकम) की रक्षाके लिये सत्तर सहस्र फिरिश्ते जिबराईलके साथ आया करते थे। उन्हें डर था कि, कहीं शैतान अपनी बात उसमें न मिला दे अथवा स्वयम् जिबराईल उस वहीमें कुछ अधिक और न्यून न करदे या बदल न दे। तात्पर्य यह कि, स्वच्छ तथा

वासनाओंकी जननी

निर्दोष वही खुदाके पेंगम्बर के पास स्वच्छ पहुँचे, इसीलिये खुदाकी ओरसे बड़ी चौकसी हुआ करती थी। हजरत इब्रअब्बासका कथन है कि, जिबराईल कभी खुदाके पेंगम्बरके पास वही न लाया। उसके साथ साठ सत्तर सहल चौकीदार फिरिश्ते वहीकी रक्षार्थ साथ नहीं थे।

कुरानमें मूर्तिपूजा—मौलवी अमादुद्दीन कृत तवारीख, मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबके नबी होनेके पाँचवें वर्षका हाल है कि, जब मक्का-वालोंसे मुसलमानोंका बैर हो गया तब मुहम्मद साहबने मुसलमानों तथा काफिरोंके सामने यह बात सुनाई। बुतोंकी प्रशंसामें सूरत नजममें यह बात उत्तरी (जैसा कि, स्वर्गवासी मास्टर रामचन्द्र सितारे हिन्द दिहलबीने आजाज कुरानमें लिखा है )

أَقْرَرُ نَيْمًا لِلَّاتِ وَالْعُرْزِي وَمِنْهُ الثَّالِثَةُ الْأَحْرِي

कि, “तुम देखते हो लात असी और मनात बुतोंको” उसके उपरान्त फर मुहम्मद साहबने इसी आयतके साथ यह भी पढ़ा है।

وَالْقَدْرُ مَا خَلَيْتَ مِنْهُ إِلَّا اللَّهُ تَعَالَى

कि, “तीनों मूर्तियों परम श्रेष्ठ हैं। इनसे मुक्तिकी अभिलाषा की जाती है।” यह बात सुनकर सब मूर्तिपूजक मुसलमानोंके मित्र बन गये फिर जब मुहम्मद साहबने देखा कि, मुसलमानों तथा मूर्तिपूजकोंमें कुछ विभिन्नता नहीं रही तब खेद करने और सोचने लगे।

दूसरा कथन—तब आपने यह आयत सुनाई जो सुरे हजमें है :—

وَمَا ارْسَلْنَاكَ مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ وَلَا نَبِيٍّ إِلَّا أَوْفَاةً أَوْ أَمَنِيَّةً أَلَيْسَ الشَّيْطَانُ فِي الْأَمْنِيَّةِ فَهُوَ شَمُّ اللَّهِ مَا لَيْسَ الشَّيْطَانُ شَمًّا مَكْرَمُ اللَّهُ آيَاتِهِ

अर्थात् ऐ ! मुहम्मद तुझसे आगे जो रसूल तथा अम्बिया संसारमें आये उनकी यह दशा हुई कि, जब उन्होंने कुछ पढ़ना चाहा तो शैतानने उनके पढ़नेमें कुछ अपनी बात मिलादी अतः खुदा शैतानकी मिलाई हुई बातोंको काटता है अपनी बातको दृढ़ कर देता है।

तात्पर्य—यह कि, मैंने जो बुतोंकी प्रशंसामें वह बात कही मूर्तियोंकी

प्रशंसा की वह वाक्य खुदाकी ओरसे नहीं था वरन् शैतानने वह बात मेरी जिह्वा-पर डालदी थी । उस वाक्यको कटा हुआ जानो क्योंकि, वह शैतानका वाक्य था । इस प्रकार शैतानी मिलावटके कारण कुरानकी बहुतसी आयतें कट गयी हैं । जिनका वृत्तान्त तफसीर मुआलि मुत्तनजीलमें लिखा है ।

समीक्षा—अब यहाँ प्रमाणित हुआ कि खुदा तथा खुदाके रसूल दोनों शैतानसे भयभीत रहा करते थे । खुदा सत्तर सहस्र चौकीदार आयतके साथ भेजा करता था । जिबराईलका भी कुछ विश्वास न था कि, वह अपनी ओरसे वहीमें कुछ मिला न दे इस चौकसी तथा सावधानीके होते रहने पर भी शैतानकी विजय होती है । वह वही तथा पैगम्बरोंकी जिह्वापर अपनी बात डाल देता है । उसकी मिलावटसे खुदा और रसूल दोनों डरा करते थे । तब बताइये कि, उनकी शक्ति तथा मुक्ति किस काम आई ।

विशेष—यहाँतक तो मैंने बहुतही संक्षेपमें सब नबियोंका हाल लिखा है एवं उनकी विद्याका वृत्तान्त प्रगट किया है । जो कोई उनकी जीवनी देखेगा वह अनेक बातोंसे विज्ञ हो जायगा कि, इन नबियोंको कैसा ज्ञान था किस प्रकारकी विद्यासे संसारवालोंको उपदेश दिया करते थे । जितने बड़े बड़े नबी बीते हैं वे येही हैं, उनके अतिरिक्त जितने नबी और बीचमें हुये हैं उनका विवरण व्यर्थ है । इन सब नबियोंको खुदाकी ओरसे बल तथा प्रकाश प्रदान किया जाता था । इसके द्वारा वे लोग मनुष्योंको उपदेश दिया करते थे । मृत्युके समय उनका सर्व प्रकाश विलुप्त हो जाता । वह दूसरी योनिमें चले जाते थे । परन्तु दूसरी देहमें पूर्वजन्मका परिश्रम कुछ सहायक होता शीघ्रही प्रकाशके अधिकारी हो जाते । किसीको मृत्युके समय प्रकाश पृथक् होता और किसीका प्रकाश उसी जीवनमें दूर हो जाता । सुतरां सावल नबी अपने जीवनमेंही बिना प्रकाशका हो गया था । एक स्त्री जिसका यार एक देव था उससे समाचार पूछता फिरा । उसमें तनिक भी ज्ञानकी ज्योति नहीं रही । देखो प्राचीन अहदनामा (१) समवाईलका (२८) बाब साविलका वृत्तान्त लिखा है । ऐसेही सब नबियोंको खुदाकी ओरसे उपदेश होता है तब विद्याका प्रदीप प्रकाशित होता है । फिर समय आनेपर बिना विद्या कभी हो जाते हैं योनि योनिमें आवागमन करते फिरते हैं जैसे घड़ीको फूक दी अथवा कलको हिला दिया जबतक उसका बल रहा तबतक चलती रही, ऐसे ही नबियोंका मन कभी प्रकाशित और कभी अन्धकारसे भर जाया करता है इसीका सार निम्न लिखित ग्रन्थलमें लिखते हैं ।