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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

उसके चिन्ह ये हैं । उस मनुष्यमें आलस्य, नौंद, चोरी, चुगली, निन्दा इत्यादिके दोष रहते हैं । घर घरमें आग लगाता है, उसमें विषय वासनाकी कामना अधिकता से पाई जाती है । देवी देवता भूतप्रेतादिकी पूजा किया करता है । कभी रोता है कभी मङ्गल गाता है दूसरेको दान पुण्य करता देखकर दुःखी होता है । सत्यगुरु को नहीं पहचानता । वेदशास्त्रोंको नहीं जानता । दूसरोंको तुच्छ तथा अपनेको बुद्धिमान समझता है । कभी नहाता नहीं कपड़े मैले रखता है । उसकी आँखोंमें कीचड़ भरा रहता है मुंहसे लार टपका करती है । जूवा चौसर आदि खेलोंमें संलग्न रहता है इसका सिर कुबड़ा तथा पैर लम्बे होते हैं ।

२-ऊशमजसे मनुष्य होनेके चिन्ह — जो कोई उषमजखानिसे मानुषिक शरीरमें आता है उसके यह चिन्ह हैं कि, वह खूब आखेट करता है । आखेट करने तथा जीववधसे बहुत हर्षित होता है । माँसको पका पकापर भक्षण किया करता है । वह गुरुको कुछ नहीं मानता । अपने गुरुसे अपनेको अच्छा जानता है । गुरु तथा नामकी निन्दा करता है, सभामें मिथ्या भाषण करता है बहुत बातें करता है । टेढ़ी पगड़ी बाँधता है उस पगड़ीका किनारा दामन तक लटकता रखता है उसके मनमें तनिक भी दया धर्म नहीं होता जिस किसीको दान पुण्य करते देखता है उसकी हँसी करता है । बड़ी चटक मटकके साथ गली कूचोंमें फिरा करता है । गुप्तमें तो पाषाण हृदय और निर्दयी है परन्तु प्रगटमें वह बहुत आवभगत किया करता है । प्रत्यक्षमें वह दयालु जान पड़ता है परन्तु यथार्थमें वह भयानक शैतान है । उसके दाँत लम्बे होते हैं उसका चेहरा भयानक होता है उसकी आँखे उभरी हुई होती हैं ।

३-उद्गिरजसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो अचलखानिमेंसे मनुष्य देहमें आता है उसके चिन्ह ये हैं कि, उसकी बुद्धि पारे की तरह चञ्चल रहती है । एक काम करनेको प्रस्तुत हो जाता है आगे शीघ्रही उससे फिर जाता है, खूब सज धजके पगड़ी बाँधता है, बादशाही दरबारमें नौकरी करता है । घोड़े पर खूब सवार होता है तलवार तथा कटार आदि कमरसे लगाता है, समय पाकर इशारेसे पराई स्त्रीको बुलाता है । व्यभिचारके लिये छिपकर पराये मकानमें जाता है । उसको तनिक भी लज्जा नहीं आती । एकक्षणमें तो प्रार्थना करता है दूसरे क्षण अपने परमेश्वरोंको भूल जाता है । एक क्षणमें तो वीर हो जाता है दूसरे क्षण नामर्द तथा डरपोक होकर भाग जाता है । एक क्षणमें सुकर्म तथा दूसरे क्षणमें कुकर्म करने लगता है भोजन करनेके समय अपना शिर खुजलाता जाता है । अपनी भुजा तथा जाँघ मलता जाता है भोजन करके सो जाता है । सोते हुये जो कोई उसको जगाने आवे तो उसको मारने दौड़ता है उसकी आँखें लाल होती हैं ।

पिंडसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो कोई पिण्डज खानिसे मनुष्य तन पाता है उसके चिन्ह ये हैं, वह वैरागी वासनाओंसे पृथक् होता है। वेदके अनुसार दान पुण्य करता है। योग समाधि लगाता है अपने गुरुसे अत्यन्त प्रेम तथा आधीनता करता है। उसके चरणोंसे लगा रहता है। वेद पुराण पढ़ता है बहुत धर्मचर्चा करता है। समाजमें उसकी बातें बुद्धि सहित होती हैं। राजभोग तथा स्त्रीसे प्रसन्न रहता है। बड़ा वीर तथा सामर्थी होता है। उसका स्वरूप और आकार कान्तिमय होता है। उसके हाथमें सदैव तलवार रहती है। जहां कहीं मूर्ति देखता है नमस्कार करता है।

यहांतक मैंने चारिखानिका विवरण किया फिर कबीर साहब कहते हैं कि, जो मनुष्य देह पाकर अल्पकालमें मर जाता है अपनी पूरी आयु पर्यन्त नहीं पहुँचता उसकी दशा दूसरी देहमें ऐसी होती है कि, वह मनुष्यकी देह छोड़कर पुनः मनुष्यकी देह पाता है। वह पुरुष बड़ा बीर तथा प्रतिष्ठित होता है। जैसे शेरके सामनेसे भेड़ोंकी भीड़ भाग जाती है उसी प्रकार वैरियोंकी सैन्य उसके सामनेसे भागती और तितर बितर होती है, वह विषयवासना तथा शारीरिक कामनाओं को पसन्द नहीं करता। उसके समीप दुर्बुद्धिता तथा मूर्खता नहीं जाती। उसको सत्य शब्दका विश्वास होता है। वह किसीकी निन्दा नहीं करता। नम्रता तथा बिनीततासे गुरुकी सेवा करता रहता है।

अन्य योनियोंमें पूर्वकी मनुष्य योनिके चिन्ह—इसी प्रकार चारखानि और चौरासी लाख योनिके जीव बनते हैं। जैसे चारों खानिके जीव मनुष्यका शरीर पाते हैं उसी प्रकार स्वकर्मानुसार मनुष्यका शरीर छोड़कर जब चौरासी योनीमें जाते हैं तब उनके पूर्वजन्मके चिन्ह उनके साथ होते हैं। उसका वृत्तान्त बहुत बड़ा है। चारों खानिके जीव सब बराबर हैं केवल तत्त्वोंके भेदसे बुद्धि स्वरूप और स्वभावमें भिन्नता होरही है, इसी प्रकार चारों खानि बनाकर चारों खानिमें स्वयम् निरञ्जन समा रहा है। कम्मोंके जालमें सब जीवोंको फँसा लिया है। उन सुकम्मों तथा दुष्कम्मोंके सब चिन्ह सब जीवोंके शरीरपर स्वयम् निरञ्जनने बनाये हैं। जिसने जैसा कार्य किया है उसके शरीरमें वैसेही चिन्ह प्रगट होते हैं। चारों खानिके सर्व जीव समान हैं। चारों खानिमें फिरते फिरते जब मनुष्यके शरीरमें आते हैं तब उनके कम्मोंके चिन्ह भली भांति प्रगट और स्पष्ट हो जाते हैं। इस मनुष्यहीके शरीरमें उनका पूरा हिसाब किताब होता है। यह आत्मा जिस शरीरमें होती है तब वहां वैसेही कार्योंको स्वीकार करती है। वही कार्यों करने लगती है गिरह बाज कबूतरके बच्चे आपही गिरहबाज होते हैं। लोटन कबूतरके

बच्चे लोटन होते हैं । परन्तु मनुष्यका बच्चा सदैव शिक्षा तथा गुरुके पथ दिखाने के आधीन रहता है । गुरु बिना इसका कोई ठीक नहीं होता । न कोई बुद्धि आती है इसी कारण किसीको पूर्णता नहीं है । परन्तु जो श्रेष्ठता तथा निपुणता मनुष्यको होती है वह और किसीको नहीं होती । यही मनुष्य देवताओंसे श्रेष्ठ तथा सर्व जीवोंसे अधमभी है । यदि मनुष्य गुरुद्वारा अच्छा काम न करे तो यह तुच्छसे तुच्छ और नीचसेभी नीच होजाता है ।

३-वैदिकी धर्म स्वसंवेदसेही बने हैं । चारों स्वसंवेदकी भीतरी बातें हैं । इस कारण वेद आवागमनके विषयमें स्वसंवेदसे समानता रखते हैं । सर्व ज्ञानी साधु आवागमनकी साक्षी देते हैं ।

कलञ्जनके पर्वतपरके सात शिकारी, दस हिरन मानसरोवर तालाबका एक हंस और सिंहलद्दीपका एक चकवीने गुरुक्षेत्रमें ब्राह्मणका जन्म पा वेद पढ़कर ज्ञान प्राप्त किया था ।

वशिष्ठ पुराणमें लिखा है कि, एक मनुष्यने चाहा कि, मैं बड़ी तपस्या करके अपना इतना बड़ा शरीर करूँ कि, मायासे पार जाकर ब्रह्मसे मिल जाऊँ । वह कठिन तपस्या करके अपना शरीर बढ़ाने लगा । उसकी देह बहुत बड़ी हो गयी पृथ्वीसे लेकर ऊपर इन्द्र लोक इत्यादिसे उस पार ऊँची चली गयी । उसका शरीर जब बहुत बड़ा हुआ । उसने देखा कि, मैं तो अब बहुत बड़ा हुआ तो उसने सत्यब्रह्मका ध्यान किया तब उसकी देह छूट गयी, वह मर गया । वह मरकर मच्छड़ हो गया क्योंकि, मरते समय उसका ध्यान मच्छड़की ओर था । वह मच्छड़ घासोंमें रहने लगा पश्चात् उसको एक हिरनकी लात लगी । मरनेके समय उस मच्छड़का ध्यान उस हिरनकी ओर होनेसे वह मच्छर मरकर हिरन होगया । उस हिरनको एक शिकारीने मारा । मरनेके समय उस हिरनका ध्यान शिकारीकी ओर हुआ । तब वह हिरन मरकर शिकारी होगया । वह शिकारी शिकार खेलने के लिये जङ्गलमें फिरने लगा । फिरते फिरते एक ऋषीश्वरसे मुलाकात होगई, तब उस ऋषिने उस शिकारीको शिक्षा दी जिस उपदेशसे वह पुनः तपस्या करके जीवन्मुक्त होगया ।

एक मकोड़ेकी आधी पिछली देह कट गयी थी आधी अगली साबित थी । वह अपनी आधी देहको घसीटे लिये जाता था । उसको देखकर एक मनुष्यने अपने गुरुसे पूछा कि, हे महाराज ! इस चीँटाने भी कभी मनुष्य शरीर पाया होगा । गुरुने कहा कि, मनुष्य होनेका तो क्या हिसाब, यह चिउँटा चौदह बार इन्द्र हो चुका है ।

उस गुरुको तीनों कालोंका ज्ञान था । इसी प्रकार अपने कर्मनुसार यह जीव सहस्रों बार ब्रह्मा और शिव हो जाता है, करोड़ों बार वरुण कुबेर और इन्द्र आदिका पद प्राप्त करता है । यह अपने उच्च पदसे गिरकर मध्य और कनिष्ठ पदमें आता है । कनिष्ठसे मध्य और मध्यसे ऊँचे पदमें जा पहुँचता है । इसी प्रकार उसका आवागमन बराबर चला जाता है ।

अब यहाँ पर विचारना उचित है कि, यदि जप तप तथा योगादिकसे मनुष्य छूट सकते तो सब जीवन्मुक्त होजाते । गर्भमें काहेको आते ? जन्म मरण का दुःख क्यों भरते ! यह मनुष्य दुर्बुद्धिता तथा अज्ञानता सहित तपस्या करता है इस कारण इसका कार्य पूरा नहीं होता । जैसा कि उस मनुष्यने इच्छा की कि, मैं अपना शरीर इतना बड़ा करूँ कि, मायासे पार होकर ब्रह्मसे संयुक्त हो जाऊँ । उस मनुष्यमें तनिक भी ज्ञान नहीं था कि, काया अर्थात् देह तो आपही माया है । जब ब्रह्मसे मिलना चाहता है तब देह कहाँ ? जब देह तब ब्रह्म कहाँ ? जब मैं हूँ तब तू नहीं, जब तू है तो मैं कहाँ ? जहाँ शुद्ध ब्रह्म है वहाँ माया कहाँ ? जब माया प्रगट होगी तो ब्रह्म पर अवश्यही परदा डालेगी । इसी प्रकार सब तपस्वी और ऋषि मुनिगण बे सोचे समझे तपस्या करते आये आवागमनका सम्बन्ध नहीं टूटा । उनके मनमें तनिक भी चिन्ता नहीं कि, जो कुछ कहने सुननेमें आता है वो सब माया है । सब कर्मोंके धागेमें बँधे पड़े हैं । इसी विषय पर भर्तृहरि जीका श्लोक लिखता हूँ —

श्लोक—ब्रह्मा येन कुलालवन्त्रियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे
विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्ता महासंकटे ।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे ॥

अर्थ—जिस कर्ममें ब्रह्माकी ब्रह्माण्डभाण्डके उत्पन्न करनेके लिये कुम्हारके समान नियुक्त कर दिया, विष्णुको दश औतार लेनेको बड़े उसके साथ संयुक्त किया, रुद्रको मनुष्यकी खोपड़ीमें भीख मँगवाई जिसकी आज्ञासे सूर्य सदैव आकाश में फिरा करता है उसी कर्मको मैं साष्टाङ्ग नमस्कार करता हूँ ।

इसी प्रकार सर्व ईश्वर तथा ईश्वरभक्त कर्महीको पुजाते आये हैं, वेद सब किताब कर्महीको बताते आये हैं, कर्मसे ही मुक्ति समझली गई है, जहाँ तक कर्म है वहाँ तक कर्ता है भक्तोंकी आराधना तथा दुष्टोंके उत्पातके वश हो अवतार धारण करते हैं अपने कर्मको भोगने तथा दूसरेके कर्मोंको भुगानेके परवस

सब जीव तथा ईश्वर है पर भक्त कम्मोंके वश नहीं भक्तोंकी तो बात निराली है, कबीर साहबने कहा है कि —

विरह भुयझूम तन डस्यो, मंतर लगे न कोय ।

राम बियोगी ना जिये, जिये तो बौरा होय ॥

सो वह मनुष्य जिसने कुछ बात जानली उसको इस संसारके लोग पागल कहा करते हैं । भर्तृहरि योगी जो ब्रह्मा विष्णु और शिव इत्यादिको कम्मोंके बन्धनमें बताता है वह स्वयम् कम्मोंके बन्धनसे छूटनेकी युक्ति नहीं जानता । सब योगी कम्मोंके बन्धनमें ही फँसे हुए हैं ।

पुनर्जन्म पर भारतीय दर्शन

४—न्याय शास्त्रका यही न्याय है कि, आवागमन ठीक है वैशेषिक भी इसीके पक्षमें ।

५—मीमांसा और पातञ्जलि सांख्यसे भी उससे सहमत हैं ।

६—सांख्य तथा बुद्ध धर्म भी यही कहता है कि, जीवोंका आवागमन है ।

७—जैन धर्म समानता रखता है और सर्व भारतके ज्ञानियों और विद्वानों की पुनर्जन्मके विषयमें एकता है । सभी पुनर्जन्मको मानते हैं जितने भी पूर्वके दार्शनिक हैं सभी पुनर्जन्मके पक्षपाती हैं ।

८ आवागमनपर तौरीत—मूसाकी पहली पुस्तकसे आदमकी उत्पत्ति तथा आवागमनका स्वरूप दिखाता हैं । यदि आदम पैगम्बर पूर्वजन्मके कम्मोंसे दुखी न होता तो उसकी वैसी अवस्था भी कभी न होती जैसी कि, अवस्थामें वह अदन की बाटिकामें फँसाया । उसके पूर्वजन्ममें कम्मोंकी गन्दगीने उसको इस अवस्थामें डाल दिया । यदि आदम कम्मोंसे पृथक् होता तो उसमें किसी प्रकारकी इच्छा न होती । वह तो अवश्य ही अपने पूर्वजन्मोंके कम्मोंसे घिरा हुआ था । वह अपने यथार्थसे पूर्ण तथा अनभिज्ञ था वह कुछ नहीं जानता था कि, मैं क्या था अब क्या हूँ? उसका पुनर्जन्म मैं स्पष्ट सिद्ध करता हूँ । उसके पुनर्जन्मसे सर्व मनुष्योंका पुनर्जन्म प्रगट होगा, यह खुदाका बेटा आदम जब उत्पन्न हुआ तब उसकी अवस्था मनुष्यों के बच्चेकोसी थी । उसका मन वासनाओंसे भरा हुआ था, मुझे खूब खाना पीना तथा सैर कौतुककी वस्तुएँ प्राप्त हों । उसकी इच्छानुसार खुदाने अदनके बगीचेको बनाया । आदममें मनुष्योंके बच्चोंके सब चिन्ह दिखाई देते थे तनिक भी विभिन्नता नहीं थी । जैसे अनजाने दूध पीते बच्चे होते हैं वैसाही वह भी था । तौरीत कुरान और हदीसोंमें उसका समस्त वृत्तान्त देखलो । उसके पिता खुदाने उसके भोगके सब सामान एकत्रित कर दिये, उसके लिये विश्रामके सब आयोजन तो

थे पर वह स्त्रीके लिये चिन्तित था। तब उसके पिताने उसे एक जोरू भी ला दी, वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। वे दोनों मूर्खताके तिमिरमें फँसे हुये थे, वे दोनों अज्ञानतावश निर्दोष तथा भोले भाले कहलाते थे। पिताको चिन्ता हुई की, मेरी सन्तान मूर्ख न रह जावे, इनको विद्या सिखाना आवश्यक है जिसमें वे जाने कि, वे किस लिये उत्पन्न किये गये हैं? ऐसा न हो कि, वे सदैव मूर्खावस्थामें ही पड़े रहें। इस कारण उसने एक विवेकका वृक्ष लगाया कि, उसके खानेसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान हो जावेगा और भला बुरा जाना जावेगा, इसके पीछे उसके पिताने शैतान गुरुको शिक्षार्थ भेजा, जिस फलके खानेको खुदाने मना किया था उसे उसने उभाड़ कर फलको उन दोनोंको खिला दिया। जैसे प्रत्येक मनुष्यको इसीकी चिन्ता होती है कि, किसी प्रकार मैं उभार कर अपने शिष्योंको विद्या तथा सभ्यता सीखने पर प्रस्तुत करूं, इसी प्रकार शैतानने फुसलाकर उन्हें फल खिलाया, जिससे आदमको विद्या हुई, वे वैकुण्ठसे निकाले गये। क्यों कि, वे सर्व पदार्थ मूर्खोंके लिये हैं जबतक मनुष्यमें मूर्खता है तब तक नरक तथा वैकुण्ठमें ही फँसा रहता है, जब जीवको विद्या होती है तब नरक तथा वैकुण्ठके दुःख सुखको मिथ्या तथा क्षणभंगुर जानता है। जब नरक तथा वैकुण्ठको तुच्छ समझकर भजनमें लगता है तब उसके मनसे सभी वासनाएं पृथक् हो जाती हैं, उनके पृथक् होनेसे सर्वज्ञताके योग्य होजाता है। महाप्रलयमें सब जीव निरञ्जनमें समा जाते हैं, ब्रह्मा तथा कीड़े मकोड़े आदि सभी अपने कम्मोंके साथ निर्जीवके समान निरञ्जनमें रहते हैं। उत्पत्तिके समय पूर्वके कम्मोंके अनुसार फिरसे शरीर धारण करते हैं। संसारमें प्रत्येक अपनी भलाई बुराईके अनुसार स्वरूप पाते हुए उसीके अनुसार दुःख सुख भोगते हैं। मनुष्यके बच्चोंके सब रङ्ग ढङ्ग आदममें प्रगट थे। इससे यही परिणाम निकला कि, आदम अनगिनती बार पहले भी जन्म ले चुका था, वही अब आदम हुआ, भविष्यमें भी अनेक बार जन्म धरेगा। यद्यपि आदम खुदाके सामर्थ्यसे उत्पन्न हुआ था तो भी अपने पूर्वजन्मोंके कार्यको प्रगट करता था। यह सम्भव नहीं कि, पवित्र आत्मा जब सशरीर हो तब दुःख सुखके बन्धनमें फँसे। यदि वह आत्मा अपने पूर्वजन्मोंके कम्मोंसे अशुद्ध न होती तो यह अवस्था कदापि न होती, इस कारण जानना चाहिये कि, अनगिनती जन्मोंसे यह जीव बराबर आवागमन करता चला आता है और भविष्यमें भी करता जावेगा। जब तक उसको शुभ और अशुभका सम्बन्ध न टूटे तबतक पिता तथा पुत्रका कर्तव्य है, तहां तक तो खुदाने आदमको सिखलाया परन्तु गुरु बिना ज्ञान नहीं होता, इस कारण अबलीस (शैतान) को भेजा, जिसमें उसके द्वारा ज्ञान पावे। यदि हजरत अबलीसकी दया न होती तो

हजरत आदम पाशविक अवस्थासे कभी पृथक् न होते । केवल शैतान गुरुकी दयासे आदमको पैगम्बरी मिली, आजतक सब विद्याओंके सीखनेका उद्योग करते हैं । यदि अबलीस गुरु न होता तो सब आदम और सारे आदमजाद निकम्मे होते । अतः उस गुरुको हमें धन्यवाद देना उचित है । जिसने हमको सभी आनन्दोंको दिया और अचेतनासे पृथक् करके परिभ्रम और भजनमें लगा दिया हम विद्या प्राप्त करके कथन करने लगे कि —

बर सरे दारम कुलाहे चरा तर्क ।

तर्क दुनियाँ तर्क उकबा तर्क मौला तर्क तर्क ॥

तात्पर्य—मनुष्य कहता है मैं अपने शिर पर चार तर्क (त्यागोंकी) टोपी धारण करता हूँ । मुझको संसारमें ही खुदाने वैकुण्ठका आनन्द दिया था । जबसे मुझको कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान न हुआ तबसे जिनको छोड़ना यद्यपि कठिन था, ऐसे संसारिक आनन्द परित्याग कर दिये । जब संसारको छोड़ा तब दूसरे लोकको ढँढ़ने लगा, परलोकके सर्व आनन्द प्राप्त हो चुके तब बुद्धि तथा सोचसे परलोक के भी सर्व पदार्थ अस्थाई तथा तुच्छ प्रतीत होने लगे, उनको भी देख भाल कर छोड़ दिया । दो तर्क हो चुकी । फिर मौलाको ढूँढ़ने लगा । मौलाकी खोजमें जब अपना प्राण अर्पण कर चुका खुदामें लीन हो गया तब खुदासे मिला । अब तो बूंद तथा नदीमें कोई विभिन्नताही नहीं रह गई दोनोंही एक हो गये । फिर तो आपही आप रह गया फिर कौन मैं हूँ, जो कुछ संसारमें होता है सो सब कुछ मैं करता हूँ और मैं भोगता हूँ, किसीका तर्क करूँ ? तर्कहीका तर्क हो गया अथवा दूसरा इसका यह भी अर्थ है कि, हे मनुष्य ! तू संसार, स्वर्ग और विज्ञताके अभिमानको छोड़ दे एवं इस अभिमानको भी छोड़ दे कि मैंने सब छोड़ दिया ।

९ तौरीतमें उत्पत्तिका—(२५) बाब (२१ से २६) आयत तक देखो । इसहाकने अपनी स्त्री रबकाके लिये प्रार्थना की कि, उसके पुत्र उत्पन्न हो क्योंकि, वह बाँझ थी । खुदाने उसकी प्रार्थना स्वीकार की, उसकी स्त्री गर्भिणी हुई उसके पेटमेंके दो पुत्र आपसमें लड़ने लगे । तब वह खुदासे पूछने गई कि, यदि यों है तो ऐसा क्यों है ! खुदाने उससे कहा कि, तेरे पेटसे दो बहुत बड़ी जातियां उत्पन्न होंगी बड़ा पुत्र छोटेकी सेवा करेगा ।

समीक्षा—वे दोनों लड़के माताके गर्भसेही लड़ते झगड़ते चले आये । वही वैर दोनोंमें प्रगट हुआ । यदि उनके पूर्व जन्मका वैर उनको ढाँवाडोल न करता तो वे आपसमें क्यों लड़ते ? केवल प्रारब्धिने उनको उसी तराजू पर धरकर तौला । जैसा कि, उनके पूर्वजन्मोंके कर्मोंने इनको गति दी थी पूर्वजन्मके कर्मानुसार इस अवस्थाका स्वरूप प्रगट हुआ इससे आवागमन स्पष्टरूपसे प्रमाणित हो गया ।

१०-देखो ! (१०४) जंवर (२९ से ३०) आयत पर्यन्त लिखा है कि तू अपना मुँह छिपाता है वे हैरान होते हैं। तू उनका दम फेर लेता है तब वे मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमें मिल जाते हैं। तू अपना दम भेजता है तब वे फिर उत्पन्न होते हैं तू पृथिवीको फिरसे सुसज्जित करता है।

तात्पर्य-तू अपना मुँह छिपाता है-आत्मा जो प्रकाशरूप है जब उस पर परदा पड़जाता है तब अन्धकारमें पड़कर वे हैरान होते हैं, सब जीव दुःखित होते हैं कहीं राह नहीं मिलती। तू उनका, दम फेर लेता है उससे वे मर भी जाते हैं तब तू उनके आत्माकी शरीरसे अलग करता है तो वे सब शरीर मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमेंसे उत्पन्न होकर फिर मिट्टीमें ही मिल जाते हैं, तू अपना स्वास भेजता है प्रकाशरूप आत्माही अपने स्वासरूप जीवको भेजता है क्योंकि, सब कुछ आत्मासेही हुआ है। पांच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्री इसीसे हैं, आत्मा जब स्वास भेजता है तब वे जीव पुनः उत्पन्न होते हैं यही आवागमन सदा प्रचलित रहता है।

११-(१२१) जंवरमें (७ से १८) आयत तक देखो। खुदा प्रत्येक कुकर्म से तुझको बचावेगा। खुदा तेरे आनेजानेमें उस समयसे लेकर सर्वदा तेरा रक्षक रहेगा।

तात्पर्य-आने जानेसे तना सुखका तात्पर्य है चिरकालतक आने जानेका तात्पर्य आवागमनके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं ठहर सकती। जबकि, मनुष्यके आयुकी सीमा है तो सर्वदा इसका आना जाना तनासुख के अतिरिक्त और कुछ ठहरही नहीं सकता। जिस खुदाकी वन्दना जो कोई करता है वह देवता पूर्वके प्रेमके कारण सर्वदा यथाशक्ति अपने पूजनेवालेकी सहायता किया करता है। जिस योनिमें वह जाता है वहाँही रक्षक होता है।

राजा विपश्चितका उदाहरण-वसिष्ठपुराणमें इस प्रकार एक कहानी लिखी है कि, विपश्चित नामक एक बड़ा राजा था। वह राजा अग्नि देवताकी पूजा किया करता था। एकबार ऐसा हुआ कि, चारों ओरसे उसके बैरी चढ़ आये उनकी सैन्य चारों ओर से उन्हें देखकर घबरायी। आगका एक कुण्ड बनाया और भली भाँति अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपना शिर तथा शरीर पृथक् पृथक् करके डाल दिया। जब उसने अपना शिर और शरीर अग्निदेवताको हवन दिया तो वो दयालु हुआ, उस एक विपश्चितके चार विपश्चित होकर उस अग्निकुण्डमें से बाहर निकल पड़े, वे चारों बड़े बलिष्ठ साहसी तथा प्रतापशाली थे। उनके तेज के सामने किसी बैरीको ठहरनेका साहस नहीं हुआ। जैसे कि, शेरके सामनेसे भेड़ोंका गोल भागता है उसी प्रकार उसके सामने कोई बैरी न ठहरा। वे चारों

विपश्चित चारों और प्रबल सैन्य लेकर चढ़ गये समुद्र तक बराबर मारते चले गये । चारों और समस्त पृथिवीको आसमुद्र विजय कर लिया कहीं कोई बैरी न छोड़ा । पृथिवी पर तो कोई राजा उनका सामना करने योग्य नहीं रहा । तब चारों के मनमें घमण्ड उत्पन्न हुआ । उन्होंने चाहा कि, हम मायाकी सीमाको तोड़ दें । देखें मायाके पार क्या है ? इच्छा की कि, समुद्रमें गोता मारें । तब राजाके कर्म-चारियोंने मना किया, रोने लगे कि, आप समुद्रमें गोता न मारें । क्योंकि, मायाकी सीमाको कभी कोई पा नहीं सकता । परन्तु उन चारोंने किसीका कहना न मान समुद्रमें गोता लगाया । चारों समुद्रमें गोता मारकर चले तो समुद्री जीवोंने उनको खा लिया । सहस्रों योनिमें वे जन्म लेने लगे, परन्तु जिस योनिमें वे शरीर धरते वहाँही अग्नि देवता इन चारोंका सहायक होता । कितने जन्म धरते धरते अन्त उन चारों विपश्चितमेंसे एक विपश्चित हिरण हो गया । वह हिरण महाराजा रामचन्द्रजीके अजायब घरमें आया । रामचन्द्रके अधीन राजाओंमेंसे एकने उसको पकड़ा सुन्दर देखकर महाराजाको भेंट किया । उस समय वशिष्ठजी, राजा दशरथ रामचन्द्र, भरत और शत्रुहण आदि सब लोग उपस्थित थे । वशिष्ठजी अपनी कथा, सुना रहे थे । उस समय उदाहरणकी भांति राजा विपश्चितका वृत्तान्त आया । वशिष्ठजीने कहा कि, हे रामचन्द्र ! इन चारों विपश्चितमेंसे एक हिरण हो गया है वह इस समय आपके अजायबघरमें बँधा हुआ है । तब रामचन्द्र इत्यादि सब लोगों को इसके देखनेकी उत्सुकता हुई । वशिष्ठजीके चिन्ह देने के अनुसार वह हिरण महल में मँगाया गया । वशिष्ठजीके अपनी बातकी सत्यता प्रगट करनेको अग्नि देवताका ध्यान किया, अग्निदेव आकर अग्निस्तम्भमें सभाके बीच खड़े हो गये । जब वह अग्नि देवता सामने आ खड़ा हुआ तब पूर्व प्रेमने उस हिरणके मनमें ऐसी उत्तेजना प्रगट की कि, वह उछाल मारकर उस आगमें जा पड़ा । जब वह हिरण आगमें जा पड़ा तब उसकी देह पलट गयी और वह असली राजा विपश्चित हो गया अग्निदेवताकी दयासे अपने शिरपर राजसी मुकुट धरे बड़े प्रतापके साथ अग्निसे निकल आया, वशिष्ठ तथा राजा रामचन्द्रको प्रणाम करके सभामें बैठ गया । वशिष्ठजीने उसको उपदेश दिया वह जीवनन्मुक्त होगया । इसी प्रकार जो कोई जिस परमेश्वरको पूजता है वही उसका परमेश्वर है और चिरकालतक वही उसका सहायक रहता है इसमें कोई सन्देह नहीं है ।

अब जानना चाहिये कि, समस्त परमेश्वरोंके पूजन से इतना तो होता है कि, मानुषिक शरीर मिल जाता है । पर जीव आवागमनसे रहित नहीं होता । मनुष्यके शरीरमें आवे सत्यपुरुषकी भक्ति करे तो वास्तवमें आवागमनका सिल-सिला टूटे, नहीं तो पूर्ववत् चला जायगा, दूसरी कोई युक्ति नहीं होगी ।

कर्मके चिन्ह

१२- (१२९) जबूरकी (१५) और (१६) आयतमें लिखा है कि, जब मैं परदेमें बनाया जाता था तब मेरा स्वरूप तुझसे छिपा नहीं था। तेरी आंखों ने मेरे कुट्टुङ्गे सांचेको देखा तेरेही दफ्तरमें सब बातें लिखी गईं। उनके हृदयोंका हाल है कि, कब सुनंगे उनमेंसे कोई न था। इससे प्रारब्ध और प्रारब्धसे आवागमन प्रमाणित होता है।

१३-वायजकी किताब (६) बाब और (६) आयतमें लिखा है कि यद्यपि वह दूना एक सहस्र वर्ष जीवित रहा तो भी उसने कुछ विशेषता न देखी। क्या सबके सब एकही स्थानमें नहीं जाते ?

तात्पर्य-सबके सब एकही स्थानमें जाते हैं। वह एक स्थान मातृगर्भ है सर्व जीव मातृगर्भमें प्रवेशकर चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं। क्योंकि, जब कोई जीव मर जाता है तब अपनी देह छोड़कर दूसरा चोला धारण करता है, सब जीव एकस्थानमें कदापि नहीं जाते वरन् भिन्न भिन्न स्थानोंको जाते हैं। कोई नरक, कोई वैकुण्ठ तथा कोई मध्यमें ही रह जाता है पर एक स्थान पर सबका जाना सम्भव नहीं है। इससे स्पष्टरूपसे प्रमाणित होता है कि, सबके सब मातृगर्भमें आवागमन किया करते हैं। वही एक स्थान सबके लिये नियत है। यदि कोई कहे कि, वह एक स्थान पृथ्वी है तो यह बात भी कदापि नहीं है। क्योंकि, मिट्टीमें तो मिट्टी मिल जाती है। आत्मा तथा शेषतत्त्व मिट्टीमें नहीं मिल सकते। अतः एक स्थान गर्भमें जानेके अतिरिक्त और कोई नहीं है कि, जहां कर्म कल्मष युक्त जीव जाया करता हो।

सुलेमानके बाबमें ईश्वरी प्रेमकी झलक

१४-सुलेमानके गजलुलगजलातके (३) बाब (४) आयतमें लिखा है कि, अपने पलंगपर मैंने उसको दूँढ़ा जिसको कि, मेरा जी चाहता है मैंने उसको दूँढ़ा पर वह नहीं मिला। अब मैं उठूँगी और नगरकी गलियों तथा सड़कोंपर फिरूँगी उसको दूँढ़ूँगी जिसको मेरा जी चाहता है मैंने उसको दूँढ़ा पर वह न पाया। जो नाकेबन्दी नगरमें फिरते हैं मुझको मिले। क्या तुमने उसको देखा जिसको मेरा जी चाहता है। जब मैं दुःखी होकर उससे बढ़ गयी थी वह जिसको मेरा मन चाहता है मिला। मैंने उसको पकड़ रखा है उसे न छोड़ूँगी जब तक कि, मैं अपने माताके घर न लेजाऊँ।

तात्पर्य-उसको अपने पलंगपर मैंने दूँढ़ा जिसको मेरा जी चाहता है। अन्धकारमय रजनी अज्ञानकी निशामें अपने मनके पलंगपर दूँढ़ा पर वह नहीं पाया। क्योंकि, प्रकाश नहीं था। अब मैं नगरकी गलियोंमें फिरूँगी यह देह नगर

है, उसके भीतर बहुतेरी गलियाँ (हृदय आदि) हैं उन गलियोंमें फिर्लेंगी । सब गलियोंमें फिरी परन्तु मेरा प्यारा प्रेमी नहीं मिला । बावन जो नाकाबन्दी शब्द आया है उसका तात्पर्य इन्द्रियोंके देवतोंसे है शरीरके भीतर बहुतेरी मूर्तियाँ दिखाई देती हैं वे स्थान स्थानपर शरीरमें स्थित हैं । वे मुझको मिलीं । क्या तुमने उसको देखा जिसे मेरा जी चाहता है वे सब मेरे प्रेमीसे अनभिन्न थे । जब मैं उनसे दुःखी होके आंगे बढ़ी; अर्थात् इन्द्रियोंके देवताओंसे आगेको चली क्योंकि, सब देवता वासनासे भरे हुये हैं—जब तक वासनाका बन्धन है तब तक प्रेमी नहीं मिलता न उससे प्रेम होता है । यही बात कबीर साहिबने भी कहा है कि—

कबीर—जब लगि आशा देहकी, तब लग भगति न होय ।

आशा त्यागी हरि भजे, भगत कहावे सोय ॥

जब वो वासनाओंको छोड़कर आगे चली तब मेरा प्यार मिला, मैंने उसको पकड़ रखा है । उसको न छोड़ूँगी । जब तक कि मैं उसको अपनी माताके महलमें न लेजाऊँ ।

माताका गृह अपना महल गर्भ है अर्थात् जब तक यह मनुष्य माताके गर्भमें नहीं आता तबहीं तक प्यारीका सम्बन्ध रहता है अपने प्रेमीको कदापि नहीं छोड़ता, पकड़ रखता है । परन्तु जिस समय वह वीर्यमें प्रवेश कर माताके गर्भमें जाता है उस समय उसको अपने प्रेमीका तनिक भी ध्यान नहीं रहता । अचेतावस्थामें निर्जीव पदार्थके समान लटकता रहता है जब जब यह आवागमन करता है तब तब अपने प्यारको भूल जाता है जब ज्ञान होता है तो बुरी तरह छटपटाता है ।

१५ बादशाह बनूकदनजरका पशु होना—दानियाल नबीकी पुस्तकके चौथे बाबमें लिखा है कि, एक दिवस बनूकदनजर बादशाह बाबलने अपने मनमें ऐसा घमण्ड किया कि, मैंने इस राज्यको अपने बाहुबल द्वारा लिया है. इस बातसे उसपर खुदाका कोप भड़का, वह मनुष्यसे पशु हो बेलोंके समान घास चरता फिरता था । उसके नख पक्षियोंकी तरह बढ़ गये, उसकी सारी आदतें पशुओंकी उसके वह जीतेजीही पशु होगया । परन्तु उसपर खुदाई दया हुई कि. वह फिर अपने मनुष्यके स्वरूपमें आगया, अपने राजासन पर बैठकर राज्य करने लगा । यह जीवनमें आवागमन देखो, इस बनूकदनजर बादशाह बाबलका वृत्तान्त पढ़कर मनुष्यको आवागमनसे इनकार करना न चाहिये । जो केवल थोडासा घमण्ड करनेसे बेल होगया जो लोग भौतिभौतिकी बुराइयाँ करते हैं उनकी क्या दशा होगी ।

कर्मपर कबीर वचन

सच्चे झूठेका न्याय

१६-वायजकी किताब (२) बाब (१७) से २१ आयत तक यह लिखा हुआ है कि खुदा सच्चों तथा धूर्तोंका न्याय करेगा। क्योंकि, प्रत्येक अभिप्राय तथा प्रत्येक कार्यके लिये एक समय है। मैंने अपने मनमें कहा बनीआदमकी अवस्थाकी बात खुदा उनपर प्रगट करदे वे आपको पशुके सदृश जानने लगे, जो मनुष्य पर बीतता है वही पशुपर भी बीतता है, दोनों पर समान घटना संघटित होती है। जिस प्रकार यह मरता है वैसेही वह भी मरता है सबमें एकही स्वाँस है। मनुष्यमें पशुसे अधिकता नहीं है, क्योंकि, सब अनित्य हैं, सबके सब एकही स्थान पर जाते हैं सबके सब मिट्टीसे हैं, सबके सब मिट्टीमें मिलजाते हैं। मनुष्योंकी आत्माका ऊपर चढ़ना तथा पशुओंकी आत्माओंका नीचे उतरना कौन जानता है।

इसका तात्पर्य-खुदा सच्चोंका सुख तथा धूर्तोंका नियत समय पर दण्ड देगा। मनुष्यको जानना चाहिये कि, वे पशुके समान हैं। दोनोंमें एकही आत्मा और स्वाँस है। मनुष्यको पशुपर बड़ाई नहीं है। सब मरकर एकही जगह जाते हैं। इस कारण मिट्टी ही न समझना चाहिये। क्योंकि, मिट्टी ही केवल मिट्टीमें जाती है। आत्मा तथा स्वाँसादिक मिट्टीमें नहीं जाते। यहां मिट्टीसे तात्पर्य चौरासी लाख योनिसे है। क्योंकि, सर्वयोनि तथा सर्व शरीर मिट्टीसे बने हैं मिट्टी हैं, यहां मिट्टी नाम सर्व शरीरोंका है। अतः जीवके लिये एक शरीरसे दूसरेमें जाना आवश्यक है सब जीवोंके लिये यही नियुक्त गृह है कि, एक घर छोड़कर दूसरेमें जाया करे। सुकर्मों मनुष्य है, दुष्कर्मों पशु हैं। अच्छोंकी आत्मा स्वर्ग तथा बुरोंकी नरक में जाया करती है।

१७-दाऊदका पुनर्जन्म-पहले सलातनिके दूसरे बाब की पहली और दूसरे आयतमें लिखा है कि, दाऊद बादशाहके जब मृत्युके दिन निकट आये तब उसने अपने पुत्र सुलेमानको शिक्षा देकर कहा कि, मैं समस्त संसारका पथ जानता हूँ इस कारण तू दृढ़ हो अपने को मर्द दिखला।

फिर देखो इज्जीलमें आमालके दूसरे बाबकी २४ आयतमें लिखा है कि, दाऊद आकाशपर न गया और मौलवी अमादुद्दीन तालीम मुहम्मदी लिखितके (१३९) पृष्ठमें लिखा है कि, दाऊद पैगम्बरकी कब्रको अप्रतिष्ठापूर्वक खुदवा डाला।

हिरोदेश बादशाहने सुना था कि, पैगम्बरीकी लाश सड़ती नहीं। इसी परीक्षाके निमित्त उसने दाऊदकी लाश को ठीक नहीं पाया। उसने उसे सड़ती

हुई देखा था । इससे प्रमाणित हुआ कि, दाऊद न आकाश पर गया न पृथ्वीपर जीवित रहा और न कन्नमें रहा वह अवश्यही समस्त संसारके पथमें गया, उसका आवागमन हुआ ।

१८-मतीकी इञ्जीलमें आवागमन-मतीकी इञ्जीलका (१२) बाब (४६) से (४५) आयत तक उसमें लिखा है कि, जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीर से निकल जाती है । तब सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है, जब जगह नहीं पाती तब कहती है कि, मैं अपने घरमें जहाँ से निकली हूँ पुनः जाती हूँ । जाती है जब उसको देखती है कि, वह खाली और साफ है । तब वह सात आत्माओंको जो उससे अधम हैं अपने साथ ले आती है वे भीतर जाकर स्थिर हो जाती हैं । इस समय मनुष्यकी पिछली दशा अगली दशासे बुरी हो जाती है ।

अब इन आयतोंका तात्पर्य मैं अक्षर अक्षर लिखता हूँ । जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीरसे निकल जाती है तथा सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है । इसका तात्पर्य यह है कि, मृत्युके मूच्छाके पीछे इसलिये कि, आत्मा पवित्र होनेके कारण है । उसका स्थान तथा श्रेणी ऊँची है इस कारण यह ऊपरको चलती है, सूखे स्थानसे यह तात्पर्य है कि, जहाँ तरी तथा गीलापन कुछ न हो । आकाश इत्यादि की उँचाईमें जाकर अपने लिये विश्रामका स्थान दूँदती है । परन्तु वह तो विश्राम का स्थान नहीं । वह तो शून्य है । आत्माके निमित्त तो कोई अवश्यही शरीर चाहिये । शरीरके लिये कोई भूमि और भूमिके लिये बस्ती होनी चाहिये । बस्तीके लिये कुछ जल जिसमें जीवोंका भरणपोषण हो । बिना भोजनके किसी जीवकी स्थिति नहीं । ये एक दूसरेका भोजन होते हैं । समस्त स्वर्गों तथा वैकुण्ठोंमें बस्ती हैं । इस अपवित्र आत्माको तो वहाँ स्थान नहीं मिलता । न यह वहाँ जाही सकती है । इस कारण यह अपवित्र आत्मा सूखी जगहोंमें अपनी स्थिति दूँदती है । क्योंकि, अपवित्र आत्मा तो वैकुण्ठमें जा न सकेगी, सूखी जगहोंमें आनन्द नहीं मिलता ; जब शून्यमें स्थान नहीं मिलता तब कहती है कि, जहाँसे मैं निकली हूँ फिर वहाँ जाऊँगी । जब आती और उसको देखती है तब उस स्थानको स्वच्छ तथा साफ पाती है इससे यह तात्पर्य है कि, वह आत्मा जब अपने मृतदेहके निकट आती है तब देखती है कि, मेरा शरीर अब मेरे रहने योग्य नहीं, वह स्वच्छ तथा झाड़ा और खाली है, क्योंकि शरीरकी सहायक चौदह इन्द्रियाँ और उनके चौदह देवतें पाँच तत्व और तीन गुण कुछ न रहे, इन साथियों बिना इस शरीरमें मेरी स्थिति कैसे हो सकती है ? वह जो कल बनी थी वो बिगड़ गयी । वह घर उजड़ गया । केवल मिट्टीका एक स्थूल भाग रह गया है । उसको कोई गाड़ दे अथवा जलादे उसके

अधीन है। पाँच तत्व और तीन गुणके मेलसे यह शरीर प्रस्तुत होजाता है। विरुद्धता से मिट जाता है, मृत्युके पीछे अपवित्र आत्मा कई बार अपने शरीरके समीप आती है, उसमें बसनेकी इच्छा करती है, पर इस शरीरमें वासका कोई उपाय न देखकर निराश हो जाती है, पलटकर सात आत्मायें जो उससे भी बुरी होती हैं अपने साथ लाती है वे भीतर जाकर रहती हैं। तब मनुष्यकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी हो जाती है। वह सात आत्मायें जो इससे बुरी हैं वे ये हैं १—वायु। २—अग्नि। ३—जल। ४—पृथ्वी। ५—गुण। ६—सत्तोगुण। ७—तमोगुण। यह सात आत्मायें अपवित्र आत्माओं से भी बुरी हैं। क्योंकि, सातों आत्मायें वासनाकी कामनासे सिरसे पाँवतक भरी हैं। ये वासनाओंसे ऐसी भरी होती हैं, कि कभी कम नहीं होतीं। दिन प्रति दिन भरती ही रहती हैं। इन्हीं सातोंकी संगति और संयोगसे इस आत्माकी बुरी दशा है। ये ही सातों इस जीवको घेर घारकर आवागमनमें डालती हैं। इन्हीं सात निकृष्ट आत्माओंके सम्बन्धने सारे जीवोंको आवागमनके बन्धनमें डाल रखा है। जैसे कि, चोरके साथ साधु भी फँस जाता है इन्हीं सातके सम्बन्धसे आत्माकी निकृष्ट अवस्था हो रही है। इनकी कभी मुक्ति नहीं होती। इन्हीं सातों द्वारा समस्त रचनाएँ खड़ी हैं। जब तक इनका सङ्ग है तबतक जीवका यही ढङ्ग रहेगा। उनका उससे इसका कदापि छूटकारा नहीं हो सकता।

यह आत्मा अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इन्हीं सातोंको साथ लाती है। इन्हींके साथ मातृगर्भमें स्थिर होती है। वीर्यके साथ यह जीव अपनी प्रारब्ध सहित स्थिर होकर फिर गर्भका नियत समय सम्पूर्ण कर शरीरके साथ बहिर्गत होता है। तब जीवकी पिछली अवस्थासे अगली अवस्था बुरी होती है। क्योंकि, आत्मा जो पहिले कुत्सित तथा अपवित्र थी इस कारण उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होती है। पहले वह मनुष्यके शरीरमें थी। मनुष्यका शरीर पाकर उसने जो कुकर्म किया तो अवश्य ही उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होगी मानुषिक शरीरसे पृथक् गई और पशु आदिके शरीरमें उसका गमन हुआ। यह अपवित्र आत्मायें पशु तथा जड़ पदार्थ अथवा नरकमें जाती हैं। सहस्रों बार उनके आवागमनका सिलसिला चला जाता है। जिसने मनुष्यदेह पाकर अपनी मुक्तिका उपाय न किया वह बड़ा अभाग है।

१९—मती की इञ्जीलका २५ बाब १४ से ३० आयत पर्यन्त लिखा है और वहाँ कयामतका वृत्तान्त और तोड़ेका उदाहरण दिया है उसे यहाँ लिखते हैं—एक मालिकने यात्रा करनेके समय अपने एक भृत्यको पाँच तोड़े दिये, दूसरे को दो तोड़े तथा तीसरेको एक तोड़ा देकर चला गया। कुछ कालके पीछे उन नौक-

रोंका म लिक आया, उनसे हिसाब लेने लगा । जिसने पाँच तोड़े पाये थे वह उन तोड़ों सहित उपस्थित हुआ कहा कि, ऐ स्वामिन् ! मुझे आपने पाँच तोड़े दिये थे उससे मैंने पाँच और कमाये हैं । मालिकने कहा भले सेवक ! चिरजीवी हो, तू थोड़ेमें भला निकला, मैं तुझे बहुत बड़ा अधिकार दूंगा । वैसाही वह दो तोड़ेवाला भी चार तोड़े लेकर उपस्थित हुआ, मालिकने वही बात उससे भी कही तीसरा जिसको स्वामीने केवल एक तोड़ा दिया था वह वही एक तोड़ा लेकर उपस्थित हुआ कहा कि, हे स्वामिन् ! मैं आपको कठिन स्वभावका जानता था इस कारण यह तोड़ा पृथ्वीमें दबाकर रखवा था । मालिकने उस नौकरसे कहा कि, अये अयोग्य आलसी नौकर ! तूने कुछ नहीं कमाया । यदि तू मेरा तोड़ा सर्फीकों पास भी रखता तो मुझको उसका सूद मिलता, फिर उसका तोड़ा छीनकर जिसके पास दश तोड़े थे उसी को दे दिया, क्योंकि, जिसके पास कुछ है उसको और भी दिया जायगा उसकी बढ़ती होगी । जिसके पास कुछ नहीं उसके पास जो कुछ है वह भी ले लिया जायगा । उस निकम्मे नौकरको बाहर अँधेरेमें ड.ल दिया । वहाँ वह रोता और दाँत पीसता रहा ।

तात्पर्य—परमेश्वरका मनुष्यसे गुप्त रहना मानों यात्रा करना है । जिस समय मनुष्य गर्भमें उलटा लटका रहता है उससे प्रतिज्ञा करता है कि, हे परमेश्वर ! इस नरक यंत्रणासे मुझको बाहर निकाल, मैं तेरी भक्ति करूँगा । परमेश्वर दयालु होता है वह गर्भसे बाहर आता है । उस समय परमेश्वर उसकी दृष्टिसे अन्तर्धान हो जाता है । प्रत्येक मनुष्यको उसने पृथक् पृथक् बुद्धिका तोड़ा बाँट दिया है, किसीको पाँच भाग और किसीको एक भाग । इस प्रकार बुद्धिका तोड़ा अपने प्रत्येक भूत्योंको देकर यात्रा करने गया अर्थात् अन्तर्धान हो गया । जब यह मनुष्य गर्भसे बाहर निकल ज्ञानमान होकर भक्ति बन्दनामें संलग्न होता है, वह पाँच तोड़ेवाला अपने सुकार्य तथा भक्तिद्वारा परमेश्वरको प्रसन्न करता है । दो तोड़ेवाला भी अपने मालिकको राजी करता है पर एक तोड़ेवाला मूर्ख उसे रुष्ट करता है ।

जब मनुष्य मर जाता है पिण्ड प्रलय होता है तब सब मनुष्य परमेश्वरके सामने अपनी भलाई बुराईका हिसाब करानेको उपस्थित होते हैं, सबकी भलाई बुराईका हिसाब होता है । तब परमेश्वर सबका हिसाब लेकर सबको दण्ड पारितोषिकादि देता है । वह तोड़ा मानुसिक चोलाकी बुद्धि है । जिसने शुभ काम किया अपना कर्तव्य पालन किया वह भला भूत्य है, उसकी बुद्धि होगी, जिस किसीने मानुषिक शरीर पाकर मनुष्यत्वके धर्मका प्रतिपालन न किया

नौ कोष

उससे मनुष्यका शरीर छुड़ा लिया जावेगा। उस एक तोड़ेवालेका फल उस दश तोड़ेवालेको दिया जायगा और उसकी बढ़ती होगी। भले भूत्यको वह कमाईका बल अधिक दिया जायगा, जो सीमाबद्ध मानुषिक बलके बाहर है। सर्पिकाको तोड़ा देनेका तात्पर्य यह है कि, सर्पिका साधु तथा गुरु हैं। यदि वह गुरुओंके शरण जाता तो भी कुकर्मोंसे बचता। क्योंकि, शरणागति भी बहुत उच्चपद है व यथार्थ शरणागति होनेपर उससे अधिक परिश्रम न कराया जाता। वह निकम्मा नौकर जिसके पास कुछ नहीं है जो कुछ उसके पास होगा वह भी ले लिया जावेगा। इसका यह तात्पर्य है कि, उससे मनुष्यका शरीर ले लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास मानुषिक शरीर ही है जो विद्या तथा गुणका भण्डार है वह है वह भी छीन ली जावेगी।

जागृत अवस्था स्वप्नावस्था और सुषुप्ति यह तीनों अवस्था जीवके लिये हैं, तुरिया ईश्वरके निमित्त है, जो ये चारों अवस्था नियत हुई हैं, उनमेंसे प्रथम जागृतावस्था तो मनुष्यके लिये है। क्योंकि, यह मनुष्य जाग्रितावस्थामें स्थित है। यह जाग्रितावस्था बुद्धिकी अवस्था है, इसीमें भलाई तथा बुराईका हिसाब है। जाग्रितकी अवस्थासेही मनुष्य तुरियावस्थाको प्राप्त करके ईश्वर पदको प्राप्त कर सकता है स्वप्नकी अवस्था पशुओंके लिये है। क्योंकि, सब पशु अनजान तथा निर्बुद्धिताकी अवस्थामें हैं यदि कोई दोष करें तो उनके पापकी कोई गणनाही नहीं की जासकती। इसी प्रकार सभी पशु अचेत निद्राकी अवस्थामें हैं, उनके पापोंका कोई हिसाब नहीं किया जाता। जड़ पदार्थ तो सुषुप्तिकी ही अवस्थामें हैं। जो कोई जाग्रत्वस्थामें आकर सुकार्थ न करे तो वह निश्चय स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थामें डाल दिया जावेगा। जो कोई नङ्गाही मनुष्य शरीरके अतिरिक्त और कुछ न रखता हो उससे क्या लिया जावेगा। निस्संदेह उससे मनुष्यका चोला ही छीन लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास केवल मनुष्यकी देह मात्रही रह गई है, दूसरा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त उससे कुछ लिया नहीं जासकता न कोई अन्य वस्तु उसके पासही है।

वह बाहर अन्धकारमें डाला जायगा। बाहरके अन्धकारसे यह तात्पर्य है कि, जो देह बुद्धि तथा ज्ञानके बाहर है, वो देह अज्ञानी पशु तथा जड़ पदार्थोंकी है, जब जीव मनुष्यकी देहसे अलग होता है तब अन्धकारमें पड़ता है। जप, तप, ज्ञान, करने अथवा सीखने योग्य नहीं रहता। क्योंकि इस निकम्मे नौकरने मनुष्यका चोला पाकर कुछ कमाई न की न तोड़ा सर्पियों (गुरु) को दिया।

इससे मानुषिक शरीरको छोड़कर पशुओंमें परिभ्रमण किया करता है । वहाँ रोना तथा दांत पीसना होता है । क्योंकि, पशुकी देहसे किसीकी मुक्ति नहीं हो सकती । अन्तमें नरकमें प्रवेश करता है जहाँ रोना तथा दांत पीसनेके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रह जाता ।

२०—योहन्नाकी इंजीलमें आवागमन—योहन्ना की इञ्जीलका (१०) बाब (८) आयत देखो । सब जितने मुझसे आगे आये वे सब चोर और बटमार हैं । पर भेड़ोंने उनकी नहीं सुनी । द्वार मैं हूँ यदि कोई मनुष्य मुझसे प्रवेश करे तो मुक्ति पावेगा । भीतर बाहर आवे जावेगा और चरनेकी जगह पावेगा । अर्थात् हजरत मसीह फरमाते हैं कि, जितने मुझसे आगे आये हैं वे सब चोर तथा बटमार थे, मनुष्योंको भटकानेवाले थे । मैं द्वार हूँ यदि कोई मुझसे प्रवेश करेगा तो वह मुक्ति पावेगा भीतर बाहर आवे जावेगा । द्वार मैं हूँ इससे यह तात्पर्य है कि, मुझे बिना किसीको मार्ग न मिलेगा । क्योंकि, समस्त कार्योंका उत्तर दाता मैं ही हूँ । इसी कारण मसीह सारे नबियोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं । यहाँ मुक्तिके अर्थ एक शरीरके कर्मोंसे छूट जानेका है, एक देहके कर्मोंसे छूटा और दूसरा देहके कर्मोंमें लबक रहा । भीतर बाहर जानेसे तात्पर्य तना सुखसे है । अर्थ यह कि, जीव पिता होकर भीतर जाता है और पुत्र होकर बाहर निकलता है । जब एक शरीरको छोड़ता है तब दूसरा शरीर अपने लिये बनाता है और सदैव आवागमन किया करता है । चरनेकी जगह पानेसे यह तात्पर्य है कि, चरनेका स्थान चौपायोंके निमित्त है । मनुष्यके निमित्त नहीं । जिसके आवागमनका सम्बन्ध टूट गया वही मनुष्य है । शेषके समस्त पूर्ण पशु हैं, यद्यपि मनुष्यके स्वरूपमें दिखाई देते हैं । जितने लोग मुक्तिके निमित्त उद्योग नहीं करते न मुक्तिकी सुधि रखते हैं वो सब पूरे पशु हैं ।

२१—कयामतसे भी पहिले आवागमन—लूकाकी इञ्जीलका (१६) बाब (१९ से ३१) आयत पर्यन्त यह है कि, लाजर नामक एक दरिद्री था । उसके समस्त शरीरमें घाव थे वह बिचारा विवश होकर एक धनाढ्यके द्वारपर पड़ा रहता था, कुत्ते उसके घावोंको चाटा करते थे । अमीरके नौकर उस अमीरके रसोईसे जो जूठा चूर चार गिरता था उन सबको इकठठा करके उस लाजरके सामने रखते । लाजर वही जूठा तथा चूरचार खाकर जीता था, अन्तमें लाजर मर गया, जब वयस समाप्त हुआ तब वह अमीर भी मर गया । लाजर तो मरकर बँकुण्ठको एवं वह अमीर नरकको गया । उसने जो नरकमेंसे दृष्टि उठाकर देखा तो लाजरको बँकुण्ठमें इबराहीमके गोदमें बैठे पाया । उसको देखकर

नौ कोषोंका विवरण

ईर्षा हो आई नरकसे उस अमीरने पुकारकर कहा कि, ऐ मेरे पिता! ऐ मेरे पिता !! ऐ इबराहीम !!! तू कृपा करके लाजरको मेरे समीप भेज दे । क्योंकि, मैं नरककी अग्निसे जल रहा हूँ, यदि लाजर मेरे समीप आवे मेरे मुंहमें उंगली दे तो मेरे शरीरकी जलन कम हो जाय । यह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, ऐ पुत्र ! तूने संसारमें बड़े बड़े सुख भोगे हैं, लाजरने केवल दुःखही दुःख उठाया है । अब इसकी पारी सुखभोगने तथा तेरी दुःख उठाने की है उस नरकके अमीरने कहा कि, ऐ पिता ! लाजरको संसारमें भेज दे कि, वह जाकर मेरे भाइयोंको समाचार दे कि मैं तो नरकमें आ पड़ा, अब वे लोग किसी तरहका पाप न करें, पुण्यमें चित्त लगावें, ऐसा न हो कि, उनको भी नरकमें आना पड़े । वह बात सुनकर इबराहीमने उत्तर दिया कि, मूसा वहाँ उपस्थित है, यदि लोग उसकी बातें मानेंगे तो वे नरकमें न पड़ेंगे । उस नरकमेंके रईसने कहा कि, यदि मुरदोंमें से कोई जीवित होकर जावे संसारमें समाचार दे तो वे लोग कदापि दुष्कर्म न करेंगे, पर मूसाकी बातका उनको विश्वास न होगा । इस कारण लाजरको भेजना आवश्यक है । तब इबराहीमने उत्तर दिया कि, यदि उनको मूसाकी बातोंका विश्वास न होगा तो वे लाजरकी बातें भी नहीं मानेंगे ।

अब इस लाजरकी कहानीसे नरक तथा वैकुण्ठका जाना क्यामतके पहिलेसे प्रचलित होना प्रमाणित हो चुका । फिर महाप्रलयमें भलों और बुरोंके हिंसाबकी क्या आवश्यकता । केवल भ्रम तथा धोखा है । जिस समय कोई मरता है उसके लिये वैकुण्ठ, नरक तथा अन्यलोक उसी समय मिलते हैं, दूसरी क्यामत और हशरगाहके समयकी कोई आवश्यकता नहीं जब भलाई बुराईका हिंसाब हुआ तब आवागमन स्वतः ही सिद्ध होगया ।

२२-आवागमनपर कुरान-कुरानमें सुरतआराफ (८) सिपारा (४) रकूअ (२९) आयतमें लिखा है कि, तू कह मेरे रबने फरमाई दीनदारी और सीधे करो अपना मुंह हर एक नामजके समय केवल उसीके आज्ञाकारी होकर उसको पुकारो । जैसा तुमको पहली बेर बनाया फेर बनोगे ।

२३-कुरान सूरत नखल (१४) सिपारा (८) रकूअ (६५) आयतमें लिखा है कि, और अल्लाःने उतारा आकाशसे जल, फिर उससे जिलाया पृथ्वीको इससे मरने पीछे उसमें देते हैं उन लोगोंका जो मुनते हैं ।

अब इस आयतसे पृथ्वीका दूसरी बार पुनः जलसे प्रगट होना स्पष्ट होता है । उसमें पते हैं उनको जो मुनते हैं इससे तात्पर्य उन मनुष्योंसे है जिनका हृदय प्रकाशित है कि, पृथ्वीके पूर्व तथा वर्तमान अवस्थाओंसे विज्ञ हैं ।

आयु

२४—कुरानमें सूरै रुम (२१) सिपारा (२) रकूअ (११) आयतमें लिखा है कि, अलबत्तः बनता है प्रथम बार फिर उसको दोहरावेगा फिर उसके ओर फिर जाओगे ।

२५—कुरानमें देखो सुरै रूप (२१) सिपारा (२) रकूअ (११) आयत में लिखा हुआ है कि, निकलता है जीता मुरदेसे, निकलता है मुरदा जीतेसे, जिलाता है पृथ्वीको उसके मरे पीछे । इसी प्रकार तुम निकाले जाओगे ।

२६—कुरान सूरै रुम (२१) सिपारा (३) रकूअ (२७) आयतमें लिखा है कि, वही है जो प्रथम बार बनाता है । फिर उसको दोहरावेगा, आसान है उस पर उसकी कहावत, सबसे ऊपर आकाशमें और पृथ्वीमें वही है जबर-दस्त हिकमत वाला ।

२७—रोजतुलअहबाबमें लिखा है कि—

أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ نُوْرُ مُحَمَّدٍ

प्रथम खुदाने नूरमुहम्बदको पैदा किया दूसरी हदीसमें है कि—

أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ الْقَلَمَ

अर्थात् पहले खुदाने कलमको बनाया जिसमें लोगोंके भाग्यको लिखा तीसरे हदीसमें है कि—

أَوَّلُ مَا خَلَقَ اللَّهُ النَّقْلَ

अर्थात् सबसे पहले खुदाने बुद्धिको उत्पन्न किया जिसमें सोच समझ भाग्यको ठहरावें ।

इन तीनों हदीसोंसे तीन बातें प्रमाणित हुई हैं । इनमें से यदि एक सत्य मानोगे तो दूसरी मिथ्या ठहर जाती है । यदि तीनोंको सत्य मानोगे तो तीन बार उत्पत्तिका होना प्रमाणित होता है । जिससे अनगिनती बेर भी कहा जा सकता है क्योंकि, किसी सृष्टिमें मुहम्मदी तेज पहले उत्पन्न हुआ, किसीमें बुद्धि और किसीमें लेखनी पहिले उत्पन्न हुई ।

२८—आत्माका मोर और फल होनेके बाद बीबी एमनाके गर्भमें जाना—मुहम्मद साहबके नूरनामः में लिखा है कि, खुदाने मुहम्मद साहबकी आत्माको मयूरके स्वरूपमें बनाकर विश्वासके वृक्षपर बैठे दिया । पहले तो मुहम्मदके

तेजने मोरके देहमें प्रवेश किया, फिर उस आत्माने एक फलमें गमन किया, वह फल जिबराईल द्वारा अब्दुल्लाके समीप पहुँचा। वह फल अब्दुल्लाके वीर्यके मार्गसे बीबी एमनाके गर्भमें पहुँचा बीबी एमनाके गर्भसे आहजरत (मुहम्मद) पैदा हुये।

गुलजार मुहम्मद तथा हदीसोंमें यह कहानी लिखी है कि, एकबार खुदाने जिबराईलसे कहा कि, एक फल ला, तब जिबराईलने पूछा कि, ऐ खुदा! कौनसा फल लाऊँ। कुछ उत्तर नहीं मिला। फिर तीसरी बार आवाज आई कि, ऐ जिबराईल! एक फलला, फिर जिबराईलने कहा कौन फल लाऊँ। इतनेमें एक ऐसी आँधी आई कि, जिबराईल उड़ गया। न जाने वह किस देशमें जा पहुँचा। एक बगीचेके द्वार पर जा खड़ा हुआ। जब जिबराईलने अपनेको इस बगीचेके द्वारपर खड़ा पाया तब बगीचेके द्वारपालसे प्रार्थना की कि, मुझे बगीचेके भीतर जाने दे। बगीचेके द्वारपालने पूछा कि, तू कौन है? उसने उत्तर दिया मैं जिबराईल हूँ। द्वारपालने कहा कि, सहस्रों जिबराईल हैं उनमेंतू कौन है। जिबर ईलने अपना पता बताया कि, मैं वह जिबराईल हूँ जो खुदाके समीप खड़ा रहता है। उस द्वारपालने बगीचेके भीतर जाने दिया। जब जिबराईल बगीचेके भीतर गया तब क्या देखता है कि, सहस्रों प्रकारके फल लटक रहे हैं वह बगीचा भली-भाँति हरा भरा हो रहा है। सब फल तथा मेवे जो वहाँ हैं सो सब खुदाकी वन्द-नामें संलग्न हैं, खुदाका नाम ले रहे हैं। सब फलोंमें एक फल सबका सरदार तथा गुरु जान पड़ता था। उसी श्रेष्ठ फलके आदेशसे सब फल खुदाका नाम लेते हुए वन्दनामें संलग्न थे। जब जिबराईलने यह कौतुक देखा तब अपने मनमें ऐसा विचार किया कि, यह फल जो सब फलोंमें बड़ा है उसीको तोड़कर ले चलूँ। उस फलको तोड़कर ले आकाशपर उड़ गया उड़ते हुये राहमें वह फल उसके हाथसे गिर गया अरबके मक्का नामक नगरमें जा पड़ा बड़े तड़के अब्दुल्ला नामक एक मनुष्य सड़क परसे चला जाता था, उसने उस फलको देखा, उठाकर अपनी जेबमें रख लिया जेबमेंसे वह फल अब्दुल्लाके शरीरमें समा गया अथवा उसने खा लिया। उस समय उसका शरीर तथा चेहरा कान्तिसे दमकने लगा अब्दुल्लाके वीर्य द्वारा बीबी एमनाके गर्भमें मुहम्मदी तेज आया, बीबी एमनाका शरीर तेजमय होगया, कान्तिसे जगमगाने लगा। नियत समयपर मुहम्मद साहिबने जन्म लेलिया।

अब उधरका वृत्तान्त सुनो कि, जिस समय वह फल जिबराईलके हाथसे छूटकर गिरा खाली हाथ जिबराईल खुदाके निकट गया निवेदन करने लगा कि,