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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

१२३

जीवधर्मबोध

( २०३१ )

दोहा-राम बढ़ावै सो बढ़े, और बढ़ै नहिं कोय ।
बलकरि बढ़ै जो रावन, पलमें डारचौ खोय ॥

चौपाई

वेद कहै जो ऐसो लेखो । ईश्वर सर्व मयी बुध देखो ॥
वेद कह कर्म कन्यौ नहिं अपन । ताको अर्थ विचारो निजमन ॥
महा करता महा भोगी जैसे । महा त्यागी पुनि जाने तैसे ॥
त्यागी महा जानिये सोई । जासु हृदय हंकार न होई ॥
जाके हृदये ऐसो बरता । मैं नाहीं कछु कर्मको करता ॥
मैं नाहीं हरि आपै आपू । सो नहिं कर्म आपनो थापू ॥
जाने ऐसो कीन विवेका । पुण्यमान पापी तेहि एका ॥
मित्र शत्रु ताके कोइ नाहीं । जहां तहां हरि आपै आहीं ॥
कोई नहीं सुख दुःखको दाता । मैं तू जग सब भ्रमकी बाता ॥
जिन विचारि लीना यह लेखा । सर्वमयी तिन ईश्वर देखा ॥
जेहि ईश्वर सब मयलखि आवै । पूरन पण फल सोई पावै ॥

रामचंद्र वचन

दोहा-जिनके हृदय विचार अस, मति न टरै हनुमंत ।
मैं सेवक चराचर, रूपराशि भगवंत ॥

चौपाई

भालू कीश कटक ले साथ । लंकापर चढ़िगे रखुनाथा ॥
सहित सेन रन रावन मारा । दोहु दिश जूझै बहुत जुझारा ॥
सुधा वृष्टि भै दोहु दल माहीं । जिये भालूकपि निश्चर नाहीं ॥
नाहीं राक्षस जिय कपि रिच्छा । ऐसी परमेश्वरकी इच्छा ॥
विष अमृत रिपु मित्र बनावै । भावे न्यारा खेल देखावै ॥
जापर कृपा करे करतारा । कन यक छनमें होय पहारा ॥

( २०३२ )

बोधसागर

१२४

सोरठा-पुण्य पाप मोहि नाहिं, निलैँपो निरद्वंद मैं ।
बंधा बंधन माहिं, विधि निषेधको ज्ञान गहिं ॥

चौपाई

मैं यक भर्म पूतसा ठाढ़ा । मेरे हृदय मान अति बाढ़ा ॥
मेरे विद्या गुण चतुराई । मैं सुन्दर छबि रूप निकार्ई ॥
मैं कुलीन उत्तम सब लायक । मेरो कर्म सकल मनभायक ॥
पुण्यते हर्ष पाप डर कापे । कर्म अकर्म आप शिर थापे ॥
जौजिव विधिनिषेध नहिं जानत । तौ कछु कर्म धर्म नहिं ठानत ॥
जानि बूझि करि है जो पापा । निश्चय ताहि नर्कदुःख व्यापा ॥
ऐसो मूढ कौन जगमाहीं । खरा खोट जो जानत नाहीं ॥
जो कोइ पुण्य पाप नहिं जाना । शिशुसमान निदौष बखाना ॥
जबते आदमको भो ज्ञाना । अहं भोगता करता जाना ॥ ॥
तबते परा कालको फांसा । पुण्यपापको व्यौरा भासा ॥
षटदरशन आतमको झगरे । न्यारे न्यारे मारग डगरे ॥
पीर पयंबरको मत न्यारा । एक विरुद्ध दुतिये व्यौहारा ॥
करतागति जो कोई लखिपावत । तौ काहेको झगर मचावत ॥
जिमि अंधरनमिसि चीन्हा हाथी । एक समान तासुके साथी ॥
मैं नहिं तू नहिं वह नहीं कोई । कहि नहिं जात ख्याल क्या होई ॥
जो मैं ही तो मोहि किन बंधा । पायौ ज्ञान गुरुकी संधा ॥
आप गुरु अरु आपै चेला । कहि न जात कुदरतको खेला ॥
दुतिया बिन कौ ज्ञान गहावै । ज्ञानते दुतिया नजर न आवै ॥
ज्ञान पाय दुतिया नहिं माना । दुतिया धौ मोहि माह डुराना ॥
अमीकुंडमें चिऊँटी डूबी । स्वाद पाय जान्यौ कछु खूबी ॥
कुंडको अंत न पावै कबहुँ । कोटिन गोता मारे जबहुँ ॥
अस विज्ञान गम्यको गहई । ताको पारावार न लहई ॥

१२५

जीवधर्मबोध

( २०३३ )

आपै भीतर बाहर बोले । बिरला साधु सो भेद टटोले ॥
देय दिलवै मागे जोई । सकल कर्मको करता सोई ॥
आपै देय आप नटि जाई । आपै चले आप हटि जाई ॥
सिद्ध साधु चकित है थकही । सतासत न कछु कही सकही ॥
स्वप्न अवस्था जब जिव परई । अपनी बस कछु कर्म न करई ॥
स्वप्नदशामें जाने सोई । यह सब कर्म आपनो होई ॥
जब जाग्यौ तब न्याय निबेरा । मेरो कर्म न सपने केरा ॥
चार अवस्थाके सब कर्मा । ऐसेहि जानि लेहु जिव भर्मा ॥
चहुँ अवस्था मिथ्या राचा । ताको कर्म होय कहँ साचा ॥
ऐसेहि ज्ञान अवस्था माही । सर्वकर्म मिथ्या दरसाही ॥
मैं नहिँ मैं मिथ्या अभिमानी । भर्मेते कर्म आपनो जानी ॥
संत सुजान यह मनहि विचारी । सब मद मान दूर करि डारी ॥
अहंकार है नर्क निसानी । भक्ति गरीबी जीव सुख दानी ॥

दोहा—जानि बूझि जो जड़ भया, आपको जानै नीच ।
सोई सबसे श्रेष्ठ है, ज्ञानगम्य तेहि बीच ॥
जाना नहिँ बूझा नहिँ, जो जड़ दशा गहाय ।
अज्ञानी मूरख सोई, सो न भक्तिपद पाय ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

दासको दीनता जब आवै ।

सो पद देव दास अपनेको शिव ब्रह्मा नहि पावे ॥
औरनको पूरा करि जाने आपको ओछ कहावे ।

अवधूतन ते सत कहत हो सो मेरे मन भावै ॥
एकै ब्रह्म सकल घट देखे दुबिधा दूर बहावे ।
इन पाँचोंसे तोरि सनेहा जब गोविंद गुण गावे ॥

( २०३४ )

बोधसागर

१२६

होय अधीन प्रेम लौलावै कुल अभिमान मिटावै ।
सहज शून्यमें रहे समार्ई पठिगुण सब बिसरावै ॥
गुरुकी दया साधुकी संगती भावभक्ति चितलावै ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन परमपद पावै ॥
कौन हमारे आये केशव क्यों न हमारे आये ।
पट रस व्यंजन छोटि रसोई साग विदुरघर खाये ॥
जहँ अभिमान तहाँ हम नहीं वह व्यंजन विष लागे ।
सोई मुनिजन पूरा कहिये अभिमानीको त्यागे ॥
जातिहीन जाके कुल नहीं है दासीको जायौ ।
ताकीट परिख्या तुम जायके बैठे कहा बड़ापन पायौ ॥
सत्यासत्यवचन कहो दुरयोधन सुनिले बात हमारी ।
विदुर हमारे प्रानसो प्यारे तुम विषिया बेकारी ॥
पुरातन कथा तुम्हारी हरिजी वनमें छाक मँगाई ।
ग्वालनके संग भोजन करते सो मति तुममें आई ॥
प्रेम प्रीतिके हम हैं भूखे अभिमानी नहीं भावै ।
कहैं कबीर साधुकी महिमा हरि अपने मुख गावै ॥

रामचंद्रवचन-चौपाई

सबहि मानप्रद आप अमानी । भरथ प्रानसम ते मम प्रानी ॥
वेद प्रमान आदि ओंकारा । सो करता सोई श्रुति सारा ॥
सो ओंकारको अर्थ बखानो । दीनता और गरीबी जानो ॥
जहँ दीनता गरीबी बसई । सबगुण ज्ञान ताहिमें लसई ॥
तौरे तो इञ्जील सोयी नय । आहि दीनता ज्ञान गुणनमय ॥
पुनि जन्बूर कहे सो हेता । दीनको प्रभु सोभा गति देता ॥
पुनि कुरानको सोई मत हेरी । ऊँच बोल है गर्दभ केरी ॥
गदहा पर ईसा चढ़ि चाले । सो दीनता धर्म प्रतिपाले ॥

१२७

जीवधर्मबोध

( २०३५ )

धन्य दीनता कह इञ्जीला । ताते हो जिव बंधन ढीला ॥
जूठी बेर सेवरी ल्याई । रामचन्द्र अति रुचिते खाई ॥
लक्ष्मन निर आदिरकर ताही । भिलनी जूठा हम नहिं खाही ॥
भई सजीवन बूटी सोई । लक्ष्मन प्रान बचायौ सोई ॥
पंडो यज्ञ जुरे ऋषि भूरी । स्वपचभक्त विन यज्ञ न पूरी ॥
जातिपातिकुलगुण अभिमानी । भ्रमत फिरे चौरासी खानी ॥
भगते भगवा भेष बनाये । शिव शंकर निज शीश चढ़ाये ॥
आदि भक्ति शिवजक्त प्रकाशी । भगवा भेष धरे संन्यासी ॥
भग पृथ्वीका रूप कहाये । तात भगवा वरन बनाये ॥
पृथ्वी तुल्य गरीबी आवै । संन्यासी जीवत मरिजावै ॥
बैरागी जो तिलक लगाई । ले मृतिका निजमाथ चढ़ाई ॥
आदम अघ तौ रेत प्रसंगा । कीनो प्रभुकी आज्ञाभंगा ॥
अदन बाहर आदन भैऊ । ताते प्रभु पुनि ऐसे कहेऊ ॥
खेहसे तेरी देह बनाई । जबलौ बहुरिन तेहि मिलिजाई ॥
तबलौं श्रम करिकरिके खैहो । अब नहिं अमृत फलको पैहो ॥
ताको ऐसो गहिये ज्ञान । जीवतही मिट्टी मिल जाना ॥
मुये तो सबही मिट्टी होता । पावै कर्म बीज यश बोता ॥
जीवतही लोधू मरजाना । यही सकल मतको परमाना ॥
चरनामृत अरु शीत प्रसादा । ताको आहि बड़ो मरजादा ॥
करिके कृपा साधु जो देही । दीनको शिष्य सेवक सो लेही ॥
ताको ऐसा अर्थ बिचारी । गहो गरीबी सब नरनारी ॥
बहुरि शिष्यसे भीख मंगवै । ताते तासु मान बिनसावै ॥
सुरगण जो अतिगुण गण धामा । आदमको कर दंड प्रणामा ॥
कारण यही तासुमें पायौ । प्रभु दीनताको श्रेष्ठ देखायौ ॥
कह आदम मिट्टीकी मूरत । कह इबलीस दीस शुचि मूरत ॥

( २०३६ )

बोधसागर

१२८

कह नारद ब्रह्मा सुत होई । कहब पुरा कैवर्तक जोई ॥
कहु सुख देवगर्भके योगी । कह नृप जनकविषयरस भोगी ॥
कह मूसा गुण ज्ञान निधाना । कह इबलीस दोजखी जाना ॥
बिनदी मतान जिव कोई तरिहै । करि सुकर्म भवसागर परिहै ॥

नानक शाह वचन

दोहा-नानक नन्हे हो रहो, जैसी नन्ही दूब ।
घास पात जरि जाहिगी, दूबखूबकी खूब ॥

सेख फरीद वचन

दोहा-फरीदा ऐसा हो रहो, जैसा करकख मंसीत ।
आठोपहरलताडिये, तेरीरब्बनालरह प्रीत ॥
सोरठा-धर्मसार यह जान, भक्ति दीन ता दिल गहे ।
तजि दीजै मदमान, होयपरम कल्यान तब ॥
तनमनधन गुरुअर्प, करनीकर गुरुद्वारनिज ।
बहुरि काल नहिं दर्प, प्रेमभाव पद पूजिये ॥

इति श्रीधर्मसार

अथ सर्वधर्मएकता वर्णन-चौपाई

एकै धर्म सकल संसारा । भिन्न भेदते दरसै न्यारा ॥
विषय अमृतमें दियौ मिलाई । ताते जिवकी सुधि विसराई ॥
सप्त पंथ तजि कुपुर कमावै । न्यारी राह जीवको भावै ॥
कहु तीरथ व्रत मूरति बताया । कहुमदमास हरामको खाया ॥
जारी जोर जुलुम कहु देखो । यक अछहको न्यारो लेखो ॥
उज्वल करनी सब देखलाई । तामें कहुक हराम मिलाई ॥
जबलों भोगकिआसा रहई । तबलों जिव हराम गतिगहई ॥
भोगकि इच्छा दिलसे त्यागे । तब जिव सत्य पंथमें लागे ॥
विषय विकारते मुक्ति न पावै । सतगुरु त्याग औरको ध्यावै ॥

१२९

जीवधर्मबोध

( २०३७ )

परम पुरुष पदको जब त्यागा । तब हराम कारीमें लागा ॥
जीव गँवायो ज्ञान कि थेली । तजि शुभकर्म करै बदफैली ॥
जौन विकार जाहि मत माहीं । तजि सब जिव निर्मल है जाहीं ॥
निज औगुणजब जिव पहिचाना । भर्म छाँडि शुभ धर्महि जाना ॥
हृदयमें जब उगे विवेका । तब सब जिवके मत हो एका ॥
सत्य पुरुषकी भक्ति जो गहेऊ । तजि विकार तब अमरसो भैऊ ॥

इति सर्वधर्मएकता

अथ ब्रह्माण्ड और पिंडकी एकता—चौपाई

यह ब्रह्मांड सकल है पानी । तामें अद्भुत ख्याल उपानी ॥
अण्ड पिंड दो उदधि अपारा । इन्द्रजाल तामें विस्तारा ॥
रच्यौ ख्याल यह बाजीगरको । अन्न लहेको भवसागरको ॥
अण्डाकार पिंड ब्रह्माण्ड । तामें सकल द्रौप नौखण्डा ॥
यह समुद्र है अगम अगाहा । भरमत जीव न पावे थाहा ॥
चौरासी लख गोता खाही । बूड़े उछले पार न जाही ॥
जिमि ब्रह्मांड समुद्र बखानी । तिमियह पिंडबून्दयकजानी ॥
सिन्धु बून्द दोनों यकरूपा । कहिनजाय अति अकथअनूपा ॥
सिन्धुमें बून्द बून्दमें सागर । जाने विनापन्यौ जगझागर ॥
जो कछु रचना सिन्धुमें परखो । ज्योंकीत्योंसोई बुंदमें निरखो ॥
वारिद बुंद विचार विलोका । दोनों द्वैधौ दोनों एका ॥
दोनों एक तुल्य है चोखे । विषय विकार दोहुनको पोखे ॥
इंद्रिन सहित दोहु एक सारा । दोहुमें एकै खेल पसारा ॥
ताते प्रथम पिंड गति जानो । पुनि ब्रह्माण्डको लेखा ठानो ॥
पिंड खेल जबलों नहीं लहई । अंडलेख तबलों कह कहई ॥
पहिले पिंड आपनो तरना । पुनि ब्रह्मांडके पार उतरना ॥
जाते पिंड तरो नहीं जाई । सो ब्रह्मा पार कह पाई ॥

( २०३८ )

बोधसागर

१३०

जबलों देह सत्यकरि जानी । तबलों पिण्ड तरे नहिं प्रानी ॥
आदिमें अण्ड रूप यक रहेऊ । हिरण्यगर्भ ताहीको कहेऊ ॥
हिरण्यगर्भ निज मनहि विचारा । द्रन्द्व खेल तेहि काल सँवारा ॥
हिरण्यगर्भ प्रजापति मेला । ताते खिला जत्तको खेला ॥
फूटा अंड भयो द्वै धारा । ताते द्रन्द्व जत्त हितकारा ॥
द्रन्द्वमता संसारहि मेले । नर नारी दोउ जगमें खेले ॥
दोनों मिले होय तब रचना । सकल स्वरूप ताहिसे खचना ॥
जिहि अवसर जिव भर्महि भंडा । जो कछु पिण्ड सोह ब्रह्मण्डा ॥
आपै लखे लखो सब जाई । आपहिमें सब सृष्टि समाई ॥
माया ब्रह्म मेल जब होई । यह संसार खेल तब होई ॥
माया दीख ब्रह्म नहिं दरसै । शून्य स्वरूप ताहिको षरसै ॥
बिंदु रुधिर दूनों हैं पानी । अंड पिंड रचनाको खानी ॥
बिंदु पिता लोहू है माता । श्वेत अरुण कहिये द्वै बाता ॥
यकभो द्रन्द्व द्रन्द्व जब टूटे । हैं अनन्त सब जगमें फूटे ॥
रुधिरसे तीन धातु प्रकटानी । चाम मासु अरु रुधिर बखानी ॥
तीन धातु नर विन्दुसे होई । हाड अरु गूद विन्द कह सोई ॥
माता तीन पिता मलतीनी । ताते जगकी रचना कीनी ॥
माताको सब कोई लखि पावै । पिता काहुकी नजर न आवै ॥
मातामें रह पिता छपाई । ताते कोई देखि नहिं पाई ॥
माता जबहि पिता बतलावै । तब कोई खबर तासुको पावै ॥
माताको अभाव जब होई । पिता दरस तब कर सब कोई ॥
यह दृष्टांत मैं प्रकट बखाना । मायामें हमि ब्रह्म लुकाना ॥
चाम मास लोहू है बाहर । हाड अरु गूद विन्द है भीतर ॥
माता जैसे पिता छपावै । माया ऐसे ब्रह्म दुरावै ॥

१३१

जीवधर्मबोध

( २०३९ )

माया ब्रह्म जीव कह आहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥
आपै खोजि आपको पैये । और कहा केहि खोजन जैये ॥
पिंड अंड दोनों यक लेखो । बाहर भीतर एकै देखो ॥
पग पाताल कहे सतइ महि । चरण पृष्ठ पाताल छठा कहि ॥
पद अंगुली सो कहे असुरगण । पदके नख असुरनके बाहण ॥
अष्टांलिग महातल पञ्चम । पेडीतलातल चौथ विरञ्चम ॥
ठेघुनी सुतल तीसरे कहिये । जंघको बितल दूसरो गहिये ॥
काल समय अथवा यज्ञ होई । पाव चलनको कहिये सोई ॥
भगसो अतलहै पहिली धरनी । लिंग ताहि प्रजापति बरनी ॥
वर्षा बीज नाम महि भनिये । महिते सो आकाशलो गनिये ॥
चूतर माथ सौ प्रभा प्रभाता । श्वेत रंग जो प्रथम लखाता ॥
मोट मास अथवा कह माया । सौ प्रदोष सन्ध्या बतलाया ॥
नाभी गंभीरता है जोई । क्षीर समुद्र बखानो सोई ॥
इत जठरा उत बडवा आगी । नसा जाल सरितागण जागी ॥
पेट सो भुवलोक पहिचानो । बालभोग लछु पल्लय जानो ॥
तृषा सो लछु पल्लय जग सोवन । हृदया स्वर्ग भूमि ऊपर भन् ॥
इत वैजन्ती माला जोई । उत लम्बादिक जाला सोई ॥
दक्षिण कुच यहि भांति बखाना । मांगनके प्रथम दे दाना ॥
बाम पयोधर ताहि कहीजै । दान याचना पीछे दीजै ॥
मन सोई गुण तीन मिलाना । रज सत तमगुण कीन प्रणामा ॥
मनसंकल्प सोई है ब्रह्मा । जग रचना जिन कीन अरंभा ॥
पोषण गुणसों वदे विष्णुवर । कोधहनन हंकार महेश्वर ॥
हास अनन्द सोई है माया । ज्ञान दुःख दंभ दूर कराया ॥
प्रानसो पौन पिष्ठ अपकर्मा । पीठ अस्थिहिमगिरि कह मर्मा ॥
पसुली इतर अस्थि गिर नामा । जो हिमगिरिके दक्षिण बामा ॥
दहनाहाथ सो दान अस वर्षा । बाम सूम तासुष्को तर्खा ॥

( २०४० )

बोधसागर

१३२

हाथ चीन्ह अप्सरा सुभाती । कर नख सो सुरगण बहु जाती॥
दक्षिण करबंध अरु निजतार्ई । लोकपाल देव अग्नि बनाई ॥
बाम जोड़कर जो अरु निजलो । अहं देव ईसान नामलो ॥
औरनिज सो कल्पद्वुम कहिये । आगे और भेद कछु कहिये ॥
दक्षिण कंध सो दांहना छोरा । वामकंध सो बायो ओरा ॥
गरदन मोठा वरुणदेववर । कंठसो महल्लोकके स्वर्ग ऊपर ॥
शब्दसो अनहद बुद्धि जो नीकी । महल्लोकके ऊपर ठीकी ॥
सो यम लोक बखानों ताहा । चितादुःखसे जगकी चाहा ॥
होटको ओष्ठ लोभको साजू । ऊपरको ओष्ठ हया अरु लाजू ॥
तालू पानी जिह्वा आगी । वचन सोई सरस्वती सुभागी ॥
दंतमोह जग पुनि कह भोजन । सब जग जीव करे जो भक्षण ॥
इतबानी उत चारों वेदा । हास्य सो माया रचना भेदा ॥
कानदो जक्त आठ विधि धारा । नाकपरा सो अश्विनी कुमारा ॥
देहगंध सो पृथ्वी योका । अधोतन दक्षिणपंचमयमलोका॥
अर्धदेह उत्तर जो हेरी । सो तपलोक षष्ठमो टेरी ॥
मस्तक बल सो नूर असलकह । आदि कि उत्पतिको सूरय वह॥
दृष्टि सदा जग उत्पति सारा । पलक मारन दिनरात उचारा ॥
दक्षिण दिशकी भृकुटी जोई । प्रीति देवता महतर सोई ॥
बाम और भृकुटी जो लस्ता । कहर कोध सुर कहे देवस्ता ॥
मस्तक सो तपलोक बखानो । सो जनलोकके ऊपर जानो ॥
शीस खोपड़ी लोकालोकू । सब लोकनते उपर विलोकू ॥
शिर कच महाप्रलय घनकारे । तनरोम नोक वनस्पति भारे ॥
रूप अनूप लक्ष्मी जाना । देहकार्ति रवि प्रभा प्रमाना ॥
महापुरुषको सोहैं गेहा । जगमें जेती मानुष देहा ॥
आतम चिदानंद करि मानी । खास महल पूर यतन ज्ञानी ॥
खास जबही नीचेको जाई । सारी सृष्टि तबै प्रकटार्ई ॥

१३३

जीवधर्मबोध

( २०४१ )

जिहि औसर बिच श्वासा रोका। हरा होय तब सब जग लोका ॥
जबहि श्वास ऊपरको खींचा। महाप्रलयहो सबकी मींचा ॥
दोहा-पिंड और ब्रह्मांडमें, रंच भेद नहीं वाद।
नानक सत्यकबीरको, अब सुनिये संवाद ॥

नानक वचन

तीन लोककी कहो गुसाईं। कैसे जानि परे तन माही ॥
कहीये दयासिंधु मोहि बानी। तुम निज पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

हेठ चरण दैं शीश अकाशा। तीनलोक देही प्रकाशा ॥
शब्द खंड ब्रह्मांडमें सोईं। माया ब्रह्म फैल घट दोईं ॥
हमरे पदको लहै न कोई। भले बूझ तुम पारख होईं ॥

नानक वचन

चार दिशा मोहि कहो गोसाईं। सातद्वीप निज कहो बुझाईं ॥
प्रभु नौरखंड अब कहो बखानी। चंद्रशूर तन कैसी मानी ॥

जिंदा वचन

आगा पीछा दक्षिण बाना। चार दिशा देही प्रमाना ॥
साठे तीन हाथकी देही। उनचास कोटि बिसियाहै पेही ॥
नवो खंड नौ संधी जानो। पिंड अंडको लेखा मानो ॥
परवत यामें हाड लगाया। धड पास ब्रह्मांड रचाया ॥
चंद्र शूर द्वै नेत्र जगावा। देखो पीठ सुमेर बनावा ॥
नसन दिया तन भीतर जानो। पेट गंडार पिंडमें मानो ॥

नानक वचन

तत्त्व प्रकार कही तुम वानी। वाकी शब्द संधि पहिचानी ॥
सातसमुद्र कहो बखानी। तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥

जिंदा वचन

जीभ नासिका नेत्र बखानो। श्रवण नाभ गुद इंद्री मानो ॥

( २०४२ )

बांधसागर

१३४

खार मीठ जल सब पहिचानो । नौसौ नदी पिंडमें मानो ॥
श्वासा नदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रस भाखा ॥
ये समुद्रमें जाय समानो । है गंडार नहीं त्रिसानो ॥

नानक वचन

सात समुद्रकी लहर बखानो । इनकी लहर कौन विधि मानो ॥

जिंदा वचन

काम अरु क्रोध लोभ हंकारा । मनमायाकी लहर अपारा ॥
अग्नि पौन पानी प्रचण्डा । पांच तत्त्व बतैं नौ खण्डा ॥

नानक वचन

बाही लहर हीरा अरु मोती । यामें कहा निकसि है सोती ॥
सभी भेद मोहिं कहु गुरुदेवा । नहिं छोड़ो अब तुमरी सेवा ॥

जिंदा वचन

जब गुरु मिलै भुङ्ग सम रंगा । ब्रह्मज्ञान उपजै सतसंगा ॥
सुमिरन भजन होय परकाशा । अनहद ध्यान पुरुषकी आशा ॥
अर्श गैवमें ध्यान लगावै । तवासिंधु थाह कोइ पावै ॥
जाय हंस तहैं डुबकी मारा । ले निकसे तब वस्तु अपारा ॥
हीरा लाल नाम परकाशा । शब्द सुरति हंसाको बासा ॥
कथा समाज निकसिहै ज्ञाना । सो हीरा मणि माणिक जाना ॥

नानक वचन

खार मीठ जल इहां अपारा । उहां कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥

जिंदा वचन

नयन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानौ जलधारी ॥
खार मीठ जल सभी भरा है । जो ब्रह्मांड सो पिंड कहा है ॥

नानक वचन

इहां है काठ लोहकी नौका । कहो स्वामी व्यौहार वहांका ॥

१३५

जीवधर्मबोध

( २०४३ )

जिंदा वचन

नाम पुरुष नौका इहां भाई । खेवट संत गुरु संत मिलाई ॥
पुरुष शब्द सुमिरो लौ लाई । पुरुष प्रताप उतारि चल भाई ॥

नानक वचन

धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । अमरभेद भाषी निज बानी ॥

साखी-तिलघोटत तारी लगी, दिलदरियाके तीर ।

नानककी संशय मिटी, जो सतगुरु मिले कबीर ॥

चौपाई

बहुरि अर्ब यूनानके ज्ञानी । पिंड अण्ड सम तूल बखानी ॥
जो सबही ब्रह्मांडमें देखो । पिंड केर सोई है लेखो ॥
अस्थि पहाड़ है मेघ पसीना । शिर नभ इंद्री कर्म प्रवीना ॥
सुर नर सुनि ग्रंथव अरु देवा । पिंड अण्डमें एकै भेवा ॥
सकल भांतिके पशु खग नाना । कर्म करंत बसै परधाना ॥
भोजन पावक पौरुष जोई । सोई रसोईदार कहोई ॥
जो बल अंतमें भोजन धरई । गन्धी नामक तासुको परई ॥
जो बल रुधिरको श्वेत बनावै । नारि कुचनमें दूध कहावै ॥
अण्डकोष नर बीरज धोवै । धोबी नाम तासुको होवै ॥
भोजन अंगमें बाटनहारा । नाम बंधानी तासु उचारा ॥
जल जो पसीना रूप निकारी । सो कहिये सक्का पनिहारी ॥
जो भोजन मल बाहर डारे । नाम हलाहलखोर सो धारे ॥
बात पित्त जो अन्तर गहई । सोई न्याय करंता कहई ॥
यह विधि सब पशुखगतनमाही । कोध स्वरूपी बीग सो आही ॥
अंड पिंडकी अकथ कहानी । मैं कछु सूक्ष्म लिखा प्रमानी ॥
दोहा-बूँद समाना सिंधुमें, यह जाने सब कोय ।
सिंधु समाना बूँदमें, जाने बिरला सोय ॥

( २०४४ )

बोधसागर

१३६

कुंडलिया

जाते बिरला सोय होय जब सतगुरु दाय।
मैंहि मैं सब ठौर और सबही भ्रम छाया ॥
भ्रम छाया सब और दौर मन ज्ञान कि टट्टी।
टट्टी जब टुटि जाय आय नहिं पुनि या हट्टी ॥

इति ब्रह्मांड पिंड

अथ सर्वदेशभाषाकी एकता

दोहा-जेते मानुष जत्कमें, हिंदू सबकी आदि।
भाषा सारे जत्ककी, संस्कृत पितु है बादि ॥

चौपाई

संस्कृत कह सोधित जनको। सोई पिता सर्व भाषनको ॥
संस्कृतके जो गुण औगाहा। ताकी नहिं कोई पावे थाहा ॥
वेदकि संस्कृत जो आहीं। अबके पंडित ससुझत नाहीं ॥
एक सूत्रके अर्थ अपारा। कह सब निजु निजु मति अनुसारा।
मर्म न जाने अर्थको सोई। यथा बुद्धि भाषे बुध लोई ॥
गूढ अर्थ जाने ब्रह्म-ज्ञानी। गुप्त वस्तु जेहि कछु न दुरानी ॥
संस्कृतको वर्ण बिचारो। और न कहुँ अस युक्ति निहारो ॥
प्रथम संस्कृतको वर्ण माला। और न कोई भाषामें भाला ॥
आदिके अक्षर बारह स्वरको। ब्रह्मस्वरूप जानिये तिनको ॥
अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ कह। औ अं अः रामरमित सब यह ॥
बारह ब्रह्म वसै ब्रह्मंड। कथै कौन सब गुणमय मंडा ॥
एक अकारते बारह स्वर हैं। व्यंजन सकलको परम पितर हैं ॥
सबके आदि है एक अकार। ताते वृद्ध भये पुनि बारा ॥
बारह रूप अकार सो बनेऊ। न्यारे न्यारे कारज ठनेऊ ॥
एक थूल यक सूक्ष्म रूपा। थूल प्रकट सूक्ष्म रह गूपा ॥
थूल अकार जो सूक्ष्म भैऊ। सो सब बरणनमें रमि गैऊ ॥
वासुदेव सब माहि बिहारी। कोई साधुजन सकै निहारी ॥

१३७

जीवधर्मबोध

( २०४५ )

निर्गुणते सरगुण जब भैऊ । ताहीको ककार जग कहेऊ ॥
जब अकार निज रूप गहाया । है ककार दशमें दरसाया ॥
पुत्र पौत्र सही तथा न कर । क ख ग घ ङ दशमें दर ॥
पञ्च ब्रह्म रह दशमें द्वारा । तिनके पुत्र अग्र पग धारा ॥
तालूपर सो कीन बसेरा । च छ ज झ ज सोई टेरा ॥
तिनते पुनि ट ठ ड ढ ण भैऊ । तालू अग्रवास तिन लैऊ ॥
त थ द ध न फिर आगे आये । दंतमूल सो बैठक पाये ॥
प फ ब भ म अधरनपै बैठारी । मुख कपाट सो दीन उचारी ॥
य र ल व श ष स ह क्ष त्र झ अगाहा । बाहरको कर चले उछाहा ॥
खोलि कपाट सो बाहर बिचरे । ब्रह्मवेत्ता बुध बानी उचरे ॥
संस्कृतके हैं अक्षर जोई । सबके पिता जानिये सोई ॥
बारह ब्रह्म सकल व्यंजनमें । धरि लघुरूप रमे सब तनमें ॥
जड़ चेतन सब माह बिहारी । जो चीन्है सो ब्रह्माचारी ॥
वासुदेव है आदि अकारा । सो रमिरहा सकल संसारा ॥
आदि ब्रह्म अकार कहाये । जहँ तहँ सोइ रहा जग छाये ॥
लखोन जाये अलख अविनाशी । सर्व खानिमें स्वतह प्रकाशी ॥
सोई अकार जो भयौ विकारी । रचनासरिसो जक्त पसारी ॥

दोहा-जब अकार ब्रह्मांडसे, भूत मंडलमें आये ।

दशमें दर परथान कर, सोई ककार कहलाये ॥

सो ककार काया रचे, जनक जगत करतार ।

तारण कारण जीवके, गुरु है सो तनधार ॥

चौपाई

अब दुतिये बिधि कहो बखानी । आदि संस्कृत जावे जानी ॥

सर्व वेदकी भाषा जोई । एक मिलान बखानो सोई ॥

सब यूनानके देवी देवा । हिंदूको पूजा अरु सेवा ॥

हिन्दू जाको श्रीकह गाये । सीरिज यूनानी बतलाये ॥

( २०४६ )

बोधसागर

१३८

इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥
इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥
हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥
संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥
अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥
आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥
अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥
मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥
अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥
पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥
पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥
सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥
दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥
सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥
शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥
भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥
अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥
जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥
संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥
संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥
अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥
चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥
पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥
मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥
और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥
अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥

१३९

जीवधर्मबोध

( २०४७ )

सत्य कबीरके नाम जो चारो । चहुँयुगमें भिन्न भिन्न उचारो ॥
सत्य सुकृत सुनींद्र कहाये । करूनामय स्वामी बतलाये ॥
कलियुग माह कबीर उचारो । चारों युगके नाम हैं चारो ॥
नाम संस्कृतमें युग तीनी । कलियुग मिश्रीत करि दीनी ॥
अरबी संस्कृत मिश्रीत कबीरा । हिन्दू सुसलमान गुरु पीरा ॥
जेते और कबीरके नाऊ । सबही संस्कृत माह कहाऊ ॥
सतये स्वसंवेद कह येही । अज हरि हर मथुरा धर देही ॥
तीनों देव पिता सब नरके । तीन लोक ब्रह्मा हरि हरके ॥
ब्रह्म श्वासते वेद उपानी । उचरे तीन देव सुख बानी ॥
संस्कृत सुर बानी होई । ताते श्रेष्ठ और नहिं कोई ॥
इति देश

अथ ब्रह्मा और आदमकी एकता—चौपाई

ब्रह्मा आदम एकै अहई । सत्यकबीर बचन अस कहई ॥
ब्रह्मा सावित्री नर नारी । आदम होवा ताहि पुकारी ॥
ब्रह्माको काशीमें वासा । अदनवाग सो नाम प्रकाशा ॥
काशी सम कोइ पुरी न आना । देखो काशी खंड प्रमाना ॥
बन अनंद पथमें कहलाया । वाराणसी बहुरि बतलाया ॥
नाम तासु कहिये पुनि वासी । सब अनंद सब सुखकी रासी ॥
वाराणसी सो भयो बनारस । सुखसे सावित्री ब्रह्मावस ॥
आदिमें कहे जो वन आनंदा । अरबी अदनबाग सुखकंदा ॥
वन है बाग अरबकी भाषा । नाम अनंद अदवसों राखा ॥
उलटि आनंद अदन हो सोई । कहे अरब पारसके लोई ॥
संस्कृतकी बोली बहुतेरी । अरब लोग उलटा कहि टेरी ॥
वन अनंद बाग अदन जो भैऊ । वाराणसी बनारस कहेऊ ॥
अरब न संस्कृत सके उचारी । उलटा सुलटा सो करि डारी ॥
इति आदमब्रह्मा

( २०४८ )

बोधसागर

१४०

अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई

मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥
नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥
ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥
तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥
मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥
भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥
नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥
लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥
चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥
तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥
प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥
प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥
आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥

इति मनुशतव्रत।

अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई

श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥
महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥
धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥
तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥
तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥
भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥
भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥
शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥
महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥
दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥

१४१

जीवधर्मबोध

( २०४९ )

आप भिखारी अनधन देही । महम्मद महादेव है येही ॥
धन अरु दर्ब चाकरन पाही । आप अलोनो साग जो खाही ॥
महा उदार महम्मद दाता । जत्तमाह सो शिव विख्याता ॥
योग भोग दोनों गुण भीजा । साबर मन्त्रो दोवा तवीजा ॥
योग युक्ति शिववर्त बताया । उत नमाजा रोज ठहराया ॥
ये ऊँकार शब्द गोहरावै । वे भोरे उठि बाग उठावै ॥
खड़ी एक नस महम्मद माथे । दंडाकार तिलक तेहि साथे ॥
प्रकट दोऊ भृकुटीके बीचे । मस्तक अंत प्रजंतलों खींचे ॥
जस कबीरमुनि तिलक कराही । सोई महम्मद मस्तक माही ॥
कोधवंत जब महम्मद बोले । तेहि औसर सोई नस डोले ॥
रोमधार यक उर बिच धारी । सोऊ दंडाकार सँवारी ॥
नाभिते कंठप्रजंतलो सोही । जन कबीर मुनि रूप है ओही ॥
शिवके संग रहे बहु देवी । तिमि बहु तारि महम्मद सेवी ॥
चीन्ह चक्र सब ताके साथ । आदिभक्ति सोई पशुनाथा ॥

इति श्रीमहादेव और भहम्मदकी एकता

अथ हनुमान और अलीकी एकता

छन्द—मूलना

हंक हनुमानते लंकमें शंकभ अलीके हंक गढ बंक टूटे ।
अली हनुमान दोऊ बांहके बली अरि अनी दलमली ज्यौ
सनी कूटे ॥ १ ॥ शूद्र जेहि शत्रुगण वीर्य सामुद्रधन रुद्र शिव
देखि दल दैत फूटे ॥ शूर संग्राममें गुणनके धाम दोऊ अली
हनुमान गुणमाहँ जूटे ॥ २ ॥

इति हनुमान

अथ परशुराम और मूसाकी एकता—चौपाई

परशुराम मूसा यकताई । ऐसे दोहुको मेल मिलाई ॥

( २०५० )

बोधसागर

१४२

विप्र अवज्ञा कीनो हरिकी । क्रोधवन्त कमला तबसरकी ॥
विष्णुकि छाती चरण प्रहारा । सब दुःख द्रन्द्व घेर तिहि बारा ॥
रहे बेहाल काल बहु तेरे । तब प्रभु तिनिहि दयाद्वग हेरे ॥
परशुराम लीनों औतारा । ब्राह्मण कुलको पा ८नहारा ॥
विद्या बुद्धि तपोधन धारी । रूप शील बल वीरज भारी ॥
सो द्विजराज काज चित दीने । क्षत्री मारि निछत्तर कीने ॥
तथा यहूदिन विकल विचारा । तब मूसा लीनो औतारा ॥
सो फिर उनको मारि नसाया । इवरानिनको प्राण बचाया ॥
विद्या बुद्धि निपुण गुणखानी । बल वीरज शोभा सरसानी ॥
परशुराम कर फरसा जोटा । तैसे मूसाके कर सोटा ॥
जैसे ब्राह्मण तथा यहूदी । दोनों माह देखिये खूदी ॥
कुल अभिगान दोहुनमें भारी । अबिरहाम वंश तन धारी ॥
परशुराम मूसा यक सारा । दोनों विष्णु केर औतारा ॥

इति परशुराम और मूसा

अथ कृष्ण और कृष्णकी एकता—चौपाई

कृष्ण कैष्ट दोउ एक समाना । हरि औतार धरे नर बाना ॥
कैष्ट नाम ईसाको आही । अंग्रेजी बोलीके माही ॥
हिंदू कहे कृष्ण जगदीसा । ईसा इनके ईस हैं ईशा ॥
कृष्ण आगमन जबहि जनायौ । सो सुनि कंसराय भय पायौ ॥
इसा जन्म भव्य सुनि काना । तबहि रोद भूपति भय माना ॥
कृष्ण जोजन्म भयौ जेहि बारा । चहुँदिस फैल गयौ उजियारा ॥
कंसकी डर वसुदेव डेराये । मथुरासे गोकुलमें ल्याये ॥
यथा कृष्ण मथुराको त्यागे । तैसे ईसाको ले भागे ॥
गर्भसे जब ईसा प्रकटाने । चहुँदिश तबहि तेज चमकाने ॥
यूसुफ नृप हिरौद भय पाई । ले मसीहको मिश्र सिधार्ई ॥
कृष्ण जन्म सुनि कंस डेरायो । केते बालक मारि नशायो ॥