कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(१९५६)
बोधसागर
४८
विद्या पाठक पहुँ जब जावै । विद्या सकल ताहिते पावै ॥
विद्यापढ़ि जब भयौ परवीना । धर्म अधर्म मर्म सब चीन्हा ॥
वेद शास्त्रको सबही छाना । तऊ न भक्तिभेद कछु जाना ॥
तब जिव संतकी संगति गहई । ताते ज्ञान लाभ सो लहई ॥
ज्ञानपाथ जब सतगुरु चीन्हा । ताके चरणमें चित दीन्हा ॥
आठ गुरुके नाम बखानो । जिनते जग जिव लाभ लहानो ॥
पहिले गुरु मातु पितु जानी । रज वीरजते देह उपानी ॥
दूजा गुरु है मनको दाई । गर्भमाह जिन युक्ति बनाई ॥
तीजा गुरु नाम जिन धारा । ताहि नाम ले लोग पुकारा ॥
चौथा गुरु जिन विद्या दीना । कुल मर्याद रीति सब चीन्हा ॥
पंचम गुरु जिन दीक्षा दीनो । रामकृष्णको सुमिरन कीनो ॥
छठये गुरु जिनभ्रम गढ़ तोड़ा । सबसे तोड़ एकसे जोड़ा ॥
सतवाँ गुरु जिन सत्य लखाया । जहाँको था तहँवा बैठाया ॥
एते गुरु हैं जक्त मझारा । जीवहि राह बतावनहारा ॥
अठये गुरु पारख पद बंदा । जाते कटे सकल यमफंदा ॥
भक्तिहि भक्ति भेद अधिकाई । तासु कथा कछु देहु सुनाई ॥
अक्षर तीन भक्तिमें धारी । ताको ऐसो अर्थ उचारी ॥
प्रथम भकारसो भव बतलावो । आवागमन जो दूर करावो ॥
दुतिये ककार करे कल्याना । तृतिये तो जिवको दे ज्ञाना ॥
भक्ती दोय प्रकार बखानो । विहित अविहित जाको जानो ॥
ऐसे प्रथम विहित निरतावो । वेद शास्त्र विधि भक्ति कमावो ॥
ताहि विहितमें चार प्रकारा । प्रथम कामना सहित उचारा ॥
जिमिहरिपदध्यायौवृजवनिता । निजमनोरथयुतभक्तिसोभनिता ॥
दुतिये बैरभाव करि ध्यावन । जिमि हरिनाकुस आदिकरावन ॥
तृतिये भयकरि भक्ति गहाई । जस मारीच भक्त रघुराई ॥
४९
जीवधर्मबोध
( १९५७ )
चौथ प्रथम भाव मर्यादिक । जैसे नारद अरु सनकादिक ॥
तिनमें द्वैको त्याग बखाना । भय अरु वैर न भक्ति प्रमाना ॥
पुनि दुतिये अविहित कहावै । प्रेम उमंग हृदयमें आवै ॥
आपसे आप प्रेम उमडाना । वेदशास्त्र विधि कहु नहिं जाना ॥
उठै उमंग प्रेमकी धारा । आपै भक्ति गहै हरि प्यारा ॥
सबसे श्रेष्ठ भक्ति है येही । मिले धाय निज परम सनेही ॥
याहूमें कहिये द्वै ढंगा । प्रथम प्रमान कीन ज्ञान अंगा ॥
ताके अंगा भक्ती कह सोई । ज्ञान उपाय मुक्तिकर जोई ॥
दुतिये सो मंत्र भाषिये ताही । याके आप ज्ञानमय आही ॥
भक्तिको भाग ज्ञान कहलावे । भक्तिमें सकल ज्ञानगुन पावै ॥
विहित अविहित कीन उचारा । बहुरि भक्ति कह तीन प्रकारा ॥
उत्तम मध्यम प्राकृत ताना । तिनको ऐसे अर्थ बखाना ॥
उत्तम भक्तीको यह लेखा । सर्व मई ईश्वरको देखा ॥
जल तरंग जस भेद न कोई । भक्ती श्रेष्ठ कहावै सोई ॥
शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । आपै आप रमै प्रभु सोई ॥
दुतिये मध्यम भक्ति बन्दता । भगवत भक्त और भगवन्ता ॥
दोनों ते सो प्रीति लगावै । दुरजन देखि न ताको भावै ॥
तृतिये प्रतिमा पूजा ठाना । मूरत को भगवत करिजाना ॥
भगवत भक्तनसे नहिं प्रीति । प्राकृत भक्त केर यह रीति ॥
बहुरि भक्ति कह तीन बिधाना । सात्त्विकराजसतामस जाना ॥
सात्त्विक भक्ति कहे निष्कामा । राजस होय कामना जामा ॥
तामस बैरी विजयके कारन । त्रिविधभक्ति पुनि कीन उचारन ॥
मानस बाचक कायक होई । बहुरि चार बिधि कहिये सोई ॥
प्रथम जोद्रोपदि आरतनिजहित । दुतिये जिह्वासू नृप प्रीछित ॥
तृतिये अर्था अर्था सोई । दुनिया चाहे ध्रुव जस होई ॥
( १९५८ )
बोधसागर
५०
चौथो ज्ञानीको मरजादा । जैसे सनकादिक प्रहलादा ॥
बहुरि तीन विधि भक्ती धरिये । प्रथमहिभक्ति आप जो करिये ॥
दुतिये औरनसे करवावै । पुनि लखिभक्ति करत हरषावै ॥
नौथा भक्ती बहुरि बखानो । श्रीनो कीर्तन सुमिरन जानो ॥
सेवा अरु अर्चा पुनि वंदन । दाससख्यपुनि आत्मनिवेदन ॥
पुनि बारह प्रकारकी भक्ती । प्रथमै संतन संगत युक्ती ॥
पुनि हो भक्तन कृपाके लायक । ऐसे करिये कर्म सुभायक ॥
तृतिये भक्तन चरित जो आही । श्रद्धा अरु निश्चय तेहि माही ॥
चौथे हरिचरित्र सुन काना । पंचम सुनत प्रेम अधिकाणा ॥
षष्ठम हरि निजरूप निरताये । जस अद्वैत बाद बतलाये ॥
सप्तम प्रीति माह नित गाढ़े । अष्टम प्रभु प्रकाश उर बाढ़े ॥
नौमै सकल विकारहि त्यागा । हरिगुन आपमें आवन लागा ॥
सर्वज्ञता होय पुनि दशमै । ग्यारहे सब हरि गुनहो इसमें ॥
बारहे निजु तम हरिकी प्रीति । सकल भर्मभय जीवकी बीति ॥
तीन प्रकार भक्तिको भेवा । प्रथम कीजिये गुरुकी सेवा ॥
तन मन धनसे प्रीति लगावै । गुरुकी सेवा सब सुख पावै ॥
दुतिये साधुन सेवा अहई । ताते जीव परमपद लहई ॥
तृतिये जप तप कीन प्रमाना । निर्गुणसर्गुण भक्ति त्रिधाना ॥
अगुण सगुण जो भक्ति उचारा । स्वसंवेद थापे दोहु बारा ॥
दोहुते पार भक्ति जो गहई । परम पुरुषकी भक्ति सो अहई ॥
ब्रह्मा भक्ती शिवकी भक्ती । रामकृष्ण विष्णु अरु शक्ती ॥
निर्गुण भक्ति योगेश्वर धारी । पुरुष भक्ति इनतेहैं न्यारी ॥
जैते भक्ति जकत में कीना । सबही जानिये गुरु आधीना ॥
प्रथमै निश्चय गुरु की करई । निश्चयबिन कछु काज न सरई ॥
सबही धर्मकेरि समताई । गुरु निश्चय बिनमुक्ति न पाई ॥
५१
जीवधर्मबोध
( १९५९ )
धर्म महम्मदमें बतलाये । निश्चय तरुपर गुरु बैठाये ॥
निश्चय माह गुरुका बासा । बिन गुरु निर्गुण नर्कनिवासा ॥
निश्चयमें जब सदगुरु बैठे । जिवके हृदय ज्ञान तब पैठे ॥
जिनके हृदये निश्चय नाहीं । तो सबही निगरे नर आही ॥
द्रन्द्वते भया सकल संसारा । द्रन्द्वहि तासु छोड़ावन हारा ॥
पुरुष नारिको भया जो मेला । ताते जगको पसरा सेला ॥
तैसे जब गुरु शिष्य मिलजाई । सकल भर्म भय जाय नसाई ॥
बिन गुरु जीव राह नहीं पावै । जप तप दान बुथा सब जावै ॥
गुरुके बचन चरन चित दीजै । कबहू ताहि उलंघ न कीजै ॥
करिये गुरुकी सदा बड़ाई । गुरुअस्तुति सब अघ बिनसाई ॥
निशदिन ताहि सेवामें रहिये । ताते अधिक न तप कोह कहिये ॥
तन मग धन गुरु अर्पन करना । गोखुरसो भवसागर तरना ॥
गुरु निरुद्ध करिये जो कर्मा । होय शुद्धपै तजे अधर्मा ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर गुरुबिन माला फेरत, गुरुबिन देते दान ।
गुरु बिन दाम हराम है, पूछो वेद पुरान ॥
गर्भयोगेश्वर गुरु बिना, लागा हरिकी सेव ।
कहै कबीर बैकुण्ठते, फेरि दियो शुक्रदेव ॥
कबीर गुरुबिन भर्मा, यौ फिरे ज्यों रामकोरोझ ।
सतगुरुसे परचै भई, पाया हरिको खोज ॥
कबीर जो निगुरा सुमिरन करे, दिनमें सौ सौ बार ।
नगर नायक सत करे, तौ जरे कौनके लार ॥
गुरु आज्ञा निरखत रहै, जैसे मणिहि भुअंग ।
कहै कबीर संसारमें, यह गुरु मुखको अंग ॥
गुरुकी आज्ञा आवई, गुरुकी आज्ञा जाय ।
( १९६० )
बोधसागर
५२
कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥
कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान ।
ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥
कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और ।
हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥
कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार ।
हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥
कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।
केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥
कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय ।
करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥
चौपाई
गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥
पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥
चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥
मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥
गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥
दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥
ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥
दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥
चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥
शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥
जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥
आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥
सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥
५३
जीवधर्मबोध
( १९६१ )
गुरु गोविंद दोउ एक स्वरूपा । बिलु गुरु परा जीव भ्रमरूपा ॥
बिन गुरु कोई विद्या नहिं आवै । अलख अभेद सो कैसे पावै ॥
बिना निशाने तीर चलावै । अंध समान ठौर नहिं पावै ॥
अच्छे गुरुके दूँढन मांही । निगुरा रहन भलो कछु नाहीं॥
जो कोई कर्म धर्म बतलाये । सो गुरु करि लीजे मन भाये ॥
बहुरि जहां उत्तम गुरु पिये । ताके चरननमें चित लैये ॥
जो दृढ हो सांचा गुरु दूँढा । निश्चय लहै गहै पद गूँढा ॥
गुरु बिन अज्ञ रहै नर कैसे । मानुष ज्यों पशु देखी जैसे ॥
जो मानुष हो गुरु बीहीना । सो जड़ पशु पंछी ते दीना ॥
पशु पंछी जेते जगमांही । बिन गुरु सबही ज्ञान गहाही ॥
निज पितु मातु ढंग सब धरही । बिना सिपाये सब कछु करही ॥
बिनगुरु करहि कर्म विधि नाना । नरके कबहुँ आव न ध्याना ॥
नर सब जिवते अबला बहूता । गुरुद्वारे पावै बल बूता ॥
शिष येते पशुहू सिपि जाहीं । मनुष सो ज्ञान होय तेहि नाहीं॥
गुरु द्वारे नर सो गुन पावै । नरते सो ईश्वर है जावै ॥
यहि विधि नर है गुर आधीना । करिये कर्म कर्म हो छीना ॥
कर्म कीजिये सतगुरुसङ्ग । तब उर उपजै ज्ञान अभंगा ॥
दोहा-गुरुव्रानी रविकर निकर, कर उर शिष्य प्रकाश ।
ज्ञानदीपके जगमगे, भयौ धर्मको नाश ॥
चौपाई
सर्वोपरि गुरुकेर महातम । बिनगुरुकोलखि पावै आतम॥
गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा । गुरुसमान कोइ देव न दूजा ॥
गुरुके चरनन जिन चित दीन्हा । आतमपरमातम तिन चीन्हा॥
गुरुकी कृपा हनै सब शोका । सोई सुखदायक दोहु लोका ॥
रामकृष्ण गुरुके गुन गायौ । ताके चरननमें चित लायौ ॥
नं. ११ बोधसागर - ७
( १९६२ )
बोधसागर
५४
संत कबीर गद्गौ गुरु चरना । बारबार ताको जस वरना ॥
गुरु करिके जो दांष लगावै । सूकर श्वान केर तन पावै ॥
नारद गुरुको दोष लगायौ । चौरासी ताको भरमायौ ॥
पूरव कथा यह कागभसुंडर । उठिकेन्हिप्रनाम गुरुकोकर ॥
नाथ करत शिवमंदिर मांही । गुरु तासुचलिआयौ ताही ॥
गुरुको देखि न सो सनमाना । निरखि अर्नात शंभुरिसियाना ॥
भै अकाशबानी तेहि काला । रे खल तैं गुरुधर्म न पाला ॥
धरु जड़ माहस सर्प शरीरा । गुरु अपमान पाव बहुपीरा ॥
एक बार पथकी यह बाता । बद्रिकाश्रममहिमें चलिजाता ॥
जाता दीख महि पंथ दुहेला । एक गुरु ताको एक चेला ॥
परम प्राति निजु गुरुसे धरई । चरनामृत बिन भोग न करई ॥
लागे तहां पहारको पानी । खेदते दुःखित गुरु कह जानी ॥
गुरुकी सेव शिष्य सो त्यागा । गारी देना ताहिको लागा ॥
गुरुहि दुखी तजिके चलि गेऊ । बद्रिपतिकी मारग लियऊ ॥
तहैंते पलटिके सो जब आई । कुष्ठवरन ताके तन छाई ॥
बाटहि माह कुष्ठ भरि मारा । यह चरित्र निज नैन निहारा ॥
गुरु निरादरको जिमि पापा । तिमि सेवाफल अगिनित थापा ॥
कॉटिन जप तप करे जो कोई । गुरुविहीन सब निरफल होई ॥
मुनि सुकदेवसे को बड़ि ज्ञानी । गर्भते योगमुक्ति जिन ठानी ॥
तपबल सो वैकुण्ठ सिधाया । बिन गुरु तहां रहन नहि पाया ॥
गुरुकी निंदा करे जो प्रानी । घोर नरकमें वासा ठानी ॥
गुरुते ईर्षा जो जड़ करिहै । सो यमदंड भांति बहु भरि है ॥
गुरुकह बड़ गोविंदते कीन्हा । जाकी कृपा गोविंदहि चीन्हा ॥
गुरुसम और न दूजा दाता । सबको मन वेदन विरुथाता ॥
रिद्धि सिद्धि गति मुक्ति अमाया । बिन गुरु दया न कहुँ कछु पाया ॥
५५
जीवधर्मबोध
( १९६३ )
गुरुविन कहो गाँठि को खोले । गुरुविन अंध टटोलत डोले ॥
बारबार कर गुरु गुण गाना । कहा कौन गुरुदेव समाना ॥
धन्य धन्य गुरु देव गोसाईं । तान्यौ भव गोखुरकी नाईं ॥
गुरुगुरु जपिके जागे योगी । विरति विचार प्रपंच वियोगी ॥
जादिनते गुरु शरनमें आये । तादिनते दुःख दोष दुराये ॥
गुरुकी पारन सकल सुखदाईं । गुरुप्रमाद अमरावति पाईं ॥
जौ गुरु जीवहि नाम न देता । तौ कहु कौन मुक्तिपद चेता ॥
ताते गुरु सब सुखको कारन । तासु चरनरजकर शिर धारन ॥
धन्य धन्य सो शिष्य बड़भागी । तन मन धन गुरुसेवा लागी ॥
तीरथ व्रत कछु काज न नाहीं । गुरुके चरणनमें पति जाही ॥
गुरुसमान तीरथ नहीं औरा । गुरु महात्मविदित सब ठौरा ॥
कोटिन तीर्थ गुरुजीके चरना । संत कबीर जो निजुमुख वरना ॥
गुरुको शीव न मानै जोईं । सो जिव निश्चय जाय बिगोईं ॥
गुरुसे लगन जासुकी लागे । तन मन धन तनसम सो त्यागे ॥
अब सुनिये गुरुपारख पदको । सोई परम गुरु है बेहदको ॥
हदके गुरुको जिन भल पूजा । ताहि मिले पारख गुरु दूजा ॥
हद बेहद माह गुरु सोईं । बिना ज्ञान लखि परत है दोईं ॥
सत्यकबीर बचन-चौपाई
गुरुसम दाता कोइ न भाई । मुक्तिको मारग दियौ बताई ॥
गुरुविन हदये ज्ञान न आवै । ज्यों कस्तूरी मृगा भुलावै ॥
गुरुविन मिटै न अपनो आपा । धर्मजबड़ी बांधा शापा ॥
गुरुविन केहरि रूपमें पड़िया । गुरु विन गजछायासे लड़िया ॥
गुरुविन श्रान देखि बहु भेषा । मन्दिर एक काँचकी देखा ॥
चहुँदिश दीस आपनी छाया । भूकत भूकत प्रान गँवाया ॥
( १९६४ )
बोधसागर
५६
गुरुबिन सुवा नलनिसे बंधा । गुरुबिना कपि पड़ौ जो फंदा ॥
कहे कबीर भर्म संसारा । बिन सदगुरु को उतरे पारा ॥
सार्वी-भर्म जेवड़ी जगबंधा, फिर जन्मै मरिजाय ।
कहैं कबीर सतगुरु मिलै, तब सतलोकसिधाय ॥
मीन चकार मगल मधु, पशु है तजै न नेह ।
नर है तजै कबीर जो, तिनके मुँह दे खेह ॥
शब्द
नरको नहिं परतीत हमारी ।
झूठी बनिज कियौ झूठे संग पूजी सबै मिलिहारी ॥
शब्दरशन मिलि पंथ चलायौ तिरदेवा अधिकारी ॥
राजा नय बड़ो परपंची रैअत रहत उजाड़ी ॥
इतने उत उतते इत राखत यमकी साट सँवारी ॥
ज्यों कपि डोरि बांधी बाजीगर अपनी खूशी रारी ॥
इहै पेड उतपति पल्यको विषया सबै बिकारी ।
जैसे श्वान अपावन राजित त्यों लागी संसारी ॥
कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को मानै बात हमारी ॥
अजहुँ लेव छोडाय कालसे जौकै सुरति सँभारी ॥
दोहा-गुरुकी महिमा अधिक है, थके विष्णु विधि वाम ॥
जोरि युगलकर पायपरि, कोटि कोटि परनाम ॥
इति नर शरीर गुरुआधीन
अथ शरनागतीको वर्णन-चौपाई
सतगुरु शरण सकल सुखदाई । ताते जिव सत लोक समाई ॥
साचे गुरुकी गहिये शरना । सोई जीव दुसह दुःख हरना ॥
झूठे गुरुसे काज न सरिहै । धोखे जिव यमके सुख परिहै ॥
सूर कि शरण परे जो कोई । सो जिव कबहुँ न जाय बिगोई ॥
५७
जीवधर्मबोध
( १९६५ )
कायर क्रूरकी शरणमें लागे । अंतमें छोड़िके ताको भागे ॥
श्वान पूछि गहि जाय न पारा । बूड़ि मरे भवसागर धारा ॥
अंधको राह देखाव कि अंधा । बंधेको खोले कह बंधा ॥
केत उपासक भाषे सोई । भक्ती अरु शरणागत दोई ॥
उभय भांतिसे प्रभुपद पाये । तामें ऐसो भेद बताये ॥
भक्ती ग्राहक ऐसे कहई । युक्ति जतन करि हरिपद गहई ॥
एकजन्म नहिं जन्म अनेका । छूटें नहीं भक्तिको टेका ॥
काहू जन्म मिले हरि अपना । छूटै सकलभय भर्म कलपना ॥
पुनि कह शरनागत जो ग्राही । करनकरावन मोहि कछु नाहीं ॥
शरन हो आपको हरि अर्पनकर । बहुरि नहीं कछु युक्ति यतनकर ॥
शरण हो फेर यतन जौं गहिये । तो शरणागत मिथ्या कहिये ॥
शरन हैं जौं निश्चयमें घाटा । ताकी यमगन रोकै बाटा ॥
जो सतगुरुकी शरणको ताकी । तेहि कछु यतन रहै नहिं बाकी ॥
ताते शरणागत सब परहै । शरण गहै ते जीव उबरहै ॥
शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञानभक्ति तेहिमाह समावै ॥
शरण हो जब यह निश्चय आई । प्रभु मोहि दोनों लोक सहाई ॥
सकल पाप ताको जरि जावै । जो सतगुरुकी शरणमें आवै ॥
शरणागतहो षट्गुन गहिये । ऐमे ताको व्यौरा कहिये ॥
विधि निषेध निजगुरुकी टेवा । दुतिये साधु प्रीत अरु सेवा ॥
तृतिये यह निश्चय उरधारै । मो अधबिसरि नाथ मोहितारै ॥
चौथे यह निश्चय मन माहीं । प्रभु तजि मोर सहायक नाहीं ॥
कैसेहु दुःख सांकरे गूढा । प्रभुतजि और सहाय न दूढा ॥
पञ्चम सतगुरु मूर्तिको ध्याना । ताके सन्मुख बिनती ठाना ॥
प्रभु तजि मोर ठेकाना नाहीं । पावन पतित नाम प्रभु आहीं ॥
मो सम पतित न कतहु निहारा । प्रभु सम और न तारनहारस ॥
( १९६६ )
बोधसागर
५८
छटयें आपको प्रभुहिं समपैं । ताको कबहुँ काल नहिं दपैं ॥
यह षट्गुन जो कोई धारा । शरणागत पलमें कर पारा ॥
काहू साधनको नहिं काजा । शरणागती सकल सुखसाजा ॥
कोइ कोइ आचारज हैं ऐसे । शरणागत विधि भापे जैसे ॥
निशदिन प्रभुको ध्यान लगावैं । यक क्षण भरि बिसरै नहिं पावैं ॥
टुटै न तार भजन दिन राती । शरणागत कहिये यहि भांती ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर जो जाकी शरन गहै, ताको ताकी लाज ।
उलटि मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥
चौपाई
जल अरु मीन कि प्रीति निहारो । तजे प्रान हो जलते न्यारो ॥
ऐसे सतगुरु पद रति राते । निशदिन तासु ध्यानमें माते ॥
कुण्डलिया
रामानन्द कि फौजमें, कबीरके शिरमौर ।
लूला लँगड़ा पांगुला, सबको करि गये ठौर ॥
सबको करि गये ठौर, सुनो कलिके नर नारी ।
गहिये ताकी शरण, हरण भवकी भय भारी ॥
भय भारी हटजाय, उपाय न कलिमें दूजी ।
मेटे यमकी त्रास, आस ताहीते पूजी ॥
शरणगहे सुख होय जिव, बीते सकल कलेश ।
गह्यौ बिभीषण शरण हरि, कीन्हा लंक नरेश ॥
कीन्हों लंकनरेश देशपति, प्रथम सो रहेऊ ।
शरण कबीर सराहि, जाहि खल दल बहु तरेऊ ॥
तन्यौ थपच चंडाल, डाल अघरहेऊ नकनिका ।
परमपुरुष पद पाय, यथा काशी की गणिका ॥
५९
जीवधर्मबोध
( १९६७ )
शरणागतको धर्म यह तन मन करिये भेट ।
गुप्त प्रकट सब आपिये पुनि यम गहे न फेट ॥
फेट गहे तब कौन सकल तेरौ नहिं मेरो ।
बाहर भीतर पौर ठौर सब तेरौ डेरो ॥
तेरौ डेरो भयो वस्तु तामें सब तेरी ।
तूही तहैं रखवाल छुटी सब संशय मेरी ॥
चौपाई
अब कलिमें आयू नर थोरी । को चित योग युक्तिमें जोरी ॥
पुण्यदान कह ध्यान अगाधू । कर्मविहीन गृही अरु साधू ॥
ताते शरनागत सुखदाई । और यतन कलिमें नहिं पाई ॥
कलिके जीव अनन्त अपारा । शरण कबीर होय भवपारा ॥
मूर्ख पुरोहित जस बिन ज्ञाना । ताको दान देत यजमाना ॥
दृढ़ है सतगुरु शरण गहीजै । सकल भर्मभय ताते छीजै ॥
सत्यकबीर बचन-शब्द
बिरिजमें महारि न खेले सिकार ।
चारपांच दश बीश महाभट संग लीने तीनो भरतार ।
मीनरूप है रहै जगतमें डारि बहावै तिरगुन जार ॥
जलरूपी है रहै संत कोई गहि पकरे गुरुचरण करार ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो यहि ते रहियौ सदा होशियार ॥
इति शरण
अथ सतसंग कुसंगका वर्णन-चौपाई
सर्व शास्त्रको यामें एका । बिनसतसंग न उपजे विवेका ॥
बिनविवेक नहिं उज्जल करनी । जाते मुक्तिपन्थ पग धरनी ॥
सतसंगतकी महिमा भारी । लिखते शेष शारदा हारी ॥
वेद कतेब पार नहिं पावैं । संतनको नित गुन गन गावैं ॥
( १९६८ )
बोधसागर
६०
विधिहरि हर नितजाको ध्यावै । संतको भेद सोऊ नहि पावै ॥
सतसंगत सब सुखकी खानी । सर्वलाभ ताहीते जानी ॥
जो तप कीजै वर्ष हजारन । छनसतसंगत कष्ट नेवारन ॥
सत्यस्वरूपी ईश्वर कहिये । ताके भक्तन संगत गहिये ॥
तासु नाम सतसंग कहावै । सो संगतगहि जिव तरिजावै ॥
साधुनकी सेवा मन लावै । तब सतसंगतको नर पावै ॥
सतसंगत कह विविधि प्रकारा । तामें द्वैविधि मुख्य उचारा ॥
हरिभक्तन ढिग बैठन ढंगा । दुतिये वेद पाठ सतसंगा ॥
जोकर भगवतभक्तन सेवा । ताते मिलै परम गुरु देवा ॥
सदशास्त्रन पढ़ि तिनहि बिचारे । कंठ पाठ सुख तिनको धारे ॥
तेहि अनुसार कर्म सब करई । सार असार तहां निरुबरई ॥
सोई शास्त्र है जिव सुखदाई । जाते भक्ती सुक्ती पाई ॥
जाहि शास्त्रपढ़ितन मन भटके । ताको ले पानीमें पटकै ॥
जैसे साधन अरु सतसंगा । वर्णन वेदकीन बहु ढंगा ॥
हरिभक्तनकी सङ्गत जोई । तेहि समान कहु तुलै न कोई ॥
सतसङ्गत जो टूटन चहई । सबही ठौर ताहिको लहई ॥
अपने पापको कारण आही । सतसङ्गत जेहि दरसे नाहीं ॥
अपनी दृष्टि दोष जो धारे । तेहि कारण परदोष निहारे ॥
निजु दग दोष चंद द्वै दरसै । अंधेको अन्धेर सब सरसै ॥
भक्तीमें दृढ हो न जबलों । सतसंगत करते रह तबलों ॥
मनक्रम साधुकि सेवा गहिये । गाहीते सबही सुख लहिये ॥
साहिब सदा सन्तके साथ । विन सतसङ्ग न आवे हाथा ॥
सन्तजान साहिबकी देही । भक्तन सङ्ग पाइये तेही ॥
भक्तन सुख हरि भोजन करही । सदा सो तिनके सङ्ग विचरही ॥
वरन विवेक एक नहि करिये । साधु जानि सेवा चित धरिहे ॥
६१
जीवधर्मबोध
( ११६९ )
साधु सेवके वैरी पाँचा । तामें भटक जाय जिव काँचा ॥
रूप वरन विद्या बल धनमद । ताने जीवन लहै सेवापद ॥
जेते सुख श्रुति संत बखानी । तातो स्वर्ग मुक्ति सुखदानी ॥
ताहुते सुख अधिक जो होई । सत संगत सम तुलै न कोई ॥
सतसंगतसे ईश्वर पावै । ताते अधिक और कह गावै ॥
जहैं ईश्वर तहैं सुरगन छाया । सब दयाल जब प्रभुकी दया ॥
गुन गन युक्ति मुक्ति जिन पाई । जहैं लगिलखो विभूति भलाई ॥
सो सबही सतसंग प्रतापा । यह पद सब संतन मिलिथापा ॥
अब कुसंगको वर्णन करिये । दुष्ट देखि ततछन परिहरिये ॥
भरुअहि निज उर लेहु लगाई । दुष्ट संग याते दुखदाई ॥
सर्प तो एक प्रानकर घाता । कूंग संग ले नरक निपाता ॥
दोहूँ लोकमें काज विभंगा । मति मलीन हो किये कुसंगा ॥
इति
अथ मनमायाको वर्णन—कविच
यह मन महाराज मनहीहै यमराज मन कीने सब काज मन
पोषत भरत है । ठाकुरवो ठग मन फैला सब जग मन कालवो
दयाल मन तारत तरतहै ॥ मनसो न खोट मन कीने हरि ओट
जिव भवमें डुबाय बरमायके छरत है । अकथ अनूप मन ईश्वर
स्वरूप मन तिहुँ पुर भूप जो उपायके हरत है ॥
चौपाई
यह मन तीन लोकको नाथा । तीन देव इंद्री तेहि साथा ॥
गुन इंद्री याते प्रकटाही । पुनि यार्हमें लय है जाही ॥
यहि मनको कोइ भेद न जाना । सुर नर मुनि परे बंदीखाना ॥
ऊपर मन अरु हेठ है माया । तासुमध्य जग जीवनिकाया ॥
( १९७० )
बोधसागर
६२
चक्की चले दल सब जिवको । होहि पिसान न पावै पिवको ॥
कहा बापुरा जीव कडारा । सुरनरमुनिसबछलिछलिमारा ॥
कुंडलिया
चलती चक्की देखिके दिया कबीरा रोय ।
दोपट भीतर आनिके साबित गया न कोय ॥
साबित गया न कोय मिले नाहिं सन्त सनेही ।
कठिन कालको घेर फेर पर समुझावै तेही ॥
समुझाये जौंचेतसो किले सतगुरु अटको ।
फेर न पीसो जाय देख तेहि यमगनसटको ॥
चौपाई
यह मन सकलजक्त बिस्तारा । यहि मनको कछु वारन पारा ॥
मनको रचना सकल जहाना । सात प्रकार सृष्टि जग नाना ॥
मानुष देव नाग कहि देता । किन्नर पशु पच्छी अरु प्रेता ॥
सात जीव हैं सृष्टिके साता । तिनकी अब सुनिये यह बाता ॥
दोहा-स्वप्ना जाग्रत प्रथमपुनि, संकल्प जाग्रित होय ॥
केवल जाग्रत त्रितयकह, चिरजाग्रत चौथो होय ॥
पंचम दृढ़ जाग्रित कहै, छठे जाग्रत सुपनाहि ॥
सतय छोन जाग्रत कहो, सात सृष्टि यह आहि ॥
चौपाई
स्वपने विषे जो जाग्रत होई । स्वप्ना जाग्रत कहिये सोई ॥
पुनि संकल्प जाग्रतकह जोई । अजौं नींद नाहिं आई होई ॥
तामैं जो मनराज फुराना । तेहि मनराजमें जग दरसाना ॥
दृढ़ वासना भई तेहिमाही । पूर्व वासना बिसरी जो जाही ॥
यहि मनराजको रचित जो देही । अभिभूतकता दृढ़ गहयेही ॥
६३
जीवधर्मबोध
( १९७१ )
केवल जागृत तृतीये होई। परमात्म ततसे फूरोई ॥
सङ्कल्प मात्र जक्त जो गहई। निश्चय आत्म पदमें रहई ॥
चौथे चिर जागृत कह लाया। आत्मतत्त्वसे जो फुरिआया ॥
निश्चय करि जो ताको गहेऊ। जन्मांतरको प्राप्ति जो भयऊ ॥
पंचम सुषुप्ति जागृत नाना। हृद घनभूत जो होय वासना ॥
पाप कर्म करि नो मन लाया। ताते थावर यूनी पाया ॥
षष्ठहि स्वपना जागृत कहिये। जब संतनकी सङ्ग्नत गहिये ॥
पट्टि सच्छास्त्र भयो जो बोधा। नहिं विचारनिज मनकोशोधा ॥
तबसो जागृत स्वपना होई। शुद्धबोध उर थपना होई ॥
सप्तम बोध विषे हृद जोई। तुरिया नाम कहावे सोई ॥
छौंन जागृत सो नाम बखाना। परमानंद प्राप्ति जिव जाना ॥
सप्त सृष्टि मन राजा केरो। मन जीते न करे भव फेरो ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर मन गोरख मन गोविंदा, मनही औघड होय।
जो मनराखै जतनकरि, तो आपै करता होय ॥
कबीरकीटिकर्मपलमें, करे यह मन विषयास्वाद।
सतगुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवाया बाद ॥
कबीर मन पंछी भया, बहुत चढ़ा आकाश।
ऊहाँ हांत गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥
कबीर-मन जो गया तो जानदे, गहिके राख शरीर।
उतरी परी कमान है, कयोंकर लोंगै तीर ॥
छन्द भुजंगप्रयात
महामत्त मातंग निर्द्भन्द गाजा।
गहै कौन पावै मनी रामराजा।
लियौ योगमा छन्दरा नाथ केरा।
( १९७२ )
बोधसागर
६४
तपी सूर सिद्धा जपी नर्क गेरा ॥
यही जीवको नित्य बहकावता है ।
यही ज्ञानी ध्यानीको डहकावता है ॥
महाकाल अन्याइया जो कही है ।
यही है यही है यही है यही है ॥
इति मन
अथ बाकुंडीको दमन-चौपाई
शम दमादि यह जिवको कर्मा । गहे सुचाल बहे सब भर्मा ॥
प्रथम वाक इंद्दी वश करना । सुधा वचनते जगमन हरना ॥
भलिविधि बूझिविचारिके बोले । जीनबाक विष अमृत घोले ॥
कटुकवचनविषे कबहुँ न कहिये । जाते श्रोताको उर दहिये ॥
काहूसे बोलो मति करुई । ऐसो ऊंच न ऐसो हरुई ॥
मध्य बोल तोलके आनो । धर्म नीतिमय वचन बखानो ॥
द्वै नर जबहि करे कनफुसकी । कान लगावन तब दिश उसकी ॥
जब द्वै मानुष बात कराही । बात न काटो तिनके माही ॥
वचन पै तर्क करे जो कोई । शुद्ध होय तो मानो सोई ॥
वृथा पक्ष निज बात न करिये । शुद्धको गह अशुद्ध परहरिये ॥
तर्क करत जो आपते ऊंचा । तो तामें ही रहिये नीचा ॥
मिथ्या निन्दा तजो भदेशा । सत्य वचन कर हित उपदेशा ॥
वेदपाठ कर विद्या दाना । पात्र कुपात्र भले पहिचाना ॥
वेद पाठ सच्छास्त्र उचारी । धर्म की विद्या कर्म सुधारी ॥
श्रुति ज्ञान विज्ञान कि पौरी । तासु प्रताप विदित सब ठौरी ॥
कथनी मती महम्मदको है । विद्या सहित साधु किमि सोहै ॥
पूर्णचन्द्र जिमि तारागनमें । विद्वज्जन तिनि तपसिन घनमें ॥
निद्रावश जो पंडित होऊ । सूरखके तपते भल सोऊ ॥
६५
जीवधर्मबोध
( १९७३ )
विद्या होय विनय संपन्या । ता पंडितको कहिये धन्या ॥
विद्या पढ़ि अभिमान भुलाना । सो जिव कीनो यमपुर थाना ॥
रसना सब संशयको छेदा । परमपंथको पावै भेदा ॥
रसना द्वार ज्ञान गुन आवै । रसना द्वार अगनि गति पावै ॥
इति रसना
अथ नेत्र और श्रवणका दमन—चौपाई
निज दृग दमन करो यहि लेखे । अन देखनी वस्तु मति देखे ॥
गुप्तस्थान मनुष्य पशु केरा । अति विशेष नहिं तादिशहेरा ॥
नरपशु परदा देख न जैसो । परे कुवानि जाहिमें ऐसो ॥
काल पाय निज दृष्टि गवावै । सो अवश्य अंधा है जावै ॥
जो परिच्छिद्र निहारन हारे । दुःखी होहिविन सुमति विचारे ॥
करता कृत निज दृष्टि निहारी । प्रभुहि सराह जीव तप भारी ॥
काम अरु कोध कुदृष्टि न हरे । सहज सुभाव नैन निज फेरे ॥
कामदृष्टि परतियपर डाले । जनु मैथुन करि धर्महि चाले ॥
निज पत्रिका लिखत जब कोई । ताहि न पढ़ो न निज दृगजोई ॥
जब तिय संग अनंग बिहारी । तब न गुप्त अस्थान निहारी ॥
जौ तादिश तेहिकालमें देखे । जन्मे पुत्र अंध यहि लेखे ॥
नैन न माह निरंजन थाना । स्वसंवेद इमि करे बखाना ॥
दृगन सपक्षी माह बसेरा । भोग हेत निज नैनन फेरा ॥
भोगे भोग दृगन आसीना । ताको छल नहिं कोई चीन्हा ॥
मन चंचल नैनन चपलाई । मन थिर हो तिनकी थिरताई ॥
नेत्रनमें है यमको बासा । सोइ जीव गल डारे फांसा ॥
जब जिव रोग सोग तन छावै । सबही अंग छीन है जावै ॥
नैन होहि कबहु नहिं छीना । सदा एकरस देखी पीना ॥
कैसहु कुशित रोग मल घेरी । ज्योति अघट्ट निरंजन केरी ॥
( १९७४ )
बोधसागर
६६
अंधी आंख निरंजन जूझे । विन देखे मुनि सब कछु बूझे ॥
ताते साधु प्रथम दृग बांधे । पीछे मन इंद्दीको साधे ॥
श्रवणको ऐसे कीजै दमना । अनमुनती बातें मति मुनना ॥
चुगली चाई निंदा वानी । सुने न श्रवण जीव जो ज्ञानी ॥
महा प्रबल इंद्दी हैं येही । जीवहि दुःखसुख व्यापे जेही ॥
गुरुपदेश कि कथा बताया । जीयत कैदी हाड तोडाया ॥
देखन ताहि जुरे नारीनर । एक गर्भिणी रहे तिहि ठाहर ॥
कैदी हाड लगा जब टूटे । निरखि गर्भिणी धीरज छूटे ॥
फिर देखी जब लोग लोगाई । सबही निजुनिजु भौन सिधाई ॥
निजघर जाय गर्भिनी बाला । कैदी सुरति कीन कछु काला ॥
मुनि ताको दोन्हो बिसराई । गर्भ कि थित सरनता पाई ॥
जन्मौ पुत्र तिहि औसर नारी । ता शिशुकी यह दशा निहारी ॥
कैदी अस्थि टुटी रह जेतो । बालक हाट टुटा सब तेतो ॥
हस्पताल सो शिशुले गयऊ । बीसवर्ष लो जीअत रहेऊ ॥
टूटा हाड़ बाल सो जीया । औषध ताहि न कछु गुनकीया ॥
मातु दृष्टि बालक दुःख पाया । गर्भहि निजु हाड़ तोड़ाया ॥
ऐसो नैन महाबलवाना । व्यासदृष्टि सुत तीनउपाना ॥
ऐसहि श्रवन प्रबलकहि गानो । एकबारकी कथा बखानो ॥
बंधा परा रहै जिहि ठाई । एक कलावत तहैं चलि आई ॥
गावन और बजावन लागा । सुनते बौरा मन अचुरागा ॥
बौरा रागको भेदी रहई । मुनि सुर ताल प्रीति अतिगहई ॥
परे परे निज अंग हलावै । ज्यों सुरताल कि गतिसुनि पावै ॥
परे परे निज अंग हलावै । खाट से खोलि दियौ पुनि वाको ॥
गुंगे बहिरे चंगे होई । श्रवण नयन हारे ते जोई ॥
६७
जीवधर्मबोध
( १९७५ )
प्राण देत मृग मधुरीबानी । ऐसहि प्रबल नासिका जानी ॥
इंद्री सकल अकलको हरही । ले सब जिव भवसागर भरही ॥
इति नेत्र श्रवण दमन
अथ हाथ पांवको दमन-चौपाई
उत्तर कर्म करनते कीजै । काहूको मति दुःख कछु दीजै ॥
पंथमें पाहन कंटक होई । करते दूर डार गह सोई ॥
दान पुन्य हाथन ते करिये । दुःखी दीनको सुखते भरिये ॥
मन्दे कर्मन हाथ उठाये । परधन परतिय दिस न चलाये ॥
चरननको यह कर्म बखाना । हरितीरथ सतसंगत जाना ॥
संतदरस रोगी सोगी पह । यथा योग चलके दुःखदलतह ॥
हरुये हरुये महि पग धरई । देखत चले न जिव कोइ मरई ॥
लाखन जिव पायनतर आवै । दाया करिके तिनहि बचावै ॥
इति हाथ पांवको दमन
अथ श्रेष्ठ पुरुषनकी सभा प्रवेश वर्णन-चौपाई
श्रेष्ठ सभामें जब पग दीजै । तहैं सब कर्म विचारते कीजै ॥
सभामध्य जेहिँ औसर पैठे । आज्ञा पाय तहां तब बैठे ॥
त्रिन बोले नहिँ बोलो बोला । बिन पूछे कछु भेद न खोला ॥
बुद्धि विरुद्ध न बोलो बानी । जाकी कोई प्रतीत न आनी ॥
बहुत बड़ाई अस्तुति छोड़ो । निंदा चुगुलीते सुख मोड़ो ॥
कबहुँ न निजगन बुद्धि सराहा । दुःखमतिभाषो सभा उच्छाहा ॥
ऐसो वचन कहो जनि ताही । मनभायक नरनायक नाही ॥
इति सभाप्रवेश
अथ मद्यमांस अभक्ष्यवर्णन-चौपाई
मद्य मांस भक्षमलिनबखानी । ताहि न ग्रहन करे नर ज्ञानी ॥
निज निजहृदय विचारो येहा । मल अरु मूत्र कि जेती देहा ॥