कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९२६ )
बोधसागर
१८
सो नरपर कलियुग को बासा । तेहि प्रिय कीने बुद्धि विनासा ॥
सोई दुष्ट सब करे अकाजा । प्रीछित धर्म-धुरंधर राजा ॥
ताहूको सो बुद्धि बिगारा । कञ्चनपरकलि आसन धारा ॥
धर्म महम्मद करे बखाना । सोरनको भागी शैताना ॥
गहि कर कञ्चनदृग न लगाये । चूमि ताहि पुनि कह गोहराये ॥
कञ्चनसे जो प्रीति लगाई । सो नहिं भगवत भक्ती पाई ॥
सो लोभी इबलीसको बन्द। निश्चय परे ताहिके फन्द। ॥
पुनि ऐसो इबलीस पुकारा । साधु सूम है मित्र हमारा ॥
सूम साधु जो जप तप करई । लोभ समस्त कृपा संहरई ॥
तैसे पापी दाता जोई । परमशत्रु मेरो है सोई ॥
जो कछु पाप करे सो दाता । दान किये सो सकल निपाता ॥
सो शैतानके वश नहिं परई । दाता कोटि पाप जो करई ॥
दोय वृक्ष द्वै ठौरमें देखा । यक औदारता लोभ है एका ॥
दानवृक्ष वैकुण्ठमें बरनी । गड़ी तासु जड़ ताही धरनी ॥
साष तासु दुनियामें आई । नरहित हेत सो दियो झुकाई ॥
जो कोई पकरे साष सखावत । सो निश्चयविहिशतको जावत ॥
साष सखावत पकरि जो रहई । अघ औगुन सब ताको दहई ॥
नवीन प्रसंशिके बचन सुनावै । सखी अवश्य मेरे ढिग आवै ॥
ऐसहि लोभवृक्षकी लड़ है । घोर नरकमें ताकी जड़ है ॥
साष तासु जगमाह झुकाई । जो कोई गहै नरकमें जाई ॥
शुभ करनी सब तासु नशावै । सूमको दौजरमें पहुँचावै ॥
सब धर्मनको मत है एहा । लोभी करे नरकमें गेहा ॥
अथ मोहवर्णन-चौपाई
चौथे मोह महा दुःखदानी । भव भोगनकी यही निशानी ॥
ता पिता सुहृद परिवारा । सगे सहोदर सह सुत दारा ॥
१९
जीवधर्मबोध
( १९२७ )
प्रथमहि मातु पिताकी मोहा । अंधभो जिमि काई लग लोहा ॥
जिहि औसर घरनी घर आई । मातु पिताकी प्रीति भुलाई ॥
परम प्रीतमा नारी अहई । बाधिन यथा गरासन चहई ॥
मधुर मधुर बोलै सुसकाई । महा ठगिन जिव ज्ञान ठगाई ॥
हने जबहि सो काम कटारी । सरवस छीन लेय सो नारी ॥
ताते प्रकट भये जो पूता । पूत नहीं आयो यमदूता ॥
मधुर बोल बोलै मन हरही । दिन दिन अधिक प्रीतिपितुकरही ॥
पुत्र कि मोहमें जन्म गँवाये । ताते कबहुं न छूटन पाये ॥
ताकी मोह भयो जिव अंधा । चला अंतको यमपुर बंधा ॥
पुत्रसे कहो कौन सुख पाया । झूल गड़े जड़ मूल नशाया ॥
जन्मतही युवती हरि लीनो । युवा भये तब धन वित छीनो ॥
मूयहुपर कपालको फोरा । मा यह सुत धौ वैरी मोरा ॥
शत्रुको सदा मित्र जग जाना । मूढ़ नहीं चेते विन ज्ञाना ॥
मेरो मेरो कर अज्ञानी । ममतामें भूले सब प्रानी ॥
मोर तोर कहि जन्म गँवावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥
बन्धु मित्र अरु संगे सखागन । सो समस्त है भक्तिके दुश्मन ॥
इन्है पेलिके हरि यश भनिये । प्रीति कबहुँ मति ठगनते ठनिये ॥
छन्द पद्मिनी
दशदिश देख बहु दृष्टि पसार । कोई नहिं तेरो यहि संसार ॥
मातु पिता स्वारथ हितकार । सुतदारादि सकल परिवार ॥
कोई न तेरो उबारनहार । सब मिलि तोहि नरकमें डार ॥
ताते तजो सकलकी प्रीत । यह दुनिया मतलबको मीत ॥
जिहि औसर स्वारथ ना होय । तेरो संग करे नहिं कोय ॥
बुद्धि विचारि विलोक विलोक । यह जग जान महाठग होय ॥
ठगसे प्रीति किये धन खोय । लहे अमरफलको विष जोय ॥
( १९२८ )
बोधसागर
२०
क्यों नहीं चिन्तामनि चित्चीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥
जठर अग्निते तेहि जो बचाय । काहे ताको दियो भुलाय ॥
महा दुःख जब घरे आय । संकटमें सो करे सहाय ॥
भजु तेहि जन्म सुफल है जाय । परमहंसकी पदवी पाय ॥
ताकी कृपा चलो यमजीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥
इति मोह
अथ भयवर्णन चौपाई
पंचम भय बटमार बड़ेरा । जो गहि जीव नरकमें गेरा ॥
भयवश तपी न जपतपकरहीं । भयते कायर घरमें मरही ॥
भय करि शूरा करे न करनी । भय करि सती न अग्निमें जरनी ॥
भय कीने शुभ कर्म न होई । भय करि शुभगति लहै न कोई ॥
भयकरि विद्याबुद्धि की हानी । भय भ्रम करि भमें चहुँखानी ॥
पांच वर्षका वय ध्रुव पाया । तप कारन सो वनाहँ सिधाया ॥
मिले ताहि नारद ऋषिराया । विविधि भांतिसे भय दिखलाया ॥
कानन महाभयावन कहेऊ । ध्रुवके हृदय न भय कछु गहेऊ ॥
बनमें जाय गूढ़ तप ठानी । रंच न सो मनमें भय मानी ॥
तपकरि हरिहि लियो प्रकटाई । धन्य धन्य ध्रुव धन्य कहाई ॥
जिनको हृदया भयते पूरा । तिनमें कबहुँ न साहस जूरा ॥
दोहा—पंचप्रकृति आकाशकी, कीने कछुक बखान ।
एकते एक महाप्रबल, सकल नरककी खान ॥
इति भय
चौपाई
पंच प्रकृत आकाश बखानो । पंच बहुरि बागूको जानो ॥
पंच अग्नि जलकी है पांचो । धरती पंच प्रकृति उर जांचो ॥
यही जीवको बंधन करही । इनहींते देही थित धरही ॥
२१
जीवधर्मबोध
( ११२९ )
तेहि सर्वथा अभाव जो कीजै । तब कैसे निज देह धरिजै ॥
पै अभाव कीजै गुरु द्वारे । तब जिव अपनो काज सँवारे ॥
पुत्र अकाशको बायू होऊ । पिता समान शून्य है सोऊ ॥
बायू बेटा अग्नि बखानी । सो तद्रूप तातके जानी ॥
तासुत जल जलते यह धरनी । ये सब सन्न एक सम उरनी ॥
शून्य अकाश शून्य तिहु गुन है । तम अरु अहंकार सब सुन है ॥
पुत्र पिता परपिता सहीते । सर्व सुन कहु सार न चीते ॥
शून्यको रचित देह यह अहई । शून्य सर्वथा ताको कहई ॥
शून्यकि कृपा सूत्र सब जानो । शून्य सर्वसंसारहि मानो ॥
तन मन धन सब शून्य बताओ । नाम रूप गुन शून्य कहाओ ॥
सो तन मन धन गुरुको दीना । नाम तासु बदले गहि लीना ॥
शून्य जो दीना शून्यहि लीना । कहो कहा कारज निज कीना ॥
शून्यहि दीन जो सूत्रहि पाया । तेहि व्योहार हाथ क्या आया ॥
है परंतु कारण तह एका । तामैं लहो भिन्न कछु लेखा ॥
निश्चय नामहु शून्य विचारी । तामैं है कारज यक भारी ॥
नाम डोरि हटु गहि जो कोई । शून्य पार पथ पावै सोई ॥
शून्यकि पारपंथ जब पावत । बहुरि शून्यमें सो नहि आवत ॥
शून्य रूप भवसागर धारा । अंड पिंड सब शून्य सँवारा ॥
अमकरि शून्यमें खल प्रकाशो । जस मृगजल मरुथलमें भासे ॥
फेन बुदबुदा वारि तरंगा । वायु प्रसंग बनावहु ढंगा ॥
जेहि औसर वायू नहि चलही । गलके सकल मिले तोह जलही ॥
जल विकार सब जलहै जैसे । माया ब्रह्म जीव यक तैसे ॥
अम करि नाम धरे बहु डोरा । एकब्रह्म तजि कतहु न औरा ॥
जेहि औसर जिव सोलखि पावै । एकै माह अनेक समावै ॥
दृश्य अनेक जो एक समई । पिंड अंडकी थाह सो पाई ॥
थाह पाय जब जीव थिरोना । तब जान्यौ हो चारु चिरोना ॥
नं. ११ बोधसागर - ६
( १९३० )
बोधसागर
२२
मैं हो आदि मध्य अरु अन्ता । मोहि फुराफुर वेद बदन्ता ॥
पक्की तत्त्व देह जब पावै । तबनिजुघरजिव बहुरिके आवै ॥
पक्की तत्त्व प्रकृत पच्चीसा । स्वसंवेदकी विधि जो दीसा ॥
ताको गह कच्चीको त्यागे । ऐसे योग युक्तिमें लागे ॥
तनकी कृपा योग अष्टंगा । ताको तज भज मनको अंगा ॥
मन अष्टांग योग उरधारो । स्वसंवेद जाको निरधारो ॥
तनकी कृपाकाज नहीं सरही । मन करनी जिवपार उतरही ॥
मनको रचित सकल संसारा । हो निवृत्त जिव मनके द्वारा ॥
तन मन यद्यपि मिथ्या दोई । मन करनी अति उत्तम होई ॥
तन है जाय आपनी बसमें । जेहि औसरआवै मन कसमें ॥
तन मन दोनों बश है जाई । तब निज रूप नजरमें आई ॥
ऐसे साधु जो जगमें आही । हरि ब्रह्म शिव ध्यावै ताही ॥
ताकी गतिको सके बखानी । लखे न शारद वेद अरु बानी ॥
मौनीजि वचन विचार माला
दोहा—स्वसंवेद नहीं कहि सके, लक्षण सन्त महन्त ।
परसंवेद कहे कष्ट, संग प्रताप कहंत ॥
चौपाई
जिनकी गति अगम अगाधू । बानी वेद पारसो साधू ॥
स्वसंवेद गुण तासु न कहई । तिनको भेद जीव किमि लहई ॥
समदृष्टि सो साधू ऐसे । सोई ब्रह्म रूप मैं पैसे ॥
काहू नहीं सो दुःख दुःखावै । जिनकी दृष्टिमें साहेब आवै ॥
को हिन्दू को मुसलमाना । को ब्रह्म केहि श्रद्ध बखाना ॥
कौन यहूदी कौन नसारा । एकै ब्रह्मको सकल पसारा ॥
रह्यौ चराचरमें सो पूरी । जाहि लखे हो सब दुःख दूरी ॥
आप आप लख ब्रह्म सनेही । जहाँ तहाँ देखो नेरी देही ॥
२३
जीवधर्मबोध
(१९३१)
मोहितजिऔर कतहु कोइनाही । अमकरि भिन्न भाव दरसाही ॥
मेरो मन अरु तन सब मेरो । तनमें मन मनमें प्रभु डेरो ॥
लखे अलखगति झगरा टूटा । जीव काल बंधनते छूटा ॥
अपनी देह सकल जग जानी । ताते सबहीको सनमानी ॥
काहूको नहीं करे निरादर । सब कोइ ओढ़े मेरी चादर ॥
स्वर्ग नरक मृत आपै आपा । जैसो कर्म तहां ले थापा ॥
सबदिल महल वहां प्रभुको है । आपै आप सर्वमें सोहै ॥
काहूको अनभल नहीं ताका । निजु अनभल ताते परिपाका ॥
औरको अनभल ताके जोई । अनभल अवश्य ताहिको होई ॥
एक मोगल क्रमकरे जो बनियां । तेहिदिग रह यक वैललदनियां ॥
मोगल परोसी धोबी रहई । लादनको एक गदहा गहई ॥
जिमि औसर खर करे पुकारा । मोगल दुखित होय तेहिबारा ॥
प्रभुसे नीति अस विनय उचरई । यहि धोबीको गदहा मरई ॥
यकदिन ऐसे कारन भयऊ । वैल मोगलको तब मरि गैऊ ॥
तिहि औसर मोगल गहि रोषा । परमेश्वरहि लगावै दोषा ॥
केते काल खुदाई कीना । गदहा बैल अजौ नहीं चीन्हा ॥
ऐसेहि सकल जीव अज्ञानी । प्रभु कह दोष लगावहि प्रानी ॥
सो नहीं दोष लगावन योगा । सबजिवनिजु२क्रमफल भोगा ॥
परभल किये भला हो अपना । निश्चय यह प्रमाण करिथपना ॥
जो काहूको कछु दुःख देई । सो दुःख अवश्य आप शिरलेई ॥
जो सबला अबला दुःखदानी । सो दुख अपने सिरपर आनी ॥
मांसरुधिर जिन जाको चाखा । परगल काटि आपसुख राखा ॥
औरकोशिरनहिनिजु शिरकाटा । अपनो तनकर बारह बाटा ॥
कोटिन यतन करे किन कोई । बदला अमिट छुटै नहीं सोई ॥
( १९३२ )
बोधसागर
२४
सत्यकबीर वचन-शब्द
अपनो कर्म न मेटो जाई ।
कर्मको लिखा मिटै घौँ कैसे जो युगकोटि सिराई ॥
गुरु वशिष्ठ सुनि लगन सोधाई सूर्य मंत्र यकदीना ।
जो सीता रघुनाथ विवाही पलयक संचन कीना ॥
तीन लोकका करता कहिये बालि बध्यौ बरि पाई ।
एक समय ऐसी बनि आई उनहू औसर याई ॥
नारदसुनिको बदन बिगान्यौ कीन्है कपिको रूप ।
शिशुपालकी भुजा उखारी आप भये हरि टूँटा ॥
पारवतीको बांझ न कहिये ईश न कही भिखारी ।
कहै कबीर करताकी बातें कर्मकि बात है न्यारी ॥
चौपाई
मेरो कर्म मोहि दुःख देता । जाने बिना भये वश प्रेता ॥
बदला भोगे आदि भवानी । बदला हरि हर अयशि आनी ॥
बदलाके कारन जिव झारी । भोगे दुःख भये संसारी ॥
दिल दुःखाव मति काहू कैंरो । सब तन अपने तन सम हेरो ॥
सबको दुःख सुख एक समाना । एकै रूप रूप सब जाना ॥
एकै रूप अनेक बरन है । एकै इन्द्री एकै तन है ॥
मनु सतरूपा वेदमें कहेऊ । सोई सकल रूप निजु गहेऊ ॥
चौरासी लख योनि उपानी । एकै अंग न और बखानी ॥
सबमें रमा सो अकथ अनूपा । सबको जानो मनु सतरूपा ॥
मनु सतरूपा आपै साहेब । देखि परे जगमें नाना ढब ॥
आदि पिता सबजग जिन हेरा । सो समदृष्टी सन्त बडेरा ॥
निर्वासनिक आदि ओंकारा । हिरनगर्भ वासना जो धारा ॥
भई वासना जगको कारन । दोय स्वरूप कीन तब धारन ॥
सुमिरनबोध एवं ग्रन्थ समाप्ति
२५
जीवधर्मबोध
( १९३३ )
हिरण्यगर्भ चित्ताह जो चाली । एक चना कीना द्वे दाली ॥
नारि पुरुष मिलि द्वन्द्व मचाया । ताते रचना राम रचाया ॥
स्वामी एक एक भे दासा । करे एक दूजाकी आसा ॥
वासना जब निवृत्त है जाई । स्वामी सेवक तब मिलिजाई ॥
जैसे प्रथम भयो द्वे ढंगा । तैसे दोनों होय करंगा ॥
सकल वासना लियौ बटोरी । द्वन्द्व खेल तब कतहु न हेरी ॥
मन इन्द्री कछु रहा न बाकी । निश दिन होय ब्रह्मकी झांकी ॥
जस प्रथमै रह अंडकि गोली । तस है बहुरि वचनको बोली ॥
तन मन इन्द्रीकी गम नाहीं । परम रूप रमि अलख कहाहीं ॥
लखै न कोई अलख गुरु देवा । जाने बिना करे सब सेवा ॥
जब जान्यौ तब सेवा नाहीं । मैं तू तह तब कछु न रहाहीं ॥
मोहिमें तूमें तोहि समाना । एक भयौ नहि दुतिया जाना ॥
सकल वासना मनते हरई । पारब्रह्म जब दाया करई ॥
ब्रह्मके खोजी साधो भाई । कैसे ब्रह्म की खोज बताई ॥
भजनानन्दी संत सुजाना । ब्रह्म सर्वमय पूरण जाना ॥
जाना तौ पै मिले न ताही । बिना मिले कछु सुख है नाहीं ॥
जैसे नारि पुरुष बर होई । एक दूसरो जाने सोई ॥
जानेते कछु सुख नहि सरसे । नारि पुरुष जबलों नहि परसे ॥
अरश परशते सुख सरसाना । तब मनहीमनमें सुखसमाना ॥
कहे कहा सो कहो न जाई । निज सखियनते सैन बुझाई ॥
सखीकि सैन सखी कोई बूझे । पियामिलनको सुखजेहि सूझे ॥
और कोई जो पूछे जाई । चुप है रहै तबै मुसकाई ॥
ब्रह्मको सुख जो कोई लहई । गूँगा होय न सो कछु कहई ॥
लून पूतली निज मनठाना । सागर थाह लेनको जाना ॥
जलमें पैठत जल है जाई । ताकी खबर कहै को आई ॥
( १९३४ )
बोधसागर
२६
कीट पतंगसे पूछे बाता । दीपक गिरे कौन सुख आता ॥
तेहि पतंग अस वचन सुनावो । तुमहि दीप ढिग चलि सुख पावो ॥
कीट तबहि दीपक नियराया । पुनि पतंग ढिग सो चलि आया ॥
आय पतंगसे वचन सुनाई । मैं कछु ज्योति स्वाद नहीं पाई ॥
तेहि पतंग बोला चिछाई । तैं किमि ज्योतिके सुखको पाई ॥
अरे मूढ संसारी कीडा । तोहि न व्यापी तन मन पीडा ॥
सुख पतंग आसिक सो जाना । दीपकमें जो धाय समाना ॥
तू तो फिरा देखिके आगी । जाने कहा मूढ दुरभागी ॥
शीश काटि निज करमें लीजै । ब्रह्मके सुखमें तब चित्त भीजै ॥
चले जक्त सब देखी देखा । सार असार करे को लेखा ॥
भेड़ा चाल सकल संसारा । नर पामरको यह व्यवहारा ॥
सबकोई कह यह मेरो धर्मा । मेरो गुरु कहा यह कर्मा ॥
सबते हमरो धर्म बडारा । सो बुधवंत जो करे विचारा ॥
चले अंधके पीछे अंधा । बिना विचार करे सोई धंधा ॥
यक शृगाल तेहि औसर बोला । ततछन तासुजाति सुह खोला ॥
वायस एक जो बोल उचारी । सबहि जातिगण तबहि पुकारी ॥
कीटके पीछे कीट जो चाला । तैसे जक्त धर्म प्रतिपाला ॥
यक धोबी यक गदहा राखा । सोढर नाम तासुको भाखा ॥
घाटके ऊपर धोबी गयऊ । ताहि ठौर सोढर मरिगयऊ ॥
ताते धोबीको दुःख होई । सोढर सोढर कहिके रोई ॥
घाटके ऊपर धोबिन आई । रुदन करत धोबीको पाई ॥
पुनि धोबिन निजघर फिर आई । सोढर कहिके रुदन कराई ॥
राजाकी रानी तेहि बेरी । धोबी गृह पठयो निज चेरी ॥
रुदन करत धोबिनिहि निहारा । सोढर सोढर करे पुकारा ॥
चेरी पुनि तहैंते फिरि आई । सोऊ रुदन करे बिलखाई ॥
२७
जीवधर्मबोध
(१९३५)
बांदी विलपत देखा रानी । रुदन बिलाप सोऊ तब ठानी ॥
राजा जब निज महलमें आया । रुदन करत रानीको पाया ॥
रानी रोवै सोढर कहि ताहा । सुनि सो रुदन रोवै नरनाहा ॥
राजा रुदनकरन जब लागा । नग्र नारि नर धीरज त्यागा ॥
सकल नग्रमें परा खँभारा । नृप मंत्री तब तहँ पग धारा ॥
मंत्री नृपते बचन उचारी । कारन कहा रुदन भो भारी ॥
तब नरनाथ बचन अस कहेऊ । दुखी सकल सोढर मरि गएऊ ॥
सोढर कौन सो मन्त्री बूझा । तब नृप कहौ मोहि नहिं सूझा ॥
रानी को मैं रोवत देखा । कीन्हौ मैं पुनि सोई लेखा ॥
रानीते जब पूछा जाई । सोढर कौन सो देहु बताई ॥
रानी कहे न जाने सोढर । मैं रोई बांदीके औढर ॥
जब पूछै बांदीसे जाई । सोढर कौन कहा बतलाई ॥
बूषली बोले मैं नहिं जानी । धोबिन देखि रुदन मैं ठानी ॥
धोबिन कह मोर धोबी रोई । सो लखि सोग मोहिको होई ॥
धोबीसे जब पूछा जाई । सोढर गढ़ा नाम बताई ॥
ऐसेही अंधा संसारा । देखा देखी कर्म पसारा ॥
जिनके हृदये माह बिचारा । सो नहिं लीकलीक पग धारा ॥
दोहा-लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत ॥
तीन लीकमें नहिं चले, सूरा सन्त सपूत ॥
चौपाई
जगमें कतहुँ न तुर्क न हिंदू । सकल देखिये नाद अरु बिंदू ॥
जेते नाद बिंदु मय बंदा । सबही कर्मके फंदमें फंदा ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसोई फल पावै सोई ॥
कर्म कुरूप स्वरूप सँवारा । कर्महि ऊँच नीच गति डारा ॥
कर्महि दुःखसुख जीव भोगावै । कर्महि सकल योनि भरमावै ॥
( १९३६ )
बोधसागर
२८
अष्ट कर्म विधि जैन बखाना । बहुरि मिमांसा कर्मप्रधाना ॥
सत्यकवीर कहै पुनि ऐसे । सब जिव कर्म फन्दमें पैसे ॥
सत्यकवीर वचन-कर्मखंडकी रमैनी
कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चंद सूर परकाशा ॥
कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महि ते भये गौरि गणेशा ॥
सात वार पंद्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥
कर्महि राम कृष्ण औतारा । कर्महि कंस रावन संसारा ॥
सार्वी-कवीर कर्म रख सागरबंध्यौ, सौ योजन मरजाद ॥
बिन अक्षर कोइ ना छुटै, सो अक्षर अगम अगाध ॥
रमैनी
सो सागर भवसागर धारा । नहिं कछु सूझै वार न पारा ॥
तहँवा बावन अक्षर लेखा । कर्मरेख सबहिन पर देखा ॥
कर्मरेख बांधा सब कोई । खानी बानी देख बिलोई ॥
वेद कतेव कर्मही गाया । कर्महिको निह कर्म बताया ॥
सतगुरु मिले तो भेद बतावे । कर्म अकर्ममध्य देखलावे ॥
कर्मरेख तहँवा लगि राखा । जहँलगि वेद व्यास कछु भाषा ॥
सार्वी-कवीर कर्मफांस छूटे नहीं, केतो करे उपाय ॥
सतगुरु मिले तो ऊबरे, नातो परलय जाय ॥
कवीर बहु बंधनते बांधिया, एक विचारा जीव ॥
जीव विचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी
सूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥
दुखिया होय रैन दिन रोवे । भोगी भोग करे सुख सोवे ॥
दुःख सुख भोग सोग समजाने । भली बुरी कछु मन नहिं आने ॥
भली बुरीको करे सो त्याग । निश्चै पावै पद वैराग ॥
२९
जीवधर्मबोध
(१९३७)
साखी-आसन साधे आपमें, आपा डारे खोय ।
कहैं कबीर सो योगी, सहजे निर्मल होय ॥
कुण्डलिया
मानुष है नहिं कोई सुवा, सुवा सो डंगर ढोर ।
चौरासी भर्मत फिरे, टूटै न कर्मकी डोर ॥
टूटै न कर्मकी डोर, भोर बुधि जहाँ तहैं भटके ।
लहे न ज्ञान अन्नप, रूप भवमें पुनि पटके ॥
पुनि पुनि पटके काल, कर्म बेरी पग भारी ।
वचन कह यक मृग चोट, जहां लख कोट शिकारी ॥
चौपाई
कृपा करे गुरु धनी दयाला । जीवहि खच लोक ले चाला ॥
ताकी कृपा योग जब होना । लगे मही तब कालको टोना ॥
कृपा योग जबलों नहिं लोई । कृपा कौनविधि तापर होई ॥
सत्यकबीर वचन
धर्मदास तोहि लाख दोहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ॥
सारशब्द बाहर जो परि है । बिचलै पीढी हंस नहिं तरि है ॥
युगन युगन तुम सेवा कीनी । ता पीछे हम इहां पगदीनी ॥
कोटिन जन्म भक्ति जब कीन्हा । सारशब्द तबही पै चीन्हा ॥
अंकुरी जिव होय जो कोई । सारशब्द अधिकारी सोई ॥
सत्यकबीर प्रमाण बखाना । ऐसो कठिन है पद निर्वाना ॥
पै दुतिये विधि कह्यो बहोरी । जापर सदगुरु कृपा न थोरी ॥
धर्मदास प्रति ऐसे कहेऊ । मांगु जो कछु तेरो चित चहेऊ ॥
धर्मदास तब वचन उचारा । तारो मोहि सहित परिवारा ॥
पिता पितामह सरखा समेता । सबहि पारकर कृपानिकेता ॥
( १९३८ )
बोधसागर
३०
तेहि अवसर सतगुरु विहसाना । का मांगे कछु मांग न जाना ॥
तारो सकल सृष्टिको भाई । तुम तो आप रहे अरुगाई ॥
यामें नहिं कछु दोष तुम्हारा । कालपुरुष तुमरी मति मारा ॥
ऐसो समरथ सत्य कबीरा । पलमें सब क्रम कागज चीरा ॥
कोटिन जन्म जो परा भुलेषा । करे जो कृपा चुकावै लेखा ॥
जहँ तहँ देख आप सदगुरु है । नहिं कहँ असुर नहीं कहँ सुर है ॥
असुर भाव जब सुरको आया । ता छन ताको असुर बनाया ॥
सुरते असुर असुर सुर होई । नारिते पुरुष पुरुष तिय सोई ॥
नीचते ऊंच ऊंचते नीचा । उत्तम मध्यम योनिमें खींचा ॥
ताते देखो दृष्टि पसारी । सकलधर्म प्रभु आप बिहारी ॥
मेरे मतसों सब धर्मनमें । खेले खेल सकल कर्मनमें ॥
जो कोइ चीन्है लाल बिहारी । दुबिधा सकल दूरकरि डारी ॥
सत्यकबीर वचन
राम रहीम करीमा केशव हरि हजरतहैं सोई ।
गहना एकै दृढ है गहना दुतिया और न कोई ॥
चौपाई
सब धर्मनमें आपै खेले । एक दूसरेसे नहिं मेले ॥
भर्मत सारी सृष्टि भुलानी । होय चहुँदिश ऐंचातानी ॥
झूठ सांच जब लेख सविवेका । झूठको तज गहु सत्तको टेका ॥
यह संसार सकल भ्रम छाही । भ्रमकरि सर्व सत्य दरशाही ॥
एक अनेक अनेक भो एका । ज्ञानते होय सो एक अनेका ॥
यथा कांचके मंदिर माहीं । कोटिन मणि मानिक रहजाहीं ॥
झाड़ फतूस अनेकन टांगा । तामें यक भ्रम दीपक जागा ॥
भ्रम दीपक जब तहां प्रकासा । कोटिन दीप मंदिरहि भाषा ॥
यक प्रतिबिम्ब अनेकन देखो । वार न पार लेख कह लेखो ॥
३१
जीवधर्मबोध
( १९३९ )
यक भ्रम दीप जो दियो बुझाई । सकलो भास नाश है जाई ॥
ऐसे एकते भयौ अनेका । बहुरि अनेक एकही एका ॥
यहि विधिसकलजक्त यहलागा । जस भ्रम दीप कांचगृह जागा ॥
ज्ञान उदयते रहै न कोई । यथा नखतगण जलमें जोई ॥
जल सूखे नहीं दरसै तारे । कोई नहीं देखजात किहि द्वारे ॥
ऐसेहि सकल जक्त यह थापा । सबमें शोभित आपै आपा ॥
ब्रह्म सब देसी लख ऐसे । यथास्फटिकमणि देखी तैसे ॥
यही स्फटिक मणिकेर सुभाऊ । जहँजसमतितसगति दरसाऊ ॥
जौन रंग तेहि सन्मुख आना । गहै स्फटिक मणि सोई बाना ॥
कर्मरंग जाट्टंग सघट्टा । देखफटिक मणिमें सोई ठट्टा ॥
राता पीता आदिक रंगा । होयस्फटिकमणि को सोई ढंगा ॥
सर्वांगी अस ब्रह्म बखाना । कर्म बनाव अनेक विधाना ॥
जहँ जसकर्म तहां तस भासू । सो निरलेप है स्वतह प्रकासू ॥
कर्मडोरि जबलों नहीं तोरे । अपनो रूप न पावै भोरे ॥
कर्मबंधते अलग जो होई । परम सोहावन उज्जल सोई ॥
कर्मसूतमें बंधा जो रहई । नाना रंग ढंग गुन गहई ॥
जेते धर्म जक्तके मांही । सबमें सोई ब्रह्म दरसाही ॥
जो दरसै सो सब भ्रम भासा । नहीं दरसै तेहि कौन प्रकाशा ॥
जो नहीं कहन सुननमें आवै । ताको कथा कौन कहि गावै ॥
मन बानीकी गम जहँ नाही । पुनि मनबानी किमि कहताही ॥
नैनते सकल जक्त दरसाई । पै निज रूप न सो लखिपाई ॥
देखे आंख सुने सब काना । रसना रसिक गंध गह ब्राना ॥
त्वचा स्पर्श तेहीको अहई । सबइंद्री निज निज कर्म गहई ॥
आंखिन रशनाको गुन जाना । स्वाद भेद नहीं सो पहिचाना ॥
कान न कबहु रूपको देखे । नाक न कबहु स्पर्शको लेखे ॥
( १९४० )
बोधसागर
३२
इंद्री निज निज कर्मही योगा । निजनिज भोग और नहिं भोगा ॥
सो इन्द्री जेहि ब्रह्म लखाही । कोई इन इन्द्रिनमें नाहीं ॥
जाते आत्मको पहिचाना । ताकी है कछु और ठेकाना ॥
मौन दशा ताते गह साधू । यह सब दीखै भर्म उपाधू ॥
विन जाने जो मौन गहाई । सो नहिं साधु मूर्ख कहलाई ॥
जो कछु कहो कहत नहिं बनई । जो चुप रहौ रहत नहिं बनई ॥
आपै आप खेल सब खेले । भर्म कूपमें मोहि कयों ठेले ॥
रसै बसै सब माह समावै । अर्श पै अपनौ तखत बतावै ॥
जो जाने सो कैसे कहई । नहिं जाने बहु बानी बहई ॥
सबही धर्म जक्तमें तेरो । कहो तो दोष देय सब मेरो ॥
सत्यकबीर वचन
काल दयाल हमै है भाई । छोड़ो दुबिधा काल पराई ॥
सबही धर्म ताहि सतगुरुके । चीन्हे बिनाकाल नहिं सुरके ॥
स्वसंवेदमें कहा बखानी । ताहि बूझि सुख पावै ज्ञानी ॥
काल पुरुष सतपुरुष समायौ । सत्य पुरुषकी देह जो पायौ ॥
सत्यपुरुष दीनों निज देही । कालपुरुष गहि लीनो येही ॥
विषयभोग सब कालकी अंगा । देखहु स्वसंवेद परसंगा ॥
विषयवासना जिहि जिवजागी । सबको धर्मराय है भागी ॥
निविकार अरु विनय विहीना । सकल वासना त्याग जोकीना ॥
सो समस्त सतपुरुष सनेही । सत्यपुरुष पुर पहुँचे येही ॥
इन्द्रीभोग विषय जो ध्यावै । धर्मरायके धाम समावै ॥
सदा रहै सो कालके फंदा । सो नहिं सत्यपुरुषको बंदा ॥
रस प्रीतिसे भक्ति जो करही । विषयविहायनाम निति रहही ॥
कालहिमें दयाल प्रकटाई । गहि करतासु लोक ले जाई ॥
सत्य पुरुषको भक्त कहावै । विषय विकार तेजो मनलावै ॥
३३
जीवधर्मबोध
( १९४१ )
प्रेमभक्ति जामें नहीं कोई । नहीं संतनकी सेवा होई ॥
सो सतपुरुषकि भक्तिसे गिरता । काल पुरुषके बंधन परता ॥
छंद—सत्यपुरुष जो निज बपुवरकह काल पुरुषको दीन्हेऊ ।
ताही पुरुषमें काल पुरुष कालमें तेहि चीन्हेऊ ॥
अंतरो बाहर दोऊ ठाहरमें निरखि भल लीन्हेऊ ॥
मोरे मते सतपुरुष सबही दूर दुविधा कीन्हेऊ ॥
चौपाई
जाहि धर्ममें जो जिव रहई । जब नखशिखसुकर्म सब गहई ॥
तब सांचा सतगुरु समुहै है । परम धर्मको मार्ग पैहै ॥
जबलों नहीं अति उत्तम करनी । परमपंथ तबलों नहीं धरनी ॥
हो यथा एक गोलाकारा । चहुँदिश ताके घेर सँवारा ॥
मध्यमें बिन्दु घेरके आही । घेरते बिन्दुको लीक जो जाही ॥
सो लकीर सब होहि बराबर । जौँ नहीं इंग बिझ्न मारगधर ॥
तेसे यह मृतलोक बखानो । सब धर्मनको थोक बखानो ॥
गोलाकार जान यह धरनी । ब्रह्मबिन्दु सतगुरुको वरनी ॥
लीक समान धर्म सब जगको । गह सब ब्रह्मबिन्दु मारगको ॥
जौ सुकर्म सब उत्तम होई । पहुँचे ब्रह्मबिन्दुको सोई ॥
टेढ़े टेढ़े चले जो कोई । ब्रह्मबिन्दु पहुँचे नहीं सोई ॥
इमि सब धर्मनके आचारी । टेढ़ चाल जब तज एक बारी ॥
ब्रह्मबिन्दुको तब सो पाई । ठाढ होहि तापर पुनि जाई ॥
सीधे खड़े होहि तेहि ऊपर । तब चहुँओर निहारेहि भूपर ॥
सब धर्मनकी दशा निहारी । केहि कर्मन अरुझे नरनारी ॥
ब्रह्मबिन्दुपर पहुँचे जो कोई । सीधे ठाढ न तापर होई ॥
शुद्ध रूप तेहि दृष्टि न आवै । फेरि फेरि भव भटका खावै ॥
बिन्दुपै सीधे खड़े भे आई । शुद्ध स्वरूप ताहि दरशाई ॥
( १९४२ )
बोधसागर
३४
शुद्ध स्वरूप जीव जब हेरी । करे न सो भवसागर फेरी ॥
गोलाकार स्वरूप बनावो । तामें सकल खेल दृशावो ॥
ब्रह्मविन्दु है आदि पुकारा । करखग आदिकसबधर्म पुकारा॥
निज निजमत जो आछे पाला । तौ सब ब्रह्मविन्दुको चाला ॥
टट्टा टेदे मारग जाहीं । ब्रह्मविन्दु पहुँचे सो नाहीं ॥
सस्सा विन्दुपे पहुँचे जाई । सीधे खड़े भये तहँ आई ॥
पूरन ज्ञानदृष्टि तिन पायौ । परम रूप रमि भवनहि आयौ॥
नन्नाहू लह विन्दु ठेकाना । ठाढ़ होनगति सो नहिं जाना॥
टेदे जायके ठाढ भयञ्ज । ताते शुद्ध स्वरूप न लहेञ्ज ॥
गोलाकार जो कथा बखानी । यह संसार सकल है पानी ॥
पानीमें जिव गोता मारा । बूड़ि जाय पुनि शीश निकारा॥
बूढे उछलै पार न पावै । लख चौरासी माह समावै ॥
जिमि शिशुमारचक यह फिरता । यकपलभरिनहिं ताको थिरता ॥
जो लग्नादिक चक्रमें आही । सबही ताके संग भ्रमाही ॥
भ्रमनकरे निशिदिन सब सोई । तिनको थिरता कबहुँ न होई ॥
ऐसहि गुरु संग सब चेले । भवसागरमें वाजी खेले ॥
उत्तर दक्षिणको जो छोरा । तहँ जो पहुँचहो थिर तेहिठौरा ॥
३५
जीवधर्मबोध
( १९४३ )
जो कोई पहुंचे तेहि खूटा । ध्रुव तारा सम भ्रमनते छूटा ॥
ज्ञानी पहुंचे कुतुबके किले । अटल होहि सो बहुरिन हिले ॥
सतगुरु किला जो ऐसे पैहै । बहुरि न सो भवमें भरमैहै ॥
यह दृष्टांत जो कोई बूझे । निश्चय परम पंथ तेहि सूझे ॥
सकल धर्मको एकै साई । सब पाले निज पुत्रकि नाई ॥
एक सोनार गढै सब गहना । जैसो कर्मरूप तस लहना ॥
सोन रूपको तार बनावै । गढ़िगुढ़ि ठोकि ठांकि सुधरावै ॥
ठोंकि ठांकि जब सीधा करई । यंत्रमें तबहि तारसों धरई ॥
खैंच तार धरि यंत्रके माही । इंग बिंग तब सब मिट जाही ॥
ऐसहि सर्व धर्म जग करो । टेढ बिंग व्यौहार जो हेरो ॥
धर्म कबीर धरहि जेहि बारी । खोट कर्म तब दूर पवारी ॥
तार समान सकल मत मंत्री । धर्मकबीर सोनारको यंत्री ॥
दोय प्रकार वासना अहई । भली बुरी जाको सब कहई ॥
दोनों भवसागरमें डारा । कहा करे यह जीव बेचारा ॥
अर्थ अरु धर्मकाम अरु मोखा । चारों त्यागे साधु सो चोखा ॥
चारते पार और जो होई । सतगुरु भेद बतावै सोई ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-तीरथ गयेते एक फल, संत मिले फल चार ।
सतगुरु मिले अनेकफल, कहै कबीर विचार ॥
चौपाई
कर्मको फल नर पावै कैसे । भोजन रस तन व्यापै जैसे ॥
जैसे भोजन जो को खाई । ताहीको गुन तामें आई ॥
आकशमात कर्म फल पावत । दुःखसुखसबजिवकोप्रकटावत ॥
जस बासना कर्म कर तैसा । तेहि अनुसार धर्म गह ऐसा ॥
सब निज निज वासना गहाई । ता तोषनकी करे उपाई ॥
( १९४४ )
बोधसागर
३६
नवी मलेशस्थानको यक रह । प्रभुप्रति विनतीकरि ऐसे कह ॥
हे प्रभु मोहि तियरति बलथोरा । यह बरदेव होय सो जोरा ॥
तेहि नम वानी कीन पुकारा । रति कारन कर मांसु अहारा ॥
मांसु खान लागा तब सोई । जान्यो प्रभुकी आज्ञा होई ॥
जस मनोरथ तैसी प्रभु आज्ञा । सत्य कहो करिके परितिज्ञा ॥
जस वासना जीव उर खोले । ताको यतन अकाशते बोले ॥
तथा फिरिशते स्वपना सुथरे । तस कलाम अछाको उतरे ॥
मिश्रसे जबहि यहूदी चाले । जब उजाड़में आय निराले ॥
मांसु खान कह प्रभु प्रतिटेरी । दियौ लगाय बटेरकी ढेरी ॥
खातहि खात मृत्यु तेहि डाला । कर्मको फल पायौ ततकाला ॥
जिन जिन मांसु खानको रोये । बचन एक प्रान सब खोये ॥
बीस वर्षके ऊपर जोई । सब मरि गयौ बचा नहिं कोई ॥
ज्ञान बिनाको प्रभु पहिचाना । ताको धर्म न कोई जाना ॥
जैसो धर्म धरे जो कोई । तैसी गति निश्चय लह सोई ॥
कोई स्वर्ग नर्कको भोगा । कोई अधर मृत्यु पुर लोगा ॥
जीव वासना प्रेरि लेआवै । ताही गतिमति स्थित करावै ॥
तीनों पुर पसरा यमजाला । कोइ बचै जेहि राख दयाला ॥
सत्यकबीर बचन
तीनों लोकमें लागी आग । कहैं कबीर कहैं जैहो भाग ॥
चौपाई
उभयवासनां ते जिव अटका । छूटै न आवा गौन को खटका ॥
कालहि रचै कालही पोषे । कालहि सब रचनाको सोषे ॥
कालको कृत कालही खैहै । कोई विरला गुरुगमबचजैहै ॥
कुंडलिया
निर्वाकार आतम सदा, वंधाकर्मकी डोर ।
मरकट नटके हाथ जिमि, फिरताखोरिन खोर ॥
३७
जीवधर्मयोग
( १९४५ )
फिरता खोरिन खोरि, कंठमें कर्म जझीरा ।
दर दर नाचत जाय, पाय तन मन बहु पीरा ॥
पीरा लह मतिमंद, होय नहीं बन्द खलासी ।
बंद दयाल जेहि काल, कालकी काटे फांसी ॥
कबीर खड़े बाजारमें, गल कट्टोंके पास ।
जो कोई करे सो भरेंगे, तुम क्यों भये उदास ॥
तुम क्यों भये उदास, भाष कर्महिको सारा ।
कर्मको रचित जहान, खान चहुँ कर्म सँवारा ॥
कर्म सँवारा दर्ब, सर्व जहाँलों जग दरसै ।
आतम तो निरलेप, एक सम सबमें सरसै ॥
हृदमें चल सो मानुवा, वेहह चले न कोय ।
हृद वेहहके बीचमें, रहौ कबीरा सोय ॥
रहौ कबीर सोय, कोय नहीं ताको परसै ।
परसै संत सुजान, ज्ञानके नैनन निरसै ॥
निरसै ज्ञानके नैन, परख पूरन सो पावै ।
जहाँ तहाँ दशै आप, ताप तिहुँ दूर बहावै ॥
हृदमें चलै सो मानुवा, बेहह चलै सो साध ।
हृद बेहह जो दोनों त्यागे, ताको मता अगाध ॥
ताको मता अगाध, आध अरु व्याध न लागे ।
कर्म जनित सब रोग, भोग भवमें नहीं पागे ॥
नहीं पागे भवभोग योग, जग नाता तोरे ।
टूटे न भजनको तार, प्रीति नामहिते जोरे ॥
हिंदू कही तो हौ नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।
पांच तत्त्वको पूतला, खेलै गैबी माहिं ॥
खेलै गैबी माह गैबको गैबी जाने ।