कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
उग्रगीता
( ३३ )
जल जीवन जलसाइ कहाई । मेरो रूप सुभाव रहाई ॥
ज्वारिन महाँ मैं जुवा कहावा । जुवा रूप मेरो रूप सुभावा ॥
जहाँ लगि जगमें होइ लराई । मेरो रूप लराई भाई ॥
जग परपंच जहां लग होई । परपंच रूपमें रहौं समोई ॥
वाद विवाद करै जो ज्ञानी । वाद रूप मोकहैं पहिचानी ॥
शंकर रूप मोर है भाई । मृत्युकालमें रहौं समाई ॥
पाप पुण्य धारौं दुइ देही । कर्म धर्म रचना है एही ॥
जग रचना विभूति मेरी होई । जल थलमें मैं रहौं समोई ॥
कहैं लगि वणौं वरणि बखानौं । सब वसुधामें मोहीं जानौं ॥
मोहिं छोड़ि कोइ और न दूजा । तीन लोकमें मेरी पूजा ॥
देवी देवता पूजा लावैं । सो सब पूजा मैं कहलावैं ॥
विभूति रूप अध्याय है दशवां । इह लगि भाव बतायउँ दशवां ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ चितलाई । धर्मदास तुम लेहु अथाईं ॥
तीनि लोक नायक भगवाना । तिन कह पुरुष दीन्ह रजधाना ॥
ताते क्रीडा करै अनंदा । खेल अनेक खेल गोविंदा ॥
तीनि लोक बाजी दइ राखा । परपंची अपने मुख भाखा ॥
सत्य कहइ सत्य भाव लखावै । करि प्रपंच जीवन भरमावै ॥
जीव जो मूल बीजके आही । इन पाया सब पुरुषके पाही ॥
बीज आदि तिहुलोक जो फूला । आपुहि जानै पुरुषहि तूला ॥
करि अभिमान पुरुष विसरावा । आपुहि पूरण पुरुष कहावा ॥
सर्वमें व्यापक आपुहि रहई । पुरुष भेद नहिं काहु सो कहई ॥
भेद कहैं उजरे पुर तीनो । आपन थापन ताते कीनो ॥
चारिहु वेद नेति जो गावैं । सदगुरु रहित पुरुष बतलावैं ॥
नं. ८ कबीरसागर - २
( ३४ )
बोधसागर
जीव जन्तु राखैँ अरुझाईं । बीज पुरुष जो दीन्हो भाई ॥
जब नहिं बीज पुरुषपहँ जाईं । तबै पुरुष हम कहँ उपजाईं ॥
बीज अंकुरी लोक ले आवौ । धर्मराजते हंस छुडावौ ॥
सेवा वसि वहि दीन्हा राजू । अब मेटी तौ सुकृतहि लाजू ॥
सुत हमार भया वरियारा । जेहि दीन्हों तिहुँलोकके भारा ॥
तुम अंकुरी सेवहु जाईं । बार २ मैं कहौं बुझाईं ॥
ताते मैं संसारहि आवा । पुरुष शब्द टारो नहिं जावा ॥
नाहिं तौ तीनौ लोकहि तारौं । धर्मराज ते सबै उबारौं ॥
जो जन अंश पुरुषके आही । सो सब आवै हमरे पाही ॥
अवर सकलजग काल बसेरा । नित २ प्रलय होत झकझेरा ॥
यहि कर काल पुरुष दियो नामा । तीन लोकते न्यारा धामा ॥
अध्याय एकादश आगे होई । काल सरूप बखानो सोई ॥
धर्मदास मन माहिं विचारो । काल रूप सब भाव निहारो ॥
जो तुम कहौ पुरुषकी आशा । सद्गुरु शब्द करौ विश्वासा ॥
छंद-हंस कारण पुरुष पठयो तबै बिनती मैं कहौं ।
धर्म है अति बली तिहुँपुर सोई दुतिया करि रहौं ॥
जाऊं भवसागरहि जो बहु भांति मोसों युधि करै ।
यह सुनि पुरुषसत्य शब्द दीन्हों धर्मराज जेहि ना डरै ॥
सोरठा-सुनतै शब्द संदेश, सुरति निरति हंसा गहो ।
पूरण पुरुष संदेश, बहुरि धरौ जग देह नहिं ॥
इति श्रीमदुग्रगोतात्रब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे
विभूतियोगव्याख्यानो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
उग्रमाता
( ३६ )
अथ एकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अर्जुन कृष्ण सो बिनती ठानी । हे स्वामी तुम अन्तर्यामी ॥
दश अध्याय तुम वरणि सुनायो। ज्ञान विज्ञान जो मोहि बतायो॥
सन्यासकर्म और वाक्य सुनायो। आतम संयम योग बातायो ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति जो मारग भाषा । कर्म योग मन हट करि राखा ॥
यह सब सुनिनिर्मल भयो अंगा । अब मोहि दर्शन भयो उमंगा ॥
होउ दयाल विराट देखावौ । मति मोकहैं तुम दूरि बहावौ ॥
जो मोहिं शक्ति न देखत होई । तौ अब शक्ति दीजिये सोई ॥
तुम ठाकुर हौ अंतर्यामी । अब दर्शन बिन रहौं न स्वामी॥
अहो दयाल कृपा-निधि-सारग । दीनबंधु तुम पतित-उजागर ॥
तब हरि बोले चतुर सुजाना । इन नैनन्ह नहीं दर्शन जाना ॥
तुम तौ हौ निज भक्त हमारे । दर्शन तुम कह देउ पियारे ॥
यह सरूप काहू नहीं देखा । इंद्रादिक सुर नर सुनि शेषा ॥
सो दर्शन तुम देखा चैहौ । तीनि लोक हलकंप बढैहौ ॥
देखौ कालरूप जब मोरा । अर्जुन तुम तब रहौं न ठौरा ॥
डरपो बहुत होइ डर भारी । डरपै लोग सकल संसारी ॥
कहैं अर्जुन सुनु कृष्ण सुरारी । प्रथम देहु हटता मोहि भारी ॥
जो मैं डरौं दरसको करई । विनु मारेही मृतक होइ रहई ॥
सोई दृष्टि मोहि देव गुसाईं । जेहि दरशे परसौं तुम पाईं ॥
दिव्य दृष्टि अर्जुन कहैं दीन्हा । अर्जुन है मम दरश अधीना ॥
धारो रूप अकाश पताला । महा स्वरूप भयंकर काला ॥
माथ अनेक अनेकन्ह नयना । कर्ण अनेक बहुत मुख बयना ॥
नाक अनेक रू दंत अनेका । चितवत दृष्टि मारि है वेगा ॥
निकसि दाढ़ बाहे मुख भारी । तिन देखत जिव नाहिं सँभारी॥
( ३६ )
बोधसागर
वदन अनेक भरे औ रीते । ऋषिसुनिवर तहाँ भये विपरीते॥
भुजधारी बहु बाहु विराजें । ऐसे कैसो दरशन राजें ॥
पाव पताल रहा जब जाई । शीश अकाश सातये भाई ॥
भूषण भांति २ के छाजें । मुकुट अनेक शीश पर राजें ॥
सूर्य चंद्रमा तहां रहाई । ऋषिसुनिवर तहाँ विनती लाई ॥
जहाँ लगि देवी देवता आहीं । सब देखो तिनके मुख माहीं ॥
अर्जुन देखि अचंभौ कीन्हा । अति डरि भये बहुत अधीना ॥
देवता ठाढ़े अस्तुति करहीं । भौ व्यापैं विलु मारे मरहीं ॥
किन्नर यक्ष गुणी सब ठाढ़े । कैंपैं सबैं देखिके गाढे ॥
राक्षस देखत भागे जाहीं । कोइ नेरे कोइ दूरि पराहीं ॥
कोइ जन अस्तुति करै मनुहारी । अब रक्षा प्रभु करौ हमारी ॥
कोइ एक जन दुरि परिहरहीं । कोइ जन निहुरी दंडवत करहीं॥
ऐसे स्फुट सकल जग देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥
औ मुख देखा बहुत भयावन । जानौ अब चाहत है खावन ॥
मुखमें तीन लोक जो देखा । तहवां रहे समाइ विशेषा ॥
जहाँ लगि साधु असाधु कहावै । सो सब ताके मुखमहँ आवै ॥
दुर्योधन देखा मुख माहीं । भीष्म द्रोणाचार्य जो आहीं ॥
योधा चले सबैं मुख माहीं । कौरौ पाण्डव उदर समाहीं ॥
कोस अड़तालिसकटक जोरहिया । सो सब मुखमें देखो तहिया॥
संसारी त्रैलोक पसारा । सो सब मुखके मध्य निहारा ॥
नदी आवै जस एकै धारा । सागर माहिं धसे सब खारा ॥
ऐसे जग सब उदर समावै । मुख माहीं सबही चलि आवै॥
जैसे जोत चांदना होई । जीव जन्तु सब लेइ समोई ॥
केतक डाढ़न माहीं अटके । केतक भागे फिरत जो भटके ॥
कोइ कतहुँ जाने नहीं पावै । बढ़ुरि २ मुख माहिं समावै ॥
उग्रगीता
( ३७ )
देखत अर्जुन बहुत डराये । मनमें धीरज नेक न आये ॥
विनय दंडवत करि बहु भाई । क्षमा करौ अब मोहिं यदुराई ॥
मोकहुँ सँभरन दे यदुराई । चित मेरो विभ्रम होइ आई ॥
तुम तौ पूरण पुरुष हो साई । रूप समेटो चित डेराई ॥
काल रूपते बहुत डेराऊँ । कृपा करो जिय मोर जुड़ाऊँ ॥
श्रीभगवानुवाच
कहैं कृष्ण अर्जुन सुनु वयना । डरपै जनि मूदो दोउ नयना ॥
तुम कारण यह भेष बनावा । और काहु देखो नहिं पावा ॥
तुम तौ क्षत्रिय बहुत पियारे । तुम कारण यह रूप सवॉरे ॥
अस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । इन कह मारौ बहु विधि भाई ॥
जो कोइ युद्ध करन कहैं आवै । राज धर्म तेहि मारि गिरावै ॥
इन सबको हम मारिजो राखो । सो सब देख्यो अपनी आंखों ॥
ए सब हमरे मुखके माहीं । तुम कहैं दूषण एकौ नाहीं ॥
तुम्हरे यश कह कारज कीन्हा । अब लगि राखा तुम्हरे लीन्हा ॥
आगे यही मृतक जो आहीं । तुम जग यश लेते कस नाहीं ॥
जगमें महा बाहु तुम होहु । अब तुम इन कहैं मारि विगोहु ॥
देखै युद्ध सकल संसारा । यश कीरति तब होइ उदारा ॥
अरजुन डरपत बिनती कीन्हा । तुम कर्ता मैं सदा अधीना ॥
अब लगि तुम कहैं मैं नहिं जाना । अब जो कहौ सोइ परमाना ॥
विनय करौ तुम सुनहु गोसाई । बहु अपराध भये मोहिं साई ॥
तुम संग सखा रूप हम डोलै । ऊँच नीच बोल जो बहु बोलै ॥
तुम तौ पिता सकल के होऊ । पालै मात पिता सुत सोऊ ॥
बालक लाख दोष जो करई । मनमें पिता रोष नहिं धरई ॥
तुम सो वैन कठिन मैं भाषा । सारथिकै अपने रथ राखा ॥
कछू चूक हमसे जो होई । सो अपराध क्षमा कर सोई ॥
( ३८ )
बोधसागर
रूप देखावहु श्याम सरूपा । वेगि छिपावहु काल सरूपा ॥
मेरो जीव न धीरज धरई । अबहीं जानौ भक्षण करई ॥
दया रूप अपनो दिखलावो । चित वित मेरो ठौर मिलावो ॥
ना तौ चित वित मेरो जाई । कैसहु धीरज मोहि न आई ॥
कालरूप तब लीन्ह सकेली । कृष्ण रूप धरि तब ही खेली ॥
शंख चक्र गदाधर जानी । मोर मुकुट पीताम्बर तानी ॥
विश्वरूप सम्पूर्ण भयञ्ज । अध्यायएकादश लगि कहञ्ज ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । कर कैसे यह काल तमाशा ॥
यह जग अन्धा उलटी रीती । अंधा मोल न फूटि मसीती ॥
अंधरे पंडित पढ़े पुराना । पढ़ि पढ़ि काहूँ भेद न जाना ॥
कृष्णजो निजमुख गीताभाषा । काल स्वरूप देखायउ आखा ॥
तबहुँ न मूरख कालहि चीन्हे । ज्ञान हीन है मतिके हीने ॥
ज्ञान अगम मैं बहुत पुकारा । सब झूठे मिलि कहै लबारा ॥
मूरख सांच झूठ नहि जाना । कैसे गुरु भेद पहिचाना ॥
भेद विना सो जन्म गवांवा । बार बार भग द्वारे आवा ॥
आवत जात महा दुख होई । जन्म बहुत धरि जाइ विगोई ॥
सतगुरु शब्द चीन्ह जो पावै । अजर अमर घर हंसा पावै ॥
धर्मदास सम हंस सुजाना । झूठो सत्य लेहु पहिचाना ॥
सांच झूठ में रहा छिपाई । चीन्हो ताहि गहौ चित लाई ॥
झूठे त्यागि सांच कह लागो । सत्य सुकृतमें तन मन पागो ॥
सत्यहिते जिव उत्तै पारा । सत्य शब्द जियको कड़हारा ॥
सत्य गहै सत्ये मुख भाखै । अभ्यन्तर सत्यहि गहि राखै ॥
सत्ये कर्म धर्म तुम करहु । कर्म भर्म दोऊ परिहरहु ॥
सत्य व्यवहार सत्य मुख बैना । सत्य है लेन सत्य है देना ॥
उग्रगीता
( ३९ )
सत्य सत्य तुम वर्तहु भाई । यह उपदेश हमारो आई ॥
यह संसार सत्य नहीं सूझे । सत्यहि बूझे झूट अरूझे ॥
जैसे नलिनी सुबना गहई । ऐसे वह जग फंदा रहई ॥
सत संगति ते उठिकै भागे । नाच पवारे मन अनुरागे ॥
विषय वासमें तन मन खोवै । उत्तम देही जानि विगोवै ॥
यह संसार कालकर फन्द। विन सतगुरु नहीं छूटे बंदा ॥
जब अक्षर निरअक्षर जाने । सतगुरु शब्द करै परवानै ॥
सार शब्द मैं आनि पुकारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥
छंद—वहो बहुविधि बूझि देखों धर्म दारुण काल हो ।
वेद पुराणमें सार गीता जस कहौ विकराल हो ॥
विश्व सब भोजन करै यह सर्व वसुधा पाल हो ।
दया जाके ताहि आवै सब जीव राखै हाल हो ॥
सोरठा—ज्योति सरूपी काल, सदा अखंडित लव वरै ।
कबहुँ न होय दयाल, जीवजंतु सब लै जरै ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कच्चीरधर्मदाससंवादे
विरहरूपन्यास्यानो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
कहैं अर्जुन सुनु अन्तर्यामी । पूर्ण पुरुष अगम तुम स्वामी ॥
ज्ञान सृष्टि भक्ति अधिकाई । निर्गुण सगुणमें को अधिकाई ॥
यह संशय उपजे जिव मोरा । कृपा करो तुम करौ निहोरा ॥
अर्जुन जो पूछेउ परभाऊ । सो अब प्रकट बखानौ दोऊ ॥
ज्ञानी अधिक करे जो ज्ञाना । निशि वासर रहै ज्ञान समाना ॥
भक्ति करे जो मन चित लाई । निस दिन सुमिरे हम कहैं भाई ॥
बहुत भांति कै सेवा लावै । प्रेम मम मेरो यश गावै ॥
( ४० )
बोधसागर
सुख संपत्ति सुत भवन न भावै । काम क्रोध मद लोभ बहावै ॥
ऐसा भक्त मेरा मन भावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥
ज्ञानते अधिक भक्ति है भाई । निसदिन मोमें रहा समाई ॥
निर्गुण सगुण है रूप हमारा । वह निरूप यह खेल पसारा ॥
निर्गुण ब्रह्म सकल घट माहीं । सगुन रूप हमारो आहीं ॥
बहुत साधु निर्गुण कह धावै । कर्म धर्म लै दूरि बहावै ॥
निर्गुण भक्ति बहुत अति भारी । कोइ कोइ विरले हैं व्रतधारी ॥
छौंठै इंद्री तन मनकर्मा । मनसा कबही जाइ न भर्मा ॥
पंच पचीसो को परमोघै । अभ्यन्तर आत्मको शोघै ॥
संकल्प विकल्प जब मनसे छूटै । काल कलेश नाता कहैं लूटै ॥
सदा नाम जो रहै लवलीना । सो साधू पुनि ब्रह्महि चीन्हा ॥
पारब्रह्म है अलख अपारा । हाथ पाउं नहि देह सँवारा ॥
क्षर अक्षर कबही नहि होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥
अलख रूप सदा अविनाशी । रहित चित अचित उदासी ॥
ऐसा ब्रह्म जो रहित अकेला । सो साधू है अविगति मेला ॥
ऐसे निर्गुण भक्त पियारे । तिन अपना निज कारज सारे ॥
ताते कठिन भक्ति यह भारी । सगुण भक्ति है मोहि पियारी ॥
शुचि संयम एकादशि करई । मन बच कर्म मोहि चित धरई ॥
अर्पणकै सब प्रभुके नामा । सुफल होइ सब पूरण कामा ॥
सदा सर्वदा मो कहैं ध्यावै । मोक्ष मुक्तिमाहीं फल पावै ॥
और सेवा सुमिरण जो करई । निशि दिन मोकहैं चर्चत रहई ॥
ध्यान धरै जो श्याम सरूपा । मोर मुकुट शिर बनो अनूपा ॥
पीत वसन बेजंती माला । कानन कुंडल नैन रसाला ॥
ऐसी भांति ध्यान जो करई । सो साधू भवसागर तरई ॥
ए अर्जुन मोहि सब विधि भावै । भक्ति करै मेरो यश गावै ॥
उग्रगीता
( ४१ )
हम तो प्रेम प्रीति के भूखे । साधु संत कबही नहीं दूखे ॥
हमरी आज्ञा साधु जो धावै । महा पदार्थ मोक्ष सो पावै ॥
जो तुम सो कछु भक्ति न होई । मानहु मोर कहा निजु सोई ॥
क्षत्री धर्म न छोडिय भाई । एहिंते तुम पुनि पहुँचो जाई ॥
धनुष बाण तुम लेहु उठाई । युद्ध करहु तुम अर्जुन जाई ॥
मनमें मोह कछु नहिं कीजै । कारण करतामें चित दीजै ॥
जो तुम युद्ध जीतिकै आवौ । पदवी अटल परम पद पावौ ॥
द्वादश अध्याय भक्ति जो भाई । कृष्ण बखाना यह अध्याई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर धर्मनि हितकारी । भक्ति कहेउ जो कृष्ण सुरारी ॥
निर्गुण भक्ति सत्य है आदी । सगुण भक्तिहु जन्म न वादी ॥
पै हम अगम बखानी ऐसी । करै विवेक विचारै तैसी ॥
निर्गुण सगुण दोउ उर झेला । बूझेगा कोइ संत सुहेला ॥
क्षर अक्षर माया है भाई । निरअक्षर सद्गुरु समुझाई ॥
ताकर भेद न काहू पाया । मूरख धरि २ जन्म गवाया ॥
सद्गुरु शरण जीव जो आवै । काल फांसते जिव मुक्तावै ॥
छन्द-निर्गुण सगुण दोउ छांडौ संधि सद्गुरु चित धरो ।
सार शब्द अपार अविगति क्षर अक्षर निर अक्षरो ॥
भेद बूझो अगम गमि करि कछु न संशौ घट रहो ।
सोई हंसा अमी पीवै पुरुष को दर्शन लहो ।
सोरठा-सोइ भक्ति निज सार, जेहिंते पुरुषहि परशिहो ॥
बहु विधि कहौं पुकारि, भक्ति हीन दरशै नहीं ।
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे भक्ति-
योगन्याख्यानो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
( ४२ )
बोधसागर
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
अर्जुन सों बोले गोपाला । निर्मल ज्ञान सुनौ यहि काला॥
माया ब्रह्म सदा संयोगा । माया संग जीव पुनि भोगा ॥
तीनिउ गुण मायाते भयङ्ग । रजगुण तमगुण सतगुण भयङ्ग॥
रजगुण ब्रह्मा सृष्टि पसारा । सतगुणपोषण विष्णु विचारा॥
तमोगुण रुद्र सँघारै सोई । तीनिउ पुत्र माया के होई ॥
पृथ्वी तेज वायु आकाशा । जलमिली पांचउ तत्त्व प्रकाशा॥
दश इंद्री कीन्हो बंधाना । कर्म पांच २ है ज्ञाना ॥
मनबुद्धि चित अहंकार जो कीन्हा । इच्छा दोइ यक धीरज चीन्हा
दुख सुख क्षेत्र जो कीन्हा माया । क्षेत्रज्ञ पुरुष अविगति समाया॥
क्षेत्र देह क्षेत्रज्ञ जिव होई । चेतन जीव अचेत समोई ॥
देह धरेते जिव दुख पावै । माया जड़ कछु शोक न आवै॥
आदि अनादि ब्रह्म औ माया । कारण सृष्टि धरे दुह भाया ॥
जैसे वृक्ष २ की छाया । वृक्ष विना छाया नहिं माया॥
ऐसे ब्रह्म सदा यक संगा । कारण सृष्टि रच्यो अर्थज्ञा ॥
अर्जुन व्यापक जीवहि जानो । अतो न न्यारो ब्रह्म पिछानो॥
जीवात्म माया भयो अंगा । परमात्म देखहु सब संगा ॥
पारब्रह्म सो लिप्त न होई । हाथ पांव इंद्री नहिं कोई ॥
सर्वेन्द्री जाके चहुँ ओरा । जहां तहां परकट सब ठौरा ॥
नैन चहुँ दिशि देखै सोई । कानन सर्व गुण सुने है जोई॥
मुख सकलौ जो खाय खवावै । पाव पवनते अधिक जो धावै॥
हाथ ऐसे जो रच संसारा । नासा सकल वास विस्तारा ॥
जो कहिये तौ सकलौ सोई । नाक होई तौ कछु न होई ॥
जाके कोई पुण्य न पापा । अलख रूप सो आपै आपा ॥
उग्रगीता
( ४२ )
ऐसे पारब्रह्म पहिचानौ । ताकी महिमा वेद बखानौ ॥
जो कोइ साधू साधन करई । इंद्री त्यागे गुण परिहरई ॥
काम क्रोध मद लोभ न आवै । तंतु प्रकृति लै दूरि बहावै ॥
माया रहित ब्रह्म है सोई । ताको आवागमन न होई ॥
माया लिप्त रहै संसारी । लोभ मोहमें भूले भारी ॥
कैसहु नहीं ब्रह्म कहैं बूझै । अंध नयन हृदये नहिं सूझै ॥
सुख संपत्ति हित चित्तसो गहई । ता परताप नर्क सो परई ॥
सुकर श्रान जन्म सो धरई । माया लीन सदा सो करई ॥
चौरासी कर्म जेहि गुण होई । निष्कर्महि जाने नहिं कोई ॥
आतम परमात्म नहिं जाने । पारब्रह्म मन कबहिं न आने ॥
रहत समीप सदा सुख सोई । न्यारा कबहीं नाहिं विछोई ॥
जैसे सूर्य जो रहै अकासा । ऐसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ है वासा ॥
कर्म लिप्त जिव नाम धराया । पारब्रह्म संयोग बनाया ॥
माया विना ब्रह्म जो होई । पारब्रह्म पुनि कहिये सोई ॥
आपुन आपा खोइ भुलाना । माया संग सदा सुख माना ॥
ता कारण भ्रम चौरासी । फिरि २ भवसागरके वासी ॥
ताते निर्गुण भक्ति न होई । सगुण भाव बतायो सोई ॥
कर्म करिय करि निर्मल होई । ऐसो तारो सब नर लोई ॥
मन वच कर्म मोहि चित्त राखै । मेरो ध्यान सदा अभिलाषै ॥
यहि प्रकार नर मोकहैं गावै । सुख संपत्ति धन लक्ष्मी आवै ॥
ब्रह्म यज्ञ त्रैदश अध्याई । क्षेत्र क्षेत्रज्ञहि वरणि सुनाई ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा भेद सो काल प्रकाशा ॥
कहिं २ निर्गुण सगुणे ल्यावै । पारब्रह्मते दूरि बहावै ॥
काह कहौ कहैलंगि गोहरावौ । अंधहि मारग कैसे पावौ ॥
( ४४ )
बोधसागर
दिवसहि लोक न सूझे भाई । सूर्य्यहि कैसे दूषण लाई ॥
ज्ञान अपार करउ परकाशा । जैसे सूरज जोति अकाशा ॥
चहुँदिशि जो उज्यारा आही । नैन विना अंधियारा ताही ॥
ज्ञान दृष्टि होई नहिं सूझे । सतगुरु मारग कैसे बूझे ॥
छन्द—ब्रह्म ज्ञान कहि २ सुनाव बहुरि आन कर्म सो ।
आपकोही स्थापि बहु विधि सब जीव राख भर्म सो॥
कर्म धर्महि भर्म त्यागै बूझि सतगुरु भेदको ।
अगम मारग वेदते जो बूझि वेद निषेद को ॥
सोरठा—ऐसो मतो अपार, वेद पार पावे नहीं ।
पुरुष शब्द नीनार, पुष्प बास जैसे रहे ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
क्षेत्रक्षेत्रज्ञनाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
बोले कृष्ण भक्त-हितकारी । अर्जुन सो अस वचन उचारी ॥
आगे बहुत ज्ञान समझाया । पै अब अगम करो तुम दाय्या ॥
जौन ज्ञान सुर नहिं पहिचानै । महिमा चारो वेद बखानै ॥
अब तुम हृदया धरउ छिपाई । ऐसों ज्ञान नहिं प्रकटै भाई ॥
प्रथम तत्त्व महि पुरुष सवारा । प्रकृति तत्त्व तेहिमें अनुसार ॥
कर्म बंध महि तत्त्वहि रहई । कर्म विधी बंधन सो कहई ॥
सब उत्पति महि तत्त्वते होई । प्रलय काल सब ताहि समोई ॥
आदि आनादिते महि चलिआई । काहू जाकी अन्त न पाई ॥
महि तत्त्व रूप ब्रह्मकी इच्छा । माया ब्रह्म समीप समीक्षा ॥
ताते तीनिउ गुण जो भयऊ । सतरज तमगुण उत्पन कियऊ ॥
ताके लक्षण करौ बखाना । तीनिउ व्यापक सकल जहाना ॥
उग्रगीता
( ४५ )
प्रथमै सतगुण सत्तै जानौ । शील लाज सन्तन हित मानौ ॥
प्रभुके सुमिरण रहै समाई । भक्ति भाव सन्तन सुख दाई ॥
शुचि संयम स्नान जो करई । जप तप दान पुण्य मन धरई ॥
निशिदिन चित रहै स्थिर भाई । सत्य संतोष जो सदा रहाई ॥
यह लक्षण सत्त्वगुण जो जाना । ताकी गति संक्षेप बखाना ॥
ऐसी भांति कांच जो होई । स्वर्ग लोक सुख मुक्तै सोई ॥
बहुत भाँति सो सदा अनन्दा । सत्त्वगुण विष्णुभाव गोविंदा ॥
रजोगुण ब्रह्मा भय उत्पानी । भूषण भोग सदा रुचि मानी ॥
बहुत भांति कै वस्तर भावै । घोडा हाथी रीझ बढ़ावै ॥
बहुत दामकै चाहै गाठी । बुद्धि फिरै भक्तन सो नाठी ॥
जहां तहां मैं मेरी बोले । सुख संपति कह धावा डोले ॥
सुखसंपति कछु काम न आवैं । हरिविन मूरख जन्म गवावैं ॥
यह लक्षण रजगुणके भाई । अन्तकाल मध्यम गति पाई ॥
तमोगुण रुद्र धरो जो देही । काम क्रोधके सदा सनेही ॥
निशिवासर रहै अहंलपटाना । आपन सम काहू नहि जाना ॥
क्रोधहि लिये करै सब कर्मा । भीतर रोख उपर तकै प्रेमा ॥
देवि देवता बहुत मनावैं । अन्त समय कोइ काम न आवैं ॥
आलस निद्रा वसै शरीरा । काहूकी नहि व्यापै पीरा ॥
तमोगुण लक्षण यह व्यवहारा । अन्त समय बहु करे पुकारा ॥
यमके दूत त्रास बड़ि देही । गति निकुष्टमें बासा लेही ॥
नर्क बासमें बासा लेई । योनि अघोर सदा भरमेई ॥
तीनों गुण बरतै सब अंगा । पलपल छिन छिन तीनों रंगा ॥
तीनों गुण रहै देह समाई । ता कारण भरमें सब भाई ॥
जिन साधुन गुण व्यापै नाहीं । सो तौ आवैं हमरे पाहीं ॥
तीनउ गुणते न्यारा खेले । ज्ञानेन्द्री लै मनहि सकेले ॥
ऐसा साधु मुक्ति गति पावै । आवागमनकी पीर मिटावै ॥
( ४६ )
बोधसागर
अर्जुन उवाच
कहै अर्जुन तुम सुनहु भुवारा । गुण तीनों कस होइ निनारा ॥
करनी रहनिते साधु सो रहई । कैसे इनते न्यारा कहई ॥
इन बिन कर्म कछु नहिं होई । कैसे कै निष्कर्मो सोई ॥
श्रीकृष्ण उवाच
कहैं कृष्ण पूछेउ तुम नीका । मेटौ संशय सकलौ जीका ॥
तीनों गुण हैं नर्ककी खानी । पै सत्त्व गुणते नर उत्पानी ॥
ताते सत्त्वगुण अधिक महातम । करै भक्ति चीन्है परमातम ॥
जो सत्त्व गुणमें बास करई । इच्छा फल मनमें नहिं धरई ॥
दुख सुख दोऊ एक समाना । भला बुरा कछु मनहिं न आना ॥
मित्र शत्रु कोइ दृष्टि न आवै । सुत औ अरि दोउ एक सुभावै ॥
पाप पुण्य की करै न आसा । निशिवासर हरिचरण निवासा ॥
रहै उदास सदा जग माहीं । शीत उष्ण व्यापै नहिं ताहीं ॥
आनंद रूप सरूप है जाहीं । जगके सुख दुख व्यापै नाहीं ॥
देहीको आपन नहिं जानै । ब्रह्म रूप न्यारा पहिचानै ॥
सुत दाराकी कौन चलावैं । जगके बन्धन सब मुक्तावै ॥
ऐसी रहनि जो साधू होई । व्यापक गतिको पावै सोई ॥
यह तौ ज्ञान अगम मैं कहिया । अर्जुन राखो मन चितगहिया ॥
चतुर्दशाध्याय कहेउ जो कृष्णा । त्रिगुण विभाग कहेउ संपूर्णा ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर सुनौ मम पासा । सत्य पुरुष चीन्हौ धर्मदासा ॥
जाते पुरुष प्रकृति जो भयऊ । माया ब्रह्म भाव दोउ ठयऊ ॥
महि तत्त्व कारण जग निर्माया । तीनिउ गुण पग तेहि भाया ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा । इनते जगत रच्यो सब सामा ॥
इनते पुनि अवतार अनेका । जन्म धरै युग युग फिरवैगा ॥
उग्रगीता
( ४७ )
ज्ञान सत्य यह कृष्ण सुनाया । पै फिरिकै आपा ठहराया ॥
आदि पुरुषते परे जो दूरी । कैसे पहुँचै लोक हजूरी ॥
यह तौ आपा कह ठहरावै । ब्रह्मज्ञान कहि कहि समुझावै ॥
जो नहिं थापे आपा भाई । कैसे चले तिहुँलोक बड़ाई ॥
राजनीति सब आप मिलावै । जाते देश न उजरन पावै ॥
पुरुष भेद जो पावइ लोई । तौ तीनिउ पुर ऊजर होई ॥
तेहि कारण तीनिउ गुण फंदा । जीव जंतु सब इनकू बंधा ॥
विष्णुरूप सत्त्वगुण जो कहिया । सत्त्वगुणसोकारजनहिलहिया ॥
अपने मुख जो कृष्ण सुनाया । तबहुँ न मूरख मोहि पतियाया ॥
अंकूरी जीव मोहि पतिआई । हंस होइ सत्य लोक सिधाई ॥
छंद-पुरुषते प्रकटो निरञ्जन बीज माया सँगदई ।
सेवा बसि तिहुँलोक पायउ करण कारण सो भई ॥
करै करावै मन जो भावै थापि आया आपको ।
पुरुष सो जिव रहे न्यारै लागि इनके आपको ॥
सोरठा-सुतु धर्मदास मुजान, सतगुरु विना न दर्शई ।
गहो शब्द निर्वाण, जेहिते पुरुष परसि हो ॥
इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे त्रिगुण-
विभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण उवाच
अर्जुन सो बोले अस बानी । कृष्ण सरूपी चतुर विज्ञानी ॥
त्रिगुणविभागयोग कहो ज्ञाना । अब पुरुषोत्तम योग बखाना ॥
वृक्ष भाव है यह संसारा । ऊर्ध्व मूल अध है तेहि डारा ॥
उलटा वृक्ष नीचे हैं शाखा । यह संसार वृक्ष सम भाषा ॥
पातहि पात तरु डारहि डारा । फल लगा विनु फूल रसाना ॥
( ४८ )
बोधसागर
अर्जुन उवाच
अर्जुन पूछहि सुनु भगवाना । वृक्षके वर्णन करौ बखाना ॥
कहैं कृष्ण सुनु कुंतिकुमारा । वृक्ष शरीर रच्यो व्यवहारा ॥
ऊपर मूल तर डार बताऊँ । शाख पत्र सब तोहि सुनाऊँ ॥
मूल वृक्ष है पुरुष अगोचर । शाखा ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥
संसारी यहि गुणते आवैं । बृन्दबृन्द फिरि २ उपजावैं ॥
साधु सन्तको आतम ज्ञानी । प्रभु पूरणकी गति पहिचानी ॥
आवागमन तिन्हैं जो नाही । रहै समीप पुरुषके पाहीं ॥
कहैं अर्जुन तुम वृक्ष बखाना । सो तौ आवागमन समाना ॥
साधुको आवागमन न होई । कैसे वृक्ष न जायैं सोई ॥
अब तुम सुनौ हौ चतुर सुजाना । निर्मल तोहि सुनावौ ज्ञाना ॥
निष्कामी इच्छा नहीं जाहीं । असंग अस्त्र ले काटै ताहीं ॥
असंग अस्त्र सब वृक्षहि काटा । जरा मरणको छूटौ घाटा ॥
सोइ साधू मन चलन न पावैं । बाहेर जाते भीतर ल्यावैं ॥
जैसे पुहूष बास है भाई । पवन सरूपी लेइ समाई ॥
ऐसे इन्द्री जिव है बासा । मन दौरे इंद्रिन के पास ॥
इन्द्री साथ महा सुख मानै । अंतकाल रहु तेहि पछितानै ॥
इन्द्रिय वश जो मन नहि होई । पूरण ब्रह्ममें रहै समोई ॥
मन इन्द्री सो रहै निनारा । सोई पावैं मुक्ति के द्वारा ॥
ऐसा साधू कोई माई । कोटिन मध्ये एक रहाई ॥
अर्जुन कहैं परमपद कैसा । कहै कृष्ण सुनु अर्जुन ऐसा ॥
कोटिन सूर्य एक सम होई । कोटिन चन्द्र पूरण है सोई ॥
तबौ न बूजौ ब्रह्म उजियारा । परब्रह्म है अपरं पारा ॥
अर्जुन कहैं सुनो प्रभु मेरे । मैं आधीना दास हौं तेरे ॥
उग्रगीता
( ४९ )
जब नर नींद करै सुख सोवे । सुषुप्ति लिये मगन सो होवे॥
और जब प्रलय होइ संसारा । रहै लीन सब ब्रह्म मझारा ॥
ए गतिभक्ति ते मुक्ति कहावे । पै काहेते आवै जावे ॥
सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । भेद न जा नर अज्ञानी ॥
संशय लीन मगन होइ सोवै । ताते फिर २ संशय होवै ॥
प्रलय घात जिव ब्रह्म समाई । मनोकामनाते फिरि आई ॥
जैसे कामना होवै लीना । तैसे कामना होवै बीना ॥
ताते आवागमन न छूटै । फिरि २ जन्म योनि धरि लूटै॥
जो चीन्है अभ्यन्तर आतम । चेतन रूप चिन्है परमातम ॥
सबके अंतर मैं ही व्यापौ । करण करावन मैं ही आपौ ॥
जैसे तिलमें तेल रहाई । जैसे काष्ठमें अग्नि रहाई ॥
अग्नि रूप हो अन्न पचावौ । सब जीवनके मध्य रहावौ ।
ऐसे व्यापक मैं अभ्यन्तर । चारिउ भोजन करौं निरन्तर ॥
चारिउ भोजन सुनो सुजाना । जो मुखमें सब आनि समाना॥
भक्षणमें एक भोजन भाई । डाढते चाभि २ सो खाई ॥
दूसर भोजन कहावै सोई । पहित भात जो भोजन होई ॥
तीसर भोजन जो नाम कहावै । डाढ दांत ताहि नहिं पावै ॥
सीरा सिरखन कठी कहावै । बिना दांतन रसना लै जावे ॥
चौथा भोजन नाम जो कहिया । दांत लगाय रस चूसे जहिया॥
यह सब भोजन मैं ही करऊँ । उदर सकलबिधि मैं ही भरऊँ॥
ब्रह्मरूप अविनाशी मोरा । पूर्ण अंश आहि यहि थोरा ॥
क्षर अक्षर दोउ ब्रह्म स्वरूपा । क्षर बिन रहै अक्षर अनूपा ॥
अक्षर पारब्रह्म सो आही । दुख सुख कछु व्यापै नहिं ताही॥
ब्रह्मो निशि दिन खोजत रहई । ताकर वार पार नहिं लहई ॥
जैन यती संन्यासी ढूँढै । बहुत मुडावै बहुते चूढै ॥
( ५० )
बोधसागर
ताकर वार पार नहीं पावै । खोजत २ जन्म गँवावै ॥
योगी जंगम और दरबेशा । बहु विधि रूप बनावै वेशा ॥
अक्षर गति कोइ पार न पावै । प्रभु पूरण सब माहँ रहावै ॥
जो सुमिरै प्रभु प्रेम लगावै । ताकह काल कबहुँ नहीं पावै ॥
ताको अवागमन नशाई । ना कहुँ आवे ना कहुँ जाई ॥
अर्जुन यह पुरुषोत्तम योगा । अध्याय पंचदश नाम संयोगा ॥
कबीर उवाच
कहै कबीर धर्मदास सुजाना । ब्रह्मज्ञान यह कृष्ण बखाना ॥
ब्रह्मज्ञान ऐसा है सोई । उग्र ज्ञान जाने नहीं कोई ॥
जिन जाना तिन ही पहिचाना । जैसे गूँगे सपना जाना ॥
गूंगा शैन जो गूंगा जानी । अभिअन्तर सो ले पहिचानी ॥
मैं तोहि प्रगटै कहौ बखानी । गुप्त शैन कोइ गूंगे जानी ॥
अगम अपार शब्द निर्धारा । बूझै आदि अन्त सुख सारा ॥
नहीं बोली भाषा महाँ आवै । नहीं रूप कछु वरणि सुनावै ॥
हाथ न पांव सुतिं नहीं जाके । कहौ कैसे कोउ पावै ताके ॥
दृष्टि अदृष्टि न देखन आवै । सतगुरु अवर न वरण लखावै ॥
छन्द-वरण अवरण भाव बूझौ क्षर अक्षरको भेद जो ।
क्षर विनशित अक्षर सुस्थित अथ कहे यह भेद जो ॥
अक्षर माहिं नि दरशाय गुरु भेद लखाइया ।
कोटि वेद पुराण वांचे सतगुरु भेद लखाइया ॥
सोरठा-अक्षर भेद है सार बहु विधि कहौ पुकारिकै ।
बूझै बूझनिहार, आदि पुरुष सुख शब्द है ॥
इति श्रीमदुग्रगीतब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे पुरुषो-
त्तमयोग व्याख्यानो नामपंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
उपगीता
( ५१ )
अथ षोडशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
सुनौ संत तुम कुंतिकुमारा । पुरुषोत्तम मैं कहेउं विचारा ॥
अब दुइ योग मैं कहेउँ बखानी । दैव आसुरी ताको मानी ॥
दैव योग जो साथै प्राणी । दैवकी शरण लेइ पहिचानी ॥
ताको लक्षण कहि समुझावौ । भिन्न भाव करि बरणि सुनावौ ॥
दैव योग संपदा को वर्णक । ताको पूजि होइ जो शर्णक ॥
प्रथम अभय निर्भय होइ रहई । काहूकी कछु शंक न करइ ॥
सत राखै अभ्यंतर अपने । झूठ न व्यापै कबहीं सपने ॥
ज्ञान योगते मन थिर राखै । दम शाम कै काया में राखै ॥
दान पुण्य मैं चित अभिलाषै । योग युक्ति मैं बहु विधि भाषै ॥
नित्त नेम पठै गुरु मंत्रा । ताते काया होइ पवित्रा ॥
अरि औ मित्र एक सम जानै । इच्छा काहूकी मनन्हि आनै ॥
होइ अकोध जो त्यागे हठको । शीतल रूप जो साथे घटको ॥
जुगली चाली दूरि बहावै । दया भाव चित माहि समावै ॥
लव लिप्सन होई जिय जाके । कोमल वचन रहै सुख ताके ॥
लोक लाज तजि साधु सुभावै । चपल बुद्धि कह दूरि बहावै ॥
तेज तजै सत्क्रियाकी आसा । क्षमावंत होइ रहेउ उदासा ॥
धीरज मनमें सदा समाई । शुचि संयम करि युक्ति रहाई ॥
होइ अद्रोह द्रोहन्हि आवै । सदा देव संपद मन भावै ॥
मन इच्छा पूजै सब कामा । देव कर्म ताकर है नामा ॥
आसुरी संपदाको वर्णन
अब आसुरी को करौ बखाना । हृदयमें नहीं ज्ञान समाना ॥
दंभ करी करि लोक देखावै । अंतर्गतन्हि ब्रह्म समावै ॥
द्रव्य देखि फूलै अधिकारी । निशिदिन लवलिप्साचितधारी ॥
( ५२ )
बोधसागर
करि अभिमान आपको जानै । और न दूसर चितमें आनै ॥
क्रोध सदा अभि अन्तर राखै । बहु कठोर कोमल नहिं भाखै॥
रहै अज्ञान ज्ञान नहिं भावै । जहां ज्ञान तहैं रोष उठावै ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति पुण्य औ पापा । कर्म धर्म करि थापैं आपा ॥
शौच किया मानै नहिं आवै । निराचारमें मन चित लावै ॥
जत्नके अस्त सदा सुख मानै । जग कर्ताको कबहि न मानै ॥
यह व्यवहार आसुरी आही । कबहु न सुमिरे प्रभु जो ताही॥
ऐसे जीव सदा दुख पावै । नरक वास में जाइ समावै ॥
नर्क द्वार तीन हैं भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥
तीन द्वार नर्कको वर्णन
प्रथम द्वार जो काम बनावा । काम द्वारलै चित्त लगावा ॥
कामविषय निशिदिन लपटाना । नर्क वासमें जाइ समाना ॥
दूसर द्वार क्रोध कहावै । जाके क्रोध सदा चित भावै ॥
ताते नर्कवास में जाई । उपजत विनशत बहु दुख पाई॥
तीसर द्वार लोभ है भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥
लोभ लागि जो जन्म गवाई । वासा नर्क सदा सो पावै ॥
नर्क द्वार यह तीन बखाना । मूरख इनमें रहै समाना ॥
दैव आसुरी संपद नामा । अध्याय षोडशो कहेउँ बखाना॥
कवीर उवाच
कहै कवीर सुनु संत विवेकी । दोउ संपदा कहेउँ विशेषी ॥
पाप पुण्य हैं दोऊ बेरी । एक लोहे एक कंचन केरी ॥
बेरी पाय एक दुख होई । कंचन ते सुख अधिक न सोई॥
यह संसार फंद यम केरा । कैसे छूटै यम उर झेरा ॥
कर्म करै कर्ता न कहावे । पाप पुण्य शिर भार लेयावे ॥
सत संतोष हियेमें धरई । सहज सरूपी भवजल तरई ॥