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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

उग्रगीता

( ३९ )

सत्य सत्य तुम वर्तहु भाई । यह उपदेश हमारो आई ॥
यह संसार सत्य नहीं सूझे । सत्यहि बूझे झूट अरूझे ॥
जैसे नलिनी सुबना गहई । ऐसे वह जग फंदा रहई ॥
सत संगति ते उठिकै भागे । नाच पवारे मन अनुरागे ॥
विषय वासमें तन मन खोवै । उत्तम देही जानि विगोवै ॥
यह संसार कालकर फन्द। विन सतगुरु नहीं छूटे बंदा ॥
जब अक्षर निरअक्षर जाने । सतगुरु शब्द करै परवानै ॥
सार शब्द मैं आनि पुकारा । जो बूझे सो उतरे पारा ॥

छंद—वहो बहुविधि बूझि देखों धर्म दारुण काल हो ।

वेद पुराणमें सार गीता जस कहौ विकराल हो ॥

विश्व सब भोजन करै यह सर्व वसुधा पाल हो ।

दया जाके ताहि आवै सब जीव राखै हाल हो ॥

सोरठा—ज्योति सरूपी काल, सदा अखंडित लव वरै ।

कबहुँ न होय दयाल, जीवजंतु सब लै जरै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कच्चीरधर्मदाससंवादे

विरहरूपन्यास्यानो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

कहैं अर्जुन सुनु अन्तर्यामी । पूर्ण पुरुष अगम तुम स्वामी ॥
ज्ञान सृष्टि भक्ति अधिकाई । निर्गुण सगुणमें को अधिकाई ॥
यह संशय उपजे जिव मोरा । कृपा करो तुम करौ निहोरा ॥
अर्जुन जो पूछेउ परभाऊ । सो अब प्रकट बखानौ दोऊ ॥
ज्ञानी अधिक करे जो ज्ञाना । निशि वासर रहै ज्ञान समाना ॥
भक्ति करे जो मन चित लाई । निस दिन सुमिरे हम कहैं भाई ॥
बहुत भांति कै सेवा लावै । प्रेम मम मेरो यश गावै ॥

( ४० )

बोधसागर

सुख संपत्ति सुत भवन न भावै । काम क्रोध मद लोभ बहावै ॥
ऐसा भक्त मेरा मन भावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥
ज्ञानते अधिक भक्ति है भाई । निसदिन मोमें रहा समाई ॥
निर्गुण सगुण है रूप हमारा । वह निरूप यह खेल पसारा ॥
निर्गुण ब्रह्म सकल घट माहीं । सगुन रूप हमारो आहीं ॥
बहुत साधु निर्गुण कह धावै । कर्म धर्म लै दूरि बहावै ॥
निर्गुण भक्ति बहुत अति भारी । कोइ कोइ विरले हैं व्रतधारी ॥
छौंठै इंद्री तन मनकर्मा । मनसा कबही जाइ न भर्मा ॥
पंच पचीसो को परमोघै । अभ्यन्तर आत्मको शोघै ॥
संकल्प विकल्प जब मनसे छूटै । काल कलेश नाता कहैं लूटै ॥
सदा नाम जो रहै लवलीना । सो साधू पुनि ब्रह्महि चीन्हा ॥
पारब्रह्म है अलख अपारा । हाथ पाउं नहि देह सँवारा ॥
क्षर अक्षर कबही नहि होई । पूरण ब्रह्म व्यापक है सोई ॥
अलख रूप सदा अविनाशी । रहित चित अचित उदासी ॥
ऐसा ब्रह्म जो रहित अकेला । सो साधू है अविगति मेला ॥
ऐसे निर्गुण भक्त पियारे । तिन अपना निज कारज सारे ॥
ताते कठिन भक्ति यह भारी । सगुण भक्ति है मोहि पियारी ॥
शुचि संयम एकादशि करई । मन बच कर्म मोहि चित धरई ॥
अर्पणकै सब प्रभुके नामा । सुफल होइ सब पूरण कामा ॥
सदा सर्वदा मो कहैं ध्यावै । मोक्ष मुक्तिमाहीं फल पावै ॥
और सेवा सुमिरण जो करई । निशि दिन मोकहैं चर्चत रहई ॥
ध्यान धरै जो श्याम सरूपा । मोर मुकुट शिर बनो अनूपा ॥
पीत वसन बेजंती माला । कानन कुंडल नैन रसाला ॥
ऐसी भांति ध्यान जो करई । सो साधू भवसागर तरई ॥
ए अर्जुन मोहि सब विधि भावै । भक्ति करै मेरो यश गावै ॥

उग्रगीता

( ४१ )

हम तो प्रेम प्रीति के भूखे । साधु संत कबही नहीं दूखे ॥
हमरी आज्ञा साधु जो धावै । महा पदार्थ मोक्ष सो पावै ॥
जो तुम सो कछु भक्ति न होई । मानहु मोर कहा निजु सोई ॥
क्षत्री धर्म न छोडिय भाई । एहिंते तुम पुनि पहुँचो जाई ॥
धनुष बाण तुम लेहु उठाई । युद्ध करहु तुम अर्जुन जाई ॥
मनमें मोह कछु नहिं कीजै । कारण करतामें चित दीजै ॥
जो तुम युद्ध जीतिकै आवौ । पदवी अटल परम पद पावौ ॥
द्वादश अध्याय भक्ति जो भाई । कृष्ण बखाना यह अध्याई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर धर्मनि हितकारी । भक्ति कहेउ जो कृष्ण सुरारी ॥
निर्गुण भक्ति सत्य है आदी । सगुण भक्तिहु जन्म न वादी ॥
पै हम अगम बखानी ऐसी । करै विवेक विचारै तैसी ॥
निर्गुण सगुण दोउ उर झेला । बूझेगा कोइ संत सुहेला ॥
क्षर अक्षर माया है भाई । निरअक्षर सद्गुरु समुझाई ॥
ताकर भेद न काहू पाया । मूरख धरि २ जन्म गवाया ॥
सद्गुरु शरण जीव जो आवै । काल फांसते जिव मुक्तावै ॥

छन्द-निर्गुण सगुण दोउ छांडौ संधि सद्गुरु चित धरो ।

सार शब्द अपार अविगति क्षर अक्षर निर अक्षरो ॥

भेद बूझो अगम गमि करि कछु न संशौ घट रहो ।

सोई हंसा अमी पीवै पुरुष को दर्शन लहो ।

सोरठा-सोइ भक्ति निज सार, जेहिंते पुरुषहि परशिहो ॥

बहु विधि कहौं पुकारि, भक्ति हीन दरशै नहीं ।

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे भक्ति-

योगन्याख्यानो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

( ४२ )

बोधसागर

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सों बोले गोपाला । निर्मल ज्ञान सुनौ यहि काला॥
माया ब्रह्म सदा संयोगा । माया संग जीव पुनि भोगा ॥
तीनिउ गुण मायाते भयङ्ग । रजगुण तमगुण सतगुण भयङ्ग॥
रजगुण ब्रह्मा सृष्टि पसारा । सतगुणपोषण विष्णु विचारा॥
तमोगुण रुद्र सँघारै सोई । तीनिउ पुत्र माया के होई ॥
पृथ्वी तेज वायु आकाशा । जलमिली पांचउ तत्त्व प्रकाशा॥
दश इंद्री कीन्हो बंधाना । कर्म पांच २ है ज्ञाना ॥
मनबुद्धि चित अहंकार जो कीन्हा । इच्छा दोइ यक धीरज चीन्हा
दुख सुख क्षेत्र जो कीन्हा माया । क्षेत्रज्ञ पुरुष अविगति समाया॥
क्षेत्र देह क्षेत्रज्ञ जिव होई । चेतन जीव अचेत समोई ॥
देह धरेते जिव दुख पावै । माया जड़ कछु शोक न आवै॥
आदि अनादि ब्रह्म औ माया । कारण सृष्टि धरे दुह भाया ॥
जैसे वृक्ष २ की छाया । वृक्ष विना छाया नहिं माया॥
ऐसे ब्रह्म सदा यक संगा । कारण सृष्टि रच्यो अर्थज्ञा ॥
अर्जुन व्यापक जीवहि जानो । अतो न न्यारो ब्रह्म पिछानो॥
जीवात्म माया भयो अंगा । परमात्म देखहु सब संगा ॥
पारब्रह्म सो लिप्त न होई । हाथ पांव इंद्री नहिं कोई ॥
सर्वेन्द्री जाके चहुँ ओरा । जहां तहां परकट सब ठौरा ॥
नैन चहुँ दिशि देखै सोई । कानन सर्व गुण सुने है जोई॥
मुख सकलौ जो खाय खवावै । पाव पवनते अधिक जो धावै॥
हाथ ऐसे जो रच संसारा । नासा सकल वास विस्तारा ॥
जो कहिये तौ सकलौ सोई । नाक होई तौ कछु न होई ॥
जाके कोई पुण्य न पापा । अलख रूप सो आपै आपा ॥

उग्रगीता

( ४२ )

ऐसे पारब्रह्म पहिचानौ । ताकी महिमा वेद बखानौ ॥
जो कोइ साधू साधन करई । इंद्री त्यागे गुण परिहरई ॥
काम क्रोध मद लोभ न आवै । तंतु प्रकृति लै दूरि बहावै ॥
माया रहित ब्रह्म है सोई । ताको आवागमन न होई ॥
माया लिप्त रहै संसारी । लोभ मोहमें भूले भारी ॥
कैसहु नहीं ब्रह्म कहैं बूझै । अंध नयन हृदये नहिं सूझै ॥
सुख संपत्ति हित चित्तसो गहई । ता परताप नर्क सो परई ॥
सुकर श्रान जन्म सो धरई । माया लीन सदा सो करई ॥
चौरासी कर्म जेहि गुण होई । निष्कर्महि जाने नहिं कोई ॥
आतम परमात्म नहिं जाने । पारब्रह्म मन कबहिं न आने ॥
रहत समीप सदा सुख सोई । न्यारा कबहीं नाहिं विछोई ॥
जैसे सूर्य जो रहै अकासा । ऐसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ है वासा ॥
कर्म लिप्त जिव नाम धराया । पारब्रह्म संयोग बनाया ॥
माया विना ब्रह्म जो होई । पारब्रह्म पुनि कहिये सोई ॥
आपुन आपा खोइ भुलाना । माया संग सदा सुख माना ॥
ता कारण भ्रम चौरासी । फिरि २ भवसागरके वासी ॥
ताते निर्गुण भक्ति न होई । सगुण भाव बतायो सोई ॥
कर्म करिय करि निर्मल होई । ऐसो तारो सब नर लोई ॥
मन वच कर्म मोहि चित्त राखै । मेरो ध्यान सदा अभिलाषै ॥
यहि प्रकार नर मोकहैं गावै । सुख संपत्ति धन लक्ष्मी आवै ॥
ब्रह्म यज्ञ त्रैदश अध्याई । क्षेत्र क्षेत्रज्ञहि वरणि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा भेद सो काल प्रकाशा ॥
कहिं २ निर्गुण सगुणे ल्यावै । पारब्रह्मते दूरि बहावै ॥
काह कहौ कहैलंगि गोहरावौ । अंधहि मारग कैसे पावौ ॥

( ४४ )

बोधसागर

दिवसहि लोक न सूझे भाई । सूर्य्यहि कैसे दूषण लाई ॥
ज्ञान अपार करउ परकाशा । जैसे सूरज जोति अकाशा ॥
चहुँदिशि जो उज्यारा आही । नैन विना अंधियारा ताही ॥
ज्ञान दृष्टि होई नहिं सूझे । सतगुरु मारग कैसे बूझे ॥

छन्द—ब्रह्म ज्ञान कहि २ सुनाव बहुरि आन कर्म सो ।
आपकोही स्थापि बहु विधि सब जीव राख भर्म सो॥
कर्म धर्महि भर्म त्यागै बूझि सतगुरु भेदको ।
अगम मारग वेदते जो बूझि वेद निषेद को ॥

सोरठा—ऐसो मतो अपार, वेद पार पावे नहीं ।
पुरुष शब्द नीनार, पुष्प बास जैसे रहे ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे
क्षेत्रक्षेत्रज्ञनाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

बोले कृष्ण भक्त-हितकारी । अर्जुन सो अस वचन उचारी ॥
आगे बहुत ज्ञान समझाया । पै अब अगम करो तुम दाय्या ॥
जौन ज्ञान सुर नहिं पहिचानै । महिमा चारो वेद बखानै ॥
अब तुम हृदया धरउ छिपाई । ऐसों ज्ञान नहिं प्रकटै भाई ॥
प्रथम तत्त्व महि पुरुष सवारा । प्रकृति तत्त्व तेहिमें अनुसार ॥
कर्म बंध महि तत्त्वहि रहई । कर्म विधी बंधन सो कहई ॥
सब उत्पति महि तत्त्वते होई । प्रलय काल सब ताहि समोई ॥
आदि आनादिते महि चलिआई । काहू जाकी अन्त न पाई ॥
महि तत्त्व रूप ब्रह्मकी इच्छा । माया ब्रह्म समीप समीक्षा ॥
ताते तीनिउ गुण जो भयऊ । सतरज तमगुण उत्पन कियऊ ॥
ताके लक्षण करौ बखाना । तीनिउ व्यापक सकल जहाना ॥

उग्रगीता

( ४५ )

प्रथमै सतगुण सत्तै जानौ । शील लाज सन्तन हित मानौ ॥
प्रभुके सुमिरण रहै समाई । भक्ति भाव सन्तन सुख दाई ॥
शुचि संयम स्नान जो करई । जप तप दान पुण्य मन धरई ॥
निशिदिन चित रहै स्थिर भाई । सत्य संतोष जो सदा रहाई ॥
यह लक्षण सत्त्वगुण जो जाना । ताकी गति संक्षेप बखाना ॥
ऐसी भांति कांच जो होई । स्वर्ग लोक सुख मुक्तै सोई ॥
बहुत भाँति सो सदा अनन्दा । सत्त्वगुण विष्णुभाव गोविंदा ॥
रजोगुण ब्रह्मा भय उत्पानी । भूषण भोग सदा रुचि मानी ॥
बहुत भांति कै वस्तर भावै । घोडा हाथी रीझ बढ़ावै ॥
बहुत दामकै चाहै गाठी । बुद्धि फिरै भक्तन सो नाठी ॥
जहां तहां मैं मेरी बोले । सुख संपति कह धावा डोले ॥
सुखसंपति कछु काम न आवैं । हरिविन मूरख जन्म गवावैं ॥
यह लक्षण रजगुणके भाई । अन्तकाल मध्यम गति पाई ॥
तमोगुण रुद्र धरो जो देही । काम क्रोधके सदा सनेही ॥
निशिवासर रहै अहंलपटाना । आपन सम काहू नहि जाना ॥
क्रोधहि लिये करै सब कर्मा । भीतर रोख उपर तकै प्रेमा ॥
देवि देवता बहुत मनावैं । अन्त समय कोइ काम न आवैं ॥
आलस निद्रा वसै शरीरा । काहूकी नहि व्यापै पीरा ॥
तमोगुण लक्षण यह व्यवहारा । अन्त समय बहु करे पुकारा ॥
यमके दूत त्रास बड़ि देही । गति निकुष्टमें बासा लेही ॥
नर्क बासमें बासा लेई । योनि अघोर सदा भरमेई ॥
तीनों गुण बरतै सब अंगा । पलपल छिन छिन तीनों रंगा ॥
तीनों गुण रहै देह समाई । ता कारण भरमें सब भाई ॥
जिन साधुन गुण व्यापै नाहीं । सो तौ आवैं हमरे पाहीं ॥
तीनउ गुणते न्यारा खेले । ज्ञानेन्द्री लै मनहि सकेले ॥
ऐसा साधु मुक्ति गति पावै । आवागमनकी पीर मिटावै ॥

( ४६ )

बोधसागर

अर्जुन उवाच

कहै अर्जुन तुम सुनहु भुवारा । गुण तीनों कस होइ निनारा ॥
करनी रहनिते साधु सो रहई । कैसे इनते न्यारा कहई ॥
इन बिन कर्म कछु नहिं होई । कैसे कै निष्कर्मो सोई ॥

श्रीकृष्ण उवाच

कहैं कृष्ण पूछेउ तुम नीका । मेटौ संशय सकलौ जीका ॥
तीनों गुण हैं नर्ककी खानी । पै सत्त्व गुणते नर उत्पानी ॥
ताते सत्त्वगुण अधिक महातम । करै भक्ति चीन्है परमातम ॥
जो सत्त्व गुणमें बास करई । इच्छा फल मनमें नहिं धरई ॥
दुख सुख दोऊ एक समाना । भला बुरा कछु मनहिं न आना ॥
मित्र शत्रु कोइ दृष्टि न आवै । सुत औ अरि दोउ एक सुभावै ॥
पाप पुण्य की करै न आसा । निशिवासर हरिचरण निवासा ॥
रहै उदास सदा जग माहीं । शीत उष्ण व्यापै नहिं ताहीं ॥
आनंद रूप सरूप है जाहीं । जगके सुख दुख व्यापै नाहीं ॥
देहीको आपन नहिं जानै । ब्रह्म रूप न्यारा पहिचानै ॥
सुत दाराकी कौन चलावैं । जगके बन्धन सब मुक्तावै ॥
ऐसी रहनि जो साधू होई । व्यापक गतिको पावै सोई ॥
यह तौ ज्ञान अगम मैं कहिया । अर्जुन राखो मन चितगहिया ॥
चतुर्दशाध्याय कहेउ जो कृष्णा । त्रिगुण विभाग कहेउ संपूर्णा ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनौ मम पासा । सत्य पुरुष चीन्हौ धर्मदासा ॥
जाते पुरुष प्रकृति जो भयऊ । माया ब्रह्म भाव दोउ ठयऊ ॥
महि तत्त्व कारण जग निर्माया । तीनिउ गुण पग तेहि भाया ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा । इनते जगत रच्यो सब सामा ॥
इनते पुनि अवतार अनेका । जन्म धरै युग युग फिरवैगा ॥

उग्रगीता

( ४७ )

ज्ञान सत्य यह कृष्ण सुनाया । पै फिरिकै आपा ठहराया ॥
आदि पुरुषते परे जो दूरी । कैसे पहुँचै लोक हजूरी ॥
यह तौ आपा कह ठहरावै । ब्रह्मज्ञान कहि कहि समुझावै ॥
जो नहिं थापे आपा भाई । कैसे चले तिहुँलोक बड़ाई ॥
राजनीति सब आप मिलावै । जाते देश न उजरन पावै ॥
पुरुष भेद जो पावइ लोई । तौ तीनिउ पुर ऊजर होई ॥
तेहि कारण तीनिउ गुण फंदा । जीव जंतु सब इनकू बंधा ॥
विष्णुरूप सत्त्वगुण जो कहिया । सत्त्वगुणसोकारजनहिलहिया ॥
अपने मुख जो कृष्ण सुनाया । तबहुँ न मूरख मोहि पतियाया ॥
अंकूरी जीव मोहि पतिआई । हंस होइ सत्य लोक सिधाई ॥

छंद-पुरुषते प्रकटो निरञ्जन बीज माया सँगदई ।

सेवा बसि तिहुँलोक पायउ करण कारण सो भई ॥

करै करावै मन जो भावै थापि आया आपको ।

पुरुष सो जिव रहे न्यारै लागि इनके आपको ॥

सोरठा-सुतु धर्मदास मुजान, सतगुरु विना न दर्शई ।

गहो शब्द निर्वाण, जेहिते पुरुष परसि हो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे त्रिगुण-

विभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन सो बोले अस बानी । कृष्ण सरूपी चतुर विज्ञानी ॥

त्रिगुणविभागयोग कहो ज्ञाना । अब पुरुषोत्तम योग बखाना ॥

वृक्ष भाव है यह संसारा । ऊर्ध्व मूल अध है तेहि डारा ॥

उलटा वृक्ष नीचे हैं शाखा । यह संसार वृक्ष सम भाषा ॥

पातहि पात तरु डारहि डारा । फल लगा विनु फूल रसाना ॥

( ४८ )

बोधसागर

अर्जुन उवाच

अर्जुन पूछहि सुनु भगवाना । वृक्षके वर्णन करौ बखाना ॥
कहैं कृष्ण सुनु कुंतिकुमारा । वृक्ष शरीर रच्यो व्यवहारा ॥
ऊपर मूल तर डार बताऊँ । शाख पत्र सब तोहि सुनाऊँ ॥
मूल वृक्ष है पुरुष अगोचर । शाखा ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥
संसारी यहि गुणते आवैं । बृन्दबृन्द फिरि २ उपजावैं ॥
साधु सन्तको आतम ज्ञानी । प्रभु पूरणकी गति पहिचानी ॥
आवागमन तिन्हैं जो नाही । रहै समीप पुरुषके पाहीं ॥
कहैं अर्जुन तुम वृक्ष बखाना । सो तौ आवागमन समाना ॥
साधुको आवागमन न होई । कैसे वृक्ष न जायैं सोई ॥
अब तुम सुनौ हौ चतुर सुजाना । निर्मल तोहि सुनावौ ज्ञाना ॥
निष्कामी इच्छा नहीं जाहीं । असंग अस्त्र ले काटै ताहीं ॥
असंग अस्त्र सब वृक्षहि काटा । जरा मरणको छूटौ घाटा ॥
सोइ साधू मन चलन न पावैं । बाहेर जाते भीतर ल्यावैं ॥
जैसे पुहूष बास है भाई । पवन सरूपी लेइ समाई ॥
ऐसे इन्द्री जिव है बासा । मन दौरे इंद्रिन के पास ॥
इन्द्री साथ महा सुख मानै । अंतकाल रहु तेहि पछितानै ॥
इन्द्रिय वश जो मन नहि होई । पूरण ब्रह्ममें रहै समोई ॥
मन इन्द्री सो रहै निनारा । सोई पावैं मुक्ति के द्वारा ॥
ऐसा साधू कोई माई । कोटिन मध्ये एक रहाई ॥
अर्जुन कहैं परमपद कैसा । कहै कृष्ण सुनु अर्जुन ऐसा ॥
कोटिन सूर्य एक सम होई । कोटिन चन्द्र पूरण है सोई ॥
तबौ न बूजौ ब्रह्म उजियारा । परब्रह्म है अपरं पारा ॥
अर्जुन कहैं सुनो प्रभु मेरे । मैं आधीना दास हौं तेरे ॥

उग्रगीता

( ४९ )

जब नर नींद करै सुख सोवे । सुषुप्ति लिये मगन सो होवे॥
और जब प्रलय होइ संसारा । रहै लीन सब ब्रह्म मझारा ॥
ए गतिभक्ति ते मुक्ति कहावे । पै काहेते आवै जावे ॥
सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । भेद न जा नर अज्ञानी ॥
संशय लीन मगन होइ सोवै । ताते फिर २ संशय होवै ॥
प्रलय घात जिव ब्रह्म समाई । मनोकामनाते फिरि आई ॥
जैसे कामना होवै लीना । तैसे कामना होवै बीना ॥
ताते आवागमन न छूटै । फिरि २ जन्म योनि धरि लूटै॥
जो चीन्है अभ्यन्तर आतम । चेतन रूप चिन्है परमातम ॥
सबके अंतर मैं ही व्यापौ । करण करावन मैं ही आपौ ॥
जैसे तिलमें तेल रहाई । जैसे काष्ठमें अग्नि रहाई ॥
अग्नि रूप हो अन्न पचावौ । सब जीवनके मध्य रहावौ ।
ऐसे व्यापक मैं अभ्यन्तर । चारिउ भोजन करौं निरन्तर ॥
चारिउ भोजन सुनो सुजाना । जो मुखमें सब आनि समाना॥
भक्षणमें एक भोजन भाई । डाढते चाभि २ सो खाई ॥
दूसर भोजन कहावै सोई । पहित भात जो भोजन होई ॥
तीसर भोजन जो नाम कहावै । डाढ दांत ताहि नहिं पावै ॥
सीरा सिरखन कठी कहावै । बिना दांतन रसना लै जावे ॥
चौथा भोजन नाम जो कहिया । दांत लगाय रस चूसे जहिया॥
यह सब भोजन मैं ही करऊँ । उदर सकलबिधि मैं ही भरऊँ॥
ब्रह्मरूप अविनाशी मोरा । पूर्ण अंश आहि यहि थोरा ॥
क्षर अक्षर दोउ ब्रह्म स्वरूपा । क्षर बिन रहै अक्षर अनूपा ॥
अक्षर पारब्रह्म सो आही । दुख सुख कछु व्यापै नहिं ताही॥
ब्रह्मो निशि दिन खोजत रहई । ताकर वार पार नहिं लहई ॥
जैन यती संन्यासी ढूँढै । बहुत मुडावै बहुते चूढै ॥

( ५० )

बोधसागर

ताकर वार पार नहीं पावै । खोजत २ जन्म गँवावै ॥
योगी जंगम और दरबेशा । बहु विधि रूप बनावै वेशा ॥
अक्षर गति कोइ पार न पावै । प्रभु पूरण सब माहँ रहावै ॥
जो सुमिरै प्रभु प्रेम लगावै । ताकह काल कबहुँ नहीं पावै ॥
ताको अवागमन नशाई । ना कहुँ आवे ना कहुँ जाई ॥
अर्जुन यह पुरुषोत्तम योगा । अध्याय पंचदश नाम संयोगा ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर धर्मदास सुजाना । ब्रह्मज्ञान यह कृष्ण बखाना ॥
ब्रह्मज्ञान ऐसा है सोई । उग्र ज्ञान जाने नहीं कोई ॥
जिन जाना तिन ही पहिचाना । जैसे गूँगे सपना जाना ॥
गूंगा शैन जो गूंगा जानी । अभिअन्तर सो ले पहिचानी ॥
मैं तोहि प्रगटै कहौ बखानी । गुप्त शैन कोइ गूंगे जानी ॥
अगम अपार शब्द निर्धारा । बूझै आदि अन्त सुख सारा ॥
नहीं बोली भाषा महाँ आवै । नहीं रूप कछु वरणि सुनावै ॥
हाथ न पांव सुतिं नहीं जाके । कहौ कैसे कोउ पावै ताके ॥
दृष्टि अदृष्टि न देखन आवै । सतगुरु अवर न वरण लखावै ॥

छन्द-वरण अवरण भाव बूझौ क्षर अक्षरको भेद जो ।

क्षर विनशित अक्षर सुस्थित अथ कहे यह भेद जो ॥

अक्षर माहिं नि दरशाय गुरु भेद लखाइया ।

कोटि वेद पुराण वांचे सतगुरु भेद लखाइया ॥

सोरठा-अक्षर भेद है सार बहु विधि कहौ पुकारिकै ।

बूझै बूझनिहार, आदि पुरुष सुख शब्द है ॥

इति श्रीमदुग्रगीतब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे पुरुषो-

त्तमयोग व्याख्यानो नामपंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

उपगीता

( ५१ )

अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

सुनौ संत तुम कुंतिकुमारा । पुरुषोत्तम मैं कहेउं विचारा ॥
अब दुइ योग मैं कहेउँ बखानी । दैव आसुरी ताको मानी ॥
दैव योग जो साथै प्राणी । दैवकी शरण लेइ पहिचानी ॥
ताको लक्षण कहि समुझावौ । भिन्न भाव करि बरणि सुनावौ ॥
दैव योग संपदा को वर्णक । ताको पूजि होइ जो शर्णक ॥
प्रथम अभय निर्भय होइ रहई । काहूकी कछु शंक न करइ ॥
सत राखै अभ्यंतर अपने । झूठ न व्यापै कबहीं सपने ॥
ज्ञान योगते मन थिर राखै । दम शाम कै काया में राखै ॥
दान पुण्य मैं चित अभिलाषै । योग युक्ति मैं बहु विधि भाषै ॥
नित्त नेम पठै गुरु मंत्रा । ताते काया होइ पवित्रा ॥
अरि औ मित्र एक सम जानै । इच्छा काहूकी मनन्हि आनै ॥
होइ अकोध जो त्यागे हठको । शीतल रूप जो साथे घटको ॥
जुगली चाली दूरि बहावै । दया भाव चित माहि समावै ॥
लव लिप्सन होई जिय जाके । कोमल वचन रहै सुख ताके ॥
लोक लाज तजि साधु सुभावै । चपल बुद्धि कह दूरि बहावै ॥
तेज तजै सत्क्रियाकी आसा । क्षमावंत होइ रहेउ उदासा ॥
धीरज मनमें सदा समाई । शुचि संयम करि युक्ति रहाई ॥
होइ अद्रोह द्रोहन्हि आवै । सदा देव संपद मन भावै ॥
मन इच्छा पूजै सब कामा । देव कर्म ताकर है नामा ॥

आसुरी संपदाको वर्णन

अब आसुरी को करौ बखाना । हृदयमें नहीं ज्ञान समाना ॥
दंभ करी करि लोक देखावै । अंतर्गतन्हि ब्रह्म समावै ॥
द्रव्य देखि फूलै अधिकारी । निशिदिन लवलिप्साचितधारी ॥

( ५२ )

बोधसागर

करि अभिमान आपको जानै । और न दूसर चितमें आनै ॥
क्रोध सदा अभि अन्तर राखै । बहु कठोर कोमल नहिं भाखै॥
रहै अज्ञान ज्ञान नहिं भावै । जहां ज्ञान तहैं रोष उठावै ॥
प्रवृत्ति निवृत्ति पुण्य औ पापा । कर्म धर्म करि थापैं आपा ॥
शौच किया मानै नहिं आवै । निराचारमें मन चित लावै ॥
जत्नके अस्त सदा सुख मानै । जग कर्ताको कबहि न मानै ॥
यह व्यवहार आसुरी आही । कबहु न सुमिरे प्रभु जो ताही॥
ऐसे जीव सदा दुख पावै । नरक वास में जाइ समावै ॥
नर्क द्वार तीन हैं भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥

तीन द्वार नर्कको वर्णन

प्रथम द्वार जो काम बनावा । काम द्वारलै चित्त लगावा ॥
कामविषय निशिदिन लपटाना । नर्क वासमें जाइ समाना ॥
दूसर द्वार क्रोध कहावै । जाके क्रोध सदा चित भावै ॥
ताते नर्कवास में जाई । उपजत विनशत बहु दुख पाई॥
तीसर द्वार लोभ है भाई । जेहिते जीव सदा भर्माई ॥
लोभ लागि जो जन्म गवाई । वासा नर्क सदा सो पावै ॥
नर्क द्वार यह तीन बखाना । मूरख इनमें रहै समाना ॥
दैव आसुरी संपद नामा । अध्याय षोडशो कहेउँ बखाना॥

कवीर उवाच

कहै कवीर सुनु संत विवेकी । दोउ संपदा कहेउँ विशेषी ॥
पाप पुण्य हैं दोऊ बेरी । एक लोहे एक कंचन केरी ॥
बेरी पाय एक दुख होई । कंचन ते सुख अधिक न सोई॥
यह संसार फंद यम केरा । कैसे छूटै यम उर झेरा ॥
कर्म करै कर्ता न कहावे । पाप पुण्य शिर भार लेयावे ॥
सत संतोष हियेमें धरई । सहज सरूपी भवजल तरई ॥

उग्रगीता

( ५३ )

साधु संत सेवा चित राखै । सदगुरु शब्द अमीरस चाखै॥
चाखत अमी अमर सो होई । अजर अमर सत्यलोक समोई॥

छन्द-धर्मदास तुम सुनो चित दै कर्म न लागे दासको ।
पाप पुण्य बंधा रहै जो छुटन चाहै फंद सो ॥
सुवा नलिनी पकरि अरझो आपनी मति मंद सो ।

सोरठा-सदा अहेरी काल, पाप पुण्य फंदा रचो ।
सदगुरु दीन दयाल, कर्म काटि मुक्ता करो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंभादे देवा-
सुरसंप्रदायाख्यानां नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहेउ सुनौ यदुराई । कछु मोरे जिय संशय आई ॥
सो अब प्रगट कहौ भगवाना । आगे सूक्ष्म सुना मैं काना ॥
शास्त्र धर्म छाड़ि जिन दीन्हा । तिनकी गति तुम कैसे कीन्हा॥
रूप सरूप कौन है ताही । सत रज तमगुण ये को आही॥

श्रीभगवानुवाच

कहैं कृष्ण सुतु कुंतिकुमारा । भली बात कर कीन्ह विचार॥
जग रचना शास्त्र मत आही । तेहि मारग सब लागे जाही ॥
शास्त्र न वेद पुराण न छोडे । सो तौ नर्कवास में बोडे ॥
जब लगि ब्रह्मज्ञान नहि आवे । तब लगि शास्त्र धर्म मन लावे॥
जब आवे याको ब्रह्मज्ञाना । शास्तर वेद कितेव हेराना ॥
ता कह कर्म न लागे भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥
जब आतम परमातम जानै । कर्म धर्मते भे निरवानै ॥

( ६४ )

बोधसागर

मोक्ष सरूपी आपे होई । ना फिर जन्मे मरै न सोई ॥
ऐसी भांति जो साधु रहाई । ना कहँ आवै ना कहँ जाई ॥
अब तीनों गुण वर्नि सुनावौं । सकल कामना तोर मिटावौं ॥

त्रिगुणको वर्णन

सत रज तमगुण तीनि बखाना । तीनते तीनि २ औ जाना ॥
पूजा तीनि अब कहौं बखानी । पूजहिं सुर नर सुनि औ ज्ञानी ॥
सात्त्विकी देवा पूजैं भाई । राजस पूजैं यक्ष बनाई ॥
तामस भूत प्रेत पूजावहिं । नर्कवास लै सो मुक्तावहिं ॥

त्रिगुण अहारको वर्णन

अहार तीन अब सुनले भाई । सबमें सत रज तम जो आई॥
खीर खांड घृत करै अहारा । यह लक्षण सतगुण व्यवहारा॥
साधु सरूपी सदा सु चाला । सन्तनको बहुविधि प्रतिपाला॥
करुवा खट्टा लोनु तीक्षण । ये अहार राजस लक्षण ॥
दुख सुख ताहि जो व्यापे भाई । नाना व्यञ्जन करै बनाई ॥
तमगुणके आहार बखाना । भई रसोई पहर सेराना ॥
भोजन करि २ लोक सिधवै । स्वाद अनेक रहै ना पावै ॥
होइ उछिष्ट अन्न अब भाई । तामसि तामस करि २ खाई॥

त्रिगुण यज्ञ वर्णन

द्रव्य यज्ञ प्रथम है भाई । बिन फल इच्छा यज्ञ कराई ॥
प्रभुके सुमिरन रहै समाई । ताकी बुद्धि सात्त्विकी भाई ॥
राजस यज्ञ करै फल चाहे । दंभ करै यश कृत्रिम समाहै ॥
यज्ञ विधि निह तामसी होई । अन चूने बिनु करै रसोई ॥
जैसे तैसे यज्ञ करै पूरा । दक्षिना देत बहुत कै घूरा ॥
खरच करै औ कल्पे भाई । ताते नर्क बास चलि जाई ॥

उग्रगीता

(५५)

त्रिगुण तपस्या वर्णन

तनसो देवता पूजा लावै । गुरु और ज्ञानी पूज पुजावै ॥
शुचि संयम जो कोमल रहई । ताकर काल पला नहिं गहई ॥
ब्रह्मचर्य पुत्रि आनि जेवावै । रहै अनिच्छा सत्य न खोवै ॥
यह तन पूजा करै सुजाना । गुरु गोविन्द को धारे ध्याना ॥
सत्त्विक मन तप कहौं बुझाई । इन्द्री सबै हाथ जेहि आई ॥
प्रथमै प्रसन्न जो राखै । मौन रहै अमृत रस चाखै ॥
आतम निग्रह करै सुजाना । अन्तर्भाव सुधा निर्वाना ॥
तपस्या मनकी कही सुनाया । सुधा सरूपी सतगुण भाया ॥

सात्त्विकी वचन तपस्या वर्णन

वचन तपस्या करो बखाना । यह तप मुखते भया प्रवीना ॥
अभय वाक्य ताकूं भइ नाहीं । सत्ति सरोत्तर जस मुख माहीं ॥
प्रिय हित साधु वचन सो कहहीं । पाठ करी करि जन्म सुधरही ॥
एते वचन तपस्या होई । मुखते करे करावै सोई ॥
तीनि तपस्या सतगुण भावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥
रजस तपस्या त्रे प्रकारा । ताकूं अब मैं करो प्रचारा ॥
तीनि तपस्या राजस भाई । तनसों तपकरि लोक देखाई ॥
मनसों कपट कबहुँ नहिं छूटै । वचन सदा मुख बोले झूटै ॥
तीनि तपस्या राजस होई । ऐसी भांति करे जो लोई ॥
तामस तप है तीन प्रकारा । शुभ अशुभ कछु नाहिं विचारा ॥
हठ करि तपसो तनको गारै । मनमें कोध सदा जो धोरै ॥
वचन कठोर बहुत सो बोले । तामस ताप अहं लिये डोलै ॥
तीन तपस्या त्रिगुण सुभावा । सो तौ वर्नक वर्नि सुनावा ॥

त्रिगुण दानका वर्णन

तीनि प्रकार दान अब वनौं । उत्तम सेवा ब्रह्महि चीन्हौं ॥

( ५६ )

बोधसागर

अन आश्रित को देइ जो दाना । तीरथ उत्तम ठौर ठेकाना ॥
दान देइ फल चाहै नाहीं । सात्त्विक दान सो कहिये ताहीं ॥

राजस दानका वर्णन

जत अश्रेको दान जो देई । लाहा कारण संशय लेई ॥
यह तौ राजसको व्यवहारा । दान देइ चित कल्पै भारा ॥

तामस दानका वर्णन

तामस अशुचिको देइ जो दाना । नटुवा वेश्या हित करि जाना ॥
ब्राह्मण देत क्रोध मन करई । इच्छा बहुतै फलको धरई ॥
यह लक्षण तामस कर होई । तीनि प्रकार दान है सोई ॥

तीनि नाम त्रिगुणको वर्णन

तीनि नाम वर्णौ मैं त्रिगुणा । जाते सृष्टि होत है सगुना ॥
वह अंतुतु है मति सोई । तीनिउ नाम एक सम होई ॥
निज मंत्रहि मैं भाषि सुनाया । ताको मर्म न काहू पाया ॥
पाक रसोइ छूति जो होई । वो अंततू सति है सोई ॥
पातक छूति रहैं नहिं कोई । यह तौ मंत्र पवित्र कराई ॥
पावै प्रसाद जो सकल जहाना । सुमिरे पावै पद निर्वाना ॥
सब कारज सुमिरे त्रे नामा । पूर्ण होइ सकल विधि कामा ॥
योग सिद्धि सत्रह अध्याई । सो तौ पूर्ण वर्णि सुनाई ॥

कबीर उवाच

कहै कबीर सुनु धर्मनिराया । तीनिउ गुण वरतै संसारा ॥
साधू कहैं कोइ कर्म न लगै । तन मनते इच्छा कह त्यागै ॥
कर्म करै कर्ता न कहावै । मन सो कुमारग जान न पावै ॥
मारग अगम साधुकर होई । कृष्ण अपने मुख भाषा सोई ॥
वेद पुराण पार नहिं पावै । जहँवा साधू ध्यान लगावै ॥
वेद कितेब दोउ है फन्दा । यहि ते लागि रहै जग धन्या ॥

उग्रगीता

( ९७ )

ज्ञानहि कहि २ कर्म हटावै । यज्ञ दान फिरि जन्म धरावै ॥
हम तौ कहौ अगोचर ज्ञाना । जाते होइ हंस निर्वाना ॥

छन्द—अगम अगोचर भेद सदगुरु साधु रहै समाइ कै ।
हंस होइ सत्यलोक आवै दरस सद्वरु पाइ कै ॥
पूरा गुरु जो पावई तौ मिटै यम फंद को ।
हंसको मुक्ताइ यमसो मिलै अच्युतानंदको ॥

सोरठा—ऐसा शब्द अपार, वार पार बिच भेद को ।
सत्य शब्द निर्धार, सद्वरु सोइ बताइया ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे योग-

सिद्धव्याख्यानो नाम सप्तश्लोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अथ अष्टादशोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन कहैं सुनो यदुनाथा । जो पूछौं सो कगै सनाथा ॥
सन्यास कर्म काहे सो कहिये । त्याग रूप सब वर्णन चहिये ॥

संन्यासको वर्णन

सुनु महाबाहु मैं कहौं बखाना । कर्म नाश संन्यास समाना ॥
कर्म धर्मको मारग छोंडै । ब्रह्म ध्यान अभ्यन्तर मांडै ॥
सब परपंचते न्यारा होई । कर्म संन्यास कहावै सोई ॥

त्यागरूप दर्शन

त्याग रूप है अगम अलेखा । कर्म करै नहिं आपु विशेषा ॥
निशि दिन कर्म धर्म जो होई । रहै अलिस लिस नहिं होई ॥
अपनेको कर्ता नहिं जानै । फल औ फल मनहिं नहिं आनै ॥
ताकहैं त्याग कहीये भाई । निशि दिन रहै नाम लौलाई ॥

( ५८ )

बोधसागर

संन्यास त्रिप्रार वर्णन

संन्यास त्याग तीनि गति होई । अनिष्ट इष्ट मिश्र गति सोई ॥
अनिष्ट नर्ककी योनी भुक्ते । देव योनिको इष्ट संयुक्ते ॥
मिश्र मानुषकी देह जो पावै । तीनों गति गीता बतलावै ॥

त्रिप्रकार क्रिया वर्णन

कहौ क्रिया तीनिहु समुझाई । ज्ञान कर्म कर्ता जो आई ॥

ज्ञान क्रिया त्रिप्रकार

प्रथमैं ज्ञान सुनौ चितलाई । ताकर लक्षण तीनि बताई ॥
जबही ज्ञान हृदयमें आवै । सर्व त्यागि प्रभुको लवलवै ॥
सर्व व्यापि जो ब्रह्महि जानै । सात्त्विक लक्षण ज्ञान बखानै ॥
राजस लक्षण जानै प्रभु न्यारा । न्यारा २ ब्रह्म विचारा ॥
तामस लक्षण एक ठौरहि जानै । मूरति प्रतिमा पूजा ठानै ॥
ताहि एहै ठाकुर है येही । परम पुरुषते नाहिं सनेही ॥
जेहि देवा कौ जो कोई ध्यावै । तेहि देवहि ठाकुर ठहरावै ॥
यह लक्षण तम गुण व्यवहारा । तामैं वास है नरक दुबारा ॥

कर्म क्रिया त्रिप्रकार वर्णन

दोसर कर्म लक्षण है तीनि । जानै कोउ साधू परबीनी ॥
कर्म करै फल चहैन ताको । पुत्र कलत्र असंग सदाको ॥
राग द्वेष जाके नहिं आवै । एतौ सत्त्वगुण कर्म सुभावे ॥
राजस कर्म सुनावौं मीता । करि २ कर्म कामना प्रीता ॥
कर्म अधिकार आपु ना होई । फल वांछै मन राजस सोई ॥
तामस कर्म सुनौ तुम भाई । तप स्नान औ जप लर जाई ॥
हठ करि कर्म करै बहु भाई । दुख सुख अह निशि लहै सदाई ॥
ता प्रकार क्रोधहु बहु होई । तामस नर्क वास है सोई ॥

कर्ता लक्षण त्रै प्रकार

तीसर कर्ता रूप बखानौं । कारण करण करै सोइ जानौं ॥