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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सत्यमुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतान, धनी धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

समत्रिशतिस्तरंगः

कबीर चरित्र बोध प्रारम्भः

दोहा-गुरु कबीर जग विदित है, भक्त मुक्ति दातार । जिव मुक्तावन कारने, आये जगत मैझार ॥ कीन्ह चरित नाना जगत, सोई करो बखान । परमानन्द यश पाइ है, नहिं पावा कोइ आन ॥ उभय आनंदके प्राप्तिको, साधन अहै अनूप । गुरु चरित गायन करी, होवे हंसन भूप ॥

( १७९० )

बोधसागर

सत्य पुरुषकी आज्ञा

सत्यपुरुषने ज्ञानीजीसे कहा कि, ऐ ज्ञानीजी ! काल पुरुषने समस्त जीवोंको फँसाकर मार लिया, सब जीव भटक भटक कर कालकी फाँसीमें पड़ गये, कोई जीव मेरे लोकमें नहीं आता मैंने सुकृति जी (धर्मदास) को सत्य पंथके प्रचारके लिये पृथ्वी पर भेजा था—उनको कालपुरुषने धोखा देकर लोक वेदमें फँसा लिया और धर्मदासजी सत्यपुरुषकी भक्तिको छोड़कर कालपुरुषकी भक्तिमें लग गये। इस कारण आप पृथ्वी पर जाओ और सुकृतिजीको चेताकर मुक्तिपंथ पृथ्वीपर प्रकट करो। तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषकी आज्ञा शिरोधार्य कर दंडवत् प्रणाम करके सत्यलोकसे बिदा हुए।

कबीर साहिबका काशीमें प्रकट होना

सम्बत् चौदह सौ पचपन विक्रमी ज्येष्ठ सुदि पूर्णिमा सोमवारके दिन सत्यपुरुषका तेज काशीके लहर तालाबमें उतरा, उस समय पृथ्वी और आकाश प्रकाशित हो गया। उस समय अष्टानंद वैष्णव उस तालाब पर बैठे थे। वृष्टि हो रही थी, बादल आकाशमें घिरे रहनेके कारण अंधकार छाया हुआ था, और बिजली चमक रही थी, जिस समय वह प्रकाश तालाबमें उतरा उस समय समस्त तालाब जगमग जगमग करने लगा और बड़ा प्रकाश हुआ। वह प्रकाश उस तालाबमें ठहर गया और प्रत्येक दिशाएँ जगमगाहटसे परिपूर्ण हो गयीं और इस आश्चर्यमय प्रकाशको देखकर अष्टानंदजी आश्चर्यान्वित हुए। प्रकाशके फैलते ही मयूर चकोर आदि नाना प्रकारके पक्षी बोलने चहचहाने लगे, कमल तथा नीलकमलके पुष्प लहलहाने और भँवरे गूँजने लगे। अष्टानन्दजीने जो उस तेजके

कबीर चरित्रबोध

( १७९१ )

देखा तो आनकर उसका समस्त विवरण रामानन्द स्वामीसे कहा कि, हे स्वामीजी ! मैंने लहर तालाबमें एक ऐसी ज्यो-तिका निरीक्षण किया है जिससे मुझको अत्यन्त आश्चर्य हुआ है। उस ज्योतिको आकाशसे उतरते और लहर तालाबमें ठहरते देखा जब वह प्रकाश उस तालाबमें उतरा तब तालाब ज्योतिसे प्रकाशित हो गया। यह बात सुनकर रामानन्द स्वामीने अष्टा-नन्दसे कहा कि, वह प्रकाश जो तुमने देखा था उसका कौतुक शीघ्र ही तुम्हारे देखने तथा सुननेमें आवेगा।

वह तेज बालकके आकारमें हुआ उस जलके ऊपर कम-लोंके पुष्पोंमें उतराने और बालकोंके सहश हाथ पाव फेंकने लगा वह तेज अपनी समस्त प्रभाओंको पृथक् करके मनुष्यके बच्चेके आकारमें दिखलायी दिया।

नीरूके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

श्वपच सुदर्शनके जो माता पिता थे वे दोनों भङ्गीका शरीर छोड़कर ब्राह्मण ब्राह्मणी हुए थे, और चँदबोर नगरमें रहते थे, इनके प्रेमसे कबीर साहब इनके घर गये और उनको सुक्ति-मार्ग बतलाने लगे, परन्तु उन्होंने ध्यान नहीं दिया, तब सत्य गुरु उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये। इसके उपरान्त वे दोनों ब्राह्मण ब्राह्मणी परलोकगामी होकर काशीमें जोलाहा जोलाही हुए और उनका नाम नीरू और नीमाह्वाद है। सुदर्शनजीके माता पिता तीसरे जन्ममें जोलाहा जोलाही हुए थे। इनको सुक्तिप्रदान करनेके निमित्त पुनः कबीर साहब उनके घर गये और काशीमें लहर तालाबमें प्रकट हुए।

कबीर साहबका नीमाको मिलना

नीरू जोलाहा काशी नगरीमें रहता था, एक दिवस वह अपनी

( १७९२ )

बोधसागर

स्त्री सहित चला आता था, देवात् वह लहर तालाबके सर्मी-पसे होकर निकला । उसकी स्त्री नीमा प्यासी हुई और जल पीनेके निमित्त उस तालाब पर गयी वहीँ देखा तो एक बड़ा ही सुन्दर बालक कमलोंमें पैरता फिरता है और हाथ पाँव फेंक रहा है । उस बालकको देखकर नीमा तालाबके भीतर घुसकर उस बच्चेको अपनी गोदमें उठा लिया और तालाबसे बाहर निकलकर नीरूके पास गयी ।

नीमा और नीरूकी बातचीत

तब पूछा कि, यह किसका लड़का ले आयी है ? तब नीमाने उत्तर दिया कि, मैंने तालाबमें पाया है । नीरूने कह दिया कि, यह लड़का जहाँसे तू ले आयी है वहाँ ही रख आ नहीं मालूम यह किसका लड़का है । तब उस स्त्रीने उत्तर दिया कि, ऐसा सुन्दर बालक तो मैं कदापि नहीं फेंकूँगी । तब नीरूने कहा कि, लोग मुझको हँसेंगे और ठट्टाएँ उड़ावेंगे कि सुकलावेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्र भी ले आया, इस कारण इस बालकको तू फेंकि आ । इस बातको जब नीमाने स्वीकार नहीं किया तब नीरू अपनी स्त्रीको मारने पीटनेपर प्रस्तुत हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । अब वह स्त्री खड़े खड़े अपने चित्तमें चिंता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ नीमा मैं तेरे पूर्वजन्म प्रेमके कारण तेरे घर आया हूँ । तू मुझको मत फेंक और अपने घर ले चल यदि मेरा कहना मानोगी तो मैं तुम्हें आवागमनके फेरेसे छुड़ा दूँगा और मुक्तिप्रदान करूँगा, समस्त दुःख संताप हर कर और वह शब्द बतलाऊंगा कि, जिससे कभी कालके फंदेमें नहीं पड़ेगी ।

कबीर चरित्रबोध

( १७१३ )

जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी, बालककी बात सुनकर नीरू भी कुछ नहीं बोला । अब वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर आये । जब काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्र भी ले आया तो लोग ठट्टा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है, बालकका कुल विवरण कह सुनाया, फिर बुलाकर पूछने लगा कि इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये । ब्राह्मण पत्रा लिये विचार ही रहे थे, इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है, दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता मत करो । यह बात सुनकर सब लोग अत्यन्त चकित हुए कि यह बालक तो स्वयम् ही अपना नाम बतलाता है यह कैसा बालक है यह किसी सिद्धका अवतार है कि कोई देवता है ? काशीमें इस बातकी चर्चा घर घर होने लगी कि, नीरूके घरमें एक बच्चा आया है सो बातें करता है । फिर नीरूने काजीको बुलाया और पूछा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये । जब काजी किताब खोलकर बालकका नाम स्थिर करने लगा तब कुरानके मध्यमें बालकके चार नाम निकले कबीर १ अकबर २ किबरा ३ किबरिया ४ ये चार नाम देखकर काजी चुप हो रहा और अपने दातोंके नीचे अँगुली दबाने लगा । फिर फिर वह कुरान खोलकर देखता तो समस्त कुरान उसको उन्हीं नामोंसे भरा दिखाई दिया । अब काजीके मनमें अत्यन्त सन्देह उत्पन्न हुआ

( १७९४ )

बोधसागर

१०

कि, ये चारों नाम तो खुदाके हैं अब क्या करें हमारे धर्मकी अप्रतिष्ठा हुई ।

गरीबदासजीकी पारख, अंगकी सखियाँ

काशीपुरको कस्द किया, उत्तरे अधर अधार । मोमिनका मुजरा हुआ, जङ्गलमें दीदार ॥ कोटि किरन शशि भानु सुधि, आसन अधर विमान । परसत पूरण ब्रह्मको, शीतल पिंड औ प्रान ॥ गोद लिया मुख चूमिके, हेम रूप झलकन्त । जगर मगर काया करे, दमके पद्म अनन्त ॥ काशी उमडी गुल भया, मोमिनका घर घेर । कोइ कह ब्रह्म विष्णु हैं, कोइ कहे इंद्र कुबेर ॥ कोइ कह वरुण धर्मराय हैं, कोइ कोइ कहता ईश । सोलह कला सुभान गति, कोई कहै जगदीश ॥ भगति मुक्ति ले उत्तरे, मेटन तीनों ताप । मोमिन घर डेरा लिया, कहै कबीरा बाप ॥ दूध पीवै नहिं अन्न भखे, नहीं पलने झूलंत । अधर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलंत ॥ कोइ कहे छल ईश्वर नहीं, कोइ किन्नर कहलाय । कोइ कहे गुण ईशका, ज्यों ज्यों मारिये साय ॥ काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निंद । ऐसे दूल्हा उत्तरे, ज्यों कन्या बरबिंद ॥ खल्क मुल्क देखन गया, राजा परजा रीत । जम्बूद्वीप जहानमें उत्तरे, शब्द अतीत ॥

१ सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।

काशी के काजी कहै, गयी दीनकी टेक ॥

११

कबीर चरित्रबोध

( १७९५ )

दुनी कहे यह देव है, देव कहै यह ईश । ईश कहै परब्रह्म है, पूर न विश्वे वीश ॥ काजी गये कुरान ले, धर लड़केको नाँउ । अक्षर अक्षरमें पुरे, धन्य कबीर बल जाँउ ॥ सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख । काशीके काजी कहै, गयी दीनकी टेक ॥ शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत नदन विनोद । महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥ नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परणाम । धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशी निष्काम ॥ सात बार चर्चा करे, बोलै बालक बैनु । शिव सो कर मस्तक धरचो, ला मोमिन यक घेनु ॥ अनग्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल । पीयो बालक ब्रह्म गति, वहां शिव भये दयाल ॥ कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि । चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा नित लेहि ॥

जब काशीके सब काजियोंको यह समाचार मिला तब वे इस समाचारको सुनकर बड़े ही चिन्तित हुए कि, यह कैसा आश्चर्य अद्भुत व्यापार है कि, समस्त कुरानमें कबीर ही कबीर दिखाई देता है । अब कौन उपाय करना चाहिये कि, ऐसे दरिद्री जोलाहेके पुत्रका इतना बड़ा नाम न रखवा जावे । फिर फिर कुरान खोलकर देखते तो यही चारों नाम निकलते । इन चारों नामोंके सिवाय और कुछ नहीं निकला । तब काशी- के काजियोंने आपसमें सम्मति की और नीरूसे कहा कि, ऐ नीरू ! तू इस बालकको अपने घरके भीतर लेजाकर मार

( १७९६ )

बोधसागर

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खपा । तब वह जोलहा कबीर साहबको अपने घरके भीतर ले गया और उनको छुरीसे काटने लगा, छुरी एक ओरसे दूसरी ओर पार निकल गई न कोई घात हुआ और न लोहूका एक बूँद ही निकला और न गले पर कोई चिह्न हुआ । नीरू यह आश्चर्यमय वृत्तान्त देखकर एकदम डर गया और थर थर कौपने लगा उसके हाथसे छुरी गिर गयी और वह अचेत सा हो गया । तब कबीर साहब बोले कि, ऐ नीरू ! मेरा कोई माता पिता नहीं है, न मैं उत्पन्न होता हूँ, न मरता हूँ, न सुझको कोई मार सकता है, न मैं किसीको मारता हूँ । और न मेरा शरीर है न मेरे मांस चर्म हड्डी और रक्त है और मैं स्वयंप्रकाश हूँ । यह बात सुनकर जोलाहा अत्यन्त भयभीत हुआ । अन्तमें विवश होकर जब यह वृत्तान्त प्रकट हुआ तब कबीरही नाम ठहराया । किसीका कुछ वश न चला कि, उसको बदल सके ।

बाललीला

बिना भोजनादि किये ही कबीर साहबका शरीर बड़ा होता जाता था और दिन प्रति आपका तेज तथा प्रताप बढ़ता जाता था । जब जोलाहा जोलाहीने देखा कि, बालक तो कुछ भोजन करता नहीं है तब वे अपने मनमें अत्यन्त चिन्तित होकर कहने लगे कि ऐ कबीरजी ! आप कुछ भोजन करो यदि आप अन्न न खाओगे तो हम भी नहीं खायेंगे । तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, ऐ नीरू ! गायकी एक कुवारी बछिया और कुम्हारके घरसे एक कोरा बरतन ले आओ । कबीर साहबकी आज्ञानुसार नीरू गया और कोरी बछिया ढूँढ़कर और कुम्हारके गृहसे एक बरतन ले आया । तब कबीर साहबने उससे कहा कि, इस बछियाको मेरे सामने बांध दो और उसके स्तनोंके नीचे

१३

कबीर चरित्रबोध

( १७९७ )

बरतन रख दो, फिर कबीर साहबने उस बछियाकी ओर देखा तो उसके स्तनोंसे दूध निकलने लगा जिससे बरतन भर गया वही दूध लेकर नीरूने कबीर साहबके मुँहके सामने रख दिया। फिर तो नीरू नित्य उसी प्रकार प्रतिदिवस किया करता था।

जब कबीर साहब कुछ बड़े हुए और छोटे-छोटे लड़कोंके साथ खेलने लगे तब आप उन लड़कोंसे ब्रह्मज्ञानकी बातें किया करते थे। वे बेसमझ लड़के कबीर साहबकी बातको तनिक भी नहीं समझते बल्कि जब वह उन्हें समझाने लगते तब वे मुँह देखने लग जाते। फिर कुछ दिनोंके पश्चात् आप साधुओं के साथ ज्ञानगोष्ठी करने लगे। जब साधु लोग आपका ज्ञान सुनते तब अत्यन्त चकित होते कि, यह छोटा बालक इस प्रकारकी बातें कैसे करता है। इन बातोंकी सुधि तो किसी साधुको भी नहीं है। तब साधुओंको विदित हो गया कि, यह बालक नहीं बरन् कोई सिद्ध ही लड़केके वेषमें प्रकट हुआ है।

कबीर साहबकी बालकपनके अनेक लीलाओंका विवरण ग्रंथोंमें लिखा है-उस समय जलनके रोगका काशीमें प्रकोप था। एक बूढ़ा स्त्री आई और कबीर साहबसे बोली कि, मैं जलन रोगसे व्यथित हूँ, आप धूल मिट्टी खेल रहे थे। कबीरजी बोले, यदि तेरी इच्छा हो तो मैं आरोग्य लाभ करूँ। तब कबीर साहबने उस स्त्रीपर थोड़ीसी धूल डाल दी और वह आरोग्य हो गयी जिसपर वह प्रसन्न होती चली गयी। इस प्रकारकी बातोंका कुछ विवरण हो नहीं सकता।

कुछ दिवसोंके उपरांत समस्त जुलाहे एकत्रित होकर कहने लगे कि, ऐ नीरू! अब तुम अपने पुत्रका सुम्रत ( मुस-

( १७९८ )

बोधसागर

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ल्मानी ) कराओ । फिर एक दिन सुकरूर करके जुलाहे एकत्रित हुए और काजीको बुलाया । जब नाई उस्तारा लेकर कबीर साहबके सामने गया तब आपने पांच लिंग उसको दिखलाये और उससे कहा कि, इन पाँचोंमेंसे जिसको चाहे तू काट ले । यह अवस्था देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया और आपका सुन्नत नहीं हुआ ।

एक दिन आप छोटे-छोटे बच्चोंके साथ खेल रहे थे, उस समय काजीने गोवधका प्रबंध किया और गऊके जबह करनेका समय आया तब आपने सब वृत्तांत जान लिया कि, काजी गऊके जबह करनेके विचारमें है । ऐसा जान करके बालकोंके साथका खेलना छोड़कर गऊकी ओर दौड़े । जबतक गायके समीप पहुँचे तबतक तो काजीने गऊको समाप्त कर दिया । कबीर साहब आकर उस काजीको उपदेश देने लगे जिससे लज्जित होकर काजी अपने अपराधके निमित्त क्षमाका प्रार्थी हुआ । फिर कबीर साहब उस गऊको जीवित करके और आप अंतर्धान हो गये ।

जब आप अंतर्धान हो गये तब जुलाहा जुलाही आपको दूँदने लगे । जब कई दिनों तक कबीर साहब उन्हें नहीं मिले तब उनको बड़ा दुःख हुआ और वे फूट-फूट कर रोने लगे । समस्त नगरमें दूँद डाला पर आप कहीं नहीं मिले । उसको तीन दिन भूखे प्यासे बीत गये, अन्नजल कुछ भी उसके मुँहमें नहीं गया । वे अत्यन्त निर्बल तथा अशक्त हो गये । जब आपने उन दोनोंको नितांत ही विह्वल पाया तब आप उनके सामने प्रकट हो गये । आपको देखते ही वे प्रसन्न होकर चरणोंपर गिर पड़े और कहने लगे कि, आप किधर चले गये ? हम

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कबीर चरित्रबोध

( १७९९ )

टूँढते-टूँढते हैरान हो गये ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, तुमने महापाप किया कि, गऊको जबह करवाया । जोलाहा जोलाही अनेक सौगंधें खाने लगे कि, हमने यह कार्य नहीं करवाया बरन् हमें इस बातकी तनिक भी सुधि नहीं है, यह कार्य काजीका है जब उन दोनोंने बहुत कुछ प्रार्थना तथा बिनती की तब कबीर साहबने दोनोंको निर्दोष समझकर उनके घर पर गये ।

जब आप छोटे २ बालकोंके साथ खेलते थे तब “राम राम” “गोविंद गोविंद” “हरि हरि” कहा करते थे तब सुसलमान लोग सुनकर कहते थे कि, यह बालक कट्टर काफिर होगा । तब उनको कबीर साहब यह प्रत्युत्तर देते थे कि, काफिर वह होगा जो दूसरोंका माल लूटता होगा, काफिर वह होगा जो कपट-भेष बनाकर संसारको ठगता हो, काफिर वह है जो निर्दोष जीवोंका प्राणनाश करता होगा, काफिर वह होगा जो मांस खाता होगा, काफिर वह होगा जो मदिरा पान करता होगा और काफिर वह होगा जो दुराचार तथा बटमारी करता होगा मैं किस प्रकार काफिर हूँ ।

साखी-कबीर साहब

गला काटकर बिसमिल करें, ते काफिर बेबूझ ।

औरनको काफिर कहैं, अपना कुम्भ न सूझ ॥

कुछ दिनके बाद कबीर साहबने गलेमें यज्ञोपवीत डाल लिया और अपने माथेपर तिलक लगा लिया, तब ब्राह्मण देखकर कहने लगे कि, यह तो तेरा धर्म नहीं है तूने वैष्णव वेष कैसे बनाया ? तू राम राम गोविंद गोविंद नारायण नारायण कहता है-यह तो मेरा धर्म है तेरा धर्म नहीं । तब कबीर

( १८०० )

बोधसागर

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साहब ब्राह्मणोंको उत्तर देते कि, हम तो ताना तनते हैं, जनेऊ तुम्हारा किस प्रकार हुआ ? और गोविंद और राम तो हमारे हृदयमें बसते हैं, तुम्हारे कैसे हुए । तुम तो गीता पढ़ते हो और सांसारिक धनके निमित्त सदैव धनाढ्योंके द्वार द्वार पर दौड़ते और भटकते रहते हो, हम तो गोविंदके अतिरिक्त और किसी अन्यको नहीं जानते हैं । इतना सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर हो जाते फिर तो हिन्दू तथा मुसलमान दोनों आपके साथ वाद विवाद किया करते और सब परास्त होने लगे । जब साधुओंने देखा कि, यह लड़का तो बड़ा ज्ञानी है, तब वे लोग पूछते कि, कबीरजी आपका गुरु कौन है, उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था-इस प्रश्नपर आप निरुत्तर निस्तब्ध हो जाते । तब साधु लोग आपको ताना मारते कि, बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी काम नहीं आवेगा-और न बिना गुरुके किसीको मुक्ति मिलेगी, तुम्हारा यह सब वार्तालाप तथा ज्ञान व्यर्थ है । जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानंद स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया । जिस समय आपने स्वामी रामानंदको गुरु करनेका संकल्प किया उस समय आपको प्रकट हुए पूरे पाँच वर्ष हो चुके थे और आपकी प्रसिद्धि भारतके बहुत भागोंमें हो चुकी थी ।

आप रामानन्द स्वामीके पास गये और विनय किया कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य कीजिये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिये मुझपर कृपा कीजिये । यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर दिया कि, मैं श्रद्धको दीक्षा नहीं देता ।

रामानन्द स्वामी और कबीर साहबकी वार्तालापका वृत्तान्त

भक्ति द्रावड देश थी, यहाँ नहीं एक विरक्ष ।

१७

कबीर चरित्रबोध

( १८०१ )

ऊत भूतको ध्यावना, पाखंड और परपञ्च ॥ रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मैझार । देश द्राविड छाड़िके, आये पुरी विचार ॥ योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता सकल शरीर । तिरवेणीके घाटमें, अटक रहे बलवीर ॥ तीर्थ वरत एकादशी, गंगोदक अस्नान । पूजा विधि विधानसों, सर्वकलासों गान ॥ करे मानसी सेव नित, आत्मतत्त्वको ध्यान । षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥ चौदह सौ चेले किये, काशीनगर मैझार । चार सम्प्रदा चलत हैं, और हैं बावन द्वार ॥ पांच बरषके जब भये, काशीमाहि कबीर । दास कबीर अजीबकला, ज्ञानध्यान गुण थीर ॥ गुल भया काशी पुरीमें, अटपट बैन विहंग । दास गरीब गुणी थके, सुनि जोलहा परसंग ॥ रामानंद अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश । दास गरीब बिलम्बना, ताहि नवावत शीश ॥ रामानंदको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाप । दास गरीब दरस मये, पैयन लगी जो लाप ॥ पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन । दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये बरबीन ॥ आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त । दास गरीब उलंग छबि, अघर डाक कूदंत ॥ कौन जाति कुल पंथ है, कौन तुम्हारा नाउँ । दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाउँ ॥

नं. ४९ बोधसा

( १८०२ )

बोधसागर

१८

जाति हमारी जगद्गुरु, परमेश्वर यह पंथ । दास गरीब लिखत परे, नाम निरंजन कंत ॥ रे बालक दुर्बुद्धि सुन, घट मठ तन आकार । दास गरीब दरदर लगे, बोले सिरजन हार ॥ तू मोमिनके पालुवा, जुलहेके घर वास । दास गरीब अज्ञान गति, एता दृढ़ विश्वास ॥ मान बड़ाई छाँड़िके, बोलौ बालक बैन । दास गरीब अथम मुखी, इतना तुम घर फैन ॥ कलियुग क्षेत्रपाल है, क्या भैरो कोइ भूत । दास गरीब विटंबना, गया जगत सब ऊत ॥ मनी मगज माया तजो, तजिये मान गुमान । दास गरीब सो बात कहि, नहीं पावेगो जान ॥ हे बालक बुधि तोरि गति, कौड़ी साखन भाँड । दास गरीबहि हदेसकरि, नहीं लेवेगे डाँड ॥ शाह शिकंदरके वधे, पग ऊपर तर शीश । दास गरीब अगाधि गति, तोर कहा जगदीश ॥ कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच । दास गरीब जहानमें, तुम सर जोरा मीच ॥ मरत मरत सबजग मुआ, लखै नऽस्थिर ठौर । दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न और ॥ नादविन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन । दास गरीब पलक फना, जैसे बुदबुद लीन ॥ तिनकर तैसे बोलते, रामानन्द सुजान । दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥ नीच मीच से ना डरे, काल कुल्हाड़ अशाश ।

१९

कबीर चरित्रबोध

( १८०३ )

दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा जगदीश ॥ जड़िहों हाथ हथकड़ी, गले तौक जञ्जीर । दास गरीब परख बिना, यह वाणी गुणगीर ॥ परख निरख नहिं तोहिको, नीच कुलीन कुजात । दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥ हे बालक नीचा कला, तुमही बोलो ऊँच । दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥ महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन । दास गरीब मनी मरी, मैं आजिज आधीन ॥ मैं अविगत गतिसे परें, चार वेदसे दूर । दास गरीब दशों दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥ सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ । दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥ जात पाँत मेरे नहीं, नाहिं स्त्री नहिं गाउँ । दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥ नाद बिन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहिं गात । दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥ सब सङ्गी बिछरू नहीं, आदि अन्त बहु जाहिं । दास गरीब सकल बसौँ, बाहर भीतर माहिं ॥ हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीर । दास गरीब अधर बसूँ, अविगत पुरुष कबीर ॥ अनन्तकोटि सलिता बड़ो, अनन्तकोटिधर ऊँच । दास गरीब सदा रहूँ नहीं हमारे कूँच ॥ पुहमी धरनि अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर । दास गरीब न दूरसा, हम सम तुल नहिं और ॥

( १८०४ )

बोधसागर

२०

मैं माया मैं काल हूँ, मैं हंसा मैं वंश । दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥ ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव । दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥ हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम । दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥ हम मौला सब सुल्कमें, सुल्क हमारे माहिं । दास गरीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाहिं ॥ हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश । दास गरीब हम नित रहें, हम तजि जात हमेश ॥ हमहीं लाल गुलाल हैं, हम पारस पद सार । दास गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥ हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश । दास गरीब तत्त्वपञ्चमें, हमहीं शब्द निवास ॥ सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्ज । दास गरीब हम रूप बिन, और सकल परपञ्ज ॥ हम रोवत हैं सृष्टिको, जो रोवति है मोहिं । दास गरीब वियोगको, और न बूझे कोइ ॥ मैं बूझूँ मैं ही कहूँ, मैं ही किया वियोग । गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥ चारों रुकुनमें हम फिरेँ, नहिं आवें नहिं जाउँ । गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥ रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह । गरीब दास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन्ह ॥ लगी महम गनीम पर, काल कटक कट कन्त ।

२१

कबीर चरित्रबोध

( १८०५ )

गरीबदास निर्भर कहैं, जो कोई नाम जपन्त ॥ मैं बालक मैं बृद्ध हूँ, मैही जवों जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमही चारों खान ॥ गगन शून्य गुसा रहूँ, हम परकट परवाह । गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप । गरीबदास जलतरैंग ज्यों, हमहिं सागरसीप ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल । गरीबदास टूँढत फिरैं, हीरे माणिक लाल ॥ इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥ बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल । गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥ सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान । गरीबदास शिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥ स्वामी घुंडी खोलके, फिर माला गले डार । गरीबदास इस भजनको, जानत हैं करतार ॥ डचोढ़ी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥ मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छोड़ो आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥

( १८०६ )

बोधसागर

२२

सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छौँट्टै रीत । गरीबदास गुदड़ी लगी, जन्म जात है बीत ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह । गरीबदास घर अगमक, कैसे पाऊँ थाह ॥ हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु शोभ । गरीबदास घर वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन सुरार । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्गलोक दरबार ॥ दूधोंकी नदियां बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर मुकुट, सर्वगपुरी अस्थान ॥ रत्न जड़ाऊ मनुष सब, गण गँधर्व सब सेव । गरीबदास उस धामकी, कैसे छौँट्टै सेव ॥ चार वेद गावैं उसे, सुर नर मुनी मिलाप । गरीबदास ध्रुव पुर यश, मिट गये तीनों ताप ॥ नारद ब्रह्मा यश रटें, गावैं शेष गणेश । गरीबदास वैकुण्ठसे, और परे को देश ॥ सुन स्वामी निज मूलगति, कहि समझाऊँ तोहिं । गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोहिं ॥ तीनलोकके जीव सब, विषय वासना भाय । गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥ कृष्ण विष्णु भगवानके, जहां गये हैं जीव । गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥ सुनु स्वामी तोसों कहैं, अगम द्रीपकी सैल । गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥ कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन बिहंड ।

२३

कबीर चरित्रबोध

( १८०७ )

गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण और पिंड ॥ बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार । गरीबदास सब रूपमें, तुमही बोलनहार ॥ तुम साहब तुम संत हो, तुम सदगुरु हम हंस । गरीबदास तुम रूप विनू, और न पूजो वंस ॥ मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश । गरीबदास अविगत मिले, मेटी मनकी ध्यास ॥ दोनों ठौर मैं एक तू, भया एकसे दोय । गरीबदास हम कारणे, उतरे मगहर जोय ॥ बोले रामानन्दजी, सुनो कबीर सुजान । गरीबदास मुक्ती भयी, उधरे पिंड औ प्राण ॥ गोष्ठी रामानन्दसे, काशी नगर मँझार । गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥

कबीर वचन

रामानंद गुरुदीक्षा दीजै । गुरुदक्षिणा कुछ हमसे लीजै ॥

रामानन्द वचन

शूद्रके कान न लगौं भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥ जब रामानंदने उत्तर दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूँगा, कबीर साहब चुपचाप चले आये, स्वामीजीका यह नियम था कि, चार घड़ीके तड़के गंगास्नानको जाया करते थे, एकदिन जब स्वामीजी स्नान करने चले तब कबीर साहब एक छोटे बालक- का रूप धरके स्वामीजीके पथमें जा पड़े । स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे, आपकी खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबके शिरमें लगी, कबीर साहब रोने लगे । एक लड़केको रोते देखकर स्वामीजी खड़े हो गये, और बालकके शीशपर हाथ धरकर

१८०८

बोधसागर

( २४ )

कहा कि, बच्चा रो मत राम राम कहो । तब कबीर साहब चुप हो गये और कहने लगे गुरुजी राम राम कहूँ ? स्वामीजीने कहा हाँ राम राम कहो । उस समयसे कबीर साहब बराबर राम राम कहने लगे, और गुरु शिष्यका सम्बन्ध बना लिया । जब गुरु चेले का सम्बन्ध बना चुके तब अपने घरमें जाकर सबेरे ही कंठी पहन लिया, और हाथमें तुलसीकी माला ले और मस्तक पर तिलक लगा ठीक वैष्णव मूर्ति धारण किया और राम रामकी धुन लगायी ।

जब कबीर साहबने यह रंग बनाया तब आपसे अनेक मनुष्य प्रश्न करते कि, कबीरजी ! आपने यह वैष्णवका वेष कैसे बनाया है ? तब वे सब लोगोंको उत्तर देते कि मैंने रामानंद स्वामीको गुरु बनाया है । यह दशा देखकर और सुनकर कितने ही संन्यासी तथा वैरागियोंने स्वामीजीसे जाकर कहा कि, महाराज ! आपने ऐसी मर्यादा छोड़ दी कि, जोलाहे पुत्रको शिष्य कर लिया ।

यह बात सुनकर स्वामीजीने कहा कि, मैंने चेला नहीं किया । तब लोग गये और कबीर साहबको बुला लाये । स्वामीजीका यह नियम था कि, वे मुसलमानका मुख नहीं देखते थे और कबीर साहबको नीरूके घरमें रहनेके कारण लोग मुसलमान कहते थे, इसलिये कबीर साहबको लोगोंने परदाके बाहर खड़ा किया और परदेके भीतरसे स्वामीजी बोले कि ऐ कबीर ! मैंने तुमको अपना चेला कब बनाया ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, स्वामीजी जब आप गंगा स्नानको जाते थे और मैं पथमें पड़ा था आपके खड़ाऊँकी ठोकर मेरे माथेमें लगी और मैं रोने लगा तब आपने कहा राम राम