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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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सारखी-कालको जीव माने नहीं, कोटिन कहूं बुझाय । मैं र्वीच्छू सत लोकको, बांधा यमपुर जाय ॥ बहता है बहजान दे, बहैं लगावन ठौर । कहा हमारा न आदरै, छों धक्का दो और ॥

इस प्रकार कबीर साहबका धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुआ । और वैरी और दूत भूत सब निराश हो गये किसीका कुछ वश नहीं चला । जो समर्थ धनी स्वयम् सत्यपुरुषने धर्म प्रचलित किया फिर किसोका सामर्थ्य थी कि, रोक सकता ? ऐसा वेगसे चला कि, लाखों सेवक और शिष्य हो गये और सत्य कबीर और सत्यनामकी पुकार समस्त संसार में पड़ी । किसीके रोके रुक नहीं सका । पश्चात् कबीरपंथ स्थापित करके कबीर साहब सत्यलोकको गये ।

कबीरपंथकी स्थापना

पहले मैं वर्णन कर आया हूँ कि, सत्यपुरुषने कहा कि, ऐ ज्ञानीजी ! पृथ्वीपर जाओ और सुकृतिजी ( धर्मदास ) को जगाओ, वह भूलकर मूर्तिपूजक हो गये हैं उनको उनकी अचेत निद्रासे जाग्रत करो और सत्यपुरुषकी भक्तिमें लगाओ और सत्य पंथ पृथ्वीपर प्रचलित करो । और बयालीस वंश नियत करके कलियुगके मनुष्योंका उद्धार करो । सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार कबीर साहबने धर्मदासको जगाया और सत्यपुरुषकी भक्तिमें लवलीन किया । फिर चारों दिशाके चार गुरु नियत किये ।

चार गुरुका वृत्तान्त

पहले गुरु धर्मदासजी हैं और उनको उत्तरके ओरकी गुरुवाई प्रदान की है और उनके बयालीस वंश हैं । दूसरे चतुर्भुजदास

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कबीर चरित्रबोध

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उनको दक्षिण ओरकी गुरुवाई प्रदान की गयी और सत्ताईस वंश हैं । तीसरे गुरुराज बंकजी हैं । उनको पूर्व ओरकी गुरुवाई प्रदानकी गयी और उनके सोलह वंश हैं । चौथे गुरु सहतीजी हैं और उनके सात वंश हैं और उनको पश्चिम ओरकी गुरुवाई प्रदान की गयी । ये चारों गुरु चार ओर ठहराये गये हैं और जब ये चारों गुरु चारों ओरसे सत्यनामका डंका बजावेंगे तब कबीर साहबका धर्म भलीभाँति पृथ्वीपर प्रचलित होगा । इन चारों गुरुओंमें केवल धर्मदासजी अबलों प्रकट हुए और उनकी वंशगद्दी स्थिर हुई । और पूर्वोक्त लिखित तीनों गुरु अबलों प्रकट नहीं हुए जब वे भी प्रकट हो जावेंगे तब इस धर्मका प्रचार विशेष होगा । अब तो केवल धर्मदासजीके वंश बयालीसका विवरण करता हूँ ।

धर्मदासके बयालीस वंशका वृत्तांत

धर्मदासके बयालीस वंशका यह ठीका सत्यगुरुने ठहराया है कि प्रत्येक वंश पच्चीस वर्ष और बीस दिवसों पर्यंत गद्दीपर बैठा करे और इससे अधिक तथा न्यून कोई न रहे । और सत्यगुरुकी आज्ञानुसार उनका अवतार और उनका अधिकार होता आता है । फिर वे अपनी इच्छासे शरीर छोड़ कर सत्यलोकको सिधारते हैं । जिस दिवस साहबका चलना होता है उसके पूर्व अनेक सन्त महन्त दर्शनार्थ एकत्रित होते हैं और जिस दिवस पच्चीस वर्ष तथा बीस दिवस पूरा होता है उस दिवस जो गद्दीका अधिकारी होता है उसको अपने स्थान गद्दीपर बैठा देते हैं और समस्त कार्य सौंप देते हैं । जब सब कार्य ठीक हो चुकता है उस समय आय पानका बीड़ा लेते हैं इसको चलानेका बीड़ा कहते हैं । जब वह चलाने-

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बीधसागर

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का बीड़ा लेते हैं उस समय हंस तो सिधार जाता है और शरीर ठंडा हो जाता है और उस शवकी समाधि कर देते हैं। इतना कौतुक कबीर साहबका अबलों पृथ्वीपर प्रकट है। यही लोग अपने चेलों सहित इस भवसागरके मांझी और नावके चलानेवाले हैं।

चारों गुरुकी प्रशंसा—उर्दू सेर

गुरु चारको पहले ताजी मकर। सातएं शकुनी स्वामए हाथ धर॥ गुरुवार सतगुरुकदमके हैंखाक। चढ़े अर्श ऊपर शबद बादपाक॥ मोअज्जित हुए खाक खाकीहुए। बाहरखू रजाजू खुदाकी हुए ॥ बुजुरगी किया अजमुबारकजबाँ। बनाया इन्हें दुजदके पासबाँ ॥ बअतराफ चारों निगहबाँ किया। मकाँ मुक्तिके चार दरबाँ किया॥ जहां बैठे वहकादिरे जुलजलाल। किबरतरुतशाहंशहीला मिसाल वजीरान चारों खिरदमंद हैं। यह अरकाने दौलत खुदावंद हैं॥ जबानिब जहाँमें किया चार हैं। बहर सिम्त यक यक मददगार हैं॥ जो इनसाँको सतगुरु हजूरी करें। निजाते शफाअतासो पूरी करें॥ परमधाम पहुँचावे चारों वजीर। चले साथ ले मर्दुमाने अफीर॥ धरमदासऔवलब सिमते शुमाल। किरोशन है जिसकी मुहब्बतकमाल यह औवल गुरु सबके शिरताज हैं। कि सब आदमी पैरवाँ आज हैं॥ बयालीसवंश उनके रोशनजमीर। मुकाबिल है जिसहेच बद्रे मुनीर॥ गुरु दूसरे हैं बजानिब जुनूब। चतुर्भुजसाहबजिवअमाबरुशखूब सत्ताईस वंश उनके हैं ताजदार। दखिन देशके आदमीबाजदार ॥ गुरु तीसरे रायबनके बशिक। लियातरुत ओ ताजशाहीबफकी॥ सोलहवंशले हुकम जारी करें। जो सतगुरुतवरसल तयारी करें॥ गुरु चौथे सदते बमगरब कहे। बमै सात फरजंदके छिप रहे ॥ ये चारों गुरु मुक्तिके रास हैं। फकत एक जाहिर धरमदास हैं॥

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कबीर चरित्रबोध

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धरमदासका सब पसारा हुआ । जहाँमें जहाँतक हजार हुआ ॥ न अबतक वह जाहिर गुरु तीन हैं। कि सतगुरुके फरमान आधीन हैं॥ गुरु चार दुनियाँमें जब आयेंगे । नहजदे करी दौर दिखलियेंगे ॥ तो सारीजमीमें हो यह गुलगुलः। है सतनामसतऔर सब बुलबुलः॥ सिलहशोरतीनों कभी गाहमें । है पोशीदः सतगुरु हुकुम चाहमें ॥ निकल जब पड़ीं फौजसालार तीन । हो सुक्तिसे मामूर सारीजमीन ॥ बमै वंश चारों हुकुम पायेंगे । शपातीं किधरके किधर जायेंगे ॥ पड़े शोरआलममें सत् नामका । हो शोदरः निजाते सरअज्जामका ॥ बहर सिम्र डंका है साहब कबीर । फिरें बोलते सत्यनाम सफ़ीर ॥ गुरु चार सतनाम डंका दिया । पुरुषकालके दिलमें सनका दिया ॥ बहरसू जुझाऊ बजे डट्टठोल । कि सबकैदियोंकीही जंजीर खोल ॥ बजै झांझ औ शंख मिरदंग जो । जिसे देखते दूत दल दंग हो ॥ न वे जूर पुर नूर है सब समात । तुलू महहै कटगई सारी रात ॥ गुरु चार हरजाय बोले नकीब । न बाकी रहा और कोई है कीब ॥ करे गुफतगू उनसे जो दूबदू । मती सारे उनके न कोई अदू ॥

धर्मदास साहबके बयालीस वंशकी प्रशंसा ।

उर्दू शेर

धरमदासके जो बयालीस वंश । सो सब सत्य सुकृतिके रूपहंस ॥ जुदागानः तारीफ़ उनकी लिखैँ । कदमदतकेपर अपने शिरकोरखैँ ॥ है औवल मचन वंशचौरामनी । गुरु सत्यमारग धरमके धनी ॥ कि इनसांका जिसमें गुजारः हुवा । परमपुर्ष यह पर नजारः हुवा ॥ वचन जो सतगुरुका अवतार है । उसीके महर्जीव भवपार है ॥ सुदर्शन साहब दूसरे नाम जो । करे जीव भवपार कण्डहारसो ॥ जोकुलपतिसाहबतीसरेनामदार । पनह जिसके सबजीवहों कामगार ॥ जोपरमोदगुरुचैथेबाला हैं पीर । सोशाफीबनाजीजेखतर खतीर ॥

नं. ११ बोधसागर - १

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बोधसागर

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कमलनाम साहब कहुँ पाँचवाँ । जगतके गुरु पीर सो बेगमाँ ॥ हैं छठएँ खुदावन्दनामेअमोल । किजिसखौफसेभागजायमकेगोल॥ जो सूरत सनेही साहब सातवाँ । कि जंगी मेहर देखिये आतमाँ ॥ जो पैदा हुए आठवें नामइक । मलिकमौतका होगया सीनःशक ॥ नवैपाकसाहब हुए नामपाक । सरमभूतको सो मिलाया है खाक॥ प्रकट नामसाहब प्रकट हैं दहम । किसामानमुक्ती किया सोबहम॥ धीरजनामसाहबइग्यारहवें जो आये । किधीरजनिगहजीवधीरज हुए॥ उगरनाम साहब हुए बारहवें । परमपंथ परचार इस अहदमें ॥ तेरहवीं उदय पहने आदमकबा । तोजमशेर गुराँभगाहुम दबा ॥ हुई तेरहवीं कुरसी आली दिमाग । कि दरजा हरेहोगयेखुशकबाग॥ हुवा जोर वो शोरसंतनामको । सला है करमखास ओ आमको॥ मिलीं बारहों पथ इस अहदमें । सतायश करें गुरुकी यकमहदमें ॥ कुरु नामसाहब कहे चौदहवाँ । कि जिनकी बुजुर्गी बदरहो जहाँ॥ जो परकाश परकाश हो रही । सना इन्द्रअस्त नाम दरजा कहीं॥ उदितसोलहवीं साथ जोशन हुए । तो जम जङ्गमें नाम रोशनहुए॥ किजब सत्रहवींहोवें साहबसुकुन्द।हुएकालके दाँत इसवक्त कुन्द॥ अरधनाम अट्टारवी दर्दमंद । कि आवागमनकी किया राह बंद॥ जो उन्नीसवीं नाम ज्ञानी गुरु । करै जीवको पुर्षके हबरू ॥ कहो बीसवीं साहब हंस मन । न जिनसे लगे कालका कोई फन ॥ सुकृतिनामसाहबहुएबीसएक । तो सुरकीरतकी जगमें रहैखुब ठीक॥ अरजनाम बाईस जाहिर हुए । तो इनसां परमपदके माहिर हुए ॥ हैरसनाम साहब जरसबीस तीन । सुन आवाजताबेहुई सबजमीन॥ हों चौबीसवीं गंग मुनिसाहब गुनहसे हों सब आदमी तायब ॥ पुरुषनामसाहबदरसबीसपाँच । नजिउकोलगेसंगेसोजाकी प्राँच ॥ छबीसवीं जाग्रतनाम साहब जगे । नइनसाँकोरहजनवठगतबठगे ॥

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कबीर चरित्रबोध

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हुए भृगुमुनि साहब सातबीस । रहेरास्त दुश्मनदियाजिसनेदींस ॥ अस्त नामसाहबकहेबीसआठ । कियमदूतकोजोदियामारकाट ॥ हैं उन्तीसवीं साहबकंठ मुन । कियाकालको मारकरसो दफन ॥ हैं सन्तोष मुनिसाहब तीसवें । पयान पुरुष आवें इस अहदमें ॥ यह खुशवक्त दैरांदिखाया हमें । परमपुरुष पैगामा आया हमें ॥ जमीं सारीसतनामकी हाँकहै । तोदरकौमको सुत्तिकी झाँक है ॥ हुई सारे आलममेंयहधूमधाम।तअस्सुबत जो और भजोसत्यनाम॥ जमी सारी पर हुक्मरानी हुई । बाहर कौमपर मेहरबानी हुई ॥ यहूदी तिसार मुसलमां हिन्दू । पढ़े कमलये सत्यनामसे हुरूदा ॥ चातर्कनामसाहबकाएकतीसदौर । जमींपरनबाकीरहेयमकाजोर ॥ बत्तीसवेंबरामदहुएआदिनाम । हुएसारेनफसानीहरकतगुलाम ॥ हैं तेतीसवें वेद नामें बुजुर्ग । कि जिस सामने हो न शैता सतर्ग ॥ साहब आदिनाम हुए तीस चार । कि उसमेहसेजीवहों कामगार ॥ महानाम साहब हैं पैँतीसवाँ । जमीपरहुवा है अमन ओ अमाँ ॥ छ्तीसवें हैं निजनामसाहबखदीन । नबाकीरहेरेवकुछनफसदेन ॥ साहबदाससाहबकासैतीसअक्ष । दियबारशइनसानकेजिसने वक्ष ॥ उदयदाससाहबहों अडतीस पुश्त । इलमतिलमसबमें न कोईदुरस्त ॥ कुरदनामसाहबकानौतीसवक्त । बहरहोजहाँजिनकोहैताजोतरक्त ॥ चेहले हग मुनीसाहबनामले । तोसत्यलोककोआदमीसबचले ॥ महामुनि साहबनामचालीसएक । बदी बेखकुन आदमीसारेनेक ॥ बयालीस मुक्तामनी साहब है । आखिर जमां सत्पुरुष नायब है ॥ यह जबतक बयालीस पीढ़ी रहे । परमधामकी जगमें सीढ़ी रहे ॥ बयालीसका जबतलक नाम है । नकब्बीरका जगतमें काम है ॥ यह सद्गुरुकेसबहंस हैं जानशीं । परमपुरुषके सारशब्द अभी ॥ बयालीस जबतक रहेंगे वजीर । जहाँमें न जाहिरफिरेंफिर कबीर ॥

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बोधसागर

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बहर एक करमाँ खाईं खिताब । कहे हैं खुदावनन्द ऐसा हिसाब ॥ बरसइनके पच्चीस ओबीसरोज । हरकेतख्तपरहोवैरौनकफिरोज ॥ हजार एक ऊपर दो पआहसाल । महेतीनदिनबीसगद्दीबजाल ॥ इतेरोज सतपुर्ष फरमान है । जो आवे शरण सोईं निर्वान है ॥ जो सतपुर्षके हंस गायब हुए । न होंबहरःवरकोइजो साहब हुए ॥ यहकलियुगमेंसतयुगगुजरजायगा । पुरुषकालकाअहदतबआयगा करे आदमीफिरजोतदबीरकोट । कर्मीसोसकेनाबचाययमकी चोट ॥ मेरी बात जो कोइ जाने दरोग । कभीफेर उसको न होवे फरोग ॥ परमपुर्ष पीरों शनासिन्दगाँ । उसी लोक जावैगे सो वन्दगाँ ॥ यहकलियुगमें सतयुगलगी हैलडी । वहरसिम्तहैआवेहैवांवाझाड़ी ॥ हैंगुरुमुखकोईउसकेनोशिन्दगाँ । जोसतगुरुमोब्बतमेजोशिन्दगाँ ॥ जोउसगुरुकेमिलनेकीकोशिशकरे । अजरओअमरजामःपोशिशकरे जो पहचानसोईं हैं शाहशहाँ । न जाने जिन्हें आदमी इवलहाँ ॥ बयालीसका जबसे ठीका हुवा । नइनसानका बाल बीकाहुवा ॥ यह माहूद ठीका जो पूरा हुवा । तो यमजालका फिर जुहरा हुवा ॥ मो इसअदहमें हो कोई बख्तमंद । जेदे बामबाला बनामैं कर्मद ॥

गजल

बयालीसवंशतगुरुकीनिशानी । हैं बखशिन्दःहयातेजानहानी ॥ उसीहमशक्कु सबनाखुदायह । रहे दुनियामें जबतक यह कहानी ॥ सनारुवानीहैंकरतेहंसजिनकी । कहे सौबारसत गुरुखुद जबानी ॥ तमीजो अबल से खुद पर्वलीजे । मकामें हंस आये कामकानी ॥ दरोगोंरास्त अब पहचाना होगा । जो मुतफार्क करेंगे दूधपानी ॥ कदमउनकेपकड़परवाज कर अब । गुजरबग चालसे अपने डुरानी ॥ हवासे अकू ओ हम लंगपा हैं । वहाँ पहुँचे नकुुरआं वेदबानी ॥ समझओ बूझकरलीजैखमोसी । अब जिसिकेमिलेगी आसमानी ॥

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कबीर चरित्रबोध

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करे क्या यह बनी आदम बेचारा । मदद पावे न जबतक आसमानी ॥ पेयालाइशक पीकर मस्त होजा । जो चाहे चेहरे खुद अरगवानी ॥ पड़े खाते हैं गोता भेष पारखंड । बरहमन भाट औं मुखा कुरानी ॥ मेहर हो गाय बकरी सुरगिया । खुरावन्द मोहाफिजपासवानी ॥ उतर चलपारइसदरियाके आजिज । हुई तुझपरजौसुरशिदमेहवाणी ॥

यह चार गुरु तथा बयालीस वंश जो मुख्य कबीरपंथी कहलाते हैं उनका विवरण हो चुका । इस समय धर्मदासके साहबके वंश उपस्थित हैं और उन्हींके पंथ दिखानेसे समस्त मनुष्य सत्यलोकको जाते हैं । दश स्थानोंका चिह्न जो मैंने दिया उन सब स्थानोंका पंथ इन्हींकी दया द्वारा प्राप्त होता है और नौ स्थानोंका पार करके दशमें स्थानको पहुँचता है । इन समस्त स्थानोंके बीचमें शून्यकी डोरी लगी हुई है । वे शून्य ( खला ) की डोरियाँ हैं उन डोरियोंके भिन्न २ नाम कबीर साहबने कहे हैं । उन डोरियों पर सत्यगुरुके पंथ दिखानेसे हंस चढ़कर पार जाते हैं । जबलों पारख गुरु नहीं मिलता तबलों उन डोरियोंकी तनिक भी सुध नहीं मिलती । ये गुरु लोग भवसागरके पार उतारनेवाले हैं । उनकी प्रशंसा अनेक बेर स्वयम् कबीर साहबने की है । देखो ग्रन्थ श्वासगुआर ।

साखी-बिरछा नहीं फल भरवैं, नदी न अचवैं नीर ।

परमारथके कारणे, सन्तन धरा शरीर ।

सन्त बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय ॥

तस बुझावे औरकी, अपनो पारस लाय ।

साधु सराहैं ताहिका, जाको सतगुरु टेक ॥

टेक बनाए देह भर, रहे शब्द मिल एक ।

सत्य शब्द हित जानके, सुमिरे सतगुरु धीर ॥

धरमदास तुम वंशको, सिरज्यो गुरु कबीर ।

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बोधसागर

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चौपाई

सत्य सुकृति सुमिरो मन माही । दूटत बन्न राखलेउ ताही ।

साखी-सत्य सुकृतिकी बालक है, जो चितवै कर डीठ ।

ताजन तोरौ चौहटे, गुनहगारकी पीठ ॥

जदि्या कहूँ तो जगतरै, परकट कहो न जाय ।

गुस परवाना देत हौं, राखो शिरे चढ़ाय ॥

जिन डरपो तुम कालका, कर मेरी परतीत ।

समद्रीप नौ खण्डमें, चलिहौ भवजल जीत ॥

यहाँलौं तो चार गुरु और बयालीस वंशका लेखा लग चुका है इनके अतिरिक्त कबीर साहबके बारह पंथ और भी कबीर-पन्थी ही कहलाते हैं ।

कबीर साहबके पंथोंका वृत्तान्त

१-नारायणदासजीका पंथ । २-यागौदासजीकापंथ । ३-सूरत गोपाल पंथ । ४-मूलनिरञ्जनका पंथ । ५-टकसारी पंथ । ६-भगवान्दासजी का पंथ । ७-सत्यनामी पंथ । ८-कमालीपंथ । ९-राम कबीर पंथ । १०-प्रेमधामकी वाणी । ११-जीवा पंथ । १२-गरीबदास पंथ ।

यह तो कबीर साहबके बारह पंथ हैं । इनमें कोई २ अच्छे हैं । और कोई निबेल विश्वासके हैं । और रामकबीरके लोग ठाकुरपूजा करते हैं । और सत्यनामियोंके ध्यान भी विचलित प्रायः हैं । इन बारह पंथोंका यही विवरण है और इन बारह पंथोंके अतिरिक्त कबीर साहबके और पंथ भी हैं ।

कबीर साहबके भिन्न २ पंथोंका वृत्तान्त

नानकपंथ-दादू पंथ-यानिप पंथ-मूलकदास पंथ-गणेश पंथ इत्यादि ।

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कबीर चरित्रबोध

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इन पंथोंके अतिरिक्त हिन्दू और मुसलमानोंमें कबीर साहबके कितने ही पंथ हैं जिनकी यथार्थता अभीलों भली भाँति ज्ञात नहीं हुई है इस कारणसे मैं कुछ लिख नहीं सकता हूँ। और कितने पंथके लोग ऐसे हैं कि, जिनके पंथके मनुष्य अब कबीर साहबको नहीं मानते सुतरां नानकशाह और दाउद राम और शिवनारायणदास इत्यादि।

जो लोग कबीर साहबको नहीं मानते उनका नाम शिष्योंमें लिखना किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है। तो भी यह नहीं कहा जा सकता है कि, जो कबीर साहबको नहीं मानते हैं उसमें उनके गुरुओंका दोष है। अथवा उनके पंथदर्शकोंका जिसको दोष होगा वही दोषी माना जावेगा।

महाप्रलयका वृत्तांत

महाप्रलयके विवरणका निचोड़ यह है कि, प्रलयके अनेक भयानक चिह्न परिलक्षित होंगे और पृथ्वीपर पाप विशेष होंगे। महाप्रलयके सवासौ वर्ष पूर्वपर्यन्त बराबर ग्रहण लगाता जावेगा, एकसौ वर्ष पर्यन्त बगबर चन्द्रग्रहण होगा और इसके उपरान्त सूर्यग्रहण होगा जब सूर्य और चन्द्रग्रहण समाप्त हो चुकेगा तब महाप्रलय आवेगी। इतनी पानीकी विशेषता होगी कि, पृथ्वीसे ऊपर इतना ऊँचा चढ़ेगा कि, जलकी लहर व झाग दश सहस्र योजन ऊँची उठेगी और समस्त जीव मर जावेंगे और समस्त शून्य हो जावेगा। पृथ्वी तथा आकाशमें कहीं कुछ दिखलाई नहीं देगा। और समस्त संसारकी रचनाको कालपुरुष समेट लेगा। और पांच तत्त्व तीन गुण कालपुरुषमें समाजावेंगे और आद्याको कालपुरुष निगल जावेगा। और निरंजनके मस्तकमें एक अर्ध गोलाकार

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बोधसागर

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प्रसादशृंगके समान एक स्थान है उसी स्थानमें समस्त रचना सूक्ष्म वेषमें होकर प्रवेशित हो जाती हैं । और समस्त रचनाको वह अपने मस्तकके उसी विशेष स्थानमें रख लेता है और समस्त रचनाको अपने शिरके बीचके गुम्बदमें लिये हुए सत्तर युगपर्यन्त बराबर शून्यमें फिरा करता है, सत्तरयुगके उपरान्त उसका चित्त व्याकुल होता है । जब एकान्त होनेके कारण उसके मनमें अत्यन्त घबराहट होती है और उससे कुछ हो नहीं सकता है और वह अपने चित्तमें यह सोचता है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ और वह बल अपनेमें नहीं पाता और दुःखी होता है कि अब क्या करूँ ? तब वह सत्यलोककी छाया अर्थात् आस पास जाकर निवेदन करता है तब समर्थकी आज्ञा होती है कि, ऐ ज्ञानी ! शून्यमें निरंजनके पास जाओ और कहो कि, वह जाकर अब कर्मजीकी पीठके ऊपर तीन लोककी रचनाका प्रस्तार करे । उस समय ज्ञानीजी सत्यपुरुषका समाचार लेकर निरंजनके पास जाते और समर्थकी आज्ञा सुनाते जब पुरुषकी आज्ञा सुनता है, उसी समय निरंजन दौड़कर कर्मजीकी पीठके ऊपर तीनों लोककी रचनाका सामान करते । तब निरंजन अपने मुँहसे आद्याको उगल देता और आद्या तथा निरंजन मिलकर तीन देवताको उत्पन्न करते फिर पांचों मिलकर सब सृष्टिकी उत्पत्ति करते और पहले सत्यस्वरूप सृष्टि उत्पन्न होती है और सब लोक नितान्त ही धर्मात्मा होते हैं और जैसा कुछ कि, मैंने पूर्वमें लिखा है उसी प्रकार समस्त रचना प्रकट होती है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति तथा विनाश हुआ करता है । और जब उत्पत्ति होती है तब इसी प्रकार कबीर साहब मनुष्योंकी शिक्षा

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कबीर चरित्रबोध

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के निमित्त पृथ्वीपर आया करते और मनुष्योंको मुक्ति प्रदान किया करते हैं ।

यह तो ब्रह्माण्डके महाप्रलयका विवरण हुआ और इसी प्रकार पिंडकी प्रलय भी होती है । कारण यह कि, जो कुछ पिंडमें है सोई ब्रह्माण्डमें है तनिक भी न्यूनता नहीं है । परन्तु सबसे बड़ा महाप्रलय भी एक दिवस होगा । जब केवल एक सत्यपुरुष और सत्य लोकही रह जावेगा और कहीं कुछ न रहेगा । अर्थात् दयाद्वीप नासुतसे लेकर सहज द्वीप अर्थात् आहूत स्थान पर्यंत सब विलोपित हो जावेंगे । केवल सत्य-लोकमें ही शान्ति रहेगी । और सत्य लोकके हंस सब सुरक्षित और सत्यपुरुषकी रक्षामें सदैव समान रहेंगे ।

कबीर साहबके अन्तर्धान होनेका वृत्तान्त

जब काशीके मनुष्योंने कबीरसाहबकी अनेक लीलाएँ देखली और जान लिया कि, यह तो स्वयम् परमेश्वर हैं और न किसीके मारनेसे मरते हैं न काटनेसे कटते हैं और न डुबानेसे डूबते हैं और न जलानेसे जलते हैं और न कोई हथियार आपके ऊपर फलित होता है और न मनुष्य तथा पशु और देवता आदि आप पर किसी प्रकारकी क्षति पहुँचा सकता है । तब उन लोगोंने आपसे पूछा कि, आपकी मृत्यु क्यों कर होगी ? उस समय आपने कहा था कि मैं मग्नह देशमें जाकर छिप जाऊंगा । अपने कथनानुसार जब कबीर साहब एकसौ बीस वर्ष पर्यंत काशीजीमें रह चुके । दो दिवस आपके जानेमें शेष रह गए तब आपने लोगोंसे कहा कि, अब मैं यहाँसे कूच करूँगा और मग्नह देशको जाऊंगा-वहाँ छिप रहूँगा । यह बात सुनकर

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बोधसागर

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काशीके लोगोंको अत्यन्त दुःख हुआ और दुखका बादल काशीजीपर छा गया और लोग अत्यन्त दुखित हुए और कहने लगे कि, आज काशी शून्य तथा उजाड़ जान पड़ती है। आज काशीका सूर्य छिप चला और नेत्रोंके सामने अन्धकार होने लगा, सब लोग कहने लगे कि हाय ! हम बड़े ही अभागे हैं हमने ऐसे सत्यवादी महात्माकी आज्ञाको अंगीकार नहीं किया। समस्त नगरमें इस बातकी धूम मच गई कि, अब कबीर साहब काशीजीसे चले जावेंगे। समस्त नगर दुःख तथा कष्टसे भर गया। काशीके लोग हाहाकार करते और कहते थे कि अब हम क्या करेंगे ? हाय ! हमने ऐसे महात्माका कहना नहीं माना। पीछेसे खरा खोटा जान पड़ता है। अबलों हम लोगोंको दिखलाई नहीं दिया। राय वीरसिंह बघेल राजा बनारसने जब सुना कि, सत्यगुरु मग्नह देशको जावेंगे वहां जाकर अन्तर्धान हो जावेंगे। अब जानेके केवल दो दिवस शेष बचे हैं तब उक्त राजा अपने दलबल सहित पहलेहीसे वहां जा पहुँचा और वहांपर सत्यगुरुकी प्रतीक्षा कर रहा था। काशीवासी कबीर साहबको घेर रहे थे और उस समय आपके समीप दश सहस्र सेवक शिष्य उपस्थित थे, उनमें कुदराम पड़ रहा था और सब बिलाप कर रहे थे और मग्नह देशका अधिपति नन्बाब बिजलीखां पठान था। वह पठान कबीर साहबका शिष्य था। जब उसने सुना कि, कबीर साहब अपना अन्तिम दिवस यहाँ करेंगे तब बड़ा प्रसन्न हुआ कि, भली बात हुई कि, सत्यगुरु अपना अन्तिम दिवस यहाँ करेंगे मैं अंतिम किया तथा कफन दफन सब कुछ अपने मत्यनुसार करूँगा। वह आपकी प्रतीक्षा

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कबीर चरित्रबोध

( १८७५ )

कर रहा था और कबीर साहब काशीसे चलकर मग्नहदेश को जा पहुँचे । आमी नदीके किनारेपर किसी साधुकी कुटी थी इस कुटीमें जाकर वह बैठ गये । और इस समय राजा वीरसिंह और नौवाब बिजलीखाँ और कबीर साहबके बहुत सेवक और शिष्य थे । वह नदी जिसके किनारेपर कबीर साहब आकर बैठ गए थे, वह अनेक दिवसों शुष्क पड़ी थी तब कबीर साहबने गुप्त रीतिसे कमलपुष्प तथा दो चादरें मँगाई और आप लेट गये और लोगोंसे कहा कि, अब ताला बंद कर दो । तब राजा वीरसिंहने कहा कि, गुरुजी मैं आपके शवको लेकर हिन्दू धर्मानुसार किया कर्म इत्यादि करूँगा । तब नौवाब बिजलीखाँ बोले कि, मैं आपको ऐसा कदापि करने नहीं दूँगा, मैं मुसलमानधर्मानुसार उनकी कफन दफन करूँगा, तब कबीर साहबने देखा कि, ये दोनों युद्धके निमित्त प्रस्तुत हैं, इसमें व्यर्थका रक्तपात होगा और दोनोंको युद्धके निमित्त प्रस्तुत-दोनोंको दलबल सहित-प्रस्तुत पाया । तब आपने दोनोंसे समझाकर कहा कि, सावधान दोनों आपसमें विवाद न करना और कदापि शस्त्र मत चलाना जो मेरी बात मानेगा सो प्रसन्न रहेगा, और सत्यगुरुकी आज्ञाको दोनों दलने स्वीकार कर लिया । तब सबोंने सत्यगुरुको दंडवत् प्रणाम किया और सबका चित्त खेदसे भर गया तब कबीर साहबने चलानेका शब्द पढ़ा और चादर तानकर लेट गये अपने सुंहपर कपड़ा ले लिया और लोगोंसे कहा कि, अब इस कोठरीका ताला बन्द कर दो लोगोंने वैसाही किया । जब ताला बन्द किया तब एक ऐसा शब्द हुआ कि, जिसको सुनकर उपस्थित मनुष्योंके चित्तपर बड़ा प्रभाव पड़ा और जयजयकार हुआ कि, सत्यगुरु सत्यलोकको सिधार गये ।

( १८७६ )

बोधसागर

५२

जब उस कोठरीका ताला खोला तब केवल दो चादर मिले और कुछ कमलके पुष्प मिले, इनमेंसे एक चादर और आधे फूल राजा वीरसिंहने लिये और दूसरी चादर और कमलके फूल नौवाब बिजलीखाने लिया। कबीर साहबका शव कहीं दिखलाई नहीं दिया। राजाने चादर तथा पुष्प लेकर सत्यगुरु की समाधि काशीमें बनायी और बिजलीखाने भी समाधि बनायी जो मगहरमें है।

हिन्दू मुसलमान दोनों गुरुभाइयोंने एक मंदिर बनाया। अब्यापि हिन्दू मुसलमान दोनों कबीरपंथी वहाँ मौजूद हैं। आमीनदी जो बहुत कालसे शुष्क पड़ी थी उसमें जल भर गया। जो अबतक प्रवाहित है, अगहन सुदि एकादशी सम्बत् १५७५ विकमीको कबीर साहब छिप गये। अन्तिम प्राकट्य में एक सौ उन्नीस वर्ष पाँच महीने और सत्ताईस दिवसों पर्यंत आम पृथ्वीपर लोगोंको शिक्षा देते रहे थे।

कबीर साहबका आदि और अन्तमें शरीर नहीं था केवल एक तेजका प्राकट्य था। ऐसा ही कबीर साहबका प्रकट होना तथा छिप जाना है। जब इच्छा हो तब प्रकट हों और जब इच्छा हो तब छिप जावें। जब कबीर साहब मगहरमें गुप्त हुए तब पुनः मथुर नगरमें प्रकट हुए, वहाँ रत्नको शिक्षा देकर फिर धर्मदासजीको बाँधोगढ़में दर्शन देकर उनको सब सत्यपंथका पथ और धर्म धर्मकी राह बता बयालीस वंशके नियम भली प्रकारसे कह और कालपुरुषके कपट जालसे भली भांति सावधान करके अन्तर्धान हो गये।

गजल

खुरशेद परख परतव मादूम हुआ है इन्सान खबर खैरसे

१३

कबीर चरित्रबोध

( १८७७ )

महकूम हुआ है ॥ आई जो खिजां और गया वक्त बहारी । बुलबुल गुजरा जाए नशीं बूम हुआ है । है कौन जहाँमें जो मिट्टा डाले वह तस्तीर । जो कुछ कि कजा काजी से मरकूम हुआ है ॥ तकदीर बयक नाकः बिठाला है दो महमल । एक नेकनुमा दूसरा बदशूम हुआ है बाकी न रहे और कहीं शम्स शोआय । अफवाज लिये तब मेह मालूम हुआ है ॥ पा खाक तेरेसे धरा एक जर्ः सर अपने । सो रहम दो दारैन का मौसूम हुआ है ॥ जो जहर मो अस्सर बहमः सालिको मसलूक । हर इन्स व जिन उससेही मससूम हुआ है ॥ आई सब और पुशत दिखाया शहे आदल । रैयत जमाः जम जोरसे मजलूम हुआ है । इस अहदमें कोई न सुन मर्दूम फरियाद । मखलूक मलिक मौतका महकूम हुआ है ॥ है मौत का चारः आदम जाद बिचारः । अज रोजे अजल उसके ही मकसूम हुआ है ॥ क्या कह सके तुझे न कहा जाय सो आजिज । जो कुछ कि तुझे गैबसे मफहूम हुआ है ॥

कबीरपंथके धार्मिक नियम

कबीर मन्शूरसे

१—एक अविगत अतीत ब्रह्म सत्य पुरुषकी भक्ति करना, उसके अतिरिक्त किसी ओर भी ध्यान न करना । वह ब्रह्म ( सत्य पुरुष ) केवल पारख गुरुकी शिक्षा और स्वसंवेदक अध्ययन ( पढ़ने ) से जाना जाता है, अन्य कोई भी मार्ग उसके प्राप्तिका नहीं है ।

२—सत्य पुरुष और कबीर साहब एकही हैं, केवल नाम मात्रका ही भेद है ! वह एकही दो नामसे कहे जाते हैं, उनमें

( १८७८ )

बोधसागर

१४

लेशमात्र भी भेद नहीं समझना, जो भेद समझेगा उसकी मुक्ति होनेमें भी भेद रहेगा ।

३—अपने गुरुकी सेवा तन, मन, धनसे करना । गुरु वचन का विश्वास करना । गुरुका आज्ञाकारी रहना । सत्य कबीर और गुरुमें कुछ भी भेद न समझना, गुरुके ऐश्वर्य्य और सिद्धि आदिका विचार न करना । जो अपने गुरु को ईश्वर करके मानता है और ईश्वरके समान ही उसमें भक्ति रखता है उसीका कार्य्य पूर्ण होता है । जो गुरुमें भेद बुद्धि करता है वह हतभाग्य सदा निष्फलता ही पाता है ।

अपने उपार्जनका दशवाँ भाग अवश्य गुरुके भेंट करना । सदा अधीनतासे गुरुका धन्यवाद करते रहना ।

४—साधुकी सेवा, भेदबुद्धि त्यागकर, सदा प्रेम और भक्तिसे करना जिसपर सत गुरुकी दया होती है, वही दोनों लोकोमें भाग्यवान होता है । वही दोनों लोकोमें सफलकाम होता है ।

सर्व प्रकारकी साधुओंकी सेवा निष्कपट हृदयसे करना परन्तु ज्ञानी विचारवान, विवेकी पारखी सन्त जो सत्य पुरुषकी भक्तिका उपदेशकर सदाचरणमें लगावें, उनकी सेवामें सदा तत्पर रहना । विशेषतः स्वधर्मके सच्चे विवेकी सन्तोंकी शिक्षाको सावधानीसे सुनना और उनको ध्यानपूर्वक विचारना चाहिये क्योंकि, स्वधर्ममें पूर्ण और दृढ़ सन्तोंके वचनसे धर्ममें दृढ़ आस्था और स्वधर्म प्रवीणता होती है । इसके उलटा परधर्म ( विपक्षीधर्म ) के पक्षपाती साधुओंके वचनसे स्वधर्ममें अश्रद्धा और भ्रम होता है ।

१ पर धर्मके पक्षपातीको अपने धर्म पुस्तकमें भी किसी प्रकारसे हस्ताक्षेप करने न दे । उनसे कभी भी अपनी धर्म पुस्तकके गुढ़ करने अथवा अनुवाद आदिकी अभिलाषा न करे ।

९५

कबीर चरित्रवोध

( १८७९ )

जिस साधुमें अपने गुरुसे मिलते हुए गुण पाये जावें उसको अपने गुरुसे भिन्न न समझना, अभेद बुद्धिसे श्रद्धापूर्वक निष्क-पट भक्ति करना ।

५-सर्वे चराचर जीवधारियों पर समान भावसे दया रखना किसी स्वरूप आकारमें भी कोई जीवधारी हो सबको अपने शरीर और आत्मा समान जानना । किसी देशकालमें भी किसी जीवधारीको दुःख न देना । संसारमें अपना निर्वाह इस प्रकार करना कि, कभी भी अपनी ओरसे किसी जीवधारीको किसी प्रकारकी हानि न पहुँचे । सब जलचर, थलचर, वनचर, पशु, पक्षी, स्थावर जंगम पर समान दया दृष्टि रखना, सबको अपने ही शरीर और प्राणके समझना ।

६-मांस आहारको सब घोर पापोंमें बड़ा पाप समझना । मांस अहारी चाहे कैसे भी गुण और पुण्यसे पूर्ण क्यों न हो परंतु कभी भी वह सत्य मार्गको प्राप्त नहीं कर सकता । मांसाहारी आत्मज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकता, उसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।

७-मदिरा तथा अन्य सर्वे मादकपदार्थ भी मांसके समान ही त्याज्य हैं । कोई मादकपदार्थका व्यसनी ध्यान नहीं कर सकता, ध्यान बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता, ज्ञान बिना मोक्ष नहीं मिलता ।

८-व्यभिचारी नर्कको प्राप्त होता है ।

९-जितने आकार और रूप ब्रह्माण्ड हैं वे बुत कहलाते हैं, उनमेंसे किसीको भी पूजनेवाला मोक्षका अधिकारी नहीं हो सकता । जिस प्रकार बुतपरस्ती ( मूर्तिपूजा ) ज्ञान

१-आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पश्यति ।

( १८८० )

बोधसागर

९६

मार्गकी टट्टी है, उसी प्रकार गुरु मूर्तिके ध्यान और उसकी भक्ति, ज्ञानद्वारकी कुंजी है ।

१०—जो कुछ भोजन, छाजन आदि अर्थात् अपने यात्रा सम्बन्धी पदार्थ होवे, सो सब प्रथम परमात्मा ( सत्यपुरुष ) को अर्पण करले तब स्वयम् स्वीकार करना ।

कोई भी पदार्थ जो प्रथम किसी देवी देवताको अर्पण हो चुका हो उसे सत्यपुरुषके भक्ति करनेवालेको कदापि ग्रहण न करना चाहिये उसे कभी भी अपने काममें न लगाना चाहिये क्योंकि सत्यपुरुषको अर्पण किये बिना किसी भी पदार्थका ग्रहण करना महापाप है और जो पदार्थ दूसरे देवी देवताको भोग लग गया वह सत्यपुरुषको अर्पण हो नहीं सकता क्योंकि दूसरे देवका अर्पित पदार्थ सत्यपुरुषको अर्पण करना एक तुच्छ सेवकके जूठे पदार्थका बादशाहको अर्पण करनेके तुल्य महान अपराध और अनर्थका कर्ता है ।

सत्यपुरुषको भोग लगाये बिना भी कदापि कोई पदार्थ ग्रहण न करे । जो सत्यपुरुषको अर्पण करके किसी पदार्थको ग्रहण करता है उसका फल अमृत समान मिलता है इसलिये उचित है कि, अत्यन्त शुद्ध और स्वच्छ भोजन आदि काममें लावे ।

११—न झूठ बोलना न झूठ वचन देना, न झूठे का संग करना और न झूठेसे किसी प्रकारका व्यवहार करना ।

१२—न चोरी करना, न चोरोंको साथ देना, न उनकी सम्मतिमें सहमत होना, न उनको सम्मति देना न उनका माल लेना, न उनके निकट जाना ।

१३—जूआ न खेलना, जूआ महान दुखका घर है,

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कवीर चरित्रबोध

( १८८१ )

जुआरियोंकी महान् दुर्दशा होती है। महाराज नल, महाराजा युधिष्ठिर आदि पुण्यस्वरूप धर्मावतारोंको भी इस जूआने कैसा नष्ट और दुर्दशाग्रसित कर दिया। जूआ, झूठ, चोरी, व्यभिचार और हिंसा आदि सब पाप परस्पर ऐसे संबन्ध रखते हैं कि, एक दोष आनेसे क्रमशः सर्व आपही आप आ जाते हैं। इनमेंसे एकको भी धारण करनेवाले पुरुष महान् कष्ट और दुःखोंको संसारमें अनुभव करते हुए परलोकमें नर्कके भागी होते हैं।

१४-शरीरके ऊपर द्वादश तिलक लगाना, कपालमें खडी लकीरके समान सीधी तिलक करना, वैसे ही मस्तक, दोनों आंख, नाभि, हृदय, दोनों भुजा और दोनों छातीसे लेकर मोटे-की ओर फिरता हुआ, पीठपर और कानपर तिलक करे।

१५-बल्ल श्वेत और उज्ज्वल रखे।

१६-ग्रीवामें तुलसीकी माला और तुलसीकी कंठी धारण करे।

१७-सत्य नामका जप, कीर्तन और भजन करे।

१८-सत्य पुरुषकी भक्ति और सत्य पंथका उपदेश करे।

एक मनुष्यको सत्य पुरुषकी भक्ति और सत्य पंथमें प्रवेश करानेका फल कोड़ों गऊको कसाईके हाथसे बचानेके पुण्यसे भी बढ़कर है।

१९-यंत्र, मन्त्र, तन्त्रादिकी ओर कभी ध्यान भी न दे, ये मुक्ति और भक्तिके शत्रु हैं, इनका साधन करनेवाला छल कपटक न्यसनमें फँसकर महा दुराचारी हो नर्कका अधिकारी होता है, जितने तन्त्रादिके साधन हैं सब नर्कके मार्ग हैं।

२०-स्वसंवेदके बिना दूसरी पुस्तकोंसे मुक्तिपथ मिलनेकी

१ यंत्र मन्त्र तन्त्रका आशय देखो, पण्डित श्रद्धामणि फिल्लोरी विरचित सत्यामृत प्रवाह पृष्ठ १८० में।

२-वेदादी विद्या सब, बोध हेतु हिय धार। सब मत महर्षम करे, तब देखो निजसैन ॥