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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय श्री ष्णोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीकृष्णके परिवारोंके रूपमें विभिन्न देवी-देवताओंका अवतरण, श्रीकृष्णके साथ उनकी एकरूपता

श्रीकृष्णावतारसे पूर्व जब देवताओसे भगवान्ने उन्हे पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके लिये कहा, तब वे ( जन्मभीरु ) समस्त देवता उन सनातन भगवान्से बोले—'भगवन् ! हम देवता होकर पृथ्वीपर जन्म लें, यह हमारे लिये बड़ी निन्दाकी बात है। हमारे द्वारा स्वेच्छासे तो भूतलपर जन्म ग्रहण करना सम्भव नहीं है, परतु आपकी आज्ञा है, इसलिये हमें वहाँ जन्म लेना ही पड़ेगा। फिर भी इतनी प्रार्थना अवश्य है कि हमें गोप ( गँवार मनुष्य ) और स्त्रीके रूपमें वहाँ उत्पन्न न करें। जिसे आपके अङ्ग-स्पर्शसे वञ्चित रहना पड़ता हो ऐसा आपके सान्निध्यसे दूर रहनेवाला मनुष्य बन- कर हममेंसे कोई भी शरीर धारण नहीं करेगा, हमें सदा अपने अङ्गोके स्पर्शका अवसर दें, तभी हम अवतार ग्रहण करेंगे।' रुद्र आदि देवताओंका यह स्नेहपूर्ण वचन सुनकर स्वयं भगवान्ने कहा—'देवताओ ! मै तुम्हे अङ्ग-स्पर्शका अवसर दूँगा; तुम्हारे वचनोंको अवश्य पूर्ण करूँगा' ॥ १-२ ॥ भगवान्का यह आश्वासन पाकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'अब हम कृतार्थ हो गये।' फिर सब देवता भगवान्की सेवाके लिये प्रकट हुए। भगवान्का परमानन्दमय अङ्ग ही नन्दरायजीके रूपमें प्रकट हुआ। नन्दरानी यशोदाके रूपमें साक्षात् मुक्तिदेवी अवतीर्ण हुईं। सुप्रसिद्ध माया सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यों तीन प्रकारकी बतायी गयी है। भगवान्के भक्त श्रीरुद्रदेवमें सात्त्विकी

माया है, ब्रह्माजीमे राजसी माया है और दैत्यवर्गमें तामसी मायाका प्रादुर्भाव हुआ है। इस प्रकार यह तीन प्रकारकी माया बतायी गयी। इससे भिन्न जो वैष्णवी माया है, जिसको जीतना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है, जिसे पूर्वकालमें ब्रह्माजी भी पराजित न कर सके तथा देवता भी जिसकी स्तुति करते हैं, वह ब्रह्मविद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी- रूपमे प्रकट हुई। निगम ( वेद ) ही वसुदेव हैं, जो सदा मुझ नारायणके स्वरूपका स्तवन करते हैं। वेदोंका तात्पर्य- भूत ब्रह्म ही श्रीबलराम और श्रीकृष्णके रूपमें इस महीतलपर अवतीर्ण हुआ। वह मूर्त्तिमान् वेदार्थ ही वृन्दावनमें गोप- गोपियोंके साथ क्रीडा करता है। ऋचाएँ उस श्रीकृष्णकी गाएँ और गोपियाँ हैं। ब्रह्मा लकुटीरूप धारण किये हुए है और रुद्र वश अर्थात् वंशी बने हैं। देवराज इन्द्र सींगा बने हैं। गोकुल नामक वनके रूपमें साक्षात् वैकुण्ठ है। वहाँ द्रुमोंके रूपमें तपस्वी महात्मा है। लोभ-क्रोधादिने दैत्योंका रूप धारण किया है, जो कलियुगमें केवल भगवान्का नाम लेनेमात्रसे तिरस्कृत ( नष्ट ) हो जाते हैं ॥ ३-९ ॥ गोपरूपमे साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही लीला विग्रह धारण किये हुए हैं। यह जगत् मायासे मोहित है, अतः उसके लिये भगवान्की लीलाका रहस्य समझना बहुत कठिन है। वह माया समस्त देवताओंके लिये भी दुर्जय है। जिनकी मायाके प्रभाव- से ब्रह्माजी लकुटी बने हुए हैं और जिन्होने भगवान् शिवको

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक पाठ (transcription) दिया गया है:

६९६ * श्रीकृष्णोपनिषद् * बाँसुरी बना रक्खा है, उनकी मायाको साधारण जगत् कैसे जान सकता है ? निश्चय ही देवताओंका बल ज्ञान है। परन्तु भगवान्की मायाने उसे भी क्षणभरमें हर लिया। श्रीशेषनाग श्रीबलराम बने, और सनातन ब्रह्म ही श्रीकृष्ण बने। सोलह हजार एक सौ आठ—रुक्मिणी आदि भगवान्‌की रानियाँ वेदकी ऋचाएँ तथा उपनिषद् हैं। इनके सिवा जो वेदोंकी ब्रह्मरूपा ऋचाएँ हैं, वे गोपियोंके रूपमें अवतीर्ण हुई है। द्वेष चाणूर मल्ल है, मत्सर दुर्जय मुष्टिक है, दर्प ही कुवलया- पीड हाथी है। गर्व ही आकाशचारी बकासुर राक्षस है। रोहिणी माताके रूपमें दयाका अवतार हुआ है, पृथ्वी माता ही सत्यभामा बनी हैं। महाव्याधि ही अघासुर है और साक्षात् कलि राजा कस बना है। श्रीकृष्णके मित्र सुदामा शम है, अक्रूर सत्य हैं और उद्धव दम है। जो शङ्ख है, वह स्वयं विष्णु है तथा लक्ष्मीका भाई होनेसे लक्ष्मीरूप भी है; वह क्षीरसमुद्रसे उत्पन्न हुआ है, मेघके समान उसका गम्भीर घोष है। दूध दहीके भडारमें जो भगवान्ने मटके फोड़े और उनसे जो दूध दहीका प्रवाह हुआ, उसके रूपमे उन्होंने साक्षात् क्षीरसागरको ही प्रकट किया है और उस महासागरमे वे बालक बने हुए पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे है। शत्रुओंके सहार तथा साधुजनोंकी रक्षामें वे सम्यक्‌रूपसे स्थित हैं। समस्त प्राणियोंपर अहैतुकी कृपा करनेके लिये तथा अपने आत्मजरूप धर्मकी रक्षा करनेके लिये श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, यों जानना चाहिये। भगवान् शिवने श्रीहरिको अर्पित करनेके लिये जिस चक्रको प्रकट किया था, भगवान्‌के हाथमें सुशोभित वह चक्र ब्रह्मस्वरूप ही है ॥ १०–१९ ॥

धर्मने चँवरका रूप ग्रहण किया है, वायुदेव ही वैजयन्ती मालाके रूपमें प्रकट हुए हैं, महेश्वरने अग्निके समान चमचमाते हुए खड्गका रूप धारण किया है। कश्यप मुनि नन्दजीके घरमे ऊखल बने हैं और माता अदिति रज्जुके रूपमे अवतरित हुई हैं। जैसे सब वर्णोंके ऊपर अनुस्वार शोभा पाता है, उसी प्रकार जो सबके ऊपर सुशोभित आकाश है, उसे ही भगवान्‌का छत्र जानो। व्यास वाल्मीकि आदि शनी महात्मा देवताओंके जितने स्वरूप बतलाते हैं तथा जिन-जिनको लोग देवरूप समझकर नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता भगवान् श्रीकृष्णके ही आश्रित हैं। भगवान्‌के हाथकी गदा सारे शत्रुओंका नाश करनेवाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्गधनुषका रूप स्वय वैष्णवी मायाने धारण किया है और प्राणसंहारक काल ही उनका वाण है। जगत्‌के बीजरूप कमलको भगवान्‌ने हाथमे लीलापूर्वक धारण किया है। गरुडने भाण्डीरवटका रूप ग्रहण किया है, और नारद मुनि सुदामा नामके सखा बने हैं। भक्तिने वृन्दाका रूप धारण किया है। सब जीवोको प्रकाश देनेवाली जो बुद्धि है, वही भगवान्‌की क्रिया-शक्ति है। अत: ये गोप-गोपी आदि सभी भगवान्‌से भिन्न नहीं हे और विभु—परमात्मा श्रीकृष्ण भी इनसे भिन्न नहीं है। उन्होंने (श्रीकृष्णने) स्वर्गवासियों- को तथा सारे वैकुण्ठधामको भूतलपर उतार लिया है ॥ २०–२५ ॥ जो इस प्रकार जानता है, वह सब तीर्थोंका फल पाता है और देहके बन्धनसे मुक्त हो जाता है—यह उपनिषद् है।

॥ अथर्ववेदीय श्रीकृष्णोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कलि ˙ रणोप ˙ ष ˎ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! 'हरे राम' आदि सोलह नामोंके मन्त्रका अद्भुत माहात्म्य हरि ॐ । द्वापरके अन्तमें नारदजी ब्रह्माजीके पास गये, और बोले—'भगवन् ! मैं भूलोकमें पर्यटन करता हुआ किस प्रकार कलिसे त्राण पा सकता हूँ ?' ब्रह्माजी बोले—'वत्स ! तुमने मुझसे आज बहुत अच्छी बात पूछी है। समस्त श्रुतियोंका जो गोपनीय रहस्य है, उसे सुनो—जिससे कलियुगमें भवसागरको पार कर लोगे। भगवान् आदि- पुरुष नारायणके नामोच्चारणमात्रसे मनुष्य कलिके दोषोंका नाश कर डालता है।' नारदजीने फिर पूछा—'वह कौन-सा नाम है ?' हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीने कहा— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ ये सोलह नाम कलिके पापोंका नाश करनेवाले हैं। इससे श्रेष्ठ कोई दूसरा उपाय सारे वेदोंमें भी नहीं देखनेमें आता। इसके द्वारा षोडश कलाओंसे आवृत्त जीवके आवरण नष्ट हो जाते हैं। तत्पश्चात् जैसे मेघके विलीन होनेपर सूर्यकी किरणें प्रकाशित हो उठती हैं, उसी प्रकार परब्रह्मका स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। फिर नारदजीने पूछा—'भगवन् ! इसके जपकी क्या विधि है ?' ब्रह्माजीने उनसे कहा—'इसकी कोई विधि नहीं है। पवित्र हो या अपवित्र, इस मन्त्रका निरन्तर जप करनेवाला सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य— चारों प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करता है। जब साधक इस सोलह नामोंवाले मन्त्रका साढे तीन करोड़ जप कर लेता है, तब ब्रह्महत्याके दोषको पार कर जाता है। वह वीरहत्याके पापसे तर जाता है। स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है। पितर, देवता और मनुष्योंके अपकारके दोषसे भी छूट जाता है। सब धर्मोंके परित्यागके पापसे तत्काल ही पवित्र हो जाता है। शीघ्र ही मुक्त हो जाता है, शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यह उपनिषद् है । ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कलिसंतरणोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्ति. !! शान्तिः !!! उ० अ० ८८—८९—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय गणपत्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् गणनायककी स्तुति, उनके बीजमन्त्र, महामन्त्र तथा गायत्री, उपनिषद्के पाठका तथा गणपति पूजनका माहात्म्य हरि ॐ। भगवान् गणपतिको नमस्कार है। तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो, तुम्हीं केवल धर्ता हो, तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपोंमें विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात् नित्य आत्मस्वरूप हो। मैं ऋत- न्याययुक्त बात कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। तुम मेरी (मुझ शिष्यकी) रक्षा करो; वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोताकी रक्षा करो। दाताकी रक्षा करो, धाताकी रक्षा करो। व्याख्या करनेवाले आचार्यकी रक्षा करो, शिष्यकी रक्षा करो। पश्चिमसे रक्षा करो, पूर्वसे रक्षा करो, उत्तरसे रक्षा करो, दक्षिणसे रक्षा करो, ऊपरसे रक्षा करो, नीचेसे रक्षा करो, सब ओरसे मेरी रक्षा करो, चारों ओरसे मेरी रक्षा करो। तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय हो, तुम आनन्दमय हो, तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द, अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, तुम ज्ञानमय, विज्ञानमय हो। यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे ठहरा हुआ है। यह सारा जगत् तुममें लयको प्राप्त होगा। इस सारे जगत्‌की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा-वाणीके ये चार विभाग तुम्हीं हो । तुम सत्त्व, रज और तम-तीनों गुणोंसे परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान-तीनों कालोंसे परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण-तीनों शरीरोंसे परे हो। तुम मूलाधार चक्रमे नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान-तीन प्रकारकी शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगिजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू, भुवः, स्वः- ये तीनों लोक तथा ॐकारवाच्य परब्रह्म भी तुम हो। गणके आदि अर्थात् ग् का पहले उच्चारण करके उसके बाद वर्णोंके आदि अर्थात् अ का उच्चारण करे, उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है । इस प्रकार अर्धचन्द्रसे सुशोभित 'ग' ॐकारसे अवरुद्ध होनेपर तुम्हारे बीज- मन्त्रका स्वरूप (ॐ ग् ) है। गकार इसका पूर्वरूप है, अकार मध्यम रूप है, अनुस्वार अन्त्य रूप है, बिन्दु उत्तर रूप है। नाद सन्धान है। सहिता सन्धि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस महामन्त्रके गणक ऋषि हैं, निचृद्गायत्री छन्द है, श्रीमद्महागणपति देवता हैं। वह महामन्त्र है- ॐ गं गणपतये नम । एकदन्तको हम जानते हैं। वक्रतुण्डका

यहाँ पृष्ठ का यथावत देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६९९

[बायाँ स्तम्भ] हम ध्यान करते हैं, वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करे*। (वह गणेश गायत्री है) एकदन्त, चतुर्भुज, चारों हाथोंमें पाश, अङ्कुश, अभय और वरदानकी मुद्रा धारण किये तथा मूषक-चिह्न- की ध्वजा लिये हुए, रक्तवर्ण, लम्बे उदरवाले, सूप-जैसे बड़े-बड़े कानोंवाले, रक्तवस्त्रधारी, शरीरपर रक्तचन्दनका लेप किये हुए, रक्तपुष्पोंसे भलीभाँति पूजित, भक्तके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले देवता, जगत्के कारण, अच्युत, सृष्टिके आदिमें आविर्भूत, प्रकृति और पुरुषसे परे श्रीगणेशजीका जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियोंमें श्रेष्ठ है। व्रात (देवसमूह) के नायकको नमस्कार, गणपतिको नमस्कार, प्रमथपति ( शिवजीके गणोंके अधिनायक ) के लिये नमस्कार, लम्बोदरको, एकदन्तको, विघ्नविनाशकको, शिवजीके पुत्रको तथा श्रीवरदमूर्तिको नमस्कार, नमस्कार ।† यह अथर्वाङ्गिरस् ( अथर्ववेदकी उपनिषद् ) है । इसका जो पाठ करता है, वह ब्रह्मत्वको प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है । सब प्रकारके विघ्न उसके लिये बाधक नहीं होते । वह सब जगह सुख पाता है । वह पाँचों प्रकारके महान् पातकों तथा उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है । सायंकाल पाठ करनेवाला दिनके पापोंका नाश करता है । प्रातःपाठ करनेवाला रात्रिके पापोंका नाश करता है । जो प्रातः-साय दोनों समय इस पाठका प्रयोग करता है, वह निष्पाप हो जाता है । धर्म,


[दायाँ स्तम्भ] अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करता है । इस अथर्वशीर्षको, जो शिष्य न हो, उसे नहीं देना चाहिये । जो मोहके कारण देता है, वह पातकी हो जाता है । सहस्र बार पाठ करनेसे जिन जिन कामनाओंका उच्चारण करता है, उन उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है । इसके द्वारा जो गणपतिको स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है । जो चतुर्थी तिथिको उपवास करके जपता है, वह विद्यावान् हो जाता है । यह अथर्वण-वाक्य है । जो इस मन्त्रके द्वारा तपश्चरण करना जानता है, वह कदापि भयको नहीं प्राप्त होता । जो दूर्वाङ्कुरोंके द्वारा भगवान् गणपतिकायजन करता है, वह कुबेरके समान हो जाता है । जो लाजोंके द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावी होता है । जो सहस्र लड्डुओं ( मोदकों ) के द्वारा यजन करता है, वह वाञ्छित फलको प्राप्त करता है । जो घृतके सहित समिधासे यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है । आठ ब्राह्मणोंको सम्यक् रीतिसे ग्रहण करानेपर सूर्यके समान तेजस्वी होता है । सूर्यग्रहणमें महानदीमें या प्रतिमाके समीप जपनेसे मन्त्रसिद्धि होती है । वह महाविघ्नसे मुक्त हो जाता है, महापातकसे मुक्त हो जाता है, महान् दोषसे मुक्त हो जाता है । जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है, सर्वज्ञ हो जाता है ।


॥ अथर्ववेदीय गणपत्युपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाऽसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!


[पाद-टिप्पणी / Footnotes]

  • 'एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।' † नमो व्रातपतये नमो गणपतये नम प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नम ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ सामवेदीय जाबालदर्शनोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड योगके आठ अङ्ग और दस यमोंका वर्णन सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले चतु- र्भुज भगवान् महाविष्णु महायोगी दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए। दत्तात्रेयजी योग साम्राज्य (के अधिपति पद) पर दीक्षित हैं—वे योगमार्गके सम्राट् हैं। उनके शिष्य मुनिवर्य साङ्कृति नामसे प्रसिद्ध थे । वे गुरुके बड़े ही भक्त थे । एक दिन एकान्तमें गुरुजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्होंने हाथ जोड़- कर विनयपूर्वक पूछा—'भगवन् ! आठ अङ्गोंसहित योगका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिसके जान लेनेमात्रसे मैं जीवन्मुक्त हो जाऊँ' ॥ १-३ ॥ भगवान् दत्तात्रेयने कहा—'साङ्कृते ! सुनो, मै तुम्हें आठ अङ्गोंसहित योगदर्शनका उपदेश करता हूँ । ब्रह्मन् ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये योगके आठ अङ्ग हैं । इनमेंसे यमके दस भेद हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव (सरलता), क्षमा, धृति, परिमित आहार और बाहर भीतरकी पवित्रता ॥ ४-६ ॥ 'तपोधन ! वेदमें बतायी हुई विधिके अतिरिक्त जो मन, वाणी और शरीरद्वारा किसीको किसी प्रकारका कष्ट दिया जाता या उसका प्राणोंसे वियोग कराया जाता है, वही वास्तविक हिंसा है, इसके सिवा दूसरी कोई हिंसा नहीं है (इस हिंसा- का सर्वथा त्याग ही अहिंसा है ) । मुने ! आत्मा सर्वत्र व्याप्त है, उसका शस्त्र आदिके द्वारा छेदन नहीं हो सकता । हाथों या इन्द्रियोंके द्वारा उसका ग्रहण होना भी सम्भव नहीं है—इस प्रकारकी जो बुद्धि है, उसे ही वेदान्तवेत्ता महात्माओंने श्रेष्ठ अहिंसा बताया है। मुनीश्वर ! नेत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा जो जिस रूपमें देखा, सुना, सूँघा और समझा हुआ विषय है, उसको उसी रूपमें वाणीद्वारा (अथवा सकेत आदिके द्वारा ) प्रकट करना सत्य है। ब्रह्मन् ! इसके सिवा सत्यका और कोई प्रकार नहीं है। अथवा सब कुछ सत्य स्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है, परमात्माके सिवा दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—इस प्रकारका जो निश्चय है, उसीको वेदान्तज्ञानके पारगामी विद्वानोंने सबसे श्रेष्ठ सत्य कहा है। दूसरेके रत्न, सुवर्ण अथवा मुक्तामणिसे लेकर एक तृणके लिये भी मन न चलाना—दूसरोंकी छोटी या बड़ी किसी भी वस्तुके लिये मनमे कभी लोभ न लाना ही अस्तेय है । विद्वान् महापुरुषोंने इसीको अस्तेय (चोरी न करना) माना है। इसके अतिरिक्त महामुने ! जगत्‌के समस्त व्यवहारोंमे अनात्मबुद्धि रखकर उन्हें आत्मासे दूर रखने- का जो भाव है, उसीको आत्मज्ञ महात्माओंने अस्तेय कहा है । मन, वाणी और शरीरके द्वारा स्त्रियोंके सहवासका परित्याग तथा ऋतुकालमें (धर्मबुद्धिसे) केवल अपनी ही पत्नीसे सम्बन्ध—यही ब्रह्मचर्य कहा गया है । अथवा काम क्रोधादि शत्रुओंको सताप देनेवाले मुनीश्वर ! मनको परब्रह्म परमात्मा- के चिन्तनमें संचरित करना—लगाये रखना ही सर्वोत्तम

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७०२ '•:- जाबालदर्शनोपनिषद् :• [ खण्ड ४ है। इसी प्रकार मानसिक जप भी मनन और ध्यानके भेद- किया गया जप सब लोगोंको यथावत् फल देनेवाला होता से दो प्रकारका है। उच्चस्वरसे किये जानेवाले जपकी अपेक्षा है, परंतु यदि उस मन्त्रको नीच पुरुषोंने अपने कानोंसे उपांशु जप (अत्यन्त मन्दस्वरसे किया गया जप) हजार- सुन लिया तो वह निष्फल हो जाता है (शास्त्रीय पर्वोपर गुना उत्तम बताया गया है। इसी प्रकार उपांशुकी अपेक्षा उपवासादि करना तथा किसी प्रकारका नियम ग्रहण करना मानसिक जप सहस्रगुना श्रेष्ठ कहा गया है। उच्चस्वरसे व्रत कहलाता है)' ॥ ८-१६ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड नौ प्रकारके यौगिक आसनोंका वर्णन 'मुनिश्रेष्ठ ! आसन नौ प्रकारके हैं—स्वस्तिकासन, गोमुखासन, अग्रभागपर दृष्टि जमाये रक्खे। यह योगियोंद्वारा सदा पद्मासन, वीरासन, सिंहासन, भद्रासन, मुक्तासन, मयूरासन सम्मानित होनेवाला सिंहासन कहा गया है।) दोनों टखनों- और सुखासन। घुटनों और जाँघोंके बीचमे अपने दोनों को अण्डकोषके नीचे सीवनीके दोनों पार्श्वभागोंमें (इस पैरोंको भलीभाँति रखकर ग्रीवा, मस्तक और शरीरको प्रकार) लगाकर रक्खे (कि पैरोंका अग्रभाग पीछेकी ओर समभावसे धारण किये रहना स्वस्तिकासन कहलाता है; मुड़ा रहे) और दोनों हाथोंसे पार्श्वभाग और पैरोंको दृढता- इसका नित्य अभ्यास करना चाहिये। दाहिने पैरके गुल्फ पूर्वक बाँधकर स्थिरभावसे बैठ जाय—यह भद्रासन है, जो विष- (टखने) को बायीं ओरके पृष्ठभागतक और बायें पैरके जनित रोगका नाश करनेवाला है। सीवनीकी सूक्ष्म रेखाको गुल्फ (टखने) को दाहिनी ओरके पृष्ठभागतक ले जाय, बायें टखनेसे दबाकर उस बायें टखनेको फिर दायें इसीको गोमुखासन कहते हैं। विप्रवर ! दोनों पैरोंको दोनों टखनेसे दबा दे तो यह मुक्तासन होता है। मुने ! लिङ्गके जाँघोंपर (व्युत्क्रमसे अर्थात् बायें पैरको दाहिनी जाँघपर ऊपरी भागमे बायें टखनेको रखकर फिर उसके ऊपर दाहिने और दाहिने पैरको बायीं जाँघपर) रखकर उनके अँगूठोंको टखनेको रख दे तो यह भी मुक्तासन कहलाता है। मुनिश्रेष्ठ ! दोनों हाथोंसे पीठके पीछेसे पकड़ ले। यही पद्मासन अपनी दोनो हथेलियोंको पृथ्वीपर टिकाकर, कोहनियोंके है। यह सम्पूर्ण रोगोंका भय दूर करनेवाला है। अग्रभागको नाभिके दोनों पाश्र्वोमे लगाये। फिर एकाग्रचित्त हो बायें पैरको दाहिनी जाँघपर रखने और शरीरको सिर और पैरको ऊँचा करके आकाशमें दण्डकी भाँति (पृथ्वी- सीधा रखकर बैठे, इसको वीरासन कहा गया है। (दोनों के समानान्तरमें) स्थित हो जाय। यह मयूरासन है, जो टखनोंको अण्डकोषके नीचे सीवनीके दोनों पाश्र्वोमे ले सब पापोंका नाश करनेवाला है। जिस किसी प्रकार बैठनेसे जाय और उन्हें इस प्रकार रक्खे कि बायें टखनेसे सीवनीका सुख और धैर्य बना रहे, वह सुखासन कहा गया है। दाहिना पार्श्व और दायें टखनेसे सीवनीका बायाँ पार्श्व असमर्थ साधक इसी आसनका आश्रय ले। जिसने आसन लगा रहे। फिर दोनों हाथोंको घुटनोंपर रखकर सब अँगुलियों- जीत लिया, उसने मानो तीनों लोक जीत लिये। सांकृते ! को फैला दे। मुँहको खोलकर एकाग्रचित्त हो नासिकाके इसी विधिसे योगयुक्त होकर तुम सदा प्राणायाम किया करो' ॥ १-१३ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ खण्ड नाड़ी-परिचय तथा आत्मतीर्थ और आत्मज्ञानकी महिमा 'सांकृते ! मनुष्यका शरीर अपने हाथके मानसे ९६ अगुलका जो स्थान है, उसे ही मनुष्योंके शरीरका मध्यभाग समझो। होता है। इम शरीरका जो मध्यभाग है, उसमें अग्निका स्थान है। वही मूलाधार है। मुनिश्रेष्ठ ! वहाँसे नौ अगुल ऊपर कन्द- उसका रग तपाये हुए सोनेके समान माना गया है। उसकी स्थान है। उसकी लबाई चौड़ाई चार-चार अगुलकी है और आकृति त्रिकोण है। यह मैने तुमसे सत्य बात बतायी है। आकृति मुर्गीके अंडेके समान है । वह ऊपरसे चमड़े गुदासे दो अगुल ऊपर और लिङ्गसे दो अगुल नीचेका आदिके द्वारा विभूषित है। मुनिपुङ्गव ! उस कन्दस्थानके

खण्ड ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०३ मध्यभागमे नाभि है, यों योगवेत्ता महात्माओंने कहा है। कन्दके मध्यभागमें जो नाड़ी है, उसका सुषुम्नाके नामसे वर्णन हुआ है। उसके चारों ओर ७२ हजार नाड़ियाँ हैं। उनमें चौदह प्रधान हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—सुषुम्ना, पिङ्गला, इडा, सरस्वती, पूषा, वरुणा, हस्ति- जिह्वा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू, विश्वोदरा, पयस्विनी, शङ्खिनी और गान्धारा। ये ही चौदह नाड़ियाँ प्रधान मानी गयी हैं। इन चौदहमें भी प्रथम तीन ही सबसे प्रधान हैं। इनमें भी एक ही नाड़ी—सुषुम्ना सर्वश्रेष्ठ है। मुने ! वेदान्त- शास्त्रके ज्ञाता विद्वानोंने इसे ब्रह्मनाडी कहा है। पीठके मध्यभागमें जो वीणादण्ड (मेरुदण्ड) नामसे प्रसिद्ध हड्डियोंका समुदाय है, उसमे होकर सुषुम्नानाड़ी मस्तक तक पहुँची हुई है। मुने ! नाभि कन्दसे दो अंगुल नीचे कुण्डलिनी- का स्थान है। वह अष्टप्रकृतिरूपा मानी गयी है। वह वायुकी यथावत् चेष्टा और जलतथा अन्न आदिको रोक करके ही सदा नाभि-कन्दके दोनों पार्श्वोंको घेरकर स्थित रहती है तथा ब्रह्मरन्ध्रके मुखको अपने मुखसे सदा आवेष्टित किये रहती है। सुषुम्नाके वाम-भागमे इडा और दक्षिण भागमें पिङ्गला स्थित है। सरस्वती और कुहू—ये दोनों सुषुम्नाके उभय पार्श्वोमे स्थित हैं। गान्धारा और हस्तिजिह्वा—ये क्रमशः इडाके पृष्ठ और पूर्व भागोंमें स्थित हैं। पूषा और यशस्विनी क्रमशः पिङ्गलाके पृष्ठ और पूर्व भागोंमें स्थित हैं। कुहू और हस्तिजिह्वाके बीचमे विश्वोदरा नाड़ी है। यशस्विनी और कुहूके मध्य भागमें वारुणा नाड़ी प्रतिष्ठित है। पूषा और सरस्वतीके मध्यमे पयस्विनी नाड़ीकी स्थिति बतायी गयी है। गान्धारा और सरस्वतीके बीचमें शङ्खिनीका स्थान है। अलम्बुषा नाभिकन्दके मध्यभागसे होती हुई गुदातक फैली हुई है। सुषुम्नाका दूसरा नाम राका है। उसके पूर्वभागमे कुहू नामकी नाड़ी है। यह नाड़ी ऊपर और नीचे स्थित है। इसकी स्थिति दक्षिण नासिकातक मानी गयी है। इडा नामकी नाड़ी बायीं नासिकातक स्थित है। यशस्विनी नाड़ी दायें पैरके अंगूठे तक फैली हुई है। पूषा पिङ्गलाके पृष्ठभागसे होती हुई दायें नेत्रतक फैली हुई है और पयस्विनी नाड़ी विद्वानोंद्वारा दाहिने कानतक फैली हुई बतायी जाती है। सरस्वती नाड़ी ऊपरकी ओर जिह्वा तक फैली हुई है। हस्तिजिह्वा नाड़ी बायें पैरके अँगूठे तक स्थित है। शङ्खिनी १ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार—ये आठ प्रकृतियाँ हैं। नामकी जो नाड़ी बतायी गयी है, वह बायें कानतक फैली हुई है। गान्धाराकी स्थिति वेदान्तज्ञोंद्वारा बायें नेत्रतक बतायी गयी है। विश्वोदरा नामकी नाड़ी नाभिकन्दके मध्यमें स्थित है॥ १–२२॥ 'प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकर (कृकल), देवदत्त और धनञ्जय—ये दस प्राणवायु सब नाड़ियोंमें सञ्चरण करते हैं। इन दसोंमें प्राण आदि पाँच ही मुख्य हैं। सुव्रत ! इन पाँचोंमें भी प्राण और अपान ही श्रेष्ठ एव आदरणीय माने गये हैं। इनमेंसे प्राण नामक वायु मुख और नासिकाके मध्यभागमें, नाभिके मध्यभागमे तथा हृदयमें नित्य निवास करता है। अपान वायु गुदा, लिङ्ग, जाँघो, घुटनों, सम्पूर्ण उदर, कटि, नाभि तथा पिण्डलियोंमें भी सदा वर्तमान रहता है। व्यान वायु दोनों कानों, दोनों नेत्रों, दोनों कंधों, दोनों टखनों, प्राणके स्थानों और कण्ठमें भी व्याप्त रहता है। उदान वायुकी स्थिति दोनों हाथों और पैरोंमे जाननी चाहिये। समान वायु निःसन्देह सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर रहता है। नाग आदि पाँचों वायु चमड़ी और हड्डी आदिमें रहते हैं ॥ २३—२९॥ 'साधुते ! उच्छ्वास और निःश्वास (श्वासको भीतर ले जाना और बाहर निकालना) और खाँसना—ये प्राणवायुके कार्य हैं। मल-मूत्रादिका त्याग अपान वायुका कार्य है। मुनिपुङ्गव ! समान वायु सब शरीरको सम अवस्थामें रखता है। उदान वायु ही ऊपरकी ओर गमन करता है। वेदान्ततत्त्वके ज्ञाता विद्वानोका कहना है कि व्यानवायु ध्वनिका व्यञ्जक है। महामुने ! डकार, वमन आदि नाग वायुका कार्य है। शरीरमे शोभा आदिका सम्पादन धनञ्जय वायुका कार्य बताया गया है। आँखोंका खोलना, मीचना आदि कूर्म नामक वायुकी प्रेरणासे होता है। कृकर (कुकल) नामकी वायु भूख-प्यास- का कारण है। तन्द्रा और आलस्य देवदत्त वायुका कार्य बताया गया है ॥ ३०–३४ ॥ 'मुने ! सुषुम्ना नाड़ीके देवता शिव और इडाके देवता भगवान् विष्णु हैं। पिङ्गला नाड़ीके ब्रह्माजी और सरस्वती नाड़ीके विराट् देवता हैं। पूषाके देवता पूषा नामक आदित्य हैं। वारुणा नाड़ीके देवता वायु हैं। हस्तिजिह्वा नामक नाड़ीके वरुण देवता हैं। मुनिश्रेष्ठ ! यशस्विनी नाड़ीके देवता भगवान् भास्कर हैं। जलस्वरूप वरुण ही अलम्बुसा नाड़ीके देवता माने गये हैं। कुहूकी अधिष्ठात्री देवी क्षुधा हैं। गान्धारीके चन्द्रमा देवता हैं। इसी प्रकार शङ्खिनीके देवता भी चन्द्रमा

७०४ - जाबालदर्शनोपनिषद् % [ खण्ड ४

[वाम स्तम्भ] ही हैं। पयस्विनीके देवता प्रजापति हैं। विश्वोदरा नाड़ीके अधिदेवता भगवान् अग्निदेव है ॥ ३५-३८॥ 'वेदवेत्ताओंमे श्रेष्ठ मुनीश्वर ! इड़ा नामकी नाड़ीमे नित्य ही चन्द्रमा सञ्चार करते हैं और पिङ्गला नाडीमे सूर्यदेव सञ्चरण करते है । पिङ्गला नाडीसे इड़ा नाडीमे जो संवत्सरा- त्मक प्राणमय सूर्यका सङ्क्रमण होता है, उसे वेदान्ततत्त्वके ज्ञाता महर्षियोंने उत्तरायण कहा है। इसी प्रकार इड़ासे पिङ्गलामें जो प्राणात्मक सूर्यका सङ्क्रमण होता है, वह दक्षिणायन कहा गया है। जब प्राण इड़ा और पिङ्गलाकी संधिमे आता है, उस समय, हे पुरुषश्रेष्ठ ! इस शरीरके भीतर अमावस्या कही जाती है। जब प्राण मूलाधारमे प्रवेश करता है, उस समय हे तापसोमे श्रेष्ठ विद्वद्वर ! तपस्वियोंने आद्य विषुव नामक योगका उदय कहा है। मुनिश्रेष्ठ ! जब प्राणवायु मूर्द्धा (सहस्रार) मे प्रवेश करता है, उस समय तत्त्वका विचार करनेवाले महर्षियोंने अन्तिम विषुव योगकी स्थिति बतायी है। समस्त उच्छ्वास और निःश्वास मास सङ्क्रान्ति माने गये हैं। इड़ा नाड़ीद्वारा जब प्राण कुण्डलिनीके स्थानपर आ जाता है, तब हे तत्त्वज्ञशिरोमणि ! चन्द्रग्रहण काल कहा जाता है। इसी प्रकार जब प्राण पिङ्गला नाड़ीके द्वारा कुण्डलिनीके स्थानपर आता है, तब हे मुनिवर ! सूर्यग्रहणकी वेला होती है॥३९-४७॥ 'अपने शरीरमे मस्तकके स्थानपर श्रीशैल नामक तीर्थ है। ललाटमें केदारतीर्थ है। हे महाप्राज्ञ ! नासिका और दोनो भौंहोंके मध्यमे काशीपुरी है। दोनों स्तनोंकी जगहपर कुरुक्षेत्र है। हृदयकमलमे तीर्थराज प्रयाग है। हृदयके मध्यभागमें चिदम्बरतीर्थ है। मूलाधार स्थानमें कमलालथ तीर्थ है। जो इस आत्मतीर्थ (अपने भीतर रहनेवाले) का परित्याग करके बाहरके तीर्थोमें भटकता रहता है, वह हाथमे रक्खे हुए बहुमूल्य रत्नको त्यागकर काँच खोजता फिरता है। भावनामय तीर्थ ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। भाव ही सम्पूर्ण कर्मोंमे प्रमाणभूत है। पत्नी और पुत्री दोनोंका आलिङ्गन किया जाता है, किंतु दोनोंमें भावका बहुत अन्तर होता है, पत्नीका आलिङ्गन दूसरे भावसे और पुत्रीका आलिङ्गन दूसरे भावसे किया जाता है। योगी पुरुष अपने आत्मतीर्थमे अधिक विश्वास और श्रद्धा रखनेके कारण जलमे भरे तीर्थों और काष्ठ आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओंकी [दक्षिण स्तम्भ] शरण नहीं लेते । महामुने ! बाह्यतीर्थसे श्रेष्ठ आन्तरिक तीर्थ ही है । आत्मतीर्थ ही महातीर्थ है, उसके सामने दूसरे तीर्थ निरर्थक हैं। शरीरके भीतर रहनेवाला दूषित चित्त बाह्य- तीर्थामें गोते लगानेमात्रसे शुद्ध नहीं होता, जैसे मदिरासे भरा हुआ घड़ा ऊपरसे सैकड़ों बार जलमे धो लिया जाय तो भी वह अपवित्र ही रहता है। अपने भीतर होनेवाले जो विषुव-योग, उत्तरायण दक्षिणायन काल और सूर्य-चन्द्रमाके ग्रहण हैं, उनमें नासिका और भौंहोंके मध्यमे स्थित वाराणसी आदि तीर्थामे भावनाद्वारा स्नान करके मनुष्य शुद्ध हो सक्ता है। मुनिश्रेष्ठ ! ज्ञानयोगमे तत्पर रहनेवाले महात्माओंका चरणोदक अज्ञानी मनुष्योंके अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये उत्तम तीर्थ है ॥ ४८-५६ ॥ 'शिवस्वरूप परमात्मा इस शरीरमे ही प्रतिष्ठित है, इनको न जाननेवाला मूढ़ मनुष्य तीर्थ, दान, जप, यज्ञ, काठ और पत्थर- मे ही सर्वदा शिवको ढूँढ़ा करता है। साङ्कृते ! जो अपने भीतर नित्य निरन्तर स्थित रहनेवाले मुझ परमात्माकी उपेक्षा करके केवल बाहरकी स्थूल प्रतिमाका ही सेवन करता है, वह हाथ- में रक्खे हुए अन्नके ग्रासको फेंककर केवल अपनी कोहनी चाटता है। योगी पुरुष अपने आत्मामें ही शिवका दर्शन करते हैं, प्रतिमाओंमें नहीं। अज्ञानी मनुष्योंके हृदयोमे भगवान्के प्रति भावना जाग्रत् करनेके लिये ही प्रतिमाओकी कल्पना की गयी है ॥ ५७-५९ ॥ 'जिसमे भिन्न न कोई पूर्व है न पर (न कारण है, न कार्य), जो सत्य, अद्वितीय और प्रज्ञानघनरूप है, उस आनन्दमय ब्रह्मको जो अपने आत्माके रूपमे देखता है, वही यथार्थ देखता है। महामुने ! यह मनुष्यका शरीर नाड़ियोंका समुदायमात्र है, जो सदा सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव- का परित्याग करके बुद्धिके द्वारा यह निश्चय करो कि 'मैं' ही परमात्मा हूँ। जो इस शरीरमे रहकर भी इससे सदा भिन्न है, महान् है, व्यापक है और सबका ईश्वर है, उस आनन्दस्वरूप अविनाशी परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करता ॥ ६०-६२ ॥ 'मुने ! ज्ञानके बलसे भेदजनक अज्ञानका नाश हो जानेपर कौन आत्मा और ब्रह्ममे मिथ्या भेदका आरोप करेगा' ॥ ६३ ॥ ॥ चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ ४ ॥

खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०५ पञ्चम खण्ड नाड़ी-शोधन एवं आत्मशोधनकी विधियाँ

माङ्कृतिने पूछा—'ब्रह्मन् ! नाडीकी शुद्धि कैसे होती है, यह मुझे ठीक ठीक और संक्षेपमे बताइये जिससे कि नाड़ी- शुद्धिपूर्वक सदा परमात्माका चिन्तन करते हुए मे जीवन्मुक्त हो जाऊँ' ॥ १ ॥ भगवान् दत्तात्रेयने कहा—'साङ्कृते ! सुनो; म संक्षेप- ने नाड़ी शुद्धिका वर्णन करता हूँ । शास्त्रोंके विधिवाक्यो- द्वारा जो कर्म बतलाये गये हैं, उनमें कर्तव्यबुद्धिमे मलग्र रहे। कामना और फलप्राप्तिके सङ्कल्पको त्याग दे । योगके यम आदि आठों अङ्गोंका सेवन करते हुए शान्त एव सत्यपरायण रहे। अपने आत्माके चिन्तनमे ही स्थित रहे और ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवामें उपस्थित हो उनसे भलीभाँति शिक्षा ले। तत्पश्चात् पर्वतशिखर, नदी तट, बिल्व वृक्षके समीप, एकान्त वन अथवा और किसी पवित्र एव मनोरम प्रदेशमे आश्रम बनाकर एकाग्रचित्तसे वहाँ रहे । फिर वहाँ पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके किसी आसनसे बैठे । ग्रीवा, मस्तक और शरीरको समान भावमे रखकर मुख बद किये हुए भलीभाँति स्थिर हो जाय । नासिकाने अग्रभागपर चन्द्र मण्डलकी भावना करे और वहाँ प्रणवके बिन्दुमे तुरीयस्वरूप परमात्माको अमृतका स्रोत बहाते हुए नेत्रोंद्वारा प्रत्यक्ष देखे। उस समय चित्तको पूर्णतः एकाग्र रक्खे । फिर इडा नाड़ीके द्वारा ( अर्थात् नासिकाके बायें छिद्रसे ) प्राणवायुको खींच कर उदरमें भर ले और देहके मध्यमें स्थित जो अग्नि है, उसका ध्यान करे माना उस वायुका सम्पर्क पाकर अग्निदेव ज्वालाओंके साथ प्रज्वलित हो उठे हों । फिर प्रणवके बिन्दु और नादसे सयुक्त अग्नि बीज ( र ) का चिन्तन करे । तदनन्तर बुद्धिमान् साधक पिङ्गला नाडी ( अर्थात् नासिकाके दाहिने छिद्रद्वारा ) प्राणवायुको विधिपूर्वक शनैः- शनै बाहर निकाले । फिर पिङ्गला नाड़ीद्वारा पूर्ववत् प्राणवायुको खींचकर अपने भीतर भर ले और अग्निबीजका चिन्तन करे । उसकेबाद इडा नाड़ीद्वारा फिर उसे धीरे-धीरे बाहर निकाल दे । इस प्रकार एकान्तमें लगातार तीन चार दिनोतक अथवा प्रतिदिन तीनों मध्याओंमे तीन चार या छः वार यह क्रिया करे । उससे उसकी नाड़ी शुद्ध हो जाती है । फिर इम नाड़ीशुद्धिके पृथक् चिह्न भी उपलब्धित होते हैं । शरीर हल्का हो जाता है, जठराग्नि उद्दीत हो जाती है और अनाहतनादकी अभिव्यक्ति होने लगती है । यह चिह्न सिद्धि- का सूचक है । जबतक यह चिह्न दिखायी न दे, तबतक इसी प्रकार अभ्यास करता रहे ॥ २-१२ ॥ 'अथवा यह सब छोड़कर आत्मशुद्धिका अनुष्ठान करे । यह आत्मा सदा शुद्ध, नित्य, सुखस्वरूप तथा स्वयम्प्रकाश है । अज्ञानवश ही यह मलिन प्रतीत होता है । ज्ञान होनेपर यह सदा विशुद्धरूपमे ही प्रकाशित होता है । जो ज्ञानरूपी जलसे अज्ञानरूपी मल और कीचड़को धो डालता है, वही सर्वदा शुद्ध है, दूसरा नहीं । क्योंकि वह दूसरा मनुष्य ज्ञानकी अवहेलना करके लौकिक कर्मोंमें आसक्त है ॥ १३ १४ ॥

॥ पञ्चम खण्ड समाप्त ॥ ५ ॥ ━•━•━•━•━ षष्ठ खण्ड प्राणायामकी विधि, उसके प्रकार, फल तथा विनियोग

'सांकृते ! अब मे प्राणायामका क्रम बतलाता हूँ, इसे श्रद्धापूर्वक सुनो । पूरक, कुम्भक और रेचक—इन तीनोमे जो प्राण-सयम सम्पन्न होता है, उसे प्राणायाम कहा गया है । ॐकारके जो तीन वर्ण अकार, उकार और मकार हैं, वे क्रमश पूरक, कुम्भक और रेचकसे सम्बन्ध रखनेवाले बताये गये हैं। इन तीनों वर्णोंका समूह ही प्रणव कहा गया है । अतः प्राणायाम भी प्रणवमय ही है। इडा नाड़ीके द्वारा वायुको धीरे धीरे भीतर खींचकर उसे उदरमे भरे और वहाँ स्थित षोडशमात्राविशिष्ट अकारका चिन्तन करे । तत्पश्चात् उस उदरमें भरी हुई वायुको कुछ कालतक धारण किये रहे और उस समय चौसठ मात्रासे विशिष्ट उकारके स्वरूपका चिन्तन करते हुए प्रणवका जप करता रहे । जबतक सम्भव हो, जपमे सलग्न रहकर वायुको धारण किये रहे । तदनन्तर विद्वान् पुरुष बत्तीस मात्राओसे विशिष्ट मकारका चिन्तन करते हुए पिङ्गला नाड़ीके द्वारा धीरे-धीरे उस भरी हुई वायुको बाहर निकाले । यह एक प्राणायाम है । इसी प्रकार अभ्यास करता रहे ॥ १-६ ॥ 'पुनः पिङ्गला नाड़ीके द्वारा वायुको धीरे-धीरे भीतर

७०६ * जावालदर्शनोपनिषद् * [ खण्ड ६ भरते हुए षोडश मात्रासे विशिष्ट अकारस्वरूप प्रणवका एकाग्रचित्त होकर चिन्तन करे। जब वायु भर जाय तब विद्वान् पुरुष मन और इन्द्रियोंको वशमे रखते हुए चौसठ मात्राओसे विशिष्ट उकारके स्वरूपका कुछ कालतक चिन्तन करे और प्रणवका जप करते हुए वायुको धारण किये रहे । इसके बाद बत्तीस मात्राओंसे विशिष्ट मकारका चिन्तन करते हुए इडा नाड़ीके द्वारा धीरे-धीरे वायुको निकाल दे। बुद्धिमान् पुरुष इसी प्रकार इडा नाड़ीके द्वारा वायुको भरते हुए पुनः अभ्यास करे। मुनीश्वर ! इस प्रकार प्रतिदिन प्राणायामका अभ्यास करना चाहिये । नित्य ऐसा अभ्यास करनेसे मनुष्य छः महीनोंमें ज्ञानवान् हो जाता है। एक वर्षतक पूर्वोक्त प्रकारसे प्राणायाम करनेसे साधकको ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है। इसलिये प्राणायामका नित्य अभ्यास करना चाहिये । जो मनुष्य योगाभ्यासमें संलग्न और सदा अपने धर्मके पालनमें तत्पर है, वह प्राणायामके द्वारा ही ज्ञान प्राप्त करके ससारसे मुक्त हो जायगा ॥ ७-११ ॥ 'जिसके द्वारा बाहरसे वायुको उदरके भीतर भरा जाता है, वह पूरक है। जलसे भरे हुए कुम्भ ( घड़े) की भाँति वायुको उदरमें धारण किये रहना कुम्भक कहलाता है और उस वायुको पुनः उदरसे बाहर निकालना रेचक कहलाता है ॥ १२-१३ ॥ 'जो प्राणायाम प्रस्वेदजनक होता है अर्थात् जिसको करते समय शरीरमे पसीना निकल आता है, वह सब प्राणायामों में अधम माना गया है। यदि प्राणायाम करते समय शरीरमें कम्पन होने लगे तो उसे मध्यम श्रेणीका प्राणायाम समझना चाहिये, तथा यदि प्राणायामके समय शरीर ऊपरको उठता हुआ सा जान पड़े तो उसे उत्तम माना गया है। जबतक उत्थानकारक प्राणायाम सिद्ध न हो जाय, तबतक पूर्वोक्त दोनों प्रकारके प्राणायामोंका ही अभ्यास करता रहे। उपर्युक्त उत्तम प्राणायामके सम्पन्न हो जानेपर विद्वान् पुरुष सुखी हो जाता है। सुव्रत ! प्राणायामसे चित्त शुद्ध हो जाता है और विशुद्ध चित्तमें अन्तःप्रकाशस्वरूप शुद्ध आत्मतत्त्वका साक्षात्कार होने लगता है। प्राणायाममें संलग्न रहनेवाले महात्मा पुरुषका प्राण चित्तके साथ सयुक्त हो परमात्मामें स्थित हो जाता है और उसका शरीर कुछ कुछ ऊपरको उठने लगता है। इससे ज्ञान होकर मोक्ष प्राप्त होता है। रेचक और पूरक छोड़कर विशेषतः कुम्भकका ही नित्य अभ्यास करना चाहिये । यों करनेवाला योगी सब पापोंसे मुक्त होकर उत्तम ज्ञानको प्राप्त कर लेता है। वह मनके समान वेगवान् होता एव मनपर विजय पा जाता है। उसके शरीरमें बालोंका पकना आदि दोष दूर हो जाते हैं। प्राणायाममें अनन्य निष्ठा रखनेवाले पुरुषके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके प्राणायामों का अभ्यास करे ॥ १४-२० ॥ 'सुव्रत ! अब मैं प्राणायामके विनियोग ( रोगविशेषकी निवृत्तिके लिये उपयोग) बतलाता हूँ। दोनों सन्ध्याओंके समय अथवा ब्राह्मवेलामें अथवा मध्याह्नके समय सदा बाहरकी वायुको भीतर खींचकर उदरमें भरने तथा उदर, नासिकाके अग्रभाग, नाभिके मध्यभाग और पैरके अँगूठेमें उस वायुको धारण करनेसे मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है तथा सौ वर्षोतक जीवित रहता है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर ! नासिकाके अग्रभागमे धारण करनेसे भी प्राण- वायुपर विजय प्राप्त हो जाती है। नाभिके मध्यभागमे धारण करनेसे समस्त रोगोंका निवारण हो जाता है। ब्रह्मन् ! पैरके अँगूठेमें वायुका निरोध करनेसे शरीरमें हल्कापन आता है। योगका साधन करनेवाला जो मनुष्य सदा जिह्वाके द्वारा वायु खींचकर उसे पीता रहता है, वह थकावट और जलनसे मुक्त होकर नीरोग रहता है। जिह्वाद्वारा वायुको खींचकर उसे जिह्वा- के मूलभागमे ही रोक दे और शान्तभावसे ( भावनाद्वारा ) अमृतपान करे। यों करनेसे वह सब प्रकारके सुख प्राप्त कर लेता है। जो इडा नाड़ीके द्वारा वायुको खींचकर उसे भौंहोंके बीचमे धारण करता और (भावनाद्वारा) विशुद्ध अमृतका पान करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है। वैदिक तत्त्वको जाननेवाले सांकृति मुनि ! इडा और पिङ्गला नाड़ियोंके द्वारा वायुको खींचकर यदि उसे नाभिमें धारण करे तो उससे भी मनुष्य सब व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है। यदि एक मासतक तीनो सन्ध्याओंके समय जिह्वाद्वारा धीरे-धीरे वायुको भीतर खींच- कर और पूर्वोक्त अमृतपानकी भावना करते हुए उसे नाभिमे रोके रहे तो वात और पित्तसे उत्पन्न सम्पूर्ण दोष निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं। दोनों नासिका छिद्रोंद्वारा वायुको भीतर खींचकर यदि उसे दोनों नेत्रोंमे धारण करे तो नेत्रके रोग नष्ट हो जाते हैं और कानोंमें उसे रोकनेसे कानके सब रोग नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार वायुको भीतर खींचकर यदि उसे मस्तकमें स्थापित करे तो सिरके सब रोग नष्ट हो जाते हैं। सांकृते ! ये सब मैने तुमसे सच्ची बातें बतायीं हैं ॥ २१-३१ ॥ 'एकाग्रचित्त होकर स्वस्तिकासनसे बैठे और प्रणवका जप करते हुए धीरे धीरे अपानवायुको ऊपरकी ओर उठाये

खण्ड ७] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०७ और कान आदि इन्द्रियोंको दोनों हाथोंसे भलीभाँति दबाये रक्खे—दोनों अँगूठोंसे दोनों कानोंको ढक ले, दोनों तर्जनी अँगुलियोंसे दोनों नेत्र आच्छादित कर ले तथा अन्य दो-दो अँगुलियोंसे नासिकाके दोनों छिद्रोंको बंद कर ले, इस प्रकार ऊपरकी सब इन्द्रियोंको आच्छादित करके उस वायुको तबतक मस्तकमें धारण किये रहे, जबतक आनन्दमय अमृतका आविर्भाव न हो जाय। महामुने ! यों करनेसे ही प्राण ब्रह्मरन्ध्रमें प्रवेश करता है। हे निष्पाप सांकृति ! जब वायु ब्रह्मरन्ध्रमे प्रवेश कर जाय तब पहले शङ्खध्वनिके समान एक गम्भीर नाद होने लगता है। बीचमे वह नाद मेघकी गर्जनाके समान हो जाता है। जब वायु मस्तकके मध्य भलीभाँति स्थित हो जाती है, उस समय पर्वतसे गिरते हुए झरनेकी कलकल ध्वनिके समान शब्द होने लगता है। महामते ! ऐसा होनेके पश्चात् योगी अत्यन्त प्रसन्नताका अनुभव करते हुए साक्षात् आत्माके सम्मुख हो जाता है। फिर आत्मतत्त्वका सम्यक् ज्ञान होता है और उस योगके प्रभावसे संसार-बन्धनका नाश हो जाता है ॥ ३२-३७ ॥ '(अब प्राणवायुको जीतनेका दूसरा प्रकार बतलाते हैं—) गुदा और लिङ्गके बीचमें जो नाड़ी है, उसे सीवनी कहते हैं; क्योंकि वही शरीरके दो अर्धांगोंको सीलकर एक करती है। बुद्धिमान् मनुष्य अपने दायें और बायें रखनेसे उस सीवनीको स्थिरभावसे दबाकर बैठे और घुटनोंके नीचे जो सन्धि है, उसमें भगवान् त्र्यम्बकनामक ज्योतिर्लिङ्गकी भावना करे। साथ ही सरस्वतीदेवी और गणेशजीका भी ध्यान कर ले। फिर बिन्दुयुक्त प्रणवका जप करते हुए लिङ्गकी नलीके छिद्रद्वारा आगेकी ओरसे वायुको खींचकर उसे मूलाधारके मध्यमे स्थापित करे। वहाँ उस वायुको रोकनेसे वहाँकी अग्नि प्रदीप्त होकर कुण्डलिनीपर आरूढ हो जाती है। फिर उस अग्निको साथ लेकर वायु सुषुम्ना नाड़ीके द्वारा ऊपर- को जाने लगती है। इस प्रकार अभ्यास करनेसे वायुपर विशेष रूपसे विजय प्राप्त हो जाती है ॥ ३८—४२ ॥ 'मुनिश्रेष्ठ ! पहले पसीना निकलना, फिर कम्पन होना तत्पश्चात् शरीरका ऊपरकी ओर उठना—ये सब वायुपर विजय प्राप्त कर लेनेके चिह्न हैं। इस प्रकार अभ्यास करने- वाले पुरुषके सब रोग मूलतः नष्ट हो जाते हैं। सांकृते ! भगन्दर तथा अन्य सब रोग भी मिट जाते हैं। बड़े और छोटे—सभी पातक नष्ट हो जाते हैं। पाप नष्ट हो जानेसे चित्त परम शुद्ध और दर्पणकी भाँति स्वच्छ हो जाता है। तत्पश्चात् हृदयमे ब्रह्मा आदि देवताओंके लोकोंतकमें प्राप्त होनेवाले भोगजनित सुखोंके प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार जो ससारसे विरक्त होता है, उसे कैवल्य मोक्षका साधनभूत ज्ञान प्राप्त हो जाता है। उस ज्ञानसे नित्य कल्याण- मय परमात्मदेवका तत्त्व जान लेनेके कारण सब प्रकारके बन्धनों- का सर्वथा नाश हो जाता है। जिसने एक बार भी ज्ञानमय अमृतरसका आस्वादन कर लिया, वह सब कार्योंको छोड़कर उसीकी ओर दौड़ पड़ता है। ज्ञानी पुरुष इस सम्पूर्ण जगत्- को ज्ञानस्वरूप ही बताते हैं, जिनकी दृष्टि कुत्सित है, वे दूसरे- दूसरे अज्ञानी मनुष्य इस जगत्को विषयरूपमें देखते हैं। आत्मस्वरूपका भलीभाँति ज्ञान होनेपर अज्ञानका पूर्णतः नाश हो जाता है। और हे महाप्राज्ञ ! अज्ञानके नष्ट हो जानेपर राग आदिका भी सहार हो जाता है। राग आदि न रहनेसे पुण्य- पापका भी लय हो जाता है। पुण्य पापके न रहनेसे ज्ञानी मनुष्यको फिर शरीर धारण नहीं करना पड़ता ॥ ४३-५१ ॥ ॥ षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ ६ ॥ सप्तम खण्ड प्रत्याहारके विविध प्रकार तथा फल 'महामुने ! अब मै प्रत्याहारका वर्णन करूँगा। विषयोंमे स्वभावतः विचरनेवाली इन्द्रियोंको बलपूर्वक वहाँसे लौटा लानेका जो प्रयत्न है, उसीको प्रत्याहार कहते हैं। 'मनुष्य जो कुछ देखता है, वह सब ब्रह्म है' यों समझते हुए ब्रह्ममें चित्तको एकाग्र कर लेना—यह ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा बतलाया हुआ प्रत्याहार है। मनुष्य मरणकालतक जो कुछ भी शुद्ध या अशुद्ध कर्म करता है, वह सब परमात्माके लिये करे— परमात्माको ही उसे समर्पित कर दे, यह भी प्रत्याहार कहलाता है। अथवा नित्य और काम्य, सब प्रकारके कर्मोंको भगवान्- की आराधनाके भावसे करे—उन कर्मोंद्वारा भगवान्की पूजा करे, इसे भी प्रत्याहार कहते हैं। अथवा वायुको एक स्थानसे खींचकर दूसरे स्थानपर स्थापित करे—दाँतके मूल- भागसे वायुका आकर्षण करके उसे कण्ठमें स्थापित करे, कण्ठ- से हृदयमे ले जाय, हृदयसे खींचकर उसे नाभि-प्रदेशमें स्थापित करे, नाभि प्रदेशसे कुण्डलिनीमें ले जाकर रोके, कुण्डलिनीके स्थानसे हटाकर विद्वान् पुरुष उसे मूलाधारमे

७०८ जाबालदर्शनोपनिषद् * [ खण्ड ९ स्थापित करे, तदनन्तर अपानवायुके स्थानसे उस वायुको तकके स्थानोमे पूर्ण कर दे । दोनो पैरोंमें, मूलाधारमे, नाभि- हटाकर कटिके दोनों भागोंमे ले जाय और वहाँसे जाँघोंके कन्दमे, हृदयके मध्यभागमे, कण्ठके मूलभागमे, तालुमे, भौंहों- मध्यभागमे ले जाय । जाँघोंमे दोनों घुटनोंमे, घुटनोंमे के मध्यभागमे, ललाटमे तथा मस्तकमे वायुको धारण करे । पिंडलियोंमे और पिंडलियोंसे पैरके अँगूठेमे ले जाकर उस यह वायु धारणात्मक प्रत्याहार है ॥ १०--१२ ॥ वायुको रोके । प्रत्याहार परायण महात्माओंने प्राचीन कालसे 'विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त हो देहसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसीको प्रत्याहार कहा है ॥ १-९ ॥ उसे स्वय ही निर्द्वन्द्व एव निर्विकल्पस्वरूप अपने आत्मामे 'इस प्रकार प्रत्याहारके अभ्यासमे लगे हुए महात्मा पुरुषके स्थापित करे । वेदान्ततत्त्वके जाननेवाले महात्माओने इसीको सब पाप तथा जन्म मरणरूप व्याधि नष्ट हो जाती है। स्वस्तिकासन- दान्ल्पनिक प्रत्याहार बताया है । इस प्रकार प्रत्याहारका का आश्रय ले विद्वान् पुरुष स्थिरभावसे बैठे और नासिकाके अभ्यास करनेवाल पुरुषके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं दोनो छिद्रोमे वायुको भीतर खींचकर उसे पैरसे लेकर मस्तक- है ॥ १३-१४ ॥ ॥ सप्तम खण्ड समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम खण्ड धारणाके दो प्रकार 'सुव्रत ! अब मै पञ्च धारणाओका वर्णन करूँगा। अपने वायुके अगमे ईश्वरका तथा आकाशके अगमे सदाशिवका ध्यान शरीरके भीतर जो आकाश है, उसमें बाह्य आकाशकी धारणा करे* ॥१-६॥ करे । इसी प्रकार प्राणमें बाहरी वायुकी, जठरानलमे बाह्य 'अथवा मुनिश्रेष्ठ ! तुमसे एक दूसरी धारणाका वर्णन अग्निकी, शरीरगत जलके अगमें ही बाह्य जल-तत्त्वकी तथा करता हूँ । बुद्धिमान् पुरुष अन्तर्यामी पुरुष (आत्मा) मे शरीरके पार्थिव भागमे ही समस्त पृथ्वीकी धारणा करे और सबपर शासन करनेवाले बोधमय, आनन्दमय एव कल्याण- प्रत्येक तत्त्वकी धारणाके समय क्रमशः ह, य, र, व, ल- स्वरूप परमात्माकी प्रतिदिन धारणा करे । इससे सब पापोंकी इन बीज मन्त्रोका उच्चारण करे । यह धारणा सर्वश्रेष्ठ बतायी शुद्धि हो जाती है । कार्यस्वरूप ब्रह्मा आदिका अपने अपने गयी है, यह सब पापोका नाश करनेवाली है। पैरसे लेकर कारणमे लय करके सबके परम कारण, अनिर्वचनीय तथा घुटनेतकका भाग पृथिवीका अग माना गया है। घुटनेसे लेकर बुद्धिसे परे जो अव्यक्त परमात्मा हे, उनकी अपने आत्मामे गुदातकका भाग जलका अश बताया जाता है। गुदासे ऊपर धारणा करे-अर्थात् ये साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा ही अन्तर्यामी हृदयतकका भाग अग्निका अश है । हृदयसे ऊपर भौहोंके आत्माके रूपमे विराजमान है, ऐसा निश्चय करे तथा इस मध्यभागतक वायुका अग है तथा मस्तकका भाग आकाश- प्रकार आत्मधारणा करते समय अपने मनको सम्पूर्ण कलाओं- का अश बताया गया है । हे महाप्राज्ञ ! पृथिवीके भागमे ब्रह्माका, से युक्त प्रणवस्वरूप परमात्मामे ही स्थापित करे । साथ ही जलके अगमें भगवान् विष्णुका, अग्निके अगमे महादेवजीका, मनके द्वारा समस्त इन्द्रियोंको भी अपने अपने विषयोंसे हटाकर आत्मामे सयुक्त करे' ॥ ७--९ ॥ ॥ अष्टम खण्ड समाप्त ॥ ८ ॥ नवम खण्ड दो प्रकारके ध्यान तथा उनका फल 'अब मै ससार बन्धनका नाश करनेवाले ध्यानका प्रकार यह निश्चय करे कि वह परब्रह्म परमात्मा मै ही बतलाता हूँ । जो समस्त ससाररूपी रोगके एकमात्र औषध, हूँ ॥ १-२॥ ऊर्ध्वरेता, भयङ्कर नेत्रोंवाले, योगीश्वरोंके भी ईश्वर, विश्वरूप 'अथवा ध्यानका दूसरा प्रकार यो है--जो सत्यस्वरूप, सबका तथा महेश्वररूप हैं, उन ऋत एव सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका ईश्वर, ज्ञानरूप, आनन्दमय, अद्वितीय, अत्यन्त निर्मल, अपने आत्मरूपसे आदरपूर्वक चिन्तन करे । अपनी बुद्धिमें नित्य तथा आदि, मध्य एव अन्तसे रहित है, स्थूल प्रपञ्चसे

  • यह पञ्चभूतोंकी धारणा 'रामतापनीयोपनिषद्' पृष्ठ १३८ की टिप्पणीमें भूत-शुद्धिके नामसे दी गयी है, उसको पढ़ने- से भूतधारणाका स्वरूप स्पष्ट हो जायगा ।

खण्ड १०] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०९ सर्वथा परे है, आकाशसे भिन्न है, स्पर्शमें आने योग्य वायुसे भी विलक्षण है, नेत्रोंसे दीख पड़नेवाले अग्नितत्त्वसे भी सर्वथा भिन्न है, रसस्वरूप जल और गन्धस्वरूप पृथिवीसे भी सर्वथा विलक्षण है, जिसे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा नहीं जाना जा सकता, जो अनुपम है, देहसे अतीत है, उस सच्चिदानन्द- स्वरूप एव अन्तररहित परब्रह्मका अपने आत्माके रूपमें ध्यान करे, बुद्धिके द्वारा यह निश्चय करे कि वह परब्रह्म परमात्मा मैं ही हूँ। इस प्रकार किया हुआ निर्विशेषका ध्यान मोक्षका साधक होता है ॥ ३-५ ॥ 'इस तरह ध्यानके अभ्यासमें लगे हुए महात्मा पुरुषको क्रमशः वेदान्तवर्णित ब्रह्मतत्त्वका विशेष ज्ञान हो जाता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है' ॥ ६ ॥ ॥ नवम खण्ड समाप्त ॥ ९ ॥ दशम खण्ड समाधि एवं उसका फल 'अब मैं संसार-बन्धनका नाश करनेवाली समाधिका वर्णन करूँगा। परमात्मा और जीवात्माकी एकताके विषयमें निश्चयात्मक बुद्धिका उदय होना ही समाधि है। यह आत्मा नित्य, सर्व- व्यापी, कूटस्थ—एकरस एव सब प्रकारके दोषोंसे रहित है। यह एक होते हुए भी मायाजनित भ्रमके कारण भिन्न भिन्न प्रतीत होता है, स्वरूपतः उसमें कोई भेद नहीं है। अतः केवल अद्वैत ही सत्य है। प्रपञ्च या संसार नामकी कोई वस्तु नहीं है। जैसे आकाश ही घटाकाश और मठाकाशके नामसे पुकारा जाता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुषोंने एक ही परमात्माको जीव और ईश्वर—इन दो रूपोंमें कल्पित कर लिया है। मैं न देह हूँ, न प्राण हूँ न इन्द्रियसमुदाय हूँ और न मन ही हूँ, सदा साक्षीरूपमें स्थित होनेके कारण मैं एकमात्र शिवस्वरूप परमात्मा हूँ—मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकारकी जो निश्चयात्मिका बुद्धि है, वही यहाँ समाधि कहलाती है ॥ १-५ ॥ 'मैं वह परमात्मा ही हूँ, संसार-बन्धनमें बँधा हुआ जीव नहीं हूँ, इसलिये मुझसे भिन्न किसी भी वस्तुकी किसी भी कालमे सत्ता नहीं है। जैसे फेन और तरङ्ग आदि समुद्रसे ही उठते हैं और पुनः समुद्रमे ही लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार यह जगत् मुझमें ही उत्पन्न और विलीन होता रहता है। अतः सृष्टिका कारणभूत समष्टि मन भी मुझसे पृथक् नहीं है। यह जगत् और माया भी मुझसे अलग कोई अस्तित्व नहीं रखते। इस प्रकार जिस पुरुषको ये परमात्मा अपने आत्मा- रूपसे अनुभव होने लगते हैं, वह परम पुरुषार्थस्वरूप साक्षात् परमामृतमय परमात्मभावको प्राप्त हो जाता है। जब योगीके मनमें सर्वत्र व्यापक आत्मचैतन्यका अपरोक्ष अनुभव होने लगता है, तब वह स्वयं परमात्मस्वरूपमे प्रतिष्ठित हो जाता है। जब ज्ञानी महात्मा सब भूतोंको अपनेमें ही देखता है और अपनेको ही सम्पूर्ण भूतोंमें प्रतिष्ठित देखता है, तब वह साक्षात् ब्रह्म हो जाता है। जब समाधिमे स्थित पुरुष परमात्मासे एकीभूत होकर अपनेसे भिन्न किसी भी भूतको नहीं देखता, तब वह केवल परमात्म- स्वरूपसे प्रतिष्ठित होता है। जब मनुष्य केवल अपने आत्मा- को ही परमार्थ—सत्यस्वरूप देखता है और सम्पूर्ण जगत्‌को मायाका विलासमात्र मानता है, तब उसे परमानन्दकी प्राप्ति हो जाती है।' महामुनि भगवान् दत्तात्रेयजी इस प्रकार उपदेश देकर मौन हो गये तथा मुनिवर सांकृति उस उपदेशको हृदयङ्गम करके अपने यथार्थ स्वरूपसे स्थित हो अत्यन्त निर्भय स्थितिमे पहुँचकर सुखसे रहने लगे ॥ ६-१३ ॥ ॥ दशम खण्ड समाप्त ॥ १० ॥ ॥ सामवेदीय जाबालदर्शनोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः .!! शान्तिः. !!! प्रथम खण्ड भगवान् शंकरका शुकदेवजीको उपदेश 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके षडङ्गन्यास

अब हम रहस्योपनिषद्की व्याख्या करते हैं। एक समय देवर्षिगणोंने पितामह ब्रह्माजीकी पूजा की और प्रणाम करके उनसे पूछा-‘भगवन् ! हमें गूढ उपनिषत्तत्त्व बतलायें।' तब ब्रह्माजीने कहा—पहले एक समय महातेजस्वी, समस्त वेदोंके ज्ञाता तपोनिधि वेदव्यासने पार्वतीके साथ भगवान् शङ्करको दण्डवत् प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की थी—॥ १॥ श्रीवेदव्यासजीने कहा—‘देव-देव, महाप्राज्ञ, जीवके बन्धनको काटनेका दृढ व्रत धारण करनेवाले प्रभो ! मेरे पुत्र शुकदेवके वेदाध्ययनके लिये किये जानेवाले उपनयन-संस्कार- कर्ममें यह प्रणव एवं गायत्री-मन्त्रके उपदेशका समय आ गया है। अतः हे जगद्गुरो ! आप उन्हें ब्रह्म-प्रणव एवं परमात्म-तत्त्वका उपदेश करें' ॥ २-३ ॥ भगवान् शङ्करने कहा—'मेरे द्वारा कैवल्यस्वरूप साक्षात् सनातन परब्रह्मका उपदेश दिये जानेपर तुम्हारा पुत्र वैराग्य- पूर्वक सब कुछ छोड़कर स्वतः प्रकाशस्वरूपको प्राप्त कर लेगा। तात्पर्य यह कि मेरे द्वारा पुत्रको ब्रह्मज्ञानका उपदेश करानेका आग्रह करोगे तो पुत्र विरक्त हो जायगा' ॥ ४ ॥ श्रीवेदव्यासजीने प्रार्थना की—'महेश्वर ! मेरे पुत्रका जो भी होना हो, सो हो किंतु इस उपनयन-कर्मके समय आपकी कृपासे, आपके द्वारा ब्रह्मज्ञानका उपदेश पाकर मेरा पुत्र शीघ्र ही सर्वज्ञ हो जाय । आपकी कृपासे वह चारो प्रकारके ( सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सालोक्य ) मोक्षोंको प्राप्त करे' ॥ ५-६ ॥

श्रीवेदव्यासजीकी ऐसी प्रार्थना सुनकर भगवान् शङ्कर प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवर्षियोंकी सभामें उपदेश देनेके लिये भगवती पार्वतीके साथ दिव्य आसनपर विराजमान हुए । तब कृत कृत्य ( सफलमनोरथ ) श्रीशुकदेवजीने आकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक उन ( भगवान् शिव ) से प्रणवकी दीक्षा ग्रहण की और फिर उन भगवान् शङ्करसे यह प्रार्थना की— ‘देवाधिदेव, सर्वज्ञ, सच्चिदानन्दस्वरूप, उमारमण, भूत- नाथ, दयानिधे ! आप प्रसन्न हों। आपने मुझे प्रणवके अन्तर्गत ( प्रत्यगात्मारूप ) एवं उससे परे स्थित परम ब्रह्मका उपदेश तो कर दिया अब मैं विशेषतः 'तत्त्वमसि', 'प्रज्ञानं ब्रह्म' प्रभृति चारो महावाक्योंका षडङ्गन्यास क्रमपूर्वक सुनना चाहता हूँ। सदाशिव प्रभो ! अब कृपा करके आप उनका रहस्य बतलायें' ॥ ७-१६ ॥ भगवान् सदाशिव बोले—'हे ज्ञाननिधि शुकदेवजी ! मुने ! तुम अत्यन्त बुद्धिमान् हो। तुम्हें अनेको साधुवाद । तुमने वेदोंमें छिपे हुए, पूछने योग्य रहस्यको ही पूछा है; अतः रहस्योपनिषद् नामसे प्रसिद्ध इस गूढ रहस्यमय उपदेशका षडङ्गन्यास सहित वर्णन किया जाता है, जिसके भली प्रकार जान लेने मात्रसे साक्षात् मोक्ष प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। फिर ( नियम यह है कि ) गुरु अङ्गहीन वाक्योंका उपदेश न करे । सभी महावाक्योंका उपदेश उनके षडङ्गके साथ ही करे। जैसे चारों वेदोंमें उपनिषद्भाग (ज्ञानकाण्ड) शिरःस्थानीय ( सर्वोत्तम ) है, वैसे ही समस्त उपनिषदोंमें यह रहस्यो-

खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७११


पनिषद् शिरःस्थानीय ( सर्वोत्तम ) है। जिस विचारवान्ने रहस्योपनिषद्में उपदिष्ट ब्रह्मका ध्यान किया है, उसे पुण्यके हेतुभूत तीर्थ-स्नान, मन्त्रजप, वेद-पाठ तथा जपादिसे क्या प्रयोजन है। महावाक्योंके अर्थको सौ वर्षोंतक विचार करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह उनके ऋष्यादि-स्मरण तथा ध्यानपूर्वक एक बारके जपसे ही प्राप्त हो जाता है ॥ १२-१७॥

[ ऋष्यादि षडङ्गका पाठ करके पुनः उनका मस्तकादिमे न्यास करना चाहिये। वह इस प्रकार है — ]

ॐ अस्य श्रीमहावाक्यमहामन्त्रस्य हस ऋषि । अव्यक्तगायत्री छन्दः। परमहंसो देवता । हं बीजम् । स शक्तिः । सोऽह कीलकम्। मम परमहंसप्रीत्यर्थे महावाक्यजपे विनियोग ।

[ निम्न प्रकारसे दोनों हाथोंकी निर्दिष्ट अंगुलियोंका स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिये—]

‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अङ्गुष्ठाभ्या नम । ‘नित्यानन्दो ब्रह्म’ तर्जनीभ्या स्वाहा। ‘नित्यानन्दमय ब्रह्म’ मध्यमाभ्या वषट् । ‘यो वै भूमा’ अनामिकाभ्या हुम् । ‘यो वै भूमाधिपतिः’ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म’ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् ।

[ फिर नीचेकी रीतिसे हृदयादिको स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिये । ]

‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ हृदयाय नम । ‘नित्यानन्दो ब्रह्म’ शिरसे स्वाहा। ‘नित्यानन्दमय ब्रह्म’ शिखायै वषट् । ‘यो वै भूमा’ कवचाय हुम् । ‘यो वै भूमाधिपति.’ नेत्रत्रयाय वौषट् । ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म’ अस्त्राय फट् । ‘भूर्भुव सुवरोम्’ इस मन्त्रसे दिगवन्ध करना चाहिये।

ध्यान नित्यानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरु तं नमामि ॥*

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥


द्वितीय खण्ड

‘तत्त्वमसि’ महावाक्यके प्रत्येक पदके पृथक्-पृथक् षडङ्गन्यास

महावाक्य चार हैं— १—‘ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म’ । २—‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि’ । ३-‘ॐ तत्त्वमसि’ और ४-‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म’। इनमेंसे ‘तत्त्वमसि’ इस अभेदवाचक (जीवब्रह्मके अभेदके प्रतिपादक) महावाक्यका जो लोग जप करते हैं, वे भगवान् शङ्करकी सायुज्यमुक्तिके अधिकारी होते हैं।

[‘तत्त्वमसि’ महावाक्यके ‘तत्’ पदरूप महामन्त्रके ऋषि आदिका स्मरण निम्नरूपसे करके उनका यथास्थान न्यास करना चाहिये---]

तत्पदमहामन्त्रस्य परमहस ऋषि । अव्यक्तगायत्री छन्द । परमहसो देवता । ह बीजम् । स शक्ति । सोऽहं कीलकम् । मम सायुज्यमुक्त्यर्थे जपे विनियोग ।

[ करन्यास ] ‘तत्पुरुषाय’ अङ्गुष्ठाभ्या नमः। ‘ईशानाय’ तर्जनीभ्या स्वाहा। ‘अघोराय’ मध्यमाभ्या वषट् । ‘सद्योजाताय’ अनामिकाभ्या हुम् । ‘वामदेवाय’ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ‘तत्पुरुषेशानाघोरसद्योजातवामदेवेभ्यो नम’ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् ।

इन्हीं करन्यासके मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके ‘भूर्भुव. सुवरोम्’ इस मन्त्रसे दिग्वन्ध करना चाहिये।

ध्यान ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यादतीतं शुद्ध बुद्धं मुक्तमप्यव्ययं च। सत्यं ज्ञानं सच्चिदानन्दरूपं ध्यायद्वेदं तन्महो भ्राजमानम् ॥†


* नित्यानन्दरूप, परमसुखदायी, कैवल्यरूप, ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे परे, आकाशके समान व्यापक एव निर्लेप, ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके लक्ष्य, एक, नित्य, निर्मल, स्थिर, सम्पूर्ण बुद्धियोंके साक्षिरूपमें अवस्थित, षड्भावविकारोंसे अतीत, त्रिगुणोंसे रहित, उन परमब्रह्मस्वरूप सद्गुरुदेवको हम नमस्कार करते हैं। † ज्ञानके साधन एव ज्ञानके विषय, तथा साथ ही ज्ञानकी गम्यतासे परे, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अव्यय, सत्यस्वरूप, ज्ञान-स्वरूप एव सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय रूपमें उस दिव्य प्रकाशका ध्यान करे ।

७१२ * शुकरहस्योपनिषद् * [ खण्ड ३ [ उसी 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'त्वम्' पदके ऋषि [ अन्तमें महावाक्यके अन्तिम तीसरे 'असि' पदके ऋषि आदिका जप निम्न प्रकारसे करके उसका न्यास करना चाहिये ।] आदिका एव न्यास-मन्त्रोंका उल्लेख किया जाता है ।] त्वंपदमहामन्त्रस्य विष्णुर्ऋषि । गायत्री छन्द । 'असि'पदमहामन्त्रस्य मन ऋषि' । गायत्री छन्द. । परमात्मा देवता । ऐं बीजम् । क्लीं शक्ति । सौ. कीलकम् । अर्धनारीश्वरो देवता । अव्यक्तादिर्बीजम् । नृसिंह. शक्तिः । मम मुक्त्यर्थे जपे विनियोग. । परमात्मा कीलकम् । जीवब्रह्मैक्यार्थे जपे विनियोगः । 'वासुदेवाय' अङ्गुष्ठाभ्या नम. । 'पृथ्विद्व्यणुकाय' अङ्गुष्ठाभ्या नम. । 'सङ्कर्षणाय' तर्जनीभ्या स्वाहा । 'अब्द् व्यणुकाय' तर्जनीभ्या स्वाहा । 'प्रद्युम्नाय' मध्यमाभ्या वषट् । 'तेजोद्व्यणुकाय' मध्यमाभ्या वषट् । 'अनिरुद्धाय' अनामिकाभ्या हुम् । 'वायुद्व्यणुकाय' अनामिकाभ्या हुम् । 'वासुदेवाय' कनिष्ठिकाभ्या वौषट् । 'आकाशद्व्यणुकाय' कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । 'वासुदेवसकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धेभ्य ' करतलकर- 'पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशद्व्यणुकेभ्य.' पृष्ठाभ्या फट् । करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । [ यह करन्यास करके ] इसी मन्त्रसे हृदयादिन्यास [ इस मन्त्रसे करन्यास करके इसी प्रकार हृदयादि- करना चाहिये । 'भूर्भुव सुवरोम्' इस मन्त्रसे दिग्वन्ध करना न्यास करे । ] 'भूर्भुव. सुवरोम्' इस मन्त्रसे दिग्रन्ध कर ले । चाहिये । ध्यान ध्यान जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मन.स्थिति । जीवत्त्व सर्वभूताना सर्वत्राखण्डविग्रहम् । ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसिपदं सदा ॥† चित्ताहङ्कारयन्तार जीवाख्य त्वपद भजे ॥* इस प्रकार महावाक्यके पडङ्ग (-न्यास ) बतलाये गये । , ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड चारों महावाक्योंकी पदविन्यासपूर्वक व्याख्या अब रहस्योपनिषद्के विभागके अनुसार वाक्योंका अर्थ देहमे परिपूर्ण परमात्मा बुद्धिके साक्षिरूपसे अवस्थित होकर बतलानेवाले श्लोक कहे जाते हैं । [ वाक्यार्थ श्लोकोंमे है, स्फुरित होनेपर 'अह' कहे जाते हे । स्वतः पूर्ण परात्मा यहाँ और श्लोकोंका भाव इस प्रकार है-] जिसके द्वारा ( प्राणी ) 'ब्रह्म' शब्दसे वर्णित है, तथा 'अस्मि' ( मैं हूँ ) यह पद उनके देखता है, इस जगत्के विषयोंको सुनता है, सूँघता है, वाणी- साथ अपनी एकताका बोध कराता है, अतः मे ब्रह्मस्वरूप द्वारा कहता है और स्वादिष्ट या अस्वादिष्टको पहचानता है ही हूँ ॥ ३-४ ॥ ( रसज्ञान करता है ), उसे 'प्रज्ञान' कहा गया है । चतुर्मुख [ 'तत्त्वमसि' वाक्यमे ] सृष्टिके पूर्व एकमात्र द्वैतकी सत्ता- ब्रह्माजी, देवराज इन्द्र, देवगण, मनुष्य एव घोड़े, गाय प्रभृति से रहित, नाम-रूपहीन सत्ता थी और अब भी वह सत्ता वैसी पशुओंमे एक ही चेतनतत्त्व ब्रह्म है । वही प्रज्ञान ( ज्ञानरूप ) ही है- 'तत्' पदसे यह प्रतिपादित होता है । उपदेश श्रवण ब्रह्म मुझमें भी है ॥ १-२ ॥ करनेवाले शिष्यका जो देह और इन्द्रियोंसे अतीतस्वरूप है, ब्रह्मादिचारो प्राप्त करनेके अधिकारी इस ( मानव ) वही यहाँ महावाक्यके 'त्व' पदसे वर्णित है तथा महावाक्यके

  • जो सम्पूर्ण प्राणियोंके जीव-तत्त्वका बोधक है, जिसकी मूर्ति सर्वत्र अखण्डित है और जो चित्त तथा अहङ्कारका नियन्त्रणकर्ता है, उस 'त्वम्' पदके द्वारा बोध्य जीव-नामक परमेश्वरका हम स्मरण करते हैं। † जबतक मनकी स्थिति है ( जबतक मनोनाश नहीं हो जाता ), तबतक 'जीव ब्रह्म ही ह', इस वाक्यार्थके रूपमें 'असि' पदका चिन्तन करे, अर्थात् 'असि' पद जीव और ब्रह्मकी एकता बतला रहा है- इस भावका मनन करता रहे । फिर यों करते-करते जब मनका लय हो जाय, तब जीव और ब्रह्म दोनोंकी एकतारूप तत्त्वका अनुभव करते हुए 'असि' पदके तात्पर्यको सदा ध्यानके द्वारा प्रत्यक्ष करता रहे ।

खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१३ 'असि' पदके द्वारा उन 'तत्' एव 'त्वम्' पदोंके बोध्य ब्रह्म और जीवकी एकताका ग्रहण कराया गया है । उस एकत्वका अनुभव करो । [ 'अयमात्मा ब्रह्म' इस महावाक्यमें ] 'अयम्' पदके द्वारा स्वतःप्रकाश अपरोक्ष—नित्य प्रत्यक्ष स्वरूपका वर्णन हुआ है । अहंकारसे लेकर शरीरपर्यन्तको प्रत्यगात्मा बताया गया है । दिखायी पड़नेवाले सम्पूर्ण जगत्में जो व्यापक तत्त्व है, वही 'ब्रह्म' शब्दसे वर्णित है । वह ब्रह्म स्वतःप्रकाश, आत्मस्वरूप है ॥ ५-८ ॥ "अनात्मामें आत्मदृष्टि करनेसे मैं अज्ञानकी निद्रामें पड़कर 'मैं' और 'मेरे' की प्रतीति करानेवाली स्वप्नावस्थामें आ पहुँचा था। श्रीगुरुदेवके द्वारा महावाक्यके पदोंका स्पष्ट उपदेश दिये जानेपर स्वरूपरूपी सूर्यके उदित होनेसे मैं जग गया हूँ । [ऐसा अनुभव करके शुकदेवजी मनन आरम्भ करते हैं—] महावाक्यके अर्थको समझनेके लिये वाच्य और लक्ष्य—इन दोनों ही अर्थोंकी प्रणालीका अनुसरण करना चाहिये । वाच्य-सरणीके अनुसार भौतिक इन्द्रिय आदि भी 'त्वं' पदके वाच्य होते हैं, किंतु लक्ष्यार्थ वही है, जो इन्द्रियादिसे अतीत विशुद्ध चेतन है। इसी प्रकार 'तत्' पदका वाच्य तो ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे विशिष्ट परमात्मा है, किंतु लक्ष्यार्थ है—केवल सच्चिदानन्दमय ब्रह्म । अतः यहाँ भाग-त्याग लक्षणासे 'असि' पदके द्वारा उक्त दोनों पदोंके लक्ष्यार्थको ही लेकर जीव और ब्रह्मकी एकता बतायी जाती है। 'त्वं' और 'तत्'—ये कार्य (शरीर) तथा कारण (माया) रूप उपाधिके द्वारा ही दो हैं । उपाधि न रहनेपर दोनों ही एकमात्र सच्चिदानन्दस्वरूप हैं । जगत्में भी 'यह वही देवदत्त है (जो अमुक स्थानपर अमुक समयमें मिला था )—इस वाक्यमें 'यह' और 'वह' इन दोनों वचनोंके हेतुभूत देश और कालका अन्तर छोड़ देनेपर देवदत्त एक ही निश्चित होता है । यह जीव कार्य ( शरीर ) की उपाधिसे युक्त है और ईश्वर कारण ( माया ) की उपाधिसहित है । कार्य एव कारणरूपको छोड़ देनेपर पूर्ण ज्ञानस्वरूप बच रहता है ॥९-१२॥ पहले गुरुके द्वारा श्रवण करे । अनन्तर मनन किया जाय । फिर निदिध्यासन करे । यह पूर्णबोधका कारण होता है। दूसरी विद्याओंका सम्यक् ज्ञान भी निश्चय ही नश्वर है, किंतु ब्रह्मविद्याका सम्यक् ज्ञान स्थिर ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है । भगवान् ब्रह्माजीकी आज्ञा है कि गुरु 'षडङ्ग' सहित महावाक्योंका उपदेश करे । केवल महावाक्योंका उपदेश न करे ॥ १३-१५ ॥ भगवान् शङ्कर बोले—'मुनिश्रेष्ठ शुकदेव ! तुम्हारे ब्रह्मवेत्ता पिता व्यासजीकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर मैंने तुम्हें इस रहस्योपनिषद्का उपदेश किया है । इसमें सच्चिदानन्द- स्वरूप ब्रह्मका उपदेश है। तुम उसका नित्य ध्यान करते हुए जीवन्मुक्त होकर विचरण करोगे । जो स्वर ( प्रणव ) वेदके प्रारम्भमें उच्चारण किया जाता है और जो वेदान्तमें ( ज्ञानकाण्डमें ) प्रतिष्ठित है, उसकी प्रकृति ( त्रिमात्रा ) में लीन होनेपर जो उससे परे ( अर्धमात्रास्वरूप ) अवस्थित है, वही महेश्वर ( परब्रह्मका स्वरूप ) है' ॥ १६-१८ ॥ भगवान् शङ्करके द्वारा इस प्रकार उपदेश दिये जानेपर शुकदेवजी सम्पूर्ण जगत्के साथ तन्मयताकाको प्राप्त हो गये । फिर उठकर भगवान् शङ्करको प्रणाम करके सम्पूर्ण परिग्रहको छोड़कर वे मानो परब्रह्मके समुद्रमे तैर रहे हों—इस प्रकार आनन्दमग्न होकर वहाँसे चल पड़े । पुत्रको जाते देखकर महामुनि कृष्णद्वैपायन व्यासजीने उनके पीछे चलते हुए पुत्र-वियोगसे कातर होकर उन्हें पुकारा । उस समय जगत्के समस्त जड-चेतन पदार्थोंने ( व्यासजीकी पुकारका ) प्रत्युत्तर दिया । सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासने उस उत्तरको सुनकर पुत्रको सकल—जगदात्माकार देखकर अपने पुत्र शुकदेवजीके साथ ( समान ) परमानन्द प्राप्त किया ( उन्हें परम प्रसन्नता हुई ) ॥ १९-२२ ॥ जो गुरुकी कृपासे इस रहस्योपनिषद्का अध्ययन करता है—इसे समझ लेता है, वह सभी पापोंसे छूटकर साक्षात् कैवल्यपदका उपभोग करता है, साक्षात् कैवल्यपदका उपभोग करता है ॥ २३ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय त्रिपाद्विभूतिमहा नारायणोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो॑ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! पूर्वकाण्ड प्रथम अध्याय पाद-चतुष्टयके स्वरूपका निर्णय परमतत्त्वके रहस्यको जाननेकी इच्छासे श्रीब्रह्माजीने देवताओंके वर्षोसे सहस्र वर्षांतक तपस्या की । सहस्र देववर्ष व्यतीत होनेपर ब्रह्माजीकी अत्यन्त उग्र एव तीव्र तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् महाविष्णु प्रकट हुए । ब्रह्माजीने उनसे कहा—'भगवन् ! मुझे परमतत्त्वका रहस्य बतलाइये, क्योंकि परमतत्त्वके रहस्यको बतलानेवाले एकमात्र आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह किस प्रकार ? ( यदि आप यह पूछें तो ) वही बतलाता हूँ । आप ही सर्वज्ञ हैं। आप ही सर्वशक्तिमान् हैं। आप ही सबके आधार हैं। आप ही सब कुछ बने हुए हैं। आप ही सबके स्वामी हैं। आप ही समस्त कार्योंके प्रवर्तक हैं। आप ही सबके पालनकर्ता हैं। आप ही सबके निवर्तक (विनाशक) हैं। आप ही सत् एव असत्स्वरूप हैं। आप ही सत् एव असत्से विलक्षण हैं। आप ही भीतर और बाहर—सर्वत्र व्यापक हैं। आप ही अत्यन्त सूक्ष्मतर हैं। आप ही महान्‌से भी अत्यन्त महान् हैं। आप ही सबकी मूल-अविद्याके विनाशक हैं। आप ही अविद्यामें विहार करनेवाले भी हैं। आप ही अविद्या- को धारण करनेवाले अधिष्ठान हैं। आप ही विद्या (ज्ञान) द्वारा जाने जाते हैं। आप ही विद्यास्वरूप हैं। आप ही विद्यासे परे भी हैं। आप ही समस्त कारणोंके कारण हैं। आप ही समस्त कारणोंकी समष्टि (समुदाय) हैं। आप ही समस्त कारणोंकी व्यष्टि (पृथक्-पृथक् कारण) हैं। आप ही अखण्ड आनन्द- रूप हैं। आप ही पूर्णानन्द हैं। आप ही निरतिशय आनन्द- स्वरूप हैं। आप ही तुरीय-तुरीय (तुरीयावस्थाके तुरीय) हैं। आप ही तुरीयातीत हैं। अनन्त उपनिषदोंद्वारा आप ही अन्वेषणीय हैं। निखिल शास्त्रोंके द्वारा आप ही ढूँढने योग्य हैं। आप ही ब्रह्मा (मै), शङ्करजी, इन्द्र आदि सब देवताओं तथा समस्त तन्त्रशास्त्रोंद्वारा अन्वेषण करने योग्य हैं। सभी मुमुक्षुओंद्धारा आप ही ढूँढे जाने योग्य हैं। सभी अमृतमय (मुक्त) पुरुषोंद्वारा आप ही खोजने योग्य हैं। आप ही अमृतमय हैं, आप ही अमृतमय हैं, आप ही अमृतमय हैं। आप ही सर्वरूप हैं, आप ही सर्वरूप हैं, आप ही सर्वरूप हैं। आप ही मोक्षस्वरूप है, आप ही मोक्षदाता हैं तथा मोक्षके सम्पूर्ण साधनस्वरूप भी आप ही हैं। आपके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आपके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब (बुद्धिद्वारा ) बाधित (अतत्त्व—मिथ्या) है—यह निश्चित है। इसलिये आप ही वक्ता हैं, आप ही गुरु हैं, आप ही पिता हैं, आप ही सबके नियन्ता हैं, आप ही सर्वस्वरूप हैं और आप ही सदा ध्यान करने योग्य हैं'—यह सुनिश्चित है' ॥ १ ॥ परमतत्त्वरूप भगवान् महाविष्णु 'साधु-साधु' कहकर प्रशंसा