भारतकोश
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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

उपदेश ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४९

गयी है। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंको प्रकाशित करते हुए तुरीयरूपमें जिसकी स्थिति बतायी गयी है, वह तुरीयरूप अविनाशी परमात्मा मैं ही हूँ—यों जानकर जो जाग्रत्- अवस्था में भी सुषुप्तकी भाँति रहता है; जो-जो सुनी और जो-जो देखी हुई वस्तु है, वह सब मानो अविज्ञात (अपरिचित)- सी है—इस प्रकार उनकी ओर ध्यान न देते हुए जो निवास करता है, उसकी स्वप्नावस्थामें भी वैसी ही अवस्था बनी रहती है। अर्थात् वह स्वप्नमें उपलब्ध पदार्थों को भी ग्रहण नहीं करता। ऐसा पुरुष जीवन्मुक्त है—इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं। समस्त श्रुतियोंके अर्थका प्रतिपादन भी यही है कि उसी- की मुक्ति होती है। भिक्षु इहलोक और परलोकके विषयोंकी भी अपेक्षा नहीं रखता। यदि उसमे अपेक्षा हो तो उसीके अनुरूप वह बन जायगा—अपने स्वरूपसे नीचे गिर जायगा। स्वरूपानुसन्धानको छोड़कर अन्य शास्त्रोंका अभ्यास उसके लिये उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे ऊँटकी पीठपर लदा हुआ केसरका भार। उसकी योगशास्त्रमें प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये। उसे सांख्यशास्त्रका अभ्यास तथा मन्त्र-तन्त्रका व्यापार भी नहीं करना चाहिये। यदि सन्यासीकी प्रवृत्ति अन्यान्य शास्त्रों- में होती है, तो वह सब उसके लिये मुर्देको पहनाये हुए आभूषणके समान है। चमारकी भाँति सबसे अत्यन्त दूर रहकर कर्म, आचार और विद्यासे भी दूर रहे। प्रणवका भी उच्च स्वरसे कीर्तन न करे, क्योंकि मनुष्य जो-जो कर्म करता है, उसका फल भी उसे भोगना पड़ता है। अतः सबको रेड़ी- के तेलके फेनकी भाँति निःसार समझकर त्याग दे और परमात्मचिन्तनमें संलग्न मनोमय दण्ड तथा हाथरूपी पात्र धारण करनेवाले दिगम्बर सन्यासीका दर्शन करके—उसके आदर्शको सामने रखकर भिक्षु सब ओर विचरण करे। वह बालक, उन्मत्त तथा पिशाचकी भाँति जीवन अथवा मृत्युकी कामना न करे। आज्ञाकारी भृत्यकी भाँति भिक्षु केवल काल की ही प्रतीक्षा करता रहे ॥ २५-२६॥

'जो तितिक्षा (सहनशीलता), ज्ञान, वैराग्य और शम दम आदि सद्गुणोंमें शून्य रहकर केवल भिक्षासे जीवन- निर्वाह करता है, वह सन्यासी सन्यास वृत्तिका हनन करनेवाला है। केवल दण्ड धारण करने, मूँड़ मुँड़ाने, वेष बनाने और दिखावेके लिये किसी आचारका पालन करनेसे मोक्ष नहीं मिलता। जिसने ज्ञानरूप दण्ड धारण किया है, वही एकदण्डी कहलाता है। जिसने काष्ठका दण्ड तो धारण कर लिया है किंतु मनसे सम्पूर्ण कामनाओंको स्थान दे रक्खा है, तथा जो ज्ञानसे सर्वथा शून्य है, वह सन्यासी महारौरव नामक घोर नरकोंमें पड़ता है। महर्षियोंने प्रतिष्ठाको शूकरीकी विष्ठाके समान बताया है। अतः सन्यासी इस प्रतिष्ठाको त्यागकर, कीटकी भाँति सर्वत्र विचरण करे। दिगम्बर सन्यासी बिना माँगे जो मिल जाय, वही भोजन करे और वैसे ही वस्त्रसे अपने शरीरको ढँके। वह दूसरोंकी इच्छासे ही वस्त्र पहने और दूसरोंकी इच्छासे ही स्नान करे। जो स्वप्नमें भी जाग्रत्- अवस्थाकी भाँति ही विशेषरूपसे सावधान हो वैसी ही चेष्टा करता है, वह श्रेष्ठ सन्यासी ब्रह्मवेत्ताओंमें वरिष्ठ (प्रधान) माना गया है। भिक्षा आदि न मिलनेपर विषाद न करे और मिल जानेपर हर्षसे फूल न उठे। भिक्षा उतनी ही ग्रहण करे, जितनेसे प्राण-रक्षा हो सके। शब्द आदि विषयोंकी आसक्तिसे सर्वथा दूर रहे। सम्मानकी प्राप्तिको वह सब प्रकारसे घृणाकी दृष्टिसे ही देखे। सम्मानका लाभ उठानेवाला सन्यासी मुक्त होनेपर भी बँध जाता है॥२७-३४॥

'जब चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर लें, ऐसे समयमें सन्यासी उत्तम वर्णवाले गृहस्थोंके घर भिक्षा लेने जाय। भिक्षाका उद्देश्य प्राण-यात्राका निर्वाहमात्र होना चाहिये। हाथको ही पात्र बनाकर विचरनेवाला करपात्री यति बार-बार भिक्षा न माँगे। एक बारमें जो मिल जाय, उसे खड़े-खड़े पा ले या चलते चलते भोजन करे। जबतक हाथका भोजन समाप्त न हो जाय, बीचमे आचमन (जलपान) न करे। सन्यासी समुद्रकी भाँति मर्यादाके भीतर ही रहते हैं। उनका आशय महान् होता है। वे महान् होकर भी सूर्यकी भाँति नियति (नियत मार्ग) का त्याग नहीं करते। जिस समय सन्यासी मुनि गौकी भाँति मुखसे आहार ग्रहण करने लगता है अर्थात् यदि कोई उसके मुखमे कुछ डाल दे, तभी वह भोजन करता है, उस समय सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति उसका समभाव हो जाता है और वह अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्तिका अधिकारी बन जाता है। जो घर निन्दनीय न हो, वहीँ भिक्षा लेनेके लिये जाय। निन्दनीय घरोंको छोड़ दे। जिस घरका दरवाजा खुला हो, उसीमे प्रवेश करे। जिसका द्वार बंद हो, उस घरमे न जाय। वह धूलसे आच्छादित निर्जन घरोंमें आश्रय ले अथवा वृक्षकी जड़को ही अपना निवासस्थान बनाये। समस्त प्रिय और अप्रियकी भावनाओंको त्याग दे ॥ ३५—४० ॥

'सन्यासी मुनि जहाँ सूर्यास्त हो जाय वहीं सो रहे। न तो अग्नि रक्खे और न कोई घर ही बनाये। दैवेच्छासे जो कुछ प्राप्त हो जाय उसीपर जीवन निर्वाह करे। मन

७५० * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ५

और इन्द्रियोंको सदा अपने वशमे रक्खे । जो सन्यासी घरसे निकलकर वनका आश्रय ले इन्द्रिय-संयमपूर्वक आनन्दका अनुष्ठान करता है और कालकी प्रतीक्षा करता हुआ विचरता रहता है, वह निश्चय ही ब्रह्मभावको प्राप्त करनेका अधिकारी होता है। जो मुनिसम्पूर्ण भूतोको अभय-दान करके विचरता है, उसे भी किसी प्राणीसे कहीं भय उत्पन्न नहीं होता। जो मन और अहङ्कारका त्याग करके द्वन्द्वजनित विकारोसे रहित हो जाता है, जिसके मनके संदेह नष्ट हो जाते हैं, जो न तो किसीपर क्रोध करता न किसीसे द्वेष रखता और न वाणीसे कभी असत्य ही बोलता है; जो पुण्य-स्थानोमे विचरता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा समय प्राप्त होनेपर भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता है वह ब्रह्मभावको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। संन्यासी वानप्रस्थ और गृहस्थोंसे कभी संसर्ग न रक्खे । वह इस बातको चाहता रहे कि जिससे उसकी जीवन- चर्या दूसरोपर प्रकट न हो। संन्यासीने हर्षवा आवेश नहीं होना चाहिये। जैसे कीट सदा चलते रहते हैं उसी प्रकार सन्यासी भी सूर्यके दिखाये हुए मार्गसे पृथिवीपर विचरतारहे अर्थात् रातको न चले ॥ ४१-४६ ॥ 'दम्भात्से युक्त, हिंसासे युक्त तथा लोक संग्रहसे युक्त जो-जो कर्म हैं उनको सन्यासी न तो स्वय करे और न दूसरोसे ही कराये। असत् शास्त्रोने कभी आसक्त न हो। कोई जीविकाका साधनभूत कर्म करके जीवन-निर्वाह न करे। अनावश्यक बात करना और तर्क करना छोड़ दे। वादी और प्रतिवादीमेंसे किसीका पक्ष ग्रहण न करे। शिष्योंका संग्रह न करे। बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे तथा अपने पक्षकी सिद्धिके लिये लौकिकवाक्यकी व्याख्याका उपयोग न करे। नये-नये आयोजन कभी न करे-सर्वथा निःसङ्कल्प होकर रहे। वह अपने आश्रमके चिह्नविशेष तथा अपने गूढ़ अभिप्रायको दूसरोपर प्रकट न होने दे। मुनि होकर भी उन्मत्त और बालककी भाँति चेष्टा करे। विद्वान् होते हुए भी मूर्खकी भाँति रहे। मनुष्योके समक्ष उन्हींकी दृष्टिके अनुसार अपनेको प्रदर्शित करे। दृष्ट न तो कुछ करे न कुछ बोले और न भले अथवा बुरेका चिन्तन ही करे। अपने आत्मामे ही रमण करता रहे। सन्यासी मुनि इसी वृत्तिसे रहकर जडकी भाँति सर्वत्र विचरतारहे। इन्द्रियोंको सयममें रखते हुए आसक्तिका सर्वथा त्याग करके वह अकेला ही इस पृथिवीपर भ्रमण करे। आत्मामे ही क्रीडा और आत्मामें ही रमण करने- वाला मनस्वी पुरुष सर्वत्र समान दृष्टि रक्खे । विद्वान् होकर भी बालककी भाँति क्रीडा करे। कार्यकुशल होकर भी मूर्खकी भाँति आचरण करे उन्मत्तकी भाँति बात करे और वेदोका विद्वान् होकर भी गोकी भाँति आचरण करे अर्थात् यह हो और यह न हो-इस बातके लिये कोई आग्रह न रक्खे । दुष्ट पुरुषोंके आक्षेप करने, अपमान करने, वञ्चना एवं दोषारोपण करनेपर भी सम रहे। उनके मारने, बाँध रखने या वृत्तिमे बाधा डालकर कष्ट पहुँचानेपर भी वह विचलित न हो। मूर्ख लोग शरीरपर या आसनपर मल- मूत्रका त्यागकर दें अथवा और भी अनेक प्रकारके कष्ट देकर तंग करें, तो भी कल्याणकामी पुरुष चुपचाप सहन करे। संकटमें पड़नेपर भी वह अपने आत्माके द्वारा अपना ही उद्धार करे। लोगोंसे मिला हुआ सम्मान योग-सम्पत्तिकी बड़ी भारी हानि करता है। साधारण लोगोंद्वारा अपमानित योगी योगसिद्धिको अवश्य प्राप्त कर लेता है। योगी पुरुष सत्पुरुषोंके धर्मको कलङ्कित न करते हुए अवश्य ही ऐसा आचरण करे, जिससे साधारण लोग उसका अपमान ही करें और उसके सम्पर्कमें न आवें। सन्यासी योगयुक्त होकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा जरायुज और अण्डज आदि किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करे तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे। काम, क्रोध, घमंड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उनका परित्याग करके सन्यासी निर्भय हो जाता है ॥ ४७-५९॥ 'भिक्षाका अन्न भोजन करना मौन रहना, तपस्या करना, विशेषतः ध्यानमे लगे रहना, उत्तम ज्ञान प्राप्त करना और वैराग्यवान् होना-यह भिक्षुका धर्म माना गया है। गेरुआ वस्त्र पहनकर सन्यासी सदा ध्यानयोगमे तत्पर रहे। गाँवके किनारे, वृक्षके नीचे अथवा किसी देवालयमे निवास करे। वह नित्य भिक्षाके अन्नसे ही जीवन निर्वाह करे। किसी एकके अन्नका भोजन तो वह कभी न करे। बुद्धिमान् पुरुष प्रतिदिन अपने आश्रमोचित आचारका पालन करे और तबतक करता रहे जबतक अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध न हो जाय। अन्त करण शुद्ध हो जानेपर वह संन्यास लेकर जहाँ कहीं भी स्वेच्छानुसार विचरण करे। सन्यासी बाहर और भीतर-सर्वत्र नारायणका दर्शन करते हुए वायुकी भाँति पाप-सम्पर्कसे रहित होकर मौनभावसे सब ओर विचरता रहे। वह सुख-दुःखमे समान भावसे रहे। मनमें क्षमा-भाव रक्खे । हाथपर जो कुछ आ जाय, उसीको भोजन करे। कहीं भी बैर न रखते हुए ब्राह्मण गौ, घोडे और मृग आदि सभी प्राणियोंमे समदृष्टि

उपदेश ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५१

रक्खे । मन-ही-मन सबके ईश्वर सर्वव्यापी परमात्माका चिन्तन शरीर और क्रियाद्वारा समस्त संसारको त्यागकर, प्रपञ्चकी ओरसे करते हुए, 'मैं ही परमानन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ, ऐसी भावना मुँह मोड़कर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी भाँति सदा रक्खे । जो इस प्रकार जानकर, मनोमय दण्ड धारण करके, अपने स्वरूपके चिन्तनमें ही संलग्न रहता है, वह मुक्त हो आशासे निवृत्त हो जाता है तथा दिगम्बर होकर सदा मन, वाणी, जाता है। यह उपनिषद् है' ॥ ६०--६६ ॥ ॥ पञ्चम उपदेश समाप्त ॥ ५ ॥ षष्ठ उपदेश तुरीयातीत पद और उसकी प्राप्तिके उपाय तथा यतिकी जीवनचर्या तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा--'भगवन् ! पुष्ट करता रहे। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति--इन तीन अवस्थाओं- भ्रमर-कीट-न्यायसे अपने स्वरूपका अनुसन्धान करनेपर मोक्ष को पार करके तुरीयावस्थामें पहुँचकर संन्यासी तुरीयातीत प्राप्त होता है--यह आपने बताया, किंतु उस स्वरूपानु- परमात्मपदमें प्रवेश करे ॥ २ ॥ सन्धानका अभ्यास कैसे हो ?' तब ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा-- 'दिन जाग्रत्-अवस्था है, रात्रि स्वप्न है, अर्द्धरात्रि सुषुप्ति- 'सत्यवादी होकर ज्ञान और वैराग्यद्वारा इस शरीरकी स्थानीय है। ये तीनों अवस्थाएँ तुरीयमें हैं और तुरीयकी आसक्तिको त्यागकर, शेष बचे हुए एक विशिष्ट शरीरमें स्थिति तुरीयातीतमें है । इस प्रकार एककी अवस्थामें स्थित होकर रहे ॥१॥ चार अवस्थाएँ हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार--इन चार "ज्ञान ही वह शरीर है। वैराग्यको ही उसका प्राण समझो । अन्तःकरणोंमेसे प्रत्येकके अधीन जो नेत्र आदि चौदह करण शम और दम--ये दो नेत्र हैं। विशुद्ध मन मुख है, बुद्धि हैं, उनके व्यापार बतलाये जाते हैं। नेत्रोंका काम है रूपको कला है, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच ग्रहण करना, श्रोत्रोंका कार्य है शब्दकी उपलब्धि, जिह्वा- विषय, चार अन्तःकरण तथा अव्यक्त प्रकृति--ये पचीस तत्त्व का कार्य है रसास्वादन, गन्धका अनुभव घ्राणेन्द्रियका काम ही उस शरीरके अवयव हैं। समष्टिगत जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, है, बोलनेकी क्रिया वाक्-इन्द्रियका व्यापार है, हाथोंका काम है तुरीय और तुरीयातीत--ये पाँच अवस्थाएँ ही उस विशिष्ट किसी वस्तुको ग्रहण करना, पैरोंका कार्य है चलना, मल- शरीरके पाँच महाभूत हैं। कर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य--ये त्याग गुदाका और विषयजनित आनन्दका अनुभव उपस्थका शरीरकी शाखा अर्थात् भुजाएँ हैं। अथवा जाग्रत्, स्वप्न, कार्य है। त्वचाका कार्य स्पर्शका अनुभव करना है। इनके सुषुप्ति और तुरीय--ये चार अवस्थाएँ ही चार भुजाएँ हैं। अधीन विषय-ग्रहणकी बुद्धि है। बुद्धिसे जानता है। चित्तसे पहले बताये हुए चौदह करण पङ्कमें स्थित कमजोर कर्मोंके चेतना प्राप्त करता है। अहङ्कारसे अहंताका अनुभव करता है। इन समान हैं। ऐसी स्थितिमें भी जैसे कीचड़में पड़ी हुई नावको सब भावोंकी विशेषरूपसे सृष्टि करके इनके समुदायरूपी शरीरमें भी अच्छा नाविक ढकेलकर उसे ठीक मार्गपर ला ही देता है, आत्माभिमान करनेके कारण तुरीय-चेतन ही जीव 'हो जाता उसी प्रकार संसार-सिन्धुके पङ्कमें फँसी हुई इस जीवनरूपी है। जैसे घरमें अभिमान करके मनुष्य गृहस्थ बनता है, उसी नौकाको उत्तम बुद्धिके द्वारा वशमें रखकर पार लगाये-ठीक प्रकार शरीरमें अभिमान करके तुरीय-चेतन जीव होकर उसी तरह, जैसे हाथीवान् हाथीको अपने वशमें रखकर उसे विचरता है। शरीरके भीतर जो अष्टदल कमलसे युक्त हृदय ठीक रास्तेसे ले जाता है। ज्ञानमय विशिष्ट शरीरमें स्थित हुआ है, उसमें रहनेवाला जीव जब उक्त कमलके पूर्ववर्ती दलमें पुरुष 'मेरे अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब कल्पित होनेके विचरता है, तब उसमे पुण्यानुष्ठानकी प्रवृत्ति होती है। आग्नेय कारण नश्वर है'--यों समझकर सदा 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं कोणवाले दलमें जानेपर उसे निद्रा और आलस्य सताते हैं। ब्रह्म ही हूँ) इस प्रकार उच्चारण करे। अपने आत्माके अतिरिक्त दक्षिण दिशाके दलमें स्थित होनेपर उसमें क्रूरताका भाव दूसरी कोई भी वस्तु ज्ञातव्य नहीं है, ऐसा निश्चय करके आता है। नैर्ऋत्यकोणवाले दलका आश्रय लेनेपर उसमें पाप- जीवन्मुक्त होकर रहे। इस प्रकार रहनेवाला पुरुष कृतकृत्य बुद्धि जाग्रत् होती है। पश्चिम दलमें स्थिति होनेपर उसका हो जाता है। व्यवहार-कालमें भी यों न कहे कि 'मैं ब्रह्म क्रीडामें अनुराग होता है। वायव्यकोणके दलमे जानेपर उसकी नहीं हूँ।' अपितु निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इस धारणाको ही बुद्धि गमनमें लगती है-वह इधर-उधर जानेका सङ्कल्प

७५२ ⸪ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ⸫ [ उपदेश ६ करता है। उत्तर दिशावाले दलमे प्रवेश करनेपर उसे शान्ति का अनुभव होता है। ईशान दलमें जानेपर ज्ञान होता है। उस कमलकी कर्णिकामे स्थित होनेपर उसके भीतर वैराग्य भाव जाग्रत् होता है तथा केशरोंमें स्थित होनेपर उसका मन आत्मचिन्तनमे लगता है। इस प्रकार चैतन्य ही जिसमे मुखकी भाँति प्रधान है, उस आत्मस्वरूपको जानकर विद्वान् पुरुष तुरीयातीत ब्रह्मरूपमे स्थित हो जाता है ॥ ३ ॥ 'जीवकी चार अवस्थाओंमें प्रथम अवस्था जाग्रत् है, दूसरी अवस्था स्वप्न है, तीसरी अवस्था सुषुप्ति है, चौथी अवस्था तुरीय है तथा इन चारोंसे रहित तुरीयातीत है। एक ही आत्मा विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तटस्थ भेदसे चार प्रकार- का प्रतीत होता है। अतः 'एक ही परमात्मदेव सबके साक्षी एव सत्त्वादि गुणोंसे रहित हैं और वह ब्रह्म मैं स्वयं हूँ' यो कहे। तुरीयातीत पुरुषको जाग्रत् आदि चारों अवस्थाओंके अनुभवसे परे मानना चाहिये। नही तो जैसे जाग्रत्-अवस्थामे जाग्रत् आदि चार अवस्थाएँ होती है, स्वप्नमें स्वप्नादि चार अवस्थाएँ होती हैं, सुषुप्तिमे सुषुप्ति आदि चार अवस्थाएँ होती है तथा तुरीयमें तुरीयादि चार अवस्थाएँ होती ह, उसी प्रकार तुरीयातीतमें भी इन अवस्थाओंके होनेकी सम्भावना हो सकती है। किंतु वास्तवमे तुरीयातीत-तत्त्व निर्गुण है, अतः उसमे इस प्रकारके अवस्था भेद सम्भव नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म एव कारणरूप जो विश्व, तैजस एव प्राज्ञ ईश्वर है, उनके साथ सब अवस्थाओंमें एक ही साक्षी स्थित होता है। अथवा तटस्थ ईश्वर ही द्रष्टा हैं—यदि यो कहेंतो ठीक नहीं, क्योकि तटस्थ पुरुष बीजोपाधिक (मायोपाधिक)ईश्वररूपसे देखे जाते हैं। अतः उनका भी कोई द्रष्टा होनेके कारण तटस्थको द्रष्टा नहीं माना जा सकता। इसलिये वह द्रष्टा नहीं है, ऐसा ही निश्चय करना चाहिये। फिर तो जीवको ही द्रष्टा मान लिया जा सकता है। नहीं, जीव द्रष्टा नहीं हो सकता, क्योकि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व और अहङ्कार आदिसे सयुक्त है। जीवसे इतर जो तुरीयातीत परमात्मा हैं, वे उक्त दोनोंके सम्पर्कसे रहित हैं। यदि कहें जीव भी तो स्वरूपत शुद्ध चैतन्य ही है, अत वह भी कर्तृत्व आदिके ससर्गेसे रहित है, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि उसमें जीवत्वका अभिमान होनेसे इस शरीररूपी क्षेत्र- में भी उसका अभिमान है और शरीराभिमानके कारण ही उसमें जीवत्व है। परमात्मासे जीवत्वका व्यवधान वैसा ही है, जैसे महाकाशसे घटाकाशका। व्यवधानके कारण ही यह इस- स्वरूप जीव उच्छ्वास और निःश्वासके बहाने सदा 'सोऽहम्' इस मन्त्रका जप करते हुए अपन स्वरूपका अनुसधान करता है। यो समझकर शरीरमे आत्माभिमान त्याग दे। जो शरीराभिमानी नहीं होता, वही ब्रह्म है, यह कहा जाता है। सन्यासी आसक्तिका त्याग करके क्रोधपर विजय प्राप्त करे, स्वल्पाहारी एव जितेन्द्रिय हो तथा बुद्धिके द्वारा समस्त इन्द्रिय- द्वारोंको बद करके मनको परमात्मचिन्तनमें लगाये। योगी सदा साधनमे सलग्न रहकर कहीं निर्जन स्थानोमे, गुफाओं और वनोंमें बैठ जाय और भलीभाँति ध्यान आरम्भ करे। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला योगवेत्ता पुरुष अतिथि सत्कार, श्राद्ध और यज्ञोंमे तथा देवयात्रा-सम्बन्धी उत्सवोंमे जहाँ अधिक जनसमुदाय एकत्र होता हो, कदापि न जाय। योगी पुरुष योगमे प्रवृत्त होकर ऐसा बर्ताव करे, जिससे दूसरे लोग उसका अनादर और तिरस्कार करें। परतु यह सत्पुरुषोंके मार्गको कलङ्कित न करे। वाग्दण्ड, कर्मदण्ड और मनो- दण्ड—ये तीन दण्ड सदा जिसके नियन्त्रणमें रहते हों, वह महासन्यासी ही यथार्थ त्रिदण्डी है। जो यति धुआँ निकलना बद हो जाने और अग्नि बुझ जानेपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे मधुकरी लाकर उसका आहार करता है, वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जो बिना अनुराग ही सन्यास-धर्ममें स्थित रहकर दण्ड धारणपूर्वक भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता है, किंतु जिसे ससारसे वैराग्य नहीं होता, वह सन्यासी नीच श्रेणीका माना गया है। जिस घरमे उसे विशेषरूपसे भिक्षा मिलती है, उसमें वासनावश पुनः भिक्षाके लिये जो नहीं जाता, वही वास्तविक यति माना गया है—इससे विपरीत आचरण करनेवाला नहीं। जो शरीर और इन्द्रिय आदिसे रहित, सर्वसाक्षी, पारमार्थिक विज्ञानस्वरूप, सुखमय, स्वयम्प्रकाश एव परमतत्त्वरूप परमात्माको अपने आत्मरूपसे जानता है, वही वर्ण और आश्रमसे अतीत यथार्थ सन्यासी है। देहमें वर्ण और आश्रम आदिकी कल्पना मायासे ही हुई है। 'मै बोधस्वरूप आत्मा हूँ, मुझसे उन वर्ण और आश्रम आदिका किसी कालमें सम्बन्ध नहीं है'—इस प्रकार जो उपनिषदोंके अनुशीलनद्वारा भली- भाँति समझ लेता है, वही अतिवर्णाश्रमी (यथार्थ सन्यासी) है। अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेनेके कारण जिसके वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचार छूट गये हैं, वह समस्त वर्णों और आश्रमोंसे ऊपर उठकर अपने आत्मामें ही स्थित है। जो पुरुष अपने आश्रमो और वर्णोंसे ऊपर उठकर आत्मामें ही स्थित है, उसीको सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान रखनेवाले ज्ञानी पुरुषोंने अतिवर्णाश्रमी (यथार्थ सन्यासी) कहा है। इसलिये नारद! सभी वर्ण और आश्रम अन्यगत (शरीरगत) होनेपर भी

उपदेश ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५३

भ्रान्तिवश आत्मामें आरोपित कर लिये जाते हैं, परंतु आत्मवेत्ता पुरुष ऐसा नहीं करते । नारद ! ब्रह्मज्ञानी-पुरुषों- के लिये न कोई विधि है न निषेध । उनके लिये अमुक वस्तु त्याज्य है और अमुक वस्तु त्याज्य नहीं है, इस तरहकी कल्पना नहीं होती । और भी नियम उनपर लागू नहीं होते ॥ ४-१९ ॥

'जिज्ञासुको चाहिये कि वह सम्पूर्ण भूतोंसे तथा ब्रह्मा- तकके पदसे भी विरक्त हो, सबमें, पुत्र और धन आदिमे भी प्रेम न रखते हुए मोक्षके साधनोंमे श्रद्धा करे और उपनिषदों- का ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हाथमे कुछ भेंट लेकर ब्रह्मवेत्ता गुरुकी सेवामें जाय । वहाँ दीर्घकालतक अपनी सेवाओंसे गुरुको संतुष्ट रखते हुए चित्तको भलीभाँति एकाग्र करके ध्यानपूर्वक उपनिषद्-वाक्योंके अर्थका श्रवण करे। ममता और अहङ्कार त्याग दे । सब प्रकारकी आसक्तियोंसे पृथक् रहे तथा शम दम आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर अपनेमें ही आत्माका दर्शन करे । संसारमें सदा जन्म, मृत्यु और जरा आदि दोषोंका दर्शन करनेसे ही उसकी ओरसे विरक्ति होती है। और जो संसारसे विरक्त हो गया है, उसीके द्वारा यथार्थ- रूपसे सन्न्यासग्रहण सम्भव होता है । इसमे तनिक भी सन्देहके लिये स्थान नहीं है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला परमहंस उपनिषदोंके श्रवण आदिके द्वारा साक्षात् मोक्षके एकमात्र साधन ब्रह्मविज्ञानका अभ्यास करे। परमहंस नामक यति ब्रह्मविज्ञानकी प्राप्तिके लिये शम-दम आदि सम्पूर्ण साधनोंसे सम्पन्न होवे । वेदान्तवेत्ता विद्वान् योगी सदा उपनिषदोंके अभ्यासमे तत्पर रहे। शम-दम आदिसे सम्पन्न हो मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें कर ले । भयको त्याग दे । कहीं भी ममता न रक्खे । सदा निर्द्वन्द्व रहे । परिग्रहको सर्वथा त्याग दे । सिरके बालोको मुँड़ा ले। पुराने वस्त्रका कौपीन पहने अथवा दिगम्बर रहे। मनमें ममता और अहङ्कारको कभी स्थान न दे । जो मित्र और शत्रु आदिमें समान भाव रखता है तथा सम्पूर्ण जीवोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त है, वह एकमात्र ज्ञानी पुरुष ही संसार-समुद्रसे पार होता है, दूसरा —अज्ञानी नहीं ॥ २०-२९ ॥

'जिज्ञासु पुरुष गुरुके हितमें तत्पर रहकर वहाँ एक वर्ष- तक निवास करे । नियमोके पालनमें कभी प्रमाद न करे तथा ब्रह्मचर्य और अहिंसा आदि यमोके पालनमे भी सतत सावधान रहे । इस प्रकार साधन करते हुए (गुरुकृपासे ) वर्षके अन्तमे सर्वोत्तम ज्ञानयोगकी उपलब्धि करके धर्मानुकूल आचरण करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे । ऊपर बताये अनुसार वर्षके अन्तमे सर्वोत्तम ज्ञानयोगकी प्राप्तिके अनन्तर ब्रह्मचर्य आदि तीनो आश्रमोंका त्याग करके अन्तिम आश्रम सन्न्यासको ग्रहण करे तथा गुरुकी आज्ञा लेकर इस पृथ्वीपर विचरण करे । वह आसक्तिको त्याग दे । क्रोधको काबूमें रक्खे । आहार स्वल्पमात्र करे और सदा जितेन्द्रिय बना रहे ॥ ३०-३३ ॥

'कर्म न करनेवाला गृहस्थ और कर्मपरायण भिक्षु—ये दोनों अपने आश्रमके विपरीत व्यवहार करनेके कारण कभी शोभा नही पाते । मनुष्य मदिराको तो पीनेपर मतवाला होता है, परंतु तरुणी स्त्रीको देखकर ही उन्मत्त हो उठता है । इसलिये दर्शनमात्रसे विषका सा प्रभाव डालनेवाली नारीको सन्यासी दूरसे ही त्याग दे । स्त्रियोंके साथ बातचीत करना, उनके पास सन्देश भेजना, नाचना, गाना, हास-परिहास करना तथा परायी निन्दा करना—सन्यासी इन सबका त्याग कर दे । नारद ! यतिके लिये (नैमित्तिक) स्नान, जप, पूजा, होम तथा अग्निहोत्र आदि कार्य कर्तव्य नहीं हैं। उसके लिये देव-पूजन, श्राद्ध-तर्पण, तीर्थयात्रा, व्रत, धर्म-अधर्म तथा लोकाचारसम्बन्धी कार्य भी नही हैं। योगयुक्त सन्यासी सम्पूर्ण कर्मोंको त्याग दे, समस्त लोकाचारोंसे भी दूर रहे । विद्वान् यति अपनी बुद्धिको परमार्थमें लगाकर कृमि, कीट, पतङ्ग तथा वनस्पति आदि जीवोंकी कभी हिंसा न करे । वह सदा अन्तर्मुख रहे, बाहर और भीतरसे भी स्वच्छता रक्खे । अपने अन्तःकरणको पूर्णतः शान्त बनाये रहे तथा बुद्धिको आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण किये रहे। नारद ! तुम भीतरसे सम्पूर्ण आसक्तियोंका परित्याग करके ससारमें विचरते रहो । सन्यासीको अकेले किसी ऐसे प्रदेशमें नहीं घूमना चाहिये, जहाँ अराजकता फैली हुई हो । सन्यासी स्तुति और नमस्कारसे दूर रहे । श्राद्ध और तर्पणसे भी अलग रहे। किसी शून्य भवनमें अथवा पर्वतकी गुफाओंमे आश्रय ले । सन्यासीको सदा स्वच्छन्दरूपसे विचरना चाहिये । यह उपनिषद् है' ॥ ३४-४२ ॥

॥ षष्ठ उपदेश समाप्त ॥ ६ ॥ --•G•-

उ० अ० ९५—

७५४ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ७ सप्तम उपदेश संन्यासीके सामान्य नियम और कुटीचक आदिके विशेष नियम तदनन्तर नारदजीके यह पूछनेपर कि 'यतिका नियम कैसा होना चाहिये ?' ब्रह्माजीने इस प्रश्नको सामने रखकर उत्तर देना आरम्भ किया। उन्होंने कहा, 'संन्यासी विरक्त होकर केवल वर्षाके चार महीनोंमें ही किसी निश्चित स्थानपर विश्राम करे। शेष आठ महीनोंमे एकाकी विचरण करे। कहां एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे; क्योकि वैसा करनेसे पतनका भय है। भ्रमरोंकी भाँति एक स्थानपर न ठहरे । अपने अन्यत्र जानेका यदि कोई विरोध करे तो सन्यासी उस विरोधको स्वीकार न करे। अपने हाथों तैरकर नदी पार न करे। पेड़पर भी न चढे । देव-उत्सवके निमित्त होनेवाले मेलेको न देखे । सदा एक घरका भोजन और आत्माके अतिरिक्त बाह्य देवताओंका पूजन न करे। आत्माके अतिरिक्त सबका त्याग करके मधुकरी वृत्तिसे भिक्षा लाकर ग्रहण करे। शरीरको कृश बनाये रखे। मेदकी वृद्धि न होने दे। घीको रुधिरके समान समझकर त्याग दे। एक घरके अन्नको मासकी भाँति समझकर छोड़ दे। इत्र या चन्दन आदिके लेपको अशुद्ध मल मूत्रादिके लेपकी भाँति मानकर उसका त्याग करे। क्षार (सोडा, साबुन आदि) को चाण्डालके समान अस्पृश्य समझे। कौपीन आदिके अतिरिक्त अन्य वस्त्रोंको जूठे बर्तनके समान समझकर उन्हें त्याग दे। अभ्यङ्ग (तेल आदि मलने) को स्त्रीके आलिङ्गनकी भाँति मानकर उससे दूर रहे। मित्रोंके आनन्ददायक सङ्गको मूत्रके समान त्याज्य समझे। किसी वस्तुकी प्राप्तिके लिये मनमें होनेवाली स्पृहाको अपने लिये गोमासके समान वर्जनीय माने। परिचित स्थानको चाण्डालका बगीचा समझे। स्त्रीको सर्पिणीके समान भयङ्कर समझे । सुवर्णको कालकूट, सभा स्थलको श्मशानभूमि, राजधानीको कुम्भीपाक नरक तथा एक स्थानके अन्नको मुर्देके लिये अर्पित पिण्डकी भाँति समझकर त्याग दे । देहको आत्मासे पृथक् देखना और प्रवृत्तिमे फँसना छोड़ दे। स्वदेशको त्याग दे और परिचित स्थानोंसे भी दूर रहे। अपनी आनन्दरूपताका निरन्तर चिन्तन करते हुए ऐसी प्रसन्नताका अनुभव करे मानो कोई भूली हुई बहुमूल्य वस्तु पुनः प्राप्त हो गयी हो। जहाँ जानेपर अपने शरीरमें ही आत्माभिमान जाग्रत् हो जाय, जिसमें अपने शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले लोग रहते हों, उस प्रदेशको सदाके लिये भूल जाय। अपने शरीरको भी मुर्देकी भाँति त्याज्य मानकर उसमें आसक्त न हो। जैसे जेलखानेसे छूटा हुआ चोर लज्जावश अपनी जन्मभूमिको न जाकर कहीं दूर जा बसता है, उसी प्रकार सन्यासी जहाँ उसके पुत्र और माता पितादि गुरुजन रहते हों, उस स्थानको छोड़कर वहाँसे दूर ही रहे। बिना यत्न किये ही जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसीका आहार करे । ब्रह्मस्वरूप प्रणवके चिन्तनमें तत्पर रहकर अन्य समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाय । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरता आदिको जलाकर त्रिगुणातीत हो जाय। क्षुधा, पिपासा आदि छः प्रकार की ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो । जन्म, वृद्धि आदि छः प्रकारके भावविकारोंसे भी अपना सम्बन्ध न माने। सत्य बोले, शरीर और मनसे पवित्र रहे तथा किसीसे भी द्रोह न करे। गाँवमे एक रात, नगरमें पाँच रात, किसी पुण्यक्षेत्रमे पाँच रात तथा तीर्थमें भी पाँच रातसे अधिक न रहे। कहीं भी अपने लिये घर न बनाये। बुद्धिको परमात्मचिन्तनमें स्थिर रक्खे । झूठ कभी न बोले । पर्वतकी गुफाओंमें निवास करे । भ्रमणकालमें सदा अकेला ही रहे। (चौमासेके समय) दो व्यक्तियोंके साथ भी रह सकता है। तीनके साथ रहनेपर तो गाँव-सा ही बन जाता है; और चारके साथ वहाँ नगर-सा बस जाता है। अतः सन्यासी अकेला ही रहे। अपने चौदह करणों (इन्द्रियो) को पृथक् पृथक् विषयोंके चिन्तनका अवकाश न दे । अखण्ड बोधसे वैराग्य-सम्पत्तिका अनुभव करके 'मुझसे भिन्न दूसरा कोई नही है, मेरे सिवा दूसरेका अस्तित्व ही नहीं है'-ऐसा मन-ही-मन विचार करके सब ओर अपने स्वरूपका ही साक्षात्कार करता हुआ जीवन्मुक्त-अवस्थाको प्राप्त करे। जबतक प्रारब्धके प्रतिभासका नाश न हो जाय, प्रणव-चिन्तनपूर्वक ओत, अनुज्ञातृ आदि चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होनेवाले तुरीय तुरीयरूपमें स्थित अपने निर्विकल्प आत्माका सम्यक् बोध प्राप्त करे । स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जबतक यह शरीर गिर न जाय, तबतक स्वरूपका चिन्तन करते हुए ही कालयापन करता रहे ॥ १ ॥ 'कुटीचकके लिये तीनों काल स्नानका विधान है। बहूदक साय-प्रातः दो बार स्नान करे । इसके लिये दिनमें एक बार ही स्नानका नियम है । परमहंस मानसिक स्नान करे । तुरीयातीतके लिये भस्मस्नान बताया गया है। अर्थात् वह सारे शरीरमें केवल विभूति लगा ले । तथा अवधूतके लिये वायव्य-

उपदेश ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५५ [बायाँ स्तम्भ] ज्ञान कहा गया है। अर्थात् शरीरमें वायुके स्पर्शमात्रसे ही वह शुद्ध हो जाता है, उसे जलसे स्नान करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥ 'कुटीचकके लिये ललाटमें ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगानेका विधान है। बहूदकके लिये त्रिपुण्ड्रका तथा हंसके लिये ऊर्ध्वपुण्ड्र, त्रिपुण्ड्र दोनोंकी विधि है। परमहंस केवल विभूति धारण करे। तुरीयातीतके लिये तिलकपुण्ड्र कहा गया है। अवधूतके लिये किसी प्रकारका तिलक आवश्यक नहीं है अथवा तुरीयातीत एवं अवधूत दोनोंके लिये ही तिलक अनावश्यक है ॥ ३ ॥ 'कुटीचक दो महीनेपर बाल बनवाये; बहूदक चार महीने- पर । हंस और परमहंसके लिये बाल बनवानेका विधान नहीं है। यदि है भी तो छः महीनेपर । तुरीयातीत और अवधूतके लिये तो क्षौरका नियम है ही नहीं ॥ ४ ॥ 'कुटीचकके लिये एक स्थानका अन्न खानेकी विधि है। बहूदकको मधुकरीका अन्न खाना चाहिये । हंस और परमहंसके लिये हाथ ही पात्र है, उसपर जो कुछ आ जाय, उतना ही खाकर सन्तोष करे । तुरीयातीतके लिये गो-मुखवृत्ति है अर्थात् उसके मुखमें दूसरा कोई जो कुछ फल फूल देना चाहे, उसे वह गायकी भाँति मुँह फैलाकर ले ले। अवधूतके लिये अजगर-वृत्ति है अर्थात् दैवेच्छा या परेच्छासे कभी जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसीपर वह संतोष करे ॥ ५ ॥ 'कुटीचकके लिये दो वस्त्र रखनेका विधान है। बहूदकके लिये एक चादर और हंसके लिये वस्त्रका एक टुकड़ा रखनेका नियम है । परमहंस दिगम्बर रहे अथवा एक कौपीनमात्र धारण करे । तुरीयातीत और अवधूतको तो दिगम्बर ही रहना चाहिये । हंस और परमहंसके लिये ही [दायाँ स्तम्भ] मृगचर्म रखनेका विधान है, अन्य संन्यासियोंके लिये नहीं ॥ ६ ॥ 'कुटीचक और बहूदकके लिये प्रत्यक्ष देवपूजनका विधान है। हंस और परमहंस केवल मानसिक पूजन कर सकते हैं । तुरीयातीत और अवधूत केवल 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) यही भावना करें ॥ ७ ॥ 'कुटीचक और बहूदकका मन्त्र-जपमें अधिकार है। हंस और परमहंस केवल ध्यानके अधिकारी हैं। तुरीयातीत और अवधूतका स्वरूपानुसंधानके सिवा और किसी कार्यमें अधिकार नहीं है। तुरीयातीत, अवधूत और परमहंस—इन तीनको ही 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके उपदेशका अधिकार प्राप्त है। कुटीचक, बहूदक और हंस—ये तीनों दूसरोंके लिये उपदेश देनेके अधिकारी नहीं हैं ॥ ८ ॥ 'कुटीचक और बहूदकके लिये मातृप्रणव अर्थात् बाह्य- प्रणवके चिन्तनका विधान है। हंस और परमहंसको अन्तः- प्रणवका तथा तुरीयातीत और अवधूतको ब्रह्मरूप प्रणवका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९ ॥ 'कुटीचक और बहूदकका प्रमुख साधन है—श्रवण। हंस और परमहंसका प्रमुख साधन है मनन तथा तुरीयातीत और अवधूतका प्रमुख साधन है निदिध्यासन। आत्मानुसंधानकी इन सभीके लिये विधि है ॥ १० ॥ 'इस प्रकार मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला सन्यासी सदा संसार-सागरसे पार उतारनेवाले तारकमन्त्र (प्रणव) का चिन्तन करते हुए जीवन्मुक्त होकर रहे । वह अधिकार- विशेषके अनुसार कैवल्य प्राप्तिके उपायका अन्वेषण करे । यह उपनिषद् है' ॥ ११ ॥ ॥ सप्तम उपदेश समाप्त ॥ ७ ॥ उपदेश प्रणवके स्वरूपका विवेचन [निचला बायाँ स्तम्भ] तत्पश्चात् नारदजीने भगवान् ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! जन्म-मृत्युसे तारनेवाला मन्त्र कौन-सा है ? मैं आपकी शरणमें हूँ, बतानेकी कृपा करें।' ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया—'वत्स ! ॐ यही तारक-मन्त्र है। [निचला दायाँ स्तम्भ] यह ब्रह्मस्वरूप है। व्यष्टि और समष्टि दोनों प्रकारसे इसीका चिन्तन करना चाहिये।' नारदजीने पूछा—'भगवन् ! व्यष्टि और समष्टि क्या है ?' ब्रह्माजीने कहा—'व्यष्टि और समष्टि ब्रह्म प्रणवके अङ्ग हैं। एक ही ब्रह्म-प्रणवके तीन भेद माने

७५६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ८

जाते हैं—एक संहार-प्रणव, दूसरा सृष्टि प्रणव और तीसरा उभयात्मक प्रणव । उभयात्मक प्रणवके आन्तर और बाह्य —दो स्वरूप हैं। इसीलिये उसे उभयात्मक कहते हैं। अन्तः- प्रणवका स्वरूप आगे बतलायेंगे। उपर्युक्त ब्रह्म-प्रणवका एक भेद व्यावहारिक प्रणव है। व्यष्टि प्रणवका ही दूसरा नाम बाह्य-प्रणव है। इन सबके अतिरिक्त एक आर्षप्रणव भी है।

अन्तर-बाह्य—उभयस्वरूप जो ब्रह्म-प्रणव है, वही विराट्प्रणवके नामसे कहा गया है। सहार-प्रणव ब्रह्मादिसे अधिष्ठित होनेके कारण ही ब्रह्म-प्रणव माना गया है। स्थूल आदि भेदसे युक्त अकारादि चार मात्राएँ जिनका स्वरूप हैं, उस मात्रा- चतुष्टयात्मक प्रणवका नाम अर्धमात्रा-प्रणव है ॥ १ ॥ अथ अन्तःप्रणवका स्वरूप बतलाते है। ॐ यह ब्रह्म

१ अद्धमात्रा, अकार और उकार जिसके अङ्ग हैं, ऐसा मकारमात्रा-प्रधान 'सहार-प्रणव' होता है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इसके अधिष्ठाता हैं। अतः यह मात्रात्रयप्रधान माना गया है, जैसा कि कहा गया है— त्रिमात्राकल्पनोपेतसहारप्रणवासना । ब्रह्मविष्ण्वीश्वरा विश्वसर्गस्थित्यन्तहेतव ॥ सवेयुर्यत एवाय सहारप्रणवो भवेत् ॥

२ उकार, मकार और अर्धमात्राको अङ्ग बनाकर अकारमात्रकी प्रधानतासे बोला जानेवाला प्रणव 'सृष्टि-प्रणव' कहलाता है। इसके अधिष्ठाता देवता ब्रह्माजी हैं, अतः यह एकमात्राम्रधान है। जैसा कि वचन है— एकमात्रात्मक तारमुपादाय चतुर्मुखः । यत. ससर्ज सकल सृष्टितारो ह्यतो भवेत् ॥

३ उपर्युक्त सहार और सृष्टि-प्रणवके अतिरिक्त एक अन्तर्बाह्योभयस्वरूप प्रणव और होनेसे 'ब्रह्म-प्रणव' तीन प्रकारका होता है। सहार-प्रणवकी तीन मात्राएँ, सृष्टि-प्रणवकी एक मात्रा, अन्त.प्रणवकी आठ मात्राएँ तथा बाह्यप्रणवकी चार मात्राएँ—ये सब मिलकर सोलह होती हैं। इन सोलह मात्राओसे विशिष्ट प्रणवको 'ब्रह्म-प्रणव' कहा जाता है। यद्यपि यह एक ही है, तथापि दृष्टिभेदसे अनेक भेदवाला हो जाता है।

४ जिसके गर्भमें (वर्णमालाके) पचास अक्षर छिपे हुए हैं, उस 'अकार' की प्रधानताको लेकर व्यवहृत होनेवाला प्रणव व्यावहारिक प्रणव कहलाता है। 'अकारो वै सर्वा वाक सैषा स्पर्शोष्मभि व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति' (अकार ही समस्त वाणी है। यह अकार-मात्रा ही स्पर्श और ऊष्मा आदि वर्णोके रूपमें व्यक्त होकर बहुत-सी होती है, अनेक रूपोंमें दिखायी देती है)—इस श्रुतिके अनुसार अकार ही समस्त वर्णोका मूल है। पचास वर्णोसे विभूषित एकमात्रप्रधान यह प्रणव है। वैखरी वाणीका, जिसके द्वारा मानवमात्र व्यवहार करते हैं, हेतु होनेसे इस प्रणवको 'व्यावहारिक' कहा गया है। दुर्गा आदि तथा इच्छा आदि तीन शक्तियोसे यह युक्त है। वसुगण, रुद्रगण और आदित्यगण इसके अङ्ग हैं। नौ ब्रह्मा एव पाँच ब्रह्मा इसके अधिष्ठाता देवता हैं। जैसा कि कहा गया है— एकमात्रात्मकस्तार पञ्चाशद्वर्णभूषित । वैखरीकल्पनाहेतुर्व्यावहारिक ईरितः ॥ दुर्गादिशक्तित्रितय तथेच्छादित्रिशक्तिकम् । वस्वाहित्यरुद्रजात नवब्रह्माधिदेवतम् ॥ तथा पञ्चब्रह्मदेव तद्वाच्यार्थ इतीरित. ।

५ विराट्-प्रणव समष्टिरूप है, इसमे बाह्य व्यष्टि-प्रणव है, उसकी चार मात्राएँ हैं। उसीको 'बाह्य प्रणव' कहते हैं। विश्व या वैश्वानर ही इसका अधिष्ठाता है। कहा भी है— व्यष्टे. समष्टिभावत्वात्स्थूलाद्यंशयोगत. । बाह्यप्रणव आम्नातो विश्वाद्या वाच्यता गताः ॥

६ अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद, कला और कलातीतरूपसे ऋषिमण्डलीद्वारा उपास्यमान सप्तमात्रात्मक प्रणवका नाम 'आर्षप्रणव' है। पञ्चब्रह्मा, विराट् और अन्तर्यामी इसके अधिष्ठाता हैं। कहा भी है— सप्तमात्रात्मक पञ्चब्रह्मान्तर्याम्यधिष्ठित. । ऋषिमण्डलसेव्यत्वादार्षप्रणव उच्यते ॥

७ आर्ष-प्रणवके अतिरिक्त एक स्थिति-प्रणव भी होता है, यह अकार-उकार—उभयमात्रारूप है। ब्रह्मा और विष्णु इसके अधिष्ठाता है। समष्टि अकार आदि मात्राचतुष्टयात्मक प्रणवको 'विराट्-प्रणव' कहते हैं। 'विराट्' आदि इसके अधिष्ठाता हैं। जैसा कि कहा है— चतु समष्टिमात्राद्युग् विराप्रणव उच्यते । विराडादिर्भवेद्वाच्य तलक्ष्य परमाक्षरम् ॥

८ स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी—इन चारकी मात्राओँसे युक्त 'अर्धमात्रा-प्रणव' होता है। ओत, अनुज्ञात, अनुज्ञा और

उपदेश ८] *** महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *** ७५७


[बायाँ स्तम्भ]

है । 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रको अन्तःप्रणव समझो । यह आठ भागोंमें विभक्त होता है । अकार, उकार, मकार, अर्द्धमात्रा, विन्दु, नाद, कला और शक्ति—ये ही उसके आठ भाग हैं । यह प्रणव केवल चार ही मात्राओंसे युक्त नहीं है, उसकी एक-एक मात्रा भी अनेकानेक भेदोंसे सम्पन्न है। केवल अकार ही दस हजार अवयवोंसे सम्पन्न है । उकारके एक सहस्र और मकारके एक सौ अवयव हैं । इसी प्रकार अर्द्धमात्रा-प्रणवका स्वरूप अनन्त अवयवोंसे युक्त है । विराट्-प्रणव सगुणरूप है, संहार-प्रणव निर्गुणरूप है और सृष्टि-प्रणव उभयात्मक है—वह सगुण-निर्गुण उभयरूप है। जैसे विराट्-प्रणव प्लुत अर्थात् अकार आदि चार मात्राओंकी समष्टिसे युक्त है, उसी प्रकार संहार-प्रणव प्लुत-प्लुत अर्थात् चतुर्थमात्रात्मक अर्द्धमात्रास्वरूप है ॥ २ ॥

विराट्-प्रणव अर्थात् विराट्स्वरूप ब्रह्म-प्रणव सोलह मात्राओंका है। यह छत्तीस तत्त्वोंसे परे है। वह षोडश मात्रारूप कैसे है, यह बताते हैं। अकार पहली मात्रा है, उकार दूसरी, मकार तीसरी, अर्द्धमात्रा चौथी, विन्दु पाँचवीं, नाद छठी, कला सातवीं, कलातीता आठवीं, शान्ति नवीं, शान्त्यतीता दसवीं, उन्मनी ग्यारहवी, मनोन्मनी बारहवीं, पुरी (वैखरी) तेरहवीं, मध्यमा चौदहवीं, पश्यन्ती पंद्रहवीं और परा सोलहवीं मात्रा है। यह सोलह मात्राओंवाला ब्रह्म-प्रणव ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्परूप चतुर्विध तुरीयसे अभिन्न होनेके कारण पुनः चौसठ मात्राओंवाला होता है। यही प्रकृति और पुरुषरूपसे पुनः दो भेदोंको प्राप्त होकर एक सौ अट्ठाइस मात्राओंवाला स्वरूप धारण करता है। इस प्रकार एक होकर भी ब्रह्म-प्रणव दृष्टिभेदसे अनेकविध सगुण और निर्गुण स्वरूपको प्राप्त होता है ॥३॥

(ॐकारको ब्रह्मस्वरूप बताया गया है। वह परब्रह्म परमात्मा कैसा है, यह बताते हैं।) ये ब्रह्म प्रणवरूप परमात्मा सबके आधारभूत तथा परम ज्योति स्वरूप हैं। ये ही सबके ईश्वर और सर्वत्र व्यापक हैं। सम्पूर्ण देवता इन्हींके स्वरूप हैं । समस्त प्रपञ्चका आधार—प्रकृति भी इन्हींके गर्भमें है। ये सर्वाक्षरमय हैं—वर्णमालाके पचास वर्ण और उनके द्वारा बोध्य अर्थ, सब इनके स्वरूप ही हैं। ये कालस्वरूप, समस्त शास्त्रमय तथा कल्याणरूप हैं। समस्त श्रुतियोंमें श्रेष्ठ तत्त्व


[दायाँ स्तम्भ]

पुरुषोत्तमरूपसे इनका ही अनुसन्धान करना चाहिये । समस्त उपनिषदोंके मुख्य अर्थ ये ही हैं। इन्हींमें उपनिषदें गतार्थ होती हैं । भूत, वर्तमान और भविष्य—इन तीनों कालोंमें होनेवाला जो जगत् है तथा इन तीनों लोकोंसे परे जो कोई अविनाशी तत्त्व है, वह सब ॐकारस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है—यह जानो । श्रेष्ठ नारद ! ॐकारको ही मोक्षदायक समझो । प्रणवके वाच्यार्थभूत परमात्मा ही यह आत्मा हैं। 'अयमात्मा ब्रह्म' (यह आत्मा ब्रह्म है)—इस श्रुतिद्वारा 'ब्रह्म' शब्दसे उन्हींका वर्णन हुआ है। ब्रह्मकी आत्माके साथ ॐकारके वाच्यार्थरूपसे एकता करके वह एकमात्र (अद्वितीय), जरारहित (मृत्युरहित) एव अमृतरूप चिन्मय तत्त्व ॐ है—इस प्रकार अनुभव करो । इस अनुभवके पश्चात् उस परमात्मस्वरूप ॐकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंवाले इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका आरोप करके—अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य हैं, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म और कारण-जगत्‌की कल्पना हुई है—विवेकद्वारा ऐसा अनुभव करके यह निश्चय करे कि यह जगत् ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा) ही है । तथा तन्मय (परमात्ममय) होनेके कारण यह अवश्य तत्स्वरूप (परमात्मारूप) ही है। इस प्रकार जगत्‌को 'ॐ' समझो अर्थात् इसे 'ॐ'के वाच्यार्थभूत परमात्मामें विलीन कर डालो तथा त्रिविध शरीरवाले अपने आत्माको भी 'यह त्रिविध शरीररूप उपाधिसे युक्त ब्रह्म ही है' ऐसी भावना करते हुए ब्रह्मरूप ही निश्चय करो । इस तरह आत्मा और परब्रह्मकी एकताका दृढ निश्चय हो जानेपर आत्मस्वरूप परब्रह्मका निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये । अब क्रमशः विश्व, तैजस आदिके वाचक प्रणवकी मात्राओंका क्रम बताया जाता है।

'स्थूल (विराट् जगत्स्वरूप) एव स्थूल जगत्‌का भोक्ता होनेसे, सूक्ष्म (सूक्ष्म जगत्स्वरूप) एव सूक्ष्म जगत्‌का भोक्ता होनेके कारण, एकमात्र आनन्दस्वरूप एव आनन्दमात्रका उपभोक्ता होनेसे तथा इन तीनोंकी अपेक्षा भी विलक्षण होनेके कारण वह आत्मा चार भेदोंवाला है। ये चार भेद ही उसके चार पाद हैं, अतः वह चार पादोंवाला है। जाग्रत्-अवस्था तथा इसके द्वारा उपलक्षित होनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् ही जिनका स्थान अर्थात् शरीर है—जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहे हैं, जिनका ज्ञान इस स्थूल (बाह्य) जगत्में सब ओर फैला हुआ है, जो इस समस्त विश्वके भोक्ता (रक्षक) हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मे-


[पाद-टिप्पणी]

१. पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच शब्दादि विषय, चार अन्त करण, पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्राएँ, महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृति—ये छत्तीस तत्त्व हैं ।

७५८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ८

न्द्रियों, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि- करण ही जिनके मुख हैं, पाताल, भूः, सुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्—ये आठ लोक ही जिनके आठ अङ्ग हैं, जो स्थूल जगत्के उपभोका हैं, स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है, वे स्थूल विश्वमें सर्वत्र व्यापक एवं अखिल विश्वरूप वैश्वानर पुरुष ही विश्वविजेता प्रभुके प्रथम पाद हैं। 'स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत्में व्याप्त परमात्मा सूक्ष्मप्रज्ञ हैं—उनका विज्ञान बाह्य जगत्की अपेक्षा आन्तरिक अर्थात् सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है। स्वतः वे पूर्वोक्तरूपसे आठ अङ्गोंवाले हैं। काम क्रोधादि शत्रुओंको तपानेवाले नारद ! वे स्वप्नलोकमें एकमात्र ही हैं, उनके सिवा दूसरा नहीं है। (उनके भी पूर्ववत् उन्नीस ही मुख हैं।) वे सूक्ष्म जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव और पालन करनेवाले हैं। उनके भी पूर्ववत् स्थूल-सूक्ष्म आदि भेदसे चार स्वरूप हैं। उन्हें तैजस पुरुष कहते हैं, क्योंकि वे तेजोमय एवं प्रकाशके स्वामी हैं। वे समस्त भूतोंके स्वामी हिरण्यगर्भ हैं। पूर्वोक्त वैश्वानर तो स्थूल हैं और हिरण्यगर्भ अन्तःप्रदेशमें स्थित होनेके कारण सूक्ष्म बताये गये हैं। इन्हें परमात्माका द्वितीय पाद बताया जाता है ॥ ४-१३ ॥ 'जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह स्पष्ट.ही सुषुप्ति है। ऐसी सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्- की प्रलयावस्था (जब कि सम्पूर्ण विश्व अपने कारणमें विलीन हो जाता है) जिनका स्थान (शरीर) है, अर्थात् समष्टि कारण-तत्त्वमें जिनकी स्थिति है, जो एकीभूत (अद्वितीय) हैं—जिनकी अभी नाना रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं हुई है, जो घनीभूत प्रज्ञानसे परिपूर्ण हैं, सुखी अर्थात् आनन्दस्वरूप हैं, नित्यानन्दमय हैं, सब जीवोंके भीतर स्थित अन्तर्यामी आत्मा हैं तथा अपने स्वरूपभूत आनन्दमात्रका उपभोग करने- वाले हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिनका मुख है, जो सर्वत्र व्यापक एव अविनाशी हैं; ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है; वे प्राज्ञनामसे प्रसिद्ध ईश्वर ही परब्रह्म परमात्माके तृतीय पाद हैं ॥ १४-१६ ॥ 'इस प्रकार तीनों पादोंके रूपमें वर्णित ये परमात्मा ईश्वर हैं। ये सर्वज्ञ हैं। ये सूक्ष्मरूपसे भावना (ध्यान) के योग्य परमेश्वर ही अन्तर्यामी आत्मा हैं। ये सम्पूर्ण विश्वके कारण हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान भी ये ही हैं। जाग्रत् आदि तीनों ही अवस्थाओंमें लक्षित होनेवाला यह जगत् भी वास्तवमें सुषुप्तरूप ही है। यह सब प्रकारकी उपरतिमें बाधक बना रहता है। (सुषुप्तरूप इसलिये है कि इससे मोहित हुए मनुष्योंको कभी किसी वस्तुका तात्त्विक ज्ञान नहीं होता।) इसी प्रकार यह त्रिविध जगत् स्वप्नवत् भी है; क्योंकि यहाँ वस्तुका प्रायः विपरीत ही ज्ञान होता है। इतना ही नहीं, कुछ का कुछ प्रतीत होनेके कारण यहाँ सब कुछ मायामात्र ही है। 'उक्त तीनों पादोंके अतिरिक्त जो चौथा तुरीय पाद है, वह ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार भेदोंके कारण चार रूपवाला है। तुरीयरूपमें स्थित ये परमात्मा एकमात्र सच्चिदानन्दरूप हैं। ओत आदि चार भेदोंमें स्थित होनेपर भी चतुर्थ पाद 'तुरीय' ही कहलाता है, उसके चारों भेद तुरीय नामसे ही प्रतिपादित होते हैं, क्योंकि प्रत्येक रूपका तुरीयमें ही पर्यवसान—लय होता है। इस तुरीय पादमें भी जो ओत, अनुज्ञातृ और अनुज्ञारूप तीन भेद हैं, वे विकल्प-ज्ञानके साधन हैं; अतः इन तीन विकल्पों (भेदों) को भी यहाँ पूर्ववत् सुषुप्ति एव मनोमय स्वप्नके समान तथा मायामात्र ही समझना चाहिये। यों जानकर यह निश्चय करना चाहिये कि इन विकल्पोंसे परे जो निर्विकल्परूप तुरीय तुरीय परमात्मा हैं, वे एकमात्र सच्चिदानन्दरूप ही हैं* ॥ १७-२० ॥ 'मुने ! इसके अनन्तर श्रुतिका यह स्पष्ट उपदेश है— जो सदा ही न तो स्थूलको जानता है, न सूक्ष्मको ही जानता है और न दोनोंको ही जानता है, जो न तो अधिक जानने- वाला है न नहीं जाननेवाला है, न अन्तःप्रज्ञ है न बहिःप्रज्ञ (न भीतरका ज्ञान रखनेवाला है न बाहरका), तथा जो प्रज्ञानका घनीभूत स्वरूप भी नहीं है, जिसे नेत्रों- द्वारा नहीं देखा गया, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो कभी पकड़में नहीं आ सकता, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता; जिसका चिन्तन नहीं हो सकता, जिसे किसी परिभाषामें नहीं बाँधा जा सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका


  • इस प्रसङ्गको स्पष्ट समझनेके लिये नृसिंहोत्तरतापनी- योपनिषद्का प्रथम खण्ड और वहाँ दी हुई टिप्पणियोंको ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये।

उपदेश ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५९ सार अथवा स्वरूप है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है— सर्वप्रकाशक सूर्यकी भाँति वही मुमुक्षुजनोंका जीवनाधार है। ऐसा परम कल्याणमय शान्त, अद्वितीय तत्त्व ही उन पूर्ण स्वयंप्रकाश ब्रह्म परम आकाशरूप है। परब्रह्म होनेके कारण ब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है—यह ज्ञानी महात्मा मानते ही वह सदा सर्वत्र विराजमान है। यह उपनिषद्का गूढ हैं। वही ब्रह्म-प्रणव है। वही जानने योग्य है, दूसरा नहीं। रहस्य है' ॥ २१-२३ ॥ ॥ अष्टम उपदेश समाप्त ॥ ८ ॥ नवम उपदेश ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन, आत्मवेत्ता संन्यासीके लक्षण तदनन्तर नारदजीने पूछा—'भगवन् ! ब्रह्मका स्वरूप पाँच भँवरोंवाली, पाँच दुःखरूप प्रवाहके वेगसे युक्त, पाँच कैसा है?' तब ब्रह्माजीने उनसे कहा—'वत्स ! ब्रह्म और क्या है, पर्वोंवाली और पचास भेदोंवाली नदीको हमलोग जानते अपना स्वरूप ही तो है— (यह आत्मा ब्रह्म ही है—सब हैं। सबकी जीविकारूप, सबके आश्रयभूत इस विस्तृत ब्रह्मचक्रमें कुछ ब्रह्म ही है, ब्रह्मके सिवा कुछ नहीं है)। ब्रह्म दूसरा जीवात्मा घुमाया जाता है। वह अपने-आपको और सबके है और मैं दूसरा हूँ—इस प्रकार जो लोग जानते हैं, वे पशु हैं, प्रेरक परमात्माको अलग-अलग जानकर उसके बाद उन जो स्वभावसे पशु-योनिमें उत्पन्न हैं, केवल उन्हींका नाम पशु परमात्मासे स्वीकृत होकर अमृतभावको प्राप्त हो जाता है। नहीं है। उन परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार सर्वात्मा और ये वेदवर्णित परब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ आश्रय और अविनाशी सर्वरूपमें जानकर विद्वान् पुरुष मृत्युके मुखसे सदाके लिये हैं। उनमें तीनों लोक स्थित हैं। वेदके तत्त्वको जाननेवाले छूट जाता है। परमात्मज्ञानके सिवा दूसरा कोई मार्ग मोक्ष- महापुरुष यहाँ (हृदयमें) अन्तर्यामीरूपसे स्थित उन ब्रह्म- की प्राप्ति करानेवाला नहीं है' ॥ १ ॥ को जानकर उन्हींके परायण हो उन परब्रह्म परमात्मामें ही ( ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु आपसमें लीन हो गये। विनाशशील जडवर्ग एवं अविनाशी जीवात्मा— कहते हैं—) 'क्या काल, स्वभाव, निश्चित फल देनेवाला कर्म, इन दोनोंके संयुक्त रूप व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप इस विश्व- आकस्मिक घटना, पाँचों महाभूत या जीवात्मा (जगत्‌का) कारण का परमेश्वर ही धारण और पोषण करते हैं तथा जीवात्मा है? इसपर विचार करना चाहिये। इन काल आदिका समुदाय इस जगत्‌के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके भी इस जगत्‌का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वे चेतन अधीन हो इसमे बँध जाता है और उन परमदेव परमेश्वरको आत्माके अधीन हैं (जड होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं)। जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। सर्वज्ञ जीवात्मा भी इस जगत्‌का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि और अज्ञानी, सर्वसमर्थ और असमर्थ—ये दो अजन्मा आत्मा वह सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है। इस प्रकार हैं तथा भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्यसामग्रीसे विचार करके उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर अपने गुणोंसे युक्त अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है। (इन तीनों- ढकी हुई उन परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका में जो ईश्वरतत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है, क्योंकि) वे साक्षात्कार किया, जो परमात्मदेव अकेले ही उन कालसे परमात्मा अनन्त, सम्पूर्ण रूपोंवाले और कर्तापनके अभिमान- लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए) सम्पूर्ण कारणोंपर से रहित हैं। जब मनुष्य इस प्रकार ईश्वर, जीव और प्रकृति— शासन करते हैं। उस एक नेमिवाले, तीन घेरोंवाले, सोलह इन तीनोंको ब्रह्मरूपमें प्राप्त कर लेता है, तब वह सब प्रकार- सिरोंवाले, पचास अरोंवाले, बीस सहायक अरोंसे तथा छः के बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। प्रकृति तो विनाशशील है और अष्टकोंसे युक्त, अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त, मार्गके इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतरूप अविनाशी है। इन तीन भेदोंवाले तथा दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभि- विनाशशील जडतत्त्व और चेतन आत्मा दोनोंको एक ईश्वर वाले चक्रको उन्होंने देखा। पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषय- अपने शासनमें रखते हैं; (इस प्रकार जानकर) उनका रूप जलसे युक्त, पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उन्हींमें लगाये रहनेसे तथा टेढी-मेढी चालसे चलनेवाली, पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली, तन्मय हो जानेसे मनुष्य अन्तमे उन्हें प्राप्त कर लेता है; पाँच प्रकारके ज्ञानके आदिकारण मनरूप मूलवाली, फिर तो समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है। उन परमदेव

७६० * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ९


[बायाँ स्तम्भ]

का निरन्तर ध्यान करनेसे उन प्रकाशमय परमात्माको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है, क्योंकि क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण जन्म-मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है। (अतः वह) शरीरका नाश होनेपर तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके सर्वथा विशुद्ध एव पूर्णकाम हो जाता है। अपने ही भीतर स्थित इन ब्रह्मको सदा ही जानना चाहिये। इनसे बढकर जाननेयोग्य तत्त्व दूसरा कुछ भी नही है। भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जडवर्ग) और उनके प्रेरक परमेश्वर—इन तीनोंको जानकर मनुष्य सब कुछ जान लेता है। इस प्रकार इन तीन भेदोंमे बताया हुआ यह सब कुछ ब्रह्म ही है। आत्मविद्या और तपस्या ही जिसकी प्राप्तिके मूल साधन हैं, वह उपनिषद्- वर्णित परमतत्त्व ही ब्रह्म है। (दृष्टिभेदसे वह द्विविध या त्रिविध बताया जाता है, परन्तु वास्तवमे भेद दृष्टि अज्ञान- मूलक है, अतः सब रूपोंमें वह एक ही ब्रह्म विराजमान है) ॥ २-१३ ॥

जो इस प्रकार जानकर निरन्तर अपने स्वरूपभूत ब्रह्मका ही चिन्तन करता है, उस एकत्वदर्शी ज्ञानीको वहाँ क्या शोक है और क्या मोह। इसलिये भूत, भविष्य और वर्तमान —तीनों कालोंमे प्रकट होनेवाला यह विराट् जगत् अविनाशी ब्रह्मस्वरूप ही है। यह सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान्‌से भी परम महान् परमात्मा इस जीवकी हृदयरूपी गुहामे स्थित है। सबकी सृष्टि एव रक्षा करनेवाले परमात्माकी कृपासे जो मनुष्य उस सङ्कल्परहित परमेश्वरको तथा उसकी महिमाको भी देख लेता है, वह सब प्रकारके दुःखोंसे रहित हो जाता है। वह परमात्मा हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी सब वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला तथा वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है। आँखोंके बिना ही वह सब कुछ देखता है। कानोंके बिना ही वह सब कुछ सुनता है। वह जाननेमे आनेवाली सभी वस्तुओंको जानता है, परन्तु उसको जाननेवाला कोई नहीं है। ज्ञानी पुरुष उसे पुरातन महान् पुरुष (पुरुषोत्तम) कहते हैं। वह इन अनित्य शरीरोंमें नित्य एव शरीररहित होकर स्थित है, उन सर्वव्यापी महान् परमात्माको जान लेनेपर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करता। वह सबका धारण-पोषण करनेवाला है, उसकी अघटित घटना-पटीयसी शक्ति अचिन्त्य है, सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तरूपसे स्वीकृत अर्थविशेष— परमात्माके रूपमें वही जाननेयोग्य है। परात्पर परब्रह्मरूपमे भी वही ज्ञातव्य है तथा सबके अवसानमें अर्थात् सम्पूर्ण


[दायाँ स्तम्भ]

जगत्‌का प्रलय होनेपर सबके सहारकरूपमे भी उसीको जानना चाहिये। वह कवि (त्रिकालज्ञ), पुराण-पुरुष तथा सबसे उत्तम पुरुषोत्तम है। वही सबका ईश्वर तथा सम्पूर्ण देवताओं- द्वारा उपासना करनेयोग्य है। वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित है, उसका कभी विनाश नहीं होता। वही शिव, विष्णु तथा कमलजन्मा ब्रह्मारूपी वृक्षोंको प्रकट करनेवाला महान् भूधर (पर्वत) है। जो पञ्चभूतात्मक है तथा पाँच इन्द्रियों- में विद्यमान रहता है, जिसने अनन्त जन्मोंके विस्तारकी परम्पराको बढा रक्खा है, उस सम्पूर्ण प्रपञ्चको उस परमात्माने पञ्चभूतोंके रूपोंमे प्रकट किये हुए अपने ही अवयवोंद्वारा स्वय ही व्याप्त कर रक्खा है, फिर भी वह स्वय इन पञ्चभूतात्मक अवयवोंसे आवृत नही है। वह परसे भी पर और महान्‌से भी महान् है। वह स्वरूपतः स्वतः प्रकाशमय, सनातन एवं कल्याणरूप है। जो दुराचारसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ अशान्त हैं—वशमे नहीं हैं, जो एकाग्रचित्त नहीं हुआ है तथा जिसका मन पूर्णतः शान्त नहीं हो पाया है, वह इस परमात्माको उत्तम ज्ञानद्वारा नहीं पा सकता (उसके भीतर आत्मज्ञानका उदय होगा ही नहीं)। वह पूर्ण ब्रह्म न भीतर जानता है, न बाहर जानता है, न बाहर- भीतर—दोनोंको ही जानता है, वह न स्थूल है न सूक्ष्म है; न वह ज्ञानरूप है, न अज्ञानरूप है, वह पकड़में आनेवाला तथा व्यवहारका विषय नहीं है। वह अपने भीतर स्वयं ही स्थित है। जो इस प्रकार जानता है, वह मुक्त हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है—इस प्रकार भगवान् ब्रह्माजीने उपदेश दिया ॥ १४-२२ ॥

अपने स्वरूपको जाननेवाला सन्यासी अकेला ही विचरता है। वह भयभीत मृगकी भाँति कभी एक स्थानपर नहीं ठहरता। अन्यत्र जानेका यदि कोई विरोध (अथवा न जानेका अनुरोध) करता है, तो उसे वह स्वीकार नहीं करता। अपने शरीरके सिवा अन्य सब वस्तुओंको त्यागकर वह मधुकरी वृत्तिसे भिक्षा ग्रहण करता है। सदा अपने स्वरूपका ही चिन्तन करते हुए उसकी सबके प्रति अनन्य बुद्धि हो जाती है—वह सबको अपना आत्मा ही समझता है तथा इस प्रकार अपने-आपमे ही स्थित रहनेवाला वह यति सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। वह परिव्राजक सम्पूर्ण क्रियाओं और कारकोंसे भेद-बुद्धि त्याग देता है। गुरु (शास्ता), शिष्य और शास्त्र

उपदेश ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६१ आदिकी त्रिपुटीसे भी वह मुक्त हो जाता है। समस्त संसार- 'सोऽहम्' (वह ब्रह्म मैं हूँ)-इस महावाक्यके उपदेशमें को त्यागकर वह कभी उसके दुःखसे मोहित नहीं होता। उसकी सहज स्थिति हो जाती है। वह परब्रह्म ही भगवान् परिव्राजक कैसा हो ? वह लौकिक धनसे रहित होनेपर ही विष्णुका परमधाम है; जहाँ जाकर योगी पुरुष वहाँसे सुखी होता है। वह ब्रह्मात्मज्ञानरूप धनसे सम्पन्न हो ज्ञान- इस संसारमें नहीं लौटते । वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता अज्ञान दोनोंसे ऊपर उठ जाता है। सुख-दुःख दोनोंके पार है और न चन्द्रमा ही प्रकाश फैलाता है। उस परम पदको पहुँच जाता है। वह आत्मज्योतिसे ही प्रकाश ग्रहण करता प्राप्त होनेवाला वह महात्मा इस संसारमे नहीं लौटता, है। सब ज्ञातव्य पदार्थ उसे ज्ञात हो जाते हैं। वह सर्वज्ञ, इस संसारमें नहीं लौटता। वही कैवल्यपद है। इतना ही यह -सब सिद्धियोंका दाता और सर्वेश्वर हो जाता है। क्योंकि उपनिषद् है ॥ २३ ॥ ॥ नवम उपदेश समाप्त ॥ ९ ॥ ॥ अथर्ववेदीय नारदपरिव्राजकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! अमृतत्वकी प्राप्तिका साधन तपोविजितचित्तस्तु निःशब्दं देशमास्थितः । निःसङ्गतत्त्वयोगज्ञो निरपेक्षः शनैः शनैः ॥ पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कं खमुत्क्रमेत् । छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥ यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा लयं व्रजेत् । तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत् ॥ अमृतत्त्वं समाप्नोति यदा कामात्स मुच्यते । सर्वैषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तं तु न बध्यते ॥ (क्षुरिकोपनिषद्) तपके द्वारा जिसने चित्तको जीत लिया है, उसे शब्दरहित एकान्त स्थानमें स्थित होकर सङ्गशून्य तत्त्वके लिये योगका ज्ञाता बनना और धीरे-धीरे अपेक्षारहित बनना चाहिये । जैसे बन्धनको काटकर हंस आकाशमें विशङ्क उड़ जाता है, वैसे ही जिसके बन्धन कट गये हैं, वह जीव संसारसे सदाके लिये तर जाता है। जैसे दीपक बुझनेके समय सारे तैलको जलाकर बुझ जाता है, वैसे ही योगी समस्त कर्मोंको जलाकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है। साधक जब समस्त कामनाओंसे छूट जाता है और सारी तृष्णाओंसे रहित हो जाता है, तब वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। यों संसार-बन्धनको काट डालनेके बाद वह बँधता नहीं। उ० अ० १६—

ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय आरुणि उपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! संन्यासग्रहणकी विधि तथा संन्यासके नियम

ॐ—प्रजापतिके उपासक अरुणके पुत्र आरुणि ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके पास गये । वहाँ जाकर बोले— 'भगवन् ! किस प्रकार मैं समस्त कर्मोंका त्याग कर सकता हूँ?' ब्रह्माजीने उनसे कहा—'अपने पुत्र, भाई-बन्धु आदिको, शिखा, यज्ञोपवीत, यज्ञ एव स्वाध्यायको तथा भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक एवं अतल, तलातल, वितल, सुतल, रसातल, महातल और पातालको—इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका त्याग कर दे । केवल दण्ड, आच्छादनके लिये वस्त्र तथा कौपीन धारण करे । शेष सब कुछ त्याग दे ॥ १ ॥ आरण्यकोंकी [आवृत्ति ( पाठ एव मनन ) करे, उपनिषदोंकी आवृत्ति करे । उपनिषदोंकी आवृत्ति करे ॥ २ ॥ 'निश्चय ही ब्रह्मको सूचित करनेवाला सूत्र—ब्रह्मसूत्र मैं ही हूँ, यों समझकर त्रिवृत्सूत्र अर्थात् उपवीतका त्याग करे । इस प्रकार समझनेवाला विद्वान् 'मया सन्यस्तम्, मया सन्यस्तम्, मया संन्यस्तम्' (मैंने सन्यास लिया, मैंने सर्वत्याग कर दिया, मैंने सब कुछ छोड़ दिया )—यों तीन बार कहकर—

अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । सखा मा गोपायौजः सखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय ॥*

'गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या वानप्रस्थ हो, यज्ञोपवीतको भूमिपर अथवा जलमें छोड़ दे । लौकिक अग्नियोंको अर्थात् अग्निहोत्रकी तीनों अग्नियोंको अपनी जठराग्निमें लीन करे तथा गायत्रीको अपनी वाणीरूपी अग्निमें स्थापित करे । कुटीमें रहनेवाला ब्रह्मचारी अपने कुटुम्बको छोड़ दे; पात्रका त्याग कर दे, पवित्री ( कुशा ) को त्याग दे । दण्डों और लोकोंका त्याग करे—इस प्रकार उन्होंने कहा । इसके बाद मन्त्रहीनके समान आचरण करे । ऊर्ध्वगमन अर्थात् ऊर्ध्वलोकोंमें जानेकी इच्छा भी न करे । औषधकी भाँति ( स्वाद-बुद्धि न रखकर, केवल शरीर-रक्षाके लिये ) अन्न ग्रहण करे; तीनों सन्ध्याओंके पूर्व स्नान करे । सन्ध्याकालमें समाधिमें स्थित होकर परमात्माका अनुसन्धान करे । सब वेदोंमें —इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित बाँसका दण्ड और कौपीन धारण करे; ओषधिकी भाँति भोजन करे; ओषधिकी भाँति अल्पमात्रामें भोजन करे, जो कुछ मिल जाय वही खा ले । आरुणि ! ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह तथा सत्यकी यत्नपूर्वक रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ३ ॥


  • सब (हिंस्र तथा अहिंस्र) प्राणियोंको अभय प्राप्त हो—किसीको भी मुझसे भय न हो, क्योंकि मुझसे ही सारा विश्व प्रवर्तित होता है। दण्ड ! तुम मेरे मित्र हो, मेरे ओजकी रक्षा करो । तुम मेरे मित्र हो, वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रके वज्र हो। वज्र ! मुझे सुख प्रदान करो। मुझे सन्यास-धर्मसे गिरानेवाला जो भी पाप हो, उसका निवारण करो।
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६३ 'इसके पश्चात् परमहंस परिव्राजकोंके लिये भूमिपर ही आसन और शयन आदिका, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहनेका तथा मिट्टी- का पात्र, तूंबी अथवा काष्ठका कमण्डलु रखनेका विधान है। संन्यासियोंको काम, क्रोध, हर्ष, रोष, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प, इच्छा, परनिन्दा, ममता, अहङ्कार आदिका भी परित्याग कर देना चाहिये । वर्षा ऋतुमें एक स्थानमें स्थिर होकर रहे; शेष आठ महीने अकेला विचरण करे, अथवा -एक और साथी लेकर, दो होकर विचरे, दो होकर विचरे ॥ ४ ॥ 'इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् ( संन्यासी होना चाहे ) वह उपनयनके अनन्तर अथवा पहले भी उपर्युक्त विधिसे अपने माता-पिता, पुत्र, अग्नि, उपवीत, कर्म, पत्नी अथवा अन्य जो कुछ भी हो—सबका परित्याग कर दे। संन्यासियोंको चाहिये कि हाथोंको ही पात्र बनाकर अथवा उदरको ही पात्रके रूपमें लेकर भिक्षाके लिये गाँवमें प्रवेश करे । उस समय 'ॐ हि ॐ हि ॐ हि' इस उपनिषद्- मन्त्रका उच्चारण करे । यह उपनिषद् है; जो इस उपनिषद्को निश्चयपूर्वक यों जानता है, वही विद्वान् है । पलाश, बेल, पीपल अथवा गूलरके दण्ड, मूँजकी मेखला तथा यज्ञोपवीत ( अर्थात् द्विजत्वके बाह्य उपकरणों ) को त्यागकर जो इस प्रकार जानता है, वही शूरवीर है । जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परम व्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परम धामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामें सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परम पद कहते हैं । वह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है । जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है । यह महा उपनिषद् है' ॥ ५ ॥ ॥ सामवेदीय आरुणिकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! दो विद्याएँ द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्त्वतः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥ ( ब्रह्मविन्दूपनिषद् १७-१८ ) दो विद्याएँ जाननेकी हैं—'शब्दब्रह्म' और 'परब्रह्म'—शास्त्रज्ञान और भगवान्‌का यथार्थ स्वरूपज्ञान । 'शास्त्रज्ञानमें निपुण हो जानेपर मनुष्य भगवान्‌को भी जान लेता है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ग्रन्थका अभ्यास करके उसके ज्ञान-विज्ञानरूप तत्त्वको प्राप्त कर ले, फिर उस ग्रन्थको वैसे ही त्याग दे, जैसे धान चाहनेवाला मनुष्य धानको लेकर पुआल- को खलिहानमें छोड़ देता है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय जाबालोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! पाशुपत-मतके अनुसार तत्त्वविचार; भस्म-धारणकी विधि तथा माहात्म्य; त्रिपुण्ड्रकी तीन रेखाओंका अर्थ

हरिः ॐ । एक बार भगवान् जाबालिके पास पिप्पलादके पुत्र पैप्पलादि मुनि गये और उनसे बोले—'भगवन् ! मुझे परमतत्त्वका रहस्य बतलाइये। क्या तत्त्व है, कौन जीव है, कौन पशु है, कौन ईश्वर है और मोक्षका उपाय क्या है ?' भगवान् जाबालिने उनसे कहा—'तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, जैसा मुझे ज्ञात है, वह सब निवेदन करूँगा।' फिर पैप्पलादि मुनि- ने उनसे पूछा—'आपको यह किसके द्वारा ज्ञात हुआ ?' वे पुनः उनसे बोले—'श्रीकार्तिकेयजीसे।' पैप्पलादिने फिर पूछा— 'षडाननको किससे ज्ञात हुआ ?' वे बोले—'श्रीमहादेवजीसे।' पैप्पलादिने फिर उनसे पूछा—'महादेवजीसे उन्होंने किस प्रकार जाना ?' तब जाबालिने उत्तर दिया—'महादेवजीकी उपासनाके द्वारा।' फिर पैप्पलादिने जाबालिसे कहा—'भगवन् ! कृपापूर्वक हमें यह सब कुछ रहस्यसहित बतलाइये।' उनके द्वारा पूछे जानेपर जाबालिने सब तत्त्व बतलाया—'पशुपति ही अहङ्कार- से युक्त होकर जब सासारिक जीव बनते हैं, तब पशु कहलाते हैं। पाँच कृत्योंसे सम्पन्न सर्वज्ञ, सर्वेश्वर महेश्वर ही पशुपति हैं।' 'पशु कौन हैं ?' यह पूछनेपर उन्होंने बतलाया कि 'जीव ही पशु कहलाते हैं।' उनके पति होनेके कारण महेश्वर पशुपति हैं। पैप्पलादिने फिर पूछा—'जीव कैसे पशु कहलाते हैं और महेश्वर कैसे पशुपति ?' भगवान् जाबालिने उनसे कहा—'जिस प्रकार घास-चारा खानेवाले, अविवेकी—जड़, दूसरोंके द्वारा हाँके जानेवाले, खेती आदिके काममें नियुक्त, सब दुःखोंको सहनेवाले तथा अपने स्वामी- के द्वारा बाँधे जानेवाले गौ आदि पशु होते हैं, वैसे ही जीव भी पशु कहलाते हैं। तथा उनके स्वामीके समान होनेके कारण सर्वज्ञ ईश्वर ही पशुपति हैं।' 'उनका ज्ञान किस उपायसे होता है ?' तब भगवान् जाबालिने उत्तर दिया 'विभूति धारण करनेसे।' 'उसकी क्या विधि है ? कहाँ-कहाँ उसे धारण करना चाहिये ?' भगवान् जाबालि पुनः उनसे कहने लगे—'सद्योजातादि' पाँच ब्रह्मसंज्ञक मन्त्रोंसे भस्म ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवेनातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ ईशान सर्वविद्यानाम् ईश्वर सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदाशिवोम् ॥

    • विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६५ संग्रह करे। 'अग्निरिति भस्म' * ॐ इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे, 'मा नस्तोके०'† इस मन्त्रसे उठाकर जलसे मले, 'त्र्यायुषम्०'‡ इत्यादि मन्त्रसे मस्तक, ललाट, वक्षःस्थल और कन्धोंपर त्रिपुण्ड्र करे। 'त्र्यायुषम्०' तथा 'त्र्यम्बकम्०'§ इन दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढते हुए तीन रेखाएँ खींचे। यह 'शाम्भव' व्रत है, सम्पूर्ण वेदोंमें वेदज्ञोंद्वारा कहा गया है। मुमुक्षु आवागमनसे बचनेके लिये इसका सम्यक् आचरण करे।' तदनन्तर सनत्कुमारने इन रेखाओंका परिमाण पूछा। त्रिपुण्ड्र- धारणकी तीन रेखाएँ ललाटभरमें चक्षु और भ्रुवोंके मध्यतक होती हैं। इनमें जो प्रथमा रेखा है, वह गार्हपत्य-अग्निका प्रतीक, प्रणवका अकार, रजोगुणस्वरूप, भूर्लोक, देहात्मा, क्रियाशक्ति, ऋग्वेद, प्रातःकालीन सवन और ब्रह्मादेवताका स्वरूप है। इसकी जो द्वितीय रेखा है, वह दक्षिणाग्निका प्रतीक, उकार, सत्त्वगुण, अन्तरिक्ष, अन्तरात्मा, इच्छाशक्ति, यजुर्वेद, माध्यन्दिन सवन और विष्णुदेवताका स्वरूप है। जो इसकी तृतीय रेखा है, वह आहवनीय अग्निका प्रतीक, मकार, तमोगुण, द्युलोक, परमात्मा, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीय सवन और महादेवदेवताका स्वरूप है। यों समझकर जो भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह विद्वान्, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्न्यासी—जो भी कोई हो, महापातक और उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है। सब देवताओंके ध्यानका फल उसको मिलता है। उसे सब तीर्थोंके स्नानका फल प्राप्त हो जाता है। वह समस्त रुद्रमन्त्रोंके जापका फल प्राप्त कर लेता है। वह पुनः आवागमनमें नहीं पड़ता, पुनः आवागमनमें नहीं पड़ता। ॐ सत्यम्—यह उपनिषद् है। ॥ सामवेदीय जावाल्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! शिवका उपासक धन्य है सर्गादिकाले भगवान् विरिश्विरुपास्त्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य । तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा धन्यः सोपास्योपासको भवति धाता ॥ (दक्षिणामूर्ति० २०) सृष्टिके आदिकालमें भगवान् ब्रह्मा इन (शिव) की उपासना करनेसे सामर्थ्य प्राप्तकर और मनोऽभिलषित अर्थको पाकर सन्तुष्ट होते हैं। इन उपास्य (शिव) का उपासक धन्य है, क्योंकि वह भी धाता (सबका धारण-पोषण करने- वाला) हो जाता है।
  • ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म व्योमेति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म ॥ † मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । मा नो वीरान्रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्त सदमित्त्वा हवामहे ॥ (यजुर्वेद १६ । १६) ‡ त्र्यायुषं जमदग्ने कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुष तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥ (यजुर्वेद ३ । ६२) § त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ (यजुर्वेद ३ । ६०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय वासुदेवोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! गोपीचन्दनका महत्त्व, उसके धारणकी विधि और फल


[बायाँ स्तम्भ]

देवर्षि नारदने सर्वेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके उनसे पूछा—भगवन् ! द्रव्य, मन्त्र, स्थान आदि (देवता, रेखा, रंग एव परिमाण) के साथ मुझे ऊर्ध्वपुण्ड्रकी विधि बतलाइये । तब देवर्षि नारदसे भगवान् वासुदेव बोले—'जिसे ब्रह्मादि मेरे भक्त धारण करते हैं, वह वैकुण्ठधाममें उत्पन्न, मुझे प्रसन्न करनेवाला विष्णुचन्दन मैने वैकुण्ठधामसे लाकर द्वारकामें प्रतिष्ठित किया है । कुङ्कुमादिसहित विष्णुचन्दन ही चन्दन है । मेरे अङ्गोंमें वह चन्दन गोपियोंद्वारा उपलेपित और प्रक्षालित होनेसे गोपीचन्दन कहा जाता है । मेरे अङ्गका वह पवित्र उपलेपन्नु चक्रतीर्थमें स्थित है । चक्र (गोमतीचक्र) सहित तथा पीले रंगका वह मुक्ति देनेवाला है । [चक्रतीर्थमें जहाँ गोमती-चक्रशिला हो, उस शिलासे लगा पीला चन्दन ही गोपी-चन्दन है । शिलासे पृथक् तथा दूसरे रंगका नहीं ।] पहले गोपीचन्दनको नमस्कार करके उठा ले, फिर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे— गोपीचन्दन पापघ्न विष्णुदेहसमुद्भव । चक्राङ्कित नमस्तुभ्यं धारणान्मुक्तिदो भव ॥ 'हे विष्णुभगवान्के देहसे समुत्पन्न पापनाशक गोपी-चन्दन ! हे चक्राङ्कित ! आपको नमस्कार है । धारण करनेसे मेरे लिये मुक्ति देनेवाले होइये ।'


[दायाँ स्तम्भ]

इस प्रकार प्रार्थना करके 'इमं मे गङ्गे०'¹ इस मन्त्रसे जल लेकर 'विष्णोर्नु कम्०'² इस मन्त्रसे (उस चन्दनको) रगड़े । फिर 'अतो देवा अवन्तु नो०'³, आदि ऋग्वेदके मन्त्रोंसे तथा १ 'इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या । असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयाऽऽर्जीकीये शृणुह्या सुषोमया ॥' (ऋक्० १०।७५।५) इस मन्त्रके सिन्धुद्वीप ऋषि हैं, मन्त्रोक्त सब नदियाँ देवता हैं, जगती छन्द है, जलदानमें इसका विनियोग है ।' इन ऋषि आदिका न्यास करना चाहिये । २ 'विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायद॒त्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥' (ऋक्० १।१५४।१) इस मन्त्रका 'विष्णोर्नु कमिति मन्त्रस्य दीर्घतमा ऋषिः नारायणो देवता त्रिष्टुप् छन्द मर्दने विनियोगः।' इस प्रकार विनियोग है । इन ऋषि आदिका न्यास करना चाहिये । ३. 'अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥' 'तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्धवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ।' (ऋक्० १।२२।१६, २०-२१) इन तीनों मन्त्रोंको पढ़े। इनका विनियोग वाक्य यह है—'अतो देवा

  • महांन्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६७

विष्णुगायत्री^१ से तीन बार अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर— शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत । गोविन्द पुण्डरीकाक्ष मा पाहि शरणागतम् ॥ 'हाथोंमें शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण किये, द्वारका- धाममें रहनेवाले हे अच्युत ! हे कमललोचन गोविन्द ! मै आप- की शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार मेरा ध्यान करके गृहस्थ अनामिका अगुलि- द्वारा ललाट आदि ( ललाट, उदर, हृदय, कण्ठ, दोनों भुजाएँ, दोनों कुक्षि, कान, पीठका (पेटके पीछेका) भाग, गर्दनके पीछे तथा मस्तक—इन ) बारह स्थानोंपर विष्णु- गायत्रीसे अथवा केशव आदि बारह नामों^२ से ( चन्दन ) धारण करे। ब्रह्मचारी अथवा वानप्रस्थ (अनामिकासे ही) ललाट, कण्ठ, हृदय तथा बाहुमूल (कन्धोंके पास बाहुके कूल्हों) पर विष्णुगायत्रीके द्वारा अथवा कृष्णादि पाँच नामों^३ से (चन्दन) धारण करे। सन्यासी तर्जनी अँगुलिसे सिर, ललाट तथा हृदयपर प्रणवके द्वारा (चन्दन) धारण करे। इति ऋचस्य कण्वो मेधातिथि ऋषि विष्णु देवता गायत्री छन्द अभिमन्त्रणे विनियोग ।' पूर्ववत् न्यास करे । १. (विष्णुगायत्री)—नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् । २ ललाटे केशव विद्यान्नारायणमथोदरे । माधव हृदये न्यस्य गोविन्द कण्ठकूपके ॥ विष्णुश्च दक्षिणे कुक्षौ तद्भुजे मधुसूदनम् । त्रिविक्रम कर्णदेशे वामे कुक्षौ तु वामनम् ॥ श्रीधर तु सदा न्यस्येद् वामबाहौ नर सदा । पद्मनाम पृष्ठदेशे ककुद्दामोदर स्मरेत् ॥ वासुदेव स्मरेन्मूर्ध्नि तिलक कारयेत् क्रमात् । ललाटमें केशव, उदरमें नारायण, हृदयमें माधव, कण्ठकूपमें गोविन्द, दाहिनी कुक्षिमें विष्णु, दाहिनी भुजामें मधुसूदन, कानोंमें त्रिविक्रम, बायीं कुक्षिमें वामन, वामबाहुमें श्रीधर, पीठमें पद्मनाभ, ककुत् (गर्दनके पीछे) में दामोदर, मस्तकपर वासुदेव—इस प्रकार भगवन्नामका न्यास करते हुए तिलक करे। ३ 'कृष्ण. सत्य. सात्वत. स्याच्छौरि शूरो जनार्दन. ।' अथवा— कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च। नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम ॥ कृष्ण, सत्य, सात्वत, शौरि एव जनार्दन अथवा कृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नन्दगोपकुमार और गोविन्द—इन नामोंसे तिलक करे। ब्रह्मादि (ब्रह्मा, विष्णु, शिव), तीनों मूर्तियाँ, तीनों (भू. भुव स्व.) व्याहृतियाँ, तीन (गण-छन्द, मात्रा- छन्द तथा अक्षर-छन्द) छन्द, तीनों (ऋक्, यजुः एव साम) वेद, तीनों (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) स्वर, तीनों (आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि) अग्नियों, तीनों (चन्द्र, सूर्य, अग्नि) ज्योतिष्मान्, तीनो (भूत, वर्तमान, भविष्य) काल, तीनों (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) अवस्थाएँ, तीनों (क्षर, अक्षर, परमात्मा) आत्मा, तीनों पुण्ड्र (अकार, उकार, मकार—प्रणवकी ये तीन मात्राएँ)—ये सब प्रणवात्मक तीनों ऊर्ध्वपुण्ड्रके स्वरूप हैं। अतः ये तीन रेखाएँ एकत्रित होकर ॐके रूपमें एक हो जाती हैं (अर्थात् तीनों पुण्ड्र मिलकर प्रणवरूप होते हैं)। अथवा परमहंस प्रणवद्वारा एक ही ऊर्ध्वपुण्ड्र ललाटपर धारण करे। वहाँ (ललाटमें) दीपके प्रकाशके समान अपने आत्माको देखता हुआ तथा 'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसी भावना करता हुआ योगी मेरा सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है और दूसरे (परमहंसके अतिरिक्त) कुटीचक, त्रिदण्डी, बहूदक आदि सन्यासी हृदयपरके ऊर्ध्वपुण्ड्रके मध्यमें या हृदयकमलके मध्यमें अपने आत्मतत्त्वकी भावना (ध्यान) करें । उस हृदयकमलके मध्यमें नीले बादलके मध्यमें प्रकाशमान विद्युल्लताकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म ऊर्ध्वमुखी अग्निशिखा स्थित है। वह नीवारके शूक (सिके—कोंपलमूल) की भाँति पतली, पीतवर्ण तथा प्रकाशमय अणुके समान है। उसी अग्नि- शिखाके मध्यमें परमात्मा स्थित हैं। पहले हृदयके ऊपरके ऊर्ध्वपुण्ड्रमें (अग्निशिखाके मध्य परमात्माकी भावनाका) अभ्यास करे। उसके पश्चात् हृदय-कमलमें (उसी ध्यानका) अभ्यास करे। इस प्रकार क्रमशः अपने आत्मरूपकी मुझ परम हरिरूपसे भावना करे । जो एकाग्र मनसे मुझ अद्वैतरूप (जिसके अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं, उस) हरिका हृदय-कमलमें अपने आत्म- रूपसे ध्यान करता है, वह मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं। अथवा जो भक्तिद्वारा मेरे अव्यय, ब्रह्म (व्यापक), आदि- मध्य एवं अन्तसे रहित, स्वयंप्रकाश, सच्चिदानन्दस्वरूपको जानता है (वह भी मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं)। मैं एक ही विष्णु अनेक रूपवाले जङ्गमों तथा स्थावर भूतोंमें भी ओतप्रोत होकर उनके आत्मरूपसे

७६८ * वासुदेवोपनिषद् * निवास करता हूँ। जैसे तिलोंमें तेल, लकड़ीमें अग्नि, दूधमें घी तथा पुष्पमें गन्ध (व्याप्त है), वैसे ही भूतोंमें उनके आत्मरूपसे मैं अवस्थित हूँ। जगत्- में जो कुछ भी दिखायी पड़ता है अथवा सुना भी जाता है, उस सबको बाहर और भीतरसे भी व्याप्त करके मैं नारायण स्थित हूँ। मैं देहादिसे रहित, सूक्ष्म, चित्प्रकाश (ज्ञानस्वरूप), निर्मल, सबमें ओतप्रोत, अद्वैत परम ब्रह्मस्वरूप हूँ। ब्रह्मरन्ध्रमें, दोनों भौंहोंके मध्यमें तथा हृदयमें चेतनाको प्रकाशित करनेवाले श्रीहरिका चिन्तन करे। इन स्थानोंको गोपीचन्दनसे उपलिप्त करके (वहाँ गोपीचन्दनका तिलक करके) तथा ध्यान करके साधक परमतत्त्वको प्राप्त करता है। ऊर्ध्वदण्डी, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), ऊर्ध्वपुण्ड्र (धारी) तथा ऊर्ध्वयोग (उत्तम गति देनेवाले योग) को जानने- वाला-इस ऊर्ध्व-चतुष्टयसे सम्पन्न सन्यासी ऊर्ध्वपद (दिव्यधाम) को प्राप्त करता है। इस प्रकार यह निश्चित ज्ञान है। यह मेरी भक्तिसे स्वयं सिद्ध हो जाता है। नित्य गोपीचन्दन धारण करनेसे एकाग्र भक्ति प्राप्त होती है। वैदिक ज्ञानसम्पन्न सर्वश्रेष्ठ सभी ब्राह्मणोंके लिये पानीके साथ घिसकर गोपीचन्दनके ऊर्ध्वपुण्ड्र (करने) का विधान है। जो मुमुक्षु (मोक्षकी इच्छा रखनेवाला) है, वह अपरोक्ष आत्मदर्शनकी सिद्धिके लिये गोपीचन्दनके अभावमे (गोपीचन्दन न हो, तब) तुलसीके जड़की मिट्टी (से) नित्य (तिलक) धारण करे। जिसका शरीर गोपीचन्दनसे लिप्त रहता है, उसके शरीरकी हड्डियाँ निश्चय ही (दधीचिकी हड्डियोंके समान) दिनोंदिन चक्र (वज्रके समान सुदृढ) होती जाती हैं। (दिनमें तो गोपीचन्दनका ऊर्ध्वपुण्ड्र करे) और रात्रि- को अग्निहोत्रकी भस्मसे 'अग्नेर्भस्मासि०' आदिसे (भस्म लेकर) 'इदं विष्णुं०' आदि मन्त्रसे मलकर तथा 'त्रीणि पदाँ०' आदि मन्त्रसे, विष्णुगायत्रीसे तथा (यदि साधु हो तो) प्रणवसे उद्धूलन करे (सम्पूर्ण शरीरको मले)। जो इस विधिसे गोपीचन्दन धारण करता है, अथवा जो इस (उपनिषद्) का अध्ययन करता है, वह समस्त महापातकोंसे पवित्र हो जाता है। उसे पाप-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुकता है। (सब तीर्थोंके स्नानका पुण्य प्राप्त कर लेता है।) सम्पूर्ण यज्ञोंका यजन करनेवाला (उनके यजनके फलको प्राप्त) होता है। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजनीय हो जाता है। उसकी मुझ नारायणमें अचला भक्ति वृद्धिको प्राप्त होती है। वह सम्यक् ज्ञान प्राप्त करके भगवान् विष्णुका सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है। फिर (संसारमें) लौटकर नहीं आता, नहीं आता। आकाशमें व्याप्त हुए सूर्यकी भाँति भगवान् विष्णुके उस परमपदको सूक्ष्मदर्शी (ज्ञानी) सदा अपने हृदयाकाशमें देखते (साक्षात् करते) हैं। भगवान् विष्णुका वह जो परम पद है, उसे लोक व्यवहारमें अनासक्त एव साधनके लिये सदा जाग्रत् रहनेवाले विप्रगण ध्यानमें प्रकाशित करते हैं। (ध्यानमें उसका साक्षात् दर्शन करते हैं।) ॥ सामवेदीय वासुदेवोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! १. 'अग्नेर्भस्मासन्ने पुरीषमसि चित स्थ परिचित्त ऊर्ध्वचित अध्वश्वम्।' (वाजसनेयिसंहिता १२।४६) २. 'इद विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ॥' (ऋक्० १।२२।१७) ३. 'त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन्।' (ऋक्० १।२२।१८)