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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • कठोपनिषद् * २०५ सम्बन्ध—अब इस प्रकार उन परमेश्वरकी महिमाको समझनेवाले पुरुषकी पहचान बताते हैं— अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ अनवस्थेषु=(जो) स्थिर न रहनेवाले (विनाशशील), शरीरेषु=शरीरोंमें, अशरीरम्=शरीररहित (एव); अव- स्थितम्=अविचलभावसे स्थित है, महान्तम्=(उस) महान्, विभुम्=सर्वव्यापी, आत्मानम्=परमात्माको, मत्वा=जानकर; धीरः=बुद्धिमान् महापुरुष, न शोचति=(कभी किसी भी कारणसे) शोक नहीं करता ॥ २२ ॥ व्याख्या—प्राणियोंके शरीर अनित्य और विनाशशील हैं, इनमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। इन सबमें सम- भावसे स्थित परब्रह्म पुरुषोत्तम इन शरीरोंसे सर्वथा रहित, अशरीरी हैं। इसी कारण वे नित्य और अचल हैं। प्राकृत देश-काल-गुणादिसे अपरिच्छिन्न उन महान्, सर्वव्यापी, सबके आत्मरूप परमेश्वरको जान लेनेके बाद वह ज्ञानी महापुरुष कभी किसी भी कारणसे किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता। यही उसकी पहचान है* ॥ २२ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि वे परमात्मा अपने पुरुषार्थसे नहीं मिलते, वर उसीको मिलते हैं, जिसको वे स्वीकार कर लेते हैं— नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ अयम्=यह; आत्मा न=परब्रह्म परमात्मा न तो, प्रवचनेन=प्रवचनसे, न मेधया=न बुद्धिसे (और), न बहुना श्रुतेन=न बहुत सुननेसे ही, लभ्यः=प्राप्त हो सकता है, यम्=जिसको, एषः=यह, वृणुते=स्वीकार कर लेता है, तेन एव लभ्यः=उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है (क्योंकि), एषः आत्मा=यह परमात्मा, तस्य=उसके लिये, स्वाम् तनूम्=अपने यथार्थ स्वरूपको; विवृणुते=प्रकट कर देता है ॥ २३ ॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन मैं कर रहा हूँ, वे न तो उनको मिलते हैं, जो शास्त्रोंको पढ-सुनकर लच्छेदार भाषामें परमात्म-तत्त्वका नाना प्रकारसे वर्णन करते हैं, न उन तर्कशील बुद्धिमान् मनुष्योंको ही मिलते हैं, जो बुद्धि- के अभिमानमें प्रमत्त हुए तर्कके द्वारा विवेचन करके उन्हें समझनेकी चेष्टा करते हैं, और न उनको ही मिलते हैं, जो परमात्माके विषयमें बहुत कुछ सुनतेरहते हैं। वे तो उसीको प्राप्त होते हैं, जिसको वे स्वयं स्वीकार कर लेते हैं और वे स्वीकार उसीको करते हैं, जिसको उनके लिये उत्कट इच्छा होती है, जो उनके बिना रह नहीं सकता। परंतु जो अपनी बुद्धि या साधनपर भरोसा न करके केवल उनकी कृपाकी ही प्रतीक्षा करता रहता है, ऐसे कृपा-निर्भर साधकपर परमात्मा कृपा करते हैं और योगमाया- का परदा हटाकर उसके सामने अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें प्रकट हो जाते हैं† ॥ २३ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि परमात्मा किसको प्राप्त नहीं होते— नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ अमद—हर्षसहित और हर्षरहित—इस प्रकार विरुद्ध धर्मवाला है। उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ?
  • इस मन्त्रका यह अर्थ भी माना गया है— आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशके समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरोंमें शरीररहित है, अवस्थितिरहित—अनित्योंमें अवस्थित नित्य अविकारी है, उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको 'यही मैं हूँ' ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता। † इस मन्त्रका यह अर्थ भी माना गया है— यह आत्मा वेदोंके प्रवचनसे विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा—ग्रन्थ-धारणकी शक्तिसे ही, और न केवल बहुत श्रवण करनेसे

२०६ * महान्तं विभुमात्मानं मंत्व धीरो न शोचति * प्रज्ञानेन=सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा, अपि=भी, एनम्=इस परमात्माको, न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात्=न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; न अशान्तः=न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; न असमाहितः=न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, वा=और; न अशान्तमानसः (आप्नुयात् )=न वही प्राप्त करता है, जिसका मन चञ्चल है ॥ २४ ॥ व्याख्या - जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे घृणा करके उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमे भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता। क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है, अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता ॥ २४ ॥ सम्बन्ध - उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्या नहीं जान सकता ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥ यस्य=(संहारकालमे) जिस परमेश्वरके, ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=ब्राह्मण और क्षत्रिय-ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणि- मात्र, ओदनः भोजन, भवतः=बन जाते हैं (तथा), मृत्युः यस्य=सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका, उप- सेचनम्=उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि), [ भवति =बन जाती है, ] सः यत्र=वह परमेश्वर जहाँ (और), इत्था=जैसा है, यह ठीक ठीक, कः वेद=कौन जानता है ॥ २५ ॥ व्याख्या - मनुष्य-शरीरमे भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है, किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव है, वे भी उन परमेश्वरके उपसेचन अर्थात् भोजनके साथ लगाकर खाये जानेवाले व्यञ्जन—चटनी-तरकारी आदिकी भाँति हैं। ऐसे ब्राह्मण-क्षत्रियादि समस्त प्राणियोंके और स्वयं मृत्युके संहारक अथवा आश्रयदाता परमेश्वरको भला, कोई भी मनुष्य इन अनित्य मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति कैसे जान सकता है। किसकी सामर्थ्य है, जो सबके जाननेवालेको जान ले। अतः (पूर्वोक्त २३ वें मन्त्रके अनुसार ) जिसको परमात्मा अपनी कृपाका पात्र बनाकर अपना तत्त्व समझाना चाहते हैं, वही उनको जान सकता है। अपनी शक्तिसे उन्हें कोई भी यथार्थ रूपमे नहीं जान सकता, क्योंकि वे लौकिक ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति बुद्धिके द्वारा जाननेमे आनेवाले नहीं हैं ॥ २५ ॥ ॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय वल्ली सम्बन्ध-द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उन्हें जान सकता है, परंतु परमात्माको प्राप्त करनेके साधनोंका वहाँ स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं हुआ, अत साधनोंका वर्णन करनेके लिये तृतीय वल्ली- का आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्रमें जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं- ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ ही जाना जा सकता है । साधक जिस आत्माका वरण करता है, उस वरण करनेवाले आत्माके द्वारा यह आत्मा स्वय ही प्राप्त किया जाता है । उस आत्माभावीके प्रति वह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूपको यथार्थ रूपमें प्रकट कर देता है ।

  • कठोपनिषद् * २०७ सुकृतस्य लोके=शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमें, परमे परार्धे=परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदय- आकाश) में, गुहाम् प्रविष्टौ=बुद्धिरूप गुफामें छिपे हुए, ऋतम् पिबन्तौ=सत्यका पान करनेवाले (दो हैं), छायातपौ= (वे) छाया और आतपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं, (यह बात) ब्रह्मविदः=ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष, वदन्ति=कहते हैं, च ये=तथा जो, त्रिणाचिकेताः=तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन कर लेनेवाले (और), पञ्चाग्नयः=पञ्चाग्निसम्पन्न गृहस्थ हैं, [ ते वदन्ति=वे भी यही बात कहते हैं ] ॥ १ ॥ व्याख्या-यमराजने यहाँ जीवात्मा और परमात्माके नित्य सम्बन्धका परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महानुभाव तथा यज्ञादि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले आस्तिक सज्जन—सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि यह मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। पूर्वजन्मार्जित अनेकों पुण्यकर्मोंको निमित्त बनाकर परम कृपालु परमात्मा कृपापरवश हो जीवको उसके कल्याण-सम्पादनके लिये यह श्रेष्ठ शरीर प्रदान करते हैं और फिर उस जीवात्माके साथ ही स्वयं भी उसीके हृदयके अन्तस्तलमें—परब्रह्मके निवासस्वरूप श्रेष्ठ स्थानमें अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हो रहते हैं। इतना ही नहीं, वे दोनों साथ-ही-साथ वहाँ सत्यका पान करते हैं—शुभ कर्मोंके अवश्यम्भावी सत्फलका भोग करते हैं (गीता ५-२९)। अवश्य ही दोनोंके भोगमें बड़ा अन्तर है। परमात्मा असङ्ग और अभोक्ता हैं, उनका प्रत्येक प्राणीके हृदयमें निवास करके उसके शुभकर्मोंके फलका उपभोग करना उनकी वैसी ही लीला है, जैसी अजन्मा होकर जन्म ग्रहण करना। इसलिये यह कहा जाता है कि वे भोगते हुए भी वस्तुतः नहीं भोगते । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा सत्यको पिलाते हैं—शुभ कर्मका फल भुगताते हैं, और जीवात्मा पीता है—फल भोगता है। परंतु जीवात्मा फलभोगके समय असङ्ग नहीं रहता। वह अभिमानवश उसमें सुखका उपभोग करता है। इस प्रकार साथ रहनेपर भी जीवात्मा और परमात्मा दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर भिन्न हैं। जीवात्मा छायाकी भाँति अल्पप्रकाश—अल्पज्ञ है, और परमात्मा धूपकी भाँति पूर्णप्रकाश—सर्वज्ञ । परंतु जीवात्मामें जो कुछ अल्पज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है, जैसे छायामें अल्पप्रकाश पूर्णप्रकाशरूप धूपका ही होता है।* इस रहस्यको समझकर मनुष्यको अपनेमें किसी प्रकारकी भी शक्ति-सामर्थ्यका अभिमान नहीं करना चाहिये और अन्तर्यामीरूपसे सदा-सर्वदा अपने हृदयमें रहनेवाले परम आत्मीय परम कृपालु परमात्माका नित्य निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये ॥ १ ॥ सम्बन्ध—परमात्माको जानने और प्राप्त करनेका जो सर्वोत्तम साधन 'उन्हें जानने और पानेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये उन्हींसे प्रार्थना करना है' इस बातको यमराज स्वयं प्रार्थना करते हुए बतलाते हैं— यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥ २ ॥ ईजानानाम्=यज्ञ करनेवालोंके लिये, यः सेतुः=जो दुःख-समुद्रसे पार पहुँचा देने योग्य सेतु है, (तम्) नाचिकेतम्= उस नाचिकेत अग्निको (और), पारम् तितीर्षताम्=संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये, यत् अभयम्=जो भयरहित पद है, (तत्) अक्षरम्=उस अविनाशी, परम् ब्रह्म=परब्रह्म पुरुषोत्तमको, शकेमहि=जानने और प्राप्त करनेमें भी हम समर्थ हों ॥ २ ॥ व्याख्या—यमराज कहते हैं कि हे परमात्मन् ! आप हमें वह सामर्थ्य दीजिये, जिससे हम निष्कामभावसे यज्ञादि शुभ कर्म करनेकी विधिको भलीभाँति जान सकें और आपके आज्ञापालनार्थ उनका अनुष्ठान करके आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें। तथा जो संसार-समुद्रसे पार होनेकी इच्छावाले विरक्त पुरुषोंके लिये निर्भयपद है, उस परम अविनाशी आप परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्‌को भी जानने और प्राप्त करनेके योग्य बन जायँ । इस मन्त्रमें यमराजने परमात्मामें उन्हें जाननेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये प्रार्थना करके यह भाव दिखलाया है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानने और प्राप्त करनेका सबसे उत्तम और सरल साधन उनसे प्रार्थना करना ही है ॥ २ ॥
  • इस मन्त्रमें 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' को ही गुहामें प्रविष्ट बतलाया गया है, 'बुद्धि' और 'जीव'को नहीं । 'गुहांहितौ तु' ० ० परमात्मन एव दृश्यते' (वेद्रिये--ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद २ सू० ११ का शाङ्करभाष्य)।

२०८ * विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—अब उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथी- के रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है— आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ आत्मानम्=( हे नचिकेता ! तुम ) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी ( उसमें बैठकर चलनेवाला ); विद्धि=समझो, तु=और, शरीरम् एव=शरीरको ही, रथम्=रथ ( समझो ), तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको, सारथिम्=सारथि ( रथको चलानेवाला ), विद्धि=समझो, च मनः एव=और मनको ही, प्रग्रहम्=लगाम ( समझो ) ॥ ३ ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ मनीषिणः=ज्ञानीजन ( इस रूपकमें ); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं ( और ); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग ( बतलाते हैं ), आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=( तथा ) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही, भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है अनन्त कालसे, यह अनवरत संसाररूपी वीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहीं धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे सुख शान्ति कभी नहीं मिल सकती । उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमे बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिको प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्‌के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममे पहुँच जाय । जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता, परन्तु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्राप्तिरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिको प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्‌को प्राप्त करता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय विषके उपभोगमे लग गया ॥ ३-४ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं— यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ यः सदा=जो सदा, अविज्ञानवान् तु=विवेकहीन बुद्धिवाला ( और ), अयुक्तेन=अवशीभूत ( चञ्चल ), मनसा= मनसे ( युक्त ), भवति=रहता है, तस्य=उसकी, इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ, सारथेः=असावधान सारथिके, दुष्टाश्वाः इव= दुष्ट घोड़ोंकी भाँति, अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली, [ भवन्ति=हो जाती हैं ] ॥ ५ ॥ व्याख्या—रथको घोड़े ही चलाते हैं, परन्तु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपात रमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं, परन्तु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे

ॐ कठोपनिषद् ॐ २०९ खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त, स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सारे रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें गिर पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उच्छृङ्खल ही होती चली जाती हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेसे होनेवाला लाभ बतलाते हैं--- यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ तु यः सदा=परन्तु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्वाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति=रहती हैं ] ॥ ६ ॥ व्याख्या-जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रखती है, उसका मन भी लक्ष्यकी ओर लगा रहता है एवं उसकी इन्द्रियाँ निश्चयात्मिका बुद्धिके अधीन रहकर भगवत्सम्बन्धी पवित्र विषयोंके सेवनमें उसी प्रकार संलग्न रहती हैं, जैसे श्रेष्ठ अश्व सावधान सारथिके अधीन रहकर उसके निर्दिष्ट मार्गपर चलते हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-पाँचवें मन्त्रके अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयमसे हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है— इसे बतलाते हैं-- यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति सँसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ यः तु सदा=जो कोई सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्कः=असंयतचित्त और; अशुचिः= अपवित्र; भवति=रहता है; सः तत्पदम्=वह उस परमपदको; न आप्नोति=नहीं पा सकता; च=अपितु; संसारम् अधिगच्छति=बार-बार जन्म मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-जिसकी बुद्धि सदा ही विवेक—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेम असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत और जिसका विचार दूषित रहता है और जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुराचारमें प्रवृत्त रहती हैं, ऐसे बुद्धिशक्तिम रहित मन इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वर अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार चक्रमें ही भटकता रहता है—शूकर-कुकुरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है ॥ ७ ॥ यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥ तु यः सदा=परन्तु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्कः=संयतचित्त (और); शुचिः=पवित्र; भवति=रहता है; सः तु=वह तो; तत्पदम्=उस परमपदको; आप्नोति=प्राप्त हो जाता है; यस्मात् भूयः=जहाँसे (लौटकर) पुनः; न जायते=जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥ व्याख्या-इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये

२१० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रखता है और उनके द्वारा मनको रोककर इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्‌को अर्पण किये हुए भोगोंका राग द्वेषसे रहित हो निष्काम भावमे शरीरनिर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—आठवें मन्त्रम कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रूपक रूपकका उपसहार करते हैं— विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥ यः नरः =जो (कोई) मनुष्य, विज्ञानसारथिः तु=विवेकशील बुद्धिरूप सारथिने सम्पन्न (और) मनःप्रग्रहवान्= मनरूप लगामको वशमे रखनेवाला है, सः = वह, अध्वनः = संसार-मार्गके, पारम् = पार पहुँचकर, विष्णो = सर्वव्यापक पुरुषोत्तम भगवान्‌के, तत् परमम् पदम् = उस सुप्रसिद्ध परमपदको, आप्नोति= प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—तृतीय मन्त्रसे नवम मन्त्रतक—सात मन्त्रोम रूपक रूपकम यह बात समझायी गयी है कि यह अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर जिस जीवात्माको परमात्माकी कृपासे मिल गया है, उसे शीघ्र सचेत होकर भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लग जाना चाहिये। शरीर अनित्य है, प्रतिक्षण इसका ह्रास हो रहा है। यदि अपने जीवनके इस अमूल्य समयको पशुओंकी भाँति सासारिक भोगोंके भोगनेम ही नष्ट कर दिया गया तो फिर बारवार जन्म मृत्युरूप ससारचक्रम घूमनेको बाध्य होना पड़ेगा। जिस महान् कार्यकी सिद्धिके लिये यह दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला था, वह पूरा नहीं होगा। अतः मनुष्यको भगवान्‌की कृपासे मिली हुई विवेकशक्तिका उपयोग करना चाहिये। समारकी अनित्यताको ओर इन आपात रमणीय विषय- जनित सुखोंकी यथार्थ दुःखरूपताको समझकर इनके चिन्तन ओर उपभोगसे सर्वथा उपरत हो जाना चाहिये। केवल शरीर- निर्वाहके उपयुक्त कर्तव्यकर्मोंका निष्कामभावमे भगवान्‌की आज्ञा समझकर अनुष्ठान करते हुए अपनी बुद्धिमे भगवान्‌के नाम, रूप, लीला, धाम तथा उनकी अलौकिक शक्ति और अहैतुकी दयापर दृढ विश्वास उत्पन्न करना चाहिये और सर्वतो- भावसे भगवान्‌पर ही निर्भर हो जाना चाहिये। अपने मनको भगवान्‌के तत्त्व चिन्तनमे, वाणीको उनके गुण-वर्णनमें, नेत्रोको उनके दर्शनमे तथा कानोको उनकी महिमा-श्रवणमे लगाना चाहिये । इस प्रकार सारी इन्द्रियोंका सम्बन्ध भगवान्‌से जोड़ देना चाहिये। जीवनका एक क्षण भी भगवान्‌की स्मृतिके बिना न बीतने पाये । इसीमे मनुष्य जीवनकी सार्थकता है। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही परब्रह्म पुरुषोत्तमके अचिन्त्य परमपदको प्राप्त होकर सदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त वर्णनमे रथके रूपककी कल्पना करके भगवत्प्राप्तिके लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धिके द्वारा मनको वशमे करके, इन्द्रियोंको विपरीत मार्गस हटाकर, भगवत्प्राप्तिके मार्गम लगानेकी बात कही गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभावसे ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियोंको उनके प्रिय ओर अभ्यस्त असत्-मार्गस किस प्रकार हटाया जाय, अतः इस बातका तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्‌की ओर लगानेका प्रकार बतलाते हैं— इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ हि इन्द्रियेभ्यः=क्योंकि इन्द्रियोमे, अर्थाः=शब्दादि विषय, पराः च=बलवान् हैं ओर, अर्थेभ्यः=शब्दादि विषयोंसे, मनः=मन, परम्=पर (प्रबल) हे तु मनसः=और मनसे भी, बुद्धिः=बुद्धि, परा=पर (बलवती) हे; बुद्धेः= (तथा) बुद्धिसे, महान् आत्मा=महान् आत्मा, (उन सबका स्वामी होनेके कारण); परः=अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है ॥१०॥ व्याख्या-इस मन्त्रमे 'पर' शब्दका प्रयोग बलवान्‌के अर्थम हुआ है, यह बात समझ लेनी चाहिये, क्योंकि कार्य- कारणभावसे या सूक्ष्मतारी दृष्टिमे इन्द्रियोंकी अपेक्षा शब्दादि विषयोंको श्रेष्ठ बतलाना युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार 'महान्' विशेषणके सहित 'आत्मा' शब्द भी 'जीवात्मा'का वाचक है, 'महत्तत्त्व'का नहीं। जीवात्मा उन सबका स्वामी है, अतः उसके लिये 'महान्' विशेषण देना उचित ही है। यदि महत्तत्त्वके अर्थमें इसका प्रयोग होता तो 'आत्मा' शब्दके प्रयोगकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि तत्त्व ही महत्तत्त्व है। तत्त्व-विचारकालमें

इसमें भेद नहीं माना जाता । इसके सिवा आगे चलकर जहाँ निरोध ( एक तत्त्वको दूसरेमें लीन करने ) का प्रसङ्ग है, वहाँ भी बुद्धिका निरोध 'महान् आत्मा'मे करनेके लिये कहा है । इन सब कारणोंसे तथा ब्रह्मसूत्रकारको साख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिरूप अर्थ स्वीकार न होनेसे भी यही मानना चाहिये कि यहाँ 'महान्' विशेषणके सहित 'आत्मा' पदका अर्थ जीवात्मा ही है । * इसलिये मन्त्रका सारांश यह है कि इन्द्रियोंसे अर्थ ( विषय ) बलवान् है । वे साधककी इन्द्रियोंको बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं, अतः साधकको उचित है कि इन्द्रियोंको विषयोसे दूर रक्खे । विषयोसे बलवान् मन है । यदि मनकी विषयोमे आसक्ति न रहे तो इन्द्रियाँ और विषय-ये दोनों साधककी कुछ भी हानि नहीं कर सकते । मनसे भी बुद्धि बलवान् है, अतः बुद्धिके द्वारा विचार करके मनको राग-द्वेषरहित बनाकर अपने वशमें कर लेना चाहिये । एव बुद्धिसे भी इन 'सबका स्वामी 'महान् आत्मा' बलवान् है । उसकी आज्ञा माननेके लिये ये सभी बाध्य है, अतः मनुष्यको आत्मशक्तिका अनुभव करके उसके द्वारा बुद्धि आदि सबको नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ १० ॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥

महतः=उस जीवात्मामे, परम्=बलवती है, अव्यक्तम्=भगवान्की माया; अव्यक्तात्=अव्यक्त मायासे भी; परः= श्रेष्ठ है; पुरुषः=परमपुरुष ( स्वय परमेश्वर ), पुरुषात्=परम पुरुष भगवान्‌से, परम्=श्रेष्ठ और बलवान्, किञ्चित्=कुछ भी, न=नहीं है, सा काष्ठा=वही सबकी परम अवधि (और), सा परा गतिः=वही परम गति है ॥ ११ ॥

व्याख्या-इस मन्त्रमे 'अव्यक्त' शब्द भगवान्‌की उस त्रिगुणमयी दैवी मायाशक्तिके लिये प्रयुक्त हुआ है, जो गीतामे दुरत्यय ( अति दुस्तर ) बतायी गयी है ( ७ । १४ ), जिससे मोहित हुए जीव भगवान्‌को नही जानते (गीता ७ । १३) । यही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें परदा है, जिसके कारण जीव सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वरको नित्य समीप होनेपर भी नही देख पाता । इसे इस प्रकरणमें'जीवसे भी बलवान् बतलानेका यह भाव है कि जीव अपनी शक्तिसे इस मायाको नहीं हटा सकता, भगवान्‌की शरण ग्रहण करनेपर भगवान्‌की दयाके बलसे ही मनुष्य इससे पार हो सकता है ( गीता ७ । १४)। यहाँ 'अव्यक्त' शब्दसे सांख्यमतावलम्बियोंका 'प्रधान तत्त्व' नहीं ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि उनके मतमे 'प्रधान' स्वतन्त्र है, वह आत्मासे पर नहीं है, तथा' आत्मांको भोग और मुक्ति-दोनों वस्तुएँ देकर उसका प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है । परन्तु उपनिषद् और गीतामें इस अव्यक्त प्रकृतिकों कहीं भी मुक्ति देनेमें समर्थ नही माना है । अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-इन सबपर आत्माका अधिकार है, अतः यह स्वयं उनको वशमें करके भगवान्‌की ओर बढ सकता है । परन्तु इस आत्मासे भी बलवान् एक और तत्त्व है, जिसका नाम 'अव्यक्त' है। कोई उसे प्रकृति और कोई माया भी कहते. हैं। इसीसे सब जीवसमुदाय मोहित होकर उसके वशमें हो रहा है । इसको हटाना जीवके अधिकारकी बात नहीं है, अतः इससे भी बलवान् जो इसके स्वामी परमपुरुष परमेश्वर हैं-जो बल, क्रिया और ज्ञान आदि सभी शक्तियोंकी अन्तिम अवधि और परम आधार हैं,-उन्हींकी शरण लेनी चाहिये । जब वे दया करके इस मायारूप परदेको स्वय हटा लेंगे, तब उसी क्षण वही भगवान्‌की प्राप्ति !हो जायगी, क्योंकि वे तो सदासे ही सर्वत्र विद्यमान हैं ॥ ११ ॥

सम्बन्ध-यही भाव अगले मन्त्रमें स्पष्ट करते हैं-

  • भाष्यकार प्रात स्मरणीयः स्वामी शकराचार्यजीने भी यहाँ 'महान् आत्मा'को जीवात्मा ही माना है, महत्तत्त्व नहीं ( देखिये ब्रह्मसूत्र अ० १ पा० ४ सू० १ का शाङ्करभाष्य ) । † इन ( १०-११ ) मन्त्रोंके कुछ आदरणीय विद्वानोंद्वारा निम्नलिखित अर्थ भी किये गये हैं- ( १ ) इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म, महान् और प्रत्यगात्मस्वरूप हैं, विषयोंसे सूक्ष्म महान् और प्रत्यगात्मस्वरूप मन है, मनसे सूक्ष्मतर, महत्तर और प्रत्यगात्मस्वरूप बुद्धिगब्दवाच्य भूतसूक्ष्म है, उस बुद्धिसे सूक्ष्म और महान् है सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला हिरण्यगर्भ-तत्त्व महान् आत्मा ( महत्तत्त्व ), इस महत्से सूक्ष्मतर प्रत्यगात्मस्वरूप और सबसे महान् अव्यक्त (मूल प्रकृति ) है, इस अव्यक्त- की अपेक्षा समन्त कारणोंका कारण और प्रत्यगात्मस्वरूप होनेसे पुरुष सूक्ष्मतर और महान् है । इस चिद्घनमात्र वस्तुसे भिन्न और कुछ भी नह। है, इस लिये यहाँ सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठाकी स्थिति या पर्यवसान है और यही उत्कृष्ट गति है ।

३१२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ एषः आत्मा = यह सबका आत्मरूप परमपुरुष, सर्वेषु भूतेषु = समस्त प्राणियोंमें रहता हुआ भी, गूढः = मायाके परदेमें छिपा रहनेके कारण, न प्रकाशते = सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, तु सूक्ष्मदर्शिभिः = केवल सूक्ष्मतत्त्वको समझनेवाले पुरुषोंद्वारा ही, सूक्ष्मया अग्र्यया बुद्ध्या = अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धिसे, दृश्यते = देखा जाता ह ॥ १२ ॥ व्याख्या—ये परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान् सबके अन्तर्यामी हैं, अतः सब प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं; परन्तु अपनी मायाके परदेमें छिपे हुए हैं, इस कारण उनके जाननेमे नहीं आते । जिन्होंने भगवान्‌का आश्रय लेकर अपनी बुद्धिको तीक्ष्ण बना लिया है, वे सूक्ष्मदर्शी ही भगवान्‌की दयासे सूक्ष्मबुद्धिके द्वारा उन्हें देख पाते हैं ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—विवेकीशील मनुष्यको भगवान्‌के शरण होकर किस प्रकार भगवान्‌की प्राप्तिके लिये साधन करना चाहिये ?—इस जिज्ञासापर कहते हैं— यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३॥ प्राज्ञः = बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि; वाक् = (पहले) वाक् आदि (समस्त इन्द्रियों) को, मनसी = मनमें, यच्छेत् = निरुद्ध करे, तत् = उस मनको, ज्ञाने आत्मनि = ज्ञानस्वरूप बुद्धिमे, यच्छेत् = विलीन करे, ज्ञानम् = ज्ञानस्वरूप बुद्धिको; महति आत्मनि = महान् आत्मामे, नियच्छेत् = विलीन करे (और), तत् = उसको, शान्ते आत्मनि = शान्तस्वरूप परमपुरुष परमात्मामे यच्छेत् = विलीन करे ॥ १३ ॥ व्याख्या—बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह पहले तो वाक् आदि इन्द्रियोको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमे विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो—मनमे विषयोंकी स्फुरणा न रहे । जब यह साधन भलीभाँति होने लगे, तब मनको ज्ञानस्वरूप बुद्धिमे विलीन कर दे अर्थात् एकमात्र विज्ञानस्वरूप निश्चयात्मिका बुद्धिकी वृत्तिके सिवा मनकी भिन्न सत्ता न रहे, किसी प्रकारका अन्य कोई भी चिन्तन न रहे । जब यहाँतक दृढ अभ्यास हो जाय, तदनन्तर उस ज्ञानस्वरूपा बुद्धिको भी जीवात्माके शुद्ध स्वरूपमें विलीन कर दे। अर्थात् ऐसी स्थितिमें स्थित हो जाय, जहाँ एकमात्र आत्मतत्त्वके सिवा—अपनेसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता या स्मृति नहीं रह जाती । इसके पश्चात् अपने-आपको भी पूर्व निश्चयके अनुसार शान्त आत्मारूप परब्रह्म पुरुषोत्तममे विलीन कर दे* ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार परमात्माके स्वरूपका वर्णन, तथा उसकी प्राप्तिका महत्त्व और साधन बतलाकर अब श्रुति मनुष्योंको सावधान करती हुई कहती है— उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ (२) इन्द्रियोंकी अधिष्ठात्री देवता सोम, कुबेर, सूर्य, वरुण, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, जयन्त, यम और दक्षकी अपेक्षा अर्थ (विषयों) के अधिष्ठात्री देवता सौपर्णी, वारुणी और उमा (शब्द-स्पर्शकी अधिष्ठात्री सौपर्णी, रूप-रसकी वारुणी और गन्धकी उमा हैं) श्रेष्ठ हैं, इनसे मनके अधिष्ठात्री देवता रुद्र, वीन्द्र (पक्षिराज गरुड़) और शेष श्रेष्ठ हैं, मनके देवताओंसे बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवता सरस्वती श्रेष्ठ हैं, सरस्वतीसे महत्तत्त्वके अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मासे अव्यक्तकी अधिष्ठात्री देवता श्री या रमा श्रेष्ठ हैं और उनसे श्रेष्ठ पुरुषशब्दवाच्य विष्णु हैं। वे परिपूर्ण हैं, उनके तुल्य ही कोई नहीं है, फिर उनसे श्रेष्ठ तो कैसे हो ?

  • इसका यह अर्थ भी किया गया है— विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसहार करें, यहाँ वाक् शब्द उपलक्षणमात्र है, तात्पर्य यह है कि समस्त इन्द्रियोंको मनके अधीन करे, उस मनको ज्ञान शब्दवाच्य बुद्धिरूप आत्मामें संयत करे, उस बुद्धिको हिरण्यगर्भकी उपाधिरूप महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको भी शान्त (निष्क्रिय) आत्मामें निरोध करे ।
  • कठोपनिषद् * २१३ उत्तिष्ठत = (हे मनुष्यो !) उठो, जाग्रत = जागो (सावधान हो जाओ और), वरान् = श्रेष्ठ महापुरुषोंके, प्राप्य = पास जाकर ( उनके द्वारा ), निबोधत = उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लो ( क्योंकि ); कवयः = त्रिकालज्ञ ज्ञानीजन, तत् पथः = उस तत्त्वज्ञानके मार्गको, क्षुरस्य = छुरीकी, निशिता दुरत्यया = तीक्ष्ण एव दुस्तर, धारा ( इव ) = धारके सदृश, दुर्गम् = दुर्गम ( अत्यन्त कठिन ), वदन्ति = बतलाते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या—हे मनुष्यो ! तुम जन्म जन्मान्तरसे अज्ञाननिद्रामें सो रहे हो। अब तुम्हें परमात्माकी दयासे यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला है। इसे पाकर अब एक क्षण भी प्रमादमें मत खोओ। शीघ्र सावधान हो जाओ। श्रेष्ठ महापुरुषोंके पास जाकर उनके उपदेशद्वारा अपने कल्याणका मार्ग और परमात्माका रहस्य समझ लो। परमात्माका तत्त्व बड़ा गहन है, उसके स्वरूपका ज्ञान, उसकी प्राप्तिका मार्ग महापुरुषोंकी सहायता और परमात्माकी कृपाके बिना वैसा ही दुस्तर है, जिस प्रकार छुरीकी तेज धारपर चलना। ऐसे दुस्तर मार्गसे सुगमतापूर्वक पार होनेका सरल उपाय वे अनुभवी महापुरुष ही बता सकते हैं, जो स्वयं इसे पार कर चुके हैं ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—ब्रह्मप्राप्तिका मार्ग इतना दुस्तर क्यों है ?—इस जिज्ञासापर परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए उसको जानने- का फल बताते हैं— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च * यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ यत् = जो, अशब्दम् = शब्दरहित, अस्पर्शम् = स्पर्border/स्पर्शरहित, अरूपम् = रूपरहित, अरसम् = रसरहित, च = और, अगन्धवत् = बिना गन्धवाला है, तथा = तथा ( जो ), अव्ययम् = अविनाशी, नित्यम् = नित्य, अनादि = अनादि, अनन्तम् = अनन्त ( असीम ); महतः परम् = महान् आत्मासे श्रेष्ठ ( एव ); ध्रुवम् = सर्वथा सत्य तत्त्व है, तत् = उस परमात्माको, निचाय्य = जानकर ( मनुष्य ); मृत्युमुखात् = मृत्युके मुखसे, प्रमुच्यते = सदाके लिये छूट जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे उस परब्रह्म परमात्माको प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित बतलाकर यह दिखलाया गया है कि सांसारिक विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे नित्य, अनादि और असीम हैं। जीवात्मासे भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्य हैं। उन्हें जानकर मनुष्य सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है* ॥ १५ ॥ सम्बन्ध—यहाँतक एक अध्यायके उपदेशको पूर्ण करके अब इस आख्यानके श्रवण और वर्णनका माहात्म्य बतलाते हैं— नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त ँ सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ मेधावी = बुद्धिमान् मनुष्य, मृत्युप्रोक्तम् = यमराजके द्वारा कहे हुए, नाचिकेतम् = नचिकेताके; सनातनम् = ( इस ) सनातन, उपाख्यानम् = उपाख्यानका, उक्त्वा = वर्णन करके, च = और; श्रुत्वा = श्रवण करके, ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोकमें; महीयते = महिमान्वित होता है ( प्रतिष्ठित होता है ) ॥ १६ ॥ व्याख्या—यह जो इस अध्यायमें नचिकेताके प्रति यमराजका उपदेश है, यह कोई नयी बात नहीं है, यह परम्परागत सनातन उपाख्यान है। इसका वर्णन करनेवाला और श्रवण करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठावाला होता है ॥ १६ ॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
  • एक आदरणीय महानुभावने इसका यह अर्थ किया है— जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, नित्य और अगन्ध है, जो अनादि, अनन्त, महत्त्त्वसे भी विलक्षण और कूटस्थ नित्य है, उस ब्रह्म आत्माको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।

२१४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * यः=जो मनुष्य, प्रयत:=सर्वथा शुद्ध होकर, इमम्=इस परमम् गुह्यम्=परम गुह्य रहस्यमय प्रसङ्गको, ब्रह्मसंसदि=ब्राह्मणोंकी सभामे, श्रावयेत्=सुनाता है, वा=अथवा, श्राद्धकाले=श्राद्धकालमे, श्रावयेत्=( भोजन करने- वालोको ) सुनाता है, तत्=( उसका ) वह श्रवण करानेरूप कर्म, आनन्त्याय कल्पते=अनन्त होनेमे ( अविनाशी फल देनेमे ) समर्थ होता है; तत् आनन्त्याय कल्पते इति=वह अनन्त होनेमे समर्थ होता है ॥ १७ ॥ व्याख्या--जो मनुष्य विशुद्ध होकर सावधानीपूर्वक इस परम रहस्यमय प्रसङ्गको तत्त्वविवेचनपूर्वक भगवत्प्रेमी शुद्धबुद्धि ब्राह्मणोंकी सभामे सुनाता है अथवा श्राद्धकालमे भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंको सुनाता है; उसका यह वर्णनरूप कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है । अनन्त होनेमें समर्थ होता है । दुबारा कहकर इस सिद्धान्तकी निश्चितता और अध्यायकी समाप्तिका लक्ष्य कराया गया है ॥ १७ ॥ ᅳ॥ तृतीय वल्ली समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

ॐ द्वितीय अध्याय प्रथम वल्ली सम्बन्ध—तृतीय वल्लीमें यह बतलाया गया कि वे परब्रह्म परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्तमान हैं, परंतु सबको दीखते नहीं। कोई विरला ही उन्हें सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा देख सकता है । इसपर यह प्रश्न होता है कि जब वे ब्रह्म अपने ही हृदयमें हैं तो उन्हें सभी लोग अपनी बुद्धिरूप नेत्रोंद्वारा क्यों नहीं देख लेते ? कोई विरला ही क्यों देखता है ? इसपर कहते है— पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ स्वयंभूः=स्वय प्रकट होनेवाले परमेश्वरने, खानि=समस्त इन्द्रियोंको, पराञ्चि=बाहरकी ओर जानेवाली ही, व्यतृणत्=बनाया है, तस्मात्=इसलिये (मनुष्य इन्द्रियोंके द्वारा प्राय ), पराङ्=बाहरकी वस्तुओको ही, पश्यति= देखता है, अन्तरात्मन्=अन्तरात्माको, न=नहीं; कश्चित्=किसी भाग्यशाली, धीरः=बुद्धिमान् मनुष्यने ही, अमृतत्वम्= अमर पदको, इच्छन्=पानेकी इच्छा करके, आवृत्तचक्षुः=चक्षु आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंकी ओरमे लौटाकर, प्रत्यगात्मानम्=अन्तरात्माको, ऐक्षत्=देखा है ॥ १ ॥ व्याख्या—शब्द-स्पर्श रूप-रस गन्ध—इन्द्रियोंके ये सभी स्थूल विषय बाहर हैं। इनका यथार्थ ज्ञान करानेके लिये इन्द्रियोंकी रचना हुई है। क्योंकि इनका ज्ञान हुए बिना न तो मनुष्य किसी विषयके स्वरूप और गुणको ही जान सकता , है और न उसका यथायोग्य त्याग एव ग्रहण करके भगवान्के इन्द्रिय निर्माणके उद्देश्यको सिद्ध करनेके लिये उनके द्वारा नवीन शुभ कर्मोंका सम्पादन ही कर सकता है । इन्द्रिय निर्माण इसीलिये है कि मनुष्य इन्द्रियोके द्वारा स्वास्थ्यकर, सुबुद्धिदायक, विशुद्ध विषयोंका ग्रहण करके सुखमय जीवन बिताते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर हो। इसीलिये स्वयंभू भगवान्ने इन्द्रियोंका मुख बाहरकी ओर बनाया, परतु विवेकके अभावसे अधिकांश मनुष्य इस बातको नहीं जानते और विषयासक्ति- वश उन्मत्तकी भाँति आपातरमणीय परतु परिणाममें भगवान्से हटाकर दुःखशोकमय नरकोंमे पहुँचानेवाले अशुद्ध विषय- भोगोंमे ही रचे-पचे रहते है । वे अन्तर्यामी परमात्माकी ओर देखते ही नहीं। कोई विरला ही बुद्धिमान् मनुष्य ऐसा होता है जो सत्संग, स्वाध्याय तथा भगवत्कृपासे अशुद्ध विषयभोगोंकी परिणामदुःखताको जानकर अमृतरूप परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे लौटाकर, उन्हे भगवत्सम्बन्धी विषयोंमे लगाकर, अन्तरात्माको—अन्तर्यामी परमात्माको देखता है* ॥ १ ॥ पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ ( ये ) बालाः=( परंतु ) जो मूर्ख, पराचः=बाह्य, कामान्=भोगोंका, अनुयन्ति=अनुसरण करते हैं ( उन्हींमें रचे-पचे रहते हैं ), ते=वे, विततस्य=सर्वत्र फैले हुए, मृत्योः=मृत्युके, पाशम्=बन्धनमें, यन्ति=पड़ते हैं, अथ=किंतु, धीराः=बुद्धिमान् मनुष्य, ध्रुवम्=नित्य, अमृतत्वम्=अमरपदको, विदित्वा=विवेकद्वारा जानकर, इह=इस जगत्में, अध्रुवेषु=अनित्य भोगोंमेंसे किसीको ( भी ), न प्रार्थयन्ते=नहीं चाहते अर्थात् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २ ॥

  • एक महानुभावने ऐसा अर्थ किया है— स्वयम्भू भगवान्ने कृपा करके ( उस भक्तके ) बाहरकी ओर जानेवाले इन्द्रिय-प्रवाहको रोक दिया—भीतरकी ओर मोड़ दिया। अतएव वह पुरुष बाहरकी वस्तुओंको नहीं देखता, अन्तरात्माको देखता है । अमृतत्वकी इच्छा करनेवाला कोई शान्तस्वभाव सत ही भगवत्कृपासे इस प्रकार बहिर्विषयोंसे चक्षु आदि इन्द्रियोंको मोड़कर अन्तर्यामी परमात्माको देखता है ।

२१६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-जो बाह्य (भगवद्-विमुख) विषयोंकी चमक दमक और आपात रमणीयताको देखकर उनमें आसक्त हुए रहते हैं और उनके पाने तथा भोगनेमें ही दुर्लभ एव अमूल्य मनुष्यजीवनको खो देते हैं, वे मूर्ख हैं। निश्चय ही वे सर्वकालव्यापी मृत्युके पाशमें बँध जाते हैं, दीर्घकालतक नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म धारण करके बार-बार जन्मते मरते रहते हैं; परंतु जो बुद्धिमान् हैं वे इस विषयपर गहराईसे यों विचार करते हैं कि 'ये इन्द्रियोंके भोग तो जीवको दूसरी योनियोंमें भी पर्याप्त मिल सकते हैं। मनुष्य शरीर उन सबसे विलक्षण है। इसका वास्तविक उद्देश्य विषयोपभोग कभी नहीं हो सकता।' इस प्रकार विचार करनेपर जब यह बात उनकी समझमें आ जाती है कि इसका उद्देश्य अमृतस्वरूप नित्य परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति करना है और वह इसी शरीरमे प्राप्त की जा सकती है, तब वे सर्वतोभावसे उसीकी ओर लग जाते हैं। फिर वे इस विनाशशील जगत्मे क्षणभङ्गुर भोगोंको प्राप्त करनेकी चेष्टा नहीं करते; इनसे सर्वथा विरक्त होकर सावधानीके साथ परमार्थ-साधनमे लग जाते हैं ॥ २ ॥ येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ येन = जिसके अनुग्रहसे मनुष्य, शब्दान् = शब्दोको, स्पर्शान् = स्पर्शोंको, रूपम् = रूप-समुदायको, रसम् = रस- समुदायको, गन्धम् = गन्ध-समुदायको, च = और, मैथुनान् = स्त्री-प्रसङ्ग आदिके सुखोको, विजानाति = अनुभव करता है (और); एतेन एव = इसीके अनुग्रहसे यह भी जानता है कि, अत्र किम् = यहाँ क्या, परिशिष्यते = शेष रह जाता है, एतत् वै = यह ही है, तत् = वह परमात्मा (जिसके विषयमें तुमने पूछा था) । ॥ ३ ॥ व्याख्या-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक सब प्रकारके विषयों का और स्त्री-सहवासादिसे होनेवाले सुखों का मनुष्य जिस परम देवसे मिली हुई ज्ञानशक्तिके द्वारा अनुभव करता है, उन्हींकी दी हुई शक्तिसे इनकी क्षणभङ्गुरताको देखकर वह यह भी समझ सकता है कि इन सबमेंसे ऐसी कौन वस्तु है, जो यहाँ शेष रहेगी ? विचार करनेपर यही समझमे आता है कि ये सभी पदार्थ प्रतिक्षण बदलनेवाले होनेसे विनाशीील हैं। इन सबके परम कारण एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही नित्य हैं। वे पहले भी थे और पीछे भी रहेंगे । अतः हे नचिकेता ! तुम्हारा पूछा हुआ वह ब्रह्मतत्त्व यही है जो सबका शेपी है, सबका पर्यवसान है, सबकी अवधि और सबकी परम गति है ॥ ३ ॥ स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ स्वप्नान्तम् च = स्वप्नके दृश्यों और, जागरितान्तम् = जाग्रत्-अवस्थाके दृश्यों; उभौ = इन दोनोको (मनुष्य); येन = जिससे; अनुपश्यति = बार-बार देखता है, [ तम् = उस, ] महान्तम् = सर्वश्रेष्ट; विभुम् = सर्वव्यापी, आत्मानम् = सबके आत्माको, मत्वा = जानकर; धीरः = बुद्धिमान् मनुष्य; न शोचति = शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ व्याख्या-जिस परमात्माके द्वारा यह जीवात्मा स्वप्नमें और जाग्रतमें होनेवाली समस्त घटनाओका बारम्बार अनुभव करता रहता है, इन सबको जाननेकी शक्ति इसको जिस परब्रह्म परमेश्वरसे मिली है, जिसकी कृपासे ही इस जीवको उस (परमात्मा) की विज्ञानशक्तिका एक अश प्राप्त हुआ है, उस सबकी अपेक्षा महान् सदा-सर्वदा सर्वत्र व्याप्त परब्रह्म परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी, किसी भी कारणसे, किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं करता * ॥ ४ ॥

  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रका निम्नलिखित भावार्थ माना है- १-जिस आत्माके द्वारा स्वप्न तथा जाग्रत् अवस्थाके अन्तर्गत दीखनेवाले पदार्थोंको मनुष्य देखता है, उस महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् वह 'परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता । २-निद्राके अन्त और ज्ञानदवस्थाके अन्तमें अर्थात् नींदसे जागनेपर और सोनेते पहले जो उस महान् सर्वव्यापी परमात्मामें मन लगाकर उसीको देखता है-उसीकी स्तुति-उपासना कर अपना सारा दायित्व उसीपर छोड़ उसीके अनन्य आश्रित हो रहता है, उस बुद्धिमान् पुरुषको कोई शोक नहीं होता ।

An accurate line-by-line Devanagari transcription of the provided image:

  • कठोपनिषद् * २१७ य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ यः=जो मनुष्य; मध्वदम्=कर्मफलदाता, जीवम्*=सबको जीवन प्रदान करनेवाले; (तथा) भूतभव्यस्य=भूत, वर्तमान और भविष्यका, ईशानम्=शासन करनेवाले, इमम्=इस, आत्मानम्=परमात्माको, अन्तिकात् वेद=(अपने) समीप जानता है, ततः(=उसके बाद वह, न विजुगुप्सते=(कभी) किसीकी निन्दा नहीं करता; एतत् वै=यह ही (है); तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था) ॥ ५ ॥ व्याख्या—जो साधक सबको जीवन प्रदान करनेवाले, जीवोंके परम जीवन और उन्हे उनके कर्मोंका फल भुगतानेवाले तथा भूत, वर्तमान और भावी जगत्‌का एकमात्र शासन करनेवाले उस परब्रह्म परमेश्वरको इस प्रकार समझ लेता है कि 'वह अन्तर्यामीरूपसे निरन्तर मेरे समीप—मेरे हृदयमें ही स्थित है,' और इससे स्वाभाविक ही यह अनुमान कर लेता है कि इसी प्रकार वे सर्वनियन्ता परमात्मा सबके हृदयमे स्थित है, वह फिर उनके इस महिमामय स्वरूपको कभी नहीं भूल सकता । इसलिये वह कभी किसीकी निन्दा नही करता या किसीसे भी घृणा नहीं करता । नचिकेता ! तुमने जिस ब्रह्मके विषयमें पूछा था, वह यही है, जिसका मैंने ऊपर वर्णन किया है † ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—अब यह बतलाते हैं कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणी उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही उत्पन्न हुए हैं, अतः जो कुछ भी है, सब उन्हींका रूपविशेष है । उनसे भिन्न यहाँ कुछ भी नहीं है, क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत्‌के अभिन्ननिमित्तोपादान कारण एकमात्र परमेश्वर ही हैं, वे एक ही अनेक रूपोंमें स्थित हैं । यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत् ।। एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ यः=जो, अद्‌भ्यः=जलसे, पूर्वम्=पहले; अजायत=हिरण्यगर्भरूपमें प्रकट हुआ था, [तम्=उस,] पूर्वम्=सबसे पहले, तपसः जातम्=तपसे उत्पन्न, गुहाम् प्रविश्य=हृदय-गुफामें प्रवेश करके, भूतेभिः (सह)=जीवात्माओंके साथ, तिष्ठन्तम्=स्थित रहनेवाले परमेश्वरको, यः=जो पुरुष, व्यपश्यत्=देखता है (वही ठीक देखता है), एतत् वै=यह ही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ६॥ व्याख्या—जो जलसे उपलक्षित पाँचों महाभूतोंसे पहले हिरण्यगर्भ ब्रह्माके रूपमें प्रकट हुए थे, उन अपने ही सङ्कल्परूप तपसे प्रकट होनेवाले और सब जीवोंके हृदयरूप गुफामें प्रविष्ट होकर उनके साथ रहनेवाले परमेश्वरको जो इस प्रकार जानता है कि 'सबके हृदयमें निवास करनेवाले सबके अन्तर्यामी परमेश्वर एक ही हैं, यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींकी महिमाका प्रकाश करता है,' वही यथार्थ जानता है । वे सदा सबके हृदयमें रहनेवाले ही ये तुम्हारे पूछे हुए परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—उन्हीं परब्रह्मका अब अदितिदेवीके रूपसे वर्णन करते हैं— या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत ॥ एतद्वै तत् ॥ ७॥ ────────────────────────────────────────────────────────────────
  • यहाँ 'जीव' शब्द परमात्माके लिये ही प्रयुक्त हुआ है, क्योकि भूत, भविष्य और वर्तमानका शासक जीव नहीं हो सकता । और प्रकरण भी यहाँ परमात्माका है, जीवका नहीं (देखिये ब्रह्मसूत्र १ । ३ । २४ का शाङ्करभाष्य) । † कुछ विद्वानोंने इसका यह अर्थ किया है— १—जो पुरुष कर्मफलभोक्ता और प्राणधारक इस जीवात्माको अपने समीप भूत और भविष्यका (त्रिकालका) ईश्वर समझता है, वह फिर किसी भयसे अपनेको छिपाकर नहीं रखता । (एक ब्रह्मसत्ताका ज्ञान होनेपर फिर कोई भय नहीं रहता, क्योंकि दूसरेकी सत्ता माननेसे ही भय होता है ।) २—जो मनुष्य मधु अर्थात् आनन्दके उपभोक्ता, भूत और भविष्यके शासक, जीवके नित्य समीप रहनेवाले, जीवके जीवन परमात्माको जान लेता है, वह फिर किसीसे भय नहीं करता । उ० अं० २८—

२१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * या=जो; देवतामयी=देवतामयी; अदितिः=अदिति; प्राणेन=प्राणोंके सहित; संभवति=उत्पन्न होती है; या=जो; भूतेभिः=प्राणियोंके सहित; व्यजायत=उत्पन्न हुई है, (तथा जो) गुहाम्=हृदयरूपी गुफामें; प्रविश्य=प्रवेश करके; तिष्ठन्तीम्=वहीं रहती है, (उसे जो पुरुष देखता है, वही यथार्थ देखता है, ) एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ७ ॥ व्याख्या—जो सर्वदेवतामयी भगवती अदितिदेवी पहले पहल उस परब्रह्मके सङ्कल्पसे सब जगत्की जीवनी-शक्तिके सहित उत्पन्न होती है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंको बीजरूपसे अपने साथ लेकर प्रकट हुई थी, हृदयरूपी गुहामें प्रविष्ट होकर वहीं रहनेवाली वह भगवती—भगवान्की अचिन्त्यमहाशक्ति भगवान्से सर्वथा अभिन्न है, भगवान् और उनकी शक्तिमें कोई भेद नहीं है, भगवान् ही शक्तिरूपसे सबके हृदयमें प्रवेश किये हुए हैं। हे नचिकेता ! यही ये ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था। अथवा—जननीरूपमें समस्त देवताओंका सृजन करनेवाली होनेके कारण जो सर्वदेवतामयी हैं, शब्दादि समस्त भोगसमूहका अदन-भक्षण करनेवाली होनेसे भी जिनका नाम अदिति है, जो हिरण्यगर्भरूप प्राणोंके सहित प्रकट होती हैं और समस्त भूतप्राणियोंके साथ ही जिनका प्रादुर्भाव होता है तथा जो सम्पूर्ण भूतप्राणियोंकी हृदय-गुफामें प्रविष्ट होकर वहाँ स्थित रहती हैं, वे परमेश्वरकी महाशक्ति वस्तुतः उनकी प्रतीक ही हैं। स्वय परमेश्वर ही इस रूपमें अपनेको प्रकट करते हैं। यही वह ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें नचिकेता ! तुमने पूछा था ॥ ७ ॥ अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥ एतद्वै तत् ॥ ८॥ (यः)=जो; जातवेदाः=सर्वज्ञ; अग्निः=अग्निदेवता; गर्भिणीभिः=गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा; सुभृतः=उपयुक्त अन्नपानादिके द्वारा भलीभाँति परिपुष्ट हुआ; गर्भः=गर्भकी; इव=भाँति; अरण्योः=दो अरणियोंमें; निहितः=सुरक्षित है—छिपा है (तथा जो); जागृवद्भिः=सावधान (और), हविष्मद्भिः=हवन करनेयोग्य सामग्रियोंसे (युक्त); मनुष्येभिः=मनुष्योंद्वारा; दिवे दिवे=प्रतिदिन; ईड्यः=स्तुति करनेयोग्य (है); एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥८॥ व्याख्या—जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रीके द्वारा शुद्ध अन्न-पानादिसे परिपुष्ट होकर बालक गर्भमें छिपा रहता है और श्रद्धा, प्रीति एव प्रसवकालीन क्लेशरूप मन्थनके द्वारा समयपर प्रकट होता है, उसी प्रकार अधर और उत्तर अरणि (ऊपर-नीचेके काष्ठखण्ड) के अंदर अग्नि देवता छिपे हुए रहते हैं एवं इनके उपासक प्रमादरहित होकर एकाग्रता, श्रद्धा तथा प्रीतिके साथ स्तुति करते हुए अरणि-मन्थनके द्वारा इन्हें प्रकट करते हैं। तदनन्तर आज्यादि विविध हवनसामग्रियोंके द्वारा इन्हें सन्तुष्ट करते हैं। ये अग्निदेवता सर्वज्ञ परमेश्वरके ही प्रतीक हैं। नचिकेता ! ये ही वे तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥८॥ यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतद्वै तत् ॥ ९॥ यतः=जहाँसे; सूर्यः=सूर्यदेव; उदेति=उदय होते हैं; च=और; यत्र=जहाँ; अस्तम् च=अस्तभावको भी; गच्छति=प्राप्त होते हैं; सर्वे=सभी; देवाः=देवता; तम्=उसीमें; अर्पिताः=समर्पित हैं। तत् उ=उस परमेश्वरको; कश्चन=कोई (कभी भी); न अत्येति=नहीं लाँघ सकता; एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ ९॥ व्याख्या—जिन परमेश्वरसे सूर्यदेव प्रकट होते हैं और जिनमें जाकर विलीन हो जाते हैं, जिनकी महिमामें ही यह सूर्यदेवताकी उदय-अस्तलीला नियमपूर्वक चलती है, उन परब्रह्ममें ही सम्पूर्ण देवता प्रविष्ट हैं—सब उन्हींमें ठहरे हुए हैं। ऐसा कोई भी नहीं है, जो उन सर्वात्मक, सर्वमय, सबके आदि-अन्त-आश्रयस्थल परमेश्वरकी महिमा और व्यवस्थाका उल्लङ्घन कर सके। सर्वतोभावसे सभी सर्वदा उनके अधीन और उन्हींके अनुशासनमें रहते हैं। कोई भी उनकी महिमाका पार नहीं पा सकता। वे सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही तुम्हारे पूछे हुए ब्रह्म हैं ॥ ९ ॥

  • कठोपनिषद् * २१९ यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥१०॥ यत् इह=जो परब्रह्म यहाँ (है); तत् एव अमुत्र=वही वहाँ (परलोकमें भी है); यत् अमुत्र=जो वहाँ (है); तत् अनु इह=वही यहाँ ( इस लोकमें) भी है; सः मृत्योः=वह मनुष्य मृत्युसे; मृत्युम्=मृत्युको (अर्थात् बारंबार जन्म-मरणको); आप्नोति=प्राप्त होता है; यः=जो, इह=इस जगत्में; नाना इव=(उस परमात्माको) अनेककी भाँति, पश्यति=देखता है ॥१०॥ व्याख्या - जो सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, सर्वरूप, सबके परम कारण, परब्रह्म पुरुषोत्तम यहाँ इस पृथ्वीलोकमे हैं, वही वहाँ परलोकमें अर्थात् देव-गन्धर्वादि विभिन्न अनन्त लोकोंमे भी हैं; तथा जो वहाँ हैं, वही यहाँ भी हैं। एक ही परमात्मा अखिल ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं। जो उन एक ही परब्रह्मको लीलासे नाना नामों और रूपोंमें प्रकाशित देखकर मोहवश उनमें नानात्वकी कल्पना करता है, उसे पुनः-पुनः मृत्युके अधीन होना पड़ता है, उसके जन्म-मरणका चक्र सहज ही नहीं छूटता । अतः दृढरूपसे यही समझना चाहिये कि वे एक ही परब्रह्म परमेश्वर अपनी अचिन्त्य शक्तिके सहित नाना रूपोंमें प्रकट हैं और यह सारा जगत् बाहर-भीतर उन एक परमात्मासे ही व्याप्त होनेके कारण उन्हींका स्वरूप है ॥ १० ॥ मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥११॥ एव=(शुद्ध) मनसे ही; इदम् आप्तव्यम्=यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किये जानेयोग्य है; इह=इस जगत्में (एक परमात्मासे अतिरिक्त); नाना=नाना (भिन्न-भिन्न भाव), किंचन=कुछ भी, न अस्ति=नहीं है, (इसलिये) यः इह= जो इस जगत्में; नाना इव=नानाकी भाँति, पश्यति=देखता है; सः=वह मनुष्य, मृत्योः=मृत्युसे, मृत्युम् गच्छति=मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥ व्याख्या - परमात्माका परमतत्त्व शुद्ध मनसे ही इस प्रकार जाना जा सकता है कि इस जगत्में एकमात्र पूर्णब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। सब कुछ उन्हींका स्वरूप है। यहाँ परमात्मासे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो यहाँ विभिन्नताकी झलक देखता है, वह मनुष्य मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है ॥ ११ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ एतद्वैतत् ॥१२॥ अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र (परिमाणवाला); पुरुषः=परम पुरुष (परमात्मा), आत्मनि मध्ये=शरीरके मध्यभाग- हृदयाकाशमें; तिष्ठति=स्थित है; भूतभव्यस्य=जो कि भूत, (वर्तमान) और भविष्यका; ईशानः=शासन करनेवाला (है); ततः=उसे जान लेनेके बाद (वह); न विजुगुप्सते=किसीकी भी निन्दा नहीं करता, एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १२ ॥
  • यद्यपि अन्तर्यामी परमेश्वर समानभावसे सर्वदा सर्वत्र परिपूर्ण हैं, तथापि हृदयमें उनका विशेष स्थान माना गया है। परमेश्वर किसी स्थूल-सूक्ष्म आकार-विशेषवाले नहीं हैं, परंतु स्थितिके अनुसार वे सभी आकारोंसे सम्पन्न हैं। क्षुद्र चींटीके हृदयदेशमें वे चींटीके हृदय-परिमाणके अनुसार परिमाणवाले हैं और विशालकाय हाथीके हृदयमें उसके हृदय- परिमाणवाले बनकर विराजित हैं। मनुष्यका हृदय अङ्गुष्ठ-परिमाणका है, और मानवशरीर ही परमात्माकी प्राप्तिका अधिकारी माना गया है। अतः मनुष्यका हृदय ही परब्रह्म परमेश्वरकी उपलब्धिका स्थान समझा जाता है। इसलिये यहाँ मनुष्यके हृदय- परिमाणके अनुसार परमेश्वरको अङ्गुष्ठमात्रपरिमाणका कहा गया है। इस प्रकार परमेश्वरको अपने हृदयमें स्थित देखनेवाला स्वाभाविक ही यह जानता है कि इसी भाँति वे सबके हृदयमें स्थित हैं, अतएव वह फिर किसीकी निन्दा नहीं करता अथवा किसीसे घृणा नहीं करता। नचिकेता ! यही वह ब्रह्म हैं, जिनके विषयमें तुमने पूछा था ॥ १२ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ एतद्वै तत् ॥१३॥

२२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुषः=परमपुरूष परमात्मा; अधूमकः=धूमरहित, ज्योतिः इव=ज्योतिकी भाँति है; भूतभव्यस्य=भूत, (वर्तमान और) भविष्यपर; ईशानः=शासन करनेवाला; सः एव अद्य=वह परमात्मा ही आज है; उ=और; सः (एव) श्वः=वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य, सनातन है), एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥ व्याख्या—मनुष्यकी हृदय-गुफामें स्थित ये अङ्गुष्ठमात्र पुरुष भूत, भविष्य और वर्तमानका नियन्त्रण करनेवाले स्वतन्त्र शासक हैं। ये ज्योतिर्मय हैं। सूर्य, अग्निकी भाँति उष्ण प्रकाशवाले नहीं; परंतु दिव्य, निर्मल और शान्त प्रकाशस्वरूप हैं। लौकिक ज्योतियोंमें धूमरूप दोष होता है; ये धूमरहित—दोषरहित, सर्वथा विशुद्ध हैं। अन्य ज्योतियाँ घटती-बढ़ती हैं और समयपर बुझ जाती हैं, परंतु ये जैसे आज हैं, वैसे ही कल भी हैं। इनकी एकरसता नित्य अक्षुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढ़ते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमे तुमने पूछा था* ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥१४॥ यथा=जिस प्रकार, दुर्गे=ऊँचे शिखरपर, वृष्टम्=बरसा हुआ; उदकम्=जल; पर्वतेषु=पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति=चारों ओर चला जाता है; एवम्=उसी प्रकार; धर्मान्=भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिको, पृथक्=परमात्मासे पृथक्, पश्यन्=देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव=उन्हींके; अनु- विधावति=पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमे और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है) ॥ १४॥ व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़-खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करके पर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे प्रवृत्त विभिन्न स्वभाववाले देव असुर मनुष्यादिको जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनका सेवन करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एव नाना प्रकारकी योनियों- में भटकना पड़ता है, वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥१५॥ यथा=(परंतु) जिस प्रकार; शुद्धे (उदके)=निर्मल जलमें; आसिक्तम्=(मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ; शुद्धम्=निर्मल, उदकम्=जल; तादृक् एव=वैसा ही, भवति=हो जाता है; एवम्=उसी प्रकार; गौतम=हे गौतमवंशी नचिकेता; विजानतः=(एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले; मुनेः=मुनिका (अर्थात् संसारसे उपरत हुए महापुरुषका), आत्मा=आत्मा, भवति=(ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—परंतु वही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४) ❖

  • यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रात स्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है— "परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमित पुरुषो भवितुमर्हति । कस्मात् ? शब्दात्—'ईशानो भूतभव्यस्य' इति । न ह्यन्य परमेश्वराद् भूतभव्यस्य निरङ्कुश- मीशिता।" अर्थात् यहाँ अङ्गुष्ठमात्र-परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना ? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्कुश नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता। (देखिये ब्रह्मसूत्र १। ३। २४ का शाङ्करभाष्य)
  • कठोपनिषद् * २२१ द्वितीय वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥ अवक्रचेतसः = सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, अजस्य = अजन्मा परमेश्वरका; एकादशद्वारम् = ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य- शरीररूप), पुरम् = पुर (नगर), (अस्ति) = है (इसके रहते हुए ही), अनुष्ठाय = (परमेश्वरका ध्यान आदि) साधन करके; न शोचति = (मनुष्य) कभी शोक नहीं करता; च = अपि तु, विमुक्तः = जीवन्मुक्त होकर; विमुच्यते = (मरनेके बाद) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै = यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥ व्याख्या—यह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न—इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदा परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्यशरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्यशरीरके रहते हुए ही—जीते-जी जो मनुष्य भजन- स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता; वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है— परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ सम्बन्ध—अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्पष्टीकरण करते हैं— हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसद्दतसद्वयोमसद्बब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ शुचिपत् = जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः = स्वयंप्रकाश पुरुषोत्तम है (वही); अन्तरिक्षसत् = अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला; वसुः = वसु है, दुरोणसत् = घरोंमें उपस्थित होनेवाला; अतिथिः = अतिथि है (और), वेदिषत् होता = यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा); नृषत् = समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला, वरसत् = मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला, ऋतसत् = सत्यमें रहनेवाला और; व्योमसत् = आकाशमें रहने- वाला (है तथा); अब्जाः = जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला, गोजाः = पृथिवीमें नानारूपोंसे प्रकट होनेवाला, := सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः = पर्वतोंमें नानारूपसे प्रकट होनेवाला (है), बृहत् ऋतम् = सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥ व्याख्या—जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयंप्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं, वही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले होते हैं, वही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं, मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं, वही जलोंमे मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, पृथिवीमे वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमे प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं* ॥२॥
  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रके ये अर्थ किये हैं— १—जो सर्वथा दोषहीन सर्वरूप 'हंस' हैं (हं चासौ—दोषहीनश्चासौ, सश्च साररूपश्च इति इस ), विशुद्ध (वायु) में स्थित शुचिषद् हैं, अन्तरिक्षमें स्थित सर्वोपरि सुखरूप वसु (व=वर, सु+सुख, यस्य स वसु ) हैं, समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता होता हैं, सबके द्वारा सम्मान्य वैद्य वेदिषत् हैं, घरोंमें अतिथि हैं या महान् ऐश्वर्यरूप (अति—महान्, थ—सम्पत्ति-ऐश्वर्य) हैं, सोमरूपसे कलशमें स्थित दुरोणसत् हैं, जो मनुष्योंमें हैं, उनसे श्रेष्ठ देवताओंमें हैं, वेदोंमें ऋत या सत्यरूप हैं, महान् प्रकृतिमें या श्रीमें हैं, जलसे उत्पन्न

२२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, पुरुषः = परमपुरुष परमात्मा, अधूमकः = धूमरहित; ज्योतिः इव = ज्योतिकी भाँति है; भूतभव्यस्य = भूत, (वर्तमान और) भविष्यपर; ईशानः = शासन करनेवाला; सः एव अद्य = वह परमात्मा ही आज है; उ=और, सः (एव) श्वः = वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य, सनातन है), एतत् वै = यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥ व्याख्या—मनुष्यकी हृदय-गुफामें स्थित ये अङ्गुष्ठमात्र पुरुष भूत, भविष्य और वर्तमानका नियन्त्रण करनेवाले स्वतन्त्र शासक हैं। ये ज्योतिर्मय है। सूर्य, अग्निकी भाँति उष्ण प्रकाशवाले नहीं, परंतु दिव्य, निर्मल और शान्त प्रकाशस्वरूप हैं। लौकिक ज्योतियोंमें धूम्ररूप दोष होता है, ये धूम्ररहित—दोषरहित, सर्वथा विशुद्ध है। अन्य ज्योतियाँ घटती-बढती हैं और समयपर बुझ जाती हैं, परंतु ये जैसे आज हैं, वैसे ही कल भी हैं। इनकी एकरसता नित्य अक्षुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता ! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था* ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥१४॥ यथा = जिस प्रकार, दुर्गे = ऊँचे शिखरपर; वृष्टम् = बरसा हुआ; उदकम् = जल; पर्वतेषु = पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति = चारों ओर चला जाता है, एवम् = उसी प्रकार; धर्मान् = भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिको, पृथक् = परमात्मासे पृथक्, पश्यन् = देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव = उन्हींके; अनु- विधावति = पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमें और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है) ॥ १४॥ व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़-खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करकेपर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे प्रवृत्त विभिन्न स्वभाववाले देव असुर मनुष्यादिको जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनका सेवन करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एव नाना प्रकारकी योनियों- में भटकना पड़ता है, वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४ ॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥१५॥ यथा = (परंतु) जिस प्रकार, शुद्धे (उदके) = निर्मल जलमें, आसिक्तम् = (मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ, शुद्धम् = निर्मल; उदकम् = जल; तादृक् एव = वैसा ही; भवति = हो जाता है, एवम् = उसी प्रकार, गौतम = हे गौतमवंशी नचिकेता, विजानतः = (एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले, मुनेः = मुनिका (अर्थात् संसारसे उपरत हुए महापुरुषका), आत्मा = आत्मा, भवति = (ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—परंतु वही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता ! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४) ❖

  • यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रात स्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है— "परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमित पुरुषो भवितुमर्हति । कस्मात् ? शब्दात्—'ईशानो भूतभव्यस्य' इति । न ह्यन्यः परमेश्वराद् भूतभव्यस्य निरङ्कुश- मीशिता।" अर्थात् यहाँ अङ्गुष्ठमात्र-परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना ? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्कुश नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता । (देखिये ब्रह्मसूत्र १।३। २४ का शाङ्करभाष्य )

द्वितीय वल्ली

  • कठोपनिषद् * २२१ द्वितीय वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥ अवक्रचेतसः =सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, अजस्य =अजन्मा परमेश्वरका, एकादशद्वारम् =ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य- शरीररूप ), पुरम् =पुर ( नगर ); (अस्ति )=है ( इसके रहते हुए ही ), अनुष्ठाय = ( परमेश्वरका ध्यान आदि ) साधन करके; न शोचति = ( मनुष्य ) कभी शोक नहीं करता, च =अपि तु, विमुक्तः =जीवन्मुक्त होकर; विमुच्यते = ( मरनेके बाद ) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै =यही है, तत् =वह ( परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था ) ॥ १ ॥ व्याख्या-यह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न-इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदा परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्यशरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्यशरीरके रहते हुए ही-जीते-जी जो मनुष्य भजन- स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता; वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है- परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ सम्बन्ध-अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्पष्टीकरण करते हैं- हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिपदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ शुचिषत् =जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः =स्वयंप्रकाश पुरुषोत्तम है (वही ), अन्तरिक्षसत् =अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला, वसुः =वसु है, दुरोणसत् =घरोंमें उपस्थित होनेवाला, अतिथिः =अतिथि है ( और ), वेदिषत् होता =यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निरूप तथा उसमे आहुति डालनेवाला 'होता' है ( तथा ), नृषत् =समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला, वरसत् =मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला; ऋतसत् =सत्यमें रहनेवाला और, व्योमसत् =आकाशमें रहने- वाला (है तथा), अब्जाः =जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला, गोजाः =पृथिवीमें नानारूपोंसे प्रकट होनेवाला, ऋतजाः = सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः =पर्वतोंमे नानारूपसे प्रकट होनेवाला ( है ), बृहत् ऋतम् =सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥ व्याख्या-जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयंप्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं, वही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमे आहुति प्रदान करनेवाले होते हैं, वही समस्त मनुष्योंके रूपमे स्थित हैं, मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं, वही जलोंमें मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, पृथिवीमें वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमें प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं* ॥२॥
  • कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रके ये अर्थ किये हैं- १-जो सर्वथा दोषहीन सर्वसाररूप 'हंस' हैं ( ह चासौ-दोषहीनश्चासौ, सश्च साररूपश्च श्ति इस ), विशुद्ध (वायु) में स्थित शुचिषद् हैं, अन्तरिक्षमें स्थित सर्वोपरि सुखस्वरूप वसु ( व=वर, सु+सुख, यस्य स वसु ) हैं, समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता होता हैं, सबके द्वारा सम्मान्य वेद्य वेदिषत् हैं, घरोंमें अतिथि हैं या महान् ऐश्वर्यरूप ( अति-महान्, थ-सम्पत्ति-ऐश्वर्य ) हैं, सोमरूपसे कलशमें स्थित दुरोणसत् हैं, जो मनुष्योंमें हैं, उनसे श्रेष्ठ देवताओंमें हैं, वेदोंमें ऋत या सत्यरूप हैं, महान् प्रकृतिमें या श्रीमें हैं, जलसे उत्पन्न

२२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ प्राणम् = (जो) प्राणको, ऊर्ध्वम् = ऊपरकी ओर, उन्नयति = उठाता है (और); अपानम् = अपानको, प्रत्यक् अस्यति = नीचे ढकेलता है, मध्ये = शरीरके मध्य (हृदय) में, आसीनम् = बैठे हुए (उस), वामनम् = सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी, विश्वे देवाः = सभी देवता, उपासते = उपासना करते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल रहे हैं। इस प्रकार शरीरके अदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारूरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण मन बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृ-देवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं ॥ ३ ॥ अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ अस्य = इस, शरीरस्थस्य = शरीरमें स्थित, विस्रंसमानस्य = एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जानेवाले, देहिनः = जीवात्माके; देहात् = शरीरसे, विमुच्यमानस्य = निकल जानेपर, अत्र = यहाँ (इस शरीरसे), किम् परिशिष्यते = क्या शेष रहता है, एतत् वै = यही है, तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था) ॥ ४ ॥ व्याख्या—यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत शरीरमें क्या वच रहता है ? देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता, पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वका पुन दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं— न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ हन्त तं इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ कश्चन = कोई भी, मर्त्यः = मरणधर्मा प्राणी, न प्राणेन = न तो प्राणसे (जीता है और), न अपानेन = न अपानसे (ही), जीवति = जीता है, तु = किंतु, यस्मिन् = जिसमें, एतौ उपाश्रितौ = (प्राण और अपान) ये दोनों आश्रय पाये हुए हैं, इतरेण = (ऐसे किसी) दूसरेसे ही, जीवन्ति = (सब) जीते हैं, गौतम = हे गौतमवंशीय, गुह्यम् सनातनम् = (वह) रहस्यमय मत्स्यादिमें हैं, पृथ्वीसे उत्पन्न वृक्ष-अन्नादिमें हैं, पर्वतोंसे उत्पन्न नदा आदिमें है, जो मुक्त पुरुषोंमें है (मुक्तोंको 'ऋता' कहते हैं, उनमें रहकर जो उनका नियन्त्रण करता है, वह ऋतजा है), और परम सत्य है तथा सब गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। २—जो गमन करनेवाला है, आकाशमें चलनेवाला सूर्य है, आकाशमें व्याप्त वायु है, पृथ्वीमें रहनेवाला होता—अग्नि है, कलशमें स्थित सोम है, घरोंमें रहनेवाला ब्राह्मण अतिथि है, मनुष्योंमें गमन करनेवाला, देवताओंमें जानेवाला, यज्ञ या सत्यमें निवास करनेवाला, आकाशमें चलनेवाला, जलमें शङ्ख-सीपी आदि रूपोंमें उत्पन्न होनेवाला, पृथ्वीमें अन्नादिरूपसे उत्पन्न होनेवाला, यज्ञान्नरूपसे उत्पन्न होनेवाला, पर्वतोंसे नदी आदिके रूपमें उत्पन्न होनेवाला, सत्यस्वरूप और महान् है अर्थात् जगत्का एकमात्र सर्वव्यापक आत्मा है।