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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
३३४कंब रामायण

'देवता लोग आँख उठाकर भी तुम्हारी ओर नही देख सकते—क्या यह कहने मात्र से तुम्हारा काम हो गया ? आओ, यहाँ की दशा भी तो देखो।'

हे प्रलय-काल में भी न डिगनेवाले त्रिमूर्त्ति एवं देवो से भी अधिक बल से युक्त (रावण) ! 'बाघिन के पीछे-पीछे जाते हुए उसके बच्चे कभी पीड़ित नहीं होते'—समुद्र से आवृत धरती के लोगों का यह कथन भी क्या असत्य है ? आओ, मेरी इस वेदना को भी तो देखो।

हे रावण ! जब देवेन्द्र ऐरावत पर आरूढ हो देवताओ की सेना के साथ गर्जन करता हुआ युद्ध करने के लिए सम्मुख आया था, तब तुमने उसे परास्त करके भगा दिया था। हे इन्द्र की पीठ को देखनेवाले ! आओ, मेरे अपमान को भी तो देखो।

हे शिव के द्वारा प्रदत्त बड़े करवाल को धारण करनेवाले ! तुम पवन, जल, अग्नि, कालांतक यम, स्वर्ग एवं ग्रहों से अपनी सेवा कराने में समर्थ हो। क्या अब इन दो नरो के बल से परास्त हो निर्बल होकर बैठे हो ?

चलते समय जिनके भारी पैरों के पद-तल से चिनगारियाँ निकलती हैं, ऐसे मद-भरे दिग्गजों के दाँतो को तोड़नेवाले तथा पर्वतों को फोड़नेवाले कंधो से युक्त, हे बलवान् ! रूप में मन्मथ के समान होने पर भी ये मनुष्य तुम्हारे जूते के नीचे की धूल के बराबर भी नहीं हैं, क्या इनपर तुम क्रोध न करोगे ?

हाय ! क्या मधुपूर्ण सुगन्धिक पुष्प-मालाधारी देवो को मिटाने की, रावण एवं उसके भाइयो की शक्ति अब नष्ट हो गई है ? क्या अब वह शक्ति मांसमय शरीरवाले, हमारे कुलवालों का आहार बननेवाले मनुष्यो के पास चली गई है ?

युद्ध में सम्मुख पड़नेवाले, जिसे देखकर यों सदेह कर उठते हैं कि यह हर है, विष्णु है अथवा ब्रह्मा है—हे ऐसे शक्ति से संपन्न खर ! घने वृक्षों से भरे विशाल वन में एकांतवास करनेवाले मुनिवेषधारी मनुष्यो की शक्ति से, अथवा पराक्रमी राक्षसों के निर्वीर्य हो जाने से मुझपर जो विपदा आ पड़ी है, उसे तू देख।

इंद्र, हर, ब्रह्मा तथा अन्य देव जब तुम्हारी सेवा में निरत रहते हैं, सप्तलोकों के निवासी तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं, तब तुम्हारे पूर्णचन्द्र-सदृश श्वेतच्छत्र की छाया में आसीन रहते समय, तुम्हारी सभा के मध्य मैं निर्लज्ज-सी आकर किस प्रकार अपना मुख दिखा सकूँगी ?

शिव के आसन कैलास को उखाड़नेवाले हे मेरे भाई ! मेरे बल को चूर करते हुए, पदाघात से मुझे नीचे गिराकर जिस (मनुष्य) ने मेरी नाक काट दी, वह जीवित रहकर अपनी भुजा को (गर्व से) देखे और मैं नीचे गिरकर रोती रहूँ—क्या यह उचित है ? यह वन खर का है न ? तो भी क्या मुझे ये कष्ट भोगने पड़ेंगे ?

दिग्गजो के क्रोध को कम करते हुए, उनके साथ युद्ध करके उनके दाँतो को तोड़नेवाले और उससे प्राप्त यश से फूले हुए कंधोवाले हे रावण ! कामना के वशीभूत होकर मैंने नाक खोई और निर्लज्जता से जिस अपमान का भागी हो गई हूँ, इससे क्या तुम्हारा यश कलंकित नही होगा ?

अरण्यकाण्ड ३३५

दानवों के कुल को मिटाकर, इन्द्र को बन्दी बनाकर, देवों को दास बनाकर उनसे सेवा करानेवाले हे मेरे भतीजे ! अरण्य में दो मनुष्यों ने मेरे कान और नाक काट दिये हैं। क्या, मैं पापिन इस अपमान से यहाँ यों ही मिट जाऊँ ?

पूर्वकाल में, हाथ में एक ही धनुष लेकर सप्तलोकों को जलानेवाले, अशमनीय क्रोध के साथ सब दिशाओं को परास्त करनेवाले तथा इन्द्र के दोनों चरणों में श्रृंखला डालनेवाले हे मेरे भतीजे ! क्या इन मनुष्यों का पराक्रम देखने के लिए नहीं आयोगे ?

शिलाओं को भेदनेवाले शस्त्रों को धारण करनेवाले विशाल करों से युक्त, हे पराक्रमी खर-दूषण आदि ! हे अंधकार को मिटानेवाले प्रकाश से युक्त रत्नाभरणों को धारण करनेवाले राक्षसों के कुल में उत्पन्न लोगो ! लुहार के द्वारा पैनाये गये शस्त्रोंवाले कुम्भकर्ण-जैसे ही क्या तुम लोग भी धरती में कहीं सोये पड़े हो ? मेरी पुकार तुमलोग सुन क्यों नहीं रहे हो ?

यों अनेक वचन कह-कहकर वह बलवान् राक्षसी शोक-मग्न हो रोती हुई वहाँ की मनोहर आश्रम-भूमि पर लोटती रही । उस समय, अपने कर में दृढ धनुष लिये, विशाल भुजावाले, मरकत पर्वत ( सदृश राम ), ( गोदावरी ) नदी पर सन्ध्या आदि नित्यकर्म समाप्त करके वहाँ आये ।

तब वह ( शूर्पणखा ), वहाँ आनेवाले ( राम ) को मार्ग के मध्य देखकर, अपनी छाती पीटती हुई, आँखों से अश्रु की वर्षा करती हुई, अपने शोणित के प्रवाह से वहाँ की सुन्दर भूमि को कीचड़ से भरती हुई, यह कहकर कि—'हे प्रभु ! हाय ! मैं तुम्हारे सुन्दर रूप पर आसक्त होने के अपराध में इस दुर्दशा को प्राप्त हुई हूँ। यह देखो ।'—उन ( राम ) के सामने गिर पड़ी ।

प्रभु ने अपने उपमाहीन मन से समझ लिया कि बिखरे केशोंवाली इस (राक्षसी) ने कोई क्रूर कार्य किया होगा । यह भी समझ लिया कि अनुज ने ही इसके दीर्घ कान-नाक काटे हैं। फिर उस ( राक्षसी ) से पूछा—तू कौन है ?

उस प्रश्न को सुनकर क्रूर राक्षसी ने उत्तर दिया—क्या तुम मुझे नहीं पहचानते ? बैर के नाम तक को धरती पर से मिटा देनेवाले क्रोध से युक्त, भयंकर पन्नाकार भाले को धारण करनेवाले, त्रिभुवन के शासक रावण की मैं बहन हूँ ।

तब ( राम के ) यह प्रश्न करने पर कि, पराक्रमी राक्षसों के स्थान को छोड़कर हमारे तप करने के इस स्थान में तू क्यों आई ? उसने उत्तर दिया कि, हे अग्निकण के समान तपानेवाली काम-वेदना के लिए उत्तम औषधि-समान ! मैं कल भी आई थी न ?

( तब राम ने प्रश्न किया—) क्या रक्त मीन के समान चंचल, काले वर्ण से युक्त दीर्घ नयनोंवाली, मधुपूर्ण कमल में निवास करनेवाली लक्ष्मी का भ्रम उत्पन्न करनेवाली, जो स्त्री कल आई थी, वह तुम्हीं हो ?—( राम के ) यों प्रश्न करने पर उस राक्षसी ने उत्तर दिया—सुन्दर नेत्रोंवाले हे राजन् ! स्तन, ताटंक-भूषित कान और लतातुल्य नासिका को काट देने पर सुन्दरता कहाँ रह जाती है ?

यह सुनकर प्रभु, दाँतों को किंचित् खोलकर, मुस्कराये और अनुज का मुख

३३६कम्ब रामायण

देखकर पूछा—हे वीर ! इसने क्या अपराध किया था कि तुमने झट इसके कान-नाक काट दिये ? तब शूर तथा उदार गुणवाले (लक्ष्मण) ने उनके चरणों पर नत होकर कहा—

अपने तीक्ष्ण दाँतों से (मांस) खाने के उद्देश्य से या क्रूरकर्मा राक्षसों के उभारने से, न जाने किस कारण से, यह दुर्गुणवाली राक्षसी अपनी आँखों से चिनगारियाँ उगलती हुई अज्ञात रूप से आई और उत्तम गुणवाली देवी (सीता) की ओर क्रोध करके झपटी।

धनुर्धारी लक्ष्मण के अपना कथन समाप्त करने के पूर्व ही, वह क्रूर राक्षसी बोल उठी—हे ऐसे देश के अधिपति, जहाँ के जलाशयों में कीचड़ में स्थित शंखकीट को अपने पति के संग रहते देखकर गर्भिणी मंडूक-स्त्री (ईर्ष्या से) क्रुद्ध हो जल को हिलाने लगती है ! अपनी सौत को देखने पर किस स्त्री का मन क्षुब्ध नहीं होगा ?

(तब राम ने कहा—) भीरुता से (माया) युद्ध करनेवाले क्रूर राक्षसों के विशाल कुल को एक साथ मिटाने के लिए हम यहाँ उनके स्थान को खोजते हुए आ पहुँचे हैं। अब तू कुछ निंदा-वचन कहकर हमारे हाथ से अपने प्राण न गँवा। सत्य के आवासभूत इस वन को छोड़कर तू दूर भाग जा। राम के ये वचन सुनकर भी वह राक्षसी बोल उठी—

जिस बुढ़ापे में बाल पक जाते हैं और (शरीर में) झुर्रियाँ पड़ जाती हैं—ऐसे बुढ़ापे से रहित ब्रह्मा आदि सब देवता, रावण को कर देते हैं। अतः, तुमने जल्दी में जो यह काम कर दिया है, वह उचित नहीं किया। यदि तुम अपनी भलाई चाहते हो, तो सुनो, मैं एक बात कहती हूँ।

वह दशमुख इतना क्रोधी है कि जो कोई जाकर उससे यह कहे कि तुम्हारी बहन की नाक कट गई है, तो वह उस कहनेवाले की जीभ काट ले। अतः, मेरी नाक काटकर तुमलोगों ने अपने कुल की जड़ ही काट दी है। अब तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते। हाय ! अपने इस सारे सौंदर्य को तुमने धूल में मिला दिया।

अब स्वर्ग के रक्षकों (देवताओं), पृथ्वी के रक्षकों (राजाओं) और नाग-लोक के रक्षकों में ऐसा कौन है, जो अपने शिरों की रक्षा करते हुए तुमलोगों की देह की भी रक्षा कर सके ? यदि तुम मेरे प्राणों की रक्षा करो (अर्थात्, विरह-पीडा से मेरी रक्षा करो) तो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी। अन्यथा वे रावण हैं (जो तुम्हारा विनाश करेंगे)—यों उस (शूर्पणखा) ने कहा।

उसने आगे कहा—चारित्र्य की रक्षा करनेवाले अचंचल पातिव्रत्य-धर्म से युक्त स्त्रियाँ, अपने महत्त्व को स्वयं नहीं कहती हैं। तो भी मैं, तुम पर अधिक प्रेम होने के कारण, यह कह रही हूँ। क्या तुम अपने इस अनुज को नहीं बतलाओगे कि मैं देवताओं से भी अधिक बलवान् (रावण) की बहन हूँ और संसार के सब प्राणियों से अधिक बलवान् हूँ।

बड़े युद्धों में भी मैं तुमलोगों की रक्षा कर सकती हूँ। तुम्हें उठाकर गगन-मार्ग से जा सकती हूँ। मांस-सदृश स्वादवाले अनेक फल लाकर तुम्हें दे सकती हूँ। तुम्हारे

अरण्यकाण्ड ३३७

मन में जो भी इच्छा उत्पन्न हो, उसे मैं पूरा करूंगी। जो रक्षा कर सकते हैं, उनसे द्वेष करने से क्या लाभ ? और, सुमन के जैसे कोमल स्वभाववाली इस नारी से ही क्या प्रयोजन है ? कहो तो सही।

उत्तम कुल, उत्तम स्वभाव, उद्दिष्ट वस्तुओ को लाने की शक्ति, बुद्धि, आकार, यौवन—सब विषयो में मेरी समता करनेवाली कोई स्त्री पृथ्वी के निवासियो में या स्वर्ग के निवासियो में भी कौन है ?—यदि तुम समर्थ हो तो कहो।

तुमने मेरी नाक काट दी। उससे क्या हानि है ? यदि तुम मुझे स्वीकार करो, तो मैं एक क्षण में उसे उत्पन्न कर लूँगी। मेरा सौंदर्य पूर्ण हो जायगा। यदि तुम्हारी कृपा प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हो गया, तो नासिका के लोप से क्या हानि होगी ? अत्युन्नत दीर्घ नासिका भी तो स्त्रियों के लिए ( सौंदर्य का ) लोप करनेवाली ही होती है न ?

मन न मिलने पर ही तो द्वेष उत्पन्न होता है ? यदि मन मे प्रेम हो और मै तुम्हें स्वीकृत हो जाऊँ, तो मेरे प्राण भी तुम्हारे अधीन हो जायेंगे। देखनेवाले सब लोग मुग्ध होकर प्रेम करने लगें, ऐसा सौंदर्य भी विष-समान ही तो होता है, विवाह करनेवाला पति जितना सौंदर्य चाहे, केवल उतना ही सौंदर्य हो, तो क्या ( तुम ) उसे स्वीकार नही करोगे ?

शिव, कमलभव चतुर्मुख, विष्णु, विनाशकारी वज्र को धारण करनेवाला इन्द्र सब मिलकर एक रूप धारण करके खड़े हों—ऐसे रूपवाले, हे सुन्दर। सब लोको के प्राणियो को अपने अनुपम बाणो से सतानेवाला मन्मथ भी क्या तुम्हारा भाई ही है ? वह ( मन्मथ ) भी तुम्हारे इस अनुज-जैसा ही करुणाहीन है।

हे स्वर्णमय वीर-कंकण से भूषित वीरो ! तुमने यही सोचकर कि यह (शूर्पणखा) सदा के लिए इस सुन्दर रूप में हमारे पास ही रहे, अन्य कही नही जा सके और कोई इसे देखकर मोहित न हो जाय—तुमने मेरे कान-नाक काट दिये। तुमने कुछ बुरा नहीं किया। अन्यथा, मेरी नाक काटकर बड़ा छेद कर देने मे तुम्हारा अन्य क्या प्रयोजन हो सकता है ? तुम्हारा वह उद्देश्य जानकर ही अब मैं पहले से दुगुना प्रेम करने लगी हूँ। मैं क्या ऐसी निर्बुद्धि हूँ ( जो इतना भी नही समझ सकूँ ) ?

उग्र कोपवाले, शस्त्रधारी राक्षस, यह समाचार जानकर यदि लाल आँखें करेंगे, तो सारा संसार ही तुम्हारे कारण विनष्ट हो जायगा। उत्तम कुल मे उत्पन्न व्यक्ति धर्म का विचार करके ऐसा विनाश नही होने देंगे। तुम यह विचारकर यह अपवाद दूर करो और मेरा उपकार कर मेरे संग रहो—यह कहकर वह विनय करती खड़ी रही।

तब रामचन्द्र ने कहा—हे क्रूर राक्षसी ! संसार के सब प्राणियो को दुःख देनेवाली क्रूर राक्षसी तुम्हारी माता की जननी ताडका के प्राण जिस शर ने हर लिये थे, वह अभी तक मेरें पास ही है। इतना ही नही, भुजबल से युक्त तथा पुष्प-मालाओं से भूषित क्रूर राक्षसों के कुल का विनाश करने के लिए ही मैं उत्पन्न हुआ हूँ। तू अपना क्षुद्र व्यवहार त्याग दे। यह कहकर रामचन्द्र ने आगे कहा—

३३८ कंब रामायण

हम, सारी पृथ्वी का शासन करनेवाले चक्रवर्ती दशरथ के पुत्र हैं और माता की आज्ञा से सुगन्धित वन में आये हुए हैं। वेदोक्त तथा तपस्वियों के कहने से हम, अपार सेना-समुद्र से युक्त राक्षसों के वंश का विनाश करेंगे और उसके पश्चात् ही पर्वत-सदृश सौधोंवाली अयोध्या नगरी में प्रवेश करेंगे—इसे ठीक समझ ले।

राक्षसों के सम्मुख सन्मार्ग पर चलनेवाले देवता लोग खड़े नहीं रह सके और पराजित हो भाग गये, तो यहाँ ये दो मनुष्य क्या कर सकेंगे ?—ऐसा विचार मत कर। यदि तू शक्तिमान् है, तो जा, क्रोधी, तीक्ष्ण शस्त्रधारी राक्षसों में तथा बलवान् यक्षों में, जो अत्यन्त शक्तिमान् हैं, उन्हें ले आ। हम उन सबका विनाश कर देंगे।

तब उस राक्षसी ने कहा—हे धान आदि अनाजों को अधिकाधिक उत्पन्न करने-वाली जल-समृद्धि से पूर्ण देशवाले ! सुनो, यदि तुम मुझे मुँह के ऊपर ओंठ से बाहर उभरे हुए दाँतोंवाली, विकृत रूपवाली कहकर मेरा तिरस्कार न करो और मुझसे प्रेम करो, तो उन राक्षसों को अवश्य मिटा सकोगे। (उनकी) माया को यथातथ्य रूप में जान सकोगे। उनको संपूर्ण रूप से परास्त कर सकोगे। उनके क्रूर कृत्यों से तुम बच सकोगे। फिर उसने कहा—

तुम इस बाँस-सदृश कंधोंवाली को न त्यागो, तो भी मै क्या तुम्हारे लिए भार हो जाऊँगी ? यदि तुम मायावी तथा सद्ज्ञान-हीन राक्षसों से युद्ध करने का विचार करते हो, तो पंचेंद्रियों के समान विविध माया करनेवाले, उनके यंत्रों को समझकर मैं उनसे तुम लोगों की रक्षा करूँगी। 'साँप के पैर साँप ही जानता है' वाली कहावत को जानते हो न ?

यदि तुम यह सोचते हो कि हृदय से प्रेम करके ही इस (सीता) ने तुमसे विवाह किया है, तो अपने इस अनुज के साथ—जिसने इतना भी विचार न किया कि राक्षसों के साथ युद्ध करना पड़े, तो हम तीनों एक साथ मिलकर रक्त की नदियाँ बहा देंगे और राक्षसों पर विजय प्राप्त करेंगे (और मेरा अंग-भंग कर दिया)—मेरा विवाह करा दो। दो ग्रहों (सूर्य और चन्द्र) को बन्दी बनानेवाले रावण से मैं बल में कुछ कम नहीं हूँ।

जब तुम उत्सव के दृश्यों से युक्त अपने बड़े नगर में प्रवेश करोगे, तब मैं (अपनी मायाशक्ति से) मनचाहा रूप धारण करूँगी। तुम्हारा यह अनुज, शांतमन होकर भी यदि यह कहे कि इस नाककटी स्त्री के साथ कैसे रह सकता हूँ ? तो हे प्रभु ! तुम इसे समझाकर कहना कि चिरकाल से मैं कटिहीन १ स्त्री के साथ रहता हूँ।

उस (शूर्पणखा) ने जब ये वचन कहे, तब अत्यन्त क्रुद्ध हुए अनुज लक्ष्मण ने पत्राकार बरछे की ओर दृष्टि करके (राम से) कहा—हे प्रभु ! यदि इसे अभी न मार दें, तो यह बहुत पीडा उत्पन्न करेगी। कहिए, आपकी क्या आज्ञा है ? प्रभु ने कहा—यदि अब भी यह हमें छोड़कर न जाये तो वैसा ही करेंगे। तब उस राक्षसी ने यह सोचकर कि ये मुझ-पर कुछ दया नहीं करेंगे और यहाँ रहूँगी, तो मेरे प्राणों की हानि होगी।


१. शूर्पणखा सीता को 'कटिहीन' कह रही है। —अनु०

अरण्यकाण्ड ३३१

फिर, यह कहकर कि—अपनी नाक, कानो और स्तनो को खोकर भी (तुम लोगो के साथ) मैं कैसे रह सकती हूँ? तुम्हारे मन को समझने के लिए ही तो मैने यह माया की थी ? अब मै पवन से भी तेज अग्नि से भी क्रूर खर को बुला लाऊँगी, जो तुम लोगों के लिए यम बनेगा—अशमनीय बेर के साथ वहाँ से चली गई । ( १-१४३ )

अध्याय ६

खर-वध पटल

रक्त की धारा बहाती हुई, बिखरे केशोवाली, नाली-जैसे छेद से युक्त नाकवाली और विशाल मुँहवाली वह (शूर्पणखा), जाकर (जनस्थान में) स्थित भयंकर खर के चरणो पर ऐसे गिरी, जैसे कोई लालिमा से युक्त बादल हो।

'(राक्षसो के) विनाश का यह दिन है'—इस बात की सूचना देते हुए, यम की आज्ञा से बजनेवाले नगाड़े के समान, अकेली चिल्लाती हुई वह (शूर्पणखा), इस प्रकार धरती पर लुढ़कती रही, जिस प्रकार गरजते मेघ से गिरे हुए वज्र की अग्नि से जलता हुआ कोई नाग हो।

उस खर ने उसे देखा, जिसके मुँह से कठोर वचनों के अनुकूल धुआँ निकल पड़ता था और पूछा—'निर्भय होकर इस प्रकार तुम्हारा रूप विकृत करनेवाले कौन हैं?' तब नासिका-द्वार से बहनेवाले रक्त से रुँधी हुई आँखोंवाली उस (शूर्पणखा) ने कहा—

दो मनुष्य हैं, जो मुनिवेषधारी हैं, हाथो में दृढ धनुष एव करवाळ धारण करने-वाले हैं, मन्मथ के समान सुन्दर रूपवाले हैं, धर्मस्वभाववाले हैं, दशरथ के पुत्र हैं, राक्षसो के साथ युद्ध करने के विचार से उनको ढूँढते रहते हैं।

वे तुम्हारे बल की कुछ परवाह नही करनेवाले हैं। धर्म-मार्ग पर स्थिर रहकर उसकी रक्षा का विचार करनेवाले हैं, विजयशील भाले रखनेवाले राक्षसों का विनाश करने का दृढ़ निश्चय रखनेवाले हैं।

उनके साथ एक मुग्ध (स्त्री) है, जो इतनी महिलोचित सुन्दरता से पूर्ण है कि पृथ्वी में, दुर्लङ्घ्य स्वर्ग-लोक मे तथा अन्य (पाताल) लोक में, कही अन्वेषण करने पर भी उसकी समता करनेवाली स्त्री नही मिलेगी। मैने अपनी आँखों से उसे देखा है। लेकिन, उसका वर्णन मै नही कर सकती।

उसे देखकर मैंने सोचा—अन्यत्र दुर्लभ सुन्दरता से युक्त इस रमणी को मै लङ्काधीश के लिए ले जाऊँगी और उस पर झपटी। तब उन मनुष्यों ने क्रुद्ध होकर मेरी नाक काट डाली।—उसने यों कहा।

उस खर ने, जो अपने आकार से संसार को भय-विकम्पित करनेवाला था और

३४० | कंब रामायण

जिसको सामने से देखनेवालों की आँखें झुलस जाती थीं, जिसने उस (शूर्पणखा) को पहले ठीक-ठीक नहीं देखा था, अब उसके वचन सुनते ही, यह कहकर उठा कि उन विनाश को प्राप्त होनेवाले मनुष्यों के द्वारा, ताल-फल के कोए के जैसे उखाड़ी गई अपनी नाक को मुझे दिखाओ।

वह उठकर खड़ा हुआ। उसका मन ऐसे क्रोध से बोखला उठा, जो सप्त लोकों को जलाकर भस्म कर सके, और बोला—'मनुष्य-मात्र मर गये, केवल इतना कह देने से ही हमारा यह अपमान नहीं मिटेगा।'१

तब ज्योंही उसने 'रथ लाओ' कहा, त्योंही उसके निकटस्थ रहनेवाले, एक ही हाथ से सारी धरती को उठाने की शक्ति रखनेवाले, दो हाथवाले ऊँचे पर्वतों के जैसे लगनेवाले, चौदह वीरों ने (खर से) निवेदन किया कि यह (युद्ध का) कार्य हमें सौंपो।

त्रिशूल, करवाळ, तोमर, चक्र, कालपाश, गदा आदि शस्त्र हाथों में लेकर वे चले, तो उनके कोलाहल से समुद्र से आवृत्त धरती के सब प्राणी भयभीत हो उठे। उनके आकार ऐसे थे, मानो विष ही साकार बन गया हो।

जलती क्रोधाग्नि से युक्त, उन राक्षसों ने (खर से) कहा—हे वीर ! हमारी सेवा आज धन्य हुई। क्या तुम देवों से युद्ध करने जा रहे हो ? हमारे जीवित रहते यदि तुम मनुष्यों से युद्ध करने जाओगे, तो हमारा जीवन व्यर्थ होगा। यों कहकर उन्होंने उसे रोका।

तब खर ने कहा—ठीक है। अच्छा कहा, यदि मैं इन क्षुद्र मनुष्यों से युद्ध करने जाऊँ, तो देवता लोग हँसेंगे। तुम लोग जाओ। उनको मारकर उनका रक्त पियो और उस सुकुमारी को साथ लेकर आओ।

(खर के) यह आज्ञा देते ही, आनंदित होकर उन वीरों ने उसे प्रणाम किया और समाचार देनेवाली निर्लज्ज (शूर्पणखा)-रूपी यम के दूत को आगे करके, उसके पीछे-पीछे चलकर दशरथ के पुत्रों के निवास पर गये।

उस (शूर्पणखा) ने कोलाहल के साथ युद्ध के लिए आये हुए उन राक्षसों को, कमल-समान नेत्रवाले उन राम को अपनी उँगली उठाकर दिखाया, जो अकलंकमहमनाम वाले चक्रपाणी (विष्णु) के ध्यान में मग्न थे।

कुछ राक्षस कह रहे थे कि (उन मनुष्यों को) पकड़कर ऊपर उछालेंगे। फिर, हाथों में रोक लेंगे। और, कुछ कहते थे कि इन्हें दीर्घ पाश से हम बाँधेंगे। यों सब राक्षसों ने, अपने नायक (खर) की आज्ञा के अनुसार कार्य को पूर्ण करने के विचार से, पहाड़ों के जैसे आकर उन (राम-लक्ष्मण) को घेर लिया।

अपरिमित शक्तिवाले राम ने अपने अनुज को यह आदेश देकर कि देवी की रक्षा करो, उज्ज्वल कल्पवृक्ष के पुष्प-समान अपने अनुपम करों से डोरी से युक्त पर्वत-सदृश विशाल भारी धनुष को उठा लिया।

कमल-सदृश नयनोंवाले प्रभु, यों (धनुष को) उठाये, करवाल के साथ बाणों से


१ भाव यह है कि संसार के सारे मनुष्यों को मार देने से भी हमारा यह अपमान न मिटेगा।—ने०

अरण्यकाण्ड ३४१

पूर्ण तूणीर को भी लिये, उस पर्णकुटी से बाहर निकले और 'अरे ! इधर आओ ।'—यों वीर- वाद कहते हुए भुजाओं को फुलाये युद्ध करने लगे ।

परशु, करवाल, उज्ज्वल फलवाला त्रिशूल तथा भयंकर प्रलयकालाग्नि की समता करनेवाले उन राक्षसों के स्तम्भ-सदृश हाथों को लक्ष्य-वेधक शरों से काट-काटकर उन्हें धरा- शायी कर दिया ।

बड़े-बड़े शस्त्रों-सहित अपनी भुजाओं के, बड़े-बड़े वृक्षों के समान कटकर गिर जाने पर भी अपने वलिष्ठ वृक्षों को लिये हुए वे राक्षस युद्ध करने के लिए आगे बढ़े । तब वलवान् (राम) के द्वारा प्रयुक्त शर, वेग से उनमें आ लगे, जिससे उनके शिर कटकर गिर पड़े । ( यह दृश्य देखकर ) पापिनी ( शूर्पणखा ) वहाँ से भाग चली ।

गरजनेवाले, क्रोधी तथा पराक्रमी सिंह के द्वारा मत्त हाथियों के मारे जाने पर जिस प्रकार हथिनी अपनी सूँड़ को उठाकर सिर पर रखे हुए चिल्लाती हुई भाग रही हो; उसी प्रकार वह ( शूर्पणखा ) भी भागकर खर के पास गई और उज्ज्वल शूलधारी खर को उसने सब वृत्तान्त सुनाया ।

वृषभवाहन ( शिव ) के लिए भी अजेय पराक्रम से युक्त क्रूर खर नामक वह (राक्षस), यह समाचार सुनकर कि सब राक्षस मारे गये, यों क्रुद्ध हो उठा कि उसकी आँखों में रक्त उमड़ पड़ा ।

कन्दरा में रहनेवाले क्रूर सिंह भी जिससे डर जायें, ऐसा गर्जन करते हुए खर ने यह आज्ञा दी—'हे सेवको ! मेरा रथ, मेरे चढ़ने के लिए अभी लाओ । मैं युद्ध करूँगा । क्षणमात्र में सेनाओं के निवास में जाओ और मेघ के जैसे बड़े नगाड़ों को हाथियों पर घुमा- कर बजवाओ ।'

ज्योंही नगाड़ों की ध्वनि हुई, त्योंही रथारूढ राक्षसों की सेना एकत्र हो आई, मानों वर्षाकालिक बड़े-बड़े मेघ अपार रूप में घिर आये हों—यह देखकर स्वर्ग और नाग- लोक भी काँप उठे ।

युद्ध की सूचना देनेवाले बड़े नगाड़ों की ध्वनि समुद्र गर्जन के सदृश थी । ( राक्षसों की ) दीर्घ भुजाएँ समुद्र की वीचियों की जैसी थी । महान् गर्जन और मेघ- सदृश काले वर्णवाला समुद्र, प्रलयकालिक पवन से प्रताड़ित होकर उमड़ पड़ा हो—यों वह ( राक्षसों की ) सेना बड़ा कोलाहल करती हुई उमड़ आई ।

घना वन ही उड़कर गगन-तल को ढक रहा हो, (ऐसा दृश्य उपस्थित करते हुए) सर्वत्र उठी हुई ऊँची ध्वजाएँ यों नाच रही थीं, जैसे भूत ही 'हमारी भूख मिट जायगी'. इस विचार से आनन्दित होकर—नाच रहे हों ।

आलान से अभी छूटे हुए, किसी की परवाह न करनेवाले, बड़ी और लम्बी टो- टो सूँड़ोंवाले मत्त हाथियों के झुंड-सदृश वह राक्षस-सेना चल पड़ी । उनके घने शस्त्र एक दूसरे से टकरा उठते थे, तो उनमें जो चिनगारियाँ निकल पड़ती थीं, उनसे सारे वन में आग लग जाती थी ।

दोनों पाश्र्वों में 'मृदङ्ग' ( नामक वाद्य ) बज रहे थे । उनकी ध्वनि, पहियों के

३४२कंब रामायण

घूमने से आगे बढ़नेवाले रथो की ध्वनि मे दब जाती थी। उस सेना ने, करुणा की मूर्ति के समान स्थित रामचन्द्र-रूपी सूर्य को, फैले हुए अन्धकार की तरह घेर लिया।

वह दृश्य ऐसा था, जैसे सप्त लोकों में ऊँचे बढ़े हुए सब पर्वत एक ही स्थान पर इकट्ठे हो गये हो, जिससे बड़े-बड़े सर्पों के द्वारा अपने शिरो पर धारण की हुई यह धरती डोल-डोलकर अपनी पीठ झुकाने लगी।

व्याघ्र-समूह है ? घनघटा है ? गरजते हाथियो का झुड है ? ऊँचे पर्वत हैं ? नही तो सिंहो की सेना है ?—यो सदेह उत्पन्न करते हुए शस्त्रधारी राक्षसों की सेना हजारों की सख्या में आ पहुँची।

(जब राक्षसो की उस सेना मे ऐसे रथ थे, जिनमे) कुछ मे शरभ जुते थे, कुछ मे सिह जुते थे, कुछ में बलवान् हाथी जुते थे, कुछ में बाघ जुते थे, कुछ मे श्वान जुते थे, कुछ में शृगाल जुते थे, कुछ में भूत जुते थे, कुछ मे घोडे जुते थे।

कुछ मे वृषभों के झुंड जुते थे, कुछ मे शूकर जुते थे, कुछ मे वायु-रूपी पिशाच जुते थे, कुछ में गर्दभ जुते थे, कुछ मे वाज जाति के पक्षी जुते थे। वे (रथ) ऐसे थे कि क्षण-भर मे ही सारे ससार मे घूम आ सकते थे।

इस प्रकार के रथों के समुदाय घिर आये। छोटी आँखो और लाल मुखवाले हाथियो के झुंड घिर आये। अपने पैरो से वायु के जैसे अतिवेग से दौड़नेवाले घोड़े घिर आये। उस समय शख बज उठे।

परशु, वरछे, करवाळ, वक्रदड, तोमर, भाले, भुशुडि, जो (शत्रु के) शरीर-भर को आवृत करनेवाले थे, गदाएँ, त्रिशूल, मूसल, काल-पाश—

कुंतक, कुलिश, दंड, भिदिपाल, असख्य धनुष, शर, चक्र, 'वलै', उज्ज्वल शखो के समुदाय, 'कप्पण' पाश—

इत्यादि शस्त्र ऐसे प्रकाशवाले थे कि सूर्य और अग्नि भी उन्हे देखकर मंद पड़ जाते थे, जिनमे (शत्रुओ का) मास और रक्त लगे थे, जो देवो को पीडा देनेवाले थे, जो विजयसूचक पुष्प-माला से अलंकृत थे, घिर आये।

अनेक सहस्र हाथियों के बल से युक्त, विशाल पृथ्वी को निगल सकनेवाले मुँह से युक्त, और अग्नि उगलनेवाली आँखोवाले चौदह राक्षस उस सेना के नायक थे।

विद्वानो का कथन है कि इस सेना-वाहिनी मे एक-एक दल की सख्या साठ लाख थी और उसमे ऐसे चौदह दल थे।

वे सेना-नायक अपार बल से युक्त थे, वज्र-समान घोष करनेवाले मुँह से युक्त थे, सब शस्त्रो के प्रयोग में कुशल हाथोंवाले थे। वे इतने ऊँचे थे कि मेघ, पर्वत-शिखर की भ्रांति से, उनके शिर पर विश्राम करते थे। वे गर्वी थे और उत्साहित मनवाले थे।

उनके आकार अंतरिक्ष को मापते थे। एनके वद्ध नेत्रों की परिधि मे नही आते थे। अपने पैरो से सारी धरती को नाप सकते थे। बड़े पराक्रमवाले थे। देवो के साथ असख्य युद्धों मे उन्होंने विजय प्राप्त की थी।

अरण्यकाण्ड ३४३

उनके कंधे इतने दृढ तथा बलवान् थे कि इन्द्र आदि के द्वारा फेंके गये बड़े शस्त्र उनपर लगकर चूर-चूर होकर छितरा जाते थे। उनकी कठोर आज्ञा ऐसी थी कि यम भी उनके चरणों पर गिरकर उनकी अधीनता स्वीकार करता था। वे ऐसे थे, मानों भयंकर अग्नि ही साकार हो गई हो।

वे शूल, पाश, घने लाल केश, क्रूर नेत्र और खड्ग दंतों से युक्त थे। वे इतने काले थे कि उनके सन्मुख विष भी सफेद जान पड़ता था। अपनी शक्ति से काल भी उन्हे अपना काल समझकर डरता रहता था। वे ऐसे रूपवाले थे।

वे वीर-कंकणधारी थे। पुष्पमालाधारी थे। कवच से आवृत वक्षवाले थे। उज्ज्वल आभरण-भूषित थे। कुंचित भुकुटिवाले थे। अग्नि-सदृश (लाल) केशवाले थे। उनके मन युद्ध की कामना से उनके लिए उमंग से भर जाते थे। अपने में वे लोग बड़ी एकता रखते थे।

अतिदृढ दंत और मद-स्रावी हाथीवाला इन्द्र भी उनके सम्मुख आ जाय, तो वह भी भयभीत होकर, पीठ दिखाकर, भाग खड़ा होगा। तीनो नश्वर भुवनो में युद्ध करने का मौका न पाकर उनके पर्वत-जैसे कंधे खुजलाते रहते थे।

हाथी, घोड़े, भूत, वानर, बलवान् सिंह, क्रोधी भालू, श्वान, व्याघ्र, शरभ—ये अग्नि-सदृश चमकते तथा भयजनक मुखवाले तथा क्षीर-समुद्र में उत्पन्न हलाहल के समान नयनवाले थे।

कोई आठ हाथोवाले थे। कई सात हाथोवाले थे। कई नेत्रो से अग्नि उगलने-वाले सात-आठ मुखोवाले थे। बलिष्ठ टाँगोंवाले थे। प्राणियो को अपने दीर्घ करो से उठाकर मुँह में ठूँसकर चबा जानेवाले थे। विनाशहीन थे।

यक्षो से छीनकर लाये गये, असुरो से दिये गये, देवो को डराकर उनसे बलात् लिये गये, अश्रान्त गन्धवों को भगाकर उनसे छीनकर लाये गये, करुणाळु सिद्धो को सताकर उनसे लिये गये—

मयूर-पक्ष, ध्वजा, छत्र, चामर, हाथियो पर रखने योग्य बड़ी पताकाएँ, वितान तथा अन्य अनेक राजचिह्न, विना व्यवधान के, सर्वत्र शोभायमान थे और गगनतल मे व्याप्त होकर ससार-भर में सूर्य का-सा प्रकाश फैला रहे थे।

वे चौदह सेनापति चौदहो भुवनो को जीतनेवाले थे। वे सैनिक परशुधारी थे, करवाळधारी थे, उज्ज्वल त्रिशूलधारी थे और सिंह और व्याघ्र के समान हिंस्र क्रोधवाले थे।

वे धनुर्धारी थे। वडे खडगो से युक्त थे। ओठो पर रखे (ओठो को चबाते हुए) दाँतोवाले थे। मेरु पर्वत को भी उखाड़ने की शक्ति रखते थे। अश्व-जुते रथोवाले थे। अपने कहे अनुसार करने की धृति और इच्छा-शक्ति रखते थे। ऐसे सैनिक सब दिशाओ से आकर एकत्र हुए।

शत्रुओ के प्राणो को उनके शरीरो से पृथक् करनेवाले और विजयमाला से भूषित त्रिशूलो को धारण किये हुए, दृढता से युक्त दूषण, त्रिशिरा इत्यादि अनेक राक्षस-नायक कोलाहल से भरी, नगाड़े बजानेवाली सेनाओं को लेकर आ पहुँचे।

३४४कंब रामायण

समृद्ध तथा शत्रुविनाशक सेना-रूपी विशाल समुद्र जब खर-रूपी गगनस्पर्शी मेरु को घेरकर चला और जब उस सेना के मध्य मे रथारूढ होकर वह ( खर ) निकला, तब उस दृश्य को देखकर सब काँप उठे।

निर्झरों के सदृश मद-स्रावी हाथी, अश्व, स्वर्ण-कलशो से भूषित रथ, राक्षस—इन (चतुर्विध) सेनाओ के अभियान से जो धूलि आकाश मे व्याप्त हुई, उससे सूर्य का स्वर्ण-रथ और हरित अश्व भी श्वेत वर्ण हो गये ।

क्रोध-भरी, विशाल समुद्र के समान फैली हुई सेना के चलने से जो धूलि-समुदाय उठा, उससे सब कानन धूलिमय हो गये । पर्वतो पर एव गगन मे स्थित बादल भी धूसर हो गये । समुद्र पट गये । अब और क्या कहा जाय ।

हत्या करने में, विष के समान उग्र मनवाले राक्षस, भूमि पर एव आकाश में रिक्त स्थान न रहने से पर्वतो के शिखरो को ऐसे लाँघते चले आये, जैसे उन पर्वतो पर दूसरे पर्वत चल रहे हो।

माया-बन्धन के कारण उत्पन्न कर्म-परिणाम को मिटा देनेवाले, आसक्तिहीन महा-पुरुषों के लिए भी अवार्य, शरीर के साथ उत्पन्न होकर उनके प्राणो को यम के हाथ सौंपने-वाली व्याधि के समान वह राक्षसी (शूर्पणखा) आगे-आगे आ रही थी। वह राक्षस-वाहिनी उदार महाप्रभु ( राम ) के निकट आ पहुँची।

उनके चापो की ध्वनि से आकाश के बादल भी काँप उठत थे। दीर्घ धनुषो के टंकार से वज्र भी भय-विकम्पित हो उठते थे। कोलाहल से समुद्र भी डर से उपशान्त हो जाता था। यो वह राक्षस-सेना उस वन में स्थित दोनो वीरो के आवास पर आ पहुँची।

( उस वन के ) पक्षी तथा मृग ( उस सेना को देखकर ) भय से व्याकुल हुए। उनके मुँह सूख गये। उनके शरीर शिथिल पड़ गये। वे उसास भरने लगे। उनकी आँखो पर अँधेरा छा गया। यो वे कही भी रुके बिना भागते चले आये और वे क्रूर राक्षसो की सेना के आगमन की सूचना देनेवाले गुप्तचरो के समान लगते थे।

उस वन के शरभ, सिंह आदि ऐसे डरकर भाग रहे थे कि धूलि-पुंज उड़कर सर्वत्र छा गये। उनके पैरो-तले दबकर वृक्ष और झाड़ चडचड़ाहट के साथ टूट गये। उन मृगो को देखकर पुष्ट भुजाओवाले राम-लक्ष्मण ने सोचा कि राक्षस-सेना उनपर चढ़ाई करने आ रही है।

विद्युत् के जैसे प्रकाशमान धनुषवाले, अतिदृढ कवचवाले, कटि में बँधे करवाल-वाले, स्वर्णमय किनारे से युक्त तूणीरधारी और क्रोधाग्नि से जलते मनवाले लक्ष्मण, स्वय पहले युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर राम के निकट आये और यह कहकर खडे हो गये कि आप यही रहे और मेरे युद्ध-कौशल को देखें। तब अपने अनुज को देखकर प्रभु कहने लगे—

हे वीर ! सन्मार्गगामी महातपस्वियो को मैने पहले वचन दिया है कि मैं राक्षसो के प्राण हरूँगा, उसको अयथार्थ न करने के लिए इस राक्षस-दल को मैं ही मारूँगा। सहज सुवासित तथा पुष्पालंकृत कुतलोवाली देवी सीता की रक्षा करते हुए तुम यही रहो। मै यही चाहता हूँ—यो (राम ने) कहा।

आरण्यकाण्ड ३४५

जिस सेना के आगमन से वृक्षों से भरे कानन में बड़ा मार्ग हो गया था, उस (सेना) को खर की सेना समझकर, कालवर्ण कमल-सदृश नेत्रवाले प्रभु ने अशैथिल बल-युक्त अपने कंधे पर बाणों से पूर्ण तूणीर बाँध लिया। कर में चाप धारण किया। सुदृढ कवच को भी पहन लिया और खड्ग भी (कटि में) बाँध लिया।

फिर, लक्ष्मण ने राम से प्रार्थना की—हे सिंह-सदृश बलशाली ! यदि युद्ध में अजेय स्वर्गलोकवासी और इस लोक के सब प्राणी भी अधिकाधिक संख्या में युद्ध करने आयें, तो भी उन सबकी आयु (मेरे हाथों) समाप्त हो जायगी। यह बात अब मुझे आप से कहने की आवश्यकता नहीं है न ? यह युद्ध मेरे लिए छोड़ दें और मेरी भुजाओं को सतानेवाले आलस्य को दूर कर दें।

लक्ष्मण ने यह कहा। किंतु, राम इससे सहमत नहीं हुए। तब लक्ष्मण, जो राम की उन्नत पर्वत-सदृश भुजाओं के बल को पहचानता था और अपने भाई की आज्ञा को टाल नहीं सकता था, अपने सुन्दर करों को जोड़कर सीता देवी के निकट उनकी रक्षा के लिए खड़ा हो गया, जो अपनी आँखों से अश्रुधारा को धरती पर गिराती हुई खड़ी थी।

वह सीता, जो उस लता के सदृश थी, जिसमें ताटंकों से शोभित एक चन्द्रमा पुष्पित हुआ था, व्याकुल हो खड़ी रही और अनुपम धनुर्धारी मेरु-जैसे रामचन्द्र, मेघों के समान गर्जन करनेवाले, खड्ग-दंतोंवाले राक्षसों के सामने पर्णकुटीर से यों निकल आये, जैसे कोई सिंह पर्वत की कंदरा से निकल पड़ा हो।

गगन तक बढ़े हुए बाँसों की झुरमुट में उत्पन्न होकर उसको जला देनेवाली अग्नि के समान अपने कुल का सर्वनाश करनेवाली वह राक्षसी (शूर्पणखा), पर्णशाला से निकले हुए राम की ओर संकेत करके बोली कि हमारा शत्रु यही राम है।

स्वर्णमय रथ पर, गगन को छूते हुए खड़े रहनेवाले, पर्वत-सम कंधोंवाले उस विजयी खर नामक राक्षस ने, जिसको देखकर सहस्रकिरण भी भय से हट जाता था, (राम को) देखा और अपने सैनिकों से कहा—मैं अकेला ही इनसे युद्ध करके, इस मनुष्य के बल को मिटाकर विजय-माला धारण करूँगा।

यह मनुष्य तो अकेला ही है और यहाँ पर आई हुई बलवान् राक्षस-सेना इतनी विशाल है कि इसके लिए वन में स्थान ही नहीं है। जब संसार के लोग इस दशा पर 'अहो !' कहेंगे (अर्थात्, आश्चर्य प्रकट करेंगे) तब मेरी विजय क्या रह जायगी ? अतः, तुम सब लोग यहीं देखते हुए खड़े रहो। मैं अकेले ही (हमारे लिए) भोज्य मांस से विशिष्ट इस मनुष्य के प्राणों को पी जाऊँगा।

तब अकंपन नामक विवेकवान् राक्षस, यह वचन सुनकर उसके निकट आया और कहने लगा—हे स्वामी ! हे वीरों में महावीर ! मेरा एक निवेदन है। युद्ध से अत्यन्त उग्र होना उचित ही है। तो भी इस समय अनेक दुःशकुन हो रहे हैं।

हे वीर ! मेघ, गरजकर रक्त की वर्षा कर रहे हैं। सूर्य के चारों ओर परिवेष-मंडल पड़ा है। कौए लड़ते और रोते हुए आपकी ध्वजा से टकरा रहे हैं और धरती पर गिर रहे हैं। इन बातों पर ध्यान दीजिए।

३४६ | कंब रामायण

खड्गों की धार पर मक्खियाँ भनभना रही हैं। सेना के वीरो की वाम भुजाएँ और वाम नेत्र फड़क रहे हैं। बलिष्ठ भुजाओवाले सेनापतियों के अश्व ऊँघते हुए गिर पड़ते हैं। श्वानों के साथ शृगाल-दल भी मिलकर आये हैं और रो रहे हैं।

हथिनियाँ मद-जल बहा रही हैं। विशाल गंडवाले हाथियों के दाँत टूटकर गिर रहे हैं। धरती काँप रही है। उन्नत आकाश से बिजलियाँ गिर रही हैं। दिशाएँ अकस्मात् जल उठती हैं। सबके शिरो की पुष्प-मालाओ से मास की दुर्गंधि निकल रही है।

ऐसे लक्षणों के उत्पन्न होने के कारण, इसे अकेला मनुष्य कहकर इसकी उपेक्षा न कीजिए। मेरा कथन सत्य है। यदि हमसब एक साथ युद्ध करने लगें, तो भी इसे परास्त नहीं कर सकते। हे विजयमालाधारी ! मेरे वचनों को क्षमा कर दो। यो अकंपन ने कहा।

यह वचन सुनते ही खर हँस पड़ा, जिससे सारा संसार काँप गया। फिर, वह बोला—मेरा दृढ पराक्रम पत्थर का वह सिल है, जिसपर देवता पिस चुके हैं। युद्ध की कामना से फूली हुई मेरी भुजाएँ क्या एक क्षुद्र मनुष्य के आगे नीची होकर रहेगी ?

खर के इस प्रकार कहते ही क्रोधभरी राक्षस सेना ने दशरथ पुत्र को ऐसे घेर लिया, जैसे घुँघराले केसरों से शोभायमान सिंह को क्रुद्ध गज-समूह ने घेर लिया हो। उस समय उनके भयकर शस्त्र एक दूसरे से टकराकर वज्र-सी ध्वनि कर उठे।

यो उस सेना के घेरते ही राम के हाथ में स्थित धनुष के सिर झुक गये। उस समय जो युद्ध हुआ और उसका जो परिणाम हुआ, इसका वर्णन हम करेंगे। राम के वेगवान् बाणों की नोक से दौड़नेवाले अश्व छिद गये और धरती पर लोट गये। लाल बिंदियो से भरे मुखवाले हाथी ऐसे गिरे, जैसे वज्र से आहत पर्वत हों।

(राक्षसो के) त्रिशूल छिन्न हुए। अग्नि-ज्वाला उगलनेवाले फरसे टूट गये। करवाल टुकड़े-टुकड़े हो गये। गदाएँ चूर-चूर हुईं। भिदिपाल मिट गये। बाण विनष्ट हुए। शरीर को चीर देनेवाले भयंकर भाले तहस-नहस हुए। धनुष एव बरछे भी चूर-चूर हो उड़ गये।

वीर-कंकण टूटे। हाथो के साथ तोमर भी टूटे। गजों के पैर टूटे। धुरियो के साथ रथ और उनपर की ध्वजाएँ टूटी। अश्व टूटे, (शरभ आदि) जन्तुओ के दलो के शिर टूटे। मूसल जड़ से टूट गये।

रामचंद्र के बाण, जीनवाले अश्वो तथा काले वर्णवाले मदजल-स्रावी, दीर्घ सूँड़वाले, पर्वत-समान हाथियों को भेदकर पार कर जाते थे और सब दिशाओं में छितरा जाते थे। निरंतर बरसनेवाली वर्षा के जल के समान रक्त, धरती पर फैल गया। राक्षसों के शोभाहीन वक्ष खुल गये। उनके शिर कटकर (धड़ से) पृथक् हो गये।

राघव ने एक, दस, सौ, सहस्र, कोटि—यों गणना के लिए दुसाध्य कठोर शरों के सिलसिले को जारी रखा। उन बाणो ने राक्षसो को मारकर पर्वत-शिखरो एवं अनेक पर्वतो के समुदाय के समान शव-राशियों की पंक्तियाँ लगा दीं।

अरण्यकाण्ड ३४७

तड़पते हुए कबंधो की राशियाँ, बहती हुई रक्त-धारा के साथ, ऐसा दृश्य उपस्थित करती थी, जैसे अरण्य के घने वृक्षों की शाखाएँ दावाग्नि मे जल रही हो, गगन में उड़नेवाले राम-वाण ऐसे लगते थे, जैसे मृत (राक्षसों) के प्राणो का भी पीछा करते हुए जा रहे हो।

युवतियो के दीर्घ नयनो के समान ही राम के वाण, करवालो के साथ ही राक्षसो के करो के गिरने पर, उनके कंठों के कट जाने पर, कवच से आवृत देहो के छिद जाने पर, उनके शिरो को भी भीषण रूप मे छितराते हुए जलकर दिगंतो को भी पारकर जाते थे।

वर्षा के सदृश राम-बाण, पर्वत-समान राक्षसों के विशाल शरीर-रूपी तटो के मध्य तालाब बना रहे थे, नदियाँ बना रहे थे, रण में रक्त-प्रवाह को भर रहे थे और यों उस स्थान में वन के दृश्य को मिटा रहे थे (अर्थात्, वहाँ के वन को रक्तमय जलाशयो मे परिवर्तित कर रहे थे)।

उस समय, विशाल रक्त-समुद्र तरगायमान हो उठे। राक्षसों के शिर उस (समुद्र) में उतराने लगे। उनकी दीर्घ मांस पेशिया उतराने लगी। दीर्घ सूँड़वाले पर्वत-जैसे हाथी उतराने लगे। झपटकर चलनेवाले घोड़े उतराने लगे। ध्वजाओ के साथ रथ भी उतराने लगे।

उस समय, अनेक बलवान् राक्षस, ज्वाला उगलनेवाली दृष्टि से देखकर, गरजकर, किसी विशाल अचल पर्वत को घेरकर, बरसनेवाले मेघ-जैसे, तीक्ष्ण बाण आदि उग्र शस्त्रो को (राम पर) बरसाने लगे।

राम ने अपने बाणो से बरसनेवाले शस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, अनेक शस्त्रों को विभिन्न दिशाओं में छितरा दिये और बिखरे रक्त-केशोवाले काले राक्षसो के शिरो को काट-काटकर यों गिरा दिया, जिससे भूमि (उन शिरों के भार से) अपनी पीठ को झुकाने लगी और वन (उन शिरों से) भर गया।

उस समय कबध नाच उठे, हाथी लाल शोणित की धाराओ में गोतं लगाने लगे, भयंकर भूत, बैर-भरे क्रोधवाले एवं क्रूर कार्य करनेवाले राक्षसों की चरबी को भर पेट खाकर आनन्द मनाने लगे, (मृत हो स्वर्ग मे आये हुए वीर) प्राणियों के भार से देवलोक की भी देह झुक गई।

मायावी, दर्प तथा कपट से भरे, वक्र दंतोवाले राक्षसों की उन आँखो की पुतलियो को, जिनको देखकर गरुड भी भयभीत हो जाता था, अब काक निकाल-निकाल-कर खाने लगे। अंधकार के समान वंचको के मध्य विनाश अनायास ही पहुँच जाता है; क्योकि कृपामय धर्म को छोड़कर अन्य कौन-सी वस्तु बलवान् हो सकती है?

तब (अनेक राक्षमो के) घने अंधकार को मिटाकर प्रकाशित होनेवाले सूर्य के जैसे धनुर्धारी (राम) को क्रोधी राक्षसों ने चमकते बरछे-जैसे अपने नेत्रों से देखा और काली तथा विशाल घनघटा-जैसे युगान्त में पत्थरो की वर्षा करे, वैसे ही सर्व प्रकार के शस्त्रो को उन (राम) पर बरसाकर युद्ध किया।

धनुर्धारी (राम) ने झुड बाँधकर आये राक्षसों को; पृथक्-पृथक् आकर सामना करनेवाले (राक्षसों) को; अत्यत क्रोध से झपटनेवाले (राक्षसो) को, पहले पराजित हो

३४८ | कंब रामायण

भागकर दुबारा युद्ध करने के लिए आनेवाले (राक्षसो) को, अपने तीक्ष्ण बाणों से इस प्रकार काटकर गिरा दिया कि यह विदित नही होता था कि किसने भाला फेंका, किसने तीर छोड़ा, किसने प्रयुक्त करने के लिए शस्त्र उठाया, किसने कौशल से कार्य किया या किसने नही किया ।

काकुत्स्थ (राम) ने बाणों से जो शिर काटें, उनमें से कुछ मेघ-मंडल में जा पहुँचे, कुछ समुद्र के किनारे के प्रदेशों में जा गिरे, कुछ चन्द्र को घेरे हुए नक्षत्रों में जा पहुँचे, कुछ उज्ज्वल कुंडल-भूषित मिथुन नामक राशि में जा पहुँचे, कुछ भीषण अरण्यों में जा गिरे, कुछ पर्वतो पर जा गिरे ओर कुछ दिशाओं की सीमाओं पर स्थित दिग्गजों के निकट जा गिरे।

वे (राम के) बाण, जो राँक्षसो के, मेरु का भी उपहास करनेवाले, अतिदृढ वक्षों को भेदकर आर-पार हो जाते थे और क्षतो से बहनेवाली रक्त-रूपी ऊँची तरंगों से पूर्ण नदियों को उमड़ा देते थे, कुछ मेघों पर जा लगते थे, कुछ चन्द्र से युक्त गगन में जा लगते थे और कुछ समुद्रों के बाहर एव भीतर जा लगते थे ।

सुन्दर मौलीधारी एव अग्नि-ज्वालाओं को उगलती आँखोंवाले सब राक्षस, सुदृढ तथा तीक्ष्ण शक्तियों को प्रयुक्त करके, (राम के) शर से आहत होकर अपने राक्षस-शरीर को समुद्र में छोड़ देते थे और अबिनश्वर (देव) शरीर को पाकर देवों के साथ मिल जाते थे और यह कहकर कि राक्षस लोग मिट गये, आनन्द-ध्वनि करने लगते थे ।

वहाँ विशाल तरंगों से भरे अनेक ऐसे रक्त-समुद्र उत्पन्न हो गये, जिनमें (राक्षसों के) यकृत्-रूपी कमल थे, रथ-रूपी पुलिन थे, बलवान् गज-रूपी मगरों के झुंड तैर रहे थे, भारी आँत-रूपी घने तथा हरे कमल-पत्र ऊपर की ओर फैले थे और जिनमें भूत स्नान करते थे ।

प्राणहारी अग्रभागों से युक्त (रामचन्द्र के बाण-रूपी) बौछार के गिरने से कुछ (राक्षस) हाय-हाय कर उठे, कुछ मूच्छित हो गिर पड़े, कुछ मिट गये, कुछ उसास भरने लगे, कुछ लौट गये, कुछ लुढ़क गये, कुछ कीचड़-भरे एव गहरी लहरो से युक्त रक्त-समुद्र म डूब गये, कुछ धरती पर पड़े रहे, कुछ टुकड़े-टुकड़े हो रहे ।

तत्र विष के समान क्रूर चौदहो सेनापति ऐसे उठ आये, जिससे विशाल क्षीर-समुद्र को मथनेवाले (देव तथा असुर) भी भयभीत हो उठे। वे (सेनापति) निहत होकर गिरे हुए राक्षसो का उपहास करने लगे। दृढ़ पहियोंवाले रथों पर आरूढ होकर बरछे ओर करवाल लिये हुए तथा धनुष धारण करके अपार समुद्र-जैसी सेना-वाहिनी को लेकर एक साथ आ पहुँचे ।

पूर्व समय में एक बार पर्वत को धनुष बनाकर आये हुए शिव को त्रिपुरासुरों ने जिस प्रकार घेर लिया था, उसी प्रकार प्रभु (राम) का आदर न करनेवाले वे राक्षस, मन की क्रोधाग्नि को आँखों से निकालते हुए आये और कालमेघ-सदृश धनुर्वीर (रामचंद्र) को घेरकर युद्ध करने लगे।

चन्द्रकला-समान खड्गाटतीवाले राक्षसों में से कुछ ने बाण का प्रयोग किया, कुछ ने वक्र दंडों का प्रयोग किया। कुछ ने अनेक शस्त्रों से प्रहार किया। कुछ ने निन्दा-

अरण्यकाण्ड ३४६

वचन कहे। कुछ ने धमकियाँ दीं। यो सबने पर्वतो के जैसे आकर ( गम कां ) घेर लिया।

( रामचन्द्र के ) धनुप पर चढ़कर निकले हुए बाणो से ( उन राक्षमो के ) रथो में जुते घोड़े सब धराशायी हो गये। सब मत्तगज वलि चढ़ गये। मजीर-भूषित घोड़ो के गिर उनकी धड़ों से अलग हो गये। जिस प्रकार उष्णकिरण ( सूर्य ) को घेरनेवाला परिवेष-मडल शीघ्र ही मिट जाता है, उसी प्रकार वचे-खुचे राक्षसो के पैर उखड़ गये और वे काँपते हुए भाग खडे हुए।

मूर्च्छित हुए क्रूर राक्षमो के शरीरो में जहाँ-जहाँ शरों की बौछार लगने से छेद हो गये थे, वहाँ-वहाँ से रक्त के प्रवाह उमड़कर बह चले और उज्ज्वल धरती को आवृत करने लगे। विस्तृत गगन में स्थित देवताओ ने अपनी आँखो को ( करो से ) ढक लिया। यम के दूत, अतिवेग से आनेवाली हवा के समान आकर ( उन राक्षसो के ) प्राण हरने लगे।

भूतो के अधिक संख्या में आने का कारण वननेवाले उस घोर युद्ध के उन्माद से भरे उन ( राक्षसों ) के कदराओ-जैसे मुँहो में श्वान आ घुसे। उनके शिरो पर शृगाल आ चढ़े। अग्नि के जैसे, वलिष्ठ सिंहों के जैसे और मेघ मे उत्पन्न होनेवाले वज्र के जैसे जो राक्षस घेरकर आये थे, वे ( गम के) अग्नि उगलनेवाले तीक्ष्ण मुखो से युक्त बाणो की सहायता से स्वर्ग मे चढ़ गये।

उन ( राक्षसों ) के शिर विखर गये। अग्निकण विखेरनेवाली आँखे विखर गईं। धरती पर पहाड़ो के समान हाथी विखर गये। ( राम के ) मेघ-सदृश धनुप से विच्छिन्न वाण सब दिशाओ मे विखर गये और चिनगारियाँ विखेरनेवाले पृथ्वी-जैसे राक्षमो के शरीरो से प्राण बिखर गये।

वे चौदह बड़े सेनापति, उनके रथ एव उनके बड़े शस्त्र—इनके अतिरिक्त, बड़े कोप के साथ ( राम के ) सम्मुख आये हुए सब राक्षस उन वीर के बाणो से निहत होकर दुर्गंध-भरे भीषण रक्त- प्रवाह में डूब गये।

उन चौदहो सेनापतियों ने चारो ओर देखा। किंतु, अपने साथ आई सेना मे एक भी ऐसे सैनिक को नही देखा, जिसका सिर उसकी धड़ से अलग न हुआ हो। इससे अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने दाँतो को पीसते हुए अपने रथो को बड़े वेग के साथ चलाते हुए रामचन्द्र को घेर लिया।

तब राम ने एक क्षण में अपने बाणो से उनके चौदहो रथो को विध्वस्त कर दिया। तब वे विध्वस्त रथ, चक्र, घोडे, सारथि, सब प्रलय-काल में प्रभंजन से फेंके गये पर्वतो के जैसे फैल गये।

उनके रथ जब नष्ट हो गये, तब वे चौदहो सेनापति पृथ्वी पर ऐसे कूद पड़े कि धरती धँसने लगी। वे अपने हाथो मे दृढ़ धनुषो को लेकर, अपनी आँखो से सबको भस्म कर देनेवाली अग्नि-ज्वालाएँ उगलते हुए वज्र-जैसे शरों को लगातार बरसाने लगे।

राम ने अपने तीक्ष्ण बाणो से उनके विध्वसकारी शरी को चूर-चूर कर दिया। उनके चौदहों धनुषों को तोड़कर उनकी युद्ध की उग्रता को शान्त कर दिया।

३५०कंब रामायण

तब वे सब सेनापति धनुषो के खो जाने से अत्यन्त क्रुद्ध होकर, बड़ी शिलाओ को लेकर, आकाश में उड़ गये और सूर्य की कांति के समान ज्वाला उगलनेवाली शिलाओं को (राम पर) बरसाने लगे।

शास्त्र-रूपी समुद्र को पार करनेवाले ज्ञानवान् प्रभु ने, प्राणहारी धनुष के साथ अपनी भौहों को भी झुकाकर उनपर पत्राकार चौदह भयंकर बाण छोड़े, जिससे वे पर्वत-खंड एवं उन सेनापतियों के शिर पृथ्वी पर आ गिरे।

इस प्रकार वे चौदहो सेनापति मरकर गिर पड़े। तब अन्य एक राक्षस-सेना, अनेक शस्त्रों को उछालती हुई तथा अपनी आँखों से अग्नि उगलती हुई रामचन्द्र के सम्मुख आ गईं और पृथ्वी पर, गगन मे एवं सब दिशाओं में फैल गई। यह देखकर देवता काँप उठे।

तब बड़े नगाड़े गर्जन कर उठे। बड़े हाथी गर्जन कर उठे। दृढ़ धनुषों की डोरियाँ गर्जन कर उठीं। शंखो के साथ अश्व भी गर्जन कर उठे। मेघ-गर्जन के समान राक्षसो की गर्जन-ध्वनि भी होने लगी।

राक्षसो के द्वारा फेंके गये, गगन-मार्ग से आनेवाले शस्त्र, वीर (राम) के बाणों से कटकर कही अपने ऊपर न आ गिरें, यह सोचकर देवता लोग भाग जाते थे। समस्त लोक काँप रहे थे। निष्कंप रहनेवाले दिग्गज भी आँखें बंद कर लेते थे।

उस उत्तम सेना का सेनापति तीन शिरोंवाला (त्रिशिर नामक) राक्षस था। जो अपार बल-सपन्न था स्वर्ण-मुकुटधारी था, अपने धनुष से तीक्ष्ण नोंकवाले बाणों की वर्षा करनेवाला था और त्रिनेत्र के हाथ में रहनेवाले त्रिशूल के जैसा आकारवाला था।

उस राक्षस-वीर के साथ, प्रलयकालिक महासमुद्र के समान सब दिशाओं से उमड़कर आई हुई उस राक्षस-सेना के बीच में धनुष को लिये, अपनी समता स्वयं करनेवाले वीर (रामचन्द्र) ऐसे लगते थे, जैसे घने अंधकार के मध्य दीप हो।

उज्ज्वल करवालधारी, वज्र-सदृश घोषवाले, भारी कवच से आवृत, तथा क्रूर नेत्र-वाले उस राक्षस (त्रिशिरा) की सेना पर राम अपनी शरवाहिनी चलाते हुए खड़े रहे।

तब उन राक्षसों के पैर, भुजाएँ, करवाल, परसे, उनकी कटि और उनके छत्र—सब-के-सब कटकर गिर गये।

जब ध्वजाएँ और कठोर क्रोधवाले अश्वों की पंक्तियाँ विध्वस्त हो गई, तब बड़े-बड़े रथ धरती पर गिर गये और भारी तथा बलिष्ठ मत्तगज वज्रपात से टूटकर गिरनेवाले पर्वत-शिखरों के समान लुढ़क गये।

शिर कट जाने पर कुछ राक्षस यह न समझते हुए कि उनके शिर कट गये हैं, अपने विजयी धनुष से शर छोड़ते ही रहे। जिनके शिर अभी कटे नही थे, वे गगन में छाये मेघों के समान अपने शस्त्र चला रहे थे।

ढाल लिये हुए विशाल हाथो, पर्वत-समान भीम आकारवाले तथा स्वर्णमय कवच धारण करनेवाले महावीरों के शिरोहीन धड़ तड़पते, उछलते हुए ऐसे नाच उठे कि नूपुरो से भूषित अप्सराएँ भी वह नाच देखकर मुग्ध हो गईं।

अरण्यकाण्ड ३५१

चामर एवं श्वेतच्छत्र-रूपी फेनवाले, गज-रूपी ऊँची पीठवाले, डूबते-उतराते मीनो से युक्त भँवरवाले तथा शीतल घाटो मे विविध रत्न-समुदाय को लाकर छितरानेवाली जीन, हौदा आदि नौकाओवाले रक्त के प्रवाह मे जा मिलते थे और उसे नया रूप (अर्थात्, रक्तवर्ण) दे देते थे।

दृढ वक्र दतोवाले कुछ राक्षस (राम के) अति तीक्ष्ण बाणो से मृत होकर देवता बन गये और भ्रमरो को आकृष्ट करनेवाली पुष्पमालाओ से शोभित केशोंवाली अप्सराओ के साथ रहकर अपने ही कबंधी का नाच देखने लगे।

कुछ राक्षस देवो के संघ मे मिल गये और उत्तम कंकणों से भूषित अप्सराओं के साथ रहकर यह देख रहे थे कि उनकी ही मृत देह की छिन्न भुजाओ को किस प्रकार एक ओर से भूत पकडकर खाने लगते हैं और दूसरी ओर श्वान उन्ही टुकड़ों को पकड़कर खींच रहे हैं। यह देख-देखकर वे हँस पड़ते थे।

कुछ राक्षस, जिनके वक्ष, चुनकर प्रयुक्त किये गये रामचंद्र के बाणो के लगने से छिद गये थे और जो (राक्षस) कर्म-बन्धन से मुक्त होकर देवता बन गये थे, यह सोचकर मन में भय करने लगे कि अहो ! राक्षसो की सेना विशाल है और राम तो एकाकी हैं, अब क्या होगा ?

शुण्डधारी गज-सदृश वीर (राम) के वे बाण, जो कंटको (राक्षमो) के शरीरों को छिन्न-भिन्न कर रहे थे, नीच तथा काले मनवाले, झूठी गवाही देनेवाले व्यक्ति के वचनों के जैसे थे।

जिस प्रकार मनोहर पंखवाला भ्रमर अपनी शरण में पडे हुए कीड़ों को अपने रूप मे परिवर्तित कर देता है, उसी प्रकार उदार प्रभु ने मायावी राक्षसो को घेरकर अपने उत्तम शरों के पवित्र प्रभाव से देवो में परिवर्तित कर दिया।

वहाँ की रक्त की नदियाँ, मानो यह विचार कर कि एक बलवान् मनुष्य ने अनेक राक्षसो को मार दिया है, यह समाचार विजय-माला से भूषित रावण को देना चाहिए— क्रोधी राक्षसो के शवों को बहाती हुई (समुद्र मे गिरकर) लका में जा पहुँची।

चारो ओर छुटी हुई राक्षस-सेना को (राम के) बाणो ने सर्वत्र छिन्न-भिन्न करके उनके प्राणों को पी लिया, जिससे वह (सेना) धरती पर लोट गई, यह देखकर त्रिशिर ने क्रुद्ध होकर भी विलव किये विना, रक्त-प्रवाह में निमग्न अपने रथ को गगन-मार्ग से चलाता हुआ गर्जन किया।

स्थिर रथवाले उस राक्षस ने, सबके लिए दृढ सत्य का साक्षी बनकर रहनेवाले, उस धर्म-स्वरूप चक्रवर्त्ती के कुमार (राम) के शरीर को, गगन की वर्षा की तरह अपने तीक्ष्ण बाणो की वर्षा से ढक दिया।

राम ने, (राक्षस के द्वारा) बरसाये गये उन सब बाणो को अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया। फिर, चौदह बाणो से (उस राक्षस के) उज्ज्वल स्वर्णमय रथ को ध्वस्त कर दिया और उसके सारथी को भी निहत कर दिया।

इतना ही नही, उसी क्षण, देवो के कोलाहल-ध्वनि करते समय, (राम ने)

३५२ | कम्ब रामायण

स्वर्ण के जैसे चमकते हुए तीक्ष्ण फलवाले अनुपम बाणों से क्रूर कार्य करनेवाले उस राक्षस के मुकुटधारी (तीन) शिरों में से, एक को छोड़कर, दो को काट गिराया।

तब वह राक्षस रथ-हीन हो गया और उसका त्रिशिर नाम भी निरर्थक हो गया। तो भी उसकी क्रूरता नही मिटी। जैसे गगन से काला मेघ उतरा हो, त्योंही उसने अपने वक्र धनुष से बाण-पुंज (राम पर) उतारे।

त्रिशिर, ललाट पर भौंहों को चढ़ाकर, प्रलय-काल की वर्षा की तरह शरों की घनी वर्षा करनेवाले धनुष को लेकर युद्ध करने लगा। तब जिस प्रकार प्रभंजन मेघ को बिखेर देता है, उसी प्रकार राम ने अपने अवार्य बाणों से उस (राक्षस) का धनुष काट दिया।

यद्यपि उस (राक्षस) ने अपना धनुष खो दिया, तथापि घूरनेवाले उसके चमकते मुख का प्रकाश कम नहीं हुआ। उसकी मेघ-गर्जन की-सी ध्वनि भी मंद नहीं पड़ी। उसका भुजबल मंद नहीं पड़ा। उसके द्वारा राम पर बरसाये जानेवाले पत्थर भी कम नहीं हुए और चाक के जैसे उसका परिभ्रमण भी मंद नहीं पड़ा।

गगन में स्वयं एकाकी रहकर भी उसने ऐसा माया-युद्ध किया, जैसे दो सौ व्यक्ति मिलकर युद्ध कर रहे हों। तब उसके दोनों पैरों को राम ने दो तीक्ष्ण बाणों से काट दिया और दो बाणों से उसकी भुजाओं को भी काट दिया।

भुजाओं और पैरों से हीन होकर वह (राक्षस) तीक्ष्ण दाँतों को बाहर किये, पर्वत-कंदरा समान एवं मांस-दुर्गंध से युक्त अपने मुख को खोले हुए, रामचन्द्र पर गिरकर उन्हें निगलने को आया। उसे देखकर राम ने किंचित् भी दया किये बिना, अपने दीर्घ विजयशील धनुष से एक बाण प्रयुक्त कर उसके एक शिर को भी काट दिया।

त्रिशिर पर्वत-शिखर की भाँति ज्यों ही भूमि पर गिरा, त्योंही, सूर्य के जैसे चमकते हुए करवाल धारण किये, अपने विशाल हाथों में ढालों को लिये हुए, बाकी बचे हुए राक्षस, दूषण नामक सेनापति के मना करने पर भी वहाँ रुके नहीं, किंतु भाग खड़े हुए। उनके दीर्घ पैर, विशाल रक्त प्रवाही में आँतों के मध्य उलझ जाते थे।

यह दृश्य देखकर, आकाश में झुंड बाँधकर स्थित देवता ताली बजाकर कोलाहल कर उठे। कुछ राक्षस, आदिशेष के फन पर स्थित धरती को दबाते हुए भाग चले और वहाँ फैली हुई चर्बी में फिसलकर उसमें डूब गये। कुछ राक्षस अपने सुरक्षित प्राणों के साथ भागे और शव के ढेरों से टकराकर लुढ़क गये।

कुछ राक्षस भागते हुए, धरती पर पड़े बरछे और करवाल की धारों से उनके पैर कट जाने से ढीले हो पड़े। कुछ, मृत राक्षसों के रक्त-प्रवाह में पैर फिसल जाने से डूब गये। कुछ, भय के मारे रक्त-सागरों में कूदकर तैरने लगे, किंतु वे कहीं स्थिर खड़े नहीं रह सके।

कुछ ऐसे भाग रहे थे कि उनके कटि के वस्त्र और खड्ग विगलकर गिर जाते थे और उनके पैरों में उलझकर उन्हें काटने लगते थे, तो भी वे उनपर ध्यान न देते थे। वे भय की मूर्त्ति-से बने, मुख श्वासाकुल होकर जहाँ-तहाँ शरों के छत्र पर लगे हुए उत्तम वीर (राम) के बाणों की प्रेरणा से, बाणों वाले से वेगवाला दौड़कर भाग निकलते थे।

अरण्यकाण्ड ३५३

अतिवेग से भागनेवाले कुछ राक्षस, बड़े हाथियो के पेट में पड़े छतो के द्वार-रूपी कदराओं में अपने खड्ग-सहित घुस जाते थे और पास खड़े कवध को देखकर यह कहकर सिर पर अपने हाथ जोड़ लेने थे कि—हे मेरे साथी, तुम यही कहना कि तुमने हमको नही देखा है।

इस प्रकार भागनेवाले राक्षसो को देखकर, अति वेगवान् अश्वो से जुते रथ पर आरूढ दूषण ने कहा—हमारे पराक्रम के योग्य युद्ध-कौशल से हीन इस मनुष्य को देखकर मत डरो। मै जानता हूँ कि डर का कोई कारण नही है। मै कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनो।

जो लोग अपयश देनेवाले भय को मन मे रखकर जीते हैं, उनसे सुन्दर कंगन पहननेवाली स्त्रियाँ भी नही डरती हैं। धैर्य-रूपी कवच ही वास्तव में रक्षा कर सकता है। भय प्राणी की रक्षा कभी नही कर सकता।

पूर्वकाल मे, तीक्ष्ण भाले को धारण करनेवाले इन्द्र तथा अविनाशी त्रिदेवो के साथ हुए युद्ध मे कौन राक्षस डरकर भागा था ? कदाचित् तुम लोगो ने, तुमसे डरकर भागनेवाले देवो से अब यह (डरकर भागना) सीख लिया है, इसीलिए अब यो भ्रात हो रहे हो।

तुम इतने बड़े वीर हो। फिर भी एक मनुष्य से हारकर, अपने हाथ मे शस्त्र रखे, नगर मे जाकर छिपने के लिए भाग रहे हो। तुम अपनी मदमाते नयनोवाली पत्नियो के वक्ष से वक्ष मिलाकर आलिंगन का सुख भोगने जा रहे हो ?

हे वीरो। (क्रोध से) ताम्रवर्ण रहनेवाली तुम्हारी आँखें अब दूध के समान श्वेत पड़ गई हैं। अहो! क्या तुम लोग अपनी स्त्रियो को, घने वन मे भागते समय वृक्ष की शाखाओ के टकराने से अपनी पीठ पर लगे छतों को दिखाओगे, या अपने वक्ष पर लगे शरो के छत को दिखानेवाले हो।

'इस हमारे शत्रु, मनुष्य का युद्ध-पराक्रम उन देवो के लिए भी दुष्प्राप्य हैं'—(शत्रु की) ऐसी प्रशंसा का कारण बनकर, इस प्रकार पीठ दिखाकर तुम्हारा भागना—अजेय भुजबल से युक्त, तुम्हारे कुल के नायक (रावण) की बहन (शूर्पणखा) की नाक कटने की बात छोड़ भी दो, तो भी यह हमारे अपयश का कारण बन रहा है। अब इससे बढ़कर दयनीय दशा और क्या हो सकती है ?

अद्भुत शस्त्र-प्रयोग मे निपुण, धीरता-पूर्ण युद्ध-कार्य से जीविका-निर्वाह करने-वाले, शत्रुओ से छीनकर लिये गये करवालों को धारण करनेवाले, हे राक्षसो। अब क्या तुम लोग मोती आदि को बेचकर वणिक्-वृत्ति करनेवाले हो ? या तीक्ष्ण बरछे, करवाल आदि से पृथ्वी को जीतकर कृषक-वृत्ति करनेवाले हो ? बताओ तो सही।

यो कहकर उसने आगे कहा—तुम लोग कुछ समय तक खड़े रहकर मेरे दीर्घ धनुष का प्रभाव देखो। फिर, वह (दूषण) स्वय अपनी तरंगायमान समुद्र-सदृश सेना को लेकर (राम के) सम्मुख जाकर आक्रमण करने लगा। वह दृश्य देखकर देवता लोग भी मूर्च्छित हो गये। तब राम ने भी उससे यह कहकर कि—'अपने को भली भाँति बचाओ'—आगे पग बढ़ा दिया।