काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
काश्यपसंहिताया विषयानुक्रमणिका
सूत्रस्थानम् ।
| विषय | पृ. | ^१पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| लेहाध्यायः । | शुद्धक्षीरस्य लक्षणम् | १२ | ६ | ||
| लेहनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १ | १ | अशुद्धक्षीरसेवनदोषास्तेषां शान्तिश्च | १३ | १ |
| कश्यपस्योत्तरम् | २ | १ | वज्रस्य (स्तनकीलकस्य) संज्ञाहेतुसंप्राप्ति-लक्षणानि | १३ | ३ |
| गर्भिण्या रसधातोस्त्रिधा विभागः | २ | २ | वज्रस्य चिकित्सा | १४ | ५ |
| देहिनां प्रकृत्यभिनिर्वृत्तौ हेतुः | २ | ४ | नार्याः स्तनोपरि दुष्टदृष्टिपातस्तच्चिकित्सा च | १५ | २ |
| देहप्रकृतेर्भेदाः | २ | ४ | दन्तजन्मिकाध्यायः २० । | ||
| देहप्रकृत्याश्रिता भेषजकल्पना | ४ | १ | दन्तजन्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १५ | ८ |
| वयोभेदेन बालेषु भेषजमात्रानिर्देशः | ४ | २ | कश्यपस्योत्तरम् | १६ | १ |
| लेहनायोग्या बालाः | ५ | ६ | दन्तानां भेदाः, संज्ञाः, उत्पत्तिकालश्च | १६ | १ |
| बालानां सात्म्यान्येवान्नपानान्युपयोज्यानि | ६ | १ | कुमारीणां कुमाराणां च दन्तजन्मनि विशेषः | १७ | १ |
| लेहनविधिः | ६ | ३ | दन्तानां निषेकोद्भेदादौ हेतुः | १७ | २ |
| बालानां सुवर्णप्राशनगुणाः | ६ | ५ | दन्तानां निषेककालः | १८ | १ |
| बालानां मेधाजनना लेहाः | ७ | २ | अप्रशस्तं दन्तजन्म, तच्छान्तिश्च | १८ | १ |
| बालानां लेहनार्थम् अभयं घृतम् | ७ | ६ | चतुर्विधं दन्तजन्म | १८ | ५ |
| बालानां लेहनार्थम् संवर्धनं घृतम् | ८ | ३ | सामुद्रसंवृतविवृतानां दोषाः | १८ | ५ |
| बालानां लेहनार्थम् ब्राह्मयाद्यं घृतम् | ८ | ५ | मासविशेषेण दन्तनिषेकस्य दोषा गुणाश्च | १८ | ७ |
| क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ । | दन्तसंपत् | १८ | १० | ||
| स्कन्दादिग्रहदूषितधात्रीदुग्धलक्षणम् | ९ | १ | अप्रशस्ता दन्ताः | १८ | १२ |
| रसवर्णाभ्यां धात्र्याः क्षीरपरीक्षा | ९ | ५ | चूड़ाकरणीयाध्यायः २१ । | ||
| दुष्टक्षीरस्य संशोधनम् | ९ | ६ | कर्णपालीवर्धनोपायाः | २१ | १ |
| क्षीरवर्धनम् | १० | ५ | अभिषजः कर्णवेधननिषेधः | २१ | ४ |
| क्षीरविशोधनो गणः | १० | ८ | स्नेहाध्यायः २२ । | ||
| क्षीरशोधनकालिक आहारः | ११ | २ | स्नेहस्य योनिर्विकल्पाश्च | २३ | ३ |
| क्षीरसंशोधनकाले वर्जनीयानि | ११ | ३ | स्थावरस्नेहाः | २३ | ३ |
| क्षीर-प्रजनन-वर्धनानि | ११ | ४ |
१. अत्र सर्वत्र पङ्क्तिसंख्यागणनायां केवलं संस्कृतमूलश्लोकगद्यस्थितपङ्क्तीनामेव ग्रहणम् ।
५६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| औद्भिदाः स्नेहाः | २३ | ४ | जीर्णस्नेहलक्षणम् | ३३ | ३ |
| घृततैलवसामज्ज्ञां पूर्वपूर्वस्य श्रेष्ठत्वम् | २३ | ५ | स्नेहावपीडगुणाः | ३३ | ६ |
| घृतगुणाः | २४ | १ | स्नेहापचारजा रोगाः, तच्चिकित्सा च | ३३ | ८ |
| तैलगुणाः | २४ | ३ | स्नेहव्यापद्धेतुस्तच्चिकित्सा च | ३४ | ३ |
| मज्जावसोर्गुणाः | २४ | ४ | स्नेहविचारणायोग्या नराः | ३४ | ५ |
| तिलतैलघृतप्रयोगप्रशंसा | २४ | ५ | प्रमेहादिषु स्नेहने विशेषविधिः | ३४ | ८ |
| ऋतुविशेषेण स्नेहविशेषोपयोगः | २५ | १ | स्नेहनस्वेदनविशोधनक्रमः | ३५ | १ |
| स्नेहविशेषेणानुपानविशेषः | २५ | ३ | स्वेदाध्यायः २३ । | ||
| उष्णोदकानुपानगुणाः | २५ | ५ | स्वेदविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३५ | ४ |
| उष्णोदकनिर्माणविधिः | २५ | ६ | कश्यपस्योत्तरम् | ३५ | ७ |
| उष्णोदकानुपानं येषां निषिद्धम् | २५ | ७ | स्वेद्या नराः | ३५ | १० |
| ओदनादिभिः स्नेहप्रयोगविधानम् | २६ | १ | दोषविशेषेण स्वेदविशेषः | ३५ | ११ |
| प्रकृतिविशेषेण स्नेहप्रयोगकालः, ततोऽन्यथा प्रयोगे दोषाश्च | २६ | ३ | शरीरावयवविशेषे स्वेदविशेषः | ३६ | २ |
| स्नेहाच्छपाने त्रिविधा मात्रा, तद्योग्या नराश्च | २७ | १ | स्वेदनसमये नेत्रादिसंरक्षणविधिः | ३६ | ३ |
| त्रिविधस्नेहमात्राणां गुणाः | २८ | १ | स्वेदनिर्वर्तनकालः | ३७ | ३ |
| घृतपानयोग्या नराः | २८ | ५ | अतिस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च | ३७ | ४ |
| तैलपानयोग्याः नराः | २८ | ७ | मन्दस्विन्नस्य लक्षणं चिकित्सा च | ३७ | ८ |
| वसापानयोग्याः नराः | २९ | १ | सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम् | ३८ | १ |
| मज्जपानयोग्याः नराः | २९ | ३ | अस्वेद्या नराः | ३८ | ३ |
| स्नेह्याः नराः | २९ | ५ | स्वेद्या नराः | ३८ | ५ |
| अस्नेह्याः नराः | ३० | १ | स्वेदस्यादौ भेदाः | ३९ | २ |
| अस्नेह्यानामच्छस्नेहपानाद्दोषाः | ३० | ५ | हस्तस्वेदविधिः | ३९ | ३ |
| अस्निग्धस्य लक्षणम् | ३० | ७ | अवहितेन बालेषु स्वेदो योज्यः | ४० | १ |
| स्निग्धस्य लक्षणम् | ३० | ८ | प्रदेहस्वेदविधिः | ४० | ७ |
| अतिस्निग्धस्य लक्षणम् | ३० | ९ | नाडीस्वेदविधिः | ४१ | १ |
| स्नेहपानात् पूर्वदिने कर्तव्यम् | ३१ | १ | प्रस्तरस्वेदविधिः | ४१ | २ |
| स्नेहपीतस्य विहारः | ३१ | ३ | सङ्करस्वेदविधिः | ४२ | १ |
| कोष्ठभेदेन स्नेहनकालः | ३१ | ४ | उपनाहस्वेदविधिः | ४२ | ३ |
| मृदुकोष्ठस्य लक्षणम् | ३१ | ५ | उपकल्पनीयाध्यायः २४ । | ||
| अजीर्णस्नेहलक्षणम् | ३२ | ३ | सम्यक्शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः | ४३ | १ |
| स्नेहजीर्णाजीर्णविशङ्कायां चिकित्सा | ३२ | ४ | अन्नसंसर्जनक्रमव्यभिचारजा रोगाः | ४५ | ७ |
| तैलादीनामजीर्णे विशेषलक्षणानि | ३२ | ६ | शुद्धस्य शीतपानान्नादिसेवनजा रोगाः | ४६ | २ |
| स्नेहाजीर्णे चिकित्सा | ३३ | १ | सम्यग्जीर्णान्निलक्षणम् | ४६ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| अजीर्णत्रिलक्षणम् | ४६ | ४ | विषूचिकाया लक्षणानि | ५१ | ६ |
| अजीर्णस्य चत्वारो भेदाः | ४७ | १ | अलसकस्य लक्षणानि | ५१ | ७ |
| आमविदग्धसश्लेष्मरसशेषाजीर्णानां लक्षणानि | ४७ | २ | नेत्रामयानां लक्षणानि | ५२ | १ |
| कण्ड्वाः लक्षणानि | ५२ | २ | |||
| अजीर्णानां सामान्यलक्षणम् | ४७ | ३ | आमस्य पूर्वरूपाणि | ५२ | ४ |
| अजीर्णानां साध्यासाध्यविचारः | ४७ | ४ | पाण्डुरोगस्य लक्षणानि | ५२ | ६ |
| अजीर्णानां चिकित्सा | ४७ | ७ | कामलायाः लक्षणानि | ५२ | ७ |
| सम्यक्कृतसंशोधनगुणाः | ४८ | ३ | मदात्ययस्य लक्षणानि | ५२ | ८ |
| वेदनाध्यायः २५ । | उरोघातस्य लक्षणानि | ५३ | १ | ||
| अवचसां बालानां वेदनाज्ञानविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४८ | ८ | जन्तुकार्दितस्य लक्षणानि | ५३ | ३ |
| ग्रहाबाधायाः पूर्वरूपाणि | ५३ | ४ | |||
| कश्यपस्योत्तरम् | ४९ | १ | बालरोगाणां सामान्यासाध्यत्वलक्षणानि | ५३ | १३ |
| शिरोरुजाया लक्षणम् | ४९ | २ | बालरोगाणामुपक्रमाः | ५४ | ३ |
| कर्णवेदनायाः लक्षणम् | ४९ | ३ | चिकित्सासंपदीयाध्यायः २६ । | ||
| मुखामयस्य लक्षणम् | ४९ | ४ | चिकित्सायाश्चत्वारः पादाः | ५४ | ६ |
| कण्ठवेदनायाः लक्षणम् | ४९ | ५ | भिषजो गुणाः | ५५ | ३ |
| अधिजिह्विकायाः लक्षणम् | ४९ | ६ | भेषजसंपत् | ५५ | ७ |
| गलग्रहस्य लक्षणम् | ४९ | ७ | आतुरसंपत् | ५६ | १ |
| कण्ठश्वयथोः लक्षणम् | ४९ | ७ | परिचारकसंपत् | ५६ | ४ |
| ज्वरपूर्वरूपाणि | ४९ | ८ | चतुःषु पादेषु भिषजः श्रेष्ठत्वम् | ५७ | १ |
| अतिसारस्य पूर्वरूपाणि | ५० | २ | रोगाध्यायः २७ । | ||
| शूलिनो बालस्य लक्षणानि | ५० | ३ | रोगाणां प्रभेदविषये महर्षीणां मतानि | ५८ | ३ |
| छर्देः पूर्वरूपाणि | ५० | ४ | रोगाणां असंख्येयत्वे हेतुः | ५८ | ९ |
| श्वासस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ५ | रोगाणां अधिष्ठानद्वयम् | ५८ | १० |
| हिक्कायाः पूर्वरूपाणि | ५० | ५ | व्याधेः प्रकृतेश्च लक्षणम् | ५८ | ११ |
| तृष्णायाः पूर्वरूपाणि | ५० | ६ | रोगाणां द्विविधा प्रकृतिः | ५९ | २ |
| आनाहस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ७ | वातादिदोषाणां शरीरे विशिष्टस्थानानि | ५९ | ३ |
| अपस्मारस्य पूर्वरूपाणि | ५० | ८ | निजागन्तुरोगयोर्विशेषः | ६० | १ |
| उन्मादस्य रूपाणि | ५० | ८ | ओजसः स्वरूपम् | ६० | ३ |
| मूत्रकृच्छ्रस्य रूपाणि | ५० | ९ | ओजसो वर्धनानि | ६१ | १ |
| प्रमेहस्य रूपाणि | ५१ | १ | वातादिसाम्यवैषम्ययोः फलम् | ६१ | २ |
| अर्शसां रूपाणि | ५१ | ३ | आविष्कृततमानां व्याधीनां स्थूलतः कथनम् | ६१ | ३ |
| अश्मर्याः रूपाणि | ५१ | ४ | अशीतिवातविकाराणां नामतो निर्देशः | ६१ | ४ |
| विसर्पस्य पूर्वरूपाणि | ५१ | ५ | वायोः स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च | ६३ | १ |
५६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| चत्वारिंशत्पित्तविकाराणां नामतो निर्देशः | ६३ | ५ | शुभाशुभानि स्फिगलक्षणानि | ६९ | १६ |
| पित्तस्य स्वरूपं, कर्म, उपक्रमाश्च | ६४ | १ | शुभाशुभानि कुकुन्दरलक्षणानि | ६९ | १८ |
| कफजविंशतिविकाराणां नामतो निर्देशः | ६५ | १ | शुभाशुभानि जघनलक्षणानि | ६९ | १९ |
| श्लेष्मणः स्वरूपं, कर्माणि, उपक्रमाश्च | ६५ | ४ | शुभाशुभानि वृषणलक्षणानि | ६९ | २० |
| वातपित्तश्लेष्मणां विशिष्टोपक्रमाः | ६६ | १ | शुभाशुभानि प्रजननलक्षणानि | ६९ | २३ |
| एकविधा व्याधयः | ६६ | ३ | शुभाशुभानि मूत्रलक्षणानि | ६९ | २४ |
| द्विविधाः | ६६ | ५ | शुभाशुभानि योनिलक्षणानि | ७० | १ |
| त्रिविधाः | ६६ | ६ | शुभाशुभानि रोमराजिलक्षणानि | ७० | ४ |
| चतुर्विधाः व्याधयः | ६६ | ८ | शुभाशुभानि कुक्षिलक्षणानि | ७० | ६ |
| पञ्चविधाः व्याधयः | ६६ | १० | शुभाशुभानि उदरलक्षणानि | ७० | ७ |
| षड्विधाः व्याधयः | ६६ | १० | शुभाशुभानि नाभिलक्षणानि | ७० | ११ |
| सप्तविधाः व्याधयः | ६६ | ११ | शुभाशुभानि पायुलक्षणानि | ७० | १३ |
| अष्टविधाः व्याधयः | ६६ | १२ | शुभाशुभानि पार्श्वलक्षणानि | ७० | १३ |
| दशविधाः व्याधयः | ६६ | १२ | शुभाशुभानि पृष्ठलक्षणानि | ७० | १४ |
| विंशतिविधाः व्याधयः | ६६ | १२ | शुभाशुभानि अंसलक्षणानि | ७० | १५ |
| उपद्रवलक्षणम् | ६७ | १ | शुभाशुभानि कक्षालक्षणानि | ७० | १७ |
| उपद्रवचिकित्साविचारः | ६७ | २ | शुभाशुभानि बाहुलक्षणानि | ७० | १८ |
| रक्तजविकाराणां हेतुः | ६७ | ६ | शुभाशुभानि मणिबन्धलक्षणानि | ७० | २० |
| रक्तजा रोगाः | ६८ | १ | शुभाशुभानि यवपंक्तिलक्षणानि | ७० | २१ |
| रक्तजानां रोगाणां चिकित्सा | ६८ | ४ | शुभाशुभानि केशभूमिलक्षणानि | ७० | २४ |
| बालोपक्रमे विशेषः | ६८ | ६ | शुभाशुभानि गतिलक्षणानि | ७० | २६ |
| लक्षणाध्यायः २८ । | अप्रशस्तानि शरीराणि | ७० | २७ | ||
| बालानां शुभाशुभदेहलक्ष्णविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ६९ | १ | बालानां प्रशस्तानि रुषितादीनि | ७० | २८ |
| कश्यपस्योत्तरम् | ६९ | ३ | वक्त्रचक्षुःस्वररूपैर्वृत्तमनःसारगुणानां परीक्षा | ७४ | १ |
| शुभाशुभानि नखलक्षणानि | ६९ | ४ | सत्त्वानां भेदाः | ७४ | ३ |
| शुभाशुभानि पादलक्षणानि | ६९ | ७ | ब्राह्मसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | २ |
| शुभाशुभानि अङ्गुलीलक्षणानि | ६९ | ११ | प्राजापत्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ३ |
| शुभाशुभानि पार्ष्णिलक्षणानि | ६९ | १२ | आर्षसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ४ |
| शुभाशुभानि उत्तरपादलक्षणानि | ६९ | १३ | ऐन्द्रसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ५ |
| शुभाशुभानि गुल्फलक्षणानि | ६९ | १३ | याम्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ६ |
| शुभाशुभानि जङ्घालक्षणानि | ६९ | १४ | वारुणसत्त्वस्य लक्षणम् | ७५ | ७ |
| शुभाशुभानि जानुलक्षणानि | ६९ | १५ | कौबेरसत्त्वस्य लक्षणम् | ७६ | १ |
| शुभाशुभानि ऊरुलक्षणानि | ६९ | १६ | गान्धर्वसत्त्वस्य लक्षणम् | ७६ | २ |
| शुद्धसत्त्वस्य सामान्यलक्षणम् | ७६ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
५६५
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| आसुरसत्त्वस्य लक्षणम् | ७६ | ६ |
| राक्षससत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | १ |
| पैशाचसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | २ |
| सार्पसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ३ |
| याक्षसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ४ |
| भूतसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ५ |
| शाकुनसत्त्वस्य लक्षणम् | ७७ | ६ |
| राजससत्त्वस्य सामान्यलक्षण् | ७८ | १ |
| पाशवसत्त्वस्य लक्षणम् | ७८ | २ |
| मात्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७८ | ३ |
| वानस्पत्यसत्त्वस्य लक्षणम् | ७८ | ४ |
| तामससत्त्वस्य सामान्यलक्षणम् | ७८ | ५ |
| सत्त्वरजस्तमसां लक्षणानि | ७८ | ६ |
| सत्त्वानुरूपं देहिनामाचरणं तत्फलं च | ७९ | १ |
| समानसत्त्वाया धात्र्याः प्रशस्तत्वम् | ७९ | २ |
| नवविधसाराणां नामतो निर्देशः | ७९ | ४ |
| त्वक्सारबालस्य लक्षणम् | ७९ | ६ |
| रक्तसारबालस्य लक्षणम् | ७९ | ७ |
विमानस्थानम् ३ ।
कर्णायजयावळीवनं(?)विमानम् ? ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| अवेक्षितगदानां चिकित्सा | ८३ | १ |
शिष्योपक्रमणीयं विमानम् ? ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| शिष्योपनयनयोग्यः कालः | ८३ | ६ |
| शिष्योपनयनविधिः | ८३ | ८ |
| शिष्यगुणाः | ८५ | १ |
| गुरोर्गुणाः | ८५ | ४ |
| शिष्यानुशासनम् | ८६ | १ |
| अध्ययनविधिः | ८७ | १ |
| अनध्ययनकालाः | ८७ | ४ |
| अधीतायुर्वेदस्य कर्तव्यानि | ८७ | ८ |
| तद्विद्यसंभाषाविधिः | ८८ | ७ |
| आयुर्वेदविषये पञ्चदश प्रश्नाः | ८९ | १ |
| आयुषो लक्षणम् | ८९ | ४ |
| आयुर्वेदशब्दस्य निरुक्तिः | ८९ | ६ |
| आयुर्वेदस्याष्टावङ्गानि | ८९ | ८ |
| आयुर्वेदस्योत्पत्तिः | ८९ | १० |
| ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यैः किमर्थमायुर्वेदोऽध्येयः | ८९ | १३ |
| कौमारभृत्यतन्त्रस्याष्टस्वङ्गेष्वाद्यत्वम् | ८९ | १८ |
| आयुर्वेदस्य पञ्चमवेदत्वप्रतिपादनम् | ९० | १ |
| आयुर्वेदस्य नित्यत्वप्रतिपादनम् | ९० | ६ |
| आयुर्वेदस्य वातपित्तकफाश्रयत्वप्रतिपादनम् | ९० | ८ |
| वातपित्तश्लेष्मप्रकृतीनां लक्षणानि | ९० | १० |
शारीरस्थानम् ४ ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| ऋतुविभागः | ९५ | १ |
| युगविभागेन कालविभागः | ९५ | ४ |
| *सृष्ट्युत्पत्तिक्रमः | ९७ | १ |
| अष्टौ प्रकृतयः | ९७ | १ |
| पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि | ९७ | २ |
| पञ्च कर्मेन्द्रियाणि | ९७ | ३ |
| पञ्च इन्द्रियार्थाः | ९७ | ३ |
| मनसोऽतीन्द्रियत्वम् | ९७ | ३ |
| क्षेत्रक्षेत्रज्ञनिरूपणम् | ९७ | ४ |
| आत्मनो लिङ्गानि | ९७ | ५ |
| मनसो लक्षणम् | ९७ | ६ |
| पञ्चमहाभूतानि | ९७ | ८ |
| महाभूतानां गुणाः | ९७ | ८ |
| नव द्रव्याणि | ९७ | ९ |
| गुणानां द्रव्याश्रितत्वम् | ९७ | ९ |
| खादीनां विशिष्टा गुणाः | ९७ | १० |
| इन्द्रियाणां विप्रकृष्टसन्निकृष्टवृत्तित्वम् | ९७ | १० |
| सर्वेन्द्रियाणां स्पर्शनलक्षणत्वम् | ९७ | ११ |
असमानगोत्रीयशारीराध्यायः ?
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| गर्भाभिवृद्धिक्रमः, चतुर्थादिमासेषु गर्भिण्या लिङ्गानि च | १०२ | १ |
गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ।
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| जीवस्य गर्भेऽवक्रमणम् | १०५ | १ |
५६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|
| गर्भस्य शरीरावयवाभिनिर्वृत्तिविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १०५ | ४ |
| कश्यपस्योत्तरम् | १०५ | ७ |
| गर्भस्याकाशादिमहाभूतजाः शरीरावयवाः | १०५ | ८ |
| गर्भस्य मातृजाः | १०५ | १३ |
| गर्भस्य पितृजाः | १०५ | १४ |
| गर्भस्य आत्मजाः शारीरभावाः | १०५ | १५ |
| गर्भस्य सात्म्यजाः शारीरभावाः | १०५ | १७ |
| गर्भस्य रसजाः शारीरभावाः | १०५ | १८ |
| सत्त्वस्यौपपादुकत्वकथनम् | १०५ | १९ |
| हृदययकृत्प्लीहफुप्फुसनिरूपणम् | १०७ | १ |
| गर्भाशय-गुद-बस्तीनां निरूपणम् | १०७ | ३ |
| अष्टावाशयाः गर्भस्य मातृजाः पितृणाश्च धातवः | १०८ | १ |
| देहस्य षट्कोशवत्त्वम् | १०८ | २ |
| शरीरविचयशारीराध्यायः ? । | ||
| अवयवविभागेनास्थां गणना | १०८ | ३ |
| दश प्राणायतनानि | १११ | १ |
| त्रीणि महामर्माणि | १११ | ३ |
| कोष्ठाङ्गानि | ११२ | १ |
| प्रत्यङ्गानि | ११२ | ३ |
| द्विविधानि स्रोतांसि | ११३ | १ |
| दश मातृसिराः | ११३ | ४ |
| देहस्वरूपम् | ११४ | १ |
| धमन्यः | ११४ | ५ |
| रोमकूपानि | ११४ | ७ |
| रोमकूपेभ्यः स्वेदप्रवृत्तिः | ११४ | ९ |
| अञ्जलिप्रमेयाः शरीरधातवः | ११४ | १० |
| शुक्रप्रवृत्तिकालः | ११५ | ८ |
| महाभूतानामन्योऽन्याश्रयत्वम् | ११५ | ९ |
| देहावयवसौक्ष्म्यस्य सुदुर्वाचत्वम् | ११६ | २ |
| जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? । | ||
| स्वभावस्य मनुष्याद्याकृतिभेदनिर्वर्तकत्वम् | ११६ | ६ |
| शरीराभिनिर्वृत्तौ वायुपरमाणूनां कार्यम् | ११६ | ७ |
| स्वभावतः प्रजानिर्वृत्तौ स्त्रीपुंसयोरुपचार | ११६ | ८ |
| शुक्रशोणितयोरभिव्यक्तेः कालावेक्षितवम् | ११७ | १ |
| कदा शुक्रशोणिते पूर्णे भवतः | ११७ | ३ |
| ऋतुकालः | ११७ | ४ |
| पुत्रकामः कन्यार्थी च कदा स्त्रियमुपेयात् | ११८ | १ |
| गर्भाधानविधिः | ११९ | १ |
| पुत्रीया इष्टिः | ११९ | ६ |
| आहारस्य धातुपोषकत्वम् | १२१ | ३ |
| धातूनां धातुपोषकत्वम् | १२१ | ५ |
| धातूनां तत्समगुणैस्तत्पोषणम् | १२१ | ७ |
| गर्भिण्यै हितानि | १२३ | ३ |
| गर्भिण्या हितं वेश्म | १२३ | ४ |
| गर्भिण्या हिता चर्या | १२३ | ७ |
| आसन्नप्रसवाया लक्षणानि | १२३ | ११ |
| तत्र कर्तव्यानि | १२४ | १ |
| शीघ्रप्रसवकरा योगाः | १२६ | २ |
| प्रसवसमये कर्तव्यम् | १२६ | ४ |
| इन्द्रियस्थानम् ५ । | ||
| ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १२ । | ||
| ओषधभेषजयोर्विशेषः | १३० | ३ |
| औषधभेषजयोर्गुणालाभेऽचिकित्स्यत्वं | १३० | ५ |
| मासान्तिकं रिष्टम् | १३१ | १ |
| मासार्धिकं | १३१ | २ |
| स्कन्दादिग्रहाबाधसूचकानि स्वप्नानि | १३१ | ९ |
| अफलाः स्वप्नाः | १३३ | ५ |
| फलवन्तः स्वप्नाः | १३४ | १ |
| दुःस्वप्नफलम् | १३४ | ३ |
| शुभं स्वप्नदर्शनम् | १३४ | ५ |
| दुःस्वप्नशान्तिः | १३५ | ७ |
| चिकित्सास्थानम् ६ । | ||
| ज्वरचिकित्साध्यायः ? । | ||
| ज्वरनिदानचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १३७ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? । | वातोत्तरे प्लीहरोगे कतिपययोगाः | १५६ | ८ | ||
| परिकर्तिकाहरा योगाः | १४१ | १ | उदावर्तचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| प्रवाहिकाहरा योगाः | १४१ | ३ | आनानोदावर्त्तयोर्निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १५८ | ३ |
| कामलाहरा योगाः | १४१ | १० | उदावर्त्तभेदाः | १५८ | ९ |
| हृच्छूलहरा योगाः | १४२ | १ | उदावर्त्तस्य सामान्यलक्षणानि | १५८ | ११ |
| त्वग्वातहरो योगः | १४२ | ५ | उदावर्त्तस्य पूर्वरूपाणि | १५८ | १४ |
| ऊर्ध्वानिलहरो योगः | १४२ | ७ | उदावर्त्तचिकित्सा | १५९ | १ |
| हिक्काश्वासहरो लेहः | १४२ | ८ | राजयक्ष्मचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| दीपनीयो योगः | १४२ | ९ | राजयक्ष्मणि पिप्पलीक्षीरम् | १६१ | १ |
| गर्भिण्याः पथ्यापथ्यम् | १४२ | १० | राजयक्ष्मणि पिप्पलीवर्धमानकम् | १६१ | ५ |
| दुष्प्रजाताचिकित्सिताध्यायः ? । | राजयक्ष्मणि नागबलाप्रयोगः | १६२ | ३ | ||
| दुष्प्रजातायाः सामान्यचिकित्सा | १४३ | ३ | राजयक्ष्मणि मण्डूकपर्णीशुण्टीब्राह्मीमधुकानां प्रयोगाः | १६२ | १० |
| दुष्प्रजाताव्याधीनां निदानम् | १४३ | ४ | राजयक्ष्मणि आजं रसायनम् | १६२ | १४ |
| दुष्प्रजाताव्याधीनां नामतो निर्देशः | १४४ | ३ | राजयक्ष्मणि महाभयारिष्टः | १६३ | १ |
| दुष्प्रजातारोगेषु त्रैवृत्तस्नेहः | १४४ | ८ | राजयक्ष्मणि इन्द्राणीघृतम् | १६३ | ८ |
| बालग्रहचिकित्सताध्यायः ? । | राजयक्ष्मणि लशुनप्रयोगः | १६३ | १० | ||
| रेवत्या वरप्राप्तिः | १४६ | ३ | राजयक्ष्मणि द्राक्षासर्पिः, पीलुघृतं च | १६४ | १ |
| रेवत्या विंशतिनामानि | १४७ | १ | राजयक्ष्मणि दैवव्यपाश्रयचिकित्सा | १६४ | ३ |
| रेवतीपूजनफलम् | १४८ | ४ | गुल्मचिकित्साध्यायः ? । | ||
| रेवतीरोषजनिता रोगाः | १४८ | ९ | गुल्मस्य भेदाः | १६५ | ३ |
| रेवत्याश्चिकित्सा | १४९ | १ | गुल्मस्य सामान्या संप्राप्तिः | १६५ | ४ |
| पूतनाग्रहोत्पत्तिः | १५० | ५ | वातगुल्मस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १६५ | ५ |
| पूतनाया नामानि | १५० | १२ | गुल्मानां पूर्वरूपम् | १६६ | १ |
| पूतनाया चिकित्सा | १५० | १४ | वातगुल्मस्य लक्षणम् | १६६ | २ |
| मुखमण्डिकाग्रहोत्पत्तिः | १५३ | १ | पित्तगुल्मस्य लक्षणम् | १६६ | ४ |
| मुखमण्डिकायाश्चिकित्सा | १५३ | ११ | कफगुल्मस्य लक्षणम् | १६६ | ५ |
| शीतपूतनार्दिते बाले चिकित्सा | १५४ | ६ | सान्निपातिकगुल्मस्य लक्षणम् | १६७ | १ |
| सर्वग्रहाणां सामान्य चिकित्सा | १५५ | ३ | रक्तगुल्मस्य निदानसंप्राप्तिलक्षणानि | १६७ | २ |
| प्लीहहलीमकचिकित्सिताध्यायः ? । | गुल्मस्य साध्यासाध्यविचारः | १६८ | १ | ||
| प्लीहवृद्धिलक्षणानि | १५५ | ११ | गुल्मस्य चिकित्सासूत्रम् | १६८ | २ |
| प्लीहवृद्धौ सामान्यचिकित्सा | १५६ | ४ | वातगुल्मे दशाङ्गं घृतम् | १६८ | ४ |
| प्लीहवृद्धौ आमलकीघृतम् | १५६ | ५ |
५६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषयः | पृ. | पं. | विषयः | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| वातगुल्मे षट्पलं घृतम् | १६८ | ६ | मूत्रकृच्छ्रचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| वातगुल्मे शैशुकं घृतम् | १६९ | १ | मूत्रकृच्छ्रस्य संप्राप्तिः | १७७ | १ |
| गुल्मे संशोधनं | १६९ | ३ | दोषभेदेन मूत्रकृच्छ्रस्य लक्षणानि | १७७ | २ |
| गुल्मे भोजनम् | १६९ | ४ | मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोर्विशेषः | १७८ | ८ |
| गुल्मे पिप्पल्यादिवटकाः | १६९ | ६ | मूत्रकृच्छ्रे कतिपययोगाः | १७९ | १ |
| वातगुल्मे हितमन्नपानम् | १६९ | १० | मूत्रकृच्छ्रप्रमेहयोश्चिकित्सायां विशेषः | १७९ | ११ |
| वातगुल्मे बस्तिः | १६९ | १२ | सरक्ते मूत्रकृच्छ्रे ऊषकादियोगः | १७९ | १४ |
| वातगुल्मे हरीतकीप्रयोगः | १६९ | १३ | मूत्रकृच्छ्रेऽन्ये कतिपययोगाः | १८० | ३ |
| कुष्ठचिकित्साध्यायः ? । | शर्कराश्मर्योर्लक्षणं चिकित्सा च | १८० | १३ | ||
| कुष्ठपूर्वरूपाणि | १७१ | १ | द्विव्रणीयचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| वातपित्तकफसन्निपातोत्तराणां कुष्ठानां लिङ्गानि | १७२ | १ | व्रणविषये जीवकस्य प्रश्नाः | १८२ | ४ |
| दोषविशेषैः कुष्ठविशेषोत्पत्तिः | १७२ | ५ | कश्यपस्योत्तरम् | १८२ | ५ |
| कुष्ठेषु साध्यासाध्यविभागः | १७२ | ९ | निजागन्तुभेदेन व्रणस्य द्वैविध्यम् | १८३ | १ |
| कुष्ठानामाश्रयभूता धातवः | १७२ | १० | दोषभेदेन व्रणानां लिङ्गानि | १८३ | ४ |
| सिध्मस्य लक्षणम् | १७२ | ११ | व्रणानां नवविध उपक्रमः | १८४ | २ |
| विचर्चिकायाः लक्षणम् | १७२ | १२ | दोषभेदेन व्रणोपक्रमाः | १८४ | ४ |
| पामायाः लक्षणम् | १७२ | १२ | व्रणबन्धनविधिः | १८५ | १ |
| दद्रोः लक्षणम् | १७२ | १२ | व्रणे कल्कदानम् | १८५ | ५ |
| किटिभस्य लक्षणम् | १७२ | १३ | पच्यमानव्रणलक्षणम् | १८६ | ३ |
| कपालस्य लक्षणम् | १७२ | १४ | पक्वव्रणलक्षणम् | १८६ | ३ |
| महारुष्कस्य लक्षणम् | १७२ | १५ | तत्र चिकित्सा | १८६ | ४ |
| मण्डलस्य लक्षणम् | १७२ | १६ | व्रणे सवर्णकरणो योगः | १८७ | १ |
| विषजस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | व्रणे रोमसंजननो योगः | १८७ | ३ |
| पौण्डरीकस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | बालानामष्टौ पिडकाः | १८७ | ५ |
| श्वित्रस्य लक्षणम् | १७२ | १७ | तासां नामानि | १८७ | ६ |
| ऋष्यजिह्वस्य लक्षणम् | १७२ | १८ | शराविका-कच्छपिका-जालिनी-सर्षपिकाऽ-लजीविनतानां लक्षणानि | १८७ | ७ |
| शतारुष्कस्य लक्षणम् | १७२ | १९ | विद्रध्याः लक्षणानि | १८७ | १० |
| औदुम्बरस्य लक्षणम् | १७२ | १९ | अरुंषिकायाः लक्षणानि | १८७ | ११ |
| काकणस्य लक्षणम् | १७२ | २० | पिडकानां चिकित्सासूत्रम् | १८९ | २ |
| चर्मदलस्य लक्षणम् | १७२ | २० | अरुंषिकाणां चिकित्सा | १८९ | ३ |
| एककुष्ठस्य लक्षणम् | १७२ | २० | अरकीलिकाय लक्षणं चिकित्सा च | १९० | २ |
| विपादिकायाः लक्षणम् | १७२ | २१ | बालानामागन्तुव्रणचिकित्सा | १९१ | ७ |
| कुष्ठेषु दोषविशेषेण चिकित्सा | १७२ | २२ | बालानां दद्रोर्निदानं चिकित्सा च | १९१ | १२ |
विषयानुक्रमणिका
<p align="right">·५६९</p>| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| बालानां रात्रौ स्नेहमर्दनोपदेशः | १९२ | १ | मदात्यये तर्पणम् | २०५ | १ |
| बालानां दुस्सङ्ग्रहजनितव्रणचिकित्सा | १९२ | ५ | मदात्यये मद्यप्रयोगः | २०५ | २ |
| द्विव्रणीयचिकित्सितोपसंहारः | १९३ | ५ | मदात्यये आहारविधिः | २०५ | ४ |
| प्रतिश्यायचिकित्सिताध्यायः ? । | मदात्यये विहारः | २०६ | ४ | ||
| प्रतिश्यायस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १९३ | १० | मदात्यये वर्ज्यानि | २०६ | ६ |
| प्रतिश्यायस्य सामान्यलक्षणम् | १९४ | १ | मदात्यये कतिपययोगाः | २०६ | १० |
| प्रतिश्यायस्य भेदाः | १९४ | ६ | फक्कचिकित्साध्यायः ? । | ||
| प्रतिश्यायस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि | १९४ | ७ | फक्कलक्षणम् | २०८ | १ |
| प्रतिश्यायस्य चिकित्सा | १९५ | २ | फक्कनिदानम् | २०८ | ३ |
| उरोघातचिकित्सिताध्यायः ? । | फक्कभेदाः, तेषां लक्षणानि च | २०८ | ८ | ||
| उरोघातस्य निदानम् | १९७ | ३ | फक्कचिकित्सा | २१० | १ |
| उरोघातस्य चिकित्सा | १९७ | ५ | धात्रीचिकित्सिताध्यायः ? । | ||
| शोथचिकित्सिताध्यायः ? । | धात्रीचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २१२ | ३ | ||
| शोथस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | १९८ | ३ | कश्यपस्योत्तरम् | २१२ | ५ |
| शोथस्य वातिकादिभेदेन लक्षणानि | १९८ | ६ | अग्निभेदेन धात्र्याश्चिकित्सा | २१२ | १० |
| कृमिचिकित्सिताध्यायः ? । | मेदस्विन्याः धात्र्याश्चिकित्सा | २१३ | १० | ||
| बालानां कृमिरोगे विडङ्गघृतम् | २०० | ३ | धात्रीरोगे बलातैलम् | २१३ | १४ |
| बालानां कृमिरोगे पथ्यम् | २०१ | १ | बलातैलातिदेशेनान्येषां तैलानां विधानम् | २१५ | ९ |
| बालानां कृमिरोगे धात्र्या औषधादिसेवनं कर्तव्यं | २०१ | ३ | षष्ठीग्रहस्य निदानं चिकित्सा च | २१७ | १ |
| बालानां कृमिरोगे गुदे कटुतैलप्रयोगः | २०१ | ७ | धात्रीणामजीर्णचिकित्सा | २१७ | १० |
| मदात्ययचिकित्साध्यायः ? । | कौमारभृत्यस्य भिषजः प्रशंसा | २१७ | १६ | ||
| मद्योत्थरोगभेदाः | २०२ | ३ | मातुः प्रशंसा | २१८ | ८ |
| पानात्ययस्य लक्षणम् | २०२ | ४ | सिद्धिस्थानम् ७ । | ||
| पानविभ्रमस्य लक्षणम् | २०२ | ६ | राजपुत्रीया सिद्धिः १ । | ||
| पानापक्रमस्य लक्षणम् | २०२ | ६ | बस्तिकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २१९ | ३ |
| मद्यगुणाः | २०२ | ७ | कश्यपस्योत्तरम् | २१९ | ९ |
| अतिसेवितमद्यदोषाः | २०३ | ५ | बालस्य कदा बस्तिकर्म कार्यमित्यत्र नानामुनीनां मतानि | २२० | १ |
| मदात्ययस्य सामान्यलक्षणम् | २०३ | ९ | बस्तिदानविधिः | २२१ | ५ |
| मदात्ययस्य वाताजादिभेदेन लक्षणानि | २०४ | १ | एकान्तरं बस्तिविधानम् | २२२ | १ |
| मदात्यये लङ्घनम् | २०४ | ५ | निरूहबस्तिगुणाः | २२२ | ५ |
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| निरूहयोग्या नरा: | २२३ | ७ | दत्तनस्यस्य हित आहारो विहारश्च | २४२ | १ |
| बस्तिकर्मप्रशंसा | २२३ | ९ | क्रियासिद्धिः ५ । | ||
| त्रिलक्षणा सिद्धिः २ । | पञ्चकर्मणि अजीर्णमैथुनयानोच्चैर्भाष्यादिवा- | ||||
| पञ्चकर्मसु त्रिविधयोगलक्षणान्यवेक्षेत | २२४ | १२ | स्वापातिच-ङ्क्रमणस्थानासात्म्यादिव- | ||
| विशोधनं कदा देयम् | २२५ | १ | र्जनोपदेशः | २४२ | ११ |
| विरेचनगुणा: | २२५ | ४ | अजीर्णादिसेवनजा व्यापदस्तासां चिकित्सा | ||
| दुर्दान्तलक्षणम् | २२५ | ६ | च | २४३ | १ |
| अतिवान्तलक्षणम् | २२५ | ९ | वर्जिता बस्तयः | २४३ | ५ |
| सम्यग्विरिक्तलक्षणम् | २२६ | १ | बस्तिप्रणेतृदोषजा व्यापदस्तासां चिकित्सा | ||
| दुर्विरिक्तस्य लक्षणम् | २२६ | ५ | च | २४३ | ६ |
| नस्यभेदा: | २२६ | ७ | बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ । | ||
| नस्यस्य समहीनातियोगलक्षणानि | २२६ | १० | बस्तिकर्मणोऽयोगातियोगलक्षणं | २४५ | ६ |
| स्वनुवासितलक्षणम् | २२७ | ३ | तच्चिकित्सा च | ||
| दुरुनुवासितलक्षणम् | २२७ | ४ | भृशमुत्पीडितबस्तेर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च | २४६ | ३ |
| सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | २२७ | ६ | पञ्चकर्मीया सिद्धिः ७ । | ||
| दुर्निरूढलक्षणम् | २२८ | १ | पञ्चकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २४८ | ३ |
| अतिनिरूढलक्षणम् | २२८ | ३ | वमनानर्हा रोगाः | २४८ | ४ |
| कर्मबस्तिलक्षणम् | २२८ | ४ | वमनार्हा रोगा रोगिणश्च | २४८ | ७ |
| वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ । | विरेचनार्हा रोगाः | २४९ | ३ | ||
| वमनौषधपानविधि: | २२८ | ९ | अविरेच्याः | २४९ | ६ |
| वमनस्य वेगसंख्यया हीनमध्योत्तमविभाग: | २२९ | ४ | शिरोविरेचनार्हा रोगाः | २५० | १ |
| वमनान्तरं कर्तव्य उपचार: | २२९ | ५ | स्नेहननस्ययोग्याः | २५० | ३ |
| बालरोगे शिशुधात्र्योरुभयोरपि संशोधनोपदेश: | २३१ | १ | अनुवासनार्हाः | २५० | ७ |
| विरेचनौषधदानविधि: | २३२ | ६ | अनुवासनायोग्याः | २५१ | २ |
| उत्तमवमनविरेचनयोर्लक्षणम् | २३३ | १ | निरूहणार्हाः | २५१ | ३ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च | २३४ | ३ | अनिरूह्याः | २५१ | ४ |
| नस्तःकर्मीया सिद्धिः ४ । | निरूहानुवासनयोः प्रमाणम् | २५१ | ६ | ||
| नस्यभेदा: | २३८ | ५ | लङ्घनीया रोगाः | २५२ | १ |
| नस्यदानविधि: | २३८ | ६ | बृंहणीया रोगाः | २५२ | २ |
| प्रधमनावपीडनयोर्विधि: | २३८ | १३ | मङ्गलसिद्धिः ८ । | ||
| नस्यदाने परिहार्याणि | २३९ | ३ | गृहस्थ्यैर्मङ्गलान्येव सेव्यानि | २५२ | ८ |
| परिहार्याण्यपरिहरतो व्यापदस्तासां | २३९ | ५ | अनुवासननिरूहयोर्लक्षणम् | २५२ | १० |
| चिकित्सा च | अनुवासनार्थं शैशुकः स्नेहः | २५३ | १ |
विषयानुक्रमणिका
५७१
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| कतिपयनिरूहयोगाः | २५३ | ७ | धूपाभिमन्त्रणम् | २६० | १२ |
| कल्पस्थानम् ८ । | लशुनकल्पाध्यायः ५ । | ||||
| धूपकल्पाध्यायः ४ । | लशुनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २६२ | ३ | ||
| कतिपयधूपयोगाः | २५५ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | २६२ | ७ |
| कौमारो धूपः | २५५ | ५ | लशुनस्य प्रागुत्पत्तिः | २६२ | ८ |
| अपस्मारग्रहापहो धूपः | २५५ | ८ | लशुनस्य रसविपाकगुणाः | २६३ | १ |
| माहेश्वरः धूपः | २५५ | १० | लशुनप्रयोगानर्हाः | २६४ | १२ |
| आग्नेयः धूपः | २५६ | १ | लशुनप्रयोगाईः कालः | २६५ | ६ |
| भद्रङ्करः धूपः | २५६ | ३ | लशुनप्रयोगविधिः | २६५ | ७ |
| रक्षोघ्नः धूपः | २५६ | ६ | लशुनप्रयोगे वर्ज्यानि | २६६ | १४ |
| प्रेतनिवारणः धूपः | २५६ | ८ | लशुनोपद्रवप्रतीकारः | २६७ | १६ |
| दशाङ्ग धूपः | २५६ | ११ | कतिपयलशुनकल्पाः | २७० | २ |
| मोहः धूपः | २५६ | १४ | गन्धमहन्नाम लशुनकल्पः | २७१ | ७ |
| वारुणः धूपः | २५६ | १६ | कटुतैलकल्पाध्यायः ६ । | ||
| चतुरङ्गिकः धूपः | २५७ | १ | प्लीहरोगे कटुतैलकल्पः | २७३ | ३ |
| नन्दकः धूपः | २५७ | ३ | प्लीहरोगे हितो विहारः | २७५ | १ |
| कर्णधूपः | २५७ | ५ | प्लीहोदरहराः कतिपयोगाः | २७५ | ३ |
| श्रीधूपः | २५७ | ७ | षट्कल्पाध्यायः ७ । | ||
| ग्रहघ्नधूपः | २५७ | ९ | बालानामक्षिरोगोपशमनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २७६ | १ |
| पुण्यो धूपः | २५७ | ११ | कश्यपस्योत्तरम् | २७६ | ३ |
| शिशुकः धूपः | २५७ | १३ | अक्षिरोगे चक्षुष्याकल्पः | २७६ | ४ |
| ब्राह्मधूपः | २५८ | १ | पुष्पक-रोचना-रसाञ्जन-कतकफलानां कल्पाः | २७७ | ११ |
| प्रतिधूपाः | २५८ | ३ | चक्षुष्या-रोचना-पुष्पक-रसाञ्जन-कतकफलानां गुणाः | २७८ | ४ |
| अरिष्टो धूपः | २५८ | ७ | पञ्चेन्द्रियविवर्धनं पाञ्चभौतिकं तैलं | २७८ | ११ |
| अपस्मारनाशनो धूपः | २५८ | ९ | शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ८ । | ||
| सर्वरोगहरः धूपः | २५८ | १० | शतपुष्पाशतावरीकल्पविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २८० | ३ |
| गणधूपः | २५९ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | २८० | ४ |
| स्वस्तिको धूपः | २५९ | २ | शतपुष्पागुणाः | २८० | ५ |
| ग्रहनाशनाः पञ्च धूपाः | २५९ | ३ | शतावरीगुणाः | २८० | ७ |
| गृहधूपः | २५९ | ५ | शतपुष्पाशतावरीकल्पार्हाः | २८० | ९ |
| धूपानामुपयोगः | २५९ | ६ | शतपुष्पाकल्पाः | २८० | १३ |
| धूपनिर्माणविधिः | २५९ | ८ | |||
| धूपभेदाः | २६० | १ | |||
| धूपानां प्रागुत्पत्तिः | २६० | ३ |
५७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| शतावरीकल्पाः | २८२ | ४ | विशेषकल्पाध्यायः ११ । | ||
| रेवतीकल्पाध्यायः ९ । | सन्निपातज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३१९ | ३ | ||
| रेवत्याः प्रागुत्पत्तिः | २८२ | ८ | कश्यपस्योत्तरम् | ३२० | १ |
| कथंभूतां स्त्रियं जातहारिणी सज्जते | २८५ | ११ | सन्निपातज्वरहेतवः | ३२० | २ |
| कथंभूतानमनुष्याञ्जातहारिण्याविशति | २८७ | १ | सन्निपातज्वरस्य दुश्चिकित्स्यत्वम् | ३२० | ८ |
| जातहारिण्याविष्ठायाः स्त्रिया लक्षणानि | २८९ | ४ | सन्निपातज्वरस्य पूर्वरूपाणि | ३२१ | ३ |
| जातहारिण्या भेदास्तेषां लक्षणानि च | २८९ | ११ | सन्निपातज्वरस्य भेदास्तेषां लक्षणानि च | ३२१ | ४ |
| कस्यामवस्थायां जातहारिण्याविशति | २९४ | १ | सन्निपातज्वरे शीतलघृतयोर्निषेधः | ३२७ | १ |
| याः स्त्रिय आविश्य जातहारिण्यन्यां-<br>स्त्रियं प्रविशति तासां वर्णनम् | २९४ | ५ | सन्निपातज्वरे को दोष आदावुपक्रम्य इत्यत्र<br>विचारः | ३२७ | ८ |
| तिरश्च्या जातहारिण्या वर्णनम् | २९६ | १ | संनिपातज्वरे क्षौद्रनिषेधः | ३२८ | ७ |
| जातहारिणीग्रस्तस्य शिशो रूपाणि | २९९ | ३ | संनिपातज्वरे प्रारम्भोपक्रमाः | ३२८ | ११ |
| प्रजावरणबन्धविधिः | ३०० | २ | संनिपातज्वरे लङ्घनम् | ३२९ | १ |
| भोजनकल्पाध्यायः १० । | संनिपातज्वरे स्वेदनम् | ३२९ | ७ | ||
| भोजनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३०४ | १ | संनिपातज्वरे तृष्णाप्रशमनाय पानीयम् | ३३१ | २ |
| बुभुक्षितपिपासितयोर्लक्षणानि तत्रोपचारः | ३०५ | १ | संनिपातज्वरे पेयायूषरसादिविधानम् | ३३१ | ८ |
| तृष्णाया निदानम् | ३०५ | १३ | संनिपातज्वरे विरेचनम् | ३३३ | १ |
| अपतर्पितस्य लिङ्गानि | ३०६ | १ | संनिपातज्वरे कषाययोगाः | ३३३ | ३ |
| मन्दाशितस्य लिङ्गानि | ३०६ | ३ | संनिपातज्वरे उरःक्षतोपद्रवलक्षणम् | ३३५ | १ |
| अत्यशितमन्दाशितयोश्चिकित्सा | ३०६ | ५ | संनिपातज्वरे पित्तप्रकोपोपचिकित्सा | ३३५ | ५ |
| सम्यग्भुक्तवतो लक्षणानि | ३०६ | ७ | संनिपातज्वरे कटुकं सर्पिः | ३३५ | ९ |
| भोजनपानकालौ | ३०६ | ११ | निवृत्तसन्निपातो यथा रक्ष्यः | ३३६ | ५ |
| भोज्यानुपूर्वीवर्णनम् | ३०६ | १२ | सन्निपातस्यासाध्यलक्षणम् | ३३७ | १ |
| येषां शीतं जलं पथ्यम् | ३०८ | ११ | निवृत्तसन्निपातस्य हित आहारो विहारश्च | ३३७ | ३ |
| येषु देशेषु यद्यत् सात्म्यं तद्देशवासिनस्तैरेव<br>भोज्यैरुपक्रम्याः | ३०९ | ५ | सन्निपातज्वरे वर्जनीयानि | ३३७ | ११ |
| पेयाया गुणाः | ३१० | १४ | सन्निपातज्वरे पथ्यान्यन्नपानानि | ३३८ | १ |
| आमाशयवर्णनम् | ३११ | ५ | संहिताकल्पाध्यायः १२ । | ||
| येषां मांसरसो हितः, येषां चाहितः | ३११ | ७ | काश्यपसंहितायाः स्थानाध्यायनिरूपणम् | ३३९ | १ |
| तक्रगुणाः | ३११ | १५ | एतत्तन्त्राध्ययनफलम् | ३३९ | १२ |
| मण्डयूषयोर्गुणाः | ३१२ | ३ | रोगाणां प्रागुत्पत्तिः | ३४० | १ |
| यवागूगुणाः | ३१३ | ११ | अस्य तन्त्रस्य प्रतिसंस्कारेतिहासः | ३४० | ७ |
| क्षीरगुणाः | ३१४ | १ | खिलस्थानम् ९ । | ||
| इक्षुरसगुणाः | ३१७ | ५ | विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः १ । | ||
| विषमज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३४२ | ३ |
विषयानुक्रमणिका
५७३
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| कश्यपस्योत्तरम् | ३४२ | ९ | ज्वरे विपरीतप्रकृतौ सति सुखसाध्यत्वम् | ३५९ | ३ |
| समविषमज्वयोर्लक्षणम् | ३४३ | १ | केषां शमनं केषां च शोधनं हितम् | ३५९ | ६ |
| विषमज्वरस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ३४३ | ४ | शमनशोधनयोर्लक्षणम् | ३५९ | १० |
| विषमज्वरलक्षणम् | ३४४ | १ | शमनीयानि द्रव्याणि | ३६० | ३ |
| विषमज्वरस्य पुनः पुनरभ्यागमने हेतुः | ३४४ | ५ | शोधनानि | ३६० | ६ |
| सततकान्येद्युष्कतृतीयकचतुर्थकानां लक्षणानि | ३४५ | ६ | शमनशोधनानि द्रव्याणि | ३६० | ९ |
| चतुर्थकज्वरे दैवव्यपाश्रयचिकित्सा | ३४६ | ७ | दोषोपशमलक्षणम् | ३६० | १३ |
| पञ्चमादिदिने विषमज्वरानभ्यागमने हेतुः | ३४८ | १ | संक्षेपतश्चिकित्सोपदेशः | ३६१ | २ |
| मोक्षकाले ज्वराभिवर्धने हेतुः | ३४८ | ५ | चिकित्सा कथं विधेया | ३६१ | ४ |
| ज्वरविसृष्टौ हेतुः | ३४९ | २ | आर्षप्रयोगास्तथैव प्रयोक्तव्याः, तत्राविज्ञाय प्रक्षेपापचयौ न विधेयौ | ३६१ | ७ |
| शीतपूर्वदाहपूर्वज्वरयोर्हेतुः | ३४९ | ३ | वयःशरीराद्यवेक्ष्य मात्रा विधेया | ३६२ | १ |
| ज्वरे शिरोभितापे पादशैत्ये च हेतुः | ३५० | १० | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ । | ||
| ज्वरे उष्णोपक्रमे हेतुः | ३५१ | १ | भैषज्योपक्रमादिविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३६२ | ६ |
| जीर्णविषमज्वरचिकित्सा | ३५१ | १० | कश्यपस्योत्तरम् | ३६३ | १८ |
| विषमज्वरे दोषाधिक्येन चिकित्साविशेषः | ३५२ | २ | रोगभेदाः | ३६४ | ४ |
| विषमज्वरे सामान्यचिकित्सा | ३५२ | ६ | शारीरव्याधिहेतवः | ३६४ | ७ |
| विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ । | मानसव्याधिहेतवः | ३६४ | ८ | ||
| सर्वज्वरचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३५४ | ३ | शारीरमानसरोगयोः प्रतीकारः | ३६५ | १ |
| कश्यपस्योत्तरम् | ३५४ | ६ | निजागन्तुभेदेन रोगद्वैविध्यम् | ३६५ | ३ |
| अवस्थायां प्रयुक्तभेषजस्य गुणकारित्वम् | ३५४ | ८ | औषधभेदाः, तल्लक्षणं च | ३६५ | ८ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | ९ | कषायशब्दनिरुक्तिः | ३६६ | ३ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | १२ | कीदृशं भेषजं राजार्हं भवति | ३६६ | ७ |
| ज्वरे शिरोविरेचनम् | ३५५ | १ | सप्तविधकषायभेदास्तेषां लक्षणानि च | ३६६ | ११ |
| ज्वरे दोषबलाबलभेदेन चिकित्साभेदः | ३५५ | ३ | दशौषधकालाः | ३६७ | ९ |
| आमज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ८ | कस्यामवस्थायां केषु च भेषजं न प्रयोज्यम् | ३६९ | ५ |
| निरामज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ११ | ऊनद्वादशवर्षाणामेकान्तेन भेषजदाननिषेधः | ३६९ | १० |
| बहिर्मार्गगतज्वरलक्षणं तत्र चिकित्सा च | ३५६ | १ | कीदृशं भेषजं न योज्यम् | ३७० | २ |
| दोषदुर्बलौषधदुर्बललक्षणानि चिकित्सा च | ३५६ | ४ | कीदृशं भेषजमवचार्यम् | ३७० | ५ |
| ज्वरापहो लंघनादिक्रमः | ३५७ | ७ | औषधदानविधिः | ३७० | ९ |
| ज्वरे कषायः कदा देयः | ३५७ | ९ | पीतौषधेन वर्ज्यानि | ३७० | १२ |
| ज्वरे संशमनम् | ३५८ | ४ | जीर्यमाणभेषजलिङ्गानि | ३७१ | १ |
| ज्वरे सर्पिः | ३५८ | ६ | अन्नकालस्य लक्षणम् | ३७१ | ३ |
| ज्वरे विरेचनम् | ३५८ | १० | त्रिविधवयोभेदाः | ३७१ | ५ |
| ज्वरे निरूहानुवासनौ | ३५९ | १ |
५७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| वयोभेदेन भेषजमात्राभेदः | ३७२ | १ | ओदनदोषाः | ३८४ | १२ |
| भेषजमात्रानिर्णयेऽग्न्यृतुसात्म्यादीन्यप्यवेक्षेत | ३७४ | १४ | यवागूसाधनपरिभाषा | ३८५ | १ |
| योगज्ञस्य भिषजः प्रशंसा | ३७५ | ३ | यवागूदोषाः | ३८५ | ४ |
| तीक्ष्णमृदुमध्यौषधयोग्या नराः | ३७६ | ४ | विविधरोगेषु यवागूविधानम् | ३८५ | ८ |
| यूषनिर्देशीयाध्यायः ४ । | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५ । | ||||
| आहारप्रशंसा | ३७७ | ४ | आहारगुणाः | ३८७ | ९ |
| आहारभेदाः | ३७८ | ३ | भोजनविधिः | ३८७ | १२ |
| आहारगुणः | ३७८ | ८ | आरोग्यलिङ्गानि | ३८८ | ५ |
| यूषगुणाः | ३७९ | ५ | अन्नकालाः | ३८९ | १ |
| यूषनिरुक्तिः | ३७९ | ९ | भोजनविधिनोपभुञ्जतो गुणाः | ३८९ | २ |
| यूषयवाग्वोर्लक्षणम् | ३७९ | ११ | मधुरादिरससात्म्यताया गुणा दोषाश्च | ३९२ | ८ |
| यूषभेदाः | ३७९ | १३ | घृतक्षीरतैलमांससात्म्यताया गुणाः | ३९३ | ३ |
| यूषरागखाडवपानकानां लक्षणम् | ३८१ | १ | भोजनोपकल्पना | ३९३ | ९ |
| वातरोगे हिता यूषाः | ३८१ | ३ | असम्यक्परिपाकहेतवः | ३९४ | ६ |
| क्वाथकल्कयोः पर्यायाः | ३८१ | ८ | समशनस्य लक्षणम् | ३९५ | १ |
| मुद्गयूषः | ३८१ | १० | अध्यशनस्य लक्षणम् | ३९५ | १ |
| विरसिकायूषः | ३८१ | १२ | प्रमृताशनस्य लक्षणम् | ३९५ | २ |
| रोचनयूषः | ३८१ | १३ | विषमाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | २ |
| दाडिमयूषः | ३८१ | १३ | विरुद्धाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ३ |
| धात्रीयूषः | ३८१ | १४ | अजीर्णाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ३ |
| चित्रकयूषः | ३८१ | १५ | अत्यशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ४ |
| मूलकयूषः | ३८१ | १७ | चतुर्विंशतिभोजनोपकल्पनाः केषु योज्याः | ३९५ | ६ |
| पञ्चकोलयूषः | ३८२ | २ | रसदोषविभागीयाध्यायः ६ । | ||
| धान्ययूषः | ३८२ | ४ | रसदोषविभागज्ञस्य भिषजः प्रशंसा | ३९६ | १ |
| कुलत्थयूषः | ३८२ | ८ | दोषभेदतो व्याधीनां द्विषष्ठिधा कल्पना | ३९६ | ३ |
| फलयूषः | ३८२ | १० | रसानां त्रिषष्ठिधा कल्पना | ३९८ | ३ |
| पुष्पयूषः | ३८२ | १२ | दोषभेदानवेक्ष्य रसा योज्याः | ३९९ | ३ |
| पत्रयूषः | ३८३ | १ | कफजे व्याधौ कटुतिक्तकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | ३ |
| वल्कलयूषः | ३८३ | ३ | पित्तजे व्याधौ तिक्तस्वादुकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | ८ |
| पल्लवयूषः | ३८३ | ५ | वातजे व्याधौ लवणाम्लकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | १२ |
| काम्बलिकयूषः | ३८३ | १० | |||
| महायूषः | ३८३ | १४ | |||
| मूलकयूषः | ३८४ | ४ | |||
| ओदनगुणाः | ३८४ | ११ |
विषयानुक्रमणिका ५७५
| पृ. | प | पृ. | प | ||
|---|---|---|---|---|---|
| पूर्वोक्तरसप्रविचारणाया ज्वरे<br>उदाहरणरूपेण प्रयोगदर्शनम् | ४०१ | १ | निरूहगुणाः | ४३० | १ |
| दोषविकल्पानवेक्ष्य रसानां प्रक्षेप्रावकषौँ<br>विधेयौ | ४०१ | ९ | सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | ४३० | ४ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिदोषभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०२ | ३ | निरूहायोगातियोगलिङ्गानि | ४३० | ७ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिरसभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०४ | १४ | निरूढस्यानुवासनप्रयोगः | ४३० | ९ |
| संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७ । | अनुवासनगुणाः | ४३१ | ५ | ||
| संशोधनमधिकृत्य षट्सु ऋतुषु दोषाणां<br>संचयप्रकोपोपशमवर्णनम् | ४०७ | ९ | अनुवासनार्थं फलतैलम् | ४३२ | १ |
| हेत्वीरितदोषस्य शीघ्रोपक्रमोपदेशः | ४०९ | ३ | अनुवासनार्थं एरण्डबस्तिः | ४३२ | १२ |
| बहुदोषस्य लक्षणम् | ४१० | १ | अनुवासनमात्राः | ४३३ | १ |
| बहुमध्याल्पबलेषु दोषेषु चिकित्साविशेषः | ४१० | ४ | निरूहमात्रा | ४३४ | १ |
| स्नेहनगुणाः | ४११ | १ | प्रधानमध्यावरा मात्राः केषु योज्याः | ४३४ | ४ |
| स्वेदनगुणाः | ४११ | २ | रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९ । | ||
| शोधनगुणाः | ४११ | ४ | रक्तगुल्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४३४ | ११ |
| शोधनविधिः | ४१३ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | ४३५ | १४ |
| शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः | ४१३ | ९ | गर्भाशयस्य रजस उत्पत्तेश्च वर्णनम् | ४३५ | १७ |
| वमनविधिः | ४१४ | ११ | रक्तगुल्मस्य संप्राप्ति | ४३६ | १० |
| विरेचनविधिः | ४१७ | २ | रक्तगुल्मस्य लक्षणानि | ४३७ | ९ |
| प्रधानमध्यमावरशुद्धिलक्षणम् | ४१७ | ९ | रक्तगुल्मस्य निरुक्तिः | ४३८ | ५ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तासां चिकित्सा च | ४१७ | ११ | रक्तगुल्मे गर्भसमानलक्षणोत्पत्तौ हेतुः | ४३९ | १ |
| कथंभूतं भेषजं सम्यक्शुद्धिमावहति | ४१९ | १२ | रक्तगुल्मे कालप्रकर्षे हेतुः | ४३९ | १० |
| बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८ । | रक्तगुल्मस्य दशममासात्परमुपक्रम्यत्वे हेतुः | ४४० | १ | ||
| बस्तिकर्मणः प्रशंसा | ४२० | ७ | रक्तगुल्मगर्भयोर्विशिष्टलक्षणानि | ४४० | ४ |
| बस्तिकर्मणस्त्रयो भेदास्तेषां लक्षणानि च | ४२१ | ५ | रक्तगुल्मगर्भयोर्निश्चयं विधायैव चिकित्सा<br>विधेया | ४४१ | ३ |
| चतुर्भद्राख्यश्रुतार्थो बस्तिकल्पः | ४२३ | १० | पूर्णे प्रसवकाले प्रवर्तमानरक्तनिवारणनिषेधः | ४४२ | ५ |
| अयुग्मबस्तिदानोपदेशः | ४२४ | ५ | रक्तगुल्मे चिकित्सासूत्रम् | ४४२ | ८ |
| बस्तिकर्मसाध्या रोगाः | ४२४ | १० | रक्तगुल्मे वर्ज्यानि | ४४३ | १ |
| निरूहप्रणिधानविधिः | ४२५ | १ | रक्तगुल्मोपद्रवाः | ४४३ | २ |
| निरूहबस्तिप्रमाणोत्कर्षापकर्षविधिः | ४२६ | ८ | रक्तगुल्मस्य शैथिल्यकरण- भेदनार्थं<br>चिकित्सा | ४४३ | ३ |
| कथंभूतं निरूहमुपकल्पयेत् | ४२८ | १ | अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १० । | ||
| अतोऽन्यथाप्रयोगे व्यापदः | ४२८ | ४ | अन्तर्वत्नीचिकित्सितोपक्रमः | ४४५ | ३ |
| कथंभूतो बस्तिः प्रशस्यते | ४२९ | ९ | गर्भिण्या ज्वरस्य विशेषतः कष्टकारकत्वम् | ४४५ | ५ |
| गर्भिण्या ज्वरस्य निदानम् | ४४५ | ७ |
५९ का. सं.
५७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| गर्भिणीज्वरस्य चिकित्सासूत्रम् | ४४५ | १० | त्रिविधदेशभेदेन सूतिकोपक्रमे विशेषः | ४६७ | ८ |
| तरुणे गर्भे अभ्यङ्ग-शिरोविरेक-धूमपान-स्वेद-वमन-स्रंसनास्थापनानुवासननिषेधः | ४४७ | २ | सूतिकाज्वरस्य निदानम् | ५६९ | १ |
| गर्भिण्याः वातज्वरे हिता योगाः | ४४८ | ६ | सूतिकाज्वरस्य दुरुपक्रमत्वे हेतुः | ४६९ | ७ |
| गर्भिण्या पित्तज्वरे हिता योगाः | ४४९ | १० | वातजादिभेदेन सूतिकाज्वरस्य लक्षणानि | ४७० | १० |
| गर्भिण्याः श्लेष्मज्वरे हिता योगाः | ४५० | ७ | स्तन्यागमोत्थज्वरस्य लक्षणम् | ४७१ | १० |
| गर्भिण्याः संसृष्टज्वरे हिता योगाः | ४५० | १० | सूतिकाया आगन्तुज्वरलिङ्गानि | ४७२ | १ |
| मद्यपाया गर्भिण्याश्चिकित्सा | ४५१ | ६ | सूतिकाज्वरे अवस्थाभेदेनोपक्रमः | ४७३ | ९ |
| गर्भिण्या अतिसारे चिकित्सा | ४५१ | ११ | वातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७४ | ११ |
| गर्भिण्या परिकर्तिकायां चिकित्सा | ४५५ | ७ | पित्तजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७६ | १० |
| गर्भिण्या मुखपाके चिकित्सा | ४५६ | १ | कफजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७८ | ९ |
| गर्भिण्या आक्षेपाकपतानकयोश्चिकित्सा | ४५६ | ५ | सन्निपातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७९ | १४ |
| गर्भिण्या छर्द्यां चिकित्सा | ४५७ | ३ | जातकर्मोत्तराध्यायः १२ । | ||
| गर्भिण्या कामलायां चिकित्सा | ४५८ | ३ | प्रथमे मासि शिशोः सूर्योदयस्य दर्शनोपस्थापनं प्रदोषे चन्द्रमसश्च | ४८३ | ३ |
| गर्भिण्या हृद्रोगे चिकित्सा | ४५८ | ५ | चतुर्थे मासि शिशोः अन्तर्गृहान्निष्क्रमणविधिः | ४८३ | ५ |
| गर्भिण्या कासे चिकित्सा | ४५८ | ११ | षष्ठे मासि भूमावभ्यासार्थं सकृदुपवेशनविधिः | ४८३ | १२ |
| गर्भिण्या दोषभेदेन जायमानेषु कासेषु चिकित्सा | ४५८ | १२ | शिशोश्शिरोपवेशननिषेधः | ४८५ | १ |
| गर्भिण्या श्वासरोगे चिकित्सा | ४५९ | ३ | षष्ठे मासि शिशोः फलप्राशनम् | ४८५ | ८ |
| गर्भिण्या ऊर्ध्ववाते चिकित्सा | ४५९ | १० | जातदन्तस्य दशमे मासि अन्नप्राशनविधिः | ४८५ | ९ |
| गर्भि ङ्कायां चिकित्सा | ४५९ | ११ | बालानाम्नदानविधिः | ४८७ | १ |
| गर्भिण्या मूत्रग्रहेषु चिकित्सा | ४५९ | १४ | कुक्कुणकचिकित्साध्यायः १३ । | ||
| गर्भिण्या चतुर्थादिमासेषु जायमानरोगचिकित्सा | ४६० | ३ | कुक्कुणकस्य निदानम् | ४८७ | ९ |
| गर्भिण्या विषाबाधाचिकित्सा | ४६१ | ३ | कुक्कुणकस्य लिङ्गानि | ४८८ | ८ |
| गर्भिण्य अरिष्टालिङ्गानि | ४६१ | १० | कुक्कुणकस्य चिकित्सा | ४८८ | १२ |
| गर्भिण्य हितो विहारः | ४६३ | १२ | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४ । | ||
| सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११ । | विसर्पविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ४९६ | ३ | ||
| चतुःषष्टिर्दुब्भजातामयाः | ४६४ | ११ | कश्यपस्योत्तरं | ४९७ | ३ |
| सूतिकोपक्रमेऽप्रमत्तेन भवित यम् | ४६६ | १ | विसर्पस्य प्रागुत्पत्तिः | ४९७ | ४ |
| सूतिकाया उदरे पीडनपूर्वकं पट्टवेष्टनम् | ४६६ | ५ | विसर्पस्य निरुक्तिः | ४९७ | ६ |
| सूतिकायाः स्वेदनम् | ४६६ | ९ | विसर्पस्य निदानम् | ४९७ | ७ |
| सूतिकायाः धूपनम् | ४६७ | १ | विसर्पस्य भेदाः | ४९८ | १ |
| सूतिकायाः अन्नपानविधिः | ४६७ | २ | विसर्पे रक्तावसेकवस्य परमौषधत्वम् | ४९८ | ३ |
| विसर्पस्य वातजादिभेदेन लक्षणानि | ४९८ | ६ |
विषयानुक्रमणिका
<div align="right">५७७</div>| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| विसर्पस्य सामान्यचिकित्सा | ४९९ | १ | शोथानां सामान्यचिकित्सा | ५२१ | ९ |
| वातजविसर्पस्य चिकित्सा | ४९९ | ४ | वातिकशोथस्य चिकित्सा | ५२४ | ६ |
| पैत्तिकविसर्पस्य चिकित्सा | ५०१ | ७ | पैत्तिकशोथस्य चिकित्सा | ५२५ | ११ |
| श्लैष्मिकविसर्पस्य चिकित्सा | ५०४ | ११ | कफजशोथस्य चिकित्सा | ५२६ | १३ |
| संसर्गजविसर्पस्य चिकित्सा | ५०६ | ११ | आगन्तुकशोथस्य चिकित्सा | ५२९ | ६ |
| चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५ । | शोथोपद्रवाः चिकित्सा | ५२९ | ७ | ||
| चर्मदलविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ५०७ | ५ | शूलचिकित्सिताध्यायः १८ । | ||
| कश्यपस्योत्तरम् | ५०८ | ३ | शूलस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ५३० | ३ |
| चर्मदलस्य निदानम् | ५०८ | ४ | शूलस्य वातजादिभेदेन लिङ्गानि | ५३० | ७ |
| महतां चर्मदलासंभवे हेतुः | ५०८ | ७ | वातिशूलस्य चिकित्सा | ५३० | ११ |
| चर्मदलभेदाः | ५०८ | ९ | पैत्तिकशूलस्य चिकित्सा | ५३१ | ४ |
| वातिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५०९ | १ | श्लैष्मिकशूलस्य चिकित्सा | ५३१ | १२ |
| पैत्तिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५०९ | ६ | शूले घृततैल्योः | ५३३ | ७ |
| श्लैष्मिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५१० | १ | शूले बस्तियोगाः | ५३४ | ८ |
| सान्निपातिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५१० | ७ | अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९ । | ||
| चर्मदलस्य साध्यासाध्यत्वविचारः | ५१० | ११ | वातज्वरहरा योगाः | ५३६ | ७ |
| वातिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५११ | १ | वातश्लेष्मज्वरहरा योगाः | ५३८ | ११ |
| पैत्तिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५११ | १२ | ज्वरे दोषविशेषेण चिकित्साविशेषः | ५४० | १ |
| श्लैष्मिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५१२ | १० | सन्निपातज्वरचिकित्सा | ५४० | ५ |
| अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६ । | मधुन उष्णयोगनिषेधः | ५४३ | २ | ||
| अम्लपित्तस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ५१४ | ३ | क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २० । | ||
| अम्लपित्तस्य लक्षणम् | ५१५ | ५ | क्षीरभेदाः | ५४४ | ४ |
| अम्लपित्तस्य चिकित्सा | ५१६ | १ | क्षीरसामान्यगुणाः | ५४४ | ७ |
| अम्लपित्तस्य उपद्रवाः | ५१८ | १० | गोक्षीरगुणाः | ५४५ | ३ |
| शोथचिकित्सिताध्यायः १७ । | महिषीक्षीरगुणाः | ५४६ | १३ | ||
| शोथस्य निदानम् | ५१९ | ४ | अजाक्षीणगुणाः | ५४७ | १ |
| शोथस्य भेदाः | ५१९ | ९ | उष्ट्रीक्षीरगुण | ५४७ | ४ |
| शोथानां वातजादिभेदेन लिङ्गानि | ५२० | २ | पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २१ । | ||
| शोथानां असाध्यलिङ्गानि | ५२१ | ८ | हंसोदकगुणाः | ५४८ | १ |
| ऋतुभेदेनोदकगुणाः | ५४८ | ४ | |||
| अप्रशस्तं जलं | ५४९ | १ | |||
| आन्तरिक्षजलगुणाः | ५४९ | ३ | |||
| देशभेदेन नदीगुणाः | ५४९ | ६ |
५७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| औद्भित्पदिजलगुणाः | ५४९ | ९ | नानाविधपशुपक्षिणां | ५५४ | २ |
| पानार्हं जलं | ५५० | १ | नानाविधजलचरमांसगुणाः | ५५६ | ३ |
| पानायोग्यं जलं | ५५० | ३ | मांसवर्गेषु श्रेष्ठाः प्राणिनः | ५५७ | ५ |
| भक्तादिमध्यान्तपीतजलगुणाः | ५५० | १२ | शरीरावयवेषु गुरुलघुत्वम् | ५५७ | ९ |
| शृतशीतजलगुणाः | ५५१ | १ | अवस्थाविशेषेण गुरुलघुत्वम् | ५५८ | १ |
| ऋतुभेदे पेयं जलं | ५५१ | ७ | शरीर-भोजन-देशादिविशेषेण | ५५८ | ४ |
| मांसगुणविशेषीयाध्यायः २२ । | देशसात्म्याध्यायः २३ । | ||||
| मांससामान्यगुणः | ५५२ | ३ | मध्यदेशः, तज्जानां सात्म्यं च | ५५९ | ३ |
| मांसरसगुणाः | ५५२ | ८ | पूर्वदेशाः, तज्जानां सात्म्यं च | ५५९ | ८ |
| संस्कारविशेषेण मांसगुणाः | ५५३ | ६ | दक्षिणदेशाः, तज्जानां सात्म्यं च | ५६० | ३ |
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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