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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

द्वितीय लम्बक १९५

द्वितीय लम्बक १९५ तब वह नकली देवता लोहजंघ रूपणिका से बोला—'तुम्हारी माता पापिनी है, उसे स्पष्ट रूप से स्वर्ग नहीं ले जाया जा सकता। हाँ एकादशी के दिन स्वर्ग का द्वार खुलता है। उस द्वार से सबसे पहले शिवजी के भक्तगण उसमें प्रवेश करते हैं। यदि इन शिवगणों में उनका-सा वेष बनाकर तुम्हारी माता की भरती करा दी जाय तो वह स्वर्ग में जा सकती है। इसलिए इसके सिर को छुरे से मुँड़ाकर सिर पर पाँच शिखाएँ या चोटियाँ रखवाओ। और गल में हड्डियों की माला और शरीर का एक भाग काजल से काला तथा दूसरा सिन्दूर से लाल करके और नंगी करके उसे शिवगणों में भरती किया जा सकेगा। यदि वह इस प्रकार शिवगण के रूप में मेरे साथ जावे तो मैं उसे स्वर्ग ले जा सकता हूँ॥१६६—१६९॥ ऐसा कहकर और कुछ ठहरकर लोहजंघ चला गया। पूर्वनिर्णयानुसार एकादशी को प्रातःकाल रूपणिका ने स्वर्ग जाने के लिए उत्सुक माता को गणों का वेश बनाकर तैयार कर दिया। सायंकाल लोहजंघ उसी प्रकार वेश्या के घर आया और रूपणिका ने माता को उसे सौंप दिया॥१७०—१७२॥ लोहजंघ भी अपने नित्यकृत्य से निवृत्त होकर उस विद्रूपवेशा कुट्टनी को अपने साथ गरुड़ पर बैठाकर आकाश में उड़ गया। आकाश में उड़ते हुए उसने एक देव-मन्दिर के सामने गड़े हुए चक्र-चिह्नित पत्थर के स्तम्भ को देखा। उसी स्तम्भ में लगे हुए चक्र के सहारे अपना अपमान करनेवाली ध्वजा के समान उस कुट्टनी को उसने खड़ा कर दिया॥१७३—१७५॥ तब कुट्टनी से उसने कहा कि 'तुम कुछ देर के लिए यहाँ ठहरो। मैं तुम्हें गणों में भरती कराने का प्रबन्ध करता हूँ। ऐसा कहकर लोहजंघ उसकी आँखों से ओझल हो गया॥१७६॥ कुछ आगे जाकर उसने एक मन्दिर के समीप रात्रि-जागरण के लिए एकत्र हुए नागरिकों का मेला देखा। उसे देखकर वह आकाश से ही चिल्लाकर बोला—'हे नागरिक लोगो आज तुम्हारे ऊपर सर्वसंहारकारिणी महामारी गिरेगी। इसलिए भगवान् का भजन करो उन्ही की शरण में जाओ'॥१७७-१७८॥ इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर डरे हुए सभी मथुरावासी स्वस्ति पाठ करते हुए भगवान् के समीप जा बैठे॥१७९॥ वह लोहजंघ भी विहार से उतरकर पक्षी को बाँधकर और देवता का नकली वेश उतारकर साधारण नागरिक के वेश में उसी जन-समाज में चुपचाप आकर मिल गया॥१८०॥

१९६ कथासरित्सागर

१९६ कथासरित्सागर अद्यापि नागतो देवो न च स्वर्गमहं गता। इति च स्तम्भपृष्ठस्था कुट्टन्येवमचिन्तयत् ॥१८१॥ अक्षमेषोपरि स्थातुं श्रावयन्ती जनांश्च । हा हाऽहं पतिष्यामीति सा चक्रन्द च बिभ्यती ॥१८२॥ तच्छ्रुत्वा पतिता सेयं मारीत्याशङ्क्य व्याकुला। देवि मा मा पतत्यूचुस्ते देवाग्रगता जनाः ॥१८३॥ ततश्छबालवृद्धास्ते माथुरास्तां विभावरीम्। मारीपातभयोद्भ्रान्ताः कथमप्यत्यवाहयन् ॥१८४॥ प्रातश्च दृष्ट्वा स्तम्भस्थां कुट्टनीं तां तथाविधाम्। प्रत्यभिज्ञातवान्सर्वं पौरलोकः सराजकः ॥१८५॥ अतिक्रान्तभये तत्र जातहासोऽखिले जने। आययौ श्रुतवृत्तान्ता तत्र रूपणिकाथ सा ॥१८६॥ सा च दृष्ट्वा सवैरक्ष्या स्तम्भाग्राज्जननीं निजाम्। तामवातारयत् सद्यस्तत्रस्थैश्च जनैः सह ॥१८७॥ सद्यः सा कुट्टनी तत्र सर्वैस्तैः सकुतूहलैः। अपृच्छ्यत यथावृत्तं सापि तेभ्यः शशंस तत् ॥१८८॥ ततः सिद्धाद्विचरितं तन्मत्वादद्भुतकारकम्। सराजविप्रवणिजो जनास्ते वाक्यमब्रुवन् ॥१८९॥ यनेयं विप्रलब्धा हि वञ्चितानेककामुका। प्रकटः सोऽस्तु तस्येह पट्टबन्धो विधीयते ॥१९०॥ मन्त्रित्वा सोहजङ्घः स समात्मानमदर्शयत्। पृष्टश्चामुक्तं सर्वं वृत्तान्तं तमवर्णयत् ॥१९१॥ ददौ च तस्मै नृपाय शङ्खछत्राद्युपायनम्। विभीषणेन प्रहितं जनविस्मयकारकम् ॥१९२॥ अथ तस्य सपदि पट्टं बद्ध्वा सम्पूज्य माथुराः सर्वे। ख्यापितां रूपणिकां राजादेशेन तां वधूम् ॥१९३॥ ततश्च तत्र प्रियया मम तदा समृद्धरोषो बहुरम्यसङ्कथम् । स लोहजङ्घः प्रतिशूरय कुट्टनीनिवारमभ्युं न्यवगद्यथासुखम् ॥१९४॥

द्वितीय लम्बक १९७

द्वितीय लम्बक १९७ उधर चक्र के सहारे खम्भे पर चढ़ी कुट्टनी खड़े-खड़े थककर सोचने लगी कि अभी तक न तो भगवान् ही आये और न मैं ही स्वर्ग गई। ऐसा सोचकर त्रस्त कुट्टनी चिल्लाने लगी और गिरने के भय से कहने लगी—'मैं गिरती हूँ। उसका रोना-पीटना सुनकर देव-मन्दिर में एकत्र मथुरा के निवासी उस ही साक्षात् महामारी समझकर व्याकुल हो गये और कहने लगे कि 'मत गिरो मत गिरो। ॥१८६१—१८६४॥ इस प्रकार महामारी के पतन से घबराये हुए मथुरावासियों ने बाल-बच्चों के साथ वह रात किसी प्रकार व्यतीत की ॥१८६५॥ प्रातः काल के प्रकाश में सभी मथुरावासी प्रजा और राजा ने भी उस रूप में खम्भे पर खड़ी कुट्टनी को देखा और पहचाना ॥१८६५॥ महामारी का भय दूर होने पर तथा एक बार खूब हँसी हो जाने पर रूपणिका वेश्या माता का समाचार सुनकर वहाँ आई ॥१८६६॥ माता को इस प्रकार खम्भे पर खड़ी देखकर उसे अत्यन्त आश्चर्य हुआ और किसी प्रकार उसने उसे ऊपर से उतरवाया ॥१८६७॥ वहाँ एकत्र जनसमूह के पूछने पर उस कुट्टनी ने अपनी दुर्दशा का सारा वृत्तान्त लोगों से कह सुनाया ॥१८६८॥ इस विस्मयकारी घटना को किसी सिद्ध आदि का विनोद समझकर ब्राह्मण वैश्य और राजा आदि एकत्र लोगों ने कहा—'अनेक कामियों को ठगनेवाली इस कुट्टनी को भी जिसने इस प्रकार ठग लिया वह धन्य है। यदि वह इस जनसमाज में है, तो प्रकट हो जाय उसे पुरस्कार-स्वरूप पट्ट-बन्ध¹ किया जायगा' ॥१८६९-९०॥ इस घोषणा को सुनकर जनसमाज में छिपा हुआ लोहजंघ प्रकट हो गया और उसने जनता के पूछने पर समस्त वृत्तान्त सुना दिया ॥१९१॥ साथ ही उसने वहीं उपस्थित मथुरा-नरेश को शंख चक्र आदि उपहार भेंट कर दिये जिसे देखकर जनता ने अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया ॥१९२॥ तदनन्तर मथुरा के नागरिकों ने लोहजंघ के इस साहसिक कार्य पर सन्तोष प्रकट करते हुए उसे पट्ट बाँधकर पुरस्कृत किया और राजा की आज्ञा से वेश्या रूपणिका को स्वाधीन करा दिया अर्थात् उसे वेश्यावृत्ति से मुक्त कर दिया ॥१९३॥ इस प्रकार राजा तथा प्रजा से सम्मानित लोहजंघ लंका से प्राप्त धनराशि द्वारा अत्यन्त समृद्ध बनकर और कुट्टनी मकरदंष्ट्रा से बदला चुकाकर सुखपूर्वक मथुरा में निवास करने लगा ॥१९४॥

१ प्राचीन समय में जिस व्यक्ति का राजा या जनता से नागरिक सम्मान किया जाता था उसे विशेष प्रकार के मुकुट आदि पहनाकर और रथ में बैठाकर शोभायात्रा (जुलूस) के साथ नगर में घुमाकर सम्मानित किया जाता था।—अनु

इत्यन्यरूपस्य वसन्तकस्य मुखात्समाकर्ण्य कथामवापि।

इत्यन्यरूपस्य वसन्तकस्य मुखात्समाकर्ण्य कथामवापि। बद्धस्य वत्साधिपते समीपे तोषं परो वासवदत्तामान् ॥११९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।

पञ्चमस्तरङ्गः वसन्तककथा : वासवदत्ताहरणम्

अथ वासवदत्ता सा शनैर्वत्सेश्वरं प्रति। गाढं बबन्ध सद्भावं पितृपक्षपराङ्मुखी ॥१॥ ततो वत्सेशानिकटं पुनर्यौगन्धरायणः। विषेणादर्शनं कृत्वा सर्वानन्याञ्जनान्प्रति ॥२॥ वसन्तकसमक्षं च विजनं तं व्यजिज्ञपत्। राजन्बद्धो भवांश्चण्डमहासेनेन मायया ॥३॥ सुतां च दत्त्वा सम्भाव्य त्वामय मोक्तुमिच्छति। तदस्यैनां स्वयं हृत्वा गच्छामस्तनयां वयम् ॥४॥ एवं ह्यस्य प्रतीकारो दृप्तस्य विहितो भवेत्। अपौरुषकृतं लोके नैव स्याल्लाघवं च नः ॥५॥ अस्ति चैतन दत्तास्यास्तनयायाः करेणुका। राज्ञा वासवदत्ताया नाम्ना भद्रवती नृप ॥६॥ सा चानुगन्तुं शक्या नान्येन दन्तिना। मुक्त्वा नडागिरिं सोऽपि तां दृष्ट्वैव न मुच्यते ॥७॥ तस्यादषाषाढको नाम हस्त्यारोहोऽत्र विद्यते। स च दत्त्वा धनं भूरि स्वीकृत्य स्थापितो मया ॥८॥ तदारुह्य करेणुं तां सह वासवदत्तया। सायुधमापयातव्यं नक्तं गुप्तमितस्त्वया ॥९॥ रुमण्वन् महामात्रो द्विग्देन्द्रितबलस्तदा। मथनं शोभतां नगो नतश्चन्तयत यथा ॥१०॥ पुलिन्दकस्य सख्युस्ते पार्श्वमद्य च याम्यहम्। मार्गरक्षामित्युक्त्वा ययौ यौगन्धरायणः ॥११॥ यत्गरात्रोर्त्तदं तागब वत्सस्य हृन्थे व्यधात्। अथ वासवदत्ता सा तस्यांनिशिमृगायतौ ॥१२॥

द्वितीय लम्बक १९९

द्वितीय लम्बक १९९ इस प्रकार विकृत वेषधारी वसन्तक के मुंह से कथा सुनकर बन्दी उदयन को अत्यन्त सन्तोष हुआ और वासवदत्ता भी हृदय से प्रसन्न हुई ॥१९५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त पञ्चम तरंग उदयन की कथा वासवदत्ता-हरण कुछ समय के अनन्तर पिता के पक्षपात से रहित होकर वासवदत्ता को वत्सराज उदयन के प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया ॥१॥ यह जानकर मन्त्री यौगन्धरायण अदृश्य रूप से पुन राजा उदयन के समीप आया। उसकी अदृश्यकारिणी विद्या के प्रभाव से उसे दूसरे व्यक्ति न देख सके ॥२॥ उसने वसन्तक के सामने ही राजा से कहा—'महाराज तुम्हें चंडमहासेन ने छल-कपट करके कैद कर लिया है और अपनी कन्या देकर तुम्हारा सम्मान करके तुम्हें छोड़ देगा ॥३॥ इसलिए हम लोग स्वयं उसकी कन्या का अपहरण करके ले चलते हैं। इस प्रकार इस अभिमानी का मान भंग होगा और संसार में तुम्हारी दुर्बलता का अपवाद भी न होगा ॥४-५॥ राजा चंडसेन ने कन्या वासवदत्ता को भद्रवती नाम की हस्तिनी दी है। वह इतनी शीघ्रता से चलती है कि दूसरे हाथी केवल एक नलगिरि को छोड़कर, उसका पीछा नहीं कर सकते। नलगिरि भी उसे देखकर युद्ध नहीं करता। उस भद्रवती हस्तिनी के पीलवान (महावत) का नाम आषाढ़क है। उसे मैंने पर्याप्त धन देकर अपने पक्ष में कर लिया है॥६-८॥ इसलिए उसी हस्तिनी की सवारी से वासवदत्ता को साथ लेकर तुम्हें रात के समय यहाँ से छिपकर भागना चाहिए॥९॥ यहाँ के बड़े हाथीवान को मद्य पिलाकर ऐसा बेसुध कर देना चाहिए कि जिससे उसे होश ही न रहे। अन्यथा वह हाथियों के संकेत समझने में अति निपुण है॥१० ॥ मार्ग रक्षा के लिए मैं तुम्हारे मित्र पुलिन्दक के पास अभी जाता हूँ। ऐसा कहकर यौगन्धरायण चला गया ॥११॥ वत्सराज ने भी अपना सारा कर्त्तव्य सोच-समझ लिया। कुछ समय के पश्चात् वासवदत्ता उसके समीप आई॥१२॥

३ कथासरित्सागर

३ कथासरित्सागर ततस्तास्ताः सविश्रम्भाः कथाः कुर्वंस्तया सह। यौगन्धरायणोक्तं च तस्यै राजा शशंस सः॥१३॥ सा च तत्प्रतिपद्यैव निश्चिक्ये गमनं प्रति। आनाम्याषाढकं सज्जं हस्त्यारोहं चकार तम्॥१४॥ देवपूजापदेशेन दत्त्वा मद्यं मदान्वितम्। सर्वाधोरणसंयुक्तं महामात्रं च साकरोत्॥१५॥ ततः प्रदोषे बिल्वस्थेमेघदाम्बवसमाकुले। आषाढकः करेणुं तां सज्जीकृत्यानिनाय सः॥१६॥ सज्जमाना च सा शब्दं चकार करिणी किल। तं च हस्तिरुताभिज्ञो महामात्रोऽप्य सोऽशृणोत्॥१७॥ त्रिशष्टियोजान्यद्य यास्यामीत्याह हस्तिनी। इत्युवाच स मोहाममदविस्खलिताक्षरम्॥१८॥ विचारार्हं पुनस्तस्य मत्तस्याभून्न मानसम्। तन्न हस्तिपकाः क्षीबास्तद्वाक्यं नव शुश्रुवुः॥१९॥ ततश्च वत्सराजोऽत्र वीणामादाय तां निजाम्। यौगन्धरायणाप्ताप्तैर्योगैः श्वसितबन्धनः॥२०॥ उपनीतप्रहरणः स्वैरं वासवदत्तया। करेणुकायामारोहत्स तस्यां सवसन्तकः॥२१॥ ततो वासवदत्तापि सह काञ्चनमालया। सख्या रहस्यभारिण्या तस्यामेवारुरोह सा॥२२॥ अयोऽश्मयिम्या निरगात् स हस्तिपक्पञ्चमः। वत्सेशो निशि मत्तगभिन्नप्राकारवर्त्मना॥२३॥ तत्स्थानरक्षिणौ वीरौ स्वैरं स हतवान्नृपः। वीरबाहुं तथा तालभटं राजसुताश्रयौ॥२४॥ ततः प्रतस्थे वेगेन स राजा दयितासखः। हृष्टः करेणुकारूढो दक्षश्यावाब्जेङ्ककुञ्जरम्॥२५॥ तज्जन्मिन्या च तौ दृष्ट्वा हतौ प्राकाररक्षिणौ। राज्ञे न्यवेदयन्ग्रात्रौ क्षुभिताः पुररक्षिणः॥२६॥ सोऽप्यन्विष्य प्रभातच्छण्डमहासेनः पलायितम्। हृतवासवदत्तं च वत्सराजमबुध्यत॥२७॥ तत्पुत्रः पालकाख्योऽथ ज्ञातकोलाहले पुरे। अभ्यधावत्स वत्सेशामभिरुह्य नडागिरिम्॥२८॥

द्वितीय लम्बक २१

द्वितीय लम्बक २१ राजा उदयन उसके साथ विविध वार्तालाप के प्रसंग में वासवदत्ता को यौगन्धरायण की योजना बतला दी। वासवदत्ता ने उसकी योजना स्वीकार करके अपने महावत आषाढ़क को बुलाकर उसे हस्तिनी पर सवार करा दिया और देवता के प्रसाद का बहाना बनाकर प्रधान महावतों को खूब मद्य पिला दिया ॥१३-१५॥ इसके पश्चात् सायंकाल के समय आषाढ़क अपनी उस हस्तिनी को सजाकर तैयार करके वहाँ ले आया ॥१६॥ सजी हुई हस्तिनी ने एक चिग्घाड़ किया जिसे सुनकर हाथियों की शब्दावली को समझने वाले प्रधान महावत ने मद्ये में चूर अतएव अस्पष्ट अक्षरों में कहा- 'हस्तिनी कह रही है कि आज मैं तिरसठ योजन जाऊँगी' ॥१७-१८॥ इतना बोल लेने के बाद फिर उसे होश न रहा और न वह कुछ सोच ही सका। दूसरे महावतों ने भी मद्ये में चूर रहने के कारण उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। तदनन्तर वत्सराज यौगन्धरायण द्वारा दी गई औषधियों से बन्धनमुक्त होकर वीणा और वासवदत्ता के लाये हुए आयुधों के साथ वसन्तक के सहित वह उस हस्तिनी पर आरूढ हुआ ॥१९-२१॥ इसके पश्चात् वासवदत्ता भी अपनी एकान्त सहेली काञ्चनमाला के साथ उसी हस्तिनी पर सवार हो गई ॥२२॥ कुछ ही समय में वत्सराज उदयन अपने साथियों के साथ टूटी हुई चहारदीवारी के मार्ग से उज्जयिनी के बाहर निकल गया ॥२३॥ उस स्थान पर पहरा देनेवाले वीरबाहु तथा तालभट नामक दोनों क्षत्रिय सिपाहियों को वत्सराज ने स्वयं ही मार डाला ॥२४॥ बाहर निकलकर वासवदत्ता के साथ उदयन प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ता गया। हस्तिनी पर आषाढ़क ने अंकुश लगा रखा था ॥२५॥ उधर उज्जयिनी में पहरेदारों ने दो वीर सिपाहियों की मृत्यु का समाचार राजा के पास पहुँचाया। चंडमहासेन ने चारों ओर खोज करने पर यह मालूम कर लिया कि उदयन वासवदत्ता को लेकर भाग गया। चंडमहासेन का लड़का पालक भी शोरगुल सुनकर और नलागिरि हाथी पर सवार होकर उनका पीछा करने लगा ॥२६-२८॥ २६

५२ कथासरित्सागरे

५२ कथासरित्सागरे वत्सेशोऽपि तमायान्तं पथि वानरयोधयत् । नडागिरिः करेणुं तां दृष्ट्वा न प्रजहार च ॥२९॥ ततः स पालको भ्रात्रा पश्चादेत्य न्यवार्यत । गोपालकेन वाक्यज्ञः पितृकार्यानुरोधिना ॥३०॥ वत्सराजोऽपि विलम्ब्य गन्तुं प्रवृते ततः । गच्छतश्चास्य शनकैः शर्वरी व्यत्यहीयत ॥३१॥ ततो विन्ध्याटवीं प्राप्य मध्याह्ने तस्य भूपतेः । त्रिषष्टियोजनायाता तृषिताभूत्करेणुका ॥३२॥ अवतीर्णे सभार्ये च राज्ञि तस्मिञ्जराणि सा । पीत्वा तदोपतं प्राप पञ्चतां हस्तिनी क्षणात् ॥३३॥ विषण्णोऽथ स वत्सेशः सह वासवदत्तया । गगनादुद्गतामेतां शृणोति स्म सरस्वतीम् ॥३४॥ अहू मायावती नाम राजन् ! विद्याधराङ्गना । इयन्तं कालमभवं शापशेषेण हस्तिनी ॥३५॥ उपकारं च वत्सेश तवाद्य श्रुतिवत्यहम् । करिष्यामि च भूयोऽपि स्वत्पुत्रस्य भविष्यतः ॥३६॥ एषा वासवदत्ता च पत्नी ते नैव मानुषी । दैवीय कारणवशादवतीर्णा क्षिताविति ॥३७॥ सतः स हृष्टो व्यसृजन्निव्यसानु वसन्तकम् । पुलिन्दकाय सुहृदे वक्तुं स्वागमनं नृपः ॥३८॥ स्वयं च पादचारी सन् स घर्मैयसिकान्वितः । तभव गच्छन्नुत्थाय दस्युभिः पर्यवार्यत ॥३९॥ धनुर्द्वितीयो वस्तूनां तेषां पञ्चोत्तर शतम् । पुरी वासवदत्ताया वत्सराजः स चावधीत् ॥४०॥ तत्क्षण सोऽस्य राज्ञोऽथ मित्र चागात्पुलिन्दकः । यौगन्धरायणसखी वसन्तकपुरःसरः ॥४१॥ स तान्दस्त्युभिदार्यान्यान्वत्सेश प्रजिघाय तम् । नयति स्म निजां पत्नीं भिल्लराजः सवस्तनम् ॥४२॥ तत्र तां रात्रिमाराध्यवर्मपादितषापया । स वत्सेशो दिशायाम सह वासवदत्तया ॥४३॥

द्वितीय लम्बक २३

द्वितीय लम्बक २३ वत्सराज ने उसे पीछा करते हुए देखकर बाणों से युद्ध प्रारम्भ किया। किन्तु नडागिरि ने मदवती हाथी को देखकर प्रहार नहीं किया॥२९॥ तदनन्तर पिता की आज्ञा से आये हुए दूसरे राजकुमार गोपालक ने जाकर पालक को लौटा लिया। उसके लौट जाने पर वत्सराज भी सुख और शान्तिपूर्वक सारा दिन यात्रा करता रहा। धीरे-धीरे रात समाप्त हुई। तब मध्याह्न समय तिरसठ योजन चल लेने पर हस्तिनी को प्यास लगी॥३०-३२॥ राजा और रानी के उतर जाने पर हस्तिनी ने पेट भर पानी पिया और इसी कारण वह मर भी गई ॥३३॥ घोर विन्ध्यारण्य में खड़े और हस्तिनी के मर जाने से दुःखित राजा ने आकाशवाणी सुनी—॥३४॥ 'हे राजन् ! मैं मायावती नाम की विद्याधरी हूँ। शाप के कारण हस्तिनी बन गई थी। मैंने अपने जीवन के रहते तुम्हें भागने में सहायता दी। भविष्य में भी तुम्हारे होनेवाले पुत्र का उपकार करूँगी॥३५-३६॥ कुमारी वासवदत्ता जो तुम्हारी पत्नी होनेवाली है वह भी मानव नहीं है, प्रत्युत शाप के कारण मनुष्य-रूप में पृथ्वी पर अवतीर्ण हुई है॥३७॥ तब राजा ने अपने नर्म-सचिव वसन्तक को विन्ध्य-शिखर पर स्थित अपने मित्र पुलिन्दक को अपने आगमन की सूचना देने के लिए भेजा॥३८॥ और स्वयं भी राजा वासवदत्ता के साथ पदयात्रा करता हुआ धीरे-धीरे उसी ओर जाता हुआ डाकुओं से घेर लिया गया। हाथ में धनुष लिये हुए राजा अकेला था और डाकू संख्या में एक सौ पाँच थे। राजा उदयन ने वासवदत्ता के देखते-देखते सबको एक-एक करके मार डाला॥३९-४०॥ उसी समय वत्सराज का मित्र पुलिन्दक वसन्तक को आगे किये हुए यौगन्धरायण के साथ आ पहुँचा॥४१॥ पुलिन्दक ने आते ही बचे-खुचे डाकुओं को भगाकर वत्सराज को प्रणाम किया और वासवदत्ता के साथ उसे अपने ग्राम में ले गया॥४२॥ जंगली कुशाओं के आघात से छिले हुए कोमल चरणोंवाली वासवदत्ता के साथ राजा ने उस रात्रि को भिल्लपल्ली में ही व्यतीत किया॥४३॥

२४ कथासरित्सागर

२४ कथासरित्सागर प्रातः सेनापतिश्चास्य रुमन्वन्नापदान्तिकम्। यौगन्धरायणं प्राग्दूतं सम्प्रेष्य योषितः ॥४४॥ आगाञ्च कटकं सञ्च तया व्याप्तदिगन्तरम् । यथा विन्ध्याटवीं प्राप सा सम्बाधरसङ्गताम् ॥४५॥ प्रविश्यकटकं तस्मिंस्तस्यामेवाटवीभुवि । तस्यावुज्जयिनीवासां त्रास वत्सेश्वरोऽथ सः ॥४६॥ तत्रस्थं च समभ्यागादुज्जयिन्या वणिक्तया। योगन्धरायणसुहृत्स वागत्याब्रवीदिदम् ॥४७॥ देव चण्डमहासेनः प्रीतो जामातरि त्वयि । प्रेषितश्च प्रतीहारस्तेनेह भवदन्तिकम् ॥४८॥ स नागच्छन् स्थितः पश्चादहमग्रत एव तु। प्रच्छन्नः सत्वरं देवि! विज्ञापयितुमात्मनः ॥४९॥ एतच्छ्रुत्वा स वत्सशो जहर्ष च शशंस च। सर्वं वासवदत्तायाः सापि हर्षमगात्परम् ॥५०॥ कृतबन्धुपरित्यागा विवाहविधिसत्वरा । अथ वासवदत्ता सा सलज्जा चोत्सुका तया ॥५१॥ ततः स्वान्तविनोदाय निकटस्थं वसन्तकम्। सा जगाद कथा काचित्त्वया मे कथ्यतामिति ॥५२॥ स च मुग्धदृशस्तस्या भर्तृभक्तिविवर्धिनीम् । वसन्तकस्तदा धीमानिमामकथयत्कथाम् ॥५३॥ गुहसेनदेवस्मितयोः कथा अस्तीह नगरी लोके ताम्रलिप्तीति विश्रुता । तस्यां च धनदत्ताख्यो वणिगासीन्महाधनः ॥५४॥ स चापुत्रो बहून्विप्रान्मुकुटश्च प्रणतोऽब्रवीत् । तथा कुरुत पुत्रो मे यथा स्यादचिरादिति ॥५५॥ ततस्तमूचुर्विप्रास्त नैतत्किञ्चन दुष्करम् । सर्वं हि साधयन्तीह द्विजः धोतेन कर्मणा ॥५६॥ तथा च पूर्वमभवद्राजा कश्चिदपुत्रकः । पञ्चोत्तरं शतं धामुसन्यान्तं पुण्योषिताम् ॥५७॥ पुत्रोत्पद्या च सम्यक्तो जन्तुर्नाम सुतोऽजनि । तत्पत्नीनामगणनां मृतगम्भूय्या इति ॥५८॥

द्वितीय लम्बक २५

द्वितीय लम्बक २५ यौगन्धरायण द्वारा दूत के मुंह से पहले से ही सूचित वत्सराज का प्रधान सेनापति रुमण्वान् भी वहाँ आ पहुँचा ॥४४॥ उसके साथ ही चारों दिशाओं को व्याप्त करती हुई सेनाएँ भी आ पहुँचीं ॥४५॥ उस विन्ध्यभूमि में स्थित अपनी सेना के शिविर में प्रवेश करके उज्जयिनी का समाचार प्राप्त करने के लिए उसने स्थिर रूप से निवास किया। जब उदयन उसी शिविर में निवास कर रहा था उसी समय यौगन्धरायण का मित्र एक बनिया उज्जयिनी से वहाँ आया और कहने लगा—'महाराज ! उज्जयिनी-नरेश चण्डमहासेन आप जामाता पर बहुत प्रसन्न हैं। उसने आपके पास अपने सन्देशवाहक प्रतिहार (खवास) को भेजा है ॥४६ ४८॥ वह आकर यहाँ ठहरा है। पहले मैं यहाँ आया हूँ। वह गुप्त रूप से आपसे निवेदन करना चाहता है। इसका आगमन जानकर वत्सराज प्रसन्न हुआ और राजा की उसने प्रशंसा की। वासवदत्ता भी उससे प्रसन्न थी। यह समाचार सुनते समय अपने बन्धुओं को छोड़कर आई हुई और विवाह के लिए शीघ्रता करती हुई वासवदत्ता लज्जित और उत्सुक हुई। उसने निकट बैठे हुए वसन्तक से कहा कि तुम एक कहानी सुनाओ ॥४९—५२॥ वसन्तक ने भी उस सुलोचना वासवदत्ता को पतिभक्ति बढानेवाली कहानी सुनाना प्रारम्भ किया ॥५३॥ गुहसेन और देवस्मिता की कथा इस देश में ताम्रलिप्ति नाम से प्रसिद्ध एक नगरी है। उसमें बहुत बड़ा धनी धनदत्त नाम का एक वैश्य रहता था ॥५४॥ वह पुत्रहीन था अतः उसने बहुत-से ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें प्रणाम करके निवेदन किया कि आप लोग ऐसा उपाय करें जिससे मुझे पुत्र लाभ हो ॥५५॥ यह सुनकर ब्राह्मणों ने कहा 'यह कोई कठिन काम नहीं है। ब्राह्मण लोग वैदिक कर्मों से सभी दुष्कर कार्यों को सुकर बना सकते हैं ॥५६॥ प्राचीन समय में एक पुत्रहीन राजा था उसकी एक ही पाँच रानियाँ थी। पुत्रेष्टि यज्ञ करने के पश्चात् राजा के घर जन्तु नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ जो सभी मौसा की आँखों के लिए दूज के चाँद के समान था ॥५७-५८॥

२६ कथासरित्सागर

२६ कथासरित्सागर जानुभ्यां पर्यटन्तं च बालं जातु पिपीलिका। कण्ठदेशे ददंशैनं मुक्तचूत्कारकातरम्॥५९॥ तावता तुमुलाक्रन्दमन्तःपुरमजायत। राजापि पुत्र पुत्रेति चक्रन्द प्राकृतो यथा॥६०॥ क्षणात्तस्मिन्समाश्वस्ते बालेऽपास्तपिपीलिके। दुःखकारणं राजा स निनिन्दैकपुत्रताम्॥६१॥ अस्ति कश्चिदुपायो मे येन स्युर्बहवः सुताः। इति सत्परितापेन पप्रच्छ ब्राह्मणांश्च सः॥६२॥ ते च प्रत्यब्रुवन् राजन्नुपायोऽत्र तवास्त्ययम्। हृत्वैतं त्वत्सुतं वह्नौ सन्मांसं हूयतेऽखिलम्॥६३॥ तद्धूमगन्धाघ्राणतो राज्ञ सर्वा प्राप्स्यन्ति तं सुतान्। एतच्छ्रुत्वा स राजा तत्तथा सर्वमकारयत्॥६४॥ स्वपत्नी समसंख्यांश्च स पुत्रान् प्राप्तवान्नृपः। अतस्त्वपि होमेन साधयामो वय सुतम्॥६५॥ इत्युक्त्वा धनदत्तं च ब्राह्मणाः कल्पितदक्षिणम्। होमं चक्रुस्ततस्तस्य वणिजो जातवान्सुतः॥६६॥ गुहसेनाभिधानश्च स बालो ववृधे क्रमात्। पितास्य धनदत्तोऽन्य भार्यामिन्विष्यति स्म सः॥६७॥ तत स सत्पिता तेन तनयेन समं ययौ। द्वीपान्तरं स्नुषाहेतोर्वणिज्याव्यपदेशतः॥६८॥ तत्र देवस्मितां नाम धर्मगुप्ताद्वणिग्वरात्। स्वपुत्रगुहसेनस्य कृते कन्यामयाचत॥६९॥ धर्मगुप्तस्तु सम्बन्धं न तमङ्गीचकार सः। आलोच्य ताम्रलिप्तीं तां दूरां दुहितृवत्सलः॥७०॥ सा तु देवस्मिता दृष्ट्वा गुहसेनं दधेथ तम्। तद्गुणाकृष्टचित्तत्वाद् वन्यत्यागेकनिश्चया॥७१॥ अङ्गीमूल्यं कृत्वा च सङ्केतं सह तेन सा। प्रियण पितृयुक्तेन रात्रौ द्वीपात्ततो ययौ॥७२॥ ताम्रलिप्तीमथ प्राप्य तयोः कृतविवाहयोः। जायापत्योमिषः प्रेमपाशबद्धमभून्मनः॥७३॥

द्वितीय लम्बक २७

द्वितीय लम्बक २७ किसी समय घुटनों के बल रेंगते हुए उस बालक की जांघ में एक चींटी ने काट लिया। फलतः बच्चा चिल्लाकर व्याकुल हो गया ॥५९॥ इतने में ही रनिवास में कोलाहल मच गया। राजा भी 'पुत्र-पुत्र' कहते हुए साधारण व्यक्तियों के समान रोने लगा ॥६०॥ कुछ समय के उपरान्त चींटी को हटा देने और बालक को चुप करा देने पर राजा एक- पुत्रता की निन्दा करने लगा। एक पुत्र का होना दुःख का कारण होता है। क्या कोई ऐसा भी उपाय है कि मेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न हो जायें सन्ताप के कारण राजा ने पुनः ब्राह्मणों को बुलाकर इस प्रकार पूछा ॥६१॥ ब्राह्मणों ने उससे कहा—'हाँ एक उपाय है। वह यह कि तुम्हारे इस लड़के को मारकर उसके मांस से हवन किया जाय। उस हवन-धूम की गन्ध को पाकर तुम्हारी सभी रानियाँ गर्भवती हो जायेंगी और तुम्हें अपनी रानियों की संख्या के बराबर पुत्र उत्पन्न होंगे। ब्राह्मणों की यह बात सुनकर राजा ने उनके कथनानुसार कार्य करना स्वीकार किया और तदनुरूप सारी व्यवस्था की। ब्राह्मणों ने पुत्र-कामना के लिए दक्षिणा का निश्चय करके यज्ञ किया और उससे गुहसेन नामक बालक उत्पन्न हुआ ॥६२-६६॥ बड़े होने पर उसके पिता ने उसके विवाह के लिए स्त्री ढूँढ़ना प्रारम्भ किया ॥६७॥ इसी प्रसंग में व्यापार के बहाने धनदत्त उसे लेकर पुत्रवधू लाने के लिए दूसरे द्वीप में भेजा गया ॥६८॥ दूसरे द्वीप में जाकर उसने धर्मगुप्त नामक बनिये से उसकी देवस्मिता नाम की कन्या को अपने पुत्र गुहसेन के लिए माँगा ॥६९॥ कन्या के अत्यन्त प्रिय होने के कारण और ताम्रलिप्ति को बहुत दूर समझकर धर्मगुप्त ने अपनी कन्या उसे नहीं दी ॥७०॥ किन्तु उसकी कन्या देवस्मिता गुहसेन को देखकर उसके गुणों से आकृष्ट होकर और अपने परिवारवालों को त्याग कर उसके साथ आने के लिए तैयार हो गई ॥७१॥ किसी सहेली के द्वारा गुहसेन से गुप्त निश्चय करके देवस्मिता गुहसेन और उसके पिता के साथ रात के समय ताम्रलिप्ति चली आई ॥७२॥ ताम्रलिप्ति पहुँचकर उन दोनों का विवाह-सम्बन्ध हो जाने पर उन दोनों का मन परस्पर प्रेमपाश में दृढ़तापूर्वक बँध गया ॥७३॥

अथास्तं पितरि प्राप्त प्रेरितोऽभूत्स बन्धुभिः। कटाहद्वीपगमनं गुहसेनो यदृच्छया॥७४॥ तच्चास्य गमनं भार्या तदा नाङ्गीचकार सा। सेर्ष्या देवस्मिता कामम यन्त्रीसङ्गशङ्किनी॥७५ स च पत्न्यामनिच्छन्त्यां प्ररयरसु च बन्धुषु। कर्त्तव्यनिश्चलो मूढो गुहसेनो बभूव सः॥७६॥ अथ गत्वा निराहारश्चक्रे ववकुस व्रतं। उपायमिह देवो मे निर्दिशत्विति चिन्तयन्॥७७॥ सापि देवस्मिता तद्वत्तन सार्धं व्यधाद् व्रतम्। ततोऽनयो शिव स्वप्नं दम्पत्योर्दर्शन ददौ॥७८॥ द्वे च रक्ताम्बुजे दत्वा स दवस्तावभाषत। हस्ते गृह्णीतमकैकं पद्ममेतदुभावपि॥७९॥ दूरस्थत्वे च यद्येकं शीलत्यागं करिष्यति। तच्चन्यस्य करे पद्म म्लानिमष्यति सत्वरम्॥॥८०॥ एतच्छ्रुत्वा प्रवुद्धयथ दम्पती तावपश्यताम्। अन्योन्यस्येव हृदय हस्तस्थं रक्तमम्बुजम्॥८१॥ तत स चक्रे प्रस्थानं गुहसेनो धृताम्बुजः। सा तु देवस्मिता तत्र तस्थौ पद्यापितेक्षणा॥८२॥ गुहसेनोऽपि तं प्राप कटाहद्वीपमाशु सः। कर्त्तुं प्रववृत धात्र रत्नानां क्रयविक्रयौ॥८३॥ हस्ते च तस्य तद्दृष्ट्वा सर्वैवाम्लानमम्बुजम्। तत्र कश्चिद् वणिक्पुत्राश्चत्वारो विस्मयं ययुः॥८४॥ ते युक्त्या स गृहं नीत्वा पाययित्वा भृशं मधु। पप्रच्छुः पद्मवृत्तान्तं सोऽपि धीरः शशंस तम्॥८५॥ घघस्त्व धिरनिर्व्वाह्यरत्नाविभ्रयविक्रयम्। विचिन्त्य गुहसगं तं चत्वारोऽपि वणिग्बसुताः॥८६॥ समन्त्र्य कौतुकात्पापास्तद्भार्याशीलविप्लवम्। चिकीर्षवो ययुः शीघ्रं ताम्रलिप्तीमलक्षिताः॥८७॥ तत्रोपायं विचिन्वन्त मुगतायतनस्थिताम्। प्रव्राजिकामुपाजग्मुर्नाम्ना योगकरण्डिकाम्॥८८॥

द्वितीय लम्बक १०१

द्वितीय लम्बक १०१ कुछ समय के अनन्तर पिता की मृत्यु हो जाने पर गुहसेन को साथियों ने कटाह-द्वीप जाने की प्रेरणा दी॥७४॥ किन्तु उसकी पत्नी देवस्मिता ने अन्य स्त्रियों के समागम के भय से उसे जाने की अनुमति नहीं दी॥७५॥ एक ओर पत्नी के रोकने से और दूसरी ओर बन्धुओं की प्रेरणा से गुहसेन अपने कर्त्तव्य के प्रति विमूढ़ हो गया कि वह क्या करे, जाय या न जाय॥७६॥ तब गुहसेन ने देवमन्दिर में जाकर निराहार व्रत करना प्रारम्भ किया कि देवता मुझे जो उपाय बतायेंगे वही करूँगा ॥७७॥ उसके व्रत को देखकर देवस्मिता ने भी उसके साथ ही व्रत करना प्रारम्भ किया। व्रत से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दम्पति को स्वप्न में दर्शन दिया॥७८॥ और दोनों को दो कमल के पुष्प दे कर कहा कि 'एक-एक पुष्प तुम लोग अपने-अपने हाथ में रखो। दूर रहकर भी तुम दोनों में से यदि एक कोई भी सदाचार का त्याग करेगा तो दूसरे के हाथ का कमल मुरझा जायगा अन्यथा दोनों ही विकसित रहेंगे ॥७९-८०॥ सोकर उठने पर वैश्य-दम्पती ने अपने-अपने हाथों में एक-एक लाल कमल देखा। वे कमल मानों दोनों के हृदय प्रत्यक्ष रूप से दोनों के हाथों में थे॥८१॥ इस घटना के उपरान्त हाथ में कमल लिये हुए उस गुहसेन ने व्यापार के लिए कटाह द्वीप की ओर प्रस्थान किया किन्तु देवस्मिता घर पर ही कमल पर आँखें गड़ाई हुई रहने लगी ॥८२॥ कटाह द्वीप में पहुँचने पर गुहसेन ने रत्नों की खरीद-बेच प्रारम्भ की॥८३॥ उसके हाथ में सदा खिले हुए कमल को देखकर चार वैश्यपुत्रों को बहुत आश्चर्य हुआ ॥८४॥ वे किसी उपाय से उसे अपने घर ले गये और उसे मद्य-पान पिलाकर पद्म के सम्बन्ध में उससे पूछा। उस मदोन्मत्त गुहसेन ने भी सारा वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया उन चारों ने गुहसेन की पत्नी का चरित्र नष्ट करने की कल्पना से गुप्त रूप से ताम्रलिप्ति की ओर प्रस्थान किया॥८५-८७॥ वहाँ पहुँचकर दुराचार के लिए उपाय सोचते हुए वे चारों दुष्ट किसी जैन-मन्दिर में गृहस्वामिनी योग-करण्डिका नाम की परिव्राजिका (तपस्वी) के पास गये ॥८८॥ २७

२१० कथासरित्सागर

२१० कथासरित्सागर प्रीतिपूर्वं च तामूचुर्भगवत्यस्मदीप्सितम्। साध्यते यत्त्वया तत्ते दास्यामोऽर्थान् बहूनिति॥८९॥ साप्युवाच ध्रुवं यूनां कापि स्त्री वाञ्छितेह य। तद्ब्रूत साधयाम्येष धनलिप्सा च नास्ति मे॥९०॥ अस्ति सिद्धिकरी नाम शिष्या मे बुद्धिशालिनी। तत्प्रसादेन सम्प्राप्तमसख्यं हि धन मया॥९१॥ सिद्धि कथा कथ शिष्याप्रसादेन भूरि प्राप्तं धनं त्वया। इति तैः सा वणिक्पुत्रैः पृष्टा प्रव्राजिकाब्रवीत् ॥९२॥ कौतुकं यदि तत्पुत्राः श्रूयतां वर्णयामि वः। इह कोऽपि वणिक्पूर्वमाययावुत्तरापथात् ॥९३॥ तस्यह्रस्वस्य मञ्जिष्ठय्या सा गत्वा शिक्षिय गृहे। युक्त्या कर्मकरीभावं कृतरूपविवर्तना ॥९४॥ विश्वास्य वणिजं तं च तद्गृहात् स्वजसञ्चयम्। सर्वं मुषित्वा प्रच्छन्नं प्रत्यूषे साच निर्ययौ ॥९५॥ नगरीनिर्गतां दृष्ट्वा खट्वापीठप्रगतिं च ताम्। मृदङ्गहस्तो मायाय डोम्बः कोऽप्यन्वगाद्द्रुतम् ॥९६॥ न्यग्रोधस्य तलं प्राप्य सा दृष्ट्वा समुपागतम्। डोम्बं सिद्धिकरी धूर्ता सदैवमेवमब्रवीत् ॥९७॥ भर्त्रा सहाद्य कलहं कृत्वाहं निर्गता गृहात्। मर्त्तुं तन्मम पाशोऽत्र त्वया मे बध्यतामिति ॥९८॥ पाशेन म्रियतामेषा किमेनां हन्म्यहं स्त्रियम्। मत्वेति तत्र वृक्षोऽसौ डोम्बः पाशमसज्जयत् ॥९९॥ ततः सिद्धिकरी डोम्बं सा मुग्धेव जगाद तम्। क्रियते कथमूद्वन्धरस्त्वया मे दर्श्यतामिति ॥१००॥ ततः स डोम्बस्तं दत्त्वा मृदङ्गं पादयोरधः। इत्थं क्रियत इत्युक्त्वा स्वकण्ठे पाशमर्पयत् ॥१ १॥ सापि सिद्धिकरी सद्यस्तं मृदङ्गमचूर्णयत्। पादाघातेन डोम्बोऽथ सोऽपि पाशं व्यपद्यत ॥१ २॥ तत्कालेमागतोऽन्वष्टुं वृक्षमूले ददर्श सः। मुषिताशेषकोशों तां दूररसिद्धिकरीं वणिक् ॥१ ३॥

द्वितीय लम्बक १९१

द्वितीय लम्बक १९१ और उससे कहने लगे—'हे देवि यदि तुम हमारा कार्य सिद्ध कर दोगी तो तुम्हें हम बहुत-सा धन देंगे' ॥८९॥ वह स्त्री बोली—'यदि तुम लोग किसी स्त्री को चाहते हो तो बताओ। मैं तुम्हारा कार्य करा दूँगी। मुझे धन का लालच नहीं है'॥९० ॥ सिद्धिकरी नाम की मेरी एक बुद्धिमती शिष्या है। उसकी कृपा से मैंने अगण्य धन प्राप्त किया है ॥९१॥ सिद्धि की कथा 'तुमने शिष्या की कृपा से अगण्य धन कैसे प्राप्त किया ?' वीरपुत्रों द्वारा इस प्रकार पूछने पर संन्यासिनी बोली—॥९२॥ बेटो ! यदि तुम्हें सुनने की इच्छा है तो सुना करती हूँ। एक बार उत्तामरण से कोई बनिया यहाँ आया था ॥९३॥ मेरी शिष्या किसी उपाय से उसके घर जाकर टिक गई। उसने अपना रूप बिगाड़कर सेविका (मजदूरनी) का रूप धारण किया ॥९४॥ धीरे-धीरे वह उस बनिए पर विश्वास जमाकर उसके घर में रखे हुए समस्त स्वर्ण भांडार को लेकर अत्यन्त प्रातःकाल में छिपकर निकल गई ॥९५॥ नगर से बाहर पकड़े जाने के भय से शीघ्रतापूर्वक भागती हुई उसे देखकर मार्ग में एक डोम उसका धन छीनने के लिए उसका पीछा करने लगा ॥ ९६॥ चतुरा सिद्धिकरी ने समझ लिया और एक पीपल के वृक्ष के नीचे पहुँचकर उसने बड़ी ही दीनता के साथ उस डोम से कहा— आज मैं अपने पति के साथ कलह करके मरने के लिए घर से भाग आई हूँ। इसलिए हे भले आदमी ! तुम मेरे लिए फाँसी का फन्दा बाँध दो। 'यह फाँसी के फन्दे से स्वयं ही मर जाय तो स्त्री-हत्या क्यों करूँ'—यह सोचकर उसने वृक्ष में फाँसी का फन्दा लटका दिया ॥९७—९८॥ तब वह सिद्धिकरी अनजान और भोली-भाली सी बनकर कहने लगी— इस फन्दे को गले में कैसे बाँधा जाता है जरा मुझे बाँधकर दिखलाओ ॥९९॥ तब उस मूर्ख डोम ने पीपल के नीचे हाथ रखकर फन्दे को गले में डालकर फाँसी का फन्दा बाँध दिया ॥१००॥ इतने ही में सिद्धिकरी ने उस हाथ को तुरन्त अलग कर दिया और उसके लटकते ही उस स्थान से नीचे के कपड़े को सम्भालकर भाग गई ॥१०१॥ [L30: कुछ समय पश्चात् सिद्धिकरी को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परिजन वहाँ आए और पेड़ से लटके हुए डोम के नीचे सिद्धिकरी को नहीं देखा ॥१०२॥ १. चाण्डाल का कार्य करनेवाली नीच जाति का पुरुष जिसे डोम कहते हैं।—सं०

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द्वितीय लम्बक २१५

द्वितीय लम्बक २१५ सिद्धिकरी भी उसे देखकर वृक्ष पर चढ़ गई और घने पत्तों में अपने को छिपाकर बैठ गई॥१४॥ नौकर के साथ उस बनिये ने आकर देखा तो केवल डोम फाँसी के फन्दे में झूल रहा है। उसने सिद्धिकरी को कहीं नहीं देखा। 'वह कहीं वृक्ष पर न चढ़ी हो' ऐसा सोचकर बनिये का नौकर वृक्ष पर चढ़ गया। उसे पेड़ पर चढ़कर समीप आया हुआ देखकर सिद्धिकरी बोली—'हे सुन्दर, मैं सचमुच तुम पर आसक्त हूँ। आओ यह धन भी लो और मेरे शरीर का भोग भी करो। ऐसा कहकर उसने उस भृत्य का आलिंगन करके चुम्बन लेते हुए उसकी जीभ को दाँतों से काट दिया ॥१५-१८॥ वेदना से पीड़ित और मुँह से रक्त बहाता हुआ बनिये का वह नौकर उस वृक्ष से नीचे गिरा और ल ल ल करता हुआ अस्पष्ट भाषण करने लगा ॥१९॥ उसे देखकर बनिया डरा कि इसपर भूत सवार हो गया है और बचे हुए नौकरों को लेकर शीघ्रता से घर की ओर भागा ॥११ ॥ उसके भागते ही वह तपस्विनी सिद्धिकरी वृक्ष से नीचे उतरी और धन की गठरी लेकर अपने घर पहुँची ॥१११॥ हे बेटे ! इस प्रकार मेरी शिष्या अति प्रतिभाशालिनी है और उसी की कृपा से मैंने बहुत-सा धन प्राप्त किया है॥११२॥ ऐसा कहकर उस परिव्राजिका ने उसी समय आई हुई अपनी शिष्या को उन्हें दिखाया और उसका परिचय उनसे कराया ॥११३॥ इसके पश्चात् उनसे बोली—'बेटे ! अब तुम अपना कार्य बताओ। किस स्त्री को तुमलोग चाहते हो। मैं उसे अभी सिद्ध करती हूँ' ॥११४॥ उसकी बाते सुनकर वैश्यपुत्र बोले—'गुहसेन व्यापारी की देवस्मिता नाम की जो स्त्री है, उससे हम लोगो का संगम कराओ' ॥११५॥ उनकी बात सुनकर परिव्राजिका ने कार्य साधने की प्रतिज्ञा की और उन वैश्यपुत्रों के ठहरने का प्रबन्ध अपने ही घर में कर दिया ॥११६॥ उनके वहाँ ठहरने पर उन्हें भोजन आदि सत्कार से प्रसन्न करके वह दुष्टत्री अपनी तपस्विनी शिष्या के साथ गुहसेन के घर गई ॥११७॥ जब वह देवस्मिता के द्वार पर पहुँची तब जंजीर में बँधी हुई कुतिया ने भूँकते हुए अन्दर जाने से रोका ॥११८॥

२१४ कथासरित्सागर

२१४ कथासरित्सागर ततो देवस्मिता दृष्ट्वा सा तां प्रावेशयत्स्वयम्। किमागता स्यादेषेति विचिन्त्य प्रेष्य चेटिकाम्॥११९॥ प्रविष्टा चाशिषं दत्त्वा कृत्वा व्याजकृतादराम्। सा तां देवस्मितां साध्वीं पापा प्रव्राजिकाब्रवीत्॥१२०॥ सदैव त्वद्दिदृक्षा मे भवत्यद्य पुनर्मया। स्वप्ने दृष्टासि तेनाहमुत्का त्वां द्रष्टुमागता॥१२१॥ भर्त्रा विनाकृता त्वां च दृष्ट्वा मे दूयते मनः। प्रियोपभोगवन्ध्ये हि विफले रूपयौबने॥१२२॥ इत्यादिभिर्वचोभिस्तां साध्वीमाश्वास्य सा चिरम्। आमन्त्र्य प्राययौ तावद् गृहं प्रव्राजिका निजम्॥१२३॥ द्वितीयेऽहनि गृहीत्वा च मरिचक्षोदनिर्भरम्। मांसखण्डं पुनः सा तद्ययौ देवस्मितागृहम्॥१२४॥ द्वारशुने ददौ तस्यै मांसखण्डं च तत्र तम्। सापि तं भक्षयामास सद्यः समरिचं शुनी॥१२५॥ ततो मरिचतोयेण तस्या दृग्भ्यामवारितम्। अश्रु प्रववृते तस्याः प्रस्रोति स्म च नासिका॥१२६॥ सापि प्रव्राजिका तस्मिन् क्षणे देवस्मितान्तिकम्। प्रविश्य तत्कृतातिथ्या प्रारभे रोदितुं शठा॥१२७॥ पृष्टा च देवस्मितया सा कृच्छ्रादेवमब्रवीत्। पुत्रि! सम्प्रति पश्यैतां बहिः प्रस्रवतीं शुनीम्॥१२८॥ एषा ह्यद्य परिज्ञाय मां जन्मान्तरसङ्गताम्। प्रवृत्ता रोदितुं तेन कृपयाश्रु ममोद्गतम्॥१२९॥ तच्छ्रुत्वा बहिरालोक्य शुनीं तां रुदतीमिव। किमेतच्चित्रमिति सा दध्यौ देवस्मिता क्षणम्॥१३०॥ प्रव्राजिकाथ सावादीत् पुत्रि पूर्वत्र जन्मनि। अहमेषा च भार्ये द्वे विप्रस्याभूव कस्यचित्॥१३१॥ स चाभवत् पतिर्दूरे देशान्तरमितस्ततः। वारं वारं प्रयाति स्म राजादेशेन दूत्यया॥१३२॥ तत्प्रवासे च दुर्मत्या स्वेच्छं पुरुषसङ्गमम्। मया भूतेन्द्रियग्रामो मोपभोगैरखण्द्यत॥१३३॥ भूतेन्द्रियानभिद्रोहो धर्मो हि परमो मतः। अतो जातिस्मरा पुत्रि! जाताहमिह जन्मनि॥१३४॥ एषा तु शीलमेवैकं ररक्षामानग्रस्तता। तेन श्वयोनौ पतिता किन्तु जातिं स्मरत्यसौ॥१३५॥