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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

[Header] १५८ कथासरित्सागर

[Header] १५८ कथासरित्सागर ततो विहस्य सोऽवादीद्विप्रो मूढाः क्व मानुषः। क्व च तिर्यक्स मार्जारश्चतुष्पात् पुच्छवानपि ॥१७४॥ तच्छ्रुत्वा तं वटुं मुक्त्वा तेऽब्रुवन्मन्दबुद्धयः। तद्गान्विष्यानयामस्तं मार्जारं तादृशं पुनः ॥१७५॥ एवमुक्तवतो मूढाञ्जनस्तत्र जहास तान्। अज्ञता नाम कस्येह नोपहासाय जायते ॥१७६॥ मार्जारमोतः कथितः श्रूयतामपरेऽप्यमी। आसीद् बहूनां मुग्धानां मुख्यो मुग्धो मठे क्वचित् ॥१७७॥ स केनचिद्वाच्यमानाद्धर्मशास्त्रात् कदाचन। तडागकर्त्तुरक्षोपीदमत्र सुमहत् फलम् ॥१७८॥ ततः स धनसम्पूर्णो विपुलं वारिपूरितम्। तडागं कारयामास नातिदूरे निजान्मठात् ॥१७९॥ एकदा स तडागं तं द्रष्टुं मुग्धाग्रणीर्गतः। केनाप्युत्पाटितान्यस्य पुलिनानि व्यलोकयत् ॥१८०॥ तथैवागत्य सोऽन्येद्युरुत्खातं तटमन्यतः। दृष्ट्वा तस्य तडागस्य सोद्वेगं समचिन्तयत् ॥१८१॥ प्रातः प्रभातादारभ्य स्थास्यामीहैव वासरम्। द्रक्ष्यामि कः करोत्येतदित्यालोच्य ययौ प्रगे ॥१८२॥ अन्येद्युर्यावदेत्यास्ते तावत्तत्र ददर्श सः। दिवोऽवतीर्य शृङ्गाभ्यां खनन्तं वृषभं तटम् ॥१८३॥ दिव्यो वृषोऽयं तत्किं न दिवं यामि सहामुना। इत्युपेत्य वृषस्यास्य हस्ताभ्यां पुच्छमग्रहीत् ॥१८४॥ सतं पुच्छाप्रलम्बं च भीतमुत्क्षिप्य वेगतः। क्षणाभिनाय नभसः स्वं धाम भगवान् वृषः ॥१८५॥ तत्र दिव्यानि भक्ष्याणि मोदकादीन्यवाप्य सः। मुञ्जानो न्यवसद् भीतो दिनानि कतिचित् सुखम् ॥१८६॥ गतागतानि कुर्व्वाणं स दृष्ट्वा तं महावृषम्। अचिन्तयत भीतानां मुख्यो दैवेन मोहितः ॥१८७॥ गच्छामि वृषपुच्छाग्रलम्बं पश्यामि बान्धवान्। कथयित्वाऽमृतमिदं तथैवेष्याम्यहं पुनः ॥१८८॥ इति सञ्चिन्त्य वृषमस्यैकदोपेत्य तस्य सः। आलम्ब्य गच्छतः पुच्छमागाद् भीतो भुवंस्तलम् ॥१८९॥

दशम लम्बक ९५९

दशम लम्बक ९५९ यह सुनकर वह ब्राह्मण हँसकर बोला—अरे मूर्खो कहाँ यह मनुष्य और कहाँ वह पशु ? बिल्ली के चार पैर होते हैं और उसकी पूँछ भी होती है। यह सुनकर वे मूर्ख शिष्य उस बालक को छोड़कर बोले—'तब वैसे ही ढूँढ़कर लाते हैं' ॥१७५॥ ऐसा कहते हुए उन्होंने सभी को हँसा दिया। सच है, मूर्खता किसके हास्य का कारण नहीं होती ॥१७६॥ मार्जार-मूर्ख की कथा सुनी अब कुछ और मूर्खों की कथाएँ सुनो। किसी एक मठ में मूर्खो का मुखिया एक महामूर्ख था ॥१७७॥ उसने किसी कथावाचक से सुन लिया कि 'तालाब बनवानेवाले को इस लोक में बहुत पुण्य मिलता है। वह मठाधीश धनी था। उसने अपने मठ के पास ही पानी से भरा एक विशाल तालाब बनवाया ॥१७८ १७९॥ एक बार वह मूर्खराज उस तालाब को देखने के लिए गया । उसने तालाब के किनारों को किसी के द्वारा उखाड़े हुए देखा ॥१८०॥ इसी प्रकार दूसरे दिन उसने दूसरी ओर देखा और वह सोचने लगा कि 'यह कौन इसके किनारों को तोड़ता है। कल प्रातःकाल ही आकर यहाँ सारा दिन रहकर देखूँगा कि कौन ऐसा करता है—ऐसा सोचकर वह दूसरे दिन प्रातःकाल ही ज्यों ही वहाँ आया उसने आकाश से उतरकर सींग से किनारों को तोड़ते हुए एक बैल को देखा। 'ओह ! यह तो दिव्य बैल है इसलिए मैं भी इसके साथ ही सीधे स्वर्ग क्यों न चला जाऊँ ? —ऐसा सोचकर और उसके पास जाकर उसने हाथों से उस बैल की पूँछ पकड़ ली ॥१८१—१८४॥ पूँछ पकड़े हुए उसे लेकर नन्दी भगवान् क्षण-भर में अपने कैलासधाम जा पहुँचे ॥१८५॥ वह मूर्ख मठाधीश दिव्य भोजन लड्डू आदि खाकर, कुछ दिनों तक वहीं सुखपूर्वक रहा । नन्दी को प्रतिदिन पृथ्वी पर यातायात करते हुए देखकर वह मूर्खराज सोचने लगा कि बैल की पूँछ पकड़कर नीचे जाऊँ और अपने बन्धु-मित्रों से मिलूँ। उन्हें यह आश्चर्यजनक घटना सुनाकर फिर आ जाऊँगा । ऐसा सोचकर एकबार वह मूर्खराज उस नन्दी के पास जाकर उसकी पूँछ पकड़कर भूमि पर आ गया ॥१८६—१८९॥

९६ कथासरित्सागर

९६ कथासरित्सागर ततः प्राप्तो मठे भौटैरन्यैराश्लिष्य तत्स्थितैः । क्व गतोऽसीति पृष्टस्तं स्ववृत्तान्तं शशंस सः ॥१९०॥ ततः सर्वे श्रुताश्चर्या भीतास्ते प्रार्थयन्त सम्। प्रसीद नय तत्रास्मानपि भोजय मोदकान् ॥१९१॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्येतान् युक्तिमुक्त्वापरे दिने । तडागोपान्तमनयत् स च तत्राययौ वृषः ॥१९२॥ जग्राह तस्य लाङ्गूलं मुख्यः पाणिद्वयेन सः । तस्याप्यगृह्णाच्चरणौ न्यस्तस्तस्यापि चेतरः ॥१९३॥ इत्यन्योन्याङ्घ्रिलग्नैस्तैर्मौटैर्यावच्च शृङ्खला । रचिता स वृषस्तावदुत्पपात नभःस्थलम् ॥१९४॥ याति तस्मिंश्च वृषभे लाङ्गलालम्बिभौटके१ । मुख्यमेश्रं तमप्राक्षीदेको मौटोऽथ दवत२॥१९५॥ अद्धामाख्याहि नस्तावदथेष्टसुरभा दिवि । कियत्प्रमाणा भवता मोदका भक्षिता इति ॥१९६॥ ततो हृष्टामुनन्द्यानो वृषपुच्छं विमुच्य तम् । पद्माकारौ करौ कृत्वा संस्प्रिष्टौ मौठनायकः ॥१९७॥ इयत्प्रमाणा इत्याशु यावत्तान प्रतिवक्ति सः । तावत्सोऽन्ये च ते सर्वे क्षितिपेत्य विपदिरे ॥१९८॥ वृषः प्रायाच्च कैलास जनो दृष्ट्वा जहास च । दोषाय निर्विमर्षैव भौतप्रश्नोत्तरक्रिया ॥१९९॥ श्रुता दुगामिनो मौटाः श्रूयतामपरोऽप्ययम्। कश्चिद् भौतो विसस्मार मार्ग मार्गान्तरं व्रजन् ॥२००॥ तरोर्नदीतटस्थस्य गच्छास्योपरिवर्त्मना । इत्युच्यते स्म पन्थानं परिपृच्छञ्जनेन सः ॥२०१॥ ततस्तस्य तरोः पृष्ठं गत्वास्त्वः स मूर्खधीः । एतत्पृष्ठेन मे पन्था उपदिष्टो जनैरिति ॥२०२॥ सत्पृष्ठे सर्पवक्षास्य भरात्पर्यन्तवर्तिनी । शाखा ननाम यत्नेन पपातालम्ब्य नैप याम् ॥२०३॥ १ लाङ्गूले=पुच्छे, मालम्बिनः=सम्बद्धानां भौटाः=मूर्खास्तस्यतस्मिन् वृषभविशेषण २ दैववशादित्यर्थः ।

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दशम लम्बक [right-aligned: १९१]

तब उसके मठ में पहुँचते ही अन्य मूर्ख उसे घेरकर बैठ गए और कहाँ गए थे ? उनके ऐसा पूछने पर मूर्ख ने कैलास-यात्रा का सारा वृत्तान्त उन्हें सुना दिया ॥१९॥

सुनकर आश्चर्य चकित वे सभी मूर्ख उससे प्रार्थना करने लगे कि 'हम लोगों पर भी कृपा करो हमें भी वहाँ ले चलो। हम लोगों को भी दिव्य लड्डू खिलाओ' ॥१९१॥

उनकी बातें सुनकर और वहाँ जाने की युक्ति बताकर दूसरे दिन तालाब के पास वह उन्हें ले गया और बैल भी वहाँ आया ॥१९२॥

तब उन मूर्खो के मुखिया महन्त ने दोनों हाथों से उसकी पूँछ पकड़ ली। उसके पैर दूसरे ने पकड़े और उसके तीसरे ने। इस प्रकार सभी मूर्खों ने एक-दूसरे के पैर पकड़-पकड़कर एक लम्बी पंक्ति-सी बना ली। तब वह बैल वेग से आकाश में उड़ा। पूँछ से लटके हुए अनेक मूर्खो वाले बैल के आकाश में जाते समय दैवयोग से उनमें से एक ने मुखिया से पूछा—'मन के अनुकूल फल देनेवाले स्वर्गलोक के प्रति हमारी उत्सुकता बढ़ाइए और यह बताइए कि तुमने कितने बड़े बड़े लड्डू वहाँ खाये थे ? ॥१९३—१९५॥

तब अपने मिससिल को भूलकर उस मूर्ख महन्त ने बैल की पूँछ छोड़ दी और दोनों हाथों को कमल की तरह मिलाकर कहा—'इतने-इतने बड़े' ॥१९६॥

जब वह उन्हें हाथ के इंगित से बता ही रहा था कि तबतक वे सब के-सब मूर्ख खड़-मुड़ होकर आकाश से नीचे गिर गये और बैल अपनी तीव्र गति से कैलास को चला गया। यह देखकर जनता पेट पकड़कर हँसने सभी मूर्खों की प्रश्नोत्तर-क्रिया भी विवेक-रहित होती है ॥१९७-१९९॥

महाराज तुमने आकाश में जानेवाले मूर्ख सुने। अब दूसरे को सुनिए एक मूर्ख मार्ग में चलते हुए सही मार्ग भूलकर विपरीत मार्ग पर जा रहा था। लोगों से पूछने पर उन्होंने कहा कि 'नदी के किनारे जो पेड़ है उसके ऊपर के मार्ग से जाओ। वह मूर्ख पेड़ के पीछे जाकर उस पर चढ़ गया। डाल पर चलते हुए उस पेड़ की लचीली पतली डालियाँ नीचे झुक गईं। किन्तु उसने अगली डाल को हाथ से पकड़ लिया और नदी के ऊपर झूलने लगा। क्योंकि लोगों ने उसे पेड़ के पीछे से जाने को बताया था ॥२००-२०१॥ १२१

१५२ कथासरित्सागर

१५२ कथासरित्सागर शाखामारुम्ब्य स्थितो यावत्तावत्तेनाययौ पथा। आरोहेष्वोपरिस्थेन नद्यां पीतजलः करी ॥२०४॥ स दृष्ट्वा तरुशाखाग्रलम्बी भीतः स दीनवाक्। महात्मन् मां गृहाणेति हस्त्यारोहमुवाच तम् ॥२ ५॥ हस्त्यारोहश्च भीतः समवतारयितुं तरोः। पादयोरग्रहीद्द्वाभ्यां पाणिभ्यामुज्झिताङ्कुशः ॥२०६॥ तावच्च निर्गत्य गते गजे भीतस्य तस्य सः। ललम्बे पादयोर्हस्तिपको वृक्षाग्रलम्बिनः ॥२०७॥ ततः स स्वरमभीतो हस्त्यारोहं तमभ्यधात्। यदि जानासि तच्छीघ्रं यत्किञ्चिद् गीयतां त्वया ॥२०८॥ इतोऽवसारयञ्जातु यच्छ्रुत्वागत्य नौ जनः। पतिताव यथाधस्ताद्रेखाबामिय नदी ॥२०९॥ इत्युक्तः स गजारोहस्तेन मञ्जु तथा जगौ। यथा स एव भीतोऽद्य परितोषमगात् परम् ॥२१०॥ साधुवादं च स ददद्विस्मृतोज्झितपादपः। दातुं प्रावर्तत द्वाभ्यां हस्ताभ्यां छोटिकां जडः ॥२११॥ तत्क्षणं विनिपत्यैव सहस्त्यारोह एव सः। नद्यां विपप्रे मूर्धहि सङ्गः कस्यास्ति शर्मणे ॥२१२॥ इत्याख्याय कथां भूयो वत्सेश्वरसुतां सः। गोमुखः कथयामास हिरण्याक्षकथामिमाम् ॥२१३॥ हिरण्याक्ष कथा अस्तीह हिमवत्कुक्षौ देशः पृथ्वीशिरोमणिः। कद्मीर इति विद्वानां धर्मस्य च निकेतनम् ॥२१४॥ तत्राधिष्ठानमभवद्धिरण्यपुरनामकम् । कनकप्रभ इति ख्यातस्तस्मिन् राजा बभूव च ॥२१५॥ तस्य रत्नप्रभादेव्यां शङ्कराराधनोद्भवः। पुत्रो हिरण्याक्ष इति क्ष्मापतेरुपपद्यत ॥२१६॥ स जातु गुलिकाक्रीडां कुर्वन् गुलिकया छलात्। तापसीं राजतन्तव्यां मार्गायातामताडयत् ॥२१७॥ सा तापसी जितक्रोधा राजपुत्रं विहस्य तम्। वागीश्वरी हिरण्याक्षमुवाच विवृतानना ॥२१८॥ स्वयौवनादिकरीदृग्मदधस्त्वं तां यदि। मृगाङ्कमगामाप्नोषि भार्यां तत्कीदृशो भवेत् ॥२१९॥

द्वादश लम्बक ९६३

द्वादश लम्बक ९६३ जब वह मूर्ख डाल पकड़कर झूल ही रहा था कि इतने में उस मार्ग से नदी में पानी पीकर एक हाथी लौट रहा था। उस पर महावत भी बैठा था। उसे देखकर पेड़ की डाल में लटकता हुआ मूर्ख शीघ्रतापूर्वक हाथीवान से बोला 'महात्मा मुझे पकड़ लो' ॥२४-२५॥ महावत ने भी उसे वृक्ष से उतारने के लिए, अंकुश को रखकर, दोनों हाथो से उसके दोनो पैर पकड़ लिये ॥२६॥ इतने में ही हाथी के आगे निकल जाने पर महावत भी पेड़ की डाल में झूलते हुए उस मूर्ख के पैरों में लटक गया ॥२७॥ तब डाल में लटका हुआ वह मूर्ख शीघ्रतापूर्वक महावत से बोला कि 'यदि तू गाना जानता है, तो गा' ॥२८॥ इसलिए यह सम्भव है कि कोई गाना सुनकर यहाँ आवे और हम दोनों को उतार ले ॥२९॥ इस प्रकार, उसके कहने पर महावत ने इतना अच्छा गीत गाया कि वह लटका हुआ मूर्ख अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया ॥३०॥ और उसे वाहवाही देता हुआ यह भूल गया कि मैं लटका हूँ, इसलिए उस मूर्ख ने अपने दोनों हाथों से चुटकी बजाना प्रारम्भ किया ॥३१॥ इस प्रकार चुटकी बजाने के चक्कर में डाल छूट जाने के कारण वह मूर्ख महावत के साथ ही गिरकर नदी में डूब गया। सच है कि मूर्खों का साथ किसके लिए हानिकारक नहीं होता ॥३२॥ नरवाहनदत्त को यह कथा सुनाकर गोमुख ने उसे हिरण्याक्ष की कथा सुनाई ॥३३॥ हिरण्याक्ष की कथा हिमालय के मध्य में पृथ्वी का शिरोमणि कश्मीर नाम का देश है, जो विद्या एवं धर्म का घर है। उस देश में हिरण्यपुर नाम का एक राज्य था जिसका राजा कनकप्रभ नाम से प्रसिद्ध था। रत्नप्रभा नाम की उसकी रानी से शिवजी की आराधना के फलस्वरूप एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम हिरण्याक्ष रखा गया। ॥३४-३६॥ वह बालक कभी गोलियाँ खेल रहा था। उसने किसी बहाने से मार्ग में जाती हुई एक तपस्विनी को गोली से मारा। क्रोध न करनेवाली क्षमाशील तपस्विनी यशोधेश्वरी ने मुँह बिगाड़ बिचकाकर राजकुमार से कहा— 'यदि तुझे अपने यौवन आदि पर इतना घमंड है तो मृगांक- लेखा को अपनी पत्नी बना लेने पर तुम्हारा घमंड कितना न बढ़ जाय' ॥३७-३९॥

१६४ कथासरित्सागर

१६४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा क्षमयित्वा तां राजपुत्रः स पृष्टवान्। कपा मृगाङ्कलेखास्या भगवत्युच्यतामिति ॥२२ ॥ अतस्त सान्द्रवीचिस्ति शशितेजा इति श्रुतः। विद्याधरेन्द्रो हिमवत्यचलन्द्र महायशाः ॥२२१॥ मृगाङ्कलेखा तस्यास्ति तनया वरकन्यका। रूपेण सुरेन्द्राणां निशासूनिश्चकप्रदा ॥२२२॥ सा चानुरूपा भार्या ते तस्यास्त्वमुचितः पतिः। इत्युक्तः सिद्धतापस्या हिरण्याक्षो जगाद ताम् ॥२२३॥ कथं भगवति प्राप्या मया सा तर्हि कथ्यताम्। तच्छ्रुत्वा सा हिरण्याक्षं तं योगेश्वर्यभाषत ॥२२४॥ गत्वाहं त्वत्कथाख्यानादुपलप्स्ये तदाशयम्। आगत्य चाहमेव त्वां तत्र नेष्याम्यतः परम् ॥२२५॥ इहास्ति योऽमरेषाख्यो देवस्तत्केतने त्वया। प्रातः प्राप्यास्मि नित्यं हि तमर्चितुमुपैम्यहम् ॥२२६॥ इत्युक्त्वा नभसा प्रायात्तापसी सा स्वसिद्धितः। तस्या मृगाङ्कलेखाया निकटं तुहिनाचलम् ॥२२७॥ तत्र तस्यै हिरण्याक्षगुणान्युक्त्वा शशंस सा। यथा यथा दिव्यकन्या साह्युत्कैवमुवाच ताम् ॥२२८॥ तादृशं चन्न भर्तारं प्राप्नुयां भगवत्यहम्। तन्निष्फलेन किं कार्यममुना जीवितेन मे ॥२२९॥ इत्यास्तऽस्मरावेशा नीत्वा तत्कथया दिनम्। मृगाङ्कलेखा तापस्या सहोवास तया निशाम् ॥२३०॥ तावत्सोऽपि हिरण्याक्षस्तच्चिन्तामीतवासरः। सुप्तः कषष्टिध्वज्जगदे गौर्या स्वप्ने निशाक्षये ॥२३१॥ विद्याधरः सन् प्राप्तस्त्वं मुनिशापेन मर्त्यताम्। तापस्याः करसंस्पर्शादेतस्या मोक्ष्यसे ततः ॥२३२॥ मृगाङ्कलेखां च ततस्तामाशु परिणेष्यसि। तच्चिन्ता नात्र कार्या ते पूर्वभार्या हि सा तव ॥२३३॥


१ काश्मीरेषु 'अमरनाथ' इति प्रसिद्धः।

दशम लम्बक ९६५

दशम लम्बक ९६५ यह सुनकर उस राजकुमार न तपस्विनी से क्षमा-प्रार्थनापूर्वक पूछा कि भगवति वह कौन-सी मृगाङ्कलेखा है? कृपया बताइए' ॥२२० ॥ तब वह तपस्विनी उससे कहने लगी—पर्वतराज हिमालय पर शशिशेखर नाम का विद्याधरों का राजा है। मृगाङ्कलेखा उसी राजा की सुन्दरी कन्या है जो अपने सौन्दर्य से रात में विद्याधरों को सोने नहीं देती (अर्थात्, सभी उसकी चिन्ता में सो नहीं पाते) ॥२२१ २२२॥ 'वह तेरे योग्य पत्नी है और तू उसके योग्य पति है'। सिद्ध तापसी के इस प्रकार कहने पर हिरण्याक्ष उससे बोला—'भगवति तब मुझे यह भी बताइए कि वह मुझे कैसे मिल सकती है ? यह सुनकर योगेश्वरी हिरण्याक्ष से बोली—'मैं उसके पास जाकर तेरी चर्चा करके उसका आशय (अभिप्राय) समझूँगी। और फिर, मैं ही यहाँ आकर तुझे वहाँ ले जाऊँगी ॥२२३—२२५॥ यहाँ अमरनाथ नाम का जो शिव-मन्दिर है वहीं मैं प्रातःकाल तुझे मिलूँगी। मैं वहाँ नित्य पूजन के लिए उपस्थित होती हूँ' ॥२२६॥ ऐसा कहकर वह तपस्विनी अपनी सिद्धि के योग से उस मृगाङ्कलेखा के पास हिमालय पर गई ॥२२७॥ वहाँ जाकर उसने हिरण्याक्ष के गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह मृगाङ्कलेखा अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उससे बोली—॥२२८॥ 'भगवति यदि वैसे पति को मैंने न पाया तो इस निष्फल जीवन से मुझे क्या काम है? इस प्रकार के भावावेश से आक्रान्त मृगाङ्कलेखा ने हिरण्याक्ष की चर्चा में दिन व्यतीत कर उसी तपस्विनी के साथ रात भी बिताई ॥२२९-२३० ॥ इधर हिरण्याक्ष भी मृगांकलेखा की चिन्ता में दिन व्यतीत करके रात्रि में किसी प्रकार सोया और पार्वती ने उसे स्वप्न में कहा—तू पहले जन्म में विद्याधर था। मुनि के शाप से मनुष्य हो गया। इसी तापसी के हाथ का सम्पर्क होने से तू शापमुक्त हो जायगा ॥२३१ २३२॥ तब तू उस मृगाङ्कलेखा से विवाह करेगा। उसकी चिन्ता तुझे न करनी चाहिए। वह तेरी पूर्वजन्म की पत्नी है' ॥२३३॥

तच्छ्रुत्वा क्षमयित्वा तां राजपुत्र च पृष्टवान्। कषा मृगाङ्कलेखास्या भगवत्युच्यतामिति ॥२२०॥ ततस्त साद्रवीदस्ति क्षितितेजा इति श्रुतः। विद्याधरेन्द्रो हिमवत्यचलेन्द्रे महायशाः ॥२२१॥ मृगाङ्कलेखा तस्यास्ति तनया वरकन्यका। रूपेण द्युचरेन्द्राणां निशासूनिद्रकप्रभा ॥२२२॥ सा चानुरूपा भार्या ते तस्यास्त्वमुचितः पतिः। इत्युक्तः सिद्धतापस्या हिरण्याक्षा जगाद ताम् ॥२२३॥ कथं भगवति प्राप्या मया सा तर्हि कथ्यताम्। तच्छ्रुत्वा सा हिरण्याक्षं च योगेश्वर्यभाषत ॥२२४॥ गत्वाहं त्वत्कथाख्यानावुपलप्स्ये तदाशयम्। आगत्य चाहमत्र त्वां तत्र नेष्याम्यतः परम् ॥२२५॥ इहास्ति योऽमरेखाख्यो देवस्तत्केतने त्वया। प्रात प्राप्तास्मि नित्यं हि तमर्चितुमुपम्यहम् ॥२२६॥ इत्युक्त्वा नमसा प्रायात्तापसी सा स्वसिद्धितः। तस्या मृगाङ्कलेखाया निकटं तुहिनाचलम् ॥२२७॥ तत्र तस्यै हिरण्याक्षगुणान्युक्त्वा क्षणेन सा। तथा यथा दिव्यकन्या सात्युत्कण्ठमुवाच ताम् ॥२२८॥ तादृशं अद्य भर्तारं प्राप्नुयां भगवत्यहम्। तन्निष्फलेन किं कार्यममुना जीवितेन मे ॥२२९॥ इत्यारूढस्मरावेशा नीत्वा तत्कथया दिनम्। मृगाङ्कलेखा तापस्या सहोवास तया निशाम् ॥२३०॥ तावत्सोऽपि हिरण्याक्षस्तच्चिन्तानीतवासरः। सुप्तः कपञ्चिज्जगदे गौर्या स्वप्ने निशाक्षये ॥२३१॥ विद्याधरः सन् प्राप्तस्त्वं मुनिशापेन मर्त्यताम्। तापस्याः करसंस्पर्शात्तस्या मोक्षमथ ततः ॥२३२॥ मृगाङ्कलेखां च तवस्तामाशु परिणेष्यसि। तच्चिन्ता नात्र कार्या ते पूर्वभार्या हि सा तव ॥२३३॥


१ काश्मीरेषु 'अमरनाथ' इति प्रसिद्धः।

द्वादश लम्बक १९५

द्वादश लम्बक १९५ यह सुनकर उस राजकुमार ने तपस्विनी से क्षमा प्रार्थनापूर्वक पूछा कि भगवति वह कौन-सी मृगांकलेखा है? कृपया बताइए' ॥२२०॥ तब वह तपस्विनी उससे कहने लगी—पर्वतराज हिमालय पर शशिखण्ड नाम का विद्याधरों का राजा है। मृगांकलेखा उसी राजा की सुन्दरी कन्या है, जो अपने सौन्दर्य से रात में विद्याधरों को सोने नहीं देती (अर्थात् सभी उसकी चिन्ता में सो नहीं पाते) ॥२२१-२२२॥ वह तेरे योग्य पत्नी है और तू उसके योग्य पति है'। सिद्ध तापसी के इस प्रकार कहने पर हिरण्याक्ष उससे बोला— भगवति तब मुझे यह भी बताइए कि वह मुझे कैसे मिल सकती है ? यह सुनकर योगेश्वरी हिरण्याक्ष से बोली— 'मैं उसके पास जाकर तेरी चर्चा करके उसका आशय (अभिप्राय) समझूँगी। और फिर, मैं ही यहाँ आकर तुझे वहाँ ले जाऊँगी ॥२२३—२२५॥ यहाँ अमरनाथ नाम का जो शिव-मन्दिर है, वहीं मैं प्रातःकाल तुझे मिलूँगी। मैं वहाँ नित्य पूजन के लिए उपस्थित होती हूँ ॥२२६॥ ऐसा कहकर वह तपस्विनी अपनी सिद्धि के योग से उस मृगांकलेखा के पास हिमालय पर गई ॥२२७॥ वहाँ जाकर उसने हिरण्याक्ष के गुणों का ऐसा वर्णन किया कि वह मृगांकलेखा अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उससे बोली—॥२२८॥ 'भगवति यदि वैसे पति को मैंने न पाया तो इस विरूद्ध जीवन से मुझे क्या लाभ है? इस प्रकार के भावावेग से आक्रान्त मृगांकलेखा ने हिरण्याक्ष की चर्चा में दिन व्यतीत कर उसी तपस्विनी के साथ रात भी बिताई ॥२२९-२३० ॥ इधर हिरण्याक्ष भी मृगांकलेखा की चिन्ता में दिन व्यतीत करके रात्रि में किसी प्रकार सोया और पार्वती ने उसे स्वप्न में कहा— तू पहले जन्म में विद्याधर था। मुनि के शाप से मनुष्य हो गया। इसी तापसी के हाथ का सम्पर्क होने से तू शापमुक्त हो जायगा ॥२३१-२३२॥ तब तू उस मृगांकलेखा से विवाह करेगा। उसकी चिन्ता तुझे न करनी चाहिए। वह तेरी पूर्वजन्म की पत्नी है' ॥२३३॥

१६६ कथासरित्सागर

१६६ कथासरित्सागर इत्यादिश्य सा देवी तिरोऽभूत्तस्य सोऽपि च। प्रबुध्य प्रातरुत्थाय चक्रे स्नानादिमङ्गलम्॥२३४॥ ततोऽमरेश्वरस्याग्रे गत्वा तस्मै प्रणम्य तम्। यत्र सङ्केतक तस्य तापस्या विहित तया॥२३५॥ अत्रान्तरे च कथमप्याप्तनिद्रा स्वमन्दिरे। मृगाङ्कलेखामपि तां गौरी स्वप्ने समादिशत्॥२३६॥ क्षीणशाप हिरण्याक्ष जात विद्याधर पुन। करस्पर्शेन तापस्याः पतिं प्राप्स्यस्यल शुचा॥२३७॥ इत्युक्त्वान्तर्हितायां च देव्यां प्रातः प्रबुध्य सा। मृगाङ्कलेखा तापस्यै तस्मै स्वप्न शशंस तम्॥२३८॥ सा तच्छ्रुतैव नागत्य भूलोक सिद्धतापसी। स्मित क्षेत्रेऽमरेशस्य हिरण्याक्ष तमभ्यधात्॥२३९॥ एहि विद्याधर लोक पुत्रेत्युक्त्वा करेण सा। प्रणत त समादाय बाहावुपतस्थुषम्॥२४०॥ तावत्स च हिरण्याक्षो भूत्वा विद्याधरेश्वरः। स्मृत्वा शापक्षयाज्जाति तापसीं तामभाषत॥२४१॥ हिमाद्रौ वद्ध्यकूटाख्ये पुरे जानीहि मामियम्। विद्याधराणा राजान नाम्नाप्यमृततेजसम्॥२४२॥ सोऽहमुल्लङ्घनक्रोधाच्छाप प्राप्य पुरा मुनेः। मर्त्ययोनिमुपागच्छ त्वत्करस्पर्शनावधिम्॥२४३॥ शाप्तस्य मे सदा भार्या या दुःखादजहत्तनूम्। सैषा मृगाङ्कलेखाद्य जाता पूर्वप्रिया मम॥२४४॥ इदानीं च त्वया सार्धं गत्वा प्राप्स्यामि तामहम्। त्वत्करस्पर्शपूतस्य शान्तः शापो हि सोऽद्य मे॥२४५॥ इति ब्रुवस्तया साक तापस्या गगनेन सः। जगामामृततेजास्त हिमाद्रि द्युचराधिपः॥२४६॥ मृगाङ्कलेखामुद्यानस्थितां तत्र ददर्श सः। साप्यापश्यत्तमायान्तं तापस्याधिष्ठितं तया॥२४७॥ चित्र श्रुतिपथेनादौ प्रविश्याग्योन्यमानसम्। अनिर्गत्याप्यधिष्ठितां दृष्टिमार्गेण तौ पुनः॥२४८॥

द्वयष्टम लम्बक १९७

द्वयष्टम लम्बक १९७ इस प्रकार आदेश देकर देवी पार्वती अन्तर्धान हो गई और प्रातःकाल उठकर हिरण्याक्ष ने स्नान सन्ध्या आदि संयम-कार्य किये ॥२३४॥ तब अमरेश्वर के सम्मुख जाकर और प्रणाम करके वह बैठ गया जहाँ पर कि उस तपस्विनी ने मिलने का संकेत दिया था॥२३५॥ इसी बीच अपने घर में किसी प्रकार सोई हुई मृगांकप्रभा को भी नींद आई और गौरी ने स्वप्न में उसे भी यह आदेश दिया ॥२३६॥ शापमुक्त और लावण्यी के हस्त-स्पर्श से पुनः विद्याधर-योनि को प्राप्त हिरण्याक्ष को तू पति के रूप में प्राप्त करेगी। शोक मत कर ॥२३७॥ ऐसा कहकर देवी के अन्तर्धान हो जाने पर वह प्रातः काल उठी और उस तपस्विनी को मृगांकप्रभा ने रात का स्वप्न सुनाया ॥२३८॥ यह सुनकर वह तपस्विनी मर्त्यलोक में आकर अमरनाथ शिव के मन्दिर में उसकी प्रतीक्षा में बैठे हुए हिरण्याक्ष से बोली--॥२३९॥ 'बेटा आओ। विद्याधर-लोक में चलें। ऐसा कहकर व प्रणाम करते हुए हिरण्याक्ष को अपने हाथ से अपनी बाहु पर बिठाकर तपस्विनी आकाश में उड़ गई ॥२४०॥ इतने में ही वह हिरण्याक्ष विद्याधर राजा होकर शाप क्षय होने से अपनी पिछली जाति को स्मरण करके उस तपस्विनी से बोला ॥२४१॥ 'हिमालय के धवलकूट नाम के नगर का अमृततेज नामक राजा मुझे तुम जानो ॥२४२॥ मैं सूर्यप्रभ से अपमान जन्य शाप के कारण मुनि से शाप प्राप्त करके मर्त्यलोक में उत्पन्न हुआ था। तेरे हाथ के स्पर्श तक ही मेरा शाप था ॥२४३॥ मुनि से शापित मुझे देखकर मेरी पत्नी ने दुःख से अपना शरीर छोड़ दिया। वही मेरी पूर्वकी पत्नी इस समय मृगांकप्रभा के रूप में है ॥२४४॥ अब मैं तेरे साथ जाकर उसे प्राप्त करूँगा। तेरे पवित्र हाथ के स्पर्श से मेरा यह शाप समाप्त होगया ॥२४५॥ ऐसा कहता हुआ वह विद्याधरेन्द्र अमृततेज आकाश मार्ग से हिमालय पर गया और वहाँ उसने उद्यान में बैठी हुई मृगांकप्रभा को देखा और मृगांकप्रभा ने भी उसे जैसा तपस्विनी ने बताया था उसी रूप में देखा ॥२४६-२४७॥ आश्चर्य की बात है कि चाहने वालों के मार्ग से देखा परस्पर दोनों के हृदय में घुसकर फिर बिना निकले ही वे दोनों आँखों के मार्ग से भी उसी प्रकार फिर दोनों एक दूसरे के हृदय में घुस गये ॥२४८॥

१९८ कथासरित्सागर

१९८ कथासरित्सागर

विवाहसिद्धये पित्रे त्वयैव कथ्यतामिति। अथ मृगाङ्कलेखात्र तापस्या प्रोच्यत तया॥२४९॥ ततो लज्जानतमुखी सा गत्वा पितरं निजम्। सखीमुखेन तत्सर्वं बोधयामास तत्क्षणम्॥२५०॥ सोऽपि स्वप्नेऽम्बिकादिष्टस्तत्पिता सत्वरस्त्वरम्। तमानयीत् स्वभवनं सम्मानामृततेजसम्॥२५१॥ ददौ मृगाङ्कलेखां च तस्मै तां स यथाविधि। कृतोद्वाहश्च तं वज्रकूटे स्वं प्रययौ पुरम्॥२५२॥ तत्र सोऽमृततेजा स्वं राज्यं प्राप्य सभार्यकम्। आनीतं सिद्धतापस्या मर्त्यत्त्वात्पितरं निजम्॥२५३॥ कनकाक्षं तमभ्यर्च्य भोगैः प्रापय्य मृतसत्। मृगाङ्कलेखया साकं तामृद्धिं बुभुजे चिरम्॥२५४॥ इति पूर्वकर्मविहितं भवितव्यं जगति यस्य जन्तोर्यत्। तदयत्नेन स पुरतः पतितं प्राप्नोत्यसाध्यमपि॥२५५॥ एवं गोमुखकथितां शक्तियशस्युत्सुको निशम्य कथाम्। शयने निशि नरवाहनदत्तो निद्रामसौ भेजे॥२५६॥

इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके नवमस्तरङ्गः।

दशमस्तरङ्गः

ततोऽन्येद्युः पुनर्नक्तं विनोदार्थं स गोमुखः। नरवाहनदत्ताय कथामेतामवर्णयत्॥१॥ धारस्वराभिधे शैले सिद्धक्षेत्रे पुरावसत्॥ उपास्यमानो बहुभिः शिष्यैः कोऽपि महामुनिः॥२॥ सोऽब्रवीज्जातु शिष्यान् स्वान् युष्मासु यदि कश्चित्। अपूर्वमीक्षितं किञ्चिच्छ्रुतं वा तन्निवेद्यताम्॥३॥ इत्युक्तस्तेन मुनिना शिष्य एको जगाद तम्। मया श्रुतमपूर्वं यत्तदाख्यामि निशम्यताम्॥४॥

नवम लम्बक १९९

नवम लम्बक १९९ तब उस प्रौढ़ा तापसी ने मृगांकलेखा से कहा कि 'तू विवाह की सिद्धि के लिए सब कुछ पिता से जाकर कह' ॥२४९॥ तब लाज से अधोमुखी मृगांकलेखा ने अपनी सखी के मुंह से यह सब वृत्तान्त अपने पिता को उसी समय बता दिया ॥२५० ॥ स्वप्न में पहले ही पार्वती द्वारा आज्ञापित उसका पिता अमृततेज को सम्मानित कर अपने घर ले आया ॥२५१॥ और, उसके लिए उसने मृगांकलेखा को विधिपूर्वक प्रदान कर दिया। विवाह के अनन्तर वह अमृततेज को अपने वज्रकूट नगर ले गया। तब अमृततेज ने अपनी पूर्व पत्नी के साथ अपने राज्य को प्राप्त कर, मनुष्य होने के कारण सिद्ध तापसी द्वारा अपने पिता कनकप्रभ को बुलवाकर और उसका सम्मान करने के उपरान्त विविध भोगों के साथ उसे पृथ्वी पर पहुँचाकर वह मृगांकलेखा के साथ चिरकाल तक अपने राज्य को भोगता रहा ॥२५२-२५४॥ इस प्रकार, पूर्वजन्म के कर्मों से जिस प्राणी का जो भवितव्य होता है वह बिना प्रयत्न किये ही असाध्य होने पर भी स्वयं सामने आकर मिलता है॥२५५॥ शक्तिप्रभा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त गोमुख द्वारा कही गई इस कथा को सुनकर सेज पर पड़ा-पड़ा नींद में सो गया ॥२५६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तिप्रभ लम्बक का नवम तरंग समाप्त दशम तरंग तब दूसरे दिन फिर रात में मनोरंजन के लिए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त के लिए यह कथा सुनाई ॥१॥ प्राचीन समय में शारदेश्वर नामक शिव-क्षेत्र में बहुत-से शिष्यों द्वारा सेवित एक महामुनि रहता था ॥२॥ किसी समय उस मुनि ने अपने शिष्यों से कहा—'तुम लोगों में से किसी ने कोई अपूर्व कुछ देखा या सुना हो तो बताओ ॥३॥ मुनि के ऐसा कहने पर एक शिष्य बोला—'मैंने जो कुछ नया सुना है उसे कहता हूँ सुनिए' ॥४॥ १२२

१७० कथासरित्सागर

१७० कथासरित्सागर विजयाख्यं महाक्षेत्रं कश्मीरेष्वस्ति शाम्भवम्। तत्र प्रव्राजकः कश्चिदासीद्विद्याभिमानवान्॥५॥ जयी सर्वत्र भूयासमित्याशसन् प्रणम्य सः। शम्भुं प्रतस्थे वादाद्यं प्रव्राट् पाटलिपुत्रकम्॥६॥ गच्छंश्च मार्गेऽतिक्रामन् वनानि सरितो गिरीन्। प्राप्याटवीं परिश्रान्तो विशश्राम तरोस्तले॥७॥ क्षणाच्च वापीशिशिरे तत्र दूराच्चधूसरम्। ददर्श धार्मिकं दण्डकुण्डिकाहस्तमागतम्॥८॥ कुतस्त्वं कुत्र यासीति निष्प्रमोऽत्र च तेन सः। प्रव्राजकेन पृष्टस्तमित्यभाषत धार्मिकः॥९॥ आगतोऽहं सखे विद्याक्षेत्रात् पाटलिपुत्रकात्। काश्मीरान् यामि तत्रत्यां जेतुं वादेन पण्डितान्॥१०॥ श्रुत्वैतद्धार्मिकवचः स परिव्राडचिन्तयत्। इहैको न जितोऽद्य चेन्मया पाटलिपुत्रकः॥११॥ तत्तत्र गत्वा जेप्यामि कथमयान् बहूनहम्। इत्यालोच्य स तं प्रव्राडाक्षिप्याह स्म धार्मिकम्॥१२॥ विपरीतमिदं किं ते वद धार्मिक चेष्टितम्। क्व धार्मिको मुमुक्षुस्त्वं क्व वादी व्यसनातुरः॥१३॥ वादाभिमानबन्धेन संसारा मोक्षमिच्छसि। शमयस्यग्निनोष्माणं शीते हृदि हिमेन च॥१४॥ उत्तितीर्षसि पाषाणनावा मूढ महोदधिम्। वातेन ज्वलितं वह्निं निवारयितुमीहसे॥१५॥ ब्राह्मं शीलं क्षमा नाम क्षात्रमापन्नरक्षणम्। मुमुक्षुशीलं च शमः कारुष्टो रक्षसां स्मृतम्॥१६॥ तस्माच्छान्तेन दान्तेन भवितव्यं मुमुक्षुणा। निरस्सङ्गद्वन्द्वेन संसारक्लेशभीरुणा॥१७॥ अतः शमकुठारेण छिन्द्धीमं भवपादपम्। हेतुवादाभिमानाम्बुसिक्तस्त्वस्य तु मा स्म वा॥१८॥ इत्युक्तो धार्मिकस्तेन परितुष्टः प्रणम्य तम्। गुर्वर्थमात्मनेत्युक्त्वा जगाम स यथागतम्॥१९॥

दशम लम्बक ९७१

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कश्मीर देश में विजय नाम का विशाल शिव-क्षेत्र है। उस क्षेत्र में एक विद्याभिमानी संन्यासी था ॥५॥ एकबार वह संन्यासी 'मैं सब स्थानों पर विजयी होऊँ' ऐसी कामना करता हुआ शिवजी को प्रणाम करके शास्त्र-वाद (शास्त्रार्थ) के लिए पाटलिपुत्र की ओर चला ॥६॥ रास्ते में असंख्य नदियां और पहाड़ों को लांघता हुआ वह एक सूनसान वन में पहुँचकर एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥७॥ कुछ ही समय के पश्चात् बावली से पीठक उस स्थान पर उसने लम्बी यात्रा के कारण धूल से भरे, सांग और कुंडी हाथ में लिये हुए एक धार्मिक पुरुष को देखा ॥८॥ उसके वहाँ बैठ जाने पर उस संन्यासी ने उससे पूछा—'तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो? तब उस धार्मिक ने उत्तर दिया— ॥९॥ 'भाई, मैं विद्या के केन्द्र पाटलिपुत्र से आ रहा हूँ और कश्मीर के विद्वानों को शास्त्रार्थ में जीतने के लिए वहाँ जा रहा हूँ' ॥१०॥ उस धार्मिक की बात सुनकर वह साधु सोचने लगा कि यहीं पर मैंने यदि इसी एक पाटलिपुत्रवाले को शास्त्रार्थ में न जीत लिया तो पाटलिपुत्र जाकर अन्य बहुतों को कैसे जीतूँगा ऐसा सोचकर उस साधु ने उस धार्मिक पर आक्षेप करते हुए कहा—॥११-१२॥ 'हे धर्मशील तुम्हारा यह विपरीत विचार कैसे हुआ ? कहाँ तो तू मुक्ति चाहनेवाला धर्मशील व्यक्ति और कहाँ रागद्वेष आदि व्यसनों से युक्त शास्त्रार्थी ॥१३॥ शास्त्रार्थ के अभिमान-रूपी बन्धन से तू संसार में मुक्ति चाहता है। तेरी यह युक्ति अग्नि से गरमी को और हिम से सरदी को शान्त करने के प्रयत्न के समान है। इस प्रकार अरे मूर्ख तू पत्थर की नाव से समुद्र पार करना चाहता है और जल की मन्थि को वायु से शान्त करना चाहता है ॥१४-१५॥ ब्राह्मण का स्वाभाविक धर्म क्षमा है और क्षत्रिय का धर्म शरणागत की रक्षा करना। मुमुक्षु (मोक्ष चाहनेवाले) का धर्म शान्ति है और राजर्षियों का धर्म कलह है ॥१६॥ इसलिए मोक्षार्थी को शान्त और दान्त (संयमी) होना चाहिए। रागद्वेष के दुःख को दूर करना चाहिए और सांसारिक कथाओं से डरना चाहिए ॥१७॥ इसलिए धर्म-रूपी कुठार से इस संसार-रूपी वृक्ष को काटो। उस विपरीत विवाद-रूपी अभिमान के जल का सिंचन न हो ॥१८॥ उस साधु से इस प्रकार कहा गया वह धार्मिक सन्तुष्ट हुआ। उसे प्रणाम करके 'आप मेरे उपदेष्टा गुरु हैं' ऐसा कहकर पीछे की ओर लौट गया ॥१९॥

१७२ कथासरित्सागर

१७२ कथासरित्सागर प्रव्राड्वसन्नस्थितोऽत्रैव तरुमूले तदन्तरात् । यक्षस्यालापमशृणोत्क्रीडतो भार्यया सह ॥२०॥ कर्णं ददाति यावच्च स प्रव्राट् तावदत्र सः। यक्षः पुष्पलतां भार्यां नर्मणा तामताडयत् ॥२१॥ तावच्च मृतकल्पं सा कृत्वात्मानं शठा मुधा। तस्योत्सवरिवारश्च मुक्ताक्रन्दो झगित्‍यभूत् ॥२२॥ चिराच्चागतजीवेव सा वृथावदुदमील्यत् । किं त्वया दृष्टमिति तां यक्षोऽप्राक्षीत्ततः पतिः ॥२३॥ अथ मिथ्यैव साबोचत् त्वयाहं माम्न्या यदा। अभ्याहता तदापश्यं कृष्णं पुरुषमागतम् ॥२४॥ पाशहस्तं ज्वलन्नेत्रं प्रांशुमूर्ध्वशिरोरुहम् । भयानकं निजच्छायाम्लिनीकृतदिक्तटम् ॥२५॥ तेन नीताहमभवं दुष्टेन यममन्दिरम् । त्याजितास्मि च तत्रत्यैस्तं निवार्याधिकारिभिः ॥२६॥ एवं तयोक्ते यक्षिण्या हसन्यक्षो जगाद ताम् । अहो विनेन्द्रजालेन स्त्रीणां चेष्टा न विद्यते ॥२७॥ को मृत्युः कुसुमाघातादावृत्तिः का यमालयात् । मूढे पाटलिपुत्रस्त्रीवृत्तान्तोऽनुकृतस्त्वया ॥२८॥ तस्मिन्हि नगरे राजा योऽस्ति सिंहाक्षनामकः । तद् भार्या मन्त्रिसनानीपुरोहितभिषग्वधूः ॥२९॥ सहादाय त्रयोदश्यां शुक्लपक्ष कदाचन । सनाधीकृततद्देशामागाद्द्रष्टुं सरस्वतीम् ॥३०॥ तत्र सन्मार्गमिलितैः सर्व्वा कुब्जान्धपङ्गुभिः । व्याधितैरित्यभाष्यन्त भूपालप्रमुखाङ्गनाः ॥३१॥ रोगातुराणां दीनानामौषधं न प्रयच्छत । येन मुच्यामहे रोगात्कुरुतात्तदनुकम्पनम् ॥३२॥ समुद्रलहरीलोलो विद्युत्स्फुरितभङ्गुरः । जीवलोको ह्ययं यात्रोत्सवक्षणसुन्दरः ॥३३॥ तदधारेऽत्र संसारे सारं दीनेषु या दया। कृपणेषु च यद्दानं गुणवान् क्व न जीवति ॥३४॥

दशम लम्बक १७१

दशम लम्बक १७१ और वह हँसता हुआ संन्यासी उसी वृक्ष के नीचे बैठा रहा और उसने वृक्ष के अन्दर से अपनी स्त्री के साथ विनोद करते हुए उस वृक्ष-निवासी यक्ष की बातचीत सुनी ॥२०॥ साधु ने कान लगाकर सुना कि यक्ष ने हँसी-हँसी में माला से स्त्री को मारा। इतने में ही उस धूर्ता स्त्री ने अपने को झूठे ही मृतवत् बना लिया और उसके परिवार के व्यक्ति रोते-चिल्लाते हुए स्तब्ध हो गये ॥२१ २२॥ बहुत समय के पश्चात् मानों फिर से जीवन आने पर उसने आँख खोली तब उसके पति ने उससे पूछा कि तूने इतने समय तक आँखें बन्द करके क्या देखा ? ॥२३॥ तब वह झूठ ही कहने लगी कि 'जब तूने माला से मुझे मारा तब मैं चेतना-हीन हो गई और मैंने एक काले पुरुष को आये हुए देखा ॥२४॥ वह पुरुष डरावना और लम्बा था उसके सिर के केश खड़े थे। वह इतना काला था कि उसकी छाया से चारों ओर अँधेरा हो रहा था। उसके हाथ में पाश था और आँखें उसकी जल रही थीं ॥२५॥ उस दुष्ट द्वारा मैं यम के घर ले जाई गई। किन्तु, वहाँ जाने पर उसके अधिकारियों से म छुड़ा दी गई' ॥२६॥ यक्षिणी के ऐसा कहने पर यक्ष हंसता हुआ बोला-आश्चर्य है कि माया के बिना स्त्री की कोई भी चेष्टा नहीं होती ॥२७॥ भला पुष्पों की मार से कैसी मृत्यु ! और यम-मन्दिर से लौटना कैसा ? अरी मूर्ख तूने तो पाटलिपुत्र की स्त्रियों का अनुकरण किया ॥२८॥ उस (पाटलिपुत्र) में सिंहाख नाम का जो राजा है उसकी रानी किसी समय मन्त्री सेनापति पुरोहित और वैद्य की पत्नियों के साथ शुक्लपक्ष की त्रयोदशी के दिन पाटलिपुत्र को अनुगृहीत करनेवाली सरस्वती के दर्शन को गई ॥२९ ३०॥ उस यात्रा के मार्ग में बहुत-से कुबड़े अन्धे कोढ़ी और पंगु रोगी भीख माँग रहे थे। उन्होंने उन स्त्रियों से प्रार्थना की कि 'हम रोग से पीड़ित अनाथों को औषधि दो जिससे हमलोग इन रोगों से छूट सकें। पीड़ितों और दीनों पर दया करो। हमारी रक्षा करो ॥३१ ३२॥ यह संसार, बिजली की चमक के समान क्षण भर में नष्ट होनेवाला है और यात्रा मेला आदि उत्सव भी क्षण-भर के लिए ही सुन्दर हैं ॥३३॥ इसलिए, संसार में सार यही है कि दीनों पर दया करना और दरिद्रों को दान देना। गुण वान् व्यक्ति कहाँ नहीं सुख भोगता ? ॥३४॥

१७४ कथासरित्सागर

१७४ कथासरित्सागर आढ्यस्य किं च दानेन सुहितस्याशनेन किम् । किं चन्दनेन शीतातौ किं घनेन हिमागम ॥३५॥ तदेतानुद्धरत न कृपणानामयापदः । इत्युक्ता व्याधितैस्तैस्ता नृपभार्यादयोऽब्रुवन् ॥३६॥ सुष्ठूपपन्नं जल्पन्ति कृपणा व्याधिता इमे । सर्वस्वेनाप्यतोऽस्माभिः कार्यमेषां चिकित्सितम् ॥३७॥ एवमन्योन्यमारूप्य श्वश्रीमभ्यर्च्य योषितः । व्याधितांस्तान्स्वभवनान्यानिन्युस्ताः पृथक्पृथक् ॥३८॥ स्वभर्तॄन् प्रेर्य तेषां च महासत्त्वान् महौषधैः । चिकित्सां कारयामासुर्नोसिसृक्षुश्च तदन्तिकात् ॥३९॥ सहवासाच्च तैरेव सङ्गमूवुर्मतन्मये । तथा ययुस्ताः ससारं तमद्य ददृशुर्येषा ॥४०॥ क्व रोगिणोऽमी कृपणा भर्तारः क्व नृपादयः । इति न व्यमृशंस्तासां मन्मथान्धीकृतं मनः ॥४१॥ ततश्च ता असम्भाव्यरोगिसम्भोगसम्भवेः । नखदन्तक्षतैर्युक्ताः पतयो ददृशुर्निजाः ॥४२॥ तं च भूपालस्तन्मन्त्रिसेनापतिमुखास्तयः । सवाद्यम्यु ससन्देहाः परस्परमतन्त्रिताः ॥४३॥ ततो राजाऽब्रवीदन्यान्यूमं सम्प्रति तिष्ठत । अहमद्य निजां भार्या तावत्पृच्छामि युक्तितः ॥४४॥ इत्युक्त्वा तान्विसृज्यैव गत्वा वासगृहं च सः । प्रवशितस्नेहमयो भार्या पप्रच्छ तां नृपः ॥४५॥ दष्टं केनाधरोष्ठं तं क्षतो केन मखं स्तनौ । सत्यमाख्यासि चेदस्ति श्रेयस्ते नान्यथा पुनः ॥४६॥ इत्युक्त्वा तेन राज्ञा सा राज्ञी कृतक्रमप्रवीत् । अवाच्यमप्यथ याह्र वक्ष्याश्चर्यमिदं शृणु ॥४७॥ चित्रभित्तरितो रात्रौ पुमांश्छन्नगदाधरः । निर्गत्यैवोपाभुङ्क्ते मां प्रातश्चात्रव लीयते ॥४८॥ यदङ्गं चन्द्रसूर्याभ्यामपि दृष्टं न जातु मे । तत्रेदृगेत्य क्रियते तेनावस्था स्थिते त्वयि ॥४९॥

दशम लम्बक १७५

दशम लम्बक १७५ बलवाले को दान देने से क्या लाभ ? तृप्त को भोजन देने से क्या फल ? शीत से काँपते हुए को चन्दन से क्या लाभ और शीतकाल में वर्षा की क्या आवश्यकता ? ॥३५॥ अतः हम इन दुखियों को उद्धार करो। हमारी रोग-रूपी आपत्ति को दूर करो। उन दुखियों से इस प्रकार कही गई उन स्त्रियां ने आपस में कहा-'ये दुःखी ठीक और उचित कह रहे हैं। इसलिए हम लोगों को अपना सर्वस्व त्याग कर भी इनकी चिकित्सा करनी चाहिए' ॥३६-३७॥ आपस में इस प्रकार विचार कर और सरस्वती देवी की पूजा करके वे स्त्रियां उन रोगियों को अलग-अलग अपने-अपने घरों में ले गईं ॥३८॥ और, सर्वसमर्थ अपने-अपने पतियों को प्रेरित करके उनकी चिकित्सा कराती हुई सदा उनके पास बैठी रहती थीं ॥३९॥ दिन-रात सहवास के कारण उत्पन्न काम-वासना से वे ऐसी हो गईं कि सारे संसार को तन्मय देखने लगीं ॥४०॥ कहाँ ये दरिद्र रोगी और कहाँ मन्त्री सेनापति आदि उनके पति काम-वासना से अन्धा किये हुए उनके मन ने यह विचार नहीं किया ॥४१॥ तदनन्तर, रोगियों के लिए असम्भव सम्भोग से चिह्नित उन स्त्रियां के शरीरों मे नखक्षत और दन्तक्षत आदि उनके निजी पतियों ने देखे ॥४२॥ तब वे राजा मन्त्री पुरोहित वैद्य आदि परस्पर मिलकर बड़ी सावधानी से सम्बद्ध के साथ चर्चा करने लगे ॥४३॥ तब राजा ने दूसरो से कहा- अभी आपलोग ठहरिए। आज मैं युक्ति से अपनी स्त्री से पूछता हूँ ॥४४॥ ऐसा कहकर उन सब को विदा करके अपने वास-भवन में जाकर स्नेह और भय दिखा- कर राजा ने रानी से पूछा-॥४५॥ 'यह तुम्हारे ओठ को किसने काटा। तुम्हारे स्तनों को नखों से किसने क्षत किया। यदि सच कहती है तो ठीक है अन्यथा तेरा कल्याण नहीं' ॥४६॥ राजा से इस प्रकार कही गई रानी ने झूठी बात बनाकर कहा-'बात तो कहने योग्य नहीं है फिर भी में वन्द्य हूँ कि तुम्हें आश्चर्य की बात कहती हूँ सुनो ॥४७॥ यह सामने दीखती हुई चित्र की दीवार से रात को हाथ में खड्ग लिए हुए एक पुरुष निकल कर मेरा उपभोग करता है और प्रातः काल उसी दीवार में विलीन हो जाता है। मेरे जिस अंग को कभी सूर्य और चन्द्र ने भी नही देखा वहाँ वह पुरुष तुम्हारे रहते हुए भी, मेरे साथ ऐसा कार्य करता है ॥४८-४९॥