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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

एकादश लम्बक १९९

एकादश लम्बक १९९
यदि मैं हार गया तो मेरा पक्ष (दाँव) वही हथिनी है और यदि वह हार गया तो इसके
पक्ष में ही दोनों घोड़े ॥८॥
उनके वेग का अन्तर आपके सिवा दूसरा नहीं जान सकता इसलिए हे प्रभो हमारे
घर पर पधारकर इसकी परीक्षा कीजिए ॥९॥
आप कृपा करें। आप सभी प्रकार की प्रार्थनाओं के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। इसीलिए
हम दोनों प्रार्थी होकर दूर से आपके पास आए हैं ॥१० ॥
इस प्रकार रुचिरदेव से प्रार्थित नरवाहनदत्त ने घोड़े और हथिनी की प्रतियोगिता के
शौक से उसकी बात मान ली ॥११॥
और, वह उसी समय लाये हुए तेज झांझोंवाले रथ पर चढ़कर उन दोनों के साथ वैशाखपुर
को चला ॥१२॥
चलते-चलते वह क्रमशः वैशाखपुर नगर में पहुँचा। उसके नगर में प्रवेश करते ही
उसे देखकर दीवानी और एकटक निहारती हुई नागरिक स्त्रियाँ नाना प्रकार के तर्क-वितर्क
करने लगीं 'यह कौन है ? क्या रति को बिना प्राप्त किया नवीन कामदेव तो नहीं है ? अथवा
दिन में दीखनेवाला निष्कलंक चन्द्र तो यह नहीं है या ब्रह्मा ने पुरुष के आकार में कामदेव को
निर्मित किया है ? इत्यादि ॥१३-१५॥
वहां (वैशाखपुर में) युवराज नरवाहनदत्त ने शृंगार रसमय और प्राचीन लोगों
से प्रतिष्ठित किया गया कामदेव का एक मन्दिर देखा ॥१६॥
रति और प्रीति देनेवाले उस कामदेव के मन्दिर में जाकर और मूर्ति को नमन करके
कुछ समय तक विश्राम करके उसने मार्ग की श्रान्ति दूर की ॥१७॥
विश्राम कर लेने के पश्चात् अगवानी किया जाता हुआ वह देवमन्दिर के समीप स्थित
रुचिरदेव के घर में प्रेम के साथ प्रवेश किया ॥१८॥
नरवाहनदत्त के आगमन के उत्सव में हाथी और घोड़े की कमी नहीं थी। उनकी
विराट् शोभा को देखकर नरवाहनदत्त बड़ा प्रसन्न हुआ ॥१९॥
वहाँ पर रुचिरदेव द्वारा समुचित सत्कार किये गये नरवाहनदत्त ने अत्यन्त आश्चर्य-
मय रूपवाली रुचिरदेव की अविवाहिता बहन को देखा ॥२० ॥
उस कन्या के रूप-सौन्दर्य से आकृष्टहृदय और नेत्रवाले नरवाहनदत्त ने प्रवास में होने-
वाले अपनी रानियों के विरह का अनुभव नहीं किया। वह उन्हें भी भूल गया ॥२१॥
उस कन्या ने भी नीलकमल की माला के सदृश प्रेम से उसके ऊपर डाली हुई दृष्टि
से मानो उसे स्वयं वर लिया ॥२२॥

१० कथासरित्सागर

१० कथासरित्सागर
ततो जयेन्द्रसेनाख्यां तां स दध्यौ यथा तथा।
आसतां निशि नार्त्तोऽन्या न निद्रापि जहार तम् ॥२३॥
अन्येद्युः पोतकानीतमपि वातसमं जवे।
तदश्वरत्नयुगलं बाहुर्विदारुह्यत्यवित् ॥२४॥
स्वयं रुधिरखेवो यां तामारुह्य करेणुकाम्।
सवेगेन जगामाथ जवायानललेन सः ॥२५॥
ततो रुधिरखवेन वाजिरत्नयुगे जिते।
यावत्स वत्सराजसुतो विदारभ्यन्तरं ततः ॥२६॥
तावत्तस्य पितुः पार्श्वद्भूतोऽन्तिकमुपाययौ।
स दृष्ट्वा पादयोर्दूस्तस्तं प्रणम्याब्रवीदिदम् ॥२७॥
इह प्रयातं बुद्ध्वा त्वां परिवारात् पिता तव।
राजा मां प्राहिणोत् त्वां प्रत्यवमादिशति स्म च ॥२८॥
इयद्दूरमनावद्य यातोऽस्युद्यानतः कथम्।
अद्यैतिर्नस्तवायाहि मुक्तव्यासङ्गलत्वरम् ॥२९॥
इति शृण्वन्पितुर्दूतात् प्रियाप्राप्तिं च चिन्तयन्।
नरवाहनदत्तोऽभूत् स दोलाऽऽरूढमानसः ॥३०॥
तावत् क्षमाप्य तत्रस्थः सार्थवाहोऽतिहर्षरूः।
दूरादेव नमन्नेत्य युवराजमुवाच तम् ॥३१॥
जय वीर जयापुष्पकोदण्डकुसुमायुध।
भाविविद्याधराधीश चक्रवर्त्तिञ्जय प्रभो ॥३२॥
बालो न किं मनोहारी वर्धमानो न किं द्विषाम्।
वित्रासकारी दृष्टोऽसि देव तस्मादसशयम् ॥३३॥
अचिरादच्युतगुण त्वां द्रक्ष्यन्त्येव खेचराः।
आक्रमन्तं क्रमेण द्यां कुर्वन्तं बलिनिर्जयम् ॥३४॥
इत्यावि स्तुतवांस्तेन युवराजेन सत्कृतः।
पृष्टश्चाकथयत् तस्मै स्ववृत्तान्तं महावणिक् ॥३५॥
दाक्षिणो वेलायाश्च कथा
अस्ति कम्पति नगरी पृथिवीमौक्तिकामलिका।
तस्यां कुसुमसारारूप्यो वणिगाढ्यो महानभूत् ॥३६॥

एकादश लम्बक १००१

एकादश लम्बक १००१
तब उस जयेन्द्रसेना नाम की कन्या का वह इस प्रकार ध्यान करने लगा कि दूसरी स्त्रिया
की तो बात ही क्या निद्रा की भी उसने उपेक्षा कर दी ॥२३॥
दूसरे दिन बाणों की विद्या का रहस्य जाननेवाले नरवाहनदत्त ने पातक द्वारा लाये गये
वायु से भी अधिक वेगवाले घोड़ों को देखा और स्वयं रुचिरदेव द्वारा लाई गई हथिनी पर बैठकर
विद्या के प्रभाव से उसमें अधिक वेग का आधान करके हथिनी को घोड़ों से मिला
दिया ॥२४-२५॥
तब रुचिरदेव उन दोनों अश्व-रत्नों को जीत गया। इसके पश्चात् युवराज जैसे ही
रुचिरदेव के घर में प्रवेश कर रहा था कि उसके पिता का एक दूत वहाँ आ पहुँचा। उस बैठकर
दूत ने चरणों में प्रणाम करके यह कहा ॥२६-२७॥
तुम्हें अकस्मात् यहाँ आये हुए जानकर तुम्हारे परिवार के साथ सम्मति करके तुम्हारे
पिता ने मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है और आज्ञा दी है कि तुम उद्यान से ही बिना सूचना दिये
इतनी दूर क्यों चले गये? हमलोग अधीर हो रहे हैं। इसलिये जिस काम में लगे हो उसे शीघ्र
ही समाप्त करके चले आओ ॥२८-२९॥
पिता के दूत से इस प्रकार सुनता हुआ और नवीन प्रेयसी की प्राप्ति की चिन्ता करता
हुआ वह नरवाहनदत्त कर्तव्य के सन्देह में पड़ गया कि वह क्या करे ॥३०॥
इतने में ही उसी समय अत्यन्त प्रसन्नाचित्त एक व्यापारी आकर दूर से ही नमस्कार करके
युवराज नरवाहनदत्त से बोला—॥३१॥
हे वीर, तुम्हारी जय हो। पुण्य के अनुरूप और पुण्या के द्वारा धारण करनेवाले विद्याधरों
के भावी चक्रवर्ती हे प्रभो तुम्हारी जय हो॥३२॥
हे स्वामिन् बालक होकर भी चित्त को चुरानेवाले और बड़े होकर शत्रुओं का भय इन
दोनों गुणों से तू निःसन्देह रहेगा ॥३३॥
पाताल को जीतकर कमलों स्वयं को जीतता हुआ उत्कृष्ट गुणावाप्त सुने आकाशचारी
लोग भी आश्चर्य हो रहे हैं॥३४॥
इन वचनों से स्तुति करता हुआ और युवराज से सन्तुष्ट बनिया पूछने पर
अपना वृत्तान्त कहने लगा ॥३५॥
व्यापारी और वैश्य की कथा
"समस्त पृथ्वी की मस्तक बाला के समान मध्या नाम की एक नगरी है। उस नगरी में
कुसुमसार नामक एक धनी वैश्य था ॥३६॥
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१२ कथासरित्सागर

१२ कथासरित्सागर
तस्य धर्मैकवसतः शङ्कराराधनाज्जितः।
एकोऽभू च्छन्द्रसाराख्यः पुत्रो वशशतानन्दनः ॥३७॥
सोऽहं मित्रैः समं जातु द्यूतायामामवक्षितुम्।
गतस्तत्रापरानार्यान्द्राक्षं वदतोऽक्षिषु ॥३८॥
कृतो धनार्जनच्छा म प्रधानब्रह्मयोऽभूत्।
असन्तुष्टस्य यद्वापि पितृपार्जितया धिया ॥३९॥
तत द्वीपान्तरं गन्तुमहमभ्युधितमना।
आरूढवान् प्रवहणं नानारत्नप्रपूरितम् ॥४०॥
दधनेवानुकूलेन वायुना प्रेरितं च तत्।
अल्पैरव दिनैः प्रापं तं द्वीप वहनं मम ॥४१॥
तत्राप्रतीतमद्रिक्षुरहन्मव्यवहृतिं च माम्।
बुद्ध्वा राजापशङ्गेन यदृष्ट्या कारागृहे न्यधात् ॥४२॥
तस्मिन् गृहे दुष्कृतिभिः क्रन्दद्भिः क्षुत्तृषार्दितैः।
प्रेतैरिव स्थिता यावदहं निरयसन्निभे ॥४३॥
तावदस्मत्कुलामित्रस्तन्निवासी महावणिक्।
महीधराख्यो राजानं मत्सखस्तं न्यजिज्ञपत् ॥४४॥
लम्पानिवासिनो ह्येष पुत्र एष वणिक्पतेः।
निर्दोषस्य तदेतस्य बन्धनाद्यद्यशस्करम् ॥४५॥
इत्यादि ज्ञापितस्तन स मामुमोच्य बन्धनात्।
आनाय्य चान्तिकं राजा सादरं सममानयत् ॥४६॥
ततो राजप्रसादेन सन्मित्राणाधयेण च।
तत्रासं महतं कुर्वन् व्यवहागतहं गृहात् ॥४७॥
एतानत्र मपूसानयात्रायां दृष्टवानहम्।
वणिजः शिगराख्यस्य सनयां वरकन्यकाम् ॥४८॥
तया च पदशाम्पिलदृष्टैर दृस्ततः।
गत्वय वणिगुत्सस्माद् याचितवांश्च ताम् ॥४९॥
न च दध्यौ विचिन्त्यान्तस्तस्मिन् मामभागिनम्।
गाथात्र युज्यते दातृमणा मञ्चयत्र कारणम् ॥५०॥
मङ्गलो मिद्धलग्नेऽहं मानामहानिरूम्।
प्रहिणाम्युपगच्छेच्च गङ्गामर्पयिता ततः॥५१॥

एकादश लम्बक १०३

एकादश लम्बक १०३
हे वत्सराज के नन्दन उसी परम धार्मिक वैश्य का मैं चन्द्रसार नामक पुत्र हूँ जिस उसने
शंकर की आराधना से पाया था ॥२७॥
एक बार मैं मित्रों के साथ देवताओं की यात्रा देखने के लिए गया। वहाँ मैंने दूसरे
धनिकों से दान माँगते हुए भिक्षुको को देखा ॥२८॥
धन देने की श्रद्धा के कारण मुझे धन उपार्जित करने की इच्छा हुई। पिता द्वारा उपार्जित
बहुत लक्ष्मी होने पर भी मैं उससे सन्तुष्ट न था ॥२९॥
इस कारण मैंने समुद्र के मार्ग से दूसरे द्वीपों में जाकर व्यापार द्वारा धन कमाने का
विचार करके विविध रत्नों से भरे व्यापारिक नाव पर यात्रा की ॥४०॥
दैव और वायु के अनुकूल होने से वह मेरी नाव कुछ ही दिनों में निर्दिष्ट द्वीप पर पहुँच
गई ॥४१॥
वहाँ मेरे जवाहरात के व्यापार को धूमधाम से चलते देखकर उस द्वीप के राजा ने मुझ
पर विश्वास न करके धन के लोभ से मुझे बाँधकर कारागार में डाल दिया ॥४२॥
नरक के समान उस कारागार में रोते-कलपते भूख-प्यास से पीड़ित कंकाल-मात्र शेष
प्रेतों के समान कैदियों के साथ मैं कुछ दिनों तक पड़ा रहा ॥४३॥
तब मेरे कुल (वंश) को जाननेवाले वहाँ के महाधनी व्यापारी महीधर ने मेरे लिए
राजा से प्रार्थना की कि 'हे महाराज यह चम्पा-निवासी वैश्यों के चौधरी का बालक है। यह
निर्दोष है, इसे कारागार में रखना आपके लिए निन्दा की बात होगी' ॥४४-४५॥
इस प्रकार समझाने पर राजा ने मुझे कैद से छुड़ाकर और अपने पास बुलाकर आदर
के साथ मेरा सम्मान किया ॥४६॥
तब राजा की कृपा से राजा के मित्र महीधर वैश्य के आश्रय में रहते हुए मैं वहाँ व्यापार
करता हुआ सुखी था ॥४७॥
एक बार उसी द्वीप में मैंने वसन्तकालीन उद्यान-यात्रा में वहाँ के निवासी शिखर नामक
वैश्य की सुन्दरी कन्या को देखा ॥४८॥
कामदेव के दर्प-रूपी समुद्र की लहरी के समान उस कन्या से हरण (आकृष्ट) किया
गया मैं उसके पिता शिखर के पास गया और उससे उस कन्या की माँग की ॥४९॥
इसके पिता ने मन में क्षण भर सोचकर, मुझसे कहा— मैं इसे स्वयं अपने हाथो से दान
नहीं कर सकता। इसमें कुछ कारण है ॥५०॥
इसलिए, मैं इसे सिंहल-द्वीप में इसके मामा के पास भेज देता हूँ तुम वहाँ जाकर उससे
माँगकर इससे विवाह कर लो ॥५१॥

१००४ कथासरित्सागर

१००४ कथासरित्सागर
सन्द्वेश्यामि तथा तत्र यथैतत्तव सेत्स्यति।
इत्युक्त्वा मां स सम्मान्य शिखरो व्यसृजद् गृहम्॥५२॥
अन्येद्युश्च स तां कन्यामारोप्य सपरिच्छदाम्।
यानपात्रेऽम्बुमार्गेण प्राहिणोत्सिंहलान् प्रति ॥५३॥
अथ यावदहं तत्र गन्तुमिच्छामि सोत्सुकः।
तावद्विद्युन्निपातोप्रा वार्ता तत्रोदमूर्छियम्॥५४॥
शिखरस्य सुता यन याता प्रवहणेन तत्।
मग्नमब्धौ न चैकोऽपि तत उत्तीर्णवानिति॥५५॥
तद्वाह्णाशवास्त्या भग्नधैर्यः प्रवहणाकुलः।
अह्रं सद्यो निरालम्ब न्यपतं शोकसागरे॥५६॥
वहैराश्वास्यमानश्च चित्तमाशाभिराक्षिपन्।
अकार्षं निश्चयं ज्ञातुं तद्दीपगमने मतिम्॥५७॥
अथ राजप्रियोऽप्यर्थैस्तैस्तस्तृषितोऽपि सन्।
आरुह्याम्बुनिधौ पोतं गन्तुमारब्धवानहम्॥५८॥
गच्छतश्च महाशब्दो मुञ्चन्धाराक्षरावलीः।
उदतिष्ठन्नमाकस्माद् घोरो वारिदतस्करः॥५९॥
तद्वायुना विरुद्धेन विधिनेव बलीयसा।
उत्क्षिप्योत्क्षिप्य च मुहुर्भग्नं मे वहनं ततः॥६०॥
मग्नेऽम्बुधौ परिजने धने च विधियोगतः।
एकं प्रापि महत्काष्ठं पतितन सता मया॥६१॥
तेन प्रसारितेनेव धात्रा सपदि बाहुना।
शनैर्वतिवशादम्बु पुलिनं प्राप्तवानहम्॥६२॥
तत्राधिरुह्य दुःखार्त्तो निन्दंश्चैवमशङ्कितम्।
स्वप्नलब्धमहं प्रापं तटोपान्तच्युतस्मितम्॥६३॥
तद्विश्रयाच्च निकटे ग्रामं कूलाप्तनाविकम्।
प्रीतवस्त्रयुगोऽज्याक्षमम्ब्विवाहृतम मनाक्॥६४॥
ततो दिशमजानानो दयिताविरही भ्रमन्।
दृष्टवानस्मि सिकताधिवसिक्तभूतां मुवम्॥६५॥
विचरन् मुनिकन्यायां तस्यां चाद्राक्षमग्रतः।
कन्यां लिङ्गार्चनव्यग्रां वनपद्मपि शोभिनीम्॥६६॥

एकादश लम्बक १९

एकादश लम्बक १९
मैं भद्रभाता को ऐसा सन्देश भेज दूँगा कि वह उसे तुम्हे ही देगा। इस प्रकार कहकर और
मेरा समुचित सम्मान करके शिरार ने मुझे घर भेज दिया ॥५२॥
दूसरे दिन शिरार ने अपने पुरोधा और माल-सामान के साथ उस कन्या को समूचे
मार्ग से नाव पर बैठाकर, सिंहल द्वीप भेज दिया ॥५३॥
उसके जाने के उपरान्त जब मैं सिंहल द्वीप जाने को उद्यत हुआ तब वायुयान के समान
यह समाचार वहाँ फैल गया ॥५४॥
कि शिरार की कन्या जिस नाव से गई थी वह नाव समुद्र में डूब गई। एक भी व्यक्ति
उनमें से समुद्र से नहीं निकल सका ॥५५॥
उस समय समाचार-रूपी ओलों से जर्जर और नाव के लिए व्याकुल असहाय होकर में
शोक-समुद्र में डूब गया ॥५६॥
बड़ा स धैर्य विश्वाय जाते हुए और आशाओं से मन को शान्त करते हुए मैंने यह समाचार
जानने के लिए सिंहल द्वीप जाने का निश्चय किया ॥५७॥
तदनन्तर राजा का प्रिय होने पर और तरह-तरह के धन से समृद्ध होने पर भी मैंने
जहाज पर चढ़कर समुद्र-यात्रा की ॥५८॥
जब मैं समुद्र-यात्रा कर ही रहा था कि इतने में धारा-रूपी बाणों का वर्षा करता हुआ
भीषण वाष्प-रूपी चोर, अकस्मात् आकाश में चढ़ आया ॥५९॥
तब विपरीत वायु से और थपेड़े बलवान् भाग्य से बार-बार टकराकर उछलता हुआ
जहाज टूट-फूट कर डूब गया ॥६०॥
भाग्यवश मेरे साथियों और धन-सम्पत्ति के समुद्र में डूब जाने पर समुद्र ने बड़े दया
मैंने एक बड़ा लकड़ी का तख्ता पा लिया ॥६१॥
उस पर पड़कर और हावा से उस धारा-बहाव में वायु के अनुकूल होने पर किसी प्रकार
किनारे पर पहुँच गया ॥६२॥
तट पर लग कर जीवित रहने का निश्चय करने पर मैंने वहीं पर गिरा हुआ माल का
एक टुकड़ा पाया ॥६३॥
उस फटे-तख्तों के मध्य बचकर आये हुए अधिक कष्ट से अत्यन्त दुर्बल और दोनों के
न रहने पर मैंने समुद्र-कण्ठ को बचाने की बुद्धि का विचार किया ॥६४॥
इसके दिन मैंने देखा कि उस द्वीप के किनारे बहुत-सी ह्वेल मछलियाँ तैरती हुई
किनारे पर आनी शुरू हुईं ॥६५॥
उन लोगों ने अपने पंखों से पानी को उछालते हुए किनारे पर पहुँचकर और किनारे की
गुफा में मुँह फैलाकर उस मांस के टुकड़े को खाने के लिए दौड़ीं ॥६६॥

१६ कथासरित्सागर

१६ कथासरित्सागर
अहो प्रिया सुसदृशी काप्येषा सेव किं भवेत्।
कुतो बतन्न तादृंशि भागधेयानि यन्मम ॥६७॥
इति मां चिन्तयन्तं च सेवेयमिति दक्षिणम्।
लोचनं वदति स्मैव साह्लादं प्रस्फुरन्मुहुः ॥६८॥
तन्वि प्रासादवासार्हा त्वमरण्येऽत्र का वद।
इति पृष्टा ततः सा च मया नाह स्म किञ्चन ॥६९॥
मुनिशापभयेनाथ लतागुल्मान्तराश्रितः।
स्थितवानस्मि तां पश्यन्नवितृप्तेन चक्षुषा ॥७०॥
कृतार्चना सा च मुहुः सस्नेहं परिवृत्य माम्।
पश्यन्ती विमुञ्चन्ती च किञ्चिदुत् प्रायासत शनैः ॥७१॥
गतायां मुग्धभासस्यां तमोधाः पश्यतो दिशः।
निष्ठाचक्रसदृशी काप्यवस्था ममाभवत् ॥७२॥
क्षणाच्चाशङ्कितायातां तेजसार्कप्रभानिभाम्।
सुतां मतङ्गस्य मुनेराबाल्याद्ब्रह्मचारिणीम् ॥७३॥
यमुनाख्यां तपः क्षामशरीरां दिव्यचक्षुषम्।
साक्षाद्धृतिमिवापश्यमहं कल्याजदर्शनाम् ॥७४॥
सा मामवददालम्ब्य चन्द्रसार धृतिं शृणु।
द्विषत्त्रास्यो वणिग् योऽसावस्ति द्वीपान्तरे महान् ॥७५॥
स रूपवत्यां जातायां कन्यायां सुहृदा किल।
जिनरक्षितसञ्ज्ञेन ज्ञानिनावादि भिक्षुणा ॥७६॥
स्वयं त्वया न देयेयं कन्यैषा ह्यप्रमातुका।
दोषः स्यात्ते स्वयन्दाने विहितं तादृशं हितम् ॥७७॥
इत्युक्तो भिक्षुणा सोऽथ तां प्रदेयां सुतां वणिक्।
च मातामहहस्तेन दातुमच्छत्स्ववर्धिताम् ॥७८॥
अतः सा सिंहलद्वीपं शेन मातामहान्तिकम्।
पित्रा विसृष्टा बहने भग्ने न्यपतदम्बुधौ ॥७९॥
आयुर्बलेन चानीथ दवनेव महोम्मिणा।
वेलातटे समुद्रेण निक्षिप्ता सा वणिक्सुता ॥८०॥
तावत्पिता मे भगवान् मतङ्गमुरिम्बुधौ।
सशिष्यः स्नातुमायातो मृतकल्पां ददर्श ताम् ॥८१॥

एकादश लम्बक १७

एकादश लम्बक १७
ओह् ! यह मेरी प्राणप्यारी के समान है या सम्भवतः वही हो। किन्तु, यह कैसे होगा ?
मेरा ऐसा भाग्य कहाँ ॥६७॥
मैं इस प्रकार सोच ही रहा था कि इतने में प्रसन्नता से बार-बार फड़कती हुई दाहिनी
आँख ने कहा—'यह वही है' ? ॥६८॥
हे कृशांगी महलों में रहने योग्य तू इस जंगल में कौन है ? मुझसे इस प्रकार पूछी गई
उस बाला ने कुछ न कहा ॥६९॥
तब मैं मुनि के शाप के भय से लता-गुल्म से छिपकर खड़ा हुआ उसे अतृप्त नेत्रों से
देखता रह गया ॥७०॥
वह सुन्दरी पूजन करने के उपरान्त घूम करके स्नेहपूर्वक मुझे देखती हुई और कुछ सोचती
हुई धीरे-धीरे चल पड़ी ॥७१॥
उसके चले जाने पर मेरे लिए चारों ओर अँधेरा हो जाने पर मेरी दशा रात्रि में चकवे
के समान अवर्णनीय थी ॥७२॥
कुछ समय के पश्चात् निष्पाप आती हुई, तेज से सूर्य के समान चमकती हुई, मतङ्ग
मुनि की बाल-ब्रह्मचारिणी सुवर्णसमा पुत्री यमुना नाम की उनकी सखी को मूर्त्तिमती धृति
(धैर्य) के रूप में मैंने देखा ॥७३-७४॥
वह मुझे स्वस्थ करके कहने लगी— हे चन्द्रसार, धीरज धर के सुन। दूसर द्वीप में दिगंबर
नाम का महान् वैश्य है ॥७५॥
उसकी रूपवती पत्नी में कन्या उत्पन्न होने पर जितरक्षित नामक विज्ञानी भिक्षु ने अपने
मित्र दिगंबर से कहा—॥७६॥
हे दिगंबर यह कन्या तुम्हारी माता की है। इसे तुम स्वयं किसी को दान न करना। स्वयं
दान करने से पाप होगा यही तेरे लिए हित है ॥७७॥
भिक्षु के इस प्रकार कहने पर उस वैश्य दिगंबर ने तुम्हारे द्वारा मांगी गई उस कन्या का
उसके मामा के हाथ से दान कराने की इच्छा की ॥७८॥
तब उसने उसे नाव द्वारा सिंहल द्वीप में उसके मामा के पास भेज दिया। किन्तु, वह नाव
भीषण तूफान के कारण समुद्र में डूब गई ॥७९॥
नाव के डूबने पर भी आयु शेष रहने के कारण भाग्य ने मङ्गरा के साथ इस समुद्र-तट
पर ला पटका ॥८०॥
इसी अवसर पर मेरे पिता मतङ्ग मुनि अपने शिष्यों के साथ समुद्र में स्नान करने के लिए
उतरे और डूबती पड़ी हुई इस कन्या का उद्धार किया॥८१॥

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर
स दयालुः समाश्वास्य तां स्वमाश्रममानयत्।
यमुने तव पाल्येयमिति च न्यस्तवान् मयि ॥८२॥
वलात्तटादियं प्राप्ता मयेति स महामुनिः।
नाम्ना तामकरोद्वेलां बालां मुनिजनप्रियाम् ॥८३॥
तत्स्नेहेन च चित्तं मेऽप्यस्तस्नेहकृपामयम्।
ब्रह्मचर्यनिरस्तोऽपि हा संसारोऽथ बाधते ॥८४॥
आपाणिग्रहणां तां च नवयौवनशोभिनीम्।
ब्रूयत चन्द्रसारैतां वर्द्ध दर्शं मनो मम ॥८५॥
सा च प्राग्जन्मभार्या ते बुद्ध्वा च त्वामिहागतम्।
प्रणिधानादहं पुत्र सम्प्राप्तैषा तवान्तिकम् ॥८६॥
तदागच्छापयच्छस्व वेलां तामस्मदर्पिताम्।
क्लेशोऽनुभूतः साफल्यं भजतां युवयोरयम् ॥८७॥
इत्यानन्द्य गिराऽभ्रवृष्ट्येव नयति स्म सा।
यमुना मां भगवती मातङ्गस्याश्रमं पितुः ॥८८॥
विज्ञप्तश्च तया तत्र तां मातङ्गमुनिः स मे।
ददौ वत्सां मनोगम्यसम्पत्तिमिव रूपिणीम् ॥८९॥
ततस्तया समं तत्र वेत्याहं सुखस्थितः।
एकदा वधुतोऽकार्षं जलकेलिं सरोऽम्भसि ॥९०॥
अपश्यता सच्छलनाप्यवेक्षं क्षिपता जलम्।
सिक्तः स्नानप्रवृत्तोऽत्र स मातङ्गमुनिर्मया ॥९१॥
स तेन कुपितः शापं सभार्यं मामपातयत्।
वियोगो भविता पापो दम्पत्योर्युवयोरिति ॥९२॥
ततस्तया दीनगिरा वध्व्या पादलग्नया।
प्रार्थितः स मुनिर्ध्यात्वा शापान्तं नो समादिशत् ॥९३॥
जेता करेणुवेगेन योऽश्वरत्नयुगं बली।
नरवाहनदत्तं स भाविविद्याधरेश्वरम् ॥९४॥
चन्द्रसार यदा द्रक्ष्यस्याराद्वत्सेश्वरात्मजम्।
सङ्गत्स्यसे तदा शापप्रशमाद्भार्ययानया ॥९५॥
इत्युक्त्वा स मातङ्गोऽपि कृत्वा स्नानादिकां क्रियाम्।
दर्शनाय हरेर्व्योम्ना श्वेतद्वीप गतोऽभवत् ॥९६॥

एकादश लम्बक ९ ९

एकादश लम्बक ९ ९
दयालु मुनि उसे धीरज बँधाकर अपने आश्रम में ले आये और—'यमुने, तुम्हें इसे
पालना है'—कहकर मुझे सौंप दिया ॥८२॥
समुद्र के तट से यह लड़की प्राप्त हुई, इसलिए मतंग मुनि ने मुनियों की प्यारी इस
कन्या का नाम बेला रख दिया ॥८३॥
इस कन्या के स्नेह से मेरा चित्त सन्तान-स्नेह से भर गया है। ब्रह्मचर्य से त्याग किया
हुआ संसार भी आज मुझे कष्टप्रद प्रतीत हो रहा है ॥८४॥
हे चन्द्रसार, अविवाहित और नवयौवन से सुसज्जित इस कन्या का वेश-देखकर मेरा
चित्त दुःखी हो रहा है ॥८५॥
बेटा, योगबल से मैने जान लिया कि यह तेरी पूर्वजन्म की भार्या है और दैवयोग से तू
भी यहाँ आ गया है ॥८६॥
इसलिए, आओ और हमारे द्वारा दान की गई इस कन्या का पाणिग्रहण करो। तुम दोनों ने
जो कष्ट का अनुभव किया है, वह सफल हो' ॥८७॥
बिना मेघ की वृष्टि के समान मुझे शान्त करती हुई यमुना अपने पिता मतंग मुनि के
आश्रम में ले गई ॥८८॥
वहाँ जाकर सूचित किये गये मतंग ने मनोरथ की मूर्त्तिमती सम्पत्ति के समान उस
कन्या का मुझे प्रदान किया ॥८९॥
तब मैं वहाँ आश्रम में बेला के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। एक बार मैं उसके साथ तालाब के
जल में केलि कर रहा था। उस समय बेला के साथ निरत मैंने अनजाने में मतंग के प्रतिकूल
पानी फेंकते हुए वहाँ स्नान के लिए आये हुए मतंग ऋषि को भिगो दिया ॥ ९०॥
इस कारण क्रुद्ध मुनि ने पत्नी-सहित मुझे शाप दिया कि 'हे पापियो, तुम्हारा छह मास का
भविष्य में वियोग होगा' ॥९२॥
तब चरणों पर पड़ी हुई बेला द्वारा दीनतापूर्वक प्रार्थना किए जाने पर मुनि ने इस शाप
का सान्त्वन इस प्रकार बतलाया ॥९३॥
जो हस्तिनी रूप में उत्तम घोड़ों की चोरी करेगी, उस विद्याधर चक्रवर्ती कनकप्रभ
के पुत्र नरवाहनदत्त को जब देखोगे, तब तुम्हारे शाप की शान्ति होगी और इस भार्या से तुम्हारा
पुनः समागम होगा ॥९४ ५॥
ऐसा कहकर वह मतंग मुनि स्नान सन्ध्या आदि निष्क्रिया करके हरि के दर्शन के लिए
आकाश मार्ग से हंसाद्वीप को चले गए ॥ ९५॥
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२१० कथासरित्सागर

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२१० कथासरित्सागर

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विद्याधरेण पादाग्राच्च प्राप्तो धूर्जटे पुरा।
तस्मान्मया च बालत्वादत्तो यक्ष्णूतपादपः ॥९७॥
सोऽयं सद्रत्ननिचितो दत्तो वामधुना मया।
इत्युक्त्वा मां सभार्यं सा तत्रैव यमुनाव्यगात् ॥९८॥
अथाहं प्राप्तदयितो निर्विण्णो वनवासतः।
वियोगभीरुस्त्वरमथ स्वं देशं प्रति सोत्सुकः ॥९९॥
ततः प्रवृत्तश्चागन्तुमहं प्राप्याम्बुधेस्तटम्।
सख्ये वणिक्प्रवहणे भार्यामारोपयं पुरः ॥१००॥
स्वयं चारोढुमिच्छामि यावत्तावत्समीरणः।
मुनिघातात्समुत्पोतं तं दूरमहरन्मम ॥१०१॥
पोतेन हृतभार्यस्य मोहोऽपि विनिपत्य मे।
स्तम्भश्छिद्र इवाहार्षीच्चेतनां विह्वलात्मनः ॥१०२॥
ततोऽत्र तापसः कश्चिदागतो वीक्ष्य मूर्च्छितम्।
कृपया मां समाश्वास्य नीतवानाश्रमं शनैः ॥१०३॥
पृष्ट्वा चामं यथावृत्तं श्रुत्वा चापविजृम्भितम्।
बुद्ध्वा च सावधिं शापं धृतिबन्धं व्यधात् स मे ॥१०४॥
ततोऽम्भो भग्नवहनोत्तीर्णं प्राप्य वणिग्वरम्।
सहायं मिलितोऽभूवमन्विष्यंस्तां प्रियां पुनः ॥१०५॥
शापक्षयाद्यथा दत्तहस्तामम्ब्वध दुर्गमान्।
तांस्तानुलङ्घयन् देशान् दिवसांश्च बहूनहम् ॥१०६॥
क्रमान्न चाद्याक्षपुरं सम्प्राप्येदं धृतो मया।
खं वत्सश्वरसद्मयुक्तमाणिक्यिहागतः ॥१०७॥
दृष्टे च दूराद्धस्तिन्यां विजितादबयुगे त्वयि।
उज्झितः स मया शापभारो सध्वन्दरात्मना ॥१०८॥
क्षणाच्च सम्मुखायातामद्राक्षमिह तां प्रियाम्।
यन्मां वणिग्भिरानीतां तेन पोतेन साधुभिः ॥१०९॥
ततस्तयाहं यमुनाप्रत्तसद्रत्नहस्तया।
मिलितस्त्वत्प्रसादेन तीर्णशापमहाप्लवः ॥११०॥
अतः प्रणन्तुं त्वामस्मि वत्सराजमुपागतः।
निवृतो यामि चदानीं स्वदेशं दयितायुतः ॥१११॥

एकादश लम्बक १ ११

एकादश लम्बक १ ११
विद्याधर ने प्राचीन समय में शिवजी के चरण के प्रप्रनाग से जो जाम का पौधा पाया था
उस बालक पौधे को मैंने उससे ले लिया था। अच्छे-अच्छे रत्नों से भरे हुए इस पौधे का अब मैं
तुम दम्पती को देती हूँ। इस प्रकार सपत्नीक मुझे कहकर यमुना भी चली गई ॥१७-१८॥
तदनन्तर, अपनी प्रेयसी पत्नी को पाकर और बनवास से ग्रस्त में वियोग के भय से अपने
देश को जाने के लिए उत्सुक हुआ ॥१९॥
यात्रा के लिए उद्यत मैंने समुद्र-तट पर आकर किसी व्यापारी की नाव मिल जाने पर पहले
अपनी पत्नी को उस पर चढ़ा दिया ॥२०॥
जब मैं उस पर चढ़ने के लिए उद्यत हुआ तब मुनि के शाप के प्रभाव से वायु ने मेरी नाव
को किनारे से दूर कर दिया ॥२१॥
उस नाव द्वारा पत्नी का हरण हो जाने पर, मूर्च्छा ने भी अवसर देखकर मेरी चेतना का
हरण कर लिया। अर्थात् मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥२२॥
तब वहाँ आया हुआ एक तपस्वी मूर्छित देखकर मुझे हाथ में उठाकर धीरज देकर अपने
आश्रम में ले गया ॥२३॥
वहाँ ले जाकर उसने मेरा सारा समाचार सुनकर, इस शाप का प्रभाव समझकर और शाप
की अवधि को जानकर भी उसने मुझे धैर्य बँधाया ॥२४॥
तब अपनी पत्नी को ढूँढ़ता हुआ मैं टूटी हुई नाव से बचकर निकले हुए अपने मित्र
बेन्ध से मिला ॥२५॥
शाप से रूप की आशा में उसके जादुबल से उन उन बहुत-से दुर्गम देशों को लाँघता हुआ
तुमसे मिलने के लिए विशालापुर आया तो ज्ञात हुआ कि वत्सराज के रूप के यात्री-स्वरूप
गुप्त यहाँ आये हुए ॥२६-२७॥
जब दूर से मैंने हथिनी द्वारा ढोया पाहा का तुम्हारे द्वारा जीतते हुए देखा तब मैं
जीवन पाकर ध्यान से मूर्च्छा हट गया और क्षण भर में ही मैंने उसी नाव से मक्षिका द्वारा लाई
गई अपनी प्राणप्यारी को भी पाया ॥२८-२९॥
तब मैं यमुना के कल्याणमय शापा से राज्य को व उस बचा से मिला और तुम्हारी
कृपा से शाप का कष्ट पार किया ॥३०॥
इसलिए हे वत्सराज के सचिव मुझे प्रणाम करने के लिए मैं यहाँ आया हूँ और अब बन्धों
से मुक्त होकर अपनी विद्याधरों के साथ जा रहा हूँ ॥३१॥

१ १२ कथासरित्सागर

१ १२ कथासरित्सागर
इति स वणिजि तस्मिन्नात्मवृत्तान्तमुक्त्वा
गतवति चरितार्थे चन्द्रसारे प्रणम्य।
अभवदतिविनम्रो वत्सराजात्मजेऽस्मिन्
स किल रुचिरदेवो दृष्टमाहात्म्यदृष्टः ॥११२॥
प्रादाच्च तां स्वभगिनीमुपचारवृत्ति-
मारुम्ब्य युक्तिमनुरागहताय तस्मै।
प्राम्बिसितां सुसदृशीं स जयेन्द्रसेनां
सद्यः करण्डुसुरगोत्तमयुग्मयुक्ताम् ॥११३॥
स च तामादाय बधूं साश्ववरां रुचिरदेवमामन्त्र्य।
नरवाहनदत्तः स्वां कौशाम्बीमाययौ नगरीम् ॥११४॥
तस्यामास्त च विहरन्नन्दितवत्सेश्वरस्तया सहितः।
अन्याभिश्च स सुखितो देवीभिर्मदनमञ्जुकाद्याभिः ॥११५॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
वेताललम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
समाप्तश्चायं वेताललम्बक एकादशः।

एकादश लम्बक १ १३

एकादश लम्बक १ १३
इस प्रकार, उस वैश्य चन्द्रसार के अपना वृत्तान्त कहकर और प्रणाम करके चले जाने पर
वह रुचिरदेव नरवाहनदत्त की महिमा को जानकर अत्यन्त हर्षित हुआ और उसके प्रति और
अधिक नम्र हो गया ॥११२॥
साथ ही रुचिरदेव ने प्रेम से वश मे किये गये नरवाहनदत्त के लिए, हथिनौ और घोड़ा की
जोड़ी के साथ अपनी बहन जयन्द्रसेना को प्रदान किया जिसे वह पहले ही देना चाहता था ॥११३॥
तदनन्तर, नरवाहनदत्त रुचिरदेव से मिलकर घोड़े और हथिनौ के साथ उसकी बहन
जयन्द्रसेना को लेकर अपनी नगरी कौशाम्बी लौट आया ॥११४॥
और, अपने पिता वत्सराज तथा मदनमंचुका आदि पत्नियों के साथ वह नरवाहनदत्त
अपनी नगरी में सुखपूर्वक रहन लगा ॥११५॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के
वेला-लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त
एकादश वेला-लम्बक समाप्त

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परिषद् के गौरव-ग्रन्थ
१ हिन्दी-साहित्य का आदिकाल—आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ३ २५
२ यूरोपीय दर्शन—स्व महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा ३ २५
३ हर्षचरितः एक सांस्कृतिक अध्ययन—डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल ९.५
४ विश्वधर्म-दर्शन—श्रीसांवलियाबिहारीलाल वर्मा १३ ५
५ सार्थवाह—डॉ मोतीचन्द्र ११
६ वैज्ञानिक विकास की भारतीय परम्परा—डॉ सत्यप्रकाश ८
७ सन्त कवि दरिया एक अनुशीलन—डॉ धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री १४
८. काव्य-मीमांसा (राजशेखर-कृत)—अनु स्व पं केदारनाथ शर्मा सारस्वत १५
९. श्रीरामावतार शर्मा-निबन्धावली—स्व महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा ८.७५
१ प्राङ्मौर्य बिहार—डॉ देवसहाय त्रिवेद ७ २५
११ गुप्तकालीन मुद्राएँ—स्व डॉ अनन्त सदाशिव अल्तेकर ९ ५
१२ भोजपुरी भाषा और साहित्य—डॉ उदयनारायण तिवारी १६.५
१३ राजकीय व्यय-प्रबन्ध के सिद्धान्त—श्रीगोरखनाथ सिंह १५
१४ रबर—श्रीफूलदेवसहाय वर्मा एम् एस-सी ७ ५
१५ ग्रह-नक्षत्र—श्रीत्रिवेणीप्रसाद सिंह आइ सी एस् ४ २५
१६. नीहारिकाएँ—डॉ गोरखप्रसाद ४ २५
१७ हिन्दू धार्मिक कथाओं के भौतिक अर्थ—श्रीत्रिवेणीप्रसाद सिंह आइ सी एस् ३
१८. ईख और चीनी—श्रीफूलदेवसहाय वर्मा ११.५
१९ शैवमत—मूल लेखक और अनुवादक डॉ यदुवंशी ८.
२ मध्यदेश ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सिंहावलोकन—डॉ धीरेन्द्र वर्मा ७
२१ २४ प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण—(खण्ड १ से ४ तक)—(संपादित) ७ २५
२५ २८. शिवपूजन-रचनावली—(चार भागों में)—आचार्य शिवपूजन सहाय ३६ २५
२९. राजनीति और दर्शन—डॉ विश्वनाथप्रसाद वर्मा १८
३ बौद्धधर्म-दर्शन—स्व आचार्य नरेन्द्रदेव १७
३१ ३२ मध्य एशिया का इतिहास—(दो खण्डों में)—महापण्डित राहुल सांकृत्यायन २ ७५
३३ दोहाकोश—ले सरहपाद छायानुवादक म प राहुल सांकृत्यायन ११ २५
३४ हिन्दी को मराठी संतों की देन—आचार्य विनयमोहन शर्मा ११ २५
३५ रामभक्ति-साहित्य में मधुर उपासना—डॉ भुवनेश्वरनाथ मिश्र 'माधव' १ २५
३६. अप्पारमणीय और चित्त-विकसन—स्व वेंकटेश्वर शर्मा ७५
३७. प्राचीन भारत की प्रांगामिकता—प रामदीन पाण्डेय ६५

  • २ -
    ३८. बांसरी बज रही—श्रीजगदीश त्रिगुणायत ८
    ३९. चतुर्वर्णमाला-निबन्धावली- (संकलित) ४.२५
    ४०. भारतीय कला को बिहार की देन—डॉ० बिन्ध्येश्वरीप्रसाद सिंह ७.५
    ४१. भोजपुरी के कवि और काव्य—श्रीदुर्गाशंकरप्रसाद सिंह ५.७५
    ४२. पेट्रोलियम—श्रीसुखदेवसहाय वर्मा ५.५
    ४३. नील-पंक्षी- (मूल लेखक मारिस मेटरलिंक) अनु० डॉ० कामिल बुल्के २.५
    ४४. लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ मानभूम एण्ड सिंहभूम— (सम्पादित) ४.५
    ४५. षड्दर्शन रहस्य—पं० रंगनाथ पाठक ५
    ४६. जातककालीन भारतीय संस्कृति—श्रीमोहनलाल महतो 'वियोगी' १.५
    ४७. प्राकृत भाषाओं का व्याकरण—के० सी० पिशल, अनु० डॉ० हेमचन्द्र जोशी २
    ४८. दक्षिणी हिन्दी-काव्यधारा—महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ६
    ४९. भारतीय प्रतीक-विद्या—डॉ० जनार्दन मिश्र ११
    ५०. संतमत का सरभंग-सम्प्रदाय—डॉ० धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री ५.५
    ५१. सूक्तिकोष (प्रथम खण्ड)—सम्पादक डॉ० विश्वनाथप्रसाद ३
    ५२. कुँवरसिंह-अमरसिंह—के० का० कि० दत्त, अनु० पं० छविनाथ पाण्डेय ५
    ५३. मुद्रण-कला—पं० छविनाथ पाण्डेय ७.२५
    ५४. लोक-साहित्य आकर-साहित्य-सूची—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ५
    ५५. लोकगाथा-परिचय—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा २.५
    ५६. लोककथा-कोश—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा १२
    ५७. बौद्धधर्म और बिहार—पं० हवलदार त्रिपाठी 'सहृदय' ८
    ५८. साहित्य का इतिहास-दर्शन—आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ५
    ५९. मुहावरा-मीमांसा—डॉ० भानुप्रकाश गुप्त १.५
    ६०. वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति—पं० गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ५
    ६१. पंचदशलोकगाथा-निबन्धावली— (संकलित) ४.५
    ६२. हिन्दी-साहित्य और बिहार (७वीं से १८वीं शती तक)—
    स० आचार्य शिवपूजन सहाय ५.५
    ६३. कथासरित्सागर (प्रथम खण्ड)—सोमदेव, अनु० के० ना० शर्मा सारस्वत १
    ६४. अयोध्याप्रसाद खत्री-स्मारक ग्रन्थ—(सम्पादित) ५
    ६५. सदल मिश्र-ग्रन्थावली—सं० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ५
    ६६. रंगनाथ रामायण (तेलगु से अनूदित)—अनु० बी० ए० सी० कामाक्षि राव १.५
    ६७. गोस्वामी तुलसीदास (पुनर्मुद्रण)—स्व० श्रीशिवनन्दन सहाय ५.५
    ६८. पुस्तकालय-विज्ञान-कोश—श्रीप्रभुनारायण गौड़ ४.५
    ६९. प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण (खण्ड ५)—
    स० आचार्य नलिनविलोचन शर्मा १
    ७०. भारतीय शब्दकोष (प्रकाण्ड १८८६)—सं० श्रीजयमाधवप्रसाद मिश्र तथा
    श्रीमभावरप्रसाद अम्बष्ठ ८.

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