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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

८१२ कथासरित्सागर

८१२ कथासरित्सागर इति कर्मकरी सा तमवोचत् तत्पतिं यथा। तत्तव प्रतिपेदे तत्सर्वं मूर्खशिरोमणिः ॥२०२॥ वञ्च्यन्ते हृदयैरेव कुस्त्रीभिः सरलाशयाः। धूतोऽन्यिन्मुग्धचण्डालकन्यका श्रूयतां त्वया ॥२ ३॥ चण्डालकन्यका कथा अभूद्रूपवती कापि मुग्धा चण्डालकन्यका। सार्वभौमवरप्राप्तौ सङ्कल्पं हृदि साकरोत् ॥२०४॥ सा मातु दृष्ट्वा राजानं नगरभ्रमनिर्गतम्। सर्वोत्तमं भर्तृबुद्धेरनुयातुं प्रचक्रमे ॥२०५॥ तावदागात् पथा तेन मुनिस्तस्य प्रणम्य सः। पादौ गजावरूढः सन् राजा स्वभवनं ययौ ॥२ ६॥ तद्दृष्ट्वा राजतोऽप्येनं विचिन्त्य मुनिमुत्तमम्। चण्डालकन्या राजानं त्यक्त्वा सा मुनिमन्वगात् ॥२०७॥ मुनिः सोऽपि व्रजन् दृष्ट्वा शून्यमग्रे शिवालयम्। न्यस्तजानुः क्षितौ तत्र शिवं मत्वा ययौ ततः ॥२०८॥ तद्वीक्ष्य सान्त्यजा मत्वा मुनेरप्युत्तमं शिवम्। भर्तृबुद्ध्या मुनिं त्यक्त्वा बंव तत्रव स्थियिये ॥२ ९॥ क्षणाच्चात्र प्रविश्य श्वा देवस्याहृत्य पीठिकाम्। जङ्घामुत्क्षिप्य जातोत्सर्गस्तस्य तद्व्यधात् ॥२१ ॥ तद्विलोक्यान्त्यजा गत्वा देवान्छ्वानं समुत्तमम्। यान्तं तमेवान्वगात् सा त्यक्त्वा देवं प्रतीच्छ्या ॥२११॥ श्वा चागत्यथ चण्डालगृहं परिचितस्य सः। चण्डालसूनोः प्रणयाल्लुलोठक्रमयोः पादयोः ॥२१२॥ तवालोक्योत्तमं मत्वा शुनश्चाण्डालपुत्रकम्। स्वजातितुष्टा वव्रे सा तमेव पतिमन्त्यजा ॥२१३॥ एवं कृतपदा दूरे पतन्ति स्वपदे जडाः। एव च मूर्खं राजानं सक्षेपमपरं शृणु ॥२१४॥ कृपणस्य राज्ञः कथा मूर्खः कश्चिद्भूदाजा कृपणः कोपवानपि। एकदा जगदुस्त्वैव मन्त्रिणस्तं हितैषिणः ॥२१५॥ दानं हरति देहह दुर्गति पारलौकिकीम्। तद्देहि दानमायूंषि भङ्गुराणि धनानि च ॥२१६॥ सञ्छ्रवा स नृपोऽवादीत् दानं दास्याम्यहं तदा। दुर्गतिं प्राप्स्यात्मानं मृतो द्रक्ष्यामि चेन्निति ॥२१७॥

षष्ठम लम्बक ८३३

षष्ठम लम्बक ८३३ वह मूलराज यह सब सच मानकर प्रसन्न हो गया। इसी प्रकार, सीधे-सादे हृदयवाले लोग दुष्ट स्त्रियों द्वारा खेल-खेल में ही ठगे जाते हैं। 'महाराज तुमने अस्थिमूर्ख की कथा सुनी अब एक मूर्खा चण्डाली की कथा सुनो ॥२२३॥ मूर्खा चण्डालकन्या की कथा एक मूर्ख और सुन्दरी चंडालकन्या थी। उसने सबसे बड़े पति की प्राप्ति के लिए मन में संकल्प किया ॥२२४॥ उसने किसी समय नगर भ्रमण के लिए निकले राजा को देखकर उसे पति बनाने के लिए उसके पीछे चलना प्रारम्भ किया ॥२२५॥ इतने में ही उस मार्ग से एक मुनि आया। राजा उतरकर उसके चरणों में प्रणाम करके फिर हाथी पर सवार हो गया और चला गया ॥२२६॥ यह देखकर, उस मुनि को राजा से भी उत्तम समझकर, वह कन्या उस मुनि के पीछे चल पड़ी ॥२२७॥ उस मुनि ने भी मार्ग में जाय हुए एक शिवालय को देखा वहाँ भूमि पर घुटना टेककर शंकरजी को प्रणाम करके वह आगे की ओर चला ॥२२८॥ उस चंडालकन्या ने उस मुनि से भी शिवजी को उत्तम समझकर मुनि को छोड़ शिवलिंग को पकड़ लिया ॥२२९॥ कुछ ही समय पश्चात् वहाँ पर एक कुत्ते ने आकर और देवता के चबूतरे पर चढ़कर, टाँगें उठाकर अपनी जाति के स्वभाव का काम किया। (अर्थात्, शिवलिंग पर मूत्र-त्याग कर दिया) ॥२३०॥ यह देखकर उस चंडालिनी ने कुत्ते को शिवजी से भी उत्तम समझकर पति बनाने की इच्छा से उस कुत्ते का पीछा किया ॥२३१॥ वह कुत्ता अपने परिचित एक चंडाल के घर में घुसकर एक युवा चंडाल के पैरों में प्रेम से लोटने लगा ॥२३२॥ यह देखकर वह चंडालकन्या कुत्ते से भी अधिक अपनी जाति के चांडाल को बड़ा मान कर, अर्थात् उसे सब से बड़ा मानकर, पति बनाकर संतुष्ट हुई ॥२३३॥ गोमुख ने नरवाहनदत्त से कहा—'स्वामिन्, इस प्रकार बहुत ऊँचे चढ़ने की चेष्टा करनेवाले मूर्ख फिर अपने ही स्थान पर आकर गिरते हैं। इसी प्रसंग में एक मूर्ख कृपण राजा की कथा सुनो' ॥२३४॥ कृपण राजा की कथा एक मूर्ख राजा था। वह धनवान् होते हुए भी अति कृपण था। एक बार उसके हितैषी मन्त्रियों ने उससे कहा—'स्वामिन्, इस लोक में किया गया दान परलोक की दुर्दशा को दूर करता है। इसलिए, दान दो क्योंकि जीवन और धन दोनों नाशवान् हैं ॥२३५-२३६॥ यह सुनकर राजा कहने लगा कि मैं दान तब दूँगा जब मरकर अपने को कष्ट म पड़ा हुआ देखूँगा' ॥२३७॥ १५

मित्रयोः कथा

ततश्चान्तर्हसन्तस्ते तूष्णीमासत मन्त्रिणः। एव नोज्झति मूढोऽर्थान् यावदर्थे स नोज्झितः ॥२१८॥ मित्रयोः कथा राजभीतौ धृतौ देव मध्ये मित्रद्वयं शृणु। बभूव चन्द्रापीडाख्यः कान्यकुब्जे महीपतिः ॥२१९॥ तस्याभवच्च धवलमुखाख्यः कोऽपि सेवकः। बहिर्भुक्त्वा च पीत्वा च सदैव प्राविशद् गृहम् ॥२२०॥ भुक्तपीतः कुतो नित्यमायासीति स भार्यया। पृष्टः स जातु धवलमुखस्तामवमभ्यधात् ॥२२१॥ सुहृत्सादर्वाहं शश्वद् भुक्त्वा पीत्वा च सुन्दरि। सदैवायामि येनास्ति लोक मित्रद्वयं मम ॥२२२॥ कल्याणवर्मनामको भोजनाद्युपकारकः। द्वितीयो वीरबाहुश्च प्राणैरप्युपकारकः ॥२२३॥ एव श्रुतैव धवलमुखोऽसौ भार्यया तया। ऊचे मित्रद्वयं तन्मे भवता दर्श्यतामिति ॥२२४॥ ततो ययौ स तद्युक्तस्तस्य कल्याणवर्मणः। गृहं सोऽपि महार्हैस्तमुपचारैरताधरत् ॥२२५॥ अन्येद्युः स ययौ वीरबाहोर्भार्यायुतोऽन्तिकम्। स च धूतस्थितः कृत्वा स्वागतं तं विसृष्टवान् ॥२२६॥ ततोऽब्रवीत् सा धवलमुखं भार्या सकौतुका। कल्याणवर्मा महतीं सत्क्रियामकरोत्तव ॥२२७॥ कृतं स्वागतमात्रं तु भवतो वीरबाहुना। तदार्यपुत्र तं मित्रं मन्यसेऽभ्यधिकं कथम् ॥२२८॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद् गच्छ मिथ्या तौ ब्रूह्यसौ क्रमात् । राजा नः कुपितोऽकस्मात् ततो ज्ञास्यस्यथ स्वयम् ॥२२९॥ इत्युक्त्वा तेन गत्वैव सा तथैति तयैश्च तत्। कल्याणवर्मणोऽबोधस्त श्रुत्वैव जगाद ताम् ॥२३० ॥ भद्रत्यहं वणिक्पुत्रो ब्रूहि राज्ञः करोमि किम्। इत्युक्ता तेन सा प्राप्तावीरबाहोरप्यन्तिकम् ॥२३१॥ तस्मै तच्च शशंसद्राजकोपं स्वभर्तरि। स युक्तैवाययौ धावन् गृहीत्वा खड्गचर्मणी ॥२३२॥

षष्ठम लम्बक ८१५

षष्ठम लम्बक ८१५ तब यह सुनकर मन ही मन हँसते हुए मन्त्री लोग चुप बैठ गए। इस प्रकार, मूर्ख तबतक धन को नहीं छोड़ता जबतक धन उसे नहीं छोड़ता ॥२१८॥ दो मित्रों की कथा ‘महाराज मूर्ख राजा की कथा सुनी। अब बीच में दो मूर्ख मित्रों की कथा सुनिए। कान्यकुब्ज देश में चन्द्रापीड नाम का एक राजा था ॥२१९॥ उसका धवलमुख नाम का एक सेवक था। वह सदा बाहर से ही खा-पीकर घर में जाता था। एक दिन उसकी स्त्री ने उससे पूछा कि तुम प्रतिदिन बाहर कहाँ से खा-पीकर आते हो? तब धवलमुख ने कहा—हे सुन्दरी मैं सदा अपने मित्र के यहाँ से खा-पीकर आता हूँ। मेरे दो मित्र हैं ॥२२०—२२२॥ उनमें एक कल्याणवर्मा नाम का मित्र सदा ही भोजन आदि से मेरा उपकार करता है। दूसरा वीरबाहु नाम का मित्र है, जो अपने प्राणों से भी मेरा उपकार करता है ॥२२३॥ उसके इस प्रकार कहने पर उसकी स्त्री ने उससे कहा—‘तुम उन दोनों मित्रों को मुझे दिखाओ’ ॥२२४॥ तदनन्तर, वह धवलमुख स्त्री के साथ कल्याणवर्मा के घर गया और उसने बहुमूल्य सामान से उनका स्वागत-सत्कार किया ॥२२५॥ तब दूसरे दिन धवलमुख अपनी पत्नी के साथ वीरबाहु के पास गया। जुआ खेलते हुए उसने धवलमुख और उसकी स्त्री का साधारण स्वागत करके उसे विदा कर दिया ॥२२६॥ तब धवलमुख की स्त्री ने उससे आश्चर्य के साथ कहा— ‘कल्याणवर्मा ने तो तुम्हारा बहुत आतिथ्य-सत्कार किया ॥२२७॥ किन्तु, वीरबाहु ने बहुत साधारण स्वागत किया। इसलिए, तुम वीरबाहु को कल्याणवर्मा से अधिक स्वागत-सत्कार करनेवाला (प्राण देनेवाला) क्यों मानते हो ? ॥२२८॥ यह सुनकर, धवलमुख अपनी पत्नी से बोला कि तू जाकर, यों ही उनकी परीक्षा लेने की दृष्टि से उन दोनों से कह दे कि ‘राजा अकस्मात् ही हमारे लिए क्रुद्ध हो गया है। उसके बाद स्वयं ही तुझे सब मालूम हो जायगा ॥२२९॥ धवलमुख से इस प्रकार कही गई उसकी स्त्री ने वैसे ही जाकर उसके दोनों मित्रों से कह दिया ॥२३०॥ उसने पहले कल्याणवर्मा से कहा तो वह सुनते ही कहने लगा— मैं बनिया का पुत्र हूँ। तुम्हीं बताओ मैं राजा का क्या करूँ?’ उससे इस प्रकार कही गई वह स्त्री उसके बाद वीरबाहु के पास गई ॥२३१॥ उससे भी उसने उसी प्रकार पति से राजा के अप्रसन्न होने की बात कही। यह सुनते ही वीरबाहु ढाल-तलवार लेकर दौड़ता हुआ धवलमुख के पास आया ॥२३२॥

८१६ कथासरित्सागर

८१६ कथासरित्सागर मन्त्रिभिर्वारितः कोपाद्राजासौ सव्व्रजेति तम्। वीरबाहुः स धवलमुखोऽथ प्राहिणोद् गृहम्॥२३३॥ एव सदन्तरः तन्वि मित्रयोरेतयोर्मम। इति भार्याश्च धवलमुखेनोक्ता तुतोष सा।२३४॥ हृद्य यदुपचारेण मित्रमन्यत् सस्नेहं। तुल्येऽपि स्निग्धतायोगे तैलं तैलं घृत घृतम्॥२३५॥ इत्याख्याय कथामेतां मन्त्री मुग्धकथा क्रमात्। नरवाहनदत्ताय गोमुखोऽकथयत्पुनः ॥२३६॥ जलभीतमूर्खस्य कथा कश्चिन् मुग्धोऽध्वगस्तीर्त्वा कृच्छ्रात्तृष्णार्तरोऽटवीम्। नदीं प्राप्यापि न पपौ वीक्षाञ्चक्रे परं जलम्॥२३७॥ तृषितोऽपि पिबस्यम्भः किं नेत्युक्तोऽत्र केनचित्। इयत्कथं पिबामीति मन्दबुद्धिरुवाच तम्॥२३८॥ किं दण्डयति राजा त्वां सर्वं पीतं न चेत्त्वया। इति तेनोपहसितोऽप्यम्बु मुग्धः स नापिबत् ॥२३९॥ एव न शक्नुवन्तीह यद्यत्कर्तुमशेषतः। यथाशक्ति न तस्यांशमपि कुर्वन्त्यबुद्धयः ॥ २४० ॥ पुत्रघातिनो मूर्खस्य कथा जलभीत श्रुतो देव श्रूयतां पुत्रघात्ययम्। बहुपुत्रो दरिद्रश्च मूर्खः कश्चिदभूत् पुमान् ॥२४१॥ स एकस्मिन्मृते पुत्रे द्वितीयमवधीत् स्वयम्। कथं बालोऽयमेकाकी पथि दूरे व्रजेदिति ॥२४२॥ तत स निन्द्यो हास्यश्च देशांन्निर्वासितो जनैः। एव पशुश्च मूर्खश्च निर्विवेकमती समौ ॥ २४३॥ भ्रातृमूर्ख कथा श्रुतस्त्वया पुत्रघाती भ्रातृभीतमिमं शृणु। जनमध्ये कथा कुर्वन् कोऽप्यासीत् क्वापि मुग्धधीः ॥२४४॥ स भव्यं पुरुषं दूराद्दृष्ट्वा मूर्खोऽब्रवीदिदम्। एष मे भवति भ्राता रिक्थमस्य हराभ्यहम् ॥२४५॥ अह तु कश्चिदप्येतन्मम हेत नैतदृणं मम। इत्युक्तवान् स मूढोऽत्र पाषाणान्यग्रहामयत् ॥२४६॥ एवं मूढस्य मूढस्य स्वार्थाभिस्यातिचित्रता। भ्रातृभीत श्रुतो देव ब्रह्मचारिसुतं शृणु ॥२४७॥

दशम लम्बक ८३७

दशम लम्बक ८३७ तब धवलमुख ने बीरबाहु को यह कहकर शान्त किया और घर को लौटाया कि 'मंत्रिया न समझाकर राजा का क्रोध शान्त कर दिया' ॥२३३॥ तब धवलमुख ने अपनी स्त्री से कहा—'प्यारी तूने घर इन दोनों मित्रों का अन्तर देखा ! यह सुनकर उसकी स्त्री सन्तुष्ट हुई ॥२३४॥ इस प्रकार बाहरी शिष्टाचार (दिखावा) करनेवाले मित्र दूसरे होते हैं और सच्चे मित्र दूसरे । चिकनाहट समान होने पर भी तेल तेल है और घी घी ही है ॥२३५॥ गोमुख मंत्री इस प्रकार मूर्खों की कथा सुनाकर नरवाहनदत्त से फिर बोला ॥२३६॥ जलभीत मूर्ख की कथा एक मूर्ख पथिक ने प्यास से व्याकुल हो किसी प्रकार बीहड़ जंगल पार कर नदी के किनारे पहुँचकर भी पानी नहीं पिया और वह केवल जल की ओर ही देखता रहा ॥२३७॥ 'प्यास होकर भी पानी क्या नहीं पी रहे हो? किसी के इस प्रकार उससे पूछने पर वह मूर्ख बोला—'इतना पानी मैं कैसे पिऊँ'?॥२३८॥ 'यदि तू सब पानी न पियेगा तो क्या राजा तुम दंड देगा? इस प्रकार उसके द्वारा मजाक करने पर भी उस मूर्ख ने पानी नहीं पिया ॥२३९॥ इस प्रकार जिस कार्य को सम्पूर्ण रूप से किया जा सकता है, उसे मूर्ख जरा सा भी नहीं कर पाते ॥२४०॥ पुत्रघाती मूर्ख की कथा इस प्रकार जलभीत मूर्ख की कथा सुनी अब महाराज पुत्रघाती की कथा सुनो। बहुत पुत्रोंवाला एक दरिद्री पुरुष था। उसने एक पुत्र के मरने पर, दूसरे पुत्र को स्वयं मार डाला लोगों के पूछने पर कि 'तूने इस पुत्र को क्यों मार डाला? उसने उत्तर दिया कि 'यह बच्चा अकेला कैसे रहता? इसलिए, उसे दूसरा साथी भी दे दिया' ॥२४१-२४२॥ यह सुनकर उसकी निन्दा और हँसी करके लोगों ने उसे गाँव से निकाल दिया। इस प्रकार विचारहीन पुरुष और पशु दोनों ही समान होते हैं ॥२४३॥ भ्रातृमूर्ख की कथा

  • राजन् तुमने पुत्रघाती की कथा सुनी अब भ्रातृमूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख कुछ लोगों की मण्डली में बैठकर बात कर रहा था। इतने में किसी श्रेष्ठ पुरुष का दूर से ही आते देखकर वह बोला— यह मेरा भाई होता है। इसका पक्ष व हिसाबदार के रूप में हरण करना हूँ। परन्तु इसके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा कहते हुए उस मूर्ख ने गन्धर्व को भी हँसा दिया ॥ २४- ४६॥
  • स्वामिन् इस प्रकार मन्द की मूर्खता और स्वार्थ से अन्य व्यक्ति का अति विचित्रता होती । इस प्रकार आपने भ्रातृमूर्ख का कथा सुनी। अब कलाकारी के पुत्र की कथा सुनो॥ ४७॥

८१८ कथासरित्सागर

८१८ कथासरित्सागर ब्रह्मचारि पुत्रस्य कथा कश्चित् पितृगुणाख्यानप्रवृत्तमखिमध्यग । मुग्धः स्वपितुरुच्चैष वर्णयन्नवमभ्यधात् ॥२४८॥ आबाल्याद्ब्रह्मचारी मे पिता नान्योऽस्ति तत्समः । तच्छ्रुत्वा त्वं कुतो जात इति तं सुहृदोऽब्रुवन् ॥२४९॥ मानसोऽहं सुतस्तस्येत्येव पुनरपि ब्रुवन् । विशेषतो विहसितः स तैर्मूढशिरोमणिः ॥२५०॥ अत्यारूढ वदन्त्येवमसम्बद्धं जहादायाः । ब्रह्मचारिसुतं श्रुत्वा श्रूयतां गणकोऽप्ययम् ॥२५१॥ मूर्खज्योतिर्विदः कथा बभूव नाम गणकः कश्चिदविज्ञानवर्जितः । स भार्यापुत्रसहितः स्वदेशाद्वृत्त्यभावतः ॥२५२॥ गत्वा देशान्तरं तत्र मिथ्याविज्ञानमात्मनः । कृतकप्रत्ययेनार्थपूजां प्राप्तुमदीधयत् ॥२५३॥ परिष्वज्य सुतं बालं स तं सर्वजनाग्रतः । रुरोद पृष्टश्च जनैरथ पापो जगाद सः ॥२५४॥ भूत भव्यं भविष्यच्च जानेऽहं तदयं शिशुः । विपत्स्यते मे दिवसे सप्तमे तेन रोदिमि ॥२५५॥ इत्युक्त्वा तत्र विस्माप्य लोकं प्राप्तेऽह्नि सप्तमे । प्रत्यूष एव सुप्तं च स व्यापादितवान् सुतम् ॥२५६॥ दृष्ट्वाथ तं मृतं बालं सञ्जातप्रत्ययैर्जनैः । पूजितो धनमासाद्य स्वदेशं स्वैरमाययौ ॥२५७॥ इत्यर्थलोभात् मिथ्यैव विज्ञानस्थापनेच्छवः । मूर्खा पुत्रमपि घ्नन्ति न रम्येष्वेषु बुद्धिमान् ॥२५८॥ क्रोधिनो मूर्खस्य कथा अथ च श्रूयतां मूर्खः क्रोधनः पुरुषः प्रभो । बहिः स्थितस्य कस्यापि पुंसः कुत्रापि शृण्वतः ॥२५९॥ अभ्यन्तरे गुणान् कश्चिच्छशंस स्वजनाग्रतः । तदा चैकोऽब्रवीत्तत्र सत्यं स गुणवान् सखे ॥२६०॥ किं तु द्वौ तस्य दोषौ स्तः साहसी क्रोधनश्च यत् । इति वादिनमेवैतं बहिर्वर्ती निशम्य सः ॥२६१॥ पुमान् प्रविश्य सहसा वाससावेष्टयद् गले । रे चास्ति साहस किं मे क्रोधः कच्चन मया कृतः ॥२६२॥

दशम लम्बक ८११

दशम लम्बक ८११ ब्रह्मचारी पुत्र की कथा अपने-अपने पिताओं का व्याख्यान करते हुए मित्रों के बीच एक मूर्ख अपने पिता की प्रशंसा करते हुए बोला—'मेरे पिता बालब्रह्मचारी हैं। यह सुनकर उसके मित्र बोले—'तब तू किससे उत्पन्न हुआ? मैं उनका मानसपुत्र हूँ'—ऐसा कहते हुए उस मूर्खराज ने सबको खूब हँसाया॥२४८—२५०॥ मूर्ख व्यक्ति इस प्रकार बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। राजन् तुमने ब्रह्मचारी के पुत्र को सुना अब एक ज्योतिषी को भी सुनो॥२५१॥ मूर्ख ज्योतिषी की कथा एक अज्ञ ज्योतिषी था। जीविका के अभाव में वह अपनी स्त्री और पुत्र को साथ लेकर चल पड़ा। दूसरे देश में जाकर बनावटी विषाद दिखाकर वह अपने धन और यश की डींग हाँकने लगा॥२५२-२५३॥ एक बार बहुत लोगों के सामने आते सड़क की गोद में गिराकर वह रोने लगा। लोगों के पूछने पर उस पापी ने कहा—॥ २५४॥ 'मैं भूत, वर्तमान और भविष्य ये तीनों काल जानता हूँ। मेरा यह पुत्र आज से सातवें दिन मर जायगा। इसलिए रोता हूँ ॥२५५॥ ऐसा कहकर और लोगों को आश्चर्य में डालकर, सातवाँ दिन आने पर उसने प्रात: काल ही सोते हुए अपने पुत्र को गला घोंटकर मार डाला॥२५६॥ इस प्रकार बालक के मरने पर ज्योतिषी को त्रिकालदर्शी मानकर विस्मित जनता ने धन से उसकी पूजा की और वह इस प्रकार धन कमाकर अपने घर आ गया॥ ५७॥ इस प्रकार धन के लोभ से झूठी पण्डिताई का प्रचार करने के उत्साह में व्यक्ति अपने पुत्र तक की हत्या कर डालते हैं। अत: बुद्धिमान् पुरुष को उनसे स्नेह न करना चाहिए॥ ५८॥ धोबी गधे की कथा महाराज एक और गधे की कथा सुनो। एक पुरुष गधे और ... का धनी था। किसी पुरुष ने घर के भीतर न आने तक व्यग्रचित्त व संशय से किसी के पूछने हुए उसके गुणों की प्रशंसा की। तब वह बोला—यह ठीक है किन्तु उसमें दो दोष हैं क्योंकि वह बड़ा आलसी और पापी है। बाहर खड़े हुए उस गधे ने यह सुनकर और लज्जावश अपना अपमान समझकर क्रोधावेश में उस पुरुष का स्तन उसके ही काटने में बोलकर आक्षेप करते हुए कहा—अरे अनभिज्ञ मेरा क्या अपराध है और किस वजह कलंक दिया ? ॥२ ५९॥

८४ कथासरित्सागर

८४ कथासरित्सागर इत्युवाच च साक्षेपं पुमान् क्रोधाग्निना ज्वलन् । ततो हसन्तस्तत्रान्ये तमूचुः किं ब्रवीत्यदः ॥२६३॥ प्रत्यक्षवञ्चितश्चौद्यसाहसोऽपि भवानिति । एवं स्वदोषः प्रकटोऽप्यज्ञैर्देव न बुध्यते ॥२६४॥ एकस्य मूर्खराज्ञः कथा इदानीं श्रूयतां मुग्ध-कन्यावर्धयिता नृपः । राजाभून्मूर्खोऽपि कन्यैका सम्प्राजनि तस्य च ॥२६५॥ स वर्धयितुकामस्तामतिस्नेहेन सत्वरम् । वैद्यानानीय नृपतिः प्रीतिपूर्वमभाषत ॥२६६॥ सदौषधप्रयोगं तं कञ्चित् कुरुत येन मे । सुतैषा वर्धते शीघ्रं सद्मर्त्रे च प्रदीयते ॥२६७॥ तच्छ्रुत्वा तेऽब्रुवन्वैद्या उपजीवयितुं जडम् । अस्त्यौषधमितो दूरात्तत्तु देशादवाप्यते ॥२६८॥ आनयामश्च यावत्तावदेव सुता सव । बदृश्या स्मापनीयैषा विमाने सत्र हीदृशम् ॥२६९॥ इत्युक्त्वा स्वापयामासुश्छन्नां से तां नृपात्मजाम् । संवत्सरानत्र बहूनौषधप्राप्तिशंसिनः ॥२७०॥ यौवनस्थां च तां प्राप्तामोपधेन प्रवर्धिताम् । द्रुवाजा दर्शयामासुः सुतां तस्मै महीभृते ॥२७१॥ सोऽपि तान्पूरयामास वैद्यांस्तुष्टो मनोरथैः । इति व्याजाज्जडधियो धूर्तैर्मृग्यन्त ईश्वराः ॥२७२॥ मूर्खकृपणस्य कथा अथ चाकर्ण्यतामर्धपणोपार्जितपण्डितः । अभून्नगरवास्येकः पुमान् प्रज्ञाभिमानवान् ॥२७३॥ ग्रामवासी च तस्यैकः पुमान् संवत्सरावधि । भृतकोवृत्यसन्तोषादापृच्छ्य स्वगृहं ययौ ॥२७४॥ गते तस्मिंश्च पप्रच्छ भार्या सन्धि गतः स ना । त्वत्त किञ्चिन्न गृहीत्वेति साप्यर्धपणमम्यधात् ॥२७५॥ ततो वक्षपजान् कृत्वा पाथेयं स नदीतटे । गत्वा स्वभृतकात्तस्मात्तमर्धपणमानयत् ॥२७६॥ तच्चार्धकोशरु शसन् स ययौ लोकहास्यताम् । एवं बहु क्षपयति स्वल्पस्यार्थे धनाधमी ॥२७७॥

दशम लम्बक ८४१

दशम लम्बक ८४१ तब हँसते हुए दूसरे धोया ने कहा—'तू तो साहस और क्षोभ दोनों ही एक साथ सामने निभा रहा है। इस प्रकार प्रत्यक्ष व्यंग्य करते हुए भी मूर्ख उसको नहीं समझते ॥२६३-२६४॥ एक मूर्ख राजा की कथा अब कन्या को बढ़ानेवाले पिता की कहानी सुनो। एक राजा का उसके यहाँ एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई ॥२६५॥ वह अत्यन्त स्नेह के कारण शीघ्र ही उस कन्या को बड़ा करने के लिए उत्सुक था। उसने वैद्यों को बुलाकर उनसे प्रेमपूर्वक कहा ॥२६६॥ आप लोग ऐसी अच्छी ओषधि का प्रयोग कीजिए कि जिससे यह कन्या शीघ्र ही बढ़ जाय और किसी अच्छे पति को दे दी जाय ॥२६७॥ यह सुनकर, वे वैद्य उस मूर्ख राजा का धन ऐंठने के लिए बोले—'महाराज दवा तो है किन्तु वह यहाँ से दूर देशों में मिलती है ॥ २६८॥ जबतक हमलोग उसे मँगाते हैं तबतक यह कन्या अदृश्य (छिपाकर) रखी जाय। ओषधि का ऐसा ही विधान है ॥२६९॥ ऐसा कहकर उन्होंने ओषधि-प्राप्ति की आशा में कन्या को अनेक वर्षों तक गुप्त रखा ॥२७०॥ जब कन्या यौवनावस्था में आ गई तब उन्होंने उसे ओषधि से बड़ी हुई बताकर राजा को दिखाया और उससे पर्याप्त धन प्राप्त किया ॥२७१॥ राजा ने भी उस वैद्य को धन से सन्तुष्ट कर दिया। महाराज इस बहाने से धूर्तजन पण्डितों को ठगते हैं ॥ २७२॥ अधेले के लिए धन लेने खर्च करनेवाले धूर्त कंजूस की कथा और भी अंधकार को प्राप्त कराने में पण्डित एक धूर्त की कथा सुनो। किसी नगर में अपने को बहुत चतुर माननेवाला एक मूर्ख था ॥ २७३॥ उसके यहाँ चोर के रहनेवाले एक पुरुष ने एक बार जब नौकरी करके जीविका निर्वाह न होने के कारण (वेतन न मिलने से) नौकरी छोड़ दी और वह अपने घर चला गया ॥ २७४॥ उसके चले जाने पर उसने अपने नवीन नौकर से पूछा—'वह नौकर क्या मुझसे कुछ लेता नहीं था?' उसने कहा—'हाँ, एक अधेला तो लेता है' ॥ २७५॥ यह सुन उस कंजूस ने अपने नये नौकर से कहा-'अरे भाई! विचारे उसके घर पर जाकर अधेला उससे वसूल करके ले आओ' ॥ २७६॥ और नौकर के साथ में अपनी सर्वस्व सम्पत्ति का खर्च करता हुआ हँसी का पात्र बन गया ॥ २७७॥ १०६

८४२ कथासरित्सागर

८४२ कथासरित्सागर अभिज्ञानकर्तु कथा अथेदानीमभिज्ञानकर्त्ता च श्रूयतां प्रभो। कस्यचित्स्नानपात्रेण मूर्खस्य व्रजतोऽम्बुधौ ॥२७८॥ राजतं भाजनं हस्तादपतत्तज्जलान्तरे। स तत्र मूर्खोऽभिज्ञानमावर्त्तादिकमग्रहीत् ॥२७९॥ आगच्छन्नुद्धरिष्यामि तदितोऽम्बिधजलादिति। पारं प्राप्याम्बुधेस्तीर्णो दृष्ट्वावर्त्तादि वारिणि ॥२८०॥ ममज्ज भाजनं प्राप्तुमभिज्ञानधिया मुहुः। पृष्टश्चोक्ताशयः सोऽन्यैरुपाहस्यत धिक्कृतः ॥२८१॥ प्रतिमांसप्रदस्य कथा एव च शृणुतेदानीं प्रतिमांसप्रदं नृपम्। मुग्ध कोऽपि नृपोऽस्त्यत्रासावावृद्धावभौ नरौ ॥२८२॥ । ॥२८३॥ तयोरेकेन च हृतं मांसं दृष्ट्वा महानसे। पक्व मांसपलायङ्गात्तस्य हर्तुर्व्यकर्त्तयत् ॥२८४॥ उत्कृत्तमांसं क्रन्दन्तं दृष्ट्वा स पतितं भुवि। जातानुकम्पो राजासो प्रतीहारं समादिशत् ॥२८५॥ छिन्ने पष्ठ्यपली मांसं नास्य शाम्यति सा व्यथा। तदत्तोऽप्यधिकं मांसममुष्मै दीयतामिति ॥२८६॥ किं जीवति शिरश्छिन्नो वस्तेदस्त शिरःक्षते। दास्यामि वेषेट्युक्त्वा स क्षत्ता गत्वाहसद्बहिः ॥२८७॥ तं समाश्वास्य वैद्यम्य कृतमांसं समर्पयत्। एवं मूढप्रभुर्नैति निग्रहं नाप्यनुग्रहम् ॥२८८॥ पुत्रास्तर काङ्क्षिणी कथा इयं चाकर्ण्यतां मन्दा स्त्री पुत्रास्तरकाङ्क्षिणी। एकपुत्रां स्त्रियं काञ्चिदन्यपुत्राभिकाङ्क्षया ॥२८९॥ पृच्छन्तीमब्रवीत् काचित्पाखण्डा क्षुद्रतापसी। योऽयं पुत्रोऽस्ति ते बालस्तं हत्वा देवताग्रतः ॥२९०॥ क्रियते चेत्ततोऽन्यस्ते निश्चितं जायते सुतः। एवं तमोक्ता यावत्सा तत्पाकर्तुमिच्छति ॥२९१॥ तावद् बुद्ध्वा हितान्त्या स्त्री वृद्धा तामवन्द्रहः। हंसि पापे सुतं जातमजातं प्राप्तुमिच्छसि ॥२९२॥

द्वादश लम्बक ८४३

द्वादश लम्बक ८४३ समुद्र की लहरों में निशान लगानेवाले की कथा अब एक चिल्लकर्त्ता की कथा सुनो। समुद्री नाव से यात्रा करते हुए किसी मूर्ख का एक सोने का बरतन समुद्र में गिर गया। उस मूर्ख ने वहाँ पर लहरों और जल के भँवरों पर मन ही-मन निशान (चिह्न) लगा लिया और यह सोचा कि 'लौटते समय यहाँ से बरतन निकाल लूँगा जब वह उधर से लौटा तब पानी में अपने चिह्न का स्मरण करके बरतन निकालने के लिए समुद्र में कूद पड़ा। लोगों के पूछने पर अपना अभिप्राय बताने पर उसकी हँसी हुई और लोगों ने उसे मूर्ख बनाकर धिक्कारा ॥२७८-२८१॥ मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की कथा अब अन्य में मांस देनेवाले एक राजा की कथा सुनो। एक राजा ने महल से दो व्यक्तियों को देखा उनमें एक ने रसोइघर से मांस चुरा लिया था। राजा ने आज्ञा देकर उसके शरीर से पाँच पल (२ तोला) मांस कटवा लिया। मांस काटने पर उसे रोने-बिलखने और भूमि पर लोटते देखकर राजा को दया आ गई और उसने द्वारपाल को आज्ञा दी कि पाँच पल मांस काट लेने से इसकी वेदना शान्त नहीं हो रही है इसलिए इस एक पाव से अधिक मांस दे दो॥२८२-२८६॥ 'महाराज गला काट लेने पर गो गले दने पर भी क्या पुरुष फिर जी सकता है—ऐसा कहकर बाहर जाकर और पेट पकड़कर द्वारपाल खूब हँसा ॥२८७॥ और आश्वासन देकर उस काटा हुआ मांस जोड़कर वैद्य को सौंप दिया। सच है मूर्ख राजा दंड देना और कृपा करना भी नहीं जानते ॥२८८॥ एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा

८४४ कथासरित्सागर

८४४ कथासरित्सागर

यदि सोऽपि न जातस्ते तत्तत्सर्वं किं करिष्यसि । इत्यवार्यत सा पापादार्यया बुद्धया तया ॥२९३॥ एवं पतन्त्यकार्येपु डाकिनीसङ्गताः स्त्रियः । वृद्धोपदेशेन तु ता रक्ष्यन्ते कृतयन्त्रणा ॥२९४॥

मूर्ख सेवक कथा

अयमामलकानेता देवेदानीं निशम्यताम् । कस्याप्यभूद् गृहस्थस्य भृत्यः कश्चन मुग्धधीः ॥२९५॥ समादिशद् गृहस्थस्तं भृत्यमामलकप्रियः । गन्धारामात् सुमधुराण्यामयामंलकानि मे ॥२९६॥ एकैकं दशनच्छेदेनास्वाद्यानीतवाञ्जडः । आस्वाद मधुराण्येता यानीतानीक्षतां प्रभुः ॥२९७॥ सोऽब्रवीत्सोऽपि तान्यक्ष्णोच्छिष्टान्यालोक्य कुत्सया । अहो गृहपतिस्तन मूर्खेनाबुद्धिना समम् ॥२९८॥ निष्प्रज्ञो नाशयत्येव प्रभोरर्थमथात्मनः । अन्तरा चात्र शृणुत भ्रातृद्वयकथामिमाम् ॥२९९॥

बन्धुद्वयस्य कथा

ब्राह्मणौ भ्रातारावास्तां पुरे पाटलिपुत्रके । यशःसोम इति ज्येष्ठ कीर्त्तिसोमोऽस्य चानुजः ॥३००॥ पित्र्यं चाभूद्धनं भूरि तयोर्ब्राह्मणपुत्रयोः । कीर्त्तिसोमो निजं भागं व्यवहारादवर्धयत् ॥३०१॥ यशःसोमस्तु भुञ्जानो ददच्चाप्यनयत्क्षयम् । तत' स निर्धनीभूतो निजां भार्यामभाषत ॥३०२॥ प्रिये धनाढ्यो भूत्वाहमिदानीं निर्धनः कथम् । वसामि मध्ये बन्धूनां सद्धिरेदं तथाऽवहम् ॥३०३॥ पाथेयेन विना कुत्र याव इत्युदिते तया । निर्बन्धं स यदा चक्रे तदा भार्या तमाह सा ॥३०४॥ अवश्यं यदि गन्तव्यं तद् गत्वा कीर्त्तिसोमतः । मृगयस्व धनं किञ्चित् पाथेयमनुजादिति ॥३०५॥ ततो गत्वानुजं यावत् पाथेयं तं स मार्गति । तावत्तदनुजः सोऽत्र जगदे भार्यया स्वया ॥३०६॥ स्थापितस्वधनायास्म द्वयं दद्मः कुतः कियत् । य एव हि दरिद्रः स्यात् स एवास्मान्भजिष्यति ॥३०७॥

दशम लम्बक ८४५

दशम लम्बक ८४५ यदि यह दूसरा पुत्र भी न हुआ तो क्या करेगी (इस एकमात्र पुत्र से भी हाथ धो बैठेगी)। इस प्रकार पुत्र का वध करती हुई उस मूर्ख स्त्री को उस वृद्धा और भली स्त्री ने बचा दिया॥२९३॥ इसी प्रकार शाकिनी (डाकिनी) आदि के चक्कर में पड़कर स्त्रियाँ नष्ट हो जाती हैं। और, वृद्धा स्त्रियों के नियन्त्रण और उपदेश से वे रक्षित होती हैं ॥२९४॥ एक मूर्खसेवक की कथा स्वामिन् अब आँवले खानेवाले की कथा सुना। किसी धनी गृहस्थ का एक मूर्ख सेवक था। आँवलों के प्रेमी उस गृहस्थ ने सेवक से कहा—जाओ उद्यान से मीठे-मीठे आँवले ले आओ। वह मूर्ख एक-एक आँवले को दाँतों से काट-काटकर और चख-चख कर ले आया और बोला— स्वामी मैं एक-एक आँवले को चख चखकर और मीठे-मीठे बताकर लाया हूँ ॥२९५- २९७॥ स्वामी ने भी उन जूठे आँवलों को उस मूर्ख सेवक के साथ ही छोड़ दिया। (अर्थात् आँवले फेंक दिये और सेवक को निकाल दिया) ॥२९८॥ इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति अपनी और अपने स्वामी की भी हानि करता है। इसी प्रसंग में दो भाइयों की कथा सुनो ॥२९९॥ दो बन्धुओं की कथा पाटलिपुत्र नगर में दो भाई रहते थे। बड़ा यज्ञसोम और छोटा कीर्तिसोम था। उन दोनों भाइयों के पास पिता का बहुत धन था। दोनों ने आपस में पिता के धन का बँटवारा कर लिया था और कीर्तिसोम अपने धन को ब्याज-बट्टे में लगाकर बढ़ाता था। यज्ञसोम ने खा-पीकर और ले-देकर अपने धन को समाप्त कर दिया। तब निर्धन होने पर यज्ञसोम अपनी पत्नी से बोला—॥३ ०—३ २॥ प्रिये मैं निर्धन होकर भी इस समय अपने इष्ट-सम्बन्धियों में कैसे रहूँ। इसलिए चलो कहीं दूसरे देश में चलें ॥३ ३॥ उसकी पत्नी ने कहा—'मार्ग में खान-पीने आदि के व्यय के बिना कैसे चलें। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब वह हठ करने लगा तब उसकी पत्नी ने उससे कहा—'यदि जाना ही आवश्यक है तो जाकर अपने छोटे भाई कीर्तिसोम से कुछ आवश्यक व्यय के लिए धन माँगो ॥३ ४—३ ५॥ तब यज्ञसोम ने जाकर कीर्तिसोम से मार्ग-व्यय के लिए कुछ धन माँगा तो उसकी (कीर्तिसोम की) पत्नी ने उससे कहा—'अपना सब धन नष्ट कर देनेवाले इसे हम कहाँ से और कितना धन देंगे? जो भी निर्धन होजायगा वही हमारे इस प्रकार धन माँगने लगेगा ॥३ ६-३ ७॥

श्रुत्वैतत्कीर्त्तिसामोऽसौ भ्रातृस्नेहान्वितोऽपि सन्। नैच्छद्दातुं किमप्यस्मै कष्टा कुस्त्रीषु वश्यता ॥३०८॥ यज्ञसोमस्ततस्तूष्णीं गत्वा पत्न्यै न्यवेदयत्तत्। तया सह प्रस्थितवान् दैवैकशरणस्ततः ॥३०९॥ गच्छन् प्राप्तोऽटवीं धवाद्गिीर्णोऽजगरेण सः। तद्भार्या च तदालोक्य चक्रन्द पतिता भुवि ॥३१ ॥ किमाक्रन्दसि भद्रे त्वमिति मानुषभाषया। सा तेनाजगरणोक्ता ब्राह्मणी निजगाद तम् ॥३११॥ न क्रन्दामि कथं यस्मान्महासत्त्व मम त्वया। क्षुसिताया विदेशस्थ ह्य भिक्षाभाजन वृतम् ॥३१२॥ तच्छ्रुत्वाऽजगरो वक्त्रादुद्गीर्यास्यै ददौ महत्। स्वर्णपात्रं गृहाणेदं भिक्षाभाण्डमिति ब्रुवन् ॥३१३॥ भो महाभाग भिक्षां मे दास्यत्यस्मिन् स्त्रिया इति। उक्तस्तस्या तद्ब्राह्मण्या जगादाजगरश्च सः ॥३१४॥ न दास्यत्यर्थितो योऽत्र भिक्षां ते तस्य तत्क्षणम्। शतधा यास्यति शिरः सत्यमेतद्वचो मम ॥३१५॥ तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणी सा तमुवाचाजगरं सती। यद्येवं तत्त्वमवात्र भर्तृभिक्षां प्रयच्छ मे ॥३१६॥ इत्युक्तमात्रे ब्राह्मण्याः सत्या सोऽजगरो मुखात्। उज्जगाराक्षतं यज्ञसोमं जीवन्तमेव तम् ॥३१७॥ तमुद्गीर्यैव सपदि दिव्यः सोऽजगरः पुमान्। परितुष्टश्च तौ हृष्टौ दम्पती निजगाद सः ॥३१८॥ अहं काञ्चनवेगाख्यो विद्याधरमहीपतिः। सोऽहं गौतमशापेन प्राप्तोऽस्म्याजगरीं गतिम् ॥३१९॥ साध्वीसद्भावपर्यन्तः स च शापो ममाभवत्। इत्युक्त्वा हेमपात्रं च रत्नैरापूर्य तत्क्षणात् ॥३२०॥ विद्याधरेश्वरो हृष्टः खमुत्पत्य जगाम सः। तौ चाप्यमुतुरादाय रत्नौघं दम्पती गृहम् ॥३२१॥ तत्रास्तं यज्ञसोमोऽसावक्षयाप्तधनः सुखम्। सत्त्वानुरूपं सर्वस्य धाता सर्वं प्रयच्छति ॥३२२॥

द्वादश लम्बक ८४७

द्वादश लम्बक ८४७ यह सुनकर उस कीर्तिसोम ने भाई के स्नेह से देना चाहते हुए भी स्त्री के भय से उसे कुछ नहीं दिया। इस प्रकार दुष्ट स्त्रियों के वश में होना भी कष्टप्रद ही होता है॥३०८॥ तब यज्ञसोम ने यह सब समाचार पत्नी से कहा और ईश्वर की शरण होकर वह घर से निकल पड़ा॥३०९॥ वह जाते हुए मार्ग में एक जंगल में पहुँचा तो दैववश वहाँ उसे एक अजगर निगल गया। यह देखकर उसकी पत्नी भूमि में लोटकर रोने लगी॥३१०॥ उसका रोना-धोना सुनकर अजगर मनुष्य की वाणी में उससे बोला—'हे भली स्त्री तू इस प्रकार क्यों रो रही है ?' तब उस ब्राह्मणी ने कहा ॥३११॥ 'हे महाप्राणी मैं क्यों न रोऊँ, जब कि तूने विदेश में मुझ दुखिया का भिक्षापात्र ही हरण कर लिया ॥३१२॥ मुझ स्त्री को अब कौन भीख देगा'। उस सदाचारिणी ब्राह्मणी के इस प्रकार कहने पर अजगर ने अपने मुँह से उगलकर एक बड़ा-सा सोने का पात्र उसके आगे रख दिया और कहा—'यह ले भिक्षा-पात्र। माँगने पर जो भी व्यक्ति इस पात्र में दान नहीं देगा उसके सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे। यह मेरी सत्य वाणी है ॥३१३–३१५॥ तब वह सती ब्राह्मणी उस अजगर से बोली—'यदि ऐसा है, तो पहले तू ही इस पात्र में मुझे पति की भिक्षा दे' ॥३१६॥ उसके ऐसा कहते ही अजगर ने समूचे और जीवित यज्ञसोम को उगल दिया॥३१७॥ उसे उगलते ही तुरन्त वह अजगर दिव्य पुरुष बन गया और प्रसन्न होकर उन दोनों (पति पत्नी) से बोला—॥३१८॥ 'मैं काञ्चनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मेरे इस शाप की अवधि सती स्त्री के सम्भाषण तक थी। वह आज समाप्त हो गई। (अतः अब मैं पुनः अपने रूप में आ गया) ऐसा कहकर और उस सोने के पात्र को रत्नों से भरकर प्रत्यक्ष विद्याधरराज आकाश में उड़कर अपने लोक को चला गया। और, वे दम्पती रत्नों का पात्र लेकर अपने घर आ गए॥३१९ - ३२१॥ घर आकर अक्षय धन वाला हुआ यज्ञसोम सुख से रहने लगा। विधाता सभी को उसके मन और कर्म के अनुसार देता है ॥३२२॥

८४८ कथासरित्सागर

८४८ कथासरित्सागर मूर्खयोद्धुः कथा श्रूयतां नापितस्यार्थी मुग्धोऽत्र च पुमानयम्। कर्णाट-क्षोत्रेपि भूपं स्वं रणे शौर्यात्सतोषयत् ॥३२३॥ स प्रसन्नो नृपस्तस्याभीष्टं दत्तवान् वरम्। शस्यस्य नापितं वस्त्रं नपुंसकनिभो भटः ॥३२४॥ सर्वथैतत्प्रमाणेन सदसन्नाभिवाञ्छति। न किञ्चिन्मार्गणं चान्यन्मुग्धं शृणुताधुना ॥३२५॥ किञ्चिन्न याचकस्य मूर्खस्य कथा कश्चित्पथि व्रजन् मूर्खं शकटस्थेन केनचित्। ऊचे समं कुरुष्वैतच्छकटं मे मनागिति ॥३२६॥ समं करोमि चेत्तन्मे किं ददासीति वादिनम्। न किञ्चित्ते ददामीति शकटी निजगाद तम् ॥३२७॥ ततः स मूर्खः शकटं समं कृत्वैव तस्य तत्। तन्मे न किञ्चिद्देहीति तं ययाचे स चाहसत् ॥३२८॥ इति देव सदैव हास्यभावं परिभावं च जनस्य निन्द्यतां च। विपदास्पदतां च यान्ति मूढा इह सन्तस्तु भवन्ति पूजनीयाः ॥३२९॥ एवं स गोमुखमुखोक्तकथाविनोदैतन्निक्षम्य रजनौ सचिवैः समेतः। विश्रान्तिहेतुमनिरास्य जगत्श्रमस्य निद्रामियाय नरवाहनदत्तदेवः ॥३३०॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके पञ्चमस्तरङ्गः। षष्ठस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः प्रातः समुत्थाय पितुर्वत्सेश्वरस्य सः। नरवाहनदत्तोऽत्र दर्शनायान्तिकं ययौ ॥१॥ तत्र पद्मावतीं देवीं भ्रातरि स्वगृहात्ततः। मागतं मगधेशस्य तनये सिंहवर्मणि ॥२॥ हृष्टस्वागतकथाप्रश्नप्रबार्बीदिवस गते। नरवाहनदत्तः स्वं मुक्त्वा मन्दिरमाययौ ॥३॥

दशम लम्बक ८४९

दशम लम्बक ८४९ एक मूर्ख योद्धा की कथा अब नापित के शावक की कथा सुनो। कर्णाट देश के एक वीर ने युद्ध में शूरता दिखाकर अपने स्वामी राजा को प्रसन्न किया। उस राजा ने भी प्रसन्न होकर उससे इच्छित वर माँगने को कहा। उस षण्ढक योद्धा ने राजा से उसके भाई को वर में माँगा ॥१२३-१२४॥ प्रत्येक व्यक्ति अपने चित्त के प्रमाण से अपना भला या बुरा चाहता है। अब कुछ न माँगनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥१२५॥ 'कुछ न' माँगनेवाले मूर्ख की कथा राह चलते हुए एक मूर्ख से गाड़ी पर बैठे हुए एक व्यक्ति ने कहा- 'मेरी गाड़ी को कुछ बराबर कर दो' ॥१२६॥ उस मूर्ख ने कहा-'यदि मैं बराबर कर दूँगा तो क्या देगा ? तब गाड़ीवाले ने कहा- 'कुछ नहीं दूँगा। तब उस मूर्ख ने 'मुझे कुछ न दो' इस प्रकार कहकर गाड़ी को ठीक कर दिया और कुछ न दो माँगा। तब गाड़ीवान हँसने लगा ॥१२७-१२८॥ 'स्वामिन्, मूर्खजन इस प्रकार सदा हँसी के पात्र तिरस्कृत निन्दनीय और विपत्तियों के शिकार होते रहते हैं और बुद्धिमान् समाज में सम्मान पाते हैं ॥१२९॥ इस प्रकार, गोमुख के मुँह से कही गई कथाओं के विनोद को मन्त्रियों के साथ सुनकर युवराज नरवाहनदत्त रात में समस्त संसार को विश्राम देनेवाली नींद में सो गया ॥१३०॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का पञ्चम तरंग समाप्त षष्ठ तरङ्ग नरवाहनदत्त की कथा (कथागत) रात बीतने पर प्रातःकाल नरवाहनदत्त उठकर पिता वत्सराज (उदयन) के दर्शन के लिए उनके पास गया ॥१॥ वहाँ महारानी पद्मावती के भाई और मगधराज (प्रद्योत) के पुत्र सिंहवर्मा के आने पर उनके स्वागत कुशल प्रश्न तथा अन्यान्य वार्तालाप में दिन व्यतीत होने पर नरवाहनदत्त भोजन करके अपने भवन में आया ॥२-३॥ १०

८५ कथासरित्सागर

८५ कथासरित्सागर तत्र शक्तियशः सोत्कं तं विनोदयितुं निशि । ततः स गोमुखो धीमानिमामकथयत् कथाम् ॥४॥ काकोलूकीयकथा बभूव क्वापि सञ्छायो महान्न्यग्रोधपादपः । शकुन्तशब्द्यैः पथिकान् विश्रमायाह्वयन्निव ॥५॥ तत्रासीन् मेघवर्णाख्यः काकराजः कृतालयः । तस्यावमर्द्दनामाभूदुलूकाधिपती रिपुः ॥६॥ स तस्य काकराजस्य तत्र रात्रावुलूकराट् । एत्य काकान् बहून् हत्वा कृत्वा परिभवं ययौ ॥७॥ प्रातः स काकराजोऽथ समाज्योवाच मन्त्रिणः । उड्डीम्पाडीविसण्डीविप्रडीविचिरजीविनः ॥८॥ स शत्रुः परिभूयास्मान् रूढशत्रुर्यो बली पुनः । आपतत्येव तत्तत्र प्रतीकारो निरूप्यताम् ॥९॥ तच्छ्रुत्वाभाषतोड्डीवी शत्रौ बलवति प्रभो । अन्यवेद्याद्य कार्यस्तस्यानुनयोऽथवा ॥१०॥ धूखैतदाडीब्याह स्म सह्यो न भयमप्यवः । पराश्रयं स्वशक्तिं च वीक्ष्य कुर्मो यथाक्षमम् ॥११॥ ततो जगाद सण्डीवी मरणं देव शोभनम् । न तु प्रणमनं शत्रोर्विषेणे वापि जीवनम् ॥१२॥ योद्धव्यं तेन साकं नः कृतावज्ञेन शत्रुना । राजा सहायवाञ्शूरः सोत्साहो जयति द्विषः ॥१३॥ अथ प्रडीवी वक्ति स्म न वध्यः स बली रणे । सन्धिं कृत्वा तु हन्तव्यः सम्प्राप्तावसरे पुनः ॥१४॥ चिरजीवी ततोऽवादीत् कः सन्धिर्धूत एव कः । आसृष्टि वैरं काकानामुल्लूकस्तत्र को ब्रजेत् ॥१५॥ मन्त्रसाध्यमिदं मन्त्रो मूलं राज्यस्य चोच्यते । श्रुत्वैतत्काकराजस्तं सोऽब्रवीच्चिरजीविनम् ॥१६॥ वृद्धस्त्वं वेत्सि चेत्तन्मे ब्रूहि त्वं केन हेतुना । काकोलूकस्य वैरिञ्च मन्त्रं वदयस्यतः परम् ॥१७॥

दशम लम्बक ८५१

दशम लम्बक ८५१ तब शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त का मनोरंजन करने के लिए बुद्धिमान् मन्त्री गोमुख ने यह कथा कही ॥४॥ कौओं और उल्लुओं की कथा१ किसी जंगल में बहुत बड़ा वटवृक्ष था। जो पक्षियों के कलरव से मानों पक्षियों के विश्राम के लिए सदा उन्हें बुलाता रहता था ॥५॥ उस बरगद पर मेघवर्ण नाम का कौओं का राजा घोंसला बनाकर रहता था। अवमर्द्द नाम का उल्लुओं का राजा उसका शत्रु था ॥६॥ वह उलूकराज एकबार रात में आकर, बहुत-से कौओं को मारकर काकराज का अपमान करके चला गया ॥७॥ प्रातःकाल ही काकराज ने मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें सत्कार करके कहा। उसके मन्त्री थे—उड्डीवी आदीवी संडीवी प्रदीवी और चिरजीवी ॥८॥ काकराज ने कहा—'वह हमारा शत्रु उलूकराज हमारा स्थान जानता है और बलवान् भी है। वह इस प्रकार आक्रमण करता ही रहेगा। उसका प्रतीकार सोचो ॥९॥ यह सुनकर उड्डीवी मन्त्री बोला—'स्वामिन् शत्रु यदि बलवान् है तो दूसरे देश में आश्रय लेना चाहिए या उससे ही अनुनय-विनय करनी चाहिए कि वह आक्रमण न करे' ॥१०॥ यह सुनकर आदीवी बोला—'अभी तत्काल उसका इतना भय नहीं है। शत्रु का आशय (अभिप्राय) और अपनी शक्ति को समझकर यथासम्भव यत्न करना चाहिए' ॥११॥ यह सुनकर संडीवी बोला—'स्वामिन् मरना अच्छा है या विदेश में जाकर जीवन बिताना अच्छा है। किन्तु, शत्रु के सामने झुकना अच्छा नहीं ॥१२॥ हमें हानि पहुँचानेवाले शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए। सहायकाकांक्षा शूर और उत्साही राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है' ॥१३॥ उसके पश्चात् प्रदीवी ने कहा—वह शत्रु बलवान् है युद्ध में उसे जीता नहीं जा सकता। इस समय उससे सन्धि करके फिर अवसर मिलने पर उसे मारना चाहिए' ॥१४॥ तब चिरजीवी ने कहा—'सन्धि का दूत कौन होगा और सन्धि ही क्या होगी। कौओं और उल्लुओं की शत्रुता सृष्टि के प्रारम्भ से ही चली आ रही है। हमारे बीच कौन पड़ेगा' ॥१५॥ यह काम मन्त्र से सिद्ध होनेवाला है क्योंकि राज्य का मूल मन्त्र ही है। यह सुनकर काकराज चिरजीवी से बोला- ॥१६॥ 'तुम वृद्ध हो सब जानते हो यह बताओ कि कौए और उल्लुओं में वैर किस कारण हुआ। उसके पश्चात् मन्त्र (सम्मति) बताना' ॥१७॥ १ पंचतन्त्र के तीसरे काकोलूकीय तन्त्र की कथा मूल यही कथा है।—अनु