कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक २१७
अष्टम लम्बक २१७ उसका नाम सूर्यप्रभ है और अपने सौन्दर्य से वह कामदेव-विजयी है। कलावती ने गुप्त रूप से जाकर उसे आत्मसमर्पण कर दिया है। आज रात में इसके पास जाने पर राजा प्रह्लाद की कन्या महस्तिका भी स्वयं वहाँ आ गई ॥२८३-२८४॥ तब उसके साथ सपत्नी-भाव से कलह करके आई हुई कलावती आत्मघात के लिए तैयार हुई, यह देखते ही उसकी बहन सुकलावती ने उसे बचाया ॥२८५॥ तब कमरे में जाकर, खाट पर पड़कर और समाचार सुनकर त्रस्त हुई बहन के साथ अब वह पड़ी है ॥२८६॥ सखिकाओं की ये बात सुनकर और उसी अदृश्य रूप से भीतर आकर समान रूपवाली उन दोनों बहनों को मैंने देखा ॥२८७॥ जबतक प्रभास सूर्यप्रभ को एकान्त में यह समाचार कह ही रहा था कि इतने में ही प्रहस्त भी वहाँ आ गया ॥२८८॥ सूर्यप्रभ के पूछने पर प्रहस्त ने कहा— जब मैं यहाँ से महस्तिका के निवास-गृह में पहुँचा तब वह भी दो सखियों के साथ निमन्त्रित होकर वहीं पहुँची। मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर उसके भवन में गया। वहाँ मैंने उसी के समान रूपवाली उसकी बारह सखियों को देखा ॥२८९-२९०॥ वे सभी सखियाँ रत्नों के सुन्दर पलंग पर बैठी हुई उसे घेरकर बैठ गईं। उनमें एक उससे कहने लगी—॥२९१॥ 'सखि ! तू सहसा दुःखी क्यों हो रही है विवाह के प्रस्तुत होने पर भी तुझे यह खिन्नता क्यों हो रही है' ॥२९२॥ यह सुनकर कुछ सोचती हुई प्रह्लाद-पुत्री बोली—'मेरा विवाह कहाँ हो रहा है। मुझे किसे दिया गया और तुझसे किसने कहा' ॥२९३॥ उसके ऐसा प्रश्न करने पर सभी सखियाँ बोलीं—'प्रातःकाल तुम्हारा विवाह है और तुम्हें सूर्यप्रभ को दिया गया है। तुम्हारे पीछे यह तुम्हारी माता महारानी ने यह कहा है और विवाह मण्डप के कार्यों में हम लोगों की नियुक्ति कर दी गई है ॥२९४-२९५॥ इसलिए तू धन्य है जिसका पति सूर्यप्रभ है। जिसके रूप के ध्यान में सुरङ्गनाओं को रात में नींद नहीं आती ॥२९६॥ हम लोगों को तो यह दुःख हो रहा है कि जब तू वहाँ होगी और हम यहाँ ? उस सुन्दर पति को पाकर तू हमें भूल जायगी' ॥२९७॥ २८
२९८ कथासरित्सागर
२९८ कथासरित्सागर एतन्महल्लिका तासां मुखाच्छ्रुत्वा जगाद सा। क्वचित् स दृष्टो युष्माभिर्मनस्तस्मिन् गतं न वः ॥२९८॥ तच्छ्रुत्वा तामवोचँस्ता हर्म्यात् सोऽस्माभिरीक्षितः। का न सा स्त्री मनो यस्या न स दृष्टो हरेदिति ॥२९९॥ ततः साप्यवदत्तर्हि सातं वक्ष्याम्यहं सखीः। युष्मानप्यभिशस्तस्मै दापयिष्याम्यमूर्यथा ॥३००॥ इत्यमन्योऽन्यविरहो न स्यान्नः सहवासतः। इति ब्रुवाणां कन्यास्ताः सम्भ्रान्ताः समभाषिरन् ॥३०१॥ सखि मैवं कृथा नैतद्युक्तमेषा त्रपा हि नः। एवमुक्तवतीरेका सा जगादासुरेन्द्रजा ॥३०२॥ किमयुक्तं न तेनैका परिणेयाहमेव हि। तस्मै सर्वेऽपि दास्यन्ति दुहितॄर्दैत्यदानवाः ॥३०३॥ अष्टाश्च राजतनयास्तस्योदूढा भुवि स्थिताः। परिणेष्यति चत्वारिंशत्स विद्याधरकन्यकाः ॥३०४॥ तन्मध्ये परिणीतासु युष्मासु मम का क्षतिः। सुखं प्रत्युत वत्स्यामो वयं सख्यः परस्परम् ॥३०५॥ अन्याभिस्तु विरुद्धाभिः कस्ताभिः संस्तवो मम। युष्माकं च त्रपा कात्र सर्वमेतत् करोम्यहम् ॥३०६॥ इति तासां कथा यावद्वर्त्तते त्वद्गतात्मनाम्। तावत्ततोऽहं निर्गत्य स्मर तत्पार्श्वमागतः ॥३०७॥ एतत् प्रहस्तस्य मुखाच्छ्रुत्वा सूर्यप्रभोऽत्र सः। अनिद्र एव शयनं तां निशामनयन्मुदा ॥३०८॥ प्रातः सह सुनीथेन मयेन सचिवैश्च सः। असुराधिपतिं द्रष्टुं प्रह्लादं तत्सभां ययौ ॥३०९॥ सुनीथं तत्र स प्राह प्रह्लादो दर्शितानरः। सुतां सूर्यप्रभायाहं ददाम्यस्मै महल्लिकाम् ॥३१०॥ अस्य हि प्राघुणातिथ्यं कार्यं मे तच्च च प्रियम्। एतत्प्रह्लादवचनं सुनीथोऽभिननन्द सः ॥३११॥ ततो वेदीं समारोप्य मध्यज्वलितपावकाम्। रत्नमालाभ्राजितोदग्ररत्नस्तम्भावभासिताम् ॥३१२॥
अष्टम लम्बक २९९
अष्टम लम्बक २९९ सखियों की बातें सुनकर महल्लिका बोली—'क्या तुमलोगों ने उसे देखा है और क्या तुम्हारा मन उस पर आया है ? यह सुनकर वे सब बोलीं—'हाँ उस नयन से हम लोगों ने देखा है। कौन ऐसी स्त्री है जिसका मन उसे देखकर हाथ से न निकल जाता हो ॥२९८ २९९॥ तब महल्लिका उनसे कहने लगी— यदि ऐसी बात है, तो मैं पिता से कहूँगी कि वह तुम लोगों को भी उसके लिए दे दे। इससे तुम लोगों के साथ मेरा वियोग भी न होगा और हम लोगों का सहवास भी बना रहेगा। ऐसा कहती हुई महल्लिका से घबराई हुई सखियां बोलीं—'नहीं सखि ऐसा न करना। यह ठीक नहीं। इससे हम लोगों को लज्जा है। ऐसा कहती हुई सखियों से असुरराज की कन्या फिर बोली—॥३०-३२॥ 'इसमें अनुचित क्या है? क्या उसे एकमात्र मुझसे ही विवाह करना है ? उसे सभी दैत्यों और दानवों के राजा अपनी अपनी कन्याएँ देंगे और भी अनेक राजाओं की विवाहित कन्याएँ मर्त्यलोक में हैं तथा बहुत-सी विद्याधर-कन्याओं से भी वह दग्गी विवाह करेगा ॥३ ३ ३ ४॥ उनके बीच तुम भी यदि उससे विवाहित हो जाओगी तो मेरी क्या हानि है, बल्कि हम सब सखियाँ मिलकर आनन्द के साथ रहेंगी। तुम लोगों को लज्जा क्यों है यह सब तो मैं कहूँगी ॥३ ५ ३ ६॥ तुम पर आसक्त चित्तवाली उसकी जब यह स्वतन्त्र बातचीत हो रही थी तब मैं उसी अदृश्य रूप में तुम्हारे पास चला आया ॥३७॥ प्रहस्त के मुख से यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने शय्या पर जागते-जागते ही रात बिताई ॥३८॥ प्रातः काल ही सुनीथ मय और सब मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ असुरराज प्रह्लाद से मिलने के लिए उसकी सभा में गया ॥३९॥ तब दैत्यराज प्रह्लाद ने आदर के साथ सुनीथ से कहा—'मैं अपनी कन्या महल्लिका को इस सूर्यप्रभ के लिए देता हूँ ॥४१ ॥ क्योंकि इसका भी आतिथ्य-सत्कार और तुम्हारा भी प्रिय मुझे करना है।' यह सुनकर सुनीथ ने प्रह्लाद की बात का सादर समर्थन किया ॥४११॥ तदनन्तर, अपने प्रकाश से रत्न-स्तम्भो की कान्ति बढ़ाती हुई मध्य में जलती हुई विवाह- वेदी पर सूर्यप्रभ को बैठाकर प्रह्लाद ने उसे अपनी कन्या महल्लिका दे दी ॥४१२ ४१३॥
महल्लिकां तां स्वसुतां प्रादात् सूर्यप्रभाय सः। प्रह्लादात्सुरसाम्राज्यसमृद्धिमिवविभूतिभिः ॥३१३॥ ददौ सप्तलराधीशः स दुहित्रे वराय च। त्रिदशावजयानीतान् सुमेरुशिखरोपमान् ॥३१४॥ तात ता अपि दत्स्वस्मै सखीर्मे द्वादश प्रियाः। एव महल्लिका स्वैरं प्रह्लादं सा तदाब्रवीत् ॥३१५॥ पुत्रि मद्भ्रातृषीमास्तास्तेन बन्दीकृता यतः। मम दातुं न युज्यन्ते इति सोऽपि जगाद ताम् ॥३१६॥ कृतोद्वाहोत्सवश्चास्मिन् याते सूर्यप्रभो दिने। विवेश वासकं नक्तं स महल्लिकया सह ॥३१७॥ सर्वकामोपचाराढ्यं तत्र च सुरतोत्सवम्। अनया समन.प्रीतिसौख्यं सोऽनुबभूव च ॥३१८॥ प्रातर्गतं च प्रह्लादं सभां तस्मिन् सहानुगे। अभीलो दानवाधीशः प्रह्लादादीनभाषत ॥३१९॥ अद्य युष्माभिरखिलैरागन्तव्यं गृहे मम। तत्रातिथ्यं यतः सूर्यप्रभस्यास्य करोम्यहम् ॥३२०॥ सुतां कसावतीं तस्मै ददामि यदि वा हितम्। एतत्तद्वचनं सर्वे तथेति प्रतिपेदिरे ॥३२१॥ ततो द्वितीयं पातालमेतस्मिन्नेव क्षणे च ते। सर्वे जग्मुः समं सूर्यप्रभेण समयादिना ॥३२२॥ तत्राभीलो ददौ तस्मै सुतां सूर्यप्रभाय ताम्। कसावतीं प्रप्रियया दत्तारमानमपि स्वयम् ॥३२३॥ कृत्वा विवाहं प्रह्लादगृहे भुक्त्वासुरान्वितः। निन्ये भोगापचारेण दिनं सूर्यप्रभाय तत् ॥३२४॥ द्वितीयेऽह्नि तथैवैतान् कुराहाख्योऽसुरेश्वरः। निमन्त्र्य सर्वाननयत् पञ्चमं स्वरसातलम् ॥३२५॥ तत्र सूर्यप्रभाय स्वां नाम्ना च कुमुदावलीम्। प्रादादुपगतातिथ्यहृतार्विधियदारमजाम् ॥३२६॥ तत्र सर्वे गमनरतभोगैर्नीत्वा दिनं च तत्। यागतं कुमुदावत्या भेव सूर्यप्रभा निशि ॥३२७॥
अष्टम लम्बक १०१
अष्टम लम्बक १०१ और, देवताओं से जीतकर लाए हुए रत्न और महामूल्य मणियों के शिखरों के ढेर उस कन्या और जामाता को दहेज में प्रदान किये ॥११३-११४॥ तब महस्त्विका ने पिता से स्वतन्त्रतापूर्वक कहा— 'पिताजी मेरी उन बारह सखियों को भी इन्हें दे दो' ॥११५॥ तब प्रह्लाद ने कहा— 'बेटी वे कन्याएँ मेरे भाई के द्वारा अपहरण करके बन्दिनी बनाई गई हैं, इसलिए वे उसी के आधीन हैं। अतः, उनमें से किसी का मेरा दान करना उचित नहीं है ॥११६॥ विवाहोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात् दिन व्यतीत होने पर (रात्रि में) सूर्यप्रभ महस्त्विका के साथ शयनागार में गया और विविध हास-विलास तथा काम-भोग के साथ रात्रि व्यतीत की ॥११७-११८॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अपने सभा के साथ प्रह्लाद के सभा में पधारने पर अभीक नामक दानवराज ने उनसे कहा—॥११९॥ 'आज आप सब लोगों को मेरे घर पर पधारना चाहिए क्योंकि मैं वहाँ राजा सूर्यप्रभ का आतिथ्य-सत्कार करूँगा ॥१२०॥ यदि आप लोग उचित समझें तो मैं अपनी कन्या कलावती को भी उसे दूँ'। उसके इस प्रस्ताव को सभी ने 'ठीक है, कहकर स्वीकार कर लिया और सभी उठकर मय-सुनीथ और सूर्यप्रभ के साथ दूसरे पाताल में गये ॥१२१-१२२॥ वहाँ पर राजा अभीक ने अपनी कन्या कलावती का सूर्यप्रभ के साथ विधिपूर्वक पाणिग्रहण करा दिया ॥१२३॥ तदनन्तर, सभी असुरों के सहित सूर्यप्रभ ने प्रह्लाद के घर में भोजन करके विविध भोगों के साथ दिन व्यतीत किया ॥१२४॥ तीसरे दिन इसी प्रकार दुष्टारोह नामक असुरराज ने अपने पाँचवें रसातल में सभी लोगों को निमंत्रित किया ॥१२५॥ और उसने अपनी कुमुद्वती नाम की कन्या को औरों के समान विधिपूर्वक सूर्यप्रभ को दान कर दिया ॥१२६॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ मित्र-मंडल के साथ विविध सुखों के भोग में दिन बिताकर रात को कुमुद्वती के शयन-गृह में गया ॥१२७॥
६२ कथासरित्सागर
६२ कथासरित्सागर तत्र त्रिलोकसुन्दर्या नवसङ्गमसोत्कया। स स्निग्धमुग्धया साक तया रात्रिमुवास ताम् ॥१२८॥ प्रातश्च सन्तुष्टच्छेन प्रह्लादप्रमुखैर्वृतः । निमन्त्र्य सप्तमं निन्ये पाताल स स्वमन्दिरम् ॥१२९॥ तत्रासुरपति सोऽस्मै सुतां नाम्ना मनोवतीम् । ददौ सरत्नाभरणां तप्तजाम्बूनदद्युतिम् ॥१३०॥ तत सूर्यप्रभ सोऽत्र नीत्वाधिकसुख दिनम् । मनोवतीनवाश्लेषसुखिनीमनयन्निशाम् ॥१३१॥ अपरेद्युश्च स सर्वयुक्त कृतनिमन्त्रणः । पातालमनयत् षष्ठ स्व सुमायो सुराधिपः ॥१३२॥ तत्र सोऽपि ददौ तस्मै सुभद्रां नाम कन्यकाम् । दूर्वास्तश्यामलाङ्गीं मूर्ति पाञ्चशरीमिव ॥१३३॥ तया सुरतसंभोगयोग्या श्यामयात्र सः। सहासीत्तदह सूर्यप्रभ पूर्णन्दुवक्त्रया ॥१३४॥ अन्येद्युश्च बली राजा तद्वदेव निनाय तम्। सूर्यप्रभ स्वपाताल तृतीय सोऽसुरानुग ॥१३५॥ सोऽपि तत्र सुतां तस्मै सुन्दरी नाम दत्तवान् । बालप्रवालसच्छायां माधवीमिव मञ्जरीम् ॥१३६॥ स्त्रीरत्नेन समं तेन रेमे सूर्यप्रभोऽत्र सः। सुरञ्जितसतद्दिवस दिव्यभोगविभूषितम् ॥१३७॥ अपरेऽह्नि मय सोऽपि राजपुत्रं तथैव तम्। चतुर्थपातालगतं भूयोऽनैषीत् स्वमन्दिरम् ॥१३८॥ विचित्ररत्नप्रासाद निजमायाविनिर्मितम् । नव नवमिवाभासमानं लक्ष्म्या प्रतिदणम् ॥१३९॥ तत्र सोऽपि ददौ तस्मै सुमायाख्यां निजां सुताम्। जगदाश्चर्यरूपां स्वां शक्तिं मूर्त्तिमतीमिव ॥१४०॥ मानुषत्वाच्च तस्मै तां मैवादेयाममन्यत । सोऽपि रेमे तया साकमत्र सूर्यप्रभ कृती ॥१४१॥ विद्याविभक्तदेहोऽथ सर्वाभिर्युगपत् सह। अरंस्तासुरकन्याभिस्ताभि रह नृपात्मज ॥१४२॥
अष्टम लम्बक ३३
अष्टम लम्बक ३३ वहाँ उसने नव संगम में उत्कंठित स्निग्ध और मुग्ध उस त्रैलोक्यसुन्दरी कुमुद्वती के साथ विनोद-वार्ता में रात बिताई ॥१२८॥ प्रातःकाल ही तन्तुच्छ नामक सातवें पाताल के राजा ने प्रह्लाद आदि को सादर निमन्त्रित किया और वह निमन्त्रण देकर सबको अपने घर ले गया ॥१२९॥ वहाँ पर तन्तुच्छ ने कुन्दन-सी गौरवर्ण रत्नालंकारों से अलंकृत अपनी सुन्दरी कन्या मनोवती सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥१३० ॥ सूर्यप्रभ ने अत्यन्त सुखद उस दिन को बिता कर मनोवती के साथ नवीन आलिंगन से मधुर रात्रि भी व्यतीत की ॥१३१॥ दूसरे दिन उसी प्रकार सबको निमन्त्रण देकर सुमाय नामक असुरराज सबको अपने छठे पाताल में ले गया ॥१३२॥ वहाँ पर उसने भी धूप के समान श्याम रंगवाली काम की सजीव मूर्ति-सी सुभद्रा नाम की कन्या सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥१३३॥ और सूर्यप्रभ भी उस दिन उसी चन्द्रवदनी षोडशी श्यामा के साथ रहा ॥१३४॥ उसके दूसरे दिन राजा बली सूर्यप्रभ को अपने तीसरे पाताल में ले गया और नये मूंगे के समान रंगवाली वासन्ती लता के समान यौवन से भरी सुन्दरी नाम की कन्या उसे प्रदान की। सूर्यप्रभ ने दिव्य भोगों से भरे हुए उस लोक में सुन्दरी के विनोद में दिन व्यतीत किया ॥१३५-१३७॥ दूसरे दिन चौथे पाताल में गये हुए राजकुमार सूर्यप्रभ को मयासुर फिर अपने घर ले गया ॥१३८॥ उसके लोक में उसकी माया से रत्नों के विचित्र महल बने हुए थे और प्रतिक्षण उनकी नई-नई झिलमिल झलक दीख रही थी ॥१३९॥ मय ने भी वहाँ पर जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली और मूर्तिमयी शक्ति के समान अपनी सुमाया नाम की कन्या उसे प्रदान की ॥१४० ॥ सूर्यप्रभ के मनुष्य होने के कारण उसे कन्या देना मय ने अनुचित नहीं समझा। वह तरुण सूर्यप्रभ उसके (सुमाया के) साथ सुख-विलास करने लगा ॥१४१॥ वह राजा अपनी विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके सभी असुर-कन्याओं के साथ एक ही समय में पृथक्-पृथक् रहने लगा ॥१४२॥
३४ कथासरित्सागर
३४ कथासरित्सागर तात्त्विकेन च देहेन भजते स्म स भूयसा। महल्लिकां प्रियतमां प्रह्लादासुरकन्यकाम् ॥३४३॥ एकदा च निशि स्वैरं स्थितस्तां स महल्लिकाम्। एवं सूर्यप्रभोऽपृच्छदभिजातां कथान्तरे ॥३४४॥ प्रिये रात्रौ सहायाते ये द्वे सख्यौ तदा तव। ते कुतस्त्ये न पश्यामि किं च ते क्व गते इति ॥३४५॥ ततो महल्लिकाऽवादीत् सुष्ट्वहं स्मारिता त्वया। ते न द्वे एव ताः सन्ति वयस्या द्वादशेह मे ॥३४६॥ मषितुम्बेण च स्वर्गान्नीत्वा अपहृत्य ताः। एकाऽमृतप्रभा नाम द्वितीया केशिनी तथा ॥३४७॥ पर्वतस्य मुनेरेते तनये शुभलक्षणे। कालिन्दीति तृतीया च चतुर्थी मद्रिकेति च ॥३४८॥ तथा दर्पक्रमालेति पञ्चमी चारुलोचना। एता महामुनेस्तिस्रो देवलस्यात्मसम्भवाः ॥३४९॥ षष्ठी सौदामनी नाम सप्तमी चोज्ज्वलाभिधा। एत हाहाभिधानस्य गन्धर्वस्य सुते उभे ॥३५०॥ अष्टमी पीवरा नाम गन्धर्वस्य हुहोः सुता। नवम्यब्जमिका नाम भासस्य दुहिता विभोः ॥३५१॥ पिक्कसाच्च गणाज्जाता दशमी स्रंसरावली। एकादशी मालिनीति नाम्ना कम्बलनन्दिनी ॥३५२॥ नाम्ना मन्दारमालेति द्वादशी वसुकन्यका। अप्सरःसु समुत्पन्ना सर्वा दिव्यस्त्रियस्तु ताः ॥३५३॥ पातालं प्रथमं नीतास्ताञ्चोद्वाहे कृते मम। तुभ्यं मया च देयास्तास्तद्युक्ता स्यां सदा यथा ॥३५४॥ प्रतिज्ञातं मया चैतत्तासां स्नेहो हि तासु मे। तातोऽप्युक्तो मया तन न दत्ता द्वावपेक्षया ॥३५५॥ एतच्छ्रुत्वा गर्वैदक्षस्तां स सूर्यप्रभोऽब्रवीत्। प्रिय महानुभावा त्वमहं पुर्यां पश्च त्विदम् ॥३५६॥ १ ततस्ताः।
अष्टम लम्बक ॥ ५
अष्टम लम्बक ॥ ५ किन्तु अगली दरीचे में तो वह अमृतप्रभ प्रह्लाद की कन्या मदिरावती के साथ रहता था ॥३४३॥ एक बार रात्रि के समय बातचीत के प्रसंग में सूर्यप्रभ ने सुशीला मदिरावती से पूछा— प्रिय उस दिन रात में तेरे साथ जो सहेलियाँ आई थीं वे कौन और कहाँ की थीं अब उन्हें मैं नहीं देख रहा हूँ। वे कहाँ गईं ॥३४४-३४५॥ यह सुनकर मदिरावती ने कहा—अच्छा किया मुझे स्मरण करा दिया। वे दो ही नहीं अपितु वे मेरी बारह रूपवाली सहेलियाँ हैं ॥३४६॥ उन्हें मेरे चाचा स्वयं में आहरण करके लाये थे। उनमें एक अमृतप्रभा और दूसरी यशिनी ये दोनों पर्वत मुनि की कन्याएँ हैं। तीसरी कान्ति और चौथी मूर्ति या तथा पाँचवीं गन्धर्व मलयना- वानी सत्यभामा ये तीनों महामुनि देवल की कन्याएँ हैं। छठी सौदामिनी नाम्नी उग्रतपस् व पांता हाहा नाम के गन्धर्व की कन्याएँ हैं। आठवीं पीवरा हूहू नाम के गन्धर्व की कन्या है। नवीं पान्त की मंजिष्ठा नाम की कन्या है ॥३४७-३५१॥ इनमें से उन्मत्त पतङ्गी ये दो रूपवती हैं। ग्यारहवीं कम्बल की कन्या भामिनी है और महोरगा नाम की बारहवीं कन्या चक्षु की है जो नागराज से उत्पन्न हुई है। ये सभी मेरे विवाह के समय मेरे रथागार में ले आई गईं। उन्हें मैं तुम्हारे लिए दूँगी जिससे मैं उनके साथ रहकर सदा सुखी रह सकूँ ॥३५२ -३५४॥ दैव उन सबों सदृश स्त्री की है और पुरुष रूप भी इसी प्रकार का है। यह आनन्द दे के लिये त्रिलोकी में भी कहा था किन्तु उन्होंने भाई की उपेक्षा करके अपना इस प्रकार [L20: तिरस्कार किया ॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने कहा—प्रिये वे सब कहाँ हैं? मुझे तुम दिखलाओ। मदिरावती ने वैसा ही किया ॥
६६ कथासरित्सागर
६६ कथासरित्सागर एवं सूर्यप्रभेणोक्ता रुषाऽवोचन्महल्लिका। मत्सपक्षं बहस्त्वन्या मद्व्यवस्थास्तु नेच्छसि ॥३५७॥ यामिवियुक्ता रज्येयं नाहमेकमपि क्षणम्। इत्युक्तस्तु तया सूर्यप्रभस्तुष्ट्यानमस्त तत्॥३५८॥ ततस्तत्रैव पाताल नीत्वैव प्रथमं स्वया। प्रह्लादसुतया तस्मै प्रदत्ता द्वादशापि ताः॥३५९॥ अथामृतप्रभामुख्यास्ताः स सूर्यप्रभ क्रमात्। परिणीयोपभुङ्क्ते स्म तस्या दिव्याङ्गना निशि॥३६०॥ प्रातश्च ताः प्रभासेन नाययित्वा रसातलम्। चतुर्थं स्थापयामास प्रच्छन्नाः पृष्ट्वा महल्लिकाम् ॥३६१॥ स्वयं चालक्षितः साकं तया तत्रैव सोऽगमत्। सभाजनाय च प्राग्बत् प्रह्लादस्य सभां मयौ ॥३६२॥ तत्रासुरेन्द्रो वक्ति स्म तं सुनीथ मयं च सः। यात सर्वे दितिदन् द्रष्टुं वेम्बायुभे इति॥३६३॥ तथेत्यथ रसातलात् सपदि निर्गतास्ते ततो। यथास्वमसुरैः समं मयसुनीथसूर्यप्रभाः॥ विमानमनुचिन्तितं तदधिरुह्य भूतासनं। सुमेरुगिरिसानुगं प्रययुरश्रमं काश्यपम् ॥३६४॥ तत्र ते दितिवनू सह स्थिते सावरैर्मुनिजनैरनिवेदिताः। अभ्युपेत्य ववृधुः क्रमण ते पादयोश्च शिरसा ववन्दिरे॥३६५॥ ते च तानसुरमातरावुभे सानुगान् समवलोक्य सादरे। साधु मूर्द्धिन परिचुम्ब्य संमदावाशिषोऽनुपदमूचतुर्मयम् ॥३६६॥ प्राप्तजीवितममुं तवात्मजं वीक्ष्य पुत्रक सुनीथमावयोः। अद्युरद्य सफलत्वमागतं त्वां च पुण्यकृतमेव मन्महे ॥३६७॥ सुमुण्डीकं धत्त कृतिनमिह सूर्यप्रभतया पुनर्जातं विख्यातुं स्थिरमसाधारणगुणम्। चितं भाविध्येयः प्रथमपिपुनैर्लक्षणगुणै- र्विलोक्यान्वस्तोपात् स्फुटमिह नमावः स्ववपुषि॥३६८॥ गच्छीदामुत्तिष्ठत यात वत्साः प्रजापतिं द्रष्टुमिहार्यपुत्रम्। तद्दर्शनाद्धो भविताऽर्थसिद्धिः कामं च वस्तद्वचनं शिवाय ॥३६९॥
सैंथम लम्बक १०७
सैंथम लम्बक १०७ इस प्रकार सूर्यप्रभ के कहने पर महस्तिका क्रोध से बोली—'मेरे ही सामने प्रतिदिन नई-नई स्त्रियों से विवाह कर रहे हो और मेरी सहेलियों को नहीं चाहते ? ॥३५७॥ मैं उनके वियोग में एक क्षण भी मनोरंजन नहीं कर सकती ।—महस्तिका के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ ने उसकी बात मान ली ॥३५८॥ तब प्रह्लाद की पुत्री ने उसे पहले पाताल में से लाकर उन सब कन्याओं को क्रमशः सौंप दे दिया। सूर्यप्रभ ने भी उन विद्याधराओं का रात्रियों में क्रमशः उपभोग करना प्रारम्भ किया ॥३५९-३६०॥ प्रातः काल ही सूर्यप्रभ ने महस्तिका से पूछकर प्रभास द्वारा उन कन्याओं को रसातल में पहुँचाकर छिपा दिया ॥३६१॥ वह स्वयं भी अदृश्य होकर महस्तिका के साथ वहाँ जाता था। एक बार सभा में प्रह्लाद ने मय एवं सुनीथ से कहा कि तुम सब दिति और दनु माताओं का दर्शन करने के लिए जाओ ॥३६२-३६३॥ 'जो आज्ञा' कहकर मय सुनीथ और सूर्यप्रभ तीनों रसातल से निकलकर यथासम्भव असुरों के साथ ध्यान करते ही उपस्थित भूतासन विमान पर बैठकर, सुमेरु शिखर पर स्थित कश्यप के आश्रम को गये ॥३६४॥ वहाँ पर आदर के साथ ऋषियों द्वारा सूचित करने पर वे लोग एक साथ बैठी हुई दिति और दनु को देखकर प्रसन्न हुए और क्रमशः वे लोग उनके चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम करने लगे ॥३६५॥ उन दोनों असुरों और दानवों की माताओं ने अपने साथियों के साथ आये हुए पुत्र मय को देखकर आदर प्रकट किया और प्रसन्नतापूर्वक आँसू बहाते हुए आशीर्वाद दिया ॥३६६॥ और कहा—पुत्र पुनर्जीवित सुनीथ के साथ तुम्हें देखकर हम दोनों को अपार आनन्द हुआ। हमारे नेत्र सफल हुए और हम तुम्हें पुण्यवान् (धन्य) समझती हैं और सूर्यप्रभ के रूप में दिव्य तेज धारी असाधारण गुणों से युक्त और भावी कल्याण से पूर्ण सुमुण्डीक को देखकर सन्तोष के कारण हम लोगों का आनन्द शरीर में नहीं समा रहा है ॥३६७-३६८॥ हे पुत्रो, अब तुम शीघ्र उठो और आर्यपुत्र कश्यप प्रजापति का दर्शन करने जाओ। उनके दर्शन से तुम्हारी कार्यसिद्धि होगी और उनकी बातों का मानना तुम्हारे कल्याण के लिए होगा' ॥३६९॥
इति ताभ्यामादिष्टा देवीभ्यां ते हर्षेण गत्वा तम्। कश्यपमुनिं मयाद्या ददृशुर्दिव्याश्रमे तत्र॥३७०॥ द्रुतशुद्धहाटकाभं तेजोमयमाधमे च देवानाम्। ज्वालाकपिशजटाधरमनलसमानं दुराधर्षम्॥३७१॥ उपगम्य च तस्य पादयोस्ते निपतन्ति स्म सहानुगाः क्रमेण। अथ सोऽपि मुहुः कृतोचिताशीः परितोषादुपवेश्य तानुवाच॥३७२॥ आनन्दः परमो ममैष यदमी दृष्टाः स्थ सर्वे सुताः। श्लाघ्यस्त्वं मय सत्पथादप्रसितो यः सर्वविद्यास्पदम्। धन्यस्त्वं च सुनीथ येन गतमप्याप्तं पुनर्जीवितं। त्वं सूर्यप्रभ पुण्यवांश्च भविता यः खचराणां पतिः॥३७३॥ तदयं पथि वर्तितव्यमधुना योऽक्ष्यमस्मद्गुरोः। भोक्ष्यध्ये सततं सुखानि परमामासाद्य येन धियम्। नैव स्याच्च पुरा यथा परिभवो भूयः परभ्योऽत्र वो। धर्मातिक्रमिणो सुरा हि मुरजिच्चक्रस्य याता वधम्॥३७४॥ ये चासुरा देवहताः सुनीथ मर्त्यप्रवीरास्त इहावतीर्णाः। योऽभूत्सुमुण्डीक इहानुजस्ते सूर्यप्रभः सैष किसाद्य जातः॥३७५॥ अन्येऽपि तेऽमी असुरा वयस्या अस्यैव जाताः खलु बान्धवाश्च। यः शम्बराख्यश्च महासुरोऽभूत्सोऽस्य जातः सचिवः प्रहस्तः॥३७६॥ यश्चासुरोऽभूत्त्रिशिराः स जातः सिद्धार्थनामा सचिवो मयस्य। वातापिरित्यास च दानवो यः प्रज्ञाढ्यनामास्य स एव मन्त्री॥३७७॥ उलूकनामा दनुजश्च योऽभूत्सोऽस्य वयस्योऽस्य धूम्रकेतूरास्य। योऽन्य वयस्योऽस्य च वीतभीतिः स कालनामाप्यभवत्सुरातिः॥३७८॥ यश्चैष भासः सचिवोऽस्य सोऽस्य दैत्योऽवतीर्णो द्युपबर्हनामा। योऽस्य प्रभासश्च स एष दैत्यो वत्सावतीर्णः प्रबलप्रभिधानः॥३७९॥ महात्मना रत्नमयेन येन देवेर्विपक्षैरपि याचितेन। कृत्वा शरीरं यखद्योऽवतीर्णं रत्नानि जातान्यस्थीनि यस्मात्॥३८०॥ ततोपतच्चण्डिकयास्य देव्या वरोऽप्यवेहानुगतः स दत्तः। यन प्रभासोऽद्य स एष जातो महाबलो दुःसहहो रिपूणाम्॥३८१॥ यौ दानवाभूतां पूर्वं सुन्दोपसुन्दनामानौ। तावेतो सर्वदमनमयस्कूरावस्य मन्त्रिणौ जातौ॥३८२॥
अष्टम लम्बक १०९
अष्टम लम्बक १०९ इस प्रकार, माताओं के आदेश को पाकर मय आदि सभी ने उसी प्रकार दिव्य आश्रम में जाकर कश्यप प्रजापति के दर्शन किये ॥१७० ॥ मुनि का रंग पिघले हुए विशुद्ध सोने के समान था उनका मुख दिव्य दीप्ति से चमकता था। अग्नि-ज्वाला के समान पीत वर्ण की उनकी जटाएँ थीं और वे स्वयं भी अग्नि के समान दुर्धर्ष थे ॥१७१॥ वे सब उनके समीप जाकर क्रमशः उनके चरणों में गिर पड़े। तदनन्तर मुनि भी उन्हें बार-बार आशीर्वाद देते हुए सन्तोष और प्रसन्नता से बोले- ॥१७२॥ 'मुझे अत्यन्त आनन्द हो रहा है कि मैंने तुम सब सन्तानों को आज देखा। हे मय तू प्रशंसनीय है। तू सभी विद्याओं का जानकार है और सत्पथ से विचलित नहीं हुआ है। सुनीथ तू भी धन्य है कि तूने गये हुए जीवन को पुनः प्राप्त किया। हे सूर्यप्रभ तू भी धन्य है कि आकाशचारी विद्याधरों का चक्रवर्ती बनेगा ॥१७३॥ तुम लोगों को धार्मिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और हमारी बातों को समझना चाहिए। इससे तुम अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त करके शाश्वत सुख प्राप्त करोगे और शत्रुओं से पहले के समान पराजय भी तुम्हारा न होगा। धर्म का उल्लंघन करनेवाले असुर विष्णु के चक्र के वशीभूत हुए थे ॥१७४॥ हे सुनीथ वे देवताओं से मारे गये असुर ही मानव-शरीर लेकर पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं। जो तुम्हारा छोटा भाई सुमुण्डीक था वह अब सूर्यप्रभ के रूप में अवतीर्ण हुआ है ॥१७५॥ और भी इसके मित्र असुर इस जन्म में इसके बन्धु-बान्धव हुए हैं जो शम्बर नाम का महाअसुर था वह प्रहस्त नाम से सूर्यप्रभ का मन्त्री हुआ है ॥१७६॥ त्रिशिरा नाम का जो असुर था वह संवेका सिद्धार्थ नाम का मन्त्री हुआ है। वातापि नाम का जो असुर था वह प्रकृष्टय नाम से इसका मन्त्री हुआ है ॥१७७॥ उलूक नाम का दानव ही इसका धुर्मन्दर नाम का मित्र हुआ है। वीतिभीति नाम का इसका मित्र पहले काल नामक दानव था और यह भास नाम का इसका मन्त्री भी वृषपर्वा नाम का दानव था और प्रभास नाम का मित्र पहले प्रबल नामक दैत्य था। इस रत्नमय महासत्त्वशाली ने देवताओं की प्रार्थना की उपेक्षा कर अपने शरीर को खण्ड-खण्ड कर अवतार लिया जिससे समस्त प्रकार के रत्न पैदा हुए। इससे संतुष्ट चण्डिका ने इसे दूसरे शरीर के अनुकूल कर दिया जिससे यह अपने शत्रुओं के लिए महा दुःसह हो गया ॥१७८-१८१॥ पूर्वजन्म में सुन्द और उपसुन्द नाम के जो दानव थे वे अब सर्वदमन और भयंकर नाम से उसके मन्त्री और मित्र हुए हैं ॥१८२॥
११० कथासरित्सागर
११० कथासरित्सागर यश्च हयग्रीवास्यो विकटाक्षश्चासुरावभूतां द्वौ। स्थिरबुद्धिमहाबुद्धी उत्पन्नावस्य ताविमौ सचिवौ ॥३८३॥ अन्येऽप्यस्य य एते श्वसुराः सचिवादिबान्धवा ये च। तेऽप्यवतीर्णा असुरा यैरिन्द्राद्या पुरा जिता बहुशः ॥३८४॥ तद्युष्माकं पक्षः पुनरप्येवं क्रमाद् गतो वृद्धिम्। धीरा भवत समृद्धिं प्राप्स्यथ धर्मादनभिच्युताः परमाम् ॥३८५॥ इति वदति कश्यपर्षौ दाक्षायण्यः¹ किलास्य पत्न्योऽत्र। अदितिप्रमुखाः सर्वा माध्यन्दिनसवनसमये आजग्मुः ॥३८६॥ दत्त्वाशिषं मयादिषु नमत्सु भर्तुः कृपान्तिकात्तासु। तास्वथ शक्रोऽत्रागात् सलोकपालोऽपि तं मुनिं द्रष्टुम् ॥३८७॥ वन्दितसदारकश्यपमुनिचरणो वन्दितो मयाद्यैश्च। सोऽथ सरोषं पश्यन् सूर्यप्रभमुक्तवानथ शक्रः ॥३८८॥ 'एषोऽर्भकः स जाने विद्याधरचक्रवर्त्तिताकामः। तदहो स्वल्पेन कथं सन्तुष्टो मेन्द्रतां किमर्थयते' ॥३८९॥ तन्श्रुत्वैव मयस्तं जगाद 'देवेन्द्र ! तत्त्वयीन्द्रत्वम्। परमेश्वरेण निर्मितमादिष्टं चास्य खेचरेश्वरत्वम् ॥३९०॥ इति मयवचनान्मघवा स तदा विहसन्नुवाच सामर्षः। 'अत्यल्पं हि तपस्या सुमहज्जगत्याकृतेरुपम्येति' ॥३९१॥ अथ स मयोऽप्यवदत् श्रुतशर्मा यत्र खेचरेन्द्रत्वे। योग्यस्तत्रासंशयमाकृतिरस्यायमर्हतीन्द्रत्वम्' ॥३९२॥ इत्युक्तवते तस्मै मयाय कुपितः स वज्रमुद्यम्य। मघवोत्ससर्ज कश्यपमुनिरकरोच्चाथ कोपहुङ्कारम् ॥३९३॥ धिक्कारमुखरताम्रेवदने कोपं ययुश्च दित्याद्याः। तत इन्द्रः शापभयादुपविशत्संहृतायुधोऽनमत् ॥३९४॥ प्रणिपत्य पादयोरथ दारयुतं तं सुरासुरप्रभवम्। कश्यपमुनिं प्रसाद्य च विज्ञापितवान् कृताञ्जलिः शक्रः ॥३९५॥ श्रुतशर्मणे मया यद् भगवन्विद्याधराधिराज्यत्वम्। दत्तं तदेष हर्तुं सूर्यप्रभवोद्यतोऽधुना तस्य ॥३९६॥ १ दक्षप्रजापतेः कन्यकाः ।
अष्टम लम्बक १११
अष्टम लम्बक १११ हयग्रीव और विकटाक्ष नाम के जो दो असुर थे वे स्थिरबुद्धि और महाबुद्धि नाम से इसके मन्त्री उत्पन्न हुए हैं ॥३८३॥ और भी जो सूर्यप्रभ के श्वसुर आदि अन्य बन्धु हैं वे सब पूर्वजन्म के ही असुर हैं जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं को अनेक बार जीता था ॥३८४॥ इस प्रकार तुम्हारा पक्ष क्रमशः बड़ा है। धैर्य रखो। धर्म का आचरण करने से तुम लोग परम समृद्धि प्राप्त करोगे' ॥३८५॥ कश्यप ऋषि के इस प्रकार कहते हुए ही अदिति आदि दक्ष की कन्याएँ, जो ऋषि की पत्नियां थीं वे मध्याह्नकालीन धर्मक्रिया के लिए वहाँ आकर उपस्थित हुईं ॥३८६॥ मय आदि ने मुनि के आशीर्वाद प्राप्त करते हुए प्रणाम करने पर और पत्नियों को आह्निक क्रिया करने की आज्ञा देने पर लोकपालों के साथ इन्द्र भी वहाँ आ गया ॥३८७॥ पत्नियों के साथ मुनि को प्रणाम करके मय आदि से प्रणाम किया गया इन्द्र सूर्यप्रभ को देखकर क्रोध से बोला-॥३८८॥ 'मालूम होता है यही लड़का है जो विद्याधर चक्रवर्ती बनना चाहता है। तो यह इतने थोड़े में ही सन्तुष्ट क्यों हो गया इन्द्र-पद क्यों नहीं चाहता ? ॥३८९॥ तब मय ने कहा- 'हे देवराज ईश्वर (शिव) ने तुम्हारे लिए देवताओं का चक्रवर्ती पद और इसके लिए विद्याधरों का चक्रवर्ती पद बनाया है' ॥३९०॥ मय के इन वचनों को सुनकर ईर्ष्या से जलता हुआ इन्द्र हँसकर बोला- 'इस प्रकार महापराक्रमी आकृति के लिए विद्याधर चक्रवर्ती का पद बहुत छोटा है' ॥३९१॥ तब मय ने कहा कि 'जहाँ विद्याधरों का चक्रवर्ती श्रुतशर्मा हो सकता है, वहाँ यह आकृति अवश्य ही निःसन्देह इन्द्र-पद के योग्य है' ॥३९२॥ ऐसा कहते हुए मय पर क्रुद्ध इन्द्र वज्र को उठाकर स्वयं लग्न हो गया। इतने में ही कश्यप मुनि के क्रोध से हुङ्कार करने पर वह रुका ॥३९३॥ धिक्कार करती हुई और क्रोध से लाल मुखवाली दिति दनु आदि मुनि-पत्नियां भी क्रुद्ध हो उठीं। तब यह देखकर शाप के भय से डरा हुआ इन्द्र भी नीचे मुँह करके वहीं बैठ गया ॥३९४॥ पत्नियों के साथ देवों और असुरों के पिता कश्यप मुनि के चरणों में गिरकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए स्तुति करता हुआ इन्द्र बोला-॥३९५॥ 'भगवन् मैंने श्रुतशर्मा को जो विद्याधरों का चक्रवर्ती-पद दिया है उसे यह सूर्यप्रभ हरण करना चाहता है ॥३९६॥
२१२ कथासरित्सागर
२१२ कथासरित्सागर एष च सर्वकारं मयोऽस्य तत्साधने कृतोद्योगः। तच्छ्रुत्वा स समिन्द्रं दितिसहितः प्रजापतिरवोचत् ॥३९७॥ दृष्टस्ते श्रुतधर्मा मघवन्सूर्यप्रभश्च धैर्यस्य। न च तस्येच्छामि तथा तन्नाशात्तद्व पूर्वमत्र मयः ॥३९८॥ सख मयस्य किं खलु जल्पसि कथयात्र कोऽपराधोऽस्य। एष हि धर्मपथस्थो ज्ञानी विज्ञानवान् गुरुप्रणतः ॥३९९॥ मस्माकरिष्यदस्माक्रोधान्निस्त्वामयं व्यधास्यच्चेत्। न च शक्तस्त्वमिमं प्रति प्रभावमतस्य किं न जानासि ॥४००॥ इति मुनिनात्र सदारेणोक्ते लज्जाभयानते चन्द्रे। अदितिरुवाच स कीदृक्श्रुतधर्मा दश्यंतामिहानीय ॥४०१॥ एतन्निशम्य शक्रो मातलिमादिश्य तत्क्षणं तत्र। मानाययति स्म स स श्रुतधर्माणं नमश्चराधीशम् ॥४०२॥ तं दृष्ट्वा कृतविनतिं वीक्ष्य च सूर्यप्रभं तमप्राक्षूः। कश्यपमुनिं स्वभार्या क एतयो रूपलक्षणयुक्त इति ॥४०३॥ अथ स मुनीन्द्रोऽवादीच्छ्रुतधर्मास्यापि न प्रभासस्य। एतत्सचिवस्य समं किं पुनरेतस्य निरुपमानस्य ॥४०४॥ सूर्यप्रभ एष यतो दिव्यैस्त रूपलक्षणैर्युक्तः। यैरस्याध्यवसायं विदधानस्येन्द्रतापि नासुलभा ॥४०५॥ इति कश्यपर्षिवचनं सर्वेऽपि श्रुष्टुवस्तदेत्यत्र। तत एष मयाय वरं वदो मुनिः शृण्वतो महेन्द्रस्य ॥४०६॥ मत्पुत्र निर्विकारं भवता स्थितमुद्यतायुधेऽपीन्द्रे। सनाजरामरोऽर्कबँयमयैरक्षतश्च भवितासि ॥४०७॥ एतावपि ते सदृशो सुनीथसूर्यप्रभो महासत्वौ। दानवपरिमवनीयौ भविष्यत सकलवैरिवर्गस्य ॥४०८॥ एष सुबाहुकुमारश्चापद्रजनीपु चिन्तितोपगतः। साहाय्यं करिष्यति मसन्नय घरदिजेन्दुसमकान्तिः ॥४०९॥ इत्युक्तवतोऽन्य मुनमर्या ऋपयश्च लोकपालाश्च। मदधि मयप्रभृतिभ्यस्तेभ्यः सर्वे वरान् ददुस्सुद्रतम् ॥४१०॥ १ गुरुप नप्रः । २ तारदब्जग्रहसुप्रभः।
अष्टम लम्बक १२३
अष्टम लम्बक १२३
और यह मय उसकी सब प्रकार की सहायता के लिए सन्नद्ध है। यह सुनकर दिति और दनु के साथ प्रजापति कश्यप ने इन्द्र से कहा—'इन्द्र तुम्हें श्रुतशर्मा प्यारा है और शिवजी का प्यारा सूर्यप्रभ है। यद्यपि मैं नहीं चाहता फिर भी शिवजी ने मय को आज्ञा दी है, तो अब तुम्हीं बताओ इसमें मय का क्या दोष है ? यह मय धर्म-मार्ग पर चलनेवाला और ज्ञान-विज्ञान युक्त है और गुरुओं के आगे विनम्र है। यदि तुम इसका अहित करते तो मेरी क्रोधाग्नि तुम्हें भस्म कर देती ! तुम इसके ऊपर अपनी सामर्थ्य नहीं दिखा सकते। क्या तुम इसके प्रभाव को नहीं जानते ? ॥३९७–४ ॥
पत्नियों-सहित मुनि के ऐसा कहने पर और इन्द्र के लज्जा से मुँह नीचा कर लेने पर इन्द्र की माता अदिति बोली—'श्रुतशर्मा कैसा है ? उसे लाकर दिखलाओ तो सही' ॥४ १॥
ऐसा सुनकर इन्द्र ने मातलि को उसी क्षण वहाँ बुलाकर आज्ञा दी और विद्याधरों के चक्रवर्ती श्रुतशर्मा को वहीं बुलाया। प्रणाम करते हुए श्रुतशर्मा और सूर्यप्रभ को देखकर कश्यप ऋषि की पत्नियों ने कश्यप प्रजापति से पूछा-'इन दोनों में सुन्दर रूप और लक्षणोंवाला कौन है ? ॥४ २४ ॥॥
तदनन्तर कश्यप मुनि ने कहा—'यह श्रुतशर्मा सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रभास के भी समान नहीं है। इस अनुपम सूर्यप्रभ के समान यह कहाँ से हो सकता है' ॥४ ४॥
सूर्यप्रभ तो उन कलाओं से युक्त है, जिससे कि उद्योग करने पर उसे इन्द्रत्व की प्राप्ति भी दुर्लभ नहीं है ॥४ ५॥
इस प्रकार कश्यप ऋषि के वचन पर सबने श्रद्धा प्रकट की। तब महर्षि ने इन्द्र के सुनते हुए मय को यह वरदान दिया—॥४ ६॥
'हे पुत्र इन्द्र के शस्त्र उठा लेने पर भी तूने जो सहिष्णुता दिखलाई अर्थात् तनिक भी क्रोध या लेशमात्र भी विकार प्रकट नहीं किया इस कारण तेरे सभी अंग वज्रमय हो जायेंगे। और तू कभी मारा नहीं जायगा। तेरे ये दोनों पुत्र सुग्रीव तथा सूर्यप्रभ भी महाबलशाली और शत्रुओं के लिए सदा अजेय रहेंगे ॥४ ७ ४ ८॥
यह सुवासुकुमार, जो चन्द्रमा के समान सुन्दर मेरा पुत्र है आपत्ति के समय या रात्रि के समय ध्यान करते ही उपस्थित होकर तुम्हारी सहायता करेगा ॥४ ९॥
मुनि के ऐसा कहने पर उनकी पत्नियों अन्य ऋषियों तथा लोकपालों ने उसी सभा में मय आदि को वरदान दिये ॥४१०॥ ४
३१४ कथासरित्सागर
३१४ कथासरित्सागर व्यतिक्रम्य क्षमम्भवद्भिर्माविनयात् प्रसादयन्द्र मयम्। दृष्टं विनयफलं हि त्वयाद्य यदनेन सद्वरा प्राप्ता ॥४११॥ तच्छ्रुत्वा मयमिन्द्रः पाणावालम्ब्य तोषयामास। सूर्यप्रभाभिभूतः श्रुतधर्मा चामवहदिनेन्दुनिमः' ॥४१२॥ प्रणम्य तमथ क्षमात् सुरपतिर्गुरुं कश्यपं जगाम स यथागतं निखिललोकपालान्वितः। मयप्रभृतयोऽपि ते मुनिवरस्य तस्याज्ञया ततः खलु तवाश्रमात् प्रकृतकार्यसिद्ध्यै ययुः ॥४१३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः तृतीयस्तरङ्गः सूर्यप्रभस्योद्योगः ततो मयसुनीथौ तौ गत्वा सूर्यप्रभश्च सः। कश्यपस्याश्रमात्तस्मात् सम्प्रापुः सर्व एव ते ॥१॥ सङ्गमं चन्द्रभागाया ऐरावत्याश्च यत्र ते। स्थिताः सूर्यप्रभस्यार्थे राजानो मित्रबान्धवाः ॥२॥ प्राप्तं सूर्यप्रभं ते च दृष्ट्वा तत्र स्थिता नृपाः। हृदन्तोऽग्रे समुत्तस्थुर्विषण्णा मरणोन्मुखाः ॥३॥ चन्द्रप्रभादर्शनजां तेषामाद्येक्ष्य दुःखिताम्। सूर्यप्रभोऽब्रवीत् तेभ्यो यथावृत्तं शशंस सन् ॥४॥ तथापि विमनाः पृष्टास्ते तेन कृच्छ्रादवर्णयन्। तस्य भार्यापहरणं विहितं श्रुतधर्मणा ॥५॥ तत्परामवदुःखार्त्तन देहत्यागोद्यमं निजम्। धारितं दिव्यया वाचा तथैवास्मै न्यवेदयत् ॥६॥ ततः सूर्यप्रभस्तत्र प्रतिज्ञामकरोन् नृपः। यदि ब्रह्मादयः सर्वेऽप्यभिरक्षन्ति तं सुराः ॥७॥ १ दिवाते यथा चन्द्रबिम्बं मलिनं भवति, तथा।
अष्टम लम्बक २१५
अष्टम लम्बक २१५ तब इन्द्र की माता अदिति ने कहा—'हे इन्द्र घमंडता छोड़ो मय को प्रसन्न करो। नम्रता के फल को तुमने देखा कि आज मय ने कितने ही अच्छे वर प्राप्त किये' ॥४११॥ यह सुनकर इन्द्र ने मय को हाथों से पकड़कर प्रसन्न किया। उस समय युद्धधर्मा सूर्यप्रभ के आगे दिन में निकले हुए चन्द्रमा के समान निष्प्रभ लग रहा था ॥ ४१२॥ तदनन्तर, लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र ने ऋषि को प्रणाम करके अपने लोक को प्रस्थान किया और मय आदि भी मुनि की आज्ञा से प्रस्तुत कार्य को सफल बनाने के लिए उसके आश्रम से अपने निवासस्थान को चले गये ॥४१३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ नामक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग सूर्यप्रभ का उद्योग तदनन्तर मय सुनीथ और सूर्यप्रभ ये सभी उस कश्यप-आश्रम से चलकर चन्द्रभागा और इरावती के संगम पर पहुँचे जहाँ सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में उसके मित्र बन्धु, ससुर आदि सभी ठहरे हुए थे ॥१ २॥ सूर्यप्रभ को देखकर वहाँ ठहरे हुए सभी राजा और मित्र बन्धु मरने को तैयार होकर रोते हुए उसके सामने आये ॥३॥ चन्द्रप्रभ को न देखने से उसके प्रति बुरी आशंका से दुःखित उन सब को सूर्यप्रभ ने जो कुछ समाचार था सब कह सुनाया ॥४॥ इस पर भी अत्यन्त व्याकुल हुए सूर्यप्रभ के उनसे पूछने पर उन्होंने श्रुतशर्मा द्वारा उनकी समस्त मर्यादा का अपहरण-वृत्तान्त अत्यन्त कठिनाई से कह सुनाया ॥५॥ श्रुतशर्मा द्वारा किये गये अपमान से दुःखी होकर अपने मरने का निश्चय और आकाशवाणी द्वारा उसका रोका जाना सब उन्होंने कह सुनाया ॥६॥ यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने क्रोध में यह प्रतिज्ञा की कि यदि ब्रह्मा आदि सभी देवता भी श्रुतशर्मा की रक्षा कर तो भी उन का समूल नाश करूँगा ॥७८॥
१५ कथासरित्सागरं
१५ कथासरित्सागरं तथाप्युन्मूलनीयो मे श्रुतशर्मा स निश्चितम्। परदारापहरणे छद्मप्रागल्भ्यवाञ्छठः ॥८॥ एव कृतप्रतिज्ञश्च गन्तु तद्विजयाय सः। लग्नं निश्चितवान् दृष्ट गणकैः सप्तमेऽहनि ॥९॥ ततस्तं निश्चितं ज्ञात्वा गृहीतविजयोगमम्। द्रढयित्वा पुनर्भूषा प्राह सूर्यप्रभं मयः ॥१०॥ सत्यं कृतोद्यमस्त्वं चेत्तद्वदामि मया तदा। मायां प्रदर्श्य नीत्वा ते पातालं स्थापिताः प्रियाः ॥११॥ एवं त्वं विजयोद्योगं करोषि रभसादिति। नैवमेव तथा ह्यग्निर्ज्वलेद्वातेरितो यथा ॥१२॥ तदेहि यामः पातालं प्रियास्ते दर्शयामि ताः। एवं मयवचः श्रुत्वा ननन्दुः सर्व एव ते ॥१३॥ प्राक्तनं च तेनैव प्रविश्य विवरेण ते। जग्मुश्चतुर्थं पाताल मयासुरपुरःसराः ॥१४॥ तत्रैकस्तो वासगृहान्मयः सूर्यप्रभाय ताः। भार्या मदनसेनाद्या आत्मीयासी समर्पयत् ॥१५॥ गृहीत्वा तास्तमान्याश्च पत्नीस्ताः सोऽसुरात्मजाः। ययौ सूर्यप्रभो द्रष्टुं प्रह्लादं मयवाक्यतः ॥१६॥ मयाच्छ्रुतवरप्राप्तिः प्रणतं तं च सोऽसुरः। ज्ञातायुधोऽथ जिज्ञासुः कृतवक्रोऽधमभ्यधात् ॥१७॥ धृतं मया दुराचार मत्कन्या ह्यददा त्वया। भ्रान्ताजिता मज्ज्येष्ठतास्तत्त्वां हन्म्यद्य पश्य माम् ॥१८॥ तच्छ्रुत्वा निर्विकारस्तं पश्यन् सूर्यप्रभोऽब्रवीत्। मच्छरीरं त्वदायत्तमविनीतं प्रणाधि माम् ॥१९॥ इत्युक्तवन्तं प्रह्लादो विहस्य तमुवाच सः। प्रक्षितोऽसि मया मापदर्पल्पोऽपि नास्ति ते ॥२० ॥ वरं गृहाण तुष्टोऽस्मीत्युक्तस्तेन तथेति सः। भक्तिं गुरुषु धर्मे च वव्रे सूर्यप्रभो वरम् ॥२१॥ ततस्तुष्टेषु सर्वेषु तस्मै सूर्यप्रभाय सः। प्रह्लादो यामिनीं नाम द्वितीयां तनयां ददौ ॥२२॥