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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सौवर्णे रत्ननिचितैः प्रासादैर्हिमवत्यपि । सुमेरुशिखरभ्रान्तिं कुर्वद्भिरुपशोभितम् ॥११॥ व्योमावतीर्णश्चोत्तीर्य विमानात् प्रविवेश तत् । सानाय्यदर्शनाभ्येत्यदिव लोकैर्बलोत्सुकैः ॥१२॥ प्रविष्टश्चराजधानीं च स श्वश्र्वा कृतमङ्गलः । अलङ्कारवतीयुक्तः सबयस्यवसन्तकः ॥१३॥ तत्र तं दिवसं दिव्यैर्भोगैः श्वश्रूप्रभावजैः । उवास सुकृती स्वर्गे इव श्वशुरवेश्मनि ॥१४॥ अन्येद्युस्तं च सा श्वश्रूरवोचत् काञ्चनप्रभा । अस्ति स्वयम्भूभगवान् नगरेऽस्मिन्नुमापतिः ॥१५॥ स दृष्टपूजितो भोगं मोक्षं चैव प्रयच्छति । अलङ्कारवतीपित्रा तत्रोद्यानं कृतं महत् ॥१६॥ तीर्थं गङ्गासरःसंज्ञमन्वर्थं चावतारितम् । तं तमर्चयितुं देवं विहर्तुं चाद्य गच्छत ॥१७॥ एव श्वश्र्वा सयोक्तस्तु शार्वोद्यानं सहानुगः । नरवाहनदत्तोऽगादलङ्कारवतीसखः ॥१८॥ तद्बभौ काञ्चनस्कन्धे रत्नशाखामनोरमे । मुक्तागुच्छाच्छकुसुमे कान्तं विद्रुमपल्लवे ॥१९॥ तत्र गङ्गासरःस्नात पूजितोमापतिश्च सः । बभ्राम रत्नसोपाना वापी काञ्चनपङ्कजाः ॥२०॥ तासां तीरेषु वृक्षेपू कल्पवल्लीगृहेषु च । सहामलङ्कारवत्या स विजहारानुगाम्बितः ॥२१॥ दिव्यैरापानसङ्गीतैः परिहासैश्च पेशलैः । मरुभूत्यार्यनैरुक्तै रमते स्म च तेषु सः ॥२२॥ मासमात्रमुवासैष क्रीडन्नुद्यानभूमिषु । नरवाहनदत्तोऽत्र श्वश्रूविद्याविभूतिभिः ॥२३॥ ततो देवोचितैर्वस्त्रैरलङ्कारैश्च पूजितः । सबधूकः सहामात्यः काञ्चनप्रभया तया ॥२४॥ आययौ स विमानेन तेनैव सह सानुगः । कौशाम्बीं सहितो वध्वा पित्रोर्दत्तेक्षणोत्सवः ॥२५॥

नवम लम्बक ४८५

नवम लम्बक ४८५ वह सुन्दरपुर रत्नों से जड़े हुए सोने के महलों से हिमालय में भी सुमेरु पर्वत की भ्रान्ति उत्पन्न कर रहा था ॥११॥ आकाश से उतरकर और विमान से बाहर निकलकर वह उस नगर में प्रविष्ट हुआ। उसके आगमन पर हिलती हुई ध्वजाओं से मानों सुन्दरपुर नगर, अपने स्वामी को प्राप्त कर प्रसन्नता प्रकट कर रहा था ॥१२॥ तदनन्तर, सास द्वारा मंगलाचार किये जाने पर, नरवाहनदत्त अपने मित्र वसन्तक और वधू अलङ्कारवती के साथ राजभवन में गया ॥१३॥ वहाँ पर सास द्वारा विद्या के प्रभाव से प्राप्त किये गये दिव्य भोगों को भोगता हुआ वह स्वर्ग में इन्द्र के समान रहने लगा ॥१४॥ किसी दिन उसकी सास काञ्चनप्रभा ने उससे कहा-'इस नगर में स्वयम्भू भगवान् उमापति शिव का मन्दिर है ॥१५॥ उनके दर्शन और पूजन से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं। अलङ्कारवती के पिता ने वहाँ एक विशाल उद्यान बनाया है ॥१६॥ और, यथार्थ नामवाला गंगासर नाम का तीर्थ भी बनाया है। आज वहाँ उनका दर्शन और विहार करने चलो' ॥१७॥ सास के इस प्रकार कहने पर नरवाहनदत्त अपने साथियों और अलङ्कारवती के साथ वहाँ गया ॥१८॥ वह स्थान सोने की प्रधान शाखाओंवाले रत्नों की छोटी डालियोंवाले और लटकते हुए मोतियों के गुच्छों से सुशोभित वृक्षों से युक्त था ॥१९॥ वहाँ पर गंगासर में स्नान और शिव का पूजन कर लेने के उपरान्त नरवाहनदत्त रत्ना की सीढ़ियोंवाली और सोने के कमलों से शोभित बावलियों में भ्रमण करने लगा ॥२०॥ उन बावलियों के रमणीय किनारों पर भ्रमण करता हुआ वह, कल्पलता-गृहों में अलङ्कार वती और साथियों के साथ विहार करने लगा ॥२१॥ दिव्य मद्यपान संगीत गोष्ठी और मरुभूति द्वारा किये जाते हुए सुन्दर हास्य विलासों से वह वहाँ अपना मनोरंजन कर रहा था ॥२२॥ इस प्रकार, सास की विद्या के प्रभाव से जाग्रत् रैनों और उद्यान भूमि में विहार करते हुए नरवाहनदत्त ने वहाँ एक मास व्यतीत किया ॥२३॥ तदनन्तर, उस काञ्चनप्रभा द्वारा दिव्य वस्त्रों एवं आभूषणों से अलङ्कृत नरवाहनदत्त अपनी वधू, मन्त्री और काञ्चनप्रभा के साथ उसी विमान द्वारा कौशाम्बी नगरी को लौट आया और उसने अपने माता पिता की आंखों को आनन्दित किया ॥२४ २५॥

४८६ कथासरित्सागर

४८६ कथासरित्सागर तत्र वासवदत्ताया वत्सराजस्य चाग्रतः। अलङ्कारवतीमाह माता सा काञ्चनप्रभा ॥२६॥ युक्तं स्थाप्यस्त्वया भर्त्ता नेष्यन्कोपेन जातुचित्। तत्पापजो हि विरहः पुत्रि गाढानुतापकृत् ॥२७॥ ईर्ष्यावत्या मया पूर्वं युक्तं यत्स्थापितः पतिः । ततोऽद्य पश्चात्तापेन दग्धे तस्मिन् गते वनम् ॥२८॥ इत्युक्त्वा तां समाश्लिष्य बाष्परुद्धनेत्रया । काञ्चनप्रभया जग्मे समुत्पत्य निजं पुरम् ॥२९॥ ततस्तस्मिन् दिने याते प्रातः कृत्वोचिताः क्रियाः । नरवाहनदत्तोऽत्र स्थिते स्वसचिवान्विते ॥३०॥ अलङ्कारवतीपार्श्वं प्रविश्यैव विलासिनी । एकाब्रवीद् भीतभीता देवि स्त्रीं रक्ष रक्ष माम् ॥३१॥ अशोकमालाया कथा एष हि ब्राह्मणो हन्तुमागतो मां बहिःस्थितः । एतद्भयात् प्रविष्टाहं पलाय्य शरणैषिणी ॥३२॥ मा भैषीब्रूहि वृत्तान्तं कोऽस्य किं त्वां विधांसति । इति पृष्ट्वा च सा वक्तुं भूय एव प्रचक्रमे ॥३३॥ अशोकमाला नामाहमस्यामेव पुरि प्रभो । बलसेनाभिधानस्य क्षत्रियस्यात्मसम्भवा ॥३४॥ साहं कन्या सती पूर्वं स्पटकुम्भेन याचिता । हठधर्माभिधानेन विप्रेणार्थवता पितुः ॥३५॥ नाहं दुराकृतिं घोरमुत्समिच्छाम्यमुं पतिम् । दत्ता मासे गृहेऽस्येति पितरं नाहमब्रुवम् ॥३६॥ तच्छ्रुत्वाप्यकरोत्तावद्धठधर्मा गृहे पितुः । प्रायं यावदहं दत्ता तेनास्मै धमभीरुणा ॥३७॥ ततो विवाहानिच्छन्तीमप्यनीषीत् स मां द्विजः । अहं गता च तं त्यक्त्वाऽन्यं क्षत्रियपुत्रकम् ॥३८॥ सार्थमभूतोऽधर्मसन्दधौवसेनेन हठशर्मणा । तद्द्वितीयो मया सत्रकुमारो धनवाञ्छितः ॥३९॥

नवम लम्बक | ४८७

[Page Header] नवम लम्बक | ४८७

कौशाम्बी पहुँचने पर वासवदत्ता और वत्सराज उदयन के सामने माता कांचनप्रभा ने पुत्री अलंकारवती से कहा—॥२६॥ 'बेटी ईर्ष्या और क्रोध से तुम अपने स्वामी को कभी कष्ट न देना। इस पाप से होनेवाला वियोग गम्भीर दुःख और पश्चात्ताप का कारण होता है ॥२७॥ 'मैंने अपने यौवन-काल में ईर्ष्या के कारण पति को कष्ट दिया था इसी कारण आज उनके वन में चले जाने पर पश्चात्ताप और वियोग से जल रही हूँ' ॥२८॥ पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देकर आंसुओं से भरी आँखोंवाली कांचनप्रभा अलंकारवती का आलिंगन करके और आकाश में उड़कर अपनी नगरी को चली गई ॥२९॥ तदनन्तर, प्रातःकालोचित क्रिया (स्नानादि) करके नरवाहनदत्त के मन्त्रियों के साथ बैठे रहने पर एक भयभीता और विलासिनी स्त्री अलंकारवती के पास आकर कहने लगी— 'मेरी रक्षा करो रक्षा करो' ॥३०-३१॥

अशोकमाला की कथा

'यह ब्राह्मण मुझे मारने के लिए बाहर खड़ा है। उसके भय से मैं शरणार्थिनी होकर आपके पास आई हूँ' ॥३२॥ 'डरो मत' अपना हाल बताओ कि वह कौन है और तुम्हें क्यों मारना चाहता है? अलंकारवती के इस प्रकार पूछने पर उसने फिर कहना प्रारम्भ किया—॥३३॥ "हे स्वामिन्, मेरा नाम अशोकमाला है। मैं इस नगरी में बलसेन नामक क्षत्रिय से उत्पन्न हुई हूँ ॥३४॥ जब मैं कुमारी थी तभी मेरे रूप के लोभी हठशर्मा नामक धनी ब्राह्मण ने मुझे मेरे पिता से माँग लिया था ॥३५॥ 'मैं इस बुरी और भीषण आकृतिवाले पुरुष को अपना पति न बनाऊँगी और पिता के दे देने पर भी मैं इसके घर न रहूँगी'—ऐसा मैंने अपने पिता से कहा ॥३६॥ यह सुनकर हठशर्मा ने मेरे पिता के घर पर अनशन प्रारम्भ कर दिया। तब ब्रह्महत्या के भय से मेरे पिता ने मुझे उसे दे दिया ॥३७॥ तदनन्तर, मुझे विवाहित करके मेरे न चाहने पर भी हठशर्मा, मुझे बलात् अपने घर ले गया तब मैंने उसे छोड़कर एक क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥३८॥ हठशर्मा ने राज दण्ड के डर से उसकी उपेक्षा की तो मैं उसे भी छोड़कर दूसरे क्षत्रियकुमार के पास चली गई ॥३९॥

४८८ कथासरित्सागर

४८८ कथासरित्सागर

तस्य चैनाग्निना रात्रौ गत्वोद्दीपितं गृहम्। ततस्तेन विमुक्ताहं तृतीयं क्षत्रियं गता॥४०॥ तस्याप्यादीपितं तेन निशि वेश्म द्विजन्मना। ततस्तेनाप्यहं त्यक्ता सम्प्राप्ता कान्दिशीकताम्॥४१॥ जम्बुकादविवेकेवाथ बिभ्यती हन्तुकामतः। हठधर्मद्विजात्तस्मात् पदात् पदममुञ्चत॥४२॥ इहैव युष्मद्भृत्यस्य बलिनो वीरशर्मणः। राजपुत्रस्य दासी त्वं शरण्यस्याहमाश्रयम्॥४३॥ तद्बुध्वा मयि नैराश्यविधुरो विरहातुरः। खगस्थिरोधः संवृत्तो हठधर्मा स दुर्मतिः॥४४॥ मद्रक्षार्थं प्रवृत्तश्च बन्धनायहू तस्य सः। राजपुत्रो मया देवि वीरशर्मा निवारितः॥४५॥ अद्य मां निर्गतां चैवावृष्ट्वाकृष्टकृपाणिकः। हठशर्मा स हन्तुं मामितो यावत् प्रभाविते॥४६॥ तेनागता पलाय्येह प्रतीहार्या दयार्द्रया। मुक्तद्वारा प्रविष्टोऽङ्ग स च जाने स्थितो बहिः॥४७॥ इत्युक्तवत्यां तस्यां च हठशर्माणमारमन। नरवाहनदत्तस्तमप्रमानायमवृद्विजम् ॥४८॥ क्रोधादधोक्मार्तं घां पश्यन्त दीप्तया दृशा। विकृतं क्षुरिकाहस्त कोपकम्पाङ्गसन्धियम्॥४९॥ उवाच चैनं कुब्रह्मन् स्त्रियं हन्ति वहस्यपि। तदर्थं परवेश्मानि किमचे पापकार्यसि॥५०॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजोऽवादीद्धर्मदारा इयं मम। त्यक्त्वा मां चान्यतो याता सहेय तदहं कथम्॥५१॥ इत्युक्तं तन बिम्बा साऽशोकमाला तदाऽब्रवीत्। भो लोकपाला ब्रूतैतत् किं न युष्मासु साक्षिषु॥५२॥ अनिच्छन्ती हठाधीता विवाहाहुमिहामुना। किं तदा च मया मोक्त नामिष्ये ते गृहृण्विति॥५३॥ एवमुक्ते तया तत्र दिव्या वागभवन्यपात्। यथाशाोकमाख्यं यक्ति सत्यं तयव तत्॥५४॥

पंचम लम्बक ४११

पंचम लम्बक ४११ तब हठशर्मा ने धन के मद में आकर उसके घर में भी एक रात्रि को आग लगा दी। उसके बाद मैंने दूसरे धनी क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥४०॥ तत्पश्चात् हठशर्मा ने आग लगाकर उसका घर भी फूँक डाला। तब उसने भी मुझे छोड़ दिया और मैं मारी-मारी फिरने लगी ॥४१॥ शियार से डरती हुई भेड़ के समान मुझे मारने की इच्छा से मेरा पीछा करते हुए हठशर्मा से मैं दूर-दूर भागती रही ॥४२॥ तब भागते-भागते मैंने इसी राजभवन में घर-सामग्रियों की रक्षा करनेवाले आपके बलवान् सेवक वीरशर्मा का आश्रय लिया और उसकी दासी होना स्वीकार किया ॥४३॥ यह जानकर निराशा से पागल और विरह से व्याकुल हठशर्मा के शरीर में केवल हाड़-मांस ही शेष रह गया ॥४४॥ उसके यहाँ आने पर मेरी रक्षा के लिए हठशर्मा को बाँधने को उद्यत वीरशर्मा को मैंने मना कर दिया ॥४५॥ आज अकस्मात् मुझे बाहर निकली हुई देखकर हठशर्मा छुरा लेकर मुझे मारने के लिए दौड़ा ॥४६॥ इसलिए, भागती हुई मैं यहाँ आई हूँ। दयालु प्रतीहारी ने मेरे लिए दरवाजा खोल दिया और मैं आपके समीप आई; मैं समझती हूँ अभी वह बाहर खड़ा है ॥४७॥" उसके ऐसा कहने पर नरवाहनदत्त ने उस ब्राह्मण हठशर्मा को अपने सामने बुलवाया ॥४८॥ क्रोध के कारण लाल आँखों से अशोकमाला को देखते हुए, क्रोध से काँपते हुए अंगोंवाले और हाथ में छुरा लिये हुए उस भीषण आकृतिवाले हठशर्मा से नरवाहनदत्त ने कहा- ॥४९॥ 'हे दुष्ट ब्राह्मण ! स्त्री को क्यों मारते हो और उसके लिए दूसरों के घरों में आग क्यों लगाते फिरते हो ? तुम ऐसा पाप कार्य क्यों कर रहे हो? ॥५०॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण कहने लगा-'यह मेरी धर्मपत्नी है और मुझे त्याग कर दूसरों के पास चली गई, तो भला मैं कैसे सहन कर सकता'? ॥५१॥ उसके ऐसा कहने पर घबराई हुई अशोकमाला बोली- 'हे लोकपालो, यह तुम्हीं कहो कि क्या तुम्हारी सन्निधि में इस ब्राह्मण ने मुझे हठपूर्वक विवाहित नहीं किया ? और, क्या मेरे न चाहते हुए भी यह मुझे बलात् नहीं ले गया ? क्या उस समय मैंने यह नहीं कहा था कि मैं तेरे घर न रहूँगी ? ॥५२-५३॥ अशोकमाला के इस प्रकार कहने पर दिव्यवाणी हुई-'यह अशोकमाला जो कहती है, वह सच है ॥५४॥ ६२

४५० कथासरित्सागर

४५० कथासरित्सागर न चैषा मानुषी सत्यमेतदीय निशम्यताम्। अस्त्यशोककरो नाम धीरो विद्याधरेश्वरः ॥५५॥ तस्यापुत्रस्य चैकैव देवाज्जज्ञे कन्यका। अशोकमाला नाम्ना सावर्धंस्तस्य पितुर्गृहे ॥५६॥ यौवनस्था च सा तेन दीयमानान्वयार्थिना। न कञ्चिदैच्छद् भर्तारमतिरूपाभिमानतः ॥५७॥ तेन शापमदात् सोऽस्यै निर्बन्धकुपितः पिता। मानुष्यं व्रज नामाऽत्र भविता च स्वमेव ते ॥५८॥ परिणेष्यति चात्र त्वां विरूपो ब्राह्मणो हठात्। तं त्यक्त्वा तद्भयाद् भर्तॄन् क्रमेण त्रीनुपैष्यसि ॥५९॥ ततोऽप्युपद्रुता तेन दासीत्वेनाभियेष्यसि। राजपुत्रं बलीयांसं न चैव स निवत्स्यति ॥६०॥ दृष्ट्वा च धाविते तस्मिन् हन्तुकामे पलायिता। प्रविष्टा राजभवनं शापात्तस्माद्विमोक्ष्यसे ॥६१॥ एव माशोकमाला सा पित्रा विद्याधरी पुरा। क्षप्ता तेनैव नाम्नाऽथ सैषा जाताऽत्र मानुषी ॥६२॥ जातश्च सैष शापान्तोऽमुष्या गत्वाधुना पदम्। वैद्याधरं स्वं तत्रस्था प्रवेक्ष्यति निजां तनुम् ॥६३॥ ततोऽभिरचिताख्येन विद्याधरमहीभुजा। वृतेन भर्त्रा सहिता शापं संस्मृत्य रंस्यते ॥६४॥ इत्युक्त्वा विरतं वाचा दिव्यया सापि तत्क्षणम्। अशोकमाला सहसा गतजीवापतद् भुवि ॥६५॥ दृष्ट्वा च तदलङ्कारवती बाष्पायितेक्षणा। नरवाहनदत्तश्च सत्वास्त्वेस्तौ बभूवतुः ॥६६॥ स तु कुत्सितामर्षो रागाधो विस्रपन्नपि। अकस्माद्दृढशर्माऽभूत्पर्योत्सुकमना द्विजः ॥६७॥ किमेतदिति पृष्टश्च सर्वैर्विप्रो जगाद सः। मया जन्म स्मृतं पूर्वं तच्च वच्मि निशम्यताम् ॥६८॥

नवम लम्बक ४११

नवम लम्बक ४११ यह मानुषी नहीं है। इसका रहस्य सुनो। आषाढ़क नाम का विद्याधरों का एक राजा है॥५५॥ उस पुत्रहीन राजा के यहाँ दैवयोग से यह एक ही कन्या हुई और अंगारमाला के नाम से पिता के घर पर ही यह बड़ी हुई॥५६॥ यौवनप्राप्त इस कन्या ने अपने रूप के घमंड में प्रार्थना करने पर भी किसी का पति नहीं माना ॥५७॥ इसके इस हठ से क्रुद्ध होकर पिता ने इसे शाप दिया कि तू मनुष्य योनि में जा। उस योनि में भी तेरा यही नाम होगा ॥५८॥ मत्त सिंह से क्रुद्ध ब्राह्मण मुझसे विवाह करेगा। तू उसे छोड़कर उत्तर मन्द में अनङ्गप्रभ तीन पत्नियों के पास जायगी ॥५९॥ वहाँ से भी भागकर एक बलवान् राजपूत के पास जायगी। वह तुझे रख लेगा। किन्तु, वहीं उन्मत्त देखकर तेरा पति तुझे मारने के लिए दौड़ेगा तब तू राजभवन में घुसकर इस शाप से मुक्त हो जायगी ॥६०-६१॥ इस प्रकार, पूर्वजन्म में जो अङ्गारमाला नाम की विद्याधरी थी, वही इस पिता के शाप से मानुषी बनी है॥६२॥ अब इसके शाप का अन्त हो गया है और अब वह विद्याधर-लोक में जाकर फिर अपना विद्याधर-शरीर प्राप्त करेगी ॥६३॥ तब वह अमितगति नामक विद्याधर राजा से विवाहित होकर और अपने रूप का स्मरण करके अप्सरासमान बनेगी ॥६४॥ ऐसा कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई और वह अङ्गारमाला भी प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ी ॥६५॥ उसे इस प्रकार देखकर अनङ्गप्रभो और मकरन्ददत्त राजा को सौंप कर चले गए ॥६६॥ यहाँ पर ही उन्होंने उस कन्या का दाह-संस्कार किया और दोनों विलाप करने लगे कि हमारी अकारण रक्षा हो गई किन्तु इस कन्या का ॥६७॥ यह सुन कर उन तपस्वियों ने उस राजा तथा अनङ्गप्रभ आदि दोनों को समझा कर शान्त कर दिया है। ...॥६८॥

४९२ कथासरित्सागर

४९२ कथासरित्सागर स्थूलभुजविद्याधरस्य कथा हिमाद्रावस्ति मदनपुर नामोत्तमं पुरम्। प्रलम्बभुज इत्यस्ति तत्र विद्याधरेश्वरः ॥६९॥ तस्योदपद्यत स्थूलभुजाख्यस्तनयः प्रभो। स च राजसुतो भव्यो यौवनस्थोऽभवत् क्रमात् ॥७०॥ ततः सुरभिदत्ताख्यो विद्याधरपतिः स्वयम्। सकन्यो गृहमागत्य प्रलम्बभुजमाह तम् ॥७१॥ इयं सुरभिदत्ताख्या सुता त्वत्सूनवे मया। दत्ता स्थूलभुजायाद्य गुणवान् स वहत्विमाम् ॥७२॥ तच्छ्रुत्वा प्रतिपद्यैव समाहूय स्वसूनवे। स प्रलम्बभुजस्तस्मायेतमर्थं न्यवेदयत् ॥७३॥ ततः स तं स्थूलभुजो रूपदर्पात् सुतोऽब्रवीत्। परिणेष्ये न चार्तेमां रूपेणैवा हि मध्यमा ॥७४॥ किं पुत्रात्यन्तरूपेण मान्या ह्येषा महान्वया। पित्रा दत्ता मया चात्ता त्वत्कृते मान्त्रया कृथाः ॥७५॥ इत्युक्तश्च पुनस्तेन पित्रा स्थूलभुजः स तत्। नाकरोद्यत्ततस्तं स शशाप कुपितः पिता ॥७६॥ रूपाहङ्कारदोषेण मानुष्येष्वधरामुना। भविष्यसि च तत्र त्वं विकृतो विकटाननः ॥७७॥ भार्यामिष्टोक्तमालाख्यां प्राप्य शापच्युतो हठात्। प्राप्तासि विरहक्लेशममिच्छन्त्या तयोज्झितः ॥७८॥ तस्याश्चान्यप्रसक्तायाः कृते दुःसङ्कधीकृतः। करिष्यस्यग्निदाहादि पातकं रागमोहितः ॥७९॥ इत्युक्तशापं रुदती तं प्रलम्बभुजं तदा। साध्वी सुरभिदत्ता सा पादलग्ना व्यजिज्ञपत् ॥८०॥ देहि शापं ममाप्येवं समास्तु गतिरावयोः। मा भून्मे भर्तुरेकस्य क्लेशो मदपराधतः ॥८१॥ एवमुक्तवतीं तुष्टः साध्वीं तां परिसान्त्वयन्। स प्रलम्बभुजः सूनोरेवं शापान्तमभ्यधात् ॥८२॥

नवम लम्बक ४९१

नवम लम्बक ४९१ स्थूलभुज विद्याधर की कथा "हिमालय पर्वत पर मदनपुर नाम का उत्तम नगर है। वहाँ प्रलम्बभुज नामक विद्याधरों का राजा है। उससे स्थूलभुज नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ यौवन-अवस्था को प्राप्त वह अति सुन्दर और भव्य आकृतिवाला हुआ ॥६९-७०॥ तदनन्तर, सुरभिदत्त नाम का विद्याधरों का स्वामी अपनी कन्या के साथ प्रलम्बभुज के घर पर आकर बोला-'यह सुरभिदत्ता नाम की मेरी कन्या है। यह मैंने तुम्हारेपुत्र स्थूलभुज को प्रदान की है। अतः वह इसके साथ विवाह करे' ॥७१-७२॥ यह सुनकर और सम्बन्ध को स्वीकार करके प्रलम्बभुज ने अपने पुत्र स्थूलभुज को बुलाकर उससे यह बात कह दी ॥७३॥ तब वह स्थूलभुज रूप के घमंड में आकर बोला-'पिताजी मैं इससे विवाह न करूँगा क्योंकि यह रूप में मध्यम है' ॥७४॥ 'बेटा बहुत अच्छे रूप से क्या करना है? उच्च वंश की यह कन्या मान्य है। पिता ने इसे दिया और मैंने तुम्हारे लिए ले लिया।' अब तुम इधर-उधर न करो' ॥७५॥ पिता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी स्थूलभुज ने उसकी बात न मानी तो पिता ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया—॥७६॥ 'अब तू अपने रूप के घमंड के दोष से मर्त्यलोक में उत्पन्न हो। मनुष्य-लोक में तू भयानक रूप और आकृतिवाला होगा ॥७७॥ तू शाप से च्युत अशोकमाला नाम की पत्नी को हठपूर्वक प्राप्त करेगा वह तुझे न चाह कर छोड़ देगी। इससे तुझे वियोग-दुःख प्राप्त होगा। जब वह दूसरों से प्रेम करेगी तब तू उसके वियोग-दुःख से अत्यन्त दुर्बल हो जायगा और प्रेम से मोहित होकर अग्निदाह आदि पाप करेगा' ॥७८-७९॥ पुत्र को इस प्रकार शाप देते हुए प्रलम्बभुज के चरणों में गिरकर रोती हुई सुरभिदत्ता कहने लगी—'मेरे अपराध से एकमात्र मेरे पति को ही शाप का दुःख न हो अतः मेरे लिए भी आज्ञा कीजिए' ॥८०-८१॥ ऐसा कहती हुई उस साध्वी सुरभिदत्ता को धैर्य देते हुए प्रसन्न प्रलम्बभुज ने स्थूलभुज के शाप का इस प्रकार अन्त किया—॥८२॥

४२४ कथासरित्सागर

४२४ कथासरित्सागर यदैवाशोकमालायाः शापमोक्षो भविष्यति । तदैव जातिं स्मृत्वाय शापादस्माद् विमोक्ष्यते ॥८३॥ प्राप्य च स्वतनू शापं संस्मरन्निरहङ्कृतिः । अचिरात्त्वां विवाहोढः स्वयुक्तो भविता सुखी ॥८४॥ इत्युक्ता तेन सा साध्वी व्यजिह्ववृत्तिमाश्रये । तं च पानीस मां स्पूसमुञ्ज धापाविह च्युतम् ॥८५॥ दृष्ट मया चाहङ्कारदोषोऽवृष्टसमिद महत् । पुंसामदृष्टे दृष्टे वा श्रेयोऽहङ्कारिणां कुत ॥८६॥ क्षीणो मे स च शापोऽद्येत्युक्त्वा मुक्त्वा च तां तनुम् । हृत्पद्मं स सम्पेदे विद्याधरकुमारकः ॥८७॥ अशोकमालादेहं च नीत्वा विद्याप्रभावतः । अदृश्यमेव निक्षेप गङ्गायामानुषस्यतः ॥८८॥ विद्याप्रभापानीतैष्व तस्तोयैरभितः क्षणात् । अक्षाळयदरुङ्कारवतीवासगृहं स तत् ॥८९॥ नरवाहनदत्तं च नत्वा तं भाविनं प्रभुम् । स्वकार्यसिद्धये प्रायादुत्पत्य स नभस्तलम् ॥९०॥ विस्मितेष्वथ सर्वेषु प्रसङ्गात्तत्र गोमुखः । अनङ्गरतिसम्बद्धामिमामकथयत् कथाम् ॥९१॥ अनङ्गरतिकथा अस्ति शूरपुरं नाम यथार्थं नगरं भुवि । महावराह इत्यासीद्राजा तत्रातिदुर्मदः ॥९२॥ गौर्याराधनतस्तस्य देव्याः पद्मरती सुता । जज्ञेऽनङ्गरतिर्नानि भूपस्यानन्दसन्ततेः ॥९३॥ कालेन यौवनारूढा सा च रूपाभिमानिनी । नेच्छति स्म पतिं कञ्चिद्याचमानेषु राजसु ॥९४॥ यः शूरो रूपवानेकं विज्ञानं वेत्ति शोभनम् । तस्मै मयात्मा दातव्य इत्युवाच तु निश्चयात् ॥९५॥ अथ तत्राययुर्वीराश्चत्वारो दक्षिणापथात् । तन्नृपेप्सव शूरोदन्तास्तवीप्सितगुणान्विताः ॥९६॥

नवम लम्बक ४५५

नवम लम्बक ४५५

जब अशोकमाला का शाप-मोक्ष होगा तभी यह भी जाति-स्मरण करके शाप से मुक्त हो जायगा ॥८३॥ और पुनः अपने विद्याधर-शरीर को प्राप्त कर शाप का स्मरण करते हुए अभिमान रहित होकर शीघ्र ही तुझसे विवाह करेगा और तेरे साथ सुखपूर्वक रहेगा' ॥८४॥ प्रलम्बभुज के इस प्रकार कहने पर उस पतिव्रता ने किसी प्रकार धीरज धारण किया। अतः आपलोग मुझे वही शापमुक्त स्थूलभुज समझें ॥८५॥ मैंने अभिमान के कारण यह दुःख प्राप्त किया। सच है अभिमानी पुरुषों का जाने या अनजाने कल्याण कैसे हो सकता है? ॥८६॥ 'आज मेरा वह शाप समाप्त हुआ' ऐसा कहकर स्थूलभुज ने मानव-शरीर का त्याग कर दिव्य विद्याधरकुमार का रूप धारण किया ॥८७॥ और, अपनी विद्या के प्रभाव से अशोकमाला के शव को अदृश्य रूप से ही गंगा में प्रवाहित कर दिया तथा विद्या के प्रभाव से मँगाये गये गंगाजल से अलंकारवती के श्राद्ध-मज्जन को धो दिया ॥८८-८९॥ एवं अपने भावी स्वामी नरवाहनदत्त को प्रणाम करके अपनी कार्य-सिद्धि के लिए आकाश में उड़ गया ॥९०॥ इस घटना के कारण वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के आश्चर्य चकित हो जाने पर गोमुख ने अनंगरति की कथा प्रारम्भ की ॥९१॥ अनंगरति की कथा इसी पृथ्वी पर यथार्थ नामवाला शूरपुर नगर है। वहाँ महावराह नाम का अत्यन्त बलशाली राजा था ॥९२॥ सन्तानहीन उस राजा को पद्मरति नाम की रानी से अनंगसुन्दरी नाम की कन्या उत्पन्न हुई ॥९३॥ कालक्रम से युवावस्था में चढ़ी हुई रूपवती अनंगरति ने अनेक राजाओं के माँगने पर भी किसी को पति बनाना स्वीकार नहीं किया ॥९४॥ और, दृढ़ निश्चय के साथ कहा कि जो शूर-वीर, रूपवान् तथा किसी विशेष विज्ञान का वेत्ता होगा उसे ही मैं अपने को दूँगी ॥९५॥ कुछ समय के अनन्तर राजकुमारी का समाचार सुनकर उसकी इच्छा से विवाह करने के लिए दक्षिणापथ से चार वीर, राजा महावराह के पास आये ॥९६॥

द्वाःस्थैरावेदितांस्तांश्च प्रविष्टान् पृच्छति स्म सः । महावराहो नृपतिरनङ्गरतिसन्निधौ ॥९७॥ नाम किं कस्य युष्माकं जातिर्विज्ञानमेव च । एतद्राजवचः श्रुत्वा तेष्वेकोऽस्तं व्यजिज्ञपत् ॥९८॥ पञ्चपट्टिकनामाहं शूद्रो विज्ञानमस्ति मे । वयामि प्रत्यहं पञ्च पट्टिकायुगलानि यत् ॥९९॥ तेभ्य एकं प्रयच्छामि ब्राह्मणाय ददामि च । द्वितीयं परमेशाय तृतीयं च वसे स्वयम् ॥१००॥ चतुर्थं मे भवेद् भार्या यदि तस्यै ददामि तत् । शरीरयात्रां विक्रीय पञ्चमेन करोम्यहम् ॥१०१॥ अथ द्वितीयोऽप्याचख्यावहं भाषाज्ञसंज्ञकः । वैश्यो रुतं विजानामि सर्वेषां मृगपक्षिणाम् ॥१०२॥ ततस्तृतीयोऽप्यवददहं खड्गधराभिधः । क्षत्रियः खड्गयुद्धेन जीये नान्येन केनचित् ॥१०३॥ चतुर्थश्चाब्रवीज्जीवदत्ताख्योऽहं द्विजोत्तमः । गौरीप्रसादविद्याभ्यां जीवयामि मृतां स्त्रियम् ॥१०४॥ एवमुक्तवतां तेषां शूद्रविट्क्षत्रियास्त्रयः । रूपं शौर्यं बलं चैव शशंसुः पृथगात्मनः ॥१०५॥ ब्राह्मणो रूपवर्जं तु बलशौर्यं शशंस सः । ततो महावराहः स्वं क्षत्तारमवदन्नृपः ॥१०६॥ नीत्वा विश्रामयैतांस्त्वं सम्प्रति स्वगृहेऽखिलान् । तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा क्षत्ता त्वानानयद्गृहम् ॥१०७॥ ततोऽब्रवीत् स राजा तामनङ्गरतिमात्मजाम् । एषां चतुर्णां वीराणां पुत्रि कोऽभिमतस्तव ॥१०८॥ शूद्रश्च वायकर्मकः क्रियते तस्य किं गुणैः । वैश्यो द्वितीयः पक्ष्यादिरुतिज्ञश्च तस्य किम् ॥१०९॥ श्रुत्वैतत्पितरं तं सा प्राहानङ्गरतिस्तथा । चतुर्णामपि तातैषां न कोऽप्यभिमतो मम ॥११०॥ ताभ्यां कथमहं दद्यामात्मानं क्षत्रिया सती । तृतीयस्तुल्यवर्णो मे भवति क्षत्रियो गुणी ॥१११॥ किं तु सेवोपजीवी स दरिद्रः प्राणविक्रयी । पृथ्वीपतिसुता भूत्वा कथं स्यां तस्य गेहिनी ॥११२॥

सप्तम लम्बक ४१७

सप्तम लम्बक ४१७ द्वारपाल द्वारा सूचना पाकर अन्दर आये हुए उनसे राजा महावराह ने अनंगरति के सामने ही पूछा—॥१९७॥ 'तुम्हारा नाम क्या है, जाति क्या है और कौन-सा विशेष विज्ञान तुमलोग जानते हो ?' राजा के प्रश्नों को सुनकर उनमें से एक ने कहा—॥१९८॥ 'मैं पंचपट्टिक नाम का शूद्र (जुलाहा) हूँ। बुनने का विज्ञान जानता हूँ और प्रतिदिन पाँच जोड़े कपड़े बुनता हूँ ॥१९९॥ उन पाँच जोड़ों में से एक ब्राह्मण को देता हूँ, दूसरा जोड़ा ईश्वर को अर्पण करता हूँ, तीसरा स्वयं पहनता हूँ और चौथा जोड़ा यदि मेरी पत्नी हो तो उसे दूँ और पाँचवें जोड़े को बेचकर जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥१ १ ॥ तब दूसरा बोला—'मैं भाषाविज्ञानी वैश्य हूँ। सभी मृगों और पक्षियों की बोलियों को जानता हूँ' ॥१ २॥ तब तीसरा बोला—'मैं खड्गधर नाम का क्षत्रिय हूँ और खड्ग के अतिरिक्त मैं अन्य किसी वृत्ति से जीवन-निर्वाह नहीं करता' ॥१ ३॥ तदनन्तर चौथा बोला—'मैं जीवदत्त नाम का ब्राह्मण हूँ। पार्वती की कृपा और विद्या के प्रभाव से मरी हुई स्त्री को जिला लेता हूँ' ॥१ ४॥ ऐसा कहते हुए शूद्र, क्षत्रिय और वैश्य तीनों ने अपने रूप, शौर्य और बल की अलग- अलग प्रशंसा की किन्तु ब्राह्मण ने रूप को छोड़ केवल बल-मात्र की बात कही। यह सुनकर राजा महावराह ने अपने द्वास्थ (प्रतीहार) से कहा कि 'तुम इन सब को अपने घर ले जाकर विश्राम कराओ'। यह सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर द्वास्थ उन्हें अपने घर ले गया ॥१ ५—१ ७॥ उनके चले जाने पर राजा ने अपनी कन्या अनंगरति से कहा 'कहो इन चारों वीरों में से तुम किसे चाहती हो ?' ॥१ ८॥ यह सुनकर वह अनंगरति पिता से बोली—'पिता इन चारों में से एक भी मुझे पसन्द नहीं है ॥१ ९॥ इनमें एक शूद्र और जुलाहा है, इस गुण से क्या लाभ ? दूसरा वैश्य पशुओं की बोलियाँ जानता है, उसके जानने से भी क्या लाभ ? मैं क्षत्रिया होकर अपने को वैश्य और शूद्र को कैसे दे दूँ ? तीसरा मेरी समान जाति का क्षत्रिय गुणी तो है, किन्तु वह सेवा से जीवन व्यतीत करनेवाला दरिद्र और प्राणों को बेचनेवाला है। मैं पृथ्वीपति की कन्या होकर उस नौकर की पत्नी कैसे बनूँ ॥११०-११२॥ ५३

४१८ कथासरित्सागर

४१८ कथासरित्सागर चतुर्थो ब्राह्मणो जीवदतोऽप्यभिगतो न मे। स विरूपो विकर्मस्थः पतितो वेदवर्जितः ॥११३॥ स ते दण्डयितुं युक्तः किं नु तस्मै ददासि माम्। वर्णाश्रमाणां धर्मस्य राजा त्वं ह्यत रक्षिता ॥११४॥ खड्गशूराच्च नृपतेर्धर्मशूरः प्रशस्यते। खड्गशूरसहस्राणां धर्मशूरो भवेत् पतिः ॥११५॥ इत्याद्युक्तवतीमेतां सुतामन्तःपुरं निजम्। विसृज्य च समुत्तस्थौ स्नानाद्यर्थं स भूपतिः ॥११६॥ द्वितीयेऽह्नि च ते वीरा गृहात् क्षत्तुर्विनिर्गताः। बभ्रमुर्नगरे तत्र चत्वारोऽपि सकौतुकाः ॥११७॥ तावच्च पद्मकदलो नामात्र व्यालवारणः। भग्नालानो जनं मथ्नन्काशाया निरगान्मदात् ॥११८॥ सोऽप्यधावच्च तान् दृष्ट्वा वीरान् हन्तुं महागजः। ते चापि तस्याभिमुखं प्राधावन्नुद्यतायुधाः ॥११९॥ ततः खड्गधराख्यो यस्तन्मध्ये क्षत्रियः स तान्। अन्यान्निवार्य मीनको गजमभ्यापपात तम् ॥१२०॥ लुलाव च करं तस्य गर्जतोऽग्रप्रसारितम्। एकेनापि प्रहारेण विक्रत्सन् दावहस्तया ॥१२१॥ पादमध्ये च निर्गत्य दर्शयित्वा च लाघवम्। प्रहारं प्रददौ पृष्ठे द्वितीयं तस्य दम्भिनः ॥१२२॥ तृतीयेन च विच्छेद तस्य पादावुभावपि। ततो मुक्तारटिर्हस्ती पपात च ममार च ॥१२३॥ तं दृष्ट्वा विक्रमं तस्य जनः सर्वो विसिस्मये। राजा महावराहस्तद्बुद्ध्वा चित्रीयते स्म च ॥१२४॥ अन्यद्युः स गजारूढो मृगयाय नृपो ययौ। वीराः खड्गधराद्यास्ते चत्वारोऽपि समन्वयुः ॥१२५॥ तत्र व्याघ्रमृगक्रोडांन् ससैन्ये राज्ञि निघ्नति। अधावन् कुपिताः सिंहाः श्रुतवारणबृंहिताः ॥१२६॥ १ चीत्कारं कुर्वन्नित्यर्थः।

नवम लम्बक ४९९

नवम लम्बक ४९९

चौथा ब्राह्मण जीवदत्त भी मुझे पसन्द नहीं है। वह कुरूप, कर्महीन, वेदरहित और पतित है ॥११३॥ वह तो तुम्हारे लिए दंड देन योग्य है। हे पिता! तुम तो वर्णों और आश्रमों के रक्षक और धर्म के प्रतिपालक हो ॥११४॥ हे राजन्, खड्गशूर से धर्मशूर अधिक प्रशंसनीय है। हजारों खड्गशूरों का एक धर्मशूर स्वामी हो सकता है ॥११५॥ इस प्रकार कहती हुई अपनी कन्या को निवास-स्थान के लिए विदा कर, राजा स्नान आदि के लिए उठ गया ॥११६॥ दूसरे दिन वे चारों क्षत्रियी वीर, द्यूता के घर से निकल और नगर देखने की इच्छा से भ्रमण करने लगे ॥११७॥ इसी बीच पद्मकलश नाम का मदान्मत्त दुष्ट हाथी साँकल तोड़कर जनता को रौंदता हुआ गजशाला से बाहर निकल आया ॥११८॥ उस हाथी ने उन चारों वीरों को देखकर, उन पर आक्रमण कर दिया। वे भी अपने- अपने शस्त्रों को उठाकर हाथी की ओर दौड़ पड़े ॥११९॥ उन में से खड्गधर नामक क्षत्रिय वीर ने और तीनों को हटाकर अकेले ही हाथी का सामना किया ॥१२०॥ और चिंघाड़ते हुए हाथी की सूँड को उसने एक ही प्रहार से कमलनाल के समान काट दिया ॥१२१॥ और पैंतरा बदलकर उसके पैरों के नीचे से निकलकर उसकी पीठ पर दूसरा प्रहार किया ॥१२२॥ उसने तीसरे प्रहार में उसके पैर काट डाले तो चिल्लाता हुआ हाथी भूमि पर गिर पड़ा और मर गया ॥१२३॥ उसके इस पराक्रम को देखकर सभी लोग चकित रह गये और राजा महावराह भी यह सब सुनकर विस्मित हुआ ॥१२४॥ दूसरे दिन वह राजा हाथी पर बैठकर शिकार के लिए वन में गया और वे चारों वीर भी उसके पीछे गये ॥१२५॥ शिकार के समय सेना के साथ राजा के अनेक बाघों, मृगों और सूअरों के मार देने पर हाथियों के चिंघाड़ सुनकर क्रुद्ध सिंह चारों ओर से राजा की ओर दौड़ पड़े ॥१२६॥

५० कथासरित्सागर

५० कथासरित्सागर अभ्यापतन्तमेकं च सिंहं खड्गधरोऽथ सः। एकेन तीक्ष्णनिस्त्रिंशप्रहारेण द्विधाऽकरोत् ॥१२७॥ द्वितीयं च गृहीत्वैव चरणे वामपाणिना। आस्फोट्य भूतले सिंहं चकार गतजीवितम् ॥१२८॥ भापाङ्गो जीवदत्तश्च पञ्चपट्टिक एव च। एकैकं सिंहमेकैकं तथैवास्फोटयन् भुवि ॥१२९॥ एवं क्रमेण ते राज्ञः पश्यतः पादचारिभिः। लीलया बहवो वीरैः सिंहव्याघ्रादयो हताः ॥१३०॥ ततः सविस्मयस्तुष्टः कृताखेटः स भूपतिः। विवेश स्वपुरं तेऽपि वीराः स्वगृहं ययुः ॥१३१॥ स च राजा प्रविश्यान्तःपुरं श्रान्तोऽपि तत्क्षणम्। तत्रैवानाययामास तामनङ्गरतिं सुताम् ॥१३२॥ आख्याय तेषां वीराणामेकैकस्य पराक्रमम्। आखेटके यथादृष्टं तामुवाचातिविस्मिताम् ॥१३३॥ पञ्चपट्टिकभापाङ्गावसवर्णावुभौ यदि। विप्रोऽपि जीवदत्तश्चेद्रूपहीनो विकर्मकृत् ॥१३४॥ तत्क्षत्रियस्य दोषोऽस्ति तस्य खड्गधरस्य कः। सुप्रमाणसुरूपस्य बलविक्रमशालिनः ॥१३५॥ येन हस्ती हतस्तावद् यः पिनष्टि च भूतले। गृहीत्वा पादतः सिंहान् खड्गेनान्यान्निहन्ति च ॥१३६॥ दरिद्रः सेवकश्चेति दोषस्तस्योच्यते यदि। अहं तं सेव्यमन्येषां करिष्यामीश्वरं क्षणात् ॥१३७॥ तत्तं वृणीष्व भर्तारं यदि ते पुत्रि रोचते। इत्युक्ता तेन सानङ्गरतिः पित्रा जगाद तम् ॥१३८॥ सद्गुणीतेषु सर्वेषु तेषु वीरेष्विह त्वया। गणकः पृच्छ्यतां तावत् पश्यामः किं ब्रवीति सः ॥१३९॥ एवं तयोक्तः स नृपो वीरानानाम्य सत्र तान्। तत्सन्निधौ सानुरोधः पप्रच्छ गणकं स्वयम् ॥१४०॥ पश्यानङ्गरतेरेषां मध्यात् केन समं मिथः। ग्रहस्यानुकूल्यं लग्नञ्च भवेत् तस्याः सदा शुभम् ॥१४१॥

नवम लम्बक ५१

नवम लम्बक ५१ आक्रमण करते हुए एक सिंह को वीर खड्गधर ने तलवार के एक ही प्रहार से दो टुकड़े करके मार डाला ॥१२७॥ और, दूसरे सिंह के पैरों को बायें हाथ से पकड़कर और घुमाकर पृथ्वी पर पटककर मार डाला ॥१२८॥ इसी प्रकार भाषा-विज्ञानी वैश्य ब्राह्मण और पंचपट्टिक शूद्र आदि तीनों वीरों ने पैदल चलते हुए ही राजा के सामने अनेक सिंह बाघ आदि को पृथ्वी पर पटक-पटककर सहज ही में मार डाला ॥१२९-१३०॥ तब आश्चर्य के साथ सन्तुष्ट राजा शिकार खेलकर नगर को लौट आया और वे चारों वीर दाता के घर पर, अपने निवास-स्थान को चल गये ॥१३१॥ तब राजा ने श्रान्त होते हुए भी उसी समय अपने रनिवास में जाकर वहीं अनंगरति को बुलवाया और शिकार के समय उन वीरों का जो पराक्रम और कौतुक देखा था सब उस बहू सुनाया। यह सब सुनकर और जानकर वह भी अत्यन्त चकित हुई ॥१३२-१३३॥ राजा ने कहा—'बेटी पंचपट्टिक और भाषाविज्ञानी ये दोनों यद्यपि समान वर्ण (जाति) के नहीं हैं और यदि ब्राह्मण जीवदत्त कुरूप और कुत्सित कर्म करनेवाला है तो क्षत्रिय खड्गधर का क्या दोष है? उसका कुल और रूप भी सुन्दर है तथा वह शूर और पराक्रम शाली है ॥१३४-१३५॥ जिसने एक मदोन्मत्त और पागल हाथी को मार दिया और जो सिंहों को पकड़कर भूमि पर पछाड़कर, मसल डालता है और खड्ग से उनके दो टुकड़े कर डालता है ॥१३६॥ यदि तुम उसके ये दो दोष बताती हो कि वह दरिद्र है और सेवक है तो मैं उसे राज भर में दूसरों से सेवा किये जाने योग्य अर्थात् राजा बना दूँगा ॥१३७॥ इसलिए बेटी यदि तुम्हें वह अच्छा लगे तो उसे पति बना लो। पिता द्वारा इस प्रकार कही गई अनंगरति बोली—॥१३८॥ 'लगी बात है तो सब को यहीं बुलाकर और ज्योतिर्विदों को भी बुलवाकर पूछो कि वे क्या बतलाते हैं॥१३९॥ यह सुनकर राजा ने उन वीरों को बुलवाकर उनके सामने ही ज्योतिषी से अनुराग के साथ स्वयं पूछा—॥१४०॥ 'देखो इन चारों में अनंगरति के साथ किसकी कुण्डली मिलती है और उसके विवाह का लग्न कब कब है ? ॥१४१॥

[Page Header] ५२ कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वा पृष्टनक्षत्रस्तेषां स गणकोत्तमः । गणयित्वा चिरं कालं राजानं तमभाषत ॥१४२॥ न चेत् कुप्यसि मे देव स्फुटं विज्ञापयामि तत् । अस्ति त्वद्दुहितुर्नेषामेकेनाप्यनुकूलता ॥१४३॥ न चेहास्ति विवाहोऽस्या एषा शापच्युतात्र यत् । विद्याधरी स शापोऽस्यास्त्रिभिर्मासैर्निवर्त्स्यति ॥१४४॥ तस्मान् मासत्रयं तावत् प्रतीक्षन्ताममी इह । नैषां स्वलोकं याता चेत्तत एतद् भविष्यति ॥१४५॥ एतन्मौहूर्तिकस्यास्य वचः सर्वेऽपि तत्र ते । श्रद्दधुस्तत्र चैवासन् वीरा मासत्रयावधि ॥१४६॥ गते मासत्रये राजा तान् वीरान् गणकं च सम् । स्वाग्रमानाययामास तामनङ्गरतिं च सः ॥१४७॥ दृष्ट्वा चाधिकसौन्दर्याम कस्मात् तां सुतां नृपः । बह्वर्षं गणकस्तां तु प्राप्तकालममन्यत ॥१४८॥ इदानीं ब्रूहि यद्युक्तं त हि मासास्त्रयो गताः । इति यावच्च तं राजा गणकं पृच्छति स्म सः ॥१४९॥ तावज्जातिं निजां स्मृत्वा सानङ्गरतिराननम् । आच्छाद्य स्वोत्तरीयेश मानुषीं तां तनुं जहाौ ॥१५०॥ एवमेषा स्थिता किंस्विदिति राजा स्वयं मुखम् । यावदुद्घाटयते तस्यास्तावत् सा ददृशे मृता ॥१५१॥ व्यामुक्त्तनेत्रभ्रमरा विवर्णवदनाम्बुजा । हप्तमञ्जुस्वना मुक्ता पद्मिनीव हिमाहता ॥१५२॥ ततः स सद्यस्तच्छोकवज्रपाताहतो भुवि । भूभृत् पपात निर्घोषः स्वपक्षच्छेदमुच्छ्रितः ॥१५३॥ राज्ञी पद्मवती सापि व्यामोहपतिता ययौ । भ्रष्टामरणपुष्पा क्ष्मामिभमग्नेव मञ्जरी ॥१५४॥ मुक्ताक्रन्दे परिजने तेषु वीरेषु दुःखिषु । सम्भ्रमांत क्षणाद्राजा जीववत्तमुवाच तम् ॥१५५॥


[Footnote] १ भू भृतः । राज्ञः पर्वतस्य च श्लेषेण वर्णनम् ।

नवम लम्बक ५१

नवम लम्बक ५१ यह सुनकर और गणक ने उन चारों के नक्षत्र पूछकर और कुछ समय तक विचार कर लेने के उपरान्त राजा से कहा—॥१४२॥ महाराज यदि आप क्रोध न करें तो स्पष्ट ही कहता हूँ कि इन चारों में एक के साथ भी तुम्हारी कन्या की कुंडली नहीं मिलती। और, इस कन्या का विवाह भी इस लोक में न होगा। क्योंकि यह शाप के कारण मनुष्य-जन्म में उत्पन्न हुई विद्याधरी है। आगामी तीन महीनों में इसका वह शाप दूर होगा ॥१४३—१४४॥ इसलिए, ये लोग तीन मास तक यहाँ रहकर प्रतीक्षा करें तदनन्तर यह कन्या यदि अपने विद्याधर-लोक में न गई, तो इसका इस लोक में विवाह हो सकेगा' ॥१४५॥ इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने ज्योतिषी की बातों में विश्वास प्रकट किया और वे चारों वीर तीन मास तक वहीं रहे ॥१४६॥ तीन महीने बीतने पर राजा ने उन चारों वीरों ज्योतिषी और अनंगरति को फिर बुलवाया। ज्योतिषी ने उस समय कन्या को अधिक सुन्दर देखकर उसका अन्तिम समय निकट आया जान लिया ॥१४७-१४८॥ अब कहो तीन मास बीत गये। इस प्रकार जैसे ही राजा ने ज्योतिषी से पूछा तबतक अनंगरति ने अपनी साड़ी के आंचल से अपना मुंह ढक लिया और उस मानव शरीर का परित्याग कर दिया ॥१४९-१५०॥ यह इस प्रकार मुँह ढककर क्यों बैठी है? ऐसा सोचकर राजा ने जब उसका मुंह स्वयं खोलकर देखा तब उसे मरी हुई पाया ॥१५१॥ वह हिम से मारी हुई कमलिनी के समान हो गई थी उसके नेत्र-रूपी भ्रमर उड़ते हुए थे मुख-कमल तेजोहीन था और अब उसके मुख में हंस के समान मधुर वाणी न थी ॥१५२॥ उसे मृत देखकर शोक-रूपी वज्र से मारा हुआ-सा और अपने पक्ष (पक्ष) के कटने से मूर्च्छित वह राजा (पर्वत) भूमि पर गिर पड़ा ॥१५३॥ उसकी माता पद्ममति भी हाथी से उखाड़ फेंकी गई लता के समान और अपने आभूषण रूपी पुष्पों के गिर जाने पर शून्य-सी होकर मूर्च्छित हो गई ॥१५४॥ अन्य भी परिजन सब लोग और वे चारों वीर भी अत्यन्त दुःखी हो गये। इतने में ही राजा ने स्वस्थ होश में आकर जीवदत्त से कहा ॥१५५॥