कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२१ दधि च मधु च ब्राह्मो मधुपर्कः ॥१॥ पायस ऐन्द्रो मधुपर्कः ॥२॥ मधु चाज्यं च सौम्यो मधुपर्कः ॥३॥ मन्थश्चाज्यं च पौष्णो मधुपर्कः ॥४॥ क्षीरं चाज्यं च सारस्वतो मधुपर्कः ॥५॥ सुरा चाज्यं च मौसलो मधु- पार्कः ॥६॥ स खल्वेष द्वये भवति सौत्रामण्यां च राज- सूये च ॥७॥ उदकं चाज्यं च वारुणो मधुपकः ॥८॥ तैलं चाज्यं च श्रावणो मधुपर्कः ॥९॥ तैलञ्च पिण्डञ्च पारि- व्राजको मधुपर्कः ॥१०॥ इति खल्वेष नवविधो मधुपर्को भवति ॥११॥ अथास्मै गां वेदयन्ते गौर्भो इति ॥१२॥ तान्प्रतिमन्त्रयते । भूतमसि भवदस्यन्नं प्राणो बहुर्भव । ज्येष्ठं यन्नाम नामत ओं भूर्भुवः स्वर्जनदोमिति ॥१३॥ अतिसृजति । मातादित्यानां दुहिता वसूनां स्वसा रुद्रा- णाममृतस्य नाभिः । प्र णो वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥ ओं तृणानि गौरत्त्वित्याह ॥१४॥ सूयवसादिति प्रतिष्ठमानामनुमन्त्रयते ॥१५॥ ना- लोहितो मधुपर्को भवति ॥१६॥ नानुज्ञानमधीमह इति दही और मधु ब्राह्म मधुपर्क है । १॥ पायस ऐन्द्र मधुपर्क है ॥२॥ मधु एवं घृत सौम्य मधुपर्क है। ३॥ मन्थ और आज्य पौष्ण मधुपर्क है॥४॥ क्षीर और आज्य सारस्वत मधुपर्क है । ५॥ मदिरा और घृत मोसल मधु- पर्क है ॥६॥ सो यह दो ही यज्ञों में होता है एक सौत्रामणी में और दूसरा राजसूय यज्ञ में ॥ ७ ॥ जल और घृत का वारुण मधुपर्क होता है ॥ ८ ॥ तैल और आज्य श्रावण मधुपर्क होता है । ९ ॥ तैल और पिण्ड पारिव्राजक मधुपर्क है ॥ १० ॥ इस प्रकार मधुपर्क नौ प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ यहाँ गो लाई जाती है—गौर्भोः ॥ इसका प्रतिमंत्रण “भूतमसि०” इत्यादि पढ़ कर गौ को छोड़ देवे। छोड़ते समय “मातादित्यानां०” इत्यादि पढ़कर गौ को छोड़ देवे “वह घास खावे”—ऐसा कहे ॥१४॥ “सूयवसात्०” से गौ को प्रतिष्ठ- मान करते हुए अनुमंत्रण करे ॥ १५ ॥ बिना मांस के मधुपर्क नहीं
२२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । कुरुतेत्येव ब्रूयात् ॥१७॥ स्वधिते मैनं हिंसीरिति शस्त्रं प्रयच्छति ॥१८॥ पाप्मानं मेऽप जहीति कर्त्तारमनुमन्त्रयते ॥१९॥ आग्नेयीं वपां कुर्युः ॥२०॥ अपि वा ब्राह्मण एव प्राश्नीयात्तद्देवतं हि तद्धविर्भवति ॥२१॥ अथास्मै स्नानमनुलेपनं मालाभ्यञ्जनमिति ॥२२॥ यदत्रोपसमाहार्यं भवति तदुपसमाहृत्य ॥२३॥ अथोपासकाः प्राप्योपास- काः स्मो भो इति वेदयन्ते ॥२४॥ तान् प्रतिमन्त्रयते । भूयांसो भूयास्म ये च नो भूयसः कार्ष्ठापि च नोऽन्ये भूयांसो जायन्ताम् ॥२५॥ अस्य च दातुरिति दातार- मीक्षते ॥२६॥ अथान्नाहाराः प्राप्यान्नाहाराः स्मो भो इति वेदयन्ते ॥२७॥ तान्प्रतिमन्त्रयते । अन्नादा भूया- स्म ये च नोऽन्नादान्कार्ष्ठापि च नोऽन्येऽन्नादा भूयांसो जायन्ताम् ॥२८॥ अस्य च दातुरिति दातारमीक्षते ॥२९॥ आहृतेऽन्ने जुहोति यत्काम कामयमाना इत्येतया ॥३०॥ यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः । तन्नः सर्वं होता है ॥१६॥ हम लोग विधि का उल्लङ्घन नहीं कर सकते अतएव “करो” ऐसा ही बोले ॥१७॥ “स्वधिते मैनं हिंसीः०” से शस्त्र को देवे ॥ १८॥ “पाप्मानं मेऽपजहि” से कर्त्ता को अनुमंत्रण करे ॥१९॥ आग्नेयी वपा को करें ॥२०॥ या ब्राह्मण ही खावे उसी देवताक हवि होती है ॥२१॥ इसके लिये स्नान, चन्दन, अनुलेपन, माला, अञ्जन लावे ॥२२॥ जो २ पदार्थ इसके लिये लाना पड़े उस २ को पहिले से लाकर घरे ॥२३॥ वस्त्रादि अलंकार सहित सब लाकर सब अर्ध्य को देवे और कहे कि “हमलोग आप के उपासक हैं” यह दाता कहे ।॥२४॥ उनको प्रतिमंत्रण करे—“भूयांसो भूयास्म०” इत्यादि पढ़कर इसके दाता को देखे ॥२५॥२६॥ अब कहते हैं “अन्नाहाराः प्राप्यान्नाहाराः स्मो भो” ऐसा जतळावे ॥२७॥ इनको प्रतिमंत्रण करे “भूयास्म०” इत्यादि पढ़े ॥ “अस्य च दातुः०” से दाता को देखे ॥२८॥२९॥ अन्न लाने पर “यत्काम०”
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२३
समृद्ध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहेति ॥३१॥ एष आचा-
र्यकल्प एष ऋत्विकल्प एष संयुक्तकल्प एष विवाह-
कल्प एषोऽतिथिकल्पो एषोऽतिथिकल्पः ॥३२॥३॥९२॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥१२॥
अथाद्भुतानि ॥१॥ वर्षे ॥२॥ यक्षेषु ॥३॥ गोमायुवद-
ने ॥४॥ कुल कलहिनि ॥५॥ भूमिचले ॥६॥ आदित्योप-
प्लवे ॥७॥ चन्द्रमसश्च ॥८॥ औपस्यामनुद्यस्याम् ॥६॥
समायां दारुणायाम् ॥१०॥ उपतारकशङ्कायाम् ॥११॥
ब्राह्मणेष्ववायुषिषु ॥१२॥ दैवतेषु नृत्यत्सु च्योतत्सु
हसत्सु गायत्सु ॥१३॥ लाङ्गल्योः संसर्गे ॥१४॥ रज्ज्वो-
इस ऋचा से आहुति करे ॥ ३० ॥ “यत्काम कामयमाना०” इत्यादि से
आहुति करे ॥३१॥ यह आचार्यकल्प है, यह ऋत्विक् कल्प है।
यह संयुक्त कल्प है, यह विवाह कल्प है और यह अतिथि कल्प है
यह अतिथिकल्प है ॥३२॥३॥९२॥ यह ब्यानबेवी कण्डिका खतम हुई ॥
यह अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२॥
अद्भुत् के विषय में कहेंगे। अद्भुत् की परिभाषा यह है कि जो
संसार में स्वभावतः जो कर्म-क्रियायें होती हैं, कभी २ कुछ आश्चर्यमय
लोकविरुद्ध क्रिया हो पड़ती है उसको “अद्भुत्” कहते हैं ॥ ऐसे अद्भुत्
कायों की जहाँ यथाविधि शान्ति नहीं होती है वहाँ दोष होता है।
जहाँ अद्भुत् होता है वहाँ दुःख होता है, नाश होता है। विनाश होने
की सूचना के लिये देवता लोग अद्भुत् को सृजन करते हैं ॥१॥ जल
की वृष्टि में, यक्षों के उपद्रव में, शृगाल के बोलने में, परिवार में परस्पर
झगड़ने में, भूकम्प में, चन्द्र और सूर्य्यग्रहण में ॥२॥३॥४॥५॥६॥७॥८॥
उषा के न उगने में, दारुणसंवत्सर में, दुर्भिक्ष और हैजा प्लेगादि
मारक में, उपतारक के सन्देह में, ब्राह्मणों के शस्त्रास्त्र ग्रहण में ॥९॥
॥१०॥११॥१२॥ जहाँ देवमूर्तियाँ या आकाश में देवगण नाच करें, अपनी
जगह से हटजावें, हँसे, गान करें या अन्य २ रूपों को धारण करें ॥१३॥
दो हलों का संसर्ग हो जावे ॥१४॥ दो अलग २ रज्जुश्रों का संसर्ग,
२२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । स्तन्हयोश्च ॥१५॥ अग्निसंसर्गे ॥१६॥ यमवत्सायां गवि ॥१७॥ वडवागर्दभ्योर्मानुष्यां च ॥१८॥ यत्र धेनवो लोहितं दुहते ॥१९॥ अनडुहि धेनुं धयति ॥२०॥ धेनौ धेनुं धय- न्त्याम् ॥२१॥ आकाशफेने ॥२२॥ पिपीलिकानाचारे॥२३॥ नीलमक्षानाचारे ॥२४॥ मधुमक्षानाचारे ॥२५॥ अनाज्ञाते ॥२६॥ अवदीर्णे ॥२७॥ अनुदक उदकोन्मीले ॥२८॥ तिलेषु समतैलेषु ॥२९॥ हविःष्वभिमृष्टेषु ॥३०॥ प्रसव्येष्ववाव- र्तेषु ॥३१॥ यूपे विरोहति ॥३२॥ उल्कायाम् ॥३३॥ धूम- केतौ सप्तर्षीनुपधूपयति ॥३४॥ नक्षत्रेषु पतापतेषु ॥३५॥ मांसमुखे निपतति ॥३६॥ अनग्नाववभासे ॥३७॥ अग्नौ श्वसति ॥३८॥ सर्पिषि तैले मधुनि च विष्यन्दे ॥३९॥ ग्राम्येऽग्नौ शालां दहति ॥४०॥ आगन्तौ च ॥४१॥ वंशे स्फोटति ॥४२॥ कुम्भोदधाने विकसत्युखायां सक्तुधान्यां च ॥४३॥१॥६३॥ दो भिन्न २ अग्नियों का संसर्ग ॥१५॥ गौ को एक साथ दो बच्चा हो, इसी प्रकार, घोड़ी, गदही और मनुष्य की स्त्री को हो तो ॥१८॥ जहाँ गौ को दूध की जगह रुधिर हो, बैल बैल से मैथुन करे, गौ गौ से मैथुन करे ॥१६॥२०॥२१॥ आकाश में फेन हो, चूँटियों के अनाचार में, नीले रंग की मक्खियों के अनाचार में, मधुमक्खियों के अनाचार में, अना- ज्ञात-उपद्रव में, किसी पदार्थ के एकाएक फटने आदि में, जहाँ जल न हो वहाँ जल होने में, जितना तिल हो उससे उतना ही तैल होने में ॥२२॥२९॥ वपा या हवियों को चिड़ियाँयें या दो पद या चतुष्पद जन्तु लेकर भाग जाने में, कुमार या कुमारी दो आवर्त्त मूर्द्धन्य हों, एक सव्यावृत् और दूसरा देशावृत्त हो, यज्ञयूप के टूट जाने पर, दिन-में उल्का पात होने पर, सप्तर्षि ताराओं को धूमकेतु अपने प्रकाश से छिपा देवे, नक्षत्रों के गिरने पर, मांस मुख गिरने पर, बिना आग के धुआँ आना, अग्नि में श्वास-सा चलना, घी, तेल और मधु में विष्यन्दन होवे, गाँव के अग्नि से शाला जल जाने पर, आगन्तु के आग लगाने पर, वंश
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२५ अथ यत्रैतानि वर्षाणि वर्षन्ति घृतं मांसं मधु च यद्धिर- ण्यं यानि चाप्यन्यानि घोराणि वर्षाणि वर्षन्ति तत्परा- भवति कुलं वा ग्रामो वा जनपदो वा ॥१॥ तत्र राजा भूमिपतिर्विद्वांसं ब्रह्माणमिच्छेत् ॥२। एष ह वै विद्वान्य- द्भृग्वङ्गिरोवित् ॥३॥ एते ह वा अस्य सर्वस्य शमयितारः पालयितारो यद्भृग्वङ्गिरसः ॥४॥ स आहोपकल्पयध्व- मिति ॥५॥ तदुपकल्पयन्ते कंसमहते वसने शुद्धमाज्यं शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥६॥ त्रीणि पर्वाणि कर्मणः पौर्णमास्यमावास्ये पुण्यं नक्षत्रम् ॥७॥ अपि चेदेव यदा कदाचिदार्ताय कुर्यात् ॥८॥ स्नातोऽहतवसनः सुरभि- र्व्रतवान् कर्मण्य उपवसत्येकरात्रं त्रिरात्रं षड्रात्रं द्वादश- रात्रं वा ॥९॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवादः पतितं भवति तत में शब्द हो, कुम्भ के रखने सक्तुधानी या उखा या अनिङ्गिता विकसित हो, ये अद्भुत कार्य्य हैं ॥४३॥१॥६३॥ यह तिरानबेवी कण्डिका खतम हुई ॥ जहाँ वर्षा में ये पदार्थ वर्षैं घृत, मांस, मधु, सोना, और भी जो घोर वस्तुओं की वृष्टि हो वहाँ अत्यन्त दुःख होता है, चाहे कुल, ग्राम, जनपद क्यों न हो सबको कष्ट होता है ॥१॥ ऐसे स्थान में, राजा, भूमि- पति विद्वान् ब्राह्मण की इच्छा करे ॥२॥ विद्वान् वही है जो भृगु-आङ्गिरस विद्या को जानने वाला हो ॥ ३ ॥ इन सारे अद्भुत कार्य्यों की शान्ति करने एवं लोगों को बचाने वाले आङ्गिरस विद्या के विद्वान् ही हैं ॥४॥ राजा ने कहा इसकी तय्यारी करो ॥ ५ ॥ उसकी तय्यारी में कटोरा, अखण्ड नये वस्त्र, शुद्ध घृत, शान्ता ओषधी, नया जलकलश ॥६॥ इसके करने के तीन समय हैं । पौर्णमासी, अमावास्या और शुभ नक्षत्र ॥७॥ या आतुरता वश जब कभी चाहे तब ही करे ॥८॥ स्नान कर नये अखण्ड वस्त्र पहन कर सुगन्धित पदार्थों का सेवन, व्रतवान्, कर्मण्य, उपवास रहे एक रात्रि, ३ रात्रि, छः रात्रि, या १२ रात्रि ॥९॥ द्वादशी के प्रातःकाल जहाँ ही वह पड़े वहीं उत्तर अग्नि का आधान करके ॥१०॥ २९
२२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । उत्तरमग्निमुपसमाधाय ॥१०॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परि- स्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥११॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥१२॥ अथ जुहोति ॥१३॥ घृतस्य धारा इह या वर्षन्ति पक्कं मांसं मधु च यद्धिरणयम् ॥ द्विषन्तमेता अनुयन्तु वृष्ट- योऽपां वृष्टयो बहुलाः सन्तु मह्यम् ॥ लोहितवर्षं मधु- पांसुवर्षं यद्वा वर्षं घोरमनिष्टमन्यत् ॥ द्विषन्तमेते अनुयन्तु सर्वे पराञ्चो यन्तु निवर्तमानाः ॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥१४॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभि- र्जुहुयात् ॥१५॥ वरमनड्वाहं ब्राह्मणः कर्त्रे दद्यात् ॥१६॥ सीरं वैश्योऽश्वं प्रादेशिको ग्रामवरं राजा ॥१७॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१८॥२॥९४॥ अथ यत्रैतानि यक्षाणि दृश्यन्ते तद्यथैतन्मर्कटः श्वापदो वायसः पुरुषरूपमिति तदेवमाशङ्क्यमेव भव- ति ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ यन्मर्कटः श्वापदो वायसो यदीदं राष्ट्रं जातवेदः पताति पुरुषरक्षसमिषिरं यत्प- परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिः, एवं जलपात्र को लाकर परिचरण द्वारा आज्य की परिचर्या करके ॥११॥ नित्य पुरस्तात् होमों को करके और आज्यभाग की दो आहुतियाँ करके ॥१२॥ अब हवन करे “घृतस्य धारा इह०” इत्यादि से अग्नये स्वाहा से आहुति करके ॥१३॥१४॥ “दिव्यो गन्धर्व०” से मातृनामों से आहुतियाँ देवे । ब्राह्मण को दक्षिणा में बैल देवे ॥१५॥१६॥ वैश्य दक्षिणा में सीर देवे और प्रादेशिक हो तो दक्षिणा में घोड़ा देवे । एवं राजा अच्छा ग्राम दक्षिणा में देवे ॥१७॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१८॥२॥६४॥ यह चौरानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥ जहाँ यक्षों को देखे—जैसे कि मर्कट, श्वांपद, वायस, पुरुष रूप तब ही आशङ्का होती है ॥१॥ तब वहाँ आहुति करे ॥२॥ “यन्मर्कटः
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२७ ताति । द्विषन्तमेते अनुयन्तु सर्वे पराञ्चो यन्तु निवर्त- मानाः॥ अग्नये स्वाहेति हुत्वा ॥३॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभिर्जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः॥५॥३॥९५॥ अथ ह गोमायू नाम मण्डूकौ यत्र वदतस्तद्यन्म- न्यन्ते मां प्रति वदतो मां प्रति वदत इति तदेवमा- शङ्क्यमेव भवति ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ यद् गोमायू वदतो जातवेदोऽन्यया वाचाभि जक्षभातः ॥ रथन्तरं बृहच्च सामैतद्विषन्तमेतावभि नानदैताम् ॥ रथन्तरेण त्वा बृहच्छमयामि बृहता त्वा रथन्तरं शमयामि ॥ इन्द्राग्नी त्वा ब्रह्मणा वावृधानावायुष्मन्तावुरुमं त्वा कराथः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥३॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभिर्जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्राय- श्चित्तिः ॥५॥४॥९६॥ अथ यत्रैतत्कुलं कलहि भवति तन्निर्ऋतिगृहीतमि- त्याचक्षते ॥१॥ तत्र जुहुयात् ॥२॥ आरादरातिमिति द्व
२२८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अयासा मनसा कृतोऽयास्यं हव्यमूहिषे ॥ अद्यानो धेहि भेषजम् ॥ स्वाहेत्यग्नौ जुहुयात् ॥४॥ तत्रैवैतान् होमाञ्जुहुयात् ॥५॥ आरादग्निं क्रव्यादं निरूहञ्जीवा- तवे ते परिधिं दधामि । इन्द्राग्नी त्वा ब्रह्मणा वावृधा- नावायुष्मन्तावुत्तमं त्वा कराथः ॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वा- हेति हुत्वा ॥ ६ ॥ अपेत एतु निर्ऋतिरित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥७॥ अपेत एतु निर्ऋतिर्नैहास्या अपि किञ्चन । अपास्याः सत्वनः पाशान्मृत्यूनेकशतं नुदे ॥ ये ते पाशा एकशतं मृत्यो मर्त्याय हन्तवे । तांस्ते यज्ञस्य मायया सर्वा अप यजामसि ॥ निरितो यन्तु नैर्ऋत्या मृत्यव एक- शतं परः ॥ सेधामैषां यत्तमः प्राणं ज्योतिश्च दध्महे ॥ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महा- न्तः । तेभ्यो अस्मान् वरुणः सोम इन्द्रो विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः ॥ ब्रह्म आजडुदगादन्तरिक्षं दिवं च ब्रह्मा- वाघूष्टामृतेन मृत्युम् । ब्रह्मोपद्रष्टा सुकृतस्य साक्षाद्ब्रह्मा- स्मदप हन्तु शमलं तमश्च ॥८॥ वरमनड्वाहमिति समा- नम् ॥९॥५॥९७॥ अथ यत्रैतद्भूमिचलो भवति तत्र जुहुयात् ॥ १ ॥ अच्युता द्यौरच्युतमन्तरिक्षमच्युता भूमिर्दिशो अच्युता इमाः। अच्युतो ऽयं रोधावरोधाद्ध्रुवो राष्ट्रे प्रति तिष्ठाति जिष्णुः ॥ यथा सूर्यो दिवि रोचते यथान्तरिक्षं मातरि- इत्यादि से आहुति देकर ॥ ४ ॥ वही इन होमों को भी देवे ॥ ५ ॥ “आरादग्निं क्रव्यादं०” इस सूक्त से आहुति देवे ॥ ६ ॥ ७ ॥ “अपेत एतु०” इत्यादि से आहुतियां देवे ॥ ८ ॥ दक्षिणा में कर्त्ताको बैल देवे ॥ ९ ॥ ५ ॥ ९७ ॥ यह सत्तानवेवी काण्डिका खतम हुई ॥ जहां भूकम्प होवे वहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “अच्युता द्यौरच्युत०”
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २२९ स्वाभिवस्ते । यथाग्निः पृथिवीमा विवेशैवायं ध्रुवो अच्युतो अस्तु जिष्णुः। यथा देवो दिवि स्तनयन्वि राजति यथा वर्षं वर्षकामाय वर्षति । यथापः पृथिवीमा विवि- शुरेवायं ध्रुवो अच्युतो अस्तु जिष्णुः॥ यथा पुरीषं नद्याः समुद्रमहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति ॥ एवा विशः संमनसो हवं मेऽप्रमादमिहोपा यन्तु सर्वाः ॥ दृहंतां देवी सह देवताभिर्ध्रुवा दृढाच्युता मे अस्तु भूमिः। सर्वंपाप्मानम- पनुद्यास्मदमित्रान्मे द्विषतोऽनुविध्यतु ॥ पृथिव्यै स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः सत्यं बृहदित्येतेनानु- वाकेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥६॥९८॥ अथ यत्रैतदादित्यं तमो गृह्णाति तत्र जुहुयात् ॥१॥ दिव्यं चित्रमृत्वया कल्पयन्तमृतूनामुग्रं भ्रमयन्नु- देति । तदादित्यः प्रतरन्नेतु सर्वत आप इमां लोकाननु- संचरन्ति ॥ ओषधीभिः संविदानाविन्द्राग्नी त्वाभि- रक्षताम् ॥ ऋतेन सत्यवाकेन तेन सर्वं तमो जहि ॥ आदित्याय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ विपासहिं सहमानमि- त्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ रोहितैरुपतिष्ठते ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥७॥६६॥ इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “आ त्वाहार्षं ध्रुवा द्यौः०” इत्यादि अनुवाकसे आहुति देवे ॥ ३ ॥ यही उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ६ ॥ ॥ ९८ ॥ यह अट्ठानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥ जहां सूर्य ग्रहण होता है, वहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “दिव्यं चित्र- मृतूया०” इत्यादिसे आहुति देकर ॥ २ ॥ “विषासहिं०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥ ३ ॥ “रोहितैः” से उपस्थान करे ॥ ४ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ ७ ॥ ६६ ॥ यह निन्यानवेवी कण्डिका खतम हुई ॥
२३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अथ यत्रतश्चन्द्रमसमुपप्लवति तत्र जुहुयात् ॥१॥ राहू राजानं त्सरति स्वरन्तमेनमिह हन्ति पूर्वः । सहस्रमस्य तन्व इह नाष्ट्याः शतं तन्वो विनश्यन्तु ॥ चन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ शकधूमं नक्षत्राणीत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥८॥१००॥ अथ यत्रैतदौषसी नोदेति तत्र जुहुयात् ॥१॥ उदेतु श्रीरुषसः कल्पयन्ती पूल्यन्कृत्वा पलित एतु चारः । ऋतून्बिभ्रती बहुधा विरूपान्मह्यं भव्यं विदुषी कल्प- याति ॥ औषस्यै स्वाहेति हुत्वा ॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृनामभिर्जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥ ॥४॥९॥१०१॥ अथ यत्रैतत्स्रमा दारुणा भव
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३१ हेति हुत्वा ॥३॥ समास्त्वाग्न इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥१०॥१०२॥ अथ यत्रैतदुपतारकाः शङ्कन्ते तत्र जुहुयात् ॥ १ ॥ रेवतीः शुभ्रा इषिरा मदन्तीस्त्वचो धूममनु ताः संवि- शन्तु । परेणापः पृथिवीं सं विशन्त्वाप इमां लोकाननु संचरन्तु ॥ अद्भ्यः स्वाहेति हुत्वा ॥ २ ॥ समुत्पतन्तु प्रनभस्वेति वर्षोर्जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥११॥१०३॥ अथ यत्रैतद्ब्राह्मणा आयुधिनो भवन्ति तत्र जुहु- यात् ॥१॥ य आसुरा मनुष्या आत्तधन्वः पुरुषमुखाश्च- रानिह । देवा वयं मनुष्यास्ते देवाः प्रविशामसि । इन्द्रो नो अस्तु पुरोगवः स नो रक्षतु सर्वतः । इन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येता- भ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥ ३ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१२॥१०४॥ देकर ॥ २ ॥ ३ ॥ “समास्त्वाग्न०” इस सूक्त से आहुति देवे ॥ ४ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ५ ॥ १० ॥ १०२ ॥ यह एक सौ दूसरी कण्डिका समाप्त हुई । अब जहां यह उपतारकाओं की शङ्का होती है, तहां आहुति देवे ॥ ॥ १ ॥ “रेवतीः शुभ्रा इषिरा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ ११ ॥ १०३॥ यह एक सौ तीसरी कण्डिका खतम हुई । अब जहां ब्राह्मणलोग अस्त्रधारी होते हैं, तहां आहुति देवे ॥ १ ॥ “य आसुरा मनुष्या०” इत्यादि से आहुति देकर ॥ २ ॥ “मा नो विदन्नमो०” इत्यादि दो सूक्तों से आहुति देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ ४ ॥ १२ ॥ १०४॥ यह एक सौ चारवी कण्डिका खतम हुई ।
२३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अथ यत्रैतद्दैवतानि नृत्यन्ति च्योतन्ति हसन्ति गायन्ति वान्त्यानि वा रूपाणि कुर्वन्ति य आसुरा मनु- ष्या मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्यभयैर्जुहुयात् ॥ १ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥१३॥१०५॥ अथ यत्रैतल्लाङ्गले संसृजतः पुरोडाशं श्रपयित्वा ॥१॥ अरण्यस्यार्धमभिव्रज्य ॥२॥ प्राचीं सीतां स्थाप- यित्वा ॥ ३ ॥ सीताया मध्ये प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥४॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः शम्याः परि- धीन्कृत्वा ॥५॥ अथ जुहोति । वित्तिरसि पुष्टिरसि श्री- रसि प्राजापत्यानां तां त्वाहं मयि पुष्टिकामो जुहोमि स्वाहा ॥६॥ कुमुद्वती पुष्करिणी सीता सर्वाङ्गशोभ- नी । कृषिः सहस्रप्रकारा प्रत्यष्ठा श्रीरिदं मयि ॥ उर्वी त्वाहुर्र्मनुष्याः श्रियं त्वा मनसो विदुः । आशायेऽन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः ॥ पर्जन्यपत्नि हरिण्यभिजि- तास्यभि नो वद ॥ कालनेत्रे हविषो नो जुषस्व तृप्तिं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥ याभिर्देवा असुरानकल्पयन् यातून्मनून् गन्धर्वान् राक्षसांश्च । ताभिर्नो अद्य सुमना
अब जहां देवता (या मूर्तियां) नाचतीं, इधर उधर चलती, हँसती, गाती हैं या अन्यान्य रूपों को धारण करती हैं-वहां “य आसुरा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ १ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥ २ ॥ १३ ॥ ॥ १०५ ॥ यह एक सौ पांचवीं कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां लाङ्गल में बैल के पुच्छ का संसर्ग हो जावे या हल से हल का। वहां पुरोडाशको पकाकर ॥१॥ अरण्य के आधे भाग में जाकर ॥ २ ॥ पूर्व मुख सीता को स्थापन करके ॥ ३ ॥ सीता के मध्य भाग में पूर्वाभिमुख इध्मों का उपसमाधान करके ॥ ४ ॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हि, शम्या, परिधियों को करके ॥ ५ ॥ आहुति देवे । “वित्तिरसि पुष्टिरसि०” इत्यादि आहुतियां देवे ॥ ६ ॥ “कुमुद्वती पुष्क-
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३३ उपा गहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा ॥ हिरण्यस्र- क्पुष्करिणी श्यामा सर्वाङ्गशोभनी ॥ कृषिर्हिरण्यप्रकारा प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ॥ अश्विभ्यां देवि सह संविदाना इन्द्रेण राधेन सह पुष्ट्या न आ गहि ॥ विशस्त्वा रासन्तां प्रदिशोऽनु सर्वा अहोरात्रार्धमासमासा आर्तवा ऋतुभिः सह ॥ भर्त्री देवानामुत मर्त्यानां भर्त्री प्रजा- नामुत मानुषाणाम् ॥ हस्तिभिरितरासैः क्षेत्रसारथि- भिः सह । हिरण्यैरश्वैरा गोभिः प्रत्यष्टा श्रीरियं मयि ॥७॥ अत्र शुनासीराण्यनुयोजयेत् ॥ ८ ॥ वरमनड्वा- हमिति समानम् ॥६॥१४॥१०६॥ अथ यत्रैतत्स्रजन्त्योर्वा कृन्तन्त्योर्वा नाना तन्तू संसृजतो मनायै तन्तुं प्रथममित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ मनायै तन्तुं प्रथमं पश्येदन्या अतन्वत । तन्नारीः प्रब्रवीमि वः साध्वीर्वः सन्तूर्वरीः ॥ साधुर्वस्तन्तुर्भवतु साधुरेतु रथो वृतः ॥ अथो होर्धरीर्यूयं प्रातर्वोढवे धावत ॥ खर्गला इव पह्वरीरपामुग्रमिवायनम् । पतन्तु पह्वरीरिचोर्वरीः साधुना पथा ॥ अवाच्यौ ते तोतुद्येते तोदेनाइवतराविव ॥ प्र स्तोममुर्वरीणां शशयानामस्ता- विषम् ॥ नारी पश्चमयूखं सूत्र॒वत्कृणुते वसु ॥ अरिष्टो अस्य वस्ता प्रेन्द्र वास उतोटिरे ॥२॥ वासः कर्त्रे दद्यात् रिणी०” इत्यादि से आहुति देवे ॥ ७ ॥ यहां शुनासीरों की अनुयोजना करे ॥ ८ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में बैल देवे ॥ ९ ॥ १४ ॥ १०६ ॥ यह एक- सौ छहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां सूतों के.कातने या बिनने में सूत परस्पर संसृज होकर टूट जावे या बेकाम हो जाया करे वहां आहुति करे ॥१॥ “मनायै तन्तुं प्रथमं०” इत्यादि से आहुति करे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में वस्त्र देवे ॥ ३ ॥ यह • ३०
२३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१५॥१०७॥ अथ यत्रैतदग्निनाग्निः संसृज्यते भवतं नः समन- सौ समोकसावित्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥ १ ॥ भवतं नः समनसौ समोकसावरेपसौ । मा हिंसिष्टं यज्ञपतिं मा यज्ञं जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः ॥ अग्निनाग्निः संसृज्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड् जुह्वास्यः ॥ त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता । सखा सख्या समिध्यसे ॥ पाहि नो अग्न एकया पाहि न उत द्वितीयया । पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जांपते पाहि चतसृभिर्वसो ॥ समीची माहनी पातामायुष्मत्या ऋचो मा सन्ति । तनूपाःसाम्नो वसुविदं लोकमनुसंचराणि ॥२॥ रुक्मं कर्त्रे दद्यात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥१६॥१०८॥ अथ यत्रैतद्यमसूर्यमौ जनयति तां शान्त्युदकेना भ्युक्ष्य दोहयित्वा ॥ १ ॥ तस्या एव गोर्दुग्धे स्थालीपाकं श्रपयित्वा ॥२॥ प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य ॥ ४ ॥ एकैक- उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥ १५ ॥ १०७ ॥ यह एक सौ सातवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ अब जहां जहां अग्नि से अग्नि का संघर्ष हो जावे वहां "भवतं नः समनसौ समोकसौ" इस सूक्त से आहुति देवे ॥ १ ॥ "भवतं नः सम- नसौ०" इत्यादि से आहुति देवे ॥ २ ॥ कर्त्ता को दक्षिणा में सोना देवे ॥ ३ ॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥१६॥१०८॥ यह एकसौ आठहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ एक साथ अनेक बच्चे गौ को पैदा हों उसको शान्ति जल से अभ्युक्षण कर गौ को दुह करके ॥१॥ उसी गौ के दूध में स्थाली- पाक पका कर ॥२॥ पूर्वाभिमुख इध्माधान करके ॥३॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके, बर्हिकुश एवं जलपात्र लाकर के ॥४॥ 'एकैकयै-
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३५ यैषा सृष्ट्या सं बभूवेत्येतेन सूक्तेनाज्यं जुहन् ॥ ५ ॥ उदपात्रे सम्पातानानयति ॥ ६ ॥ उत्तमं संपातमोदने प्रत्यनयति ।॥७॥ ततो गां च प्राशयति वत्सौ चोदपात्रा- देनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥ ८ ॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥९॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१०॥१७॥१०९॥ अथ चेद्वडवा वा गर्दभी वा स्यादेवमेव प्राञ्चमिध्म- मुपसमाधाय ॥ १ ॥ एवं परिस्तीर्य ॥२॥ एवमुपसाद्य ॥३॥ एतेनैव सूक्तेनाज्यं जुहन् ॥४॥ उदपात्रे संपाताना- नयति ॥५॥ उदपात्रादेनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥६॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥७॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥८॥१८॥११०॥ अथ चेन्मानुषी स्यादेवमेव प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥१॥ एवं परिस्तीर्य ॥२॥ एवमुपसाद्य ॥३॥ उपस्थे जातकावाधाय ॥४॥ एतेनैव सूक्तेनाज्यं जुहन् ॥५॥ षा सृष्ट्या०” इत्यादि सूक्त से आज्य की आहुति करता हुआ जलपात्र में सम्पातों को रखता जावे । उत्तम सम्पात को ओदन में लावे ॥५॥६॥७॥ तब गौ और दोनों बच्चों को प्राशन करावे और जलपात्र से इसको आचमन करा कर सम्प्रोक्षण करावे ॥८॥ उस गौ को कर्त्ता ही को देवे ॥९॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१०॥१७॥१०९॥ यह एकसौ नौहवी कण्डिका खतम हुई ॥ यदि घोड़ी या गदही इसी प्रकार जोड़े बच्चे प्रसव करे तो पूर्वाभि- मुख इध्मों का आधान करके एवं परिस्तरण करके सामग्रियों को आसा- दन करके इसी सूक्त से आज्य की आहुति देता हुआ ॥१॥२॥३॥४॥ जलपात्र में सम्पातों को रखे ॥५॥ जलपात्र ही से इनको आचमन और सम्प्रोक्षण करे ॥६॥ इसको दक्षिणा में कर्त्ता को ही देवे ॥७॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥८॥१८॥११०॥ यह एकसौ दसवी कण्डिका खतम हुई ॥ यदि मनुष्यस्त्री को यमल प्रसव हो तो, उसको भी इसी प्रकार पूर्वा- भिमुख इध्मों का आधान, परिस्तरण और उपसादन करके ॥१॥२॥३॥
२३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । अमीषां मूर्ध्नि स मातुः पुत्रयोरित्यनुपूर्वं सम्पाताना- नयति ॥६॥ उदपात्र उत्तरान्संपातान् ॥७॥ उदपात्रा- देनानाचामयति च संप्रोक्षति च ॥८॥ तां तस्यैव दद्यात् ॥६॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥१०॥ तस्या निष्क्रयो यथार्हं यथासंपद्वा ॥११॥१६॥१११॥ अथ यत्रैतद्धेनवो लोहितं दुह्रते यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्त इत्येताभिश्चतसृभिर्जुहुयात् ॥१॥ वरां धेनुं कर्त्रे दद्यात् ॥२॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥३॥२०॥११२॥ अथ यत्रैतदनड्वान्धेनुं धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ अनड्वान्धेनुमधयदिन्द्रो गोरूपमाविशत् । स मे भूतिं च पुष्टिं च दीर्घमायुश्च धेहि नः॥ इन्द्राय स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ मा नो विदन्नमो देववधेभ्य इत्येताभ्यां सूक्ताभ्यां जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४॥२१॥११३॥ गोदमें बच्चों को लेकर इसी सूक्त से आज्य की आहुति देता हुआ। “अमीषां मूर्ध्नि०” इत्यादि से सम्पातों को लावे ॥४॥५॥६॥ जलपात्र में शेष सम्पातों को धरे ॥७॥ जलपात्र ही से इनको आचमन और सम्प्रो- क्षण करे ॥८॥ उसके बच्चों को उसीको देवे ॥६॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥१०॥ उसका निष्क्रय यथाशक्ति यथासम्पद् कर्त्ता को देवे ॥११॥ ॥१९॥१११॥ यह एक सौ ग्यारहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ धेनु को दुहने पर दूध की जगह रुधिर आवे तो “यः पौरु- षेयेण क्रविषा समङ्क्त०” इत्यादि ४ ऋचाओं से चार आहुतियाँ देवे ॥१॥ कर्त्ता को दक्षिणा में धेनु देवे ॥२॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३॥ ॥२०॥११२॥ यह एकसौ बारहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ बैल धेनु पर मैथुनार्थ चेष्टा करता है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “अनड्वान्धेनुमधयदिन्द्रो०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ “मा नो विदन्नमो देववधेभ्यः०” इन दो सूक्तों से आहुति देवे ॥५॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४॥२१॥११३॥ यह एकसौ तेरहवी कण्डिका खतम हुई ॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३७ अथ यत्रैतद्धेनुर्धेनं धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ योगक्षेमं धेनुं वाजपत्नीमिन्द्राग्निभ्यां प्रेषिते जक्षभाने। तस्मान्मा- मग्ने परि पाहि घोरात्प्र नो जायन्तां मिथुनानि रूपशः॥ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ दिव्यो गन्धर्व इति मातृ- नामभिर्जुहुयात् ॥३॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४।२२।११४॥ अथ यत्रैतद्गौर्वाश्वो वाश्वतरो वा पुरुषो वाका- शफेनमवगन्धयति तत्र जुहुयात् ॥१॥ पयो देवेषु पय ओषधीषु पय आशासु पयोऽन्तरिक्षे । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभिसंगृणन्तु ॥ पयो यदप्सु पय उस्रियासु पय उत्सेषूत पर्वतेषु । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभिसंगृणन्तु ॥ यन्मृगेषु पय आविष्ठमस्ति यदेजति पतति यत्पतत्रिषु । तन्मे धाता च सविता च धत्तां विश्वे तद्देवा अभि- संगृणन्तु ॥ यानि पयांसि दिव्यार्पितानि यान्यन्तरिक्षे बहुधा बहूनि । तेषामीशानं वशिनी नो अद्य प्रदत्ता द्यावापृथिवी अहृणीयमाना इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥२॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥३।२३।११५॥ अथ यत्रैतत्पिपीलिका अनाचाररूपा दृश्यन्ते तत्र अब जहाँ धेनु धेनु से मैथुन करना चाहती है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “योगक्षेमं धेनुं०” इत्यादि से आहुति देकर ॥२॥ “दिव्यो गन्धर्व०” और मातृ नामों से आहुतियाँ देवे ॥२।३॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥४।२२।११४॥ यह एकसौ चौदहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ गौ या अश्व या अश्वतर या पुरुष आकाश के फेन का गन्ध लेता है, वहाँ आहुति करे ॥१॥ “पयो देवेषु०” इत्यादि इस सूक्त से आहुति करे ॥२॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥३।२३।११५॥ यह एकसौ पन्द्रहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ पिपीलिका अनाचार रूप से दीखने लगतीं, तहाँ आहुति
२३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । जुहुयात् ॥ १ ॥ भुवाय स्वाहा भुवनाय स्वाहा भुवन- पतये स्वाहा भुवां पतये स्वाहा वोषाय स्वाहा विनताय स्वाहा शतारुणाय स्वाहा ॥२॥ यः प्राच्यां दिशि श्वेत- पिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो दक्षिणायां दिशि कृष्णपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यः प्रतीच्यां दिशि रजतपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। य उदी- च्यां दिशि रोहितपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो ध्रुवायां दिशि बभ्रुपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। यो व्यध्वायां दिशि हरितपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा। य ऊर्ध्वायां दिश्यरुणपिपीलिकानां राजा तस्मै स्वाहा॥३॥ ताश्चेदेतावता न शाम्येयुस्तत उत्तरमग्निमुपसमा- धाय ॥ ४ ॥ शरमयं बर्हिरुभयतः परिच्छिन्नं प्रसव्यं परि- स्तीर्य ॥ ५ ॥ विषावध्वस्तमिङ्गिडमाज्यं शाकपलाशे- नोत्पूतं बाधकेन स्रुवेण जुहोति ॥६॥ उत्तिष्ठत निर्द्रवत न व इहास्त्वत्यश्वनम् । इन्द्रो वः सर्वासां साकं गर्भा- नाण्डानि भेत्स्यति । फडुताः पिपीलिका इति ॥ ७ ॥ इन्द्रो वो यमो वो वरुणो वोऽग्निर्वो वायुर्वः सूर्यो वश्चन्द्रो वः प्रजापतिर्व ईशानो व इति ॥८॥२४॥११६॥ अथ यत्रैतन्नीलमक्षा अनाचाररूपा दृश्यन्ते तत्र करे॥१॥ "भुवाय स्वाहा, भुवनाय स्वाहा०" इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ ॥३॥ यदि इससे न शान्ति करें तो उत्तर अग्नि का आधान करके ॥४॥ शरमयबर्हि जो दोनों ओर टूटे हों प्रसन्य परिस्तरण करके ॥५॥ विषा- वध्वस्त इङ्गिड आज्य को शाक के पत्ते से उत्पवन करके बाधक वृक्ष के स्रुव से आहुति देवे ॥६॥ "उत्तिष्ठत निर्द्रवत०" इत्यादि से ॥७॥ फिर "इन्द्रो वो यमो०" इत्यादि से आहुति देवे ॥८॥२४॥११६॥ यह एकसौ सोलहवी कण्डिका खतम हुई ॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २३९
जुहुयात् ॥१॥ या मर्त्यैः सरथं यान्ति घोरा मृत्योर्दूत्यः क्रविशः सं बभूवुः। शिवं चक्षुरुत घोषः शिवानां शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ शान्तं चक्षुरुत वायसीनां या ह्यासां घोरा मनसो विसृष्टिः ॥ मनसस्पते तन्वा मा पाहि घोरान्मा वि रिक्षि तन्वा मा प्रजया मा पशु- भिर्घायवे स्वाहेति हुत्वा ॥२॥ वात आ वातु भेषजमित्ये- तेन सूक्तेन जुहुयात् ॥३॥ वात आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नो हृदे ॥ प्र ण आयूंषि ता°र्षत् ॥ उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा । स नो जीवातवे कृधि ॥ यददो वात ते गृहे निहितं भेषजं गुहा । तस्य नो धेहि जीवस इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥४॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥५॥२५॥११७॥ अथ यत्रैतन्मधुमक्षिका अनाचाररूपा दृश्यन्ते मधु वात ऋतायत इत्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥१॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥२॥२६॥११८॥ अथ यत्रैतदनाज्ञातमद्भुतं दृश्यते तत्र जुहुयात् ॥१॥ यदज्ञातमनाज्ञातमर्थस्य कर्मणो मिथः॥ अग्ने त्वं नस्त- स्मात्पाहि स हि वेत्थ यथायथम् ॥ अग्नये स्वाहा ॥२॥ वायो सूर्य चन्द्रेति च ॥३॥ पुरुषसंमितोऽर्थः कर्मार्थः
अब जहाँ नीले रंग की मक्षिका अनाचार रूप से दीख पड़ें, वहाँ आहुति देवे ॥१॥ “या मर्त्यैः सरथं यान्ति०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥ “वात आ वातु०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥३॥ 'वात आ वातु भेषजं०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥४॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥५॥२५॥११७॥ यह एकसौ सतरहवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ मधुमक्षिका अनाचार रूपा दीख पड़े, वहाँ आहुति देना चाहिये ॥१॥ “यदज्ञातमनाम्नातं०” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥
पुरुषसंमितः । वायुर्मा तस्मात्पातु स हि वेत्थ यथा- यथम् ॥ वायवे स्वाहा ॥४॥ अग्निर्मा सूर्यो मा चन्द्रो मेति च ॥५॥२७॥११९॥ अथ यत्रैतद्ग्रामे वावसाने वाग्निशरणे वा सम- ज्यायां वावदीर्येत चतस्रो धेनव उपक्लृप्ता भवन्ति श्वेता कृष्णा रोहिणी सुरूपा चतुर्थी ॥१॥ तासामेत- द्वादशरात्रं संदुग्धं नवनीतं निदधाति ॥२॥ द्वादश्याः प्रातर्यत्रैवादीऽवदीर्णं भवति तत उत्तरमग्निमुपसमा- धाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिः श्वेताया आज्येन सन्त्रीय ॥४॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरभि मन्त्र्यालभ्य ॥५॥ अथ जुहुयात् ॥६॥ तथा दक्षिणार्धे ॥७॥ तथा पश्चार्धे ॥८॥ उत्तरार्धे संस्थाप्य वास्तोष्पत्यै- र्जुहुयात् ॥९॥ अवदीर्णे संपातानानीय संस्थाप्य होमान् ॥१०॥ अवदीर्णं शान्त्युदकेन संप्रोक्ष्य ॥११॥ ता एव “वायो सूर्य चन्द्रेति च०” इत्यादि से आहुति देवे ॥३॥४॥ “अग्निर्मा सूर्यो मा चन्द्रो मा०” इत्यादि से आहुति देवे ॥५॥२७॥११९॥ यह एकसौ उन्नीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहाँ ग्राम में या दहन गृह में या अग्निशाला में, या समज्या में कोई काष्ठ आदि फट या टूट जावे तो उसकी शान्ति के लिये ४ धेनु की आवश्यकता होती है । एक श्वेता, दूसरी काली, तीसरी रोहिणी, चौथी सुरूपा ॥ इन चारों के दूध, नवनीत १२ रात्र तक ग्रहण करे और द्वादशी के प्रातःकाल जहाँ, दीवार या काष्ठादि फट गया हो उससे उत्तर अग्नि का आधान करे ॥१॥२॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिकुश को श्वेत गौ के घी से चपोट कर ॥४॥ “अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि तीन ऋचा से अभिमंत्रण कर भूमि को स्पर्श करे ॥२॥ तब आहुति देवे ॥६॥ उसी प्रकार अग्नि के दक्षिणार्ध भाग में तथा पश्चिमार्ध में और उत्त- रार्द्ध में संस्थापन करके “वास्तोष्पत्य” ऋचाओं से आहुतियाँ देवे ॥७॥ ॥८॥९॥अवदीर्ण स्थान सम्पातों को लाकर होम को संस्थापन करके ॥१०॥