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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
४८२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) असन्धेयेन त्ववश्यं सन्धातव्ये यतः प्रभावः ततः प्रतिविदध्यात् । (२) सोपकारं व्यवहितं गुप्तमायुःक्षयादिति । वासयेदरिपक्षीयमवशीर्णक्रियाविधौ ॥ (३) विक्रामयेद्धूर्तंरि वा सिद्धं वा दण्डचारिणम् । कुर्यादमित्राटवीषु प्रत्यन्ते वान्यतः क्षियेत् ॥ (४) पण्यं कुर्यादसिद्धं वा सिद्धं वा तेन संवृतम् । तस्यैव दोषेणादूष्यं परसन्धेयकारणात् ॥ (५) अथवा शमयेदेनमायत्यर्थमुपांशुना । आयत्यां च वधप्रेप्सुं दृष्ट्वा हन्याद्गतागतम् ॥ (६) अरितोभ्यागतो दोषः शत्रुसंवासकारितः । सर्पसंवासधार्मित्वान्निन्द्यतोद्वेगेन दूषितः ॥


चला आये, उसको पुनः आश्रय न दिया जाय; और जो शत्रु का अपकार करके आया हो उसे ग्रहण कर लिया जाय । जो दोनों का ही अपकार करने वाला हो उसकी अच्छी तरह जाँच करके उसको रखा जाय या दूर कर दिया जाय ।

( १ ) जो व्यक्ति सन्धि करने के योग्य नहीं है, यदि विशेष परिस्थितिवश उससे सन्धि करनी पड़े तो शत्रु के जिन कारणों से वह व्यक्ति प्रभावित हो, पहिले उनका प्रतीकार किया जाय ।

( २ ) यदि शत्रुपक्ष का कोई व्यक्ति अपने आश्रय में रहकर किसी कारण शत्रु के आश्रय में चला जाय और वहाँ से पुनः वापिस चला आये तो ऐसे गतागत को कुछ विशेष सन्धि-नियमों पर ही पुनः प्रश्रय दिया जाना चाहिए । ऐसे व्यक्ति को किसी विश्वस्त भृत्य की देख-रेख में आयु पर्यन्त आश्रय दिया जाय ।

( ३ ) यदि वह निष्कपट सावित हो जाय तो उसे स्वामी की परिचर्या में नियुक्त किया जाय । वहाँ भी निष्कपट जँचे तो उसे सेना-विभाग में नियुक्त किया जाय या आटविकों के मुकाबले में अथवा कहीं दूर प्रदेश में नियुक्त किया जाय ।

( ४ ) यदि नियुक्त स्थान पर वह कपटपूर्ण व्यवहार करे तो व्यापार का बहाना करके उसे शत्रुदेश में भेज दिया जाय और इस बहाने से शत्रु के साथ सन्धि करके उसी के दोष से उसको मरवा दिया जाय ।

( ५ ) यदि भविष्य में किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका न हो तो उसको चुपचाप मरवा दिया जाय । भविष्य में वध करने की इच्छा रखने वाले गतागत को तो देखते ही मरवा देना चाहिए ।

( ६ ) शत्रु के आश्रय से आया हुआ व्यक्ति, शत्रु-सहवास के कारण बड़ा जहरीला है, क्योंकि शत्रु-सहवास साँप के सहवास के समान है । इसलिए ऐसा व्यक्ति निंदित कहा गया है ।

प्र० १११ : अ० ६ ] प्रयाण और सन्धियाँ ४८३

(१) जायते प्लक्षबीजाशात् कपोतादिव शाल्मलेः । उद्वेगजननो नित्यं पश्चादपि भयावहः ॥ (२) प्रकाशयुद्धं निर्दिष्टो देशे काले च विक्रमः । विभीषणमवस्कन्दः प्रमादव्यसनार्दनम् ॥ एकत्र त्यागघातौ च कूटयुद्धस्य मातृका । योगगूढोपजापार्थं तूष्णींयुद्धस्य लक्षणम् ।

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे संहितप्रयाणिकं परिपणितापरिपणितापसृतादि-सन्धिर्नाम षष्ठोऽध्याय, आदितस्त्रिशततमः ।

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(१) जैसे प्लक्ष (पाखर या वरगद) का बीज खाने वाला कबूतर सेमल के पेड़ पर जाकर उद्विग्न होता है उसी प्रकार शत्रु पक्ष का व्यक्ति भी विजिगीषु के लिए भयप्रद और बाद में उद्वेगजनक होता है ।

(२) किसी देश या समय को निश्चित करके जो युद्ध-घोषणा की जाती है उसे प्रकाशयुद्ध कहते हैं । थोड़ी सी सेना को बहुत दिखाकर भय पैदा कर देना; किलों जलाना एवं लूट-पाट कर देना, प्रमाद तथा व्यसन के समय शत्रु को पीड़ित करना एक स्थान का युद्ध छोड़कर दूसरी ओर से धावा बोल देना—यह कूटयुद्ध है । विष और औषधि आदि के प्रयोगों तथा गुप्तचरों के उपजाप (धोखा-बहकाना) आदि के प्रयोगों से शत्रु का विनाश करना तूष्णींयुद्ध कहलाता है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में छठा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११२## द्वैधीभाविकाः सन्धिविक्रमाश्च
अध्याय ७

(१) विजिगीषुद्वितीयां प्रकृतिमेवमुपगृह्णीयात् । सामन्तं सामन्तेन सम्भूय यायात् । यदि वा मन्येत—'पाष्णि मे न ग्रहीष्यति, पाष्णिग्राहं वारयिष्यति, यातव्यं नाभिसरिष्यति, बलद्वैगुण्यं मे भविष्यति, वीवधासारौ मे प्रवर्तयिष्यति, परस्य वारयिष्यति, बह्वाबाधे मे पथि कण्टकान् मर्दयिष्यति, दुर्गाटव्यपसारेषु दण्डेन चरिष्यति, यातव्यमविषह्ये दोषे सन्धौ वा स्थापयिष्यति, लब्धलाभांशो वा शत्रूनन्यानन्मे विश्वासयिष्यती'ति ।

(२) द्वैधीभूतो वा कोशेन दण्डं दण्डेन कोशं सामन्तानामन्यतमाल्लिप्सेत ।


द्वैधीभाव संबंधी संधि और विक्रम

( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि अपने पड़ोस के शत्रु राजा को वह अपनी सहायता के लिए इन तरीकों से तैयार करे : किसी एक सामंत से मिलकर वह यातव्य सामंत पर चढाई करे । अथवा यदि ऐसा समझे कि 'अपने साथ मिलाया हुआ सामंत, मेरी अनुपस्थिति में, मेरे देश पर आक्रमण तो नहीं करेगा; दूसरे पाष्णिग्राह ( पीछे से आक्रमण करने वाले शत्रु ) को रोकेगा, मेरे यातव्य की ओर जाकर न मिलेगा, इसको साथ लेकर मेरी शक्ति दुगुनी हो जायेगी, अपने देश में उत्पन्न धान्य तथा मेरे मित्र राजा की सेना को मेरी सहायता के लिये आने देगा, उसे न रोकेगा, शत्रुदेश में जाने से इन दोनों को रोकेगा, युद्धकाल में मेरे मार्ग की कठिनाइयों को दूर करेगा, दुर्ग तथा आटवियों पर प्रयाण करने के समय सेना द्वारा मुझे मदद पहुँचाता रहेगा, किसी असह्य अनर्थ या आपत्ति के आ जाने पर यातव्य के साथ मेरी संधि करा देगा, अथवा प्रतिज्ञात अपने लाभांश को मुझसे प्राप्त कर मेरे दूसरे शत्रुओं पर भी मेरा विश्वास जमा देगा' इत्यादि ।

( २ ) यदि सामंत को अपने साथ मिलाने में विजिगीषु को विश्वास न हो तो द्वैधीभाव प्रयोग के द्वारा वह पीछे या बगल में रहने वाले किसी एक सामंत को धन देकर, यदि सेना कम हो तो, सेना ले और यदि धन कम हो तो सेना देकर धन प्राप्त करने का यत्न करे ।

प्र० ११२ : अ० ७ ] द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम ४८५

(१) तेषां ज्यायसोऽधिकेनांशेन समात्समेन हीनाद्धीनेनेति समसन्धिः । विपर्यये विषमसन्धिः । तयोर्विशेषलाभादतिसन्धिः । (२) व्यसनिनमपायस्थाने सक्तमनर्थिनं वा ज्यायांसं हीनो बलसमेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत । अन्यथा सन्दध्यात् । (३) एवंभूतो हीनशक्तिप्रतापपूरणार्थं संभाव्यार्थाभिसारी मूलपाष्णि-त्राणार्थं वा ज्यायांसं हीनो बलसमाद्विशिष्टेन लाभेन पणेत । पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयादन्यथा विक्रमेत । (४) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमुपस्थितार्थं वा ज्यायांसं हीनो दुर्गमित्र-प्रतिस्तब्धो वा ह्रस्वमध्वानं यातुकामः शत्रुमयुद्धमेकान्तसिद्धिं लाभमादातु-


( १ ) विषमसंधि के तीन प्रकार हैं : १. अधिक शक्तिशाली सामंत को अधिक लाभांश देकर उससे संधि करना, २. समान शक्तिशाली सामंत को समभाग लाभांश देकर उससे संधि करना और ३. कम शक्तिशाली सामंत को थोड़ा हिस्सा लाभांश देकर उससे संधि करना । इसके विपरीत विषमसंधि के छह प्रकार हैं : १. अधिक शक्तिशाली सामंत को बराबर हिस्सा देकर या २. कम हिस्सा देकर ३. समान शक्ति-शाली सामंत को कम हिस्सा देकर या ४. अधिक हिस्सा देकर तथा ५. हीनशक्ति सामंत को बराबर हिस्सा देकर या ६. अधिक हिस्सा देकर । ये दोनों प्रकार की संधियों के द्वारा जब प्रतिज्ञात धन से अधिक धन का लाभ हो जाय तो वे अतिसंधि कहलाती हैं; अर्थात् इस अतिसंधि भेद से वे ( ३ सम + ६ विषम ) नौ संधियाँ अठारह प्रकार की हो जाती हैं ।

( २ ) हीनशक्ति विजिगीषु को चाहिए कि वह व्यसनी, शारीरिक नाश करने में निरत और अनर्थकारी, अधिक शक्ति सामंत के साथ, सेना के समान हिस्सा लेकर ही सन्धि करे । इस प्रकार सन्धि करने पर यदि अधिक शक्ति सामंत, अपना तिरस्कार करने वाले विजिगीषु का अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा शान्त रहे ।

( ३ ) समसंधि : इस प्रकार व्यसनपीडित हीनशक्ति विजिगीषु को चाहिए कि अपने विनष्ट प्रताप एवं शक्ति को पूरा करने के लिए और अपने सम्भावित अर्थ को पूरा करने के लिए अथ च अपने दुर्ग तथा र्पाष्ण की रक्षा करने के लिए सेना की अपेक्षा अधिक हिस्सा देकर अधिक शक्ति संपन्न सामन्त के साथ, वह सन्धि कर ले । सन्धि कर लेने पर यदि हीनशक्ति विजिगीषु ईमानदारी से रहे तो अधिक शक्ति सामन्त सदा उस पर अनुग्रह बनाये रखे । अन्यथा उस पर आकमण कर दे ।

( ४ ) शिकार आदि व्यसनों में आसक्त, कुपित, लोभी तथा भीरु अमात्य, अमात्य-प्रकृतिवाले अनर्थकारी अधिकशक्ति सामंत के साथ, हीनशक्ति विजिगीषु, अपने मजबूत किलों एवं सहायक मित्रों के कारण गर्वित, अथवा अपने नजदीक के किसी शत्रु

४८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

कामो बलसमाद्धीनेन लाभेन पणेत। पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत। अन्यथा सन्दध्यात्।

(१) अरन्ध्रव्यसनो वा ज्यायान् दुरारब्धकर्माणं भूयः क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामो दूष्यदण्डं प्रवासयितुकामो दूष्यदण्डमावाहयितुकामो वा पीडनीयमुच्छेदनीयं वा हीनेन व्यथयितुकामः सन्धिप्रधानो वा कल्याणबुद्धिः हीनं लाभं प्रतिगृह्णीयात्। कल्याणबुद्धिना सम्भूयार्थं लिप्सैत। अन्यथा विक्रमेत।

(२) एवं समः सममतिसन्दध्यादनुगृह्णीयाद्वा।

(३) परानीकस्य प्रत्यनीकं मित्राटवीनां वा शत्रोर्विभूमीनां देशिकं मूलपाष्णिंत्राणार्थं वा समः समबलेन लाभेन पणेत। पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयादन्यथा विक्रमेत।

(४) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमनेकविरुद्धमन्यतो लभमानो वा समः सम-


पर आक्रमण करने वाला बिना लाभ के ही विजय की इच्छा रखने वाला, सेना की अपेक्षा थोड़ा हिस्सा देकर ही सन्धि कर ले। यदि अधिकशक्ति सामंत, अपना तिरस्कार करने वाले हीनशक्ति राजा का इस प्रकार की संधि कर लेने पर अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे। अन्यथा सन्धि बनाये रखे।

(१) प्रकृतिकोप एवं मृगयादि व्यसनों से पृथक् हुए अपने विरोधी शत्रु को अधिक क्षय-व्यय से ग्रस्त रखने की इच्छा करने वाला, अपनी दूषित सेना को निकालने तथा शत्रु की दूषित सेना को अपने यहाँ बुलाने की इच्छा करने वाला, या पीड़ित एवं विनष्ट करने योग्य शत्रु का हीन शक्ति राजा से पीड़न तथा उच्छेदन कराने की इच्छा रखने वाला, अथवा सन्धि गुण को प्रमुख समझने वाला कल्याणबुद्धि अधिकशक्ति सामंत होने के कारण थोड़े दिये हुए लाभ को भी स्वीकार कर ले। कल्याणबुद्धि हीन के साथ मिलकर बराबर उसकी सहायता करता रहे। यदि वह हीन दुष्टबुद्धि हो तो उस पर आक्रमण कर दे।

(२) इसी प्रकार समशक्ति सामंत, दूसरे समशक्ति सामंत के साथ दुष्टबुद्धि और कल्याणबुद्धि देखकर ही निग्रह तथा अनुग्रह करे।

(३) शत्रु की सेना के साथ तथा शत्रु के मित्र एवं आटविकों के साथ युद्ध करने में समर्थ, शत्रु के पर्वतीय प्रांतों का नक्शा भलीभाँति समझने वाला, अथवा अपने दुर्ग तथा पाष्णि की रक्षा करने के लिए सम सामंत की सेना बराबर विजय-लाभांश देकर सन्धि कर ले। सन्धि करने पर यदि समशक्ति सामंत कल्याणबुद्धि बना रहे तो उस पर अनुग्रह बनाये रखे, अन्यथा उस पर आक्रमण कर दे।

(४) मृगया आदि व्यसनों तथा प्राकृतिककोपों से पीड़ित और दूसरे अनेक सामंतों का विरोधी अथवा सहायता बिना ही अन्य उपायों से हुई कार्यसिद्धि, सम-

प्र० ११२ : अ० ७ ] द्वैधीभाव सम्बन्धी सन्धि और विक्रम ४८७

बलाद्धीनेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् ।

(१) एवंभूतो वा समः सामन्तायत्तकार्यः कर्तव्यबलो वा बलसमाद्विशिष्टेन लाभेन पणेत । पणितः कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयादन्यथा विक्रमेत ।

(२) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रमभिहन्तुकामः स्वारब्धमेकान्तसिद्धिं वास्य कर्मोपहन्तुकामो मूले यात्रायां वा प्रहर्तुकामो यातव्याद् भूयो लभमानो वा ज्यायांसं हीनं समं वा भूयो याचेत । भूयो वा याचितः स्वबलरक्षार्थं दुर्धर्षमन्यदुर्गमासारमटवीं वा परदण्डेन मर्दितुकामः प्रकृष्टेऽध्वनि काले वा परदण्डं क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामः परदण्डेन वा विवृद्धस्तमेवोच्छेत्तुकामः परदण्डमादातुकामो वा भूयो दद्यात् ।


शक्ति सामंत के साथ सेना की अपेक्षा थोड़ा ही लाभांश देकर सन्धि कर ले । सन्धि करने के बाद यदि वह उसका उपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे अन्यथा चुपचाप सन्धि कर ले ।

( १ ) मृगयादि व्यसनों और प्रकृति-कोपों से पीड़ित, दूसरे सामंत की सहायता करने पर ही अपने कार्यों की सफलता देखने वाला अथवा नई सेना भर्ती करने वाला समशक्ति सामंत, दूसरे समशक्ति सामंत के साथ सेना की अपेक्षा अधिक लाभ देकर सन्धि कर ले । सन्धि करने पर यदि वह कल्याणबुद्धि बना रहे तो उस पर सदा अनुग्रह बनाये रखे, अन्यथा आक्रमण कर दे ।

( २ ) मृगयादि व्यसनों एवं प्रकृति-प्रकोपों से पीड़ित अधिकशक्तिसंपन्न ( ज्याय ) हीनशक्ति अथवा समशक्ति सामंत को नष्ट करने की इच्छा करने वाला या उचित देश-काल के अनुसार आरंभित उसके अवश्यंभावी कार्यों को नष्ट करने की इच्छा रखने वाला अथवा विजिगीषु की यात्रा के बाद उसके पीछे से उसके किले आदि पर चढ़ाई करने की कामना वाला, अथवा विजिगीषु की अपेक्षा यातव्य से अधिक धन पा जाने वाला हीन, ज्याय या समशक्ति सामंत, उक्त ज्याय, हीन या समशक्ति सामंत से अधिक लाभ की माँग करे । इस प्रकार माँग करने पर अपनी सेना की रक्षा के लिए तथा दूसरे के दुर्गम दुर्ग, मित्रबल, आटविकों आदि को दूसरे सामंत की सेना से कुचल डालने की इच्छा रखने वाला, दूर देश में अधिक समय तक दूसरे सामंत की सेना को काम पर लगा क्षय-व्यय से युक्त करने की इच्छा रखने वाला, या यातव्य की सेना के द्वारा अपनी सेना को बढाकर फिर उस अधिक माँगने वाले का उच्छेदन करने की कामना वाला अथवा यातव्य की सेना को उस अधिक माँगने वाले सामंत की सहायता से लेने की इच्छा रखने वाला, अवश्यमेव उतना अधिक लाभ दे, जितने की दूसरे सामंत माँग करें ।

४८८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) ज्यायान् वा हीनं यातव्यापदेशेन हस्ते कर्तुकामः परमुच्छिद्य वा तमेवोच्छेत्तुकामः त्यागं वा कृत्वा प्रत्यादातुकामो बलस्माद्विशिष्टेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् । यातव्य-संहितो वा तिष्ठेत् । दूष्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् ।

(२) जातव्यसनप्रकृतिरन्ध्रो वा ज्यायान् हीनं बलसमेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् ।

(३) एवंभूतं वा हीनं ज्यायान् बलस्माद्धीनेन लाभेन पणेत । पणितस्तस्यापकारसमर्थो विक्रमेत, अन्यथा सन्दध्यात् ।

(४) आदौ बुद्धयेत पणितः पणमानश्च कारणम् । ततो वितर्क्योभयतो यतः श्रेयस्ततो व्रजेत् ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे द्वैधीभावसन्धिविक्रमोनाम सप्तमोऽध्याय, आदितश्चतुश्शततमः ।

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(१) यातव्य के बहाने अपने वश में करने की इच्छा रखने वाला, शत्रु का उच्छेद कर फिर उसी का उच्छेद करने की कामना वाला, या देकर फिर लौटा लाने की इच्छा रखने वाला अधिकशक्ति सामंत हीनशक्ति सामंत के साथ, अवश्यमेव सेना की अपेक्षा अधिक लाभ देकर, संधि कर ले । संधि हो जाने पर यदि वह उसका अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा चुपचाप संधि बनाये रखे । अथवा यातव्य के साथ संधि करके पूर्ववत् बना रहे । अथवा अपनी शत्रु सेना तथा आटविक सेना को संधि करने वाले अधिक शक्ति सामंत को दे दे ।

(२) व्यसन पीडित एवं आपत्तिग्रस्त अधिक शक्ति सामंत के साथ, सेना के बराबर लाभ देकर, संधि कर ले । संधि करने के बाद यदि वह उसका अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा संधि को पूर्ववत् बनाये रखे ।

(३) अधिक शक्ति सामंत को चाहिए कि व्यसनी एवं विपत्तिग्रस्त हीनशक्ति सामंत के साथ वह सेना की अपेक्षा कम लाभ देकर संधि कर ले । यदि वह अपकार करने में समर्थ हो तो उस पर आक्रमण कर दे, अन्यथा पूर्ववत् संधि बनाये रखे ।

(४) विजयेच्छु पणित (जिससे संधि की जाय) और पणमान (संधि करने वाला) दोनों को चाहिए कि वे ऊपर बताई गई संधियों के कारणों को भलीभांति समझ लें । उसके बाद संधि तथा विग्रह करने पर लाभ तथा हानि के परिणामों को समझ-बूझ कर जिसमें अपना कल्याण समझें उस मार्ग को अपनाये ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में सातवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११३-११४<br>अध्याय ८## यातव्यवृत्तिः, अनुग्राह्यमित्रविशेषाश्च

(१) यातव्योऽभियास्यमानः सन्धिकारणमादातुकामो विहस्तुकामो वा सामवायिकानामन्यतमं लाभद्वैगुण्येन पणेत। प्रपणिता क्षयव्ययप्रवास-प्रत्यवायपरोपकारशरीराबाधांश्चास्य वर्णयेत्। प्रतिपन्नमर्थेन योजयेत्। वैरं वा परैर्ग्राहयित्वा विसंवादयेत्।

(२) दुरारब्धकर्माणं भूयः क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामः स्वारब्धायां वा यात्रायां सिद्धिं विघातयितुकामो मूले यात्रायां वा प्रतिहर्तुकामो यातव्य-संहितः पुनर्याचितुकामः प्रत्युत्पन्नार्थकृच्छ्रस्तस्मिन्नविश्वस्तो वा तदात्वे लाभमल्पमिच्छेदायत्यां प्रभूतम्।

(३) मित्रोपकारममित्रोपघातमर्थानुबन्धमवेक्षमाणः पूर्वोपकारकं कारयितुकामो भूयस्तदात्वे महान्तं लाभमुत्सृज्यायत्यामल्पमिच्छेत्।


यातव्य सम्बन्धी व्यवहार और अनुग्रह करने वाले मित्रों के प्रति कर्त्तव्य

( १ ) यातव्य विजिगीषु को चाहिए कि आक्रमण करने से पहिले ही वह, सन्धि के कारणों को मानने वाले या उसकी अपेक्षा न रखने वाले सहायक ( सामवायिक ) के रूप में किसी एक सामंत के साथ, पूर्व निश्चित लाभ से, दुगुना लाभ देकर सन्धि कर ले । तदनन्तर उस साथी सामन्त के समक्ष वह : सेनाक्षय, धनव्यय, दूर प्रवास, मार्ग के विघ्न, शत्रुपक्ष में घुसकर उसका उपकार करना और शरीर पीड़ा आदि दोषों या बाधाओं को खोलकर रख दें । यदि वह इन सब बाधाओं को झेलना स्वीकार कर ले तो उसे प्रतिज्ञात धन दे दे । इसके विपरीत यदि वह सन्धि के कारणों को स्वीकार न करे तो दूसरे सामन्त से उसका विरोध करा कर, उससे अपनी सन्धि तोड़ दे ।

( २ ) अनुचित देश-काल में युद्ध-यात्रा का आरम्भ कर सामन्त को क्षय-व्यय-ग्रस्त करने की इच्छा रखने वाला या उचित देश-काल में युद्ध यात्रा करके अवश्य-म्भावी सिद्धि का विधान करने की इच्छा वाला या यात्रा करने पर दुर्ग आदि के ऊपर आक्रमण करने की इच्छा वाला; या यातव्य से पहिले थोड़ा ही लेकर सन्धि करके फिर अधिक माँग की इच्छा रखने वाला या आकस्मिक अर्थ-कष्ट से ग्रसित या यातव्य में अविश्वास करने वाला; उस समय थोड़ा ही लाभ लेकर सन्धि कर ले और फिर भविष्य में अधिक धन लेने की इच्छा करे ।

( ३ ) यदि उसे यह सम्भावना हो कि आगे चलकर मित्र से उसको लाभ होगा;

४९० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण

(१) दूष्यामित्राभ्यां मूलहरेण वा ज्यायसा विगृहीतं त्रातुकामस्तथा-विधमुपकारं कारयितुकामः सम्बन्धापेक्षी वा तदात्वे च आयत्यां लाभं न प्रतिगृह्णीयात् । (२) कृतसन्धिरतिक्रमितुकामः परस्य प्रकृतिकर्शनं मित्रामित्रसन्धि-विश्लेषणं वा कर्तुकामः पराभियोगाच्छङ्कमानो लाभमप्राप्तमधिकं याचेत । तमितरस्तदात्वे च आयत्यां च क्रममवेक्षेत । तेन पूर्वे व्याख्याताः । (३) अरिविजिगीष्वोस्तु स्वं स्वं मित्रमनुगृह्णतोः शक्यकल्यभव्या-रम्भिस्थिरकर्मानुरक्तप्रकृतिभ्यो विशेषः । शक्यारम्भी विषह्यं कर्मारभेत् । कल्यारम्भी निर्दोषम् । भव्यारम्भी कल्याणोदयम् । स्थिरकर्मा नासमाप्य कर्मोपरमते । अनुरक्तप्रकृतिः सुसहायत्वादल्पेनाप्यनुग्रहेण कार्यं साधयति । त एते कृतार्थाः सुखेन प्रभूतं चोपकुर्वन्ति । अतः प्रतिलोमेनानुग्राह्याः ।

शत्रुओं को वह हानि कर पायेगा; पुराने सहायक पुनः सहायता करेंगे; ऐसी स्थिति में उस समय अधिक लाभ को छोड़ कर भविष्य में भी वह थोड़े ही लाभ की कामना करे ।

( १ ) यदि वह चाहता हो कि दूष्य, शत्रु एवं अधिकशक्ति सामन्त से उसके साथी सामन्त की रक्षा हो जाय अथवा अपने प्रति भी इसी प्रकार के उपकारों को चाहे; और यह चाहे कि यातव्य के साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाय, तो उस समय और भविष्य में भी अपने साथी से कुछ भी लाभ न ले ।

( २ ) यदि वह पहिले की गई सन्धि को तोड़ना चाहे या शत्रुप्रकृति को नष्ट करना चाहे या मित्र तथा शत्रु की सन्धि को तोड़ना चाहे या उसे शत्रु के आक्रमण की आशंका हो या अप्राप्त पूर्व निश्चित लाभ से अधिक लाभांश की माँग करे, ऐसी दशा में दूसरे सामन्त को चाहिए, जिससे लाभ की माँग की गई है, कि वह इस प्रकार की माँग के सम्बन्ध में उस समय और भविष्य में होने वाले लाभ तथा हानि का भलीभाँति विचार करे । इसी प्रकार पूर्वोक्त तीन पक्षों में भी हानि-लाभ का विचार समझना चाहिए ।

( ३ ) अपने-अपने मित्रों पर बड़ा अनुग्रह रखने वाले शत्रु और विजिगीषु, दोनों को चाहिए कि वे १. शक्यारम्भी २. कल्याणारम्भी ३. भव्यारम्भी ४. स्थिर-कर्मा और ५. अनुरक्त प्रकृति, इन पाँच प्रकार के मित्रों पर विशेष अनुग्रह रखें । अपनी शक्ति के अनुसार कर सकने योग्य कार्य को ही आरम्भ करने वाला शक्या-रम्भी कहलाता है । दोष रहित कार्य को आरम्भ करने वाला कल्याणारम्भी कहलाता है । भविष्य में कल्याणप्रद फल को देने वाले को जो आरम्भ करे उसे भव्यारम्भी कहते हैं । आरम्भ किये हुए कार्य को जो समाप्त किये बिना न छोड़े उसे स्थिरकर्मा कहते हैं । अच्छे सहायक मिल जाने के कारण थोड़ी-सी सेना आदि से कार्य को पूरा कर देने वाला अनुरक्तप्रकृति कहलाता है । यदि इन पाँच प्रकार

प्र० ११३-११४ : अ० ८ ] [ यातव्य-अनुग्राह्य सम्बन्धी व्यवहार ४९१

(१) तयोरेकपुरुषानुग्रहे यो मित्रं मित्रतरं वानुगृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते । मित्रादात्मवृद्धिं हि प्राप्नोति । क्षयव्ययप्रवासपरोपकारान् इतरः । कृतार्थश्च शत्रुर्वैगुण्यमेति ।

(२) मध्यमं त्वनुगृह्णतोर्यो मध्यमं मित्रं मित्रतरं वानुगृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते । मित्रादात्मवृद्धिं हि प्राप्नोति । क्षयव्ययप्रवासपरोपकारानितरः । मध्यमश्चेदनुगृहीतो विगुणः स्यादमित्रोऽतिसन्धत्ते । कृतप्रयासं हि मध्यमामित्रमपसृतमेकार्थोपगतं प्राप्नोति ।

(३) तेनोदासीनानुग्रहो व्याख्यातः ।

(४) मध्यमोदासीनयोर्बलांशदाने यः शूरं कृतास्त्रं दुःखसहमनुरक्तं वा दण्डं ददाति, सोऽतिसन्धीयते । विपरीतोऽतिसन्धत्ते ।

(५) यत्र तु दण्डः प्रतिहतस्तं वा चार्थमन्यांश्च साधयति, तत्र मौलभृतश्रेणीमित्राटवीबलानामन्यतममुपलब्धदेशकालं दण्डं दद्यात् । अमित्राटवीबलं वा व्यवहितदेशकालम् ।


के मित्रों को सहायता देकर कृतार्थ किया जाय तो उनसे विजिगीषु को बहुत सहायता मिलती है । इनसे विपरीत अशक्यारम्भी आदि पर कदापि भी अनुग्रह न किया जाय ।

( १ ) यदि शत्रु और विजिगीषु दोनों एक ही व्यक्ति पर अनुग्रह करना चाहते हों, तो जो मित्र या अतिमित्र हो उस पर ही अनुग्रह किया जाय, क्योंकि वह अत्यन्त लाभ पहुँचाता है । मित्र से तो सर्वदा ही आत्मवृद्धि होती है, यदि उस पर अनुग्रह भी किया जाय तब तो कहना ही क्या है । जो भी मित्र की जगह शत्रु पर अनुग्रह करता है उसके पुरुष एवं धन का नाश होता है तथा दूर-दूर जाकर उसको शत्रु का उपकार करना पड़ता है, और कार्य सध जाने के बाद फिर शत्रु उससे बिगाड़ कर लेता है ।

( २ ) यदि शत्रु और विजिगीषु मध्यम राजा पर अनुग्रह करना चाहें तब भी मित्र अथवा अतिमित्र पर ही अनुग्रह करना ठीक होता है, क्योंकि मित्र से सदा ही अपनी संवृद्धि होती है और शत्रु पर अनुग्रह करने वाले को सदा ही क्षय, व्यय, प्रवास सहना पड़ता है तथा शत्रु का उपकार करना पड़ता है अनुगृहीत मध्यम राजा के बिगड़ जाने पर अपने शत्रु को ही विशेष लाभ होता है, क्योंकि मित्र बनकर बिगड़ जाने के बाद शत्रु बना मध्यम समान कार्य करने वाले विजिगीषु के शत्रु को अपना मित्र बना लेता है ।

( ३ ) इसी प्रकार उदासीन राजा पर अनुग्रह करने का सुफल कुफल समझ लेना चाहिए ।

( ४ ) मध्यम और उदासीन राजाओं को सेना की सहायता में जो अपने शस्त्र-सञ्चालन में कुशल, दुःखसहिष्णु एवं अनुरक्त सैनिक को दे डालते हैं वे धोखा खाते हैं, और जो ऐसा नहीं करता वह लाभ में रहता है ।

( ५ ) जिस कार्य को सम्पन्न करने के लिए एक बार भेजी हुई सेना नष्ट हो

४९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) यं तु मन्येत—'कृतार्थो मे दण्डं गृह्णीयादमित्राटव्यभूम्यनृतुषु वा वासयेदफलं वा कुर्यादि'ति दण्डव्यासङ्गापदेशेन नैनमनुगृह्णीयात् । एवमवश्यं त्वनुग्रहीतव्ये तत्कालसहमस्मै दण्डं दद्यात् । आ समाप्तैश्चैनं वासयेद्योधयेच्च, बलव्यसनेभ्यश्च रक्षेत् । कृतार्थच्च सापदेशमवस्त्रावयेत् । दूष्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् । यातव्येन वा सन्धायैनमतिसन्दध्यात् ।

(२) समे हि लाभे सन्धिः स्याद्विषमे विक्रमो मतः ।
समहीनविशिष्टानामित्युक्ताः सन्धिविक्रमाः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे यातव्यवृत्तिरग्राह्यमित्रविशेषो नाम अष्टमोऽध्याय; आदितः पञ्चशततमः ।

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गई हो उसकी पूर्ति के लिए तथा दूसरे कार्यों की सफलता के लिए ऐसे अवसर पर मौलबल, भृतबल, श्रेणीबल, मित्रबल और आटवीबल, इन पाँचों में से किसी एक सेना को उचित देश-काल के अनुसार भेज देना चाहिए । अथवा दूर देश और अधिक समय के लिए अमित्रबल या आटवीबल को ही भेजना चाहिए ।

( १ ) जिस उदासीन या मध्यम को यह समझा जाय कि : वह अपना कार्य निकाल लेने के बाद मेरी सेना को अपने वश में कर लेगा, या उसको शत्रु के पास, आटविक के पास, अयुक्त स्थानों तथा ऋतुओं में रखेगा, अथवा मेरी सेना को जीत का कोई हिस्सा न देगा' उसको कुछ बहाना बना कर सेना न दी जाय । यदि इस प्रकार के राजा की सहायता करनी परमावश्यक हो तो उतने समय तक के लिए उसको समर्थ सैनिक दिये जायें, जब तक कार्य समाप्त न हो और सुविधाजनक भूमि में सेना रहे तथा अवसर आने पर ही वह युद्ध करे, साथ ही सैनिक आपत्तियों या निरस्त्र हो जाने की स्थिति से उन्हें सुरक्षित रखे । कार्य हो जाने के बाद कुछ बहाना बनाकर सेना वापिस बुला ली जाय । फिर जरूरत पड़ने पर अपनो दूष्यसेना, शत्रु सेना या आटविक सेना को ही देना चाहिए, अथवा यातव्य के साथ मिलकर मध्यम या उदासीन राजा से खूब धन वसूल करे ।

( २ ) बराबर लाभ देने पर सन्धि और लाभांश में ज्यादा-कमी करने पर विग्रह कर देना चाहिए । इस अध्याय में सम, हीन और विशिष्ट राजाओं की सन्धि तथा विक्रम का निरूपण किया गया ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में यातव्यवृत्ति-अनुग्राह्यमित्रविशेष नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११५मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धयः
अध्याय ९

(१) संहितप्रयाणे मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्तरोत्तरो लाभः श्रेयान् । मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः, मित्रं हिरण्यलाभात् । यो वा लाभः सिद्धः शेषयोरन्यतरं साधयति । (२) 'त्वं चाहं च मित्रं लभावहे' इत्येवमादिः समसन्धिः । 'त्वं मित्रम्' इत्येवमादिर्विषमसन्धिः । तयोर्विशेषलाभादतिसन्धिः । (३) समसन्धौ तु यः सम्पन्नं मित्रं मित्रकृच्छ्रे वा मित्रमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । आपद्धि सौहृदस्थैर्यमुत्पादयति । (४) मित्रकृच्छ्रेऽपि नित्यमवश्यमनित्यं वश्यं वेति । 'नित्यमवश्यं श्रेयः, तद्ध्यनुपकुर्वदपि नापकरोति' इत्याचार्याः ।


मित्रसंधि और हिरण्यसंधि

( संधि-विचार १ )

(१) संयुक्त युद्ध-यात्रा में मित्र, हिरण्य और भूमि, इन लाभों में उत्तरोत्तर लाभ श्रेष्ठ है । क्योंकि भूमिलाभ से शेष दोनों लाभ प्राप्त हो सकते हैं और हिरण्य लाभ से मित्रलाभ सुलभ किया जा सकता है । अथवा जिस प्राप्त हुए लाभ से शेष दोनों या उनमें से कोई एक लाभ सिद्ध हो सके, वही श्रेष्ठ समझना चाहिए ।

(२) 'तुम और हम, दोनों मिलकर मित्र को लाभ पहुँचायें' इस प्रकार की गई संधि को समसंधि कहते हैं । 'तुम मित्र-लाभ प्राप्त करो और मैं हिरण्य का अथवा तुम हिरण्य का लाभ प्राप्त करो और मैं भूमि का' इस प्रकार की गई संधि को विषमसंधि कहते हैं । इन दोनों संधियों में पूर्व लिखित लाभ से अधिक लाभ प्राप्त हो तो वह अतिसंधि कहलाती है ।

(३) समसंधि में जो संपन्न मित्र को या विपत्तिग्रस्त मित्र को प्राप्त करता है, वह अतिसंधि के विशेष लाभ को प्राप्त करता है । क्योंकि आपत्ति में मित्रता और भी दृढ़ हो जाती है ।

(४) मित्र के विपत्तिकाल में, अपने वश में न रहने वाले नित्य मित्र का मिलना उत्तम है या अपने वश में रहने वाले अनित्य मित्र का मिलना अच्छा है ? इस संबंध में पुरातन आचार्यों का कहना है कि नित्य मित्र का प्राप्त करना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि वह उपकार न करे किन्तु अपकार कभी भी नहीं करता है ।

४९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः-वश्यमनित्यं श्रेयः, यावदुपकरोति तावन्मित्रं भवति । उपकारलक्षणं मित्रमिति ।

(२) वश्ययोरपि महाभोगमनित्यमल्पभोगं वा नित्यमिति । 'महाभोग-मनित्यं श्रेयः, महाभोगमनित्यमल्पकालेन महदुपकुर्वन्महान्ति व्ययस्थानानि प्रतिकरोति' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । नित्यमल्पभोगं श्रेयः, महाभोगमनित्यमुपकार-भयादपक्रामति, उपकृत्य वा प्रत्यादातुमीहते । नित्यमल्पभोगं सातत्यादल्प-मुपकुर्वन्महता कालेन महदुपकरोति ।

(४) गुरुसमुत्थं महान्मित्रं लघुसमुत्थमल्पं वेति । 'गुरुसमुत्थं महान्मित्रं प्रतापकरं भवति, यदा चोत्तिष्ठते, तदा कार्यं साधयति' इत्याचार्याः ।

(५) नेति कौटिल्यः-लघुसमुत्थमल्पं श्रेयः, लघुसमुत्थमल्पं मित्रं कार्यकालं नातिपातयति दौर्बल्याच्च यथेष्टभोग्यं भवति, नेतरत् प्रकृष्ट-भौमम् ।


(१) परन्तु कौटिल्य का कहना है कि अपने वश में रहने वाला अनित्य मित्र का प्राप्त होना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि जब तक वह उपकार करता रहता है तभी तक मित्र बना रहता है, मित्र का लक्षण ही अपने साथी की भलाई करना है ।

(२) 'अपने वश में रहने वाले दो मित्रों में से थोड़े समय के लिए अधिक कर देने वाला मित्र अच्छा है या हमेशा थोड़ा-थोड़ा कर देने वाला मित्र अच्छा है ?' पूर्वाचार्यों का कहना है कि थोड़े दिन तक अधिक कर देने वाला मित्र श्रेष्ठ है, क्योंकि वह थोड़े ही समय में बहुत ज्यादा धनादि देकर विजिगीषु का महान् उपकार कर देता है, तथा अपनी सहायता से राजकीय व्ययछिद्रों का भी प्रतीकार कर देता है ।

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि सदा के लिए थोड़ा-थोड़ा देने वाला मित्र श्रेष्ठ है, क्योंकि एक साथ अधिक देने के भय से मित्रता भी टूट जाती है और फिर वह अपने दिये गये धन को वापिस करने के लिए यत्न करता है । इसके विपरीत थोड़ा-थोड़ा धन देने वाला मित्र विजिगीषु का बड़ा उपकार करता है ।

(४) बड़ी कठिनाई और बड़े यत्न करने पर शत्रु से युद्ध करने के लिए तैयार होने वाला प्रबल मित्र अच्छा है या सरलता से शीघ्र ही तैयार हो जाने वाला निर्बल मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि कठिनता से तैयार होने वाला प्रबल मित्र ही अच्छा है, क्योंकि एक तो वह शत्रुओं का दमन कर सकेगा और दूसरे में कार्य को भी पूरा कर देगा ।

(५) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं है । उसका कहना है कि सरलता

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि-विचार ( १) ४९५

(१) विक्षिप्तसैन्यमवश्यसैन्यं वेति ? 'विक्षिप्तं सैन्यं शक्यं प्रतिसंहर्तुं वश्यत्वात्' इत्याचार्याः। (२) नेति कौटिल्यः। अवश्यसैन्यं श्रेयः। अवश्यं हि शक्यं सामादिभिर्वश्यं कर्तुं, नेतरत्कार्यव्यासक्तं प्रतिसंहर्तुम्। (३) पुरुषभोगं हिरण्यभोगं वा मित्रमिति। 'पुरुषभोगं मित्रं श्रेयः, पुरुषभोगं मित्रं प्रतापकरं भवति। यदा चोत्तिष्ठते तदा कार्यं साधयति' इत्याचार्याः। (४) नेति कौटिल्यः। हिरण्यभोगं मित्रं श्रेयः, नित्यो हिरण्येन योगः कदाचित् दण्डेन दण्डश्च हिरण्येनान्ये च कामाः प्राप्यन्त इति।


से शीघ्र तैयार हो जाने वाला निर्बल मित्र ही उत्तम है, क्योंकि ऐसा मित्र हरेक आवश्यकता पर काम आता है और इच्छानुसार उसको किसी भी कार्य में लगाया जा सकता है। इसके विपरीत ये सभी बातें दूसरे मित्र में नहीं होतीं, विशेषतया जब कि वह दूर देश में रहता है।

( १ ) 'कार्य सिद्धि के लिए अनेक स्थानों में विघटित राजा की वश्य सेना अच्छी है या जिसकी सेना तो अपने वश में न हो लेकिन सब अपने पास हो, ऐसा मित्र अच्छा है ?' पूर्वाचार्यों का इस संबंध में यह सुझाव है कि विघटित सेना शीघ्र ही एकत्र की जा सकती है।

( २ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि अपने पास ही एकत्र अवश्य सेना वाला राजा ही मित्र के लायक है; क्योंकि साम, दाम आदि उपायों से उस सेना को अपने वश में किया जा सकता है और शीघ्र ही इच्छित कार्यों में उसको लगाया जा सकता है। इसके विपरीत दूसरे कार्यों में व्यस्त बिखरी हुई सेना को तत्काल एकत्र कर अपने कार्यों में नहीं लगाया जा सकता है।

( ३ ) 'आदमियों की सहायता देने वाला मित्र अच्छा है ? या हिरण्य की सहायता देने वाला मित्र अच्छा है ? इन दोनों में आदमियों की सहायता देने मित्र ही अच्छा है, क्योंकि वह स्वयं ही शत्रुओं पर आक्रमण कर उन्हें दबा सकता है, और जब कभी भी कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है तो उस कार्य को पूरा भी कर डालता है ऐसा पूर्वाचार्यों का मत है।

( ४ ) किन्तु कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है। उसके मत से हिरण्य आदि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है, क्योंकि धन की आवश्यकता सदा ही बनी रहती है, जब कि सेना की आवश्यकता कभी-कभी ही होती है। और फिर धन के के द्वारा सेना-संग्रह भी किया जा सकता है तथा दूसरे अभीष्ट कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है।

४९६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) हिरण्यभोगं भूमिभोगं वा मित्रमिति । 'हिरण्यभोगं गतिमत्त्वात्सर्वव्ययप्रतीकारकरम्' इत्याचार्याः ।

(२) नेति कौटिल्यः—'मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः' इत्युक्तं पुरस्तात् । तस्माद्भूमिभोगं मित्रं श्रेय इति ।

(३) तुल्ये पुरुषभोगे विक्रमः क्लेशसहत्वमनुरागः सर्वबललाभी वा मित्रकुलाद्विशेषः ।

(४) तुल्ये हिरण्यभोगे प्रार्थितार्थता प्राभूत्यमल्पप्रयासता सातत्यं च विशेषः ।

(५) तत्रैतद्भवति—

नित्यं वश्यं लघूत्थानं पितृपैतामहं महत् ।
अद्वैध्यं चेति सम्पन्नं मित्रं षड्गुणमुच्यते ॥

(६)

ऋते यदर्थं प्रणयाद्रक्ष्यते यच्च रक्षति ।
पूर्वोपचितसम्बन्धं तन्मित्रं नित्यमुच्यते ॥

(७)

सर्वचित्रमहाभोगं त्रिविधं वश्यमुच्यते ।


(१) 'हिरण्य देने वाला मित्र श्रेष्ठ है या भूमि देने वाला मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि हिरण्य देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है; क्योंकि धन को जहाँ चाहो, इच्छानुसार लगाया जा सकता है और हर तरह का व्यय उससे पूरा किया जा सकता है ।

(२) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'मित्र और हिरण्य दोनों ही भूमि से प्राप्त किए जा सकते हैं' इस बात को पहिले ही बताया जा चुका है । इसलिए भूमि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है ।

(३) यदि दो मित्र समान रूप से पुरुषों की सहायता पहुँचाने वाले हों तो उनमें जो पराक्रमी, क्लेशसह; अनुरागी और मौलभृत आदि सभी प्रकार की सेनाएँ देने वाला हो वही श्रेष्ठ है ।

(४) इसी प्रकार समानरूप से हिरण्य आदि की सहायता पहुँचाने वाले दो मित्रों में वही मित्र श्रेष्ठ है; जो थोड़ा ही कहने पर बहुत धन दे और निरंतर ही ऐसा देता रहे ।

(५) मित्र और उनके गुण : गुण भेद से मित्र छह प्रकार के होते हैं; नित्य, वश्य, लघूत्थान, पितृ-पैतामह, महत् और अद्वैध्य ।

(६) निस्वार्थ भाव से पुराने संबंधों के कारण स्नेहवश विजिगीषु जिसकी रक्षा करता है और जो विजिगीषु की रक्षा करता है उसको नित्यमित्र कहते हैं ।

(७) वश्यमित्र तीन प्रकार का होता है : सर्वभोग, चित्रभोग और महाभोग ।

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९७

एकतोभोग्युभयतः सर्वतोभोगि चापरम् ॥
(१) आदातृ वा दात्रपि वा जीवत्यरिषु हिंसया ।
मित्रं नित्यमवश्यं तद् दुर्गाटव्यपसारि च ॥
(२) अन्यतो विगृहीतं यल्लघुव्यसनमेव वा ।
सन्धत्ते चोपकाराय तन्मित्रं वश्यमध्रुवम् ॥
(३) एकार्थानर्थसम्बन्धमुपकार्यविकारि च ।
मित्रभावि भवत्येतन्मित्रमद्वैध्यमापदि ॥
(४) मित्रभावाद्ध्रुवं मित्रं शत्रुसाधारणाच्चलम् ।
न कस्यचिदुदासीनं द्वयोरुभयभावि तत् ॥


जो सेना, धन, भूमि आदि सभी तरह से विजिगीषु की सहायता करता है वह सर्वभोग वश्यमित्र, जो केवल सेना एवं धन से विजिगीषु का महान् उपकार करे वह महाभोग वश्यमित्र; और जो रत्न, ताँबा, लोहा, लकड़ी के जंगल आदि से विजिगीषु की सहायता करता है वह चित्रभोग वश्यमित्र कहलाता है । अनर्थ-निवारण की दृष्टि से वश्यमित्र के तीन भेद और हैं; एकतोभोगी, उभयतोभोगी और सर्वतोभोगी । जो केवल शत्रु का प्रतीकार करे वह एकतोभोगी, जो शत्रु तथा शत्रुमित्र दोनों का प्रतीकार करे वह उभयतोभोगी; और जो शत्रु, शत्रुमित्र तथा आटविक आदि सब का प्रतीकार करे वह सर्वतोभोगी वश्यमित्र कहलाता है ।

( १ ) जो विजिगीषु का उपकार न करने पर भी शत्रुओं की लूट-मार करके अपना निर्वाह करता हो और जो दुर्ग एवं अटवी में सुरक्षित हो वह वश्यमित्रता हीन नित्यमित्र कहलाता है ।

( २ ) किन्तु जिस-जिस पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो, जिस पर थोड़ी विपत्ति आ पड़ी हो, इसलिए जो सहायतार्थ विजिगीषु से सन्धि करना चाहता है वह नित्यमित्रताहीन वश्यमित्र कहलाता है । उपकारक होने से वश्य और अपनी उन्नति-काल तक ही मित्रता रखने के कारण वह अनित्य है ।

( ३ ) जो दुःख-सुख को समान रूप से अनुभव करे, सदा उपकार करने वाला हो, कभी भी विमुख न हो और जो आपत्तिकाल में साथ न छोड़े वह अद्वैध्य मित्र है । उसके साथ मित्रता का नित्य संबंध होने के कारण उसको मित्रभावि भी कहते हैं ।

( ४ ) जो शत्रु और विजिगीषु, दोनों का उपकार न करे, जो दोनों का समान उपकार करे, जो दुर्बलतावश दोनों का सेवक बना रहे, वह उभयभावि मित्र कहलाता है ।

३२ कौ०

४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) विजिगीषोरमित्रं यन्मित्रमन्तर्धितां गतम् ।
उपकारे निविष्टं वाशक्तं वानुपकारि तत् ॥
(२) प्रियं परस्य वा रक्ष्यं पूज्यसम्बन्धमेव वा ।
अनुगृह्णाति यन्मित्रं शत्रुसाधारणं हि तत् ॥
(३) प्रकृष्टभौमं सन्तुष्टं बलवच्चालसं च यत् ।
उदासीनं भवत्येतद्व्यसनादवमानितम् ॥
(४) अरेर्नेतुश्च यद्वृद्धि दौर्बल्यादनुवर्तते ।
उभयस्याप्यविद्विष्टं विद्यादुभयभावि तत् ।
(५) कारणाकरणध्वस्तं कारणाकरणागतम् ।
यो मित्रं समपेक्षेत स मृत्युमुपगूहति ॥

(६) क्षिप्रमल्पो लाभश्चिरान्महानिति वा । 'क्षिप्रमल्पो लाभः कार्य-देशकालसंवादकः श्रेयान्' इत्याचार्याः ।

(७) नेति कौटिल्यः । चिरादविनिपाती बीजसधर्मा महान् लाभः श्रेयान्, विपर्यये पूर्वः ।


( १ ) जो विजिगीषु राजा अमित्र तथा शत्रु-विजिगीषु के बीच होने के कारण मित्र हो तथा इच्छा होने पर भी जो दोनों का उपकार न कर सके वह भी उभय-भावि मित्र है।

( २ ) जो विजिगीषु का मित्र हो तथा शत्रु का भी प्रिय एवं रक्ष्य ( रक्षा किए जाने योग्य ) हो और शत्रु के साथ जिसका कोई पूज्य सम्बन्ध हो, वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ३ ) दूसरे देश में रहने वाला, सन्तोषी, बलवान् और आलस्य एवं व्यसनों के कारण तिरस्कृत मित्र उपकार करने के समय उदासीन हो जाया करता है ।

( ४ ) जो मित्र दुर्बल होने के कारण शत्रु और विजिगीषु दोनों का अनुगामी होता है । किसी से भी द्वेष न करके दोनों की आज्ञा को मानता है वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ५ ) अकारण गत और अकारण आगत मित्र को जो आश्रय देता है । वह निश्चय ही अपनी मौत को स्वयं बुलाता है ।

( ६ ) 'शीघ्र होने वाला थोड़ा लाभ अच्छा है या देर में होने वाला बड़ा लाभ अच्छा है?' इस पर पूर्वाचार्यों का कथन है कि शीघ्र हो जाने वाला थोड़ा लाभ श्रेयस्कर है, क्योंकि उससे देश, काल और कार्य के लाभ को जाना जा सकता है ।

( ७ ) किन्तु कौटिल्य इससे सहमत नहीं है । उसका कहना है कि देर में होने

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९९

(१) एवं दृष्ट्वा ध्रुवे लाभे लाभांशे च गुणोदयम् । स्वार्थसिद्धिपरो यायात् संहितः सामवायिकैः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धिनम नवमोऽध्याय, आदितः षट्छत्ततमः ।

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वाला विघ्नरहित बीज आदि का महान लाभ ही उत्तम है । यदि महान लाभ में निधन होने की सम्भावना हो तो शीघ्र मिलनेवाला थोड़ा ही लाभ श्रेष्ठ है ।

( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने निश्चित लाभ या लाभांश के परिणाम को ठीक तरह से जानकर दूसरे राजाओं के साथ सन्धि करके अपनी कार्य सिद्धि के लिए तत्पर रहे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धि नामक नौवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११६# भूमिसन्धि
अध्याय १०

(१) 'त्वं चाहं च भूमिं लभावहे' इति भूमिसन्धिः । (२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थः सम्पन्नां भूमिमवाप्नोति सोऽतिसन्धत्ते । (३) तुल्ये सम्पन्नालाभे यो बलवन्तमाक्रम्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । भूमिलाभं शत्रुकर्शनं प्रतापं च हि प्राप्नोति । दुर्बलाद् भूमिलाभे सत्यं सौकर्यं भवति । दुर्बल एव च भूमिलाभः, तत्सामन्तश्च मित्रममित्रभावं गच्छति । (४) तुल्ये बलीयस्त्वे यः स्थिरं शत्रुमुत्पाट्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । दुर्गावाप्तिर्हि स्वभूमिरक्षणममित्राटवीप्रतिषेधं च करोति ।


भूमिसन्धि

( सन्धि-विचार-२ )

( १ ) 'तुम और हम मिलकर भूमि को प्राप्त करें' इस प्रकार की गई भूमि-विषयक सन्धि को भूमिसन्धि कहते हैं ।

( २ ) शत्रु और विजिगीषु, दोनों में जो भी धन और गुणी भृत्यों को शीघ्र उपस्थित कर सम्पन्न भूमि को प्राप्त करता है, वह विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) दोनों को समान रूप से सम्पन्न भूमि के प्राप्त हो जाने पर भी जो बलवान् शत्रु पर आक्रमण करके भूमि को प्राप्त करता है वही विशेष लाभ में रहता है; क्योंकि एक तो उसे भूमि का लाभ होता है और दूसरे अपने बलवान् शत्रु का नाश कर वह अपने प्रताप का भी विस्तार करता है । यद्यपि दुर्बल से भूमि प्राप्त करना निःसन्देह सुगम है, तथापि इस प्रकार का भूमि लाभ निकृष्ट कोटि का होता है: क्योंकि यह लाभ दुर्बल की हिंसा करके प्राप्त होता है और दूसरे में दुर्बल के पड़ोसी सामंत तथा विजिगीषु के मित्र भी उसके आचरण से क्षुब्ध होकर उसके शत्रु बन जाते हैं । इसलिए दुर्बल से भूमि लेना श्रेयस्कर नहीं है ।

( ४ ) दो समान बलशाली शत्रुओं के होने पर, जो विजिगीषु स्थायी शत्रु का नाश कर भूमि प्राप्त करता है, वही विशेष लाभ में है; क्योंकि शत्रु के दुर्ग आदि अपने हाथों में आ जाने पर विजिगीषु की भूमि की रक्षा हो जाती है और आटविकों का प्रतीकार करना भी उसके लिए सरल हो जाता है ।

प्र० ११६ : अ० १० ] सन्धि विचार ( २ ) ५०१

(१) चलामित्राद्भूमिलाभे शक्यसामन्ततो विशेषः । दुर्बलसामन्ता हि क्षिप्राप्यायनयोगक्षेमा भवति । विपरीता बलवत्सामन्ता कोशदण्डावच्छेदनी च भूमिर्भवति ।

(२) सम्पन्ना नित्याममित्रा मन्दगुणा वा भूमिरनित्याममित्रेति । 'सम्पन्ना नित्याममित्रा श्रेयसी भूमिः । सम्पन्ना हि कोशदण्डौ सम्पादयति । तौ चामित्रप्रतिघातकौ' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः—नित्याममित्रालाभे भूयाञ्छत्रुलाभो भवति । नित्यश्च शत्रुरुपकृते चापकृते च शत्रुरेव भवति । अनित्यस्तु शत्रुरुपकारादनपकाराद्वा शाम्यति ।

(४) यस्या हि भूमेर्बहुदुर्गाश्चोरगणैर्म्लेंच्छाटवीभिर्वा नित्याविरहताः प्रत्यन्ताः, सा नित्याममित्रा । विपर्यये त्वनित्याममित्रेति ।

(५) अल्पा प्रत्यासन्ना महती व्यवहिता वा भूमिरिति । अल्पा प्रत्यासन्ना श्रेयसी । सुखा हि प्राप्तुं पालयितुमभिसारयितुं च भवति । विपरीता व्यवहिता ।


( १ ) चलायमान शत्रु से भूमि लाभ करने पर उसी दशा में विशेष लाभ होता है जब उस चलायमान शत्रु का पड़ोसी दुर्बल हो; क्योंकि ऐसी भूमि विजिगीषु को शीघ्र ही योग क्षेम की देने वाली होती है। इसके विपरीत जिस विजित भूमि का सामन्त बलवान् हो वह सर्वदा अनिष्टकर होती है; विजिगीषु के कोश और बल को क्षीण करने वाली होती है ।

( २ ) 'विजिगीषु के लिए सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है या अत्यल्प सम्पन्न एवं अनित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है ?' इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का मन्तव्य है कि सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि सम्पन्न भूमि के द्वारा कोश तथा सेना, दोनों को बढ़ाया जा सकता है, जिससे कि शत्रुओं का उच्छेद किया जा सकता है ।

( ३ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य को स्वीकार नहीं करता है । उसका कहना है कि नित्य शत्रु की भूमि लेने से शत्रुता बहुत बढ़ जाती है; क्योंकि जो नित्य शत्रु है उसका उपकार किया जाय या अपकार; वह रहता शत्रु ही है । किन्तु अनित्य शत्रु का उपकार या अपकार करने पर वह शान्त हो जाता है ।

( ४ ) जिस भूमि के सीमा प्रान्तों के बहुत से दुर्ग चोरों, म्लेच्छों तथा आटविकों से सदा घिरे रहते हैं वह भूमि नित्याममित्रा कहलाती है; और इसके विपरीत भूमि अनित्याममित्रा कहलाती है ।

( ५ ) 'प्राप्त होने वाली भूमियों में निकटवर्ती थोड़ी भूमि ठीक है या दूर की