महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
देवताओंके साथ रहते हैं।
सूदिता मौरवाः पाशा निशुम्भनरकौ हतौ ।
कृतक्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥
शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिता भरतर्षभ ।
धनुषश्च प्रणादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥
भरतश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्णने मुरदैत्यके पाश काट दिये, निशुम्भ और नरकासुरको मार डाला और प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये निष्कण्टक बना दिया। इन्होंने अपने धनुषकी टंकार और पांचजन्य शंखके हुंकारसे समस्त भूपालोंको आतंकित कर दिया है।
मेघप्रख्यैरनीकैश्च दाक्षिणात्यैः सुसंवृतम् ।
रुक्मिणं त्रासयामास केशवो भरतर्षभ ॥
भरतकुलभूषण! भगवान् केशवने उस रुक्मीको भी भयभीत कर दिया, जिसके पास मेघोंकी घटाके समान असंख्य सेनाएँ हैं और जो दाक्षिणात्य सेवकोंसे सदा सुरक्षित रहता है।
ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ।
उवाह महिषीं भोज्यामेष चक्रगदाधरः ॥
इन चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने रुक्मीको हराकर सूर्यके समान तेजस्वी तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा भोजकुलोत्पन्ना रुक्मिणीका अपहरण किया, जो इस समय इनकी महारानीके पदपर प्रतिष्ठित हैं।
जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः ।
वक्रश्च सह शैब्येन शतधन्वा च क्षत्रियः ॥
ये जारूथी नगरीमें वहाँके राजा आहुतिको तथा क्राथ एवं शिशुपालको भी परास्त कर चुके हैं। इन्होंने शैब्य, दन्तवक्र तथा शतधन्वा नामक क्षत्रियोंको भी हराया है।
इन्द्रद्युम्नो हतः क्रोधाद् यवनश्च कशेरुमान् ।
इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन और कशेरुमान्का भी क्रोधपूर्वक वध किया है।
पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः ॥
विभिद्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनमयोधयत् ।
कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करके द्युमत्सेनके साथ युद्ध किया।
महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ ॥
जग्राह भरतश्रेष्ठ वरुणस्याभितश्चरौ ।
इरावत्यामुभौ चैतावग्निसूर्यसमौ बले ॥
गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ।
भरतश्रेष्ठ! जो बलमें अग्नि और सूर्यके समान थे और वरुणदेवताके उभय पार्श्वमें विचरण करते तथा जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा महेन्द्र पर्वतके शिखरपर इरावती नदीके किनारे पकड़े और मारे गये।
अक्षप्रपतने चैव नेमिहंसपथेषु च ।। उभौ तावपि कृष्णेन स्वराष्ट्रे विनिपातितौ ।
अक्षप्रपतनके अन्तर्गत नेमिहंसपथ नामक स्थानमें, जो उनके अपने ही राज्यमें पड़ता था, उन दोनोंको भगवान् श्रीकृष्णने मारा था।
प्राग्ज्योतिषं पुरश्रेष्ठमसुरैर्बहुभिर्वृतम् । प्राप्य लोहितकूटानि कृष्णेन वरुणो जितः ।। अजेयो दुष्प्रधर्षश्च लोकपालो महाद्युतिः ।
बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पुरश्रेष्ठ प्राग्ज्योतिषमें पहुँचकर वहाँकी पर्वतमालाके लाल शिखरोंपर जाकर श्रीकृष्णने उन लोकपाल वरुणदेवतापर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्धर्ष, अजेय एवं अत्यन्त तेजस्वी हैं।
इन्द्रद्वीपो महेन्द्रेण गुप्तो मघवता स्वयम् ।। पारिजातो हृतः पार्थ केशवेन बलीयसा ।
पार्थ! यद्यपि इन्द्र पारिजातके लिये द्वीप (रक्षक) बने हुए थे, स्वयं ही उसकी रक्षा करते थे, तथापि महाबली केशवने उस वृक्षका अपहरण कर लिया।
पाण्ड्यं पौण्ड्रं च मात्स्यं च कलिङ्गं च जनार्दनः ।। जघान सहितान् सर्वानङ्गराजं च माधवः ।
लक्ष्मीपति जनार्दनने पाण्ड्य, पौण्ड्र, मत्स्य, कलिंग और अंग आदि देशोंके समस्त राजाओंको एक साथ पराजित किया।
एष चैकशतां हत्वा रथेन क्षत्रपुङ्गवान् ।। गान्धारीमवहत् कृष्णो महिषीं यादवर्षभः ।
यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने केवल एक रथपर चढ़कर अपने विरोधमें खड़े हुए सौ क्षत्रियनरेशोंको मौतके घाट उतारकर गान्धारराजकुमारी शिंशुमाको अपनी महारानी बनाया।
बभ्रोश्च प्रियमन्विच्छन्नेष चक्रगदाधरः ।। वेणुदारिहतां भार्यामुन्ममाथ युधिष्ठिर ।
युधिष्ठिर! चक्र और गदा धारण करनेवाले इन भगवान्ने बभ्रुका प्रिय करनेकी इच्छासे वेणुदारिके द्वारा अपहृत की हुई उनकी भार्याका उद्धार किया था।
पर्याप्तां पृथिवीं सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् ।। वेणुदारिवशे युक्तां जिगाय मधुसूदनः ।
इतना ही नहीं; मधुसूदनने वेणुदारिके वशमें पड़ी हुई घोड़ों, हाथियों एवं रथोंसहित
सम्पूर्ण पृथ्वीको भी जीत लिया।
अवाप्य तपसा वीर्यं बलमोजश्च भारत ।।
त्रासिताः सगणाः सर्वे बाणेन विबुधाधिपाः ।
वज्राशनिगदापाशैस्त्रासयद्भिरनेकशः ।।
तस्य नासीद् रणे मृत्युर्देवैरपि सवासवैः ।
सोऽभिभूतश्च कृष्णेन निहतश्च महात्मना ।।
छित्त्वा बाहुसहस्रं तद् गोविन्देन महात्मना।
भारत! जिस बाणासुरने तपस्याद्वारा बल, वीर्य और ओज पाकर समस्त देवेश्वरोंको
उनके गणोंसहित भयभीत कर दिया था, इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा बारंबार वज्र, अशनि,
गदा और पाशोंका प्रहार करके त्रास दिये जानेपर भी समरांगणमें जिसकी मृत्यु न हो सकी,
उसी दैत्यराज बाणासुरको महामना भगवान् गोविन्दने उसकी सहस्र भुजाएँ काटकर
पराजित एवं क्षत-विक्षत कर दिया।
एष पीठं महाबाहुः कंसं च मधुसूदनः ।।
पैठकं चातिलोमानं निजघान जनार्दनः ।
मधु दैत्यका विनाश करनेवाले इन महाबाहु जनार्दनने पीठ, कंस, पैठक और
अतिलोमा नामक असुरोंको भी मार दिया।
जम्भमैरावतं चैव विरूपं च महायशाः ।।
जघान भरतश्रेष्ठ शम्बरं चारिमर्दनम् ।
भरतश्रेष्ठ! इन महायशस्वी श्रीकृष्णने जम्भ, ऐरावत, विरूप और शत्रुमर्दन
शम्बरासुरको भी (अपनी विभूतियों-द्वारा) मरवा डाला।
एष भोगवतीं गत्वा वासुकिं भरतर्षभ ।।
निर्जित्य पुण्डरीकाक्षो रौहिणेयममोचयत् ।
भरतकुलभूषण! इन कमलनयन श्रीहरिने भोगवती-पुरीमें जाकर वासुकि नागको
हराकर रोहिणीनन्दनको* बन्धनसे छुड़ाया।
एवं बहूनि कर्माणि शिशुरेव जनार्दनः ।।
कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् ।
इस प्रकार संकर्षणसहित कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें ही बहुत-से
अद्भुत कर्म किये थे।
एवमेषोऽसुराणां च सुराणां चापि सर्वशः ।।
भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
ये ही देवताओं और असुरोंको सर्वथा अभय तथा भय देनेवाले हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही
सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं।
एवमेष महाबाहुः शास्ता सर्वदुरात्मनाम् ।।
कृत्वा देवार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते ।
इस प्रकार सम्पूर्ण दुष्टोंका दमन करनेवाले ये महाबाहु भगवान् श्रीहरि अनन्त देवकार्य सिद्ध करके अपने परमधामको पधारेंगे।
एष भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ।।
द्वारकामात्मसात् कृत्वा सागरं गमयिष्यति ।
ये महायशस्वी श्रीकृष्ण मुनिजनवांछित एवं भोगोंसे सम्पन्न रमणीय द्वारकापुरीको आत्मसात् करके समुद्रमें विलीन कर देंगे।
बहुपुण्यवतीं रम्यां चैत्ययूपवतीं शुभाम् ।।
द्वारकां वरुणावासं प्रवेश्यति सकाननाम् ।
ये चैत्य और यूपोंसे सम्पन्न, परम पुण्यवती, रमणीय एवं मंगलमयी द्वारकाको वन-उपवनोंसहित वरुणालयमें डुबा देंगे।
तां सूर्यसदनप्रख्यां मनोज्ञां शार्ङ्गधन्वना ।।
विश्लिष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति ।
सूर्यलोकके समान कान्तिमती एवं मनोरम द्वारकापुरीको जब शार्ङ्गधन्वा वासुदेव त्याग देंगे, उस समय समुद्र इसे अपने भीतर ले लेगा।
सुरासुरमनुष्येषु नाभून्न भविता क्वचित् ।।
यस्तामध्यवसद् राजा अन्यत्र मधुसूदनात् ।
भगवान् मधुसूदनके सिवा देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें ऐसा कोई राजा न हुआ और न होगा ही, जो द्वारकापुरीमें रहनेका संकल्प भी कर सके।
भ्राजमानास्तु शिशवो वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।।
तज्जुष्टं प्रतिपत्स्यन्ते नाकपृष्ठं गतासवः ।
उस समय वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी एवं उनके कान्तिमान् शिशु भी प्राण त्यागकर भगवत्सेवित परमधामको प्राप्त करेंगे।
एवमेव दशार्हाणां विधाय विधिना विधिम् ।।
विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च सविता स्वयम् ।
इस प्रकार ये दशार्हवंशियोंके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे। ये स्वयं ही विष्णु, नारायण, सोम, सूर्य और सविता हैं।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्रकामगमो वशी ।।
मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ।
ये अप्रमेय हैं। इनपर किसीका नियन्त्रण नहीं चल सकता। ये इच्छानुसार चलनेवाले और सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनेसे खेलता है, उसी प्रकार ये भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ आनन्दमयी क्रीड़ा करते हैं।
नैष गर्भत्वमापेदे न योन्यामवसत् प्रभुः ।।
आत्मनस्तेजसा कृष्णः सर्वेषां कुरुते गतिम् ।
ये प्रभु न तो किसीके गर्भमें आते हैं और न किसी योनिविशेषमें ही इनका आवास हुआ है अर्थात् ये अपने-आप ही प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण अपने ही तेजसे सबकी सद्गति करते हैं।
यथा बुद्बुद उत्थाय तत्रैव प्रविलीयते ।।
चराचराणि भूतानि तथा नारायणे सदा ।
जैसे बुद्बुद पानीसे उठकर फिर उसीमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार समस्त चराचर भूत सदा भगवान् नारायणसे प्रकट होकर उन्हींमें विलीन हो जाते हैं।
न प्रमातुं महाबाहुः शक्यो भारत केशवः ।।
परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ।
भारत! इन महाबाहु केशवकी कोई इतिश्री नहीं बतायी जा सकती। इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न पर और अपर कुछ भी नहीं है।
अयं तु पुरुषो बालः शिशुपालो न बुध्यते ।
सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते ।। ३० ।।
यह शिशुपाल मूढ़बुद्धि पुरुष है, यह भगवान् श्रीकृष्णको सर्वत्र व्यापक तथा सर्वदा स्थिर नहीं जानता है, इसीलिये उनके सम्बन्धमें ऐसी बातें कहता है ।। ३० ।।
यो हि धर्मं विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान् नरः ।
स वै पश्येद् यथा धर्मं न तथा चेदिराडयम् ।। ३१ ।।
जो बुद्धिमान् मनुष्य उत्तम धर्मकी खोज करता है, वह धर्मके स्वरूपको जैसा समझता है, वैसा यह चेदिराज शिशुपाल नहीं समझता ।। ३१ ।।
सवृद्धबालेष्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु ।
को नार्हं मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजयेत् ।।
अथवा वृद्धों और बालकोंसहित यहाँ बैठे हुए समस्त महात्मा राजाओंमें ऐसा कौन है, जो श्रीकृष्ण-को पूज्य न मानता हो या कौन है, जो इनकी पूजा न करता हो? ।। ३२ ।।
अथैनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति ।
दुष्कृतायां यथान्यायं तथायं कर्तुमर्हति ।। ३३ ।।
यदि शिशुपाल इस पूजाको अनुचित मानता है, तो अब उस अनुचित पूजाके विषयमें उसे जो उचित जान पड़े, वैसा करे ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि भीष्मवाक्ये अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।।
३८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें भीष्मवाक्य नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७२८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७६१ १/३ श्लोक हैं)
* जिनमें ऋतुधर्म (रजस्वलावस्था)-का प्रादुर्भाव न हुआ हो, उन्हें नग्निका कहते हैं।
* मूर्ति या शिवलिंगके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो। शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था।
* रोहिणीके गद और सारण आदि कई पुत्र थे।
अध्याय (पृष्ठ 1977)
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाबलः ।
व्याजहारोत्तरं तत्र सहदेवोऽर्थवद् वचः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर महाबली भीष्म चुप हो गये। तत्पश्चात् माद्रीकुमार सहदेवने शिशुपालकी बातोंका मुँहतोड़ उत्तर देते हुए यह सार्थक बात कही— ॥ १ ॥
केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम् ।
पूज्यमानं मया यो वः कृष्णं न सहते नृपाः ॥ २ ॥
सर्वेषां बलिनां मूर्ध्नि मयेदं निहितं पदम् ।
एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रब्रवीतु सः ॥ ३ ॥
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशयः ।
‘राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है ॥ २-३ १/२ ॥
मतिमन्तश्च ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम् ॥ ४ ॥
अर्च्यमर्चितमर्हार्हमनुजानन्तु ते नृपाः ।
‘जो बुद्धिमान् राजा हों वे मेरे द्वारा की हुई आचार्य, पिता, गुरु, पूजनीय तथा अर्घ्यनिवेदनके सर्वथा योग्य भगवान् श्रीकृष्णकी पूजाका हृदयसे अनुमोदन करें’ ॥ ४ १/२ ॥
ततो न व्याजहारैषां कश्चिद् बुद्धिमतां सताम् ॥ ५ ॥
मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे ।
सहदेवने महामानी और बलवान् राजाओंके बीच खड़े होकर अपना पैर दिखाया था, तो भी जो बुद्धिमान् एवं श्रेष्ठ नरेश थे, उनमेंसे कोई कुछ न बोला ॥ ५ १/२ ॥
ततोऽपतत् पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि ॥ ६ ॥
अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यब्रुवन् साधु साध्विति ।
उस समय सहदेवके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और अदृश्यरूपसे खड़े हुए देवताओंने 'साधु', 'साधु' कहकर उनके सत्साहसकी प्रशंसा की॥ ६ १/२॥
आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पकः॥ ७॥
सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित्।
उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वचः॥ ८॥
तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले—॥ ७-८॥
कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नराः।
जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सम्भाष्याः कदाचन॥ ९॥
'जो मानव कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा नहीं करेंगे, वे जीते-जी ही मृतक-तुल्य समझे जायँगे। ऐसे लोगोंसे कभी बातचीत नहीं करनी चाहिये'॥ ९॥
वैशम्पायन उवाच
पूजयित्वा च पूजार्हान् ब्रह्मक्षत्रविशेषवित्।
सहदेवो नृणां देवः समापद्यत कर्म तत्॥ १०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियोंमें विशिष्ट व्यक्तियोंको पहचानने-वाले नरदेव सहदेवने क्रमशः पूज्य व्यक्तियोंकी पूजा करके वह अर्घ्यनिवेदनका कार्य पूरा कर दिया॥ १०॥
तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः।
अतिताम्रेक्षणः कोपादुवाच मनुजाधिपान्॥ ११॥
इस प्रकार श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जानेपर शत्रुविजयी शिशुपालने क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें करके समस्त राजाओंसे कहा—॥ ११॥
स्थितः सेनापतिर्योऽहं मन्यध्वं किं तु साम्प्रतम्।
युधि तिष्ठाम संनह्य समेतान् वृष्णिपाण्डवान्॥ १२॥
'भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो। आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जायँ'॥ १२॥
इति सर्वान् समुत्साह्य राज्ञस्तांश्चेदिपुङ्गवः।
यज्ञोपघाताय ततः सोऽमन्त्रयत राजभिः॥ १३॥
तत्राहूता गताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः।
समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा॥ १४॥
इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की। शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये। वे सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी ॥ १३-१४ ॥
युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चार्हणम् ।
न स्याद् यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाब्रुवन् ॥ १५ ॥
उन सबने यह कहा कि 'युधिष्ठिरके अभिषेक और श्रीकृष्णकी पूजाका कार्य सफल न हो, वैसा प्रयत्न करना चाहिये' ॥ १५ ॥
निष्कर्षात्रिश्शयात् सर्वे राजानः क्रोधमूर्च्छिताः ।
अब्रुवंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात् ॥ १६ ॥
इस निर्णय एवं निष्कर्षपर पहुँचकर वे सभी नरेश क्रोधसे मोहित हो गये। सहदेवकी बातोंसे अपमानका अनुभव करके अपनी शक्तिकी प्रबलताका विश्वास करके राजाओंने उपर्युक्त बातें कही थीं ॥ १६ ॥
सुहृद्भिर्वार्यमाणानां तेषां हि वपुराबभौ ।
आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम् ॥ १७ ॥
अपने सगे-सम्बन्धियोंके मना करनेपर भी उनका क्रोधसे तमतमाता हुआ शरीर उन सिंहोंके समान सुशोभित हुआ, जो मांससे वंचित कर दिये जानेके कारण दहाड़ रहे हों।
तं बलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम् ।
कुर्वाणं समयं कृष्णो युद्धाय बुबुधे तदा ॥ १८ ॥
राजाओंका वह समुदाय अक्षय समुद्रकी भाँति उमड़ रहा था। उसका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था। सेनाएँ ही उसकी अपार जलराशि थीं। उसे इस प्रकार शपथ करते देख भगवान् श्रीकृष्णने यह समझ लिया कि अब ये नरेश युद्धके लिये तैयार हैं ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि राजमन्त्रणे
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें राजाओंकी मन्त्रणाविषयक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
(शिशुपालवधपर्व)
(शिशुपालवधपर्व)
चत्वारिंंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना
वैशम्पायन उवाच
ततः सागरसंकाशं दृष्ट्वा नृपतिमण्डलम् ।
संवर्तवाताभिहतं भीमं क्षुब्धमिवार्णवम् ॥ १ ॥
रोषात् प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिरः ।
भीष्मं मतिमतां मुख्यं वृद्धं कुरुपितामहम् ।
बृहस्पतिं बृहत्तेजाः पुरुहूत इवारिहा ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रलयकालीन महावायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हुए भयंकर महासागरकी भाँति राजाओंके उस समुदायको क्रोधसे चंचल हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीसे उसी प्रकार बोले, जैसे शत्रुहन्ता महातेजस्वी इन्द्र बृहस्पतिजीसे कोई बात पूछते हैं— ॥ १-२ ॥
असौ रोषात् प्रचलितो महान् नृपतिसागरः ।
अत्र यत् प्रतिपत्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
'पितामह! यह देखिये, राजाओंका महासमुद्र रोषसे अत्यन्त चंचल हो उठा है। अब यहाँ इन सबको शान्त करनेका जो उचित उपाय जान पड़े, वह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
यज्ञस्य च न विघ्नः स्यात् प्रजानां च हितं भवेत् ।
यथा सर्वत्र तत् सर्वं ब्रूहि मेऽद्य पितामह ॥ ४ ॥
'दादाजी! यज्ञमें विघ्न न पड़े और प्रजाओंका हित हो तथा जिस प्रकार सर्वत्र शान्ति भी बनी रहे, वह सब उपाय अब मुझे बतानेकी कृपा करें' ॥ ४ ॥
इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
उवाचेदं वचो भीष्मस्ततः कुरुपितामहः ॥ ५ ॥
धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुरुकुलपितामह भीष्मजी इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल श्वा सिंहं हन्तुमर्हति ।
शिवः पन्थाः सुनीतोऽत्र मया पूर्वतरं वृतः ॥ ६ ॥
‘कुरुवंशके वीर! तुम डरो मत, क्या कुत्ता कभी सिंहको मार सकता है? हमने कल्याणमय मार्ग पहले ही चुन लिया है (श्रीकृष्णका आश्रय ही वह मार्ग है जिसका मैंने वरण कर लिया है)॥ ६॥
प्रसुप्ते हि यथा सिंहे श्वानस्तस्मिन् समागताः।
भषेयुः सहिताः सर्वे तथेमे वसुधाधिपाः॥ ७॥
वृष्णिसिंहस्य सुप्तस्य तथामी प्रमुखे स्थिताः।
‘जैसे सिंहके सो जानेपर बहुत-से कुत्ते उसके निकट आकर एक साथ भूँकने लगते हैं, उसी प्रकार ये सामने खड़े हुए राजा भी तभीतक भूँक रहे हैं, जबतक वृष्णिवंशका सिंह सो रहा है॥ ७ १/२॥
भषन्ते तात संक्रुद्धाः श्वानः सिंहस्य संनिधौ॥ ८॥
न हि सम्बुध्यते यावत् सुप्तः सिंह इवाच्युतः।
तेन सिंहीकरोत्येतान् नृसिंहश्चेदिपुङ्गवः॥ ९॥
पार्थिवान् पार्थिवश्रेष्ठः शिशुपालोऽप्यचेतनः।
सर्वान् सर्वात्मना तात नेतुकामो यमक्षयम्॥ १०॥
‘क्रोधमें भरे हुए कुत्तोंके समान ये लोग सिंहके निकट तभीतक कोलाहल मचा रहे हैं, जबतक भगवान् श्रीकृष्ण सिंहकी तरह जाग नहीं उठते—इन्हें दण्ड देनेके लिये उद्यत नहीं हो जाते। राजाओंमें श्रेष्ठ चेदिकुलभूषण नृसिंह शिशुपाल भी अपनी विवेकशक्ति खो बैठा है, तभी इन सब नरेशोंको यमलोकमें भेज देनेकी इच्छासे कुत्तेसे सिंह बनानेकी कोशिश कर रहा है॥ ८—१०॥
नूनमेतत् समादातुं पुनरिच्छत्यधोक्षजः।
यदस्य शिशुपालस्य तेजस्तिष्ठति भारत॥ ११॥
‘भारत! अवश्य ही भगवान् श्रीकृष्ण इस शिशुपालके भीतर उनका जो तेज है, उसे पुनः समेट लेना चाहते हैं॥ ११॥
विप्लुता चास्य भद्रं ते बुद्धिर्बुद्धिमतां वर।
चेदिराजस्य कौन्तेय सर्वेषां च महीक्षिताम्॥ १२॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। अवश्य ही इस चेदिराज शिशुपालकी तथा इन समस्त भूपालोंकी बुद्धि मारी गयी है॥ १२॥
आदातुं च नरव्याघ्रो यं यमिच्छत्ययं तदा।
तस्य विप्लवते बुद्धिरेवं चेदिपतेर्यथा॥ १३॥
‘क्योंकि नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण जिस-जिसको अपनेमें विलीन कर लेना चाहते हैं, उस-उस मनुष्यकी बुद्धि इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे इस चेदिराज शिशुपालकी॥ १३॥
चतुर्विधानां भूतानां त्रिषु लोकेषु माधवः।
प्रभवश्चैव सर्वेषां निधनं च युधिष्ठिरः॥ १४॥
‘युधिष्ठिर! माधव श्रीकृष्ण तीनों लोकोंमें जो स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज और जरायुज—ये चार प्रकारके प्राणी हैं, उन सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।। १४ ।।
वैशम्पायन उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा ततश्चेदिपतिर्नृपः ।
भीष्मं रूक्षाक्षरा वाचः श्रावयामास भारत ।। १५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर चेदिराज शिशुपाल उनको बड़ी कठोर बातें सुनाने लगा ।। १५ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि युधिष्ठिराश्वासने
चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासन नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।
अध्याय (पृष्ठ 1983)
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
शिशुपालद्वारा भीष्मकी निन्दा
शिशुपाल उवाच
विभीषिकाभिर्बह्वीभिर्भीषयन् सर्वपार्थिवान् ।
न व्यपत्रपसे कस्माद् वृद्धः सन् कुलपांसन ॥ १ ॥
शिशुपाल बोला— कुलको कलंकित करनेवाले भीष्म! तुम अनेक प्रकारकी विभीषिकाओंद्वारा इन सब राजाओंको डरानेकी चेष्टा कर रहे हो। बड़े-बूढ़े होकर भी तुम्हें अपने इस कृत्यपर लज्जा क्यों नहीं आती? ॥ १ ॥
युक्तमेतत् तृतीयायां प्रकृतौ वर्तता त्वया ।
वक्तुं धर्मादपेतार्थं त्वं हि सर्वकुरूत्तमः ॥ २ ॥
तुम तीसरी प्रकृतिमें स्थित (नपुंसक) हो, अतः तुम्हारे लिये इस प्रकार धर्मविरुद्ध बातें कहना उचित ही है। फिर भी यह आश्चर्य है कि तुम समूचे कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष कहे जाते हो ॥ २ ॥
नावि नौरिव सम्बद्धा यथान्धो बान्धमन्वियात् ।
तथाभूता हि कौरव्या येषां भीष्म त्वमग्रणीः ॥ ३ ॥
भीष्म! जैसे एक नाव दूसरी नावमें बाँध दी जाय, एक अंधा दूसरे अंधेके पीछे चले; वही दशा इन सब कौरवोंकी है, जिन्हें तुम-जैसा अगुआ मिला है ॥ ३ ॥
पूतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषतः ।
त्वया कीर्तयतास्माकं भूयः प्रव्यथितं मनः ॥ ४ ॥
तुमने श्रीकृष्णके पूतना-वध आदि कर्मोंका जो विशेषरूपसे वर्णन किया है, उससे हमारे मनको पुनः बहुत बड़ी चोट पहुँची है ॥ ४ ॥
अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छतः ।
कथं भीष्म न ते जिह्वा शतधेयं विदीर्यते ॥ ५ ॥
भीष्म! तुम्हें अपने ज्ञानीपनका बड़ा घमंड है, परंतु तुम हो वास्तवमें बड़े मूर्ख! ओह! इस केशवकी स्तुति करनेकी इच्छा होते ही तुम्हारी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते? ॥ ५ ॥
यत्र कुत्सा प्रयोक्तव्या भीष्म बालतरैर्नरैः ।
तमिमं ज्ञानवृद्धः सन् गोपं संस्तोतुमिच्छसि ॥ ६ ॥
भीष्म! जिसके प्रति मूर्ख-से-मूर्ख मनुष्योंको भी घृणा करनी चाहिये, उसी ग्वालियेकी तुम ज्ञानवृद्ध होकर भी स्तुति करना चाहते हो (यह आश्चर्य है!) ॥ ६ ॥
यद्यनेन हतो बाल्ये शकुनिश्चित्रमत्र किम् ।
तौ वाश्ववृषभौ भीष्म यौ न युद्धविशारदौ ॥ ७ ॥ भीष्म! यदि इसने बचपनमें एक पक्षी (बकासुर)-को अथवा जो युद्धकी कलासे सर्वथा अनभिज्ञ थे, उन अश्व (केशी) और वृषभ (अरिष्टासुर) नामक पशुओंको मार डाला तो इसमें क्या आश्चर्यकी बात हो गयी? ॥ ७ ॥
चेतनारहितं काष्ठं यद्यनेन निपातितम् । पादेन शकटं भीष्म तत्र किं कृतमद्भुतम् ॥ ८ ॥ भीष्म! छकड़ा क्या है, चेतनाशून्य लकड़ियोंका ढेर ही तो, यदि इसने पैरसे उसको उलट ही दिया तो कौन अनोखी करामात कर डाली? ॥ ८ ॥
(अर्कप्रमाणौ तौ वृक्षौ यद्यनेन निपातितौ । नागश्च पातितोऽनेन तत्र को विस्मयः कृतः ॥) आकके पौधोंके बराबर दो अर्जुन वृक्षोंको यदि श्रीकृष्णने गिरा दिया अथवा एक नागको ही मार गिराया तो कौन बड़े आश्चर्यका काम कर डाला?।
वल्मीकमात्रः सप्ताहं यद्यनेन धृतोऽचलः । तदा गोवर्धनो भीष्म न तच्चित्रं मतं मम ॥ ९ ॥ भीष्म! यदि इसने गोवर्धनपर्वतको सात दिनतक अपने हाथपर उठाये रखा तो उसमें भी मुझे कोई आश्चर्यकी बात नहीं जान पड़ती; क्योंकि गोवर्धन तो दीमकोंकी खोदी हुई मिट्टीका ढेरमात्र है ॥ ९ ॥
भुक्तमेतेन बह्वन्नं क्रीडता नगमूर्धनि । इति ते भीष्म शृण्वानाः परे विस्मयमागताः ॥ १० ॥ भीष्म! कृष्णने गोवर्धनपर्वतके शिखरपर खेलते हुए अकेले ही बहुत-सा अन्न खा लिया, यह बात भी तुम्हारे मुँहसे सुनकर दूसरे लोगोंको ही आश्चर्य हुआ होगा (मुझे नहीं) ॥ १० ॥
यस्य चानेन धर्मज्ञ भुक्तमन्नं बलीयसः । स चानेन हतः कंस इत्येतन्न महाद्भुतम् ॥ ११ ॥ धर्मज्ञ भीष्म! जिस महाबली कंसका अन्न खाकर यह पला था, उसीको इसने मार डाला। यह भी इसके लिये कोई बड़ी अद्भुत बात नहीं है ॥ ११ ॥
न ते श्रुतमिदं भीष्म नूनं कथयतां सताम् । यद् वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञं वाक्यं कुरुकुलाधम ॥ १२ ॥ कुरुकुलाधम भीष्म! तुम धर्मको बिल्कुल नहीं जानते। मैं तुमसे धर्मकी जो बात कहूँगा, वह तुमने संत-महात्माओंके मुखसे भी नहीं सुनी होगी ॥ १२ ॥
स्त्रीषु गोषु न शस्त्राणि पातयेद् ब्राह्मणेषु च । यस्य चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात् प्रतिश्रयः ॥ १३ ॥
स्त्रीपर, गौपर, ब्राह्मणोंपर तथा जिसका अन्न खाय अथवा जिनके यहाँ अपनेको आश्रय मिला हो, उनपर भी हथियार न चलाये ॥ १३ ॥
इति सन्तोऽनुशासन्ति सज्जनं धर्मिणः सदा ।
भीष्म लोके हि तत् सर्वं वितथं त्वयि दृश्यते ॥ १४ ॥
भीष्म! जगत्में साधु धर्मात्मा पुरुष सज्जनोंको सदा इसी धर्मका उपदेश देते रहते हैं; किंतु तुम्हारे निकट यह सब धर्म मिथ्या दिखायी देता है ॥ १४ ॥
ज्ञानवृद्धं च वृद्धं च भूयांसं केशवं मम ।
अजानत इवाख्यासि संस्तुवन् कौरवाधम ॥ १५ ॥
कौरवाधम! तुम मेरे सामने इस कृष्णकी स्तुति करते हुए इसे ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध बता रहे हो, मानो मैं इसके विषयमें कुछ जानता ही न होऊँ ॥ १५ ॥
गोघ्नः स्त्रीघ्नश्च सन् भीष्म त्वद्वाक्याद् यदि पूज्यते ।
एवंभूतश्च यो भीष्म कथं संस्तवमर्हति ॥ १६ ॥
भीष्म! यदि तुम्हारे कहनेसे गोघाती और स्त्रीहन्ता होते हुए भी इस कृष्णकी पूजा हो रही है तो तुम्हारी धर्मज्ञताकी हद हो गयी। तुम्हीं बताओ, जो इन दोनों ही प्रकारकी हत्याओंका अपराधी है, वह स्तुतिका अधिकारी कैसे हो सकता है? ॥ १६ ॥
असौ मतिमतां श्रेष्ठो य एष जगतः प्रभुः ।
सम्भावयति चाप्येवं त्वद्वाक्याच्च जनार्दनः ।
एवमेतत् सर्वमिति तत् सर्वं वितथं ध्रुवम् ॥ १७ ॥
तुम कहते हो—‘ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, ये ही सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं’ और तुम्हारे ही कहनेसे यह कृष्ण अपनेको ऐसा ही समझने भी लगा है। वह इन सभी बातोंको ज्यों-की-त्यों ठीक मानता है; परंतु मेरी दृष्टिमें कृष्णके सम्बन्धमें तुम्हारे द्वारा जो कुछ कहा गया है, वह सब निश्चय ही झूठा है ॥ १७ ॥
न गाथागाथिनं शास्ति बहु चेदपि गायति ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि भूलिङ्गशकुनिर्यथा ॥ १८ ॥
कोई भी गीत गानेवालेको कुछ सिखा नहीं सकता, चाहे वह कितनी ही बार क्यों न गाता हो। भूलिंग पक्षीकी भाँति सब प्राणी अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करते हैं ॥ १८ ॥
नूनं प्रकृतिरेषा ते जघन्या नात्र संशयः ।
अति पापीयसी चैषा पाण्डवानामपीष्यते ॥ १९ ॥
निश्चय ही तुम्हारी यह प्रकृति बड़ी अधम है, इसमें संशय नहीं है। अतएव इन पाण्डवोंकी प्रकृति भी तुम्हारे ही समान अत्यन्त पापमयी होती जा रही है ॥ १९ ॥
येषामर्च्यतमः कृष्णस्त्वं च येषां प्रदर्शकः ।
धर्मवांस्त्वमधर्मज्ञः सतां मार्गादवप्लुतः ॥ २० ॥
अथवा क्यों न हो, जिनका परम पूजनीय कृष्ण है और सत्पुरुषोंके मार्गसे गिरा हुआ तुम-जैसा धर्मज्ञानशून्य धर्मात्मा जिनका मार्गदर्शक है ॥ २० ॥
को हि धर्मिणमात्मानं जानन् ज्ञानविदां वरः ।
कुर्याद् यथा त्वया भीष्म कृतं धर्ममवेक्षता ॥ २१ ॥
भीष्म! कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनेको ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ और धर्मात्मा जानते हुए भी ऐसे नीच कर्म करेगा, जो धर्मपर दृष्टि रखते हुए भी तुम्हारे द्वारा किये गये हैं ॥ २१ ॥
चेत् त्वं धर्मं विजानासि यदि प्राज्ञा मतिस्तव ।
अन्यकामा हि धर्मज्ञा कन्यका प्राज्ञमानिना ।
अम्बा नामेति भद्रं ते कथं सापहृता त्वया ॥ २२ ॥
यदि तुम धर्मको जानते हो, यदि तुम्हारी बुद्धि उत्तम ज्ञान और विवेकसे सम्पन्न है तो तुम्हारा भला हो, बताओ, काशिराजकी जो धर्मज्ञ कन्या अम्बा दूसरे पुरुषमें अनुरक्त थी, उसका अपनेको पण्डित माननेवाले तुमने क्यों अपहरण किया? ॥ २२ ॥
तां त्वयापि हृतां भीष्म कन्यां नैषितवान् यतः ।
भ्राता विचित्रवीर्यस्ते सतां मार्गमनुष्ठितः ॥ २३ ॥
भीष्म! तुम्हारे द्वारा अपहरण की गयी उस काशिराजकी कन्याको तुम्हारे भाई विचित्रवीर्यने अपनानेकी इच्छा नहीं की, क्योंकि वे सन्मार्गपर स्थित रहनेवाले थे ॥ २३ ॥
दारयोर्यस्य चान्येन मिषतः प्राज्ञमानिनः ।
तव जातान्यपत्यानि सज्जनाचरिते पथि ॥ २४ ॥
उन्हींकी दोनों विधवा पत्नियोंके गर्भसे तुम-जैसे पण्डितमानीके देखते-देखते दूसरे पुरुषद्वारा संतानें उत्पन्न की गयीं, फिर भी तुम अपनेको साधु पुरुषोंके मार्गपर स्थिर मानते हो ॥ २४ ॥
को हि धर्मोऽस्ति ते भीष्म ब्रह्मचर्यमिदं वृथा ।
यद् धारयसि मोहाद् वा क्लीबत्वाद् वा न संशयः ॥ २५ ॥
भीष्म! तुम्हारा धर्म क्या है! तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य भी व्यर्थका ढकोसलामात्र है, जिसे तुमने मोहवश अथवा नपुंसकताके कारण धारण कर रखा है, इसमें संशय नहीं ॥ २५ ॥
न त्वहं तव धर्मज्ञ पश्याम्युपचयं क्वचित् ।
न हि ते सेविता वृद्धा य एवं धर्ममब्रवीः ॥ २६ ॥
धर्मज्ञ भीष्म! मैं तुम्हारी कहीं कोई उन्नति भी तो नहीं देख रहा हूँ। मेरा तो विश्वास है, तुमने ज्ञानवृद्ध पुरुषोंका कभी संग नहीं किया है। तभी तो तुम ऐसे धर्मका उपदेश करते हो ॥ २६ ॥
इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः ।
सर्वमेतदपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २७ ॥
यज्ञ, दान, स्वाध्याय तथा बहुत दक्षिणावाले बड़े-बड़े यज्ञ—ये सब संतानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ॥ २७ ॥
व्रतोपवासैर्बहुभिः कृतं भवति भीष्म यत् ।
सर्वं तदनपत्यस्य मोघं भवति निश्चयात् ॥ २८ ॥
भीष्म! अनेक व्रतों और उपवासोंद्वारा जो पुण्य कार्य किया जाता है, वह सब संतानहीन पुरुषके लिये निश्चय ही व्यर्थ हो जाता है ॥ २८ ॥
सोऽनपत्यश्च वृद्धश्च मिथ्याधर्मानुसारकः ।
हंसवत् त्वमपीदानीं ज्ञातिभ्यः प्राप्नुया वधम् ॥ २९ ॥
तुम संतानहीन, वृद्ध और मिथ्याधर्मका अनुसरण करनेवाले हो; अतः इस समय हंसकी भाँति तुम भी अपने जातिभाइयोंके हाथसे ही मारे जाओगे ॥ २९ ॥
एवं हि कथयन्त्यन्ये नरा ज्ञानविदः पुरा ।
भीष्म यत् तदहं सम्यग् वक्ष्यामि तव शृण्वतः ॥ ३० ॥
भीष्म! पहलेके विवेकी मनुष्य एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाया करते हैं, वही मैं ज्यों-का-त्यों तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥ ३० ॥
वृद्धः किल समुद्रान्ते कश्चिद्धंसोऽभवत् पुरा ।
धर्मवागन्यथावृत्तः पक्षिणः सोऽनुशास्ति च ॥ ३१ ॥
धर्म चरत माधर्ममिति तस्य वचः किल ।
पक्षिणः शुश्रुवुर्भीष्म सततं सत्यवादिनः ॥ ३२ ॥
पूर्वकालकी बात है, समुद्रके निकट कोई बूढ़ा हंस रहता था। वह धर्मकी बातें करता; परंतु उसका आचरण ठीक उसके विपरीत होता था। वह पक्षियोंको सदा यह उपदेश किया करता कि धर्म करो, अधर्मसे दूर रहो। सदा सत्य बोलनेवाले उस हंसके मुखसे दूसरे-दूसरे पक्षी यही उपदेश सुना करते थे ॥ ३१-३२ ॥
अथास्य भक्ष्यमाजह्रुः समुद्रजलचारिणः ।
अण्डजा भीष्म तस्यान्ये धर्मार्थमिति शुश्रुम ॥ ३३ ॥
भीष्म! ऐसा सुननेमें आया है कि वे समुद्रके जलमें विचरनेवाले पक्षी धर्म समझकर उसके लिये भोजन जुटा दिया करते थे ॥ ३३ ॥
ते च तस्य समभ्याशे निक्षिप्याण्डानि सर्वशः ।
समुद्राम्भस्यमज्जन्त चरन्तो भीष्म पक्षिणः ।
तेषामण्डानि सर्वेषां भक्षयामास पापकृत् ॥ ३४ ॥
भीष्म! हंसपर विश्वास हो जानेके कारण वे सभी पक्षी अपने अण्डे उसके पास ही रखकर समुद्रके जलमें गोते लगाते और विचरते थे; परंतु वह पापी हंस उन सबके अण्डे खा जाता था ॥ ३४ ॥
स हंसः सम्प्रमत्तानामप्रमत्तः स्वकर्मणि ।
ततः प्रक्षीयमाणेषु तेषु तेष्वण्डजोऽपरः । अशङ्कत महाप्राज्ञः स कदाचिद् ददर्श ह ॥ ३५ ॥ वे बेचारे पक्षी असावधान थे और वह अपना काम बनानेके लिये सदा चौकन्ना रहता था। तदनन्तर जब वे अण्डे नष्ट होने लगे, तब एक बुद्धिमान् पक्षीको हंसपर कुछ संदेह हुआ और एक दिन उसने उसकी सारी करतूत देख भी ली ॥ ३५ ॥
ततः स कथयामास दृष्ट्वा हंसस्य किल्बिषम् । तेषां परमदुःखार्तः स पक्षी सर्वपक्षिणाम् ॥ ३६ ॥ हंसका यह पापपूर्ण कृत्य देखकर वह पक्षी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो उठा और उसने अन्य सब पक्षियोंसे सारा हाल कह सुनाया ॥ ३६ ॥
ततः प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा पक्षिणस्ते समीपगाः । निजघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह ॥ ३७ ॥ कुरुवंशी भीष्म! तब उन पक्षियोंने निकट जाकर सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया और धर्मात्माका मिथ्या ढोंग बनाये हुए उस हंसको मार डाला ॥ ३७ ॥
ते त्वां हंससधर्माणमपीमे वसुधाधिपाः । निहन्युर्भीष्म संक्रुद्धाः पक्षिणस्तं यथाण्डजम् ॥ ३८ ॥ गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । भीष्म यां तां च ते सम्यक् कथयिष्यामि भारत ॥ ३९ ॥ तुम भी उस हंसके ही समान हो, अतः ये सब नरेश अत्यन्त कुपित होकर आज तुम्हें उसी तरह मार डालेंगे, जैसे उन पक्षियोंने हंसकी हत्या कर डाली थी। भीष्म! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान् एक गाथा गाया करते हैं। भरतकुलभूषण! मैं उसे भी तुमको भलीभाँति सुनाये देता हूँ ॥ ३८-३९ ॥
अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मैतत् तव वाचमतीयते ॥ ४० ॥ ‘हंस! तुम्हारी अन्तरात्मा रागादि दोषोंसे दूषित है, तुम्हारा यह अण्डभक्षणरूप अपवित्र कर्म तुम्हारी इस धर्मोपदेशमयी वाणीके सर्वथा विरुद्ध है’ ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते समापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवाक्ये एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवाक्यविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४१ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1989)
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना
शिशुपाल उवाच
स मे बहुमतो राजा जरासंधो महाबलः । योऽनेन युद्धं नेयेष दासोऽयमिति संयुगे ॥ १ ॥ शिशुपाल बोला—महाबली राजा जरासंध मेरे लिये बड़े ही सम्माननीय थे। वे कृष्णको दास समझकर इसके साथ युद्धमें लड़ना ही नहीं चाहते थे ॥ १ ॥
केशवेन कृतं कर्म जरासंधवधे तदा । भीमसेनार्जुनाभ्यां च कस्तत् साध्विति मन्यते ॥ २ ॥ तब इस केशवने जरासंधके वधके लिये भीमसेन और अर्जुनको साथ लेकर जो नीच कर्म किया है, उसे कौन अच्छा मान सकता है? ॥ २ ॥
अद्वारेण प्रविष्टेन छद्मना ब्रह्मवादिना । दृष्टः प्रभावः कृष्णेन जरासंधस्य भूपतेः ॥ ३ ॥ पहले तो (चैत्यकगिरिके शिखरको तोड़कर) बिना दरवाजेके ही इसने नगरमें प्रवेश किया। उसपर भी छद्मवेष बना लिया और अपनेको ब्राह्मण प्रसिद्ध कर दिया। इस प्रकार इस कृष्णने भूपाल जरासंधका प्रभाव देखा ॥ ३ ॥
येन धर्मात्मनाऽऽत्मानं ब्रह्मण्यमविजानता । नेषितं पाद्यमस्मै तद् दातुमग्रे दुरात्मने ॥ ४ ॥ उस धर्मात्मा जरासंधने जब इस दुरात्माके आगे ब्राह्मण अतिथिके योग्य पाद्य आदि प्रस्तुत किये, तब इसने यह जानकर कि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, उसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४ ॥
भुज्यतामिति तेनोक्ताः कृष्णभीमधनंजयाः । जरासंधेन कौरव्य कृष्णेन विकृतं कृतम् ॥ ५ ॥ कौरव्य भीष्म! तत्पश्चात् जब उन्होंने कृष्ण, भीम और अर्जुन तीनोंसे भोजन करनेका आग्रह किया, तब इस कृष्णने ही उसका निषेध किया था ॥ ५ ॥
यद्ययं जगतः कर्ता यथैनं मूर्ख मन्यसे । कस्मान्न ब्राह्मणं सम्यगात्मानमवगच्छति ॥ ६ ॥ मूर्ख भीष्म! यदि यह कृष्ण सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता है, जैसा कि तुम इसे मानते हो तो यह अपनेको भलीभाँति ब्राह्मण भी क्यों नहीं मानता? ॥ ६ ॥
इदं त्वाश्चर्यभूतं मे यदिमे पाण्डवास्त्वया । अपकृष्टाः सतां मार्गान्मन्यन्ते तच्च साध्विति ॥ ७ ॥ मुझे सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात तो यह जान पड़ती है कि ये पाण्डव भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गसे दूर हटा दिये गये हैं; इसलिये ये भी कृष्णके इस कार्यको ठीक समझते हैं ॥ ७ ॥ अथ वा नैतदाश्चर्यं येषां त्वमसि भारत । स्त्रीसधर्मा च वृद्धश्च सर्वार्थानां प्रदर्शकः ॥ ८ ॥ अथवा भारत! स्त्रीके समान धर्मवाले (नपुंसक) और बूढ़े तुम-जैसे लोग जिनके सभी कार्योंमें पथ-प्रदर्शन करते हैं, उनका ऐसा समझना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रूक्षं रूक्षाक्षरं बहु । चुकोप बलिनां श्रेष्ठो भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शिशुपालकी बातें बड़ी रूखी थीं। उनका एक-एक अक्षर कटुतासे भरा हुआ था। उन्हें सुनकर बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रतापी भीमसेन क्रोधाग्निसे जल उठे ॥ ९ ॥ तथा पद्मप्रतीकाशे स्वभावायतविस्तृते । भूयः क्रोधाभिताम्राक्षे रक्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ १० ॥ उनकी आँखें स्वभावतः बड़ी-बड़ी और कमलके समान सुन्दर थीं। वे क्रोधके कारण अधिक लाल हो गयीं; मानो उनमें खून उतर आया हो ॥ १० ॥ त्रिशिखां भ्रुकुटीं चास्य ददृशुः सर्वपार्थिवाः । ललाटस्थां त्रिकूटस्थां गङ्गां त्रिपथगामिव ॥ ११ ॥ सब राजाओंने देखा, उनके ललाटमें तीन रेखाओंसे युक्त भ्रुकुटी तन गयी है; मानो त्रिकूटपर्वतपर त्रिपथगामिनी गंगा लहरा उठी हों ॥ ११ ॥ दन्तान् संदशतस्तस्य कोपाद् ददृशुराननम् । युगान्ते सर्वभूतानि कालस्येव जिघत्सतः ॥ १२ ॥ वे दाँतोंसे दाँत पीसने लगे, रोषकी अधिकतासे उनका मुख ऐसा भयंकर दिखायी देने लगा; मानो प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको निगल जानेकी इच्छावाला विकराल काल ही प्रकट हो गया हो ॥ १२ ॥ उत्पतन्तं तु वेगेन जग्राहैनं मनस्विनम् । भीष्म एव महाबाहुर्महासेनमिवेश्वरः ॥ १३ ॥ वे उछलकर शिशुपालके पास पहुँचना ही चाहते थे कि महाबाहु भीष्मने बड़े वेगसे उठकर उन मनस्वी भीमको पकड़ लिया, मानो महेश्वरने कार्तिकेयको रोक लिया हो ॥ १३ ॥