महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नागराज! यदि वैदिक संस्कार करके वेदाध्ययन करनेपर भी ब्राह्मणादि वर्णोंमें अपेक्षित शील और सदाचारका उदय नहीं हुआ तो उसमें प्रबल वर्णसंकरता है, ऐसा विचारपूर्वक निश्चय किया गया है ।।
यत्रेदानीं महासर्प संस्कृतं वृत्तमिष्यते ।
तं ब्राह्मणमहं पूर्वमुक्तवान् भुजगोत्तम ।। ३७ ।।
महासर्प! भुजंगमप्रवर! इस समय जिसमें संस्कारके साथ-साथ सदाचारकी उपलब्धि हो, वही ब्राह्मण है। यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ।। ३७ ।।
सर्प उवाच
श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर ।
भक्षयेयमहं कस्माद् भ्रातरं ते वृकोदरम् ।। ३८ ।।
**सर्प बोला—**युधिष्ठिर! तुम जाननेयोग्य सभी बातें जानते हो। मैंने तुम्हारी बात अच्छी तरह सुन ली। अब मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको कैसे खा सकता हूँ? ।। ३८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरसर्पसंवादे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरसर्पसंवादविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।
१८१-
एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप करनेके प्रभावसे सर्पयोनिसे मुक्त होकर स्वर्ग जाना
युधिष्ठिर उवाच
भवानेतादृशो लोके वेदवेदाङ्गपारगः ।
ब्रूहि किं कुर्वतः कर्म भवेद् गतिरनुत्तमा ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तुम सम्पूर्ण वेद-वेदांगोंके पारगामी हो। लोकमें तुम्हारी ऐसी ही ख्याति है। बताओ, किस कर्मके आचरणसे सर्वोत्तम गति प्राप्त हो सकती है? ॥ १ ॥
सर्प उवाच
पात्रे दत्त्वा प्रियाण्युक्त्वा सत्यमुक्त्वा च भारत ।
अहिंसानिरतः स्वर्गं गच्छेदिति मतिर्मम ॥ २ ॥
**सर्पने कहा—**भारत! इस विषयमें मेरा विचार यह है कि मनुष्य सत्पात्रको दान देनेसे, सत्य और प्रिय वचन बोलनेसे तथा अहिंसा-धर्ममें तत्पर रहनेसे स्वर्ग (उत्तम गति) पा सकता है ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
दानाद् वा सर्प सत्याद् वा किमतो गुरु दृश्यते ।
अहिंसाप्रिययोश्चैव गुरुलाघवमुच्यताम् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**नागराज! दान और सत्यमें किसका पलड़ा भारी देखा जाता है? अहिंसा और प्रियभाषण—इनमेंसे किसका महत्त्व अधिक है और किसका कम? यह बताओ ॥ ३ ॥
सर्प उवाच
दानं च सत्यं तत्त्वं वा अहिंसा प्रियमेव च ।
एषां कार्यगरीयस्त्वाद् दृश्यते गुरुलाघवम् ॥ ४ ॥
**सर्पने कहा—**महाराज! दान, सत्य-तत्त्व, अहिंसा और प्रियभाषण—इनकी गुरुता और लघुता कार्यकी महत्ताके अनुसार देखी जाती है ॥ ४ ॥
कस्माच्चिद् दानयोगाद्धि सत्यमेव विशिष्यते ।
सत्यवाक्याच्च राजेन्द्र किंचिद् दानं विशिष्यते ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! किसी दानसे सत्यका ही महत्त्व बढ़ जाता है और कोई-कोई दान ही सत्यभाषणसे अधिक महत्त्व रखता है ॥ ५ ॥ एवमेव महेष्वास प्रियवाक्यानमहीपते । अहिंसा दृश्यते गुर्वी ततश्च प्रियमिष्यते ॥ ६ ॥ महान् धनुर्धर भूपाल! इसी प्रकार कहीं तो प्रिय वचनकी अपेक्षा अहिंसाका गौरव अधिक देखा जाता है और कहीं अहिंसासे भी बढ़कर प्रियभाषणका महत्त्व दृष्टिगोचर होता है ॥ ६ ॥ एवमेतद् भवेद् राजन् कार्यापेक्षमन्तरम् । यदभिप्रेतमन्यत् ते ब्रूहि यावद् ब्रवीम्यहम् ॥ ७ ॥ राजन्! इस प्रकार इनके गौरव-लाघवका निश्चय कार्यकी अपेक्षासे ही होता है। अब और जो कुछ भी प्रश्न तुम्हें अभीष्ट हो, वह पूछो। मैं यथासाध्य उत्तर देता हूँ ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं स्वर्गे गतिः सर्प कर्मणां च फलं ध्रुवम् । अशरीरस्य दृश्येत प्रब्रूहि विषयांश्च मे ॥ ८ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**सर्प! मनुष्यको स्वर्गकी प्राप्ति और कर्मोंका निश्चयरूपसे मिलनेवाला फल किस प्रकार देखनेमें आता है एवं देहाभिमानसे रहित पुरुषकी गति किस प्रकार होती है? इन विषयोंको मुझसे भलीभाँति कहिये ॥ ८ ॥
सर्प उवाच
तिस्रो वै गतयो राजन् परिदृष्टाः स्वकर्मभिः । मानुषं स्वर्गवासश्च तिर्यग्योनिश्च तत् त्रिधा ॥ ९ ॥ **सर्पने कहा—**राजन्! अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जीवोंकी तीन प्रकारकी गतियाँ देखी जाती हैं—स्वर्गलोककी प्राप्ति, मनुष्ययोनिमें जन्म लेना और पशु-पक्षी आदि योनियोंमें (तथा नरकोंमें) उत्पन्न होना।* बस, ये ही तीन योनियाँ हैं ॥ ९ ॥ तत्र वै मानुषालोकाद् दानादिभिरतन्द्रितः । अहिंसार्थसमायुक्तैः कारणैः स्वर्गमश्नुते ॥ १० ॥ इनमेंसे जो जीव मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है, पर यदि आलस्य और प्रमादका त्याग करके अहिंसाका पालन करते हुए दान आदि शुभ कर्म करता है, तो उसे इन पुण्य कर्मोंके कारण स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥ विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् । तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥ ११ ॥ कामक्रोधसमायुक्तो हिंसालोभसमन्वितः । मनुष्यत्वात् परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूयते ॥ १२ ॥
राजेन्द्र! इसके विपरीत कारण उपस्थित होनेपर मनुष्ययोनिमें तथा पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म लेना पड़ता है। तात! पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेनेका जो विशेष कारण है, उसे भी यहाँ बतलाया जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ और हिंसामें तत्पर होकर मानवतासे भ्रष्ट हो जाता है, अपनी मनुष्य होनेकी योग्यताको भी खो देता है, वही पशु-पक्षी आदि योनिमें जन्म पाता है ॥ ११-१२ ॥
तिर्यग्योन्याः पृथग्भावो मनुष्यार्थे विधीयते । गवादिभ्यस्तथाश्वेभ्यो देवत्वमपि दृश्यते ॥ १३ ॥
फिर मनुष्य-जन्मकी प्राप्तिके लिये उसका तिर्यक्-योनिसे उद्धार होता है। गौओं तथा अश्वोंको भी उस योनिसे छुटकारा मिलकर देवत्वकी प्राप्ति होती है, यह बात देखी जाती है ॥ १३ ॥
सोऽयमेता गतीस्तात जन्तुश्चरति कार्यवान् । नित्ये महति चात्मानमवस्थापयते द्विजः ॥ १४ ॥ जातो जातश्च बलवद् भुङ्क्ते चात्मा स देहवान् । फलार्थस्तात निष्पृक्तः प्रजापालनभावनः ॥ १५ ॥
तात! प्रयोजनवश वही यह जीव इन्हीं तीन गतियोंमें भटकता रहता है। कर्मफलको चाहनेवाला देहाभिमानी जीव परवशतासे बार-बार जन्म लेता और दुःख-सुखका उपभोग करता है। किंतु तात! जो कर्मफलमें आसक्त नहीं है, वह प्रजाजनोंके पालनकी भावनावाला द्विज अपने आत्माको नित्य परब्रह्म परमात्मामें भलीभाँति स्थित कर देता है ॥ १४-१५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
शब्दे स्पर्शे च रूपे च तथैव रसगन्धयोः । तस्याधिष्ठानमव्यग्रो ब्रूहि सर्प यथातथम् ॥ १६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— सर्प! शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इनका आधार क्या है? आप शान्तचित्त होकर इसे यथार्थरूपसे बताइये ॥ १६ ॥
किं न गृह्णाति विषयान् युगपच्च महामते । एतावदुच्यतां चोक्तं सर्वं पन्नगसत्तम ॥ १७ ॥
महामते! पन्नगश्रेष्ठ! मन विषयोंका एक ही साथ ग्रहण क्यों नहीं करता? इन उपर्युक्त सब बातोंको बताइये ॥
सर्प उवाच
यदात्मद्रव्यमायुष्मन् देहसंश्रयणान्वितम् । करणाधिष्ठितं भोगानुपभुङ्क्ते यथाविधि ॥ १८ ॥
सर्पने कहा— आयुष्मन्! स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंका आश्रय लेनेवाला और इन्द्रियोंसे युक्त जो आत्मा नामक द्रव्य है, वही विधिपूर्वक नाना प्रकारके भोगोंको भोगता है॥ १८॥ ज्ञानं चैवात्र बुद्धिश्च मनश्च भरतर्षभ । तस्य भोगाधिकरणे करणानि निबोध मे ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! ज्ञान, बुद्धि और मन—ये ही शरीरमें उसके करण समझो ॥ १९ ॥ मनसा तात पर्येति क्रमशो विषयानिमान् । विषयायतनस्थो हि भूतात्मा क्षेत्रमास्थितः ॥ २० ॥ तात! पाँचों विषयोंके आधारभूत पंचभूतोंसे बने हुए शरीरमें स्थित जीवात्मा इस शरीरमें स्थित हुआ ही मनके द्वारा क्रमशः इन पाँचों विषयोंका उपभोग करता है ॥ २० ॥ तत्र चापि नरव्याघ्र मनो जन्तोर्विधीयते । तस्माद् युगपदत्रास्य ग्रहणं नोपपद्यते ॥ २१ ॥ नरश्रेष्ठ! विषयोंके उपभोगके समय (बुद्धिके द्वारा) इस जीवात्माका मन किसी एक ही विषयमें नियन्त्रित कर दिया जाता है। इसीलिये उसके द्वारा एक ही साथ अनेक विषयोंका ग्रहण सम्भव नहीं हो पाता है ॥ २१ ॥ स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः । बुद्धिं द्रव्येषु सृजति विविधेषु परावराम् ॥ २२ ॥ पुरुषसिंह! वही आत्मा दोनों भौंहोंके बीच स्थित होकर उत्तम-अधम बुद्धिको भिन्न-भिन्न द्रव्योंकी ओर प्रेरित करता है ॥ २२ ॥ बुद्धेरुत्तरकाला च वेदना दृश्यते बुधैः । एष वै राजशार्दूल विधिः क्षेत्रज्ञभावनः ॥ २३ ॥ बुद्धिकी क्रियाके उत्तरकालमें भी विद्वान् पुरुषोंको एक अनुभूति दिखायी देती है। नृपश्रेष्ठ! यही क्षेत्रज्ञ आत्माको प्रकाशित करनेवाली विधि है ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मनसश्चापि बुद्धेश्च ब्रूहि मे लक्षणं परम् । एतदध्यात्मविदुषां परं कार्यं विधीयते ॥ २४ ॥ युधिष्ठिरने कहा— सर्प! मुझे मन और बुद्धिका उत्तम लक्षण बतलाओ। अध्यात्मशास्त्रके विद्वानोंके लिये इनको जानना परम कर्तव्य कहा गया है ॥ २४ ॥
सर्प उवाच
बुद्धिरात्मानुगा तात उत्पातेन विधीयते । तदाश्रिता हि संज्ञैषा बुद्धिस्तस्यैषिणी भवेत् ॥ २५ ॥ बुद्धिरुत्पद्यते कार्यान्मनस्तूत्पन्नमेव हि ।
बुद्धेर्गुणविधानेन मनस्तद्गुणवद् भवेत् ।। २६ ।।
सर्पने कहा—तात! आत्माके भोग और मोक्षका सम्पादन करना ही बुद्धिका प्रयोजन
है तथा आत्माका आश्रय लेकर ही बुद्धि विषयोंकी ओर जाती है। इस कारण वह
आत्माका अनुसरण करनेवाली मानी जाती है। वह भी आत्माकी चेतनशक्तिके सम्बन्धसे
ही है तथा बुद्धिके गुणविधानसे अर्थात् उसकी ज्ञानशक्तिके प्रभावसे ही मन उस गुणसे
सम्पन्न होता है यानी इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है। अतः बुद्धि तो
कार्यके आरम्भसे प्रकट होती है और मन सदैव प्रकट रहता है। (कार्यको देखकर ही
कारणकी सत्ता व्यक्त होती है—यह न्याय है) ।। २५-२६ ।।
एतद् विशेषणं तात मनोबुद्धयोर्यदन्तरम् ।
त्वमप्यत्राभिसम्बुद्धः कथं वा मन्यते भवान् ।। २७ ।।
तात! मन और बुद्धिकी यह विशेषता ही उन दोनोंका अन्तर है। तुम भी तो इस
विषयके अच्छे ज्ञाता हो, अतः बताओ, तुम्हारी कैसी मान्यता है? ।। २७ ।।
युधिष्ठिर उवाच
अहो बुद्धिमतां श्रेष्ठ शुभा बुद्धिरियं तव ।
विदितं वेदितव्यं ते कस्मात् समनुपृच्छसि ।। २८ ।।
युधिष्ठिर बोले—बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ! तुम्हारी यह बुद्धि बड़ी उत्तम है। तुम तो जानने
योग्य वस्तुको जान चुके हो, फिर मुझसे क्यों पूछते हो? ।। २८ ।।
सर्वज्ञं त्वां कथं मोह आविशत् स्वर्गवासिनम् ।
एवमद्भुतकम्माणमिति मे संशयो महान् ।। २९ ।।
तुम तो सर्वज्ञ तथा स्वर्गके निवासी थे। तुमने बड़े अद्भुत कर्म किये थे। भला, तुम्हें कैसे
मोह हो गया? (अर्थात् ब्राह्मणोंका अपमान कैसे कर बैठे?) इस बातको लेकर मेरे मनमें
बड़ा संशय हो रहा है ।। २९ ।।
सर्प उवाच
सुप्रज्ञमपि चेच्छूरमृद्धिर्मोहयते नरम् ।
वर्तमानः सुखे सर्वो मुह्यतीति मतिर्मम ।। ३० ।।
सर्पने कहा—राजन्! यह धन-सम्पत्ति बड़े-बड़े बुद्धिमान् और शूरवीर मनुष्यको भी
मोहमें डाल देती है। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुख-विलासमें डूबे हुए सभी लोग मोहित
हो जाते हैं ।। ३० ।।
सोऽहमैश्वर्यमोहेन मदाविष्टो युधिष्ठिर ।
पतितः प्रतिसम्बुद्धस्त्वां तु सम्बोधयाम्यहम् ।। ३१ ।।
युधिष्ठिर! इसी तरह मैं भी ऐश्वर्यके मोहसे मदोन्मत्त हो गया और मुझे उस समय चेत
हुआ, जब कि मेरा अधःपतन हो चुका। अतः अब तुम्हें सचेत कर रहा हूँ ।। ३१ ।।
कृतं कार्यं महाराज त्वया मम परंतप । क्षीणःशापः सुकृच्छ्रो मे त्वया सम्भाष्य साधुना ॥ ३२ ॥ परंतप महाराज! आज तुमने मेरा बहुत बड़ा कार्य किया। इस समय तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुषसे वार्तालाप करनेके कारण मेरा वह अत्यन्त कष्टदायक शाप निवृत्त हो गया ॥ ३२ ॥ अहं हि दिवि दिव्येन विमानेन चरन् पुरा । अभिमानेन मत्तः सन् कंचिन्नान्यमचिन्तयम् ॥ ३३ ॥ पूर्वकालमें (जब मैं स्वर्गका राजा था,) दिव्य विमानपर चढ़कर आकाशमें विचरता रहता था। उस समय अभिमानसे मत्त होकर मैं दूसरे किसीको कुछ नहीं समझता था ॥ ३३ ॥ ब्रह्मर्षिदेवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः । करान् मम प्रयच्छन्ति सर्वे त्रैलोक्यवासिनः ॥ ३४ ॥ ब्रह्मर्षि, देवता गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग आदि जो भी इस त्रिलोकीमें निवास करनेवाले प्राणी थे, वे सब मुझे कर देते थे ॥ ३४ ॥ चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते । तस्य तेजो हराम्याशु तद्धि-दृष्टेर्बलं मम ॥ ३५ ॥ राजन्! उन दिनों मैं जिस प्राणीकी ओर आँख उठाकर देखता था, उसका तेज तत्काल हर लेता था। यह थी मेरी दृष्टिकी शक्ति ॥ ३५ ॥ ब्रह्मर्षीणां सहस्रं हि उवाह शिबिकां मम । स मामपनयो राजन् भ्रंशयामास वै श्रियः ॥ ३६ ॥ हजारों ही ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोते थे। महाराज! मेरे इसी अत्याचारने मुझे स्वर्गकी राज्यलक्ष्मीसे भ्रष्ट कर दिया ॥ ३६ ॥ तत्र ह्यगस्त्यः पादेन वहन् स्पृष्टो मया मुनिः । अगस्त्येन ततोऽस्म्युक्तः सर्पस्त्वं च भवेति ह ॥ ३७ ॥ स्वर्गमें मुनिवर अगस्त्य जब मेरी पालकी ढो रहे थे, तब मैंने उन्हें लात मारी, इसलिये उन्होंने मुझे ऐसा कहा कि 'तू निश्चय ही सर्प हो जा' ॥ ३७ ॥ ततस्तस्माद् विमानाग्र्यात् प्रच्युतश्च्युतलक्षणः । प्रपतन् बुबुधेऽत्मानं व्यालीभूतमधोमुखम् । आयाचं तमहं विप्रं शापस्यान्तो भवेदिति ॥ ३८ ॥ उनके इतना कहते ही मेरे सभी राजचिह्न लुप्त हो गये। मैं (सर्प होकर) उस उत्तम विमानसे नीचे गिरा। उस समय मुझे ज्ञात हुआ कि मैं सर्प होकर नीचे मुँह किये गिर रहा हूँ; तब मैंने शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन ब्रह्मर्षिसे याचना करते हुए कहा ॥ ३८ ॥ सर्प उवाच
प्रमादात् सम्प्रमूढस्य भगवन् क्षन्तुमर्हसि ।
ततः स मामुवाचेदं प्रपतन्तं कृपान्वितः ॥ ३९ ॥
सर्पने कहा— भगवन्! मैं प्रमादवश विवेकशून्य हो गया था। इसीलिये मुझसे यह घोर अपराध हुआ है। आप कृपया क्षमा करें। तब मुझे गिरते देख वे महर्षि दयासे द्रवित होकर बोले— ॥ ३९ ॥
युधिष्ठिरो धर्मराजः शापात् त्वां मोक्षयिष्यति ।
अभिमानस्य घोरस्य पापस्य च नराधिप ॥ ४० ॥
फले क्षीणे महाराज फलं पुण्यमवाप्स्यसि ।
ततो मे विस्मयो जातस्तद् दृष्ट्वा तपसो बलम् ॥ ४१ ॥
‘राजन्! धर्मराज युधिष्ठिर तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे। महाराज! जब तुम्हारे इस अभिमान और घोर पापका फल क्षीण हो जायगा, तब तुम्हें फिर तुम्हारे पुण्योंका फल प्राप्त होगा’। उस समय मुझे उनकी तपस्याका महान् बल देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४०-४१ ॥
ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाह्मचूचुदम् ।
सत्यं दमस्तपो दानमहिंसा धर्मनित्यता ॥ ४२ ॥
साधकानि सदा पुंसां न जातिर्न कुलं नृप ।
अरिष्ट एष ते भ्राता भीमसेनो महाबलः ।
स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥ ४३ ॥
राजन्! उनका ब्रह्म-ज्ञान और ब्राह्मणत्व देखकर भी मुझे बड़ा विस्मय हुआ। इसीलिये इस विषयमें मैंने तुमसे पहले प्रश्न किया था। राजन्! सत्य, इन्द्रियसंयम, तपस्या, दान, अहिंसा और धर्मपरायणता—ये सद्गुण ही सदा मनुष्योंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले हैं, जाति और कुल नहीं। ये रहे तुम्हारे भाई महाबली भीमसेन, जो सर्वथा सकुशल हैं। महाराज! तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं पुनः स्वर्गलोकको जाऊँगा ॥ ४२-४३ ॥
(स चायं पुरुषव्याघ्र कालः पुण्य उपागतः ।
तदस्मात् कारणात् पार्थ कार्यं मम महत् कृतम् ॥)
पुरुषसिंह! पार्थ! तुम्हारे शुभागमनसे ही यह पुण्यकाल प्राप्त हुआ है, इस कारण तुमने मेरा बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया।
वैशम्पायन उवाच
(ततस्तस्मिन् मुहूर्ते तु विमानं कामगामि वै ।
अवपातेन महता तत्रावाप तदुत्तमम् ॥)
इत्युक्त्वाऽऽजगरं देहं मुक्त्वा स नहुषो नृपः ।
दिव्यं वपुः समास्थाय गतस्त्रिदिवमेव ह ॥ ४४ ॥
वैशम्पायनजी कहते है— जनमेजय! तदनन्तर उसी मुहूर्तमें एक इच्छानुसार चलनेवाला उत्तम विमान बड़े जोरकी उड़ानके, साथ वहाँ आ पहुँचा। युधिष्ठिरसे पूर्वोक्त बातें कहकर राजा नहुषने अजगरका शरीर त्याग दिया और दिव्य शरीर धारण करके वे पुनः स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४४ ॥
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रात्रा भीमेन संगत: ।
धौम्येन सहित: श्रीमाना श्रमं पुनरागमत् ॥ ४५ ॥
धर्मात्मा युधिष्ठिर भी भाई भीमसेनसे मिलकर उनके और धौम्य मुनिके साथ फिर अपने आश्रमपर लौट आये ॥ ४५ ॥
ततो द्विजेभ्य: सर्वेभ्य: समेतेभ्यो यथातथम् ।
कथयामास तत् सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिर: ॥ ४६ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने वहाँ एकत्र हुए सब ब्राह्मणोंको भीमसेनके सर्पके चंगुलसे छूटनेका वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ४६ ॥
तच्छ्रुत्वा ते द्विजा: सर्वे भ्रातरश्चास्य ते त्रय: ।
आसन् सुव्रीडिता राजन् द्रौपदी च यशस्विनी ॥ ४७ ॥
राजन्! यह सुनकर सब ब्राह्मण, उनके तीनों भाई और यशस्विनी द्रौपदी सब-के-सब बड़े लज्जित हुए ॥ ४७ ॥
ते तु सर्वे द्विजश्रेष्ठाःपाण्डवानां हितेप्सया । मैवमित्यब्रुवन् भीमं गर्हयन्तोऽस्य साहसम् ॥ ४८ ॥ तब पाण्डवोंके हितकी इच्छासे वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण भीमसेनको उनके दुःसाहसकी निन्दा करते हुए बोले—'अब कभी ऐसा न करना' ॥ ४८ ॥ पाण्डवास्तु भयान्मुक्तं प्रेक्ष्य भीमं महाबलम् । हर्षमाहारयांचक्रुर्विजहुश्च मुदा युताः ॥ ४९ ॥ पाण्डवलोग महाबली भीमसेनको भयसे मुक्त हुआ देख हर्षसे उल्लसित हो उठे और प्रसन्नतापूर्वक वहाँ विचरने लगे ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि भीममोचने एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें भीमसेनके सर्पके भयसे छूटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं।)
* ये ही क्रमशः ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगतिके नामसे प्रसिद्ध हैं।
(मार्कण्डेयसमस्यापर्व)
(मार्कण्डेयसमस्यापर्व)
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
वर्षा और शरद्-ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुनः द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
निदाघान्तकरः कालः सर्वभूतसुखावहः ।
तत्रैव वसतां तेषां प्रावृट् समभिपद्यत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर ग्रीष्म-ऋतुकी समाप्ति सूचित करनेवाला वर्षाकाल आया, जो समस्त प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाला था। पाण्डव अभी द्वैतवनमें ही थे, उसी समय वर्षा-ऋतु आ गयी ॥ १ ॥
छादयन्तो महाघोषाः खं दिशश्च बलाहकाः ।
प्रववर्षुर्दिवारात्रमसिताः सततं तदा ॥ २ ॥
तब काले-काले मेघ जोर-जोरसे गर्जना करते हुए आकाश और दिशाओंमें छा गये और दिन-रात निरन्तर जलकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
तपात्ययनिकेताश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
अपेतार्कप्रभाजालाः सविद्युद्विमलप्रभाः ॥ ३ ॥
वे वर्षामें तम्बूके समान जान पड़ते थे। उनकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी थी। उन्होंने सूर्यके प्रभापुञ्जको तो ढँक दिया था और विद्युत्की निर्मल प्रभा धारण कर ली थी ॥ ३ ॥
विरूढशष्पा धरणी मत्तदंशसरीसृपा ।
बभूव पयसा सिक्ता शान्ता सर्वमनोरमा ॥ ४ ॥
धरतीपर घास जम गयी। मतवाले डाँस और सर्प आदि विचरने लगे। पृथ्वी जलसे अभिषिक्त होकर शान्त और सबके लिये मनोरम हो गयी ॥ ४ ॥
न स्म प्रज्ञायते किंचिदम्भसा समवस्तृते ।
समं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि च ॥ ५ ॥
सब ओर इतना पानी भर गया कि ऊँचा-नीचा, समतल, नदी अथवा पेड़-पौधे आदिका पता नहीं चलता था ॥ ५ ॥
क्षुब्धतोया महावेगाः श्वसमाना इवाशुगाः ।
सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये ।। ६ ।। वर्षा-ऋतुकी नदियाँ बड़े वेगसे छूटनेवाले शीघ्र-गामी बाणोंकी भाँति सनसनाती हुई चलती थीं। उनके जलमें हिलोरें उठती रहती थीं और वे कितने ही काननोंकी शोभा बढ़ाती थीं ।। ६ ।। नदतां काननान्तेषु श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः । वृष्टिभिश्च्छाद्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ।। ७ ।। वनके भीतर वर्षाकी बौछारोंसे भीगते और बोलते हुए वराह, मृग और पक्षियोंकी भाँति-भाँतिकी बोलियाँ सुनायी देती थीं ।। ७ ।। स्तोककाः शिखिनश्चैव पुंस्कोकिलगणैः सह । मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ।। ८ ।। पपीहा और मोर नर-कोकिलोंके साथ आनन्दोन्मत्त होकर इधर-उधर उड़ने लगे और मेढक भी घमण्डमें आकर इधर-उधर कूदते और टर्र-टर्र करते थे ।। ८ ।। तथा बहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता । अभ्यतीता शिवा तेषां चरतां मरुधन्वसु ।। ९ ।। पाण्डव अभी मरुप्रदेशमें ही विचरते थे, तभी मेघोंकी गर्जनासे गूँजती तथा अनेक प्रकारके रूप-रंग लिये प्रकट हुई मंगलमयी वर्षा-ऋतु भी बीत गयी ।। ९ ।। क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत् प्रमुदिताभवत् । रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ।। १० ।। विमलाकाशनक्षत्रा शरत् तेषां शिवाभवत् । मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ११ ।। तत्पश्चात् आनन्दमयी शरद्-ऋतुका शुभागमन हुआ। क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी चारों ओर विचरने लगे। वनोंमें और पर्वतीय शिखरोंपर कास, कुश आदि बहुत बढ़ गये थे। नदियोंका जल स्वच्छ हो गया। आकाश निर्मल होनेसे नक्षत्रोंका आलोक और उज्ज्वल हो उठा। सब ओर मृग और पक्षी कलोल करने लगे। महात्मा पाण्डवोंके लिये यह शरद्-ऋतु अत्यन्त सुखदायिनी थी ।। १०-११ ।। दृश्यन्ते शान्तरजसः क्षपा जलदशीतलाः । ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ।। १२ ।। उस समयकी रातें धूलरहित एवं निर्मल दिखायी देती थीं। बादलोंके समान उनमें शीतलता थी। ग्रहों और नक्षत्रोंके समुदाय तथा चन्द्रमा उनकी शोभा बढ़ाते थे ।। १२ ।। कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः । नदीः पुष्करिणीश्चैव ददृशुः समलंकृताः ।। १३ ।। पाण्डवोंने देखा, नदियाँ और पोखरियाँ कुमुदों तथा कमल-पुष्पोंसे अलंकृत हैं। उनमें शीतल जल भरा हुआ है और वे सबके लिये सुखदायिनी प्रतीत होती हैं ।। १३ ।।
आकाशनीकाशतटां तीरवानीरसंकुलाम् ।
बभूव चरतां हर्षः पुण्यतीर्थां सरस्वतीम् ॥ १४ ॥
पावन तीर्थोंसे विभूषित सरस्वती नदीका तट आकाशके समान निर्मल दिखायी देता था। उसके दोनों किनारे बेंतकी लहलहाती हुई लताओंसे आच्छादित थे। वहाँ विचरते हुए पाण्डवोंको बड़ा आनन्द मिलता था ॥ १४ ॥
ते वै मुमुदिरे वीराः प्रसन्नसलिलां शिवाम् ।
पश्यन्तो दृढधन्वानः परिपूर्णां सरस्वतीम् ॥ १५ ॥
वीर पाण्डव सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले थे। उन्होंने स्वच्छ जलसे भरी हुई कल्याणमयी सरस्वतीका दर्शन करके बड़े आनन्दका अनुभव किया ॥ १५ ॥
तेषां पुण्यतमा रात्रिः पर्वसंधौ स्म शारदी ।
तत्रैव वसतामासीत् कार्तिकी जनमेजय ॥ १६ ॥
जनमेजय! उनके वहीं रहते समय पर्वकी संधि-वेलामें कार्तिककी शरत्पूर्णिमाकी परम पुण्यमयी रात्रि आयी ॥ १६ ॥
पुण्यकृद्भिर्महासत्त्वैस्तापसैः सह पाण्डवाः ।
तत् सर्वे भरतश्रेष्ठाः समेहुर्योगमुत्तमम् ॥ १७ ॥
उस समय भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न, पुण्यात्मा, तपस्वी मुनियोंके साथ स्नान-दानादिके द्वारा उस उत्तम योगको पूर्णतः सफल बनाया ॥ १७ ॥
तमिस्राभ्युदये तस्मिन् धौम्येन सह पाण्डवाः ।
सूतैः पौरोगवैश्चैव काम्यकं प्रययुर्वनम् ॥ १८ ॥
फिर कृष्ण-पक्षका उदय होनेपर पाण्डवलोग धौम्य मुनि, सारथिगण तथा पाकशालाध्यक्षके साथ काम्यक-वनकी ओर चल दिये ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि काम्यकवनप्रवेशे
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें काम्यकवनगमनविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८२ ॥
१८३-
त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल-भोगका विवेचन
वैशम्पायन उवाच
काम्यकं प्राप्य कौरव्य युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
कृतातिथ्या मुनिगणैर्निषेदुः सह कृष्णया ।। १ ।।
ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसतः पाण्डुनन्दनान् ।
ब्राह्मणा बहवस्तत्र समन्तात् पर्यवारयन् ।। २ ।।
अथाब्रवीद् द्विजः कश्चिदर्जुनस्य प्रियः सखा ।
स एष्यति महाबाहुर्वशी शौरिरुदारधीः ।। ३ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कुरुनन्दन जनमेजय! काम्यकवनमें पहुँचनेपर वहाँके मुनियोंने युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंका यथोचित आदर-सत्कार किया। फिर वे द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे। जब वे विश्वासपात्र पाण्डव वहाँ निवास करने लगे, तब बहुत-से ब्राह्मणोंने आकर सब ओरसे उन्हें घेर लिया (और उन्हींके साथ रहने लगे)। तदनन्तर एक दिन एक ब्राह्मण आया। उसने यह सूचना दी कि सबको वशमें रखनेवाले उदारबुद्धि महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण, जो अर्जुनके प्रिय सखा हैं, अभी यहाँ पधारेंगे ।। १—३ ।।
विदिता हि हरेर्यूयमिहायाताः कुरुद्वहाः ।
सदा हि दर्शनाकाङ्क्षी श्रेयोऽन्वेषी च वो हरिः ।। ४ ।।
कुरुश्रेष्ठ पाण्डवो! आपलोगोंका यहाँ आना भगवान् श्रीकृष्णको ज्ञात हो चुका है। वे सदा आपलोगोंको देखनेके लिये उत्सुक रहते हैं और आपके कल्याणकी बात सोचते रहते हैं ।। ४ ।।
बहुवत्सरजीवी च मार्कण्डेयो महातपाः ।
स्वाध्यायतपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान् समेष्यति ।। ५ ।।
एक शुभ समाचार और है, चिरंजीवी महातपस्वी मार्कण्डेय मुनि, जो स्वाध्याय और तपस्यामें संलग्न रहा करते हैं, शीघ्र ही आपलोगोंसे मिलेंगे ।। ५ ।।
तथैव ब्रुवतस्तस्य प्रत्यदृश्यत केशवः ।
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेन रथिनां वरः ।। ६ ।।
मघवानिव पौलोम्या सहितः सत्यभामया ।
उपायाद् देवकीपुत्रो दिदृक्षुः कुरुसत्तमान् ।। ७ ।।
ब्राह्मण इस प्रकारकी बातें कह ही रहा था कि शैब्य और सुग्रीव नामक अश्वोंसे जुते हुए रथद्वारा रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण आते हुए दिखायी दिये। जैसे शचीके साथ इन्द्र आये हों, उसी प्रकार सत्यभामाके साथ देवकीनन्दन श्रीहरि उन कुरुकुलशिरोमणि पाण्डवोंसे मिलने वहाँ आये ।। ६-७ ।।
अवतीर्य रथात् कृष्णो धर्मराजं यथाविधि ।
ववन्दे मुदितो धीमान् भीमं च बलिनां वरम् ।। ८ ।।
परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णने रथसे उतरकर बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मराज युधिष्ठिर तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमको विधिपूर्वक प्रणाम किया ।। ८ ।।
पूजयामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादितः ।
परिष्वज्य गुडाकेशं द्रौपदीं पर्यसान्त्वयत् ।। ९ ।।
स दृष्ट्वा फाल्गुनं वीरं चिरस्य प्रियमागतम् ।
पर्यष्वजत दाशार्हः पुनः पुनररिंदमः ।। १० ।।
फिर धौम्य मुनिका पूजन किया। तत्पश्चात् नकुल-सहदेवने आकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। इसके बाद निद्राविजयी अर्जुनको हृदयसे लगाकर श्रीकृष्णने द्रौपदीको भलीभाँति सान्त्वना दी। परमप्रिय वीरवर अर्जुनको दीर्घकालके बाद आया देख शत्रुदमन श्रीकृष्णने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया ।। ९-१० ।।
तथैव सत्यभामापि द्रौपदीं परिषस्वजे ।
पाण्डवानां प्रियां भार्यां कृष्णस्य महिषी प्रिया ।। ११ ।।
इसी प्रकार श्रीकृष्णकी प्यारी रानी सत्यभामाने भी पाण्डवोंकी प्रिय पत्नी पांचालीका आलिंगन किया ।। ११ ।।
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सभार्याः सपुरोहिताः । आनर्चुः पुण्डरीकाक्षं परिवव्रुश्च सर्वशः ॥ १२ ॥ तदनन्तर पत्नी और पुरोहितसहित समस्त पाण्डवोंने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका पूजन किया और सब-के-सब उन्हें घेरकर बैठ गये ॥ १२ ॥ कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वान् धनंजयेनासुरतर्जनेन । बभौ यथा भूतपतिर्महात्मा समेत्य साक्षाद् भगवान् गुहेन ॥ १३ ॥ सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण असुरोंको भयभीत करनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनसे मिलकर उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे परम महात्मा साक्षात् भगवान् भूतनाथ शंकर कार्तिकेयसे मिलकर शोभा पाते हैं ॥ १३ ॥ ततः समस्तानि किरीटमाली वनेषु वृत्तानि गदाग्रजाय । उक्त्वा यथावत् पुनरन्वपृच्छत् कथं सुभद्रा च स चाभिमन्युः ॥ १४ ॥ तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनने गदके बड़े भाई भगवान् श्रीकृष्णको वनवासके सारे वृत्तान्त यथार्थरूपसे बताकर पुनः उनसे पूछा—'सुभद्रा और अभिमन्यु कैसे हैं?' ॥ १४ ॥
स पूजयित्वा मधुहा यथावत् पार्थं च कृष्णां च पुरोहितं च । उवाच राजानमभिप्रशंसन् युधिष्ठिरं तत्र सहोपविश्य ॥ १५ ॥ भगवान् मधुसूदनने अर्जुन, द्रौपदी तथा पुरोहित धौम्यका सम्मान करके सबके साथ बैठकर राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा— ॥ १५ ॥
धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभात् तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् । सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं जितस्त्वयायं च परश्च लोकः ॥ १६ ॥ ‘राजन्! पाण्डुनन्दन! राज्यलाभकी अपेक्षा धर्म महान् है। धर्मकी वृद्धिके लिये तपको ही प्रधान साधन बताया गया है। आप सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंके साथ-साथ स्वधर्मका पालन करते हैं, अतः आपने इस लोक और परलोक दोनोंको जीत लिया है ॥ १६ ॥
अधीतमग्रे चरता व्रतानि सम्यग् धनुर्वेदमवाप्यकृत्स्नम् । क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लब्ध्वा सर्वे ह्यवाप्ताः क्रतवः पुराणाः ॥ १७ ॥ न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति कामान्न किंचित् कुरुषे नरेन्द्र । न चार्थलोभात् प्रजहासि धर्मं तस्मात् प्रभावादसि धर्मराजः ॥ १८ ॥ ‘आपने सबसे पहले ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। तत्पश्चात् सम्पूर्ण धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है। इसके बाद क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धनका उपार्जन करके समस्त प्राचीन यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। नरेश्वर! जिसमें गँवारोंकी आसक्ति हुआ करती है, उस स्त्री-सम्बन्धी भोगमें आपका अनुराग नहीं है। आप कामनासे प्रेरित होकर कुछ नहीं करते हैं और धनके लोभसे धर्मका त्याग नहीं करते हैं। इसी प्रभावसे धर्मराज कहलाते हैं ॥ १७-१८ ॥
दानं च सत्यं च तपश्च राजन् श्रद्धा च बुद्धिश्च क्षमा धृतिश्च । अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा- नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ॥ १९ ॥
‘राजन्! आपने राज्य, धन और भोगोंको पाकर भी सदा दान, सत्य, तप, श्रद्धा, बुद्धि, क्षमा तथा धृति—इन सद्गुणोंसे ही प्रेम किया है ।। १९ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1238)
कृष्णां सभायामवशामपश्यत् । अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं सहेत तत् पाण्डव कस्त्वदन्यः ॥ २० ॥ 'पाण्डुनन्दन! कुरुजांगलदेशकी जनताने द्यूतसभामें द्रौपदीको जिस विवश-अवस्थामें देखा था और उस समय उसके साथ जो पापपूर्ण बर्ताव किया गया था, उसे आपके सिवा दूसरा कौन सह सकता था? ॥ २० ॥ असंशयं सर्वसमृद्धकामः क्षिप्रं प्रजाः पालयितासि सम्यक् । इमे वयं निग्रहणे कुरूणां यदि प्रतिज्ञा भवतः समाप्ता ॥ २१ ॥ 'धर्मराज! अब शीघ्र ही आपके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और आप राजसिंहासनपर आरूढ़ होकर न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यदि आपकी वनवासविषयक प्रतिज्ञा पूरी हो जाय, तो हम सब लोग आपके विरोधी कौरवोंको दण्ड देनेके लिये उद्यत हैं' ॥ २१ ॥ धौम्यं च भीमं च युधिष्ठिरं च यमौ च कृष्णां च दशार्हसिंहः । उवाच दिष्ट्या भवतां शिवेन प्राप्तः किरीटी मुदितः कृतास्त्रः ॥ २२ ॥ तदनन्तर यदुकुलसिंह भगवान् श्रीकृष्णने धौम्य, युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव और द्रौपदीकी ओर देखते हुए कहा—'सौभाग्यकी बात है कि आपलोगोंद्वारा की हुई मंगलकामनासे किरीटधारी अर्जुन अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् होकर सानन्द लौट आये हैं' ॥ २२ ॥ प्रोवाच कृष्णामपि याज्ञसेनीं दशार्हभर्ता सहितः सुहृद्भिः । दिष्ट्या समग्रासि धनंजयेन समागतेत्येवमुवाच कृष्णः ॥ २३ ॥ कृष्णे धनुर्वेदरतिप्रधाना- स्तवात्मजास्ते शिशवः सुशीलाः । सद्भिः सदैवचरितं सुहृद्भि- श्र्ररन्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि ॥ २४ ॥ इसके बाद दशार्हकुलके स्वामी श्रीकृष्ण, जो अपने सुहृदोंसे घिरे हुए थे, यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीसे बोले—'कृष्णे! अर्जुनसे मिलकर तेरी सारी कामना सफल हो गयी, यह बड़े