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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

नाकृतात्मा वेदयति धर्माधर्मविनिश्चयम् ॥ १८ ॥
मैं आपके कहनेके अनुसार माता-पिताकी सेवा करूँगा। जिसका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, वह धर्म-अधर्मके निर्णयको बतला नहीं सकता ॥ १८ ॥
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः शूद्रयोनौ हि वर्तते ।
न त्वां शूद्रमहं मन्ये भवितव्यं हि कारणम् ॥ १९ ॥
आश्चर्य है कि यह सनातन धर्म, जिसके स्वरूपको समझना अत्यन्त कठिन है, शूद्रयोनिके मनुष्यमें भी विद्यमान है। मैं आपको शूद्र नहीं मानता। आपका जो शूद्रयोनिमें जन्म हो गया है, इसका कोई विशेष कारण होना चाहिये ॥ १९ ॥
येन कर्मविशेषेण प्राप्तेयं शूद्रता त्वया ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेन हि महामते ।
कामया ब्रूहि मे सर्वं सत्येन प्रयतात्मना ॥ २० ॥
महामते! जिस विशेष कर्मके कारण आपको यह शूद्रयोनि प्राप्त हुई है, उसे मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। आप सत्य और पवित्र अन्तःकरणके विश्वासके अनुसार स्वेच्छापूर्वक मुझे सब कुछ बताइये ॥ २० ॥

व्याध उवाच

अनतिक्रमणीया वै ब्राह्मणा मे द्विजोत्तम ।
शृणु सर्वमिदं वृत्तं पूर्वदेहे ममानघ ॥ २१ ॥
**धर्मव्याधने कहा—**विप्रवर! मुझे ब्राह्मणोंका अपराध कभी नहीं करना चाहिये। अनघ! मेरे पूर्वजन्मके शरीरद्वारा जो घटना घटित हुई है, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ २१ ॥
अहं हि ब्राह्मणः पूर्वमासं द्विजवरात्मजः ।
वेदाध्यायी सुकुशलो वेदाङ्गानां च पारगः ॥ २२ ॥
मैं पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणका पुत्र और वेदाध्ययनपरायण ब्राह्मण था। वेदांगोंका पारंगत विद्वान् माना जाता था। मैं विद्याध्ययनमें अत्यन्त कुशल था ॥
आत्मदोषकृतैर्ब्रह्मन्नवस्थामाप्तवानिमाम् ।
कश्चिद् राजा मम सखा धनुर्वेदपरायणः ॥ २३ ॥
संसर्गाद् धनुषि श्रेष्ठस्ततोऽहमभवं द्विज ।
ब्राह्मण! अपने ही दोषोंके कारण मुझे इस दुरवस्थामें आना पड़ा है। पूर्वजन्ममें जब मैं ब्राह्मण था, एक धनुर्वेद-परायण राजाके साथ मेरी मित्रता हो गयी थी। उनके संसर्गसे मैं धनुर्वेदकी शिक्षा लेने लगा और धनुष चलानेकी कलामें मैंने श्रेष्ठ योग्यता प्राप्त कर ली ॥ २३ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु मृगयां निर्गतो नृपः ॥ २४ ॥

सहितो योधमुख्यैश्च मन्त्रिभिश्च सुसंवृतः । ततोऽभ्यहन् मृगांस्तत्र सुबहूनाश्रमं प्रति ॥ २५ ॥ ब्रह्मन्! इसी समय राजा अपने मन्त्रियों तथा प्रधान योद्धाओंके साथ शिकार खेलनेके लिये निकले। उन्होंने एक ऋषिके आश्रमके निकट बहुत-से हिंसक पशुओंका वध किया ॥ २४-२५ ॥

अथ क्षिप्तः शरो घोरो मयापि द्विजसत्तम । ताडितश्च ऋषिस्तेन शरेणानतपर्वणा ॥ २६ ॥ द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने भी एक भयानक बाण छोड़ा। उसकी गाँठ कुछ झुकी हुई थी। उस बाणसे एक ऋषि मारे गये ॥ २६ ॥

भूमौ निपतितो ब्रह्मन्नुवाच प्रतिनादयन् । नापराध्याम्यहं किंचित् केन पापमिदं कृतम् ॥ २७ ॥ ब्रह्मन्! बाण लगते ही वे मुनि पृथिवीपर गिर पड़े और अपने आर्तनादसे उस वन्य प्रदेशको गुँजाते हुए बोले, 'आह! मैं तो किसीका कोई अपराध नहीं करता हूँ। फिर किसने यह पापकर्म कर डाला?' ॥ २७ ॥

मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्तः सहसा प्रभो । अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा ॥ २८ ॥ प्रभो! मैंने उन्हें हिंसक पशु समझकर बाण मारा था। अतः सहसा उनके पास जा पहुँचा। वहाँ जाकर देखा कि झुकी हुई गाँठवाले उस बाणसे एक ऋषि घायल होकर धरतीपर पड़े हैं ॥ २८ ॥

अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः । तमुग्रतपसं विप्रं निष्तनन्तं महीतले ॥ २९ ॥ यह न करनेयोग्य पाप कर डालनेके कारण मेरे मनमें उस समय बड़ी पीड़ा हुई। वे उग्र तपस्वी ब्राह्मण उस समय धरतीपर पड़े-पड़े कराह रहे थे ॥ २९ ॥

अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम् । क्षन्तुमर्हसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनिः ॥ ३० ॥ मैंने साहस करके उन मुनीश्वरसे कहा—'भगवन्! अनजानमें मेरे द्वारा यह अपराध बन गया है। अतः आप यह सब क्षमा कर दें' ॥ ३० ॥

ततः प्रत्यब्रवीद् वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्च्छितः । व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज ॥ ३१ ॥ मेरी बात सुनकर ऋषि क्रोधसे व्याकुल हो गये और उत्तर देते हुए बोले—'निर्दयी ब्राह्मण! तू शूद्रयोनिमें जन्म लेकर व्याध होगा' ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण- व्याधसंवादविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥

कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान

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षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान

व्याध उवाच

एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम ।
अभिप्रसादयमृषिं गिरा त्राहीति मां तदा ॥ १ ॥
अजानता मयाकार्यमिदमद्य कृतं मुने ।
क्षन्तुमर्हसि तत् सर्वं प्रसीद भगवन्निति ॥ २ ॥
धर्मव्याध कहता है—विप्रवर! जब इस प्रकार ऋषिने मुझे शाप दे दिया, तब मैंने कहा—'भगवन्! मेरी रक्षा कीजिये—मुझे उबारिये। मुने! मैंने अनजानमें यह आज अनुचित काम कर डाला है। मेरा सब अपराध क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न हो जाइये।' ऐसा कहकर उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की ॥ १-२ ॥

ऋषिरुवाच

नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशयम् ।
आनृशंस्यात् त्वहं किञ्चित् कर्तानुग्रहमद्य ते ॥ ३ ॥
ऋषिने कहा—यह शाप टल नहीं सकता। ऐसा होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं है। परंतु मेरा स्वभाव क्रूर नहीं है, इसलिये मैं तुझपर आज कुछ अनुग्रह करता हूँ ॥ ३ ॥
शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि ।
मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशयः ॥ ४ ॥
तू शूद्रयोनिमें रहकर धर्मज्ञ होगा और माता-पिताकी सेवा करेगा। इसमें तनिक भी संदेहके लिये स्थान नहीं है ॥ ४ ॥
तया शुश्रूषया सिद्धिं महत्त्वं समवाप्स्यसि ।
जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि ॥ ५ ॥
उस सेवासे तुझे सिद्धि और महत्ता प्राप्त होगी। तू पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला होगा और अन्तमें स्वर्गलोकमें जायगा ॥ ५ ॥
शापक्षये तु निर्वृत्ते भवितासि पुनर्द्विजः ।
एवं शप्तः पुरा तेन ऋषिणास्म्युग्रतेजसा ॥ ६ ॥
शापका निवारण हो जानेपर तू फिर ब्राह्मण होगा। इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी महर्षिने पूर्वकालमें मुझे शाप दिया था ॥ ६ ॥
प्रसादश्च कृतस्तेन ममैव द्विपदां वर ।

शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम ॥ ७ ॥
आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत ।
नरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने ही मेरे ऊपर अनुग्रह किया। द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर मैंने उनके शरीरसे बाण निकाला और उन्हें उनके आश्रमपर पहुँचा दिया। परंतु उनके प्राण नहीं गये ॥ ७ १/२ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराभवत् ॥ ८ ॥
अभितश्चापि गन्तव्यं मया स्वर्गं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥
विप्रवर! पूर्वजन्ममें मेरे ऊपर जो कुछ बीता था, वह सब मैंने आपसे कह सुनाया। अब इस जीवनके पश्चात् मुझे स्वर्गलोकमें जाना है ॥ ८-९ ॥

ब्राह्मण उवाच
एवमेतानि पुरुषा दुःखानि च सुखानि च ।
आप्नुवन्ति महाबुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि ॥ १० ॥
**ब्राह्मण बोला—**महामते! मनुष्य इसी प्रकार दुःख और सुख पाते रहते हैं। इसके लिये आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ १० ॥
दुष्करं हि कृतं कर्म जानता जातिमात्मनः ।
लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञ नित्यं धर्मपरायणः ॥ ११ ॥
जिसके फलस्वरूप आपको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका ज्ञान बना हुआ है, वह पिता-माताकी सेवारूप कर्म दूसरोंके लिये दुष्कर है; किंतु आपने उसे सम्पन्न कर लिया है। आप लोकवृत्तान्तका तत्त्व जानते हैं और सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं ॥ ११ ॥
कर्मदोषश्च वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन ते ।
कञ्चित् कालमुष्यतां वै ततोऽसि भविता द्विजः ॥ १२ ॥
विद्वन्! आपको जो यह कर्मदोष (दूषित कर्म) प्राप्त हुआ है, वह आपके पूर्वजन्मके कर्मका फल है। इस जन्मके नहीं। अतः कुछ कालतक और इसी रूपमें रहें। फिर आप ब्राह्मण हो जायँगे ॥ १२ ॥
साम्प्रतं च मतो मेऽसि ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु ॥ १३ ॥
दाम्भिको दुष्कृतः प्रायः शूद्रेण सदृशो भवेत् ।
मैं तो अभी आपको ब्राह्मण मानता हूँ। आपके ब्राह्मण होनेमें संदेह नहीं है। जो ब्राह्मण होकर भी पतनके गर्तमें गिरानेवाले पापकर्मोंमें फँसा हुआ है और प्रायः दुष्कर्मपरायण तथा पाखंडी है, वह शूद्रके समान है ॥ १३ १/२ ॥
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः ॥ १४ ॥
तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः ।

इसके विपरीत जो शूद्र होकर भी (शम,) दम, सत्य तथा धर्मका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण ही मानता हूँ; क्योंकि मनुष्य सदाचारसे ही द्विज होता है ।। १४ १/२ ।।

कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्नोति दारुणाम् ।। १५ ।।
क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम ।
कर्मदोषसे ही मनुष्य विषम एवं भयंकर दुर्गतिमें पड़ जाता है। परंतु नरश्रेष्ठ! मैं तो समझता हूँ कि आपके सारे कर्मदोष सर्वथा नष्ट हो गये हैं ।। १५ १/२ ।।
कर्तुमर्हसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा ह्यविषादिनः ।
लोकवृत्तानुवृत्तज्ञा नित्यं धर्मपरायणाः ।। १६ ।।
अतः आपको अपने विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। आपके-जैसे ज्ञानी पुरुष, जो लोकवृत्तान्तके अनुवर्तनका रहस्य जाननेवाले तथा नित्य धर्मपरायण हैं, कभी विषादग्रस्त नहीं होते हैं ।। १६ ।।

व्याध उवाच

प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः ।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ।। १७ ।।
**धर्मव्याधने कहा—**ज्ञानी पुरुष शारीरिक कष्टका औषधसेवनद्वारा नाश करे और विवेकशील बुद्धिद्वारा मानसिक दुःखको नष्ट करे। यही ज्ञानकी शक्ति है। बुद्धिमान् मनुष्यको बालकोंके समान शोक या विलाप नहीं करना चाहिये ।। १७ ।।
अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात् प्रियस्य च ।
मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते चाल्पबुद्धयः ।। १८ ।।
मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग और प्रिय वस्तुके वियोगमें मानसिक दुःखसे दुःखी होते हैं ।। १८ ।।
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च ।
सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ।। १९ ।।
सभी प्राणी तीनों गुणोंके कार्यभूत विभिन्न वस्तु आदिसे जिस प्रकार संयुक्त होते हैं, वैसे ही वियुक्त भी होते रहते हैं। अतः किसी एकका संयोग और किसी एकका वियोग वास्तवमें शोकका कारण नहीं है ।। १९ ।।
अनिष्टं चान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते ।
ततश्च प्रतिकुर्वन्ति यदि पश्यन्त्युपक्रमात् ।। २० ।।
यदि किसी कार्यमें अनिष्टका संयोग दिखायी देता है तो मनुष्य शीघ्र ही उससे निवृत्त हो जाता है। और यदि आरम्भ होनेसे पहले ही उस अनिष्टका पता लग जाता है तो लोग उसके प्रतीकारका उपाय करने लगते हैं ।। २० ।।

शोचतो न भवेत् किंचित् केवलं परितप्यते। परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नराः ॥ २१ ॥ त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः। असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥ २२ ॥ केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दुःख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं। मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है ॥ २१-२२ ॥

असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्। न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २३ ॥ असंतोषका अन्त नहीं है, अतः संतोष ही परम सुख है। जिन्होंने ज्ञानमार्गको पार करके परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते हैं ॥

न विषादे मनः कार्य विषादो विषमुत्तमम्। मारयत्यकृतप्रज्ञं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥ २४ ॥ मनको विषादकी ओर न जाने दे। विषाद उग्र विष है। वह क्रोधमें भरे हुए सर्पकी भाँति विवेकहीन अज्ञानी मनुष्यको मार डालता है ॥ २४ ॥

यं विषादोऽभिभवति विक्रमे समुपस्थिते। तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते ॥ २५ ॥ पराक्रमका अवसर उपस्थित होनेपर जिसे विषाद घेर लेता है, उस तेजोहीन पुरुषका कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता ॥ २५ ॥

अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम्। न हि निर्वेदमागम्य किंचित् प्राप्नोति शोभनम् ॥ २६ ॥ किये जानेवाले कर्मका फल अवश्य दृष्टिगोचर होता है। केवल खिन्न होकर बैठ रहनेसे कोई अच्छा परिणाम हाथ नहीं लगता ॥ २६ ॥

अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे। अशोचन्नारभेतैवं मुक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥ २७ ॥ अतः दुःखसे छूटनेके उपायको अवश्य देखे। शोक और विषादमें न पड़कर आवश्यक कार्य आरम्भ कर दे। इस प्रकार प्रयत्न करनेसे मनुष्य निश्चय ही दुःखसे छूट जाता है और फिर किसी संकट या व्यसनमें नहीं फँसता ॥ २७ ॥

भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धेः परं गताः। न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥ २८ ॥ संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, ऐसा सोचकर जो बुद्धिसे पार होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये हैं वे ज्ञानी महापुरुष परमात्माका साक्षात्कार करते हुए कभी शोकमें नहीं पड़ते ॥ २८ ॥

न शोचामि च वै विद्वन् कालाकाङ्क्षी स्थितो ह्यहम् । एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन् नावसीदामि सत्तम ॥ २९ ॥ विद्वन्! मैं अन्तकालकी प्रतीक्षा करता हूँ। अतः कभी शोकमग्न नहीं होता। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! उपर्युक्त विचारोंका मनन करते रहनेसे मुझे कभी दुःख या अनुत्साह नहीं होता ॥ २९ ॥

ब्राह्मण उवाच

कृतप्रज्ञोऽसि मेधावी बुद्धिर्हि विपुला तव । नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित् ॥ ३० ॥ **ब्राह्मण बोला—**धर्मव्याध! आप ज्ञानी और बुद्धिमान् हैं। आपकी बुद्धि विशाल है। आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं और ज्ञानानन्दसे तृप्त रहते हैं। अतः मैं आपके लिये शोक नहीं करता ॥ ३० ॥

आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु । अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर ॥ ३१ ॥ अब मैं जानेके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। आपका कल्याण हो और धर्म सदा आपकी रक्षा करे। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! आप धर्माचरणमें कभी प्रमाद न करें ॥ ३१ ॥

मार्कण्डेय उवाच

बाढमित्येव तं व्याधः कृताञ्जलिरुवाच ह । प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ॥ ३२ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! कौशिक ब्राह्मणकी बात सुनकर धर्मव्याधने हाथ जोड़कर कहा—'बहुत अच्छा! अब आप अपने घरको पधारें।' तदनन्तर विप्रवर कौशिक धर्मव्याधकी परिक्रमा करके वहाँसे चल दिया ॥ ३२ ॥

स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा । मातापितृभ्यां वृद्धाभ्यां यथान्यायं सुशंसितः ॥ ३३ ॥ घर जाकर उस ब्राह्मणने अपने माता-पिताकी सब प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा की और उन बूढ़े माता-पिताने प्रसन्न होकर उसकी यथायोग्य प्रशंसा की ॥ ३३ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्ठिर । पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतां वर ॥ ३४ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तात युधिष्ठिर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने ये सब बातें कह सुनायीं ॥

पतिव्रताया माहात्म्यं ब्राह्मणस्य च सत्तम । मातापित्रोश्च शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता ॥ ३५ ॥

साधुश्रेष्ठ! पतिव्रताका माहात्म्य और धर्मव्याधके द्वारा ब्राह्मणसे कही हुई माता-पिताकी सेवा आदिकी बातें बता दीं।। ३५।।

युधिष्ठिर उवाच

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् धर्माख्यानमनुत्तमम् ।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ।। ३६ ।।
युधिष्ठिर बोले— ब्रह्मन्! आपने धर्मके विषयमें यह अत्यन्त अद्भुत और उत्तम उपाख्यान सुनाया है। मुनिवर! आप समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं।। ३६।।

सुखश्रव्यतया विद्वन् मुहूर्त इव मे गतः ।
न हि तृप्तोऽस्मि भगवन् शृण्वानो धर्ममुत्तमम् ।। ३७ ।।
विद्वन्! यह कथा सुननेमें इतनी सुखद थी कि मेरा बहुत-सा समय भी दो घड़ीके समान बीत गया। भगवन्! आपके मुखसे यह धर्मकी उत्तम कथा सुनते-सुनते मुझे तृप्ति ही नहीं हो रही है।। ३७।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २१६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याधसंवादविषयक दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१६ ।।

श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।

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सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयमिदं तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह धर्मयुक्त शुभ कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन मार्कण्डेयमुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथमग्निर्वर्न यातः कथं चाप्यङ्गिराः पुरा ।
नष्टेऽग्नौ हव्यमवहदग्निर्भूत्वा महाद्युतिः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—मुने! पूर्वकालमें अग्निदेवने किस कारणसे जलमें प्रवेश किया था? और अग्निके अदृश्य हो जानेपर महातेजस्वी अंगिरा ऋषिने किस प्रकार अग्नि होकर देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेका कार्य किया? ॥ २ ॥

अग्निर्यदा त्वेक एव बहुत्वं चास्य कर्मसु ।
दृश्यते भगवन् सर्वमेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
भगवन्! जब अग्निदेव एक ही हैं, तब विभिन्न कर्मोंमें उनके अनेक रूप क्यों दिखायी देते हैं? मैं यह सब कुछ जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

कुमारश्च यथोत्पन्नो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् ।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च ॥ ४ ॥
कुमार कार्तिकेयकी उत्पत्ति कैसे हुई? वे अग्निके पुत्र कैसे हुए? भगवान् शंकरने तथा गंगादेवी और कृत्तिकाओंसे उनका जन्म कैसे सम्भव हुआ? ॥ ४ ॥

एतदिच्छाम्यहं त्वत्तः श्रोतुं भार्गवसत्तम ।
कौतूहलसमाविष्टो याथातथ्यं महामुने ॥ ५ ॥
भृगुकुलतिलक महामुने! मैं आपके मुखसे यह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा क्रुद्धो हुतवहस्तपस्तप्तुं वनं गतः ॥ ६ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! इस विषयमें जानकार लोग उस प्राचीन इतिहासको दोहराया करते हैं, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार अग्निदेव कुपित हो तपस्याके लिये जलमें प्रविष्ट हुए थे? ।। ६ ।। यथा च भगवानग्निः स्वयमेवाङ्गिराऽभवत् । संतापयंश्च प्रभया नाशयंस्तिमिरणि च ॥ ७ ॥ कैसे स्वयं महर्षि अंगिरा ही भगवान् अग्नि बन गये और अपनी प्रभासे अन्धकारका निवारण करते हुए जगत्‌को ताप देने लगे? ।। ७ ।। पुराङ्गिरा महाबाहो चचार तप उत्तमम् । आश्रमस्थो महाभागो हव्यवाहं विशेषयन् । तथा स भूत्वा तु तदा जगत् सर्वं व्यकाशयत् ॥ ८ ॥ महाबाहो! प्राचीन कालकी बात है, महाभाग अंगिरा ऋषि अपने आश्रममें ही रहकर उत्तम तपस्या करने लगे। वे अग्निसे भी अधिक तेजस्वी होनेके लिये यत्नशील थे। अपने उद्देश्यमें सफल होकर वे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करने लगे ।। ८ ।। तपश्चरंस्तु हुतभुक् संतप्तस्तस्य तेजसा । भृशं ग्लानश्च तेजस्वी न च किंचित् प्रजज्ञिवान् ॥ ९ ॥ उन्हीं दिनों अग्निदेव भी तपस्या कर रहे थे। वे तेजस्वी होकर भी अंगिराके तेजसे संतप्त हो अत्यन्त मलिन पड़ गये। परंतु इसका कारण क्या है? यह कुछ भी उनकी समझमें नहीं आया ।। ९ ।। अथ संचिन्तयामास भगवान् हव्यवाहनः । अन्योऽग्निरिह लोकानां ब्रह्मणा सम्प्रकल्पितः ॥ १० ॥ तब भगवान् अग्निने यह सोचा—'हो-न-हो, ब्रह्माजीने इस जगत्‌के लिये किसी दूसरे अग्निदेवताका निर्माण कर लिया है' ।। १० ।। अग्नित्वं विप्रणष्टं हि तप्यमानस्य मे तपः । कथमग्निः पुनरहं भवेयमिति चिन्त्य सः ॥ ११ ॥ अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापयन्तं महामुनिम् । 'जान पड़ता है, तपस्यामें लग जानेसे मेरा अग्नित्व नष्ट हो गया। अब मैं पुनः किस प्रकार अग्नि हो सकता हूँ?' यह विचार करते हुए उन्होंने देखा कि महामुनि अंगिरा अग्निकी ही भाँति प्रकाशित हो सम्पूर्ण जगत्‌को ताप दे रहे ।। ११ १/२ ।। सोपासर्पच्छनैर्भीतस्तमुवाच तदाङ्गिराः ॥ १२ ॥ शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावनः । विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु ॥ १३ ॥ यह देख वे डरते-डरते धीरेसे उनके पास गये। उस समय उनसे अंगिरा मुनिने कहा—'देव! आप पुनः शीघ्र ही लोकभावन अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हो जाइये; क्योंकि तीनों

लोकों तथा स्थावर-जंगम प्राणियोंमें आपकी प्रसिद्धि है ॥ १२-१३ ॥ त्वमग्निः प्रथमं सृष्टो ब्रह्मणा तिमिरापहः । स्वस्थानं प्रतिपद्यस्व शीघ्रमेव तमोनुद ॥ १४ ॥ 'ब्रह्माजीने आपको ही अन्धकारनाशक प्रथम अग्निके रूपमें उत्पन्न किया है। तिमिरपुञ्जको दूर भगानेवाले देवता! आप शीघ्र ही अपना स्थान ग्रहण कीजिये' ॥ १४ ॥

अग्निरुवाच

नष्टकीर्तिरहं लोके भवान् जातो हुताशनः । भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जनाः ॥ १५ ॥ **अग्निदेव बोले—**मुने! संसारमें मेरी कीर्ति नष्ट हो गयी है। अब आप ही अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हैं। आपको ही लोग अग्नि समझेंगे, आपके सामने मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा ॥ १५ ॥

निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव । भविष्यामि द्वितीयोऽहं प्राजापत्यक एव च ॥ १६ ॥ मैं अपना अग्नित्व आपमें ही रख देता हूँ, आप ही प्रथम अग्निके पदपर प्रतिष्ठित होइये। मैं द्वितीय प्राजापत्य नामक अग्नि होऊँगा ॥ १६ ॥

अंगिरा उवाच

कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरपहः । मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा ॥ १७ ॥ **अङ्गिराने कहा—**अग्निदेव! आप प्रजाको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुण्यकर्म (देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेका कार्य) सम्पन्न कीजिये और स्वयं ही अन्धकारनिवारक अग्निपदपर प्रतिष्ठित होइये; साथ ही मुझे अपना पहला पुत्र स्वीकार कर लीजिये ॥ १७ ॥

मार्कण्डेय उवाच

तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाकरोत् । राजन् बृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरसः सुतः ॥ १८ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! अंगिराका यह वचन सुनकर अग्निदेवने वैसा ही किया। उन्हें अपना प्रथम पुत्र मान लिया। फिर अंगिराके भी बृहस्पति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १८ ॥

ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेराङ्गिरसं सुतम् । उपेत्य देवाः पप्रच्छुः कारणं तत्र भारत ॥ १९ ॥ भरतनन्दन! अंगिराको अग्निदेवका प्रथम पुत्र जानकर सब देवता उनके पास आये और इसका कारण पूछने लगे ॥ १९ ॥

स तु पृष्टस्तदा देवैस्ततः कारणमब्रवीत् ।
प्रत्यगृह्णंस्तु देवाश्च तद् वचोऽङ्गिरसस्तदा ॥ २० ॥

देवताओंके पूछनेपर अंगिराने उन्हें कारण बताया और देवताओंने अंगिराके उस कथनपर विश्वास करके उसे यथार्थ माना ॥ २० ॥
तत्र नानाविधानग्नीन् प्रवक्ष्यामि महाप्रभान् ।
कर्मभिर्बहुभिः ख्यातान् नानार्थान् ब्राह्मणेष्विह ॥ २१ ॥

अब मैं महान् कान्तिमान् विविध अग्नियोंका, जो ब्राह्मणग्रंथोक्त विधि-वाक्योंमें अनेक कर्मोंद्वारा विभिन्न प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये विख्यात हैं, वर्णन करूँगा ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे
सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें अंगिरसके प्रसंगमें दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१७ ॥

अंगिराकी संततिका वर्णन

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अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अंगिराकी संततिका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

ब्रह्मणो यस्तृतीयस्तु पुत्रः कुरुकुलोद्वह ।
तस्याभवत् सुभा भार्या प्रजास्तस्यां च मे शृणु ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कुरुकुलधुरन्धर युधिष्ठिर! ब्रह्माजीके जो तीसरे पुत्र अंगिरा हैं, उनकी पत्नीका नाम सुभा है। उसके गर्भसे जो संतानें उत्पन्न हुईं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १ ॥

बृहत्कीर्तिर्बृहज्ज्योतिर्बृहद्ब्रह्मा बृहन्मनाः ।
बृहन्मन्त्रो बृहद्भासस्तथा राजन् बृहस्पतिः ॥ २ ॥
राजन्! बृहत्कीर्ति, बृहज्ज्योति, बृहद्ब्रह्मा, बृहन्मना, बृहन्मन्त्र, बृहद्भास तथा बृहस्पति (ये अंगिरासे सुभाके सात पुत्र हुए) ॥ २ ॥

प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाभवत् ।
देवी भानुमती नाम प्रथमाङ्गिरसः सुता ॥ ३ ॥
अंगिराकी प्रथम पुत्रीका नाम देवी भानुमती है। वह उनकी संतानोंमें सबसे अधिक रूपवती है; उसके रूपकी कहीं तुलना ही नहीं है (भानु अर्थात् सूर्यसे युक्त होनेके कारण यह दिनकी अभिमानिनी है) ॥ ३ ॥

भूतानामेव सर्वेषां यस्यां रागस्तदाभवत् ।
रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीयाङ्गिरसः सुता ॥ ४ ॥
अंगिरा मुनिकी दूसरी कन्या 'रागा' नामसे विख्यात है। उसपर समस्त प्राणियोंका विशेष अनुराग प्रकट हुआ था। इसीलिये उसका ऐसा नाम प्रसिद्ध हुआ। (यह रात्रिकी अभिमानिनी है) ॥ ४ ॥

यां कपर्दिसुतामाहुर्दृश्यादृश्येति देहिनः ।
तनुत्वात् सा सिनीवाली तृतीयाङ्गिरसः सुता ॥ ५ ॥
अंगिराकी तीसरी पुत्री 'सिनीवाली' (चतुर्दशीयुक्ता अमावास्या) है जो अत्यन्त कृश होनेके कारण कभी दीखती है और कभी नहीं दीखती; इसीलिये लोग उसे 'दृश्यादृश्या' कहते हैं। भगवान् रुद्र उसे ललाटमें धारण करते हैं, इस कारण उसे सब लोग 'रुद्रसुता, भी कहते हैं ॥ ५ ॥

पश्यत्यर्चिष्मती भाभिर्विभिर्विश्वं हविष्मती ।
षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्महिष्मतीम् ॥ ६ ॥

उनकी चौथी पुत्री 'अर्चिष्मती' है, (यही पूर्ण चन्द्रमासे युक्त होनेके कारण शुद्ध पौर्णमासी कही जाती है) इसकी प्रभासे लोग रातमें भी सब वस्तुओंको स्पष्ट देखते हैं। पाँचवीं कन्या 'हविष्मती' (प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा 'राका') है, जिसके सांनिध्यमें हविष्यद्वारा देवताओंका यजन किया जाता है। अंगिरा मुनिकी जो छठी पुण्यात्मा कन्या है, उसे 'महिष्मती' कहते हैं (यही चतुर्दशीयुक्ता पूर्णिमा है, जिसे 'अनुमति' भी कहते हैं) ।। ६ ।।
महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महामते ।
महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ।। ७ ।।
महामते! जो दीप्तिशाली सोमयाग आदि महायज्ञोंमें प्रकाशित होनेके कारण 'महामती' नामसे विख्यात है, वह (प्रतिपद्युक्त अमावास्या) अंगिरा मुनिकी सातवीं पुत्री कहलाती है ।। ७ ।।
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहायते ।
एकानंशेति तामाहुः कुहूमङ्गिरसः सुताम् ।। ८ ।।
जिस भगवती अमाको देखकर लोग 'कुहु-कुहु' ध्वनि कर उठते (चकित हो जाते) हैं, अंगिरा मुनिकी वह आठवीं पुत्री 'कुहू' नामसे विख्यात है। उसमें चन्द्रमाकी एकमात्र कला अत्यन्त सूक्ष्म अंशसे शेष रहती है। (यही शुद्ध अमावस्या है) ।। ८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि अङ्गिरसोपाख्याने अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २१८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१८ ।।

बृहस्पतिकी संततिका वर्णन

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एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

बृहस्पतिकी संततिका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

बृहस्पतेश्चान्द्रमसी भार्याऽऽसीद् या यशस्विनी ।
अग्नीन् साजनयत् पुण्यान् षडेकां चापि पुत्रिकाम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! बृहस्पतिजीकी जो यशस्विनी पत्नी चान्द्रमसी (तारा) नामसे विख्यात थी, उसने पुत्ररूपमें छः पवित्र अग्नियोंको तथा एक पुत्रीको भी जन्म दिया ॥ १ ॥

आहुतिष्वेव यस्याग्नेर्हविषाद्यं विधीयते ।
सोऽग्निर्बृहस्पतेः पुत्रः शंयुर्नाम महाव्रतः ॥ २ ॥
(दर्श-पौर्णमास आदिमें) प्रधान आहुतियोंको देते समय जिस अग्निके लिये सर्वप्रथम घीकी आहुति दी जाती है, वह महान् व्रतधारी अग्नि ही बृहस्पतिका 'शंयु' नामसे विख्यात (प्रथम) पुत्र है ॥ २ ॥

चातुर्मास्येषु यस्येष्टमश्वमेधेऽग्रजः प्रभुः ।
दीप्तो ज्वालैरनेकाभैरग्निरेकोऽथ वीर्यवान् ॥ ३ ॥
चातुर्मास्य-सम्बन्धी यज्ञोंमें तथा अश्वमेध-यज्ञमें जिसका पूजन होता है, जो सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाला और सर्वसमर्थ है तथा जो अनेक वर्णकी ज्वालाओंसे प्रज्वलित है, वह अद्वितीय शक्तिशाली अग्नि ही शंयु है ॥ ३ ॥

शंयोरप्रतिमा भार्या सत्या सत्याथ धर्मजा ।
अग्निस्तस्य सुतो दीप्तस्तिस्रः कन्याश्च सुव्रताः ॥ ४ ॥
शंयुकी पत्नीका नाम था सत्या। वह धर्मकी पुत्री थी। उसके रूप और गुणोंकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सदा सत्यके पालनमें तत्पर रहती थी। उसके गर्भसे शंयुके एक अग्निस্বরূপ पुत्र तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तीन कन्याएँ हुईं ॥ ४ ॥

प्रथमेनाज्यभागेन पूज्यते योऽग्निरध्वरे ।
अग्निस्तस्य भरद्वाजः प्रथमः पुत्र उच्यते ॥ ५ ॥
यज्ञमें प्रथम आज्यभागके द्वारा जिस अग्निकी पूजा की जाती है, वही शंयुका ज्येष्ठ पुत्र 'भरद्वाज' नामक अग्नि बताया जाता है ॥ ५ ॥

पौर्णमासेषु सर्वेषु हविषाऽऽज्यं स्रुवोद्यतम् ।
भरतो नामतः सोऽग्निर्द्वितीयः शंयुतः सुतः ॥ ६ ॥
समस्त पौर्णमास यागोंमें स्रुवासे हविष्यके साथ घी उठाकर जिसके लिये 'प्रथम आधार' अर्पित किया जाता है, वह 'भरत' (ऊर्ज) नामक अग्नि शंयुका द्वितीय पुत्र है

(इसका जन्म शंयुकी दूसरी स्त्रीके गर्भसे हुआ था) ॥ ६ ॥ तिस्रः कन्या भवन्त्यन्या यासां स भरतः पतिः । भरतस्तु सुतस्तस्य भरत्येका च पुत्रिका ॥ ७ ॥ शंयुके तीन कन्याएँ और हुई, जिनका बड़ा भाई भरत ही पालन करता था। भरत (ऊर्ज)-के ‘भरत’ नामवाला ही एक पुत्र तथा ‘भरती’ नामकी एक कन्या हुई ॥ ७ ॥ भरतो भरतस्याग्नेः पावकस्तु प्रजापतेः । महानत्यर्थमहितस्तथा भरतसत्तम ॥ ८ ॥ सबका भरण-पोषण करनेवाले प्रजापति भरत नामक अग्निसे ‘पावक’ की उत्पत्ति हुई। भरतश्रेष्ठ! वह अत्यन्त महनीय (पूज्य) होनेके कारण ‘महान्’ कहा गया है ॥ ८ ॥ भरद्वाजस्य भार्या तु वीरा वीरस्य पिण्डदा । प्राहुराज्येन तस्येज्यां सोमस्येव द्विजाः शनैः ॥ ९ ॥ शंयुके पहले पुत्र भरद्वाजकी पत्नीका नाम ‘वीरा’ था, जिसने वीर नामक पुत्रको शरीर प्रदान किया। ब्राह्मणोंने सोमकी ही भाँति वीरकी भी आज्यभागसे पूजा बतायी है³। इनके लिये आहुति देते समय मन्त्रका उपांशु उच्चारण किया जाता है ॥ ९ ॥ हविषा यो द्वितीयेन सोमेन सह युज्यते । रथप्रभू रथध्वानः कुम्भरेताः स उच्यते ॥ १० ॥ सोमदेवताके साथ इन्हींको द्वितीय आज्यभाग प्राप्त होता है। इन्हें ‘रथप्रभु’, ‘रथध्वान’ और ‘कुम्भरेता’ भी कहते हैं ॥ १० ॥ सरय्वां जनयत् सिद्धिं भानुं भाभिः समावृणोत् । आग्नेयमानयन् नित्यमाह्वाने ह्येष सूयते ॥ ११ ॥ वीरने ‘सरयू’ नामवाली पत्नीके गर्भसे ‘सिद्धि’ नामक पुत्रको जन्म दिया। सिद्धिने अपनी प्रभासे सूर्यको भी आच्छादित कर लिया। सूर्यके आच्छादित हो जानेपर उसने अग्निदेवता-सम्बन्धी यज्ञका अनुष्ठान किया। आह्वान-मन्त्र (अग्निमग्न आवह इत्यादि)-में इस सिद्धि नामक अग्निकी ही स्तुति की जाती है ॥ ११ ॥ यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिया । अग्निर्निश्च्यवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ॥ १२ ॥ बृहस्पतिके (दूसरे) पुत्रका नाम ‘निश्च्यवन’ है। ये यश, वर्चस् (तेज) और कान्तिसे कभी च्युत नहीं होते हैं। निश्च्यवन अग्नि केवल पृथिवीकी स्तुति करते हैं२ ॥ विपाप्मा कलुषैर्मुक्तो विशुद्धश्चार्चिषा ज्वलन् । विपापोऽग्निः सुतस्तस्य सत्यः समयधर्मकृत् ॥ १३ ॥ वे निष्पाप, निर्मल, विशुद्ध तथा तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हैं। उनका पुत्र ‘सत्य नामक अग्नि है; सत्य भी निष्पाप तथा कालधर्मके प्रवर्तक हैं ॥ १३ ॥

आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् ।
अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभयत्यभिसेविते ।। १४ ।।
वे वेदनासे पीडित होकर आर्तनाद करनेवाले प्राणियोंको उस कष्टसे निष्कृति (छुटकारा) दिलाते हैं, इसीलिये उन अग्निका एक नाम निष्कृति भी है। वे ही प्राणियोंद्वारा सेवित गृह और उद्यान आदिमें शोभाकी सृष्टि करते हैं ।। १४ ।।
अनुकूजन्ति येनेह वेदनार्ताः स्वयं जनाः ।
तस्य पुत्रः स्वनो नाम पावकः स रुजस्करः ।। १५ ।।
सत्यके पुत्रका नाम 'स्वन' है, जिनसे पीडित होकर लोग वेदनासे स्वयं कराह उठते हैं। इसीलिये उनका यह नाम पड़ा है। वे रोगकारक अग्नि हैं ।। १५ ।।
यस्तु विश्वस्य जगतो बुद्धिमाक्रम्य तिष्ठति ।
तं प्राहुरध्यात्मविदो विश्वजिन्नाम पावकम् ।। १६ ।।
(बृहस्पतिके तीसरे पुत्रका नाम 'विश्वजित्' है) वे सम्पूर्ण विश्वकी बुद्धिको अपने वशमें करके स्थित हैं, इसलिये अध्यात्मशास्त्रके विद्वानोंने उन्हें 'विश्वजित्' अग्नि कहा है ।। १६ ।।
अन्तरग्निः स्मृतो यस्तु भुक्तं पचति देहिनाम् ।
स जज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत ।। १७ ।।
भरतनन्दन! जो समस्त प्राणियोंके उदरमें स्थित हो उनके खाये हुए पदार्थोंको पचाते हैं, वे सम्पूर्ण लोकोंमें 'विश्वभुक्' नामसे प्रसिद्ध अग्नि बृहस्पतिके (चौथे) पुत्रके रूपमें प्रकट हुए हैं ।। १७ ।।
ब्रह्मचारी यतात्मा च सततं विपुलव्रतः ।
ब्राह्मणाः पूजयन्त्येनं पाकयज्ञेषु पावकम् ।। १८ ।।
ये विश्वभुक् अग्नि ब्रह्मचारी, जितात्मा तथा सदा प्रचुर व्रतोंका पालन करनेवाले हैं। ब्राह्मणलोग पाकयज्ञोंमें इन्हींकी पूजा करते हैं ।। १८ ।।
पवित्रा गोमती नाम नदी यस्याभवत् प्रिया ।
तस्मिन् कर्माणि सर्वाणि क्रियन्ते धर्मकर्तृभिः ।। १९ ।।
पवित्र गोमती नदी इनकी प्रिय पत्नी हुईं। धर्माचरण करनेवाले द्विजलोग विश्वभुक् अग्निमें ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं ।। १९ ।।
वडवाग्निः पिबत्यम्भो योऽसौ परमदारुणः ।
ऊर्ध्वभागूर्ध्वभाङ्नाम कविः प्राणाश्रितस्तु यः ।। २० ।।
जो अत्यन्त भयंकर वडवानलरूपसे समुद्रका जल सोखते रहते हैं, वे ही शरीरके भीतर ऊर्ध्वगति—'उदान' नामसे प्रसिद्ध हैं। ऊपरकी ओर गतिशील होनेसे ही उनका नाम 'ऊर्ध्वभाक्' है। वे प्राणवायुके आश्रित एवं त्रिकालदर्शी हैं। (उन्हें बृहस्पतिका पाँचवाँ पुत्र माना गया है) ।। २० ।।

उद्गद्वारं हविर्यस्य गृहे नित्यं प्रदीयते । ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमः स्मृतः ॥ २१ ॥ प्रत्येक गृह्यकर्ममें जिस अग्निके लिये सदा घीकी ऐसी धारा दी जाती है जिसका प्रवाह उत्तराभिमुख हो और इस प्रकार दी हुई वह घृतकी आहुति अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करती है। इसीलिये उस उत्कृष्ट अग्निका नाम ‘स्विष्टकृत्’ है। (उसे बृहस्पतिका छठा पुत्र समझना चाहिये) ॥ २१ ॥

यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति पावकः । क्रुद्धस्य तु रसो जज्ञे मन्युतीव्रा च पुत्रिका । स्वाहेति दारुणा क्रूरा सर्वभूतेषु तिष्ठति ॥ २२ ॥ जिस समय अग्निस্বরূপ बृहस्पतिका क्रोध प्रशान्त प्राणियोंपर प्रकट हुआ उस समय उनके शरीरसे जो पसीना निकला, वही उनकी पुत्रीके रूपमें परिणत हो गया। वह पुत्री अधिक क्रोधवाली थी। वह ‘स्वाहा’ नामसे प्रसिद्ध हुई। वह दारुण एवं क्रूर कन्या सम्पूर्ण भूतोंमें निवास करती है ॥ २२ ॥

त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन । अतुलत्वात् कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ॥ २३ ॥ स्वर्गमें भी कहीं तुलना न होनेके कारण जिसके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं है, उस स्वाहा-पुत्रको देवताओंने ‘काम’ नामक अग्नि कहा है ॥ २३ ॥

संहर्षाद् धारयन् क्रोधं धन्वी स्रग्वी रथे स्थितः । समरे नाशयेच्छत्रूनमोघो नाम पावकः ॥ २४ ॥ जो हृदयमें क्रोध धारण किये धनुष और मालासे विभूषित हो रथपर बैठकर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धमें शत्रुओंका नाश करते हैं, उसका नाम है ‘अमोघ’ अग्नि ॥

उक्थो नाम महाभाग त्रिभिरुक्थैरभिष्टुतः । महावाचं त्वजनयत् समाश्वासं हि यं विदुः ॥ २५ ॥ महाभाग! ब्राह्मणलोग त्रिविध उक्थ मन्त्रोंद्वारा जिसकी स्तुति करते हैं, जिसने महावाणी (परा)-का आविष्कार किया है तथा ज्ञानी पुरुष जिसे आश्वासन देनेवाला समझते हैं; उस अग्निका नाम ‘उक्थ’ है ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥

१. 'अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय' इस श्रुतिमें अग्नि और सोमको उपांशु मन्त्रोच्चारणपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेका विधान है। यहाँ सोमके साथ जिस अग्निको आज्यभागका अधिकारी बताया गया है, वह 'वीर' नामक अग्नि ही है। २. ये वाक्‌के अभिमानी देवता हैं। 'तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।