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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पुरा रामभयादेव तापस्यं समुपाश्रितम् ॥ ५६ ॥
वहाँ रावण अपने भूतपूर्व मन्त्री मारीचसे मिला, जो श्रीरामचन्द्रजीके भयसे ही पहलेसे उस स्थानमें आकर तपस्या करता था ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रामवनाभिगमने
सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें श्रीरामवनगमनविषयक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५६ १/२ श्लोक हैं)

२७८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण

मार्कण्डेय उवाच

मारीचस्त्वथ सम्भ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् ।
पूजयामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्ततः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! रावणको आया देख मारीच सहसा उठकर खड़ा हो गया और उसने फल-मूल आदि अतिथिसत्कारकी सामग्रियोंद्वारा उसका विधिवत् पूजन किया ॥ १ ॥

विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः ।
उवाच प्रथितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ २ ॥
जब रावण बैठकर विश्राम कर चुका, तब उसके पास बैठकर बातचीत करनेमें कुशल राक्षस मारीचने वाक्यका मर्म समझनेमें निपुण रावणसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २ ॥

न ते प्रकृतिमान् वर्णः कच्चित् क्षेमं पुरे तव ।
कच्चित् प्रकृतयः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ॥ ३ ॥
‘लंकेश्वर! तुम्हारे शरीरका रंग ठीक हालतमें नहीं है। तुम उदास दिखायी देते हो। तुम्हारे नगरमें कुशल तो है न? समस्त प्रजा और मन्त्री आदि पहलेकी भाँति तुम्हारी सेवा करते हैं न? ॥ ३ ॥

किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर ।
कृतमित्येव तद् विद्धि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ ४ ॥
‘राक्षसराज! कौन-सा ऐसा कार्य आ गया है, जिसके लिये तुम्हें यहाँतक आना पड़ा? यदि वह मेरेद्वारा साध्य है तो कितना ही कठिन क्यों न हो, उसे किया हुआ ही समझो’ ॥ ४ ॥

शशंस रावणस्तस्मै तत् सर्वं रामचेष्टितम् ।
समासेनैव कार्याणि क्रोधामर्षसमन्वितः ॥ ५ ॥
रावण क्रोध और अमर्षमें भरा हुआ था। उसने एक-एक करके रामद्वारा किये हुए सब कार्य संक्षेपसे कह सुनाये ॥ ५ ॥

मारीचस्त्वब्रवीच्छ्रुत्वा समासेनैव रावणम् ।
अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै ॥ ६ ॥
मारीचने सारी बातें सुनकर थोड़ेमें ही रावणको समझाते हुए कहा—‘दशानन! तुम श्रीरामसे भिड़नेका साहस न करो। मैं उनके पराक्रमको जानता हूँ ॥ ६ ॥

बाणवेगं हि कस्तस्य शक्तः सोढुं महात्मनः ।

प्रव्रज्यायां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥ विनाशमुखमेतत् ते केनाख्यातं दुरात्मना । ‘भला! इस जगत्में कौन ऐसा वीर है, जो परमात्मा श्रीरामके बाणोंका वेग सह सके? मैं जो यहाँ संन्यासी बना बैठा हूँ, इसमें भी वे पुरुषरत्न श्रीराम ही कारण हैं। श्रीरामसे वैर मोल लेना विनाशके मुखमें जाना है, किस दुरात्माने तुम्हें ऐसी सलाह दी है?’ ॥ ७ १/२ ॥

तमुवाचाथ सक्रोधो रावणः परिभर्त्सयन् ॥ ८ ॥ अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्यूरपि ते ध्रुवम् । मारीचकी बात सुनकर रावण और भी कुपित हो उठा और उसे डाँटते हुए बोला—‘मारीच! यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा तो भी तेरी मृत्यु निश्चित ही है ॥ ८ १/२ ॥ मारीचश्चिन्तयामास विशिष्टान्मरणं वरम् ॥ ९ ॥ अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् । मारीचने सोचा, ‘यदि मृत्यु निश्चित ही है तो श्रेष्ठ पुरुषके हाथसे ही मरना अच्छा होगा; अतः रावणका जो अभीष्ट कार्य है, उसे अवश्य करूँगा’ ॥ ९ १/२ ॥ ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो रक्षसां वरम् ॥ १० ॥ किं ते साह्यं मया कार्यं करिष्याम्यवशोऽपि तत् ।

तदनन्तर उसने राक्षसराज रावणसे कहा—'अच्छा; बताओ, मुझे तुम्हारी क्या सहायता करनी होगी? इच्छा, न होनेपर भी मैं विवश होकर उसे करूँगा' ।। १० १/२ ।। तमब्रवीद् दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय ।। ११ ।। रत्नशृङ्गो मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः । ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदयिष्यति ।। १२ ।। तब दशाननने उससे कहा—'तुम एक ऐसे मनोहर मृगका रूप धारण करो जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हों और शरीरके रोएँ भी रत्नोंके ही समान चित्र-विचित्र दिखायी दें। फिर रामके आश्रमपर जाओ और सीताको लुभाओ। सीता तुम्हें देख लेनेपर निश्चय ही रामसे यह अनुरोध करेगी कि 'आप इस मृगको पकड़ लाइये' ।। ११-१२ ।। अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति । तामादायापनेष्यामि ततः स न भविष्यति ।। १३ ।। भार्यावियोगाद् दुर्बुद्धिरेतत् साह्यं कुरुष्व मे । 'तुम्हारे पीछे रामके अपने आश्रमसे दूर निकल जानेपर सीताको वशमें लाना सहज हो जायगा। मैं उसे आश्रमसे हरकर ले जाऊँगा और दुर्बुद्धि राम अपनी प्यारी पत्नीके वियोगसे व्याकुल होकर प्राण दे देगा। बस, मेरी इतनी ही सहायता कर दो' ।। १३ १/२ ।। इत्येवमुक्तो मारीचः कृत्वोदकमथात्मनः ।। १४ ।। रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत् सुदुःखितः । रावणके ऐसा कहनेपर मारीच स्वयं ही अपना श्राद्ध-तर्पण करके अत्यन्त दुःखी होकर आगे जाते हुए रावणके पीछे-पीछे चला ।। १४ १/२ ।। ततस्तस्याश्रमं गत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।। १५ ।। चक्रतुस्तत् तथा सर्वमुभौ यत् पूर्वमन्त्रितम् । तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप जाकर उन दोनोंने पहले जैसी सलाह कर रखी थी, उसके अनुसार सब कार्य किया ।। १५ १/२ ।। रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् ।। १६ ।। मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः । दर्शयामास मारीचो वैदेहीं मृगरूपधृक् ।। १७ ।। रावण मूँड़ मुड़ाने, भिक्षापात्र हाथमें लिये एवं त्रिदण्डधारी संन्यासीका रूप धारण करके और मारीच मृग बनकर—दोनों उस स्थानपर गये। मारीचने विदेहनन्दिनी सीताके समक्ष अपना मृगरूप प्रकट किया ।। १६-१७ ।। चोदयामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता । रामस्तस्याः प्रियं कुर्वन् धनुरादाय सत्वरः ।। १८ ।। रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रययौ मृगलिप्सया ।

विधिके विधानसे प्रेरित होकर सीताने उस मृगको लानेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको भेजा। श्रीरामचन्द्रजी सीताका प्रिय करनेके लिये धनुष हाथमें ले लक्ष्मणको सीताकी रक्षाका भार सौंपकर मृगको लानेकी इच्छासे तुरंत चल दिये ।। १८ १/२ ।।

स धन्वी बद्धतूणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् ।। १९ ।।
अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा ।
वे धनुष-बाण ले, पीठपर तरकस बाँधकर, कटिमें कृपाण लटकाये तथा हाथोंमें दस्ताने पहने उस मृगके पीछे उसी प्रकार दौड़े, जैसे मृगशिरा नक्षत्रके पीछे भगवान् रुद्र दौड़े थे ।। १९ १/२ ।।
सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् ।। २० ।।
चकर्ष महदध्वानं रामस्तं बुबुधे ततः ।
निशाचरं विदित्वा तं राघवः प्रतिभानवान् ।। २१ ।।
अमोघं शरमादाय जघान मृगरूपिणम् ।
मायावी राक्षस मारीच कभी छिप जाता और कभी नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो जाता था। इस प्रकार वह श्रीरामचन्द्रजीको आश्रमसे बहुत दूर खींच ले गया। तब श्रीरामचन्द्रजी यह ताड़ गये कि यह कोई मायावी राक्षस है। यह बात ध्यानमें आते ही प्रतिभाशाली

श्रीरघुनाथजीने एक अमोघ बाण लेकर उस मृगरूपधारी निशाचरको मार डाला॥ २०-२१॥ स रामबाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा ॥ २२ ॥ हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह । श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे आहत हो मरते समय मारीचने उनके ही स्वरमें 'हा सीते, हा लक्ष्मण' कहकर आर्तनाद किया ॥ २२ १/२ ॥ शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् ॥ २३ ॥ सा प्राद्रवद् यतः शब्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः । अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिष्यति ॥ २४ ॥ मुहूर्ताद् द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मिते । विदेहनन्दिनी सीताने भी उसकी वह करुणाभरी पुकार सुनी। उसकी पुकार सुनते ही जिस ओरसे वह आवाज आयी थी, उसी ओर वे दौड़ पड़ीं। तब लक्ष्मणने उनसे कहा—'भीरु! डरनेकी कोई बात नहीं है। भला, कौन ऐसा है, जो भगवान् रामको मार सकेगा? शुचिस्मिते! तुम दो ही घड़ीमें अपने पति भगवान् श्रीरामको यहाँ उपस्थित देखोगी॥ २३-२४ १/२ ॥ इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् ॥ २५ ॥ हता वै स्त्रीस्वभावेन शुक्लचारित्रभूषणा । सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता ॥ २६ ॥ लक्ष्मणकी यह बात सुनकर रोती हुई सीताने उन्हें संदेहकी दृष्टिसे देखा। यद्यपि शुद्ध सदाचार ही उनका आभूषण था। वे साध्वी और पतिव्रता थीं; तथापि स्त्री स्वभाववश उस समय उनकी बुद्धि मारी गयी। उन्होंने लक्ष्मणको कठोर बातें सुनानी आरम्भ कीं—॥ २५-२६॥ नैष कामो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थयसे हृदा । अप्यहं शस्त्रमादाय हन्यामात्मानमात्मना ॥ २७ ॥ पतेयं गिरिशृङ्गाद् वा विशेयं वा हुताशनम् । रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथंचन ॥ २८ ॥ निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा । 'ओ मूढ़! तुम मन-ही-मन जिस वस्तुको पाना चाहते हो, तुम्हारा वह मनोरथ कभी पूर्ण न होगा। मैं स्वयं तलवार लेकर अपना गला काट लूँगी, पर्वतके शिखरसे कूद पडूँगी अथवा जलती हुई आगमें समा जाऊँगी; परंतु' राम-जैसे स्वामीको छोड़कर तुम-जैसे नीच पुरुषका कदापि वरण न करूँगी। जैसे सिंहिनी सियारको नहीं स्वीकार कर सकती, उसी प्रकार मैं तुम्हें नहीं ग्रहण करूँगी' ॥ २७-२८ १/२ ॥ एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः ॥ २९ ॥

पिधाय कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः । स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ॥ ३० ॥ अवीक्षमाणो बिम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा । लक्ष्मण सदाचारी तथा श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी थे। उन्होंने सीताके ये कठोर वचन सुनकर अपने दोनों कान बंद कर लिये और उसी मार्गसे चल दिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी गये थे। उस समय लक्ष्मणके हाथमें धनुष था। उन्होंने बिम्बफलके समान अरुण अधरोंवाली सीताकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं। श्रीरामके पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ २९-३० १/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणः प्रत्यदृश्यत ॥ ३१ ॥ अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानलः । यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ॥ ३२ ॥ इसी समय अवसर पाकर राक्षस रावण साध्वी सीताको हर ले जानेकी इच्छासे वहाँ दिखायी दिया। वह भयानक निशाचर सुन्दर रूप धारण करके राखमें छिपी हुई आगके समान संन्यासीके वेषमें अपने यथार्थ रूपको छिपाये हुए था ॥ ३१-३२ ॥ सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा । निमन्त्रयामास तदा फलमूलाश्नादिभिः ॥ ३३ ॥ उस समय यतिको अपने आश्रमपर आया हुआ देख धर्मको जाननेवाली जनकनन्दिनी सीता फल-मूलके भोजन आदिके अतिथिसत्कारके लिये उसे निमन्त्रित किया ॥ अवमन्य ततः सर्वं स्वरूपं प्रत्यपद्यत । सान्त्वयामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ॥ ३४ ॥ राक्षसराज रावण सीताकी दी हुई उन सभी वस्तुओंकी अवहेलना करके अपने असली रूपमें प्रकट हो गया और विदेहराजकुमारीको इस प्रकार सान्त्वना देने लगा— ॥ ३४ ॥ सीते राक्षसराजोऽहं रावणो नाम विश्रुतः । मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ॥ ३५ ॥ 'सीते! मैं राक्षसोंका राजा हूँ। मेरा 'रावण' नाम सर्वत्र विख्यात है। समुद्रके पार बसी हुई रमणीय लंकापुरी मेरी राजधानी है ॥ ३५ ॥ तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह । भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ॥ ३६ ॥ 'वहाँ नर-नारियोंके बीच मेरे साथ रहकर तुम बड़ी शोभा पाओगी। अतः सुन्दरी! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और इस तपस्वी रामको छोड़ दो' ॥ ३६ ॥ एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी । पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद् वचः ॥ ३७ ॥ प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ।

शैत्यमग्निरियान्नाहं त्यजेयं रघुनन्दनम् ॥ ३८ ॥ रावणके ऐसे वचन सुनकर सुन्दरी जनककिशोरीने अपने दोनों कान बंद कर लिये और उससे इस प्रकार कहा—'बस, अब ऐसी बातें मुँहसे न निकाल। नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े, पृथ्वी टूक-टूक हो जाय और अग्नि अपनी उष्णताका त्याग करके शीतल हो जाय, परंतु मैं रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नहीं छोड़ सकती ॥ ३७-३८ ॥ कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् । उपस्थाय महानागं करेणुः सूकरं स्पृशेत् ॥ ३९ ॥ 'गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले पद्ममाला-मण्डित वनवासी गजराजकी सेवामें उपस्थित होकर कोई हथिनी किसी शूकरको कैसे छू सकती है? ॥ ३९ ॥ कथं हि पीत्वा माध्वीकं पीत्वा च मधुमाधवीम् । लोभं सौवीरके कुर्यान्नारी काचिदिति स्मरेत् ॥ ४० ॥ 'जो फूलोंके रससे बने हुए मधुर पेय तथा मधुमक्षिकाओंद्वारा तैयार किया हुआ मधु पी चुकी हो, ऐसी कोई भी नारी काँजीके रसका लोभ कैसे कर सकती है?' ॥ ४० ॥ इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं ततः । क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठी विधुन्वाना करौ मुहुः ॥ ४१ ॥ रावणसे इस प्रकार कहकर सीता अपने आश्रममें प्रवेश करने लगीं। उस समय क्रोधके मारे उनके ओंठ फड़क रहे थे और वे अपने दोनों हाथोंको बार-बार हिला रही थीं ॥ ४१ ॥ तामभिद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधयत् । भर्त्सयित्वा तु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् ॥ ४२ ॥ इसी समय रावणने दौड़कर उनका मार्ग रोक लिया और कठोर स्वरसे उन्हें डराना, धमकाना आरम्भ किया। इससे वे भयके मारे मूर्च्छित हो गयीं ॥ ४२ ॥

मूर्धजेषु निजग्राह ऊर्ध्वमाचक्रमे ततः ।
तां ददर्श ततो गृध्रो जटायुर्गिरिगोचरः ।
रुदतीं राम रामेति ह्रियमाणां तपस्विनीम् ॥ ४३ ॥
तब रावणने उनके केश पकड़ लिये और आकाशमार्गसे लंकाकी ओर प्रस्थान किया। उस समय वे तपस्विनी सीता ‘हा राम-हा रामकी’ रट लगाती हुई रो रही थीं और वह राक्षस उन्हें हरकर लिये जा रहा था। इसी अवस्थामें एक पर्वतकी गुफामें रहनेवाले गृध्रराज जटायुने उन्हें देखा ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि मारीचवधे सीताहरणे च
अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें मारीचवध तथा सीताहरणविषयक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७८ ॥

२७९-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि-संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप

मार्कण्डेय उवाच

सखा दशरथस्यासीज्जटायुररुणात्मजः ।
गृध्रराजो महावीरः सम्पातिर्यस्य सोदरः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! महावीर गृध्रराज जटायु (सूर्यके सारथि) अरुणके पुत्र थे। उनके बड़े भाईका नाम सम्पाति था। राजा दशरथके साथ उनकी बड़ी मित्रता थी ॥ १ ॥

स ददर्श तदा सीतां रावणाङ्कगतां स्नुषाम् ।
सक्रोधोऽभ्यद्रवत् पक्षी रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ २ ॥
इसी नाते सीताको वे अपनी पुत्रवधू मानते थे। जब जटायुने उन्हें रावणकी गोदमें पराधीन होकर पड़ी हुई देखा तब उनके क्रोधकी सीमा न रही। वे राक्षसराज रावणपर टूट पड़े ॥ २ ॥

अथैनमब्रवीद् गृध्रो मुञ्च मुञ्चेति मैथिलीम् ।
ध्रियमाणे मयि कथं हरिष्यसि निशाचर ॥ ३ ॥
इस प्रकार और वे बोले—'निशाचर! मिथिलेश-कुमारीको छोड़ दे, छोड़ दे। मेरे जीते-जी तू इन्हें कैसे हर ले जायगा?' ॥ ३ ॥

न हि मे मोक्ष्यसे जीवन् यदि नोत्सृजसे वधूम् ।
उक्त्वैवं राक्षसेन्द्रं तं चकर्त नखरैर्भृशम् ॥ ४ ॥
'यदि मेरी पुत्रवधू सीताको तू नहीं छोड़ेगा तो मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकेगा।' ऐसा कहकर जटायुने अपने नखोंसे राक्षसराज रावणको बहुत घायल कर दिया ॥ ४ ॥

पक्षतुण्डप्रहारैश्च शतशो जर्जरीकृतम् ।
चक्षार रुधिरं भूरि गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ ५ ॥
उन्होंने पंखों और चोंचसे मार-मारकर उसके सैकड़ों घाव कर दिये। रावणका सारा शरीर जर्जर हो गया तथा देहसे रक्तकी धाराएँ बह चलीं, मानो पर्वत अनेक झरनोंसे आर्द्र हो रहा हो ॥ ५ ॥

स वध्यमानो गृध्रेण रामप्रियहितैषिणा ।
खड्गमादाय चिच्छेद भुजौ तस्य पतत्रिणः ॥ ६ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय एवं हित चाहनेवाले जटायुको इस प्रकार चोट करते देख रावणने तलवार लेकर उन पक्षिराजके दोनों पंख काट डाले ।। ६ ।।

निहत्य गृध्रराजं स भिन्नाभ्रशिखरोपमम् ।
ऊर्ध्वमाचक्रमे सीतां गृहीत्वाङ्केन राक्षसः ।। ७ ।।
बादलोंको भेदनेवाले पर्वतशिखरके समान गृध्रराज जटायुको घायल करके रावण पुनः सीताको गोदमें लिये हुए आकाशमार्गसे चल दिया ।। ७ ।।

यत्र यत्र तु वैदेही पश्यत्याश्रममण्डलम् ।
सरो वा सरितो वापि तत्र मुञ्चति भूषणम् ।। ८ ।।
विदेहकुमारी सीता जहाँ-जहाँ कोई आश्रम, सरोवर या नदी देखतीं, वहाँ-वहाँ अपना कोई-न-कोई आभूषण गिरा देती थीं ।। ८ ।।

सा ददर्श गिरिप्रस्थे पञ्च वानरपुङ्गवान् ।
तत्र वासो महद्दिव्यमुत्ससर्ज मनस्विनी ।। ९ ।।
आगे जानेपर उन्होंने एक पर्वतके शिखरपर बैठे हुए पाँच श्रेष्ठ वानरोंको देखा। वहाँ उन बुद्धिमती देवीने अपना एक अत्यन्त दिव्य वस्त्र गिरा दिया ।। ९ ।।

तत् तेषां वानरेन्द्राणां पपात पवनोद्धुतम् ।
मध्ये सुपीतं पञ्चानां विद्युन्मेघान्तरे यथा ।। १० ।।

वह सुन्दर पीले रंगका वस्त्र आकाशमें उड़ता हुआ उन पाँचों वानरोंके मध्यभागमें जा गिरा, मानो मेघोंके बीचमें विद्युत् प्रकट हो गयी हो ॥ १० ॥

अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ।
ददर्शार्थ पुरीं रम्यां बहुद्वारां मनोरमाम् ॥ ११ ॥
आकाशचारी पक्षीकी भाँति आकाशगामी रावण थोड़े ही समयमें अपना मार्ग तय करके लंकाके निकट जा पहुँचा। उसने दूरसे ही अपनी रमणीय एवं मनोहर पुरीको देखा, जो अनेक दरवाजोंसे सुशोभित हो रही थी ॥ ११ ॥

प्राकारवप्रसम्बाधां निर्मितां विश्वकर्मणा ।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां ससीतो राक्षसेश्वरः ॥ १२ ॥
साक्षात् विश्वकर्माने उस पुरीका निर्माण किया था। वह सब ओरसे चहारदीवारी तथा खाइयोंद्वारा घिरी हुई थी। राक्षसराज रावणने सीताके साथ उसी लंकापुरीमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥

एवं हृतायां वैदेह्यां रामो हत्वा महामृगम् ।
निवृत्तो ददृशे धीमान् भ्रातरं लक्ष्मणं तथा ॥ १३ ॥
इस प्रकार सीताका अपहरण हो जानेपर बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजी उस महामृगरूप मारीचको मारकर लौटे; उस समय मार्गमें उन्हें लक्ष्मण दिखायी दिये ॥ १३ ॥

कथमुत्सृज्य वैदेहीं वने राक्षससेविते ।
इति तं भ्रातरं दृष्ट्वा प्राप्तोऽसीति व्यगर्हयत् ॥ १४ ॥
भाईको देखकर श्रीरामने उन्हें कोसते हुए कहा—'लक्ष्मण! राक्षसोंसे भरे हुए इस घोर जंगलमें जानकीको अकेली छोड़कर तुम यहाँ कैसे चले आये?' ॥ १४ ॥

मृगरूपधरेणाथ रक्षसा सोऽपकर्षणम् ।
भ्रातुरागमनं चैव चिन्तयन् पर्यतप्यत ॥ १५ ॥
'मृगरूपधारी राक्षस मुझे आश्रमसे दूर खींच लाया और भाई भी आश्रमको अरक्षित छोड़कर मेरे पास आ गया', यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन संतप्त हो उठे ॥ १५ ॥

गर्हयन्नेव रामस्तु त्वरितस्तं समासदत् ।
अपि जीवति वैदेही नेति पश्यामि लक्ष्मण ॥ १६ ॥
उपर्युक्तरूपसे लक्ष्मणकी निन्दा करते हुए श्रीरामचन्द्रजी तुरंत उनके पास आ गये और कहने लगे—'लक्ष्मण! मैं देखता हूँ, सीता जीवित भी है या नहीं' ॥ १६ ॥

तस्य तत् सर्वमाचख्यौ सीताया लक्ष्मणो वचः ।
यदुक्तवत्यसदृशं वैदेही पश्चिमं वचः ॥ १७ ॥
तब लक्ष्मणने सीताकी वे सारी अनुचित एवं आक्षेपपूर्ण बातें, जिन्हें उन्होंने अन्तमें कहा था, कह सुनायीं ॥ १७ ॥

दह्यमानेन तु हृदा रामोऽभ्यपतदाश्रमम् । स ददर्श तदा गृध्रं निहतं पर्वतोपमम् ॥ १८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीका हृदय शोकाग्निसे दग्ध हो रहा था। वे शीघ्रतापूर्वक आश्रमकी ओर बढ़े। मार्गमें उन्हें पर्वताकार गृध्रराज जटायु दिखायी दिये, जो रावणके हाथसे घायल हुए पड़े थे ॥ १८ ॥

राक्षसं शङ्कमानस्तं विकृष्य बलवद् धनुः । अभ्यधावत काकुत्स्थस्ततस्तं सहलक्ष्मणः ॥ १९ ॥ लक्ष्मणसहित श्रीरामने उन्हें राक्षस समझकर अपने प्रबल धनुषको खींचा और उनपर धावा कर दिया ॥ १९ ॥

स तावुवाच तेजस्वी सहितौ रामलक्ष्मणौ । गृध्रराजोऽस्मि भद्रं वां सखा दशरथस्य वै ॥ २० ॥ तब तेजस्वी जटायुने साथ आये हुए श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंसे कहा—'आप दोनोंका भला हो। मैं राजा दशरथका मित्र गृध्रराज जटायु हूँ' ॥ २० ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संगृह्य धनुषी शुभे । कोऽयं पितरमस्माकं नाम्नाऽऽहेत्यूचतुश्च तौ ॥ २१ ॥ उनकी ये बातें सुनकर उन्होंने अपने सुन्दर धनुष उतारकर हाथमें ले लिये और परस्पर पूछने लगे कि 'यह कौन है जो हमारे पिताका नाम लेकर परिचय दे रहा है' ॥ २१ ॥

ततो ददृशतुस्तौ तं छिन्नपक्षद्वयं खगम् । तयोः शशंस गृध्रस्तु सीतार्थे रावणाद् वधम् ॥ २२ ॥ तदनन्तर उन्होंने पास आकर देखा—जटायुके दोनों पंख कटे हुए हैं। गृध्रने बताया कि 'सीताको छुड़ानेके लिये युद्ध करते समय मैं रावणके हाथसे अत्यन्त घायल कर दिया गया हूँ' ॥ २२ ॥

अपृच्छद् राघवो गृध्रं रावणः कां दिशं गतः । तस्य गृध्रः शिरःकम्पैराचचक्षे ममार च ॥ २३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने जटायुसे पूछा—'रावण किस दिशाकी ओर गया है?' गृध्रने सिर हिलाकर संकेतसे दक्षिण दिशा बतायी और अपने प्राण त्याग दिये ॥ २३ ॥

दक्षिणामिति काकुत्स्थो विदित्वास्य तदिङ्गितम् । संस्कारं लम्भयामास सखायं पूजयन् पितुः ॥ २४ ॥ उनके संकेतके अनुसार दक्षिण दिशा समझ लेनेके पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने पिताके मित्र होनेके नाते जटायुको आदर देते हुए उनका विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार किया ॥ २४ ॥

ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं व्यपविद्धबृसीमठम् । विध्वस्तकलशं शून्यं गोमायुशतसंकुलम् ॥ २५ ॥

तदनन्तर आश्रमपर पहुँचकर उन्होंने देखा, कुशकी चटाई बाहर फेंकी हुई है, कुटी उजाड़ हो गयी है, घर सूना पड़ा है, कलश फूटे पड़े हैं और सारे आश्रममें सैकड़ों गीदड़ भरे हुए हैं॥ २५॥

दुःखशोकसमाविष्टौ वैदेहीहरणार्दितौ ।
जग्मतुर्दण्डकारण्यं दक्षिणेन परंतपौ ॥ २६ ॥
सीताका अपहरण हो जानेसे दोनों भाइयोंको बड़ी वेदना हुई। वे दुःख और शोकमें डूब गये। फिर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम और लक्ष्मण दण्डकारण्यसे दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये॥ २६॥

वने महति तस्मिंस्तु रामः सौमित्रिणा सह ।
ददर्श मृगयूथानि द्रवमाणानि सर्वशः ॥ २७ ॥
उस विशाल वनमें लक्ष्मणसहित श्रीरामने देखा कि मृगोंके झुंड सब ओर भाग रहे हैं॥ २७॥

शब्दं च घोरं सत्त्वानां दावाग्नेरिव वर्धतः ।
अपश्येतां मुहूर्ताच्च कबन्धं घोरदर्शनम् ॥ २८ ॥
वन-जन्तुओंका भयंकर शब्द ऐसा जान पड़ता था मानो वहाँ सब ओर दावानल फैल रहा हो और उससे भयभीत हुए प्राणी आर्तनाद कर रहे हों। दो ही घड़ीमें उन दोनों

भाइयोंने देखा, सामने एक 'कबन्ध' (धड़) प्रकट हुआ है, जो देखनेमें अत्यन्त भयंकर है॥ २८॥ मेघपर्वतसंकाशं शालस्कन्धं महाभुजम्। उरोगतविशालाक्षं महोदरमहामुखम्॥ २९॥ वह मेघके समान काला और पर्वतके समान विशालकाय था। साखूकी शाखाके समान उसके कंधे और बड़ी-बड़ी भुजाएँ थीं। उसकी चौड़ी छातीमें दो बड़ी-बड़ी आँखें चमक रहीं थीं और लंबे-से पेटमें बहुत बड़ा मुख दिखायी दे रहा था॥ २९॥ यदृच्छयाथ तद् रक्षः करे जग्राह लक्ष्मणम्। विषादमगमत् सद्यः सौमित्रिरथ भारत॥ ३०॥ वह एक राक्षस था। उसने सहसा आकर लक्ष्मणका एक हाथ पकड़ लिया। भारत! यह देख सुमित्रानन्दन लक्ष्मण तत्काल बहुत दुःखी हो गये॥ ३०॥ स राममभिसम्प्रेक्ष्य कृष्यते येन तन्मुखम्। विषण्णश्चाब्रवीद् रामं पश्यावस्थामिमां मम॥ ३१॥ जिस ओर उस राक्षसका मुख था, उसी ओर वे खिंचे चले जा रहे थे। तब श्रीरामकी ओर देखकर वे अत्यन्त विषादग्रस्त होकर बोले—'भैया! देखिये, मेरी यह क्या अवस्था हो रही है?॥ ३१॥ हरणं चैव वैदेह्या मम चायमुपप्लवः। राज्यभ्रंशश्च भवतस्तातस्य मरणं तथा॥ ३२॥ 'विदेहकुमारीका अपहरण, मेरा इस प्रकार असमयमें विपत्तिग्रस्त होना, आपका राज्यसे निर्वासन तथा पिताजीकी मृत्यु—(इस प्रकार संकटपर संकट आता जा रहा है)॥ ३२॥ नाहं त्वां सह वैदेह्या समेतं कोसलागतम्। द्रक्ष्यामि पृथिवीराज्ये पितृपैतामहे स्थितम्॥ ३३॥ 'जान पड़ता है, जब आप सीताके साथ अयोध्यामें लौटकर पिता-पितामहोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस भूमण्डलके राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे, उस समय मैं आपका दर्शन न कर सकूँगा॥ ३३॥ द्रक्ष्यन्त्यार्यस्य धन्या ये कुशलाजशमीदलैः। अभिषिक्तस्य वदनं सोमं शान्तघनं यथा॥ ३४॥ 'जो लोग कुश, लाजा और शमीपत्र आदिके द्वारा राज्यपर अभिषिक्त हुए आप आर्यके मेघोंके आवरणसे रहित शरत्कालीन चन्द्रमाके समान मनोहर मुखका दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं'॥ ३४॥ एवं बहुविधं धीमान् विललाप स लक्ष्मणः। तमुवाचाथ काकुत्स्थः सम्भ्रमेष्वप्यसम्भ्रमः॥ ३५॥

बुद्धिमान् लक्ष्मण इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विलाप करने लगे। भगवान् श्रीराम घबराहटके समय भी घबराते नहीं थे। उन्होंने लक्ष्मणसे कहा— ॥ ३५ ॥ मा विषीद नरव्याघ्र नैष कश्चिन्मयि स्थिते । छिन्ध्यस्य दक्षिणं बाहुं छिन्नः सव्यो मया भुजः ॥ ३६ ॥ 'नरश्रेष्ठ! तुम खेद न करो। मेरे रहते यह राक्षस कोई चीज नहीं है; इससे तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँच सकती। तुम इसकी दाहिनी बाँह काट डालो। मैं बायीं भुजा काट रहा हूँ' ॥ ३६ ॥ इत्येवं वदता तस्य भुजो रामेण पातितः । खड्गेन भृशतीक्ष्णेन निकृत्तस्तिलकाण्डवत् ॥ ३७ ॥ इस प्रकार कहते हुए श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त तीखी तलवारसे उस राक्षसकी एक बाँह तिलके पौधेकी तरह काट गिरायी ॥ ३७ ॥ ततोऽस्य दक्षिणं बाहु खड्गेनाजघ्निवान् बली । सौमित्रिरपि सम्प्रेक्ष्य भ्रातरं राघवं स्थितम् ॥ ३८ ॥ पुनर्जघान पार्श्वे वै तद् रक्षो लक्ष्मणो भृशम् । गतासुरपतद् भूमौ कबन्धः सुमहांस्ततः ॥ ३९ ॥ तदनन्तर बलवान् सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने भी अपने खड्गसे उसकी दाहिनी बाँह काट डाली और अपने भाई श्रीरामको खड़ा देखकर उन्होंने उसकी पसलीपर भी बड़े जोरसे प्रहार किया। फिर तो वह महान् राक्षस कबन्ध प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३८-३९ ॥

तस्य देहाद् विनिःसृत्य पुरुषो दिव्यदर्शनः ।
ददृशे दिवमास्थाय दिवि सूर्य इव ज्वलन् ॥ ४० ॥
उसकी देहसे एक दिव्यरूपधारी पुरुष निकलकर आकाशमें खड़ा दिखायी दिया। वह सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा था ॥ ४० ॥

पप्रच्छ रामस्तं वाग्मी कस्त्वं प्रब्रूहि पृच्छतः ।
कामया किमिदं चित्रमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ॥ ४१ ॥
तब कुशल वक्ता भगवान् श्रीरामने उससे पूछा—‘तुम कौन हो? अपना परिचय दो। मेरे पूछनेपर अपनी इच्छाके अनुसार बताओ, यह कैसी अद्भुत एवं आश्चर्यमयी घटना प्रतीत हो रही है?’ ॥ ४१ ॥

तस्याचचक्षे गन्धर्वो विश्वावसुमहं नृप ।
प्राप्तो ब्राह्मणशापेन योनिं राक्षससेविताम् ॥ ४२ ॥
रावणेन हृता सीता राज्ञा लङ्काधिवासिना ।
सुग्रीवमभिगच्छस्व स ते साह्यं करिष्यति ॥ ४३ ॥
उसने कहा—‘राजन्! मैं विश्वावसु नामक गन्धर्व हूँ। एक ब्राह्मणके शापसे इस राक्षसयोनिमें आ गया था—लंकावासी राक्षसराज रावणने आपकी पत्नी सीताका अपहरण किया है। आप वानरराज सुग्रीवसे मिलिये। वे आपकी सहायता करेंगे’ ॥ ४२-४३ ॥

एषा पम्पा शिवजला हंसकारण्डवायुता ।
ऋष्यमूकस्य शैलस्य संनिकर्षे तटाकिनी ॥ ४४ ॥
‘यह थोड़ी ही दूरपर पवित्र जलसे भरा हुआ पम्पासरोवर है, जिसमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी चहक रहे हैं। वह सरोवर ऋष्यमूक पर्वतसे सटा हुआ है ।। ४४ ।।
वसते तत्र सुग्रीवश्चतुर्भिः सचिवैः सह ।
भ्राता वानरराजस्य वालिनो हेममालिनः ॥ ४५ ॥
‘वहीं अपने चार मन्त्रियोंके साथ सुवर्णमालाधारी वानरराज वालीके भाई सुग्रीव निवास करते हैं ।। ४५ ।।
तेन त्वं सह संगम्य दुःखमूलं निवेदय ।
समानशीलो भवतः साहाय्यं स करिष्यति ॥ ४६ ॥
‘उनसे मिलकर आप अपने दुःखका कारण बताइये। उनका शील-स्वभाव आपके ही समान है। वे निश्चय ही आपकी सहायता करेंगे ।। ४६ ।।
एतावच्छक्यमस्माभिर्वक्तुं द्रष्टासि जानकीम् ।
ध्रुवं वानरराजस्य विदितो रावणालयः ॥ ४७ ॥
‘मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि आपकी जनकनन्दिनी सीतासे अवश्य भेंट होगी। वानरराज सुग्रीवको रावणके घरका पता निश्चय ही ज्ञात है’ ।। ४७ ।।
इत्युक्त्वान्तर्हितो दिव्यः पुरुषः स महाप्रभः ।
विस्मयं जग्मतुश्चोभौ प्रवीरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४८ ॥
ऐसा कहकर वह महातेजस्वी दिव्य पुरुष वहीं अन्तर्हित हो गया। वीरवर श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंको उसके दर्शन और वार्तालापसे बड़ा विस्मय हुआ ।। ४८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि कबन्धहनने
एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कबन्धवधविषयक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७९ ।।

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अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षस्योंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन

मार्कण्डेय उवाच

ततोऽविदूरे नलिनीं प्रभूतकमलोत्पलाम् ।
सीताहरणदुःखार्तः पम्पां रामः समासदत् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर सीताहरणके दुःखसे पीड़ित हो श्रीरामचन्द्रजी पम्पासरोवर-पर गये, जो वहाँसे थोड़ी ही दूरपर था। उसमें बहुत-से कमल और उत्पल लिखे हुए थे ॥ १ ॥

मारुतेन सुशीतेन सुखेनामृतगन्धिना ।
सेव्यमानो वने तस्मिन् जगाम मनसा प्रियाम् ॥ २ ॥
उस वनमें अमृतकी-सी सुगन्ध लिये मन्द गतिसे प्रवाहित होनेवाली सुखद शीतल वायुका स्पर्श पाकर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन अपनी प्रिया सीताका चिन्तन करने लगे ॥ २ ॥

विललाप स राजेन्द्रस्तत्र कान्तामनुस्मरन् ।
कामबाणाभिसंतप्तः सौमित्रिस्तमथाब्रवीत् ॥ ३ ॥
अपनी प्राणवल्लभाका बारंबार स्मरण करके कामबाणसे संतप्त हुए-से महाराज श्रीराम विलाप करने लगे। उस समय सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उनसे कहा— ॥ ३ ॥

न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद ।
आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ॥ ४ ॥
‘मानद! मनपर काबू रखनेवाले तथा वृद्धोंके समान संयम-नियमसे रहनेवाले पुरुषको जैसे कोई रोग नहीं छू सकता, उसी प्रकार आपको ऐसे दैन्यभावका स्पर्श होना उचित नहीं जान पड़ता है’ ॥ ४ ॥

प्रवृत्तिरुपलब्धा ते वैदेह्या रावणस्य च ।
तां त्वं पुरुषकारेण बुद्ध्या चैवोपपादय ॥ ५ ॥
‘आपको सीता तथा उनका अपहरण करनेवाले रावणका समाचार मिल ही गया है। अब आप अपने पुरुषार्थ और बुद्धिबलसे जानकीको प्राप्त कीजिये ॥ ५ ॥

अभिगच्छाव सुग्रीवं शैलस्थं हरिपुङ्गवम् ।

मयि शिष्ये च भृत्ये च सहाये च समाश्वस ।। ६ ।। 'हम दोनों यहाँसे वानरराज सुग्रीवके पास चलें, जो ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर रहते हैं। मैं आपका शिष्य, सेवक और सहायक हूँ। मेरे रहते आपको धैर्य रखना चाहिये' ।। ६ ।।

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्लक्ष्मणेन स राघवः । उक्तः प्रकृतिमापेदे कार्ये चानन्तरोऽभवत् ।। ७ ।। इस प्रकार लक्ष्मणद्वारा अनेक प्रकारके वचनोंसे धैर्य दिलाये जानेपर श्रीरामचन्द्रजी स्वस्थ हुए और आवश्यक कार्यमें लग गये ।। ७ ।।

निषेव्य वारि पम्पायास्तर्पयित्वा पितॄनपि । प्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।। ८ ।। उन्होंने पम्पासरोवरके जलमें स्नान करके पितरोंका तर्पण किया। फिर उन दोनों वीर भ्राता श्रीराम और लक्ष्मणने वहाँसे प्रस्थान किया ।। ८ ।।

तावृष्यमूकमाभ्येत्य बहुमूलफलद्रुमम् । गिर्यग्रे वानरान् पञ्च वीरौ ददृशतुस्तदा ।। ९ ।। प्रचुर फल, मूल और वृक्षोंसे भरे हुए ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचकर उन दोनों वीरोंने देखा, पर्वतके शिखरपर पाँच वानर बैठे हुए हैं ।। ९ ।।

सुग्रीवः प्रेषयामास सचिवं वानरं तयोः । बुद्धिमन्तं हनूमन्तं हिमवन्तमिव स्थितम् ।। १० ।। सुग्रीवने हिमालयके समान गम्भीर भावसे बैठे हुए अपने बुद्धिमान् सचिव हनुमान्‌को उन दोनोंके पास भेजा ।। १० ।।

तेन सम्भाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः । सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्तदा नृप ।। ११ ।। उनके साथ पहले बातचीत हो जानेपर वे दोनों भाई सुग्रीवके पास गये। राजन्! उस समय श्रीरामचन्द्रजीने वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की ।। ११ ।।

तद् वासो दर्शयामासुस्तस्य कार्ये निवेदिते । वानराणां तु यत् सीता ह्रियमाणा व्यपासृजत् ।। १२ ।। रामने सुग्रीवके समक्ष जब अपना कार्य निवेदन किया, तब उन्होंने श्रीरामको वह वस्त्र दिखाया, जिसे अपहरणकालमें सीताने वानरोंके बीचमें डाल दिया था ।। १२ ।।