महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
स च दोषः प्रयत्नेन न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ २२ ॥
**नारदजीने कहा—**दोष तो एक ही है, जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है। उस दोषको प्रयत्न करके भी हटाया नहीं जा सकता ॥ २२ ॥
एको दोषोऽस्ति नान्योऽस्य सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् ।
संवत्सरेण क्षीणायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥ २३ ॥
आजसे लेकर एक वर्ष पूर्ण होनेतक सत्यवान्की आयु पूर्ण हो जायगी और वह शरीर त्याग देगा। केवल यही दोष उसमें है, दूसरा नहीं ॥ २३ ॥
राजोवाच
एहि सावित्रि गच्छस्व अन्यं वरय शोभने ।
तस्य दोषो महानेको गुणानाक्रम्य च स्थितः ॥ २४ ॥
**राजा बोले—**बेटी सावित्री! यहाँ आ। शोभने! तू पुनः यात्रा कर और दूसरे किसी पुरुषका वरण कर ले। सत्यवान्का यह एक ही बहुत बड़ा दोष है जो उसके सभी गुणोंको दबाकर स्थित है ॥ २४ ॥
यथा मे भगवान् नारदो देवसत्कृतः ।
संवत्सरेण सोऽल्पायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥ २५ ॥
जैसा कि देववन्दित भगवान् नारदजी कह रहे हैं, सत्यवान्की आयु बहुत थोड़ी है और वह एक ही वर्षमें देहत्याग कर देगा ॥ २५ ॥
सावित्र्युवाच
सकृदंशो निपतति सकृत् कन्या प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत् सकृत् ॥ २६ ॥
दीर्घायुरथवाल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा ।
सकृद् वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम् ॥ २७ ॥
**सावित्री बोली—**भाइयोंमें धनका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है तथा श्रेष्ठ दाता 'मैं दूँगा', यह कहकर एक ही बार वचनदान करता है। ये तीन बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन; मैंने उन्हें एक बार अपना पति चुन लिया। अब मैं दूसरे किसी पुरुषका वरण नहीं कर सकती ॥ २६-२७ ॥
मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाभिधीयते ।
क्रियते कर्मणा पश्चात् प्रमाणं मे मनस्ततः ॥ २८ ॥
पहले मनसे निश्चय करके फिर वाणीद्वारा कहा जाता है। तत्पश्चात् उसे कार्यरूपमें परिणत किया जाता है, अतः इस विषयमें मेरा मन ही प्रमाण है ॥ २८ ॥
नारद उवाच
स्थिरा बुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव ।
नैषा वारयितुं शक्या धर्मादस्मात् कथंचन ॥ २९ ॥
नारदजी बोले— नरश्रेष्ठ! आपकी पुत्री सावित्रीकी बुद्धि स्थिर है। इसे इस धर्ममार्गसे किसी तरह हटाया नहीं जा सकता ॥ २९ ॥
नान्यस्मिन् पुरुषे सन्ति ये सत्यवति वै गुणाः ।
प्रदानमेव तस्मान्मे रोचते दुहितुस्तव ॥ ३० ॥
सत्यवान्में जो गुण हैं, वे दूसरे किसी पुरुषमें हैं भी नहीं। अतः मुझे आपकी पुत्रीका सत्यवान्के साथ विवाह कर देना ही ठीक मालूम पड़ता है ॥ ३० ॥
राजोवाच
अविचाल्यं तदुक्तं यत् तथ्यं भगवता वचः ।
करिष्याम्येतदेवं च गुरुर्हि भगवान् मम ॥ ३१ ॥
राजा बोले— देवर्षे! आपने जो बात कही है, वह ठीक है। उसे टाला नहीं जा सकता। अतः मैं ऐसा ही करूँगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ॥ ३१ ॥
नारद उवाच
अविघ्नमस्तु सावित्र्याः प्रदाने दुहितुस्तव ।
साधयिष्याम्यहं तावत् सर्वेषां भद्रमस्तु वः ॥ ३२ ॥
नारदजीने कहा— राजन्! आपकी पुत्री सावित्रीके विवाहमें किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा न आवे। अच्छा, अब मैं चलता हूँ। आप सब लोगोंका कल्याण हो ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा समुत्पत्य नारदस्त्रिदिवं गतः ।
राजापि दुहितुः सज्जं वैवाहिकमकारयत् ॥ ३३ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर नारदजी उठे और स्वर्गलोकमें चले गये। इधर राजा भी अपनी पुत्रीके विवाहकी तैयारी कराने लगे ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९४ ॥
२९५-
पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना
मार्कण्डेय उवाच
अथ कन्याप्रदाने स तमेवार्थं विचिन्तयन् ।
समानिन्ये च तत् सर्वं भाण्डं वैवाहिकं नृपः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर कन्यादानके विषयमें नारदजीके ही कथनपर विचार करते हुए राजा अश्वपतिने विवाहके लिये सारी सामग्री एकत्र करवायी ॥ १ ॥
ततो वृद्धान् द्विजान् सर्वानृत्विजः सपुरोहितान् ।
समाहूय दिने पुण्ये प्रययौ सह कन्यया ॥ २ ॥
फिर उन्होंने बूढ़े ब्राह्मणों, समस्त ऋत्विजों तथा पुरोहितोंको बुलाकर किसी शुभ दिनमें कन्याके साथ तपोवनको प्रस्थान किया ॥ २ ॥
मेध्यारण्यं स गत्वा च द्युमत्सेनाश्रमं नृपः ।
पद्भ्यामेव द्विजैः सार्धं राजर्षिं तमुपागमत् ॥ ३ ॥
पवित्र वनमें द्युमत्सेनके आश्रमके निकट पहुँचकर राजा अश्वपति ब्राह्मणोंके साथ पैदल ही उन राजर्षिके पास गये ॥ ३ ॥
तत्रापश्यन्महाभागं शालवृक्षमुपाश्रितम् ।
कौश्यां बृस्यां समासीनं चक्षुर्हीनं नृपं तदा ॥ ४ ॥
वहाँ उन्होंने उन महाभाग नेत्रहीन नरेशको शालवृक्षके नीचे एक कुशकी चटाईपर बैठे देखा ॥ ४ ॥
स राजा तस्य राजर्षेः कृत्वा पूजां यथार्हतः ।
वाचा सुनियतो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ॥ ५ ॥
तस्यार्घ्यमासनं चैव गां चावेद्य स धर्मवित् ।
किमागमनमित्येवं राजा राजानमब्रवीत् ॥ ६ ॥
राजा अश्वपतिने राजर्षि द्युमत्सेनकी यथायोग्य पूजा की और वाणीको संयममें रखकर उन्होंने उनके समक्ष अपना परिचय दिया। तब धर्मज्ञ राजा द्युमत्सेनने मद्रराज अश्वपतिको अर्घ्य, आसन और गौ निवेदन करके उनसे पूछा—‘किस उद्देश्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है?’ ॥ ५-६ ॥
तस्य सर्वमभिप्रायमितिकर्तव्यतां च ताम् ।
सत्यवन्तं समुद्दिश्य सर्वमेव न्यवेदयत् ॥ ७ ॥
तब राजाने उनसे सत्यवान्के उद्देश्यसे अपना सारा अभिप्राय तथा कैसे-कैसे क्या-क्या करना है इत्यादि बातोंका विवरण सब कुछ स्पष्ट बता दिया ॥ ७ ॥
अश्वपतिरुवाच
सावित्री नाम राजर्षे कन्येयं मम शोभना ।
तां स्वधर्मेण धर्मज्ञ स्नुषार्थे त्वं गृहाण मे ॥ ८ ॥
**अश्वपति बोले—**धर्मज्ञ राजर्षे! सावित्री नामसे प्रसिद्ध मेरी यह सुन्दरी कन्या है। इसे आप धर्मतः अपनी पुत्रवधू बनानेके लिये स्वीकार करें ॥ ८ ॥
द्युमत्सेन उवाच
च्युताः स्म राज्याद् वनवासमाश्रिता-
श्चराम धर्मं नियतास्तपस्विनः ।
कथं त्वनर्हा वनवासमाश्रमे
निवत्स्यते क्लेशमिमं सुता तव ॥ ९ ॥
**द्युमत्सेन बोले—**महाराज! हम राज्यसे भ्रष्ट हो चुके हैं एवं वनका आश्रय लेकर संयम-नियमके साथ तपस्वी जीवन बिताते हुए धर्मका अनुष्ठान करते हैं। आपकी कन्या ये सब कष्ट सहन करनेयोग्य नहीं है। ऐसी दशामें यह आश्रममें रहकर वनवासके इस कष्टको कैसे सह सकेगी? ॥ ९ ॥
अश्वपतिरुवाच
सुखं च दुःखं च भवाभवात्मकं
यदा विजानाति सुताहमेव च ।
न मद्धिधे युज्यति वाक्यमीदृशं
विनिश्चयेनाभिगतोऽस्मि ते नृप ॥ १० ॥
**अश्वपतिने कहा—**राजन्! सुख और दुःख तो उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। इस बातको मैं और मेरी पुत्री दोनों जानते हैं। मेरे-जैसे मनुष्यसे आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मैं तो सब प्रकारसे निश्चय करके ही आपके पास आया हूँ ॥ १० ॥
आशां नार्हसि मे हन्तुं सौहृदात् प्रणतस्य च ।
अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न मार्हसि ॥ ११ ॥
मैं सौहार्दभावसे आपकी शरणमें आया हूँ। आप मेरी आशा भग्न न करें—प्रेमपूर्वक अपने पास आये हुए मुझ प्रार्थीको निराश न लौटावें ॥ ११ ॥
अनुरूपो हि युक्तश्च त्वं ममाहं तवापि च ।
स्नुषां प्रतीच्छ मे कन्यां भार्यां सत्यवतः सतः ॥ १२ ॥
आप सर्वथा मेरे अनुरूप और योग्य हैं। मैं भी आपके योग्य हूँ। आप मेरी इस कन्याको अपने श्रेष्ठ पुत्र सत्यवान्की पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥
द्युमत्सेन उवाच
पूर्वमेवाभिलषितः सम्बन्धो मे त्वया सह । भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद् विचारितम् ॥ १३ ॥ **द्युमत्सेन बोले—**महाराज! मैं तो पहलेसे ही आपके साथ सम्बन्ध करना चाहता था; परंतु इस समय अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया हूँ, ऐसा सोचकर मैंने ऐसा विचार कर लिया था कि अब यह सम्बन्ध नहीं हो सकेगा ॥ १३ ॥
अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः । स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥ १४ ॥ किंतु मेरा यह अभिप्राय, जो मुझे पहलेसे ही अभीष्ट था, यदि आज ही सिद्ध होना चाहता है तो अवश्य हो। आप मेरे मनोवांछित अतिथि हैं ॥ १४ ॥
ततः सर्वान् समानाय्य द्विजानाश्रमवासिनः । यथाविधि समुद्वाहं कारयामासतुर्नृपौ ॥ १५ ॥ तदनन्तर उस आश्रममें रहनेवाले सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर दोनों राजाओंने सत्यवान्-सावित्रीका विवाह-संस्कार विधिवत् सम्पन्न कराया ॥ १५ ॥
दत्त्वा सोऽश्वपतिः कन्यां यथार्हं सपरिच्छदम् । ययौ स्वमेव भवनं युक्तः परमया मुदा ॥ १६ ॥ राजा अश्वपति दहेजसहित कन्यादान देकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनी राजधानीको लौट गये ॥ १६ ॥
सत्यवानपि तां भार्यां लब्ध्वा सर्वगुणान्विताम् । मुमुदे सा च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ॥ १७ ॥ उस सर्वसद्गुणसम्पन्न भार्याको पाकर सत्यवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई और सत्यवान्को अपने मनोवांछित पतिके रूपमें पाकर सावित्रीको भी बड़ा आनन्द हुआ ॥
गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा । जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषायमेव च ॥ १८ ॥ पिताके चले जानेपर सावित्री अपने सब आभूषण उतारकर वल्कल तथा गेरुआ वस्त्र पहनने लगी ॥ १८ ॥
परिचारैर्गुणैश्चैव प्रश्रयेण दमेन च । सर्वकामक्रियाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमादधे ॥ १९ ॥ सावित्रीने सेवा, गुण, विनय, संयम और सबके मनके अनुसार कार्य करनेसे सभीको प्रसन्न कर लिया ॥ १९ ॥
श्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः ।
श्वशुरं देवसत्कारैर्वाचः संयमनेन च ॥ २० ॥
उसने शारीरिक सेवा तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा सासको और वाणीके संयमपूर्वक देवोचित सत्कारद्वारा ससुरको संतुष्ट किया ॥ २० ॥
तथैव प्रियवादेन नैपुणेन शमेन च ।
रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यतोषयत् ॥ २१ ॥
इसी प्रकार मधुर सम्भाषण, कार्य-कुशलता, शान्ति तथा एकान्तसेवाद्वारा पतिदेवको भी सदा प्रसन्न रखा ॥ २१ ॥
एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् ।
कालस्तपस्यतां कश्चिदपाक्रामत भारत ॥ २२ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार उन सब लोगोंको उस आश्रममें रहकर तपस्या करते कुछ काल व्यतीत हो गया ॥ २२ ॥
सावित्र्या ग्लायमानायास्तिष्ठन्त्यास्तु दिवानिशम् ।
नारदेन यदुक्तं तद् वाक्यं मनसि वर्तते ॥ २३ ॥
इधर सावित्री निरन्तर चिन्तासे गली जा रही थी। दिन-रात सोते-उठते हर समय नारदजीकी कही हुई बात उसके मनमें बनी रहती थी—वह उसे क्षणभरके लिये भी नहीं भूलती थी ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९५ ॥
२९६-
षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास-ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान्के साथ उसका वनमें जाना
मार्कण्डेय उवाच
ततः काले बहुतिथे व्यतिक्रान्ते कदाचन ।
प्राप्तः स कालो मर्तव्यं यत्र सत्यवता नृप ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर एक दिन वह समय भी आ पहुँचा जब कि सत्यवान्की मृत्यु होनेवाली थी ॥ १ ॥
गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते ।
यद् वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ॥ २ ॥
सावित्री एक-एक दिन बीतनेपर उसकी गणना करती रहती थी। नारदजीने जो बात कही थी, वह उसके हृदयमें सदा विद्यमान रहती थी ॥ २ ॥
चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति संचिन्त्य भाविनी ।
व्रतं त्रिरात्रमुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताभवत् ॥ ३ ॥
भाविनी सावित्रीको जब यह निश्चय हो गया कि मेरे पतिको आजसे चौथे दिन मरना है, तब उसने तीन रातका व्रत धारण किया और उसमें वह दिन-रात खड़ी ही रही ॥ ३ ॥
तं श्रुत्वा नियमं तस्या भृशं दुःखान्वितो नृपः ।
उत्थाय वाक्यं सावित्रीमब्रवीत् परिसान्त्वयन् ॥ ४ ॥
सावित्रीका यह कठोर नियम सुनकर राजा द्युमत्सेनको बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने उठकर सावित्रीको सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ४ ॥
द्युमत्सेन उवाच
अतितीव्रोऽयमारम्भस्त्वयाऽऽरब्धो नृपात्मजे ।
तिसृणां वसतीनां हि स्थानं परमदुष्करम् ॥ ५ ॥
**द्युमत्सेन बोले—**राजकुमारी! तुमने यह बड़ा कठोर व्रत आरम्भ किया है। तीन दिनोंतक निराहार रहना तो अत्यन्त दुष्कर कार्य है ॥ ५ ॥
सावित्र्युवाच
न कार्यस्तात संतापः पारयिष्याम्यहं व्रतम् ।
व्यवसायकृतं हीदं व्यवसायश्च कारणम् ॥ ६ ॥
**सावित्री बोली—**पिताजी! आप चिन्ता न करें। मैं इस व्रतको पूर्ण कर लूँगी। दृढ़ निश्चय ही व्रतके निर्वाहमें कारण हुआ करता है, सो मैंने भी दृढ़ निश्चयसे ही इस व्रतको
आरम्भ किया है ॥ ६ ॥
द्युमत्सेन उवाच
व्रतं भिन्धीति वक्तुं त्वां नास्मि शक्तः कथञ्चन ।
पारयेस्वेति वचनं युक्तमस्मद्विधो वदेत् ॥ ७ ॥
द्युमत्सेनने कहा— यह तो मैं तुम्हें किसी तरह नहीं कह सकता कि ‘बेटी! तुम व्रत भंग कर दो।’ मेरे-जैसा मनुष्य यही समुचित बात कह सकता है कि ‘तुम व्रतको निर्विघ्न पूर्ण करो’ ॥ ७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा द्युमत्सेनो विरराम महामनाः ।
तिष्ठन्ती चैव सावित्री काष्ठभूतेव लक्ष्यते ॥ ८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महामना द्युमत्सेन चुप हो गये। सावित्री एक स्थानपर खड़ी हुई काठ-सी दिखायी देती थी ॥ ८ ॥
श्वोभूते भर्तृमरणे सावित्र्या भरतर्षभ ।
दुःखान्वितायास्तिष्ठन्त्या सा रात्रिर्व्यत्यवर्तत ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! कल ही पतिदेवकी मृत्यु होनेवाली है, यह सोचकर दुःखमें डूबी हुई सावित्रीकी वह रात खड़े-ही-खड़े बीत गयी ॥ ९ ॥
अद्य तद् दिवसं चेति हुत्वा दीप्तं हुताशनम् ।
युगमात्रोदिते सूर्ये कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः ॥ १० ॥
दूसरे दिन यह सोचकर कि आज ही वह दिन है, उसने सूर्यदेवके चार हाथ ऊपर उठते-उठते पूर्वाह्नकालके सब कृत्य पूरे कर लिये और प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी ॥ १० ॥
ततः सर्वान् द्विजान् वृद्धान् श्वश्रूं श्वशुरमेव च ।
अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्नियता स्थिता ॥ ११ ॥
फिर सभी ब्राह्मणों, बड़े-बूढ़ों और सास-ससुरको क्रमशः प्रणाम करके वह नियमपूर्वक हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी रही ॥ ११ ॥
अवैधव्याशिषस्ते तु सावित्र्यर्थं हिताः शुभाः ।
ऊचुस्तपस्विनः सर्वे तपोवननिवासिनः ॥ १२ ॥
उस तपोवनमें रहनेवाले सभी तपस्वियोंने सावित्रीके लिये अवैधव्यसूचक—सौभाग्यवर्धक, शुभ और हितकर आशीर्वाद दिये ॥ १२ ॥
एवमस्त्विति सावित्री ध्यानयोगपरायणा ।
मनसा ता गिरः सर्वा प्रत्यगृह्णात् तपस्विनाम् ॥ १३ ॥
सावित्रीने ध्यानयोगमें स्थित हो तपस्वियोंकी उस आशीर्वादमयी वाणीको ‘एवमस्तु (ऐसा ही हो)’ कहकर मन-ही-मन शिरोधार्य किया ॥ १३ ॥
तं कालं तं मुहूर्तं च प्रतीक्षन्ती नृपात्मजा ।
यथोक्तं नारदवचश्चिन्तयन्ती सुदुःखिता ॥ १४ ॥
फिर पतिकी मृत्युसे सम्बन्ध रखनेवाले समय और मुहूर्तकी प्रतीक्षा करती हुई राजकुमारी सावित्री नारदजीके पूर्वोक्त वचनका चिन्तन करके बहुत दुःखी हो गयी ॥ १४ ॥
ततस्तु श्वश्रूश्वशुरावूचतुस्तां नृपात्मजाम् ।
एकान्तमास्थितां वाक्यं प्रीत्या भरतसत्तम ॥ १५ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर सास और ससुरने एकान्तमें बैठी हुई राजकुमारी सावित्रीसे प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥
श्वशुरावूचतुः
व्रतं यथोपदिष्टं तु तथा तत् पारितं त्वया ।
आहारकालः सम्प्राप्तः क्रियतां यदनन्तरम् ॥ १६ ॥
**सास-ससुर बोले—**बेटी! तुमने शास्त्रके उपदेशके अनुसार अपना व्रत पूरा कर लिया है, अब पारण करनेका समय हो गया है। अतः जो कर्तव्य है, वह करो ॥ १६ ॥
सावित्र्युवाच
अस्तं गते मयाऽऽदित्ये भोक्तव्यं कृतकामया ।
एष मे हृदि संकल्पः समयश्च कृतो मया ॥ १७ ॥
**सावित्री बोली—**सूर्यास्त होनेपर जब मेरा मनोरथ पूर्ण हो जायगा तभी मैं भोजन करूँगी। यह मेरे मनका संकल्प है और मैंने ऐसा करनेकी प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवं सम्भाषमाणायाः सावित्र्या भोजनं प्रति ।
स्कन्धे परशुमादाय सत्यवान् प्रस्थितो वनम् ॥ १८ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जब सावित्री भोजनके सम्बन्धमें इस प्रकार बातें कर रही थी, उसी समय सत्यवान् कंधेपर कुल्हाड़ी रखकर (फल-फूल, समिधा आदि लानेके लिये) वनकी ओर चले ॥ १८ ॥
सावित्री त्वाह भर्तारं नैकस्त्वं गन्तुमर्हसि ।
सह त्वया गमिष्यामि न हि त्वां हातुमुत्सहे ॥ १९ ॥
**उस समय सावित्रीने अपने पतिसे कहा—**नाथ! आप अकेले न जाइये। मैं भी आपके साथ चलूँगी। आज मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती ॥ १९ ॥
सत्यवानुवाच
वनं न गतपूर्वं ते दुःखः पन्थाश्च भाविनि ।
व्रतोपवासक्षामा च कथं पद्भ्यां गमिष्यसि ॥ २० ॥
**सत्यवान्ने कहा—**सुन्दरि! तुम पहले कभी वनमें नहीं गयी हो। वनका रास्ता बड़ा दुःखदायक होता है, तुम व्रत और उपवास करनेके कारण दुर्बल हो रही हो। ऐसी दशामें पैदल कैसे चल सकोगी? ।। २० ।।
सावित्र्युवाच
उपवासान्न मे ग्लानिर्नास्ति चापि परिश्रमः ।
गमने च कृतोत्साहां प्रतिषेद्धुं न मार्हसि ॥ २१ ॥
**सावित्री बोली—**उपवासके कारण मुझे किसी प्रकारकी शिथिलता और थकावट नहीं है। चलनेके लिये मेरे मनमें पूर्ण उत्साह है, अतः आप मुझे मना न कीजिये ।।
सत्यवानुवाच
यदि ते गमनोत्साहः करिष्यामि तव प्रियम् ।
मम त्वामन्त्रय गुरून् न मां दोषः स्पृशेदयम् ॥ २२ ॥
सत्यवान्ने कहा— यदि तुम्हें चलनेका उत्साह है तो मैं तुम्हारा प्रिय मनोरथ पूर्ण करूँगा। परंतु तुम मेरे माता-पितासे पूछ लो, जिससे मुझे दोषका भागी न होना पड़े ॥
मार्कण्डेय उवाच
साभिवाद्याब्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता । अयं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम् ॥ २३ ॥ इच्छेयमभ्यनुज्ञाता आर्यया श्वशुरेण ह । अनेन सह निर्गन्तुं न मेऽद्य विरहः क्षमः ॥ २४ ॥ गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव । न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ॥ २५ ॥ संवत्सरः किंचिदूनो न निष्क्रान्ताहमाश्रमात् । वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे ॥ २६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— तब महान् व्रतका पालन करनेवाली सावित्रीने अपने सास-ससुरको प्रणाम करके कहा—'ये मेरे पतिदेव फल आदि लानेके लिये महान् वनमें जा रहे हैं। यदि सासजी और ससुरजी मुझे आज्ञा दें तो मैं भी इनके साथ जाना चाहती हूँ। आज मुझे इनका एक क्षणका भी विरह सहा नहीं जाता। आपके पुत्र आज गुरुजनोंके लिये तथा अग्निहोत्रके उद्देश्यसे फल, फूल और समिधा आदि लानेके लिये वनमें जा रहे हैं, अतः उनको रोकना उचित नहीं है। हाँ, यदि किसी दूसरे कार्यके लिये वनमें जाते होते तो उन्हें रोका भी जा सकता था। एक वर्षसे कुछ ही कम हुआ, मैं आश्रमसे बाहर नहीं निकली। अतः आज फूलोंसे भरे हुए वनको देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ २३—२६ ॥
द्युमत्सेन उवाच
यतः प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स्नुषा मम । नानयाभ्यर्थनायुक्तमुक्तपूर्वं स्मराम्यहम् ॥ २७ ॥
द्युमत्सेन बोले— जबसे सावित्रीके पिताने इसे मेरी पुत्रवधू बनाकर दिया है, तबसे आजतक इसने पहले कभी मुझसे किसी बातके लिये प्रार्थना की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ २७ ॥
तदेषा लभतां कामं यथाभिलषितं वधूः । अप्रमादश्च कर्तव्यः पुत्रि सत्यवतः पथि ॥ २८ ॥
अतः आज मेरी पुत्रवधू अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करे। बेटी! जा, सत्यवान्के मार्गमें सावधानी रखना ॥ २८ ॥
मार्कण्डेय उवाच
उभाभ्यामभ्यनुज्ञाता सा जगाम यशस्विनी ।
सह भर्त्रा हसन्तीव हृदयेन विदूयता ॥ २९ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इस प्रकार सास और ससुर दोनोंकी आज्ञा पाकर यशस्विनी सावित्री अपने पतिदेवके साथ चल दी, वह ऊपरसे तो हँसती-सी जान पड़ती थी, किंतु उसका हृदय दुःखकी ज्वालासे दग्ध हो रहा था ॥ २९ ॥
सा वनानि विचित्राणि रमणीयानि सर्वशः ।
मयूरगणजुष्टानि ददर्श विपुलेक्षणा ॥ ३० ॥
विशाल नेत्रोंवाली सावित्रीने सब ओर घूम-घूमकर मयूरसमूहोंसे सेवित रमणीय और विचित्र वन देखे ॥ ३० ॥
नदीः पुण्यवहाश्चैव पुष्पितांश्च नगोत्तमान् ।
सत्यवानाह पश्येति सावित्रीं मधुरं वचः ॥ ३१ ॥
पवित्र जल बहानेवाली नदियों तथा फूलोंसे लदे हुए सुन्दर वृक्षोंको लक्ष्य करके सत्यवान् सावित्रीसे मधुर वाणीमें कहते—'प्रिये! देखो, कैसा मनोहर दृश्य है' ॥ ३१ ॥
निरीक्षमाणा भर्तारं सर्वावस्थमनिन्दिता ।
मृतमेव हि भर्तारं काले मुनिवचः स्मरन् ॥ ३२ ॥
सती-साध्वी सावित्री अपने पतिकी सभी अवस्थाओंका निरीक्षण करती थी। नारदजीके वचनोंको स्मरण करके उसे निश्चय हो गया था कि समयपर मेरे पतिकी मृत्यु अवश्यम्भावी है ॥ ३२ ॥
अनुव्रजन्ती भर्तारं जगाम मृदुगामिनी ।
द्विधेव हृदयं कृत्वा तं च कालमवेक्षती ॥ ३३ ॥
मन्दगतिसे चलनेवाली सावित्री मानो अपने हृदयके दो भाग करके एकसे अपने पतिका अनुसरण करती और दूसरेसे प्रतिक्षण उनके मृत्युकालकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९६ ॥
सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप
सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान्को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान
मार्कण्डेय उवाच
अथ भार्यासहायः स फलान्यादाय वीर्यवान् ।
कठिनं पूरयामास ततः काष्ठान्यपाटयत् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— तदनन्तर पत्नीसहित शक्तिशाली सत्यवान्ने फल चुनकर एक काठकी टोकरी भर ली। तत्पश्चात् वे लकड़ी चीरने लगे ॥ १ ॥
तस्य पाटयतः काष्ठं स्वेदो वै समजायत ।
व्यायामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना ॥ २ ॥
सोऽभिगम्य प्रियां भार्यामुवाच श्रमपीडितः ।
लकड़ी चीरते समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे पसीना निकल आया और उसी परिश्रमसे उनके सिरमें दर्द होने लगा। तब वे श्रमसे पीड़ित हो अपनी प्यारी पत्नीके पास जाकर बोले— ॥ २ १/२ ॥
सत्यवानुवाच
व्यायामेन ममानेन जाता शिरसि वेदना ॥ ३ ॥
अङ्गानि चैव सावित्रि हृदयं दूयतीव च ।
अस्वस्थमिव चात्मानं लक्षये मितभाषिणि ॥ ४ ॥
शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षयाम्यहम् ।
तत् स्वप्तुमिच्छे कल्याणि न स्थातुं शक्तिरस्ति मे ॥ ५ ॥
सत्यवान्ने कहा— सावित्री! आज लकड़ी काटनेके परिश्रमसे मेरे सिरमें दर्द होने लगा है, सारे अंगोंमें पीड़ा हो रही है और हृदय दग्ध-सा होता जान पड़ता है। मितभाषिणी प्रिये! मैं अपने-आपको अस्वस्थ-सा देख रहा हूँ। ऐसा जान पड़ता है, कोई शूलोंसे मेरे सिरको छेद रहा है। कल्याणि! अब मैं सोना चाहता हूँ। मुझमें खड़े रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है ॥ ३—५ ॥
सा समासाद्य सावित्री भर्तारमुपगम्य च ।
उत्सङ्गेऽस्य शिरः कृत्वा निषसाद महीतले ॥ ६ ॥
यह सुनकर सावित्री शीघ्र अपने पतिके पास आयी और उनका सिर गोदमें लेकर पृथ्वीपर बैठ गयी ॥ ६ ॥
ततः सा नारदवचो विमृशन्ती तपस्विनी । तं मुहूर्तं क्षणं वेलां दिवसं च युयोज ह ॥ ७ ॥
फिर वह तपस्विनी राजकन्या नारदजीकी बात याद करके उस मुहूर्त, क्षण, समय और दिनका योग मिलाने लगी ॥ ७ ॥
मुहूर्तादिव चापश्यत् पुरुषं रक्तवाससम् । बद्धमौलिं वपुष्मन्तमादित्यसमतेजसम् ॥ ८ ॥ श्यामावदातं रक्ताक्षं पाशहस्तं भयावहम् । स्थितं सत्यवतः पार्श्वे निरीक्षन्तं तमेव च ॥ ९ ॥
दो ही घड़ीमें उसने देखा, एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए हैं, जिनके शरीरपर लाल रंगका वस्त्र शोभा पा रहा है। सिरपर मुकुट बँधा हुआ है। सूर्यके समान तेजस्वी होनेके कारण वे मूर्तिमान् सूर्य ही जान पड़ते हैं। उनका शरीर श्याम एवं उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित है, नेत्र लाल हैं। उनके हाथमें पाश है। उनका स्वरूप डरावना है। वे सत्यवान्के पास खड़े हैं और बार-बार उन्हींकी ओर देख रहे हैं ॥ ८-९ ॥
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय भर्तुर्न्यस्य शनैः शिरः । कृताञ्जलिरुवाचार्ता हृदयेन प्रवेपती ॥ १० ॥
उन्हें देखते ही सावित्रीने धीरेसे पतिका मस्तक भूमिपर रख दिया और सहसा खड़ी हो हाथ जोड़कर काँपते हुए हृदयसे वह आर्त वाणीमें बोली ।। १० ।।
सावित्र्युवाच
दैवतं त्वाभिजानामि वपुरेतद्ध्यमानुषम् । कामया ब्रूहि देवेश कस्त्वं किं चिकीर्षसि ।। ११ ।।
सावित्रीने कहा— मैं समझती हूँ, आप कोई देवता हैं; क्योंकि आपका यह शरीर मनुष्यों-जैसा नहीं है। देवेश्वर! यदि आपकी इच्छा हो तो बताइये आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं ।। ११ ।।
यम उवाच
पतिव्रतासि सावित्रि तथैव च तपोऽन्विता । अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम् ।। १२ ।।
यमराज बोले— सावित्री! तू पतिव्रता और तपस्विनी है, इसलिये मैं तुझसे वार्तालाप कर सकता हूँ। शुभे! तू मुझे यमराज जान ।। १२ ।।
अयं ते सत्यवान् भर्ता क्षीणायुः पार्थिवात्मजः । नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्ध्येतन्मे चिकीर्षितम् ।। १३ ।।
तेरे पति इस राजकुमार सत्यवान्की आयु समाप्त हो गयी है, अतः मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा। बस, मैं यही करना चाहता हूँ ।। १३ ।।
सावित्र्युवाच
श्रूयते भगवन् दूतास्तवागच्छन्ति मानवान् । नेतुं किल भवान् कस्मादागतोऽसि स्वयं प्रभो ।। १४ ।।
सावित्रीने पूछा— भगवन्! मैंने तो सुना है कि मनुष्योंको ले जानेके लिये आपके दूत आया करते हैं। प्रभो! आप स्वयं यहाँ कैसे चले आये? ।। १४ ।।
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्तः पितृराजस्तां भगवान् स्वचिकीर्षितम् । यथावत् सर्वमाख्यातुं तत्प्रियार्थं प्रचक्रमे ।। १५ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! सावित्रीके इस प्रकार पूछनेपर पितृराज भगवान् यमने उसका प्रिय करनेके लिये अपना सारा अभिप्राय यथार्थरूपसे बताना आरम्भ किया ।। १५ ।।
अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान् गुणसागरः । नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतोऽस्मि स्वयमागतः ।। १६ ।।
'यह सत्यवान् धर्मात्मा, रूपवान् और गुणोंका समुद्र है। मेरे दूतोंद्वारा ले जाया जाने योग्य नहीं है। इसीलिये मैं स्वयं आया हूँ' ।। १६ ।।
ततः सत्यवतः कायात् पाशबद्धं वशं गतम् ।
अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निष्कर्ष यमो बलात् ।। १७ ।।
तदनन्तर यमराजने सत्यवान्के शरीरसे पाशमें बँधे हुए अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले विवश हुए जीवको बलपूर्वक खींचकर निकाला ।। १७ ।।
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् ।
निर्विचेष्टं शरीरं तद् बभूवाप्रियदर्शनम् ।। १८ ।।
फिर तो प्राण निकल जानेसे उसकी साँस बंद हो गयी—अंगकान्ति फीकी पड़ गयी और शरीर निश्चेष्ट होकर अपरूप दिखायी देने लगा ।। १८ ।।
यमस्तु तं ततो बद्ध्वा प्रयातो दक्षिणामुखः ।
सावित्री चैव दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत ।
नियमव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ।। १९ ।।
यमराज उस जीवको बाँधकर साथ लिये दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। सावित्री दुःखसे आतुर हो यमराजके ही पीछे-पीछे चल पड़ी। वह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकन्या नियमपूर्वक व्रतोंके पालनसे पूर्णतः सिद्ध हो चुकी थी। (अतः निर्बाध गतिसे सर्वत्र आने-जानेमें समर्थ थी) ।। १९ ।।
यम उवाच
निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौर्ध्वदेहिकम् ।
कृतं भर्तुस्त्वयाऽऽनृण्यं यावद् गम्यं गतं त्वया ।। २० ।।
**यमराज बोले—**सावित्री! अब तू लौट जा, सत्यवान्का अन्त्येष्टि-संस्कार कर। अब तू पतिके ऋणसे उऋण हो गयी। पतिके पीछे तुझे जहाँतक आना चाहिये था, तू वहाँतक आ चुकी ।। २० ।।
सावित्र्युवाच
यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति ।
मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ।। २१ ।।
**सावित्रीने कहा—**जहाँ मेरे पति ले जाये जाते हैं अथवा ये स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी जाना चाहिये; यही सनातन धर्म है ।। २१ ।।
तपसा गुरुभक्त्या च भर्तुः स्नेहाद् व्रतेन च ।
तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गतिः ।। २२ ।।
तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रतपालन तथा आपकी कृपासे मेरी गति कहीं भी रुक नहीं सकती ।। २२ ।।
प्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिनः । मित्रतां च पुरस्कृत्य किञ्चिद् वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २३ ॥ तत्त्वार्थदर्शी विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सात पग साथ चलनेमात्रसे मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी मित्रताको सामने रखकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगी, उसे सुनिये ॥ २३ ॥
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति धर्मं च वासं च परिश्रमं च । विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥ २४ ॥ जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, वे वनमें रहकर धर्मपालन, गुरुकुलवास तथा कष्टसहनरूप तपस्या नहीं कर सकते हैं। जितेन्द्रिय पुरुष ही यह सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। महात्मालोग विवेक-विचारसे ही धर्म-प्राप्ति बताते हैं, अतः सभी सत्पुरुष धर्मको ही श्रेष्ठ मानते हैं ॥ २४ ॥
एकस्य धर्मेण सतां मतेन सर्वे स्म तं मार्गमनुप्रपन्नाः । मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाञ्छे तस्मात् सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥ २५ ॥ अपने एक ही वर्णके सत्पुरुष-सम्मत धर्मका पालन करनेसे सभी लोग उस विज्ञान-मार्गपर पहुँच जाते हैं, जो सबका लक्ष्य है। अतः दूसरे या तीसरे वर्णकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। इसलिये साधु पुरुष केवल वर्ण-धर्मको ही प्रधानता देते हैं ॥ २५ ॥
यम उवाच
निवर्त तुष्टोऽस्मि तवानया गिरा स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुयुक्तया । वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ॥ २६ ॥ **यमराज बोले—**अनिन्दिते! तू लौट जा। स्वर, अक्षर, व्यंजन एवं युक्तियोंसे युक्त तेरी इन बातोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तू यहाँ मुझसे कोई वर माँग ले। सत्यवान्के जीवनके सिवा मैं और सब कुछ तुझे दे सकता हूँ ॥ २६ ॥
सावित्र्युवाच
च्युतः स्वराज्याद् वनवासमाश्रितो विनष्टचक्षुः श्वशुरो ममाश्रमे । स लब्धचक्षुर्बलवान् भवेन्नृप-
स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभः ॥ २७ ॥
**सावित्री बोली—**भगवन्! मेरे श्वशुर अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर वनमें रहते हैं। उनकी आँखें भी नष्ट हो गयी हैं। मैं चाहती हूँ, आपकी कृपासे उन महाराजको उनकी आँखें मिल जायँ और वे बलवान् तथा अग्नि एवं सूर्यके समान तेजस्वी हो जायँ ॥ २७ ॥
यम उवाच
ददानि तेऽहं तमनिन्दिते वरं
यथा त्वयोक्तं भविता च तत् तथा ।
तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षये
निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥ २८ ॥
**यमराज बोले—**अनिन्दिते! मैं तुझे वर देता हूँ। तूने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा। मैं देखता हूँ, तू राह चलनेके कारण बहुत थक गयी है। अब लौट जा, जिससे तुझे अधिक परिश्रम न हो ॥ २८ ॥
सावित्र्युवाच
श्रमः कुतो भर्तृसमीपतो हि मे
यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा ।
यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः
सुरेश भूयश्च वचो निबोध मे ॥ २९ ॥
**सावित्री बोली—**स्वामीके समीप रहते हुए मुझे श्रम हो ही कैसे सकता है। जहाँ मेरे पतिदेव रहेंगे, वहीं मेरी भी गति निश्चित है। आप जहाँ मेरे प्राणनाथको ले जायँगे, वहीं मेरा जाना भी अवश्यम्भावी है। देवेश्वर! आप फिर मेरी बात सुनिये ॥ २९ ॥
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं
ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते ।
न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं
ततः सतां संनिवसेत् समागमे ॥ ३० ॥
सत्पुरुषोंका एक बारका समागम भी अत्यन्त अभीष्ट होता है। उनके साथ मित्रता हो जाना उससे भी बढ़कर बताया गया है। साधु पुरुषका संग कभी निष्फल नहीं होता; अतः सदा सत्पुरुषोंके ही समीप रहना चाहिये ॥ ३० ॥
यम उवाच
मनोऽनुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं
त्वया यदुक्तं वचनं हिताश्रयम् ।
विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं
वरं द्वितीयं वरयस्व भामिनि ॥ ३१ ॥
यमराज बोले— भामिनी! तूने जो सबके हितकी बात कही है, वह मेरे मनके अनुकूल है तथा विद्वानोंकी भी बुद्धिको बढ़ानेवाली है; अतः इस सत्यवान्के जीवनको छोड़कर तू दूसरा कोई वर और माँग ले ॥ ३१ ॥
सावित्र्युवाच
हृतं पुरा मे श्वशुरस्य धीमतः
स्वमेव राज्यं लभतां स पार्थिवः ।
जह्यात् स्वधर्मं न च मे गुरुर्यथा
द्वितीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥ ३२ ॥
सावित्री बोली— मेरे बुद्धिमान् श्वशुरका राज्य, जो पहले उनसे छीन लिया गया है, उसे वे महराज पुनः प्राप्त कर लें तथा वे मेरे पूज्य गुरु महाराज द्युमत्सेन कभी अपना धर्म न छोड़ें; यही दूसरा वर मैं आपसे माँगती हूँ ॥ ३२ ॥
यम उवाच
स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यतेऽचिरा-
न्न च स्वधर्मात् परिहास्यते नृपः ।
कृतेन कामेन मया नृपात्मजे
निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥ ३३ ॥
यमराज बोले— राजा द्युमत्सेन शीघ्र एवं अनायास ही अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे और वे कभी अपने धर्मका भी परित्याग नहीं करेंगे। राजकुमारी! मेरेद्वारा अब तेरी इच्छा पूरी हो गयी। तू लौट जा, जिससे तुझे परिश्रम न हो ॥ ३३ ॥
सावित्र्युवाच
प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता
नियम्य चैता नयसे निकामया ।
ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं
निबोध चेमां गिरमीरितां मया ॥ ३४ ॥
सावित्री बोली— देव! इस सारी प्रजाको आप नियमसे संयममें रखते हैं और उसका नियमन करके आप अपनी इच्छाके अनुसार उसे विभिन्न लोकोंमें ले जाते हैं। इसीलिये आपका 'यम' नाम सर्वत्र विख्यात है। मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये ॥ ३४ ॥
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥ ३५ ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥ ३५ ॥
एवंप्रायश्च लोकोऽयं मनुष्याः शक्तिपेशलाः ।
सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते ॥ ३६ ॥
प्रायः इस संसारके लोग अल्पायु होते हैं, मनुष्योंकी शक्तिहीनता तो प्रसिद्ध ही है। आप-जैसे संत-महात्मा तो अपनी शरणमें आये हुए शत्रुओंपर भी दया करते हैं। (फिर हम-जैसे दीन मनुष्योंपर दया क्यों न करेंगे?) ॥ ३६ ॥
यम उवाच
पिपासितस्येव भवेद् यथा पय-
स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम् ।
विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं
वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि ॥ ३७ ॥
**यमराज बोले—**शुभे! जैसे प्यासे मनुष्यको प्राप्त हुआ जल आनन्ददायक होता है, उसी प्रकार तेरी कही हुई यह बात मुझे अत्यन्त सुख दे रही है। अतः तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई वर, जिसे तू लेना चाहे, माँग ले ॥ ३७ ॥
सावित्र्युवाच
ममानपत्यः पृथिवीपतिः पिता
भवेत् पितुः पुत्रशतं तथौरसम् ।
कुलस्य सन्तानकरं च यद् भवेत्
तृतीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥ ३८ ॥
**सावित्रीने कहा—**भगवन्! मेरे पिता महाराज अश्वपति पुत्रहीन हैं; उन्हें सौ ऐसे औरस पुत्र प्राप्त हों, जो उनके कुलकी संतानपरम्पराको चलानेवाले हों। मैं आपसे यही तीसरा वर माँगती हूँ ॥ ३८ ॥
यम उवाच
कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं
शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे ।
कृतेन कामेन नराधिपात्मजे
निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥ ३९ ॥
**यमराज बोले—**शुभे! तेरे पिताके कुलकी संतान-परम्पराको चलानेवाले सौ तेजस्वी पुत्र होंगे। राजकुमारी! तेरी यह कामना भी पूरी हुई। अब लौट जा, तू रास्तेसे बड़ी दूर चली आयी है ॥ ३९ ॥