महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दयाभाव बनाये रखना और दान देना यह साधु पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥ ३५ ॥
एवंप्रायश्च लोकोऽयं मनुष्याः शक्तिपेशलाः ।
सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते ॥ ३६ ॥
प्रायः इस संसारके लोग अल्पायु होते हैं, मनुष्योंकी शक्तिहीनता तो प्रसिद्ध ही है। आप-जैसे संत-महात्मा तो अपनी शरणमें आये हुए शत्रुओंपर भी दया करते हैं। (फिर हम-जैसे दीन मनुष्योंपर दया क्यों न करेंगे?) ॥ ३६ ॥
यम उवाच
पिपासितस्येव भवेद् यथा पय-
स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम् ।
विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं
वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि ॥ ३७ ॥
**यमराज बोले—**शुभे! जैसे प्यासे मनुष्यको प्राप्त हुआ जल आनन्ददायक होता है, उसी प्रकार तेरी कही हुई यह बात मुझे अत्यन्त सुख दे रही है। अतः तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई वर, जिसे तू लेना चाहे, माँग ले ॥ ३७ ॥
सावित्र्युवाच
ममानपत्यः पृथिवीपतिः पिता
भवेत् पितुः पुत्रशतं तथौरसम् ।
कुलस्य सन्तानकरं च यद् भवेत्
तृतीयमेतद् वरयामि ते वरम् ॥ ३८ ॥
**सावित्रीने कहा—**भगवन्! मेरे पिता महाराज अश्वपति पुत्रहीन हैं; उन्हें सौ ऐसे औरस पुत्र प्राप्त हों, जो उनके कुलकी संतानपरम्पराको चलानेवाले हों। मैं आपसे यही तीसरा वर माँगती हूँ ॥ ३८ ॥
यम उवाच
कुलस्य सन्तानकरं सुवर्चसं
शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे ।
कृतेन कामेन नराधिपात्मजे
निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥ ३९ ॥
**यमराज बोले—**शुभे! तेरे पिताके कुलकी संतान-परम्पराको चलानेवाले सौ तेजस्वी पुत्र होंगे। राजकुमारी! तेरी यह कामना भी पूरी हुई। अब लौट जा, तू रास्तेसे बड़ी दूर चली आयी है ॥ ३९ ॥
सावित्र्युवाच
न दूरमेतन्मम भर्तृसंनिधौ मनो हि मे दूरतरं प्रधावति । अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां मयोच्यमानां शृणु भूय एव च ॥ ४० ॥ **सावित्रीने कहा—**भगवन्! मैं अपने स्वामीके समीप हूँ। इसलिये यह स्थान मेरे लिये दूर नहीं है। मेरा मन तो और भी दूरतक दौड़ लगाता है। आप चलते-चलते ही मेरी कही हुई ये प्रस्तुत बातें पुनः सुनें ॥ ४० ॥ विवस्वतस्त्वं तनयः प्रतापवां- स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधैः । समेन धर्मेण चरन्ति ताः प्रजा- स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता ॥ ४१ ॥ देवेश्वर! आप विवस्वान् (सूर्य)-के प्रतापी पुत्र हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं। आप समस्त प्रजाके साथ समतापूर्वक धर्मानुसार आचरण करते हैं, इसलिये आप धर्मराज कहलाते हैं ॥ ४१ ॥ आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः । तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥ ४२ ॥ मनुष्यको अपने-आपपर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना संतोंपर होता है। इसलिये सब लोग संतोंसे विशेष प्रेम करना चाहते हैं ॥ ४२ ॥ सौहृदात् सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते । तस्मात् सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ॥ ४३ ॥ सौहार्दसे ही समस्त प्राणियोंका एक-दूसरेके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। संतोंमें सौहार्द होनेके कारण ही सब लोग उनपर अधिक विश्वास करते हैं ॥ ४३ ॥
यम उवाच
उदाहृतं ते वचनं यदङ्गने शुभे न तादृक् त्वदृते श्रुतं मया । अनेन तुष्टोऽस्मि विनास्य जीवितं वरं चतुर्थं वरयस्व गच्छ च ॥ ४४ ॥ **यमराज बोले—**कल्याणि! तूने जैसी बात कही है, वैसी मैंने तेरे सिवा किसी दूसरेके मुखसे नहीं सुनी है। शुभे! तेरी इस बातसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई चौथा वर माँग ले और यहाँसे लौट जा ॥ ४४ ॥
सावित्र्युवाच
ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं भवेदुभाभ्यामिह यत् कुलोद्वहम् । शतं सुतानां बलवीर्यशालिना- मिदं चतुर्थं वरयामि ते वरम् ॥ ४५ ॥ **सावित्रीने कहा—**मेरे और सत्यवान्—दोनोंके संयोगसे कुलकी वृद्धि करनेवाले, बल और पराक्रमसे सुशोभित सौ औरस पुत्र हों। यह मैं आपसे चौथा वर माँगती हूँ ॥ ४५ ॥
यम उवाच
शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले । परिश्रमस्ते न भवन्नृपात्मजे निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥ ४६ ॥ **यमराज बोले—**अबले! तुझे बल और पराक्रमसे सम्पन्न सौ पुत्र प्राप्त होंगे; जो तेरी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले होंगे। राजकुमारी! अब तू लौट जा, जिससे तुझे थकावट न हो। तू रास्तेसे बहुत दूर चली आयी है ॥ ४६ ॥
सावित्र्युवाच
सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्तिः सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति । सतां सद्भिर्नाफलः सङ्गमोऽस्ति सद्भ्यो भयं नानुवर्तन्ति सन्तः ॥ ४७ ॥ **सावित्रीने कहा—**सत्पुरुषोंकी वृत्ति निरन्तर धर्ममें ही लगी रहती है। श्रेष्ठ पुरुष कभी दुःखी या व्यथित नहीं होते। सत्पुरुषोंका संतोंके साथ जो समागम होता है, वह कभी निष्फल नहीं होता है। श्रेष्ठ पुरुष संतोंसे कभी भय नहीं मानते हैं ॥ ४७ ॥
सन्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्यं सन्तो भूमिं तपसा धारयन्ति । सन्तो गतिर्भूतभव्यस्य राजन् सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ॥ ४८ ॥ श्रेष्ठ पुरुष सत्यके बलसे सूर्यका संचालन करते हैं। संत-महात्मा अपनी तपस्यासे इस पृथ्वीको धारण करते हैं। राजन्! सत्पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्यके आश्रय हैं। श्रेष्ठ पुरुष संतोंके बीचमें रहकर कभी दुःख नहीं उठाते हैं ॥ ४८ ॥
आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय शाश्वतम् । सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ति परस्परम् ॥ ४९ ॥
यह सनातन सदाचार सत्पुरुषोंद्वारा सेवित है। यह जानकर सभी श्रेष्ठ पुरुष परोपकार करते हैं और आपसमें एक-दूसरेकी ओर स्वार्थकी दृष्टिसे कभी नहीं देखते हैं॥ ४९॥
न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो
न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः।
यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं
तस्मात् सन्तो रक्षितारो भवन्ति॥ ५०॥
सत्पुरुषोंका प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं जाता। वहाँ किसीको स्वार्थकी हानि नहीं उठानी पड़ती है और न मान-सम्मान ही नष्ट होता है। ये तीनों (प्रसाद, अर्थ और मान) संतोंमें नित्य-निरन्तर बने रहते हैं; इसलिये वे सम्पूर्ण जगत्के रक्षक होते हैं॥ ५०॥
यम उवाच
यथा यथा भाषसि धर्मसंहितं
मनोऽनुकूलं सुपद्ं महार्थवत्।
तथा तथा मे त्वयि भक्तिरुत्तमा
वरं वृणीष्वाप्रतिमं पतिव्रते॥ ५१॥
**यमराज बोले—**पतिव्रते! जैसे-जैसे तू गम्भीर अर्थसे युक्त और सुन्दर पदोंसे विभूषित, मनके अनुकूल धर्मसंगत बातें मुझे सुनाती जा रही है, वैसे-ही-वैसे तेरे प्रति मेरी उत्तम भक्ति बढ़ती जाती है; अतः तू मुझसे कोई अनुपम वर माँग ले॥ ५१॥
सावित्र्युवाच
न तेऽपवर्गः सुकृताद् विनाकृत-
स्तथा यथान्येषु वरेषु मानद।
वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं
यथा मृता ह्येवमहं पतिं विना॥ ५२॥
**सावित्रीने कहा—**मानद! आपने मुझे जो पुत्र-प्राप्तिका वर दिया है, वह पुण्यमय दाम्पत्य-संयोगके बिना सफल नहीं हो सकता। अन्य वरोंकी जैसी स्थिति है, वैसी इस अन्तिम वरकी नहीं है। इसलिये मैं पुनः यह वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायें; क्योंकि इन पतिदेवताके बिना मैं मरी हुईके ही समान हूँ॥ ५२॥
न कामये भर्तृविनाकृता सुखं
न कामये भर्तृविनाकृता दिवम्।
न कामये भर्तृविनाकृता श्रियं
न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम्॥ ५३॥
पतिके बिना यदि कोई सुख मिलता है तो वह मुझे नहीं चाहिये। पतिदेवके बिना मैं स्वर्गलोकमें भी जानेकी इच्छा नहीं रखती। पतिके बिना मुझे धन-सम्पत्तिकी भी इच्छा नहीं
है। अधिक क्या कहूँ, मैं पतिके बिना जीवित रहना भी नहीं चाहती ॥ ५३ ॥
वरातिसर्गः शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्रियते च मे पतिः । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥ ५४ ॥
आपने ही मुझे सौ पुत्र होनेका वर दिया है और आप ही मेरे पतिको अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायँ, इससे आपका ही वचन सत्य होगा ॥ ५४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तं पाश मुक्त्वा वैवस्वतो यमः । धर्मराजः प्रहृष्टात्मा सावित्रीमिदमब्रवीत् ॥ ५५ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर 'तथास्तु' कहकर सूर्यपुत्र धर्मराज यमने सत्यवान्का बन्धन खोल दिया और प्रसन्नचित्त होकर सावित्रीसे इस प्रकार कहा—
एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि । (तोषिताेऽहं त्वया साध्वि वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।) अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थः स भविष्यति ॥ ५६ ॥
'भद्रे! यह ले, मैंने तेरे पतिको छोड़ दिया। कुलनन्दिनी! तूने अपने धर्मार्थयुक्त वचनोंद्वारा मुझे पूर्ण संतुष्ट कर दिया है। साध्वी! यह सत्यवान् नीरोग, सफल-मनोरथ तथा तेरे द्वारा ले जानेयोग्य हो गया ।। ५६ ।।
चतुर्वर्षशतायुश्च त्वया सार्धमवाप्स्यति ।
इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति ।। ५७ ।।
'यह तेरे साथ रहकर चार सौ वर्षोंकी आयु प्राप्त करेगा। यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करके यह अपने धर्माचरणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात होगा ।। ५७ ।।
त्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवान् जनयिष्यति ।
ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियाः पुत्रपौत्रिणः ।। ५८ ।।
'सत्यवान् तेरे गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न करेगा और वे सभी राजकुमार राजा होनेके साथ ही पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होंगे ।। ५८ ।।
ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्च भविष्यन्तीह शाश्वताः ।
पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ।। ५९ ।।
'तेरे ही नामसे उनकी सदा ख्याति होगी अर्थात् वे सावित्र नामसे प्रसिद्ध होंगे। तेरे पिताके भी तेरी माताके ही गर्भसे सौ पुत्र होंगे ।। ५९ ।।
मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः ।
भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ।। ६० ।।
अध्याय (पृष्ठ 1999)
यम-सावित्री
‘वे तेरी माता मालवीसे उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे। तेरे भाई मालव क्षत्रिय पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न तथा देवताओंके समान तेजस्वी होंगे’॥ ६०॥
एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान्।
निवर्तयित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं ययौ॥ ६१॥
सावित्रीको इस प्रकार वरदान दे प्रतापी धर्मराज उसे लौटाकर अपने लोकको चले गये॥ ६१॥
सावित्र्यपि यमे याते भर्तारं प्रतिलभ्य च।
जगाम तत्र यत्रास्या भर्तुः शावं कलेवरम्॥ ६२॥
यमराजके चले जानेपर सावित्री अपने पतिको पाकर उसी स्थानपर गयी; जहाँ पतिका मृत शरीर पड़ा था॥ ६२॥
सा भूमौ प्रेक्ष्य भर्तारमुपसृत्योपगृह्य च।
उत्सङ्गे शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह॥ ६३॥
वह पृथ्वीपर अपने पतिको पड़ा देख उनके पास गयी और पृथ्वीपर बैठ गयी, फिर पतिको उठाकर उसने उनके मस्तकको गोदीमें रख लिया॥ ६३॥
संज्ञां च स पुनर्लब्ध्वा सावित्रीमभ्यभाषत।
प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनः पुनरुदीक्ष्य वै॥ ६४॥
तदनन्तर पुनः चेतना प्राप्त करके सत्यवान् परदेशमें रहकर लौटे हुए पुरुषकी भाँति बार-बार प्रेमपूर्वक सावित्रीकी ओर देखते हुए उससे बोले॥ ६४॥
सत्यवानुवाच
सुचिरं बत सुप्तोऽस्मि किमर्थं नावबोधितः।
क्व चासौ पुरुषः श्यामो योऽसौ मां संचकर्ष ह॥ ६५॥
सत्यवान्ने कहा— प्रिये! खेद है कि मैं बहुत देरतक सोता रह गया। तुमने मुझे जगा क्यों नहीं दिया? वे श्यामवर्णके पुरुष कहाँ हैं जिन्होंने मुझे खींचा था?॥ ६५॥
सावित्र्युवाच
सुचिरं त्वं प्रसुप्तोऽसि ममाङ्के पुरुषर्षभ।
गतः स भगवान् देवः प्रजासंयमनो यमः॥ ६६॥
सावित्री बोली— नरश्रेष्ठ! आप मेरी गोदमें बहुत देरतक सोते रह गये। वे श्यामवर्णके पुरुष प्रजाको संयममें रखनेवाले साक्षात् भगवान् यम थे, जो अब चले गये हैं॥ ६६॥
विश्रान्तोऽसि महाभाग विनिद्रश्च नृपात्मज।
यदि शक्यं समुत्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम्॥ ६७॥
महाभाग! आपने विश्राम कर लिया। राजकुमार! अब आपकी नींद भी टूट चुकी है। यदि शक्ति हो तो उठिये; देखिये, प्रगाढ़ अन्धकारसे युक्त रात्रि हो गयी है॥ ६७॥
मार्कण्डेय उवाच
उपलभ्य ततः संज्ञां सुखसुप्त इवोत्थितः । दिशः सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान् ॥ ६८ ॥ फलाहारोऽस्मि निष्क्रान्तस्त्वया सह सुमध्यमे । ततः पाटयतः काष्ठं शिरसो मे रुजाभवत् ॥ ६९ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तब होशमें आकर सत्यवान् सुखपूर्वक सोये हुए पुरुषकी भाँति उठकर सम्पूर्ण दिशाओं तथा वनप्रान्तकी ओर दृष्टि डालकर बोले—'सुमध्यमे! मैं फल लानेके लिये तुम्हारे साथ घरसे निकला था, फिर लकड़ी चीरते समय मेरे सिरमें जोर-जोरसे दर्द होने लगा था ॥ ६८-६९ ॥
शिरोऽभितापसंतप्तः स्थातुं चिरमशक्नुवन् । तवोत्सङ्गे प्रसुप्तोऽस्मि इति सर्वं स्मरे शुभे ॥ ७० ॥
'शुभे! मस्तककी उस पीड़ासे संतप्त हो मैं देरतक खड़ा रहनेमें असमर्थ हो गया और तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सो रहा। ये सारी बातें मुझे क्रमशः याद आ रही हैं ॥ ७० ॥
त्वयोपगूढस्य च मे निद्रयापहृतं मनः । ततोऽपश्यं तमो घोरं पुरुषं च महौजसम् ॥ ७१ ॥
'तुम्हारे अंगोंका स्पर्श होनेसे मेरा मन नींदमें खो गया। तत्पश्चात् मुझे घोर अंधकार दिखायी दिया। साथ ही एक महातेजस्वी दिव्य पुरुषका दर्शन हुआ ॥ ७१ ॥
तद् यदि त्वं विजानासि किं तद् ब्रूहि सुमध्यमे । स्वप्नो मे यदि वा दृष्टो यदि वा सत्यमेव तत् ॥ ७२ ॥
'सुमध्यमे! यदि तुम जानती हो तो बताओ; वह सब क्या था? मैंने जो कुछ देखा है वह स्वप्न तो नहीं था? अथवा वह सब सत्य ही था' ॥ ७२ ॥
तमुवाचाथ सावित्री रजनी व्यवगाहते । श्वस्ते सर्वं यथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज ॥ ७३ ॥
तब सावित्री उनसे बोली—राजकुमार! रात बढ़ती जा रही है। कल सबेरे मैं आपसे सब बातें ठीक-ठीक बताऊँगी ॥ ७३ ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते पितरौ पश्य सुव्रत । विगाढा रजनी चेयं निवृत्तश्च दिवाकरः ॥ ७४ ॥
'सुव्रत! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। आप चलकर माता-पिताका दर्शन तो कीजिये। सूर्य डूब गये तथा रात घनी हो गयी है ॥ ७४ ॥
नक्तंचराश्चरन्त्येते हृष्टाः क्रूराभिभाषिणः । श्रूयन्ते पर्णशब्दाश्च मृगाणां चरतां वने ॥ ७५ ॥
ये क्रूर बोली बोलनेवाले निशाचर यहाँ प्रसन्नतापूर्वक विचर रहे हैं। वनमें घूमते हुए मृगोंके पैरोंसे लगकर पत्तोंके मर्मर शब्द सुनायी पड़ते हैं ॥ ७५ ॥
एता घोरं शिवा नादान् दिशं दक्षिणपश्चिमाम् । आस्थाय विरुवन्त्युग्राः कम्पयन्त्यो मनो मम ॥ ७६ ॥ 'दक्षिण और पश्चिमके कोणकी दिशामें जाकर ये उग्र सियारिनें भयंकर शब्द कर रही हैं, जिससे मेरा हृदय काँप उठता है ।। ७६ ।।
सत्यवानुवाच वनं प्रतिभयाकारं घनेन तमसाऽऽवृतम् । न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि ॥ ७७ ॥ **सत्यवान् बोले—**प्रिये! यह वन गाढ अंधकारसे आच्छादित होकर अत्यन्त भयंकर दिखायी दे रहा है। इस समय न तो तुम्हें रास्ता सूझेगा और न तुम चल ही सकोगी ।। ७७ ।।
सावित्र्युवाच अस्मिन्नद्य वने दग्धे शुष्कवृक्षः स्थितो ज्वलन् । वायुना ध्म्यमानोऽत्र दृश्यतेऽग्निः क्वचित् क्वचित् ॥ ७८ ॥ **सावित्रीने कहा—**आज इस वनमें आग लगी थी। इसमें एक सूखा वृक्ष खड़ा है, जो जल रहा है। हवा लगनेसे उसमें कहीं-कहीं आग दिखायी देती है ।। ७८ ।। ततोऽग्निमानयित्वेह ज्वालयिष्यामि सर्वतः । काष्ठानीमानि सन्तीह जहि सन्तापमात्मनः ॥ ७९ ॥ वहींसे आग ले आकर मैं सब ओर लकड़ियाँ जलाऊँगी। यहाँ बहुत-से काठ-कबाड़ पड़े हैं। आप मनसे चिन्ता निकाल दीजिये ।। ७९ ।। यदि नोत्सहसे गन्तुं सरुजं त्वां हि लक्षये । न च ज्ञास्यसि पन्थानं तमसा संवृते वने ॥ ८० ॥ श्वः प्रभाते वने दृश्ये यास्यावोऽनुमते तव। वसावेह क्षपामेकां रुचितं यदि तेऽनघ ॥ ८१ ॥ परंतु मैं आपको रुग्ण देख रही हूँ। ऐसी दशामें यदि आपके मनमें चलनेका उत्साह न हो अथवा इस तिमिराच्छन्न वनमें यदि आपको रास्तेका ज्ञान न हो सके तो आपकी अनुमति होनेपर हम दोनों कल सबेरे, जब वनकी हर एक वस्तु स्पष्ट दीखने लगे, घर चलेंगे। अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो एक रात हमलोग यहीं निवास करें ।। ८०-८१ ।।
सत्यवानुवाच शिरोरुजा निवृत्ता मे स्वस्थान्यङ्गानि लक्षये । मातापितृभ्यामिच्छामि संगमं त्वत्प्रसादजम् ॥ ८२ ॥
सत्यवान्ने कहा— प्रिये! मेरे सिरका दर्द दूर हो गया है। मुझे अपने सब अंग स्वस्थ दिखायी देते हैं। अब तुम्हारे कृपाप्रसादसे मैं अपने माता-पितासे मिलना चाहता हूँ॥ ८२ ॥
न कदाचिद् विकालं हि गतपूर्वो मयाऽऽश्रमः ।
अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम् ॥ ८३ ॥
आजसे पहले कभी भी मैं इतनी देर करके असमयमें अपने आश्रमपर नहीं लौटा हूँ। संध्या होनेसे पहले ही माता मुझे रोक लेती है—आश्रमसे बाहर नहीं जाने देती ॥ ८३ ॥
दिवापि मयि निष्क्रान्ते संतप्येते गुरू मम ।
विचिनोति हि मां तातः सहैवाश्रमवासिभिः ॥ ८४ ॥
दिनमें भी यदि मैं आश्रमसे दूर निकल जाता हूँ तो मेरे माता-पिता व्याकुल हो उठते हैं एवं पिताजी आश्रमवासियोंके साथ मुझे खोजने निकल पड़ते हैं ॥ ८४ ॥
मात्रा पित्रा च सुभृशं दुःखिताभ्यामहं पुरा ।
उपालब्धश्च बहुशश्चिरेणागच्छसीति ह ॥ ८५ ॥
मेरे माता-पिताने अत्यन्त दुःखी होकर पहले कई बार मुझे उलाहना दिया है कि ‘तु देरसे घर लौटता है’ ॥ ८५ ॥
का त्ववस्था तयोरद्य मदर्थमिति चिन्तये ।
तयोरदृश्ये मयि च महत् दुःखं भविष्यति ॥ ८६ ॥
आज मेरे लिये उन दोनोंकी क्या अवस्था हुई होगी? यह सोचकर मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है। मुझे न देखनेपर उन दोनोंको महान् दुःख होगा ॥ ८६ ॥
पुरा मामूचतुश्चैव रात्रावस्रायमाणकौ ।
भृशं सुदुःखितौ वृद्धौ बहुशः प्रीतिसंयुतौ ॥ ८७ ॥
पहलेकी बात है, मेरे वृद्ध माता-पिताने अत्यन्त दुःखी हो रातमें आँसू बहाते हुए मुझसे बारंबार प्रेमपूर्वक कहा था— ॥ ८७ ॥
त्वया हीनौ न जीवाव मुहूर्तमपि पुत्रक ।
यावद् धरिष्यसे पुत्र तावन्नौ जीवितं ध्रुवम् ॥ ८८ ॥
‘बेटा! तुम्हारे बिना हम दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते। वत्स! तुम जबतक जीवित रहोगे, तभीतक हमारा भी जीवन निश्चित है ॥ ८८ ॥
वृद्धयोरन्धयोर्दृष्टिस्त्वयि वंशः प्रतिष्ठितः ।
त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च संतानं चावयोरिति ॥ ८९ ॥
‘हम दोनों बूढ़े और अंधे हैं। तुम्हीं हमारी दृष्टि हो तथा तुम्हींपर हमारा वंश प्रतिष्ठित है। हम दोनोंका पिण्ड, कीर्ति और कुलपरम्परा सब कुछ तुमपर ही अवलम्बित है’ ॥ ८९ ॥
माता वृद्धा पिता वृद्धस्तयोर्यष्टिरहं किल ।
तौ रात्रौ मामपश्यन्तौ कामवस्थां गमिष्यतः ॥ ९० ॥
मेरी माता बूढ़ी है। पिता भी वृद्ध हैं, केवल मैं ही उन दोनोंके लिये लाठीका सहारा हूँ। वे दोनों रातमें मुझे न देखकर पता नहीं किस दशाको पहुँच जायँगे? ।। ९० ।। निद्रायाश्चाभ्यसूयामि यस्या हेतोः पिता मम । माता च संशयं प्राप्ता मत्कृतेऽनपकारिणी ।। ९१ ।। मैं अपनी इस नींदको कोसता हूँ, जिसके कारण मेरे पिता तथा कभी मेरा अपकार न करनेवाली मेरी माताका जीवन संशयमें पड़ गया है ।। ९१ ।। अहं च संशयं प्राप्तः कृच्छ्रामापदमास्थितः । मातापितृभ्यां हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे ।। ९२ ।। मैं भी कठिन विपत्तिमें फँसकर प्राण-संशयकी दशामें आ पहुँचा हूँ। माता-पिताके बिना तो मैं कदापि जीवित नहीं रह सकता ।। ९२ ।। व्यक्तमाकुलया बुद्ध्या प्रज्ञाचक्षुः पिता मम । एकैकमस्यां वेलायां पृच्छत्याश्रमवासिनम् ।। ९३ ।। निश्चय ही इस समय मेरे प्रज्ञाचक्षु (अंधे) पिता व्याकुल हृदयसे एक-एक आश्रमवासीके पास जाकर मेरे विषयमें पूछ रहे होंगे ।। ९३ ।। नात्मानमनुशोचामि यथाहं पितरं शुभे । भर्तारं चाप्यनुगतां मातरं परिदुर्बलाम् ।। ९४ ।। शुभे! मुझे अपने लिये उतना शोक नहीं है, जितना कि पिताके लिये और उन्हींका अनुसरण करनेवाली दुबली-पतली माताके लिये है ।। ९४ ।। मत्कृतेन हि तावद्य सन्तापं परमेष्यतः । जीवन्तावनुजीवामि भर्तव्यौ तौ मयेति ह ।। ९५ ।। तयोः प्रियं मे कर्तव्यमिति जानामि चाप्यहम् । मेरे कारण आज मेरे माता-पिता बहुत संतप्त होंगे। उन्हें जीवित देखकर ही मैं जी रहा हूँ। मुझे उन दोनोंका भरण-पोषण करना चाहिये। मैं यह भी जानता हूँ कि माता-पिताका प्रिय करना ही मेरा कर्तव्य है ।। ९५ ½ ।।
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा गुरुभक्तो गुरुप्रियः ।। ९६ ।। उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्तः सुस्वरं प्ररुरोद ह । **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यों कहकर धर्मात्मा, गुरुभक्त एवं गुरुजनोंके प्रिय सत्यवान् दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखसे आतुर हो फूट-फूटकर रोने लगे ।। ९६ ½ ।। ततोऽब्रवीत् तथा दृष्ट्वा भर्तारं शोककर्शितम् ।। ९७ ।। प्रमृज्याश्रूणि नेत्राभ्यां सावित्री धर्मचारिणी । यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं यदि दत्तं हुतं यदि ।। ९८ ।।
श्वश्रूश्वशुरभर्तॄणां मम पुण्यास्तु शर्वरी ।
अपने पतिको इस प्रकार शोकसे कातर हुआ देख धर्मका पालन करनेवाली सावित्रीने नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंको पोंछकर कहा—'यदि मैंने कोई तपस्या की हो, यदि दान दिया हो और होम किया हो तो मेरे सास-ससुर और पतिके लिये यह रात पुण्यमयी हो ।। ९७-९८ १/२ ।।
न स्मराम्युक्तपूर्वं वै स्वैरेष्वनृतां गिरम् ।। ९९ ।।
तेन सत्येन तावद्य ध्रियेतां श्वशुरौ मम ।
'मैंने पहले कभी इच्छानुसार किये जानेवाले क्रीडा-विनोदमें भी झूठी बात कही हो, मुझे इसका स्मरण नहीं है। उस सत्यके प्रभावसे इस समय मेरे सास-ससुर जीवित रहें ।। ९९ १/२ ।।
सत्यवानुवाच
कामये दर्शनं पित्रोर्याहि सावित्रि मा चिरम् ।। १०० ।।
(अपि नाम गुरू तौ हि पश्येयं प्रीयमाणकौ ।)
**सत्यवान्ने कहा—**सावित्री! चलो, मैं शीघ्र ही माता-पिताका दर्शन करना चाहता हूँ। क्या मैं उन दोनोंको प्रसन्न देख सकूँगा? ।। १०० ।।
पुरा मातुः पितुर्वापि यदि पश्यामि विप्रियम् ।
न जीविष्ये वरारोहे सत्येनात्मानमालभे ।। १०१ ।।
वरारोहे! मैं सत्यकी शपथ खाकर अपना शरीर छूकर कहता हूँ, यदि मैं माता अथवा पिताका अप्रिय देखूँगा तो जीवित नहीं रहूँगा ।। १०१ ।।
यदि धर्मे च ते बुद्धिर्मां चेज्जीवन्तमिच्छसि ।
मम प्रियं वा कर्तव्यं गच्छावाश्रममन्तिकात् ।। १०२ ।।
यदि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें रत है, यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो अथवा मेरा प्रिय करना अपना कर्तव्य समझती हो तो हम दोनों शीघ्र ही आश्रमके समीप चलें ।। १०२ ।।
मार्कण्डेय उवाच
सावित्री तत उत्थाय केशान् संयम्य भाविनी ।
पतिमुत्थापयामास बाहुभ्यां परिगृह्य वै ।। १०३ ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब पतिका हितचिन्तन करनेवाली सावित्रीने उठकर अपने खुले हुए केशोंको बाँध लिया और दोनों हाथोंसे पकड़कर पतिको उठाया ।। १०३ ।।
उत्थाय सत्यवांश्चापि प्रमृज्याङ्गानि पाणिना ।
सर्वा दिशः समालोक्य कठिने दृष्टिमदधे ।। १०४ ।।
सत्यवान्ने भी उठकर एक हाथसे अपने सभी अंग पोंछे और चारों ओर देखकर फलोंकी टोकरीपर दृष्टि डाली ॥ १०४ ॥
तमुवाचाथ सावित्री श्वः फलानि हरिष्यसि ।
योगक्षेमार्थमेतं ते नेष्यामि परशुं त्वहम् ॥ १०५ ॥
तब सावित्रीने उनसे कहा—'कल सबेरे फलोंको ले चलियेगा। इस समय आपके योग-क्षेमके लिये इस कुल्हाड़ीको मैं साथ ले चलूँगी' ॥ १०५ ॥
कृत्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्बिनम् ।
गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशे पुनरागमत् ॥ १०६ ॥
फिर उसने टोकरीके बोझको पेड़की डालमें लटका दिया और कुल्हाड़ी लेकर वह पुनः पतिके पास आ गयी ॥ १०६ ॥
वामे स्कन्धे तु वामोरूर्भर्तुर्बाहुं निवेश्य च ।
दक्षिणेन परिष्वज्य जगाम गजगामिनी ॥ १०७ ॥
कमनीय ऊरुओंसे सुशोभित तथा हाथीके समान मन्द गतिसे चलनेवाली सावित्रीने पतिकी दाहिनी भुजाको अपने बायें कंधेपर रखकर दाहिने हाथसे उन्हें अपने पार्श्वभागमें सटा लिया और धीरे-धीरे चलने लगी ॥ १०७ ॥
सत्यवानुवाच
अभ्यासगमनाद् भीरु पन्थानो विदिता मम ।
वृक्षान्तरालोकितया ज्योत्स्नया चापि लक्षये ।। १०८ ।।
**उस समय सत्यवान्ने कहा—**भीरु! बार-बार आने-जानेसे यहाँके सभी मार्ग मेरे परिचित हैं। वृक्षोंके भीतरसे दिखायी देनेवाली चाँदनीसे भी मैं रास्तोंकी पहचान कर लेता हूँ ।। १०८ ।।
आगतौ स्वः पथा येन फलान्यवचितानि च ।
यथागतं शुभे गच्छ पन्थानं मा विचारय ।। १०९ ।।
यह वही मार्ग है जिससे हम दोनों आये थे और हमने फल चुने थे। शुभे! तुम जैसे आयी हो वैसे चली चलो। रास्तेका विचार न करो ।। १०९ ।।
पलाशखण्डे चैतस्मिन् पन्था व्यावर्तते द्विधा ।
तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च ।। ११० ।।
स्वस्थोऽस्मि बलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ ।
पलाश-वृक्षोंके इस वनप्रदेशमें यह मार्ग अलग-अलग दो दिशाओंकी ओर मुड़ जाता है। इन दोनोंमेंसे जो मार्ग उत्तरकी ओरसे जाता है, उसीसे चलो और शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाओ। अब मैं स्वस्थ हूँ, बलवान् हूँ और अपने माता तथा पिता दोनोंको देखनेके लिये उत्सुक हूँ ।। ११० १/२ ।।
मार्कण्डेय उवाच
ब्रुवन्नेवं त्वरायुक्तः सम्प्रायादाश्रमं प्रति ।। १११ ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**ऐसा कहते हुए सत्यवान् बड़ी उतावलीके साथ आश्रमकी ओर चलने लगे ।। १११ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २९७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २९७ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११२ श्लोक हैं)
२९८-
अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान्के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना
मार्कण्डेय उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महाबलः ।
लब्धचक्षुः प्रसन्नायां दृष्ट्यां सर्वं ददर्श ह ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इसी समय महाबली महाराजा द्युमत्सेनको उनकी खोयी हुई आँखें मिल गयीं। दृष्टि स्वच्छ हो जानेके कारण वे सब कुछ देखने लगे ॥ १ ॥
स सर्वान्याश्रमान् गत्वा शैब्यया सह भार्यया ।
पुत्रहेतोः परामार्तिं जगाम भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे अपनी पत्नी शैब्याके साथ सभी आश्रमोंमें जाकर पुत्रका पता लगाने लगे। उस समय उन्हें सत्यवान्के लिये बड़ी वेदना हो रही थी ॥ २ ॥
तावाश्रमान् नदींश्चैव वनानि च सरांसि च ।
तस्यां निशि विचिन्वन्तौ दम्पती परिजग्मतुः ॥ ३ ॥
वे दोनों पति-पत्नी उस रातमें पुत्रकी खोज करते हुए विभिन्न आश्रमों, नदीके तटों तथा वनों और सरोवरोंमें भ्रमण करने लगे ॥ ३ ॥
श्रुत्वा शब्दं तु यं कञ्चिदुन्मुखौ सुतशङ्कया ।
सावित्रीसहितोऽभ्येति सत्यवानित्यभाषताम् ॥ ४ ॥
जो कोई भी शब्द कानमें पड़ता, उसीको सुनकर वे अपने पुत्रके आनेकी आशंकासे उत्सुक हो उठते और परस्पर कहने लगते कि ‘सावित्रीके साथ सत्यवान् आ रहा है’ ॥ ४ ॥
भिन्नैश्च परुषैः पादैः सव्रणैः शोणितोक्षितैः ।
कुशकण्टकविद्धाङ्गावुन्मत्ताविव धावतः ॥ ५ ॥
उनके पैरोंमें बिवाई फट गयी थी, वे कठोर हो गये थे तथा घाव हो जानेके कारण रक्तसे भींगे रहते थे, तो भी उन्हीं पैरोंसे वे दोनों दम्पति इधर-उधर पागलोंकी भाँति दौड़ रहे थे। उस समय उनके अंगोंमें कुश और काँटे बिंध गये थे ॥ ५ ॥
ततोऽभिसृत्य तैर्विप्रैः सर्वैराश्रमवासिभिः ।
परिवार्य समाश्वास्य तावानीतौ स्वमाश्रमम् ॥ ६ ॥
तब उन आश्रमोंमें रहनेवाले समस्त ब्राह्मणोंने उनके पास जा उन्हें सब ओरसे घेरकर आश्वासन दिया तथा उन दोनोंको उनके आश्रमपर पहुँचाया॥ ६॥
तत्र भार्यासहायः स वृतो वृद्धैस्तपोधनैः।
आश्वासितोऽपि चित्रार्थैः पूर्वराज्ञां कथाश्रयैः॥ ७॥
ततस्तौ पुनराश्वस्तौ वृद्धौ पुत्रदिदृक्षया।
बाल्यवृत्तानि पुत्रस्य स्मरन्तौ भृशदुःखितौ॥ ८॥
तपस्याके धनी वृद्ध ब्राह्मणोंद्वारा घिरे हुए पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनको प्राचीन राजाओंकी विचित्र अर्थोंसे भरी हुई कथाएँ सुनाकर पूरा आश्वासन दिया गया, तो भी वे दोनों वृद्ध बारंबार सान्त्वना मिलते रहनेपर भी अपने पुत्रको देखनेकी इच्छासे उसके बचपनकी बातें सोचते हुए बहुत दुःखी हो गये॥ ७-८॥
पुनरुक्त्वा च करुणां वाचं तौ शोककर्शितौ।
हा पुत्र हा साध्वि वधूः क्वासि क्वासीत्यरोदताम्।
ब्राह्मणः सत्यवाक् तेषामुवाचेदं तयोर्वचः॥ ९॥
वे शोककातर दम्पति बारंबार करुण वचन बोलते हुए 'हा पुत्र! हा सती-साध्वी बहू! तुम कहाँ हो, कहाँ हो?' यों कहकर रोने लगे। उस समय एक सत्यवादी ब्राह्मणने उन दोनोंसे इस प्रकार कहा॥ ९॥
सुवर्चा उवाच
यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च।
आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान्॥ १०॥
**सुवर्चा बोले—**सत्यवान्की पत्नी सावित्री जैसी तपस्या, इन्द्रियसंयम तथा सदाचारसे संयुक्त है, उसे देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि सत्यवान् जीवित है॥ १०॥
गौतम उवाच
वेदाः साङ्गा मयाधीतास्तपो मे संचितं महत्।
कौमारब्रह्मचर्यं च गुरवोऽग्निश्च तोषिताः॥ ११॥
समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे।
वायुभक्षोपवासश्च कृतो मे विधिवत् पुरा॥ १२॥
अनेन तपसा वेद्मि सर्वं परचिकीर्षितम्।
सत्यमेतन्निबोधध्वं ध्रियते सत्यवानिति॥ १३॥
**गौतम बोले—**मैंने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। महान् तपका संचय किया है। कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनों तथा अग्निदेवको संतुष्ट किया है। एकाग्रचित्त होकर सभी व्रत पूर्ण किये हैं। पूर्वकालमें हवा पीकर विधिपूर्वक उपवासव्रतका साधन किया है। इस तपस्याके प्रभावसे मैं दूसरोंकी सारी
चेष्टाओंको जान लेता हूँ। आपलोग मेरी यह बात सच मानें कि सत्यवान् जीवित है ।। ११—१३ ।।
शिष्य उवाच
उपाध्यायस्य मे वक्त्राद् यथा वाक्यं विनिःसृतम् ।
नैव जातु भवेन्मिथ्या तथा जीवति सत्यवान् ।। १४ ।।
**गौतमके शिष्यने कहा—**मेरे गुरुजीके मुखसे जो बात निकली है वह कभी मिथ्या नहीं हो सकती। सत्यवान् अवश्य जीवित है ।। १४ ।।
ऋषय ऊचुः
यथास्य भार्या सावित्री सर्वैरेव सुलक्षणैः ।
अवैधव्यकरैर्युक्ता तथा जीवति सत्यवान् ।। १५ ।।
**कुछ ऋषियोंने कहा—**सत्यवान्की पत्नी सावित्री उन सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त है जो वैधव्यका निवारण करके सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, इसलिये सत्यवान् अवश्य जीवित है ।। १५ ।।
भारद्वाज उवाच
यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च ।
आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ।। १६ ।।
**भारद्वाज बोले—**सत्यवान्की पत्नी सावित्री जैसी तपस्या, इन्द्रियसंयम तथा सदाचारसे संयुक्त है, उसे देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि सत्यवान् जीवित है ।।
दाल्भ्य उवाच
यथा दृष्टिः प्रवृत्ता ते सावित्र्याश्च यथा व्रतम् ।
गताऽऽहारमकृत्वा च तथा जीवति सत्यवान् ।। १७ ।।
**दाल्भ्यने कहा—**राजन्! जिस प्रकार आपको दृष्टि प्राप्त हो गयी और जिस प्रकार सावित्रीका उपवास-व्रत चल रहा था तथा जिस प्रकार वह आज भोजन किये बिना ही पतिके साथ गयी है, इन सब बातोंपर विचार करनेसे यही प्रतीत होता है कि सत्यवान् जीवित है ।। १७ ।।
आपस्तम्ब उवाच
यथा वदन्ति शान्तायां दिशि वै मृगपक्षिणः ।
पार्थिवी च प्रवृत्तिस्ते तथा जीवति सत्यवान् ।। १८ ।।
**आपस्तम्ब बोले—**इस शान्त (एवं प्रसन्न) दिशामें मृग और पक्षी जैसी बोली बोल रहे हैं और आपके द्वारा जिस प्रकार राजोचित धर्मका अनुष्ठान हो रहा है, उसके अनुसार यह
कहा जा सकता है कि सत्यवान् जीवित है ।। १८ ।।
धौम्य उवाच
सर्वैर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रियः ।
दीर्घायुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् ।। १९ ।।
**धौम्यने कहा—**महाराज! आपका यह पुत्र जिस प्रकार समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न, जनप्रिय तथा चिरजीवी पुरुषोंके लक्षणोंसे युक्त है, उसके अनुसार यही मानना चाहिये कि सत्यवान् जीवित है ।। १९ ।।
मार्कण्डेय उवाच
एवमाश्वासितस्तैस्तु सत्यवाग्भिस्तपस्विभिः ।
तांस्तान् विगणयन् सर्वांस्ततः स्थिर इवाभवत् ।। २० ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इस प्रकार सत्यवादी एवं तपस्वी मुनियोंने जब राजा द्युमत्सेनको पूर्णतः आश्वासन दिया, तब उन सबका समादर करते हुए उनकी बात मानकर वे स्थिर-से हो गये ।। २० ।।
ततो मुहूर्तात् सावित्री भर्त्रा सत्यवता सह ।
आजगामाश्रमं रात्रौ प्रहृष्टा प्रविवेश ह ।। २१ ।।
तदनन्तर दो ही घड़ीमें सावित्री अपने पति सत्यवान्के साथ रातमें वहाँ आयी और बड़े हर्षके साथ उसने आश्रममें प्रवेश किया ।। २१ ।।
ब्राह्मणा ऊचुः
पुत्रेण संगतं त्वां तु चक्षुष्मन्तं निरीक्ष्य च ।
सर्वे वयं वै पृच्छामो वृद्धिं वै पृथिवीपते ।। २२ ।।
**तब ब्राह्मणोंने कहा—**महाराज! पुत्रके साथ आपका मिलन हुआ और आपको नेत्र भी प्राप्त हो गये, इस अवस्थामें आपको देखकर हम सब लोग आपका अभ्युदय मना रहे हैं ।। २२ ।।
समागमेन पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनेन च ।
चक्षुषश्चात्मनो लाभात् त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे ।। २३ ।।
बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपको पुत्रका समागम प्राप्त हुआ, बहू सावित्रीका दर्शन हुआ और अपने खोये हुए नेत्र पुनः मिल गये। इन तीनों बातोंसे आपका अभ्युदय सूचित होता है ।। २३ ।।
सर्वैरस्माभिरुक्तं यत् तथा तन्नात्र संशयः ।
भूयोभूयः समृद्धिस्ते क्षिप्रमेव भविष्यति ।। २४ ।।
हम सब लोगोंने जो बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों सत्य निकली, इसमें संशय नहीं है। आगे भी शीघ्र ही आपकी बारंबार समृद्धि होनेवाली है ॥ २४ ॥
ततोऽग्निं तत्र संज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि ।
उपासांचक्रिरे पार्थ द्युमत्सेनं महीपतिम् ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर! तदनन्तर सभी ब्राह्मण वहाँ आग जलाकर राजा द्युमत्सेनके पास बैठ गये ॥ २५ ॥
शैब्या च सत्यवांश्चैव सावित्री चैकतः स्थिताः ।
सर्वैस्तैरभ्यनुज्ञाता विशोकाः समुपाविशन् ॥ २६ ॥
शैब्या, सत्यवान् तथा सावित्री—ये तीनों भी एक ओर खड़े थे, जो उन सब महात्माओंकी आज्ञा पाकर शोकरहित हो बैठ गये ॥ २६ ॥
ततो राज्ञा सहासीनाः सर्वे ते वनवासिनः ।
जातकौतूहलाः पार्थ पप्रच्छुर्नृपतेः सुतम् ॥ २७ ॥
पार्थ! तत्पश्चात् राजाके साथ बैठे हुए वे सभी वनवासी कौतूहलवश राजकुमार सत्यवान्से पूछने लगे ॥ २७ ॥
ऋषय ऊचुः
प्रागेव नागतं कस्मात् सभार्येण त्वया विभो ।
विरात्रे चागतं कस्मात् कोऽनुबन्धस्तवाभवत् ॥ २८ ॥
**ऋषि बोले—**राजकुमार! तुम अपनी पत्नीके साथ पहले ही क्यों नहीं चले आये? क्यों इतनी रात बिताकर आये? तुम्हारे सामने कौन-सी अड़चन आ गयी थी? ॥ २८ ॥
संतापितः पिता माता वयं चैव नृपात्मज ।
कस्मादिति न जानीमस्तत् सर्वं वक्तुमर्हसि ॥ २९ ॥
राजपुत्र! तुमने आनेमें विलम्ब करके अपने माता-पिता तथा हमलोगोंको भी भारी संतापमें डाल दिया था। तुमने ऐसा क्यों किया? यह हम नहीं जान पाते हैं, अतः सब बातें स्पष्ट रूपसे बताओ ॥ २९ ॥
सत्यवानुवाच
पित्राहमभ्यनुज्ञातः सावित्रीसहितो गतः ।
अथ मेऽभूच्छिरोदुःखं वने काष्ठानि भिन्दतः ॥ ३० ॥
**सत्यवान् बोले—**मैं पिताकी आज्ञा पाकर सावित्रीके साथ वनमें गया। फिर वनमें लकड़ियोंको चीरते समय मेरे सिरमें बड़े जोरसे दर्द होने लगा ॥ ३० ॥
सुप्तश्चाहं वेदनया चिरमित्युपलक्षये ।
तावत् कालं न च मया सुप्तपूर्वं कदाचन ॥ ३१ ॥