महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
'माँ! यदि तुम मेरा कुछ भी प्रिय करना चाहती हो तो मेरे लिये शीघ्र किसी सवारीकी व्यवस्था कर दो। मैं विदर्भदेश जाना चाहती हूँ।' राजन्! तब 'बहुत अच्छा' कहकर दमयन्तीकी मौसीने प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्रकी राय लेकर सुन्दरी दमयन्तीको पालकीपर बिठाकर विदा किया। उसकी रक्षाके लिये बहुत बड़ी सेना दे दी। भरतश्रेष्ठ! राजमाताने दमयन्तीके साथ खाने-पीनेकी तथा अन्य आवश्यक सामग्रियोंकी अच्छी व्यवस्था कर दी॥ २१—२३॥
ततः सा न चिरादेव विदर्भानगमत् पुनः ।
तां तु बन्धुजनः सर्वः प्रहृष्टः समपूजयत् ॥ २४ ॥
तदनन्तर वहाँसे विदा हो वह थोड़े ही दिनोंमें विदर्भदेशकी राजधानीमें जा पहुँची। उसके आगमनसे माता-पिता आदि सभी बन्धु-बान्धव बड़े प्रसन्न हुए और सबने उसका स्वागत-सत्कार किया॥ २४॥
सर्वान् कुशलिनो दृष्ट्वा बान्धवान् दारकौ च तौ ।
मातरं पितरं चोभौ सर्वं चैव सखीजनम् ॥ २५ ॥
देवताः पूजयामास ब्राह्मणांश्च यशस्विनी ।
परेण विधिना देवी दमयन्ती विशाम्पते ॥ २६ ॥
राजन्! समस्त बन्धु-बान्धवों, दोनों बच्चों, माता-पिता और सम्पूर्ण सखियोंको सकुशल देखकर यशस्विनी देवी दमयन्तीने उत्तम विधिके साथ देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन किया॥ २५-२६॥
अतर्पयत् सुदेवं च गोसहस्रेण पार्थिवः ।
प्रीतो दृष्ट्वैव तनयां ग्रामेण द्रविणेन च ॥ २७ ॥
राजा भीम अपनी पुत्रीको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने एक हजार गौ, एक गाँव तथा धन देकर सुदेव ब्राह्मणको संतुष्ट किया॥ २७॥
सा व्युष्टा रजनीं तत्र पितुर्वेश्मनि भाविनी ।
विश्रान्ता मातरं राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर! भाविनी दमयन्तीने उस रातमें पिताके घरमें विश्राम किया। सबेरा होनेपर उसने मातासे कहा—॥ २८॥
दमयन्त्युवाच
मां चेदिच्छसि जीवन्तीं मातः सत्यं ब्रवीमि ते ।
नलस्य नरवीरस्य यतस्वानयने पुनः ॥ २९ ॥
दमयन्ती बोली—माँ! यदि मुझे जीवित देखना चाहती हो तो मैं तुमसे सच कहती हूँ, नरवीर महाराज नलकी खोज करानेका पुनः प्रयत्न करो॥ २९॥
दमयन्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुःखिता ।
बाष्पेणापिहिता राज्ञी नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ॥ ३० ॥ दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं। वे अत्यन्त दुःखी हो गयीं और तत्काल उसे कोई उत्तर न दे सकीं ॥ ३० ॥ तदवस्थां तु तां दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं तदा । हाहाभूतमतीवासीद् भृशं च प्ररुरोद ह ॥ ३१ ॥ तब महारानीकी यह दयनीय अवस्था देख उस समय सारे अन्तःपुरमें हाहाकार मच गया। सब-के-सब फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३१ ॥ ततो भीमं महाराजं भार्या वचनमब्रवीत् । दमयन्ती तव सुता भर्तारमनुशोचति ॥ ३२ ॥ तदनन्तर महाराज भीमसे उनकी पत्नीने कहा—'प्राणनाथ! आपकी पुत्री दमयन्ती अपने पतिके लिये निरन्तर शोकमें डूबी रहती है ॥ ३२ ॥ अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती नृप । प्रयतन्तां तव प्रेष्याः पुण्यश्लोकस्य मार्गणे ॥ ३३ ॥ 'नरेश्वर! उसने लाज छोड़कर स्वयं अपने मुँहसे कहा है, अतः आपके सेवक पुण्यश्लोक महाराज नलका पता लगानेका प्रयत्न करें' ॥ ३३ ॥ तया प्रदेशितो राजा ब्राह्मणान् वशवर्तिनः । प्रास्थापयद् दिशः सर्वा यतध्वं नलमार्गणे ॥ ३४ ॥ महारानीसे प्रेरित हो राजा भीमने अपने अधीनस्थ ब्राह्मणोंको यह कहकर सब दिशाओंमें भेजा कि 'आपलोग नलको ढूँढ़नेकी चेष्टा करें' ॥ ३४ ॥ ततो विदर्भाधिपतेर्नियोगाद् ब्राह्मणास्तदा । दमयन्तीमथो सृत्वा प्रस्थिताःसमेत्याथाब्रुवन् ॥ ३५ ॥ तत्पश्चात् विदर्भनरेशकी आज्ञासे ब्राह्मणलोग प्रस्थित हो दमयन्तीके पास जाकर बोले—'राजकुमारी! हम सब नलका पता लगाने जा रहे हैं (क्या आपको कुछ कहना है?)' ॥ ३५ ॥
अथ तानब्रवीद् भैमी सर्वराष्ट्रेष्विदं वचः ।
ब्रुवध्वं जनसंसत्सु तत्र तत्र पुनः पुनः ॥ ३६ ॥
तब भीमकुमारीने उन ब्राह्मणोंसे कहा—'सब राष्ट्रोंमें घूम-घूमकर जनसमुदायमें आपलोग बार-बार मेरी यह बात बोलें— ॥ ३६ ॥
क्व नु त्वं कितवच्छित्त्वा वस्त्रार्धं प्रस्थितो मम ।
उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥ ३७ ॥
‘ओ जुआरी प्रियतम! तुम वनमें सोयी हुई और अपने पतिमें अनुराग रखनेवाली मुझ प्यारी पत्नीको छोड़कर तथा मेरे आधे वस्त्रको फाड़कर कहाँ चल दिये? ॥ ३७ ॥
सा वै यथा त्वया दृष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी ।
दह्यमाना भृशं बाला वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ॥ ३८ ॥
‘उसे तुमने जिस अवस्थामें देखा था, उसी अवस्थामें वह आज भी है और तुम्हारे आगमनकी प्रतीक्षा कर रही है। आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढँककर वह युवती तुम्हारी विरहाग्निमें निरन्तर जल रही है ॥ ३८ ॥
तस्या रुदत्याः सततं तेन शोकेन पार्थिव ।
प्रसादं कुरु वै वीर प्रतिवाक्यं ददस्व च ॥ ३९ ॥
‘वीर भूमिपाल! सदा तुम्हारे शोकसे रोती हुई अपनी उस प्यारी पत्नीपर पुनः कृपा करो और मुझे मेरी बातका उत्तर दो' ॥ ३९ ॥
एवमन्यच्च वक्तव्यं कृपां कुर्याद् यथा मयि । वायुना धूयमानो हि वनं दहति पावकः ॥ ४० ॥ ‘ब्राह्मणो! ये तथा और भी बहुत-सी ऐसी बातें आप कहें, जिससे वे मुझपर कृपा करें। वायुकी सहायतासे प्रज्वलित आग सारे वनको जला डालती है (इसी प्रकार विरहकी व्याकुलता मुझे जला रही है) ॥ ४० ॥ भर्तव्या रक्षणीया च पत्नी पत्या हि सर्वदा । तन्नष्टमुभयं कस्माद् धर्मज्ञस्य सतस्तव ॥ ४१ ॥ ‘प्राणनाथ! पतिको उचित है कि वह सदा अपनी पत्नीका भरण-पोषण एवं संरक्षण करे। आप धर्मज्ञ और साधु पुरुष हैं, आपके ये दोनों कर्तव्य सहसा नष्ट कैसे हो गये? ॥ ४१ ॥ ख्यातः प्राज्ञः कुलीनश्च सानुक्रोशो भवान् सदा । संवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसंक्षयात् ॥ ४२ ॥ ‘आप विख्यात विद्वान्, कुलीन और सदा सबके प्रति दयाभाव रखनेवाले हैं, परंतु मेरे हृदयमें यह संदेह होने लगा है कि आप मेरा भाग्य नष्ट होनेके कारण मेरे प्रति निर्दय हो गये हैं ॥ ४२ ॥ तत् कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ । आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥ ४३ ॥ ‘नरव्याघ्र! नरोत्तम! मुझपर दया करो। मैंने तुम्हारे ही मुखसे सुन रखा है कि दयालुता सबसे बड़ा धर्म है’ ॥ ४३ ॥ एवं ब्रुवाणान् यदि वः प्रतिब्रूयात् कथंचन । स नरः सर्वथा ज्ञेयः कश्चासौ क्व नु वर्तते ॥ ४४ ॥ ‘ब्राह्मणो! यदि आपके ऐसी बातें कहनेपर कोई किसी प्रकार भी आपको उत्तर दे तो उस मनुष्यका सब प्रकारसे परिचय प्राप्त कीजियेगा कि वह कौन है और कहाँ रहता है, इत्यादि ॥ ४४ ॥ यश्चैवं वचनं श्रुत्वा ब्रूयात् प्रतिवचो नरः । तदादाय वचस्तस्य ममावेद्यं द्विजोत्तमाः ॥ ४५ ॥ ‘विप्रवरो! आपके इन वचनोंको सुनकर जो कोई मनुष्य जैसा भी उत्तर दे, उसकी वह बात याद रखकर आपलोग मुझे बतावें ॥ ४५ ॥ यथा च वो न जानीयाद् ब्रुवतो मम शासनात् । पुनरागमनं चैव तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥ ४६ ॥ ‘किसीको भी यह नहीं मालूम होना चाहिये कि आपलोग मेरी आज्ञासे ये बातें कह रहे हैं। जब कोई उत्तर मिल जाय, तब आप आलस्य छोड़कर पुनः यहाँ तुरंत लौट आवें ॥ ४६ ॥
यदि वासौ समृद्धः स्याद् यदि वाप्यधनो भवेत् । यदि वाप्यसमर्थः स्याज्ज्ञेयमस्य चिकीर्षितम् ॥ ४७ ॥ ‘उत्तर देनेवाला पुरुष धनवान् हो या निर्धन, समर्थ हो या असमर्थ, वह क्या करना चाहता है, इस बातको जाननेका प्रयत्न कीजिये’ ॥ ४७ ॥ एवमुक्तास्त्वगच्छंस्ते ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् । नलं मृगयितुं राजंस्तदा व्यसनिनं तथा ॥ ४८ ॥ ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान् घोषांस्तथाऽऽश्रमान् । अन्वेषन्तो नलं राजन् नाधिजग्मुर्द्विजातयः ॥ ४९ ॥ राजन्! दमयन्तीके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण संकटमें पड़े हुए राजा नलको ढूँढ़नेके लिये सब दिशाओंकी ओर चले गये। युधिष्ठिर! उन ब्राह्मणोंने नगरों, राष्ट्रों, गाँवों, गोष्ठों तथा आश्रमोंमें भी नलका अन्वेषण किया; किंतु उन्हें कहीं भी उनका पता न लगा ॥ ४८-४९ ॥ तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशाम्पते । श्रावयांचक्रिरे विप्रा दमयन्त्या यथेरितम् ॥ ५० ॥ महाराज! दमयन्तीने जैसा बताया था, उस वाक्यको सभी ब्राह्मण भिन्न-भिन्न स्थानोंमें जाकर लोगोंको सुनाया करते थे ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलान्वेषणे एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी खोजविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 501)
सप्ततितमोऽध्यायः
पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना
बृहदश्व उवाच
अथ दीर्घस्य कालस्य पर्णादो नाम वै द्विजः ।
प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
**बृहदश्व मुनि कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर दीर्घ-कालके पश्चात् पर्णाद नामक ब्राह्मण विदर्भदेशकी राजधानीमें लौटकर आये और दमयन्तीसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
नैषधं मृगयानेन दमयन्ति मया नलम् ।
अयोध्यां नगरीं गत्वा भाङ्गासुरिमुपस्थितः ॥ २ ॥
'दमयन्ती! मैं निषधनरेश नलको ढूँढ़ता हुआ अयोध्या नगरीमें गया और वहाँ राजा ऋतुपर्णके दरबारमें उपस्थित हुआ ॥ २ ॥
श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं स महाजने ।
ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा नाब्रवीत् किंचिदृऋतुपर्णो नराधिपः ।
न च पार्षदः कश्चिद् भाष्यमाणो मयासकृत् ॥ ४ ॥
'वहाँ बहुत लोगोंकी भीड़में मैंने तुम्हारा वाक्य महाभाग ऋतुपर्णको सुनाया। वरवर्णिनि! उस बातको सुनकर राजा ऋतुपर्ण कुछ न बोले। मेरे बार-बार कहनेपर भी उनका कोई सभासद् भी इसका उत्तर न दे सका ॥ ३-४ ॥
अनुज्ञातं तु मां राज्ञा विजने कश्चिदब्रवीत् ।
ऋतुपर्णस्य पुरुषो बाहुको नाम नामतः ॥ ५ ॥
'परंतु ऋतुपर्णके यहाँ बाहुक नामधारी एक पुरुष है, उसने जब मैं राजासे विदा लेकर लौटने लगा, तब मुझसे एकान्तमें आकर तुम्हारी बातोंका उत्तर दिया ॥ ५ ॥
सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो ह्रस्वबाहुकः ।
शीघ्रयानेषु कुशलो मृष्टकर्ता च भोजने ॥ ६ ॥
'वह महाराज ऋतुपर्णका सारथि है। उसकी भुजाएँ छोटी हैं तथा वह देखनेमें कुरूप भी है। वह घोड़ोंको शीघ्र हाँकनेमें कुशल है और अपने बनाये हुए भोजनमें बड़ा मिठास उत्पन्न कर देता है ॥ ६ ॥
स विनिःश्वस्य बहुशो रुदित्वा च पुनः पुनः ।
कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत ।। ७ ।। ‘बाहुकने बार-बार लंबी साँसें खींचकर अनेक बार रोदन किया और मुझसे कुशल-समाचार पूछकर फिर वह इस प्रकार कहने लगा— ।। ७ ।। वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ।। ८ ।। ‘उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसा करके वे सत्य और स्वर्ग दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ।। ८ ।। रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन । प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ।। ९ ।। ‘श्रेष्ठ नारियाँ अपने पतियोंसे परित्यक्त होनेपर भी कभी क्रोध नहीं करतीं। वे सदाचाररूपी कवचसे आवृत प्राणोंको धारण करती हैं ।। ९ ।। विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च । यत् सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ।। १० ।। ‘वह पुरुष बड़े संकटमें था, सुखके साधनोंसे वंचित होकर किंकर्तव्यविमूढ हो गया था। ऐसी दशामें यदि उसने अपनी पत्नीका परित्याग किया है तो इसके लिये पत्नीको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ।। १० ।। प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः । आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ।। ११ ।। ‘जीविका पानेके लिये चेष्टा करते समय पक्षियोंने जिसके वस्त्रका अपहरण कर लिया था और जो अनेक प्रकारकी मानसिक चिन्ताओंसे दग्ध हो रहा था, उस पुरुषपर श्यामाको क्रोध नहीं करना चाहिये ।। ११ ।। सत्कृतासत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् । भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ।। १२ ।। ‘पतिने उसका सत्कार किया हो या असत्कार—उसे चाहिये कि पतिको वैसे संकटमें पड़ा देखकर उसे क्षमा कर दे; क्योंकि वह राज्य और लक्ष्मीसे वंचित हो भूखसे पीड़ित एवं विपत्तिके अथाह सागरमें डूबा हुआ था’ ।। १२ ।। तस्य तद् वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहागतः । श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय ।। १३ ।। ‘बाहुककी वह बात सुनकर मैं तुरंत यहाँ चला आया। यह सब सुनकर अब कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें तुम्हीं प्रमाण हो। (तुम्हारी इच्छा हो तो) महाराजको भी ये बातें सूचित कर दो’ ।। १३ ।। एतच्छ्रुत्वाश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशाम्पते । दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत ।। १४ ।।
युधिष्ठिर! पर्णादका यह कथन सुनकर दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उसने एकान्तमें जाकर अपनी मातासे कहा— ।। १४ ।।
अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कदाचन ।
त्वत्संनिधौ नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम् ।। १५ ।।
यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् ।
तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत् प्रियमिच्छसि ।। १६ ।।
'माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये। मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाऊँगी। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा ।। १५-१६ ।।
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु बान्धवान् ।
तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु मा चिरम् ।। १७ ।।
समानेतुं नलं मातरयोध्यां नगरीमितः ।
'जैसे सुदेवने मुझे यहाँ लाकर बन्धु-बान्धवोंसे शीघ्र मिला दिया, उसी मंगलमय उद्देश्यकी सिद्धिके लिये सुदेव ब्राह्मण फिर शीघ्र ही यहाँसे अयोध्या जायँ, देर न करें। माँ! वहाँ जानेका उद्देश्य है, महाराज नलको यहाँ ले आना' ।। १७ १/२ ।।
विश्रान्तं तु ततः पश्चात् पर्णादं द्विजसत्तमम् ।। १८ ।।
अर्चयामास वैदर्भी धनेनातीव भाविनी ।
नले चेहागते तत्र भूयो दास्यामि ते वसु ।। १९ ।।
इतनेहीमें विप्रवर पर्णाद जब विश्राम कर चुके, तब विदर्भराजकुमारी दमयन्तीने बहुत धन देकर उनका सत्कार किया और यह भी कहा—'महाराज नलके यहाँ पधारनेपर मैं आपको और भी धन दूँगी ।। १८-१९ ।।
त्वया हि मे बहु कृतं यदन्यो न करिष्यति ।
यद् भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ।। २० ।।
'विप्रवर! आपने मेरा बहुत बड़ा उपकार किया, जो दूसरा नहीं कर सकता; क्योंकि अब मैं अपने स्वामीसे शीघ्र ही मिल सकूँगी' ।। २० ।।
स एवमुक्तोऽथाश्वास्य आशीर्वादैः सुमङ्गलैः । गृहानुपययौ चापि कृतार्थः सुमहामनाः ॥ २१ ॥ दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अत्यन्त उदार हृदयवाले पर्णाद अपने परम मंगलमय आशीर्वादोंद्वारा उसे आश्वासन दे कृतार्थ हो अपने घर चले गये ॥ २१ ॥ ततः सुदेवमाभाष्य दमयन्ती युधिष्ठिर । अब्रवीत् संनिधौ मातुर्दुःखशोकसमन्विता ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर! तदनन्तर दमयन्तीने सुदेव ब्राह्मणको बुलाकर अपनी माताके समीप दुःख-शोकसे पीड़ित होकर कहा— ॥ २२ ॥ गत्वा सुदेव नगरीमयोध्यावासिनं नृपम् । ऋतुपर्णं वचो ब्रूहि सम्पतन्निव कामगः ॥ २३ ॥ ‘सुदेवजी! आप इच्छानुसार चलनेवाले द्रुतगामी पक्षीकी भाँति शीघ्रतापूर्वक अयोध्या नगरीमें जाकर वहाँके निवासी राजा ऋतुपर्णसे कहिये— ॥ २३ ॥ आस्थास्यति पुनर्भीमी दमयन्ती स्वयंवरम् । तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥ २४ ॥ ‘भीमकुमारी दमयन्ती पुनः स्वयंवर करेगी। वहाँ बहुत-से राजा और राजकुमार सब ओरसे जा रहे हैं ॥ २४ ॥ तथा च गणितः कालः श्वोभूते स भविष्यति ।
यदि सम्भावनीयं ते गच्छ शीघ्रमरिंदम ॥ २५ ॥
'उसके लिये समय नियत हो चुका है। कल ही स्वयंवर होगा। शत्रुदमन! यदि आपका वहाँ पहुँचना सम्भव हो तो शीघ्र जाइये ।। २५ ।।
सूर्योदये द्वितीयं सा भर्तारं वरयिष्यति ।
न हि स ज्ञायते वीरो नलो जीवति वा न वा ॥ २६ ॥
'कल सूर्योदय होनेके बाद वह दूसरे पतिका वरण कर लेगी; क्योंकि वीरवर नल जीवित हैं या नहीं, इसका कुछ पता नहीं लगता है' ।। २६ ।।
एवं तया यथोक्तो वै गत्वा राजानमब्रवीत् ।
ऋतुपर्णं महाराज सुदेवो ब्राह्मणस्तदा ॥ २७ ॥
महाराज! दमयन्तीके इस प्रकार बतानेपर सुदेव ब्राह्मणने राजा ऋतुपर्णके पास जाकर वही बात कही ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपुनःस्वयंवरकथने
सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीके पुनः स्वयंवरकी चर्चासे सम्बन्ध रखनेवाला सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।
अध्याय (पृष्ठ 506)
एकसप्ततितमोऽध्यायः
राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालन-कलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना
बृहदश्व उवाच
श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नराधिपः ।
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा बाहुकं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! सुदेवकी वह बात सुनकर राजा ऋतुपर्णने मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बाहुकसे कहा— ॥ १ ॥
विदर्भान् यातुमिच्छामि दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।
एकाह्ना हयतत्त्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक ॥ २ ॥
'बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ हो, यदि मेरी बात मानो तो मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें सम्मिलित होनेके लिये एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ' ॥ २ ॥
एवमुक्तस्य कौन्तेय तेन राज्ञा नलस्य ह ।
व्यदीर्यत मनो दुःखात् प्रदध्यौ च महामनाः ॥ ३ ॥
कुन्तीनन्दन! राजा ऋतुपर्णके ऐसा कहनेपर राजा नलका मन अत्यन्त दुःखसे विदीर्ण होने लगा। महामना नल बहुत देरतक किसी भारी चिन्तामें निमग्न हो गये ॥ ३ ॥
दमयन्ती वदेदेतत् कुर्याद् दुःखेन मोहिता ।
अस्मदर्थे भवेद् वायमुपायश्चिन्तितो महान् ॥ ४ ॥
वे सोचने लगे—'क्या दमयन्ती ऐसी बात कह सकती है? अथवा सम्भव है, दुःखसे मोहित होकर वह ऐसा कार्य कर ले। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसने मेरी प्राप्तिके लिये यह महान् उपाय सोच निकाला हो? ॥ ४ ॥
नृशंसं बत वैदर्भी भर्तुकामा तपस्विनी ।
मया क्षुद्रेण निकृता कृपणा पापबुद्धिना ॥ ५ ॥
स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः ।
स्यादेवमपि कुर्यात् सा विवासाद् गतसौहृदा ॥ ६ ॥
'तपस्विनी एवं दीन विदर्भराजकुमारीको मुझ नीच एवं पापबुद्धि पुरुषने धोखा दिया है, इसीलिये वह ऐसा निष्ठुर कार्य करनेको उद्यत हो गयी। संसारमें स्त्रीका चंचल स्वभाव
प्रसिद्ध है। मेरा अपराध भी भयंकर है। सम्भव है मेरे प्रवाससे उसका हार्दिक स्नेह कम हो गया हो, अतः वह ऐसा भी कर ले ।। ५-६ ।।
मम शोकेन संविग्ना नैराश्यात् तनुमध्यमा ।
नैवं सा कर्हिचित् कुर्यात् सापत्या च विशेषतः ।। ७ ।।
‘क्योंकि पतली कमरवाली वह युवती मेरे शोकसे अत्यन्त उद्विग्न हो उठी होगी और मेरे मिलनेकी आशा न होनेके कारण उसने ऐसा विचार कर लिया होगा, परंतु मेरा हृदय कहता है कि वह कभी ऐसा नहीं कर सकती। विशेषतः वह संतानवती है। इसलिये भी उससे ऐसी आशा नहीं की जा सकती ।। ७ ।।
यदत्र सत्यं वासत्यं गत्वा वेत्स्यामि निश्चयम् ।
ऋतुपर्णस्य वै काममात्मार्थं च करोम्यहम् ।। ८ ।।
‘इसमें कितना सत्य या असत्य है—इसे मैं वहाँ जाकर ही निश्चितरूपसे जान सकूँगा, अतः मैं अपने लिये ही ऋतुपर्णकी इस कामनाको पूर्ण करूँगा’ ।। ८ ।।
इति निश्चित्य मनसा बाहुको दीनमानसः ।
कृताञ्जलिरुवाचेदमृतुपर्णं जनाधिपम् ।। ९ ।।
प्रतिजानामि ते वाक्यं गमिष्यामि नराधिप ।
एकाह्ना पुरुषव्याघ्र विदर्भनगरीं नृप ।। १० ।।
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके दीनहृदय बाहुकने दोनों हाथ जोड़कर राजा ऋतुपर्णसे इस प्रकार कहा—‘नरेश्वर! पुरुषसिंह! मैंने आपकी आज्ञा सुनी है, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें आपके साथ जा पहुँचूँगा’ ।। ९-१० ।।
ततः परीक्षामश्वानां चक्रे राजन् स बाहुकः ।
अश्वशालामुपागम्य भार्ङ्गासुरिन्नृपाज्ञया ।। ११ ।।
युधिष्ठिर! तदनन्तर बाहुकने अश्वशालामें जाकर राजा ऋतुपर्णकी आज्ञासे अश्वोंकी परीक्षा की ।। ११ ।।
स त्वर्यमाणो बहुश ऋतुपर्णेन बाहुकः ।
अश्वाञ्जिज्ञासमानो वै विचार्य च पुनः पुनः ।
अध्यगच्छत् कृशानश्वान् समर्थानध्वनि क्षमान् ।। १२ ।।
ऋतुपर्ण बाहुकको बार-बार उत्तेजित करने लगे, अतः उसने अच्छी तरह विचार करके अश्वोंकी परीक्षा कर ली और ऐसे अश्वोंको चुना, जो देखनेमें दुबले होनेपर भी मार्ग तय करनेमें शक्तिशाली एवं समर्थ थे ।। १२ ।।
तेजोबलसमायुक्तान् कुलशीलसमन्वितान् ।
वर्जिताँल्लक्षणैर्हीनैः पृथुप्रोथान् महाहनून् ।। १३ ।।
वे तेज और बलसे युक्त थे। वे अच्छी जातिके और अच्छे स्वभावके थे। उनमें अशुभ लक्षणोंका सर्वथा अभाव था। उनकी नाक मोटी और थूथन (ठोड़ी) चौड़ी थी ।। १३ ।।
शुद्धान् दशभिरावर्तैः सिन्धुजान् वातरंहसः । दृष्ट्वा तानब्रवीद् राजा किंचित् कोपसमन्वितः ॥ १४ ॥ वे वायुके समान वेगशाली सिन्धुदेशके घोड़े थे। वे दस आवर्त (भँवरियों)-के चिह्नोंसे युक्त होनेके कारण निर्दोष थे। उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्णने कुछ कुपित होकर कहा— ॥ १४ ॥ किमिदं प्रार्थितं कर्तुं प्रलब्धव्या न ते वयम् । कथमल्पबलप्राणा वक्ष्यन्तीमे हया मम । महदध्वानमपि च गन्तव्यं कथमीदृशैः ॥ १५ ॥ 'क्या तुमसे ऐसे ही घोड़े चुननेके लिये कहा था, तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे हो। ये अल्प बल और शक्तिवाले घोड़े कैसे मेरा इतना बड़ा रास्ता तय कर सकेंगे? ऐसे घोड़ोंसे इतनी दूरतक रथ कैसे ले जाया जायगा?' ॥ १५ ॥
बाहुक उवाच एको ललाटे द्वौ मूर्ध्नि द्वौ द्वौ पार्श्वोपपार्श्वयोः । द्वौ द्वौ वक्षसि विज्ञेयौ प्रयाणे चैक एव तु ॥ १६ ॥ बाहुकने कहा—राजन्! ललाटमें एक, मस्तकमें दो, पार्श्वभागमें दो, उपपार्श्वभागमें भी दो, छातीमें दोनों ओर दो दो और पीठमें एक—इस प्रकार कुल बारह भँवरियोंको पहचानकर घोड़े रथमें जोतने चाहिये ॥ १६ ॥ एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान् नात्र संशयः । यानन्यान् मन्यसे राजन् ब्रूहि तान् योजयामि ते ॥ १७ ॥ ये मेरे चुने हुए घोड़े अवश्य विदर्भदेशकी राजधानीतक पहुँचेंगे, इसमें संशय नहीं है। महाराज! इन्हें छोड़कर आप जिनको ठीक समझें, उन्हींको मैं रथमें जोत दूँगा ॥ १७ ॥
ऋतुपर्ण उवाच त्वमेव हयतत्त्वज्ञः कुशलो ह्यसि बाहुक । यान् मन्यसे समर्थांस्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय ॥ १८ ॥ ऋतुपर्ण बोले—बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ और कुशल हो, अतः तुम जिन्हें इस कार्यमें समर्थ समझो, उन्हींको शीघ्र जोतो ॥ १८ ॥ ततः सदश्वांश्चतुरः कुलशीलसमन्वितान् । योजयामास कुशलो जवयुक्तान् रथे नलः ॥ १९ ॥ तब चतुर एवं कुशल राजा नलने अच्छी जाति और उत्तम स्वभावके चार वेगशाली घोड़ोंको रथमें जोता ॥ १९ ॥ ततो युक्तं रथं राजा समारोहत् त्वरान्वितः । अथ पर्यपतन् भूमौ जानुभिस्ते हयोत्तमाः ॥ २० ॥
जुते हुए रथपर राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ सवार हुए। इसलिये उनके चढ़ते ही वे उत्तम घोड़े घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २० ॥ ततो नरवरः श्रीमान् नलो राजा विशाम्पते । सान्त्वयामास तानश्वांस्तेजोबलसमन्वितान् ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर! तब नरश्रेष्ठ श्रीमान् राजा नलने तेज और बलसे सम्पन्न उन घोड़ोंको पुचकारा ॥ २१ ॥ रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष सः । सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम् ॥ २२ ॥ ते चोद्यमाना विधिवद् बाहुकेन हयोत्तमाः । समुत्पेतुरथाकाशं रथिनं मोहयन्निव ॥ २३ ॥ फिर अपने हाथमें बागडोर ले उन्हें काबूमें करके रथको आगे बढ़ानेकी इच्छा की। वार्ष्णेय सारथिको रथपर बैठाकर अत्यन्त वेगका आश्रय ले उन्होंने रथ हाँक दिया। बाहुकके द्वारा विधिपूर्वक हाँके जाते हुए वे उत्तम अश्व रथीको मोहित—से करते हुए इतने तीव्र वेगसे चले, मानो आकाशमें उड़ रहे हों ॥ २२-२३ ॥
तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान् वहतो वातरंहसः ।
अयोध्याधिपतिः श्रीमान् विस्मयं परमं ययौ ॥ २४ ॥
उस प्रकार वायुके समान वेगसे रथका वहन करनेवाले उन अश्वोंको देखकर श्रीमान् अयोध्यानरेशको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २४ ॥
रथघोषं तु तं श्रुत्वा हयसंग्रहणं च तत् ।
वार्ष्णेयश्चिन्तयामास बाहुकस्य हयज्ञताम् ॥ २५ ॥
किं नु स्यान्मातलिरयं देवराजस्य सारथिः ।
तथा तल्लक्षणं वीरे बाहुके दृश्यते महत् ॥ २६ ॥
रथकी आवाज सुनकर और घोड़ोंको काबूमें करनेकी वह कला देखकर वार्ष्णेयने बाहुकके अश्व-विज्ञानपर सोचना आरम्भ किया। 'क्या यह देवराज इन्द्रका सारथि मातलि है? इस वीर बाहुकमें मातलिक-सा ही महान् लक्षण देखा जाता है ॥ २५-२६ ॥
शालिहोत्रोऽथ किं नु स्याद्धयानां कुलतत्त्ववित् ।
मानुषं समनुप्राप्तो वपुः परमशोभनम् ॥ २७ ॥
'अथवा घोड़ोंकी जाति और उनके विषयकी तात्त्विक बातें जाननेवाले ये आचार्य शालिहोत्र तो नहीं हैं, जो परम सुन्दर मानव शरीर धारण करके यहाँ आ पहुँचे हैं ॥ २७ ॥
उताहोस्विद् भवेद् राजा नलः परपुरंजयः ।
सोऽयं नृपतिरायात इत्येवं समचिन्तयत् ॥ २८ ॥
'अथवा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले साक्षात् राजा नल ही तो इस रूपमें नहीं आ गये हैं? अवश्य वे ही हैं, इस प्रकार वार्ष्णेयने चिन्तन करना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥
अथ चेह नलो विद्यां वेत्ति तामेव बाहुकः ।
तुल्यं हि लक्ष्यते ज्ञानं बाहुकस्य नलस्य च ॥ २९ ॥
'राजा नल इस जगत्में जिस विद्याको जानते हैं, उसीको बाहुक भी जानता है। बाहुक और नल दोनोंका ज्ञान मुझे एक-सा दिखायी देता है ॥ २९ ॥
अपि चेदं वयस्तुल्यं बाहुकस्य नलस्य च ।
नायं नलो महावीर्यस्तद्विद्यश्च भविष्यति ॥ ३० ॥
'इसी प्रकार बाहुक और नलकी अवस्था भी एक है। यह महापराक्रमी राजा नल नहीं है तो भी उनके ही समान विद्वान् कोई दूसरा महापुरुष होगा ॥ ३० ॥
प्रच्छन्ना हि महात्मानश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् ।
दैवेन विधिना युक्ताः शास्त्रोक्तैश्च निरूपणैः ॥ ३१ ॥
'बहुत-से महात्मा प्रच्छन्न रूप धारण करके देवोचित विधि तथा शास्त्रोक्त नियमोंसे युक्त होकर इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ ३१ ॥
भवेन्न मतिभेदो मे गात्रवैरूप्यतां प्रति ।
प्रमाणात् परिहीनस्तु भवेदिति मतिर्मम ॥ ३२ ॥
'इसके शरीरकी रूपहीनताको लक्ष्य करके मेरी बुद्धिमें यह भेद नहीं पैदा होता कि यह नल नहीं है, परंतु राजा नलकी जो मोटाई है, उससे यह कुछ दुबला-पतला है। उससे मेरे मनमें यह विचार होता है कि सम्भव है, यह नल न हो ।। ३२ ।। वयःप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः । नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये बाहुकमन्ततः ॥ ३३ ॥ 'इसकी अवस्थाका प्रमाण तो उन्हींके समान है, परंतु रूपकी दृष्टिसे तो अन्तर पड़ता है। फिर भी अन्ततः मैं इसी निर्णयपर पहुँचता हूँ कि मेरी रायमें बाहुक सर्वगुणसम्पन्न राजा नल ही हैं' ।। ३३ ।। एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेयः पर्यचिन्तयत् । हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ॥ ३४ ॥ महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पुण्यश्लोक नलके सारथि वार्ष्णेयने बार-बार उपर्युक्त रूपसे विचार करते हुए मन-ही-मन उक्त धारणा बना ली ।। ३४ ।। ऋतुपर्णश्च राजेन्द्रो बाहुकस्य हयज्ञताम् । चिन्तयन् मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः ॥ ३५ ॥ महाराज ऋतुपर्ण भी बाहुकके अश्वसंचालन-विषयक ज्ञानपर विचार करके वार्ष्णेय सारथिके साथ बहुत प्रसन्न हुए ।। ३५ ।। ऐकाग्र्यं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत् । परं यत्नं च सम्प्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह ॥ ३६ ॥ उसकी वह एकाग्रता, वह उत्साह, घोड़ोंको काबूमें रखनेकी वह कला और वह उत्तम प्रयत्न देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ।। ३६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णविदर्भगमने एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋतुपर्णका विदर्भदेशमें गमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
स नदीः पर्वतांश्चैव वनानि च सरांसि च ।
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना
बृहदश्व उवाच
स नदीः पर्वतांश्चैव वनानि च सरांसि च ।
अचिरेणातिचक्राम खेचरः खे चरन्निव ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! जैसे पक्षी आकाशमें उड़ता है, उसी प्रकार बाहुक (बड़े वेगसे) शीघ्रतापूर्वक कितनी ही नदियों, पर्वतों, वनों और सरोवरोंको लाँघता हुआ आगे बढ़ने लगा ॥ १ ॥
तथा प्रयाते तु रथे तदा भाङ्गासुरिर्नृपः ।
उत्तरीयमधोऽपश्यद् भ्रष्टं परपुरंजयः ॥ २ ॥
जब रथ इस प्रकार तीव्र गतिसे दौड़ रहा था, उसी समय शत्रुओंके नगरोंको जीतनेवाले राजा ऋतुपर्णने देखा, उनका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर गया है ॥ २ ॥
ततः स त्वरमाणस्तु पटे निपतिते तदा ।
ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामनाः ॥ ३ ॥
निगृह्णीष्व महाबुद्धे हयानेतान् महाजवान् ।
वार्ष्णेयो यावदेनं मे पटमानयतामिह ॥ ४ ॥
उस समय वस्त्र गिर जानेपर उन महामना नरेशने बड़ी उतावलीके साथ नलसे कहा—‘महामते! इस वेगशाली घोड़ोंको (थोड़ी देरके लिये) रोक लो। मैं अपनी गिरी हुई चादर लूँगा। जबतक यह वार्ष्णेय उतरकर मेरे उत्तरीय वस्त्रको ला दे, तबतक रथको रोके रहो’ ॥ ३-४ ॥
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तव ।
योजनं समतिक्रान्तो नाहर्तुं शक्यते पुनः ॥ ५ ॥
यह सुनकर नलने उसे उत्तर दिया—‘महाराज! आपका वस्त्र बहुत दूर गिरा है। मैं उस स्थानसे चार कोस आगे आ गया हूँ। अब फिर वह नहीं लाया जा सकता’ ॥ ५ ॥
एवमुक्तो नलेनाथ तदा भाङ्गासुरिर्नृपः ।
आससाद वने राजन् फलवन्तं बिभीतकम् ॥ ६ ॥
राजन्! नलके ऐसा कहनेपर राजा ऋतुपर्ण चुप हो गये। अब वे एक वनमें एक बहेड़ेके वृक्षके पास आ पहुँचे, जिसमें बहुत-से फल लगे थे ॥ ६ ॥ तं दृष्ट्वा बाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभाषत । ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम् ॥ ७ ॥ उस वृक्षको देखकर राजा ऋतुपर्णने तुरंत ही बाहुकसे कहा—‘सूत! तुम देखो, मुझमें भी गणना करने (हिसाब लगाने) की कितनी अद्भुत शक्ति है ॥ ७ ॥ सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन । नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ॥ ८ ॥ ‘सब लोग सभी बातें नहीं जानते। संसारमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तथा एक ही पुरुषमें सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रतिष्ठा नहीं है ॥ ८ ॥ वृक्षेऽस्मिन् यानि पर्णानि फलान्यपि च बाहुक । पतितान्यपि यान्यत्र तत्रैकमधिकं शतम् ॥ ९ ॥ एकपत्राधिकं चात्र फलमेकं च बाहुक । पञ्चकोट्योऽथ पत्राणां द्वयोरपि च शाखयोः ॥ १० ॥ प्रचिनुह्यस्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्याः प्रशाखिकाः । आभ्यां फलसहस्रे द्वे पञ्चोनं शतमेव च ॥ ११ ॥ ‘बाहुक! इस वृक्षपर जितने पत्ते और फल हैं, उन सबको मैं बताता हूँ। पेड़के नीचे जो पत्ते और फल गिरे हुए हैं, उनकी संख्या एक सौ अधिक है, इसके सिवा एक पत्र तथा एक फल और भी अधिक है; अर्थात् नीचे गिरे हुए पत्तों और फलोंकी संख्या वृक्षमें लगे हुए पत्तों और फलोंसे एक सौ दो अधिक है। इस वृक्षकी दोनों शाखाओंमें पाँच करोड़ पत्ते हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो इन दोनों शाखाओं तथा इसकी अन्य प्रशाखाओं (को काटकर उन)-के पत्ते गिन लो। इसी प्रकार इन शाखाओंमें दो हजार पंचानबे फल लगे हुए हैं ॥ ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुकोऽब्रवीत् । परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन ॥ १२ ॥ प्रत्यक्षमेतत् कर्तास्मि शातयित्वा बिभीतकम् । अथात्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता ॥ १३ ॥ प्रत्यक्षं ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम् । अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा ॥ १४ ॥ यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा—‘शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको काटूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं ॥ १२—१४ ॥
संख्यास्यामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप । मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन् यच्छतु वाजिनाम् ॥ १५ ॥ 'जनेश्वर! यदि वार्ष्णेय दो घड़ीतक भी इन घोड़ोंकी लगाम सँभाले तो मैं आपके देखते-देखते इसके फलोंको गिन लूँगा' ॥ १५ ॥ तमब्रवीन्नृपः सूतं नायं कालो विलम्बितुम् । बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थितः ॥ १६ ॥ प्रतीक्षस्व मुहूर्तं त्वमथवा त्वरते भवान् । एष याति शिवः पन्था याहि वार्ष्णेयसारथिः ॥ १७ ॥ तब राजाने सारथिसे कहा—'यह विलम्ब करनेका समय नहीं है।' बाहुक बोला—'मैं प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही गणना समाप्त कर दूँगा। आप दो ही घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये। अथवा यदि आपको बड़ी जल्दी हो तो यह विदर्भदेशका मंगलमय मार्ग है, वार्ष्णेयको सारथि बनाकर चले जाइये' ॥ १६-१७ ॥ अब्रवीदृतुपर्णस्तु सान्त्वयन् कुरुनन्दन । त्वमेव यन्ता नान्योऽस्ति पृथिव्यामपि बाहुक ॥ १८ ॥ कुरुनन्दन! तब ऋतुपर्णने उसे सान्त्वना देते हुए कहा—'बाहुक! तुम्हीं इन घोड़ोंको हाँक सकते हो। इस कलामें पृथ्वीपर तुम्हारे जैसा दूसरा कोई नहीं है ॥ १८ ॥ त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान् हयकोविद । शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि न विघ्नं कर्तुमर्हसि ॥ १९ ॥ 'घोड़ोंके रहस्यको जाननेवाले बाहुक! तुम्हारे ही प्रयत्नसे मैं विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ। देखो, तुम्हारी शरणमें आया हूँ। इस कार्यमें विघ्न न डालो ॥ १९ ॥ कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक । विदर्भान् यदि यात्वाद्य सूर्यं दर्शयितासि मे ॥ २० ॥ 'बाहुक! यदि आज विदर्भदेशमें पहुँचकर तुम मुझे सूर्यका दर्शन करा सको तो तुम जो कहोगे, तुम्हारी वही इच्छा पूर्ण करूँगा' ॥ २० ॥ अथाब्रवीद् बाहुकस्तं संख्याय च बिभीतकम् । ततो विदर्भान् यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम ॥ २१ ॥ यह सुनकर बाहुकने कहा—'मैं बहेड़ेके फलोंको गिनकर विदर्भदेशको चलूँगा। आप मेरी यह बात मान लीजिये' ॥ २१ ॥ अकाम इव तं राजा गणयस्वेत्युवाच ह । एकदेशं च शाखायाः समादिष्टं मयानघ ॥ २२ ॥ गणयस्वाश्वतत्त्वज्ञ ततस्त्वं प्रीतिमावह । सोऽवतीर्य रथात् तूर्णं शातयामास तं द्रुमम् ॥ २३ ॥
राजाने मानो अनिच्छासे कहा—‘अच्छा, गिन लो। अश्वविद्याके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप बाहुक! मेरे बताये अनुसार तुम शाखाके एक ही भागको गिनो। इससे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी’। बाहुकने रथसे उतरकर तुरंत ही उस वृक्षको काट डाला ॥ २२-२३ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमब्रवीत् । गणयित्वा यथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु ॥ २४ ॥ गिननेसे उसे उतने ही फल मिले। तब उसने विस्मित होकर राजा ऋतुपर्णसे कहा — ॥ २४ ॥ अत्यद्भुतमिदं राजन् दृष्टवानस्मि ते बलम् । श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययैतज्ज्ञायते नृप ॥ २५ ॥ तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप । विद्ध्यक्षहृदयज्ञं मां संख्याने च विशारदम् ॥ २६ ॥ ‘राजन्! आपमें गणितकी यह अद्भुत शक्ति मैंने देखी है। नराधिप! जिस विद्यासे यह गिनती जान ली जाती है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।’ राजा तुरंत जानेके लिये उत्सुक थे, अतः उन्होंने बाहुकसे कहा—‘तुम मुझे द्यूत-विद्याका मर्मज्ञ और गणितमें अत्यन्त निपुण समझो’ ॥ २५-२६ ॥ बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम । मत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ बाहुकने कहा—‘पुरुषश्रेष्ठ! तुम यह विद्या मुझे बतला दो और बदलेमें मुझसे भी अश्व-विद्याका रहस्य ग्रहण कर लो’ ॥ २७ ॥ ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुकं कार्यगौरवात् । हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यब्रवीद् वचः ॥ २८ ॥ तब राजा ऋतुपर्णने कार्यकी गुरुता और अश्व-विज्ञानके लोभसे बाहुकको आश्वासन देते हुए कहा—‘तथास्तु’ ॥ २८ ॥ यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् । निक्षेपो मेऽश्वहृदयं त्वयि तिष्ठतु बाहुक । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वै ॥ २९ ॥ ‘बाहुक! तुम मुझसे द्यूत-विद्याका गूढ़ रहस्य ग्रहण करो और अश्वविज्ञानको मेरे लिये अपने ही पास धरोहरके रूपमें रहने दो।’ ऐसा कहकर ऋतुपर्णने नलको अपनी विद्या दे दी ॥ २९ ॥ तस्याक्षहृदयज्ञस्य शरीरात्रिःसृतः कलिः । कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात् सततमुद्वमन् ॥ ३० ॥ कलेस्तस्य तदार्तस्य शापाग्निः स विनिःसृतः । स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान् ॥ ३१ ॥