महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
एकत्रिशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध तथा अश्वत्थामाके द्वारा राजा नीलका वध
धृतराष्ट्र उवाच
तेष्वनीकेषु भग्नेषु पाण्डुपुत्रेण संजय ।
चलितानां द्रुतानां च कथमासीन्मनो हि वः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! पाण्डुपुत्र अर्जुनके द्वारा पराजित हो जब सारी सेनाएँ भाग खड़ी हुईं, उस समय विचलित हो पलायन करते हुए तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हो रही थी? ॥ १ ॥
अनीकानां प्रभग्नानामवस्थानमपश्यताम् ।
दुष्करं प्रतिसंधानं तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥
भागती हुई सेनाओंको जब अपने ठहरनेके लिये कोई स्थान नहीं दिखायी देता हो, उस समय उन सबको संगठित करके एक स्थानपर ले आना बड़ा कठिन काम होता है। अतः संजय! तुम मुझे वह सब समाचार ठीक-ठीक बताओ ॥ २ ॥
संजय उवाच
तथापि तव पुत्रस्य प्रियकामा विशाम्पते ।
यशः प्रवीरा लोकेषु रक्षन्तो द्रोणमन्वयुः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**प्रजानाथ! यद्यपि सेनाओंमें भगदड़ पड़ गयी थी, तथापि बहुत-से विश्वविख्यात वीरोंने आपके पुत्रका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर अपने यशकी रक्षा करते हुए उस समय द्रोणाचार्यका साथ दिया ॥ ३ ॥
समुद्यतेषु चास्त्रेषु सम्प्राप्ते च युधिष्ठिरे ।
अकुर्वन्नार्यकर्माणि भैरवे सत्यभीतवत् ॥ ४ ॥
अन्तरं भीमसेनस्य प्रापतन्नमितौजसः ।
सात्यकेश्चैव वीरस्य धृष्टद्युम्नस्य वा विभो ॥ ५ ॥
प्रभो! वह भयंकर संग्राम छिड़ जानेपर समस्त योद्धा निर्भय-से होकर आर्यजनोचित पुरुषार्थ प्रकट करने लगे। जब सब ओरसे हथियार उठे हुए थे और राजा युधिष्ठिर सामने आ पहुँचे थे, उस दशामें भीमसेन, सात्यकि अथवा वीर धृष्टद्युम्नकी असावधानीका लाभ उठाकर अमिततेजस्वी कौरवयोद्धा पाण्डव-सेनापर टूट पड़े ॥ ४-५ ॥
द्रोणं द्रोणमिति क्रूराः पञ्चालाः समचोदयन् ।
मा द्रोणमिति पुत्रास्ते कुरून् सर्वानचोदयन् ॥ ६ ॥
क्रूर स्वभाववाले पांचालसैनिक एक-दूसरेको प्रेरित करने लगे, अरे! द्रोणाचार्यको पकड़ लो, द्रोणाचार्यको बंदी बना लो और आपके पुत्र समस्त कौरवोंको आदेश दे रहे थे कि देखना, द्रोणाचार्यको शत्रु पकड़ न पावें ॥ ६ ॥
द्रोणं द्रोणमिति ह्येके मा द्रोणमिति चापरे ।
कुरूणां पाण्डवानां च द्रोणद्यूतमवर्तत ॥ ७ ॥
एक ओरसे आवाज आती थी 'द्रोणको पकड़ो, द्रोणको पकड़ो।' दूसरी ओरसे उत्तर मिलता, 'द्रोणाचार्यको कोई नहीं पकड़ सकता।' इस प्रकार द्रोणाचार्यको दाँवपर रखकर कौरव और पाण्डवोंमें युद्धका जूआ आरम्भ हो गया था ॥ ७ ॥
यं यं प्रमथते द्रोणः पञ्चालानां रथव्रजम् ।
तत्र तत्र तु पाञ्चाल्यो धृष्टद्युम्नोऽभ्यवर्तत ॥ ८ ॥
पांचालोंके जिस-जिस रथसमुदायको द्रोणाचार्य मथ डालनेका प्रयत्न करते, वहाँ-वहाँ पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न उनका सामना करनेके लिये आ जाता था ॥ ८ ॥
तथा भागविपर्यासैः संग्रामे भैरवे सति ।
वीराः समासदन् वीरान् कुर्वन्तो भैरवं रवम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार भागविपर्ययद्वारा भयंकर संग्राम आरम्भ होनेपर भैरव-गर्जना करते हुए उभय पक्षके वीरोंने विपक्षी वीरोंपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥
अकम्पनीयाः शत्रूणां बभूवुस्तत्र पाण्डवाः ।
अकम्पयन्ननीकानि स्मरन्तः क्लेशमात्मनः ॥ १० ॥
उस समय पाण्डवोंको शत्रुदलके लोग विचलित न कर सके। वे अपनेको दिये गये क्लेशोंको याद करके आपके सैनिकोंको कँपा रहे थे ॥ १० ॥
ते त्वमर्षवशं प्राप्ता ह्रीमन्तः सत्त्वचोदिताः ।
त्यक्त्वा प्राणान् न्यवर्तन्त घ्नन्तो द्रोणं महाहवे ॥ ११ ॥
पाण्डव लज्जाशील, सत्त्वगुणसे प्रेरित और अमर्षके अधीन हो रहे थे। वे प्राणोंकी परवा न करके उस महान् समरमें द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये लौट रहे थे ॥ ११ ॥
अयसामिव सम्पातः शिलानामिव चाभवत् ।
दीव्यतां तुमुले युद्धे प्राणैरमिततेजसाम् ॥ १२ ॥
उस भयंकर युद्धमें प्राणोंकी बाजी लगाकर खेलनेवाले अमिततेजस्वी वीरोंका संघर्ष लोहों तथा पत्थरोंके परस्पर टकरानेके समान भयंकर शब्द करता था ॥ १२ ॥
न तु स्मरन्ति संग्राममपि वृद्धास्तथाविधम् ।
दृष्टपूर्वं महाराज श्रुतपूर्वमथापि वा ॥ १३ ॥
महाराज! बड़े-बूढ़े लोग भी पहलेके देखे अथवा सुने हुए किसी भी वैसे संग्रामका स्मरण नहीं करते हैं ॥ १३ ॥
प्राकम्पतेव पृथिवी तस्मिन् वीरावसादने ।
निवर्तता बलौघेन महता भारपीडिता ॥ १४ ॥
वीरोंका विनाश करनेवाले उस युद्धमें लौटते हुए विशाल सैनिकसमूहके महान् भारसे पीड़ित हो यह पृथ्वी काँपने-सी लगी ॥ १४ ॥
घूर्णतोऽपि बलौघस्य दिवं स्तब्ध्वेव निःस्वनः ।
अजातशत्रोस्तत्सैन्यमाविवेश सुभैरवः ॥ १५ ॥
वहाँ सब ओर चक्कर काटते हुए सैन्यसमूहका अत्यन्त भयंकर कोलाहल आकाशको स्तब्ध-सा करके अजातशत्रु युधिष्ठिरकी सेनामें व्याप्त हो गया ॥ १५ ॥
समासाद्य तु पाण्डूनामनीकानि सहस्रशः ।
द्रोणेन चरता संख्ये प्रभग्नानि शितैः शरैः ॥ १६ ॥
रणभूमिमें विचरते हुए द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनामें प्रवेश करके अपने तीखे बाणोंद्वारा सहस्रों सैनिकोंके पाँव उखाड़ दिये ॥ १६ ॥
तेषु प्रमथ्यमानेषु द्रोणेनाद्भुतकर्मणा ।
पर्यवारयदासाद्य द्रोणं सेनापतिः स्वयम् ॥ १७ ॥
अद्भुत पराक्रम करनेवाले द्रोणाचार्यके द्वारा जब उन सेनाओंका मन्थन होने लगा, उस समय स्वयं सेनापति धृष्टद्युम्नने द्रोणके पास पहुँचकर उन्हें रोका ॥ १७ ॥
तदद्भुतमभूद् युद्धं द्रोणपाञ्चालयोस्तथा ।
नैव तस्योपमा काचिदिति मे निश्चिता मतिः ॥ १८ ॥
वहाँ द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नमें अद्भुत युद्ध होने लगा, जिसकी कहीं कोई तुलना नहीं थी, यह मेरा निश्चित मत है ॥ १८ ॥
ततो नीलोऽनलप्रख्यो ददाह कुरुवाहिनीम् ।
शरस्फुलिङ्गश्चापार्चिर्दहन् कक्षमिवानलः ॥ १९ ॥
तदनन्तर अग्निके समान कान्तिमान् नील बाणरूपी चिनगारियों तथा धनूषरूपी लपटोंका विस्तार करते हुए कौरव-सेनाको दग्ध करने लगे, मानो आग घास-फूसके ढेरको जला रही हो ॥ १९ ॥
तं दहन्तमनीकानि द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
पूर्वाभिभाषी सुश्लक्ष्णं स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ २० ॥
राजा नीलको कौरव-सेनाका दहन करते देख प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने, जो पहले स्वयं ही वार्तालाप आरम्भ करनेवाला था, मुसकराते हुए मधुर वचनोंमें कहा— ॥ २० ॥
नील किं बहुभिर्दग्धैस्तव योधैः शरार्चिषा ।
मयैकेन हि युध्यस्व क्रुद्धः प्रहर चाशु माम् ॥ २१ ॥
‘नील! तुमको बाणोंकी ज्वालासे इन बहुत-से योद्धाओंको दग्ध करनेसे क्या लाभ? तुम अकेले मुझसे ही युद्ध करो और कुपित होकर मेरे ऊपर शीघ्र प्रहार करो’ ॥ २१ ॥
तं पद्मनिकराकारं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ।
व्याकोशपद्माभमुखो नीलो विव्याध सायकैः ॥ २२ ॥ नीलका मुख विकसित कमलके समान कान्तिमान् था। उन्होंने पद्मसमूहकी-सी आकृति तथा कमल-दलके सदृश नेत्रोंवाले अश्वत्थामाको अपने बाणोंसे बींध डाला ॥ २२ ॥
तेनापि विद्धः सहसा दौणिर्भल्लैः शितैस्त्रिभिः । धनुर्ध्वजं च छत्रं च द्विषतः स न्यकृन्तत ॥ २३ ॥ उनके द्वारा घायल होकर अश्वत्थामाने सहसा तीन तीखे भल्लोंद्वारा अपने शत्रु नीलके धनुष, ध्वज तथा छत्रको काट डाला ॥ २३ ॥
स प्लुतः स्यन्दनात्तस्मान्नीलश्चर्मवरासिभृत् । द्रौणायनेः शिरः कायाद्धर्तुमैच्छत् पतत्रिवत् ॥ २४ ॥ तब नील ढाल और सुन्दर तलवार हाथमें लेकर उस रथसे कूद पड़े। जैसे पक्षी किसी मनचाही वस्तुको लेनेके लिये झपट्टा मारता है, उसी प्रकार नीलने भी अश्वत्थामाके धड़से उसका सिर उतार लेनेका विचार किया ॥ २४ ॥
तस्योन्नतांसं सुनसं शिरः कायात् सकुण्डलम् । भल्लेनापाहरद् द्रौणिः स्मयमान इवानघ ॥ २५ ॥ निष्पाप नरेश! उस समय अश्वत्थामाने मुसकराते हुए-से भल्ल मारकर उसके द्वारा नीलके ऊँचे कंधों, सुन्दर नासिकाओं तथा कुण्डलोंसहित मस्तकको धड़से काट गिराया ॥ २५ ॥
सम्पूर्णचन्द्राभमुखः पद्मपत्रनिभेक्षणः । प्रांशुरुत्पलपत्राभो निहतो न्यपतद् भुवि ॥ २६ ॥ पूर्णचन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुख और कमलदलके समान सुन्दर नेत्रवाले राजा नील बड़े ऊँचे कदके थे। उनकी अंगकान्ति नीलकमल-दलके समान श्याम थी। वे अश्वत्थामाद्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥
ततः प्रविव्यथे सेना पाण्डवी भृशमाकुला । आचार्यपुत्रेण हते नीले ज्वलिततेजसि ॥ २७ ॥ आचार्यपुत्रके द्वारा प्रज्वलित तेजवाले राजा नीलके मारे जानेपर पाण्डव-सेना अत्यन्त व्याकुल और व्यथित हो उठी ॥ २७ ॥
अचिन्तयंश्च ते सर्वे पाण्डवानां महारथाः । कथं नो वासविस्त्रायाच्छत्रुभ्य इति मारिष ॥ २८ ॥ आर्य! उस समय समस्त पाण्डव महारथी यह सोचने लगे कि इन्द्रकुमार अर्जुन शत्रुओंके हाथसे हमारी रक्षा कैसे कर सकते हैं? ॥ २८ ॥
दक्षिणेन तु सेनायाः कुरुते कदनं बली । संशप्तकावशेषस्य नारायणबलस्य च ॥ २९ ॥
वे बलवान् अर्जुन तो इस सेनाके दक्षिण भागमें बचे-खुचे संशप्तकों और नारायणी सेनाके सैनिकोंका संहार कर रहे हैं॥ २९॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि नीलवधे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें नीलवधविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥
द्वात्रिंशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध, भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम
संजय उवाच
प्रतिघातं तु सैन्यस्य नामृष्यत वृकोदरः ।
सोऽभ्याहनद् गुरुं षष्ट्या कर्णं च दशभिः शरैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! अपनी सेनाका वह विनाश भीमसेनसे नहीं सहा गया। उन्होंने गुरुदेवको साठ और कर्णको दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १ ॥
तस्य द्रोणः शितैर्बाणैस्तीक्ष्णधारैरजिह्मगैः ।
जीवितान्तमभिप्रेप्सुर्मर्माण्याशु जघान ह ॥ २ ॥
तब द्रोणाचार्यने सीधे जानेवाले, तीखी धारसे युक्त पैने बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक भीमसेनके मर्मस्थानोंपर आघात किया। वे भीमसेनके प्राणोंका अन्त कर देना चाहते थे ॥ २ ॥
आनन्तर्यमभिप्रेप्सुः षड्विंशत्या समर्पयत् ।
कर्णो द्वादशभिर्बाणैरश्वत्थामा च सप्तभिः ॥ ३ ॥
इस आघात-प्रतिघातको निरन्तर जारी रखनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यने भीमसेनको छब्बीस, कर्णने बारह और अश्वत्थामाने सात बाण मारे ॥ ३ ॥
षड्भिर्दुर्योधनो राजा तत एनमथाकिरत् ।
भीमसेनोऽपि तान् सर्वान् प्रत्यविध्यन्महाबलः ॥ ४ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधनने उनके ऊपर छः बाणोंद्वारा प्रहार किया। फिर महाबली भीमसेनने उन सबको अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ४ ॥
द्रोणं पञ्चाशतेषूणां कर्णं च दशभिः शरैः ।
दुर्योधनं द्वादशभिर्द्रौणिमष्टाभिराशुगैः ॥ ५ ॥
उन्होंने द्रोणको पचास, कर्णको दस, दुर्योधनको बारह और अश्वत्थामाको आठ बाण मारे ॥ ५ ॥
आरावं तुमुलं कुर्वन्नभ्यवर्तत तान् रणे ।
तस्मिन् संत्यजति प्राणान् मृत्युसाधारणीकृते ॥ ६ ॥
अजातशत्रुस्तान् योधान् भीमं त्रातेत्यचोदयत् । ते ययुर्भीमसेनस्य समीपममितौजसः ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् भयंकर गर्जना करते हुए भीमने रणक्षेत्रमें उन सबका सामना किया। भीमसेन मृत्युके तुल्य अवस्थामें पहुँच गये थे और अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहते थे। उसी समय अजातशत्रु युधिष्ठिरने अपने योद्धाओंको यह कहकर आगे बढ़नेकी आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग भीमसेनकी रक्षा करो।' यह सुनकर वे अमित तेजस्वी वीर भीमसेनके समीप चले ॥ ६-७ ॥
युयुधानप्रभृतयो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । ते समेत्य सुसंरब्धाः सहिताः पुरुषर्षभाः ॥ ८ ॥ महेष्वासवरैर्गुप्ता द्रोणानीकं बिभित्सवः । समापेतुर्महावीर्या भीमप्रभृतयो रथाः ॥ ९ ॥ सात्यकि आदि महारथी तथा पाण्डुकुमार माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव—ये सभी पुरुषश्रेष्ठ वीर परस्पर मिलकर एक साथ अत्यन्त क्रोधमें भरकर बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे सुरक्षित हो द्रोणाचार्यकी सेनाको विदीर्ण कर डालनेकी इच्छासे उसपर टूट पड़े। वे भीम आदि सभी महारथी अत्यन्त पराक्रमी थे ॥ ८-९ ॥
तान् प्रत्यगृह्णादव्यग्रो द्रोणोऽपि रथिनां वरः । महारथानतिबलान् वीरान् समरयोधिनः ॥ १० ॥ उस समय रथियोंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोणने घबराहट छोड़कर उन अत्यन्त बलवान् समरभूमिमें युद्ध करनेवाले महारथी वीरोंको रोक दिया ॥ १० ॥
बाह्यं मृत्युभयं कृत्वा तावकान् पाण्डवा ययुः । सादिनः सादिनोऽभ्यघ्नंस्तथैव रथिनो रथान् ॥ ११ ॥ परंतु पाण्डववीर मौतके भयको बाहर छोड़कर आपके सैनिकोंपर चढ़ आये। घुड़सवार घुड़सवारोंको तथा रथारोही योद्धा रथियोंको मारने लगे ॥ ११ ॥
आसीच्छक्त्यासिसम्पातो युद्धमासीत् परश्वधैः । प्रकृष्टमसियुद्धं च बभूव कटुकोदयम् ॥ १२ ॥ उस युद्धमें शक्ति और खड्गोंके घातक प्रहार हो रहे थे। फरसोंसे मार-काट हो रही थी। तलवार खींचकर उसके द्वारा ऐसा भयंकर युद्ध हो रहा था कि उसका कटु परिणाम प्रत्यक्ष सामने आ रहा था ॥ १२ ॥
कुञ्जराणां च सम्पाते युद्धमासीत् सुदारुणम् । अपतत् कुञ्जरादन्यो हयादन्यस्त्ववाक्शिराः ॥ १३ ॥ हाथियोंके संघर्षमें अत्यन्त दारुण संग्राम होने लगा। कोई हाथीसे गिरता था तो कोई घोड़ेसे ही औंधे सिर धराशायी हो रहा था ॥ १३ ॥
नरो बाणविनिर्भिन्नो रथादन्यश्च मारिष ।
तत्रान्यस्य च सम्मर्दे पतितस्य विवर्मणः ।। १४ ।। शिरः प्रध्वंसयामास वक्षस्याक्रम्य कुञ्जरः । आर्य! उस युद्धमें कितने मनुष्य बाणोंसे विदीर्ण होकर रथसे नीचे गिर जाते थे। कितने ही योद्धा कवचशून्य हो धरतीपर गिर पड़ते थे और सहसा कोई हाथी उनकी छातीपर पैर रखकर उनके मस्तकको भी कुचल देता था ।। १४ १/२ ।। अपरांश्चापरेऽमृद्नन् वारणाः पतितान् नरान् ।। १५ ।। विषाणैश्चावनिं गत्वा व्यभिन्दन् रथिनो बहून् । दूसरे हाथियोंने भी दूसरे बहुत-से गिरे हुए मनुष्यों-को अपने पैरोंसे रौंद डाला। अपने दाँतोंसे धरतीपर आघात करके बहुत-से रथियोंको चीर डाला ।। १५ १/२ ।। नरान्त्रैः केचिदपरे विषाणालग्नसंश्रयैः ।। १६ ।। बभ्रमुः समरे नागा मृद्नन्तः शतशो नरान् । कितने ही गजराज अपने दाँतोंमें लगी हुई मनुष्योंकी आँतें लिये समरभूमिमें सैकड़ों योद्धाओंको कुचलते हुए चक्कर लगा रहे थे ।। १६ १/२ ।। कार्ष्णायसतनुत्राणान् नरांश्चरथकुञ्जरान् ।। १७ ।। पतितान् पोथयाञ्चक्रुर्द्विपाः स्थूलनलानिव । काले रंगके लोहमय कवच धारण करके रणभूमिमें गिरे हुए कितने ही मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियोंको बड़े-बड़े गजराजोंने मोटे नरकुलोंके समान रौंद डाला ।। १७ १/२ ।। गृध्रपत्राधिवासांसि शयनानि नराधिपाः ।। १८ ।। ह्रीमन्तः कालसम्पर्कात् सुदुःखान्यनुशेरते । बड़े-बड़े राजा कालसंयोगसे अत्यन्त दुःखदायिनी तथा गीधकी पाँखरूपी बिछौनोंसे युक्त शय्याओंपर लज्जापूर्वक सो रहे थे ।। १८ १/२ ।। हन्ति स्मात्र पिता पुत्रं रथेनाभ्येत्य संयुगे ।। १९ ।। पुत्रश्च पितरं मोहान्निर्मर्यादमवर्तत । वहाँ पिता रथके द्वारा युद्धके मैदानमें आकर पुत्रका ही वध कर डालता था और पुत्र भी मोहवश पिताके प्राण ले रहा था। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था ।। १९ १/२ ।। रथो भग्नो ध्वजश्छिन्नश्छत्रमुर्व्यां निपातितम् ।। २० ।। युगार्धं छिन्नमादाय प्रदुद्राव तथा हयः । कितने ही रथ टूट गये, ध्वज कट गये, छत्र पृथ्वीपर गिरा दिये गये और जूए खण्डित हो गये। उन खण्डित हुए आधे जूओंको ही लेकर घोड़े तेजीसे भाग रहे थे ।। २० १/२ ।। सासिर्बाहुर्निपतितः शिरश्छिन्नं सकुण्डलम् ।। २१ ।। गजेनाक्षिप्य बलिना रथः संचूर्णितः क्षितौ ।
कितने ही वीरोंकी भुजाएँ तलवारसहित काट गिरायी गयीं, कितनोंके कुण्डलमण्डित मस्तक धड़से अलग कर दिये गये। कहीं किसी बलवान् हाथीने रथको उठाकर फेंक दिया और वह पृथ्वीपर गिरकर चूर-चूर हो गया ।। २१ १/२ ।। रथिना ताडितो नागो नाराचेनापतत् क्षितौ ।। २२ ।। सारोहश्चापतद् वाजी गजेनाभ्याहतो भृशम् । निर्मर्यादं महद् युद्धमवर्तत सुदारुणम् ।। २३ ।। किसी रथीने नाराचके द्वारा गजराजपर आघात किया और वह धराशायी हो गया। किसी हाथीके वेगपूर्वक आघात करनेपर सवारसहित घोड़ा धरतीपर ढेर हो गया। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य अत्यन्त भयंकर एवं महान् युद्ध होने लगा ।। २२-२३ ।। हा तात हा पुत्र सखे क्वासि तिष्ठ क्व धावसि । प्रहराहर जह्येनं स्मितक्ष्वेडितगर्जितैः ।। २४ ।। इत्येवमुच्चरन्ति स्म श्रूयन्ते विविधा गिरः । उस समय सभी सैनिक 'हा तात! हा पुत्र! सखे! तुम कहाँ हो? ठहरो, कहाँ भागे जा रहे हो? मारो, लाओ, इसका वध कर डालो'—इस प्रकारकी बातें कह रहे थे। हास्य, उछल-कूद और गर्जनाके साथ उनके मुखसे नाना प्रकारकी बातें सुनायी देती थीं ।। २४ १/२ ।। नरस्याश्वस्य नागस्य समसज्जत शोणितम् ।। २५ ।। उपाशाम्यद् रजो भौमं भीरून् कश्मलमाविशत् । मनुष्य, घोड़े और हाथीके रक्त एक-दूसरेसे मिल रहे थे। उस रक्तप्रवाहसे वहाँकी उड़ती हुई भयंकर धूल शान्त हो गयी। उस रक्तराशिको देखकर भीरु पुरुषोंपर मोह छा जाता था ।। २५ १/२ ।। चक्रेण चक्रमसाद्य वीरो वीरस्य संयुगे ।। २६ ।। अतीतेषुपथे काले जहार गदया शिरः । किसी वीरने अपने चक्रके द्वारा शत्रुपक्षीय वीरके चक्रका निवारण करके युद्धमें बाणप्रहारके योग्य अवसर न होनेके कारण गदासे ही उसका सिर उड़ा दिया ।। २६ १/२ ।। आसीत् केशपरामर्शो मुष्टियुद्धं च दारुणम् ।। २७ ।। नखैर्दन्तैश्च शूराणामद्वीपे द्वीपमिच्छताम् । कुछ लोगोंमें एक-दूसरेके केश पकड़कर युद्ध होने लगा। कितने ही योद्धाओंमें अत्यन्त भयंकर मुक्कोंकी मार होने लगी। कितने ही शूरवीर उस निराश्रय स्थानमें आश्रय ढूँढ़ रहे थे और नखों तथा दाँतोंसे एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे ।। २७ १/२ ।। तत्राच्छिद्यत शूरस्य सखड्गो बाहुरुद्यतः ।। २८ ।। सधनुश्चापरस्यापि सशरः साङ्कुशस्तथा ।
आक्रोशदन्यमन्योऽत्र तथान्यो विमुखोऽद्रवत् ॥ २९ ॥
उस युद्धमें एक शूरवीरकी खड्गसहित ऊपर उठी हुई भुजा काट डाली गयी। दूसरेकी भी धनुष-बाण और अंकुशसहित बाँह खण्डित हो गयी। वहाँ एक सैनिक दूसरेको पुकारता था और दूसरा युद्धसे विमुख होकर भागा जा रहा था ॥ २८-२९ ॥
अन्यः प्राप्तस्य चान्यस्य शिरः कायादपाहरत् ।
सशब्दमद्रवच्चान्यः शब्दादन्योऽत्रसद् भृशम् ॥ ३० ॥
किसी दूसरे वीरने सामने आये हुए अन्य योद्धाके मस्तकको धड़से अलग कर दिया। यह देख कोई तीसरा वीर बड़े जोरसे कोलाहल करता हुआ भागा। उसके उस आर्तनादसे एक अन्य योद्धा अत्यन्त डर गया ॥ ३० ॥
स्वानन्योऽथ परानन्यो जघान निशितैः शरैः ।
गिरिशृङ्गोपमश्चात्र नाराचेन निपातितः ॥ ३१ ॥
मातङ्गो न्यपतद् भूमौ नदीरोध इवोष्णगे ।
कोई अपने ही सैनिकोंको और कोई शत्रु-योद्धाओंको अपने तीखे बाणोंसे मार रहा था। उस युद्धमें पर्वतशिखरके समान विशालकाय हाथी नाराचसे मारा जाकर वर्षाकालमें नदीके तटकी भाँति धरतीपर गिरा और ढेर हो गया ॥ ३१ १/२ ॥
तथैव रथिनं नागः क्षरन् गिरिरिवारुजन् ॥ ३२ ॥
अभ्यतिष्ठत् पदा भूमौ सहाश्वं सहसारथिम् ।
झरने बहानेवाले पर्वतकी भाँति किसी मदस्रावी गजराजने सारथि और अश्वोंसहित रथीको पैरोंसे भूमिपर दबाकर उन सबको कुचल डाला ॥ ३२ १/२ ॥
शूरान् प्रहरतो दृष्ट्वा कृतास्त्रान् रुधिरोक्षितान् ॥ ३३ ॥
बहूनप्याविशन्मोहो भीरून् हृदयदुर्बलान् ।
अस्त्र-विद्यामें निपुण और खूनसे लथपथ हुए शूरवीरोंको परस्पर प्रहार करते देख बहुत-से दुर्बल हृदयवाले भीरु मनुष्योंके मनमें मोहका संचार होने लगा ॥ ३३ १/२ ॥
सर्वमाविग्नमभवन्न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ ३४ ॥
सैन्येन रजसा ध्वस्तं निर्मर्यादमवर्तत ।
उस समय सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे व्याप्त होकर सारा जनसमूह उद्विग्न हो रहा था, किसीको कुछ नहीं सूझता था। उस युद्धमें किसी भी नियम या मर्यादाका पालन नहीं हो रहा था ॥ ३४ १/२ ॥
ततः सेनापतिः शीघ्रमयं काल इति ब्रुवन् ॥ ३५ ॥
नित्याभित्वरितानेव त्वरयामास पाण्डवान् ।
तब सेनापति धृष्टद्युम्नने यही उपयुक्त अवसर है, ऐसा कहते हुए सदा शीघ्रता करनेवाले पाण्डवोंको और भी जल्दी करनेके लिये प्रेरित किया ॥ ३५ १/२ ॥
कुर्वन्तः शासनं तस्य पाण्डवा बाहुशालिनः ॥ ३६ ॥ सरो हंसा इवापेतुर्घ्नन्तो द्रोणरथं प्रति । तदनन्तर अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले पाण्डव सेनापतिकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वहाँ द्रोणाचार्यके रथपर प्रहार करते हुए उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे बहुत-से हंस किसी सरोवरपर सब ओरसे उड़कर आते हैं ॥ ३६ १/२ ॥
गृह्णीताद्रवतान्योन्यं विभीता विनिकृन्तत ॥ ३७ ॥ इत्यासीत् तुमुलः शब्दो दुर्धर्षस्य रथं प्रति । उस समय दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यके रथके समीप सब ओरसे यही भयानक आवाज आने लगी कि ‘दौड़ो, पकड़ो और निर्भय होकर शत्रुओंको काट डालो’ ॥ ३७ १/२ ॥
ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणी राजा जयद्रथः ॥ ३८ ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यश्चैतान् न्यवारयन् । तब द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, राजा जयद्रथ, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा राजा शल्यने मिलकर इन आक्रमणकारियोंको रोका ॥ ३८ १/२ ॥
ते त्वार्यधर्मसंरब्धा दुर्निवारा दुरासदाः ॥ ३९ ॥ शरार्ता न जहुर्द्रोणं पञ्चालाः पाण्डवैः सह । वे पाण्डवोंसहित पाञ्चालवीर आर्यधर्मके अनुसार विजयके लिये प्रयत्नशील थे। उन्हें रोकना या पराजित करना बहुत कठिन था। वे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी द्रोणाचार्यको छोड़ न सके ॥ ३९ १/२ ॥
ततो द्रोणोऽतिसंक्रुद्धो विसृजञ्छतशः शरान् ॥ ४० ॥ चेदिपञ्चालपाण्डूनामकरोत् कदनं महत् । यह देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके चेदि, पांचाल तथा पाण्डव-योद्धाओंका महान् संहार आरम्भ किया ॥ ४० १/२ ॥
तस्य ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे दिक्षु मारिष ॥ ४१ ॥ वज्रसंहादसंकाशस्त्रासयन् मानवान् बहून् । आर्य! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका गम्भीर घोष सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी देता था। वह वज्रकी गर्जनाके समान घोर शब्द बहुसंख्यक मनुष्योंको भयभीत कर रहा था ॥ ४१ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे जिष्णुर्जित्वा संशप्तकान् बहून् ॥ ४२ ॥ अभ्ययात् तत्र यत्रासौ द्रोणः पाण्डून् प्रमर्दति । इसी समय अर्जुन बहुत-से संशप्तकोंपर विजय प्राप्त करके उस स्थानपर आये, जहाँ आचार्य द्रोण पाण्डव-सैनिकोंका मर्दन कर रहे थे ॥ ४२ १/२ ॥
ताञ्छरौघान् महावर्तान् शोणितोदान् महाह्रदान् ॥ ४३ ॥ तीर्णः संशप्तकान् हत्वा प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः ।
संशप्तक योद्धा महान् सरोवरोंके समान थे, बाणोंके समूह ही उनके जल-प्रवाह थे, धनुष ही उनमें उठी हुई बड़ी-बड़ी भँवरोंके समान जान पड़ते थे तथा प्रवाहित होनेवाला रक्त ही उन सरोवरोंका जल था। अर्जुन संशप्तकोंका वध करके उन महान् सरोवरोंके पार होकर वहाँ आते दिखायी दिये थे ॥ ४३ १/२ ॥ तस्य कीर्तिमतो लक्ष्म सूर्यप्रतिमतेजसः ॥ ४४ ॥ दीप्यमानमपश्याम तेजसा वानरध्वजम् । सूर्यके समान तेजस्वी एवं यशस्वी अर्जुनके चिह्नस्वरूप वानरध्वजको हमने दूरसे ही देखा, जो अपने दिव्य तेजसे उद्भासित हो रहा था ॥ ४४ १/२ ॥ संशप्तकसमुद्रं तमुच्छोष्यास्त्रगभस्तिभिः ॥ ४५ ॥ स पाण्डवयुगान्तार्कः कुरूनप्यभ्यतीपतत् । वे पाण्डुवंशके प्रलयकालीन सूर्य अपनी अस्त्रमयी किरणोंसे उस संशप्तकरूपी समुद्रको सोखकर कौरव-सैनिकोंको भी संतप्त करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥ प्रददाह कुरून् सर्वानर्जुनः शस्त्रतेजसा ॥ ४६ ॥ युगान्ते सर्वभूतानि धूमकेतुरिवोत्थितः । जैसे प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्नि सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने अपने अस्त्र-शस्त्रोंके तेजसे समस्त कौरव-सैनिकोंको जलाना आरम्भ किया ॥ ४६ १/२ ॥ तेन बाणसहस्रौघैर्गजाश्वरथयोधिनः ॥ ४७ ॥ ताड्यमानाः क्षितिं जग्मुर्मुक्तकेशाः शरार्दिताः । हाथी, घोड़े तथा रथपर आरूढ़ होकर युद्ध करनेवाले बहुत-से योद्धा अर्जुनके सहस्रों बाणसमूहोंसे आहत एवं पीड़ित हो बाल खोले हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ केचिदार्तस्वरं चक्रुर्विनेशुरपरे पुनः ॥ ४८ ॥ पार्थबाणहताः केचिन्निपेतुर्विगतासवः । कोई आर्तनाद करने लगे, कोई नष्ट हो गये, कोई अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर प्राणशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४८ १/२ ॥ तेषामुत्पतितान् कांश्चित् पतितांश्च पराङ्मुखान् ॥ ४९ ॥ न जघानार्जुनो योधान् योधव्रतमनुस्मरन् । उन योद्धाओंमेंसे जो लोग रथसे कूद पड़े थे या धरतीपर गिर गये थे अथवा युद्धसे विमुख होकर भाग चले थे, उन सबको एक वीर सैनिकके लिये निश्चित नियमका निरन्तर स्मरण रखते हुए अर्जुनने नहीं मारा ॥ ते विकीर्णरथाश्चित्राः प्रायशश्च पराङ्मुखाः ॥ ५० ॥ कुरवः कर्ण कर्णेति हाहेति च विचुक्रुशुः ।
कौरव-सैनिकोंके रथ टूट-फूटकर बिखर गये। उनकी विचित्र अवस्था हो गयी। वे प्रायः युद्धसे विमुख हो गये और 'हा कर्ण, हा कर्ण' कहकर पुकारने लगे ।। ५० १/२ ।।
तमाधिरथिराक्रन्दं विज्ञाय शरणैषिणाम् ।। ५१ ।।
मा भैष्टेति प्रतिश्रुत्य ययावभिमुखोऽर्जुनम् ।
तब अधिरथपुत्र कर्णने उन शरणार्थी सैनिकोंकी करुण पुकार सुनकर 'डरो मत' इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर अर्जुनका सामना करनेके लिये प्रस्थान किया ।। ५१ १/२ ।।
स भारतरथश्रेष्ठः सर्वभारतहर्षणः ।। ५२ ।।
प्रादुश्चक्रे तदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः ।
उस समय अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, भरतवंशियोंके श्रेष्ठ महारथी तथा सम्पूर्ण भारतीय सेनाका हर्ष बढ़ानेवाले कर्णने आग्नेयास्त्र प्रकट किया ।। ५२ १/२ ।।
तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च ।। ५३ ।।
शरौघाञ्छरजालेन विदुधाव धनंजयः ।
प्रज्वलित बाणसमूह तथा देदीप्यमान धनुष धारण करनेवाले कर्णके उन बाणसमूहोंको अर्जुनने अपने बाणोंके समुदायद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ५३ १/२ ।।
तथैवाधिरथिस्तस्य बाणाञ्ज्वलिततेजसः ।। ५४ ।।
अस्त्रमस्त्रेण संवार्य प्राणदद् विसृजञ्छरान् ।
उसी प्रकार अधिरथकुमार कर्णने भी प्रज्वलित तेजवाले अर्जुनके बाणोंका तथा उनके प्रत्येक अस्त्रका अपने अस्त्रोंद्वारा निवारण करके बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। ५४ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नश्च भीमश्च सात्यकिश्च महारथः ।। ५५ ।।
विव्यधुः कर्णमासाद्य त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
इसी समय धृष्टद्युम्न, भीम तथा महारथी सात्यकिने भी कर्णके पास पहुँचकर उसे तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ।। ५५ १/२ ।।
अर्जुनास्त्रं तु राधेयः संवार्य शरवृष्टिभिः ।। ५६ ।।
तेषां त्रयाणां चापानि चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः ।
तब राधानन्दन कर्णने अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा अर्जुनके बाणोंका निवारण करके अपने तीन बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न आदि तीनों वीरोंके धनुषोंको भी काट दिया ।। ५६ १/२ ।।
ते निकृत्तायुधाः शूरा निर्विषा भुजगा इव ।। ५७ ।।
रथशक्तीः समुत्क्षिप्य भृशं सिंहा इवानदन् ।
अपने धनुष कट जानेपर विषहीन भुजंगमोंके समान उन शूरवीरोंने रथ-शक्तियोंको ऊपर उठाकर सिंहोंके समान भयंकर गर्जना की ।। ५७ १/२ ।।
ता भुजाग्रैर्महावेगा निसृष्टा भुजगोपमाः ।। ५८ ।।
दीप्यमाना महाशक्त्यो जग्मुराधिरथिं प्रति । उनके हाथोंसे छूटी हुई वे अत्यन्त वेगशालिनी सर्पाकार महाशक्तियाँ अपनी प्रभासे प्रकाशित होती हुई कर्णकी ओर चलीं ॥ ५८ १/२ ॥ ता निकृत्य शरव्रातैस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ ५९ ॥ ननाद बलवान् कर्णः पार्थाय विसृजञ्छरान् । परंतु बलवान् कर्णने सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणसमूहोंद्वारा उन शक्तियोंके टुकड़े-टुकड़े करके अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करते हुए सिंहनाद किया ॥ ५९ १/२ ॥ अर्जुनश्चापि राधेयं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ॥ ६० ॥ कर्णादवरजं बाणैर्जघान निशितैः शरैः । अर्जुनने भी राधानन्दन कर्णको सात शीघ्रगामी बाणोंद्वारा बींधकर अपने पैने बाणोंसे उसके छोटे भाईको मार डाला ॥ ६० १/२ ॥ ततः शत्रुंजयं हत्वा पार्थः षड्भिरजिह्मगैः ॥ ६१ ॥ जहार सद्यो भल्लेन विपाटस्य शिरो रथात् । तत्पश्चात् सीधे जानेवाले छः सायकोंद्वारा शत्रुंजयका संहार करके एक भल्लद्वारा रथपर बैठे हुए विपाटका मस्तक तत्काल काट गिराया ॥ ६१ १/२ ॥ पश्यतां धार्तराष्ट्राणामेकेनैव किरीटिना ॥ ६२ ॥ प्रमुखे सूतपुत्रस्य सोदर्या निहतास्त्रयः । इस प्रकार धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते एकमात्र अर्जुनने युद्धके मुहानेपर सूतपुत्र कर्णके तीन भाइयोंका वध कर डाला ॥ ६२ १/२ ॥ ततो भीमः समुत्पत्य स्वरथाद् वैनतेयवत् ॥ ६३ ॥ वरासिना कर्णपक्षान् जघान दश पञ्च च । तदनन्तर भीमसेनने गरुड़की भाँति अपने रथसे उछलकर उत्तम खड्गद्वारा कर्णपक्षके पंद्रह योद्धाओंको मार डाला ॥ ६३ १/२ ॥ पुनस्तु रथमास्थाय धनुरदाय चापरम् ॥ ६४ ॥ विव्याध दशभिः कर्णं सूतमश्वांश्च पञ्चभिः । फिर भी उन्होंने अपने रथपर बैठकर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और दस बाणोंद्वारा कर्णको तथा पाँच बाणोंसे उसके सारथि और घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ ६४ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नोऽप्यसिवरं चर्म चादाय भास्वरम् ॥ ६५ ॥ जघान चन्द्रवर्माणं बृहत्क्षत्रं च नैषधम् । धृष्टद्युम्नने भी श्रेष्ठ खड्ग और चमकीली ढाल लेकर चन्द्रवर्मा तथा निषधराज बृहत्क्षत्रका काम तमाम कर दिया ॥ ६५ १/२ ॥ ततः स्वरथमास्थाय पाञ्चाल्योऽन्यच्च कार्मुकम् ॥ ६६ ॥
आदाय कर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या नदन् रणे ।
तदनन्तर पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्नने अपने रथपर बैठकर दूसरा धनुष ले रणक्षेत्रमें गर्जना करते हुए तिहत्तर बाणोंद्वारा कर्णको बींध डाला ॥ ६६ १/२ ॥
शैनेयोऽप्यन्यदादाय धनुरिन्दुसमद्युतिः ॥ ६७ ॥
सूतपुत्रं चतुःषष्ट्या विद्ध्वा सिंह इवानदत् ।
तत्पश्चात् चन्द्रमाके समान कान्तिमान् सात्यकिने भी दूसरा धनुष हाथमें लेकर सूतपुत्र कर्णको चौंसठ बाणोंसे घायल करके सिंहके समान गर्जना की ॥ ६७ १/२ ॥
भल्लाभ्यां साधुमुक्ताभ्यां छित्त्वा कर्णस्य कार्मुकम् ॥ ६८ ॥
पुनः कर्णं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।
इसके बाद उन्होंने अच्छी तरह छोड़े हुए दो भल्लोंद्वारा कर्णके धनुषको काटकर पुनः तीन बाणोंद्वारा कर्णकी दोनों भुजाओं तथा छातीमें भी चोट पहुँचायी ॥
ततो दुर्योधनो द्रोणो राजा चैव जयद्रथः ॥ ६९ ॥
निमज्जमानं राधेयमुज्जह्रुः सात्यकार्णवात् ।
तत्पश्चात् दुर्योधन, द्रोणाचार्य तथा राजा जयद्रथने डूबते हुए राधानन्दन कर्णका सात्यकिरूपी समुद्रसे उद्धार किया ॥ ६९ १/२ ॥
पत्यश्वरथमातङ्गास्त्वदीयाः शतशोऽपरे ॥ ७० ॥
कर्णमेवाभ्यधावन्त त्रास्यमानाः प्रहारिणः ।
उस समय आपकी सेनाके अन्य सैकड़ों पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा सात्यकिसे संत्रस्त होकर कर्णके ही पीछे दौड़े गये ॥ ७० १/२ ॥
धृष्टद्युम्नश्च भीमश्च सौभद्रोऽर्जुन एव च ॥ ७१ ॥
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिं जुगुपू रणे ।
उधर धृष्टद्युम्न, भीमसेन, अभिमन्यु, अर्जुन, नकुल तथा सहदेवने रणक्षेत्रमें सात्यकिका संरक्षण आरम्भ किया ॥ ७१ १/२ ॥
एवमेष महारौद्रः क्षयार्थं सर्वधन्विनाम् ॥ ७२ ॥
तावकानां परेषां च त्यक्त्वा प्राणानभूद् रणः ।
महाराज! इस प्रकार आपके तथा शत्रुपक्षके सम्पूर्ण धनुर्धरोंके विनाशके लिये उनमें परस्पर प्राणोंकी परवा न करके अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ७२ १/२ ॥
पदातिरथनागाश्च गजाश्वरथपत्तिभिः ॥ ७३ ॥
रथिनो नागपत्त्यश्चै रथपत्ती रथद्विपैः ।
पैदल, रथ, हाथी और घोड़े क्रमशः हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंके साथ युद्ध करने लगे। रथी हाथियों, पैदलों और घोड़ोंके साथ भिड़ गये। रथी और पैदल सैनिक रथियों और हाथियोंका सामना करने लगे ॥ ७३ १/२ ॥
अश्वैरश्वा गजैर्नागा रथिनो रथिभिः सह ॥ ७४ ॥ संयुक्ताः समदृश्यन्त पत्तयश्चापि पत्तिभिः । घोड़ोंसे घोड़े, हाथियोंसे हाथी, रथियोंसे रथी और पैदलोंसे पैदल जूझते दिखायी दे रहे थे ॥ ७४ १/२ ॥ एवं सुकलिलं युद्धमासीत् क्रव्यादहर्षणम् । महद्भिस्तैरभीतानां यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥ ७५ ॥ इस प्रकार उन निर्भीक सैनिकोंका महान् शक्तिशाली विपक्षी योद्धाओंके साथ अत्यन्त घमासान युद्ध हो रहा था, जो कच्चा मांस खानेवाले पशु-पक्षियों तथा पिशाचोंके हर्षकी वृद्धि और यमराजके राष्ट्रकी समृद्धि करनेवाला था ॥ ७५ १/२ ॥ ततो हता नररथवाजिकुञ्जरै- रनेकशो द्विपरथपत्तिवाजिनः । गजैर्गजा रथिभिरुदायुधा रथा हयैर्हयाः पत्तिगणैश्च पत्तयः ॥ ७६ ॥ उस समय पैदल, रथी, घुड़सवार और हाथीसवारोंके द्वारा बहुत-से हाथीसवार, रथी, पैदल और घुड़सवार मारे गये। हाथियोंने हाथियोंको, रथियोंने शस्त्र उठाये हुए रथियोंको, घुड़सवारोंने घुड़सवारोंको और पैदल योद्धाओंने पैदल योद्धाओंको मार गिराया ॥ ७६ ॥ रथैर्द्विपा द्विरदवरैर्महाहया हयैर्नरा वररथिभिश्च वाजिनः । निरस्तजिह्वादशनेक्षणाः क्षितौ क्षयं गताः प्रमथितवर्मभूषणाः ॥ ७७ ॥ रथियोंने हाथियोंको, गजराजोंने बड़े-बड़े घोड़ोंको, घुड़सवारोंने पैदलोंको तथा श्रेष्ठ रथियोंने घुड़सवारोंको धराशायी कर दिया। उनकी जिह्वा, दाँत और नेत्र—ये सब बाहर निकल आये थे। कवच और आभूषण टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े थे। ऐसी अवस्थामें वे सब योद्धा पृथ्वीपर गिरकर नष्ट हो गये थे ॥ ७७ ॥ तथा परैर्बहुकरणैर्वरैरायुधै- र्हता गताः प्रतिभयदर्शनाः क्षितिम् । विपोथिता हयगजपादताडिता भृशाकुला रथमुखनेमिभिः क्षताः ॥ ७८ ॥ शत्रुओंके पास बहुत-से साधन थे। उनके हाथमें उत्तम अस्त्र-शस्त्र थे। उनके द्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हुए सैनिक बड़े भयंकर दिखायी देते थे। कितने ही योद्धा हाथियों और घोड़ोंके पैरोंसे आहत होकर धरतीपर गिर पड़ते थे। कितने ही बड़े-बड़े रथोंके पहियोंसे कुचलकर क्षत-विक्षत हो अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे ॥ ७८ ॥ प्रमोदने श्वापदपक्षिरक्षसां
जनक्षये वर्तति तत्र दारुणे । महाबलास्ते कुपिताः परस्परं निषूदयन्तः प्रविचेरुरोजसा ॥ ७९ ॥ वहाँ वह भयंकर जनसंहार हिंसक जन्तुओं, पक्षियों तथा राक्षसोंको आनन्द प्रदान करनेवाला था। उसमें कुपित हुए वे महाबली शूरवीर एक-दूसरेको मारते हुए बलपूर्वक विचरण कर रहे थे ॥ ७९ ॥
ततो बले भृशलुलिते परस्परं निरीक्षमाणे रुधिरौघसम्प्लुते । दिवाकरेऽस्तंगिरिमास्थिते शनै- रुभे प्रयाते शिबिराय भारत ॥ ८० ॥ भरतनन्दन! दोनों ओरकी सेनाएँ अत्यन्त आहत होकर खूनसे लथपथ हो एक-दूसरीकी ओर देख रही थीं, इतनेहीमें सूर्यदेव अस्ताचलको जा पहुँचे। फिर तो वे दोनों ही धीरे-धीरे अपने-अपने शिविरकी ओर चल दीं ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि द्वादशदिवसावहारे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें बारहवें दिनके युद्धमें सेनाका युद्धसे विरत हो अपने शिविरको प्रस्थानविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
(अभिमन्युवधपर्व)
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन
संजय उवाच
पूर्वमस्मासु भग्नेषु फाल्गुनेनामितौजसा ।
द्रोणे च मोघसंकल्पे रक्षिते च युधिष्ठिरे ॥ १ ॥
सर्वे विध्वस्तकवचास्तावका युधि निर्जिताः ।
रजस्वला भृशोद्विग्ना वीक्षमाणा दिशो दश ॥ २ ॥
अवहारं ततः कृत्वा भारद्वाजस्य सम्मते ।
लब्धलक्ष्यैः शरैर्भिन्ना भृशावहसिता रणे ॥ ३ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब अमित तेजस्वी अर्जुनने पहले ही हम सब लोगोंको भगा दिया, द्रोणाचार्यका संकल्प व्यर्थ हो गया तथा राजा युधिष्ठिर सर्वथा सुरक्षित रह गये, तब आपके समस्त सैनिक द्रोणाचार्यकी सम्मतिसे युद्ध बंद करके भयसे अत्यन्त उद्विग्न हो दसों दिशाओंकी ओर देखते हुए शिविरकी ओर चल दिये। वे सब-के-सब युद्धमें पराजित होकर धूलमें भर गये थे। उनके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे तथा कभी न चूकनेवाले अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण होकर वे रणक्षेत्रमें अत्यन्त उपहासके पात्र बन गये ॥ १—३ ॥
श्लाघमानेषु भूतेषु फाल्गुनस्यामितान् गुणान् ।
केशवस्य च सौहार्दे कीर्त्यमानेऽर्जुनं प्रति ॥ ४ ॥
समस्त प्राणी अर्जुनके असंख्य गुणोंकी प्रशंसा तथा उनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके सौहार्दका बखान कर रहे थे ॥ ४ ॥
अभिशस्ता इवाभूवन् ध्यानमूकत्वमास्थिताः ।
ततः प्रभातसमये द्रोणं दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
उस समय आपके महारथीगण कलंकित-से हो रहे थे। वे ध्यानस्थसे होकर मूक हो गये थे। तदनन्तर प्रातःकाल दुर्योधन द्रोणाचार्यके पास जाकर उनसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ ५ ॥
प्रणयादभिमानाच्च द्विषद्वृद्ध्या च दुर्मनाः ।
शृण्वतां सर्वयोधानां संरब्धो वाक्यकोविदः ॥ ६ ॥
शत्रुओंके अभ्युदयसे वह मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया था। द्रोणाचार्यके प्रति उसके हृदयमें प्रेम था। उसे अपने शौर्यपर अभिमान भी था। अतः अत्यन्त कुपित हो बातचीतमें कुशल राजा दुर्योधनने समस्त योद्धाओंके सुनते हुए इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।
नूनं वयं वध्यपक्षे भवतो द्विजसत्तम ।
तथा हि नाग्रहीः प्राप्तं समीपेऽद्य युधिष्ठिरम् ।। ७ ।।
'द्विजश्रेष्ठ! निश्चय ही हमलोग आपकी दृष्टिमें शत्रुवर्गके अन्तर्गत हैं। यही कारण है कि आज आपने अत्यन्त निकट आनेपर भी राजा युधिष्ठिरको नहीं पकड़ा है ।। ७ ।।
इच्छतस्ते न मुच्येत चक्षुःप्राप्तो रणे रिपुः ।
जिघृक्षतो रक्ष्यमाणः सामरैरपि पाण्डवैः ।। ८ ।।
'रणक्षेत्रमें कोई शत्रु आपके नेत्रोंके समक्ष आ जाय और उसे आप पकड़ना चाहें तो सम्पूर्ण देवताओंके साथ रहे सारे पाण्डव उसकी रक्षा क्यों न कर रहे हों, निश्चय ही वह आपसे छूटकर नहीं जा सकता ।। ८ ।।
वरं दत्त्वा मम प्रीतः पश्चाद् विकृतवानसि ।
आशाभङ्गं न कुर्वन्ति भक्तस्यार्याः कथंचन ।। ९ ।।
'आपने प्रसन्न होकर पहले तो मुझे वर दिया और पीछे उसे उलट दिया; परंतु श्रेष्ठ पुरुष किसी प्रकार भी अपने भक्तकी आशा भंग नहीं करते हैं' ।। ९ ।।
ततोऽप्रीतस्तथोक्तः सन् भारद्वाजोऽब्रवीन्नृपम् ।
नाईसे मां तथा ज्ञातुं घटमानं तव प्रिये ।। १० ।।
दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणाचार्यको तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई। वे दुःखी होकर राजासे इस प्रकार बोले—'राजन्! तुमको मुझे इस प्रकार प्रतिज्ञा भंग करनेवाला नहीं समझना चाहिये। मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर तुम्हारा प्रिय करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ ।। १० ।।
ससुरासुरगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः ।
नालं लोका रणे जेतुं पाल्यमानं किरीटिना ।। ११ ।।
‘परंतु एक बात याद रखो, किरीटधारी अर्जुन रणक्षेत्रमें जिसकी रक्षा कर रहे हों, उसे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोक भी नहीं जीत सकते ।। ११ ।। विश्वसृग् यत्र गोविन्दः पृतनानीस्तथार्जुनः । तत्र कस्य बलं क्रामेदन्यत्र त्र्यम्बकात् प्रभोः ।। १२ ।। ‘जहाँ जगत्स्रष्टा भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुन सेनानायक हों, वहाँ भगवान् शंकरके सिवा दूसरे किस पुरुषका बल काम कर सकता है ।। १२ ।। सत्यं तात ब्रवीम्यद्य नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । अद्यैकं प्रवरं कंचित् पातयिष्ये महारथम् ।। १३ ।। ‘तात! आज मैं एक सच्ची बात कहता हूँ, यह कभी झूठी नहीं हो सकती। आज मैं पाण्डवपक्षके किसी श्रेष्ठ महारथीको अवश्य मार गिराऊँगा ।। १३ ।। तं च व्यूहं विधास्यामि योऽभेद्यस्त्रिदशैरपि । योगेन केनचिद् राजन्नर्जुनस्त्वपनीयताम् ।। १४ ।। ‘राजन्! आज उस व्यूहका निर्माण करूँगा, जिसे देवता भी तोड़ नहीं सकते; परंतु किसी उपायसे अर्जुनको यहाँसे दूर हटा दो ।। १४ ।। न ह्यज्ञातमसाध्यं वा तस्य संख्येऽस्ति किंचन । तेन ह्युपात्तं सकलं सर्वज्ञानमितस्ततः ।। १५ ।। ‘युद्धके सम्बन्धमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो अर्जुनके लिये अज्ञात अथवा असाध्य हो। उन्होंने इधर-उधरसे युद्धविषयक सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है’ ।। १५ ।। द्रोणेन व्याहृते त्वेवं संशप्तकगणाः पुनः ।