महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना
चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना
शौनक उवाच
कथं स भगवान् देवो यज्ञेष्वग्रहरः प्रभुः ।
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित् तथा ॥ १ ॥
शौनकजीने कहा— सूतनन्दन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान् नारायणदेव यज्ञोंमें प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले माने गये हैं तथा वे ही वेदों और वेदांगोंके ज्ञाता परमेश्वर नित्य-निरन्तर यज्ञधारी (यज्ञकर्ता) भी बताये गये हैं। एक ही भगवान्में यज्ञोंके कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों कैसे सम्भव होते हैं? ॥ १ ॥
निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षमी भागवतः प्रभुः ।
निवृत्तिधर्मान् विदधे स एव भगवान् प्रभुः ॥ २ ॥
सबके स्वामी क्षमाशील भगवान् नारायण स्वयं तो निवृत्तिधर्ममें ही स्थित हैं और उन्हीं सर्वशक्तिमान् भगवान्ने निवृत्तिधर्मोंका विधान किया है ॥ २ ॥
कथं प्रवृत्तिधर्मेषु भागार्हा देवताः कृताः ।
कथं निवृत्तिधर्माश्च कृता व्यावृत्तबुद्धयः ॥ ३ ॥
इस प्रकार निवृत्तिधर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होंने देवताओंको प्रवृत्तिधर्मोंमें अर्थात् यज्ञादि कर्मोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बनाया? तथा ऋषि-मुनियोंको विषयोंसे विरक्तबुद्धि और निवृत्तिधर्मपरायण किस कारण बनाया? ॥ ३ ॥
एतं नः संशयं सौते छिन्धि गुह्यं सनातनम् ।
त्वया नारायणकथाः श्रुता वै धर्मसंहिताः ॥ ४ ॥
सूतनन्दन! यह गूढ़ संदेह हमारे मनमें सदा उठता रहता है, आप इसका निवारण कीजिये; क्योंकि आपने भगवान् नारायणकी बहुत-सी धर्मसंगत कथाएँ सुन रखी हैं ॥ ४ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयेन यत् पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धीमतः ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पौराणं शौनकोत्तम ॥ ५ ॥
सूतपुत्रने कहा— मुनिश्रेष्ठ शौनक! राजा जनमेजयने बुद्धिमान् व्यासजीके शिष्य वैशम्पायनजीके सम्मुख जो प्रश्न उपस्थित किया था, उस पुराणप्रोक्त विषयका मैं तुम्हारे
सामने वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥ श्रुत्वा माहात्म्यमेतस्य देहिनां परमात्मनः । जनमेजयो महाप्राज्ञो वैशम्पायनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ परम बुद्धिमान् जनमेजयने समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप इन परमात्मा नारायणदेवका माहात्म्य सुनकर उनसे इस प्रकार कहा ॥ ६ ॥ जनमेजय उवाच इमे सब्रह्मका लोकाः ससुरासुरमानवाः । क्रियास्वभ्युदयोक्तासु सक्ता दृश्यन्ति सर्वशः ॥ ७ ॥ जनमेजय बोले—मुने! ब्रह्मा, देवगण, असुरगण तथा मनुष्योंसहित ये समस्त लोक लौकिक अभ्युदयके लिये बताये गये कर्मोंमें ही आसक्त देखे जाते हैं ॥ ७ ॥ मोक्षश्चोक्तस्त्वया ब्रह्मन् निर्वाणं परमं सुखम् । ये तु मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिताः ॥ ८ ॥ ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्तीह शुश्रुम । ब्रह्मन्! परंतु आपने मोक्षको परम शान्ति एवं परम सुखस्वरूप बताया है। जो मुक्त होते हैं, वे पुण्य और पापसे रहित हो सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले भगवान् नारायणदेवमें प्रवेश करते हैं, यह बात मैंने सुन रखी है ॥ ८ १/२ ॥ अयं हि दुरनुष्ठेयो मोक्षधर्मः सनातनः ॥ ९ ॥ यं हित्वा देवताः सर्वा हव्यकव्यभुजोऽभवन् । किंतु यह सनातन मोक्षधर्म अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है, जिसे छोड़कर सब देवता हव्य और कव्योंके भोक्ता बन गये हैं ॥ ९ १/२ ॥ किं च ब्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्च बलभित् प्रभुः ॥ १० ॥ सूर्यस्ताराधिपो वायुरग्निर्वरुण एव च । आकाशं जगती चैव ये च शेषा दिवौकसः ॥ ११ ॥ प्रलयं न विजानन्ति आत्मनः परिनिर्मितम् । ततस्तेनास्थिता मार्गं ध्रुवमक्षरमव्ययम् ॥ १२ ॥ इसके सिवा ब्रह्मा, रुद्र और बलासुरका वध करनेवाले सामर्थ्यशाली इन्द्र एवं सूर्य, तारापति चन्द्रमा, वायु, अग्नि, वरुण, आकाश, पृथ्वी तथा जो अवशिष्ट देवता बताये गये हैं, वे सब क्या परमात्माके रचे हुए अपने मोक्षमार्गको नहीं जानते हैं? जिससे कि निश्चल, क्षयशून्य एवं अविनाशी मार्गका आश्रय नहीं लेते हैं? ॥ १०—१२ ॥ स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिताः । दोषः कालपरीमाणे महानेष क्रियावताम् ॥ १३ ॥
जो लोग नियत कालतक प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलोंको लक्ष्य करके प्रवृत्तिमार्गका आश्रय लेते हैं, उन कर्मपरायण पुरुषोंके लिये यही सबसे बड़ा दोष है कि वे कालकी सीमामें आबद्ध रहकर ही कर्मका फल भोग करते हैं ॥ १३ ॥ एतन्मे संशयं विप्र हृदि शल्यमिवार्पितम् । छिन्धीतिहासकथनात् परं कौतूहलं हि मे ॥ १४ ॥ विप्रवर! यह संशय मेरे हृदयमें काँटेके समान चुभता है। आप इतिहास सुनाकर मेरे संदेहका निवारण करें। मेरे मनमें इस विषयको जाननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ॥ १४ ॥ कथं भागहराः प्रोक्ता देवताः क्रतुषु द्विज । किमर्थं चाध्वरे ब्रह्मन्निज्यन्ते त्रिदिवौकसः ॥ १५ ॥ द्विजश्रेष्ठ! देवताओंको यज्ञोंमें भाग लेनेका अधिकारी क्यों बताया गया है? ब्रह्मन्! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवताओंकी ही यज्ञमें किसलिये पूजा की जाती है? ॥ १५ ॥ ये च भागं प्रगृह्णन्ति यज्ञेषु द्विजसत्तम । ते यजन्तो महायज्ञैः कस्य भागं ददन्ति वै ॥ १६ ॥ ब्राह्मणशिरोमणे! जो यज्ञोंमें भाग ग्रहण करते हैं, वे देवता जब स्वयं महायज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, तब किसको भाग समर्पित करते हैं? ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
अहो गूढतमः प्रश्नस्त्वया पृष्टो जनेश्वर । नातप्ततपसा ह्येष नावेदविदुषा तथा ॥ १७ ॥ नापुराणविदा चैव शक्यो व्याहर्तुमञ्जसा । **वैशम्पायनजीने कहा—**जनेश्वर! तुमने बड़ा गूढ़ प्रश्न उपस्थित किया है। जिसने तपस्या नहीं की है तथा जो वेदों और पुराणोंका विद्वान् नहीं है, वह मनुष्य अनायास ही ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ १७१/२ ॥ हन्त ते कथयिष्यामि यन्मे पृष्टः पुरा गुरुः ॥ १८ ॥ कृष्णद्वैपायनो व्यासो वेदव्यासो महार्षिः । अब मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। पूर्वकालमें मेरे पूछनेपर वेदोंका विस्तार करनेवाले गुरुदेव महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने जो कुछ बताया था, वही मैं तुमसे कहूँगा ॥ १८१/२ ॥ सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः ॥ १९ ॥ अहं चतुर्थः शिष्यो वै पञ्चमश्च शुकः स्मृतः ।
सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पैल—इन तीनके सिवा व्यासजीका चौथा शिष्य मैं ही हूँ और पाँचवें शिष्य उनके पुत्र शुकदेव माने गये हैं॥ १९ ½ ॥
एतान् समागतान् सर्वान् पञ्च शिष्यान् दमान्वितान् ॥ २० ॥ शौचाचारसमायुक्तान् जितक्रोधान् जितेन्द्रियान् । वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ॥ २१ ॥ ये पाँचों शिष्य इन्द्रियदमन एवं मनोनिग्रहसे सम्पन्न, शौच तथा सदाचारसे संयुक्त, क्रोधशून्य और जितेन्द्रिय हैं। अपनी सेवामें आये हुए इन सभी शिष्योंको व्यासजीने चारों वेदों तथा पाँचवें वेद महाभारतका अध्ययन कराया॥
मेरौ गिरिवरे रम्ये सिद्धचारणसेविते । तेषामभ्यस्यतां वेदान् कदाचित् संशयोऽभवत् ॥ २२ ॥ एष वै यस्त्वया पृष्टस्तेन तेषां प्रकीर्तितः । ततः श्रुतो मया चापि तवाख्येयोऽद्य भारत ॥ २३ ॥ सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिवर मेरुके रमणीय शिखरपर वेदाभ्यास करते हुए हम सब शिष्योंके मनमें किसी समय यही संदेह उत्पन्न हुआ, जिसे आज तुमने पूछा है। भारत! व्यासजीने हम शिष्योंको जो उत्तर दिया, उसे मैंने भी उन्हींके मुखसे सुना था। वही आज तुम्हें भी बताना है॥ २२-२३॥
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा सर्वाज्ञानतमोनुदः । पराशरसुतः श्रीमान् व्यासो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ २४ ॥ अपने शिष्योंका संशययुक्त वचन सुनकर सबके अज्ञानान्धकारका निवारण करनेवाले पराशरनन्दन श्रीमान् व्यासजीने यह बात कही—॥ २४॥
मया हि सुमहत् तप्तं तपः परमदारुणम् । भूतं भव्यं भविष्यं च जानीयामिति सत्तमाः ॥ २५ ॥ ‘साधु पुरुषोंमें श्रेष्ठ शिष्यगण! एक समयकी बात है कि मैंने भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त कठोर और बड़ी भारी तपस्या की॥ २५॥
तस्य मे तप्ततपसो निगृहीतेन्द्रियस्य च । नारायणप्रसादेन क्षीरोदस्यानुकूलतः ॥ २६ ॥ त्रैकालिकमिदं ज्ञानं प्रादुर्भूतं यथेप्सितम् । तच्छृणुध्वं यथान्यायं वक्ष्ये संशयमुत्तमम् ॥ २७ ॥ ‘जब मैं इन्द्रियोंको वशमें करके अपनी तपस्या पूर्ण कर चुका, तब भगवान् नारायणके कृपाप्रसादसे क्षीरसागरके तटपर मुझे मेरी इच्छाके अनुसार यह तीनों कालोंका ज्ञान प्राप्त
हुआ। अतः मैं तुम्हारे संदेहके निवारणके लिये उत्तम एवं न्यायोचित बात कहूँगा। तुमलोग ध्यान देकर सुनो ।। २६-२७ ।।
यथा वृत्तं हि कल्पादौ दृष्टं मे ज्ञानचक्षुषा । परमात्मेति यं प्राहुः सांख्ययोगविदो जनाः ।। २८ ।। महापुरुषसंज्ञां स लभते स्वेन कर्मणा । तस्मात् प्रसूतम्व्यक्तं प्रधानं तं विदुर्बुधाः ।। २९ ।। 'कल्पके आदिमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था और जिसे मैंने ज्ञानदृष्टिसे देखा था, वह सब बता रहा हूँ। सांख्य और योगके विद्वान् जिन्हें परमात्मा कहते हैं, वे ही अपने कर्मके प्रभावसे महापुरुष नाम धारण करते हैं। उन्हींसे अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई है, जिसे विद्वान् पुरुष प्रधानके नामसे भी जानते हैं ।। २८-२९ ।।
अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् । अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मेति कथ्यते ।। ३० ।। 'जगत्की सृष्टिके लिये उन्हीं महापुरुष और अव्यक्तसे व्यक्तकी उत्पत्ति हुई, जिसे सम्पूर्ण लोकोंमें अनिरुद्ध एवं महान् आत्मा कहते हैं ।। ३० ।।
योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् । सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः ।। ३१ ।। 'व्यक्तभावको प्राप्त हुए उन्हीं अनिरुद्धने पितामह ब्रह्माकी सृष्टि की। वे ब्रह्मा सम्पूर्ण तेजोमय हैं और उन्हींको समष्टि अहंकार कहा गया है ।। ३१ ।।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । अहंकार प्रसूतानि महाभूतानि पञ्चधा ।। ३२ ।। 'पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये पाँच सूक्ष्म महाभूत अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं ।। ३२ ।।
महाभूतानि सृष्ट्वैव तान् गुणान् निर्ममे पुनः । भूतेभ्यश्चैव निष्पन्ना मूर्तिमन्तश्च तान् शृणु ।। ३३ ।। 'अहंकारस्वरूप ब्रह्माने पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टि करके फिर उनके शब्द-स्पर्श आदि गुणोंका निर्माण किया। उन भूतोंसे जो मूर्तिमान् प्राणी उत्पन्न हुए, उनके नाम सुनो ।। ३३ ।।
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महात्मा वै मनुः स्वायम्भुवस्तथा ।। ३४ ।। 'मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, महात्मा वसिष्ठ और स्वायम्भुव मनु ।। ३४ ।।
ज्ञेयाः प्रकृतयोऽष्टौ ता यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः । वेदवेदाङ्गसंयुक्तान् यज्ञान् यज्ञाङ्गसंयुतान् ।। ३५ ।।
निर्ममे लोकसिद्धयर्थं ब्रह्मा लोकपितामहः ।
अष्टाभ्यः प्रकृतिभ्यश्च जातं विश्वमिदं जगत् ॥ ३६ ॥
‘इन आठोंको प्रकृति जानना चाहिये, जिनमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। लोकपितामह ब्रह्माने सम्पूर्ण लोकोंके जीवन-निर्वाहके लिये वेद-वेदांग और यज्ञांगोंसे युक्त यज्ञोंकी सृष्टि की है। पूर्वोक्त आठ प्रकृतियोंसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है ॥ ३५-३६ ॥
रुद्रो रोषात्मको जातो दशान्यान् सोऽसृजत् स्वयम् ।
एकादशैते रुद्रास्तु विकारपुरुषाः स्मृताः ॥ ३७ ॥
‘ब्रह्माजीके रोषसे रुद्रका प्रादुर्भाव हुआ है। उन रुद्रने स्वयं ही दस अन्य रुद्रोंकी भी सृष्टि कर ली है। इस प्रकार ये ग्यारह रुद्र हैं, जो विकारपुरुष माने गये हैं ॥ ३७ ॥
ते रुद्राः प्रकृतिश्चैव सर्वे चैव सुरर्षयः ।
उत्पन्ना लोकसिद्धयर्थं ब्रह्माणं समुपस्थिताः ॥ ३८ ॥
‘वे ग्यारह रुद्र, आठ प्रकृति और समस्त देवर्षिगण, जो लोकरक्षाके लिये उत्पन्न हुए थे, ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ३८ ॥
वयं सृष्टा हि भगवंस्त्वया च प्रभविष्णुना ।
येन यस्मिन्नधीकारे वर्तितव्यं पितामह ॥ ३९ ॥
योऽसौ त्वयाभिनिर्दिष्टो ह्यधिकारोऽर्थचिन्तकः ।
परिपाल्यः कथं तेन साहंकारेण कर्तृणा ॥ ४० ॥
(और इस प्रकार बोले—) ‘भगवन्! पितामह! आप महान् प्रभावशाली हैं। आपने ही हमलोगोंकी सृष्टि की है। हममेंसे जिसको जिस अधिकार या कार्यमें प्रवृत्त होना है तथा आपके द्वारा जिस अर्थसाधक अधिकारका निर्देश किया गया है, उसका पालन अहंकारयुक्त कर्ताके द्वारा कैसे हो सकता है? ॥ ३९-४० ॥
प्रदिशस्व बलं तस्य योऽधिकारार्थचिन्तकः ।
एवमुक्तो महादेवो देवांस्तानिदमब्रवीत् ॥ ४१ ॥
‘उस अधिकार और प्रयोजनका चिन्तन करनेवाला जो पुरुष है, उसे आप कर्तव्यपालनकी शक्ति प्रदान कीजिये।’ उनके ऐसा कहनेपर महान् देव ब्रह्माजीने उन देवताओंसे इस प्रकार कहा ॥ ४१ ॥
ब्रह्मोवाच
साध्वहं ज्ञापितो देवा युष्माभिर्भद्रमस्तु वः ।
ममाप्येषा समुत्पन्ना चिन्ता या भवतां मता ॥ ४२ ॥
ब्रह्माजी बोले—देवताओ! तुमने मुझे अच्छी बात सुझायी है! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे हृदयमें जो चिन्ता उत्पन्न हुई है, वही मेरे हृदयमें भी पैदा हुई है ॥
लोकत्रयस्य कृत्स्नस्य कथं कार्यः परिग्रहः ।
कथं बलक्षयो न स्याद् युष्माकं ह्यात्मनश्च मे ॥ ४३ ॥
किस प्रकार तीनों लोकोंके अधिकृत कार्यका सम्पादन किया जाय तथा किस तरह तुम्हारी और मेरी शक्तिका भी क्षय न हो ॥ ४३ ॥
इतः सर्वेऽपि गच्छामः शरणं लोकसाक्षिणम् ।
महापुरुषमव्यक्तं स नो वक्ष्यति यद्धितम् ॥ ४४ ॥
हम सब लोग यहाँसे अव्यक्त लोकसाक्षी महापुरुष नारायणदेवकी शरणमें चलें। वे हमारे लिये हितकी बात बतायेंगे ॥ ४४ ॥
ततस्ते ब्रह्मणा सार्धमृषयो विबुधास्तथा ।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जग्मुर्लोकहितार्थिनः ॥ ४५ ॥
तदनन्तर वे सब ऋषि और देवता सम्पूर्ण जगत्के हितकी भावना लेकर ब्रह्माजीके साथ क्षीरसागरके उत्तर तटपर गये ॥ ४५ ॥
ते तपः समुपातिष्ठन् ब्रह्मोक्तं वेदकल्पितम् ।
स महानियमो नाम तपश्चर्यासु दारुणः ॥ ४६ ॥
वहाँ ब्रह्माजीके कथनानुसार उन सबने वेदोक्त रीतिसे तपस्या आरम्भ की। उनका वह महान् नियम सभी तपस्याओंमें कठोर था ॥ ४६ ॥
ऊर्ध्वा दृष्टिर्बाहवश्च एकाग्रं च मनोऽभवत् ।
एकपादाः स्थिताः सर्वे काष्ठभूताः समाहिताः ॥ ४७ ॥
उनकी आँखें ऊपरकी ओर लगी थीं, भुजाएँ भी ऊपरकी ओर ही उठी हुई थीं। मन एकाग्र था। वे सब-के-सब समाहितचित्त हो एक पैरसे खड़े हो काष्ठके समान जान पड़ते थे ॥ ४७ ॥
दिव्यं वर्षसहस्रं ते तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।
शुश्रुवुर्मधुरां वाणीं वेदवेदाङ्गभूषिताम् ॥ ४८ ॥
एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या करनेके पश्चात् उन्हें वेद और वेदांगोंसे विभूषित मधुर वाणी सुनायी दी ॥ ४८ ॥
श्रीभगवानुवाच
भो भोः सब्रह्मका देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
स्वागतेनार्च्य वः सर्वान् श्रावये वाक्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥
श्रीभगवान् बोले— हे तपस्याके धनी ब्रह्मा आदि देवताओ तथा ऋषियो! मैं स्वागतके द्वारा तुम सबका सत्कार करके तुम्हें यह उत्तम वचन सुनाता हूँ ॥ ४९ ॥
विज्ञातं वो मया कार्यं तच्च लोकहितं महत् ।
प्रवृत्तियुक्तं कर्तव्यं युष्मत्प्राणोपबृंहणम् ॥ ५० ॥
तुम्हारा प्रयोजन क्या है? यह मुझे ज्ञात हो गया है। वह सम्पूर्ण जगत्के लिये अत्यन्त हितकर है। तुम्हें प्रवृत्तियुक्त धर्मका पालन करना चाहिये। वह तुम्हारे प्राणोंका पोषक तथा शक्तिका संवर्द्धन करनेवाला होगा ॥ ५० ॥
सुतप्तं च तपो देवा ममाराधनकाम्यया ।
भोक्ष्यथास्य महासत्त्वास्तपसः फलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
महान् धैर्यशाली देवताओ! तुमलोगोंने मेरी आराधनाकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या की है। उस तपस्याके उत्तम फलका तुम अवश्य उपभोग करोगे ॥ ५१ ॥
एष ब्रह्मा लोकगुरुर्महान् लोकपितामहः ।
यूयं च विबुधश्रेष्ठा मां यजध्वं समाहिताः ॥ ५२ ॥
ये सम्पूर्ण जगत्के महान् गुरु लोकपितामह ब्रह्मा और तुम सभी श्रेष्ठ देवगण एकाग्रचित्त हो यज्ञोंद्वारा मेरा यजन करो ॥ ५२ ॥
सर्वे भागान् कल्पयध्वं यज्ञेषु मम नित्यशः ।
तथा श्रेयोऽभिधास्यामि यथाधीकारमीश्वराः ॥ ५३ ॥
लोकेश्वरो! तुम सब लोग यज्ञोंमें सदा मेरे लिये भाग समर्पित करते रहो। ऐसा होनेपर मैं तुम्हें तुम्हारे अधिकारके अनुसार कल्याणमार्गका उपदेश करता रहूँगा ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैतद् देवदेवस्य वाक्यं हृष्टतनूरुहाः ।
ततस्ते विबुधाः सर्वे ब्रह्मा ते च महर्षयः ॥ ५४ ॥
वेददृष्टेन विधिना वैष्णवं क्रतुमाहरन् ।
तस्मिन् सत्रे सदा ब्रह्मा स्वयं भागमकल्पयत् ॥ ५५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवाधिदेव भगवान् नारायणका यह वचन सुनकर उन सबके रोम हर्षसे खिल उठे। तदनन्तर उन सब देवताओं, महर्षियों और ब्रह्माजीने वेदोक्त विधिसे वैष्णव यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें ब्रह्माजीने स्वयं भगवान्के लिये भाग निश्चित किया ॥ ५४-५५ ॥
देवा देवर्षयश्चैव स्वं स्वं भागमकल्पयन् ।
ते कार्तयुगधर्माणो भागाः परमसत्कृताः ॥ ५६ ॥
उसी प्रकार देवताओं और देवर्षियोंने भी अपना-अपना भाग भगवान्के लिये निश्चित किया। सत्ययुगके न्यायानुसार निश्चित किये हुए वे उत्तम यज्ञ-भाग सबके द्वारा अत्यन्त सत्कृत हुए ॥ ५६ ॥
प्राहुरादित्यवर्णं तं पुरुषं तमसः परम् ।
बृहन्तं सर्वगं देवमीशानं वरदं प्रभुम् ॥ ५७ ॥
ऋषि कहते हैं कि 'भगवान् नारायण सूर्यके समान तेजस्वी, अन्तर्यामी पुरुष, अज्ञानान्धकारसे परे, सर्वव्यापी, सर्वगामी, ईश्वर, वरदाता और सर्वसमर्थ हैं' ॥ ५७ ॥ ततोऽथ वरदो देवस्तान् सर्वानमरान् स्थितान् । अशरीरो बभाषेदं वाक्यं खस्थो महेश्वरः ॥ ५८ ॥ यज्ञभाग निश्चित हो जानेपर उन वरदायक देवता महेश्वर नारायणदेवने आकाशमें बिना शरीरके ही स्थित हो वहाँ खड़े हुए उन समस्त देवताओंसे यह बात कही— ॥ ५८ ॥ येन यः कल्पितो भागः स तथा मामुपागतः । प्रीतोऽहं प्रदिशाम्यद्य फलमावृत्तिलक्षणम् ॥ ५९ ॥ 'देवताओ! जिसने जो भाग हमारे लिये निश्चित किया था, वह उसी रूपमें मुझे प्राप्त हो गया। इससे प्रसन्न होकर आज मैं तुम्हें पुनरावृत्तिरूप फल प्रदान करता हूँ ॥ ५९ ॥ एतद् वो लक्षणं देवा मत्प्रसादसमुद्भवम् । स्वयं यज्ञैर्यजमानाः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ६० ॥ युगे युगे भविष्यध्वं प्रवृत्तिफलभागिनः । 'देवताओ! मेरी कृपासे तुम्हारा ऐसा ही लक्षण होगा। तुम प्रत्येक युगमें उत्तम दक्षिणाओंसे संयुक्त यज्ञोंद्वारा यजन करके प्रवृत्तिरूप धर्मफलके भागी होओगे ॥ ६० १/२ ॥ यज्ञैर्यै चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः ॥ ६१ ॥ कल्पयिष्यन्ति वो भागांस्ते नरा वेदकल्पितान् । 'देवगण! सम्पूर्ण लोकोंमें जो मनुष्य यज्ञोंद्वारा यजन करेंगे, वे तुम्हारे लिये वेदके कथनानुसार यज्ञभाग निश्चित करेंगे ॥ ६१ १/२ ॥ यो मे यथा कल्पितवान् भागमस्मिन् महाक्रतौ ॥ ६२ ॥ स तथा यज्ञभागार्हो वेदसूत्रे मया कृतः । 'इस महान् यज्ञमें जिस देवताने मेरे लिये जैसा भाग निश्चित किया है, वह वैदिक सूत्रमें मेरेद्वारा वैसे ही यज्ञभागका अधिकारी बनाया गया ॥ ६२ १/२ ॥ यूयं लोकान् भावयध्वं यज्ञभागफलोचिताः ॥ ६३ ॥ सर्वार्थचिन्तका लोके यथाधिकारनिर्मिताः । 'तुमलोग यज्ञमें भाग लेकर यजमानको उसका फल देनेमें प्रवृत्त हो जगत्में अपने अधिकारके अनुसार सबके सभी मनोरथोंका चिन्तन करते हुए सब लोगोंको उन्नतिशील बनाओ ॥ ६३ १/२ ॥ याः क्रियाः प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृताः ॥ ६४ ॥ आभिराप्यायितबला लोकान् वै धारयिष्यथ ।
'प्रवृत्ति-फलसे समादृत होनेवाली जिन यज्ञ-क्रियाओंका जगत्में प्रचार होगा, उन्हींसे तुम्हारे बलकी वृद्धि होगी और बलिष्ठ होकर तुमलोग सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करोगे ।। ६४ १/२ ।।
यूयं हि भाविता यज्ञैः सर्वयज्ञेषु मानवैः ।। ६५ ।।
मां ततो भावयिष्यध्वमेषा वो भावना मम ।
'सम्पूर्ण यज्ञोंमें मनुष्य तुम्हारा यजन करके तुम्हें उन्नतिशील एवं पुष्ट बनायेंगे, फिर तुमलोग भी मुझे इसी प्रकार परिपुष्ट करोगे। यही तुम्हारे लिये मेरा उपदेश है ।। ६५ १/२ ।।
इत्यर्थं निर्मिता वेदा यज्ञाश्चौषधिभिः सह ।। ६६ ।।
एभिः सम्यक् प्रयुक्तैर्हि प्रीयन्ते देवताः क्षितौ ।
'इसीके लिये मैंने वेदों तथा ओषधियों (अन्न-फल आदि) सहित यज्ञोंकी सृष्टि की है। इनका भलीभाँति पृथ्वीपर अनुष्ठान होनेसे सम्पूर्ण देवता तृप्त होंगे ।। ६६ १/२ ।।
निर्माणमेतद् युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम् ।। ६७ ।।
मया कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षयादिह ।
चिन्तयध्वं लोकहितं यथाधिकारमीश्वराः ।। ६८ ।।
'देवश्रेष्ठगण! मैंने प्रवृत्तिप्रधान गुणके सहित तुमलोगोंकी सृष्टि की है, अतः लोकेश्वरो! जबतक कल्पका अन्त न हो जाय, तबतक तुमलोग अपने अधिकारके अनुसार लोगोंका हितचिन्तन करते रहो ।।
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। ६९ ।।
'मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ—ये सात ऋषि ब्रह्माजीके द्वारा मनसे उत्पन्न किये गये हैं ।। ६९ ।।
एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः ।
प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ।। ७० ।।
'ये प्रधान वेदवेत्ता और प्रवृत्ति-धर्मावलम्बी हैं। इन सबको वेदाचार्य माना गया है और प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित किया गया है ।। ७० ।।
अयं क्रियावतां पन्था व्यक्तीभूतः सनातनः ।
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ।। ७१ ।।
'यह कर्मपरायण पुरुषोंके लिये सनातन मार्ग प्रकट हुआ है। इस पद्धतिसे लोकोंकी सृष्टि करनेवाले प्रभावशाली पुरुषको अनिरुद्ध कहा गया है ।। ७१ ।।
सनः सनत्सुजातश्च सनकः ससनन्दनः ।
सनत्कुमारः कपिलः सप्तमश्च सनातनः ।। ७२ ।।
सप्तैते मानसाः प्रोक्ता ऋषयो ब्रह्मणः सुताः ।
स्वयमागतविज्ञाना निवृत्तिं धर्ममास्थिताः ।। ७३ ।।
‘सन, सनत्सुजात, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल तथा सातवें सनातन—ये सात ऋषि भी ब्रह्माके मानस पुत्र कहे गये हैं। इन्हें स्वयं विज्ञान प्राप्त है और ये निवृत्तिधर्ममें स्थित हैं।। ७२-७३।।
एते योगविदो मुख्याः सांख्यज्ञानविशारदाः।
आचार्या धर्मशास्त्रेषु मोक्षधर्मप्रवर्तकाः॥ ७४॥
‘ये प्रमुख योगवेत्ता, सांख्यज्ञान-विशारद, धर्मशास्त्रोंके आचार्य तथा मोक्षधर्मके प्रवर्तक हैं।। ७४।।
यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात् त्रिगुणो महान्।
तस्मात् परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः॥ ७५॥
‘पूर्वकालमें अव्यक्त प्रकृतिसे जो त्रिगुणात्मक महान् अहंकार प्रकट हुआ था, उससे अत्यन्त परे जिसकी स्थिति है, वह समष्टि चेतन क्षेत्रज्ञ माना गया है।। ७५।।
सोऽहं क्रियावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः।
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन् यस्मिंश्च कर्मणि॥ ७६॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुते महत्।
‘वह क्षेत्रज्ञ मैं हूँ। जो कर्मपरायण मनुष्य हैं, वे पुनरावृत्तिशील हैं; अतः उनके लिये यह निवृत्तिमार्ग दुर्लभ है। जिस प्राणीका जिस प्रकार निर्माण हुआ है तथा वह जिस-जिस प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप कर्ममें संलग्न होता है, वह उसीके महान् फलका भागी होता है।। ७६ १/२।।
एष लोकगुरुर्ब्रह्मा जगदादिकरः प्रभुः॥ ७७॥
एष माता पिता चैव युष्माकं च पितामहः।
मयानुशिष्टो भविता सर्वभूतवरप्रदः॥ ७८॥
‘ये लोकगुरु ब्रह्मा जगत्के आदि स्रष्टा और प्रभु हैं। ये ही तुम्हारे माता-पिता और पितामह हैं। मेरी आज्ञाके अनुसार ये सम्पूर्ण भूतोंको वर प्रदान करनेवाले होंगे।। ७७-७८।।
अस्य चैवात्मजो रुद्रो ललाटाद् यः समुत्थितः।
ब्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वभूतधरः प्रभुः॥ ७९॥
‘इनके ललाटसे जो रुद्र उत्पन्न हुए हैं, वे भी इन (ब्रह्माजी) के ही पुत्र हैं। ब्रह्माजीकी आज्ञासे वे सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ होंगे।। ७९।।
गच्छध्वं स्वानधिकारांश्चिन्तयध्वं यथाविधि।
प्रवर्तन्तां क्रियाः सर्वाः सर्वलोकेषु मा चिरम्॥ ८०॥
‘तुम सब लोग जाओ और अपने-अपने अधिकारोंका विधिपूर्वक पालन करो। समस्त लोकोंमें सम्पूर्ण वैदिक क्रियाएँ अविलम्ब प्रचलित हो जानी चाहिये।। ८०।।
प्रदिश्यन्तां च कर्माणि प्राणिनां गतयस्तथा।
परिनिश्चितकालानि आयूंषीह सुरोत्तमाः ॥ ८१ ॥
‘सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग प्राणियोंको उनके कर्म, उन कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली गति तथा नियत कालतककी आयु प्रदान करो ॥ ८१ ॥
इदं कृतयुगं नाम कालः श्रेष्ठः प्रवर्तितः ।
अहिंस्या यज्ञपशवो युगेऽस्मिन् न तदन्यथा ॥ ८२ ॥
‘यह सत्ययुग नामक श्रेष्ठ समय चल रहा है। इस युगमें यज्ञ-पशुओंकी हिंसा नहीं की जाती। अहिंसा-धर्मके विपरीत यहाँ कुछ भी नहीं होता है ॥ ८२ ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मो भविष्यत्यत्र वै सुराः ।
ततस्त्रेतायुगं नाम त्रयी यत्र भविष्यति ॥ ८३ ॥
‘देवताओ! इस सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त सम्पूर्ण धर्मका पालन होगा। तदनन्तर त्रेतायुग आयेगा, जिसमें वेदत्रयीका प्रचार होगा ॥ ८३ ॥
प्रोक्षिता यत्र पशवो वधं प्राप्स्यन्ति वै मखे ।
यत्र पादश्चतुर्थो वै धर्मस्य न भविष्यति ॥ ८४ ॥
‘उस युगमें यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये गये पशुओंका वध किया जायगा* और धर्मका एक पाद—चतुर्थ अंश कम हो जायगा ॥ ८४ ॥
ततो वै द्वापरं नाम मिश्रः कालो भविष्यति ।
द्विपादहीनो धर्मश्च युगे तस्मिन् भविष्यति ॥ ८५ ॥
‘उसके बाद द्वापर युगका आगमन होगा। वह समय धर्म और अधर्मके सम्मिश्रणसे युक्त होगा। उस युगमें धर्मके दो चरण नष्ट हो जायँगे ॥ ८५ ॥
ततस्तिष्येऽथ सम्प्राप्ते युगे कलिपुरस्कृते ।
एकपादस्थितो धर्मो यत्र तत्र भविष्यति ॥ ८६ ॥
‘तदनन्तर पुष्य नक्षत्रमें कलियुगका पदार्पण होगा। उस समय यत्र-तत्र धर्मका एक चरण ही शेष रह जायगा’ ॥ ८६ ॥
देवा देवर्षयश्चोचुस्तमेवंवादिनं गुरुम् ।
एकपादस्थिते धर्मे यत्र क्वचन गामिनि ॥ ८७ ॥
कथं कर्तव्यमस्माभिर्भगवंस्तद् वदस्व नः ।
तब देवताओं और देवर्षियोंने उपर्युक्त बात कहनेवाले गुरुस्वरूप भगवान्से कहा—‘भगवन्! जब कलियुगमें जहाँ-कहीं भी धर्मका एक ही चरण अवशिष्ट रहेगा, तब हमें क्या करना होगा? यह बताइये’ ॥ ८७ १/२ ॥
श्रीभगवानुवाच
यत्र वेदाश्च यज्ञाश्च तपः सत्यं दमस्तथा ॥ ८८ ॥
अहिंसाधर्मसंयुक्ताः प्रचरेयुः सुरोत्तमाः ।
स वो देशः सेवितव्यो मा वोऽधर्मः पदा स्पृशेत् ॥ ८९ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**सुरश्रेष्ठगण! जहाँ वेद, यज्ञ, तप, सत्य, इन्द्रियसंयम और अहिंसाधर्म प्रचलित हों, उसी देशका तुम्हें सेवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हें अधर्म अपने एक पैरसे भी नहीं छू सकेगा ॥
व्यास उवाच
तेऽनुशिष्टा भगवता देवाः सर्षिगणास्तथा । नमस्कृत्या भगवते जग्मुर्देशान् यथेप्सितान् ॥ ९० ॥ **व्यासजी कहते हैं—**शिष्यो! भगवान्का यह उपदेश पाकर ऋषियोंसहित देवता उन्हें नमस्कार करके अपने अभीष्ट देशोंको चले गये ॥ ९० ॥ गतेषु त्रिदिवौकःसु ब्रह्मैकः पर्यवस्थितः । दिदृक्षुर्भगवन्तं तमनिरुद्धतनौ स्थितम् ॥ ९१ ॥ स्वर्गवासी देवताओंके चले जानेपर अकेले ब्रह्माजी ही वहाँ खड़े रहे। वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित भगवान् श्रीहरिका दर्शन करना चाहते थे ॥ ९१ ॥ तं देवो दर्शयामास कृत्वा हयशिरो महत् । साङ्गानावर्तयन् वेदान् कमण्डलुत्रिदण्डधृक् ॥ ९२ ॥ तब भगवान्ने महान् हयग्रीवरूप धारण करके ब्रह्माजीको दर्शन दिया। वे कमण्डलु और त्रिदण्ड धारण करके छहों अंगोंसहित वेदोंकी आवृत्ति कर रहे थे ॥ ९२ ॥ ततोऽश्वशिरसं दृष्ट्वा तं देवममितौजसम् । लोककर्ता प्रभुर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ ९३ ॥ मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः । स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ॥ ९४ ॥ उस समय अमित पराक्रमी भगवान् हयग्रीवका दर्शन करके सम्पूर्ण जगत्के हितकी कामनासे लोककर्ता भगवान् ब्रह्माने उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उन वरदायक देवताके सम्मुख वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब भगवान्ने उनको हृदयसे लगाकर यह बात सुनायी ॥ ९३-९४ ॥
श्रीभगवानुवाच
लोककार्यगतीः सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि । धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः ॥ ९५ ॥ **श्रीभगवान् बोले—**ब्रह्मन्! तुम सम्पूर्ण लोकोंके समस्त कर्मों और उनसे मिलनेवाली गतियोंका विधिपूर्वक चिन्तन करो; क्योंकि तुम्हीं सम्पूर्ण प्राणियोंके धाता हो, तुम्हीं सबके प्रभु हो और तुम्हीं इस जगत्के गुरु हो ॥ ९५ ॥ त्वय्यावेशितभारोऽहं धृतिं प्राप्स्याम्यथाञ्जसा ।
यदा च सुरकार्यं ते अविषह्यं भविष्यति ॥ ९६ ॥ प्रादुर्भावं गमिष्यामि तदाऽऽत्मज्ञानदैशिकः । एवमुक्त्वा हयशिरास्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ९७ ॥ तुमपर यह भार रखकर मैं अनायास ही धैर्य धारण करूँगा। जब कभी तुम्हारे लिये देवताओंका कार्य असह्य हो जायगा, तब मैं आत्मज्ञानका उपदेश देनेके लिये तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा। ऐसा कहकर भगवान् हयग्रीव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९६-९७ ॥ तेनानुशिष्टो ब्रह्मापि स्वलोकमचिराद् गतः । एवमेष महाभागः पद्मनाभः सनातनः ॥ ९८ ॥ यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा । निवृत्तिं चास्थितो धर्मं गतिमक्षयधर्मिणाम् । प्रवृत्तिधर्मान् विदधे कृत्वा लोकस्य चित्रताम् ॥ ९९ ॥ भगवान्का यह उपदेश पाकर ब्रह्मा भी शीघ्र ही अपने लोकको चले गये। इस प्रकार ये महाभाग सनातन पुरुष भगवान् पद्मनाभ यज्ञोंमें अग्रभोक्ता और सदा ही यज्ञके पोषक एवं प्रवर्तक बताये गये हैं। वे कभी अक्षयधर्मी महात्माओंके निवृत्तिधर्मका आश्रय लेते हैं और कभी लोककी विचित्र चित्तवृत्ति करके प्रवृत्तिधर्मका विधान करते हैं ॥ ९८-९९ ॥ स आदिः स मध्यः स चान्तः प्रजानां स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम् । युगान्ते प्रसुप्तः सुसंक्षिप्य लोकान् युगादौ प्रबुद्धो जगद्द्युत्ससर्ज ॥ १०० ॥ वे ही भगवान् नारायण प्रजाके आदि, मध्य और अन्त हैं। वे ही धाता, धेय, कर्ता और कार्य हैं। वे ही युगान्तके समय सम्पूर्ण लोकोंका संहार करके सो जाते हैं और वे ही कल्पके आदिमें जाग्रत् हो सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ १०० ॥ तस्मै नमध्वं देवाय निर्गुणाय महात्मने । अजाय विश्वरूपाय धाम्ने सर्वदिवौकसाम् ॥ १०१ ॥ शिष्यो! तुम उन्हीं अजन्मा, विश्वरूप, सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय निर्गुण परमात्मा नारायणदेवको नमस्कार करो ॥ १०१ ॥ महाभूताधिपतये रुद्राणां पतये तथा । आदित्यपतये चैव वसूनां पतये तथा ॥ १०२ ॥ वे ही महाभूतोंके अधिपति तथा रुद्रों, आदित्यों और वसुओंके स्वामी हैं। उन्हें नमस्कार करो ॥ १०२ ॥ अश्विभ्यां पतये चैव मरुतां पतये तथा । वेदयज्ञाधिपतये वेदाङ्गपतयेऽपि च ॥ १०३ ॥
वे अश्विनीकुमारोंके पति, मरुद्गणोंके पालक, वेद और यज्ञोंके अधिपति तथा वेदांगोंके भी स्वामी हैं। उन्हें प्रणाम करो ।। १०३ ।।
समुद्रवासिने नित्यं हरये मुञ्जकेशिने ।
शान्ताय सर्वभूतानां मोक्षधर्मानुभाषिणे ।। १०४ ।।
जो सदा समुद्रमें निवास करते हैं, जिनका केश मूँजके समान है तथा जो समस्त प्राणियोंको मोक्षधर्मका उपदेश देते हैं, उन शान्तस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार करो ।। १०४ ।।
तपसां तेजसां चैव पतये यशसामपि ।
वचसां पतये नित्यं सरितां पतये तथा ।। १०५ ।।
जो तप, तेज, यश, वाणी तथा सरिताओंके स्वामी एवं नित्य संरक्षक हैं, उन श्रीहरिको नमस्कार करो ।। १०५ ।।
कपर्दिने वराहाय एकशृङ्गाय धीमते ।
विवस्वतेऽश्वशिरसे चतुर्मूर्तिधृते सदा ।। १०६ ।।
जो जटाजूटधारी, एक सींगवाले वराह, बुद्धिमान् विवस्वान्, हयग्रीव तथा चतुर्मूर्तिधारी हैं, उन श्रीनारायण-देवको सदा नमस्कार करो ।। १०६ ।।
गुह्याय ज्ञानदृश्याय अक्षराय क्षराय च ।
एष देवः संचरति सर्वत्रगतिरव्ययः ।। १०७ ।।
जिनका स्वरूप गुह्य है, जो ज्ञानरूपी नेत्रसे ही देखे जाते हैं तथा अक्षर और क्षररूप हैं, उन श्रीहरिको प्रणाम करो। ये अविनाशी नारायणदेव सर्वत्र संचरण करते हैं; इनकी सर्वत्र गति है ।। १०७ ।।
एष चैतत् परं ब्रह्म ज्ञेयो विज्ञानचक्षुषा ।
एवमेतत् पुरा दृष्टं मया वै ज्ञानचक्षुषा ।। १०८ ।।
ये ही परब्रह्म हैं। विज्ञानमय नेत्रसे ही इनका दर्शन एवं ज्ञान हो सकता है। पूर्वकालमें मैंने ज्ञानदृष्टिसे ही इनका इस प्रकार साक्षात्कार किया था ।। १०८ ।।
कथितं तच्च वै सर्वं मया पृष्टेन तत्त्वतः ।
क्रियतां मद्वचः शिष्याः सेव्यतां हरिरीश्वरः ।
गीयतां वेदशब्दैश्च पूज्यतां च यथाविधि ।। १०९ ।।
शिष्यो! तुमलोगोंके पूछनेपर मैंने ये सारी बातें यथार्थरूपसे कही हैं। तुम मेरी बात मानो और सर्वेश्वर श्रीहरिका सेवन करो। वेदमन्त्रोंद्वारा उन्हींकी महिमाका गान और उन्हींका विधिपूर्वक पूजन करो ।। १०९ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तास्तु वयं तेन वेदव्यासेन धीमता ।
सर्वे शिष्याः सुतश्चास्य शुकः परमधर्मवित् ॥ ११० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् वेदव्यासने हम सब शिष्योंको तथा अपने परम धर्मज्ञ पुत्र शुकदेवको ऐसा ही उपदेश दिया ॥ ११० ॥ स चास्माकमुपाध्यायः सहास्माभिर्विशाम्पते । चतुर्वेदोद्गताभिस्तमृग्भिः समभितुष्टुवे ॥ १११ ॥ प्रजानाथ! फिर हमारे उपाध्याय व्यासने हमारे साथ चारों वेदोंकी ऋचाओंद्वारा उन नारायणदेवका स्तवन किया ॥ १११ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । एवं मेऽकथयद् राजन् पुरा द्वैपायनो गुरुः ॥ ११२ ॥ राजन्! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। पूर्वकालमें मेरे गुरु व्यासजीने मुझे ऐसा ही उपदेश दिया था ॥ ११२ ॥ यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चैनं परिकीर्तयेत् । नमो भगवते कृत्वा समाहितमतिर्नरः ॥ ११३ ॥ भवत्यरोगो मतिमान् बलरूपसमन्वितः । आतुरो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११४ ॥ जो प्रतिदिन इसे सुनता है और जो भगवान्को नमस्कार करके एकाग्रचित्त हो सदा इसका पाठ करता है, वह बुद्धिमान्, बलवान्, रूपवान् तथा रोगरहित होता है। रोगी रोगसे और बँधा हुआ पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ११३-११४ ॥ कामान् कामी लभेत् कामं दीर्घं चायुरवाप्नुयात् । ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥ ११५ ॥ कामनावाला पुरुष मनोवांछित कामनाओंको पाता है तथा बड़ी भारी आयु प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता और क्षत्रिय विजयी होता है ॥ ११५ ॥ वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् । अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या चैवेप्सितं पतिम् ॥ ११६ ॥ वैश्य इसको पढ़ने और सुननेसे महान् लाभका भागी होता है। शूद्र सुख पाता है। पुत्रहीनको पुत्र और कन्याको मनोवांछित पतिकी प्राप्ति होती है ॥ ११६ ॥ लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनयेत् सुतम् । वन्ध्या प्रसवमाप्नोति पुत्रपौत्रसमृद्धिमत् ॥ ११७ ॥ जिसका गर्भ अटक गया हो, वह इसको सुननेसे उस संकटसे छूट जाती है। गर्भवती स्त्री यथासमय पुत्र पैदा करती है। वन्ध्या भी प्रसवको प्राप्त होती है तथा उसका वह प्रसव पुत्र-पौत्र एवं समृद्धिसे सम्पन्न होता है ॥ ११७ ॥ क्षेमेण गच्छेदध्वानमिदं यः पठते पथि । यो यं कामं कामयते स तमाप्नोति च ध्रुवम् ॥ ११८ ॥
जो मार्गमें इसका पाठ करता है, वह कुशलतापूर्वक अपनी यात्रा पूरी करता है। इसे पढ़ने और सुननेवाला पुरुष जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है ॥ ११८ ॥
इदं महर्षेर्वचनं विनिश्चितं
महात्मनः पुरुषवरस्य कीर्तितम् ।
समागमं चर्षिदिवौकसामिमं
निशम्य भक्ताः सुसुखं लभन्ते ॥ ११९ ॥
पुरुषप्रवर महात्मा महर्षि व्यासके कहे हुए इस सिद्धान्तभूत वचनको तथा ऋषियों और देवताओंके समागम-सम्बन्धी इस वृत्तान्तको श्रवण करके भक्तजन उत्तम सुख पाते हैं ॥ ११९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४० ॥
* पशुवधसे यहाँ क्या अभिप्राय है, ठीक समझमें नहीं आया।
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना
एकचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना
जनमेजय उवाच
अस्तौषीद् यैरिमं व्यासः सशिष्यो मधुसूदनम् ।
नामभिर्विविधैरेषां निरुक्तं भगवन् मम ॥ १ ॥
वक्तुमर्हसि शुश्रूषोः प्रजापतिपतेर्हरेः ।
श्रुत्वा भवेयं यत् पूतः शरच्चन्द्र इवामलः ॥ २ ॥
**जनमेजयने कहा—**भगवन्! शिष्योंसहित महर्षि व्यासने जिन नाना प्रकारके नामोंद्वारा इन मधुसूदनका स्तवन किया था, उनका निर्वचन (व्युत्पत्ति) मुझे बतानेकी कृपा करें। मैं प्रजापतियोंके पति भगवान् श्रीहरिके नामोंकी व्याख्या सुनना चाहता हूँ; क्योंकि उन्हें सुनकर मैं शरच्चन्द्रके समान निर्मल एवं पवित्र हो जाऊँगा ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् यथाऽऽचष्ट फाल्गुनस्य हरिः प्रभुः ।
प्रसन्नात्माऽऽत्मनो नाम्नां निरुक्तं गुणकर्मजम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! भगवान् श्रीहरिने अर्जुनपर प्रसन्न होकर उनसे गुण और कर्मके अनुसार स्वयं अपने नामोंकी जैसी व्याख्या की थी, वही तुम्हें सुना रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
नामभिः कीर्तितैस्तस्य केशवस्य महात्मनः ।
पृष्टवान् केशवं राजन् फाल्गुनः परवीरहा ॥ ४ ॥
नरेश्वर! जिन नामोंके द्वारा उन महात्मा केशवका कीर्तन किया जाता है, शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने श्रीकृष्णसे उनके विषयमें इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥
अर्जुन उवाच
भगवन् भूतभव्येश सर्वभूतसृगव्यय ।
लोकधाम जगन्नाथ लोकानामभयप्रद ॥ ५ ॥
यानि नामानि ते देव कीर्तितानि महर्षिभिः ।
वेदेषु सपुराणेषु यानि गुह्यानि कर्मभिः ॥ ६ ॥
तेषां निरुक्तं त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि केशव ।
न ह्यन्यो वर्ण येन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो ॥ ७ ॥
अर्जुन बोले—भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके स्वामी, सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा, अविनाशी, जगदाधार तथा सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले जगन्नाथ, भगवन्, नारायणदेव! महर्षियोंने आपके जो-जो नाम कहे हैं तथा पुराणों और वेदोंमें कर्मानुसार जो-जो गोपनीय नाम पढ़े गये हैं, उन सबकी व्याख्या मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ। प्रभो! केशव! आपके सिवा दूसरा कोई उन नामोंकी व्युत्पत्ति नहीं बता सकता ॥ ५—७ ॥
श्रीभगवानुवाच
ऋग्वेदे सयजुर्वेदे तथैवाथर्वसामसु ।
पुराणे सोपनिषदे तथैव ज्यौतिषेऽर्जुन ॥ ८ ॥
सांख्ये च योगशास्त्रे च आयुर्वेदे तथैव च ।
बहूनि मम नामानि कीर्तितानि महर्षिभिः ॥ ९ ॥
श्रीभगवान्ने कहा—अर्जुन! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, उपनिषद्, पुराण, ज्योतिष, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र तथा आयुर्वेदमें महर्षियोंने मेरे बहुत-से नाम कहे हैं ॥ ८-९ ॥
गौणानि तत्र नामानि कर्मजानि च कानिचित् ।
निरुक्तं कर्मजानां त्वं शृणुष्व प्रयतोऽनघ ॥ १० ॥
उनमें कुछ नाम तो गुणोंके अनुसार हैं और कुछ कर्मोंसे हुए हैं। निष्पाप अर्जुन! तुम पहले एकाग्रचित होकर मेरे कर्मजनित नामोंकी व्याख्या सुनो ॥ १० ॥
कथ्यमानं मया तात त्वं हि मेऽर्धं स्मृतः पुरा ।
नमोऽतियशसे तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ ११ ॥
नारायणाय विश्वाय निर्गुणाय गुणात्मने ।
तात! मैं तुमसे उन नामोंकी व्युत्पत्ति बताता हूँ, क्योंकि पूर्वकालसे ही तुम मेरे आधे शरीर माने गये हो। जो समस्त देहधारियोंके उत्कृष्ट आत्मा हैं, उन महायशस्वी, निर्गुण सगुणरूप विश्वात्मा भगवान् नारायणदेवको नमस्कार है ॥ ११ १/२ ॥
यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ॥ १२ ॥
योऽसौ योनिर्हि सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च ।
जिनके प्रसादसे ब्रह्मा और क्रोधसे रुद्र प्रकट हुए हैं, वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण चराचर जगत्की उत्पत्तिके कारण हैं ॥ १२ १/२ ॥
अष्टादशगुणं यत् तत् सत्त्वं सत्त्ववतां वर ॥ १३ ॥
प्रकृतिः सा परा मह्यं रोदसी योगधारिणी ।
ऋता सत्यामराजय्या लोकानामात्मसंज्ञिता ॥ १४ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अठारह* गुणोंवाला जो सत्त्व है अर्थात् आदिपुरुष है, वही मेरी परा प्रकृति है। पृथ्वी और आकाशकी आत्मस्वरूपा वह योगबलसे समस्त लोकोंको धारण करनेवाली है। वही ऋता (कर्मफलभूत गतिस्वरूपा), सत्या (त्रिकालाबाधित ब्रह्मरूपा) अमर, अजेय तथा सम्पूर्ण लोकोंकी आत्मा है ।। १३-१४ ।। तस्मात् सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । तपो यज्ञश्च यष्टा च पुराणः पुरुषो विराट् ।। १५ ।। अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकानां प्रभवाप्ययः । उसीसे सृष्टि और प्रलय आदि सम्पूर्ण विकार प्रकट होते हैं। वही तप, यज्ञ और यजमान है, वही पुरातन विराट् पुरुष है, उसे ही अनिरुद्ध कहा गया है। उसीसे लोकोंकी सृष्टि और प्रलय होते हैं ।। १५ १/२ ।। ब्राह्मे रात्रिक्षये प्राप्ते तस्य ह्यमिततेजसः ।। १६ ।। प्रसादात् प्रादुरभवत् पद्मं पद्मानिभेक्षण । ततो ब्रह्मा समभवत् स तस्यैव प्रसादजः ।। १७ ।। जब प्रलयकी रात व्यतीत हुई थी, उस समय उन अमित तेजस्वी अनिरुद्धकी कृपासे एक कमल प्रकट हुआ। कमलनयन अर्जुन! उसी कमलसे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ। वे ब्रह्मा भगवान् अनिरुद्धके प्रसादसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। १६-१७ ।। अह्नः क्षये ललाटाच्च सुतो देवस्य वै तथा । क्रोधाविष्टस्य संजज्ञे रुद्रः संहारकारकः ।। १८ ।। ब्रह्माका दिन बीतनेपर क्रोधके आवेशमें आये हुए उस देवके ललाटसे उनके पुत्ररूपमें संहारकारी रुद्र प्रकट हुए ।। १८ ।। एतौ द्वौ विबुधश्रेष्ठौ प्रसादक्रोधजावुभौ । तदादेशितपन्थानौ सृष्टिसंहारकारकौ ।। १९ ।। ये दोनों श्रेष्ठ देवता—ब्रह्मा और रुद्र भगवान्के प्रसाद और क्रोधसे प्रकट हुए हैं तथा उन्हींके बताये हुए मार्गका आश्रय ले सृष्टि और संहारका कार्य पूर्ण करते हैं ।। १९ ।। निमित्तमात्रं तावत्र सर्वप्राणिवरप्रदौ । कपर्दी जटिलो मुण्डः श्मशानगृहसेवकः ।। २० ।। उग्रव्रतचरो रुद्रो योगी परमदारुणः । दक्षक्रतुहरश्चैव भगनेत्रहरस्तथा ।। २१ ।। समस्त प्राणियोंको वर देनेवाले वे दोनों देवता सृष्टि और प्रलयके निमित्तमात्र हैं। (वास्तवमें तो वह सब कुछ भगवान्की इच्छासे ही होता है।) इनमेंसे संहारकारी रुद्रके कपर्दी (जटाजूटधारी), जटिल, मुण्ड, श्मशानगृहका सेवन करनेवाले, उग्र व्रतका आचरण