महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप चार सींगोंको धारण करनेवाले शब्दब्रह्मस्वरूप, ७६४ गदाग्रजः-गदसे पहले जन्म लेनेवाले श्रीकृष्ण ॥ ९४ ॥ चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९५ ॥ ७६५ चतुर्मूर्तिः-राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, ७६६ चतुर्बाहुः-चार भुजाओंवाले, ७६७ चतुर्व्यूहः-वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंसे युक्त, ७६८ चतुर्गतिः-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्यरूप चार परम गतिस्वरूप, ७६९ चतुरात्मा-मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, ७७० चतुर्भावः-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंके उत्पत्तिस्थान, ७७१ चतुर्वेदवित्-चारों वेदोंके अर्थको भलीभाँति जाननेवाले, ७७२ एकपात्-एक पादवाले यानी एक पाद (अंश)-से समस्त विश्वको व्याप्त करनेवाले ॥ ९५ ॥ समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गे दुरावासो दुरारिहा ॥ ९६ ॥ ७७३ समावर्तः-संसारचक्रको भलीभाँति घुमानेवाले, ७७४ अनिवृत्तात्मा-सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी हटा हुआ नहीं है, ऐसे, ७७५ दुर्जयः-किसीसे भी जीतनेमें न आनेवाले, ७७६ दुरतिक्रमः-जिनकी आज्ञाका कोई उल्लंघन नहीं कर सके, ऐसे, ७७७ दुर्लभः-बिना भक्तिके प्राप्त न होनेवाले, ७७८ दुर्गमः-कठिनतासे जाननेमें आनेवाले, ७७९ दुर्गः-कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, ७८० दुरावासः-बड़ी कठिनतासे योगीजनोंद्वारा हृदयमें बसाये जानेवाले, ७८१ दुरारिहा-दुष्ट मार्गमें चलनेवाले दैत्योंका वध करनेवाले ॥ ९६ ॥ शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः । इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ९७ ॥ ७८२ शुभाङ्गः-कल्याणकारक सुन्दर अंगोंवाले, ७८३ लोकसारङ्गः-लोकोंके सारको ग्रहण करनेवाले, ७८४ सु तन्तुः-सुन्दर विस्तृत जगत्रूप तन्तुवाले, ७८५ तन्तु वर्धनः-पूर्वोक्त जगत्-तन्तुको बढ़ानेवाले, ७८६ इन्द्रकर्मा-इन्द्रके समान कर्मवाले, ७८७ महाकर्मा-बड़े-बड़े कर्म करनेवाले, ७८८ कृतकर्मा-जो समस्त कर्तव्य कर्म कर चुके हों, जिनका कोई कर्तव्य शेष न रहा हो—ऐसे कृतकृत्य, ७८९ कृतागमः-स्वोचित अनेक कार्योंको पूर्ण करनेके लिये अवतार धारण करके आनेवाले ॥ ९७ ॥ उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ९८ ॥ ७९० उद्भवः-स्वेच्छासे श्रेष्ठ जन्म धारण करनेवाले, ७९१ सुन्दरः-परम सुन्दर, ७९२ सुन्दः-परम करुणाशील, ७९३ रत्ननाभः-रत्नके समान सुन्दर नाभिवाले, ७९४ सुलोचनः-सुन्दर नेत्रोंवाले, ७९५ अर्कः-ब्रह्मादि पूज्य पुरुषोंके भी पूजनीय, ७९६
वाजसनः-याचकोंको अन्न प्रदान करनेवाले, ७९७ शृङ्गी-प्रलयकालमें सींगयुक्त मत्स्यविशेषका रूप धारण करनेवाले, ७९८ जयन्तः-शत्रुओंको पूर्णतया जीतनेवाले, ७९९ सर्वविज्जयी-सब कुछ जाननेवाले और सबको जीतनेवाले ।। ९८ ।। सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ।। ९९ ।। ८०० सुवर्णबिन्दुः-सुन्दर अक्षर और बिन्दुसे युक्त ओंकारस्वरूप, ८०१ अक्षोभ्यः-किसीके द्वारा भी क्षुभित न किये जा सकनेवाले, ८०२ सर्ववागीश्वरेश्वरः-समस्त वाणीपतियोंके यानी ब्रह्मादिके भी स्वामी, ८०३ महाह्रदः-ध्यान करनेवाले जिसमें गोता लगाकर आनन्दमें मग्न होते हैं, ऐसे परमानन्दके महान् सरोवर, ८०४ महागर्तः-महान् रथवाले, ८०५ महाभूतः-त्रिकालमें कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, ८०६ महानिधिः-सबके महान् निवास-स्थान ।। ९९ ।। कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः । अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। १०० ।। ८०७ कुमुदः-कु अर्थात् पृथ्वीको उसका भार उतारकर प्रसन्न करनेवाले, ८०८ कुन्दरः-हिरण्याक्षको मारनेके लिये पृथ्वीको विदीर्ण करनेवाले, ८०९ कुन्दः-परशुराम-अवतारमें पृथ्वी प्रदान करनेवाले, ८१० पर्जन्यः-बादलकी भाँति समस्त इष्ट वस्तुओंकी वर्षा करनेवाले, ८११ पावनः-स्मरणमात्रसे पवित्र करनेवाले, ८१२ अनिलः-सदा प्रबुद्ध रहनेवाले, ८१३ अमृताशः-जिनकी आशा कभी विफल न हो—ऐसे अमोघसंकल्प, ८१४ अमृतवपुः-जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो—ऐसे नित्य विग्रह, ८१५ सर्वज्ञः-सदा-सर्वदा सब कुछ जाननेवाले, ८१६ सर्वतोमुखः-सब ओर मुखवाले यानी जहाँ कहीं भी उनके भक्त भक्तिपूर्वक पत्र-पुष्पादि जो कुछ भी अर्पण करें, उसे भक्षण करनेवाले ।। १०० ।। सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ।। १०१ ।। ८१७ सुलभः-नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवालेको और एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको बिना ही परिश्रमके सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, ८१८ सुव्रतः-सुन्दर भोजन करनेवाले यानी अपने भक्तोंद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पण किये हुए पत्र-पुष्पादि मामूली भोजनको भी परम श्रेष्ठ मानकर खानेवाले, ८१९ सिद्धः-स्वभावसे ही समस्त सिद्धियोंसे युक्त, ८२० शत्रुजित्-देवता और सत्पुरुषोंके शत्रुओंको जीतनेवाले, ८२१ शत्रुतापनः-देव-शत्रुओंको तपानेवाले, ८२२ न्यग्रोधः-वटवृक्षरूप, ८२३ उदुम्बरः-कारणरूपसे आकाशके भी ऊपर रहनेवाले, ८२४ अश्वत्थः-पीपल वृक्षस्वरूप, ८२५ चाणूरान्ध्रनिषूदनः-चाणूर नामक अन्ध्रजातिके वीर मल्लको मारनेवाले ।। १०१ ।। सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः । अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद् भयनाशनः ।। १०२ ।।
८२६ सहस्रार्चिः-अनन्त किरणोंवाले सूर्यरूप, ८२७ सप्तजिह्वः-काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुचि—इन सात जिह्वाओंवाले अग्निस्वरूप, ८२८ सप्तैधाः-सात दीप्तिवाले अग्निस्वरूप, ८२९ सप्तवाहनः-सात घोड़ोंवाले सूर्यरूप, ८३० अमूर्तिः-मूर्तिरहित निराकार, ८३१ अनघः-सब प्रकारसे निष्पाप, ८३२ अचिन्त्यः-किसी प्रकार भी चिन्तन करनेमें न आनेवाले अव्यक्तस्वरूप, ८३३ भयकृत्-दुष्टोंको भयभीत करनेवाले, ८३४ भयनाशनः-स्मरण करनेवालोंके और सत्पुरुषोंके भयका नाश करनेवाले ।। १०२ ।।
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। १०३ ।।
८३५ अणुः-अत्यन्त सूक्ष्म, ८३६ बृहत्-सबसे बड़े, ८३७ कृशः-अत्यन्त पतले और हलके, ८३८ स्थूलः-अत्यन्त मोटे और भारी, ८३९ गुणभृत्-समस्त गुणोंको धारण करनेवाले, ८४० निर्गुणः-सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे अतीत, ८४१ महान्-गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और ज्ञान आदिकी अतिशयताके कारण परम महत्त्वसम्पन्न, ८४२ अधृतः-जिनको कोई भी धारण नहीं कर सकता—ऐसे निराधार, ८४३ स्वधृतः-अपने-आपसे धारित यानी अपनी ही महिमामें स्थित, ८४४ स्वास्यः-सुन्दर मुखवाले, ८४५ प्राग्वंशः-जिनसे समस्त वंश-परम्परा आरम्भ हुई है—ऐसे समस्त पूर्वजोंके भी पूर्वज आदिपुरुष, ८४६ वंशवर्धनः-जगत्-प्रपंचरूप वंशको और यादव वंशको बढ़ानेवाले ।। १०३ ।।
भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। १०४ ।।
८४७ भारभृत्-शेषनाग आदिके रूपमें पृथ्वीका भार उठानेवाले और अपने भक्तोंके योगक्षेमरूप भारको वहन करनेवाले, ८४८ कथितः-वेद-शास्त्र और महापुरुषोंद्वारा जिनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका बारंबार कथन किया गया है, ऐसे सबके द्वारा वर्णित, ८४९ योगी-नित्य समाधियुक्त, ८५० योगीशः-समस्त योगियोंके स्वामी, ८५१ सर्वकामदः-समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, ८५२ आश्रमः-सबको विश्राम देनेवाले, ८५३ श्रमणः-दुष्टोंको संतप्त करनेवाले, ८५४ क्षामः-प्रलयकालमें सब प्रजाका क्षय करनेवाले, ८५५ सुपर्णः-वेदरूप सुन्दर पत्तोंवाले (संसारवृक्षस्वरूप), ८५६ वायुवाहनः-वायुको गमन करनेके लिये शक्ति देनेवाले ।। १०४ ।।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमोऽयमः ।। १०५ ।।
८५७ धनुर्धरः-धनुषधारी श्रीराम, ८५८ धनुर्वेदः-धनुर्विद्याको जाननेवाले श्रीराम, ८५९ दण्डः-दमन करनेवालोंकी दमनशक्ति, ८६० दमयिता-यम और राजा आदिके रूपमें दमन करनेवाले, ८६१ दमः-दण्डका कार्य यानी जिनको दण्ड दिया जाता है, उनका सुधार, ८६२ अपराजितः-शत्रुओंद्वारा पराजित न होनेवाले, ८६३ सर्वसहः-सब कुछ सहन करनेकी
सामर्थ्यसे युक्त, अतिशय तितिक्षु, ८६४ नियन्ता-सबको अपने-अपने कर्तव्यमें नियुक्त करनेवाले, ८६५ अनियमः-नियमोंसे न बँधे हुए, जिनका कोई भी नियन्त्रण करनेवाला नहीं, ऐसे परमस्वतन्त्र, ८६६ अयमः-जिनका कोई शासक नहीं ॥ १०५ ॥
सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ १०६ ॥
८६७ सत्त्ववान्-बल, वीर्य, सामर्थ्य आदि समस्त तत्त्वोंसे सम्पन्न, ८६८ सात्त्विकः-सत्त्वगुणप्रधानविग्रह, ८६९ सत्यः-सत्यभाषणस्वरूप, ८७० सत्यधर्मपरायणः-यथार्थ भाषण और धर्मके परम आधार, ८७१ अभिप्रायः-प्रेमीजन जिनको चाहते हैं—ऐसे परम इष्ट, ८७२ प्रियार्हः-अत्यन्त प्रिय वस्तु समर्पण करनेके लिये योग्य पात्र, ८७३ अर्हः-सबके परम पूज्य, ८७४ प्रियकृत्-भजनेवालोंका प्रिय करनेवाले, ८७५ प्रीतिवर्धनः-अपने प्रेमियोंके प्रेमको बढ़ानेवाले ॥ १०६ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग् विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥
८७६ विहायसगतिः-आकाशमें गमन करनेवाले, ८७७ ज्योतिः-स्वयंप्रकाशस्वरूप, ८७८ सुरुचिः-सुन्दर रुचि और कान्तिवाले, ८७९ हुतभुक्-यज्ञमें हवन की हुई समस्त हविको अग्निरूपसे भक्षण करनेवाले, ८८० विभुः-सर्वव्यापी, ८८१ रविः-समस्त रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य, ८८२ विरोचनः-विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले, ८८३ सूर्यः-शोभाको प्रकट करनेवाले, ८८४ सविता-समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ८८५ रविलोचनः-सूर्यरूप नेत्रोंवाले ॥ १०७ ॥
अनन्तो हुतभुग् भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ १०८ ॥
८८६ अनन्तः-सब प्रकारसे अन्तरहित, ८८७ हुतभुक्-यज्ञमें हवन की हुई सामग्रीको उन-उन देवताओंके रूपमें भक्षण करनेवाले, ८८८ भोक्ता-जगत्का पालन करनेवाले, ८८९ सुखदः-भक्तोंको दर्शनरूप परम सुख देनेवाले, ८९० नैकजः-धर्मरक्षा, साधुरक्षा आदि परम विशुद्ध हेतुओंसे स्वेच्छापूर्वक अनेक जन्म धारण करनेवाले, ८९१ अग्रजः-सबसे पहले जन्मनेवाले आदिपुरुष, ८९२ अनिर्विण्णः-पूर्णकाम होनेके कारण उकताहटसे रहित, ८९३ सदामर्षी-सत्पुरुषोंपर क्षमा करनेवाले, ८९४ लोकाधिष्ठानम्-समस्त लोकोंके आधार, ८९५ अद्भुतः-अत्यन्त आश्चर्यमय ॥ १०८ ॥
सनात् सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत् स्वस्ति स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ १०९ ॥
८९६ सनात्-अनन्तकालस्वरूप, ८९७ सनातनतमः-सबके कारण होनेसे ब्रह्मादि पुरुषोंकी अपेक्षा भी परम पुराणपुरुष, ८९८ कपिलः-महर्षि कपिलावतार, ८९९ कपिः-सूर्यदेव, ९०० अप्ययः-सम्पूर्ण जगत्के लयस्थान, ९०१ स्वस्तिदः-परमानन्दरूप मंगल
देनेवाले, ९०२ स्वस्तिकृत्-आश्रितजनोंका कल्याण करनेवाले, ९०३ स्वस्ति-कल्याणस्वरूप, ९०४ स्वस्तिभुक्-भक्तोंके परम कल्याणकी रक्षा करनेवाले, ९०५ स्वस्तिदक्षिणः-कल्याण करनेमें समर्थ और शीघ्र कल्याण करनेवाले ॥ १०९ ॥ अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ११० ॥ ९०६ अरौद्रः-सब प्रकारके रुद्र (क्रूर) भावोंसे रहित शान्तिमूर्ति, ९०७ कुण्डली-सूर्यके समान प्रकाशमान मकराकृति कुण्डलोंको धारण करनेवाले, ९०८ चक्री-सुदर्शनचक्रको धारण करनेवाले, ९०९ विक्रमी-सबसे विलक्षण पराक्रमशील, ९१० ऊर्जितशासनः-जिनका श्रुति-स्मृतिरूप शासन अत्यन्त श्रेष्ठ है—ऐसे अतिश्रेष्ठ शासन करनेवाले, ९११ शब्दातिगः-शब्दकी जहाँ पहुँच नहीं, ऐसे वाणीके अविषय, ९१२ शब्दसहः-कठोर शब्दोंको सहन करनेवाले, ९१३ शिशिरः-त्रितापपीड़ितोंको शान्ति देनेवाले शीतलमूर्ति, ९१४ शर्वरीकरः-ज्ञानियोंकी रात्रि संसार और अज्ञानियोंकी रात्रि ज्ञान—इन दोनोंको उत्पन्न करनेवाले ॥ ११० ॥ अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥ ९१५ अक्रूरः-सब प्रकारके क्रूरभावोंसे रहित, ९१६ पेशलः-मन, वाणी और कर्म—सभी दृष्टियोंसे सुन्दर होनेके कारण परम सुन्दर, ९१७ दक्षः-सब प्रकारसे समृद्ध, परमशक्तिशाली और क्षणमात्रमें बड़े-से-बड़ा कार्य कर देनेवाले महान् कार्यकुशल, ९१८ दक्षिणः-संहारकारी, ९१९ क्षमिणां वरः-क्षमा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९२० विद्वत्तमः-विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ परम विद्वान्, ९२१ वीतभयः-सब प्रकारके भयसे रहित, ९२२ पुण्यश्रवणकीर्तनः-जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपका श्रवण और कीर्तन परम पावन हैं; ऐसे ॥ १११ ॥ उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ११२ ॥ ९२३ उत्तारणः-संसार-सागरसे पार करनेवाले, ९२४ दुष्कृतिहा-पापोंका और पापियोंका नाश करनेवाले, ९२५ पुण्यः-स्मरण आदि करनेवाले समस्त पुरुषोंको पवित्र कर देनेवाले, ९२६ दुःस्वप्ननाशनः-ध्यान, स्मरण, कीर्तन और पूजन करनेसे बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाले, ९२७ वीरहा-शरणागतोंकी विविध गतियोंका यानी संसार-चक्रका नाश करनेवाले, ९२८ रक्षणः-सब प्रकारसे रक्षा करनेवाले, ९२९ सन्तः-विद्या, विनय और धर्म आदिका प्रचार करनेके लिये संतोंके रूपमें प्रकट होनेवाले, ९३० जीवनः-समस्त प्रजाको प्राणरूपसे जीवित रखनेवाले, ९३१ पर्यवस्थितः-समस्त विश्वको व्याप्त करके स्थित रहनेवाले ॥ ११२ ॥ अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ११३ ॥ ९३२ अनन्तरूपः-अमितरूपवाले, ९३३ अनन्तश्रीः-अपरिमित शोभासम्पन्न, ९३४ जितमन्युः-सब प्रकारसे क्रोधको जीत लेनेवाले, ९३५ भयापहः-भक्तभयहारी, ९३६ चतुरस्रः-मंगलमूर्ति, ९३७ गभीरात्मा-गम्भीर मनवाले, ९३८ विदिशः-अधिकारियोंको उनके कर्मानुसार विभागपूर्वक नाना प्रकारके फल देनेवाले, ९३९ व्यादिशः-सबको यथायोग्य विविध आज्ञा देनेवाले, ९४० दिशः-वेदरूपसे समस्त कर्मोंका फल बतलानेवाले ॥ ११३ ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः । जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ११४ ॥ ९४१ अनादिः-जिसका आदि कोई न हो ऐसे सबके कारणस्वरूप, ९४२ भूर्भुवः-पृथ्वीके भी आधार, ९४३ लक्ष्मीः-समस्त शोभायमान वस्तुओंकी शोभास्वरूप, ९४४ सुवीरः-उत्तम योद्धा, ९४५ रुचिराङ्गदः-परम रुचिकर कल्याणमय बाजूबंदोंको धारण करनेवाले, ९४६ जननः-प्राणिमात्रको उत्पन्न करनेवाले, ९४७ जनजन्मादिः-जन्म लेनेवालोंके जन्मके मूल कारण, ९४८ भीमः-दुष्टोंको भय देनेवाले, ९४९ भीमपराक्रमः-अतिशय भय उत्पन्न करनेवाले, पराक्रमसे युक्त ॥ ११४ ॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ११५ ॥ ९५० आधारनिलयः-आधारस्वरूप पृथ्वी आदि समस्त भूतोंके स्थान, ९५१ अधाता-जिसका कोई भी बनानेवाला न हो ऐसे स्वयं स्थित, ९५२ पुष्पहासः-पुष्पकी भाँति विकसित हास्यवाले, ९५३ प्रजागरः-भली प्रकार जाग्रत् रहनेवाले नित्यप्रबुद्ध, ९५४ ऊर्ध्वगः-सबसे ऊपर रहनेवाले, ९५५ सत्पथाचारः-सत्पुरुषोंके मार्गका आचरण करनेवाले मर्यादापुरुषोत्तम, ९५६ प्राणदः-परीक्षित् आदि मरे हुओंको भी जीवन देनेवाले, ९५७ प्रणवः-ॐकारस्वरूप, ९५८ पणः-यथायोग्य व्यवहार करनेवाले ॥ ११५ ॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ११६ ॥ ९५९ प्रमाणम्-स्वतःसिद्ध होनेसे स्वयं प्रमाणस्वरूप, ९६० प्राणनिलयः-प्राणोंके आधारभूत, ९६१ प्राणभृत्-समस्त प्राणोंका पोषण करनेवाले, ९६२ प्राणजीवनः-प्राणवायुके संचारसे प्राणियोंको जीवित रखनेवाले, ९६३ तत्त्वम्-यथार्थ तत्त्वरूप, ९६४ तत्त्ववित्-यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ९६५ एकात्मा-अद्वितीयस्वरूप, ९६६ जन्ममृत्युजरातिगः-जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा आदि शरीरके धर्मोंसे सर्वथा अतीत ॥ ११६ ॥
भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ११७ ॥
९६७ भूर्भुवःस्वस्तरुः-‘भूः भुवः स्वः’ तीनों लोकोंवाले, संसारवृक्षस्वरूप, ९६८ तारः-संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, ९६९ सविता-सबको उत्पन्न करनेवाले, ९७० प्रपितामहः-पितामह ब्रह्माके भी पिता, ९७१ यज्ञः-यज्ञस्वरूप, ९७२ यज्ञपतिः-समस्त यज्ञोंके अधिष्ठाता, ९७३ यज्वा-यजमानरूपसे यज्ञ करनेवाले, ९७४ यज्ञाङ्गः-समस्त यज्ञरूप अंगोंवाले, वाराहस्वरूप, ९७५ यज्ञवाहनः-यज्ञोंको चलानेवाले ।। ११७ ।।
यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। ११८ ।।
९७६ यज्ञभृत्-यज्ञोंको धारण करनेवाले, ९७७ यज्ञकृत्-यज्ञोंके रचयिता, ९७८ यज्ञी-समस्त यज्ञ जिसमें समाप्त होते हैं—ऐसे यज्ञशेषी, ९७९ यज्ञभुक्-समस्त यज्ञोंके भोक्ता, ९८० यज्ञसाधनः-ब्रह्मयज्ञ, जपयज्ञ आदि बहुत-से यज्ञ जिनकी प्राप्तिके साधन हैं ऐसे, ९८१ यज्ञान्तकृत्-यज्ञोंका फल देनेवाले, ९८२ यज्ञगुह्यम्-यज्ञोंमें गुप्त निष्काम यज्ञस्वरूप, ९८३ अन्नम्-समस्त प्राणियोंके अन्न यानी अन्नकी भाँति उनकी सब प्रकारसे तुष्टि-पुष्टि करनेवाले, ९८४ अन्नादः-समस्त अन्नोंके भोक्ता ।। ११८ ।।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। ११९ ।।
९८५ आत्मयोनिः-जिनका कारण दूसरा कोई नहीं ऐसे स्वयं योनिस्वरूप, ९८६ स्वयंजातः-स्वयं अपने-आप स्वेच्छापूर्वक प्रकट होनेवाले, ९८७ वैखानः-पातालवासी हिरण्याक्षका वध करनेके लिये पृथ्वीको खोदनेवाले, वाराह-अवतारधारी, ९८८ सामगायनः-सामवेदका गान करनेवाले, ९८९ देवकीनन्दनः-देवकीपुत्र, ९९० स्रष्टा-समस्त लोकोंके रचयिता, ९९१ क्षितीशः-पृथ्वीपति, ९९२ पापनाशनः-स्मरण, कीर्तन, पूजन और ध्यान आदि करनेसे समस्त पापसमुदायका नाश करनेवाले ।। ११९ ।।
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। १२० ।।
९९३ शङ्खभृत्-पाञ्चजन्यशंखको धारण करनेवाले, ९९४ नन्दकी-नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले, ९९५ चक्री-सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, ९९६ शार्ङ्गधन्वा-शार्ङ्गधनुषधारी, ९९७ गदाधरः-कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले, ९९८ रथाङ्गपाणिः-भीष्मकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये सुदर्शन चक्रको हाथमें धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, ९९९ अक्षोभ्यः-जो किसी प्रकार भी विचलित नहीं किये जा सके, ऐसे, १००० सर्वप्रहरणायुधः-ज्ञात और अज्ञात जितने भी युद्धादिमें काम आनेवाले अस्त्र-शस्त्र हैं, उन सबको धारण करनेवाले ।। १२० ।।
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति
यहाँ हजार नामोंकी समाप्ति दिखलानेके लिये अन्तिम नामको दुबारा लिखा गया है। मंगलवाची होनेसे ॐकारका स्मरण किया गया है। अन्तमें नमस्कार करके भगवान्की पूजा की गयी है।
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १२१ ॥
इस प्रकार यह कीर्तन करने योग्य महात्मा केशवके दिव्य एक हजार नामोंका पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया ॥ १२१ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचित् सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ १२२ ॥
जो मनुष्य इस विष्णुसहस्रनामका सदा श्रवण करता है और जो प्रतिदिन इसका कीर्तन या पाठ करता है, उसका इस लोकमें तथा परलोकमें कहीं भी कुछ अशुभ नहीं होता ॥ १२२ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ १२३ ॥
इस विष्णुसहस्रनामका श्रवण, पठन और कीर्तन करनेसे ब्राह्मण वेदान्त-पारगामी हो जाता है, क्षत्रिय युद्धमें विजय पाता है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र सुख पाता है ॥ १२३ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद् धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात् कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात् प्रजाम् ॥ १२४ ॥
धर्मकी इच्छावाला धर्मको पाता है, अर्थकी इच्छावाला अर्थ पाता है, भोगोंकी इच्छावाला भोग पाता है और संतानकी इच्छावाला संतान पाता है ॥ १२४ ॥
भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत् प्रकीर्तयेत् ॥ १२५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १२६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान् बलरूपगुणान्वितः ॥ १२७ ॥
जो भक्तिमान् पुरुष सदा प्रातःकालमें उठकर स्नान करके पवित्र हो मनमें विष्णुका ध्यान करता हुआ इस वासुदेव-सहस्रनामका भली प्रकार पाठ करता है, वह महान् यश पाता है, जातिमें महत्त्व पाता है, अचल सम्पत्ति पाता है और अति उत्तम कल्याण पाता है तथा उसको कहीं भय नहीं होता। वह वीर्य और तेजको पाता है तथा आरोग्यवान्, कान्तिमान्, बलवान्, रूपवान् और सर्वगुणसम्पन्न हो जाता है ॥ १२५—१२७ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ १२८ ॥ रोगार्तुर पुरुष रोगसे छूट जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ पुरुष बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत भयसे छूट जाता है और आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे छूट जाता है ॥ १२८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् । स्तुवन् नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ १२९ ॥ जो पुरुष भक्तिसम्पन्न होकर इस विष्णुसहस्रनामसे पुरुषोत्तम भगवान्की प्रतिदिन स्तुति करता है, वह शीघ्र ही समस्त संकटोंसे पार हो जाता है ॥ १२९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः । सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १३० ॥ जो मनुष्य वासुदेवके आश्रित और उनके परायण है, वह समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध अन्तःकरणवाला हो सनातन परब्रह्मको पाता है ॥ १३० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ १३१ ॥ वासुदेवके भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता है तथा उनको जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका भी भय नहीं रहता है ॥ १३१ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः । युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १३२ ॥ जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भक्तिभावसे इस विष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह आत्मसुख, क्षमा, लक्ष्मी, धैर्य, स्मृति और कीर्तिको पाता है ॥ १३२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः । भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३३ ॥ पुरुषोत्तमके पुण्यात्मा भक्तोंको किसी दिन क्रोध नहीं आता, ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होती, लोभ नहीं होता और उनकी बुद्धि कभी अशुद्ध नहीं होती ॥ १३३ ॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः । वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १३४ ॥ स्वर्ग, सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्षत्रसहित आकाश, दस दिशाएँ, पृथ्वी और महासागर—ये सब महात्मा वासुदेवके प्रभावसे धारण किये गये हैं ॥ १३४ ॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । जगद् वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १३५ ॥ देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, सर्प और राक्षससहित यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णके अधीन रहकर यथायोग्य बरत रहे हैं ॥ १३५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः । वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १३६ ॥
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सत्त्व, तेज, बल, धीरज, क्षेत्र, (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)—ये सब-के-सब श्रीवासुदेवके रूप हैं, ऐसा वेद कहते हैं ।। १३६ ।।
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ।। १३७ ।।
सब शास्त्रोंमें आचार प्रथम माना जाता है, आचारसे ही धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मके स्वामी भगवान् अच्युत हैं ।। १३७ ।।
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ।। १३८ ।।
ऋषि, पितर, देवता, पञ्च महाभूत, धातुएँ और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण जगत्—ये सब नारायणसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। १३८ ।।
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्या शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत् सर्वं जनार्दनात् ।। १३९ ।।
योग, ज्ञान, सांख्य, विद्याएँ, शिल्प आदि कर्म, वेद, शास्त्र और विज्ञान—ये सब विष्णुसे उत्पन्न हुए हैं ।। १३९ ।।
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ।। १४० ।।
वे समस्त विश्वके भोक्ता और अविनाशी विष्णु ही एक ऐसे हैं, जो अनेक रूपोंमें विभक्त होकर भिन्न-भिन्न भूतविशेषोंके अनेक रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा त्रिलोकीमें व्याप्त होकर सबको भोग रहे हैं ।। १४० ।।
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद् य इच्छेत् पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ।। १४१ ।।
जो पुरुष परम श्रेय और सुख पाना चाहता हो, वह भगवान् व्यासजीके कहे हुए इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे ।। १४१ ।।
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ।। १४२ ।।
जो विश्वके ईश्वर जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले जन्मरहित कमललोचन भगवान् विष्णुका भजन करते हैं, वे कभी पराभव नहीं पाते हैं ।। १४२ ।।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि
दानधर्मपर्वणि विष्णुसहस्रनामकथने
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत व्यासनिर्र्मित शतसाहस्रीय संहितासम्बन्धी अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विष्णुसहस्रनामकथनविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा
हुआ ॥ १४९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)
जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
किं जप्यं जपतो नित्यं भवेद् धर्मफलं महत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आप महाज्ञानी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं। अतः मैं पूछता हूँ कि प्रतिदिन किस स्तोत्र या मन्त्रका जप करनेसे धर्मके महान् फलकी प्राप्ति हो सकती है? ॥ १ ॥
प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वापि कर्मणि ।
दैवे वा श्राद्धकाले वा किं जप्यं कर्मसाधनम् ॥ २ ॥
यात्रा, गृहप्रवेश अथवा किसी कर्मका आरम्भ करते समय, देवयज्ञमें या श्राद्धके समय किस मन्त्रका जप करनेसे कर्मकी पूर्ति हो जाती है? ॥ २ ॥
शान्तिकं पौष्टिकं रक्षा शत्रुघ्नं भयनाशनम् ।
जप्यं यद् ब्रह्मसमितं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ३ ॥
शान्ति, पुष्टि, रक्षा, शत्रुनाश तथा भय-निवारण करनेवाला कौन-सा ऐसा जपनीय मन्त्र है, जो वेदके समान माननीय है? आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
व्यासप्रोक्तमिमं मन्त्रं शृणुष्वैकमना नृप ।
सावित्र्या विहितं दिव्यं सद्यः पापविमोचनम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! महर्षि वेदव्यासका बताया हुआ यह एक मन्त्र है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। सावित्री देवीने इस दिव्यमन्त्रकी सृष्टि की है तथा यह तत्काल ही पापसे छुटकारा दिलानेवाला है ॥ ४ ॥
शृणु मन्त्रविधिं कृत्स्नं प्रोच्यमानं मयानघ ।
यं श्रुत्वा पाण्डवश्रेष्ठ सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
अनघ! पाण्डवश्रेष्ठ! मैं इस मन्त्रकी सम्पूर्ण विधि बताता हूँ, सुनो। उसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥
रात्रावहनि धर्मज्ञ जपन् पापैर्न लिप्यते ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ६ ॥
धर्मज्ञ नरेश्वर! जो रात-दिन इस मन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। वही मन्त्र मैं तुम्हें बता रहा हूँ, एकचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥
आयुष्मान् भवते चैव यं श्रुत्वा पार्थिवात्मज ।
पुरुषस्तु सुसिद्धार्थः प्रेत्य चेह च मोदते ॥ ७ ॥
राजकुमार! जो इस मन्त्रको सुनता है, वह पुरुष दीर्घजीवी तथा सफलमनोरथ होता है, इहलोक और परलोकमें भी आनन्द भोगता है ॥ ७ ॥
सेवितं सततं राजन् पुरा राजर्षिसत्तमैः ।
क्षत्रधर्मपरैर्नित्यं सत्यव्रतपरायणैः ॥ ८ ॥
राजन्! प्राचीनकालमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेवाले और सदा सत्य व्रतके आचरणमें संलग्न रहनेवाले राजर्षिशिरोमणि इस मन्त्रका सदा ही जप किया करते थे ॥ ८ ॥
इदमाह्निकमव्यग्रं कुर्वद्भिर्नियतैः सदा ।
नृपैर्भरतशार्दूल प्राप्यते श्रीरनुत्तमा ॥ ९ ॥
भरतसिंह! जो राजा मन और इन्द्रियोंको वशमें करके शान्तिपूर्वक प्रतिदिन इस मन्त्रका जप करते हैं, उन्हें सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त होती है ॥ ९ ॥
नमो वसिष्ठाय महाव्रताय
पराशरं वेदनिधिं नमस्ये ।
नमोऽस्त्वनन्ताय महोरगाय
नमोऽस्तु सिद्धेभ्य इहाक्षयेभ्यः ॥ १० ॥
नमोऽस्त्वृषिभ्यः परमं परेषां
देवेषु देवं वरदं वराणाम् ।
सहस्रशीर्षाय नमः शिवाय
सहस्रनामाय जनार्दनाय ॥ ११ ॥
(यह मन्त्र इस प्रकार है—) महान् व्रतधारी वसिष्ठको नमस्कार है, वेदनिधि पराशरको नमस्कार है, विशाल सर्परूपधारी अनन्त (शेषनाग)-को नमस्कार है, अक्षय सिद्धगणको नमस्कार है, ऋषिवृन्दको नमस्कार है तथा परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वरको नमस्कार है एवं सहस्र मस्तकवाले शिवको और सहस्रों नाम धारण करनेवाले भगवान् जनार्दनको नमस्कार है ॥ १०-११ ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी चापराजितः ।
ऋतश्च पितृरूपश्च त्र्यम्बकश्च महेश्वरः ॥ १२ ॥
वृषाकपिश्च शम्भुश्च हवनोऽथेश्वरस्तथा ।
एकादशैते प्रथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः ॥ १३ ॥
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर—ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं; जो तीनों लोकोंके स्वामी
हैं ।। १२-१३ ।। शतमेतत् समाम्नातं शतरुद्रे महात्मनाम् । अंशो भगश्च मित्रश्च वरुणश्च जलेश्वरः ।। १४ ।। तथा धातार्यमा चैव जयन्तो भास्करस्तथा । त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ।। १५ ।। इत्येते द्वादशादित्याः काश्यपेया इति श्रुतिः । वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें महात्मा रुद्रके सैकड़ों नाम बताये गये हैं। अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र तथा विष्णु—ये बारह आदित्य कहलाते हैं। ये सब-के-सब कश्यपके पुत्र हैं ।। १४-१५ १/२ ।। धरो ध्रुवश्च सोमश्च सावित्रोऽथानिलोऽनलः ।। १६ ।। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः । धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं ।। १६ १/२ ।। नासत्यश्चापि दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि ।। १७ ।। मार्तण्डस्यात्मजावेतौ संज्ञानासाविनिर्गतौ । नासत्य और दस्र—ये दोनों अश्विनीकुमारके नामसे प्रसिद्ध हैं। इनकी उत्पत्ति भगवान् सूर्यके वीर्यसे हुई है। ये अश्वरूपधारिणी संज्ञा देवीके नाकसे प्रकट हुए थे (ये सब मिलाकर तैंतीस देवता हैं) ।। १७ १/२ ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि लोकानां कर्मसाक्षिणः ।। १८ ।। अपि यज्ञस्य वेत्तारो दत्तस्य सुकृतस्य च । अदृश्याः सर्वभूतेषु पश्यन्ति त्रिदशेश्वराः ।। १९ ।। शुभाशुभानि कर्माणि मृत्युः कालश्च सर्वशः । विश्वेदेवाः पितृगणा मूर्तिमन्तस्तपोधनाः ।। २० ।। मुनयश्चैव सिद्धाश्च तपोमोक्षपरायणाः । शुचिस्मिताः कीर्त्यतां प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् ।। २१ ।। अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं—मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगत्पर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं ।। १८—२१ ।। प्रजापतिकृतानेताँल्लोकान् दिव्येन तेजसा । वसन्ति सर्वलोकेषु प्रयताः सर्वकर्मसु ।। २२ ।।
प्रजापति ब्रह्माजीने जिन लोकोंकी रचना की है, उन सबमें ये अपने दिव्य तेजसे निवास करते हैं तथा शुद्धभावसे सबके कर्मोंका निरीक्षण करते हैं ॥ २२ ॥
प्राणानामीश्वरानेतान् कीर्तयन् प्रयतो नरः । धर्मार्थकामैर्विपुलैर्युज्यते सह नित्यशः ॥ २३ ॥ ये सबके प्राणोंके स्वामी हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नित्य इनका कीर्तन करता है, उसे प्रचुरमात्रामें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥
लोकांश्च लभते पुण्यान् विश्वेश्वरकृतान् शुभान् । एते देवास्त्रयस्त्रिंशत् सर्वभूतगणेश्वराः ॥ २४ ॥ वह लोकनाथ ब्रह्माजीके रचे हुए मंगलमय पवित्र लोकोंमें जाता है। ऊपर बताये हुए तैंतीस देवता सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं ॥ २४ ॥
नन्दीश्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वजः । ईश्वराः सर्वलोकानां गणेश्वरविनायकाः ॥ २५ ॥ सौम्या रौद्रा गणाश्चैव योगभूतगणास्तथा । ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्णः पतगेश्वरः ॥ २६ ॥ पृथिव्यां तपसा सिद्धाः स्थावराश्च चराश्च ह । हिमवान् गिरयः सर्वे चत्वारश्च महार्णवाः ॥ २७ ॥ भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमाः । विष्णुर्देवोऽथ जिष्णुश्च स्कन्दश्चाम्बिकया सह ॥ २८ ॥ कीर्तयन् प्रयतः सर्वान् सर्वपापैः प्रमुच्यते । इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वीपर तपसे सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान् शंकरके तुल्य पराक्रमवाले उनके अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका—इन सबके नामोंका शुद्धभावसे कीर्तन करनेवाले मनुष्यके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २५—२८ १/२ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मानवानृषिसत्तमान् ॥ २९ ॥ यवक्रीतश्च रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू । औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुतः ॥ ३० ॥ ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा । ब्रह्मतेजोमयाः सर्वे कीर्तिता लोकभावनाः ॥ ३१ ॥ अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ—यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवान्, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और बर्हिषद—ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं ॥ २९—३१ ॥
लभन्ते हि शुभं सर्वे रुद्रानलवसुप्रभाः । भुवि कृत्वा शुभं कर्म मोदन्ते दिवि दैवतैः ॥ ३२ ॥ इनका तेज रुद्र, अग्नि तथा वसुओंके समान है। ये पृथ्वीपर शुभकर्म करके अब स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं और शुभफलका उपभोग करते हैं ॥ ३२ ॥ महेन्द्रगुरवः सप्त प्राचीं वै दिशमाश्रिताः । प्रयतः कीर्तयेदेतान् शक्रलोके महीयते ॥ ३३ ॥ महेन्द्रके गुरु सातों महर्षि पूर्व दिशामें निवास करते हैं। जो पुरुष शुद्धचित्तसे इनका नाम लेता है, वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३३ ॥ उन्मुचुःप्रमुचुश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् । दृढव्यश्चोर्ध्वबाहुश्च तृणसोमाङ्गिरास्तथा ॥ ३४ ॥ मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् । धर्मराजर्त्विजः सप्त दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥ ३५ ॥ उन्मुचु, प्रमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमांगिरा और मित्रावरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य मुनि—ये सात धर्मराज (यम)-के ऋत्विज् हैं और दक्षिण दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ दृढेयुश्च ऋतेयुश्च परिव्याधश्च कीर्तिमान् । एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ॥ ३६ ॥ अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा ऋषिः सारस्वतस्तथा । वरुणस्यर्त्विजः सप्त पश्चिमां दिशमाश्रिताः ॥ ३७ ॥ दृढेयु, ऋतेयु, कीर्तिमान् परिव्याध, सूर्यके सदृश तेजस्वी एकत, द्वित, त्रित तथा धर्मात्मा अत्रिके पुत्र सारस्वत मुनि—ये सात वरुणके ऋत्विज् हैं और पश्चिम दिशामें इनका निवास है ॥ ३६-३७ ॥ अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपश्व महानृषिः । गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ॥ ३८ ॥ ऋचीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् । धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रिताः ॥ ३९ ॥ अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र और ऋचीकनन्दन प्रतापवान् उग्रस्वभाववाले जमदग्नि—ये सात उत्तर दिशामें रहनेवाले और कुबेरके गुरु (ऋत्विज्) हैं ॥ ३८-३९ ॥ अपरे मुनयः सप्त दिक्षु सर्वासवधिष्ठिताः । कीर्तिस्वस्तिकरा नृणां कीर्तिता लोकभावनाः ॥ ४० ॥ इनके सिवा सात महर्षि और हैं जो सम्पूर्ण दिशाओंमें निवास करते हैं। वे जगत्को उत्पन्न करनेवाले हैं। उपर्युक्त महर्षियोंका यदि नाम लिया जाय तो वे मनुष्योंकी कीर्ति
बढ़ाते और उनका कल्याण करते हैं॥ ४०॥ धर्मः कामश्च कालश्च वसुर्वासुकिरेव च। अनन्तः कपिलश्चैव सप्तैते धरणीधराः ॥ ४१ ॥ धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल—ये सात पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं॥ ४१ ॥ रामो व्यासस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा च लोमशः। इत्येते मुनयो दिव्या एकैकः सप्त सप्तधा ॥ ४२ ॥ परशुराम, व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और लोमश—ये चारों दिव्य मुनि हैं। इनमेंसे एक-एक सात-सात ऋषियोंके समान हैं॥ ४२ ॥ शान्तिस्वस्तिकरा लोके दिशांपालाः प्रकीर्तिताः। यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तन्मुखः शरणं व्रजेत् ॥ ४३ ॥ ये सब ऋषि इस जगत्में शान्ति और कल्याणका विस्तार करनेवाले तथा दिशाओंके पालक कहे जाते हैं। ये जिस-जिस दिशामें निवास करें, उस-उस दिशाकी ओर मुँह करके इनकी शरण लेनी चाहिये॥ ४३॥ स्रष्टारः सर्वभूतानां कीर्तिता लोकपावनाः। संवर्तो मेरुसावर्णी मार्कण्डेयश्च धार्मिकः ॥ ४४ ॥ सांख्ययोगौ नारदश्च दुर्वासाश्च महर्षिः। अत्यन्ततपसो दान्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ ४५ ॥ ये सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा और लोकपावन बताये गये हैं। संवर्त, मेरुसावर्णि, धर्मात्मा मार्कण्डेय, सांख्य, योग, नारद, महर्षि दुर्वासा—ये सात ऋषि अत्यन्त तपस्वी, जितेन्द्रिय और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं॥ ४४-४५॥ अपरे रुद्रसंकाशाः कीर्तिता ब्रह्मलौकिकाः। अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो लभते धनम् ॥ ४६ ॥ इन सब ऋषियोंके अतिरिक्त बहुत-से महर्षि रुद्रके समान प्रभावशाली हैं। इनका कीर्तन करनेसे ये ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। उनके कीर्तनसे पुत्रहीनको पुत्र मिलता है और दरिद्रको धन॥ ४६॥ तथा धर्मार्थकामेषु सिद्धिं च लभते नरः। पृथुं वैन्यं नृपवरं पृथ्वी यस्याभवत् सुता ॥ ४७ ॥ प्रजापतिं सार्वभौमं कीर्तयेद् वसुधाधिपम्। इनका नाम लेनेवाले मनुष्यके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि होती है। वेनकुमार नृपश्रेष्ठ पृथुका, जिनकी यह पृथ्वी पुत्री हो गयी थी तथा जो प्रजापति एवं सार्वभौम सम्राट् थे, कीर्तन करना चाहिये॥ ४७ १/२॥ आदित्यवंशप्रभवं महेन्द्रसमविक्रमम् ॥ ४८ ॥
पुरूरवसमैलं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
बुधस्य दयितं पुत्रं कीर्तयेद् वसुधाधिपम् ।। ४९ ।।
सूर्यवंशमें उत्पन्न और देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी इला और बुधके प्रिय पुत्र
त्रिभुवनविख्यात राजा पुरूरवाका नाम कीर्तन करें ।। ४८-४९ ।।
त्रिलोकविश्रुतं वीरं भरतं च प्रकीर्तयेत् ।
गवामयेन यज्ञेन येनेष्टं वै कृते युगे ।। ५० ।।
रन्तिदेवं महादेवं कीर्तयेत् परमद्युतिम् ।
विश्वजित्तपसोपेतं लक्षण्यं लोकपूजितम् ।। ५१ ।।
त्रिलोकीके विख्यात वीर भरतका नामोच्चारण करे, जिन्होंने सत्ययुगमें गवामय यज्ञका
अनुष्ठान किया था। उन विश्वविजयिनी तपस्यासे युक्त, शुभ लक्षणसम्पन्न एवं लोकपूजित
परम तेजस्वी महाराज रन्तिदेवका भी कीर्तन करें ।। ५०-५१ ।।
तथा श्वेतं च राजर्षिं कीर्तयेत् परमद्युतिम् ।
सगरस्यात्मजा येन प्लावितास्तारितास्तथा ।। ५२ ।।
महातेजस्वी राजर्षि श्वेतका तथा जिन्होंने सगरपुत्रोंको गंगाजलसे आप्लावित करके
उनका उद्धार किया था, उन महाराज भगीरथका भी कीर्तन एवं स्मरण करे ।। ५२ ।।
हुताशनसमानेतान् महारूपान् महौजसः ।
उग्रकायान् महासत्त्वान् कीर्तयेत् कीर्तिवर्धनान् ।। ५३ ।।
वे सभी राजा अग्निके समान तेजस्वी, अत्यन्त रूपवान्, महान् बलसम्पन्न,
उग्रशरीरवाले परम धीर और अपने कीर्तिको बढ़ानेवाले थे। इन सबका कीर्तन करना
चाहिये ।। ५३ ।।
देवानृषिगणांश्चैव नृपांश्च जगतीश्वरान् ।
सांख्यं योगं च परमं हव्यं कव्यं तथैव च ।। ५४ ।।
कीर्तितं परमं ब्रह्म सर्वश्रुतिपरायणम् ।
मङ्गल्यं सर्वभूतानां पवित्रं बहुकीर्तितम् ।। ५५ ।।
व्याधिप्रशमनं श्रेष्ठं पौष्टिकं सर्वकर्मणाम् ।
प्रयतः कीर्तयेच्चैतान् कल्यं सायं च भारत ।। ५६ ।।
देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये।
सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन
सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है। इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता
है। इससे सब कर्मोंमें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और
शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और
राजाओंके भी नाम लेने चाहिये ।। ५४–५६ ।।
एते वै पान्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।
एते विनायकाः श्रेष्ठा दक्षाः शान्ता जितेन्द्रियाः ।। ५७ ।। ये देवता आदि जगत्की रक्षा करते, पानी बरसाते, प्रकाश और हवा देते तथा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। ये ही विघ्नोंके राजा विनायक, श्रेष्ठ, दक्ष, क्षमाशील और जितेन्द्रिय हैं ।। ५७ ।। नराणामशुभं सर्वे व्यपोहन्ति प्रकीर्तिताः । साक्षिभूता महात्मानः पापस्य सुकृतस्य च ।। ५८ ।। ये महात्मा सब मनुष्योंके पाप-पुण्यके साक्षी हैं। इनका नाम लेनेपर ये सब लोग मानवोंके अमंगलका नाश करते हैं ।। ५८ ।। एतान् वै कल्यमुत्थाय कीर्तयन् शुभमश्रुते । नाग्निचौरभयं तस्य न मार्गप्रतिरोधनम् ।। ५९ ।। जो सबेरे उठकर इनके नाम और गुणोंका उच्चारण करता है, उसे शुभ कर्मोंके भोग प्राप्त होते हैं। उसके यहाँ आग और चोरका भय नहीं रहता तथा उसका मार्ग कभी रोका नहीं जाता ।। ५९ ।। एतान् कीर्तयतां नित्यं दुःस्वप्नो नश्यते नृणाम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ।। ६० ।। प्रतिदिन इन देवताओंका कीर्तन करनेसे मनुष्योंका दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है। वह सब पापोंसे मुक्त होता है और कुशलपूर्वक घर लौटता है ।। ६० ।। दीक्षाकालेषु सर्वेषु यः पठेन्नियतो द्विजः । न्यायवानात्मनिरतः क्षान्तो दान्तोऽनसूयकः ।। ६१ ।। जो द्विज दीक्षाके सभी अवसरोंपर नियमपूर्वक इन नामोंका पाठ करता है, वह न्यायशील, आत्मनिष्ठ, क्षमावान्, जितेन्द्रिय तथा दोष-दृष्टिसे रहित होता है ।। ६१ ।। रोगार्तो व्याधियुक्तो वा पठन् पापात् प्रमुच्यते । वास्तुमध्ये तु पठतः कुले स्वस्त्ययनं भवेत् ।। ६२ ।। रणे-व्याधिसे ग्रस्त मनुष्य इसका पाठ करनेपर पापमुक्त एवं नीरोग हो जाता है। जो अपने घरके भीतर इन नामोंका पाठ करता है, उसके कुलका कल्याण होता है ।। ६२ ।। क्षेत्रमध्ये तु पठतः सर्वं सस्यं प्ररोहति । गच्छतः क्षेममध्वानं ग्रामान्तरगतः पठन् ।। ६३ ।। खेतमें इस नाममालाको पढ़नेवाले मनुष्यकी सारी खेती जमती और उपजती है। जो गाँवके भीतर रहकर इस नामावलीका पाठ करता है, यात्रा करते समय उसका मार्ग सकुशल समाप्त होता है ।। ६३ ।। आत्मनश्च सुतानां च दाराणां च धनस्य च । बीजानामोषधीनां च रक्षामेतां प्रयोजयेत् ।। ६४ ।।
अपनी, पुत्रोंकी, पत्नीकी, धनकी तथा बीजों और ओषधियोंकी भी रक्षाके लिये इस नामावलीका प्रयोग करे ॥ ६४ ॥
एतान् संग्रामकाले तु पठतः क्षत्रियस्य तु । व्रजन्ति रिपवो नाशं क्षेमं च परिवर्तते ॥ ६५ ॥ युद्धकालमें इन नामोंका पाठ करनेवाले क्षत्रियके शत्रु भाग जाते हैं और उसका सब ओरसे कल्याण होता है ॥ ६५ ॥
एतान् दैवे च पित्र्ये च पठतः पुरुषस्य हि । भुञ्जते पितरः कव्यं हव्यं च त्रिदिवौकसः ॥ ६६ ॥ जो देवयज्ञ और श्राद्धके समय उपर्युक्त नामोंका पाठ करता है, उस पुरुषके हव्यको देवता और कव्यको पितर सहर्ष स्वीकार करते हैं ॥ ६६ ॥
न व्याधिश्चापदभयं न द्विपान्न हि तस्करात् । कश्मलं लघुतां याति पाप्मना च प्रमुच्यते ॥ ६७ ॥ उसके यहाँ रोग या हिंसक जन्तुओंका भय नहीं रहता। हाथी अथवा चोरसे भी कोई बाधा नहीं आती। शोक कम हो जाता है और पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ ६७ ॥
यानपात्रे च याने च प्रवासे राजवेश्मनि । परां सिद्धिमवाप्नोति सावित्रीं ह्युत्तमां पठन् ॥ ६८ ॥ जो मनुष्य जहाजमें या किसी सवारीमें बैठनेपर, विदेशमें अथवा राजदरबारमें जानेपर मन-ही-मन उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥
न च राजभयं तेषां न पिशाचान्न राक्षसात् । नाग्न्यम्बुपवनव्यालाद् भयं तस्योपजायते ॥ ६९ ॥ गायत्रीका जप करनेसे द्विजको राजा, पिशाच, राक्षस, आग, पानी, हवा और साँप आदिका भय नहीं होता ॥ ६९ ॥
चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमस्य विशेषतः । करोति सततं शान्तिं सावित्रीमुत्तमां पठन् ॥ ७० ॥ जो उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह पुरुष चारों वर्णों और विशेषतः चारों आश्रमोंमें सदा शान्ति स्थापन करता है ॥ ७० ॥
नाग्निर्दहति काष्ठानि सावित्री यत्र पठ्यते । न तत्र बालो म्रियते न च तिष्ठन्ति पन्नगाः ॥ ७१ ॥ जहाँ गायत्रीका जप किया जाता है, उस घरके काठके किवाड़ोंमें आग नहीं लगती। वहाँ बालककी मृत्यु नहीं होती तथा उस घरमें साँप नहीं टिकते हैं ॥ ७१ ॥
न तेषां विद्यते दुःखं गच्छन्ति परमां गतिम् । ये शृण्वन्ति महद् ब्रह्म सावित्रीगुणकीर्तनम् ॥ ७२ ॥