महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
केवल सुवर्णकी अपेक्षा उसका आभूषण बनवाकर दान देना श्रेष्ठ माना गया है। अतः दानकालमें ब्राह्मणको सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करके भोजन करावे। जो यह अद्भुत एवं उत्कृष्ट सुवर्ण-दान करता है, वह पुनर्जन्म लेनेपर निश्चय ही सुन्दर शरीर, कान्ति, बुद्धि और कीर्ति पाता है ।।
तस्मात् स्वशक्त्या दातव्यं काञ्चनं भुवि मानवैः ।
न ह्येतस्मात् परं लोकेष्वन्यत् पापात् प्रमुच्यते ।।
अतः मनुष्योंको अपनी शक्तिके अनुसार पृथ्वीपर सुवर्णदान अवश्य करना चाहिये। संसारमें इससे बढ़कर कोई दान नहीं है। सुवर्णदान करके मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है ।।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि गवां दानमनिन्दिते ।
न हि गोभ्यः परं दानं विद्यते जगति प्रिये ।।
अनिन्दिते! इसके बाद मैं गोदानका वर्णन करूँगा। प्रिये! इस संसारमें गौओंके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ।।
लोकान् सिसृक्षुणा पूर्वं गावः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
वृत्त्यर्थं सर्वभूतानां तस्मात् ता मातरः स्मृताः ।।
पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी इच्छावाले स्वयम्भू ब्रह्माजीने समस्त प्राणियोंकी जीवन-वृत्तिके लिये गौओंकी सृष्टि की थी। इसलिये वे सबकी माताएँ मानी गयी हैं ।।
लोकज्येष्ठा लोकवृत्त्यां प्रवृत्ता
मय्यायत्ताः सोमनिष्यन्दभूताः ।
सौम्याः पुण्याः कामदाः प्राणदाश्च
तस्मात् पूज्याः पुण्यकामैर्मनुष्यैः ।।
गौएँ सम्पूर्ण जगत्में ज्येष्ठ हैं। वे लोगोंको जीविका देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। मेरे अधीन हैं और चन्द्रमाके अमृतमय द्रवसे प्रकट हुई हैं। वे सौम्य, पुण्यमयी, कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली तथा प्राणदायिनी हैं। इसलिये पुण्याभिलाषी मनुष्योंके लिये पूजनीय हैं ।।
धेनुं दत्त्वा निभृतां सुशीलां
कल्याणवत्सां च पयस्विनीं च ।
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या-
स्तावत्समाः स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ।।
जो हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाली, उत्तम बछड़ेसे युक्त एवं दूध देनेवाली गायका दान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गीय फल भोगता है ।।
प्रयच्छते यः कपिलां सचैलां
सकांस्यदोहां कनकाग्रशृङ्गीम् ।
पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व-
मासप्तमं तारयते परत्र ॥ जो काँसके दुग्धपात्र और सोनेसे मढ़े हुए सींगोंवाली कपिला गौका वस्त्रसहित दान करता है, वह अपने पुत्रों, पौत्रों तथा सातवीं पीढ़ीतकके समस्त कुलका परलोकमें उद्धार कर देता है ॥ अन्तर्जाताः क्रीतका द्यूतलब्धाः प्राणक्रीताः सोदकाश्चौजसा वा । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणार्थंगताश्च द्वारैरेतैस्ताः प्रलब्धाः प्रदद्यात् ॥ जो अपने ही यहाँ पैदा हुई हों, खरीदकर लायी गयी हों, जुएमें जीत ली गयी हों, बदलेमें दूसरा कोई प्राणी देकर खरीदी गयी हों, जल हाथमें लेकर संकल्पपूर्वक दी गयी हों, अथवा युद्धमें बलपूर्वक जीती गयी हों, संकटसे छुड़ाकर लायी गयी हों, या पालन-पोषणके लिये आयी हों—इन द्वारोंसे प्राप्त हुई गौओंका दान करना चाहिये ॥ कृशाय बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये । प्रदाय नीरुजां धेनुं लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥ जीविकाके बिना दुर्बल, अनेक पुत्रवाले, अग्निहोत्री, श्रोत्रिय ब्राह्मणको दूध देनेवाली नीरोग गायका दान करके दाता सर्वोत्तम लोकोंको प्राप्त होता है ॥ नृशंसस्य कृतघ्नस्य लुब्धस्यानृतवादिनः । हव्यकव्यव्यपेतस्य न दद्याद् गाः कथंचन ॥ जो क्रूर, कृतघ्न, लोभी, असत्यवादी और हव्य-कव्यसे दूर रहनेवाला हो, ऐसे मनुष्यको किसी तरह गौएँ नहीं देनी चाहिये ॥ समानवत्सां यो दद्याद् धेनुं विप्रे पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां सोमलोके महीयते ॥ जो मनुष्य समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली गायको वस्त्र ओढ़ाकर ब्राह्मणको दान करता है, वह सोमलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ समानवत्सां यो दद्यात् कृष्णां धेनुं पयस्विनीम् । सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नां लोकान् प्राप्नोत्यपाम्पतेः ॥ जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी एवं दूध देनेवाली काली गौको वस्त्र ओढ़ाकर उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह जलके स्वामी वरुणके लोकोंमें जाता है ॥ हिरण्यवर्णां पिङ्गाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंछन्नां यान्ति कौबेर सद्मनः ॥ जिसके शरीरका रंग सुनहरा, आँखें भूरी, साथमें बछड़ा और काँसकी दुहानी हो, उस गौको वस्त्र ओढ़ाकर दान करनेसे मनुष्य कुबेरके धाममें जाते हैं ॥ वायुरेणुसवर्णां च सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंछन्नां वायुलोके महीयते ॥
वायुसे उड़ी हुई धूलिके समान रंगवाली, बछड़े-सहित, दूध देनेवाली गायको कपड़ा ओढ़ाकर काँसके दुहानीके साथ दान देकर दाता वायुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
समानवत्सां यो धेनुं दत्त्वा गौरीं पयस्विनीम् ।
सुवृत्तां वस्त्रसंछन्नामग्निलोके महीयते ॥
जो समान रंगके बछड़ेवाली, सीधी-सादी, धौरी एवं दूध देनेवाली धेनुको वस्त्रसे आच्छादित करके उसका दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥
युवानं बलिनं श्यामं शतेन सह यूथपम् ।
गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशृङ्गमलंकृतम् ॥
ऋषभं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाणां महात्मनाम् ।
ऐश्वर्यमभिजायन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥
जो लोग महामनस्वी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको नौजवान, बड़े सींगवाले, बलवान्, श्यामवर्ण, एक सौ गौओंसहित यूथपति गवेन्द्र (साँड़) को पूर्णतः अलंकृत करके उसे श्रेष्ठ ब्राह्मणके हाथमें दे देते हैं, वे बारंबार जन्म लेनेपर ऐश्वर्यके साथ ही जन्म लेते हैं ॥
गवां मूत्रपुरीषाणि नोद्विजेत कदाचन ।
न चासां मांसमश्रीयाद् गोषु भक्तः सदा भवेत् ॥
गौओंके मल-मूत्रसे कभी उद्विग्न नहीं होना चाहिये और उनका मांस कभी नहीं खाना चाहिये। सदा गौओंका भक्त होना चाहिये ॥
ग्रासमुष्टिं परगवे दद्याद् संवत्सरं शुचिः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ॥
जो पवित्र भावसे रहकर एक वर्षतक दूसरेकी गायको एक मुट्ठी ग्रास खिलाता है और स्वयं आहार नहीं करता, उसका वह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होता है ॥
गवामुभयतः काले नित्यं स्वस्त्ययनं वदेत् ।
न चासां चिन्तयेत् पापमिति धर्मविदो विदुः ॥
गौओंके पास प्रतिदिन दोनों समय उनके कल्याणकी बात कहनी चाहिये। कभी उनका अनिष्ट-चिन्तन नहीं करना चाहिये। ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ॥
गावः पवित्रं परमं गोषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
कथंचिन्नापमन्तव्या गावो लोकस्य मातरः ॥
गौएँ परम पवित्र वस्तु हैं, गौओंमें सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। अतः किसी तरह गौओंका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत्की माताएँ हैं ॥
तस्मादेव गवां दानं विशिष्टमिति कथ्यते ।
गोषु पूजा च भक्तिश्च नरस्यायुष्यतां वहेत् ॥
इसीलिये गौओंका दान सबसे उत्कृष्ट बताया जाता है। गौओंकी पूजा तथा उनके प्रति की हुई भक्ति मनुष्यकी आयु बढ़ानेवाली होती है ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानं महाफलम् । भूमिदानसमं दानं लोके नास्तीति निश्चयः ॥ इसके बाद मैं भूमिदानका महत्त्व बतलाऊँगा। भूमिदानका महान् फल है। संसारमें भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। यही धर्मात्मा पुरुषोंका निश्चय है ॥ गृहयुक् क्षेत्रयुग् वापि भूमिभागः प्रदीयते । सुखभोगं निराक्रोशं वास्तुपूर्वं प्रकल्प्य च ॥ ग्रहीतारमलंकृत्य वस्त्रपुष्पानुलेपनैः । सभृत्यं सपरिवारं भोजयित्वा यथेष्टतः ॥ यो दद्याद् दक्षिणां काले त्रिरद्भिर्गृह्यतामिति ॥ गृह अथवा क्षेत्रसे युक्त भू-भागका दान करना चाहिये। जहाँ सुख भोगनेकी सुविधा हो, जो अनिन्दनीय स्थान हो, वहाँ वास्तुपूजनपूर्वक गृह बनाकर दान लेनेवालेको वस्त्र, पुष्पमाला तथा चन्दनसे अलंकृत करके सेवक और परिवारसहित उसे यथेष्ट भोजन करावे। तत्पश्चात् यथासमय तीन बार हाथमें जल लेकर ‘दान ग्रहण कीजिये’ ऐसा कहकर उसे उस भूमिको दान एवं दक्षिणा दे ॥ एवं भूम्यां प्रदत्तायां श्रद्धया वीतमत्सरैः । यावत् तिष्ठति सा भूमिस्तावत् तस्य फलं विदुः । इस प्रकार ईर्ष्यारहित पुरुषोंद्वारा श्रद्धापूर्वक भूदान दिये जानेपर जबतक वह भूमि रहती है, तबतक दाता उसके दानजनित फलका उपभोग करते हैं ॥ भूमिदः स्वर्गमारुह्य रमते शाश्वतीः समाः । अचला ह्यक्षया भूमिः सर्वकामान् दुधुक्षति ॥ भूमिदान देनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाकर सदा ही सुख भोगता है; क्योंकि यह अचल एवं अक्षय भूमि सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करती है ॥ यत् किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः । अपि गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन मुच्यते ॥ जीविकाके लिये कष्ट पानेवाला पुरुष जो कोई भी पाप करता है, गायके कान बराबर भूमिको दान करनेसे भी मुक्त हो जाता है ॥ सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च । सर्वमेतन्महाभागे भूमिदाने प्रतिष्ठितम् ॥ महाभागे! भूमिदानमें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न—इन सबका दान प्रतिष्ठित है ॥ भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।
ब्रह्मलोकाय संसिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ।। स्वामीके कल्याण-साधनमें तत्पर हो युद्धमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले शूरवीर योद्धा उत्तम सिद्धि पाकर ब्रह्मलोककी यात्रा करते हैं; परंतु वे भी भूमिदान करनेवालेको लाँघ नहीं पाते हैं ।। हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम् । सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा ।। जहाँ सुन्दर कूँआँ और रहनेके लिये घर बना हो, जो हलसे जोती गयी हो और जिसमें बीजसहित फल लगे हों, ऐसी भूमिका दान करना चाहिये। वह सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली होती है ।। निष्पन्नसस्यां पृथिवीं यो ददाति द्विजन्मनाम् । विमुक्तः कलुषैः सर्वैः शक्रलोकं स गच्छति ।। जो उपजी हुई खेतीसे युक्त भूमिका ब्राह्मणोंके लिये दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो इन्द्रलोकमें जाता है ।। यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रमभिवर्धयेत् । एवं सर्वफलैर्भूमिर्दातारमभिवर्धयेत् ।। जैसे माता दूध पिलाकर अपने पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार भूमि सम्पूर्ण मनोवांछित फल देकर दाताको अभ्युदयशील बनाती है ।। ब्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् । ग्राहयित्वा निजां भूमिं न यान्ति यमसादनम् ।। जो लोग उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, अग्निहोत्री एवं सदाचारी ब्राह्मणको अपनी भूमि देते हैं, वे यमलोकमें कभी नहीं जाते हैं ।। यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि दृश्यते । तथा भूमेः कृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ।। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी प्रतिदिन वृद्धि होती देखी जाती है, उसी प्रकार किये हुए भूमिदानका महत्त्व प्रत्येक नयी फसल पैदा होनेपर बढ़ता जाता है ।। यथा बीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानगुणार्जिताः ।। जैसे पृथ्वीपर बिखेरे हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, उसी प्रकार भूमिदानके गुणोंसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण मनोवांछित भोग अंकुरित होते और बढ़ते हैं ।। पितरः पितृलोकस्था देवताश्च दिवि स्थिताः । संतर्पयन्ति भोगैस्तं यो ददाति वसुंधराम् ।। जो भूमिका दान करता है, उसे पितृलोकनिवासी पितर और स्वर्गवासी देवता अभीष्ट भोगोंद्वारा तृप्त करते हैं ।।
दीर्घायुष्यं वराङ्गत्वं स्फीतां च श्रियमुत्तमाम् । परत्र लभते मर्त्यः सम्प्रदाय वसुंधराम् ॥ भूमिदान करके मनुष्य परलोकमें दीर्घायु, सुन्दर शरीर और बढ़ी-चढ़ी उत्तम सम्पत्ति पाता है ॥
एतत् सर्वं मयोद्दिष्टं भूमिदानस्य यत् फलम् । श्रद्दधानैर्नरैर्नित्यं श्राव्यमेतत् सनातनम् । यह सब मैंने भूमिदानका फल बताया है। श्रद्धालु पुरुषोंको प्रतिदिन यह सनातन दानमाहात्म्य सुनना चाहिये ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि कन्यादानं यथाविधि । कन्या देया महादेवि परेषामात्मनोऽपि वा ॥ अब मैं विधिपूर्वक कन्यादानका माहात्म्य बताऊँगा। महादेवि! दूसरोंकी और अपनी भी कन्याका दान करना चाहिये ॥
कन्यां शुद्धव्रताचारां कुलरूपसमन्विताम् । यस्मै दित्सति पात्राय तेनापि भृशकामिताम् ॥ जो शुद्ध व्रत एवं आचारवाली, कुलीन एवं सुन्दर रूपवाली कन्याका किसी सुपात्र पुरुषको दान करना चाहता है, उसे इस बातपर भी ध्यान रखना चाहिये कि वह सुपात्र व्यक्ति उस कन्याको बहुत चाहता है या नहीं (वह पुरुष उसे चाहता हो तभी उसके साथ उस कन्याका विवाह करना चाहिये) ॥
प्रथमं तां समाकल्प्य बन्धुभिः कृतनिश्चयाम् । कारयित्वा गृहं पूर्वं दासीदासपरिच्छदैः ॥ गृहोपकरणैश्चैव पशुधान्येन संयुताम् । तदर्थिने तदर्हाय कन्यां तां समलङ्कृताम् ॥ सविवाहं यथान्यायं प्रयच्छेदग्निसाक्षिकम् ॥ पहले बन्धुओंके साथ सलाह करके कन्याके विवाहका निश्चय करे, तत्पश्चात् उसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित करे। फिर उसके लिये मण्डप बनाकर दास-दासी, अन्यान्य सामग्री, घरके आवश्यक उपकरण, पशु और धान्यसे सम्पन्न एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुई उस कन्याका उसे चाहनेवाले योग्य वरको अग्निदेवकी साक्षितामें यथोचित रीतिसे विवाहपूर्वक दान करे ॥
वृत्त्यायतीं यथा कृत्वा सद्गृहे तौ निवेशयेत् ॥ एवं कृत्वा वधूदानं तस्य दानस्य गौरवात् । प्रेत्यभावे महीयेत स्वर्गलोके यथासुखम् ॥ पुनर्जातश्च सौभाग्यं कुलवृद्धिं तथाऽऽप्नुयात् ॥
भविष्यमें जीवन-निर्वाहके लिये पूर्ण व्यवस्था करके उन दोनों दम्पतिको उत्तम गृहमें ठहरावे। इस प्रकार वधू-वेषमें कन्याका दान करके उस दानकी महिमासे दाता मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें सुख और सम्मानके साथ रहता है। फिर जन्म लेनेपर उसे सौभाग्य प्राप्त होता है तथा वह अपने कुलको बढ़ाता है ॥ विद्यादानं तथा देवि पात्रभूताय वै ददत् । प्रेत्यभावे लभेन्मर्त्यो मेधां वृद्धिं धृतिं स्मृतिम् ॥ देवि! सुपात्र शिष्यको विद्यादान देनेवाला मनुष्य मृत्युके पश्चात् वृद्धि, बुद्धि, धृति और स्मृति प्राप्त करता है ॥ अनुरूपाय शिष्याय यश्च विद्यां प्रयच्छति । यथोक्तस्य प्रदानस्य फलमानन्त्यमश्नुते ॥ जो सुयोग्य शिष्यको विद्या दान करता है, उसे शास्त्रोक्त दानका अक्षय फल प्राप्त होता है ॥ दापनं त्वथ विद्यानां दरिद्रेभ्योऽर्थवेदनैः । स्वयं दत्तेन तुल्यं स्यादिति विद्धि शुभानने ॥ शुभानने! निर्धन छात्रोंको धनकी सहायता देकर विद्या प्राप्त कराना भी स्वयं किये हुए विद्यादानके समान है, ऐसा समझो ॥ एवं ते कथितान्येव महादानानि मानिनि । त्वत्प्रियार्थं मया देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ मानिनि! देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हारी प्रसन्नताके लिये ये बड़े-बड़े दान बताये हैं। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश कथं देयं तिलान्वितम् । तस्य तस्य फलं ब्रूहि दत्तस्य च कृतस्य च ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! तिलका दान कैसे करना चाहिये? और करनेका फल क्या होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तिलकल्पविधिं देवि तन्मे शृणु समाहिता ॥ समृद्धैरसमृद्धैर्वा तिला देया विशेषतः । तिलाः पवित्राः पापघ्नाः सुपुण्या इति संस्मृताः ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**तुम एकाग्रचित्त होकर मुझसे तिलकल्पकी विधि सुनो। मनुष्य धनी हों या निर्धन, उन्हें विशेषरूपसे तिलोंका दान करना चाहिये; क्योंकि तिल पवित्र, पापनाशक और पुण्यमय माने गये हैं ॥
न्यायतस्तु तिलान् शुद्धान् संहृत्याथ स्वशक्तितः ।
तिलराशिं पुनः कुर्यात् पर्वताभं सरत्नकम् ॥
महान्तं यदि वा स्तोकं नानाद्रव्यसमन्वितम् ॥
सुवर्णरजताभ्यां च मणिमुक्ताप्रवालकैः ।
अलंकृत्य यथायोगं सपताकं सवेदिकम् ॥
सभूषणं सवस्त्रं च शयनासनसम्मितम् ।
प्रायशः कौमुदीमासे पौर्णमास्यां विशेषतः ।
भोजयित्वा च विधिवद् ब्राह्मणानर्हतो बहून् ॥
स्वयं कृतोपवासश्च वृत्तशौचसमन्वितः ।
दद्यात् प्रदक्षिणीकृत्य तिलराशिं सदक्षिणम् ॥
अपनी शक्तिके अनुसार न्यायपूर्वक शुद्ध तिलोंका संग्रह करके उनकी पर्वताकार राशि बनावे। वह राशि छोटी हो या बड़ी उसे नाना प्रकारके द्रव्यों तथा रत्नोंसे युक्त करे। फिर यथाशक्ति सोना, चाँदी, मणि, मोती और मूँगोंसे अलंकृत करके पताका, वेदी, भूषण, वस्त्र, शय्या और आसनसे सुशोभित करे। प्रायः आश्विन मासमें विशेषतः पूर्णिमा तिथिको बहुत-से सुयोग्य ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर स्वयं उपवास करके शौचाचार-सम्पन्न हो उन ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके दक्षिणासहित उस तिलराशिका दान करे ॥
एकस्यापि बहूनां वा दातव्यं भूतिमिच्छता ।
तस्य दानफलं देवि अग्निष्टोमेन संयुतम् ॥
कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह एक ही पुरुषको या अनेक व्यक्तियोंको दान दे। देवि! उनके दानका फल अग्निष्टोम यज्ञके समान होता है ॥
केवलं वा तिलैरेव भूमौ कृत्वा गवाकृतिम् ।
सवस्त्रकं सरत्नं च पुंसा गोदानकांक्षिणा ॥
तदर्हाय प्रदातव्यं तस्य गोदानतः फलम् ॥
अथवा पृथ्वीपर केवल तिलोंसे ही गौकी आकृति बनाकर गोदानके फलकी इच्छा रखनेवाला पुरुष रत्न और वस्त्रसहित उस तिल-धेनुका सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे। इससे दाताको गोदान करनेका फल मिलता है ॥
शरावांस्तिलसम्पूर्णान् सहिरण्यान् सचम्पकान् ।
नृपो ददद् ब्राह्मणाय स पुण्यफलभाग् भवेत् ॥
जो राजा सुवर्ण और चम्पासे युक्त तथा तिलसे भरे हुए शरावों (पुरवों) का ब्राह्मणको दान करता है, वह पुण्य-फलका भागी होता है ॥
एवं तिलमयं देयं नरेण हितमिच्छता ।
नानादानफलं भूयः शृणु देवि समाहिता ॥
देवि! अपना हित चाहनेवाले मनुष्यको इसी प्रकार तिलमयी धेनुका दान करना चाहिये। अब पुनः एकाग्रचित्त होकर नाना प्रकारके दानोंका फल सुनो ॥
बलमायुष्यमारोग्यमन्नदानाल्लभेत्ररः ।
पानीयदस्तु सौभाग्यं रसज्ञानं लभेत्ररः ॥
अन्नदान करनेसे मनुष्यको बल, आयु और आरोग्यकी प्राप्ति होती है। जलदान करनेवाला पुरुष सौभाग्य तथा रसका ज्ञान प्राप्त करता है ॥
वस्त्रदानाद् वपुःशोभामलंकारं लभेत्ररः ।
दीपदो बुद्धिवैशद्यं द्युतिशोभां लभेत्ररः ॥
वस्त्रदान करनेसे मनुष्य शारीरिक शोभा और आभूषण लाभ करता है। दीपदान करनेवालेकी बुद्धि निर्मल होती है तथा उसे द्युति एवं शोभाकी प्राप्ति होती है ॥
राजबीजाविमोक्षं तु छत्रदो लभते फलम् ।
दासीदासप्रदानात् तु भवेत् कर्मान्तभाङ्नरः ॥
दासीदासं च विविधं लभेत् प्रेत्य गुणान्वितम् ॥
छत्रदान करनेवाला पुरुष किसी भी जन्ममें राजवंशसे अलग नहीं होता। दासी और दासोंका दान करनेसे मनुष्य कर्मोंका अन्त कर देता है और मृत्युके पश्चात् उत्तम गुणोंसे युक्त भाँति-भाँतिके दासों और दासियोंको प्राप्त करता है ॥
यानानि वाहनं चैव तदर्हाय ददन्नरः ।
पादरोगपरिक्लेशान्मुक्तः श्वसनवाहवान् ।
विचित्रं रमणीयं च लभते यानवाहनम् ॥
जो मनुष्य सुयोग्य ब्राह्मणको रथ आदि यानों और वाहनोंका दान करता है, वह पैरसम्बन्धी रोगों और क्लेशोंसे मुक्त हो जाता है। उसकी सवारीमें वायुके समान वेगशाली घोड़े मिलते हैं। वह विचित्र एवं रमणीय यान और वाहन पाता है ॥
सेतुकूपतटाकानां कर्ता तु लभते नरः ।
दीर्घायुष्यं च सौभाग्यं तथा प्रेत्य गतिं शुभाम् ॥
पुल, कुआँ और पोखरा बनवानेवाला मानव दीर्घायु, सौभाग्य तथा मृत्युके पश्चात् शुभ गति प्राप्त कर लेता है ॥
वृक्षसंरोपको यस्तु छायापुष्पफलप्रदः ।
प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यमभिगम्यो भवेन्नरः ॥
जो वृक्ष लगानेवाला तथा छाया, फूल और फल प्रदान करनेवाला है, वह मृत्युके पश्चात् पुण्यलोक पाता है और सबके लिये मिलनेके योग्य हो जाता है ॥
यस्तु संक्रमकृल्लोके नदीषु जलहारिणाम् ।
लभेत् पुण्यफलं प्रेत्य व्यसनेभ्यो विमोक्षणम् ॥
जो मनुष्य इस जगत्में नदियोंपर जल ले जानेवाले पुरुषोंकी सुविधाके लिये पुल निर्माण कराता है, वह मृत्युके पश्चात् उसका पुण्यफल पाता है और सब प्रकारके संकटोंसे छुटकारा पा जाता है ।। मार्गकृत् सततं मर्त्यो भवेत् संतानवान् पुनः । कायदोषविमुक्तस्तु तीर्थकृत् सततं भवेत् ।। जो मनुष्य सदा मार्गका निर्माण करता है, वह संतानवान् होता है। तथा जो जलमें उतरनेके लिये सीढ़ी एवं पक्के घाट बनवाता है, वह शारीरिक दोषसे मुक्त हो जाता है ।। औषधानां प्रदानात् तु सततं कृपयान्वितः । भवेद् व्याधिविहीनश्च दीर्घायुश्च विशेषतः ।। जो सदा कृपापूर्वक रोगियोंको औषध प्रदान करता है, वह रोगहीन और विशेषतः दीर्घायु होता है ।। अनाथान् पोषयेद् यस्तु कृपणान्धकपङ्गुकान् । स तु पुण्यफलं प्रेत्य लभते कृच्छ्रमोक्षणम् ।। जो अनाथों, दीन-दुःखियों, अन्धों और पंगु मनुष्योंका पोषण करता है, वह मृत्युके पश्चात् उसका पुण्यफल पाता और संकटसे मुक्त हो जाता है ।। वेदगोष्ठाः सभाः शाला भिक्षूणां च प्रतिश्रयम् । यः कुर्याल्लभते नित्यं नरः प्रेत्य शुभं फलम् ।। जो मनुष्य वेदविद्यालय, सभाभवन, धर्मशाला तथा भिक्षुओंके लिये आश्रम बनाता है, वह मृत्युके पश्चात् शुभ फल पाता है ।। विविधं विविधाकारं भक्ष्यभोज्यगुणान्वितम् । रम्यं सदैव गोवाटं यः कुर्याल्लभते नरः । प्रेत्यभावे शुभां जातिं व्याधिमोक्षं तथैव च । एवं नानाविधं द्रव्यं दानकर्ता लभेत् फलम् ।। जो मानव उत्तम भक्ष्य-भोज्यसम्बन्धी गुणोंसे युक्त तथा नाना प्रकारकी आकृतिवाली भाँति-भाँतिकी रमणीय गोशालाओंका सदैव निर्माण करता है, वह मृत्युके पश्चात् उत्तम जन्म पाता और रोगमुक्त होता है। इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंका दान करनेवाला मनुष्य पुण्यफलका भागी होता है ।। बुद्धिमायुष्यमारोग्यं बलं भाग्यं तथाऽऽगमम् । रूपेण सप्तधा भूत्वा मानुष्यं फलति ध्रुवम् ।। बुद्धि, आयुष्य, आरोग्य, बल, भाग्य, आगम तथा रूप—इन सात भागोंमें प्रकट होकर मनुष्यका पुण्यकर्म अवश्य अपना फल देता है ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते । लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने कहा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! लौकिक और वैदिक यज्ञको उत्तम बताया जाता है। अतः इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता । यज्ञा वेदेष्वधीताश्च वेदा ब्राह्मणसंयुताः ॥ **श्रीमहेश्वर बोले—**देवि! देवताओंकी जो पूजा है, वह यज्ञोंके ही अन्तर्गत है। यज्ञोंका वेदोंमें वर्णन है और वेद ब्राह्मणोंके साथ हैं ॥
इदं तु सकलं द्रव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये । यज्ञार्थं विद्धि तत् सृष्टं लोकानां हितकाम्यया ॥ प्रिये! स्वर्गलोकमें या पृथ्वीपर जो द्रव्य दृष्टि-गोचर होता है, इस सबकी सृष्टि विधाताद्वारा लोकहितकी कामनासे यज्ञके लिये की गयी है, ऐसा समझो ॥
एवं विज्ञाय तत् कर्ता सदारः सततं द्विजः । प्रेत्यभावे लभेल्लोकान् ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ऐसा समझकर जो द्विज सदा अपनी स्त्रीके साथ रहकर यज्ञ-कर्म करता है, वह ब्रह्मकर्ममें तत्पर रहनेके कारण मृत्युके पश्चात् पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥
ब्राह्मणेष्वेव तद् ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम् ॥ तस्माद् विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा । यज्ञकर्म कृतं सर्वं देवता अभितर्पयेत् ॥ देवि! वह ब्रह्म (वेद) सदा ब्राह्मणोंमें ही स्थित है, अतः शास्त्र-विधिके अनुसार ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ सम्पूर्ण यज्ञकर्म देवताओंको तृप्त करता है ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायशः स्मृताः ॥ अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितैः । सुशुद्धैर्यजमानैश्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधि ॥ शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः ॥ ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी उत्पत्ति प्रायः यज्ञके लिये ही मानी गयी है। शुद्ध यजमानों तथा ऋत्विजों-द्वारा किये गये वेदवर्णित अग्निष्टोम आदि यज्ञों एवं विशुद्ध द्रव्योपकरणोंसे यजन करना चाहिये, यह शास्त्रका निश्चय है ॥
तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत् । तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत् ॥
इस प्रकार किये गये यज्ञोंमें देवताओंको संतोष होता है और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानको यज्ञका पूरा-पूरा फल मिलता है ।।
देवाः संतोषिता यज्ञैर्लोकान् संवर्धयन्त्युत ।
यज्ञोंद्वारा संतुष्ट किये हुए देवता सम्पूर्ण लोकोंकी वृद्धि करते हैं ।।
तस्माद् यज्वा दिवं गत्वामरैः सह मोदते ।
नास्ति यज्ञसमं दानं नास्ति यज्ञसमो निधिः ।।
सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहितः ।
इसलिये यजमान स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। यज्ञके समान कोई दान नहीं है और यज्ञके समान कोई निधि नहीं है। देवि! सम्पूर्ण धर्मोंका उद्देश्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है ।।
एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु ।।
देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सवः ।।
यह यज्ञद्वारा की गयी देवपूजा वैदिकी है। इससे भिन्न जो दूसरी लौकिकी पूजा है, उसका वर्णन सुनो। देवताओंके सत्कारके लिये लोकमें समय-समयपर उत्सव किया जाता है ।।
देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै ।
यागान् देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि ।।
देवान् संतोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात् ।।
देवि! जो देवालयमें देवताका संस्कार करके उत्सव मनाता है और पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ एवं देवताओंको उपहार समर्पित करके उन्हें संतुष्ट करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त करता है ।।
गन्धमाल्यैश्च विविधैः परमान्नेन धूपनैः ।
बह्वीभिः स्तुतिभिश्चैव स्तुवद्भिः प्रयतैर्नरैः ।।
नृत्तैर्वाद्यैश्च गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलोभनैः ।
देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि ।।
तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिताः ।
तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे ।।
देवि! इस भूतपर जो मनुष्य देवताओंके सत्कारके उद्देश्यसे नाना प्रकारके गन्ध, माल्य, उत्तम अन्न, धूपदान तथा बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा स्तवन करते हैं और शुद्धचित्त हो नृत्य, वाद्य, गान तथा दृष्टिको लुभानेवाले अन्यान्य कार्यक्रमोंद्वारा देवाराधन करते हैं, उनके भक्तिजनित सत्कारसे ही पूजित हो देवता स्वर्गमें उतनेसे ही संतुष्ट हो जाते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]
[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]
उमोवाच
पितृमेधः कथं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।
सर्वेषां पितरः पूज्याः सर्वसम्पत्प्रदायिनः ॥
उमाने पूछा— देव! पितृमेध (श्राद्ध) कैसे किया जाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता पितर सभीके लिये पूजनीय होते हैं ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत् तन्मनाः शृणु ।
देशकालौ विधानं च तत्क्रियायाः शुभाशुभम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं पितृमेधका यथावद्रूपसे वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। देश, काल, विधान तथा क्रियाके शुभाशुभ फलका भी वर्णन करूँगा ॥
लोकेषु पितरः पूज्या देवतानां च देवताः ।
शुचयो निर्मलाः पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥
सभी लोकोंमें पितर पूजनीय होते हैं। वे देवताओंके भी देवता हैं। उनका स्वरूप शुद्ध, निर्मल एवं पवित्र है। वे दक्षिणदिशामें निवास करते हैं ॥
यथा वृष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठाः सर्वजन्तवः ।
पितरश्च तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ॥
शुभेक्षणे! जैसे भूमिपर रहनेवाले सभी प्राणी वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार पितृलोकमें रहनेवाले पितर श्राद्धकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥
तस्य देशाः कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा सरस्वती ।
प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्तं महाफलम् ॥
श्राद्धके लिये पवित्र देश हैं—कुरुक्षेत्र, गया, गङ्गा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर—इन तीर्थस्थानोंमें दिया गया श्राद्धका दान महान् फलदायक होता है ॥
तीर्थानि सरितः पुण्या विविक्तानि वनानि च ।
नदीनां पुलिनानीति देशाः श्राद्धस्य पूजिताः ॥
तीर्थ, पवित्र नदियाँ, एकान्त वन तथा नदियोंके तट—ये श्राद्धके लिये प्रशंसित देश हैं ॥
माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ ।
पक्षयोः कृष्णपक्षश्च पूर्वपक्षात् प्रशस्यते ॥
श्राद्ध-कर्ममें माघ और भाद्रपदमास प्रशंसित हैं। दोनों पक्षोंमें पूर्वपक्ष (शुक्ल) की अपेक्षा कृष्णपक्ष उत्तम बताया जाता है ॥
अमावास्यां त्रयोदश्यां नवम्यां प्रतिपत्सु च । तिथिष्वेतासु तुष्यन्ति दत्तेनेह पितामहाः ॥ अमावास्या, त्रयोदशी, नवमी और प्रतिपदा—इन तिथियोंमें यहाँ श्राद्धका दान करनेसे पितृगण संतुष्ट होते हैं ॥
पूर्वाह्ने शुक्लपक्षे च रात्रौ जन्मदिनेषु वा । युग्मेष्वहस्सु च श्राद्धं न च कुर्वीत पण्डितः ॥ विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पूर्वाह्नमें, शुक्ल-पक्षमें, रात्रिमें अपने जन्मके दिनमें और युग्म दिनोंमें श्राद्ध न करे ॥
एष कालो मया प्रोक्तः पितृमेधस्य पूजितः । यस्मिंश्च ब्राह्मणं पात्रं पश्येत् कालः स च स्मृतः ॥ यह मैंने श्राद्धका प्रशस्त समय बताया है। जिस दिन सुपात्र ब्राह्मणका दर्शन हो, वह भी श्राद्धका उत्तम समय माना गया है ॥
अपाङ्क्तेया द्विजा वर्ज्या ग्राह्यास्ते पङ्क्तिपावनाः । भोजयेद् यदि पापिष्ठान् श्राद्धेषु नरकं व्रजेत् ॥ श्राद्धमें अपांक्तेय ब्राह्मणोंका त्याग और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंको ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई श्राद्धमें पापिष्ठोंको भोजन कराता है तो वह नरकमें पड़ता है ॥
वृत्तश्रुतकुलोपेतान् सकलत्रान् गुणान्वितान् । तदर्हान् श्रोत्रियान् विद्धि ब्राह्मणान्युजः शुभे ॥ शुभे! जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न, सपत्नीक तथा सद्गुणी हों, ऐसे श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको तुम श्राद्धके योग्य समझो। श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी संख्या विषम होनी चाहिये ॥
एतान् निमन्त्रयेद् विद्वान् पूर्वेद्युः प्रातरेव वा । ततः श्राद्धक्रियां पश्चादारभेत यथाविधि ॥ विद्वान् पुरुष इन ब्राह्मणोंको श्राद्धके पहले ही दिन अथवा श्राद्धके ही दिन प्रातःकाल निमन्त्रण दे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक श्राद्धकर्म आरम्भ करे ॥
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र हैं—दौहित्र, कुतपकाल (दिनके पन्द्रह भागमेंसे आठवाँ भाग) तथा तिल। इस कार्यमें तीन गुणोंकी प्रशंसा की जाती है। पवित्रता, क्रोधहीनता और अत्वरा (जल्दीबाजी न करना) ॥
कुतपः खड्गपात्रं च कुशा दर्भास्तिला मधु ।
कालशाकं गजच्छाया पवित्रं श्राद्धकर्मसु ॥ कुतप, खड्गपात्र, कुशा, दर्भ, तिल, मधु, कालशाक और गजच्छाया—ये वस्तुएँ श्राद्धकर्ममें पवित्र मानी गयी हैं ॥ तिलानवकिरेत् तत्र नानावर्णान् समन्ततः । अशुद्धमपवित्रं च तिलैः शुध्यति शोभने ॥ श्राद्धके स्थानमें चारों ओर अनेक वर्णवाले तिल बिखेरने चाहिये। शोभने! तिलोंसे अशुद्ध और अपवित्र स्थान शुद्ध हो जाता है ॥ नीलकाषायवस्त्रं च भिन्नवर्णं नवव्रणम् । हीनाङ्गमशुचिं वापि वर्जयेत् तत्र दूरतः ॥ श्राद्धमें नीला और गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले, विभिन्न वर्णवाले, नये घाववाले, किसी अंगसे हीन और अपवित्र मनुष्यको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ उपकल्प्य तदाहारं ब्राह्मणानर्चयेत् ततः ॥ श्मश्रुकर्मशिरस्स्नातान् समारोप्यासनं क्रमात् । सुगन्धमाल्याभरणैः स्रग्भिरेतान् विभूषयेत् ॥ श्राद्धकी रसोई तैयार करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे। हजामत बनवाकर सिरसे नहाये हुए उन ब्राह्मणोंको क्रमशः आसनपर बिठाकर सुगन्ध, माला, आभूषणों तथा पुष्पहारोंसे विभूषित करे ॥ अलंकृत्योपविष्टांस्तान् पिण्डावापं निवेदयेत् ॥ ततः प्रस्तीर्य दर्भाणां प्रस्तरं दक्षिणामुखम् । तत्समीपेऽग्निमिद्ध्वा च स्वधां च जुहुयात् ततः ॥ अलंकृत होकर बैठे हुए उन ब्राह्मणोंको यह निवेदन करे कि अब मैं पिण्डदान करूँगा। तदनन्तर दक्षिणाभिमुख कुश बिछाकर उनके समीप अग्नि प्रज्वलित करके उसमें श्राद्धान्नकी आहुति दे (आहुतिके मन्त्र इस प्रकार हैं—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा) ॥ समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात् तदा । तथा दर्भेषु पिन्डांस्त्रीन् निर्वपेद् दक्षिणामुखः । अपसव्यमपाङ्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम् ॥ इस प्रकार अग्नि और सोमके लिये आहुति देकर उनके समीप पितरोंके निमित्त होम करे तथा दक्षिणाभिमुख हो अपसव्य होकर अर्थात् जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर पितरोंके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर तीन पिण्ड दे। उन पिण्डोंका अंगुष्ठसे स्पर्श न हो ॥ एतेन विधिना दत्तं पितृणामक्षयं भवेत् । ततो विप्रान् यथाशक्ति पूजयेन्नियतः शुचिः ॥
सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजाः ।। इस विधिसे दिया हुआ पिण्डदान पितरोंके लिये अक्षय होता है। तत्पश्चात् मनको वशमें रखकर पवित्र हो यथाशक्ति दक्षिणा और सामग्री देकर ब्राह्मणोंकी यथाशक्ति पूजा करे। जिससे वे संतुष्ट हो जायें ।।
यत्र तत् क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथः । नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत् ।। जहाँ यह श्राद्ध या पूजन किया जाता है, वहाँ न तो कुछ बोले और न आपसमें ही कुछ दूसरी बात करे। वाणी और शरीरको संयममें रखकर श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।।
ततो निर्वपने वृत्ते तान् पिण्डांस्तदनन्तरम् । ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ।। पिण्डदानका कार्य पूर्ण हो जानेपर उन पिण्डोंको ब्राह्मण, अग्नि, बकरा अथवा गौ भक्षण कर ले या उन्हें जलमें डाल दिया जाय ।।
पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामा हि प्राशयेत् । आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् ।। यदि श्राद्धकर्ताकी पत्नीको पुत्रकी कामना हो, तो वह मध्यम पिण्ड अर्थात् पितामहको अर्पित किये हुए पिण्डको खा ले और प्रार्थना करे कि 'पितरो! आपलोग मेरे गर्भमें कमलोंकी मालासे अलंकृत एक सुन्दर कुमारकी स्थापना करें' ।।
तृप्तानुत्थाप्य तान् विप्रानन्नशेषं निवेदयेत् । तच्छेषं बहुभिः पश्चात् सभृत्यो भक्षयेन्नरः ।। जब ब्राह्मणलोग भोजन करके तृप्त हो जायें, तब उन्हें उठाकर शेष अन्न दूसरोंको निवेदन करे। तत्पश्चात् बहुत-से लोगोंके साथ मनुष्य भृत्यवर्गसहित शेष अन्नका स्वयं भोजन करे ।।
एष प्रोक्तः समासेन पितृयज्ञः सनातनः । पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात् ।। यह सनातन पितृयज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया गया। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ताको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।।
अहन्यहनि वा कुर्यान्मासे मासेऽथवा पुनः । संवत्सरं द्विः कुर्याच्च चतुर्वापि स्वशक्तितः ।। मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन, प्रतिमास, सालमें दो बार अथवा चार बार भी श्राद्ध करे ।।
दीर्घायुश्च भवेत् स्वस्थः पितृमेधेन वा पुनः । सपुत्रो बहुभृत्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।।
श्राद्ध करनेसे मनुष्य दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। वह बहुतसे पुत्र, सेवक तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ।।
श्राद्धदः स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम् ।
अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम् ।।
श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष विविध आकृतियोंवाले, निर्मल, रजोगुणरहित और अप्सराओंसे सेवित स्वर्गलोकमें निरन्तर निवास पाता है ।।
श्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिताः ।
तेषां पुष्टिं प्रजां चैव दास्यन्ति पितरः सदा ।।
जो पुष्टिकी इच्छा रखनेवाले पण्डित श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि एवं संतान प्रदान करते हैं ।।
धन्य यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुविनाशनम् ।
कुलसंधारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिणः ।।
मनीषी पुरुष श्राद्धको धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, शत्रुनाशक एवं कुलधारक बताते हैं ।।
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ।।
यत्सारस्तु नरो लोके तद् दानं चोत्तमं स्मृतम् ।
सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ।।
देवि! भामिनि! दानके फलका जो प्रमाण माना गया है, उसे सुनो। जगत्में मनुष्यके पास जो सार वस्तु है, उसका दान उसके लिये उत्तम माना गया है। शोभने! इस पृथ्वीपर उसीको सम्पूर्ण दानकी विधि कही गयी है ।।
प्रस्थं सारं दरिद्रस्य सारं कोटिधनस्य च ।
प्रस्थसारस्तु तत् प्रस्थं ददन्महदवाप्नुयात् ।।
कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्महदवाप्नुयात् ।
उभयं तन्महत् तच्च फलेनैव समं स्मृतम् ।।
दरिद्रका सार है सेरभर अन्न और जो करोड़पति है उसका सार है करोड़। जिसका सेरभर अनाज ही सार है, वह उसीका दान करके महान् फल प्राप्त कर लेता है और जिसका सार एक करोड़ मुद्रा है, वह उसीका दान कर दे तो महान् फलका भागी होता है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण दान हैं और दोनोंका फल महान् माना गया है ।।
धर्मार्थकामभोगेषु शक्त्यभावस्तु मध्यमम् ।
स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद् दानमधमं स्मृतम् ।।
धर्म, अर्थ और काम-भोगमें शक्तिका अभाव हो जाय और उस अवस्थामें कुछ दान किया जाय तो वह दान मध्यम कोटिका है और अपने धन एवं शक्तिसे अत्यन्त हीन कोटिका दान अधम माना गया है ।।
शृणु दत्तस्य वै देवि पञ्चधा फलकल्पनाम् । आनन्त्यं च महच्चैव समं हीनं हि पातकम् ॥ देवि! दानके फलकी पाँच प्रकारसे कल्पना की गयी है, उसको सुनो। अनन्त, महान्, सम, हीन और पाप—ये पाँच तरहके फल होते हैं।। तेषां विशेषं वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ॥ देवि! इन पाँचोंकी जो विशेषता है, उसे बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जिस धनका त्याग करना अत्यन्त कठिन हो, उसे सुपात्रको देना 'आनन्त्य' कहलाता है अर्थात् उस दानका फल अनन्त—अक्षय होता है।। दानं षड्गुणयुक्तं तु महदित्यभिधीयते । यथाश्रद्धं तु वै दानं यथार्हं सममुच्यते ॥ पूर्वोक्त छः गुणोंसे युक्त जो दान है, उसीको 'महान्' कहा गया है। जैसी अपनी श्रद्धा हो उसीके अनुसार यथायोग्य दान देना 'सम' कहलाता है।। गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम् । दानं पातकमित्याहुः षड्गुणानां विपर्यये ॥ गुणहीन दानको 'हीन' कहा गया है। यदि पूर्वोक्त छः गुणोंके विपरीत दान किया जाय तो वह 'पातक' रूप कहा गया है।। देवलोके महत् कालमानन्त्यस्य फलं विदुः । महत्तस्तु तथा कालं स्वर्गलोके तु पूज्यते ॥ आनन्त्य या 'अनन्त' नामक दानका फल देव-लोकमें दीर्घ कालतक भोगा जाता है। महद् दानका फल यह है कि मनुष्य स्वर्गलोकमें अधिक कालतक पूजित होता है।। समस्य तु तदा दानं मानुष्यं भोगमावहेत् । दानं निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ॥ सम-दान मनुष्यलोकका भोग प्रस्तुत करता है। शुभे! क्रियासे हीन दान निष्फल बताया गया है।। अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत् । नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानतः ॥ अथवा म्लेच्छ देशोंमें जन्म लेकर मनुष्य वहाँ उसका फल पाता है। अशुभदानसे पाप लगता है और उसका फल भोगनेके लिये वह दाता मृत्युके पश्चात् नरक या तिर्यक् योनियोंमें जाता है।।
उमोवाच
अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम् ।
उमाने पूछा- भगवन्! अशुभदानका भी फल शुभ कैसे होता है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मनसा तत्त्वतः शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम् ।
प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ।।
श्रीमहेश्वरने कहा- प्रिये! जो दान शुद्ध हृदयसे अर्थात् निष्काम भावसे दिये जानेके
कारण तत्त्वतः शुद्ध हो, जिसमें क्रूरताका अभाव हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह शुभ
फल देनेवाला है। सभी प्रकारके दानोंको प्रसन्नताके साथ देकर दाता शुभ फलका भागी
होता है ।।
रहस्यं सर्वदानानामेतद् विद्धि शुभेक्षणे ।
अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्भिः कृतानि च ।।
शुभेक्षणे! इसीको तुम सम्पूर्ण दानोंका रहस्य समझो। अब सत्पुरुषोंद्वारा किये गये
अन्य धर्म-कार्योंका वर्णन सुनो ।।
आरामदेवगोष्ठानि संक्रमाः कूप एव च ।
गोवाटश्च तटाकश्च सभा शाला च सर्वशः ।।
पाषण्डावसथश्चैव पानीयं गोतृणानि च ।
व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम् ।।
अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशोधनम् ।
व्यसनाभ्यवपत्तिश्च सर्वेषां च स्वशक्तितः ।।
एतत् सर्वं समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम् ।
तत् कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्त्या श्रद्धया शुभे ।।
बगीचा लगाना, देवस्थान बनाना, पुल और कुआँका निर्माण करना, गोशाला, पोखरा,
धर्मशाला, सबके लिये घर, पाखण्डीतकको भी आश्रय देना, पानी पिलाना, गौओंको घास
देना, रोगियोंके लिये दवा और पथ्यकी व्यवस्था करना, अनाथ बालकोंका पालन-पोषण
करना, अनाथ मुर्दोंका दाह-संस्कार कराना, तीर्थ-मार्गका शोधन करना, अपनी शक्तिके
अनुसार सभीके संकटोंको दूर करनेका प्रयत्न करना-यह सब संक्षेपसे धर्मकार्य बताया
गया। शुभे! मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक यह धर्मकार्य करना चाहिये ।।
प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा ।
रूपं सौभाग्यमारोग्यं बलं सौख्यं लभेन्नरः ।।
स्वर्गे वा मानुषे वापि तैस्तैराप्यायते हि सः ।।
यह सब करनेसे मृत्युके पश्चात् मनुष्यको पुण्य प्राप्त होता है, इसमें विचार करनेकी
आवश्यकता नहीं है। वह धर्मात्मा पुरुष रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है।
वह स्वर्गलोकमें रहे या मनुष्यलोकमें, उन-उन पुण्यफलोंसे तृप्त होता रहता है ।।
उमोवाच भगवल्लोँकपालेश धर्मस्तु कतिभेदकः । दृश्यते परितः सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने कहा— भगवन्! लोकपालेश्वर! धर्मके कितने भेद हैं? साधु पुरुष सब ओर उसके कितने भेद देखते हैं? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच स्मृतिधर्मश्च बहुधा सद्भिदाचार इष्यते ॥ देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च । जातिधर्माश्च वै धर्मा गणधर्माश्च शोभने ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— स्मृतिकथित धर्म अनेक प्रकारका है। श्रेष्ठ पुरुषोंको आचार-धर्म अभीष्ट होता है। शोभने! देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म तथा समुदाय-धर्म भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥ शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते । एतद् धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभिः ॥ शरीर और कालकी विषमतासे आपद्धर्म भी देखा जाता है। इस जगत्में रहनेवाले मनुष्य ही धर्मके ये नाना भेद करते हैं ॥ तत्कारणसमायोगे लभेत् कुर्वन् फलं नरः ॥ कारणका संयोग होनेपर धर्माचरण करनेवाला मनुष्य उस धर्मके फलको प्राप्त करता है ॥ श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्रकृतो धर्म उच्यते । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ धर्मोंमें जो श्रौत (वेद-कथित) और स्मार्त (स्मृति-कथित) धर्म है, उसे प्रकृत धर्म कहते हैं। देवि! इस प्रकार तुम्हें धर्मकी बात बतायी गयी है। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)