महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो मनुष्य इस जगत्में नदियोंपर जल ले जानेवाले पुरुषोंकी सुविधाके लिये पुल निर्माण कराता है, वह मृत्युके पश्चात् उसका पुण्यफल पाता है और सब प्रकारके संकटोंसे छुटकारा पा जाता है ।। मार्गकृत् सततं मर्त्यो भवेत् संतानवान् पुनः । कायदोषविमुक्तस्तु तीर्थकृत् सततं भवेत् ।। जो मनुष्य सदा मार्गका निर्माण करता है, वह संतानवान् होता है। तथा जो जलमें उतरनेके लिये सीढ़ी एवं पक्के घाट बनवाता है, वह शारीरिक दोषसे मुक्त हो जाता है ।। औषधानां प्रदानात् तु सततं कृपयान्वितः । भवेद् व्याधिविहीनश्च दीर्घायुश्च विशेषतः ।। जो सदा कृपापूर्वक रोगियोंको औषध प्रदान करता है, वह रोगहीन और विशेषतः दीर्घायु होता है ।। अनाथान् पोषयेद् यस्तु कृपणान्धकपङ्गुकान् । स तु पुण्यफलं प्रेत्य लभते कृच्छ्रमोक्षणम् ।। जो अनाथों, दीन-दुःखियों, अन्धों और पंगु मनुष्योंका पोषण करता है, वह मृत्युके पश्चात् उसका पुण्यफल पाता और संकटसे मुक्त हो जाता है ।। वेदगोष्ठाः सभाः शाला भिक्षूणां च प्रतिश्रयम् । यः कुर्याल्लभते नित्यं नरः प्रेत्य शुभं फलम् ।। जो मनुष्य वेदविद्यालय, सभाभवन, धर्मशाला तथा भिक्षुओंके लिये आश्रम बनाता है, वह मृत्युके पश्चात् शुभ फल पाता है ।। विविधं विविधाकारं भक्ष्यभोज्यगुणान्वितम् । रम्यं सदैव गोवाटं यः कुर्याल्लभते नरः । प्रेत्यभावे शुभां जातिं व्याधिमोक्षं तथैव च । एवं नानाविधं द्रव्यं दानकर्ता लभेत् फलम् ।। जो मानव उत्तम भक्ष्य-भोज्यसम्बन्धी गुणोंसे युक्त तथा नाना प्रकारकी आकृतिवाली भाँति-भाँतिकी रमणीय गोशालाओंका सदैव निर्माण करता है, वह मृत्युके पश्चात् उत्तम जन्म पाता और रोगमुक्त होता है। इस प्रकार भाँति-भाँतिके द्रव्योंका दान करनेवाला मनुष्य पुण्यफलका भागी होता है ।। बुद्धिमायुष्यमारोग्यं बलं भाग्यं तथाऽऽगमम् । रूपेण सप्तधा भूत्वा मानुष्यं फलति ध्रुवम् ।। बुद्धि, आयुष्य, आरोग्य, बल, भाग्य, आगम तथा रूप—इन सात भागोंमें प्रकट होकर मनुष्यका पुण्यकर्म अवश्य अपना फल देता है ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते । लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने कहा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! लौकिक और वैदिक यज्ञको उत्तम बताया जाता है। अतः इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता । यज्ञा वेदेष्वधीताश्च वेदा ब्राह्मणसंयुताः ॥ **श्रीमहेश्वर बोले—**देवि! देवताओंकी जो पूजा है, वह यज्ञोंके ही अन्तर्गत है। यज्ञोंका वेदोंमें वर्णन है और वेद ब्राह्मणोंके साथ हैं ॥
इदं तु सकलं द्रव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये । यज्ञार्थं विद्धि तत् सृष्टं लोकानां हितकाम्यया ॥ प्रिये! स्वर्गलोकमें या पृथ्वीपर जो द्रव्य दृष्टि-गोचर होता है, इस सबकी सृष्टि विधाताद्वारा लोकहितकी कामनासे यज्ञके लिये की गयी है, ऐसा समझो ॥
एवं विज्ञाय तत् कर्ता सदारः सततं द्विजः । प्रेत्यभावे लभेल्लोकान् ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ऐसा समझकर जो द्विज सदा अपनी स्त्रीके साथ रहकर यज्ञ-कर्म करता है, वह ब्रह्मकर्ममें तत्पर रहनेके कारण मृत्युके पश्चात् पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥
ब्राह्मणेष्वेव तद् ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम् ॥ तस्माद् विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा । यज्ञकर्म कृतं सर्वं देवता अभितर्पयेत् ॥ देवि! वह ब्रह्म (वेद) सदा ब्राह्मणोंमें ही स्थित है, अतः शास्त्र-विधिके अनुसार ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ सम्पूर्ण यज्ञकर्म देवताओंको तृप्त करता है ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायशः स्मृताः ॥ अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितैः । सुशुद्धैर्यजमानैश्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधि ॥ शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः ॥ ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी उत्पत्ति प्रायः यज्ञके लिये ही मानी गयी है। शुद्ध यजमानों तथा ऋत्विजों-द्वारा किये गये वेदवर्णित अग्निष्टोम आदि यज्ञों एवं विशुद्ध द्रव्योपकरणोंसे यजन करना चाहिये, यह शास्त्रका निश्चय है ॥
तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत् । तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत् ॥
इस प्रकार किये गये यज्ञोंमें देवताओंको संतोष होता है और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानको यज्ञका पूरा-पूरा फल मिलता है ।।
देवाः संतोषिता यज्ञैर्लोकान् संवर्धयन्त्युत ।
यज्ञोंद्वारा संतुष्ट किये हुए देवता सम्पूर्ण लोकोंकी वृद्धि करते हैं ।।
तस्माद् यज्वा दिवं गत्वामरैः सह मोदते ।
नास्ति यज्ञसमं दानं नास्ति यज्ञसमो निधिः ।।
सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहितः ।
इसलिये यजमान स्वर्गलोकमें जाकर देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। यज्ञके समान कोई दान नहीं है और यज्ञके समान कोई निधि नहीं है। देवि! सम्पूर्ण धर्मोंका उद्देश्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है ।।
एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु ।।
देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सवः ।।
यह यज्ञद्वारा की गयी देवपूजा वैदिकी है। इससे भिन्न जो दूसरी लौकिकी पूजा है, उसका वर्णन सुनो। देवताओंके सत्कारके लिये लोकमें समय-समयपर उत्सव किया जाता है ।।
देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै ।
यागान् देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि ।।
देवान् संतोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात् ।।
देवि! जो देवालयमें देवताका संस्कार करके उत्सव मनाता है और पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ एवं देवताओंको उपहार समर्पित करके उन्हें संतुष्ट करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त करता है ।।
गन्धमाल्यैश्च विविधैः परमान्नेन धूपनैः ।
बह्वीभिः स्तुतिभिश्चैव स्तुवद्भिः प्रयतैर्नरैः ।।
नृत्तैर्वाद्यैश्च गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलोभनैः ।
देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि ।।
तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिताः ।
तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे ।।
देवि! इस भूतपर जो मनुष्य देवताओंके सत्कारके उद्देश्यसे नाना प्रकारके गन्ध, माल्य, उत्तम अन्न, धूपदान तथा बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा स्तवन करते हैं और शुद्धचित्त हो नृत्य, वाद्य, गान तथा दृष्टिको लुभानेवाले अन्यान्य कार्यक्रमोंद्वारा देवाराधन करते हैं, उनके भक्तिजनित सत्कारसे ही पूजित हो देवता स्वर्गमें उतनेसे ही संतुष्ट हो जाते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]
[श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]
उमोवाच
पितृमेधः कथं देव तन्मे शंसितुमर्हसि ।
सर्वेषां पितरः पूज्याः सर्वसम्पत्प्रदायिनः ॥
उमाने पूछा— देव! पितृमेध (श्राद्ध) कैसे किया जाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता पितर सभीके लिये पूजनीय होते हैं ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
पितृमेधं प्रवक्ष्यामि यथावत् तन्मनाः शृणु ।
देशकालौ विधानं च तत्क्रियायाः शुभाशुभम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं पितृमेधका यथावद्रूपसे वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। देश, काल, विधान तथा क्रियाके शुभाशुभ फलका भी वर्णन करूँगा ॥
लोकेषु पितरः पूज्या देवतानां च देवताः ।
शुचयो निर्मलाः पुण्या दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥
सभी लोकोंमें पितर पूजनीय होते हैं। वे देवताओंके भी देवता हैं। उनका स्वरूप शुद्ध, निर्मल एवं पवित्र है। वे दक्षिणदिशामें निवास करते हैं ॥
यथा वृष्टिं प्रतीक्षन्ते भूमिष्ठाः सर्वजन्तवः ।
पितरश्च तथा लोके पितृमेधं शुभेक्षणे ॥
शुभेक्षणे! जैसे भूमिपर रहनेवाले सभी प्राणी वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार पितृलोकमें रहनेवाले पितर श्राद्धकी प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥
तस्य देशाः कुरुक्षेत्रं गया गङ्गा सरस्वती ।
प्रभासं पुष्करं चेति तेषु दत्तं महाफलम् ॥
श्राद्धके लिये पवित्र देश हैं—कुरुक्षेत्र, गया, गङ्गा, सरस्वती, प्रभास और पुष्कर—इन तीर्थस्थानोंमें दिया गया श्राद्धका दान महान् फलदायक होता है ॥
तीर्थानि सरितः पुण्या विविक्तानि वनानि च ।
नदीनां पुलिनानीति देशाः श्राद्धस्य पूजिताः ॥
तीर्थ, पवित्र नदियाँ, एकान्त वन तथा नदियोंके तट—ये श्राद्धके लिये प्रशंसित देश हैं ॥
माघप्रोष्ठपदौ मासौ श्राद्धकर्मणि पूजितौ ।
पक्षयोः कृष्णपक्षश्च पूर्वपक्षात् प्रशस्यते ॥
श्राद्ध-कर्ममें माघ और भाद्रपदमास प्रशंसित हैं। दोनों पक्षोंमें पूर्वपक्ष (शुक्ल) की अपेक्षा कृष्णपक्ष उत्तम बताया जाता है ॥
अमावास्यां त्रयोदश्यां नवम्यां प्रतिपत्सु च । तिथिष्वेतासु तुष्यन्ति दत्तेनेह पितामहाः ॥ अमावास्या, त्रयोदशी, नवमी और प्रतिपदा—इन तिथियोंमें यहाँ श्राद्धका दान करनेसे पितृगण संतुष्ट होते हैं ॥
पूर्वाह्ने शुक्लपक्षे च रात्रौ जन्मदिनेषु वा । युग्मेष्वहस्सु च श्राद्धं न च कुर्वीत पण्डितः ॥ विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पूर्वाह्नमें, शुक्ल-पक्षमें, रात्रिमें अपने जन्मके दिनमें और युग्म दिनोंमें श्राद्ध न करे ॥
एष कालो मया प्रोक्तः पितृमेधस्य पूजितः । यस्मिंश्च ब्राह्मणं पात्रं पश्येत् कालः स च स्मृतः ॥ यह मैंने श्राद्धका प्रशस्त समय बताया है। जिस दिन सुपात्र ब्राह्मणका दर्शन हो, वह भी श्राद्धका उत्तम समय माना गया है ॥
अपाङ्क्तेया द्विजा वर्ज्या ग्राह्यास्ते पङ्क्तिपावनाः । भोजयेद् यदि पापिष्ठान् श्राद्धेषु नरकं व्रजेत् ॥ श्राद्धमें अपांक्तेय ब्राह्मणोंका त्याग और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंको ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई श्राद्धमें पापिष्ठोंको भोजन कराता है तो वह नरकमें पड़ता है ॥
वृत्तश्रुतकुलोपेतान् सकलत्रान् गुणान्वितान् । तदर्हान् श्रोत्रियान् विद्धि ब्राह्मणान्युजः शुभे ॥ शुभे! जो सदाचार, शास्त्रज्ञान और उत्तम कुलसे सम्पन्न, सपत्नीक तथा सद्गुणी हों, ऐसे श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको तुम श्राद्धके योग्य समझो। श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी संख्या विषम होनी चाहिये ॥
एतान् निमन्त्रयेद् विद्वान् पूर्वेद्युः प्रातरेव वा । ततः श्राद्धक्रियां पश्चादारभेत यथाविधि ॥ विद्वान् पुरुष इन ब्राह्मणोंको श्राद्धके पहले ही दिन अथवा श्राद्धके ही दिन प्रातःकाल निमन्त्रण दे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक श्राद्धकर्म आरम्भ करे ॥
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र हैं—दौहित्र, कुतपकाल (दिनके पन्द्रह भागमेंसे आठवाँ भाग) तथा तिल। इस कार्यमें तीन गुणोंकी प्रशंसा की जाती है। पवित्रता, क्रोधहीनता और अत्वरा (जल्दीबाजी न करना) ॥
कुतपः खड्गपात्रं च कुशा दर्भास्तिला मधु ।
कालशाकं गजच्छाया पवित्रं श्राद्धकर्मसु ॥ कुतप, खड्गपात्र, कुशा, दर्भ, तिल, मधु, कालशाक और गजच्छाया—ये वस्तुएँ श्राद्धकर्ममें पवित्र मानी गयी हैं ॥ तिलानवकिरेत् तत्र नानावर्णान् समन्ततः । अशुद्धमपवित्रं च तिलैः शुध्यति शोभने ॥ श्राद्धके स्थानमें चारों ओर अनेक वर्णवाले तिल बिखेरने चाहिये। शोभने! तिलोंसे अशुद्ध और अपवित्र स्थान शुद्ध हो जाता है ॥ नीलकाषायवस्त्रं च भिन्नवर्णं नवव्रणम् । हीनाङ्गमशुचिं वापि वर्जयेत् तत्र दूरतः ॥ श्राद्धमें नीला और गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले, विभिन्न वर्णवाले, नये घाववाले, किसी अंगसे हीन और अपवित्र मनुष्यको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ उपकल्प्य तदाहारं ब्राह्मणानर्चयेत् ततः ॥ श्मश्रुकर्मशिरस्स्नातान् समारोप्यासनं क्रमात् । सुगन्धमाल्याभरणैः स्रग्भिरेतान् विभूषयेत् ॥ श्राद्धकी रसोई तैयार करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे। हजामत बनवाकर सिरसे नहाये हुए उन ब्राह्मणोंको क्रमशः आसनपर बिठाकर सुगन्ध, माला, आभूषणों तथा पुष्पहारोंसे विभूषित करे ॥ अलंकृत्योपविष्टांस्तान् पिण्डावापं निवेदयेत् ॥ ततः प्रस्तीर्य दर्भाणां प्रस्तरं दक्षिणामुखम् । तत्समीपेऽग्निमिद्ध्वा च स्वधां च जुहुयात् ततः ॥ अलंकृत होकर बैठे हुए उन ब्राह्मणोंको यह निवेदन करे कि अब मैं पिण्डदान करूँगा। तदनन्तर दक्षिणाभिमुख कुश बिछाकर उनके समीप अग्नि प्रज्वलित करके उसमें श्राद्धान्नकी आहुति दे (आहुतिके मन्त्र इस प्रकार हैं—अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा) ॥ समीपे त्वग्नीषोमाभ्यां पितृभ्यो जुहुयात् तदा । तथा दर्भेषु पिन्डांस्त्रीन् निर्वपेद् दक्षिणामुखः । अपसव्यमपाङ्गुष्ठं नामधेयपुरस्कृतम् ॥ इस प्रकार अग्नि और सोमके लिये आहुति देकर उनके समीप पितरोंके निमित्त होम करे तथा दक्षिणाभिमुख हो अपसव्य होकर अर्थात् जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर पितरोंके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर तीन पिण्ड दे। उन पिण्डोंका अंगुष्ठसे स्पर्श न हो ॥ एतेन विधिना दत्तं पितृणामक्षयं भवेत् । ततो विप्रान् यथाशक्ति पूजयेन्नियतः शुचिः ॥
सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजाः ।। इस विधिसे दिया हुआ पिण्डदान पितरोंके लिये अक्षय होता है। तत्पश्चात् मनको वशमें रखकर पवित्र हो यथाशक्ति दक्षिणा और सामग्री देकर ब्राह्मणोंकी यथाशक्ति पूजा करे। जिससे वे संतुष्ट हो जायें ।।
यत्र तत् क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथः । नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत् ।। जहाँ यह श्राद्ध या पूजन किया जाता है, वहाँ न तो कुछ बोले और न आपसमें ही कुछ दूसरी बात करे। वाणी और शरीरको संयममें रखकर श्राद्धकर्म आरम्भ करे ।।
ततो निर्वपने वृत्ते तान् पिण्डांस्तदनन्तरम् । ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ।। पिण्डदानका कार्य पूर्ण हो जानेपर उन पिण्डोंको ब्राह्मण, अग्नि, बकरा अथवा गौ भक्षण कर ले या उन्हें जलमें डाल दिया जाय ।।
पत्नीं वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामा हि प्राशयेत् । आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् ।। यदि श्राद्धकर्ताकी पत्नीको पुत्रकी कामना हो, तो वह मध्यम पिण्ड अर्थात् पितामहको अर्पित किये हुए पिण्डको खा ले और प्रार्थना करे कि 'पितरो! आपलोग मेरे गर्भमें कमलोंकी मालासे अलंकृत एक सुन्दर कुमारकी स्थापना करें' ।।
तृप्तानुत्थाप्य तान् विप्रानन्नशेषं निवेदयेत् । तच्छेषं बहुभिः पश्चात् सभृत्यो भक्षयेन्नरः ।। जब ब्राह्मणलोग भोजन करके तृप्त हो जायें, तब उन्हें उठाकर शेष अन्न दूसरोंको निवेदन करे। तत्पश्चात् बहुत-से लोगोंके साथ मनुष्य भृत्यवर्गसहित शेष अन्नका स्वयं भोजन करे ।।
एष प्रोक्तः समासेन पितृयज्ञः सनातनः । पितरस्तेन तुष्यन्ति कर्ता च फलमाप्नुयात् ।। यह सनातन पितृयज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया गया। इससे पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ताको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ।।
अहन्यहनि वा कुर्यान्मासे मासेऽथवा पुनः । संवत्सरं द्विः कुर्याच्च चतुर्वापि स्वशक्तितः ।। मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन, प्रतिमास, सालमें दो बार अथवा चार बार भी श्राद्ध करे ।।
दीर्घायुश्च भवेत् स्वस्थः पितृमेधेन वा पुनः । सपुत्रो बहुभृत्यश्च प्रभूतधनधान्यवान् ।।
श्राद्ध करनेसे मनुष्य दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। वह बहुतसे पुत्र, सेवक तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है ।।
श्राद्धदः स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम् ।
अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम् ।।
श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष विविध आकृतियोंवाले, निर्मल, रजोगुणरहित और अप्सराओंसे सेवित स्वर्गलोकमें निरन्तर निवास पाता है ।।
श्राद्धानि पुष्टिकामा वै ये प्रकुर्वन्ति पण्डिताः ।
तेषां पुष्टिं प्रजां चैव दास्यन्ति पितरः सदा ।।
जो पुष्टिकी इच्छा रखनेवाले पण्डित श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितर सदा पुष्टि एवं संतान प्रदान करते हैं ।।
धन्य यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं शत्रुविनाशनम् ।
कुलसंधारकं चेति श्राद्धमाहुर्मनीषिणः ।।
मनीषी पुरुष श्राद्धको धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, शत्रुनाशक एवं कुलधारक बताते हैं ।।
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि ।।
यत्सारस्तु नरो लोके तद् दानं चोत्तमं स्मृतम् ।
सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने ।।
देवि! भामिनि! दानके फलका जो प्रमाण माना गया है, उसे सुनो। जगत्में मनुष्यके पास जो सार वस्तु है, उसका दान उसके लिये उत्तम माना गया है। शोभने! इस पृथ्वीपर उसीको सम्पूर्ण दानकी विधि कही गयी है ।।
प्रस्थं सारं दरिद्रस्य सारं कोटिधनस्य च ।
प्रस्थसारस्तु तत् प्रस्थं ददन्महदवाप्नुयात् ।।
कोटिसारस्तु तां कोटिं ददन्महदवाप्नुयात् ।
उभयं तन्महत् तच्च फलेनैव समं स्मृतम् ।।
दरिद्रका सार है सेरभर अन्न और जो करोड़पति है उसका सार है करोड़। जिसका सेरभर अनाज ही सार है, वह उसीका दान करके महान् फल प्राप्त कर लेता है और जिसका सार एक करोड़ मुद्रा है, वह उसीका दान कर दे तो महान् फलका भागी होता है। ये दोनों ही महत्त्वपूर्ण दान हैं और दोनोंका फल महान् माना गया है ।।
धर्मार्थकामभोगेषु शक्त्यभावस्तु मध्यमम् ।
स्वद्रव्यादतिहीनं तु तद् दानमधमं स्मृतम् ।।
धर्म, अर्थ और काम-भोगमें शक्तिका अभाव हो जाय और उस अवस्थामें कुछ दान किया जाय तो वह दान मध्यम कोटिका है और अपने धन एवं शक्तिसे अत्यन्त हीन कोटिका दान अधम माना गया है ।।
शृणु दत्तस्य वै देवि पञ्चधा फलकल्पनाम् । आनन्त्यं च महच्चैव समं हीनं हि पातकम् ॥ देवि! दानके फलकी पाँच प्रकारसे कल्पना की गयी है, उसको सुनो। अनन्त, महान्, सम, हीन और पाप—ये पाँच तरहके फल होते हैं।। तेषां विशेषं वक्ष्यामि शृणु देवि समाहिता । दुस्त्यजस्य च वै दानं पात्र आनन्त्यमुच्यते ॥ देवि! इन पाँचोंकी जो विशेषता है, उसे बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जिस धनका त्याग करना अत्यन्त कठिन हो, उसे सुपात्रको देना 'आनन्त्य' कहलाता है अर्थात् उस दानका फल अनन्त—अक्षय होता है।। दानं षड्गुणयुक्तं तु महदित्यभिधीयते । यथाश्रद्धं तु वै दानं यथार्हं सममुच्यते ॥ पूर्वोक्त छः गुणोंसे युक्त जो दान है, उसीको 'महान्' कहा गया है। जैसी अपनी श्रद्धा हो उसीके अनुसार यथायोग्य दान देना 'सम' कहलाता है।। गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम् । दानं पातकमित्याहुः षड्गुणानां विपर्यये ॥ गुणहीन दानको 'हीन' कहा गया है। यदि पूर्वोक्त छः गुणोंके विपरीत दान किया जाय तो वह 'पातक' रूप कहा गया है।। देवलोके महत् कालमानन्त्यस्य फलं विदुः । महत्तस्तु तथा कालं स्वर्गलोके तु पूज्यते ॥ आनन्त्य या 'अनन्त' नामक दानका फल देव-लोकमें दीर्घ कालतक भोगा जाता है। महद् दानका फल यह है कि मनुष्य स्वर्गलोकमें अधिक कालतक पूजित होता है।। समस्य तु तदा दानं मानुष्यं भोगमावहेत् । दानं निष्फलमित्याहुर्विहीनं क्रियया शुभे ॥ सम-दान मनुष्यलोकका भोग प्रस्तुत करता है। शुभे! क्रियासे हीन दान निष्फल बताया गया है।। अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत् । नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानतः ॥ अथवा म्लेच्छ देशोंमें जन्म लेकर मनुष्य वहाँ उसका फल पाता है। अशुभदानसे पाप लगता है और उसका फल भोगनेके लिये वह दाता मृत्युके पश्चात् नरक या तिर्यक् योनियोंमें जाता है।।
उमोवाच
अशुभस्यापि दानस्य शुभं स्याच्च फलं कथम् ।
उमाने पूछा- भगवन्! अशुभदानका भी फल शुभ कैसे होता है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मनसा तत्त्वतः शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम् ।
प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ।।
श्रीमहेश्वरने कहा- प्रिये! जो दान शुद्ध हृदयसे अर्थात् निष्काम भावसे दिये जानेके
कारण तत्त्वतः शुद्ध हो, जिसमें क्रूरताका अभाव हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह शुभ
फल देनेवाला है। सभी प्रकारके दानोंको प्रसन्नताके साथ देकर दाता शुभ फलका भागी
होता है ।।
रहस्यं सर्वदानानामेतद् विद्धि शुभेक्षणे ।
अन्यानि धर्मकार्याणि शृणु सद्भिः कृतानि च ।।
शुभेक्षणे! इसीको तुम सम्पूर्ण दानोंका रहस्य समझो। अब सत्पुरुषोंद्वारा किये गये
अन्य धर्म-कार्योंका वर्णन सुनो ।।
आरामदेवगोष्ठानि संक्रमाः कूप एव च ।
गोवाटश्च तटाकश्च सभा शाला च सर्वशः ।।
पाषण्डावसथश्चैव पानीयं गोतृणानि च ।
व्याधितानां च भैषज्यमनाथानां च पोषणम् ।।
अनाथशवसंस्कारस्तीर्थमार्गविशोधनम् ।
व्यसनाभ्यवपत्तिश्च सर्वेषां च स्वशक्तितः ।।
एतत् सर्वं समासेन धर्मकार्यमिति स्मृतम् ।
तत् कर्तव्यं मनुष्येण स्वशक्त्या श्रद्धया शुभे ।।
बगीचा लगाना, देवस्थान बनाना, पुल और कुआँका निर्माण करना, गोशाला, पोखरा,
धर्मशाला, सबके लिये घर, पाखण्डीतकको भी आश्रय देना, पानी पिलाना, गौओंको घास
देना, रोगियोंके लिये दवा और पथ्यकी व्यवस्था करना, अनाथ बालकोंका पालन-पोषण
करना, अनाथ मुर्दोंका दाह-संस्कार कराना, तीर्थ-मार्गका शोधन करना, अपनी शक्तिके
अनुसार सभीके संकटोंको दूर करनेका प्रयत्न करना-यह सब संक्षेपसे धर्मकार्य बताया
गया। शुभे! मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक यह धर्मकार्य करना चाहिये ।।
प्रेत्यभावे लभेत् पुण्यं नास्ति तत्र विचारणा ।
रूपं सौभाग्यमारोग्यं बलं सौख्यं लभेन्नरः ।।
स्वर्गे वा मानुषे वापि तैस्तैराप्यायते हि सः ।।
यह सब करनेसे मृत्युके पश्चात् मनुष्यको पुण्य प्राप्त होता है, इसमें विचार करनेकी
आवश्यकता नहीं है। वह धर्मात्मा पुरुष रूप, सौभाग्य, आरोग्य, बल और सुख पाता है।
वह स्वर्गलोकमें रहे या मनुष्यलोकमें, उन-उन पुण्यफलोंसे तृप्त होता रहता है ।।
उमोवाच भगवल्लोँकपालेश धर्मस्तु कतिभेदकः । दृश्यते परितः सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने कहा— भगवन्! लोकपालेश्वर! धर्मके कितने भेद हैं? साधु पुरुष सब ओर उसके कितने भेद देखते हैं? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच स्मृतिधर्मश्च बहुधा सद्भिदाचार इष्यते ॥ देशधर्माश्च दृश्यन्ते कुलधर्मास्तथैव च । जातिधर्माश्च वै धर्मा गणधर्माश्च शोभने ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— स्मृतिकथित धर्म अनेक प्रकारका है। श्रेष्ठ पुरुषोंको आचार-धर्म अभीष्ट होता है। शोभने! देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म तथा समुदाय-धर्म भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥ शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते । एतद् धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभिः ॥ शरीर और कालकी विषमतासे आपद्धर्म भी देखा जाता है। इस जगत्में रहनेवाले मनुष्य ही धर्मके ये नाना भेद करते हैं ॥ तत्कारणसमायोगे लभेत् कुर्वन् फलं नरः ॥ कारणका संयोग होनेपर धर्माचरण करनेवाला मनुष्य उस धर्मके फलको प्राप्त करता है ॥ श्रौतस्मार्तस्तु धर्माणां प्रकृतो धर्म उच्यते । इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥ धर्मोंमें जो श्रौत (वेद-कथित) और स्मार्त (स्मृति-कथित) धर्म है, उसे प्रकृत धर्म कहते हैं। देवि! इस प्रकार तुम्हें धर्मकी बात बतायी गयी है। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका
[प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]
उमोवाच
मानुषेष्वेव जीवत्सु गतिर्विज्ञायते न वा । यथा शुभगतिर्जीवन् नासौ त्वशुभभागिति ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे शंसितुमर्हसि । उमाने पूछा—प्रभो! मनुष्योंके जीते-जी उनकी गतिका ज्ञान होता है या नहीं? शुभगतिवाले मनुष्यका जैसा जीवन है, वैसा ही अशुभ गतिवालेका नहीं हो सकता। इस विषयको मैं सुनना चाहती हूँ, आप मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि जीवितं विद्यते यथा । द्विविधाः प्राणिनो लोके दैवासुरसमाश्रिताः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! प्राणियोंका जीवन जैसा होता है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा। संसारमें दो प्रकारके प्राणी होते हैं—एक दैवभावके आश्रित और दूसरे आसुरभावके आश्रित ॥
मनसा कर्मणा वाचा प्रतिकूला भवन्ति ये । तादृशानासुरान् विद्धि मर्त्यांस्ते नरकालयाः ॥ जो मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके प्रतिकूल ही आचरण करते हैं, उनको आसुर समझो। उन्हें नरकमें निवास करना पड़ता है ॥
हिंस्राश्चोराश्च धूर्ताश्च परदाराभिमर्शकाः । नीचकर्मरता ये च शौचमङ्गलवर्जिताः ॥ शुचिविद्वेषिणः पापा लोकचारित्रदूषकाः । एवंयुक्तसमाचारा जीवन्तो नरकालयाः ॥ जो हिंसक, चोर, धूर्त, परस्त्रीगामी, नीचकर्म-परायण, शौच और मंगलाचारसे रहित, पवित्रतासे द्वेष रखनेवाले, पापी और लोगोंके चरित्रपर कलंक लगानेवाले हैं, ऐसे आचारवाले अर्थात् आसुरी स्वभाववाले मनुष्य जीते-जी ही नरकमें पड़े हुए हैं ॥
लोकोद्वेगकराश्चान्ये पशवश्च सरीसृपाः । वृक्षाः कण्टकिनो रूक्षास्तादृशान् विद्धि चासुरान् ॥ जो लोगोंको उद्वेगमें डालनेवाले पशु, साँप-बिच्छू आदि जन्तु तथा रूखे और कँटीले वृक्ष हैं, वे सब पहले आसुर स्वभावके मनुष्य ही थे, ऐसा समझो ॥
अपरान् देवपक्षांस्तु शृणु देवि समाहिता ।। मनोवाक्कर्मभिर्नित्यमनुकूला भवन्ति ये । तादृशानमरान् विद्धि ते नराः स्वर्गगामिनः ।। देवी! अब तुम एकाग्रचित्त होकर दूसरे देव-पक्षीय अर्थात् दैवी प्रकृतिवाले मनुष्योंका परिचय सुनो। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा सबके अनुकूल होते हैं, ऐसे मनुष्योंको अमर (देवता) समझो। वे स्वर्गगामी होते हैं ।।
शौचार्जवपरा धीराः परार्थान् न हरन्ति ये । ये समाः सर्वभूतेषु ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो शौच और सरलतामें तत्पर तथा धीर हैं, जो दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करते हैं और समस्त प्राणियोंके प्रति समानभाव रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
धार्मिकाः शौचसम्पन्नाः शुक्ला मधुरवादिनः । नाकार्यं मनसेच्छन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो धार्मिक, शौचाचारसम्पन्न, शुद्ध और मधुरभाषी होकर कभी मनसे भी न करने योग्य कार्य करना नहीं चाहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
दरिद्रा अपि ये केचिद् याचिताः प्रीतिपूर्वकम् । ददत्येव च यत् किंचित् ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो कोई दरिद्र होनेपर भी किसी याचकके माँगनेपर उसे प्रसन्नतापूर्वक कुछ-न-कुछ देते ही हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
आस्तिका मङ्गलपराः सततं वृद्धसेविनः । पुण्यकर्मपरा नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो आस्तिक, मंगलपरायण, सदा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेवाले और प्रतिदिन पुण्यकर्ममें संलग्न रहनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
निर्ममा निरहंकाराः सानुक्रोशाः स्वबन्धुषु । दीनानुकम्पिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो ममता और अहंकारसे शून्य, अपने बन्धुजनोंपर अनुग्रह रखनेवाले और सदा दीनोंपर दया करनेवाले हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
स्वदुःखमिव मन्यन्ते परेषां दुःखवेदनम् । गुरुशुश्रूषणपरा देवब्राह्मणपूजकाः ।। कृतज्ञाः कृतविद्याश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ।। जो दूसरोंकी दुःख-वेदनाको अपने दुःखके समान ही मानते हैं, गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहते हैं, देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, कृतज्ञ तथा विद्वान् हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
जितेन्द्रिया जितक्रोधा जितमानमदास्तथा ।
लोभमात्सर्यहीना ये ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
शक्त्या चाभ्यवपद्यन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो जितेन्द्रिय, क्रोधपर विजय पानेवाले और मान तथा मदको परास्त करनेवाले हैं तथा जिनमें लोभ और मात्सर्यका अभाव है, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं; जो यथाशक्ति परोपकारमें तत्पर रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
व्रतिनो दानशीलाश्च धर्मशीलाश्च मानवाः ।
ऋजवो मृदवो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो व्रती, दानशील, धर्मशील, सरल और सदा कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेवाले हैं, वे मनुष्य सदा स्वर्गलोकमें जाते हैं ।।
ऐहिकेन तु वृत्तेन पारत्रमनुमीयते ।
एवंविधा नरा लोके जीवन्तः स्वर्गगामिनः ।।
इस लोकके आचारसे परलोकमें प्राप्त होनेवाली गतिका अनुमान किया जाता है। जगत्में ऐसा जीवन बितानेवाले मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
यदन्यच्च शुभं लोके प्रजानुग्रहकारि च ।
पशवश्चैव वृक्षाश्च प्रजानां हितकारिणः ।।
तादृशान् देवपक्षस्थानिति विद्धि शुभानने ।।
लोकमें और भी जो शुभ एवं प्रजापर अनुग्रह करनेवाला कर्म है, वह स्वर्गकी प्राप्तिका साधन है। शुभानने! जो प्रजाका हित करनेवाले पशु एवं वृक्ष हैं, उन सबको देवपक्षीय जानो ।।
शुभाशुभमयं लोके सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।
दैवं शुभमिति प्राहुरसुरं चाशुभं प्रिये ।।
जगत्में सारा चराचरसमुदाय शुभाशुभमय है। प्रिये! इनमें जो शुभ है, उसे दैव और जो अशुभ है, उसे आसुर समझो ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचित् कालधर्ममुपस्थिताः ।
प्राणमोक्षं कथं कृत्वा परत्र हितमाप्नुयुः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! जो कोई मनुष्य मृत्युके निकट पहुँचे हुए हैं, वे किस प्रकार अपने प्राणोंका परित्याग करें, जिससे परलोकमें उन्हें कल्याणकी प्राप्ति हो? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु देवि समाहिता ।
द्विविधं मरणं लोके स्वभावाद् यत्नस्तथा ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इस विषयका वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। लोकमें दो प्रकारकी मृत्यु होती है, एक स्वाभाविक और दूसरी यत्नसाध्य ।।
तयोः स्वभावं नापायं यत्नतः करणोद्भवम् ।
एतयोरुभयोर्देवि विधानं शृणु शोभने ।।
देवि! इन दोनोंमें जो स्वाभाविक मृत्यु है, वह अटल है, उसमें कोई बाधा नहीं है। परंतु जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह साधनसामग्रीद्वारा सम्भव होती है। शोभने! इन दोनोंमें जो विधान है, वह मुझसे सुनो ।।
कल्याकल्यशरीरस्य यत्नजं द्विविधं स्मृतम् ।
यत्नजं नाम मरणमात्मत्यागो मुमूर्षया ।।
जो यत्नसाध्य मृत्यु है, वह समर्थ और असमर्थ शरीरसे सम्बन्ध रखनेके कारण दो प्रकारकी मानी गयी है। मरनेकी इच्छासे जो जान-बूझकर अपने शरीरका परित्याग किया जाता है, उसीका नाम है यत्नसाध्य मृत्यु ।।
तत्राकल्यशरीरस्य जरा व्याधिश्च कारणम् ।
महाप्रस्थानगमनं तथा प्रायोपवेशनम् ।।
जलावगाहनं चैव अग्निचित्याप्रवेशनम् ।
एवं चतुर्विधः प्रोक्त आत्मत्यागो मुमूर्षताम् ।।
जो असमर्थ शरीरसे युक्त है अर्थात् बुढ़ापेके कारण या रोगके कारण असमर्थ हो गया है, उसकी मृत्युमें कारण है महाप्रस्थानगमन, आमरण उपवास, जलमें प्रवेश अथवा चिताकी आगमें जल मरना। यह चार प्रकारका देहत्याग बताया गया है, जिसे मरनेकी इच्छावाले पुरुष करते हैं ।।
एतेषां क्रमयोगेन विधानं शृणु शोभने ।।
स्वधर्मयुक्तं गार्हस्थ्यं चिरमूढ्वा विधानतः ।
तत्रानृण्यं च सम्प्राप्य वृद्धो वा व्याधितोऽपि वा ।।
दर्शयित्वा स्वदौर्बल्यं सर्वानैवानुमान्य च ।
सर्वं विहाय बन्धूंश्च कर्मणां भरणं तथा ।।
दानानि विधिवत् कृत्वा धर्मकार्यार्थमात्मनः ।
अनुज्ञाप्य जनं सर्वं वाचा मधुरया ब्रुवन् ।।
अहतं वस्त्रमाच्छाद्य बद्ध्वा तत् कुशरज्जुना ।
उपस्पृश्य प्रतिज्ञाय व्यवसायपुरस्सरम् ।।
परित्यज्य ततो ग्राम्यं धर्मं कुर्याद् यथेप्सितम् ।।
शोभने! अब क्रमशः इनकी विधि सुनो—मनुष्य स्वधर्मयुक्त गार्हस्थ्य-आश्रमका दीर्घकालतक विधिपूर्वक निर्वाह करके उससे उऋण हो वृद्ध अथवा रोगी हो जानेपर अपनी
दुर्बलता दिखा सभी लोगोंसे गृहत्यागके लिये अनुमति ले फिर समस्त भाई-बन्धुओं और
कर्मानुष्ठानोंका त्याग करके अपने धर्मकार्यके लिये विधिवत् दान करनेके पश्चात् मीठी
वाणी बोलकर सब लोगोंसे आज्ञा ले नूतन वस्त्र धारण करके उसे कुशकी रस्सीसे बाँध ले।
इसके बाद आचमनपूर्वक दृढ़ निश्चयके साथ आत्मत्यागकी प्रतिज्ञा करके ग्राम्यधर्मको
छोड़कर इच्छानुसार कार्य करे ।।
महाप्रस्थानमिच्छेच्चेत् प्रतिष्ठेतोत्तरां दिशम् ।।
भूत्वा तावन्निराहारो यावत् प्राणविमोक्षणम् ।
चेष्टाहानौ शयित्वापि तन्मनाः प्राणमुत्सृजेत् ।।
एवं पुण्यकृतां लोकानमलान् प्रतिपद्यते ।।
यदि महाप्रस्थानकी इच्छा हो तो निराहार रहकर जबतक प्राण निकल न जायँ तबतक
उत्तर दिशाकी ओर निरन्तर प्रस्थान करे। जब शरीर निश्चेष्ट हो जाय, तब वहीं सोकर उस
परमेश्वरमें मन लगाकर प्राणोंका परित्याग कर दे। ऐसा करनेसे वह पुण्यात्माओंके निर्मल
लोकोंको प्राप्त होता है ।।
प्रायोपवेशनं चेच्छेत् तेनैव विधिना नरः ।
देशे पुण्यतमे श्रेष्ठे निराहारस्तु संविशेत् ।।
यदि मनुष्य प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करना चाहे तो पूर्वोक्त विधिसे ही घर
छोड़कर परम पवित्र श्रेष्ठतम देशमें निराहार होकर बैठ जाय ।।
आप्राणान्तं शुचिर्भूत्वा कुर्वन् दानं स्वशक्तितः ।
हरिं स्मरंस्त्यजेत् प्राणानेष धर्मः सनातनः ।।
जबतक प्राणोंका अन्त न हो तबतक शुद्ध होकर अपनी शक्तिके अनुसार दान करते
हुए भगवान्के स्मरण-पूर्वक प्राणोंका परित्याग करे। यह सनातन धर्म है ।।
एवं कलेवरं त्यक्त्वा स्वर्गलोके महीयते ।।
अग्निप्रवेशनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे ।
कृत्वा काष्ठमयं चित्यं पुण्यक्षेत्रे नदीषु वा ।।
दैवतेभ्यो नमस्कृत्या कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
भूत्वा शुचिर्व्यवसितः स्मरन् नारायणं हरिम् ।।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्या प्रविशेदग्निसंस्तरम् ।।
शुभे! इस प्रकार शरीरका त्याग करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि
मनुष्य अग्निमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे विदा लेकर किसी पुण्यक्षेत्रमें अथवा
नदियोंके तटपर काठकी चिता बनावे। फिर देवताओंको नमस्कार और परिक्रमा करके
शुद्ध एवं दृढ़निश्चयसे युक्त हो श्रीनारायण हरिका स्मरण करते हुए ब्राह्मणोंको मस्तक
नवाकर उस प्रज्वलित चिताग्निमें प्रवेश कर जाय ।।
सोऽपि लोकान् यथान्यायं प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ।।
जलावगाहनं चेच्छेत् तेनैव विधिना शुभे । ख्याते पुण्यतमे तीर्थे निमज्जेत् सुकृतं स्मरन् ॥ सोऽपि पुण्यतमाँल्लोकान् निसर्गात् प्रतिपद्यते ॥ ऐसा पुरुष भी यथोचितरूपसे उक्त कार्य करके पुण्यात्माओंके लोक प्राप्त कर लेता है। शुभे! यदि कोई जलमें प्रवेश करना चाहे तो उसी विधिसे किसी विख्यात पवित्रतम तीर्थमें पुण्यका चिन्तन करते हुए डूब जाय। ऐसा मनुष्य भी स्वभावतः पुण्यतम लोकोंमें जाता है ॥
ततः कल्यशरीरस्य संत्यागं शृणु तत्त्वतः ॥ रक्षार्थं क्षत्रियस्येष्टः प्रजापालनकारणात् ॥ योधानां भर्तृपिण्डार्थं गुर्वर्थं ब्रह्मचारिणाम् । गोब्राह्मणार्थं सर्वेषां प्राणत्यागो विधीयते ॥ इसके बाद समर्थ शरीरवाले पुरुषके आत्मत्यागकी तात्त्विक विधि बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियके लिये दीन-दुःखियोंकी रक्षा और प्रजापालनके निमित्त प्राणत्याग अभीष्ट बताया गया है। योद्धा अपने स्वामीके अन्नका बदला चुकानेके लिये, ब्रह्मचारी गुरुके हितके लिये तथा सब लोग गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राणोंको निछावर कर दें, यह शास्त्रका विधान है ॥
स्वराज्यरक्षणार्थं वा कुनृपैः पीडिताः प्रजाः । मोक्तुकामस्त्यजेत् प्राणान् युद्धमार्गे यथाविधि ॥ राजा अपने राज्यकी रक्षाके लिये अथवा दुष्ट नरेशोंद्वारा पीड़ित हुई प्रजाको संकटसे छुड़ानेके लिये विधिपूर्वक युद्धके मार्गपर चलकर प्राणोंका परित्याग करे ॥
सुसन्नद्धो व्यवसितः सम्प्रविश्यापराङ्मुखः ॥ एवं राजा मृतः सद्यः स्वर्गलोके महीयते । तादृशी सुगतिर्नास्ति क्षत्रियस्य विशेषतः ॥ जो राजा कवच बाँधकर मनमें दृढ़ निश्चय ले युद्धमें प्रवेश करके पीठ नहीं दिखाता और शत्रुओंका सामना करता हुआ मारा जाता है, वह तत्काल स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। सामान्यतः सबके लिये और विशेषतः क्षत्रियके लिये वैसी उत्तम गति दूसरी नहीं है ॥
भृत्यो वा भर्तृपिण्डार्थं भर्तृकर्मण्युपस्थिते । कुर्वंस्तत्र तु साहाय्यमात्मप्राणानपेक्षया ॥ स्वाम्यर्थं संत्यजेत् प्राणान् पुण्याँल्लोकान् स गच्छति । स्पृहणीयः सुरगणैस्तत्र नास्ति विचारणा ॥ जो भृत्य स्वामीके अन्नका बदला देनेके लिये उनका कार्य उपस्थित होनेपर अपने प्राणोंका मोह छोड़कर उनकी सहायता करता है और स्वामीके लिये प्राण त्याग देता है, वह
देवसमूहोंके लिये स्पृहणीय हो पुण्यलोकोंमें जाता है। इस विषयमें कोई विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ एवं गोब्राह्मणार्थं वा दीनार्थं वा त्यजेत् तनुम् । सोऽपि पुण्यमवाप्नोति आनृशंस्यव्यपेक्षया ॥ इत्येते जीवितत्यागे मार्गास्ते समुदाहृताः ॥ इस प्रकार जो गौओं, ब्राह्मणों तथा दीन-दुःखियोंकी रक्षाके लिये शरीरका त्याग करता है, वह भी दयाधर्मको अपनानेके कारण पुण्यलोकोंमें जाता है। इस तरह ये प्राणत्यागके समुचित मार्ग तुम्हें बताये गये हैं ॥ कामात् क्रोधाद् भयाद् वापि यदि चेत् संत्यजेत् तनुम् । सोऽनन्तं नरकं याति आत्महन्तृत्वकारणात् ॥ यदि कोई काम, क्रोध अथवा भयसे शरीरका त्याग करे तो वह आत्महत्या करनेके कारण अनन्त नरकमें जाता है ॥ स्वभावं मरणं नाम न तु चात्मेच्छया भवेत् । यथा मृतानां यत् कार्यं तन्मे शृणु यथाविधि ॥ स्वाभाविक मृत्यु वह है, जो अपनी इच्छासे नहीं होती, स्वतः प्राप्त हो जाती है। उसमें जिस प्रकार मरे हुए लोगोंके लिये जो कर्तव्य है, वह मुझसे विधिपूर्वक सुनो ॥ तत्रापि मरणं त्यागो मूढत्यागाद् विशिष्यते । भूमौ संवेशयेद् देहं नरस्य विनशिष्यतः ॥ निर्जीवं वृणुयात् सद्यो वाससा तु कलेवरम् । माल्यगन्धैरलङ्कृत्य सुवर्णेन च भामिनि ॥ श्मशाने दक्षिणे देशे चिताग्नौ प्रदहेन्मृतम् । अथवा निक्षिपेद् भूमौ शरीरं जीववर्जितम् ॥ उसमें भी जो मरण या त्याग होता है, वह किसी मूर्खके देहत्यागसे बढ़कर है। मरनेवाले मनुष्यके शरीरको पृथ्वीपर लिटा देना चाहिये और जब प्राण निकल जाय, तब तत्काल उसके शरीरको नूतन वस्त्रसे ढक देना चाहिये। भामिनि! फिर उसे माला, गन्ध और सुवर्णसे अलंकृत करके श्मशान-भूमिमें दक्षिण दिशाकी ओर चिताकी आगमें उस शवको जला देना चाहिये। अथवा निर्जीव शरीरको वहाँ भूमिपर ही डाल दे ॥ दिवा च शुक्लपक्षश्च उत्तरायणमेव च । मुमूर्षूणां प्रशस्तानि विपरीतं तु गर्हितम् ॥ दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणका समय मुमूर्षुओंके लिये उत्तम है। इसके विपरीत रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन निन्दित हैं ॥ औदकं चाष्टकाश्राद्धं बहुभिर्बहुभिः कृतम् । आप्यायनं मृतानां तत् परलोके भवेच्छुभम् ॥
एतत् सर्वं मया प्रोक्तं मानुषाणां हितं वचः ॥ बहुत-से पुरुषोंद्वारा किया गया जलदान और अष्टकाश्राद्ध परलोकमें मृत पुरुषोंको तृप्त करनेवाला और शुभ होता है। यह सब मैंने मनुष्योंके लिये हितकारक बात बतायी है॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]
[मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता]
उमोवाच
देवदेव नमस्तेऽस्तु कालसूदन शंकर ।
लोकेषु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्मया श्रुताः ॥
विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यः शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ।
**उमाने कहा—**देवदेव! कालसूदन शंकर! आपको नमस्कार है। आपकी कृपासे मैंने अनेक प्रकारके धर्म सुने। अब यह बताइये कि सम्पूर्ण धर्मोंसे श्रेष्ठ, सनातन, अटल और अविनाशी धर्म क्या है? ।।
नारद उवाच
एवं पृष्टस्तया देव्या महादेवः पिनाकधृक् ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं सूक्ष्ममध्यात्मसंश्रितम् ॥
**नारदजीने कहा—**देवी पार्वतीके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी महादेवजीने सूक्ष्म अध्यात्मभावसे युक्त मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि निश्चयम् ।
एतदेव विशिष्टं ते यत् त्वं पृच्छसि मां प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वर बोले—**महाभागे! तुमने न्यायतः सुननेकी निश्चित इच्छा प्रकट की है, प्रिये! तुम मुझसे जो पूछती हो, यही तुम्हारा विशिष्ट गुण है ।।
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गलोकफलाश्रितः ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥
सर्वत्र स्वर्गलोकरूपी फलके आश्रयभूत धर्मका विधान किया गया है। धर्मके बहुत-से द्वार हैं और उसकी कोई क्रिया यहाँ निष्फल नहीं होती ।।
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
तं तमेवाभिजानाति नान्यं धर्मं शुचिस्मिते ॥
शुचिस्मिते! जो-जो जिस-जिस विषयमें निश्चयको प्राप्त होता है, वह-वह उसी-उसीको धर्म समझता है, दूसरेको नहीं ।।
शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम् ।
एतद्धि सर्वधर्माणां विशिष्टं शुभमव्ययम् ॥
देवि! अब तुम संक्षेपसे परम उत्तम मोक्ष-द्वारका वर्णन सुनो। यही सब धर्मोंमें उत्तम, शुभ और अविनाशी है ।।