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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

कथं रक्षामि भवतस्तेऽब्रुवंश्चन्द्रमा भव । तिमिरघ्नश्च सविता दस्युहन्ता च नो भव ॥ ७ ॥ अत्रिने कहा—'मैं किस प्रकार आपलोगोंकी रक्षा करूँ? देवता बोले—'आप अन्धकारको नष्ट करनेवाले चन्द्रमा और सूर्यका रूप धारण कीजिये और हमारे शत्रु बने हुए इन डाकू दानवोंका नाश कर डालिये' ॥ ७ ॥

एवमुक्तस्तदात्रिर्वै तमोनुदभवच्छशी । अपश्यत् सौम्यभावाच्च सोमवत् प्रियदर्शनः ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा नातिप्रभं सोमं तथा सूर्य च पार्थिव । प्रकाशमकरोत्रिस्तपसा स्वेन संयुगे ॥ ९ ॥ जगद् वितिमिरं चापि प्रदीप्तमकरोत् तदा ॥ १० ॥ पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अत्रिने अन्धकारको दूर करनेवाले चन्द्रमाका रूप धारण किया और सोमके समान देखनेमें प्रिय लगने लगे। उन्होंने शान्तभावसे देवताओंकी ओर देखा। उस समय चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभा मन्द देखकर अत्रिने अपनी तपस्यासे उस युद्धभूमिमें प्रकाश फैलाया तथा सम्पूर्ण जगत्‌को अन्धकारशून्य एवं आलोकित कर दिया ॥ ८—१० ॥

व्यजयच्छत्रुसंघांश्च देवानां स्वेन तेजसा । अत्रिणा दह्यमानांस्तान् दृष्ट्वा देवा महासुरान् ॥ ११ ॥ पराक्रमैस्तेऽपि तदा व्यघ्नन्नत्रिसुरक्षिताः । उद्भासितश्च सविता देवास्त्राता हतासुराः ॥ १२ ॥ उन्होंने अपने तेजसे ही देवताओंके शत्रुओंको परास्त कर दिया। अत्रिके तेजसे उन महान् असुरोंको दग्ध होते देख अत्रिसे सुरक्षित हुए देवताओंने भी उस समय पराक्रम करके उन दैत्योंको मार डाला। अत्रिने सूर्यको तेजस्वी बनाया, देवताओंका उद्धार किया और असुरोंको नष्ट कर दिया ॥ ११-१२ ॥

अत्रिणा त्वथ सामर्थ्यं कृतमुत्तमतेजसा । द्विजेनाग्निद्वितीयेन जपता चर्मवाससा ॥ १३ ॥ फलभक्षेण राजर्षे पश्य कर्मात्रिणा कृतम् । तस्यापि विस्तरेणोक्तं कर्मात्रेः सुमहात्मनः । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमत्रितः क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥ अत्रि मुनि गायत्रीका जप करनेवाले, मृगचर्मधारी, फलाहारी, अग्निहोत्री और उत्तम तेजसे युक्त ब्राह्मण हैं। उन्होंने जो सामर्थ्य दिखलाया, जैसा महान् कर्म किया, उसपर दृष्टिपात करो। मैंने उन उत्तम महात्मा अत्रिका भी कर्म विस्तारपूर्वक बताया है। मैं कहता हूँ ब्राह्मण श्रेष्ठ है। तुम बताओ अत्रिसे श्रेष्ठ कौन क्षत्रिय है? ॥ १३-१४ ॥

इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।

शृणु राजन् महत्कर्म च्यवनस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी अर्जुन चुप ही रहा। तब वायु देवता फिर कहने लगे—राजन्! अब महात्मा च्यवनके माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ १५ ॥
अश्विनोः प्रतिसंश्रुत्य च्यवनः पाकशासनम् ।
प्रोवाच सहितो देवैः सोमपावश्विनौ कुरु ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंको सोमपान करानेकी प्रतिज्ञा करके इन्द्रसे कहा—'देवराज! आप दोनों अश्विनीकुमारोंको देवताओंके साथ सोमपानमें सम्मिलित कर लीजिये' ॥ १६ ॥

इन्द्र उवाच

अस्माभिर्निन्दितावेतौ भवेतां सोमपौ कथम् ।
देवैर्न सम्मितावेतौ तस्मान्मैवं वदस्व नः ॥ १७ ॥
इन्द्र बोले— विप्रवर! अश्विनीकुमार हमलोगोंके द्वारा निन्दित हैं। फिर ये सोमपानके अधिकारी कैसे हो सकते हैं। ये दोनों देवताओंके समान प्रतिष्ठित नहीं हैं; अतः उनके लिये इस तरहकी बात न कीजिये ॥ १७ ॥
अश्विभ्यां सह नेच्छामः सोमं पातुं महाव्रत ।
यदन्यद् वक्ष्यसे विप्र तत् करिष्यामि ते वचः ॥ १८ ॥
महान् व्रतधारी विप्रवर! हमलोग अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करना नहीं चाहते हैं। अतः इसको छोड़कर आप और जिस कामके लिये मुझे आज्ञा देंगे, उसे अवश्य मैं पूर्ण करूँगा ॥ १८ ॥

च्यवन उवाच

पिबेतामश्विनौ सोमं भवद्भिः सहिताविमौ ।
उभावेतावपि सुरौ सूर्यपुत्रौ सुरेश्वर ॥ १९ ॥
च्यवन बोले— देवराज! अश्विनीकुमार भी सूर्यके पुत्र होनेके कारण देवता ही हैं। अतः ये आप सब लोगोंके साथ निश्चय ही सोमपान कर सकते हैं ॥ १९ ॥
क्रियतां मद्वचो देवा यथा वै समुदाहृतम् ।
एतद् वः कुर्वतां श्रेयो भवेन्नैतदकुर्वताम् ॥ २० ॥
देवताओ! मैंने जैसी बात कही है, उसे आपलोग स्वीकार करें। ऐसा करनेमें ही आपलोगोंकी भलाई है; अन्यथा इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा ॥ २० ॥

इन्द्र उवाच

अश्विभ्यां सह सोमं वै न पास्यामि द्विजोत्तम ।
पिबन्त्वन्ये यथाकामं नाहं पातुमिहोत्सहे ॥ २१ ॥

**इन्द्रने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! निश्चय ही मैं दोनों अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान नहीं करूँगा। अन्य देवताओंकी इच्छा हो तो उनके साथ सोमरस पीयें। मैं तो नहीं पी सकता॥ २१॥

च्यवन उवाच

न चेत् करिष्यसि वचो मयोक्तं बलसूदन ।
मया प्रमथितः सद्यः सोमं पास्यसि वै मखे ॥ २२ ॥
**च्यवनने कहा—**बलसूदन! यदि तुम सीधी तरह मेरी कही हुई बात नहीं मानोगे तो यज्ञमें मेरे द्वारा तुम्हारा अभिमान चूर्ण कर दिया जायगा, फिर तो तत्काल ही तुम सोमरस पीने लगोगे॥ २२॥

वायुरुवाच

ततः कर्म समारब्धं हिताय सहसाश्विनोः ।
च्यवनेन ततो मन्त्रैरभिभूताः सुराऽभवन् ॥ २३ ॥
**वायुदेवता कहते हैं—**तदनन्तर च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंके हितके लिये सहसा यज्ञ आरम्भ किया। उनके मन्त्रबलसे समस्त देवता प्रभावित हो गये॥ २३॥
तत् तु कर्म समारब्धं दृष्ट्वेन्द्रः क्रोधमूर्च्छितः ।
उद्यम्य विपुलं शैलं च्यवनं समुपाद्रवत् ॥ २४ ॥
उस यज्ञकर्मका आरम्भ होता देख इन्द्र क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और हाथमें एक विशाल पर्वत लेकर वे च्यवन मुनिकी ओर दौड़े॥ २४॥
तथा वज्रेण भगवानमर्षाकुललोचनः ।
तमापतन्तं दृष्ट्वैव च्यवनस्तपसान्वितः ॥ २५ ॥
अद्भिः सिक्त्वास्तम्भयत् तं सवज्रं सहपर्वतम् ।
उस समय उनके नेत्र अमर्षसे आकुल हो रहे थे। भगवान् इन्द्रने वज्रके द्वारा भी मुनिपर आक्रमण किया। उनको आक्रमण करते देख तपस्वी च्यवनने जलका छींटा देकर वज्र और पर्वतसहित इन्द्रको स्तम्भित कर दिया—जडवत् बना दिया॥ २५½॥
अथेन्द्रस्य महाघोरं सोऽसृजच्छत्रुमेव हि ॥ २६ ॥
मदं नामाहुतिमयं व्यादितास्यं महामुनिः ।
तस्य दन्तसहस्रं तु बभूव शतयोजनम् ॥ २७ ॥
द्वियोजनशतास्तस्य दंष्ट्राः परमदारुणाः ।
हनुस्तस्याभवद् भूमावास्यं चास्यास्पृशद् दिवम् ॥ २८ ॥
जिह्वामूले स्थितास्तस्य सर्वे देवाः सवासवाः ।
तिमेरास्यमनुप्राप्ता यथा मत्स्या महार्णवे ॥ २९ ॥

इसके बाद उन महामुनिने अग्निमें आहुति डालकर इन्द्रके लिये एक अत्यन्त भयंकर शत्रु उत्पन्न किया, जिसका नाम मद था। वह मुँह फैलाकर खड़ा हो गया। उसकी ठोढ़ीका भाग जमीनमें सटा हुआ था और ऊपरवाला ओठ आकाशको छू रहा था। उसके मुँहके भीतर एक हजार दाँत थे, जो सौ-सौ योजन ऊँचे थे और उसकी भयंकर दाढ़ें दो-दो सौ योजन लंबी थीं। उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उसकी जिह्वाकी जड़में आ गये, ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें बहुत-से मत्स्य तिमि नामक महामत्स्यके मुखमें पड़ गये हों॥ २६—२९॥

ते सम्मन्त्र्य ततो देवा मदस्यास्यसमीपगाः।
अब्रुवन् सहिताः शक्रं प्रणमास्मै द्विजातये॥ ३०॥
अश्विभ्यां सह सोमं च पिबाम विगतज्वराः।
फिर तो मदके मुखमें पड़े हुए देवताओंने आपसमें सलाह करके इन्द्रसे कहा—'देवराज! आप विप्रवर च्यवनको प्रणाम कीजिये (इनसे विरोध करना अच्छा नहीं है)। हमलोग निश्चिन्त होकर अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करेंगे'॥ ३० १/२॥

ततः स प्रणतः शक्रश्चकार च्यवनस्य तत्॥ ३१॥
च्यवनः कृतवानेतावश्विनौ सोमपायिनौ।
ततः प्रत्याहरत् कर्म मदं च व्यभजन्मुनिः॥ ३२॥
अक्षेषु मृगयायां च पाने स्त्रीषु च वीर्यवान्॥ ३३॥
यह सुनकर इन्द्रने महामुनि च्यवनके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर च्यवनने अश्विनीकुमारोंको सोमरसका भागी बनाया और अपना यज्ञ समाप्त कर दिया। इसके बाद शक्तिशाली मुनिने जुआ, शिकार, मदिरा और स्त्रियोंमें मदको बाँट दिया॥ ३१—३३॥

एतैर्दोषैर्नरा राजन् क्षयं यान्ति न संशयः।
तस्मादेतान् नरो नित्यं दूरतः परिवर्जयेत्॥ ३४॥
राजन्! इन दोषोंसे युक्त मनुष्य अवश्य ही नाशको प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं है। अतः इन्हें सदाके लिये दूरसे ही त्याग देना चाहिये॥ ३४॥

एतत् ते च्यवनस्यापि कर्म राजन् प्रकीर्तितम्।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं क्षत्रियं ब्राह्मणाद् वरम्॥ ३५॥
नरेश्वर! यह तुमसे च्यवन मुनिका महान् कर्म भी बताया गया। मैं कहता हूँ—ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा तुम, बताओ कौन-सा क्षत्रिय ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है?॥ ३५॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥

कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार

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सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार

भीष्म उवाच

तूष्णीमासीदर्जुनस्तु पवनस्त्वब्रवीत् पुनः ।
शृणु मे ब्राह्मणेष्वेव मुख्यं कर्म जनाधिप ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इतनेपर भी कार्तवीर्य चुप ही रहा। तब वायु देवताने फिर कहा—नरेश्वर! ब्राह्मणोंके और भी जो श्रेष्ठ कर्म हैं, उनका वर्णन सुनो ॥ १ ॥

मदस्यास्यमनुप्राप्ता यदा सेन्द्रा दिवौकसः ।
तदैव च्यवनेनेह हृता तेषां वसुन्धरा ॥ २ ॥
जब इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मदके मुखमें पड़ गये थे, उसी समय च्यवनने उनके अधिकारकी सारी भूमि हर ली थी (तथा कप नामक दानवोंने उनके स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लिया था) ॥ २ ॥

उभौ लोकौ हृतौ मत्वा ते देवा दुःखिताऽभवन् ।
शोकार्ताश्च महात्मानं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ ३ ॥
अपने दोनों लोकोंका अपहरण हुआ जान वे देवता बहुत दुःखी हो गये और शोकसे आतुर हो महात्मा ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ३ ॥

देवा ऊचुः

मदास्यव्यतिषक्तानामस्माकं लोकपूजित ।
च्यवनेन हृता भूमिः कपैश्चैव दिवं प्रभो ॥ ४ ॥
**देवता बोले—**लोकपूजित प्रभो! जिस समय हम मदके मुखमें पड़ गये थे, उस समय च्यवनने हमारी भूमि हर ली थी और कप नामक दानवोंने स्वर्गलोकपर अधिकार कर लिया ॥ ४ ॥

ब्रह्मोवाच

गच्छध्वं शरणं विप्रानाशु सेन्द्रा दिवौकसः ।
प्रसाद्य तानुभौ लोकाववाप्स्यथ यथा पुरा ॥ ५ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्रसहित देवताओ! तुमलोग शीघ्र ही ब्राह्मणोंकी शरणमें जाओ। उन्हें प्रसन्न कर लेनेपर तुमलोग पहलेकी भाँति दोनों लोक प्राप्त कर लोगे ॥ ५ ॥

ते ययुः शरणं विप्रानूचुस्ते कान् जयामहे ।
इत्युक्तास्ते द्विजान् प्राहुर्जयतेह कपानिति ॥ ६ ॥
तब देवतालोग ब्राह्मणोंकी शरणमें गये। ब्राह्मणोंने पूछा—‘हम किनको जीतें?’ उनके इस तरह पूछनेपर देवताओंने ब्राह्मणोंसे कहा—‘आपलोग कप नामक दानवोंको परास्त कीजिये’ ॥ ६ ॥

भूगतान् हि विजेतारो वयमित्यब्रुवन् द्विजाः ।
ततः कर्म समारब्धं ब्राह्मणैः कपनाशनम् ॥ ७ ॥
तब ब्राह्मणोंने कहा—‘हम उन दानवोंको पृथ्वीपर लाकर परास्त करेंगे।’ तदनन्तर ब्राह्मणोंने कपविनाशक कर्म आरम्भ किया ॥ ७ ॥

तच्छ्रुत्वा प्रेषितो दूतो ब्राह्मणेभ्यो धनी कपैः ।
स च तान् ब्राह्मणानाह धनी कपवचो यथा ॥ ८ ॥
इसका समाचार सुनकर कपोंने ब्राह्मणोंके पास अपना धनी नामक दूत भेजा, उसने उन ब्राह्मणोंसे कपोंका संदेश इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

भवद्भिः सदृशाः सर्वे कपाः किमिह वर्तते ।
सर्वे वेदविदः प्राज्ञाः सर्वे च क्रतुयाजिनः ॥ ९ ॥
सर्वे सत्यव्रताश्चैव सर्वे तुल्या महर्षिभिः ।
श्रीश्चैव रमते तेषु धारयन्ति श्रियं च ते ॥ १० ॥
‘ब्राह्मणो! समस्त कप नामक दानव आपलोगोंके ही समान हैं। फिर उनके विरुद्ध यहाँ क्या हो रहा है? सभी कप वेदोंके ज्ञाता और विद्वान् हैं। सब-के-सब यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। सभी सत्यप्रतिज्ञ हैं और सब-के-सब महर्षियोंके तुल्य हैं। श्री उनके यहाँ रमण करती है और वे श्रीको धारण करते हैं’ ॥ ९-१० ॥

वृथादारान् न गच्छन्ति वृथामांसं न भुञ्जते ।
दीप्तमग्निं जुह्वते च गुरूणां वचने स्थिताः ॥ ११ ॥
‘वे परायी स्त्रियोंसे समागम नहीं करते। मांसको व्यर्थ समझकर उसे कभी नहीं खाते हैं। प्रज्वलित अग्निमें आहुति देते और गुरुजनोंकी आज्ञामें स्थित रहते हैं ॥ ११ ॥

सर्वे च नियतात्मानो बालानां संविभागिनः ।
उपेत्य शनकैर्यान्ति न सेवन्ति रजस्वलाम् ।
स्वर्गतिं चैव गच्छन्ति तथैव शुभकर्मिणः ॥ १२ ॥
‘वे सभी अपने मनको संयममें रखते हैं। बालकोंको उनका भाग बाँट देते हैं। निकट आकर धीरे-धीरे चलते हैं। रजस्वला स्त्रीका कभी सेवन नहीं करते। शुभकर्म करते हैं और स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १२ ॥

अभुक्तवत्सु नाश्नन्ति गर्भिणीवृद्धकादिषु ।
पूर्वाह्नेषु न दीव्यन्ति दिवा चैव न शेरते ॥ १३ ॥

'गर्भवती स्त्री और वृद्ध आदिके भोजन करनेसे पहले भोजन नहीं करते हैं। पूर्वाह्नमें जुआ नहीं खेलते और दिनमें नींद नहीं लेते हैं ।। १३ ।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्गुणैर्युक्तान् कथं कपान् । विजेष्यथ निवर्तध्वं निवृत्तानां सुखं हि वः ।। १४ ।। 'इनसे तथा अन्य बहुत-से गुणोंद्वारा संयुक्त हुए कप नामक दानवोंको आपलोग क्यों पराजित करना चाहते हैं? इस अवांछनीय कार्यसे निवृत्त होइये, क्योंकि निवृत्त होनेसे ही आपलोगोंको सुख मिलेगा' ।। १४ ।।

ब्राह्मणा ऊचुः कपान्वयं विजेष्यामो ये देवास्ते वयं स्मृताः । तस्माद् वध्याः कपाऽस्माकं धनिन् याहि यथाऽऽगतम् ।। १५ ।। तब ब्राह्मणोंने कहा—जो देवता हैं, वे हमलोग हैं; अतः देवद्रोही कप हमारे लिये वध्य हैं। इसलिये हम कपोंके कुलको पराजित करेंगे। धनी! तुम जैसे आये हो उसी तरह लौट जाओ ।। १५ ।। धनी गत्वा कपानाह न वो विप्राः प्रियंकराः । गृहीत्वास्त्राण्यतो विप्रान् कपाः सर्वे समाद्रवन् ।। १६ ।। धनीने जाकर कपोंसे कहा—'ब्राह्मणलोग आपका प्रिय करनेको उद्यत नहीं हैं।' यह सुनकर अस्त्र-शस्त्र हाथमें ले सभी कप ब्राह्मणोंपर टूट पड़े ।। १६ ।। समुदग्रध्वजान् दृष्ट्वा कपान् सर्वे द्विजातयः । व्यसृजन् ज्वलितानग्नीन् कपानां प्राणनाशनान् ।। १७ ।। उनकी ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं। कपोंको आक्रमण करते देख सभी ब्राह्मण उन कपोंपर प्रज्वलित एवं प्राणनाशक अग्निका प्रहार करने लगे ।। १७ ।। ब्रह्मसृष्टा हव्यभुजः कपान् हत्वा सनातनाः । नभसीव यथाभ्राणि व्यराजन्त नराधिप ।। १८ ।। नरेश्वर! ब्राह्मणोंके छोड़े हुए सनातन अग्निदेव उन कपोंका संहार करके आकाशमें बादलोंके समान प्रकाशित होने लगे ।। १८ ।। हत्वा वै दानवान् देवाः सर्वे सम्भूय संयुगे । तेनाभ्यजानन् हि तदा ब्राह्मणैर्निहतान् कपान् ।। १९ ।। उस समय सब देवताओंने युद्धमें संगठित होकर दानवोंका संहार कर डाला। किंतु उस समय उन्हें यह मालूम नहीं था कि ब्राह्मणोंने कपोंका विनाश कर डाला है ।। १९ ।। अथागम्य महातेजा नारदोऽकथयद् विभो । यथा हता महाभागैस्तेजसा ब्राह्मणैः कपाः ।। २० ।।

प्रभो! तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने आकर यह बात बतायी कि किस प्रकार महाभाग ब्राह्मणोंने अपने तेजसे कपोंका नाश किया है ॥ २० ॥

नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रीताः सर्वे दिवौकसः ।
प्रशंसुर्द्विजांश्चापि ब्राह्मणांश्च यशस्विनः ॥ २१ ॥
नारदजीकी बात सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने द्विजों और यशस्वी ब्राह्मणोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २१ ॥

तेषां तेजस्तथा वीर्यं देवानां ववृधे ततः ।
अवाप्नुवंश्चामरत्वं त्रिषु लोकेषु पूजितम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर देवताओंके तेज और पराक्रमकी वृद्धि होने लगी। उन्होंने तीनों लोकोंमें सम्मानित होकर अमरत्व प्राप्त कर लिया ॥ २२ ॥

इत्युक्तवचनं वायुमर्जुनः प्रत्युवाच ह ।
प्रतिपूज्य महाबाहो यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
महाबाहु युधिष्ठिर! जब वायुने इस प्रकार ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाया, तब कार्तवीर्य अर्जुनने उनके वचनोंकी प्रशंसा करके जो उत्तर दिया, उसे सुनो ॥ २३ ॥

अर्जुन उवाच

जीवाम्यहं ब्राह्मणार्थं सर्वथा सततं प्रभो ।
ब्रह्मण्यो ब्राह्मणेभ्यश्च प्रणमामि च नित्यशः ॥ २४ ॥
अर्जुन बोला— प्रभो! मैं सब प्रकारसे और सदा ब्राह्मणोंके लिये ही जीवन धारण करता हूँ, ब्राह्मणोंका भक्त हूँ और प्रतिदिन ब्राह्मणोंको प्रणाम करता हूँ ॥ २४ ॥

दत्तात्रेयप्रसादाच्च मया प्राप्तमिदं बलम् ।
लोके च परमा कीर्तिर्धर्मश्चाचरितो महान् ॥ २५ ॥
विप्रवर दत्तात्रेयजीकी कृपासे मुझे इस लोकमें महान् बल, उत्तम कीर्ति और महान् धर्मकी प्राप्ति हुई है ॥ २५ ॥

अहो ब्राह्मणकर्माणि मया मारुत तत्त्वतः ।
त्वया प्रोक्तानि कात्स्न्र्येन श्रुतानि प्रयतेन च ॥ २६ ॥
वायुदेव! बड़े हर्षकी बात है कि आपने मुझसे ब्राह्मणोंके अद्भुत कर्मोंका यथावत् वर्णन किया और मैंने ध्यान देकर उन सबको श्रवण किया है ॥ २६ ॥

वायुरुवाच

ब्राह्मणान् क्षात्रधर्मेण पालयस्वेन्द्रियाणि च ।
भृगुभ्यस्ते भयं घोरं तत् तु कालाद् भविष्यति ॥ २७ ॥
वायुने कहा— राजन्! तुम क्षत्रिय-धर्मके अनुसार ब्राह्मणोंकी रक्षा और इन्द्रियोंका संयम करो। तुम्हें भृगुवंशी ब्राह्मणोंसे घोर भय प्राप्त होनेवाला है; परंतु यह दीर्घकालके

पश्चात् सम्भव होगा॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेव और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५७ ॥

भीष्मजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन

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अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मणानर्चसे राजन् सततं संशितव्रतान् ।
कं तु कर्मोदयं दृष्ट्वा तानर्चसि जनाधिप ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजन्! आप सदा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंकी पूजा किया करते थे। अतः जनेश्वर! मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन-सा लाभ देखकर उनका पूजन करते थे? ॥ १ ॥

कां वा ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा महाव्रत ।
तानर्चसि महाबाहो सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ २ ॥
महान् व्रतधारी महाबाहो! ब्राह्मणोंकी पूजासे भविष्यमें मिलनेवाले किस फलकी ओर दृष्टि रखकर आप उनकी आराधना करते थे? यह सब मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

एष ते केशवः सर्वमाख्यास्यति महामतिः ।
व्युष्टिं ब्राह्मणपूजायां दृष्टव्युष्टिर्महाव्रतः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! ये महान् व्रतधारी परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मण-पूजासे होनेवाले लाभका प्रत्यक्ष अनुभव कर चुके हैं; अतः वही तुमसे इस विषयकी सारी बातें बतायेंगे ॥ ३ ॥

बलं श्रोत्रे वाङ्मनश्चक्षुषी च
ज्ञानं तथा सविशुद्धं ममाद्य ।
देहन्यासो नातिचिरान्मतो मे
न चाति तूर्णं सविताद्य याति ॥ ४ ॥
आज मेरा बल, मेरे कान, मेरी वाणी, मेरा मन और मेरे दोनों नेत्र तथा मेरा विशुद्ध ज्ञान भी सब एकत्रित हो गये हैं। अतः जान पड़ता है कि अब मेरा शरीर छूटनेमें अधिक विलम्ब नहीं है। आज सूर्यदेव अधिक तेजीसे नहीं चलते हैं ॥ ४ ॥

उक्ता धर्मा ये पुराणे महान्तो
राजन् विप्राणां क्षत्रियाणां विशां च ।
तथा शूद्राणां धर्ममुपासते च
शेषं कृष्णादुपशिक्षस्व पार्थ ॥ ५ ॥

पार्थ! पुराणोंमें जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंके (अलग-अलग) धर्म बतलाये गये हैं तथा सब वर्णोंके लोग जिस-जिस धर्मकी उपासना करते हैं, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया है। अब जो कुछ बाकी रह गया हो, उसकी भगवान् श्रीकृष्णसे शिक्षा लो ॥ ५ ॥

अहं ह्येनं वेद्मि तत्त्वेन कृष्णं
योऽयं हि यच्चास्य बलं पुराणम् ।
अमेयात्मा केशवः कौरवेन्द्र
सोऽयं धर्मं वक्ष्यति संशयेषु ॥ ६ ॥

इन श्रीकृष्णका जो स्वरूप है और जो इनका पुरातन बल है, उसे ठीक-ठीक मैं जानता हूँ। कौरवराज! भगवान् श्रीकृष्ण अप्रमेय हैं; अतः तुम्हारे मनमें संदेह होनेपर यही तुम्हें धर्मका उपदेश करेंगे ॥ ६ ॥

कृष्णः पृथिवीमसृजत् खं दिवं च
कृष्णस्य देहान्मेदिनी सम्बभूव ।
वराहोऽयं भीमबलः पुराणः
स पर्वतान् व्यसृजद् वै दिशश्च ॥ ७ ॥

श्रीकृष्णने ही इस पृथ्‍वी, आकाश और स्वर्गकी सृष्टि की है। इन्हींके शरीरसे पृथ्‍वीका प्रादुर्भाव हुआ है। यही भयंकर बलवाले वराहके रूपमें प्रकट हुए थे तथा इन्हीं पुराण-पुरुषने पर्वतों और दिशाओंको उत्पन्न किया है ॥ ७ ॥

अस्य चाधोऽथान्तरिक्षं दिवं च
दिशश्चतस्रो विदिशश्चतस्रः ।
सृष्टिस्तथैवेयमनुप्रसूता
स निर्ममे विश्वमिदं पुराणम् ॥ ८ ॥

अन्तरिक्ष, स्वर्ग, चारों दिशाएँ तथा चारों कोण—ये सब भगवान् श्रीकृष्णसे नीचे हैं। इन्हींसे सृष्टिकी परम्परा प्रचलित हुई है तथा इन्होंने ही इस प्राचीन विश्वका निर्माण किया है ॥ ८ ॥

अस्य नाभ्यां पुष्करं सम्प्रसूतं
यत्रोत्पन्नः स्वयमेवामितौजाः ।
तेनाच्छिन्नं तत् तमः पार्थ घोरं
यत् तत् तिष्ठत्यर्णवं तर्जयानम् ॥ ९ ॥

कुन्तीनन्दन! सृष्टिके आरम्भमें इनकी नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ और उसीके भीतर अमित तेजस्वी ब्रह्माजी स्वतः प्रकट हुए। जिन्होंने उस घोर अन्धकारका नाश किया है, जो समुद्रको भी डाँट बताता हुआ सब ओर व्याप्त हो रहा था (अर्थात् जो अगाध और अपार था) ॥ ९ ॥

कृते युगे धर्म आसीत् समग्र-

स्त्रेताकाले ज्ञानमनुप्रपन्नः । बलं त्वासीद् द्वापरे पार्थ कृष्णः कलौ त्वधर्मः क्षितिमेवाजगाम ॥ १० ॥ पार्थ! सत्ययुगमें श्रीकृष्ण सम्पूर्ण धर्मरूपसे विराजमान थे, त्रेतामें पूर्णज्ञान या विवेकरूपमें स्थित थे, द्वापरमें बलरूपसे स्थित हुए थे और कलियुगमें अधर्मरूपसे इस पृथ्वीपर आयेंगे (अर्थात् उस समय अधर्म ही बलवान् होगा) ॥ १० ॥

स एव पूर्वं निजघान दैत्यान् स पूर्वदेवश्च बभूव सम्राट् । स भूतानां भावनो भूतभव्यः स विश्वस्यास्य जगतश्चाभिगोप्ता ॥ ११ ॥ इन्होंने ही प्राचीनकालमें दैत्योंका संहार किया और ये ही दैत्यसम्राट् बलिके रूपमें प्रकट हुए। ये भूतभावन प्रभु ही भूत और भविष्य इनके ही स्वरूप हैं तथा ये ही इस सम्पूर्ण जगत्‌के रक्षा करनेवाले हैं ॥ ११ ॥

यदा धर्मो ग्लाति वंशे सुराणां तदा कृष्णो जायते मानुषेषु । धर्मे स्थित्वा स तु वै भावितात्मा परांश्च लोकानपरांश्च पाति ॥ १२ ॥ जब धर्मका ह्रास होने लगता है, तब ये शुद्ध अन्तःकरणवाले श्रीकृष्ण देवताओं तथा मनुष्योंके कुलमें अवतार लेकर स्वयं धर्ममें स्थित हो उसका आचरण करते हुए उसकी स्थापना तथा पर और अपर लोकोंकी रक्षा करते हैं ॥ १२ ॥

त्याज्यं त्यक्त्वा चासुराणां वधाय कार्याकार्ये कारणं चैव पार्थ । कृतं करिष्यत् क्रियते च देवो राहुं सोमं विद्धि च शक्रमेनम् ॥ १३ ॥ कुन्तीनन्दन! ये त्याज्य वस्तुका त्याग करके असुरोंका वध करनेके लिये स्वयं कारण बनते हैं। कार्य, अकार्य और कारण सब इन्हींके स्वरूप हैं। ये नारायणदेव ही भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें किये जानेवाले कर्मरूप हैं। तुम इन्हींको राहु, चन्द्रमा और इन्द्र समझो ॥ १३ ॥

स विश्वकर्मा स हि विश्वरूपः स विश्वभुग् विश्वसृग् विश्वजिच्च । स शूलभृच्छोणितभृत् कराल- स्तं कर्मभिर्विदितं वै स्तुवन्ति ॥ १४ ॥

श्रीकृष्ण ही विश्वकर्मा, विश्वरूप, विश्वभोक्ता, विश्वविधाता और विश्वविजेता हैं। वे ही एक हाथमें त्रिशूल और दूसरे हाथमें रक्तसे भरा खप्पर लिये विकरालरूप धारण करते हैं। अपने नाना प्रकारके कर्मोंसे जगत्में विख्यात हुए श्रीकृष्णकी ही सब लोग स्तुति करते हैं॥ १४॥

तं गन्धर्वाणामप्सरसां च नित्य- मुपतिष्ठन्ते विबुधानां शतानि । तं राक्षसाश्च परिसंवदन्ति रायस्पोषः स विजिगीषुरेकः ॥ १५ ॥

सैकड़ों गन्धर्व, अप्सराएँ तथा देवता सदा इनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। राक्षस भी इनसे सम्मति लिया करते हैं। एकमात्र ये ही धनके रक्षक और विजयके अभिलाषी हैं॥ १५॥

तमध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरे सामगाश्च स्तुवन्ति । तं ब्राह्मणा ब्रह्ममन्त्रैः स्तुवन्ति तस्मै हविरध्वर्यवः कल्पयन्ति ॥ १६ ॥

यज्ञमें स्तोतालोग इन्हींकी स्तुति करते हैं। सामगान करनेवाले विद्वान् रथन्तर साममें इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मण वेदके मन्त्रोंसे इन्हींका स्तवन करते हैं और यजुर्वेदी अध्वर्यु यज्ञमें इन्हींको हविष्यका भाग देते हैं॥ १६॥

स पौराणीं ब्रह्मगुहां प्रविष्टो महीसत्रं भारताग्रे ददर्श । स चैव गामुद्दधाराग्र्यकर्मा विक्षोभ्य दैत्यानुरगान् दानवांश्च ॥ १७ ॥

भारत! इन्होंने ही पूर्वकालमें ब्रह्मरूप पुरातन गुहामें प्रवेश करके इस पृथ्वीका जलमें प्रलय होना देखा है। इन सृष्टिकर्म करनेवाले श्रीकृष्णने दैत्यों, दानवों तथा नागोंको विक्षुब्ध करके इस पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया है॥ १७॥

तं घोषार्थे गीर्भिरिन्द्राः स्तुवन्ति स चापीशो भारतैकः पशूनाम् । तस्य भक्षान् विविधान् वेदयन्ति तमेवाजौ वाहनं वेदयन्ति ॥ १८ ॥

व्रजकी रक्षाके लिये गोवर्द्धन पर्वत उठानेके समय इन्द्र आदि देवताओंने इनकी स्तुति की थी। भरतनन्दन! ये एकमात्र श्रीकृष्ण ही समस्त पशुओं (जीवों)-के अधिपति हैं। इनको नाना प्रकारके भोजन अर्पित किये जाते हैं। युद्धमें ये ही विजय दिलानेवाले माने जाते हैं॥ १८॥

तस्यान्तरिक्षं पृथिवी दिवं च सर्वं वशे तिष्ठति शाश्वतस्य । स कुम्भे रेतः ससृजे सुराणां यत्रोत्पन्नमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥ १९ ॥ पृथ्वी, आकाश और स्वर्गलोक सभी इन सनातन पुरुष श्रीकृष्णके वशमें रहते हैं। इन्होंने कुम्भमें देवताओं (मित्र और वरुण)-का वीर्य स्थापित किया था; जिससे महर्षि वसिष्ठकी उत्पत्ति हुई बतायी जाती है ॥ १९ ॥

स मातरिश्वा विभुरश्ववाजी स रश्मिवान् सविता चादिदेवः । तेनासुरा विजिताः सर्व एव तद्विक्रान्तैर्विजितानीह त्रीणि ॥ २० ॥ ये ही सर्वत्र विचरनेवाले वायु हैं, तीव्रगामी अश्व हैं, सर्वव्यापी हैं, अंशुमाली सूर्य और आदि देवता हैं। इन्होंने ही समस्त असुरोंपर विजय पायी तथा इन्होंने ही अपने तीन पदोंसे तीनों लोकोंको नाप लिया था ॥ २० ॥

स देवानां मानुषाणां पितॄणां तमेवाहुर्यज्ञविदां वितानम् । स एव कालं विभजन्नुदेति तस्योत्तरं दक्षिणं चायने द्वे ॥ २१ ॥ ये श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देवताओं, पितरों और मनुष्योंके आत्मा हैं। इन्हींको यज्ञवेत्ताओंका यज्ञ कहा गया है। ये ही दिन और रातका विभाग करते हुए सूर्यरूपमें उदित होते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन इन्हींके दो मार्ग हैं ॥ २१ ॥

तस्यैवोर्ध्वं तिर्यगधश्चरन्ति गभस्तयो मेदिनीं भासयन्तः । तं ब्राह्मणा वेदविदो जुषन्ति तस्यादित्यो भामुपयुज्य भाति ॥ २२ ॥ इन्हींके ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलमें पृथ्वीको प्रकाशित करनेवाली किरणें फैलती हैं। वेदवेत्ता ब्राह्मण इन्हींकी सेवा करते हैं और इन्हींके प्रकाशका सहारा लेकर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं ॥ २२ ॥

स मासि मास्यध्वरकृद् विधत्ते तमध्वरे वेदविदः पठन्ति । स एवोक्तश्चक्रमिदं त्रिनाभि सप्ताश्वयुक्तं वहते वै त्रिधाम ॥ २३ ॥

ये यज्ञकर्ता श्रीकृष्ण प्रत्येक मासमें यज्ञ करते हैं। प्रत्येक यज्ञमें वेदज्ञ ब्राह्मण इन्हींके गुण गाते हैं। ये ही तीन नाभियों, तीन धामों और सात अश्वोंसे युक्त इस संवत्सर-चक्रको धारण करते हैं ।। २३ ।।

महातेजाः सर्वगः सर्वसिंहः कृष्णो लोकान् धारयते यथैकः । हंसं तमोध्नं च तमेव वीर कृष्णं सदा पार्थ कर्तारमेहि ।। २४ ।।

वीर कुन्तीनन्दन! ये महातेजस्वी और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले सर्वसिंह श्रीकृष्ण अकेले ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। तुम इन श्रीकृष्णको ही अन्धकारनाशक सूर्य और समस्त कार्योंका कर्ता समझो ।। २४ ।।

स एकदा कक्षगतो महात्मा तृप्तो विभुः खाण्डवे धूमकेतुः । स राक्षसानुरगांश्चावजित्य सर्वत्रगः सर्वमग्नौ जुहोति ।। २५ ।।

इन्हीं महात्मा वासुदेवने एक बार अग्निस্বরূপ होकर खाण्डव वनकी सूखी लकड़ियोंमें व्याप्त हो पूर्णतः तृप्तिका अनुभव किया था। ये सर्वव्यापी प्रभु ही राक्षसों और नागोंको जीतकर सबको अग्निमें ही होम देते हैं ।। २५ ।।

स एव पार्थाय श्वेतमश्वं प्रायच्छत् स एवाश्वानथ सर्वांश्चकार । स बन्धुरस्तस्य रथस्त्रिचक्र- स्त्रिवृच्छिराश्चतुरश्वस्त्रिनाभिः ।। २६ ।।

इन्होंने ही अर्जुनको श्वेत अश्व प्रदान किया था। इन्होंने ही समस्त अश्वोंकी सृष्टि की थी। ये ही संसाररूपी रथको बाँधनेवाले बन्धन हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इस रथके चक्र हैं। ऊर्ध्व, मध्य और अधः—जिसकी गति है। काल, अदृष्ट, इच्छा और संकल्प—ये चार जिसके घोड़े हैं। सफेद, काला और लाल रंगका त्रिविध कर्म ही जिसकी नाभि है। वह संसार-रथ इन श्रीकृष्णके ही अधिकारमें है ।। २६ ।।

स विहायो व्यदधात् पञ्चनाभिः स निर्ममे गां दिवमन्तरिक्षम् । सोऽरण्यानि व्यसृजत् पर्वतांश्च हृषीकेशोऽमितदीप्ताग्नितेजाः ।। २७ ।।

पाँचों भूतोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णने ही आकाशकी सृष्टि की है। इन्होंने ही पृथ्वी, स्वर्गलोक और अन्तरिक्षकी रचना की है, अत्यन्त प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी इन हृषीकेशने ही वन और पर्वतोंको उत्पन्न किया है ।। २७ ।।

अलंघयद वै सरितो जिघांसन्
शक्रं वज्रं प्रहरन्तं निरास ।
स महेन्द्रः स्तूयते वै महाध्वरे
विप्रैरेको ऋक्सहस्रैः पुराणैः ॥ २८ ॥
इन्हीं वासुदेवने वज्रका प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए इन्द्रको मार डालनेकी इच्छासे कितनी ही सरिताओंको लाँघा और उन्हें परास्त किया था। वे ही महेन्द्ररूप हैं। ब्राह्मण बड़े-बड़े यज्ञोंमें सहस्रों पुरानी ऋचाओंंद्वारा एकमात्र इन्हींकी स्तुति करते हैं ॥ २८ ॥

दुर्वासा वै तेन नान्येन शक्यो
गृहे राजन् वासयितुं महौजाः ।
तमेवाहुर्ऋषिमेकं पुराणं
स विश्वकृद् विधात्यात्मभावान् ॥ २९ ॥
राजन्! इन श्रीकृष्णके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो अपने घरमें महातेजस्वी दुर्वासाको ठहरा सके। इनको ही अद्वितीय पुरातन ऋषि कहते हैं। ये ही विश्वनिर्माता हैं और अपने स्वरूपसे ही अनेक पदार्थोंकी सृष्टि करते रहते हैं ॥ २९ ॥

वेदांश्च यो वेदयतेऽधिदेवो
विधींश्च यश्चाश्रयते पुराणान् ।
कामे वेदे लौकिके यत्फलं च
विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३० ॥
ये देवताओंके देवता होकर भी वेदोंका अध्ययन करते और प्राचीन विधियोंका आश्रय लेते हैं। लौकिक और वैदिक कर्मका जो फल है, वह सब श्रीकृष्ण ही हैं ऐसा विश्वास करो ॥ ३० ॥

ज्योतींषि शुक्लानि हि सर्वलोके
त्रयो लोका लोकपालास्त्रयश्च ।
त्रयोऽग्नयो व्याहृतयश्च तिस्रः
सर्वे देवा देवकीपुत्र एव ॥ ३१ ॥
ये ही सम्पूर्ण लोकोंकी शुक्लज्योति हैं तथा तीनों लोक, तीनों लोकपाल, त्रिविध अग्नि, तीनों व्याहृतियाँ और सम्पूर्ण देवता भी ये देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं ॥ ३१ ॥

स वत्सरः स ऋतुः सोऽर्धमासः
सोऽहोरात्रः स कला वै स काष्ठाः ।
मात्रा मुहूर्ताश्च लवाः क्षणाश्च
विष्वक्सेनः सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ३२ ॥
संवत्सर, ऋतु, पक्ष, दिन-रात, कला, काष्ठा, मात्रा, मुहूर्त, लव और क्षण—इन सबको श्रीकृष्णका ही स्वरूप समझो ॥ ३२ ॥

चन्द्रादित्यौ ग्रहनक्षत्रताराः सर्वाणि दर्शान्यथ पौर्णमासम् । नक्षत्रयोगा ऋतवश्च पार्थ विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रसूतम् ॥ ३३ ॥ पार्थ! चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा, अमावास्या, पौर्णमासी, नक्षत्रयोग तथा ऋतु— इन सबकी उत्पत्ति श्रीकृष्णसे ही हुई है ॥ ३३ ॥

रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च साध्याश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । प्रजापतिर्देवमातादितिश्च सर्वे कृष्णादृषयश्चैव सप्त ॥ ३४ ॥ रुद्र, आदित्य, वसु अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, प्रजापति, देवमाता अदिति और सप्तर्षि—ये सब-के-सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट हुए हैं ॥ ३४ ॥

वायुर्भूत्वा विक्षिपेते च विश्व- मग्निर्भूत्वा दहते विश्वरूपः । आपो भूत्वा मज्जयते च सर्वं ब्रह्मा भूत्वा सृजते विश्वसंघान् ॥ ३५ ॥ ये विश्वरूप श्रीकृष्ण ही वायुरूप धारण करके संसारको चेष्टा प्रदान करते हैं, अग्निरूप होकर सबको भस्म करते हैं, जलका रूप धारण करके जगत्‌को डुबाते हैं और ब्रह्मा होकर सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करते हैं ॥ ३५ ॥

वेद्यं च यद् वेदयते च वेद्यं विधिश्च यश्च श्रयते विधेयम् । धर्मे च वेदे च बले च सर्वं चराचरं केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ३६ ॥ ये स्वयं वेद्यस्वरूप होकर भी वेदवेद्य तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करते हैं। विधिरूप होकर भी विहित कर्मोंका आश्रय लेते हैं। ये ही धर्म, वेद और बलमें स्थित हैं। तुम यह विश्वास करो कि सारा चराचर जगत् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है ॥ ३६ ॥

ज्योतिर्भूतः परमोऽसौ पुरस्तात् प्रकाशते यत्प्रभया विश्वरूपः । अपः सृष्ट्वा सर्वभूतात्मयोनिः पुराकरोत् सर्वमेवाथ विश्वम् ॥ ३७ ॥ ये विश्वरूपधारी श्रीकृष्ण परम ज्योतिर्मय सूर्यका रूप धारण करके पूर्व दिशामें प्रकट होते हैं। जिनकी प्रभासे सारा जगत् प्रकाशित होता है। ये समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिके

स्थान हैं। इन्होंने पूर्वकालमें पहले जलकी सृष्टि करके फिर सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न किया था॥ ३७ ॥

ऋतूनुत्पातान् विविधान्यद्भुतानि मेघान् विद्युत्सर्वमैरावतं च। सर्वं कृष्णात् स्थावरं जङ्गमं च विश्वात्मानं विष्णुमेनं प्रतीहि॥ ३८ ॥ ऋतु, नाना प्रकारके उत्पात, अनेकानेक अद्भुत पदार्थ, मेघ, बिजली, ऐरावत और सम्पूर्ण चराचर जगत्‌की इन्हींसे उत्पत्ति हुई है। तुम इन्हींको समस्त विश्वका आत्मा—विष्णु समझो॥ ३८ ॥

विश्वावासं निर्गुणं वासुदेवं संकर्षणं जीवभूतं वदन्ति। ततः प्रद्युम्नमनिरुद्धं चतुर्थ- माज्ञापयत्यात्मयोनिर्महात्मा॥ ३९ ॥ ये विश्वके निवासस्थान और निर्गुण हैं। इन्हींको वासुदेव, जीवभूत संकर्षण, प्रद्युम्न और चौथा अनिरुद्ध कहते हैं। ये आत्मयोनि परमात्मा सबको अपनी आज्ञाके अधीन रखते हैं॥ ३९ ॥

स पञ्चाधा पञ्चजनोपपन्नं संचोदयन् विश्वमिदं सिसृक्षुः। ततश्चकारावनिमारुतौ च खं ज्योतिरम्भश्च तथैव पार्थ॥ ४० ॥ कुन्तीकुमार! ये देवता, असुर, मनुष्य, पितर और तिर्यग् रूपसे पाँच प्रकारके संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा रखकर पञ्चभूतोंसे युक्त जगत्‌के प्रेरक होकर सबको अपने अधीन रखते हैं। उन्होंने ही क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशकी सृष्टि की है॥ ४० ॥

स स्थावरं जङ्गमं चैवमेत- च्चतुर्विधं लोकमिमं च कृत्वा। ततो भूमिं व्यदधात् पञ्चबीजां द्यौः पृथिव्यां धास्यति भूरि वारि॥ ४१ ॥ इन्होंने जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणियोंसे युक्त इस चराचर जगत्‌की सृष्टि करके चतुर्विध भूत-समुदाय और कर्म—इन पाँचोंकी बीजरूपा भूमिका निर्माण किया। ये ही आकाशस्वरूप बनकर इस पृथ्वीपर प्रचुर जलकी वर्षा करते हैं॥ ४१ ॥

तेन विश्वं कृतमेतद्धि राजन् स जीवयत्यात्मनैवात्मयोनिः। ततो देवानसुरान् मानवांश्च

लोकानृषींश्चापि पितॄन् प्रजाश्च । समासेन विधिवत्प्राणिलोकान् सर्वान् सदा भूतपतिः सिसृक्षुः ॥ ४२ ॥ राजन्! इन्होंने ही इस विश्वको उत्पन्न किया है और ये ही आत्मयोनि श्रीकृष्ण अपनी ही शक्तिसे सबको जीवन प्रदान करते हैं। देवता, असुर, मनुष्य, लोक, ऋषि, पितर, प्रजा और संक्षेपतः सम्पूर्ण प्राणियोंको इन्हींसे जीवन मिलता है। ये भगवान् भूतनाथ ही सदा विधिपूर्वक समस्त भूतोंकी सृष्टिकी इच्छा रखते हैं ॥ ४२ ॥

शुभाशुभं स्थावरं जङ्गमं च विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि । यद् वर्तते यच्च भविष्यतीह सर्वं ह्येतत् केशवं त्वं प्रतीहि ॥ ४३ ॥ शुभ-अशुभ और स्थावर-जंगमरूप यह सारा जगत् श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुआ है, इस बातपर विश्वास करो। भूत, भविष्य और वर्तमान सब श्रीकृष्णका ही स्वरूप है। यह तुम्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ४३ ॥

मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले साक्षात् कृष्णः शाश्वतो धर्मवाहः । भूतं च यच्चेह न विद्या किंचिद् विष्वक्सेनात् सर्वमेतत् प्रतीहि ॥ ४४ ॥ प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर साक्षात् श्रीकृष्ण ही मृत्युरूप बन जाते हैं। ये धर्मके सनातन रक्षक हैं। जो बात बीत चुकी है तथा जिसका अभी कोई पता नहीं है, वे सब श्रीकृष्णसे ही प्रकट होते हैं, यह निश्चितरूपसे जान लो ॥ ४४ ॥

यत् प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम् । तत्सर्वं केशवोऽचिन्त्यो विपरीतमतः परम् ॥ ४५ ॥ तीनों लोकोंमें जो कुछ भी उत्तम, पवित्र तथा शुभ या अशुभ वस्तु है, वह सब अचिन्त्य भगवान् श्रीकृष्णका ही स्वरूप है, श्रीकृष्णसे भिन्न कोई वस्तु है, ऐसा सोचना अपनी विपरीत बुद्धिका ही परिचय देना है ॥ ४५ ॥

एतादृशः केशवोऽतश्च भूयो नारायणः परमश्चाव्ययश्च । मध्याद्यन्तस्य जगतस्तस्थुषश्च बुभूषतां प्रभवश्चाव्ययश्च ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी ऐसी ही महिमा है। बल्कि ये इससे भी अधिक प्रभावशाली हैं। ये ही परम पुरुष अविनाशी नारायण हैं। ये ही स्थावर-जंगमरूप जगत्के आदि, मध्य और