महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातना विरजसो वितमस्का विशोकाः । आदित्यदेवस्य पदं महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३२ ॥ **गौतमने कहा—**राजन्! सोमलोकसे भी ऊपर कितने ही सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और शोकसे रहित हैं। वे महात्मा सूर्यदेवके स्थान हैं। वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।।
धृतराष्ट्र उवाच
स्वाध्यायशीला गुरुशुश्रूषणे रता- स्तपस्विनः सुव्रताः सत्यसंधाः । आचार्याणामप्रतिकूलभाषिणो नित्योत्थिता गुरुकर्मस्वचोद्याः ॥ ३३ ॥ तथाविधानामेष लोको महर्षे विशुद्धानां भावितो वाग्यतानाम् । सत्ये स्थितानां वेदविदां महात्मनां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**महर्षे! जो स्वाध्यायशील, गुरुसेवापरायण, तपस्वी, उत्तम व्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, आचार्योंके प्रतिकूल भाषण न करनेवाले, सदा उद्योगशील तथा बिना कहे ही गुरुके कार्यमें संलग्न रहनेवाले हैं, जिनका भाव विशुद्ध है, जो मौनव्रतावलम्बी, सत्यनिष्ठ और वेदवेत्ता महात्मा हैं, उन्हीं लोगोंके लिये यह सूर्यदेवका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ॥ ३३-३४ ॥
गौतम उवाच
ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः सुपुण्यगंधा विरजा विशोकाः । वरुणस्य राज्ञः सदने महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३५ ॥ **गौतमने कहा—**उसके सिवा दूसरे भी बहुत-से सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ न तो रजोगुण है और न शोक ही। महामना राजा वरुणके लोकमें वे स्थान हैं। वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ३५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
चातुर्मास्यैर्यै यजन्ते जनाः सदा
तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति । ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना यथाम्नायं त्रीणि वर्षाणि विप्राः ॥ ३६ ॥ सुधारिणां धर्मधुरे महात्मनां यथोदिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् । धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३७ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो लोग सदा चातुर्मास्य याग करते हैं, हजारों इष्टियोंका अनुष्ठान करते हैं तथा जो ब्राह्मण तीन वर्षोंतक वैदिक विधिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र करते हैं, धर्मका भार अच्छी तरह वहन करते हैं, वेदोक्त मार्गपर भलीभाँति स्थित होते हैं, वे ही धर्मात्मा महात्मा ब्राह्मण वरुणलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है। यह उससे भी उत्तम लोक प्राप्त करेगा ॥ ३६-३७ ॥
गौतम उवाच
इन्द्रस्य लोका विरजा विशोका दुरन्वयाः काङ्क्षिता मानवानाम् । तस्याहं ते भवने भूरितेजसो राजन्निर्मं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३८ ॥ **गौतमने कहा—**राजन्! इन्द्रके लोक रजोगुण और शोकसे रहित हैं। उनकी प्राप्ति बहुत कठिन है। सभी मनुष्य उन्हें पानेकी इच्छा करते हैं। उन्हीं महातेजस्वी इन्द्रके भवनमें चलकर मैं आपसे अपने इस हाथीको वापस लूँगा ॥ ३८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
शतवर्षजीवी यश्च शूरो मनुष्यो वेदाध्यायी यश्च यज्वाप्रमत्तः । एते सर्वे शक्रलोकं व्रजन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३९ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो सौ वर्षतक जीनेवाला शूरवीर मनुष्य वेदोंका स्वाध्याय करता, यज्ञमें तत्पर रहता और कभी प्रमाद नहीं करता है, ऐसे ही लोग इन्द्रलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्र उससे भी उत्तम लोकमें जायगा। उसे वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३९ ॥
गौतम उवाच
प्राजापत्याः सन्ति लोका महान्तो नाकस्य पृष्ठे पुष्कला वीतशोकाः ।
मनीषिताः सर्वलोकोद्भवानां
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४० ॥
**गौतम बोले—**राजन्! स्वर्गके शिखरपर प्रजापतिके महान् लोक हैं जो हृष्ट-पुष्ट और शोकरहित हैं। सम्पूर्ण जगत्के प्राणी उन्हें पाना चाहते हैं। मैं वहीं जाकर तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४० ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये राजानो राजसूयाभिषिक्ता
धर्मात्मानो रक्षितारः प्रजानाम् ।
ये चाश्वमेधावभृथे प्लुतांगा-
स्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ४१ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**मुने! जो धर्मात्मा राजा राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होते हैं प्रजाजनोंकी रक्षा करते हैं तथा अश्वमेधयज्ञके अवभृथ-स्नानमें जिसके सारे अंग भीग जाते हैं, उन्हींके लिये प्रजापतिलोक हैं। धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जायगा ॥ ४१ ॥
गौतम उवाच
ततः परं भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगंधा विरजा वीतशोकाः ।
तस्मिन्नहं दुर्लभे चाप्यधृष्ये
गवां लोके हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४२ ॥
**गौतम बोले—**उससे परे जो पवित्र गन्धसे परिपूर्ण, रजोगुणरहित तथा शोकशन्य सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, उन्हें गोलोक कहते हैं। उस दुर्लभ एवं दुर्धर्ष गोलोकमें जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
यो गोसहस्री शतदः समां समां
गवां शती दश दद्याच्च शक्त्या ।
तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां
पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम् ॥ ४३ ॥
ये जीर्यन्ते ब्रह्मचर्येण विप्रा
ब्राह्मीं वाचं परिरक्षन्ति चैव ।
मनस्विनस्तीर्थयात्रापरायणा-
स्ते तत्र मोदन्ति गवां निवासे ॥ ४४ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**जो सहस्र गौओंका स्वामी होकर प्रतिवर्ष सौ गौओंका दान करता है, सौ गौओंका स्वामी होकर यथाशक्ति दस गौओंका दान करता है, जिसके पास दस ही गौएँ हैं, वह यदि उनमेंसे एक गायका दान करता है अथवा जो दानशील पुरुष पाँच गौओंमेंसे एक गायका दान कर देता है, वह गोलोकमें जाता है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका पालन करते-करते ही बूढ़े हो जाते हैं, जो वेदवाणीकी सदा रक्षा करते हैं तथा जो मनस्वी ब्राह्मण सदा तीर्थयात्राओंमें ही तत्पर रहते हैं, वे ही गौओंके निवास-स्थान गोलोकमें आनंद भोगते हैं ।। ४३-४४ ।।
प्रभासं मानसं तीर्थं पुष्कराणि महत्सरः । पुण्यं च नैमिषं तीर्थं बाहुदां करतोयिनीम् ॥ ४५ ॥ गयां गयशिरश्चैव विपाशां स्थूलवालुकाम् । कृष्णां गंगां पञ्चनदं महाह्रदमथापि च ॥ ४६ ॥ गोमतीं कौशिकीं पम्पां महात्मानो धृतव्रताः । सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां ये तु यान्ति च ॥ ४७ ॥ तत्र ते दिव्यसंस्थाना दिव्यमाल्यधराः शिवाः । प्रयान्ति पुण्यगंधाढ्या धृतराष्ट्रो न तत्र वै ॥ ४८ ॥
प्रभात, मानसरोवर तीर्थ, त्रिपुष्कर नामक महान् सरोवर, पवित्र नैमिषतीर्थ, बाहुदा नदी, करतोया नदी, गया, गयशिर, स्थूल बालुकायुकत्त विपाशा (व्यास), कृष्णा, गंगा, पंचनद, महाह्रद, गोमती, कौशिकी, पम्पासरोवर, सरस्वती, दृषद्वती और यमुना—इन तीर्थोंमें जो व्रतधारी महात्मा जाते हैं, वे ही दिव्य रूप धारण करके दिव्य मालाओंसे अलंकृत हो गोलोकमें जाते हैं और कल्याणमय स्वरूप तथा पवित्र सुगंधसे व्याप्त होकर वहाँ निवास करते हैं। धृतराष्ट्र उस लोकमें भी नहीं मिलेगा ।।
गौतम उवाच
यत्र शीतभयं नास्ति न चोष्णभयमण्वपि । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न दुःखं न सुखं तथा ॥ ४९ ॥ न द्वेष्यो न प्रियः कश्चिन्न बन्धुर्न रिपुस्तथा । न जरामरणे तत्र न पुण्यं न च पातकम् ॥ ५० ॥ तस्मिन् विरजसि स्फीते प्रज्ञासत्त्वव्यवस्थिते । स्वयम्भुभवने पुण्ये हस्तिनं मे प्रदास्यसि ॥ ५१ ॥
**गौतम बोले—**जहाँ सर्दीका भय नहीं है, गर्मीका अणुमात्र भी भय नहीं है, जहाँ न भूख लगती है न प्यास, न ग्लानि प्राप्त होती है न दुःख-सुख, जहाँ न कोई द्वेषका पात्र है न प्रेमका, न कोई बन्धु है न शत्रु, जहाँ जरा-मृत्यु, पुण्य और पाप कुछ भी नहीं है, उस
रजोगुणसे रहित, समृद्धिशाली, बुद्धि और सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाकर तुम्हें मुझे यह हाथी वापस देना पड़ेगा ॥ ४९–५१ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
निर्मुक्ताः सर्वसंगैर्यै कृतात्मानो यतव्रताः । अध्यात्मयोगसंस्थानैर्युक्ताः स्वर्गगतिं गताः ॥ ५२ ॥ ते ब्रह्मभवनं पुण्यं प्राप्नुवन्तीह सात्त्विकाः । न तत्र धृतराष्ट्रस्ते शक्यो द्रष्टुं महामुने ॥ ५३ ॥ धृतराष्ट्रने कहा—महामुने! जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हैं, जिन्होंने अपने मनको वशमें कर लिया है, जो नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं जो अध्यात्मज्ञान और योगसंबंधी आसनोंसे युक्त हैं, जो स्वर्गलोकके अधिकारी हो चुके हैं, ऐसे सात्त्विक पुरुष ही पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाते हैं। वहाँ तुम्हें धृतराष्ट्र नहीं दिखायी दे सकता ॥ ५२-५३ ॥
गौतम उवाच
रथन्तरं यत्र बृहच्च गीयते यत्र वेदी पुण्डरीकैस्तृणोति । यत्रोपयाति हरिभिः सोमपीथी तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ५४ ॥ गौतम बोले—जहाँ रथन्तर और बृहतसामका गान किया जाता है, जहाँ याज्ञिक पुरुष वेदीको कमलपुष्पोंसे आच्छादित करते हैं तथा जहाँ सोमपान करनेवाला पुरुष दिव्य अश्वोंद्वारा यात्रा करता है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ५४ ॥ बुध्यामि त्वां वृत्रहणं शतक्रतुं व्यतिक्रमन्तं भुवनानि विश्वा । कच्चिन्न वाचा वृजिनं कदाचि- दकार्षं ते मनसोऽभिषंगात् ॥ ५५ ॥ मैं जानता हूँ, आप राजा धृतराष्ट्र नहीं, वृत्रासुरका वध करनेवाले शतक्रतु इन्द्र हैं और सम्पूर्ण जगत्का निरीक्षण करनेके लिये सब ओर घूम रहे हैं। मैंने मानसिक आवेशमें आकर कदाचित् वाणीद्वारा आपके प्रति कोई अपराध तो नहीं कर डाला? ॥ ५५ ॥
शतक्रतुरुवाच
मघवाहं लोकपथं प्रजाना- मन्वागमं परिवादे गजस्य । तस्माद् भवान् प्रणतं मानुशास्तु
ब्रवीषि यत् तत् करवाणि सर्वम् ॥ ५६ ॥
शतक्रतु बोले— मैं इन्द्र हूँ और आपके हाथीके अपहरणके कारण मानव प्रजाके दृष्टिपथमें निन्दित हो गया हूँ। अब मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ। आप मुझे कर्तव्यका उपदेश दें। आप जो-जो कहेंगे, वह सब करूँगा ॥ ५६ ॥
गौतम उवाच
श्वेतं करेणुं मम पुत्रं हि नागं
यं मेऽहार्षीर्दशवर्षाणि बालम् ।
यो मे वने वसतोऽभूद् द्वितीय-
स्तमेव मे देहि सुरेन्द्र नागम् ॥ ५७ ॥
गौतम बोले— देवेन्द्र! यह श्वेत गजराजकुमार जो इस समय नवजवान हाथीके रूपमें परिणत हो चुका है, मेरा पुत्र है और अभी दस वर्षका बच्चा है। यही इस वनमें रहते हुए मेरा सहचर एवं सहयोगी है। इसे आपने हर लिया है। मेरी प्रार्थना है कि मेरे इसी हाथीको आप मुझे लौटा दें ॥ ५७ ॥
शतक्रतुरुवाच
अयं सुतस्ते द्विजमुख्य नाग
आगच्छति त्वामभिवीक्षमाणः ।
पादौ च ते नासिकयोपजिघ्रते
श्रेयो ममाध्याहि नमश्च तेऽस्तु ॥ ५८ ॥
शतक्रतुने कहा— विप्रवर! आपका पुत्रस्वरूप यह हाथी आपकीही ओर देखता हुआ आ रहा है और पास आकर आपके दोनों चरणोंको अपनी नासिकासे सूँघता है। अब आप मेरा कल्याण-चिंतन कीजिये, आपको नमस्कार है ॥
गौतम उवाच
शिवं सदैवहे सुरेन्द्र तुभ्यं
ध्यायामि पूजां च सदा प्रयुञ्जे ।
ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व
त्वया दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम् ॥ ५९ ॥
गौतम बोले— सुरेन्द्र! मैं सदा ही यहाँ आपके कल्याणका चिंतन करता हूँ और सदा आपके लिये अपनी पूजा अर्पित करता हूँ। शक्र! आप भी मुझे कल्याण प्रदान करें। मैं आपके दिये हुए इस हाथीको ग्रहण करता हूँ ॥ ५९ ॥
शतक्रतुरुवाच
येषां वेदा निहिता वै गुहायां
मनीषिणां सत्यवतां महात्मनाम् । तेषां त्वयैकेन महात्मनास्मि वृद्धस्तस्मात् प्रीतिमांस्तेऽहमद्य ।। ६० ।। हन्तैहि ब्राह्मण क्षिप्रं सह पुत्रेण हस्तिना । त्वं हि प्राप्तुं शुभाँल्लोकानह्नाय च चिराय च ।। ६१ ।। **शतक्रतुने कहा—**जिन सत्यवादी मनीषी महात्माओंकी हृदय-गुफामें सम्पूर्ण वेद निहित हैं, उनमें आप प्रमुख महात्मा हैं। केवल आपके कल्याण-चिंतनसे मैं समृद्धिशाली हो गया। इसलिये आज मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्राह्मण! मैं बड़े हर्षके साथ कहता हूँ कि आप अपने इस पुत्रभूत हाथीके साथ शीघ्र चलिये। आप अभी चिरकालके लिये कल्याणमय लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी हो गये हैं ।। ६०-६१ ।। स गौतमं पुरस्कृत्य सह पुत्रेण हस्तिना । दिवमाचक्रमे वज्री सद्भिः सह दुरासदम् ।। ६२ ।। पुत्रस्वरूप हाथीके साथ गौतमको आगे करके वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ दुर्गम देवलोकमें चले गये ।। ६२ ।। इदं यः शृणुयान्नित्यं यः पठेद्वा जितेन्द्रियः । स याति ब्रह्मणो लोकं ब्राह्मणो गौतमो यथा ।। ६३ ।। जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनेगा, अथवा इसका पाठ करेगा, वह गौतम ब्राह्मणकी भाँति ब्रह्मलोकमें जायगा ।। ६३ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हस्तिकूटो नाम द्वयधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें हस्तिकूट नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।
ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा
युधिष्ठिर उवाच
दानं बहुविधाकारं शांतिः सत्यमहिंसितम् । स्वदारतुष्टिश्चोक्ता ते फलं दानस्य चैव यत् ॥ १ ॥ पितामहस्य विदितं किमन्यत् तपसो बलात् । तपसो यत्परं तेऽद्य तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने अनेक प्रकारके दान, शांति, सत्य और अहिंसा आदिका वर्णन किया। अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेकी बात बतायी और दानके फलका भी निरूपण किया। आपकी जानकारीमें तपोबलसे बढ़कर दूसरा कौन बल है? यदि आपकी रायमें तपस्यासे भी कोई उत्कृष्ट साधन हो तो हमारे समक्ष उसकी व्याख्या करें ॥ १-२ ॥
भीष्म उवाच
तपः प्रचक्षते यावत् तावल्लोको युधिष्ठिर । मतं ममात्र कौन्तेय तपो नानशनात् परम् ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! मनुष्य जितना तप करता है, उसीके अनुसार उसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं; किन्तु कुंतीकुमार! मेरी रायमें अनशनसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । भगीरथस्य संवादं ब्रह्मणश्च महात्मनः ॥ ४ ॥
इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा भगीरथ और महात्मा ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
अतीत्य सुरलोकं च गवां लोकं च भारत । ऋषिलोकं च सोऽगच्छद् भगीरथ इति श्रुतम् ॥ ५ ॥
भारत! सुननेमें आया है कि राजा भगीरथ देवलोक, गौओंके लोक और ऋषिलोकको भी लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ५ ॥
तं तु दृष्ट्वा वचः प्राह ब्रह्मा राजन् भगीरथम् । कथं भगीरथागास्त्वमिमं लोकं दुरासदम् ॥ ६ ॥
राजन्! राजा भगीरथको वहाँ उपस्थित देख ब्रह्माजीने उनसे पूछा—'भगीरथ! इस लोकमें तो आना बहुत ही कठिन है, तुम कैसे यहाँ आ पहुँचे ॥ ६ ॥
न हि देवा न गंधर्वा न मनुष्या भगीरथ । आयान्त्यतप्ततपसः कथं वै त्वमिहागतः ॥ ७ ॥ 'भगीरथ! देवता, गंधर्व और मनुष्य बिना तपस्या किये यहाँ नहीं आ सकते। फिर तुम कैसे यहाँ आ गये?' ॥ ७ ॥
भगीरथ उवाच
निष्काणां वै ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः शतं सहस्राणि सदैव दानम् । ब्राह्मं व्रतं नित्यमास्थाय विद्वन् न त्वेवाहं तस्य फलादिहागाम् ॥ ८ ॥ भगीरथने कहा—विद्वन्! मैं ब्रह्मचर्यव्रतका आश्रय लेकर प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण-मुद्राओंका ब्राह्मणोंके लिये दान किया करता था; परंतु उस दानके फलसे मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ८ ॥
दशैकरात्रान् दशपञ्चरात्रा- नेकादशैकादशकान् क्रतूनंश्च । ज्योतिष्टोमानां च शतं यदिष्टं फलेन तेनापि च नागतोऽहम् ॥ ९ ॥ मैंने एक रातमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, पाँच रातोंमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, ग्यारह रातोंमें समाप्त होनेवाले ग्यारह यज्ञ और ज्योतिष्टोम नामक एक सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, परंतु उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ९ ॥
यच्चावसं जाह्नवतीरनित्यः शतं समास्तप्यमानस्तपोऽहम् । अदां च तत्राश्वतरीसहस्रं नारीपुरं न च तेनाहमागाम् ॥ १० ॥ मैंने जो घोर तपस्या करते हुए लगातार सौ वर्षोंतक प्रतिदिन गंगाजीके तटपर निवास किया है और वहाँ सहस्रों खच्चरियों तथा झुंड-की-झुंड कन्याओंका दान किया, उस पुण्यके प्रभावसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १० ॥
दशायुतानि चाश्वानां गोऽयुतानि च विंशतिम् । पुष्करेषु द्विजातिभ्यः प्रादां शतसहस्रशः ॥ ११ ॥ सुवर्णचन्द्रोत्तमधारिणीनां कन्योत्तमानामददं सहस्रम् । षष्टिं सहस्राणि विभूषितानां जाम्बूनदैराभरणैर्न तेन ॥ १२ ॥
पुष्करतीर्थमें जो सैकड़ों-हजारों बार मैंने ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े और दो लाख गौएँ दान कीं तथा सोनेके उत्तम चन्द्रहार धारण करनेवाली जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित हुई साठ हजार सुन्दरी कन्याओंका जो सहस्रों बार दान किया, उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ दशार्बुदान्यददं गोसवेज्या- स्वकैकशो दश गा लोकनाथ । समानवत्साः पयसा समन्विताः सुवर्णकांस्योपदुहा न तेन ॥ १३ ॥ लोकनाथ! गोसव नामक यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें मैंने दूध देनेवाली सौ करोड़ गौओंका दान किया। उस समय एक-एक ब्राह्मणको दस-दस गायें मिली थीं। प्रत्येक गायके साथ उसीके समान रंगवाले बछड़े और सुवर्णमय दुग्धपात्र भी दिये गये थे; परंतु उस यज्ञके पुण्यसे भी मैं यहाँतक नहीं पहुँचा हूँ ॥ १३ ॥ आप्तोर्यामेषु नियतमेकैकस्मिन् दशाददम् । गृष्टीनां क्षीरदात्रीणां रोहिणीनां शतानि च ॥ १४ ॥ अनेक बार सोमयागकी दीक्षा लेकर उन यज्ञोंमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको पहले बारकी ब्यायी हुई दूध देनेवाली दस-दस गौएँ और रोहिणी जातिकी सौ-सौ गौएँ दान की हैं ॥ १४ ॥ दोग्ध्रीणां वै गवां चापि प्रयुतानि दशैव ह । प्रादां दशगुणं ब्रह्मन् न तेनाहमिहागतः ॥ १५ ॥ ब्रह्मन्! इनके अतिरिक्त भी मैंने दस बार दस-दस लाख दुधारू गौएँ दान की हैं; किंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ १५ ॥ वाजिनां बाह्लिजातानामयुतान्यददं दश । कर्काणां हेममालानां न च तेनाहमागतः ॥ १६ ॥ बाह्लीक देशमें उत्पन्न हुए श्वेतरंगके एक लाख घोड़ोंको सोनेकी मालाओंसे सजाकर मैंने ब्राह्मणोंको दान किया; किंतु उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ कोटीश्च काञ्चनस्याष्टौ प्रादां ब्रह्मन् दशान्वहम् । एकैकस्मिन् क्रतौ तेन फलेनाहं न चागतः ॥ १७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने एक-एक यज्ञमें प्रतिदिन अठारह-अठारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १७ ॥ वाजिनां श्यामकणीनां हरितानां पितामह । प्रादां हेमस्रजां ब्रह्मन् कोटीर्दश च सप्त च ॥ १८ ॥ ईषादन्तान् महाकायान् काञ्चनस्रग्विभूषितान् । पद्मिनो वै सहस्राणि प्रादां दश च सप्त च ॥ १९ ॥
अलंकृतानां देवेश दिव्यैः कनकभूषणैः । रथानां काञ्चनाङ्गानां सहस्राण्यददं दश ॥ २० ॥ सप्त चान्यानि युक्तानि वाजिभिः समलंकृतैः । ब्रह्मन्! पितामह! फिर स्वर्णहारसे विभूषित हरे रंगवाले सत्रह करोड़ श्यामकर्ण घोड़े, ईषादण्ड (हरिस) के समान दाँतोंवाले, स्वर्णमालामण्डित एवं विशाल शरीरवाले सत्रह हजार कमलचिह्नयुक्त हाथी तथा सोनेके बने हुए दिव्य आभूषणोंसे विभूषित स्वर्णमय उपकरणोंसे युक्त और सजे-सजाये घोड़े जुते हुए सत्रह हजार रथ दान किये ॥ १८—२० १/२ ॥
दक्षिणावयवाः केचिद् वेदैर्ये सम्प्रकीर्तिताः ॥ २१ ॥ वाजपेयेषु दशसु प्रादां तेष्वपि चाप्यहम् । इनके अतिरिक्त भी जो वस्तुएँ वेदोंमें दक्षिणाके अवयवरूपसे बतायी गयी हैं, उन सबको मैंने दस वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करके दान किया था ॥ २१ १/२ ॥
शक्रतुल्यप्रभावाणामिज्यया विक्रमेण ह ॥ २२ ॥ सहस्रं निष्ककण्ठानामददं दक्षिणामहम् । विजित्य भूपतीन् सर्वानर्थैरिष्ट्वा पितामह ॥ २३ ॥ अष्टभ्यो राजसूयेभ्यो न च तेनाहमागतः । पितामह! यज्ञ और पराक्रममें जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनके कण्ठमें सुवर्णके हार शोभा पा रहे थे, ऐसे हजारों राजाओंको युद्धमें जीतकर प्रचुर धनके द्वारा आठ राजसूययज्ञ करके मैंने उन्हें ब्राह्मणोंको दक्षिणामें दे दिया; परंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २२-२३ १/२ ॥
स्रोतश्च यावद्गङ्गाकयाश्छन्नमासीज्जगत्पते ॥ २४ ॥ दक्षिणाभिः प्रवृत्ताभिर्मम नागां च तत्कृते । जगत्पते! मेरी दी हुई दक्षिणाओंसे गंगानदी आच्छादित हो गयी थी; परंतु उसके कारण भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २४ १/२ ॥
वाजिनां च सहस्रे द्वे सुवर्णशतभूषिते ॥ २५ ॥ वरं ग्रामशतं चाहमेकैकस्य त्रिधाददम् । उस यज्ञमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको तीन-तीन बार सोनेके सैकड़ों आभूषणोंसे विभूषित दो-दो हजार घोड़े और एक-एक सौ अच्छे गाँव दिये थे ॥ २५ १/२ ॥
तपस्वी नियताहारः शममास्थाय वाग्यतः ॥ २६ ॥ दीर्घकालं हिमवति गङ्गायाश्च दुरुत्सहाम् । मूर्ध्ना धारां महादेवः शिरसा यामधारयत् । न तेनाप्यहमागच्छं फलेनेह पितामह ॥ २७ ॥
पितामह! मिताहारी, मौन और शांतभावसे रहकर मैंने हिमालय पर्वतपर सुदीर्घ कालतक तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने गंगाजीकी दुःसह धाराको अपने मस्तकपर धारण किया; परंतु उस तपस्याके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ॥ २६-२७ ॥ शम्याक्षेपैरयजं यच्च देवान् साद्यस्कानांयुतैश्चापि यत्तत् । त्रयोदशद्वादशाहैश्च देव सपौण्डरीकान्न च तेषां फलेन ॥ २८ ॥ देव! मैंने अनेक बार 'शम्याक्षेप*' याग किये। दस हजार 'साद्यस्क' यागोंका अनुष्ठान किया। कई बार तेरह और बारह दिनोंमें समाप्त होनेवाले याग और 'पुण्डरीक' नामक यज्ञ पूर्ण किये; परंतु उनके फलोंसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ २८ ॥ अष्टौ सहस्राणि ककुद्मिनामहं शुक्लर्षभाणामददं द्विजेभ्यः । एकैकं वै काञ्चनं शृंगमेभ्यः पत्नीश्चैषामददं निष्ककण्ठीः ॥ २९ ॥ इतना ही नहीं, मैंने सफेद रंगके ककुद्वाले आठ हजार वृषभ भी ब्राह्मणोंको दान किये, जिनके एक-एक सींगमें सोना मढ़ा हुआ था तथा उन ब्राह्मणोंको सुवर्णमय हारसे विभूषित गौएँ भी मैंने दी थीं ॥ २९ ॥ हिरण्यरत्ननिचयानददं रत्नपर्वतान् । धनधान्यसमृद्धांश्च ग्रामांश्चान्ये सहस्रशः ॥ ३० ॥ शतं शतानां गृष्टीनामददं चाप्यतन्द्रितः । इष्ट्वानेकैर्महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो न तेन च ॥ ३१ ॥ मैंने आलस्यरहित होकर अनेक बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके उनमें सोने और रत्नोंके ढेर, रत्नमय पर्वत, धनधान्यसे सम्पन्न हजारों गाँव और एक बारकी ब्यायी हुई सहस्रों गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं; किंतु उनके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३०-३१ ॥ एकादशाहैरयजं सदक्षिणै- र्द्विद्वादशाहैरश्वमेधैश्च देव । आर्कायणैः षोडशभिश्च ब्रह्मं- स्तेषां फलेनेह न चागतोऽस्मि ॥ ३२ ॥ देव! ब्रह्मन्! मैंने ग्यारह दिनोंमें होनेवाले और चौबीस दिनोंमें होनेवाले दक्षिणासहित यज्ञ किये। बहुत-से अश्वमेधयज्ञ भी कर डाले तथा सोलह बार आर्कायणयज्ञोंका अनुष्ठान किया; परंतु उन यज्ञोंके फलसे मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ ३२ ॥ निष्कैककण्ठमददं योजनायतं
तद्विस्तीर्णं काञ्चनपादपानाम् । वनं वृतानां रत्नविभूषितानां न चैव तेषामागतोऽहं फलेन ॥ ३३ ॥ चार कोस लंबा-चौड़ा एक चम्पाके वृक्षोंका वन, जिसके प्रत्येक वृक्षमें रत्न जड़े हुए थे, वस्त्र लपेटा गया था और कण्ठदेशमें स्वर्णमाला पहनायी गयी थी, मैंने दान किया है; किंतु उस दानके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३३ ॥
तुरायणं हि व्रतमप्यधृष्य- मक्रोधनोऽकरवं त्रिंशतोऽब्दान् । शतं गवामष्टशतानि चैव दिने दिने ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः ॥ ३४ ॥ मैं तीस वर्षोंतक क्रोधरहित होकर तुरायण नामक दुष्कर व्रतका पालन करता रहा, जिसमें प्रतिदिन नौ सौ गायें ब्राह्मणोंको दान देता था ॥ ३४ ॥
पयस्विनीनामथ रोहिणीनां तथैवान्याननडुहो लोकनाथ । प्रादां नित्यं ब्राह्मणेभ्यः सुरेश नेहागतस्तेन फलेन चाहम् ॥ ३५ ॥ लोकनाथ! सुरेश्वर! इनके अतिरिक्त रोहिणी (कपिला) जातिकी बहुत-सी दुधारू गौएँ तथा बहुसंख्यक साँड़ भी मैं प्रतिदिन ब्राह्मणोंको दान करता था; परंतु उन सब दानोंके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥
त्रिंशदग्नीनहं ब्रह्मन्नयजं यच्च नित्यदा । अष्टाभिः सर्वमेधैश्च नरमेधैश्च सप्तभिः ॥ ३६ ॥ दशभिर्विश्वजिद्भिश्च शतैरष्टादशोत्तरैः । न चैव तेषां देवेश फलेनाहमिहागमम् ॥ ३७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने प्रतिदिन एक-एक करके तीस बार अग्निचयन एवं यजन किया। आठ बार सर्वमेध, सात बार नरमेध और एक सौ अट्ठाईस बार विश्वजित् यज्ञ किया है; परंतु देवेश्वर! उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३६-३७ ॥
सरय्वां बाहुदायां च गङ्गायामथ नैमिषे । गवां शतानामयुतमददं न च तेन वै ॥ ३८ ॥ सरयू, बाहुदा, गंगा और नैमिषारण्य तीर्थमें जाकर मैंने दस लाख गोदान किये हैं; परंतु उनके फलसे भी यहाँ आना नहीं हुआ है (केवल अनशनव्रतके प्रभावसे मुझे इस दुर्लभ लोककी प्राप्ति हुई है) ॥ ३८ ॥
इन्द्रेण गुह्यं निहितं वै गुहायां यद्गार्गवस्तपसेहाभ्यविन्दत् ।
जाज्वल्यमानमुशनस्तेजसेह तत्सादयामासमहं वरेण्य ।। ३९ ।। पहले इन्द्रने स्वयं अनशनव्रतका अनुष्ठान करके इसे गुप्त रखा था। उसके बाद शुक्राचार्यने तपस्याके द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्हींके तेजसे उसका माहात्म्य सर्वत्र प्रकाशित हुआ। सर्वश्रेष्ठ पितामह! मैंने भी अंतमें उसी अनशनव्रतका साधन आरम्भ किया ।।
ततो मे ब्राह्मणास्तुष्टास्तस्मिन् कर्मणि साधिते । सहस्रमृषयश्चासन् ये वै तत्र समागताः ।। ४० ।। उक्तस्तैरस्मि गच्छ त्वं ब्रह्मलोकमिति प्रभो । प्रीतेनोक्तसहस्रेण ब्राह्मणानामहं प्रभो । इमं लोकमनुप्राप्तो मा भूत् तेऽत्र विचारणा ।। ४१ ।। जब उस कर्मकी पूर्ति हुई, उस समय मेरे पास हजारों ब्राह्मण और ऋषि पधारे। वे सभी मुझपर बहुत संतुष्ट थे। प्रभो! उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुझे आज्ञा दी कि 'तुम ब्रह्मलोकको जाओ।' भगवन्! प्रसन्न हुए उन हजारों ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे मैं इस लोकमें आया हूँ। इसमें आप कोई अन्यथा विचार न करें ।। ४०-४१ ।।
कामं यथावद्विहितं विधात्रा पृष्टेन वाच्यं तु मया यथावत् । तपो हि नान्यच्चानशनान्मतं मे नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।। ४२ ।। देवेश्वर! मैंने अपनी इच्छाके अनुसार विधिपूर्वक अनशनव्रतका पालन किया। आप सम्पूर्ण जगत्के विधाता हैं। आपके पूछनेपर मुझे सब बातें यथावत्रूपसे बतानी चाहिये, इसलिये सब कुछ कहा है। मेरी समझमें अनशनव्रतसे बढ़कर दूसरी कोई तपस्या नहीं है। आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न होइये ।। ४२ ।।
भीष्म उवाच
इत्युक्तवन्तं ब्रह्मा तु राजानं स भगीरथम् । पूजयामास पूजार्हं विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ४३ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! राजा भगीरथने जब इस प्रकार कहा, तब ब्रह्माजीने शास्त्रोक्त विधिसे आदरणीय नरेशका विशेष आदर-सत्कार किया ।। ४३ ।।
तस्मादनशनैर्युक्तो विप्रान् पूजय नित्यदा । विप्राणां वचनात् सर्वं परत्रेह च सिध्यति ।। ४४ ।। अतः तुम भी अनशनव्रतसे युक्त होकर सदा ब्राह्मणोंका पूजन करो; क्योंकि ब्राह्मणोंके आशीर्वादसे इह लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं ।।
वासोभिरन्नैर्गोभिश्च शुभैर्नैवेशिकैरपि ।
शुभैः सुरगणैश्चापि स्तोष्या एव द्विजास्तथा ।
एतदेव परं गुह्यमलोभेन समाचर ॥ ४५ ॥
अन्न, वस्त्र, गौ तथा सुंदर गृह देकर और कल्याणकारी देवताओंकी आराधना करके भी ब्राह्मणोंको ही संतुष्ट करना चाहिये। तुम लोभ छोड़कर इसी परम गोपनीय धर्मका आचरण करो ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्रह्मभगीरथसंवादे
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्मा और भगीरथका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥
* यज्ञकर्ता पुरुष 'शम्या' नामक एक काठका डंडा खूब जोर लगाकर फेंकता है, वह जितनी दूरपर जाकर गिरता है उतने दूरमें यज्ञकी वेदी बनायी जाती है; उस वेदीपर जो यज्ञ किया जाता है उसे 'शम्याक्षेप' अथवा 'शम्याप्रास' यज्ञ कहते हैं।
आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण
चतुरधिकशततमोऽध्यायः
आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण
युधिष्ठिर उवाच
शतायुरुक्तः पुरुषः शतवीर्यश्च जायते ।
कस्मान्म्रियन्ते पुरुषा बाला अपि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा—पितामह! शास्त्रोंमें कहा गया है कि 'मनुष्यकी आयु सौ वर्षोंकी होती है। वह सैकड़ों प्रकारकी शक्ति लेकर जन्म धारण करता है।' किंतु देखता हूँ कि कितने ही मनुष्य बचपनमें ही मर जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? ॥ १ ॥
आयुष्मान् केन भवति अल्पायुर्वापि मानवः ।
केन वा लभते कीर्तिं केन वा लभते श्रियम् ॥ २ ॥
मनुष्य किस उपायसे दीर्घायु होता है अथवा किस कारणसे उसकी आयु कम हो जाती है? क्या करनेसे वह कीर्ति पाता है या क्या करनेसे उसे सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है? ॥ २ ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण जपहोमैस्तथौषधैः ।
कर्मणा मनसा वाचा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
पितामह! मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीरके द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, जप, होम तथा औषध आदिमेंसे किसका आश्रय ले, जिससे वह श्रेयका भागी हो, वह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
अत्र तेऽहं प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि ।
अल्पायुर्येन भवति दीर्घायुर्वापि मानवः ॥ ४ ॥
येन वा लभते कीर्तिं येन वा लभते श्रियम् ।
यथा वर्तयन् पुरुषः श्रेयसा सम्प्रयुज्यते ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, इसका उत्तर देता हूँ। मनुष्य जिस कारणसे अल्पायु होता है, जिस उपायसे दीर्घायु होता है, जिससे वह कीर्ति और सम्पत्तिका भागी होता है तथा जिस बर्तावसे पुरुषको श्रेयका संयोग प्राप्त होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो ॥
आचाराल्लभते ह्यायुराचाराल्लभते श्रियम् ।
आचारात् कीर्तिमाप्नोति पुरुषः प्रेत्य चेह च ॥ ६ ॥
सदाचारसे ही मनुष्यको आयुकी प्राप्ति होती है, सदाचारसे ही वह सम्पत्ति पाता है तथा सदाचारसे ही उसे इहलोक और परलोकमें भी कीर्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
दुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत् । त्रसन्ति यस्माद् भूतानि तथा परिभवन्ति च ॥ ७ ॥ दुराचारी पुरुष, जिससे समस्त प्राणी डरते और तिरस्कृत होते हैं, इस संसारमें बड़ी आयु नहीं पाता ॥
तस्मात् कुर्यादिहाचारं यदिच्छेदू भूतिमात्मनः । अपि पापशरीरस्य आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ ८ ॥ अतः यदि मनुष्य अपना कल्याण करना चाहता हो तो उसे इस जगत्में सदाचारका पालन करना चाहिये। जिसका सारा शरीर ही पापमय है, वह भी यदि सदाचारका पालन करे तो वह उसके शरीर और मनके बुरे लक्षणोंको दबा देता है ॥ ८ ॥
आचारलक्षणो धर्मः संतश्चारित्रलक्षणाः । साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम् ॥ ९ ॥ सदाचार ही धर्मका लक्षण है। सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषोंकी पहचान है। श्रेष्ठ पुरुष जैसा बर्ताव करते हैं; वही सदाचारका स्वरूप अथवा लक्षण है ॥ ९ ॥
अप्यदृष्टं श्रवादेव पुरुषं धर्मचारिणम् । भूतिकर्माणं कुर्वाणं तं जनाः कुर्वते प्रियम् ॥ १० ॥ जो मनुष्य धर्मका आचरण करता और लोक-कल्याणके कार्यमें लगा रहता है, उसका दर्शन न हुआ हो तो भी मनुष्य केवल नाम सुनकर उससे प्रेम करने लगते हैं ॥ १० ॥
ये नास्तिका निष्क्रियाश्च गुरुशास्त्राभिलङ्घिनः । अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः ॥ ११ ॥ जो नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले, धर्मको न जाननेवाले और दुराचारी हैं, उन मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है ॥ ११ ॥
विशीला भिन्नमर्यादा नित्यं संकीर्णमैथुनाः । अल्पायुषो भवन्तीह नरा निरयगामिनः ॥ १२ ॥ जो मनुष्य शीलहीन, सदा धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले तथा दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ सम्पर्क रखनेवाले हैं; वे इस लोकमें अल्पायु होते और मरनेके बाद नरकमें पड़ते हैं ॥ १२ ॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि समुदाचारवान् नरः । श्रद्दधानोऽनसूयुश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १३ ॥ सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे हीन होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ १३ ॥
अक्रोधनः सत्यवादी भूतानामविहिंसकः । अनसूयुरजिह्मश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥
जो क्रोधहीन, सत्यवादी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला, अदोषदर्शी और कपटशून्य है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ १४ ॥ लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः । नित्योच्छिष्टः संकुसुको नेहायुर्विन्दते महत् ॥ १५ ॥ जो ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता तथा सदा ही उच्छिष्ट (अशुद्ध) एवं चंचल रहता है, ऐसे कुलक्षणयुक्त मनुष्यको दीर्घायु नहीं प्राप्त होती ॥ १५ ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिंतयेत् । उत्थायाचम्य तिष्ठेत् पूर्वा संध्यां कृताञ्जलिः ॥ १६ ॥ प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें (अर्थात् सूर्योदयसे दो घड़ी पहले) जागे तथा धर्म और अर्थके विषयमें विचार करे। फिर शय्यासे उठकर शौच-स्नानके पश्चात् आचमन करके हाथ जोड़े हुए प्रातःकालकी संध्या करे ॥ १६ ॥ एवमेवापरां संध्यां समुपासीत वाग्यतः । नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं नास्तं यान्तं कदाचन ॥ १७ ॥ इसी प्रकार सायंकालमें भी मौन रहकर संध्योपासना करे। उदय और अस्तके समय सूर्यकी ओर कदापि न देखे ॥ १७ ॥ नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् । ऋषयो नित्यसंध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुवन् ॥ १८ ॥ तस्मात् तिष्ठेत् सदा पूर्वा पश्चिमां चैव वाग्यतः । ग्रहण और मध्याह्नके समय भी सूर्यकी ओर दृष्टिपात न करे तथा जलमें स्थित सूर्यके प्रतिबिम्बकी ओर भी न देखे। ऋषियोंने प्रतिदिन संध्योपासना करनेसे ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी। इसलिये सदा मौन रहकर द्विजमात्रको प्रातःकाल और सायंकालकी संध्या अवश्य करनी चाहिये ॥ १८ १/२ ॥ ये न पूर्वामुपासन्ते द्विजाः संध्यां न पश्चिमाम् ॥ १९ ॥ सर्वांस्तान् धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् । जो द्विज न तो प्रातःकालकी संध्या करते हैं और न सायंकालकी ही, उन सबसे धार्मिक राजा शूद्रोचित कर्म करावे ॥ १९ १/२ ॥ परदारा न गन्तव्या सर्ववर्णेषु कर्हिचित् ॥ २० ॥ न हीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ २१ ॥ किसी भी वर्णके पुरुषको कभी भी परायी स्त्रियोंसे संसर्ग नहीं करना चाहिये। परस्त्री-सेवनसे मनुष्यकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। संसारमें परस्त्री-समागमके समान पुरुषकी आयुको नष्ट करनेवाला दूसरा कोई कार्य नहीं है ॥ २०-२१ ॥ यावन्तो रोमकूपाः स्युः स्त्रीणां गात्रेषु निर्मिताः ।
तावद् वर्षसहस्राणि नरकं पर्युपासते ॥ २२ ॥ स्त्रियोंके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक व्यभिचारी पुरुषोंको नरकमें रहना पड़ता है ॥ २२ ॥ प्रसाधनं च केशानामञ्जनं दन्तधावनम् । पूर्वाह्न एव कार्याणि देवतानां च पूजनम् ॥ २३ ॥ केशोंको सँवारना, आँखोंमें अंजन लगाना, दाँत-मुँह धोना और देवताओंकी पूजा करना—ये सब कार्य दिनके पहले प्रहरमें ही करने चाहिये ॥ २३ ॥ पुरीषमूत्रे नोदीक्षेन्नाधितिष्ठेत् कदाचन । नातिकल्यं नातिसायं न च मध्यन्दिने स्थिते ॥ २४ ॥ नाज्ञातैः सह गच्छेत नैको न वृषलैः सह । मल-मूत्रकी ओर न देखे, उसपर कभी पैर न रखे। अत्यन्त सबेरे, अधिक साँझ हो जानेपर और ठीक दोपहरके समय कहीं बाहर न जाय। न तो अपरिचित पुरुषोंके साथ यात्रा करे, न शूद्रोंके साथ और न अकेला ही ॥ २४ १/२ ॥ पन्था देयो ब्राह्मणाय गोभ्यो राजभ्य एव च ॥ २५ ॥ वृद्धाय भारतप्ताय गर्भिण्यै दुर्बलाय च । ब्राह्मण, गाय, राजा, वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, दुर्बल और भारपीड़ित मनुष्य यदि सामनेसे आते हों तो स्वयं किनारे हटकर उन्हें जानेका मार्ग देना चाहिये ॥ २५ १/२ ॥ प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान् वनस्पतीन् ॥ २६ ॥ चतुष्पथान् प्रकुर्वीत सर्वानैव प्रदक्षिणान् । मार्गमें चलते समय अश्वत्थ आदि परिचित वृक्षों तथा समस्त चौराहोंको दाहिने करके जाना चाहिये ॥ मध्यन्दिने निशाकाले अर्धरात्रे च सर्वदा ॥ २७ ॥ चतुष्पथं न सेवेत उभे संध्ये तथैव च । दोपहरमें, रातमें, विशेषतः आधी रातके समय और दोनों संध्याओंके समय कभी चौराहोंपर न रहे ॥ उपानहौ च वस्त्रं च धृतमन्यैर्न धारयेत् ॥ २८ ॥ ब्रह्मचारी च नित्यं स्यात् पादं पादेन नाक्रमेत् । अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च सर्वशः ॥ २९ ॥ अष्टम्यां सर्वपक्षाणां ब्रह्मचारी सदा भवेत् । आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जयेत् ॥ ३० ॥ दूसरोंके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने। सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे। पैरसे पैरको न दबाये। सभी पक्षोंकी अमावास्या, पौर्णमासी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा ब्रह्मचारी रहे—स्त्री-समागम न करे। किसीकी निंदा, बदनामी और चुगली न करे ॥ २८—३० ॥
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेद् रुशतीं पापलोक्याम् ॥ ३१ ॥ दूसरोंके मर्मपर आघात न करे, क्रूरतापूर्ण बात न बोले, औरोंको नीचा न दिखावे। जिसके कहनेसे दूसरोंको उद्वेग होता हो वह रुखाईसे भरी हुई बात पापियोंके लोकमें ले जानेवाली होती है। अतः वैसी बात कभी न बोले ॥ ३१ ॥
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य वा मर्मसु ये पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ ३२ ॥ वचनरूपी बाण मुँहसे निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोकमें पड़ा रहता है। अतः जो दूसरोंके मर्मस्थानोंपर चोट करते हैं, ऐसे वचन विद्वान् पुरुष दूसरोंके प्रति कभी न कहे ॥ ३२ ॥
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥ ३३ ॥ बाणोंसे बिंधा और फरसेसे कटा हुआ वन पुनः अंकुरित हो जाता है, किंतु दुर्वचनरूपी शस्त्रसे किया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता है ॥ ३३ ॥
कर्णिनालीकनाराचान् निर्हरन्ति शरीरतः । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशयो हि सः ॥ ३४ ॥ कर्णि, नालीक और नाराच—ये शरीरमें यदि गड़ जायँ तो चिकित्सक मनुष्य इन्हें शरीरसे निकाल देते हैं, किंतु वचनरूपी बाणको निकालना असंभव होता है; क्योंकि वह हृदयके भीतर चुभा होता है ॥ ३४ ॥
हीनांगानतिरिक्तांगान् विद्याहीनान् विगर्हितान् । रूपद्रविणहीनांश्च सत्त्वहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ ३५ ॥ हीनांग (अंधे-काने आदि), अधिकांग (छांगुर आदि), विद्याहीन, निन्दित, कुरूप, निर्धन और निर्बल मनुष्योंपर आक्षेप करना उचित नहीं है ॥ ३५ ॥
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषस्तम्भोऽभिमानं च तैक्ष्ण्यं च परिवर्जयेत् ॥ ३६ ॥ नास्तिकता, वेदोंकी निंदा, देवताओंको कोसना, द्वेष, उद्धण्डता, अभिमान और कठोरता—इन दुर्गुणोंका त्याग कर देना चाहिये ॥ ३६ ॥
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैनं निपातयेत् । अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थं ताडनं स्मृतम् ॥ ३७ ॥