भारतकोश
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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

१३० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

यक्ष्मन्! बिना श्रद्धाका हवन, बिना नहाये, बिना जलके, अवहेलनापूर्वक दिया हुआ दान, जो व्यर्थ पड़ो हो अथवा फेंक दी जानेवाली हो, ऐसी वस्तुका दान और अत्यन्त अभिमानसे, दोषसे, क्रोधसे तथा कष्ट मानकर किया हुआ दान—इन सबका फल तुम्हें ही मिलेगा! कन्याका मूल्य चुकानेके लिये जो धनोपार्जनकी क्रिया की जाती है तथा जो असत् शास्त्रोंद्वारा सम्पादित होनेवाली क्रियाएँ हैं, उन सबका फल तुम्हारी पुष्टिके लिये तुम्हें देता हूँ। जो कार्य केवल धन कमानेके लिये किया जाता है, धर्मकी दृष्टिसे नहीं तथा जो सत्यकी अवहेलनापूर्वक अध्ययन किया जाता है, वह सब तुम्हारी इच्छा-पूर्तिके लिये तुम्हें दे रहा हूँ। जो मनुष्य गर्भिणी स्त्रीके साथ समागम करते, सन्ध्या और नित्यकर्मका उल्लङ्घन करते तथा असत्-शास्त्रोंके अनुसार कार्य या उनकी चर्चा करके दूषित होते हैं, ऐसे मनुष्योंको दबानेकी तुममें पूरी शक्ति होगी।

दुःसह! जहाँ एक ही पङ्क्तिमें दो तरहका भोजन परोसा जाता हो, अतिथि-सत्कार और बलिवैश्वदेवका उद्देश्य न रखकर केवल अपने लिये भोजन बनाया जाता हो, भोजनमें भेद रखा जाता हो अर्थात् किसीके लिये अच्छा और किसीके लिये खराब बनता हो और जहाँ घरमें रोज-रोज कलह होता हो, वहीं तुम्हारा निवास है। जहाँ गाय-घोड़े आदि वाहन बिना खिलाये-पिलाये बाँध दिये जाते हों और संध्याके पहले ही जिस घरको धो-बुहारकर साफ नहीं किया जाता हो, वहाँ रहनेवाले मनुष्योंको तुमसे भय प्राप्त होगा। जो मनुष्य बिना व्रतके ही उपवास करते, जूए और स्त्रियोंमें आसक्त रहते, दुःसह वचन बोलते और विडालव्रती होते—बिल्लियोंकी तरह ऊपरसे साधु बनकर छिपे-छिपे अपना उल्लू सीधा करते हैं, वे सब तुम्हारे उपकारी हैं। जो ब्रह्मचर्यपालनके बिना ही अध्ययन और विद्वान् हुए बिना ही यज्ञ करते हैं, तपोवनमें रहकर भी ग्राम्य विषय भोगोंका सेवन करते और अपने मनको जीतनेका यत्न नहीं करते तथा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र अपने-अपने कर्मसे भ्रष्ट होते हैं, ऐसे लोग परलोककी इच्छासे जो भी चेष्टा करते हैं, उसका सारा फल तुम्हींको मिलेगा।

यक्ष्मन्! तुम्हारी पुष्टिके लिये और भी उपाय बताता हूँ, सुनो। जो लोग बलिवैश्वदेवके अन्तमें तुम्हारे नामके उच्चारणपूर्वक तुम्हें बलि अर्पण करते हैं और 'यक्ष्मँस्तत्ते निर्णेजनं नमः' कहकर उसे त्यागते हैं, जो शुद्धतापूर्वक बना हुआ अन्न विधिपूर्वक भोजन करते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते, लोलुपता नहीं रखते और स्त्रियोंके वशीभूत नहीं होते, ऐसे मनुष्योंके घरोंको तुम त्याग देना। जहाँ हविष्यसे देवताओंकी और श्राद्धान्नसे पितरोंकी पूजा होती हो तथा कुलकी स्त्रियों, बहनों और अतिथियोंका स्वागत सत्कार होता हो, उस घरको भी छोड़ देना। जहाँ बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष तथा स्वजनवर्गमें प्रेम हो, जहाँकी स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक रहती हों, बाहर जानेके लिये उत्सुक नहीं होतीं तथा लज्जाकी रक्षा करती हैं, उस घरपर भी दृष्टि न डालना। जहाँ अवस्था और सम्बन्धके अनुसार शयन, आसन और भोजनकी व्यवस्था हो, जहाँके निवासी दयालु, सत्कर्मपरायण और साधारण सामग्रीसे युक्त हों तथा जिस घरके लोग गुरु, वृद्ध एवं ब्राह्मणोंके खड़े रहनेपर स्वयं भी आसनपर नहीं बैठते, वह घर भी तुम्हें छोड़ देना चाहिये। देवता, पितर, मनुष्य और अतिथियोंके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही जिसका भोजन है, उस पुरुषके घरमें भी तुम पैर न रखना।

जो सत्यवादी, क्षमाशील, अहिंसक, दूसरोंको पीड़ा न देनेवाले तथा दोषदृष्टिसे रहित हों, ऐसे पुरुषोंको तुम छोड़ देना। जो अपने पतिकी सेवामें संलग्न रहती, दुष्टा स्त्रियोंका साथ नहीं करती तथा कुटुम्बके लोगों एवं पतिके भोजन करनेसे बचे हुए अन्नको ही खाकर अपने शरीरका पोषण करती है, ऐसी स्त्रीको भी तुम हाथ न लगाना।

दुःसहकी सन्तानोंद्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्तिके उपाय १३१


जो सदा यज्ञ, अध्ययन, वेदाभ्यास और दानमें मन लगाता है, यज्ञ कराने, शास्त्र पढ़ाने तथा उत्तम दान ग्रहण करनेसे ही जिसकी जीविका चलती हो, ऐसे ब्राह्मणको भी तुम त्याग देना। दुःसह! जो सदा दान, अध्ययन और यज्ञके लिये उद्यत रहता और अपने लिये उत्तम एवं विशुद्ध शस्त्रग्रहणकी वृत्तिसे जीविका चलाता हो, उस क्षत्रियके पास भी तुम न जाना। जो दान, अध्ययन और यज्ञ—इन तीन पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त हो और पशु-पालन, व्यापार एवं कृषिसे जीविका चलाता हो, ऐसे पापरहित वैश्यको भी त्याग देना। यक्ष्मन्! जो दान, यज्ञ और द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहता और ब्राह्मण आदिकी सेवासे ही जीवन निर्वाह करता हो—ऐसे शूद्रका भी त्याग कर देना।

जहाँ गृहस्थ पुरुष श्रुति-स्मृतिके अनुकूल उपायसे जीविका चलाता हो, उसकी पत्नी उसीकी अनुगामिनी हो, पुत्र गुरु, देवता और पिताका पूजन करता हो तथा पत्नी भी पतिकी पूजामें संलग्न रहती हो, वहाँ अलक्ष्मीका भय कैसे हो सकता है। यक्ष्मन्! जो प्रतिदिन संध्याके समय पानीसे धोया जाता और स्थान-स्थानपर फूलोंसे पूजित होता है, उस घरकी ओर तुम आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। जिस घरमें बिछी हुई शय्याको सूर्य न देखते हों अर्थात् जहाँ लोग सूर्योदयसे पहले ही सोकर उठ जाते हों, जहाँ प्रतिदिन अग्नि और जल प्रस्तुत रहता हो, सूर्योदय होनेतक दीप जलता एवं सूर्यका पूर्ण प्रकाश पहुँचता हो, वह घर लक्ष्मीका निवास-स्थान है। जहाँ साँड़, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घृत, ब्राह्मण तथा ताँबेके पात्र हों, उस घरमें तुम्हारे लिये स्थान नहीं है।

दुःसह! जहाँ पके या कच्चे अन्नोंका अनादर और शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन होता हो, उस घरमें तुम इच्छानुसार विचरण करो। जिस घरमें मनुष्यकी हड्डी हो और एक दिन तथा एक रात मुर्दा पड़ा रहा हो, उसमें तुम्हारा तथा अन्य राक्षसोंका भी निवास रहे। जो अपने भाई-बन्धुको तथा सपिण्ड एवं समानोदक मनुष्योंको अन्न और जल दिये बिना ही भोजन करते हैं, उस समय उन लोगोंपर तुम आक्रमण करो। जहाँ पुरवासी पहलेसे ही बड़े-बड़े उत्सव मनानेमें प्रसिद्ध हो चुके हों और पहलेकी ही भाँति अब अपने घरपर उत्सव मनाते हों, ऐसे घरोंमें न जाना। जो सूपकी हवासे, भीगे कपड़ेके जलकी बूँदोंसे तथा नखके अग्रभागके जलसे स्नान करते हों, उन कुलक्षणी पुरुषोंके पास अवश्य जाओ। जो पुरुष देशाचार, प्रतिज्ञा, कुलधर्म, जप, होम, मङ्गल, देवयज्ञ, उत्तम शौच तथा लोक-प्रचलित धर्मोंका भलीभाँति पालन करता हो, उसके संसर्गमें तुम्हें नहीं जाना चाहिये।

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**दुःसहसे ऐसी बात कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर उसने भी ब्रह्माजीकी आज्ञाका उसी प्रकार पालन किया।


दुःसहकी सन्तानोंद्वारा होनेवाले विघ्न और उनकी शान्तिके उपाय

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**दुःसहकी पत्नी निर्माष्टि हुई। यह कलिकी कन्या थी। कलिकी पत्नीने रजस्वला होनेपर चाण्डालका दर्शन किया था, उसीसे इस कन्याका जन्म हुआ था। दुःसह और निर्माष्टिकी सोलह सन्तानें हुईं जो समस्त संसारमें व्याप्त हैं। इनमें आठ पुत्र थे और आठ कन्याएँ। ये सब-के-सब अत्यन्त भयंकर थे। दन्ताकृष्टि, तथोक्ति, परिवर्त्त, अङ्गधुक्, शकुनि, गण्डप्रान्तरति, गर्भहा तथा सस्यहा—ये आठ पुत्र थे। नियोजिका, विरोधिनी, स्वयंहारिका, भ्रामणी, ऋतुहारिका, स्मृतिहरा, बीजहरा तथा विद्वेषिणी—ये आठ कन्याएँ थीं, जो सम्पूर्ण जगत्‌को भय देनेवाली हुईं। अब मैं इनके कर्म तथा इनसे होनेवाले दोषोंकी शान्तिके उपाय बतलाऊँगा। पहले आठ

१३२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


पुत्रोंके विषयमें सुनो। दन्ताकृष्ट छोटे बच्चोंके दाँतोंमें स्थित होकर उनमें रगड़ पैदा करता है। इस प्रकार वह दुःसह नामक अलक्ष्मी-पुत्रको वहाँ बुलाना चाहता है। उसकी शान्तिके लिये सोये हुए बालककी शय्या और दाँतोंपर सफेद सरसों छींटना चाहिये तथा सुवर्चला (ब्राह्मी) नामक ओषधिसे स्नान कराने और उत्तम शास्त्रोंका पाठ करानेसे भी यह दोष दूर होता है। दुःसहका दूसरा पुत्र तथोक्ति जब आता है, तब वह बारंबार 'यही हो, यही हो' ऐसा कहता हुआ मनुष्योंको शुभाशुभमें लगा देता है। यदि अकस्मात् शुभाशुभकी प्रवृत्ति हो तो उसे तथोक्तिकी ही प्रेरणा समझनी चाहिये। यदि शुभका कथन या श्रवण हो तो विद्वान् पुरुष उसे मङ्गलमय बतावे और यदि अशुभका श्रवण या कथन हो तो उसकी शान्तिके लिये भगवान् विष्णु, चराचरगुरु ब्रह्मा तथा अपने-अपने कुलदेवताके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। जो अन्यके गर्भमें दूसरे गर्भोंको रखने और बदलनेमें प्रसन्नताका अनुभव करता है तथा कोई बात कहनेके लिये उत्सुक मनुष्यके मुखसे किसी और ही बातको कहला देता है, वह दुःसहका तीसरा पुत्र परिवर्त है। उसकी शान्तिके लिये भी तत्त्ववेत्ता पुरुष पीली सरसों छिड़के और रक्षोघ्न-मन्त्रोंका पाठ करे।

अङ्गध्रुक् नामक चौथा कुमार वायुके समान मनुष्योंके अङ्गोंमें प्रवेश करके स्फुरण (फड़कने) आदिके द्वारा शुभाशुभ फलकी सूचना देता है। उसकी शान्तिके लिये कुशोंसे शरीरको झाड़े। दुःसहका पाँचवाँ कुमार शकुनि कौवे आदि पक्षियोंके अथवा कुत्ते-सियार आदि पशुओंके शरीरमें स्थित होकर अपनी बोलीसे शुभाशुभ फलको सूचित करता है। उसमें भी अशुभसूचक शब्द होनेपर कार्यारम्भका परित्याग करना चाहिये और शुभसूचक शब्द होनेपर अत्यन्त शीघ्रताके साथ कार्यारम्भ कर देना चाहिये। ऐसा प्रजापतिका कथन है। द्विजश्रेष्ठ! गण्डप्रान्तरति नामक छठा कुमार गण्डप्रान्तोंमें आधे मुहूर्ततक स्थित हो सब प्रकारके कार्यारम्भका नाश और माङ्गलिक कर्म तथा अनिन्दनीयता (प्रतिष्ठा)-का अपहरण करता है। ब्राह्मणोंके आशीर्वाद, देवताओंकी स्तुति, मूलशान्ति, गोमूत्र और सरसों मिले हुए जलसे स्नान, जन्मकालिक नक्षत्र और ग्रहोंके पूजन, धर्ममय उपनिषदोंके पाठ, शास्त्रोंके दर्शन तथा गण्डान्तमें पैदा हुए बालककी अवज्ञा (कुछ कालतक उसका मुँह न देखने)-से उसके दोषकी शान्ति होती है। सातवाँ कुमार 'गर्भहा' बड़ा भयंकर है, जो स्त्रियोंके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ पिण्डको अपना ग्रास बना लेता है। प्रतिदिन पवित्रतापूर्वक रहने, प्रसिद्ध मन्त्र (कवच आदि) लिखकर बाँधने, उत्तम फूलों आदिकी माला धारण करने, पवित्र गृहमें रहने तथा अधिक परिश्रम न करनेसे गर्भवती स्त्रीकी उसके भयसे रक्षा होती है। अतः इसके लिये सदा चेष्टा करनी चाहिये। इसी प्रकार आठवाँ कुमार सस्यहा है, वह खेतीकी उपजको नष्ट करता है। उसकी भी शान्ति करनी चाहिये; इसके लिये उपाय है—खेतमें पुराना जूता रखना, अपसव्य होकर वहाँ जाना, चाण्डालका उसमें प्रवेश कराना, खेतके बाहर पूजा चढ़ाना और चन्द्रमा एवं जल (वरुण)-के नामों या मन्त्रोंका कीर्तन करना।

दुःसहकी पहली कन्या नियोजिका है। वह मनुष्योंको परायी स्त्री और पराये धनके अपहरण आदिमें लगा देती है। पवित्र ग्रन्थों, मन्त्रों अथवा स्तुतियोंके पाठसे तथा क्रोध-लोभ आदि दुर्गुणोंका त्याग करनेसे उसकी शान्ति होती है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि 'नियोजिका मुझे इन दुष्कर्मोंमें लगा रही है' यों विचारकर उसका विरोध करते हुए उन कर्मोंका त्याग करे। जब कोई अपनेको गाली दे या मार बैठे तो भी यही सोचकर कि नियोजिकाने ही इसे इस बुराईमें लगाया है, क्रोध आदिके वशीभूत न हो। इसी प्रकार विद्वान् पुरुष सदा इस बातका स्मरण करता रहे कि नियोजिका

  • दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन * १३३

ही मुझको और मेरे चित्तको परस्त्री-संसर्गमें लगाती है। दूसरी कन्याका नाम विरोधिनी है। वह परस्पर प्रेम रखनेवाले स्त्री-पुरुषोंमें, भाई-बन्धुओंमें, मित्रोंमें, पिता-मातामें, पिता-पुत्रमें तथा सजातीय पुरुषोंमें विरोध डाला करती है। अतः बलिकर्म (पूजोपहारसमर्पण) करने, कठोर बातोंको सहने तथा शास्त्रीय आचार-विचारका पालन करनेके द्वारा उसके भयसे अपनी रक्षा करे। तीसरी कन्याका नाम स्वयंहारिका है। वह खलिहानसे अनाज, घर और गोशालैसे दूध-घी तथा बढ़नेवाले द्रव्यसे उसकी वृद्धि नष्ट कर देती है और सदा अन्तर्धान रहती है। इतना ही नहीं, रसोईघरसे अधपका अन्न तथा अन्नभंडारसे अनाज चुरा लेती है और परोसी हुई रसोईको भोजन करनेवाले मनुष्यके साथ स्वयं भी भोजन करती है। मनुष्योंके जूठे अन्नतक चुरा लेती है। जोते हुए खेत, घर और शालासे ऋद्धि-सिद्धिको हड़प लेती है। गायों और स्त्रियोंके थनोंसे दूध गायब कर देती है। दहीसे घी, तिलसे तेल, कुसुम्भ आदिका रंग तथा रूईसे सूत हर लेती है। इस प्रकार स्वयंहारिका निरन्तर अपहरणमें ही लगी रहती है। उससे रक्षा होनेके लिये अपने घरमें मोरके जोड़े रखे। स्त्रीकी कृत्रिम मूर्ति बनाकर स्थापित करे, घरकी दीवारपर रक्षाके मन्त्र और वाक्य लिखे, घरके भीतर जूठन न रहने दे, हवनकी अग्निसे तथा देवताको धूप देनेसे जो भस्म हो, उसे लेकर दूध आदिके बर्तनोंमें लगा दे [गाय और स्त्रीके स्तनोंमें तथा अन्नभंडार आदिमें भी उस भस्मका स्पर्श करा दे]। इससे रक्षा होती है। जो एक स्थानपर निवास करनेवाले पुरुषके मनमें उद्वेग पैदा करती है, वह भ्रामणी नामकी कन्या है। उसकी शान्तिके लिये आसन, शय्या तथा उस भूमिपर, जहाँ मनुष्य रहता हो, पीली सरसों छींट दे। साथ ही एकाग्रचित्त होकर पृथ्वी-सूक्तका जप करे।

दुःसहकी पाँचवीं कन्या स्त्रियोंके मासिक धर्म नष्ट करती है। इसलिये उसे ऋतुहारिका जानना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये स्त्रीको तीर्थोंमें, देवालयके समीप, चैत्य वृक्षके नीचे, पर्वतके शिखरपर तथा नदीके संगम एवं सरोवरोंमें नहलाना चाहिये। साथ ही चिकित्साशास्त्रके ज्ञाता अच्छे वैद्यको बुलाकर उसकी दी हुई उत्तम ओषधियोंका सेवन भी कराना चाहिये। छठी कन्याका नाम स्मृतिहरा है। यह स्त्रियोंकी स्मरणशक्तिको हर लेती है। पवित्र एवं एकान्त स्थानमें रहनेसे उसकी शान्ति होती है। सातवीं कन्या बीजहरा कहलाती है। यह अत्यन्त भयानक है। स्त्री-पुरुषोंके रज-वीर्यका अपहरण किया करती है। पवित्र अन्नके भोजन तथा नित्य स्नान करनेसे उसकी शान्ति होती है। आठवीं कन्या विद्वेषिणी है, जो सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली है। यह स्त्री अथवा पुरुषको लोगोंका द्वेषपात्र बना देती है। उसकी शान्तिके लिये मधु, घृत, क्षीरमिश्रित तिलोंका हवन एवं मित्रविन्दा नामक यज्ञ करे।


दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं— भृगुसे उनकी पत्नी ख्यातिने धाता और विधाता नामक दो देवताओंको उत्पन्न किया। देवाधिदेव भगवान् नारायणकी धर्मपत्नी श्रीलक्ष्मीदेवी भी ख्यातिके ही गर्भसे प्रकट हुईं। महात्मा मेरुकी दो कन्याएँ थीं—आयति और नियति। ये ही धाता और विधाताकी पत्नियाँ हुईं। इन दोनोंसे दो पुत्र हुए—प्राण तथा मेरे महायशस्वी पिता मृकण्डु। श्रीमृकण्डुसे मेरा जन्म हुआ, मेरी माता मनस्विनी देवी थीं। मेरी पत्नी धूम्रवतीके गर्भसे मेरे पुत्र वेदशिराका जन्म हुआ। अब प्राणकी सन्तानका वर्णन सुनो। प्राणका पुत्र द्युतिमान् और द्युतिमान्‌का अजरा हुआ। उन

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दोनोंके बहुत-से पुत्र-पौत्र हुए।

मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमासको उत्पन्न किया। महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए—विरजा और पर्वत। अङ्गिराकी पत्नी स्मृतिने चार कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम ये हैं—सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति। इसी प्रकार महर्षि अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा तथा योगी दत्तात्रेय—इन तीन पापरहित पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुलस्त्यकी पत्नी प्रीतिसे दत्तोत्ति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अपने पूर्वजन्ममें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'अगस्त्य' के नामसे प्रसिद्ध था। क्षमा प्रजापति पुलहकी पत्नी थी। उसने कर्दम, अर्वर्रीवत् और सहिष्णु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये। क्रतुकी पत्नी सन्नतिने साठ हजार बालखिल्य नामक ऊर्ध्वरेता महर्षियोंको उत्पन्न किया। वसिष्ठकी पत्नी ऊर्जाके गर्भसे सात पुत्र उत्पन्न हुए—रज, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनघ, सुतपा और शुक्र। ये सभी सप्तर्षि हुए।

ब्रह्मन्! अग्नितत्त्वके अभिमानी देवता अग्नि ब्रह्माजीके प्रथम पुत्र थे। उनकी पत्नी स्वाहाने तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो बड़े ही उदार और तेजस्वी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—पावक, पवमान और शुचि। इनमें शुचि जलको सोखनेवाला है। इन तीनोंके वंशमें प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे पैंतालीस पुत्र हुए। इनके साथ पिता अग्नि और उनके तीन पुत्रोंकी संख्या जोड़नेसे कुल उनचास अग्नि होते हैं। ये सब-के-सब दुर्जय माने जाते हैं। ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, अनग्निक और साग्निक पितर बतलाये गये हैं, उनसे स्वधाने दो कन्याओंको जन्म दिया, जिनके नाम थे—मेना और धारिणी। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न तथा सभी गुणोंसे सुशोभित, ब्रह्मवादिनी एवं योगिनी थीं। इस प्रकार यह दक्ष कन्याओंकी वंश-परम्पराका वर्णन हुआ। जो श्रद्धापूर्वक इसका चिन्तन करता है, वह निःसन्तान नहीं रहता।

क्रौष्टुकि बोले—भगवन्! आपने जो अभी स्वायम्भुव मन्वन्तरकी चर्चा की है, उसका वर्णन मैं अच्छी तरह सुनना चाहता हूँ। मन्वन्तरके कालमान, देवता, देवर्षि, राजा और इन्द्र—इन सबका वर्णन कीजिये।

मार्कण्डेयजीने कहा—ब्रह्मन्! मन्वन्तरकी अवधि इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालकी होती है, यह बात बतायी जा चुकी है। अब मानव-वर्षसे मन्वन्तरका कालमान सुनो। तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षोंका एक मन्वन्तर होता है। देवताओंके मानसे आठ लाख बावन हजार वर्षोंका यह काल है। सबसे पहले मनु स्वायम्भुव हैं। इसके बाद स्वारोचिष, औत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष हैं। ये छः मनु बीत चुके हैं। इस समय वैवस्वत मनुका राज्य है। भविष्यमें सावर्णि नामवाले पाँच मनु, रौच्य मनु तथा भौम मनु—ये सात और होनेवाले हैं। इनका विस्तृत वर्णन मन्वन्तरोंके प्रकरणमें करेंगे। ब्रह्मन्! इस समय मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र और पितरोंका परिचय देता हूँ तथा उनकी उत्पत्ति, संग्रह एवं संतानोंका भी वर्णन करता हूँ। साथ ही यह भी बतलाता हूँ कि मनु और उनके पुत्रोंके राज्यका क्षेत्र कितना था।

पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रथम त्रेतायुगमें प्रियव्रतके पुत्रों अर्थात् स्वायम्भुव मनुके पौत्रोंने पृथ्वीके वर्ष-विभाग किये थे। प्रजापति कर्दमजीकी पुत्री प्रजावती राजा प्रियव्रतको ब्याही गयी थी, उसके गर्भसे दो कन्याएँ और दस पुत्र हुए। कन्याओंके नाम थे—सम्राट् और कुक्षि। उन दोनोंके दसों भाई प्रजापतिके समान तेजस्वी और बड़े शूरवीर थे। उनमें सातके नाम इस प्रकार हैं—आग्नीध्र, मेधातिथि, वपुष्मान्, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, भव्य और सवन। इनके सिवा मेधा, अग्निबाहु और मित्र—ये तीन और थे, जो तपस्या और योगमें तत्पर रहते थे। इन्हें अपने पूर्वजन्मके

  • दक्ष प्रजापतिकी संतान तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन * १३५

वृत्तान्तोंका स्मरण था। अतएव इन महाभाग्यशाली पुरुषोंने राज्य-भोगमें मन नहीं लगाया। राजा प्रियव्रतने शेष सातों पुत्रोंको सातों द्वीपोंके राजपदपर धर्मपूर्वक अभिषिक्त कर दिया। अब द्वीपोंका वर्णन सुनो।

प्रियव्रतने जम्बूद्वीपमें आग्नीध्रको राजा बनाया। प्लक्षद्वीपका राज्य मेधातिथिको सौंपा। शाल्मलद्वीपमें वपुष्मान्‌को और कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्‌को राजा बनाया। द्युतिमान् क्रौञ्चद्वीपके, भव्य शाकद्वीपके तथा सवन पुष्करद्वीपके स्वामी बनाये गये। पुष्करराज सवनके दो पुत्र हुए—महावीर और धातकि। उन्होंने पुष्करद्वीपको दो भागोंमें बाँटकर बसाया। भव्यके सात पुत्र थे, उनके नाम ये हैं—जलद, कुमार, सुकुमार, वनीयक, कुशोत्तर, मेधावी और महाद्रुम। उन्होंने अपने-अपने नामसे शाकद्वीपके सात खण्ड किये। द्युतिमान्‌के भी कुशल, मनुग, उष्ण, प्राकार, अंधकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये सात ही पुत्र थे। उनके नामसे क्रौञ्चद्वीपके सात खण्ड हुए। राजा ज्योतिष्मान्‌के कुशद्वीपमें भी उनके पुत्रोंके नामपर सात खण्ड बने, उनके नाम इस प्रकार हैं—उद्भिद, वेष्णव, सुरथ, लम्बन, धृतिमान्, प्रभाकर तथा कपिल। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्‌के भी सात पुत्र हुए—श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और केतुमान्। इनके नामपर भी पूर्ववत् उक्त द्वीपके सात खण्ड बनाये गये। प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके भी सात ही पुत्र हुए और उनके नामसे प्लक्षद्वीपके भी सात खण्ड बन गये। उन खण्डोंके नाम इस प्रकार हैं—शाकभव, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव। प्लक्षद्वीपसे लेकर शाकद्वीपतकके पाँच द्वीपोंमें वर्णाश्रम-धर्म विभागपूर्वक स्थित है। वहाँ धर्मका सदा स्वाभाविक रूपसे पालन होता है। कभी किसी जीवकी हिंसा नहीं की जाती। उन पाँचों द्वीपों और उनके वर्षोंमें सब धर्म सामान्य रूपसे सर्वत्र प्रचलित हैं।

ब्रह्मन्! राजा प्रियव्रतने आग्नीध्रको जम्बूद्वीपका राज्य दिया था। उनके नौ पुत्र हुए, जो प्रजापतिके समान शक्तिशाली थे। उनमें सबसे बड़ेका नाम नाभि था, उससे छोटा किम्पुरुष था। तीसरेका नाम हरि, चौथेका इलावृत, पाँचवेंका रम्य, छठेका हिरण्वक, सातवेंका कुरु, आठवेंका भद्राश्व और नवेंका केतुमाल था। इन पुत्रोंके नामपर ही जम्बूद्वीपके नौ खण्ड हुए। हिमवर्षको छोड़कर शेष जो किम्पुरुष आदि वर्ष हैं, उनमें सुखकी अधिकता है और बिना यत्न किये स्वभावसे ही वहाँ सब कामनाओंकी सिद्धि होती है। उनमें किसी प्रकारके विपर्यय (असुख, अकाल मृत्यु आदि) तथा जरा-मृत्युका कोई भय नहीं है और न वहाँ धर्म-अधर्म अथवा उत्तम, मध्यम, अधम आदिका ही कोई भेद है। उन आठ वर्षोंमें न चार युगोंकी व्यवस्था है, न छः ऋतुओंकी। वहाँ किसी विशेष ऋतुके कोई चिह्न नहीं दीख पड़ते। आग्नीध्रकुमार नाभिके पुत्र ऋषभ और ऋषभके भरत हुए, जो अपने सौ भाइयोंमें सबसे बड़े थे। ऋषभ अपने पुत्रको राज्य दे महाप्रव्रज्या (संन्यास) ग्रहण करके तपस्या करने लगे। वे महर्षि पुलहके आश्रममें ही रहते थे। उन्होंने हिम नामक वर्षको, जो सबसे दक्षिण है, अपने पुत्र भरतको दिया था; इसलिये महात्मा भरतके नामपर इसका नाम भारतवर्ष हो गया।

भरतके पुत्र सुमति हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। भरतने उनको राज्य देकर वनका आश्रय लिया। राजा प्रियव्रतके पुत्रों तथा उनके भी पुत्र-पौत्रोंने स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका उपभोग किया। द्विजश्रेष्ठ! यह मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि बतलायी अब और क्या सुनाऊँ?

१३६* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

जम्बूद्वीप और उसके पर्वतोंका वर्णन

क्रौष्टुकिने पूछा— ब्रह्मन्! द्वीप, समुद्र, पर्वत और वर्ष कितने हैं तथा उनमें कौन-कौन-सी नदियाँ हैं? महाभूत (पृथ्वी) और लोकालोकका प्रमाण क्या है? चन्द्रमा और सूर्यका व्यास, परिमाण तथा गति कितनी है? महामुने! ये सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये।

मार्कण्डेयजी बोले— ब्रह्मन्! समूची पृथ्वीका विस्तार पचास करोड़ योजन है। अब उसके सब स्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। महाभाग! जम्बूद्वीपसे लेकर पुष्करद्वीपतक जितने द्वीपोंकी मैंने चर्चा की है, उन सबका विस्तार इस प्रकार है। क्रमशः एक द्वीपसे दूसरा द्वीप दुगुना बड़ा है; इसी क्रमसे जम्बूद्वीप, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्करद्वीप स्थित हैं। ये क्रमशः लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दही, दूध और जलके समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। ये समुद्र भी एककी अपेक्षा दूसरे दुगुने बड़े हैं।

अब मैं जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन करता हूँ। इसकी लंबाई-चौड़ाई एक लाख योजनकी है। इसमें हिमवान्, हेमकूट, निषध, मेरु, नील, श्वेत तथा शृङ्गी—ये सात वर्षपर्वत हैं। इनमें मेरु तो सबके बीचमें है, उसके सिवा जो नील और निषध नामक दो और मध्यवर्ती पर्वत हैं, वे एक-एक लाख योजनतक फैले हुए हैं। निषधसे दक्षिणमें तथा नीलसे उत्तरमें जो दो-दो पर्वत हैं, उनका विस्तार क्रमशः दस-दस हजार योजन कम है। अर्थात् हेमकूट और श्वेत नब्बे-नब्बे हजार योजनतक तथा हिमवान् और शृङ्गी अस्सी-अस्सी हजार योजनतक फैले हुए हैं। वे सभी दो-दो हजार योजन ऊँचे और उतने ही चौड़े हैं। इस जम्बूद्वीपके छह वर्षपर्वत समुद्रके भीतरतक प्रवेश किये हुए हैं। वह पृथ्वी दक्षिण और उत्तरमें नीची और बीचमें ऊँची तथा चौड़ी है। जम्बूद्वीपके तीन खण्ड दक्षिणमें हैं और तीन खण्ड उत्तरमें। इनके मध्यभागमें इलावृत वर्ष है, जो आधे चन्द्रमाके आकारमें स्थित है। उसके पूर्वमें भद्राश्व और पश्चिममें केतुमाल वर्ष है। इलावृत वर्षके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जिसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। वह सोलह हजार योजन नीचेतक पृथ्वीमें समाया हुआ है तथा उसकी चौड़ाई भी सोलह हजार योजन ही है। वह शराव (पुरवे)-की आकृतिका होनेके कारण चोटीकी ओर बत्तीस हजार योजन चौड़ा है। मेरुपर्वतका रंग पूर्वकी ओर सफेद, दक्षिणकी ओर पीला, पश्चिमकी ओर काला और उत्तरकी ओर लाल है। यह रंग क्रमशः ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र तथा क्षत्रियका है। मेरुपर्वतके ऊपर क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्रादि आठ लोकपालोंके निवासस्थान हैं। इनके बीचमें ब्रह्माजीकी सभा है। वह सभामण्डप चौदह हजार योजन ऊँचा है। उसके नीचे विष्कम्भ (आधार) रूपसे चार पर्वत हैं, जो दस-दस हजार योजन ऊँचे हैं। वे क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व। इन चारों पर्वतोंके ऊपर चार बड़े-बड़े वृक्ष हैं, जो ध्वजाकी भाँति उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्दराचलपर कदम्ब, गन्धमादन पर्वतपर जम्बू, विपुलपर पीपल तथा सुपार्श्वके ऊपर बरगदका महान् वृक्ष है। इन पर्वतोंका विस्तार ग्यारह-ग्यारह सौ योजनका है। मेरुके पूर्वभागमें जठर और देवकूट पर्वत हैं, जो नील और निषध पर्वततक फैले हुए हैं। निषध और पारियात्र—ये दो पर्वत मेरुके पश्चिम भागमें स्थित हैं। पूर्ववाले पर्वतोंकी भाँति ये भी नीलगिरितक फैले हुए हैं। हिमवान् और कैलासपर्वत मेरुके दक्षिण भागमें स्थित हैं। ये पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैलते हुए समुद्रके भीतरतक चले गये हैं। इसी प्रकार उसके उत्तर भागमें शृङ्गवान् और जारुधि

  • जम्बूद्वीप और उसके पर्वतोंका वर्णन * १३७

नापक पर्वत हैं। ये भी दक्षिण भागवाले पर्वतोंकी भाँति समुद्रके भीतरतक फैले हुए हैं। द्विजश्रेष्ठ! ये मर्यादा-पर्वत कहलाते हैं।

हिमवान् और हेमकूट आदि पर्वतोंका पारस्परिक अन्तर नौ-नौ हजार योजन है। ये इलावृतवर्षके मध्यभागमें मेरुकी चारों दिशाओंमें स्थित हैं। गन्धमादन पर्वतपर जो जामुनके फल गिरते हैं, वे हाथीके शरीरके बराबर होते हैं। उनमेंसे जो रस निकलता है, उससे जम्बू नामकी नदी प्रकट होती है, जहाँसे जाम्बूनद नामक सुवर्ण उत्पन्न होता है। वह नदी जम्बूवृक्षके मूलभूत मेरुपर्वतकी परिक्रमा करती हुई बहती है और वहाँके निवासी उसका जल पीते हैं। भद्राश्ववर्षमें भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे, भारतवर्षमें कच्छपरूपसे, केतुमालवर्षमें वाराहरूपसे तथा उत्तरकुरुमें मत्स्यरूपसे विराजते हैं।

द्विजश्रेष्ठ! मन्दर आदि चार पर्वतोंपर जो चार वन और सरोवर हैं, उनके नाम सुनो। मेरुसे पूर्वके पर्वतपर चैत्ररथ नामक वन है, दक्षिण शैलपर नन्दन वन है, पश्चिमके पर्वतपर वैभ्राज वन है और उत्तरवाले पर्वतपर सावित्र नामक वन है। पूर्वमें अरुणोद, दक्षिणमें मानस, पश्चिममें शीतोद और उत्तरमें महाभद्रनामक सरोवर है। शीतार्त्त, चक्रमुञ्ज, कुलीर, सुकङ्कवान्, मणिशैल, वृषवान्, महानील, भवाचल, सुबिन्दु, मन्दर, वेणु, तामस, निषध तथा देवशैल—ये महान् पर्वत मन्दराचलसे पूर्व दिशामें स्थित हैं। त्रिकूट, शिखराद्रि, कलिङ्ग, पतङ्गक, रुचक, सानुमान्, ताम्रक, विशाखवान्, श्वेतोदर, समूल, वसुधार, रत्नवान्, एकशृङ्ग, महाशैल, राजशैल, पिपाठक, पञ्चशैल, कैलास और हिमालय—ये मेरुके दक्षिणभागमें स्थित हैं। सुरक्ष, शिशिराक्ष, वैदूर्य, पिङ्गल, पिञ्जर, महाभद्र, सुरस, कपिल, मधु, अञ्जन, कुक्कुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, पारियात्र और शृङ्गवान्—ये मेरुके पश्चिम विष्कम्भ विपुल गिरिसे पश्चिममें स्थित हैं। शङ्खकूट, वृषभ, हंसनाभ, कपिलेन्द्र, सानुमान्, नील, स्वर्णशृङ्ग, शतशृङ्ग, पुष्पक, मेघ, विरजाक्ष, वराहाद्रि, मयूर तथा जारुधि—ये सभी पर्वत मेरुके उत्तरभागमें स्थित हैं। इन पर्वतोंकी कन्दराएँ बड़ी मनोहर हैं। हरे-भरे वन और स्वच्छ जलवाले सरोवर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ पुण्यात्मा मनुष्योंका जन्म होता है। द्विजश्रेष्ठ! वे स्थान इस पृथ्वीके स्वर्ग हैं। इनमें स्वर्गसे भी अधिक गुण हैं। यहाँ नूतन पाप-पुण्यका उपार्जन नहीं होता। ये देवताओंके लिये भी पुण्यभोगके ही स्थान हैं। इन पर्वतोंपर विद्याधर, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता तथा गन्धर्वोंके सुन्दर एवं विशाल वासस्थान हैं। वे परम पवित्र तथा देवताओंके मनोहर उपवनोंसे सुशोभित हैं। वहाँके सरोवर भी बड़े सुन्दर हैं। वहाँ सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली वायु चलती है। इन पर्वतोंपर मनुष्योंमें कहीं वैमनस्य नहीं होता।

इस प्रकार मैंने चार पत्रोंसे सुशोभित पार्थिव कमलका वर्णन किया है। भद्राश्व और भारत आदि वर्ष चारों दिशाओंमें इस कमलके पत्र हैं। मेरुके दक्षिणभागमें जिस भारत नामक वर्षकी चर्चा की गयी है, वही कर्मभूमि है। अन्य स्थानोंमें पाप-पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती। अतः भारतवर्षको ही सबसे प्रधान समझना चाहिये। क्योंकि वहाँ सब कुछ प्रतिष्ठित है। भारतवर्षसे मनुष्य स्वर्गलोक, मोक्ष, मनुष्यलोक, नरक, तिर्यग्योनि अथवा और कोई गति—जो चाहे प्राप्त कर सकता है।

१३८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, किम्पुरुष आदि वर्षोंकी विशेषता तथा भारतवर्षके विभाग, नदी, पर्वत और जनपदोंका वर्णन

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**द्विजश्रेष्ठ! विश्वयोनि भगवान् नारायणका जो ध्रुवाधार* नामक पद है, उसीसे त्रिपथगामिनी भगवती गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। वहाँसे चलकर वे सुधाकी उत्पत्तिके स्थान और जलके आधारभूत चन्द्रमण्डलमें प्रविष्ट हुईं और सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे अत्यन्त पवित्र हो मेरुपर्वतके शिखरपर गिरीं। वहाँ उनकी चार धाराएँ हो गयीं। मेरुके शिखरों और तटोंसे नीचे गिरती-बहती गङ्गाका जल चारों ओर बिखर गया और आधार न होनेके कारण नीचे गिरने लगा। इस प्रकार वह जल मन्दर आदि चारों पर्वतोंपर बराबर-बराबर बँट गया। अपने वेगसे बड़े-बड़े पर्वतोंको विदीर्ण करती हुई गङ्गाकी जो धारा पूर्व दिशाकी ओर गयी, वह सीताके नामसे विख्यात हुई। सीता नैत्ररथ नामक वनको जलसे आप्लावित करती हुई अरुणोद सरोवरमें गयी और वहाँसे शीतान्त पर्वत तथा अन्य पहाड़ोंको लाँघती हुई पृथ्वीपर पहुँची। वहाँसे भद्राश्ववर्षमें होती हुई समुद्रमें मिल गयी। इसी प्रकार मेरुके दक्षिण गन्धमादनपर्वतपर जो गङ्गाकी दूसरी धारा गिरी, वह अलकनन्दाके नामसे विख्यात हुई। अलकनन्दा मेरुकी घाटियोंपर फैले हुए नन्दन वनमें, जो देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला है, बहती हुई बड़े वेगसे चलकर मानसरोवरमें पहुँची। उस सरोवरको अपने जलसे परिपूर्ण करके गङ्गा शैलराजके रमणीय शिखरपर आयी। वहाँसे क्रमशः दक्षिणमें स्थित समस्त पर्वतोंको अपने जलसे आप्लावित करती हुई महागिरि हिमवान्‌पर जा पहुँची। वहीं भगवान् शङ्करने गङ्गाजीको अपने शीशपर धारण कर लिया और फिर नहीं छोड़ा। तब राजा भगीरथने आकर उपवास और स्तुतिके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की। उससे प्रसन्न होकर महादेवजीने गङ्गाको छोड़ दिया। फिर वे सात धाराओंमें विभक्त होकर दक्षिण समुद्रमें जा मिलीं। उनकी तीन धाराएँ तो पूर्व दिशाकी ओर गयीं। एक धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर बहने लगी।

मेरुगिरिके पश्चिममें जो विपुल नामक पर्वत है, उसपर गिरी हुई महानदी गङ्गाकी धारा स्वचक्षुके नामसे विख्यात हुई। वहाँसे वैराज पर्वतपर होती हुई स्वचक्षु शीतोद सरोवरमें गयी और उसे आप्लावित करके त्रिशिख पर्वतपर पहुँच गयी। फिर वहाँसे अन्य पर्वतोंके शिखरोंपर होती हुई केतुमालवर्षमें पहुँचकर खारे पानीके समुद्रमें मिल गयी। मेरुके उत्तरीय पाद सुपार्श्वपर्वतपर


* इसको शिशुमार चक्र भी कहते हैं

  • श्रीगङ्गाजीकी उत्पत्ति, किम्पुरुष आदि वर्षोंकी विशेषता तथा भारतवर्षके विभाग * १३९

गिरे हुए गङ्गाकी धारा सोमाके नामसे विख्यात हुई और सावित्र वनको पवित्र करती हुई महाभद्र सरोवरमें जा पहुँची। वहाँसे शङ्खकूट पर्वतपर जा क्रमशः वृषभ आदि शैलमालाओंको लाँघती हुई उत्तरकुरु नामक वर्षमें बहने लगी। अन्ततोगत्वा महासागरमें जा मिली।

द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें गङ्गाजीकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह सुनाया। साथ ही जम्बूद्वीपका निवेश और उसके वर्ष-विभाग भी बतला दिये। किम्पुरुष आदि समस्त वर्षोंमें प्रजा बड़े सुखसे रहती है। उसे किसी प्रकारका भय नहीं सताता। उनमें कोई छोटा-बड़ा या ऊँच-नीच नहीं होता। जम्बूद्वीपके नवों वर्षोंमें सात-सात कुल पर्वत हैं और प्रत्येक देशमें पर्वतोंसे निकली हुई अनेकानेक नदियाँ हैं। विप्रवर! किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, वहाँ पृथ्वीसे ही प्रचुर जल निकलता है; किन्तु भारतवर्षमें वर्षाके जलसे विशेष कार्य चलता है। उक्त आठ वर्षोंमें वार्क्षी, स्वाभाविकी, देश्या, तोयोत्था, मानसी तथा कर्मजा सिद्धियाँ मनुष्योंको प्राप्त होती हैं। कामना पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष आदि वृक्षोंसे जो सिद्धि प्राप्त होती है, उसे वार्क्षी-सिद्धि कहते हैं। स्वभावसे ही प्राप्त होनेवाली सिद्धि स्वाभाविकी कहलाती है। देशसे या स्थानविशेषसे जो कार्यसिद्धि होती है, उसका नाम देश्या है। जलकी सूक्ष्मतासे होनेवाली सिद्धि तोयोत्था कही गयी है। ध्यानसे ही प्राप्त होनेवाली सिद्धिको मानसी कहते हैं तथा उपासना आदि कर्मसे जो सिद्धि प्राप्त होती है; वह कर्मजा कहलाती है। किम्पुरुष आदि वर्षोंमें युगकी व्यवस्था और आधि-व्याधि नहीं हैं। वहाँ पाप पुण्यका अनुष्ठान भी नहीं देखा जाता।

**क्रौष्टुकिने कहा—**भगवन्! आपने जम्बूद्वीपका संक्षेपसे वर्णन किया; किन्तु महाभाग! अभी-अभी आपने जो यह कहा कि भारतवर्षको छोड़कर और कहीं किया हुआ कर्म पुण्य और पापका जनक नहीं होता, केवल भारतवर्षसे ही मोक्ष तथा स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं पाताल आदि लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है। मनुष्योंके लिये और किसी भूमिपर कर्मका विधान नहीं है, केवल यह भारत ही कर्मभूमि है। अतः भारतवर्षका वृत्तान्त विस्तारके साथ बतलाइये। जितने इसके भेद हों, जैसी इस देशकी स्थिति हो और जो-जो यहाँ पर्वत हों, उन सबका भलीभाँति वर्णन कीजिये।

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**ब्रह्मन्! सुनो, भारतवर्षके नौ विभाग हैं, उन सबके बीचमें समुद्रका अन्तर है; अतः एक विभागके मनुष्यका दूसरे विभागमें जाना असम्भव है। उक्त नौ विभागोंके नाम इस प्रकार हैं—इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गान्धर्वद्वीप, वारुणद्वीप और नवाँ यह भारतवर्ष। भारत भी समुद्रसे घिरा है। यह उत्तरसे दक्षिणतक एक हजार योजन बड़ा है। इसके पूर्वमें किरात और पश्चिममें यवन रहते हैं। बीचमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंका निवास है। ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग यहाँ यज्ञ, शस्त्र-ग्रहण और व्यवसाय आदि कर्मोंसे अपनेको पवित्र करते हैं; तथा इन्हींसे इनका जीवन-निर्वाह भी होता है। इतना ही नहीं, इन्हीं कर्मोंसे ये स्वर्ग, मोक्ष और पुण्य प्राप्त करते हैं तथा इन्हींको ठीक-ठीक न करनेसे इन्हें पाप भोगना पड़ता है।

महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात ही यहाँ कुल-पर्वत हैं। इनके निकट और भी हजारों पर्वत हैं। ये सभी अत्यन्त विस्तृत, ऊँचे तथा रमणीय हैं। इनके शिखर भी बहुत से हैं। इनके सिवा कोलाहल, वैभ्राज, मन्दर, दर्दुराचल, वातस्वन, वैद्युत, मैनाक, स्वरस, तुङ्गप्रस्थ, नागगिरि, रोचन, पाण्डुराचल, पुष्पागिरि, दुर्जयन्त, रैवत, अर्बुद, ऋष्यमूक, गोमन्त, कूटशैल, कृतस्मर, श्रीपर्वत और चकोर आदि सैकड़ों पर्वत और हैं, जिनसे मिले हुए म्लेच्छ और आर्य जनपद विभागपूर्वक स्थित हैं। वे लोग

६. देवी माहात्म्य (श्रीदुर्गासप्तशती — महिषासुर व शुम्भ-निशुम्भ वध)

१४० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


जिन श्रेष्ठ नदियोंका जल पीते हैं, उनके नाम सुनो। गङ्गा, सरस्वती, सिन्धु, चन्द्रभागा (चिनाब), यमुना, शतद्रू (सतलज), वितस्ता (झेलम), इरावती (रावी), कुहू, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, विपाशा (व्यास), देविका, रंक्षु, निश्चीरा, गण्डकी, कौशिकी (कोसी)—ये सभी नदियाँ हिमालयकी तलैटीसे निकली हुई हैं। वेदस्मृति, वेदवती, वृत्रघ्नी, सिन्धु, वेणा, सानन्दना, सदानीरा, मही, पारा, चर्मण्वती, नूपी, विदिशा, वेत्रवती (बेतवा), क्षिप्रा तथा अवन्ती—इन नदियोंका उद्गमस्थान पारियात्र पर्वत है। महानद शोण (सोन), नर्मदा, सुरथा, अद्रिजा, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूट्रा, चित्रोत्पला, तमसा, करमोदा, पिशाचिका, पिप्पलश्रोणि, विपाशा, वंजुला, सुमेरुजा, शुक्तिमती, शकुली, त्रिदिवाक्रम और वेगवाहिनी—ये नदियाँ ऋक्षपर्वतकी शाखाओंसे निकली हैं। शिप्रा, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, तापी, निषधावती, वेण्वा, वैतरणी, सिनीवाली, कुमुद्वती, करतोया, महागौरी, दुर्गा तथा अन्तःशिवा—ये पुण्यसलिला कल्याणमयी नदियाँ विन्ध्याचलकी घाटियोंसे निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, बाह्या तथा कावेरी—ये श्रेष्ठ सह्यपर्वतकी शाखाओंसे प्रकट हुई हैं। कृतमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पजा और उत्पलावती—ये मलयाचलसे निकली हैं। इनका जल बहुत शीतल होता है। पितृसोमा, ऋषिकुल्या, इक्षुका, त्रिदिवा, लाङ्गूलिनी और वंशकरा—ये महेन्द्रपर्वतसे निकली मानी जाती हैं। ऋषिकुल्या, कुमारी, मन्दगा, मन्दवाहिनी, कुशा और पलाशनी—इनका उद्गम शुक्तिमान् पर्वतसे हुआ है। ये सभी नदियाँ पवित्र हैं, सभी गङ्गा और सरस्वतीके समान हैं तथा सभी साक्षात् या परम्परासे समुद्रमें मिली हैं। ये सब-की-सब जगत्के लिये माता-सदृश हैं। इन सबको पापहारिणी माना गया है। द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त और भी हजारों छोटी नदियाँ हैं, जिनमें कुछ तो केवल वर्षाकालमें बहती हैं और कुछ सदा ही बहनेवाली हैं।

मत्स्य, अश्वकूट, कुल्य, कुन्तल, काशी, कोसल, अर्बुद, अर्कलिङ्ग, मल्ल और वृक—ये प्रायः मध्यदेशके जनपद कहे गये हैं। सह्यपर्वतके उत्तरका भूभाग, जहाँ गोदावरी नदी बहती है, सम्पूर्ण भूमण्डलमें सबसे अधिक मनोरम प्रदेश है। वहाँ महात्मा भार्गवका मनोहर नगर गोवर्धन है। वहाँ अनेक जनपद हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—बाल्हीक (बलख), वाटधान, आभीर, कालतोयक, अपरान्त, शूद्र, पह्लव, चर्मखण्डिक, गान्धार, यवन, सिन्धु (सिंध), सौवीर, मद्र, शतद्रुज, कलिङ्ग, पारद, हारभूषिक, माठर, बहुभद्र, कैकेय और दशमालिक। ये क्षत्रियोंके उपनिवेश हैं तथा इनमें वैश्य और शूद्रकुलके लोग भी रहते हैं। काम्बोज (खंभात), दरद, बर्बर, हर्षवर्धन, चीन, तुषार, बहुल बाह्यातोदर, आत्रेय, भरद्वाज, पुष्कल, कशेरुक, लम्पाक, शूलकार, चूलिक, जागुड़, औध्र और अनिभद्र—ये सब किरातोंकी जातियाँ हैं। तामस, हंसमार्ग, काश्मीर, गणराष्ट्र, शूलिक, कुहक, ऊर्णा तथा दार्ब—ये समस्त देश उत्तरमें स्थित हैं।

अब पूर्वके देशोंका वर्णन सुनो—अङ्गारक, मुद्गरक, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, प्लवङ्ग, रङ्गेय, मालद, मलवर्तिक, ब्रह्मोत्तर, प्रविजय, भार्गव, ज्ञेयमल्लक, प्राग्ज्योतिष, मद्र, विदेह (मिथिला), ताम्रलिप्तक, मल्ल, मगध और गोमन्त—ये पूर्व दिशाके जनपद हैं। अब दक्षिण दिशाके जनपद बतलाये जाते हैं। पाण्ड्य, केरल, चोल, कुल्य, गोलाङ्गूल, शैलूष, मूषिक, कुसुम, वनवासक, महाराष्ट्र, माहिषिक, कलिङ्ग, आभीर, वैशिक्य, आटव्य, शबर, पुलिन्द, विन्ध्यमालेय, वैदर्भ, दण्डक, पौरिक, मौलिक, अश्मक, भोगवर्धन, नैषिक, कुन्तल, आन्ध्र, उद्भिद्, वनदारक—ये सभी दक्षिणप्रदेशके जनपद हैं। अब अपरान्त देशोंका वर्णन सुनो। सूर्पारक, कालिबल, दुर्ग,

  • भारतवर्षमें भगवान् कूर्मकी स्थितिका वर्णन * १४१

अनीकट, पुलिन्द, सुमीन, रूपप, श्वापद, कुरुमिन, कठाक्षर, कारसमर, लोहजङ्घ, वाजेय, राजभद्रक, नासिक्याव, नर्मदाके उत्तरके देश, भीरुकच्छ माहेय, सारस्वत, काश्मीर, सुराष्ट्र, आवन्त्य और अर्बुद—ये अपरान्त-प्रदेश हैं। अब विन्ध्यनिवासियोंके देश बतलाये जाते हैं। सरज, करूष, केरल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, भोज्य, किष्किन्ध्यक, तोशल, कोसल, त्रैपुर, वैदिश, तुम्बूर, तुम्बुल, पटु, नैषध, अन्नज, तुष्टिकार, वीरहोत्र और अवन्ति—ये सभी जनपद विन्ध्याचलकी घाटियोंमें बसे हैं।

अब पर्वतीय देशोंका वर्णन किया जाता है—नीहार, हंसमार्ग, कुरु, गुर्गण, खस, कुन्तप्रावरण, ऊर्ण, दार्ब, कृत्रक, त्रिगर्त, मालव, किरात और तामस। ये पर्वतोंके आश्रयमें बसे हैं। इतने देशोंसे परिपूर्ण यह भारतवर्ष है। इसमें चारों दिशाओंके देशोंकी स्थिति है। इसमें सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि—इन चारों युगोंकी व्यवस्था है। भारतवर्षके दक्षिण, पश्चिम तथा पूर्वमें महासागर है और उत्तरकी ओर धनुषकी प्रत्यङ्गाके समान हिमालय पर्वतकी स्थिति है। यह भारतवर्ष सब प्रकारकी उन्नतिका बीज है। यहाँ शुभकर्म करनेसे ब्रह्मपद, इन्द्रपद, देवलोक और मरुद्गणोंका स्थान भी मिलता है। इसी प्रकार यहाँ निन्दित कर्म करनेसे मनुष्यको मृग, पशु, सर्प तथा स्थावरोंकी योनि भी मिल सकती है। ब्रह्मन्! इस जगत्में भारतवर्षके सिवा दूसरा कोई देश कर्मभूमि नहीं है। ब्रह्मर्षे! देवताओंके मनमें भी सदा यह अभिलाषा रहा करती है कि 'हम देवयोनिसे भ्रष्ट होनेपर भारतवर्षमें मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हों।' उनका कहना है कि 'भारतवर्षके मनुष्य वह कार्य कर सकते हैं, जो देवता और असुरोंके लिये भी असम्भव है; किन्तु खेदकी बात है कि ये मनुष्य कर्मबन्धनमें बँधकर अपने कर्मोंकी ख्याति—अपनी कीर्ति फैलानेको उत्सुक रहते हैं और लेशमात्र सांसारिक सुखके प्रलोभनमें पड़कर नित्य अक्षय सुखकी प्राप्तिके लिये कोई भी कर्म नहीं करते।'


भारतवर्षमें भगवान् कूर्मकी स्थितिका वर्णन

क्रौष्टुकिने कहा— भगवन्! आपने मुझसे भारतवर्षका भलीभाँति वर्णन किया तथा वहाँकी नदियों, पर्वतों और जनपदोंको भी बतलाया। इसके पहले आपने यह कहा था कि भारतवर्षमें भगवान् श्रीहरि कूर्मरूपसे निवास करते हैं, सो उनकी स्थिति कहाँ और किस प्रकार है, यह सब सुननेको मेरी इच्छा हो रही है। कूर्मरूपी भगवान् जनार्दन किस रूपमें स्थित हैं, उनसे मनुष्योंके शुभ-अशुभकी सूचना कैसे मिलती है? भगवान् कूर्मका मुख कैसा है? और उनके चरण कौन हैं? ये सारी बातें बताइये।

मार्कण्डेयजी बोले— ब्रह्मन्! कूर्मरूपधारी भगवान् श्रीहरि नौ भेदोंसे युक्त इस भारतवर्षको आक्रान्त करके स्थित हैं। उनका मुख पूर्व दिशाकी ओर है। उनके चारों ओर नौ भागोंमें विभक्त होकर सम्पूर्ण नक्षत्र और देश स्थित हैं। उन्हें बतलाता हूँ, सुनो। वेदि, मद्र, अरिमण्डव्य, शाल्व, नीप, शक्र, उज्जिहान, घोषसंख्य, खस, सारस्वत, मत्स्य, शूरसेन, माथुर, धर्मारण्य, ज्योतिषिक, गौरग्रीव, गुडाश्मक, उदेहक, पाञ्चाल, सङ्केत, कंक, मारुत, कालकोटि, पाखण्ड, पारियात्रनिवासी, कापिञ्जल, कुरुबाह्य, उदुम्बर तथा गजाह्वय (हस्तिनापुर आदि)—के मनुष्य भगवान् कूर्मके मध्यभाग (कटिप्रदेश)-में स्थित हैं। कृत्तिका, रोहिणी और मृगशिरा—ये तीन नक्षत्र उक्त स्थानके निवासियोंके लिये शुभाशुभके सूचक होते हैं। वृषभध्वज, अञ्जन, जम्बू, मानवाचल, शूर्पकर्ण, व्याघ्रमुख, खर्भक, कर्बटाशन, चन्द्रेश्वर, खश,

१४२ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


मगध, मैथिल, पौण्ड्र, वदन्वन्तुर, प्राग्ज्योतिष, लौहित्य, सामुद्र, पुरुषादक, पूर्णोत्कट, भद्रगौर, उदयगिरि, काशी, मेखल, मुष्ट, ताम्रलिप्त, एकपादप, वर्धमान और कोसल—ये देश कूर्मभगवान्‌के मुखभागमें स्थित हैं। आर्द्रा, पुनर्वसु और पुष्य—ये तीन नक्षत्र भी उनके मुखमें हैं।

अब कूर्मभगवान्‌के दक्षिण चरणमें जो देश हैं, उनके नाम सुनो—कलिङ्ग (उड़ीसा), बङ्ग (बंगाल), जठर, कोसल, मूषिक, चेदि, ऊर्ध्वकर्ण, मत्स्य, अन्ध्र, विन्ध्यवासी, विदर्भ (बरार), नारिकेल, धर्मद्वीप, ऐलिक, व्याघ्रग्रीव, महाग्रीव, त्रैपुर, श्मश्रुधारी, कैष्किन्ध्य, हेमकूट, निषध, कटकस्थल, दशार्ण, हारिक, नग्न, निषाद, काकलालक, पर्ण तथा शबर। ये देश भगवान् कूर्मके पूर्व-दक्षिण दिशावाले चरणमें स्थित हैं। आश्लेषा, मघा और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र भी वहीं हैं। लङ्का, कालाजिन, शैट्टिक, निकटर महेन्द्र, गलव और दर्दुर पर्वतोंके पास बसे हुए जनपद, कर्कोटक वनमें रहनेवाले लोग तथा भृगुकच्छ, कोङ्कण, सम्पूर्ण आभीर-प्रदेश, वेण्या नदीके तटपर बसे हुए देश, अवन्ति, दासपुर, आकारी, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोनर्द, चित्रकूट, चोल, कोलगिरि, क्रौञ्चद्वीप, जटाधर, कावेरीके तटवर्ती देश, ऋष्यमूक पर्वतपर बसे हुए प्रदेश, नासिक, शङ्ख, शुक्ति आदि तथा वैदूर्य पर्वतके समीपवर्ती देश, वारिचर कोल, चर्मपट्ट, गवद्वाह्य, कृष्णद्वीपवासी, सूर्याद्रि और कुमुदाद्रिके निवासी, औखा का, दिशिक, कर्णप्रावरक, दक्षिण, कौरुष, ऋषिक, तापनाश्रम, ऋषभ, सिंहल, काञ्चीनिवासी, त्रिलिङ्ग, कुञ्जरदरी तथा कच्छमें रहनेवाले लोग और ताम्रपर्णी नदीके तटवर्ती देश—ये भगवान् कूर्मकी दायीं कुक्षिमें स्थित हैं। उत्तरा-फाल्गुनी, हस्त तथा चित्रा—ये तीन नक्षत्र भी वहीं हैं।

काम्बोज, पह्लव, वडवामुख, सिन्धु, सौवीर, आनर्त, वनितामुख, द्रावण, शूद्र, कर्ण, प्राधेय, बर्बर, किरात, पारद, पाण्ड्य, पारशव, कल, धूर्तक, हैमगिरिक, सिन्धु, कालक, वैरत, सौराष्ट्र, दरद, द्राविड़, महार्णव—ये देश कूर्मभगवान्‌के दक्षिण चरणमें स्थित हैं। स्वाती, विशाखा और अनुराधा नक्षत्र भी वहीं हैं। मणिमेघ, क्षुरार्द्रि, खञ्जन, अस्तगिरि, अपरान्तिक, हैहय, शान्तिक, विप्रशस्तक, कोङ्कण, पञ्चनद, वमन, अवर, तारक्षुर, अङ्गतक, शर्कर, शाल्मवेश्मक, गुरुस्वर, फाल्गुनकद वेणुमतीनिवासी, फाल्गुलुक, घोर, गुरुह, चकल, एकेक्षण, वाजिकेश, दीर्घग्रीव, सुचूलिक तथा अश्वकेश—ये देश भगवान् कच्छपके पुच्छभागमें स्थित हैं। वहीं ज्येष्ठा, मूल और पूर्वाषाढा नक्षत्र भी हैं। माण्डव्य, चण्डखार, अश्मक, ललन, कुशात्त, लडह, स्त्रीवाह्य, बालिक, नृसिंह, वेणुमतीवासी, बालावस्थ, धर्मबद्ध, उलूक तथा ऊरुर्भनिवासी मनुष्य भगवान् कूर्मके बायें चरणमें स्थित हैं। उत्तराषाढा, श्रवण और धनिष्ठाकी भी वहीं स्थिति है। कैलास, हिमवान्, धनुष्मान्, वसुमान्, क्रौञ्च, कुरुवक, क्षुद्रवीणा, रसालय, भोगप्रस्थ, यामुन, अन्तर्द्धीप, त्रिगर्त, अग्नीज्य, अर्दन, अधमुख, चिञ्चिड, केशधारी, दासेरक, वाटधान, शवधान, पुष्कल, अधम, कैरात, तक्षशिलाश्रय, अम्वाल, मालव, मद्र, वेणुक, बर्दन्तिक, पिङ्गल, मानकलह, हूण, कोहलक, माण्डव्य, भूतिसुवक, शातक, हेमतारक, यशोमत्य, गान्धार, स्वर, सागराणि, यौधेय, दासमेय, राजन्य, श्यामक तथा शेनधूर्त—ये कूर्मभगवान्‌की बायीं कुक्षिमें हैं। शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदा—ये तीन नक्षत्र भी वहीं हैं। किन्नरराज्य, पशुपाल, कीचक, काश्मीरक, अभिसारजन, दरद, अङ्गण, कुरट, अन्नदारक, एकपाद, खश, घोष, स्वर्ग, भौम, अनवद्य, यवन, हिङ्ग, चोरप्रापरण, त्रिनेत्र, पौरव तथा गन्धर्व—ये कच्छपभगवान्‌के पूर्व-उत्तरवाले चरणके आश्रित हैं। रेवती, अश्विनी और भरणी भी वहीं हैं।

विप्रवर! उक्त देशोंमें क्रमश: ये ही नक्षत्र ऐसे हैं, जिनके कारण मनुष्योंको पीड़ा होती है अर्थात् जब इनके साथ दुष्ट ग्रहोंका योग होता है तो ये उनसे प्रभावित होकर प्रजाको कष्ट देते हैं और उत्तम ग्रहोंके योग होनेपर वे वहाँके मनुष्योंको

  • भारतवर्षमें भगवान् कूर्मकी स्थितिका वर्णन * १४७

अभ्युदयकी प्राप्ति कराते हैं। जिस नक्षत्रराशिका जो ग्रह स्वामी है, उसीके अशुभ भावमें रहनेपर उस देशके लोगोंको कष्ट होता है और वही ग्रह जब उच्च स्थानमें होता है तो शुभ फलोंकी प्राप्ति होती है। नक्षत्रों और ग्रहोंमें होनेवाला शुभाशुभ फल साधारणतया सब देशोंमें सभी मनुष्योंको प्राप्त होता है। यदि अपने नक्षत्र खराब हों अथवा जन्मके समय ग्रह अशुभ स्थानोंमें पड़े हों तो मनुष्यको कष्ट भोगना पड़ता है। यह बात प्रत्येकके लिये सामान्य रूपसे लागू होती है। इसी प्रकार यदि नक्षत्र और ग्रह अच्छे पड़े हों तो उसका फल शुभ होता है। पुण्यात्मा मनुष्यके ग्रह यदि अशुभ स्थानोंमें हों तो उन्हें द्रव्य, गोष्ठ, भृत्य, सुहृद्, पुत्र एवं भार्याकी भी हानि उठानी पड़ती है। यदि पुण्य थोड़ा है तो अपने शरीरपर भी भय आ सकता है और जिन्होंने अधिक मात्रामें पाप ही-पाप किये हैं, उन्हें तो सर्वत्र ही द्रव्य आदि तथा शरीर—सभीकी हानि उठानी पड़ती है। जो सर्वथा निष्पाप हैं, उन्हें ग्रह आदिसे कभी कहीं भी भय नहीं है। नक्षत्र और ग्रहसे प्राप्त शुभाशुभ फलको मनुष्य कभी तो अकेले भोगता है और कभी-कभी साधारणतया सम्पूर्ण दिशा, देश, जन-समुदाय, राजा अथवा पुत्रके साथ भोगता है। जब ग्रह दूषित नहीं होते तो मनुष्य परस्पर अपनी रक्षा करते हैं और ग्रहोंके दूषित हो जानेपर उन्हें शुभ फलोंसे वञ्चित होना पड़ता है। यहाँ कूर्मभगवान्‌के विग्रहमें जो नक्षत्रोंकी स्थिति बतायी गयी है, वे नक्षत्र उन-उन देशोंके लिये सामान्य रूपसे शुभ या अशुभ होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अपने देश-नक्षत्र तथा ग्रहजनित पीड़ाको उपस्थित देख उसको विधिपूर्वक शान्ति करे। साथ ही लोकवादोंका भी शमन करे। आकाशसे देवताओं तथा दैत्य आदिके जो शस्त्र पृथ्वीपर गिरते हैं, उन्हें लोकमें 'लोकवाद' कहा गया है। विद्वान् पुरुष उन सबकी शान्ति करे, लोकवादोंकी कभी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि उनकी शान्ति करनेसे ही उनके द्वारा प्राप्त होनेवाले भयका निवारण होता है। लोकवादों और ग्रहोंके अनुकूल होनेपर शुभ फलका उदय एवं पापका नाश होता है तथा प्रतिकूल होनेपर वे बुद्धि एवं धन आदिका भी नाश कर डालते हैं। अतः उनकी शान्तिके लिये द्रोहका त्याग तथा उपवास करे। देवस्थानों तथा देववृक्षोंको प्रणाम करना भी उत्तम माना गया है। जप, होम, दान और स्नान करे तथा क्रोधको त्याग दे। विद्वान् पुरुष किसीसे भी द्रोह न करे। सब प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखे। दुर्वचन न कहे और बढ़-बढ़कर बातें न बनाये।

इस प्रकार मैंने भारतवर्षमें स्थित भगवान् कूर्मके स्वरूपका वर्णन किया। वे अचिन्त्यात्मा नारायण हैं, उन्हींमें सम्पूर्ण जगत्‌की स्थिति है। उन्हींमें सम्पूर्ण देवता और नक्षत्र-मण्डल हैं। उन्हींके भीतर अग्नि, पृथ्वी और सोम हैं। मेष आदि तीन राशियाँ भगवान् कूर्मके मध्यभाग (कटिप्रदेश) में हैं। मिथुन और कर्क मुखमें स्थित हैं। पूर्व और दक्षिणवाले चरणमें कर्क तथा सिंह हैं। सिंह, कन्या और तुला—ये तीन राशियाँ उनकी कुक्षिमें हैं। तुला और वृश्चिक दक्षिण-पश्चिमवाले चरणमें हैं। पृष्ठभागमें वृश्चिक और धन स्थित हैं, वायव्यकोणवाले चरणमें धन, मकर और कुम्भ हैं। उत्तर कुक्षिमें कुम्भ और मीनकी स्थिति है तथा ईशानकोणवाले चरणमें मीन और मेष राशि हैं। ब्रह्मन्! भगवान् कूर्मके श्रीविग्रहमें सम्पूर्ण देश स्थित हैं, उन देशोंमें नक्षत्र हैं, नक्षत्रोंमें राशियाँ हैं और राशियोंमें ग्रहोंकी स्थिति है। अतः यह नक्षत्रोंमें पीड़ा होनेपर देशोंमें भी पीड़ा होती है, ऐसा जानना चाहिये और इसकी शान्तिके लिये विधिवत् स्नान करके दान-होम आदिका अनुष्ठान करना चाहिये।

१४४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

भद्राश्व आदि वर्षोंका संक्षिप्त वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं— मुने! इस प्रकार मैंने भारतवर्षका यथावत् वर्णन किया। इस देशमें ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चार युगों तथा चार वर्णोंकी व्यवस्था है। अब शैलराज देवकूटके पूर्व जो भद्राश्ववर्ष है, उसका वर्णन सुनो। वहाँ श्वेतपर्ण, नील, पर्वतश्रेष्ठ शैवाल, कौरङ्ग तथा पर्णशालाग्र—ये पाँच कुलपर्वत हैं। इनसे उत्पन्न हुए और भी बहुततेरे छोटे-छोटे पर्वत हैं। उनसे लगे हुए अनेक प्रकारके हजारों जनपद हैं, जिनके नाम कुमुदसंकाश, शुद्धसानु और सुमङ्गल आदि हैं। सीता, शङ्खावती, भद्रा तथा चक्रावर्ता आदि वहाँकी नदियाँ हैं, जिनके पाट बहुत विस्तृत हैं। उनका जल बहुत ठंडा होता है। भद्राश्ववर्षके सभी मनुष्य शङ्ख तथा शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान् होते हैं। उन्हें दिव्य पुरुषोंका संग प्राप्त होता है। वे बड़े पुण्यात्मा होते हैं। उनमें उत्तम-मध्यमका भेद नहीं होता, सब समान ही देखे जाते हैं। वे स्वभावतः सहनशीलता आदि आठ गुणोंसे युक्त होते हैं। वहाँ चार भुजाधारी भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे विराजमान रहते हैं। वे मस्तक, हृदय, लिङ्ग, चरण, हाथ और तीन नेत्रोंसे सुशोभित हैं। उन जगदीश्वरके अङ्गोंमें भी पूर्ववत् देशोंकी स्थिति जाननी चाहिये।

अब उससे पश्चिममें स्थित केतुमालवर्षका वर्णन सुनो। वहाँ विशाल, कम्बल, कृष्ण, जयन्त, हरिपर्वत, विशोक और वर्धमान—ये सात कुलपर्वत हैं। इनके सिवा और भी बहुत-से पर्वत हैं जहाँ लोग निवास करते हैं। उस देशमें मौलि, महाकाय, शाकपोत, करन्धक तथा अङ्गुल आदि सैकड़ों जनपद हैं। वहाँके लोग वङ्कुरूपाणा, रत्नकम्बला, अमोघा, कामिनी श्यामा तथा अन्यान्य सहस्रों नदियोंके जल पीते हैं। उस देशमें भगवान् श्रीहरि वराहरूपसे विराजमान हैं। वे अपने हाथ, पैर, मुख, हृदय, पीठ, पँसली आदि अङ्गोंमें बहुत-से देश एवं तीन-तीन नक्षत्र पूर्ववत् धारण करते हैं। वे नक्षत्र भी पहलेकी ही भाँति उन-उन देशोंके लिये शुभाशुभसूचक होते हैं।

मुनिश्रेष्ठ! यह मैंने केतुमालवर्षके विषयमें कुछ बातें बतायी हैं, अब मुझसे उत्तरकुरुवर्षका वर्णन सुनो। वहाँकी भूमि मणिमयी और वायु सुगन्धित तथा सर्वदा सुख देनेवाली होती है। जो लोग देवलोकसे च्युत होते हैं, वे ही उस देशमें जन्म लेते हैं। उस देशमें गिरिराज चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त—ये दो कुलपर्वत हैं। वहाँ भद्रसोमा नामवाली महानदी पवित्र एवं स्वच्छ जलकी धारा बहाती हुई निरन्तर बहती रहती है। इसके सिवा और भी हजारों नदियाँ बहती हैं। कुलपर्वतोंके अतिरिक्त और भी अनेक पर्वत हैं तथा सैकड़ों एवं सहस्रों वन हैं, जहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट नाना प्रकारके फल उपलब्ध होते हैं। उत्तरकुरुवर्षमें भी भगवान् श्रीकृष्ण पूर्वकी ओर सिर करके मत्स्यरूपमें विराजमान रहते हैं। उनके भिन्न भिन्न नौ अवयवोंमें तीन तीनके क्रमसे सभी नक्षत्र नौ भागोंमें विभक्त होकर स्थित हैं; इसी प्रकार वहाँके देश भी नौ भागोंमें विभक्त हैं। उस देशमें चन्द्रद्वीप और भद्रद्वीप नामक दो द्वीप हैं, जो समुद्रके भीतर स्थित हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने उत्तरकुरुवर्षका वर्णन किया; अब किम्पुरुष आदिका वर्णन सुनो।

वहाँके स्त्री-पुरुष रोग और शोकसे रहित होते हैं। उस वर्षमें प्लक्षखण्ड नामक एक मनोहर वन है, जो नन्दनवनके समान रमणीय जान पड़ता है। वहाँके पुरुष सदा उस वनके फलोंका रस पीते हैं। इससे उनकी जवानी सदा स्थिर रहती है और वहाँकी स्त्रियोंके शरीरसे कमलकी सुगन्ध आती है। किम्पुरुषवर्षके बाद अब हरिवर्षका

  • स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४५

परिचय दिया जाता है। वहाँके मनुष्य चाँदीके समान गौरवर्णके होते हैं। देवलोकसे च्युत होनेके कारण उन सबका स्वरूप देवताओंके ही समान होता है। हरिवर्षके सभी मनुष्य उत्तम इक्षुरसका पान करते हैं। वहाँ किसीको वृद्धावस्थाका कष्ट नहीं भोगना पड़ता। वे सब-के-सब अजर होते हैं। जबतक जीते हैं, नीरोग रहते हैं। अब जम्बूद्वीपके बीचमें स्थित इलावृतवर्षका वर्णन सुनो—इसे मेरुवर्ष भी कहा गया है। वहाँ सूर्य नहीं तपता और मनुष्योंको वृद्धावस्था नहीं सताती। चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और ग्रहोंकी किरणें वहाँ प्रकाशमें नहीं आतीं, क्योंकि स्वयं मेरुपर्वतकी प्रभा उन सबकी अपेक्षा बढ़कर होती है। वहाँके मनुष्य जामुनके फलका रस पीते और कमलों-सी कान्ति धारण करनेवाले, कमलके समान सुगन्धित एवं कमलदलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले होते हैं। इलावृतवर्षके मध्यमें मेरुपर्वतकी स्थिति है। वह शराव (पुरवे)-के समान नीचे पतला और ऊपर चौड़ा होता गया है। उस वर्षमें महागिरि मेरु ही एक पर्वत है और उसीसे इलावृतवर्षकी प्रसिद्धि हुई है। इसके बाद रम्यकवर्षका वर्णन करता हूँ, सुनो। वहाँ हरे पत्तोंसे सुशोभित एक ऊँचा बरगदका वृक्ष है। उसीके फलका रस पीकर वहाँके निवासी जीवन निर्वाह करते हैं। वे जरा और दुर्गन्धसे रहित तथा अत्यन्त निर्मल होते हैं। एक-दूसरेके प्रति प्रगाढ़ प्रेम ही उनका प्रधान गुण है। उसके उत्तरमें हिरण्मय नामक वर्ष है, जहाँ प्रचुर कमल-वनोंसे सुशोभित हिरण्यवती नामकी नदी बहती है। वहाँके मनुष्य बहुत बड़े बलवान्, तेजस्वी, यक्षके समान सुन्दर, महान् पराक्रमी, धनवान् तथा नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले होते हैं।


स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन

क्रौष्टुकि बोले— महामुने! आपने मेरे प्रश्नके अनुसार पृथ्वी, समुद्र आदिकी स्थिति तथा प्रमाण आदिका भलीभाँति वर्णन किया। अब मैं मन्वन्तरों, उनके स्वामियों, देवताओं, ऋषियों तथा मनुपुत्रोंका परिचय सुनना चाहता हूँ।

मार्कण्डेयजीने कहा— मुने! मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तरकी बातें तो बता दीं अब स्वारोचिष नामक दूसरे मन्वन्तरका वर्णन सुनो। वरुणा नदीके तटपर अरुणास्पद नामक नगरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनका रूप अश्विनीकुमारोंके समान मनोहर था। वे स्वभावसे मृदु, सदाचारी तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी थे। अतिथियोंके प्रति उनका सदा ही प्रेम बना रहता था। रातको घरपर आये हुए अभ्यागतोंको वे ठहरनेके लिये स्थान देते और उनके भोजन आदिकी भी व्यवस्था करते थे। उनके मनमें प्रायः यह विचार उठा करता था कि 'मैं रमणीय वन, उद्यान तथा भाँति-भाँतिके नगरोंसे सुशोभित सम्पूर्ण भूमण्डलको घूम-घूमकर देखूँ।' एक दिन उनके घरपर कोई अतिथि पधारे, जो नाना प्रकारकी ओषधियोंके प्रभावको जाननेवाले तथा मन्त्रविद्यामें प्रवीण थे। ब्राह्मणने श्रद्धापूर्ण हृदयसे अतिथिका स्वागत-सत्कार किया। बातचीतके प्रसङ्गमें अभ्यागतने ब्राह्मणसे अनेकों देशों, रमणीय नगरों, वनों, नदियों, पर्वतों और पुण्यतीर्थोंकी बातें बतायीं। यह सब सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले—'विप्रवर! आपने अनेक देश देखनेके कारण बहुत परिश्रम उठाया है तो भी न तो आप अत्यन्त बूढ़े हुए और न जवानीने ही आपका साथ छोड़ा। थोड़े ही समयमें आप सारी पृथ्वीपर कैसे भ्रमण कर लेते हैं?'

आगन्तुक ब्राह्मणने कहा— 'ब्रह्मन्! मन्त्र और ओषधियोंके प्रभावसे मेरी गति कहीं भी नहीं रुकती। मैं आधे दिनमें एक हजार योजन चलता हूँ।

१४६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

आगन्तुक ब्राह्मण बड़े विद्वान् थे; अतः गृहस्थ ब्राह्मणको उनकी बातोंपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे बड़े आदरके साथ बोले—'भगवन्! मुझपर भी कृपा कीजिये और अपने मन्त्रका प्रभाव दिखलाइये। इस पृथ्वीको देखनेकी मेरी बड़ी इच्छा है।' यह सुनकर उदारचित्त आगन्तुक ब्राह्मणने उन्हें पैरमें लगानेके लिये एक लेप दिया और वे जिस दिशाको जाना चाहते थे, उसे अपने मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया। वह लेप अपने पैरोंमें लगाकर ब्राह्मण देवता अनेकों झरनोंसे सुशोभित हिमालय पर्वतको देखनेके लिये गये। उन्होंने सोचा था कि 'मैं आधे दिनमें एक हजार योजन दूर जाऊँगा और शेष आधे दिनमें पुनः घर लौट आऊँगा।' वे हिमालयके शिखरपर पहुँच गये; किंतु शरीरमें अधिक थकावट नहीं हुई। उन्होंने वहाँकी पर्वतीय भूमिपर पैदल ही विचरना आरम्भ किया। बर्फपर चलनेके कारण उनके पैरोंमें लगा हुआ दिव्य औषधिका लेप धुल गया। इससे उनकी तीव्र-गति कुण्ठित हो गयी। अब वे इधर-उधर घूमकर हिमालयके अत्यन्त मनोहर शिखरोंका अवलोकन करने लगे। वहाँ सिद्ध और गन्धर्व रहते थे। किन्नरगण विहार करते थे तथा इधर-उधर देवता आदिके क्रीड़ा-विहारसे वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। सैकड़ों दिव्य अप्सराओंसे भरे हुए बर्फके मनोहर शिखरोंका दर्शन करनेसे ब्राह्मणदेवताको तृप्ति नहीं हुई। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया।

फिर दूसरे दिन आनेका विचार करके जब वे घर जानेको उद्यत हुए तो उन्हें अपने पैरोंकी गति कुण्ठित जान पड़ी। वे सोचने लगे—'अहो! यहाँ बर्फके पानीसे मेरे पैरका लेप घुल गया। इधर यह पर्वत अत्यन्त दुर्गम है और मैं अपने घरसे बहुत दूर चला आया हूँ। अब तो घरपर न पहुँच सकनेके कारण मेरे अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मकी हानि होना चाहती है। यहाँ रहकर वह सब कैसे करूँगा। यह तो मेरे ऊपर बहुत बड़ा संकट आ रहा है। इस अवस्थामें यदि मुझे किन्हीं तपस्वी महात्माका दर्शन हो जाता तो वे घर पहुँचनेके लिये मुझे कोई उपाय बतलाते।'

इस प्रकार विचार करते हुए ब्राह्मण देवता हिमालयपर विचरने लगे। चरणोंकी औषधिजनित शक्ति नष्ट हो जानेके कारण उन्हें बड़ी चिन्ता हो रही थी। इस प्रकार वहाँ घूमते हुए ब्राह्मणपर एक श्रेष्ठ अप्सराकी दृष्टि पड़ी, जो अपने मनोहर रूपके कारण बड़ी शोभा पा रही थी। उसका नाम वरुथिनी था। उन्हें देखते ही वरुथिनी कामदेवके वशीभूत हो गयी। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके प्रति तत्काल उसका प्रेम हो गया। वह सोचने लगी, 'ये कौन हैं? इनका रूप तो बड़ा ही मनोहर है। यदि ये मुझे ठुकरा न दें तो मेरा जन्म सफल हो जाय। मैंने बहुत-से देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व और पन्नगोंको देखा है; किन्तु एक भी इन महात्माके समान रूपवान् नहीं है। जिस प्रकार इनमें मेरा अनुराग हो गया है, उसी प्रकार यदि ये भी मुझमें अनुरक्त हो जायँ तो मेरा काम बन जाय। फिर तो मैं यह समझूँगी कि मैंने बहुत बड़े पुण्यका उपार्जन किया है।'

  • स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४७

इस प्रकार चिन्ता करती हुई वह दिव्यलोककी सुन्दरी युवती कामदेवसे व्याकुल हो अत्यन्त मनोहर रूप धारण किये उनके सामने उपस्थित हुई। सुन्दर रूपवाली वरूथिनीको देखकर ब्राह्मणकुमार स्वागतपूर्वक उसके पास गये और इस प्रकार बोले—'नूतन कमलके समान कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो ? किसकी कन्या हो ? और यहाँ क्या करती हो ? मैं ब्राह्मण हूँ और अरुणास्पद नगरसे यहाँ आया हूँ। मेरे पैरोंमें दिव्य लेप लगा हुआ था, जो बर्फके जलसे धुल गया है। इसीलिये मैं दूर-गमनकी शक्तिसे रहित होनेके कारण यहाँ आ गया हूँ।'

वरूथिनी बोली—ब्रह्मन् ! मैं अप्सरा हूँ। मेरा नाम वरूथिनी है। मैं इस रमणीय पर्वतपर ही सदा विचरण करती हूँ। आज आपके दर्शनसे कामदेवके वशीभूत हो गयी हूँ। बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ। इस समय सर्वथा आपके अधीन हूँ।

हानि न हो, वही मुझे बतलाओ। भद्रे ! नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका छूटना ब्राह्मणके लिये बहुत बड़ी हानि है; अतः इससे बचनेके लिये तुम हिमालयसे मेरा उद्धार करो। ब्राह्मणोंका परदेशमें रहना कदापि उचित नहीं है। देश देखनेकी उत्कण्ठाने ही मुझसे यह अपराध कराया है। श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने घरमें मौजूद रहे, तभी उसके समस्त कर्मोंकी सिद्धि होती है और जो इस प्रकार प्रवास करता है, उसके नित्य-नैमित्तिक कर्मोंकी हानि ही होती है; अतः यशस्विनि! अब अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे मैं सूर्यास्तके पहले ही अपने घरपर पहुँच जाऊँ।

वरूथिनी बोली—महाभाग ! ऐसा न कहिये। ऐसा दिन कभी न आये, जब कि आप मुझे छोड़कर अपने घर चले जायें। ब्राह्मणकुमार ! यहाँसे अधिक रमणीय स्वर्ग भी नहीं है। इसलिये हमलोग स्वर्गलोक छोड़कर यहाँ रहा करते हैं। आपने मेरे मनको हर लिया है। मैं कामदेवके वशमें हूँ; आपको सुन्दर हार, वस्त्र, आभूषण, भक्ष्य-भोज्य तथा अङ्गराग आदि सभी भोग-सामग्री दूँगी। आप यहाँ रहिये। यहाँ रहनेसे आपके शरीरमें कभी बुढ़ापा नहीं आयेगा; क्योंकि यह देवताओंकी भूमि है। यह यौवनकी पुष्टि करनेवाली है।

यों कहकर वह कमलनयनी अप्सरा बावली-सी हो गयी और 'मुझपर कृपा कीजिये' ऐसा मधुर वाणीमें कहती हुई सहसा अनुरागपूर्वक उनका आलिङ्गन करने लगी।

तब ब्राह्मणने कहा—अरी ओ दुष्टे! मेरे शरीरका स्पर्श न कर। जो तेरे ही जैसा हो, वैसे किसी अन्य पुरुषके पास चली जा। मैं तो किसी और भावसे प्रार्थना करता हूँ और तू और ही भावसे मेरे पास आती है। गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियों ही मेरे आराध्य देव हैं। अग्निशाला ही मेरे लिये रमणीय स्थान है तथा कुशासनसे सुशोभित

ब्राह्मणने कहा—कल्याणी ! मैं जिस उपायसे अपने घरपर जा सकूँ और मेरे समस्त नित्यकर्मोंकी

१४८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


वेदों ही मेरी प्रिया है। वरूथिनी! यदि ब्राह्मण भोगके लिये चेष्टा करे तो उसको वह चेष्टा अच्छी नहीं मानी जाती। परन्तु यदि वह नित्य-नैमित्तिक कर्मोंके पालनके लिये चेष्टा करता है तो वह इहलोकमें क्लेशयुक्त जान पड़नेपर भी परलोकमें उत्तम फल देनेवाली होती है।

वरूथिनी बोली—ब्रह्मन्! मैं वेदनासे मर रही हूँ। मेरी रक्षा करनेसे आपको परलोकमें पुण्यका ही फल मिलेगा और दूसरे जन्ममें भी अनेकानेक भोग प्राप्त होंगे। इस प्रकार मेरा मनोरथ पूर्ण करनेसे लोक-परलोक दोनों ही सधते हैं, दोनों ही आपको लाभ पहुँचानेमें सहायक होते हैं। यदि आप मेरी प्रार्थना ठुकरा देंगे तो मेरी मृत्यु होगी और आपको भी पाप लगेगा।

ब्राह्मणने कहा—वरूथिनी! मेरे गुरुजनोंने उपदेश दिया है कि परायी स्त्रीकी अभिलाषा कदापि न करे; अतः मैं तुझे नहीं चाहता। भले ही तू बिलखाया करे अथवा सूखकर दुबली हो जाय।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—यों कहकर उन महाभाग ब्राह्मणने पवित्र हो जलका आचमन किया और गार्हपत्य-अग्निको प्रणाम करके मन-ही-मन कहा—‘भगवन् अग्निदेव! आप ही सब कर्मोंकी सिद्धिके कारण हैं। आपसे ही आहवनीय और दक्षिणाग्निका प्रादुर्भाव हुआ है। आपको तृप्त करनेसे देवता वृष्टि करते और अन्न आदिकी वृद्धिमें कारण बनते हैं। अन्नसे ही सम्पूर्ण जगत्‌का जीवन-निर्वाह होता है और किससे नहीं। इस प्रकार आपसे ही जगत्‌की रक्षा होती है। इस सत्यके प्रभावसे मैं सूर्यास्त होनेके पहले ही अपने घर पहुँच जाऊँ। यदि कभी ठीक समयपर मैंने वैदिक कर्मोंका परित्याग न किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे मैं आज घर पहुँचकर डूबनेसे पहले ही सूर्यको देखूँ। यदि कभी मेरे मनमें पराये धन तथा परायी स्त्रीकी अभिलाषा न हुई हो तो मेरा यह मनोरथ सिद्ध हो जाय।’

ब्राह्मणकुमारके ऐसा कहनेपर उनके शरीरमें गार्हपत्य-अग्निने प्रवेश किया; फिर तो वे ज्वालाओंके बीचमें प्रकट हुए मूर्तिमान् अग्निदेवकी भाँति उस प्रदेशको प्रकाशित करने लगे। उधर उन तेजस्वी ब्राह्मणके प्रति उनकी ओर देखती हुई देवाङ्गनाका अनुराग और भी बढ़ गया। अग्निदेवके प्रवेश करनेपर वे ब्राह्मणकुमार जैसे आये थे, उसी प्रकार तुरंत वहाँसे चल दिये और एक ही क्षणमें घर पहुँचकर उन्होंने शास्त्रोक्त विधिसे सब कर्मोंका अनुष्ठान पूरा किया। उनके चले जानेके बाद उस सर्वाङ्गसुन्दरी अप्सराने लंबी-लंबी साँसें लेकर शेष दिन और रात्रि व्यतीत की। उसका हृदय ब्राह्मणके प्रति पूर्णरूपसे आसक्त हो गया था। वह बारंबार आहें भरती, हाहाकार करती, रोती और अपनेको मन्दभागिनी मानकर धिक्कारती थी। उस समय उसका मन आहार, विहार, सुरम्य वन तथा रमणीय कन्दराओंमें भी सुख नहीं पाता था।

मुने! कलि नामका एक गन्धर्व था, जो पहलेसे ही वरूथिनीमें आसक्त हो रहा था; किन्तु उस अप्सराने उसको फटकार दिया था। उस दिन

  • स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन * १४१

उसने वरूथिनीको विरहिणीकी अवस्थामें देखा तो मन-ही-मन विचार किया—‘क्या कारण है, जो आज वरूथिनी इस पर्वतपर लंबी साँसें खींचती हुई म्लान-मुखसे विचर रही है?’ इसका रहस्य जाननेके लिये कलिने उत्कण्ठापूर्वक बहुत देरतक ध्यान किया और समाधिके प्रभावसे उसने सब बातोंको भलीभाँति जान लिया। इसके बाद सोचा, ‘अब समय बितानेकी आवश्यकता नहीं। यह वरूथिनी एक मनुष्यपर आसक्त हुई है। उसका रूप धारण कर लेनेपर यह निश्चय ही मेरे साथ रमण करेगी, अतः इसी उपायको कार्यमें लाऊँगा।’

ऐसा निश्चय करके गन्धर्वने अपने प्रभावसे ब्राह्मणका रूप धारण किया और जहाँ वरूथिनी बैठी थी, उधर ही विचरण करने लगा। उसे देखकर उस सुन्दरीके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वह पास आकर बारंबार कहने लगी—‘ब्रह्मन्! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये। आपके त्याग देनेपर मैं अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो आपको अत्यन्त कष्टदायक पाप लगेगा और आपकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भी नष्ट हो जायेंगी। यदि आपने मुझे अपनाया तो मेरी जीवनरक्षासे होनेवाला धर्म आपको अवश्य प्राप्त होगा।’

कलि बोला—सुन्दरी! क्या करूँ, एक ओर तो मेरी धार्मिक क्रिया नष्ट हो रही है और दूसरी ओर तुम प्राण देनेकी बात कहती हो। इससे मैं संकटमें पड़ गया हूँ। अच्छा, इस समय मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करनेके लिये तुम तैयार रहो तो तुम्हारे साथ मेरा समागम हो सकता है, अन्यथा नहीं।

वरूथिनीने कहा—ब्रह्मन्! प्रसन्न होइये; आप जो कहेंगे, वही करूँगी। इस समय आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करना मेरा कर्तव्य है।

कलि बोला—सुन्दरी! सम्भोगके समय तुम आँखें बंद किये रहो, मेरी ओर दृष्टि न डालो तो मेरे साथ तुम्हारा संसर्ग हो सकता है।

वरूथिनीने कहा—ऐसा ही होगा। आपका कल्याण हो। आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही हो। मुझे इस समय सब प्रकारसे आपकी आज्ञाके अधीन रहना है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर वह गन्धर्व वरूथिनीके साथ पुष्पित काननोंसे सुशोभित पर्वतके मनोरम शिखरोंपर, सुन्दर सरोवरोंमें, रमणीय कन्दराओंमें, नदियोंके किनारे तथा अन्य मनोरम प्रदेशोंमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगा। सम्भोगके समय वरूथिनी अपनी आँखें बंद कर लेती और ब्राह्मणके तेजस्वी स्वरूपका चिन्तन किया करती थी। तत्पश्चात् समयानुसार ब्राह्मणके स्वरूपका ध्यान करते-करते उस अप्सराने गन्धर्वके वीर्यसे गर्भ धारण किया। वरूथिनीको गर्भिणी जानकर ब्राह्मणरूपधारी गन्धर्वने उसे आश्वासन दिया और प्रेमपूर्वक उससे विदा ले वह अपने घर चला गया। गर्भकी अवधि पूर्ण होनेपर प्रज्वलित अग्निकी भाँति तेजस्वी बालकका जन्म हुआ, मानो सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको