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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

लोग जो एक मूल द्रव्यको सबका कारण मान लेते हैं, यह अपने अधिकारसे आगे जाना है। यद्यपि उन्होंने प्रत्ययवादियोंके संवित्को बड़ा महत्त्व दिया है, फिर भी ये कहते हैं कि 'भूतवादकी कल्पना अधिक पट सकती है।' इस तरह वे संवित्का आधार भी मानते हैं और यह भी कहते हैं कि 'संवित्के बाहर कोई वस्तु नहीं हो सकती।' इस तरह भूत या आत्माके सम्बन्धमें हूमके समान यह भी अज्ञेयवादी हैं। इनका कहना है कि 'भौतिकवादके सम्बन्धमें जहाँतक व्याख्या हो, ठीक ही है। परंतु हमें तो व्यवहारके लिये प्राकृतिक नियमोंका ज्ञान भी पर्याप्त है।' हमें आम खानेसे काम है, पेड़ गिननेसे क्या लाभ ? अज्ञेय पदार्थ एक हो या अनेक, इसके बारेमें कुछ निश्चय कहा नहीं जा सकता।' कर्त्तव्यके सम्बन्धमें उसका कहना है कि 'हमें प्रकृतिसे ऊँचे उठना चाहिये, उसका अनुकरण नहीं करना चाहिये।' क्लीफॉर्डके अनुसार 'सर्व मानमद्रव्य ही सर्वत्र संसारमें फैला है। यही द्रव्यविकासद्वारा ऐन्द्रियक शरीरोंमें इकट्ठा होकर चेतना हो जाता है। मेरे मनसे भिन्न अन्य मनके द्वारा भी जो वस्तु उपलब्ध होती है, वही वस्तुकी वस्तुता है।' विलियम रीडका कहना है कि 'मनुष्यजाति एक व्यक्ति है। वह पूर्णताकी ओर जा रही है, वही ईश्वर है।' विकासवादियोंके मतानुसार 'विकासकी पराकाष्ठामें जब मनुष्यमें सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता होगी, तभी ईश्वर- कल्पनाकी बात पूरी होगी।' कहना न होगा कि 'इन जडवादियोंकी कल्पनाओंमें भी परस्पर महान् मतभेद है।' अनेकों ऐसे पदार्थोंको 'अज्ञेय' कहकर ही वे संतोप कर लेते हैं। डीन मैन्सलके अनुसार 'जब भूतद्रव्यके ही समझनेमें वैज्ञानिकोंको कठिनाई है, तब आध्यात्मिक द्रव्यमें कठिनाई होनेमात्रसे उसमें अविश्वास क्यों किया जाय ? जब किसी पदार्थके अस्तित्वके लिये प्रमाण अपेक्षित होता है, तब उसके अभावके लिये भी तो प्रमाण चाहिये ही । यह तो निश्चय ही है कि आधिभौतिक शास्त्रज्ञ भी एक अव्यक्त प्रकृतिको किसी न-किसी नामसे स्वीकार करते हैं और उसीसे अनेक प्रकारकी सृष्टि मानते हैं।' इस सम्बन्धमें लोकमान्य तिलकनें 'गीता-रहस्य' में लिखा है— 'हेकलकी विश्वकी पहेली' ( Riddle of the universe ) के अनुसार आधुनिक पदार्थ विज्ञानवादीकी दृष्टिमें कार्यके कोई भी गुण कारणके बाहरके गुणोंसे उत्पन्न नहीं होते। जब कारणको कार्यका स्वरूप प्राप्त होता है, तब उस कार्यमें रहनेवाले द्रव्यांश एवं कर्मशक्तिका कुछ भी नाश नहीं होता । पदार्थकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंके द्रव्यांश और कर्मशक्तिको जोड़कर वजन भी सदैव

१४२ मार्क्सवाद और रामराज्य एक-सा ही रहता है । न वह घटता है न बढ़ता है। यह बात प्रत्यक्ष प्रयोगसे सिद्ध है। 'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६) का ठीक यही अर्थ है। प्रथम अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञ प्रपञ्च सृष्टिके ९२ मूलतत्त्व मानते थे । परंतु अब उन्होंने यह माना कि 'यह मूलतत्त्व स्वयंसिद्ध नहीं । इनकी जड़में कोई एक ही तत्त्व है, उसीसे सूर्य, चन्द्र, तारागण, पृथ्वी आदि सृष्टि उत्पन्न हुई है। उस एक पदार्थको सांख्यानुसार 'प्रकृति' कहा जाता है। 'इन्द्रियोंके अगोचर, अव्यक्त, सूक्ष्म, अखण्डित एक ही निरवयव मूल द्रव्यसे व्यक्तकी सृष्टि होती है, इस सांख्यमतको ही पाश्चात्त्य भौतिकवादी भी मान गये हैं । हाँ, वे यह भी कहते हैं कि 'इस मूल द्रव्यकी शक्तिका क्रमशः विकास हो रहा है । पूर्वापर- क्रम छोड़कर अचानक निरर्थक कुछ भी निर्माण नहीं होता ।' इसी मतको 'उत्क्रान्तिवाद' या 'विकासवाद' कहा जाता है। तदनुसार सूर्यमालामे पहले कुछ एक ही सूक्ष्म द्रव्य था, उसकी गति अथवा उष्णताका परिणाम घटता गया । तब उक्त द्रव्यका अधिकाधिक सङ्कोच होने लगा और पृथ्वीसमेत सब ग्रह क्रमशः उत्पन्न हुए। अन्तमें जो शेष अंश बचा, वही सूर्य है। पृथ्वीका भी सूर्यके सदृश पहले एक उष्ण गोला था। ज्यों-ज्यों उष्णता कम होती गयी, त्यों-त्यों मूल द्रव्योंमेंसे ही कुछ द्रव्य पतले और कुछ घने हो गये । इस प्रकार पृथ्वीके ऊपरका भाग हवा और पानी तथा उसके नीचेका पृथ्वीका जड़ गोला—ये तीन पदार्थ बन गये । इन तीनोके मिश्रण अथवा संयोगसे सब सजीव एवं निर्जीव सृष्टि उत्पन्न हुई । डार्विन आदिकोके अनुसार 'छोटे कीडोसे-ही विकास होते- होते मनुष्य बन गया।' यह पीछे कहा जा चुका है कि 'इन लोगोने चेतनाको भी जड़का ही परिणाम माना है।' परंतु कान्ट आदिका कथन है कि 'सृष्टिका ज्ञान आत्माके एकीकरण व्यापारका फल है । इसलिये आत्माको स्वतन्त्र पदार्थ मानना ही चाहिये।' बाह्य सृष्टिके ज्ञाता आत्माको स्वयं भी बाह्य सृष्टिका एक भाग मानना वैसा ही अनङ्गत है, जैसा कि किसीका अपने कंधेपर स्वयं ही बैठ सकना । सांख्योके सत्त्व, रज, तमके स्थानमे भौतिकवादी गति, उष्णता और आकर्षणशक्ति मानते हैं। पदार्थ एक होनेपर भी उसमें गुणभेदके बिना विचित्र सृष्टि उपपन्न नहीं हो सकती, अतः उस प्रकृतिमे सत्त्व, रज, तम गुण माने जाते हैं। हेकलका कहना है कि 'मन, बुद्धि, आत्मा आदि शरीरके ही धर्म हैं । अतएव जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरण-शक्ति नष्ट हो जाती है और वह पागल हो जाता है। सिरपर चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई भाग बिगड जाता है, तब भी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है । मस्तिष्कके साथ ही मनोधर्म और आत्मा भी समाप्त है। इस दृष्टिमे फिर केवल जड़

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अव्यक्त ही रह जाता है। मूल प्रकृतिकी शक्ति ही धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। उसीमें चैतन्य या आत्माका स्वरूप व्यक्त होता है।' सत्कार्यवादके समान ही इस प्रकृतिके भी कुछ नियम हे। उन्हीं नियमोके अनुसार जड जगत् और मनुष्य भी उत्पन्न होते हैं। प्रकृति जैसा कराती है वैसा ही सबको करना पड़ता है। संसार एक कारागार है, सब प्राणी उसके कैदी हैं और पदार्थोंके गुण-धर्म ही बेड़ियाँ हैं। उनका तोड़ना असम्भव है। इसीलिये, हेकलके मतानुसार 'एक अव्यक्त प्रकृति ही सब कुछ है।' यही उसका 'जडाद्वैतवाद' है। सांख्यमता- नुसार 'प्रकृतिका कार्य जड प्रपञ्च ही है, चेतन प्रकृतिसे भिन्न है।' जड सामग्रीसे ही सब वस्तुओकी उत्पत्ति हो जाती है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। सांख्यवादी भी स्वतन्त्र, व्यापक, असंग, चेतन, आत्मा और प्रकृतिके समन्वयसे ही सृष्टिप्रपञ्च मानते हैं। इसी सम्बन्धमें सांख्योंका 'पङ्गु- अंधन्याय'* प्रसिद्ध है। जैसे पङ्गु चल नहीं सकता ओर अंधा देख नहीं सकता, दोनोंका जब मेल होता है, पङ्गुको कंधेपर चढ़ाकर जब अंधेके पैर और पङ्गुके आँखका सहयोग मिलता है, तब गमनादि क्रिया सम्पन्न होती है। वैसे ही अंधेके तुल्य अचेतन प्रकृति ओर पङ्गुके तुल्य गति-शक्तिरहित चेतन पुरुष, इन दोनोंके सम्बन्धसे सृष्टि-प्रपञ्च चलता है। व्यवहारमें अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन अश्वके आधारपर ही होती है। यान्त्रिक प्रवृत्तियोंके भी मूलमें संयोजक होता है। एकत्रित सामग्री कर्ता नही बन जाती। संघात या समुदायमात्रमें कर्तृत्व नहीं हो सकता। क्षेत्ररूपी कारखानेमें मनुष्य बुद्धि, मन आदि नौकरोंसे काम करानेवाला कौन है ? एकत्रित सामग्रियाँ भी विलग न हो जायें, एतदर्थ उन्हे धागासे बाँधना भी पड़ता है, अन्यथा वे कभी भी अलग हो जायेंगी, अतः कोई नियामक चेतन परमावश्यक है।' यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'समुच्चयका गुण चैतन्य है', क्योंकि जिसमें जो वस्तु असत् है, वह कभी भी सत् नहीं हो सकती - 'नासतो विद्यते भावः' फिर भी समुच्चयोत्पन्न गुणकी अपेक्षा भौतिकवादी समुच्चयको ही चेतन आत्मा मानते हैं। परंतु जब अग्निके बदले लकड़ी, विद्युत्के स्थानपर मेघ ओर आकर्षणशक्तिके बदले पृथ्वी आदि नहीं ग्रहण किये जाते, तब यह क्यो न माना जाय कि देहादि संघातका, मन, बुद्धि आदिका व्यवस्थापूर्वक काम चलता रहे, एतदर्थ संघातसे भिन्न किसी शक्तिका अंगीकार करना आवश्यक है। भले ही उस शक्तिका अधिष्ठान अगम्य हो, परंतु उसका अपलाप नहीं किया जा सकता। 'संघातका ज्ञान स्वयं संघात ही कर लेता है।' यह कहना तो सर्वथा असङ्गत ही है। अतः संघात जिसके लिये प्रवृत्त होता है, जो संघातका ज्ञाता या प्रवर्तक होता है, उसे मानना आवश्यक है।

  • देखिये सांख्यदर्शन ( ३ । ५ ) तथा सांख्यकारिका ( २१ ) ।

१४४ मार्क्सवाद और रामराज्य कॉम्टका कहना है कि 'बुद्धिके व्यापारोका सूक्ष्म निरीक्षण करनेपर मालूम होता है कि मन, बुद्धि, अहङ्कार, चेतना ये सभी शरीर-क्षेत्रके गुण हैं। उनका प्रवर्त्तक आत्मा इनसे भिन्न स्वतन्त्र और इनसे परे है। किसी भी जीवशास्त्रके तर्क या विज्ञान अथवा यान्त्रिक साधनोसे इसके विरुद्ध कोई प्रमाण नही मिलता। विकासवादी अधिक-से-अधिक आत्मा या परमेश्वरको अज्ञेय कहते हैं। वेदान्त- शास्त्रमे भी समाधि-सम्पन्न ऋतम्भरा प्रज्ञाके बिना सर्वसाधारणके लिये आत्माको अज्ञेय कहा गया है। दृश्यका प्रकाश द्रष्टासे होता है। दृश्यसे द्रष्टाका प्रकाश नहीं होता। इसीलिये देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहङ्कार आदि सभी प्रपञ्चका भासक सर्वद्रष्टा आत्मा है। इन दृश्योके द्वारा उसका प्रकाश नही हो सकता, इसीलिये उसे अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य माना जाता है। फिर भी वही सबका अधिष्ठान एवं सबका भासक, स्वयंप्रकाश है। अतः उसके सम्बन्धमें संशय, भ्रम एवं अज्ञान हो ही नहीं सकते; क्योकि जिसके द्वारा संशय, भ्रम तथा अज्ञानका भी भान होता है, उसकी सत्ताका अपलाप कौन कर सकता है?— येनेदं सर्वं विजानते तं केन विजानीयात्। (बृहदा० उप० २।४।१४) —अर्थात् जिसके द्वारा सब वस्तुओको जाना जाता है, उसे किससे जाना जाय। नियमपूर्वक प्रवृत्तिके लिये ही प्रकृतिका प्रथम परिणाम महत्तत्त्व माना जाता है। समष्टिबुद्धि ही महत्तत्त्व है, परंतु चैतन्य-सम्पर्कके बिना जड प्रकृतिके परिणाम बुद्धितत्त्व या महत्तत्त्वसे भी नियमित-प्रवृत्तिका उपपादन नही हो सकता। ईश्वर एवं आत्माके सम्बन्धमें विकासवादियोका मत अस्पष्ट, अधूरा एवं भ्रान्तिपूर्ण है। 'संघर्ष एवं स्वार्थ ही जीवनका सार है। परोपकारका भी अन्तिम लक्ष्य स्वार्थ ही है' यह मत भी विकासवादियोका असंगत ही है। कहा जा चुका है कि कितने ही लोग परोपकारको ही स्वार्थ समझते हैं। व्याघ्र-जैसे हिंस्र प्राणी भी अपने बच्चोके लिये प्राणतक देते देखे जाते हैं। डॉक्टर गेडोके मतानुसार 'पानीकी मछलियोका मनुष्यतक विकास होनेमें ५३७५००० पीढियाँ बीत गयीं।' कई लोग इससे भी अधिक संख्याका अनुमान लगाते हैं। मछलियोसे पहलेकी संख्या यदि गिनी जाय, तब तो पीढियोंकी सख्या और भी बढ जाती है। सूक्ष्म जन्तुओका ही मछलियो, कछुओ, पक्षियों, बदरो तथा मनुष्योके रूपमें परिणाम बतलानेवाले दार्शनिक अनेक चित्रों और फोटो आदिद्वारा विकासक्रमको प्रत्यक्ष-सा दिखला देते हैं। परंतु यदि यह विकासक्रम वास्तविक है, तो फिर बंदरोंसे बंदरोंकी, मनुष्योसे मनुष्योंकी, पक्षियोंसे पक्षियोंकी और मछलियोसे मछलियोकी उत्पत्तिका नियम क्यो उपलब्ध हो रहा है? आज भी बंदरोंकी परम्परामे मनुष्योका जन्म होता हुआ

दिखायी क्यों नहीं देता ? किञ्चिन्मात्र सादृश्यसे अन्यत्र अन्य रूपमें परिणाम नहीं सिद्ध किया जा सकता । कितने ही पौधे समान ढङ्गके होते हुए भी गुणोंमें भिन्न हैं। कोई जहर है तो कोई अमृत है । समान वंशोंमे भी हय, अश्व, अर्वा आदिमें जातिभेद माना जाता है । मनुष्योंमें भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि जातिभेद मान्य होता है। वृक्षों, पशुओं तथा जलचर जन्तुओंमें अवान्तर बहुत अधिक समानता होनेपर भी उनमें जाति, गुण आदिका भेद होता है। शुभ-अशुभ कर्मोंके अनुसार ही जातिभेद शास्त्रीय दृष्टिसे मान्य है । जाति, आयु, भोगका आरम्भक कर्म ही प्रारब्धकर्म माना जाता है । कार्यकी विलक्षणता कारणकी विलक्षणतासे ही सम्भव होती है। अतः कर्म-वैचित्र्यसे जाति-वैचित्र्यकी मान्यता संगत है । विभिन्न ढङ्गके बीजोंसे विभिन्न ढङ्गके अङ्कुरोंकी उत्पत्ति होती है । विभिन्न प्राणियोंके सजातीय शुक्र-शोणितसे सजातीय प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । विजातीय प्राणियोंसे विजातीयोंकी उत्पत्ति अदृष्टचर है । विजातीय शुक्र-शोणितोंसे भी सन्तानोत्पत्तिमे बाधा पड़ती है । फिर इस दृष्ट कार्य-कारणभावको छोड़कर अदृष्टकी कल्पना सर्वथा अपार्थक है । जब भिन्न-भिन्न परम्पराएँ उपलब्ध हैं ही, तब बीजरूपसे तथा शक्तिरूपसे उन्हे स्वतन्त्र ही क्यों न माना जाय ? निम्बसे आम्रकी उत्पत्ति नहीं होती, बालूसे तैल नहीं निकलता तथा अश्वसे महिषकी उत्पत्ति नहीं होती क्योकि निम्ब आदिमें आम्र आदिका शक्तिरूपसे अस्तित्व नहीं है । 'असत्‌की उत्पत्ति और सत्‌का विनाश नहीं होता,' यह सिद्धान्त दृढ है । इसीलिये बन्दरोंसे मनुष्योंकी उत्पत्ति दृष्ट नहीं होती । इस तरह एक मूल प्रकृति या कारणब्रह्मसे ही समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है । सर्वकार्यानुगुण शक्तियाँ कारणमे रहती हैं । राजनीति के सम्बन्धमें भी विकासवादियोंकी ऐसी ही कल्पनाएँ हैं । स्पेंसरका यह भी कहना है कि 'गरीबी एव निर्बलता भी प्राकृतिक है । जो योग्य होता है, वही जीवित रहता है । जो परिस्थितिके अनुकूल अपने-आपको' नहीं बना सकते, ऐसे प्राणी मर जाते हैं । उसी तरह जो व्यक्ति वैज्ञानिक परिवर्तनके साथ अपनेको परिवर्तित नहीं कर सकता और विपरीत परिस्थितिमे नहीं रख सकता, वही गरीब होता है । उसके सुधारमें शासनको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये ।' इसके मतानुसार 'यदि कोई अध्यापक उष्णता न सह सकनेके कारण मूर्च्छित हो गया हो तो विद्यार्थियोंको उसे वैसे ही मूर्च्छित छोडकर चल देना चाहिये और उसे स्वयं परिस्थितिसे मुकाविला करनेके लिये छोड़ देना चाहिये ।' विज्ञान या साइन्समे भी पर्याप्त मतभेद ह । डार्विन, हेकल आदिके समयके प्राचीन साइन्सने आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म आदिके सम्बन्धमें बहुत-सी उल्टी मा० रा० १०-

१४६ मार्क्सवाद और रामराज्य बातें कही, परंतु सत्यकी खोज करनेवाले वैज्ञानिकोकी खोज निरन्तर चल ही रही है। लगभग अर्धशताब्दीसे तो विज्ञानने ही प्राणिविज्ञान-सिद्धान्तमें पर्याप्त रद्दो-बदल कर दिया । विकासवाद तो वस्तुतः खण्डित ही हो गया, किंतु स्वेच्छाचारियोंके लिये आत्मा, ईश्वर, कर्मफल, पुनर्जन्म आदि जहरके समान कडुए प्रतीत होते हैं । अतः वे लोग अब भी उसी जड़वाद विकासवादकी रट लगा रहे हैं, क्योंकि विकासवादमें ईश्वर; धर्म आदिसे छुट्टी मिल जाती है । अतः जो वस्तु वैज्ञानिकोंकी दृष्टिसे भी गलत सिद्ध हो चुकी, उसी विकासवाद— जड़वादके पीछे उच्छृङ्खल लोग पड़े हुए हैं । ‘साइंस ऐण्ड रिलीजन’ ( धर्म एव विज्ञान ) पुस्तकमें सर ओलिवर जोजेफ लाज एफ० आर० एस० डी० एस-सी०, एल्-एल्० डी०, प्रो० जॉन एम्ब्रोज, प्रो० डब्ल्यू० बी० बाट्मली, प्रो० एडवर्ड हल, जॉन एलन हार्कर, प्रो० जर्मन सिम्स उडहेड तथा प्रो० सिल्वेनिस फिलिप्स थॉम्पसन—इन सात प्रसिद्ध वैज्ञानिकोके मन्तव्योंका उल्लेख है । इस पुस्तकमे ईश्वर, जीव, धर्म एव विकासके सम्बन्धमें डार्विन आदिके मतका खण्डनकर आस्तिक पक्षका समर्थन किया गया है । वर्तमान वैज्ञानिक प्राचीन वैज्ञानिकोको ‘पुराना’ कहकर उनके मतकी उपेक्षा करते हैं। प्रो० बाट्मली कहते हैं कि ‘हेकलका प्राचीन भौतिकवाद वर्तमान युगसे बिल्कुल दूर है। हेकलकी ‘दि रिड्ल आफ युनिवर्स’ का उत्तर ‘रद्दी विचार एवं नूतन उत्तर’ ( दि ओल्ड रिड्ल एण्ड न्यूएस्ट आसर ) पुस्तकमे दिया गया है । उस पुस्तकमें यह भी कहा गया है कि ‘नवीन वैज्ञानिक पहलेकी अधी प्रकृतिके हाथमें न रहकर प्रकृतिको अपने हाथमे रखनेकी शिक्षा देते हैं । विकासको मनमाना नहीं, प्रत्युत नियमबद्ध होकर कार्य करनेवाला बतलाते हैं । विकासके द्वारा परमात्माका दर्शन करते हैं । डार्विन, हक्सले, हेकल आदिके समयका संसार केवल प्राकृतिक था, परंतु अबके वैज्ञानिकोको सर्वज्ञ परमेश्वर भी स्वीकृत है। डार्विनकी प्रकृति भी अब ईश्वरसे नियन्त्रित है। साइकोलाजी ( मनोविज्ञान ), फ्रीनालोजी ( मस्तिष्क.शास्त्र ) और स्पिरिचुअलिज्म ( आधुनिक परलोकवाद ) के पण्डित जीवका अस्तित्व एवं उसका जन्मान्तर भी स्वीकृत करते हैं ।’ इस तरह कर्मोद्वारा जीवोंकी अवस्था बदलती है । मनमानी प्रकृति मक्खीसे चिड़िया और चिड़ियासे साँप नहीं बना सकती । सर ओलिवर लाजका कहना है कि ‘विकास तो कुड्मल ( कलिका ) से पुष्प एव बीजसे अंकुर बनानेवाला निश्चित नियम है। नवीन विज्ञानके अनुसार कई प्राणी ऐसे पाये गये हैं, जिन्होंने अपने आदि जन्मसे लेकर अबतक अपना रूप बिल्कुल नहीं बदला । यही ‘स्थिर शरीरवाले’ कहे जाते हैं । हेकल आदिके अनुसार

विकासवाद १८७ मनुष्यको हुए ८ लाख २० हजार वर्ष हुए। इसी बीच उसने इतनी उन्नति की। पर मि० जॉन टी० रोडको नेवादा में एक ६० लाख वर्षका पुराना जूतेका तला पत्थरकी दशामें मिला, तबसे तो विकासवाद सर्वथा ही धराशायी हो गया। पृथिवीकी आयु अबतक जितने भी प्रकारोंसे सिद्ध की गयी, उनमेंसे कोई भी प्रकार इस जूतेके कारण विकासवादकी सब कड़ियोंको उपपन्न करनेमें समर्थ नहीं है। अमीबासे लेकर मनुष्यतक न जाने कितने कड़ियाँ ह, यदि एक-एक कड़ी करोड़ वर्ष ले, तो ज्यादा-से-ज्यादा पृथ्वी कितनी पुरानी हो सकती है, उसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। अभी हालमें यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि 'मनुष्योंका विकास बंदरोंसे नहीं हुआ, प्रत्युत बंदरोंका जन्म मनुष्योंसे हुआ है।' इन वैज्ञानिकोंका कहना है कि 'पूर्वकालके मनुष्योंने ज्ञान- विज्ञानमे बहुत उन्नति की थी; इसलिये उनके सिर कमजोर हो गये थे। कुछ दिनोंके बाद वे असभ्य जंगली हो गये। उनमेंसे कुछ वनमानुष और कुछ बंदर बन गये।' ये नवीन वैज्ञानिक पुराने वैज्ञानिकोसे कहीं अधिक सूक्ष्मदर्शी हैं। इन्होंने अपने तजुर्वेसे पुराने ज्ञानोंमें अधिक वृद्धि की है। अतः परिस्थिति संयोग या इत्तिफाकके अनुसार नहीं, किंतु कमोंके अनुसार ईश्वराज्ञानुसार ही प्रकृति जीवोंके शरीरोंको विकसित करती है। जैसे बीजसे वृक्ष, उसीसे फलका विकास होता है, वैसे ईश्वरीय नियमानुसार ही सब विकास ठीक हैं। विकासवादियोंके मतानुसार—"प्राकृतिक पदार्थोंका मूल कारण 'ईथर' है। उसीकी कल्पना और तरंगावलीसे विद्युत्, प्रकाश, शब्द और गर्मी उत्पन्न होते हैं। उसीके अति सूक्ष्म कणोंको 'इलैक्ट्रोन' कहते हैं। इनके ही संघातसे विद्युत् बनती है। यही शक्तिके रूपसे स्थूल आकारमें 'मैटर' कहलाती है। मैटरकी विरलदशाको 'गैस', तरल दशाको 'लिक्विड' तथा ठोस दशाको 'सॉलिड' कहते हैं। ईथरसे उत्पन्न ये पदार्थ घनीभूत होकर और आकर्षण- विकर्षणके नियमसे चक्राकारगतिमे हो जाते हैं। कुछ समयके बाद वही चक्र सूर्य बन जाता है। सूर्यमें गर्मी तथा गतिके कारण चक्कर पड़ जाते हैं। उसके कुछ अंग अलग होकर दूसरे ग्रह बन जाते हैं। उन ग्रहोंसे उपग्रह बनते हैं। इसी प्रकारके ग्रहोंमेसे हमारी पृथ्वी एक ग्रह है। यह पह्ले गर्म थी, फिर धीरे-धीरे ठंढी हुई। उसीसे भाप, बादल, पानी, समुद्र, भूमि एवं जीव पैदा हुए। वनस्पति एवं जन्तुओंके भी पहले चेतनता उत्पन्न हुई। उसीकी एक शाखा एक कोष्ठधारी 'अमीबा' बन गयी। अमीबा इतने बढे कि उन्हें खाने पीनेकी वस्तुओंकी दिक्कत होने लगी। उन्हींकी वे संतानें, जो शारीरिक प्रयत्न तथा मानसिक अभ्यासमें बलवान् थीं, जीवन संग्राममें बच गयीं। वे फिर बढी और भोजनके लिये सग्राम जारी रहा। योग्य बचे, अयोग्य मारे गये।

बचे हुए अमीवा पहलोसे कुछ भिन्न प्रकारके थे । इनमे भी वही सघर्ष चला । मरते-बचते परिस्थितिके अनुमार आकार-प्रकार बदलते-बदलते मछली, मेढक, सॉप, पक्षी, गाय, बैल, वंदर, वनमानुष और मनुष्यकी उत्पत्ति हुई । “सब प्राणियोका एक ही तत्त्वसे बनना, सबमें जीवन और सतति धारण करनेवाले समान अवयवोंका होना सिद्ध करता है कि सब एक ही मूलयन्त्रके उसी प्रकार सुधरे हुए रूप हैं, जिस प्रकार आरम्भकी साइकिल भद्दे ढगकी थी, उसमें सुधार होते-होते आजकी साइकिल बन गयी । अबतककी सभी साइकिलों- को एक कतारमे रखे तो पता लगेगा कि एकहीके ये सब सुधरे हुए रूप हैं । उसी प्रकार सभी प्राणी 'अमीबा'के सुधरे हुए रूप हैं । जैसे तीन पहिये और दो पहियेकी मोटर दो वस्तुएँ नहीं, वैसे ही बिना पैरका सॉप और सैकडो पैरवाला कनखजूरा कोई दो वस्तु नहीं । पहलेका सुधारा हुआ रूप ही दूसरा है । पहले सादी फिर सकीर्ण, पहले बिना हड्डीवाली फिर हड्डीवाली, पहले जोड़ोवाली फिर सपाट रचनाका क्रम यान्त्रिक ही है । जमीन खोदनेसे भी यही क्रम मिलता है । सादी रचनावाले नीचेकी तहोंमें और क्लिष्ट रचनावाले हड्डीवाले ऊपरकी तहोंमें मिलते हैं । मनुष्य गर्भ पहले अमीबाकी तरह एक कोष्ठवाला, फिर मछलीके आकारका, फिर क्रमशः मण्डूक, सर्प एव पक्षीके आकारका होता है । फिर बदर- की शकलका होकर मनुष्य होता है । इस तरहसे भूगोलके प्राणियोकी शरीर-रचना, यत्र-तत्र प्राप्त हड्डियोंकी रचना तथा विभिन्न देशोंमें स्थित प्राणियोकी शरीर-रचना- की तुलना करनेसे यही प्रतीत होता है कि सब एक ही मौलिक यन्त्रके परिशोधित एव परिवर्धित स्वरूप हैं । कई स्त्रियोंके चार या आठ स्तन होते हैं, कई मनुष्योंके पूँछ होती है । इससे मालूम होता है कि मनुष्य भी उन योनियोसे होकर आया है, जिनमें अधिक स्तन एव पूँछ होते हैं । कान न हिला सकने और आँत उतरनेकी बीमारीसे प्रतीत होता है कि मनुष्यके ये अंग शक्तिहीन हो गये । कहीं एक ही प्राणीमें इन दो प्रकारके प्राणियों-जैसे अङ्ग पाये जाते हैं । चमगादड, उडती गिलहरी, लुप्त कडियोंके उत्तम निदर्शक और विकासके प्रमाण हैं ।” इस सम्बन्धमें कहना यह है कि यन्त्रोका विकास जैसे किसी चेतनकी बुद्धिका परिणाम है, वैसे ही विश्वका विकास भी किसी चेतन ईश्वरसे ही सम्भव है । भले साइकिलें एक ही यन्त्रके विकास हो, फिर भी मोटर, रेल, वायुयान तथा कारखानोंके यन्त्र, सब साइकिलके ही विकास नहीं । इसी तरह सॉपोके अवान्तर- भेद सॉपोंके विकास भले ही हों, परन्तु कनखजूरा, बड़ी गिजाया और छोटी गिजाई आदिका स्वतन्त्र ही अस्तित्व क्यो न माना जाय ? निराकार जीव कर्मवश विभिन्न योनियोसे होता हुआ मनुष्य-योनिमे आया, इसमें कोई मतभेद नही । किन्तु अमुक जीवित देहमें ही सब प्रकारके जीवित देह बने, यह कल्पना सर्वथा

विकासवाद १४९

निराधार है। कहा जाता है कि 'सम्पूर्ण संसार परिवर्तनका फल है।' किन्तु परिवर्तन या गति जड पदार्थका स्वाभाविक धर्म नहीं हो सकती। व्यवहारमे देखते हैं कि घडीमें गतिका परिवर्तन घडीका स्वाभाविक धर्म नही, बन्दूकद्वारा चलनेवाली गोलीकी गति स्वाभाविक नहीं है, घडी और गोली पहले गतिहीन थीं, अन्तमें भी गतिहीन होनेवाली हैं। बीचमें किसी चेतनद्वारा ही उनमें गति मिलती है। इस तरह संसारमें तेज, जल, किरण, वायु आदि सभी पदार्थोमे गति या परिवर्तन किसी चेतनमे ही मिलना चाहिये। घडी और गोलीकी गतिके तुल्य ही ससारकी गति भी न पहले थी, न अन्तमें रहेगी। उसे गति देनेवाला चेतन ईश्वर ही है। 'साइंस एण्ड रेलीजन'में प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० जे० एम्० फ्लेमिंगका कहना है कि 'साइन्सके स्वाध्यायसे हमें इस प्राकृतिक जगत्में तरकीब, योजना, धारणा और विचार दिखलायी पड़ते हैं। ये बाते इत्तिफाकसे अचानक नहीं आ गयीं। ये विचार चैतन्यकी सूचना देते हैं। यह संसार बिना विचारवान्के कभी नहीं बन सकता। महर्षिव्यासने भी उपनिषदोंके आधारपर शारीरक सूत्रमें कहा ही है कि जड प्रकृतिमें ईक्षण नहीं बन सकता, किंतु यह संसार ईक्षणपूर्वक ही हो सकता है— "ईक्षतेर्नाशब्दम्।" (ब्रह्मसूत्र १।१।५) कुछ विकासवादियोकी कल्पना है कि 'पृथ्वीपर गिरनेवाले तारकाओंके द्वारा जीवनका बीज हमारे यहाँ पहुँचा।' परंतु इसमे शंका यह होती है कि क्या प्रोटोप्लाज्ममें इतनी शक्ति है कि तारिकाओसे पृथ्वीपर पहुँचनेतक उनमें जीवन अवशिष्ट रह सकता होगा? दूसरी कल्पना यह है कि 'असंख्य वर्षोंके पहले अनुकूल स्थिति पानेपर जीवनका एकदम प्रादुर्भाव हुआ।' परंतु इसपर विकास- वादी ही कहते हैं कि 'जीवनका आरम्भ कब हुआ, कैसे हुआ, इसपर वैज्ञानिकों- को अबतक कुछ ज्ञात नहीं। इससे स्पष्ट है कि 'चैतन्य कैसे बनता है,' यह वैज्ञानिकोको मालूम नहीं। परंतु उनका विश्वास है कि 'वह है प्राकृतिक,' क्योंकि उनके मतमें चेतन प्रोटोप्लाज्म ही है। प्रोटोप्लाज्म, जो शहदकी भाँति तरल पदार्थ है, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बारह भौतिक पदार्थोंसे बना है, जो कि जड ही हैं। ये भौतिक पदार्थ 'एलेक्ट्रोन'के न्यूनाधिक मेलसे बनते हैं। एलेक्ट्रोन खण्ड-खण्ड है, अर्थात् ये सब पदार्थ परमाणुओंसे बने है, जीव भी प्राकृतिक परमाणुओंसे ही बना है।' हक्सलेके मतानुसार 'चेतन' पदार्थ दीपज्योति अथवा पानीके भँवरके तुल्य नित्य प्रतीत होनेपर भी प्रतिक्षण बदलने वाली व्यक्तियाँ ही हैं। नये-नये परमाणु मिलते जाते हैं, पुराने अलग होते रहते हैं, यह धारा निरन्तर बहती रहती है' इसलिये ज्ञान एवं चैतन्यका सिलसिला नहीं टूटता।

१५० मार्क्सवाद और रामराज्य नवीन विज्ञानके अनुसार 'प्रत्येक परमाणु कई एलेक्ट्रोनोसे बना होता है । एलेक्ट्रोन एक दूसरेसे चिपकते नहीं, प्रत्युत दूर-दूर रहते हैं। जिस प्रकार तारका- समूह दूर-दूर रहकर भी एक तारापिण्ड या सौर जगत् कहलाता है, उसी प्रकार अनेको एलेक्ट्रोनोसे बना हुआ 'एटम' भी है। इसी एटमसे उपर्युक्त बारह पदार्थ बनते हैं। इन्हीं बारह पदार्थोंसे ज्ञान, चैतन्य या आत्मा बना है। अतः वह भी परिवर्त्तनशील है।' वैज्ञानिकोके अनुसार परमाणुओंकी गति प्रति सेकेन्ड एक लाख मील है। यहाँ विचारणीय यह है कि जुदा-जुदा रहकर इतने वेगसे चलनेवाले परमाणु किस प्रकार अपना ज्ञान दूसरे परमाणुमें डालते हैं अथवा किस प्रकार ज्ञान एक परमाणुसे उड़कर दूसरे परमाणुमे जाता है और चैतन्य स्थिर रहता है ? बीसो वर्ष पढानेपर भी विद्यार्थी भूल जाता है, परंतु बिना किसी साधनके दूर-दूर स्थित परमाणु इतने वेगसे दौडते हुए अपना ज्ञान दूसरेमे फेककर चले जाते हैं और दूसरे उस ज्ञानको ले लेते हैं। यह कितनी आश्चर्यजनक और कितनी असंगत बात है ? दिसम्बर सन् १९२३ के 'चिल्ड्रेन्स न्यूज' पत्रमें प्रो० रिचर्ड की 'थर्टी इयर्स आफ साइकिकल रिसर्च' नामक पुस्तकका विज्ञापन छपा है । उसीमें पुस्तकका एक उद्धरण है कि 'पचास वर्षपूर्व भौतिक विज्ञानका यही रुख था कि जो बात भौतिक विज्ञानसे सिद्ध न हो, उसका अस्तित्व ही नहीं, वह ढोग है । किंतु आज ऐसे भी प्रमाण मिल रहे हैं कि भौतिक विज्ञानकी पहुँचके बाहर भी पदार्थोंका अस्तित्व है। ऐसे पदार्थोंको 'साइकिकल' कहते हैं। यह शब्द जीवके लिये व्यवहृत होता है। जीवात्माको अब कोई भी भौतिक नहीं कहना ।' डार्विनके सुपुत्र प्रो० जार्ज डार्विनने - १६अगस्त सन् १९०५ को दक्षिण अफ्रीकामें 'ब्रिटिश एसोसिएशन'के प्रधानकी हैसियतसे कहा है कि 'जीवनका रहस्य अब भी उतना ही गूढ है जितना कि पहले था।' प्रो० गेडिस कहते हैं कि 'कुछ प्रामाणिक विज्ञानवेत्ता, जो जीवके एक लोकसे दूसरे लोकमें आगमनकी कल्पनाको सन्तोषजनक मानते हैं, ऐसा भी मानते हैं कि जीव प्रकृतिकी भाँति अनादि है।' दूसरे एक विद्वान्का कहना है कि 'चेतनके प्रभाव बिना जड पदार्थोंमे चेतना आ ही नहीं सकती।' विज्ञानका यह नियम पृथ्वीके आकर्षण-नियमके समान अटल प्रतीत होता है। जबसे मनोविज्ञान, मस्तिष्कशास्त्र एव आत्मविद्याका अन्वेषण हुआ, तबसे जीव सम्बन्धी सभी शंकाएँ निवृत्त हो गयीं ।" मनोविज्ञानके एक विद्वान्का कहना है कि 'किसी भी जीवनकार्यकी संगति भौतिक नियमोमे स्पष्ट नहीं होती । आँसू या पसीना निकलनेके नियमोका भी स्पष्टीकरण अभीतक नहीं हो सका ।' मस्तिष्क-शास्त्रके जन्मदाता गॉलका

विकासवाद १५१

कहना है कि ‘मेरी रायमें एक ही निरवयव वस्तु है, जो देखती, सुनती, स्पर्श करती है, प्रेम, विचार एव स्मरण करती है, पर अपना कार्य करनेके लिये वह मस्तिष्कमें अनेक भौतिक साधन चाहती है।’ इससे वेदान्तके द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता आत्माका ही वर्णन मिलता-जुलता है। आत्मविद्याके प्रसिद्ध पण्डित सर ओलिवर लॉज लिखते हैं कि ‘एक बार आप इस बातको देखे कि अन्तःकरण बडी वस्तु है। वह इस मशीन (शरीर) से बाहरकी वस्तु है। ऐसा नहीं कि जब शरीर नष्ट होता है, तब वह अपना अस्तित्व खो देती है। हम जितने दिनोंतक पृथिवीपर रहते हैं, उतने ही दिनोंके लिये हमारा अस्तित्व परिमित नहीं। हम बिना शरीरके भी रह सकते हैं। हमारा अस्तित्व बना ही रहेगा। मै ऐसा क्यों कहता हूँ ? इसलिये कि ये सब बातें विज्ञानके आधारपर स्थित हैं। बहुतोंने अभी इसका अनुभव नहीं किया, पर यदि कोई तीस-चालीस वर्षतक अपनी आयु इस विषयमे लगाये, तभी वह यह कह सकनेका अधिकारी होगा कि अब मैं किसी स्थितिमें पहुँचा हूँ।’ इन बातोमे ज्ञात होगा कि जीवका स्वतन्त्र अस्तित्व विज्ञानसम्मत है। अब ईश्वर- नियन्त्रित प्रकृतिसे विकास उसी प्रकार मान्य है, जिस प्रकार कलीसे फूलका विकास होता है। जैसे कलीसे फूल ही होगा, भ्रमर नहीं, बीजसे वृक्ष ही होगा, मूँगा नहीं, वैसे ही ईश्वरीय नियमानुसार पदार्थोंका विकास होगा । यह टी० एच् हक्सलेके ‘एनीवर्सरी ऐडेस’ के इन वाक्योमे स्पष्ट है कि ‘प्रत्येक पशु और वनस्पतिकी सभी जातियोंमें कुछ विशेष प्राणी ऐसे होते हैं, जिनको मैं ‘स्थिर आकृति’ नाम देता हूँ, उनमे सृष्टिसे लेकर अबतक कोई विकार नहीं हुआ।’ मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्टेजका कहना है कि ‘जल-कृमियोंमें बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न रूपवाले जन्तु प्रतिदिन उत्पन्न होते हैं । इनके लिये यह आवश्यक नहीं कि वे एक दूसरेसे विकृत होकर उत्पन्न हो, प्रत्युत वे तो एक दूमरेसे अपेक्षारहित होकर एक ही समयमें अलग- अलग आकारके साथ उत्पन्न होते हैं । इससे क्रम-विकासका स्पष्टतया खण्डन हो जाता है। अनुभव भी यही है कि सिरमें मैल जमनेसे जुएँ साक्षात् उत्पन्न होती हैं। वे अनेक अन्य देह धारण करनेके बाद जुएँ नहीं बनतीं । खाटका खटमल मलिनतासे ज्यो-का-त्यो उत्पन्न होता है। मूत्रके कीडे समारके समस्त देशोमें एक ही आकारके उत्पन्न होते हैं।’ इन घटनाओसे सिद्ध होता है कि अमुक आकार प्राप्त करनेके लिये अनेक आकारोका चक्कर लगाना आवश्यक नहीं । जिस ईश्वरके द्वारा चन्द्र-सूर्य बनते हैं, जिससे अमीबा बनते हैं, उसीसे स्वतन्त्र अन्य शरीर भी बन सकते हैं ।

१५२ | मार्क्सवाद और रामराज्य


इसीलिये एक आधुनिक वैज्ञानिक अपनी ‘प्रिंसिपल्स ऑफ जुआलोजी’ ( प्राणिविज्ञानके सिद्धान्त ) पुस्तकमें लिखता है कि ‘पृथ्वीपर उत्पन्न बिना हड्डीके जन्तुओं और मनुष्यादि हड्डीवाले प्राणियोंमें एक समान ही उन्नति देखी जाती है, परन्तु इस समानताका यह अर्थ नहीं कि एक प्रकारके प्राणीसे दूसरे प्रकारके प्राणी विकसित हुए हैं । आदिम मत्स्य ही सर्पणशील प्राणियोंका पूर्वज नहीं और न मनुष्य ही अन्य स्तनधारियोंसे विकसित हुआ है । प्राणियोंकी शृङ्खला किसी अभौतिक तत्त्वसे सम्बन्ध रखती है, जिसने पृथ्वीपर अनेक प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि करके अन्तमे मनुष्यको बनाया है—‘ब्रह्मावलोकधिषणं सुदमाप देवः । ( श्रीमद्भा० ११ । ९ । २८ ) इसके अतिरिक्त परमेश्वरका अस्तित्व माननेपर प्रकृतिकी स्वतन्त्रताका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । फिर तो अनादिसिद्ध जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार उनके सुख-दुःखादि फल-भोगार्थ ही देहका निर्माण अपेक्षित होता है । सुख-दुःखकी न्यूनता-अधिकता देहकी बनावटपर निर्भर है । इस दशामें जिन प्राणियोंको उनके कर्मानुसार जैसा सुख-दुःख देना है, सीधे तदुपयोगी ही शरीरका निर्माण आवश्यक है । व्यर्थ असंख्य शरीरोंमें घुमा-फिराकर जीवको उस शरीरमे लाना परमात्माके लिये उचित नहीं । कर्मफलोंको भोगानेके लिये यदि किसी अपराधीको तीन मासकी कालकोठरीकी सजा देनी है, तो पुलिस उस व्यक्तिको वर्षों इधर-उधरकी हवालातोंमें भटकाती फिरे, यह न्याय नहीं । अतः ईश्वर एवं जीव-तत्त्व मान लेनेपर फिर क्रम-विकासका कोई भी स्थान नहीं रह जाता । विकास-सिद्धान्तकी मान्यता है कि ‘चेतनकोष्ठसे प्राणी बनता है । इन्हीं चेतनकोष्ठोंसे समस्त प्राणियोंकी रचना हुई । इन सब जीवित प्राणियोंमें तीन सामान्य बातें हैं—( १ ) सब प्राणियोंके शरीर एक ही सरल पदार्थोंसे बने हैं । पशु-पक्षियोंके शारीरिक तत्त्वोंमें कोई अन्तर नहीं । ( २ ) सब प्राणी अपनी क्षीण शक्ति फिरसे प्राप्त कर लेते हैं । प्रतिदिन काम करके श्रान्त होते हैं, विश्रामके अनन्तर पुनः ताजे हो जाते हैं । ( ३ ) यन्त्रोंकी भाँति सुधरते-सुधरते एक शरीरसे अन्य शरीरवाले होते हैं । सब प्राणियोंके आठ स्थान होते हैं—( १ ) पोषण—बाहरसे पदार्थ लेना, पचाना और सारे शरीरमे पहुँचाना, ( २ ) श्वासोच्छ्वास, ( ३ ) मलत्याग, ( ४ ) रक्तप्रसार, ( ५ ) प्रेरणा, ( ६ ) आधारस्थान ( जिससे शरीर सधारहता है ), ( ७ ) ज्ञानतन्तु (जिससे समस्त शरीरका हाल मालूम होता है ) और ( ८ ) प्रसव । इस तरह सब प्राणियोंके तत्त्व एक-से हैं और आठ स्थान भी एक-से होते है । किंतु ये सब बाते भारतकेलिये कोई नयी खोज नहीं हैं। यहाँका एक गँवार भी जानता है कि ‘पंच रचित यह अधम सरीरा ।’ जो जीते, खाते, काम करते तथा संतति उत्पन्न करते हैं, उनमें

आठ संस्थान होने ही चाहिये। क्या कोई ऐसा भी मूर्ख होगा जो समझेगा कि 'भोजन किया जाता है और मलत्याग न किया जायगा ?' नालेके पानीकी तरह रक्तका बहना, संतति उत्पन्न करना सभी दुनियाँको अवगत है । हाँ, विचारणीय यह है कि जिस प्रकार यन्त्र धीरे-धीरे सुधरता है, क्या उसी प्रकार प्राणी और-से-और हो जाता है । वस्तुतः यन्त्र मनुष्यकी परिमित बुद्धिसे बनता है; उसमें अनुभवके आधारपर कुशलता होती है, इसलिये आरम्भिक और अन्तिम रूपमें अन्तर पड जाता है, परन्तु सर्वज्ञ परमेश्वरकी बुद्धिकी रचना मनुष्य- बुद्धि-जैसी नहीं हो सकती ।

प्राणियोंके कर्मफलभोगार्थ परमेश्वर तदुचित देह बनाते हैं । जिसके जैसे कर्म, उसे वैसा ही सुख दुःख भोगना पड़ता है । उसके लिये उसी प्रकारका देह-निर्माण आवश्यक है । शरीरका बनाना यदि स्वतन्त्र प्रकृति या जीवके अधीन माना जाय तो यन्त्रका दृष्टान्त ठीक हो सकता है । पर यहाँ तो कर्मानुसार शरीर प्रदान करनेवाला ईश्वर है । अतः यन्त्रका दृष्टान्त व्यर्थ है । विकासवादीका कहना है कि 'वैज्ञानिकोंने अबतक कोई ऐसी रीति आविष्कृत नहीं की, जिससे इन परिवर्तनोंको वे परीक्षणोंद्वारा सिद्ध कर सकें; और न उनको अबतक यही ज्ञात हो सका कि इस प्रकारके परिवर्तनके नियम क्या हैं ? वैज्ञानिकोंको परिवर्तनके नियम मालूम नहीं । यह भी मालूम नहीं कि परिवर्तन कैसे होता है ? परिवर्तन होते हुए भी किसीने नहीं देखा । अमुक प्राणीका अमुक प्राणी बन गया, इसे किसीने नहीं देखा । आज किसीको भी बंदरसे मनुष्य बनते नहीं देखा जाता और मनुष्यके बाद मनुष्यसे दूसरा भी कोई प्राणी उत्पन्न होते नहीं दिखायी देता । ऐसी स्थितिमें परिवर्तन सिवा कल्पनाके और कुछ भी सिद्ध नहीं होता । विज्ञानके प्रखर पण्डित भी यही कहते हैं कि 'जीवकी श्रेणियो एवं जातियोंकी उत्पत्तिका रहस्य हमको ज्ञात नहीं ।' थॉम्पसनका कहना है कि 'हम नहीं जानते कि 'पृथ्वीपर जीवधारीकी उत्पत्ति कबसे हुई ?, दूसरा एक विद्वान् भी कहता है कि 'इस उजाड पृथ्वीपर प्राणीकी उत्पत्ति कैसे हुई, यह हम नहीं जानते ।' कुछ तीसरे लोग डार्विनके ही शब्दोंमें स्वीकार करते हैं कि 'एक जातिसे दूसरी उपजातिकी भिन्नताके नियमोंके सम्बन्धमें हमलोग कुछ नहीं जानते ।'

जातिविधान

इसी तरह विकासवादी जातिविभाग-शास्त्रके अनुसार साधर्म्य-वैधर्म्यके अनुसार प्राणिवर्गका वर्गीकरण पृष्ठवंशधारी और पृष्ठवंशविहीनोंके भेदसे करते हैं । जबसे रक्तकी परीक्षाका सिलसिला जारी हुआ, तबसे विकासवादियोंका

१७४ मार्क्सवाद और रामराज्य वर्ग-विन्यास गलत सिद्ध हो गया। अबतक लोग 'गिनी फाउल' को मुर्गीकी किस्मका समझते थे। पर अब रक्तकी परीक्षासे वह शुतुरमुर्गकी जातिका मालूम होता है। इसी तरह 'विकासवाद' के लेखकने भालूको श्वान-जातिमें लिखा है। परंतु उसके रुधिरकी परीक्षासे वह सील आदिकी भाँति जलजन्तु सिद्ध हो रहा है। इसके अतिरिक्त जब विकासवादी एक ही प्रकारके मूल प्राणीसे समस्त भूमण्डलके प्राणियोंकी उत्पत्ति मानता है, जब सबके संस्थान एक समान गिनता है और एक ही तरीकेसे विकास मानता है, तब इन सबके रुधिरकण एक ही बनावटके क्यों नहीं होते ? किसी जातिके प्राणीका रुधिरकण गोल, किसीका चपटा क्यों होता है ? यह रुधिरका पृथक्त्व सिद्ध करता है कि प्रत्येक जातिका शरीर भिन्न प्रकारके रुधिरकणोंसे बना होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि समस्त जातियाँ एक ही प्रकारके प्राणीसे विकसित नहीं हुई, प्रत्युत सबकी उत्पत्ति मूलतः अलग-अलग हुई। तुलनात्मक शरीर-रचना-शास्त्रसे विकासवादकी बहुत ही सामग्री मिलती है। बाह्यरूपमें अत्यन्त भिन्नता होनेपर भी कई प्राणियोंका जातिविभाग इस शास्त्रने एक ही वर्गमें किया है। आन्तरिक रचना-साम्यपर इसका निर्णय होता है। तदनुसार 'चमगादड, ह्वेल और गौ अनुक्रमसे नभचर, जलचर और भूमिचर होनेपर भी तीनोंका एक ही वर्गमें अन्तर्भाव किया गया है, क्योंकि तीनो ही स्तनधारी है। इसके अनुसार अनेक जातिके कुत्तोंमें साधर्म्य-वैधर्म्य दोनों ही मौजूद हैं। साधर्म्यसे सब कुत्ते एक ही वर्गके हैं। वैधर्म्यसे बुलडाग, ताजी और लैडी आदि अलग-अलग हैं, किंतु हैं सब एक ही पूर्व जन्तुकी सतति । इसी तरह लोमडी, सियार और भेडिया वैषम्यसे अलग हैं । पर मांसभक्षण आदि साम्यसे एक ही पूर्वजन्तुकी सतति प्रतीत होते हैं। बिल्ली और बनबिलाव अलग होते हुए भी एक ही हैं। चीता, व्याघ्र, सिंह अलग-अलग होते हुए भी एक हैं। इन सबका मांसाहारी, स्तनधारी कक्षामें समावेश होता है। इनमे व्याघ्र तथा सिंहके मेलसे और भेड़िये तथा कुत्तेके मेलसे संतति भी होती है। भालू भी मांस-भक्षक प्राणी है। इसकी आन्तर-रचना कुत्ते, बिल्लीकी रचनासे कुछ पृथक् है। पर इसका मेल इन्हींके साथ मिलता है। मांस-भक्षकोंमें बिज्जु, नेवला, ऊदबिलाव अलग-अलग होते हुए भी एक ही प्रकारके हैं। ह्वेल मछली भी मांसभक्षक है। यह जन्तु पहले स्थलचारी था, पर अब इसका पानी ही घर हो गया। इसके पैर कमजोर और नावके चप्पूकी भाँति हो गये। शरीरमें इसके बल भी कम होता है। यह स्तनधारी, मांसभक्षी प्राणी है। स्तनधारियोंमें तीक्ष्ण दाँतवालोंका एक दल चूहा, छुछूंदर, घूस, गिलहरी, शशक और स्याहीका है। ये वस्तुओको कुतरते हैं। अतः तीक्ष्णदन्ती कहलाते हैं। इनमें ही उड़न गिलहरी भी है। चमगादड़ भी इसी

विकासवाद १५५ जातिका है; किन्तु यह उड़नेवाला है । इनके पैरोंकी रचना भूमिचर जानवरोंके अगले पैरोंके तुल्य होती है । विकासवादका यह सबसे उत्तम प्रमाण समझा जाता है । स्तनधारियोंमें गाय, घोड़ा, हाथी, ऊँट, हरिण, गैड़ा, सूअर, दरियाई घोड़ा आदि हैं । इनके सूँड़ या खुर होते हैं । इनमें खुरका माश्चर्य है। हाथीकी पाँचों अँगुलियाँ, टापीरके चार, गैंडेके तीन, ऊँटकी दो और घोड़ेकी एक ही होती है । यहाँ अंगुलियोंके क्रमशः ह्राससे विकासका अच्छा प्रमाण मिलता है । आस्ट्रेलियाका केंगारू भी विकासका अच्छा प्रमाण है । इसकी माँदीके पेटमें एक थैली होती है । माता बच्चोंको पैदा करके इसी थैलेमें रख लेती है। इस थैलेमें स्तन होते हैं । बच्चे बड़े होनेपर थैलेसे बाहर निकलते हैं । इसी तरह अमेरिकाका 'ओपोसम' होता है । उसकी भी मादाके पेटमें थैली होती है। इनके सिवा डकबिल एव ईकड्ना दो स्तनधारी जन्तु और भी होते हैं । ये अण्डे देते हैं, परन्तु अण्डोंको पेटमें रखनेके लिये इनके भी पेटमें थैली होती है । इस तरह स्तनधारियोंमें देखा गया है कि कई पूर्ण जरायुज, कई केंगारूकी भाँति अर्ध-जरायुज और कई डकबिलकी भाँति अण्डज हैं । ये स्तनधारियों एव अण्डजोके मध्यवर्त्ती प्राणी हैं । 'इसी तरह पृष्ठवंशधारियोंकी दूसरी श्रेणीके पक्षी भी कई प्रकारके होते हैं । कोई दाना चुगते हैं, कोई मांस खाते हैं और कोई पानीमें तैरते हैं । परिस्थितिके अनुसार उनके चोंच, पैर और झिल्लीदार पंजोंकी बनावट होती है । आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, न्यूजीलैड और अमेरिकाका पेग्विन पक्षी भी विकासका एक श्रेष्ठ प्रमाण है। यह जहाँ रहता है, वहाँ दूसरा पक्षी नहीं रहता, इसीलिये इसकी उड़नेकी शक्ति नष्ट हो गयी । यह पानीमें तैरता है । इसके पैर नावके चप्पुओंकी तरह पानी काटनेवाले हो गये । शुतुरमुर्ग और मोरकी भी उड़नेकी शक्ति कम हो गयी, क्योकि इन्हें किसी पक्षीका डर नही । यह परिस्थितिमे प्राप्त विकासके उदाहरण हैं । 'पीठकी हड्डीवालोमे तीसरी जाति सर्पणशीलोकी है । इसमे गोह, साँप, अजगर, नाकू, मगरमच्छ एवं कछुआ आदि हैं । गोहकी अनेक जातियों हैं, एक जातिकी गोहमें आगेके पैर नहीं होते, दूसरी जातिमें आगे-पीछे चारों पैर नहीं होते । सर्प बिना पैरका होता ही है। ये भी विकासके प्रमाण हैं । पृष्ठ- वंशवालोकी चौथी जाति है मण्डूकोंकी, यह पैदाइशसे लेकर युवावस्थातक अपनी जीवनीसे सिद्ध कर देता है कि मछलियोसे उसकी उत्पत्ति हुई है। मछलियोंकी तरह पहले वह गलफडोसे श्वास लेता है, फिर मुखसे । पहले उसके (मछलीकी तरह) पूँछ होती है, फिर वह लुप्त हो जाती है । पाँचवीं श्रेणी मछलियोंकी है । वे हजारो प्रकारकी होती हैं, जिससे विकासके अनुमानकी अधिक सम्भावना

१५६ मार्क्सवाद और रामराज्य रहती है । इसी तरह अस्थिरहित प्राणियोंके भी शरीरोंसे विकासका अनुमान होता है । ये जोड़ोंसे बने होते है । कनखजूरा, बिच्छू, मकड़ी, भौंरा, ततैया आदि इसी विभागके हैं । इनमे भिन्नता होते हुए भी सबके शरीर छोटे-छोटे जोड़ोसे बने होते हैं । इनसे भी मालूम होता है कि सब एक ही मूल प्राणीसे बने हैं' । इनके आगे अत्यन्त सूक्ष्म हैड्रा, अमीबा आदि प्राणी है । इनके भी पोषण, श्वासोच्छ्वास आदि आठो संस्थान हैं । इस तरह सब प्राणियोंमें वैधर्म्य होते हुए भी वे साधर्म्यसे रहित नही हैं । क्रमसे रखनेपर पहले अमीबा, हैड्रा, कनखजूरे आदि जोड़वाले कीड़े, फिर हड्डीवाली मछलियाँ, फिर मण्डूक, फिर सर्प, फिर पक्षी और अन्तमे स्तनधारियोंका स्थान ठहरता है । विकाससे इनकी आकृतिमें भिन्नता है । जैसे नये यन्त्रके बन जानेपर पुराने यन्त्र अलग हो जाते हैं, वैसे ही योग्य प्राणियोंके उत्पन्न हो जानेपर अयोग्य जातियाँ पीछे रह जाती हैं । पिछली जातियोंके अवशिष्ट अवयव इस बातकी साक्षी दे रहे हैं । मनुष्य भी स्तनधारी जन्तुओंकी श्रेणीमें है । वनमानुष, बंदर, लीमर आदि जातियाँ इसी श्रेणीकी हैं, अतः इनकी उत्पत्ति विकासवादके अनुसार ही है ।' यद्यपि आन्तर-रचनाका मिलान ठीक है, फिर भी इनकी श्रेणियाँ बाह्य रूप- से ही निर्धारित की गयी हैं । स्तनोंको देखकर स्तनधारियोंकी श्रेणीका निर्णय किया है । मांस खाना, जीभसे पानी पीना, मैथुनके समय बँध जाना, पसीना न आना, अँधेरेमे भी देखना आदि सब बाहरी लक्षण हैं । इसी तरह दाँत देखकर तीक्ष्ण- दन्तवालोकी श्रेणी बनी । इस तरह सभी विभाग प्रायः बाह्य भेदपर ही निर्भर ह, अतः आन्तरिक रचनापर वर्ग-विभागका अहंकार व्यर्थ है । ह्वेल, चमगादड़ और गायके स्तनोंको देखकर ही सबको एक श्रेणीमें रक्खा गया है । जहाँ इनकी बाह्य आकृतिसे काम नहीं लिया, वही भूल हुई । भालू और गिनी फाउल- को एक मानना भूल है । उस भूलको अब रुधिर-शास्त्र सुधार रहा है, अतः केवल आन्तर रचनापर उपर्युक्त विभागकी बात असङ्गत है । शरीरके अंदर हड्डियाँ, नस-नाड़ियाँ, यकृत्-प्लीहा, गर्भाशय आदि अनेक यन्त्र हे । पर ये क्या अस्थिहीन कीडोंमें भी ह ? कुत्ते और गायके पानी पीनेके ढगमे भेद है । कुत्ता जीभसे और गाय घूँटसे पानी पीती है, फिर भी दोनो स्तनधारी हैं । अतः आन्तर-रचना जटिल है, उसके आधारपर वर्गभेद नही बन सकता । अमीबासे स्तनधारियोंतककी रचनामे साम्यका पक्ष भी गलत है । यत्किंचित् साम्य तो पाञ्चभौतिक होनेसे सबमें ही है । अस्थियुक्त और अस्थिहीन प्राणियोंकी कुछ भी समानता नहीं है । यकृत्, प्लीहा, गर्भाशयादि एकमें हैं, दूसरेमें नहीं । अस्थिहीनोंमें अस्थियाँ कैसे हुईं, इसपर भी विकासवादी चकरा जाते हैं ।

विकासवाद

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इसपर उनकी चार कल्पनाएँ हँ-(१) प्राणियोंकी मानसिक प्रेरणासे अस्थियाँ बनीं, ( २ ) कठोर काम करते-करते जैसे मनुष्योंके शरीरमें घट्टे पड़ जाते हैं, वैसे ही श्रम करनेसे प्राणियोंके देहमें अस्थियाँ बन गयीं, ( ३ ) जब चूनेके अधिकांश भागवाले पदार्थ खाये गये, तब हड्डियाँ पैदा हुई और ( ४ ) शरीरके अंदर नस, नाड़ी आदि अवयव ही हड्डियाँ बन गये। परन्तु ये चारो पक्ष असंगत हैं। मनका असर उसीपर पड़ता है, जिसका मनसे सम्बन्ध हो। अस्थिका मनसे कोई सम्बन्ध नहीं। दाँतपर सुई चुभानेसे मनपर कुछ भी असर, नहीं पड़ता। अतः 'मानसिक प्रेरणासे अस्थियाँ बनीं,' यह नहीं कहा जा सकता। यों तो सम्पूर्ण संसार ही मनकी कल्पना है, फिर अस्थि ही क्यों ? घट्टोंका दृष्टान्त भी ठीक नहीं, क्योकि बाहरी वस्तुके संघर्षसे बाहरी ही कठोरता आती है। बाह्य संघर्षसे शरीरके अंदर हड्डियाँ कैसे बनेगीं ? चूनेवाले भोजनसे भी हड्डियाँ नहीं बन सकतीं। सभी जानते हैं कि 'खूनसे हड्डियाँ पैदा होती हैं,' परन्तु लाखो जूँ, चमड़े, कीलने, खटमल मनुष्यों, पशुओके खून पीते हैं, जोके खून पीती ह, परन्तु उनमें हड्डी नहीं बनी। चींटियाँ हड्डियोंको चुनकर खाती हैं, उनमें भी हड्डी पैदा नही हुई। 'नस-नाड़ियों हड्डी बन जाती हैं' यह भी बात युक्तिहीन है। बच्चोंके मुखमें पहले दाँत नहीं होते, कुछ दिन बाद दाँत निकल आते हैं। यदि नस-नाड़ियोंका दाँत बन जाना माने तो उधर थोडे ही दिनोंमे वे दाँत गिर जाते हैं। गिरते समय नस-नाडियोंसे उनका कोई लगाव प्रतीत नहीं होता। कुछ दिनो बाद फिर नये दाँत निकलते हैं, यदि पहली नस-नाड़ियो चली गयी तो यह दूसरी कहाँसे आयीं ? वृद्ध होनेपर वे दाँत भी चले जाते हैं, तब भी किसी नस नाडीका लगाव मालूम नहीं होता। डाक्टर भी दाँत निकाल देते हैं, पर उनके साथ नस आदि कोई चीज नहीं निकलती। दाँत तो कीलोकी तरह गड़े होते हैं, शरीर या किसी दूसरे अङ्गसे उनका वास्ता नहीं प्रतीत होता। इसी तरह भीतरका सारा अस्थिपञ्जर अलग ही प्रतीत होता है, उसका वास्ता नस नाड़ी, मास, त्वचा किसीसे नहीं । फिर ऐसी निराली वस्तुको अस्थिहीन प्राणियोंने कैसे प्राप्त किया ? विकासवादी कहते हैं कि 'परिस्थितियोसे ही हड्डियाँ उत्पन्न हुईं, परन्तु परिस्थिति भी हड्डी बनानेमें असमर्थ है। भाई- बहन दोनो एक ही परिस्थितिमें उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। पर बहनके

१५८ मार्क्सवाद और रामराज्य ग्रन्थोंसे मालूम होता है कि 'दो स्त्रियोंके परस्पर मैथुन करनेसे यदि किसीके गर्भमें बीज चला गया, तो उस गर्भसे अस्थिविहीन शिशु उत्पन्न होता है।' इसी तरह 'कोई ऋतुस्नाता स्त्री यदि स्वप्नमे मैथुन करे तो वायुद्वारा आर्तव खिंचकर गर्भमें धारित होता है। वही अस्थिहीन मांस-पिण्डके रूपमे उत्पन्न होता है। केश-श्मश्रु, लोम, नख-दन्त, शिर-धमनी, स्नायु, शुक्र—ये सब पितृज गुण होते है। इसी कारण स्त्रीको दाढ़ी-मूंछ, मयूरीको पूंछ, मुर्गीको कलँगी और हथिनीके दाँत नहीं होते। पुरुषमें क्यो ये कठिन पदार्थ होते हैं और स्त्रीमें क्यो नही होते ? अमीवामें कौन स्त्री है एवं कौन पुरुष, किस प्रकार उसका वंश चला, फिर नर-मादा-भेद कैसे हुआ, अस्थिहीन और अस्थियुक्त यह भेद कैसे हुआ ? इनका विकासवादमें कोई भी यथार्थ उत्तर नहीं। अतः शरीर-तुलनाकी दृष्टिसे अस्थिहीनोंका अस्थिवालोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं। कहा जाता है कि 'एक कोष्ठवाला अमीवा दो कोष्ठवाला हैड्रा बन गया, क्योकि विकास- सिद्धान्तानुसार कोष्ठ हमेशा दुगुने परिणाममें बढता है अर्थात् एकके दो, दोके चार, चारके आठ और आठके सोलह हो जाते हैं।' इसके अनुसार प्रत्येक उत्तरोत्तर योनियाँ आकार और वजनमें पूर्वकी अपेक्षा दूनी, चौगुनी, अठगुनी होनी चाहिये। पर ऐसा देखनेमें नही आता । स्थिति तो यह है कि अमीवा हर जगहसे अपने अंदर छेद कर लेता है। इससे वह एक कोष्ठका भी नही प्रतीत होता। यदि एक कोष्ठ हर जगहसे फटता है तो उसका चेतन-रस— प्रोटोप्लाज्म—वह जाना चाहिये, किंतु ऐसा नहीं होता। इस तरह अमीवासे लेकर जोडवालोंतक और जोडवालोंसे लेकर अस्थिवालोंतक कोई भी तुलना नही। स्तनोंका विज्ञान क्या है, यह भी विचारणीय है। ये स्तन नरोंमें क्यो नही होते, इसका कोई उत्तर नहीं। अमीवाके भी आकार-प्रकारका ज्ञान वैज्ञानिकोको नहीं। वह एक कोष्ठवाला है या अनेक कोष्ठवाला और कोष्ठका क्या विज्ञान है, उसमें नर-मादेका क्या विज्ञान है, इन कोष्ठोंसे उत्तर योनियोका किस प्रकार विकास होता है, यह भी विकासवादी सिद्ध नहीं कर पाते । जोडवालो और अस्थिवालोंके बीचमें भी कोई प्राणी है या नही, इसे भी वे नहीं जानते । अस्थिकी उत्पत्ति विकासद्वारा असम्भव है, यह बतलाया जा चुका है। घोड़ेमें स्तनोंका अभाव क्यो, यह भी विचारणीय ही है । इस तरह शरीर-तुलना-शास्त्रसे विकास सिद्ध नहीं होता। परिस्थितिवश प्राणियोंके अङ्गोंका ह्रास-विकास कहा जाता है। 'ओपोसम, डकब्रिल, पेग्विन, मोर, ह्वेल, शुतुरमुर्गके शरीरोंमे ऐसे चिह्न पाये जाते है, जिनसे परिस्थितिवश शरीरोंमे ह्रास-विकास सिद्ध होता है।' परन्तु 'उक्त प्राणियोंके अङ्गोंमें ह्रास-विकास हुआ' यह विकासवादी किस प्रमाणसे कहते हैं ? यह

कहना कहीं अधिक प्रामाणिक है कि उन-उन प्राणियोंके कर्मानुसार सुख-दुःख भोगार्थ परमेश्वरने ही उन्हें वैसे-वैसे अङ्ग दिये। व्हेलके पैर कमजोर हो गये, मोर, शुतुरमुर्गके पख कमजोर हो गये, परंतु यदि इससे पहले कभी वे जोरदार पैरवाले और पखवाले देखे गये होते तो कुछ कल्पना भी हो सकती थी। जब पानीमें तैरनेका काम देते हैं, तब इस कल्पनामें क्या प्रमाण है कि 'पहले वह स्थलचारी था, अब पानीमें रहनेसे पैर कमजोर हो गये ?' इसी तरह मोर, शुतुरमुर्ग हैं। वे डील-डौलमें बड़े हैं, इनको पक्षियोंसे डर नहीं। फिर भी स्थलचारियोंसे बचनेके लिये उनके पख हैं अतः 'परिस्थितिके कारण पैर कमजोर हैं।' यह भी कहना व्यर्थ है। आज भी कुत्ता मोरको नोच डालता है, फिर यह कैसे समझ लिया कि 'उसका कोई शत्रु नहीं है, उड़नेका काम न पड़नेसे पख कमजोर हो गये ?' 'पक्षियोंसे स्तनधारी बने' यह कल्पना भी व्यर्थ है। जब उड़नेकी अधूरी विमान-विद्यासे भी मनुष्य प्रसन्न है, तब पख पाकर भी पक्षी उड़न-विद्याको क्यों छोड़ेंगे ? 'पक्षियोंका कोई शत्रु नहीं' क्या ऐसा कोई समझदार व्यक्ति कह सकता है ? यदि आज भी पक्षियोंके शत्रु हैं ही, तो वे अपने पखोंको बर्बाद कर पशु क्यों बन गये ? परिस्थितिसे न अङ्ग लुप्त होते हैं और न तो नये उत्पन्न होते हैं। यदि परिस्थिति ही सब कुछ थी तो हथिनोको दाँत क्यों नहीं हुए ? हथिनी और हाथी दोनों समान स्थितिमें थे ही। वस्तुतः प्राणियोंके जाति, आयु और भोग उनके कर्मानुसार ईश्वरद्वारा ही प्राप्त होते हैं। 'भिन्न जातियोंके मिश्रणसे वंश चलता है' यह पक्ष भी गलत है। अनेकों जातियोंका परस्पर मैथुन व्यर्थ होता है। कुछसे संताने उत्पन्न होती हैं, पर वंश नहीं चलता। जिनमें वंश चलता है, वे अत्यन्त भिन्न जातिके नहीं, अपितु समान जातिके ही होते हैं। सिंह-व्याघ्र एवं कुत्ते-भेड़ियेके मेलसे संतानोंत्पत्ति यद्यपि होती है तो भी उनका आगे वंश नहीं चलता। देखते हैं कि घोड़े-गदहेसे खच्चर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनसे वंश नहीं चलता। यही स्थिति कलमी आम, पेवंदी बेरकी भी है। यदि कलमी आमसे वृक्ष पैदा हुए या सिंह-व्याघ्रके मेलसे वंश चला तो भी आगे चलकर वे मूलजातिके रूपमें ही हो जाते हैं, धीरे-धीरे या तो व्याघ्र या सिंहकी ही शकलमें हो जाते हैं। कलमी आम भी छोटा होते-होते तुखमी आमके ही आकारका हो जाता है। विकाससे अलग जाति उत्पन्न हो सकती है, परंतु वंश नहीं चलता। बच्चा तो दो स्त्रियोंके अन्योन्य मैथुनसे भी उत्पन्न होता है, परंतु उसमें हड्डी नहीं होती, वंश नहीं चलता। अमेरिकामे विद्वान् लूथर बंकने बहुतसे वृक्षोंकी कलमोंसे अनेक प्रकारके फल-फूल उत्पन्न किये हैं। यहाँ भी सजातीय मिश्रणमें ही संततिका सिद्धान्त स्थिर है। समान जाति और समान

भोगवालोके ही सम्बन्धसे संतान उत्पन्न होती है और वश चलता है । अतएव मास खानेवालो और घास खानेवालोके सम्बन्धसे भी वश नहीं चलता । प्रायः जाति, आयु, भोगके साथ ही प्रसवका सम्बन्ध रहता है। भोगोके सम्बन्धमे परिस्थितिवादी कह सकता है कि 'अमुक जातिको जब जीनेके लिये खुराक न मिली, तब वह मास खाने लगी।' परंतु प्रत्येक जातिकी नियत आयुका क्या कारण है, यह विकासवादी नही बतला सकता । मनुष्य, बंदर, गाय, बकरी, ऊँट, गधा और छोटे कीडोकी आयुका महान् अन्तर है । मनुष्य- के समान ही उससे भी बलवान् पशुओकी सौ वर्षकी आयु क्यो नही, इसका उत्तर भी विकासवादसे बाहर है । विकासवादके अनुसार पृष्ठवंशधारी प्राणियोमें कच्छप एव सर्प भी सर्पणशीलोकी श्रेणीमें है । आयुष् शास्त्रियोके मतानुसार कछुआ १५० वर्ष जीता है और सर्प १२० वर्ष जीता है। विकासवादके अनुसार सर्पणशील प्राणी ही पक्षी बने हैं, परंतु पक्षियोमें कबूतर ८ ही वर्ष जीता है। पक्षियोका विकास स्तनधारी प्राणी है, उनमें शशक ८ वर्ष, कुत्ता १४ वर्ष, घोड़ा ३२ वर्ष, बंदर २१ और मनुष्य १०० वर्ष जीता है। यहाँ स्पष्ट ही विकासमे आयुका ह्रास हो रहा है। दीर्घायु कच्छप एव सर्पको पराजित करनेवाला कबूतर ८ ही वर्ष जीता है । इससे भी योग्य प्राणी शशक, कुत्ता, घोड़ा भी क्रमशः ८, १४ और ३२ ही वर्ष जीते हैं। मनुष्योका जिसे पूर्वज कहा जाता है, उस बदरकी आयु २१ वर्ष ही है । मनुष्य भी तो कच्छप एव सर्पसे कम ही जीता है । विकासवादका कहना है कि 'जीवन सग्राममें योग्य ही रह जाता है, उसीसे नवीन जातियोका प्रादुर्भाव होता है, परंतु जीनेके लिये संग्राम करके विकसित होकर और योग्यता प्राप्त करके भी प्राणी उलटे मृत्युके अधिक निकट पहुँच गये। जो पहिलेके और सरलरचनाके हैं, वे अधिक जीते हैं तथा जो क्लिष्ट रचनाके हैं और बादके हैं, वे कम जीते हैं। यह क्या मशीनोका सुधार है कि जो पहली १२० या १५० वर्षकी थी, वही सुधरी हुई मशीन ८ ही वर्ष टिकने लगी । यह अच्छा यान्त्रिक विकास है । शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परम स्मृतम् । चतुस्त्रिशत्तु वर्षाणामश्वस्यायुः परं स्मृतम् ॥ पञ्चविंशति वर्षाणि परमायुर्वृषोष्ट्रयोः । यह भी स्पष्ट है कि एक मिनटमें शशक ३८, कबूतर ३६, वानर ३२, कुत्ता २९, बकरी २४, बिल्ली २५, घोड़ा १९, मनुष्य १३, हाथी १२, सर्प ८ और कछुआ ५ बार श्वास लेता है । यह भी विचारणीय है कि 'अभिनवतम मशीन बन जानेपर पुरानी मशीनोका बनना बंद हो जाता है।' परंतु यहाँ तो मनुष्यके विकसित हो जानेपर भी पुराने कीडे-मकोडोके बननेमे किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं