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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

३१६ मार्क्सवाद और रामराज्य दान-पुण्य करना चाहता है। अपनी सम्पत्ति अपने बेटे-पोतोंके लिये छोड़ना चाहता है। यदि वह जान ले कि कम्युनिष्ट-राज्यमें बाप-दादेकी कमाई बेटे-पोतेकी बपौती मिलकियत नहीं समझी जाती तो वह कभी भी कम्युनिष्टोंमें शामिल न होगा। यदि वह जान ले कि काम न करनेवाले वृद्ध माता, पिताको एवं वृद्ध होनेपर उसे भी कम्युनिष्ट-राज्यमें कोई स्थान नहीं है, तो अवश्य ही उसे घबड़ाहट होगी। इसके अतिरिक्त यह भी हम कह आये हैं कि यदि पूँजीवादी शासनमें ९९ मजदूर हैं, तो वहाँ मजदूर-सरकार क्यों नहीं बन जाती ? क्योंकि वहाँ तो मतगणना- के आधारपर सरकारें बनती हैं। अतः मजदूरोंकी उक्त संख्या मिथ्या एवं भ्रामक है। इसी तरह यह भी झूठ है कि किसी भी श्रम करनेवाले मजदूरको अपने विचार व्यक्त करनेकी स्वतन्त्रता है। जहाँ कोई स्वतन्त्र प्रेस या पत्र नहीं हो सकता, नागरिक स्वतन्त्रतापूर्वक किसी दूसरे देशके विचार नहीं पढ़ सकते, रेडियो सुन नहीं सकते, अपने देशमें भी स्वतन्त्रतासे अपने मतका प्रचार नहीं कर सकते, वहाँ भी प्रजातन्त्र एवं प्रजाहितकी बात करना सर्वथा उपहासास्पद है। वस्तुतः जो सम्पूर्ण जड़ प्रपञ्चको निरीश्वर मानते हैं, कोई शाश्वत नियम नहीं मानते, व्यक्तिगत शासन नहीं मानते, उन्हे कोई शासन बनानेका अधिकार भी कैसे है ? व्यक्तिका समुदाय ही समष्टि है। व्यक्तिमें जो गुण नहीं, वह समष्टिमें भी न आयेगा। लाल सूतोंसे ही लाल कपड़ा बनता है। सफेद सूतोंमें लालिमा नहीं है, अतः उनसे लाल कपड़ा नहीं बन सकता। यदि व्यष्टि शासन अमान्य है तो समष्टिके नामपर भी शासन नहीं बन सकता, फिर तो अराजकताका ही समर्थन श्रेष्ठ है। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरेका शासन क्यों मानेगा ? जो कोई सत्य, नियम या सिद्धान्त नहीं मानता, वह किस आधारपर नये सिद्धान्तोंकी स्थापना कर सकेगा ? गत दिनो (१९५४ में) किसी ब्रिटिश मन्त्रीने विचार-स्वातन्त्र्यके सम्बन्धमें एक लेख 'प्रवदा' (रूसी-पत्र) में भेजा था। जिसमे उन्होंने अखबारों, रेडियो तथा साम्यवादी विचारोंके विरुद्ध रूसी प्रतिबन्धकी चर्चा करते हुए रूसमे विचार- स्वातन्त्र्यका अभाव बतलानेका प्रयत्न किया था। 'प्रवदा'ने उसी अङ्कमे उसका उत्तर भी छापा था। उत्तरका सार यही था कि राष्ट्रियता-विरोधी भावोंको न पनपने देना भूषण है, दूषण नहीं। पर क्या कोई पूछ सकता है कि राष्ट्रिय विचार क्या शासनाारूढ दलका विचार है ? वस्तुतः यदि स्वतन्त्रताके साथ विश्वकी मत- गणना हो, तभी राष्ट्रिय विचारका पता लग सकता है।

षष्ठ परिच्छेद मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था मूल्यका आधार कहा जाता है, 'पूँजीवादी समाजके जीवन और गतिका आधार होता है खरीदना, बेचना तथा वस्तुओं एवं श्रमका विनिमय ही परस्पर सम्बन्धका सार है । मार्क्सके मतानुसार 'पूँजीवादके अन्तर्गत जो माल तैयार होकर बाजारमें जाता है उनके दो तरहके मूल्य होते हैं—एक उपयोग सम्बन्धी, दूसरा विनिमय-सम्बन्धी । पहलेका अभिप्राय उस वस्तुके गुणसे है, जिससे खरीदनेवालेकी शारीरिक या मानसिक आवश्यकताकी पूर्ति होती है। जिसका उपयोग मूल्य नहीं होता, उसका विनिमय या विक्रय नहीं होता। उपयोग मूल्यकी दृष्टिसे प्रत्येक वस्तु दूसरीसे भिन्न होना चाहिये। कोई आदमी एक मन गेहूँका परिवर्तन उसी ढंगके गेहूँसे नहीं करता; हाँ, उसका परिवर्तन २० गज कपड़ेमे कर सकता है। अब यह प्रश्न होता है कि एक वस्तुका विनिमय दूसरी वस्तुसे कैसे और किस नियमसे हो ? इसी नियम या कायदेका नाम विनिमय मूल्य है। इसका आधार श्रमके उस परिमाण और कठोरतापर निर्भर होता है, जो किसी वस्तुके बनाये या पैदा करनेमे आवश्यक होता है। बाजारमें श्रमके समान परिमाणका परस्पर बदला किया जाता है। श्रमका परिमाण इस दृष्टिसे नहीं नापा जाता कि अमुक व्यक्तिको एक वस्तु बनानेमें कितनी देर लगती है। किंतु समाजमें आमतौरसे प्रचलित प्रणालीसे जितना समय लगता है उसी हिसाबसे श्रमका परिमाण नापा जाता है। जैसे हाथसे कपडा बुननेवाले जुलाहेको २० गजके थान बनानेमें २० घंटे काम करना पड़ता है, जो कि आधुनिक मशीनोंद्वारा ५ घंटे या उससे भी कम समयमें बनाया जा सकता है। पर हाथसे कपड़ा बुननेवालेको—चौगुना-पाँचगुना मूल्य नहीं दिया जा सकता। अतः मार्क्सके मतानुसार वस्तुके विनिमय मूल्यका आधार वह परिमाण है, जो उस वस्तुके तैयार करनेमें लगता है। परंतु श्रमका यह परिमाण सदा एक सा नहीं रहता। नये आविष्कारोंसे माल तैयार करनेके ढंगमें उन्नति और श्रमजीवियोंकी उत्पादनवृद्धि आदि कारणोंसे किसी वस्तुके बनानेके लिये आवश्यक श्रमका परिमाण घट सकता है। उस अवस्थामें यदि दूसरी बातें (जैसे उसकी वस्तुकी माँग सिक्का आदि) ज्योंकी त्यों बनी रहें, तो विनिमय मूल्य भी कम हो जाता है। अतः श्रम ही विनिमय मूल्यका आधार है। विनिमय मूल्यका

३१८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही किसी समाज या देशकी सम्पत्तिका निर्णय किया जा सकता है। वस्तुओंके तैयार करनेमें जितना श्रम अपेक्षित होता है, अगर वे उससे कममें तैयार होने लगे, तो किसी देशकी सम्पत्ति आकारमें भले ही बड़ी हों, पर मूल्यकी दृष्टिसे नगण्य हो सकती हैं। उद्योग-धंधोंकी दृष्टिसे जो देश जितना अधिक अग्रसर होता है, उसकी सभ्यताका दर्जा जितना ऊँचा होता है, उतनी उसकी सम्पत्ति भी अधिक होती है। सम्पत्तिकी उत्पत्तिपर श्रम भी कम खर्च होता है। वर्तमान व्यावहारिक राजनीतिमें यह अधिक मजदूरी और कम घंटेके कामके रूपमें दृष्टिगोचर होती है। विनिमय मूल्यका आधार उपयोग-मूल्य ही होता है। यदि कोई चीज इतनी अधिक बन जाय, जिसकी लोगोंको आवश्यकता न हो, तो शेष वस्तुका कुछ भी मूल्य नहीं रह जाता, भले ही उसके तैयार करनेमें श्रम किया गया है। इसलिये विनिमय मूल्य या समाजद्वारा किये गये श्रमका पूरा फल तभी प्राप्त हो सकता है, जब कि वस्तुओकी पैदावार और उनकी माँगमें समानता बनी रहे। इसके लिये संघटन और समाजके मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है।' कहा जाता है, 'प्राचीन अर्थशास्त्रोंके मतानुसार पूँजीपति जो कि उत्पत्तिका नियन्त्रण करता है, अपनी पूँजीद्वारा मजदूरोंको औजार और कच्चा माल पहुँचाता है। वह तैयार मालको बिकवाता है, माल तैयार होनेके क्रमको जारी रखता है, अतः वही मूल्यका उत्पादक माना जाता है। वह श्रमजीवियोंकी भी उत्पत्तिका एक साधन गिना जाता है। पर मार्क्सके मतानुसार श्रमजीवी ही जो कच्चे मालसे वस्तुएँ तैयार करते तथा कच्चा माल उत्पन्न करके वस्तु-निर्माणके स्थानतक पहुँचाते हैं, मूल्यके एकमात्र उत्पादक हैं।' वस्तुतः यह कोई अनहोनी बात नहीं है। व्यवहारमें सुगमता लानेके लिये मुद्रा या रुपयोंका प्रचलन ठीक ही है। मनभर गेहूँका दाम दो बकरी या एक जोड़े जूतेका दाम एक मेज है, इस व्यवहारमें झंझट अधिक है। व्यवहारमें सुविधाके लिये रुपयाके द्वारा पदार्थोंके दाम आँके जाते हैं ! कोई सौदा देकर रुपया ले लेनेपर इस बातका संतोष रखता है कि आवश्यक होनेसे उस रुपयेसे कोई भी चीज खरीदी जा सकती है। पदार्थोंके संग्रह करने या ले जाने, ले आनेमें अनेक कठिनाइयाँ होती हैं। रुपयोंसे ऐसी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। रहा यह कि पूँजीपतिको उसके द्वारा मुनाफा खींचने या जमा करनेका अवसर मिलता है। पर सदुपयोग-दुरुपयोग प्रत्येक वस्तुका किया जा सकता है। मशीन चलानेवाली, प्रकाश फैलानेवाली बिजलीसे प्राणी आत्महत्या भी कर सकता है। रुपयेसे व्यवहारमें हर प्रकारकी सुविधा ही होती है। उधार या कर्जके रूपमें लेना देना, उगाहना

आदि रुपयेके व्यवहारमें सुगमता होती है । किसीको रुपयेसे लाभ होता है, एतावता वह बुरा नहीं कहा जा सकता । क्रय-विक्रयके काममें आनेवाली वस्तुओके दामका आधार भी केवल श्रम नहीं है, किंतु उपयोगिता एवं माँग दामका आधार है । और उसका भी परम आधार है उपकार्य-उपकारकभाव । विकासवादियोंके अनुसार अध्यात्मवादी नया आविष्कार नहीं मानते, किंतु वेदादिशास्त्रोंद्वारा विहित वर्णाश्रमानुसारी श्रौतस्मार्त्त धर्मद्वारा देवार्चन करना और उनके द्वारा प्रदत्त वृष्टि अन्न, प्रजा आदिरूपमें फल प्राप्त करना—यह सब भी विनिमय ही है । परम दार्शनिक भगवान् श्रीकृष्णने कहा है कि—तुम यज्ञसे देवताओंका अर्चनकर संवर्द्धन करो । देवता भी विविध फल प्रदानकर तुम्हारा संवर्द्धन करेंगे । इस तरह परस्पर एक दूसरेका पोषण करते हुए आप सब परम श्रेयके भागी होगे । देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ( गीता ३ । ११ ) निःसीम, ज्ञान, शक्ति-सम्पन्न ईश्वर ही है ।

३२० मार्क्सवाद और रामराज्य बौद्धश्रमका महत्त्व अधिक होता था। शारीरिक, बौद्धिक सभी कर्मोंमे अभ्याससे योग्यता बढ़ती है। साथ ही कुछ जन्मजात, जन्मान्तरीय विशेषताएँ भी होती हैं। कभी-कभी समान पिताके पुत्रोंको समान सुविधा तथा शिक्षाका प्रबन्ध रहनेपर भी कोई किसी कार्यमें दक्ष होता है; कोई किसी दूसरे कार्यमें और कोई किसी भी कार्यमें दक्ष नहीं होता। उस दक्षताके तारतम्यसे भी श्रमके मूलका भेद हो जाता है। आधुनिक लोग भी फावड़ा चलानेवाले श्रमिककी अपेक्षा इंजीनियरके श्रमका बहुत ज्यादा मूल्य समझते हैं। यद्यपि फावड़ा चलानेवालेके श्रममें बहुत कठोरता है। इंजीनियरके श्रममें कठोरता नगण्य ही है। कभी श्रमद्वारा निर्मित उपयोगी वस्तुका श्रमनिर्मित दूसरी उपयोगी वस्तुके साथ विनिमय होता है, परंतु कभी श्रमका ही वस्तुके साथ विनिमय होता है। जैसे किसीसे अमुक परिमाणमें कोई उपयोगी वस्तु या रुपया देकर अमुक मात्रामें शारीरिक या बौद्धिक श्रम लिया जाता है। कभी-कभी श्रम-निर्मित उपयोगी वस्तु देकर गाय या बकरी आदि ऐसी वस्तु खरीदते हैं, जिसके बनानेमें श्रम कुछ भी नहीं खर्च होता। श्रमकी बराबरीके अनुसार दामकी बराबरीकी बात सर्वथा असंगत एवं अव्यावहारिक है। शीसम एवं चन्दनके सिंहासन बनानेमे श्रम समान ही होगा; पर दोनोंके मूल्यमें पर्याप्त अन्तर होता है। लोहेकी थाली एवं सोनेकी थालीमें श्रमके विपरीत मूल्य मिलनेका व्यवहार आज भी प्रचलित है। पहाड़से निकले हुए अपरिष्कृत हीरेमें कुछ भी श्रम नहीं लगा; किंतु लाखो गज कपड़ेके बनानेमें अपेक्षित महान् श्रम भी उसके बराबरका नहीं ठहरता। अतः कहना पड़ेगा कि उपयोग तथा माँगके अनुसार ही वस्तुका मूल्य होता है। यह बात श्रम एव श्रम-निर्मित पदार्थ दोनोंहीके सम्बन्धमें समानरूपसे लागू होती है। जल, वायु आदि अत्यन्त उपयोगी होते हुए भी जहाँ पर्याप्त मात्रामें सुलभ होते हैं, वहाँ उनका कोई दाम नही है। पर जहाँ कमी होनेके कारण उनकी माँग होती है, वहाँ उनका भी दाम बढ़ जाता है। यदि हीरा भी पानी या बालूके तुल्य पर्याप्त हाता और उसकी मांग न होती, तो इतने मूल्यका वह न होता। अथवा यदि वह शौकीन धनिकोंकी मानसिक आवश्यकताका पूरक न होता तो भी उसकी कीमत नगण्य ही होती। पहाड़में उत्पन्न हानेवाली विभिन्न वस्तुओके मूल्यमें जो कच्चे मालके रूपमें है; पर्याप्त अन्तर है। इसी प्रकार जंगलमें स्वतः उत्पन्न विभिन्न प्रकारकी ओषधियो, लकड़ियो तथा हिरण, गाय, हाथी, बाघ, बकरे आदि पशुओंके, जिनमें मनुष्यका कुछ भी श्रम खर्च नहीं हुआ है, दामोंमें पर्याप्त अन्तर है, परस्पर विनिमय भी हो सकता है। यह विनिमय श्रमकी बराबरीके आधारपर नहीं; किंतु उपयोगिता एवं माँगके आधारपर ही है, ऐसा कहना पड़ेगा। वस्तुके महत्त्व, अल्पता, बहुलताके साथ, उपयोग एवं माँगका सम्बन्ध रहता है। एक ज्ञानशून्य मनुष्य और बकरेके लिये

रोटी या नीमकी पत्तीका जो महत्त्व है, वह हीरेका नहीं । जो वस्तु जिसके बाह्य या आन्तरिक आवश्यकताओ, इच्छाओंकी पूरक होती है, उसके प्रति ही उसकी कीमत होती है । कभी-कभी एक गिलास पानी या एक टुकडा रोटी भी सैकड़ों हीरेके बराबर ठहरती है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—'सपति सगरे जगतकी, स्वासा सम नहिं होइ ।' सारे संसारकी सम्पत्ति एक श्वासके बराबर नहीं होती । यदि कोई गुणी करोड़ों हीरा लेकर भी मरणकालमें श्वास लौटा दे, तो यह सौदा महँगा नहीं समझा जाता । वस्तुतः मार्क्स श्रमको ही आमदनी या मूल्यका आधार मानकर, प्राकृतिक वस्तु या कच्चे मालके उत्पादनका महत्त्व घटाकर मजदूर-राज्यका औचित्य सिद्ध करना चाहता है, परंतु उपर्युक्त कथनानुसार यही कहा जा सकता है कि मूल्यमें श्रम भी कारण है । जैसे श्रम बिना कभी मशीन एवं कच्चे माल तथा भूमि- खान आदि अन्य प्राकृतिक साधन मुर्दे पड़े रहते हैं, वैसे ही श्रम भी उपयुक्त साधनों बिना निरर्थक ही रह जाता है । काम लेनेवाला न हो तो कामका कुछ भी फल नहीं होता । काम लेनेवाला तथा दाम देनेवाला न मिलनेसे ही बेकारीका प्रश्न उठता है । यह ऊपर कहा ही जा चुका है कि अनेकों ऐसी वस्तुएँ हैं, जिनके उत्पादनमें श्रम कुछ नहीं हुआ और उनका उपयोग-मूल्य एवं विनिमय-मूल्य दोनो ही होता है । कोई भी कार्य लाभके लिये ही किया जाता है, तभी अति समान वस्तुका विनिमय नही होता । अर्थात् एक मन गेहूँका उसी ढगके एक मन गेहूँके साथ विनिमय नहीं किया जाता । यातायातके द्वारा देशान्तर, कालान्तरके सम्बन्धसे क्रय-विक्रय या विनिमय लाभके लिये ही होते हैं । जैसे भारतका जूट विदेशोमें विशेष मूल्य देता है; मार्गशीर्षका चावल श्रावणमें अधिक मूल्यवान् हो जाता है । अपनी आवश्यकतासे अधिक उत्पादन होने एवं अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा होनेसे ही विनिमय या क्रय-विक्रयकी बात चलती है । अतएव खेती, मजदूरी और नौकरीके धंधेके समान ही क्रय-विक्रयका एक धंधा है । यदि उससे लाभकी सम्भावना न हो तो उसमें कोई प्रवृत्त ही क्यो हो ? मूल्य और श्रम कहा जाता है, 'मशीनोके नये आविष्कारो एवं उत्पादनके कामोमें दक्षता आनेसे कम श्रममें वस्तु उत्पन्न होने लगती है । इसीलिये वस्तुका दाम कम हो जाता है । अतः सिद्ध है कि श्रम ही विनिमय-मूल्यका आधार है ।' पर यह बात ठीक नहीं जँचती । कारण, दूसरा पक्ष यह कह सकता है कि मालकी अधिकताके कारण ही माँग घटी और माँग घटनेसे विनिमय-मूल्य घटा । माल बढानेके कारण मशीनें भी हैं ही । आवश्यकतासे अधिक सौदा तैयार हो जानेपर मार्क्सवादी श्रमको मा० रा० २१--

३२२ मार्क्सवाद और रामराज्य निरर्थक मानते हैं। वस्तुतः उपयोग-मूल्य और विनिमय-मूल्य, यह विभाजन ही व्यर्थ है। उद्देश्यभेदसे वस्तुभेद नहीं होता। अग्नि अपने लिये जलायी जाती है, वह दूसरोंके काममें भी आती है। अग्निहोत्रके उद्देश्यसे अग्नि-मन्थन करके अग्नि प्रकट की जाती है, फिर वही भोजन बनानेके काममें आती है। कभी उसीसे यज्ञशाला भी जल जाती है। पर इतनेसे ही अग्नि दो नहीं हो जाती। भारतीय दृष्टिसे तो कोई वस्तु केवल अपने लिये पैदा ही नहीं की जाती। यज्ञ, दान, देवता, पितर तथा पड़ोसीका हित भी उद्देश्य रहता है। फिर जब अन्य वस्तुएँ तथा रुपये भी अपने काममें आते हैं, तब बेचनेके लिये तैयार किया हुआ माल भी तो प्रकारान्तरसे आत्मार्थ ही हुआ। यदि वस्त्रादि पदार्थ या रुपयादि अपेक्षित न हों तो क्यों श्रमसे वस्तु-निर्माण करे और निर्मित वस्तुको दूसरोंको क्यों दे ? अतः निष्पक्षरूपसे सर्व- हितकारी रामराज्य है। यह ठीक है कि श्रम बिना कच्चा माल तथा मशीनें व्यर्थ हैं, पर श्रम भी प्राकृतिक साधनों (कच्चे माल) के अभावमें निरर्थक ही है। अतएव श्रमको केवल सहकारी कारण माना जा सकता है। जैसे घटका कारण मृत्तिका है, पर जल सहकारी कारण है; क्योंकि जलके बिना घटका निर्माण नहीं हो सकता। तो भी घटके कारणोंमें मृत्तिकाकी प्रधानताका खण्डन नहीं हो सकता, पर सहकारी कारण होनेसे जलकी तरह श्रम भी अवश्य महत्त्वपूर्ण है। साथ ही प्राकृतिक साधन तो श्रमानपेक्ष भी कुछ मूल्य रखते हैं, पर अन्य साधनोंके अभावमें श्रमकी कोई कीमत नहीं। मजदूरी कहा जाता है, 'यद्यपि मालूम पड़ता है, मजदूरको उसके श्रमके बदले पूरी मजदूरी मिल रही है, परंतु उसको घोड़ाको दाना देनेके तुल्य केवल उतनी ही मजदूरी दी जाती है, जितनेमें वह जीवन-निर्वाह कर सके और उसमें काम करनेकी शक्ति बनी रहे। जब कभी वस्तुओकी दर घट जाती है, तो मजदूरीका परिमाण ज्यो-का-त्यो बना रहनेपर भी मजदूर जीवन-निर्वाहकी अधिक सामग्री पा सकते हैं। वस्तुओके दर बढनेपर कम सामग्री मिलने लगती है। इस दृष्टिसे मजदूरों- के वेतनके रुपयोंकी संख्या ज्यो की-त्यो बनी रहनेपर भी वास्तवमें उनकी मजदूरी घटती-बढ़ती रहती है। पूँजीवादी अर्थशास्त्रकार इस नियमको स्पष्ट और न्याययुक्त मानते हैं। पर मार्क्स इससे संतुष्ट नहीं। उसका कहना है कि कोई पूँजीपति उसी नौकरको रखता है, जो उसे दी जानेवाली मजदूरीसे अधिक माल तैयार करता है। यदि अपने जीवन-निर्वाहके लायक सामग्री पानेके लिये मजदूरको प्रतिदिन ५ घंटा काम करना पर्याप्त हो, तो उसे ५ घंटे पूँजीपतिके लिये भी काम करना आवश्यक होता है। अतः मार्क्सके मतानुसार मजदूरके अपने लिये किये गये श्रमको

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३२३

आवश्यक श्रम और पूँजीपतिके लिये किये गये श्रमको अतिरिक्त श्रम कहा जाता है। मार्क्स अतिरिक्त श्रमको बिना मूल्यका श्रम कहता है। इस तरह बदलेमें बिना कुछ दिये ही पूँजीपति मजदूरकी कमाई हजम करता रहता है।' मजदूरोंको उनके कामके अनुसार मजदूरी मिलनी परमावश्यक है। निष्पक्ष सरकार, जनता अथवा उभयपक्षीय विशेषज्ञ विद्वान् उचित मजदूरीकी दर निश्चित कर सकते हैं । समष्टि-हितकी दृष्टिसे सरकारको उस निश्चयकी मान्यता देनी चाहिये । उचित भोजन-वस्त्र, औषध, आवास-स्थान एव शिक्षाकी व्यवस्था सबके लिये होनी परमावश्यक है । उसके ऊपर भी योग्यता एव कामके अनुसार मजदूरको अधिकाधिक विकसित सुखी तथा साधनसम्पन्न होने, अपने श्रम न करने लायक माता पिता तथा बालक एवं अपनी अगली पीढीके लिये धन-सग्रह करनेका अधिकार होना चाहिये । यह सामान्य बात है कि दूसरोंकी वस्तु छीनना किसीको बुरा नहीं लगता, परंतु जब अपनी वस्तु छिनने लगती है, तब अवश्य पीड़ा प्रतीत होती है । मजदूरोके भी कुटुम्ब होते हैं। वे भी अपने कुटुम्बके भविष्यकी दृष्टिसे अनेक वस्तुओका संग्रह करते हैं । जब उनका संग्रह छिनने लगता है, तब उन्हे भी यह नहीं जँचता । कोई भी व्यापार, धंधा, उद्योग अपने फायदेके लिये ही किया जाता है। मजदूर भी फायदेके लिये नौकरी करता है। कोई आदमी अपनी खेती करके भी जीवन चला सकता है । फिर भी वह नौकरी करनेके लिये शहरोमें जाता है, वहाँ देहातोकी अपेक्षा कम परिश्रममे ही अधिक लाभ दिखायी देता है । तब फिर यह स्वाभाविक है कि पूँजीपति भी मजदूरी देकर मजदूरोसे लाभ उठाये । शास्त्रोके अनुसार भी ऋत्विक् आदिको जितनी दक्षिणा देकर यज्ञ किया जाता है, उससे लाखो गुणा अधिक फल यजमानको मिलता है । इसी तरह मजदूरोंको उचित वेतन दे देनेपर उनके द्वारा मालिकको अधिक लाभ होता हो तो उससे मजदूरका कुछ भी नुकसान नहीं होता । यदि उत्पादनमें श्रम ही सब कुछ होता, प्राकृतिक साधनो, मशीनोका महत्त्व न होता, मजदूर मजदूरी न लेता; तब अवश्य ही सब कुछ मजदूरका ही होना चाहिये था । परंतु जब अन्य साधन भी प्रधान- रूपसे अपेक्षित होते हैं, मजदूर मजदूरी लेता है, तो उत्पादनसे पूँजीपतिका लाभ अनुचित नहीं कहा जा सकता । अपने निर्वाहलायक ही काम करना तब उचित होता, जब दूसरेसे कोई प्रयोजन नहीं होता । अर्थात् जब वह अपनी पूँजीसे कच्चा माल लेकर उसे स्वय पक्का बनाकर बाजारमें ले जाता है और पूँजीसे अधिक मूल्य प्राप्त करता है, तब वह अधिक मूल्यको श्रम-फल मानता है। लेकिन जब कोई दूसरा पूँजी देता है तब उस लाभमें पूँजीवाला भी भागीदार बनेगा । इस अवस्था मे श्रमसे ही लाभ हुआ, यह नही कहा जा सकता । बिना लाभमें भाग पाये पूँजीवाला पूँजी देना स्वीकार भी न करेगा । दूसरा जब दाम देकर काम लेता है तो वह

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अवश्य चाहेगा कि इस कमाईसे मजदूरकी मजदूरी निकल आये और हमे भी कुछ मिल जाय । मजदूर सरकारको भी सरकारी काम चलानेके लिये लाभ चाहिये । यदि मजदूर अपने ही निर्वाह या लाभके लिये काम करे, संचालक सरकारके लिये कुछ न करे तो सरकारी खर्च कैसे चलेगा ? गुप्तचर, पुलिस, पलटन, शस्त्रास्त्र तथा वैज्ञानिको, अन्वेषको और विभिन्न आविष्कारोके लिये अरबोका लाभ आवश्यक है । लाभ बिना पूँजीपति दिवालिया हो जायगा । अकाल, दुष्काल, अति- वृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, शलभ, मूषक, भूकम्प तथा अन्य उत्पातोके कारण नुकसान या घाटा होनेपर पूँजीपतिको कारखानो, मजदूरो एव अपना भी काम चलाना ही पड़ेगा । यदि लाभ न हो तो यह सब काम कैसे चलेगा ? पूँजी या लाभ बिना किसी भी राष्ट्र या सरकारका काम ही नहीं चल सकता । यह बात अलग है कि पूँजी एवं लाभ व्यक्तिके पास न जाकर मजदूर-सरकारके पास जाय जो पूँजी एवं लाभ एक जगह दोष था, वही दूसरी जगह जाकर गुण हो जाय, यह भी कम्युनिस्टोकी विचित्र बात है । अतएव मालिक सीधे-सीधे घंटो और महीनोके हिसाबसे श्रमको खरीदते हैं । कभी-कभी उससे लाभ न होनेपर भी उन्हे दाम देना पड़ता है । कभी कुछ लाभ मिलता है, कभी ज्यादा लाभ भी मिलता है । कोई सौदा भी खरीदनेसे यही बात होती है । कभी घाटा, कभी लाभ प्राप्त होता है। इसमें बिना कुछ दिये हजम कर जानेका प्रश्न ही नहीं उठता। अतः अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना इस दृष्टिसे सर्वथा व्यर्थ हो जाती है । अतिरिक्त लाभ मशीनोके आविष्कार होनेपर मशीनोंद्वारा लाखो मजदूरोका काम हो जाता है । फिर तो मशीनकी कमाईका फल मशीन-मालिकको मिलना ठीक ही है । कहा जाता है कि 'जमीन खोदनेवाले मजदूरको एक घंटेके परिश्रमका फल उतना नही मिलता, जितना कि एक इंजीनियरके परिश्रमका होता है।' इसका कारण मार्क्सवादियोकी दृष्टिसे यह है कि 'जमीन खोदनेका काम मनुष्य एक या दो दिनमें सीख सकता है, परंतु इंजीनियरका काम सीखनेके लिये १० वर्ष- का परिश्रम अपेक्षित होता है। १० वर्षकी मेहनतका दाम इंजीनियर अपने मेहनतके प्रत्येक घंटे और दिनमें वसूल करता है । इसीलिये उसके परिश्रमके एक घंटेका दाम मामूली मजदूरके एक घंटेके परिश्रमके दामसे दसगुना अधिक होता है।' उपर्युक्त तर्क अविचारितरमणीय है । वस्तुतः यहाँ श्रमवैचित्र्यसे ही उसके मूल्यका वैचित्र्य मानना उचित है। किस ढंगके परिश्रमका फल कितना और कैसा होता है, इसी आधारपर उसका दाम आँका जाना ठीक है । अन्यथा जबसे ही इंजीनियर काम सीखना आरम्भ करता है तबसे ही गरीब किसान जमीन

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३२५ खोदने, हल जोतने, बोझा ढोनेका काम करता रहता है। इस तरह हर दृष्टिसे इंजीनियरके परिश्रमसे मजदूरोंका परिश्रम अधिक ही होता है। अध्यात्मवादीकी दृष्टिमें उसी तरह कालान्तर एव जन्मान्तरके कर्मों एवं उनके विचित्रतासे ही फलोंमें भेद होता है। समष्टि जगत्के परमहितकी दृष्टिसे विचारपूर्ण सूक्ष्म कर्मों के फलस्वरूप ही उच्चकोटिके ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न जन्म होते हैं। जन्मान्तरीय सुकृत-दुष्कृत कर्मोंके अनुसार ही प्राणियोंको विविध प्रकारके वैध भूमिधन आदि दान, क्रय, दान, पुरस्कार आदिरूपमें प्राप्त होते हैं। जन्मान्तरीय सुकृत- दुष्कृत वैचित्र्य बिना मनुष्य-पशु आदिके जन्म-वैचित्र्यका हेतु जड़वादी कुछ भी नहीं कह सकते। हेतु विचित्रता बिना कार्यमें विचित्रता असम्भव ही होती है। अतः धर्माधर्म-वैचित्र्यमें ही फल वैचित्र्य मानना पड़ेगा। वस्तुतः मार्क्स आदि भौतिकवादी विश्वको निरीश्वर ही मानते हैं। उनकी दृष्टिमें न ईश्वर है, न जड़-देहादि संघातसे भिन्न आत्मा और न जन्मान्तर। अतएव जन्मान्तरीय कर्मों तथा जन्मान्तरीय कर्मफल भोग भी उन्हें मान्य नहीं है। जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, उनके सभी विचार विकासवादकी दृष्टिसे चलते हैं। उनके मतानुसार पक्षी, पशु, वानर, वनमानुष आदि क्रमसे मनुष्यका विकास हुआ है। संसार अल्पशक्तिसे बहुशक्तिमत्ताकी ओर, अज्ञतासे विज्ञताकी ओर, असभ्यतासे सभ्यताकी ओर तथा जंगलीपनसे नागरिकताकी ओर जा रहा है। फलतः सभीके पूर्वज पिता-पितामहादि अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदिकी अपेक्षा अल्पज्ञ, अल्पशक्ति, असभ्य तथा जंगली थे। इस दृष्टिसे ऋषि, महर्षि अज्ञानी एवं जंगली ही थे। अतएव व्यास, वसिष्ठ, अत्रि, बृहस्पति, शुक्र आदि ऋषि-महर्षियोंकी शास्त्रीय व्यवस्थाओंको भी ये लोग अवैज्ञानिक, असंगत, संकीर्ण एव शोषणमूलक मानते हैं। बृहस्पति आदि ऋषियोंने व्यापारको मालिक एव मजदूरकी सम्मतिसे निश्चित लाभके लिये ही बताया है। वेतन मजदूरी आदिको परिमित ही माना है। लाभांश पूँजीपतिका ही माना है। भूमिका लगान भी इन ऋषियोंने मान रखा है, परंतु मार्क्सवादी इसे स्वीकार नहीं करते। वे आर्ष इतिहासको प्रमाण नहीं मानते—भले ही आधुनिक मिथ्या मनगढत इतिहासोंको ही सत्य मान लें। उनके अनुसार 'पहले सब मनुष्य जगली थे, असभ्य थे, परिवार आदि नहीं बसाते थे। हजारों वर्ष बाद परिवारकी प्रथा चली, फिर खेती करना सीखा। अनेक वस्तुओंका बनाना और उनका उपयोग करना सीखा। आवश्यकता- से अधिक अन्न तथा अन्य वस्तुएँ पैदा होने लगीं। तब दूसरे पड़ोसियोंसे विनिमय- की बात भी सीखी। भूमि पहले किसीकी नहीं थी, खेती करनेसे लाभ होते देखकर प्रवल लोगोंने दुर्बलोंसे भूमि छीनी। दुर्बलोंसे धन भी छीन लिया तथा

३२६ मार्क्सवाद और रामराज्य उनसे जबर्दस्ती काम लेकर उनकी कमाईको हड़प कर राजा, जमींदार, धनवान् या पूँजीपति बन गये । दुर्बलोंको साधनहीन बनाकर युगोंसे उनका शोषण चल रहा है। उन्हींके परिश्रम एवं कमाईका सब वैभव है, जिससे पूँजीपति और जमींदार, सामन्त लोग मौज ले रहे हैं। इसीलिये आजके यान्त्रिक महान् औद्योगिक विकास युगका जो कुछ भी भूमि, पूँजी या मुनाफा है, सब मजदूरोंका ही है, सब उन्हीं- की कमाई है। लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम सौदा बेचनेसे मिलता है, सब मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है। वह सब मजदूरोंको न मिलकर उसका स्वल्पांश मिलता है, यह अन्याय है। अतः अब सब भूमि, पूँजी, कल-कारखाने, मशीन, पूँजीपतियोंके हाथसे छीनकर सम्पूर्ण राष्ट्रोंका मालिक मजदूरको ही बनाना चाहिये। मजदूरका अधिनायकत्व सम्पादित कर पूँजीपति सेठ आदिकोको इतना कुचल देना चाहिये, जिसमें कभी भी सिर उठाने लायक न रह जायें । इसके लिये न्याय-अन्याय, हिंसा-अहिंसा, अपहरण आदि जो भी करना पड़े वही धर्म है, वही न्याय है, वही शास्त्र है। किसी भी पुराने न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, या शास्त्र और तदनुकूल नियम व्यवस्थाओंको एकदम नष्ट कर देना चाहिये।' इस तरह अध्यात्मवादी धर्मनियन्त्रित शासन ' रामराज्य धर्मसापेक्ष पक्षपातहीन राज्यका भौतिकवादी समाजवाद, साम्यवादके साथ किसी तरह भी कोई समन्वय हो सकना असम्भव है। पूर्व-पश्चिम या अन्धकार-प्रकाशके समान इनका परस्पर आधारमें, साधनमें, साध्यमें, व्यवहारमें महान् मतविरोध है। अध्यात्मवादीके मतानुसार जगत्प्रपञ्च चेतन सर्वज्ञ ईश्वरका कार्य है, देहभिन्न अनादि, अनन्त जीवोंके शुभाशुभ जन्मान्तरीय कर्मोंकी विचित्रतासे ही जगत्की विचित्रता होती है। जडवादी कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, परंतु ईश्वरका अभाव भी उन्होंने कैसे जाना ? यदि कहे कि उपलब्ध नहीं होता—इसलिये ईश्वर नहीं है, तो यह असंगत है। क्योकि कितनी वस्तुएँ विद्यमान रहनेपर भी सूक्ष्म रहनेसे उपलब्ध नहीं होतीं। अति दूर होनेपर पर्वत आदि तथा आकाशमें उड़ते हुए पक्षी नहीं दीखते। अति सामीप्यके कारण नेत्रस्थ अञ्जन भी अपने ही नेत्रोंसे नहीं दीखता । इन्द्रियघात अन्धत्व, बधिरत्वसे भी रूप-शब्द आदि नहीं गृहीत होते । मनकी अनवस्थितिसे, कामादिसे उपहतमनस्क स्फीतालोक-मध्यवर्ती घटको भी नहीं देख सकता। अति सूक्ष्म होनेसे समाहितमनस्क प्राणी भी परमाणु आदिको नहीं देख सकता । व्यवधानसे वस्तु अन्तर तिरोहित वस्तुका दर्शन नहीं होता, जैसे कुड्यादि व्यवहित वस्तुका अदर्शन। तारों आदिका अदर्शन अभिभवके कारण ही नहीं होता, जैसे सूर्यकी प्रभासे अभिभूत होनेके कारण दिनमें रहते हुए भी तारागण नही दीखते । समानाभिहारसे भी वस्तुका उपालम्भ नहीं होता, जैसे जलाशयमें निपतित तोय-विन्दु‌का भेद अनुभूत नहीं होता। क्षीर

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३२७ आदि अवस्थामें दधि, घृत आदि अनुद्भूत होनेसे भी अनुपलब्ध होते हैं, वैसे ही परमाणु, प्रकृति, परमेश्वरकी भी अनुपलब्धि होती है। अभावके कारण अनुपलब्धि नहीं कही जा सकती। 'अतिदूरात्सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात्। सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः' (सांख्यकारि० ७, सां० द० १ । १०८, महाभाष्य ४ । १ । ३, चरकसूत्र ० १० । ८) कहा जा सकता है कि 'फिर तो उपलब्ध न होनेपर भी जैसे ईश्वर, आत्मा आदिकी सत्ता मान लेते हैं, उसी तरह अनुपलब्ध होनेपर भी सप्तम रस एव खपुष्पादि भी मान लेना पडेगा।' परन्तु इसका उत्तर यह है कि प्रकृति, आत्मा, परमात्मा आदि प्रमाणसिद्ध हैं, सप्तम रस खपुष्पादि प्रमाणसिद्ध नहीं हैं। प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है। जैसे रूपोपलब्धि रूप-क्रियाके द्वारा नेत्ररूप सूक्ष्म इन्द्रियकी सत्ता सिद्ध होती है, वृक्षके द्वारा बीजका अनुमान होता है, वैसे ही प्रपञ्चरूपी कार्यके द्वारा उसका उपादान कारण एव कर्त्तारूपी निमित्त कारणका अनुमान होता है। वही उपादान एव निमित्तकारण प्रकृतिविशिष्ट ईश्वर है। शय्या, प्रासाद आदिसंघात-विलक्षण चेतन देवदत्त आदिके लिये होते हैं। इसी तरह देहेन्द्रियादि सघात भी स्वविलक्षण किसी असंहत चेतनके लिये अवश्य होने चाहिये। इन युक्तियोंसे तर्क-अनुमानोंसे चेतनात्मा तथा परमेश्वरकी सिद्धि होती है। यदि प्रत्यक्षद्वारा अनुपलब्ध होनेसे ही वस्तुका अभाव निर्णय किया जाय, तब तो गृहसे विनिर्गत जनोको न देखकर उनका भी अभाव समझ लिया जायगा। अतःप्रत्यक्षयोग्यकी प्रत्यक्षानुपलब्धिसे ही अभावका निर्णय किया जा सकता है। घ्राणातिरिक्त श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियोसे अग्राद्य होनेपर भी केवल घ्राणद्वारा उपलब्ध होनेसे गन्धकी सत्ता मान्य है। अतः गन्धका अभाव नहीं कहा जा सकता। चित्तकी एकाग्रतारूपी योगसे उद्भूत सामर्थ्ययुक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा तथा अपौरुषेय आगमद्वारा आत्मा, परमात्माका दृढ निर्णय होता है। विवेक-विज्ञान- द्वारा सर्वभासक अखण्ड बोध, अखण्ड सत्ताका, जो कि सभी परिच्छिन्न बोधो एवं सत्ताओंका उद्गमस्थान है, स्वप्रकाशरूपसे स्पष्ट साक्षात्कार होता है। चक्षुरादि स्थूल प्रत्यक्ष साधन एवं काँच, यन्त्र या यान्त्रिक विश्लेषणोसे वैज्ञानिकोंको उपलब्ध न होनेमात्रसे प्रकृति, परमेश्वरादिका अभाव नहीं कहा जा सकता। अनेक चीजोंको वैज्ञानिक पहले नहीं जानते थे, अव जानने लगे हैं। प्रथम जिन परमाणु हाइड्रोजन शक्तियोंका ज्ञान उन्हें नहीं था, उन्हींका आज प्रत्यक्ष हो रहा है। एतावता वे शक्तियाँ पहले नहीं थीं—यह कैसे कहा जा सकता है ? वायुयानका जब आविष्कार नहीं हुआ था, तब यह भी असम्भव-जैसी चीज थी; परन्तु अव सम्भव हो गयी। पहले सूर्यमण्डलसे भूमण्डलकी उत्पत्ति मानकर

३२८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही विकासवादी संतुष्ट हो गये थे, परंतु फिर बादमें पृथ्वी आदि भूत-चतुष्टयको सूर्यका भी कारण समझा । फिर कई लोगोंने आकाशको भी स्वीकार कर लिया । अब बहुतोंको प्रकृतिमें भी विश्वास होने लगा है । सम्भव है आगे चलकर आत्मा, परमात्मा आदिका भी कुछ आभास उपलब्ध हो । जो विज्ञान स्वयं अभी अपनेको प्रकृतिके अनन्त भण्डारमेंसे अतिक्षुद्र कणके भी सम्पूर्णतया जानकार होनेका दावा नहीं करता, उस विज्ञान एवं वैज्ञानिक यन्त्र-बलपर ईश्वर, धर्मशास्त्र तथा सर्वज्ञकल्प ऋषियों, महर्षियों तथा योग्य सामर्थ्यका खण्डन करना एक दुस्साहसपूर्ण मूर्खता है । अध्यात्मवादी प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आर्ष एवं अपौरुषेय आगमोंके आधारपर परमेश्वरसे सृष्टि मानते हैं, शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार जगत्की विचित्रता मानते हैं । जैसे शास्त्रानुसार ही निकृष्ट कर्मोंके फलस्वरूप श्वान, शूकर, गर्दभ आदि योनियोंमें जन्म होता है, उन्हें मनुष्योचित शय्या, प्रासाद, भोजन आदि नहीं प्राप्त होता, वैसे ही पशु आदिकी अपेक्षा उत्कृष्ट, परंतु निकृष्ट कर्मोंके कारण ही कुछ ऐसे मनुष्योंका भी जन्म होता है, जिनके पास पर्याप्त भूमि, सम्पत्ति आदि नहीं होती । इसी तरह कर्मोंके उत्कर्षापकर्षके कारण ही भूमि, धन, उच्च मस्तिष्क विद्यादिसम्पन्न मनुष्य 'तथा देवादि जन्म होते हैं । इस दृष्टिसे कुछ लोग उत्पादन, साधन एव श्रम दोनोंहीसे सम्पन्न होते हैं । कुछ लोग श्रमसे ही जीविका उपार्जन करते है । उन्हींके सम्बन्धमे वेतन, मजदूरी आदिका विवेचन शास्त्रोंमें है । यद्यपि काम करनेवाले और काम करानेवालोंके ही आपसी समझौतेसे मजदूरी या वेतन आदिका दर निश्चित होता है, तथापि राष्ट्रकी आर्थिक स्थिति लाभ और कामकी स्थितिको देखकर समाज या सरकार भी औचित्यके आधारपर मजदूरीका दर निर्णय कर सकते हैं । शास्त्रोंमें साझेकी खेतीकी एव साझेके व्यापारोंकी भी पर्याप्त चर्चा है, परंतु लाभमें साझेदारोका हिस्सा मान्य होता है, नौकरोंका नहीं । क्योंकि उन्हे नौकरी मिलती ही है । मालिक इसी लाभके लिये रुपया, कच्चा माल, मशीन और बुद्धि-परिश्रमका उपयोग करता है । कभी-कभी घाटा भी उठाता है, जिसमें साझेदार ही हिस्सेदार होते हैं, मजदूर नहीं । कहा जाता है कि 'पूँजी, मशीन आदि साधन ' भी मजदूरोंके ही श्रमका फल है; क्योंकि छोटे व्यापार एव छोटी मात्रामें होनेवाली खेतीसे जो क्रमशः धन- राशि संगृहीत हुई है, वह भी मजदूरो एव मालिको ( हलवाहो ) के अतिरिक्त परिश्रमके फलस्वरूप अतिरिक्त आयका ही संग्रह है । परंतु यह भी तो हो सकता है कि कोई स्वयं खेती करनेवाला किसान अपने ही खेतसे अन्न या तेलहन आदि उत्पन्न करता है और स्वयं ही कोल्हूमें तेल पेरता है । अन्य तेल बेचकर पूँजी इकट्ठा

करता है, या वकालत, डाक्टरीके पेशेसे जिससे कि सैकड़ों, हजारोंकी प्रतिदिन आमदनी होती है, या इंजीनियरीके पेशेसे पर्याप्त धन कमाता है । वह अपने ही परिश्रमसे कमाया हुआ धन है, उस पूँजीसे व्यापार करनेवालेके व्यापारमें या औद्योगिक कार्यमें होनेवाला लाभ तो पूँजीपतिका मानना ही पड़ेगा । कहा जाता है कि 'मशीनोंके अधिकाधिक विकाससे मशीनोंकी सहायतासे पैदावार बढ़ जाती है, परंतु मेहनतकी शक्ति घट जाती है, अर्थात् बहुत मजदूरोंकी जरूरत नहीं पड़ती, अतः उसका दाम भी कम पड़ता है । इससे पूँजीपतिका लाभ खूब बढ़ जाता है।' परंतु यह अनुचित भी तो नहीं है, जब वैज्ञानिको और मशीनों- पर पर्याप्त पैसा लगाया गया है, तभी तो मशीनें बनी हैं। फिर उनका फायदा उठाना क्यों अनुचित है ? जैसे मार्क्सवादी इं जीनियरके डजीनियरी सीखनेके समयके श्रमके दामका भी कामके घंटोंके दाममें वसूल करना उचित मानते हैं, वैसे ही वैज्ञानिकोके शिक्षाका खर्च, अन्वेषणका व्यय, मशीन बनानेका व्यय, मशीन खरीदनेका खर्च आदिका भी तो दाम और उसका मुनाफा वमूल करना उचित है । पैसेका सूद रूसी मार्क्सवादी भी देते हैं, अतः पैसेका भी लाभ होना उचित है। जैसे कोई कच्चे मालसे पक्का माल पैदा करनेवाला उपयोगी सौदा बनाकर कच्चे मालके दामसे अधिक दाम वसूल करता है, वैसे ही पैसेके दामसे कहीं अधिक दाम पैसेको काममें लगाकर वसूल किया जाना उचित ही है । मार्क्सके मतसे मशीनोंके द्वारा पैदावार बढ़ जानेसे एवं मजदूरोंकी कम अपेक्षासे मजदूरोंकी बेकारी बढ़ती है । मजदूरोंकी बेकारीते पचानवे प्रतिशत मजदूरवाले समाजमें क्रय (खरीदने) की शक्ति घट जाती है । इसलिये बाजारमें माल- की खपत कम होती है । तदर्थ माल कम पैदा करनेकी चेष्टामें और मजदूर कम करने पड़ते हैं । इससे और बेकारी बढ़ती है । फलस्वरूप खपत और कम हो जाती है।' इस तरह पूँजीवादी प्रणालीमें उत्पन्न हुए गतिरोधको समाप्त करनेका मार्क्सीय उपाय यह है कि 'समाजकी आवश्यकताओंको पूर्ण करनेके लिये जितने आवश्यक सामाजिक श्रमकी जरूरत हो, उसे सम्पूर्ण समाज सहयोगसे करे, कोई भी व्यक्ति बेकार न रहे । पैदावारके उन्नतिके साधनोंकी सहायतासे प्रत्येक व्यक्तिको कम परिश्रम करना पड़े और साथ ही पैदावारको भी बढ़ाया जाय । अपने परिश्रमके अनुसार सब फल पाये । इससे प्रत्येक श्रमिकको परिश्रम कम करना पड़ेगा, परंतु खरीदनेकी शक्ति सबके पास बनी रहेगी, अतः मालके खपतमें कमी न होगी ।' अध्यात्मवादी रामराज्यमें यद्यपि लाभका अधिकारी उद्योगपति ही है तथापि लाभका पञ्चधा विभाजन करके एक हिस्सा मालिकके काम आता है । अवशिष्ट धर्म, यश आदिके नामपर राष्ट्रके काममें खर्च कर दिया जाता है । लाभ एव कामके अनुसार ही मजदूरोंकी मजदूरीका भी दर निश्चित किया जाता है ।

३३२ मार्क्सवाद और रामराज्य या मुनाफा कहलाता है, वह शुद्धरूपसे मेहनतका ही फल है। इसी प्रकार जब पूँजीपति बडे पैमानेपर सौदा तैयार कराता है, तब भी लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम मिलता है, वह लाभ या मुनाफा मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है। सौदेके मूल्यमेंसे कच्चे मालका मूल्य निकाल लेनेपर केवल सौदेका खर्च और मेहनतका ही मूल्य बच जाता है, पर पूँजीपति मेहनतका पूरा फल मजदूरको दे देता है तो मुनाफेकी कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। अतः मजदूरके मेहनतका जितना फल उसको मिलता है उतना ही पूँजीपतिको अधिक लाभ होता है।' पर यह विचार एकाङ्गी दृष्टिकोणसे ही है । लाभ या मुनाफा केवल मेहनतका फल नहीं हो सकता, किंतु वह कच्चे माल एवं मेहनत दोनोंका ही फल है। यदि मेहनत बिना कच्चा माल अल्प मूल्यका था, तो कच्चे माल बिना मेहनत भी व्यर्थ थी। फिर तो जैसे पूँजीपतिने दाम देकर कच्चा माल खरीदा वैसे ही दाम देकर श्रम भी खरीदा। दोनोंके खरीदनेमें खर्च हुए । दामसे अधिक दाम जो मुनाफेके रूपमें मिला, वह पूँजीपतिका ही होता है । जैसे श्रमवाला अपने श्रमका फल चाहता है, वैसे ही कच्चा मालवाला अपने कच्चे मालका फल चाहता है। जैसे कभी-कभी अवसरपर कच्चे मालमें तेजी-मंदी आती रहती है, वैसे ही श्रममें भी सस्तापन और महँगापन आता रहता है। दुर्लभता एवं माँगकी अधिकता होनेपर कच्चा माल महँगा हो जाता है, वैसे ही दुर्लभता एवं माँगके अनुसार ही श्रम भी महँगा हो जाता है । कभी बाजारमें सस्ते दाममें कच्चा माल भी मिलता है, कभी सस्ते दाममें श्रम मिलता है। कहा जा सकता है कि 'कच्चे मालका जो दाम मिल गया, वह उसका दाम है', परंतु इसी तरह यह भी तो कहा जा सकता है कि मजदूरोंको भी श्रमका वेतन उन्हें मिल गया । इसी तरह श्रम और कच्चा माल दोनों ही श्रमिकका होता तो दोनोंका ही फल उसे ही मिलता या कच्चा माल खरीदनेका दाम और श्रम दोनों ही श्रमिकके होते तो भी सब फल उसीको मिलता । किंतु जब श्रम श्रमिकका है, कच्चा माल और उसका दाम दूसरेका है, तब तो जैसे श्रमका फल श्रमिकको मिलना चाहिये, वैसे ही कच्चे मालका भी फल उसके मालिकको मिलना ही चाहिये। जैसे श्रमिक मिलनेवाली मजदूरीको कम कहता है वैसे ही कच्चे मालका विक्रेता भी अपने मालके मिलनेवाले दामको कम कहता है । इन दोनोंको जो अपने पैसेसे इकट्ठा करता है, दोनोंका प्रबन्ध करता है, यद्यपि लाभकी आशा ही करता है, तथापि कभी-कभी अनुमानके विपरीत उसे नुकसान भी होता है। जो इन सब खतरोंको अपने सिरपर झेलता है, उसे उसके पैसे, परिश्रम, साहस, हानि एवं खतरा उठानेका आखिर क्या फल होगा ? अतः कच्चे मालके दाम निकालकर बचे हुए सौदेका दाम श्रमका ही फल है, यह कहना गलत है ।

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३३३ हाँ, कच्चे माल एव श्रमके उचित मूल्यका निर्धारण करना आवश्यक है । इसपर भारतीय शास्त्रोने पर्याप्त प्रकाश डाला है । इससे पूँजीपतिके आयपर भी नियन्त्रण हो जाता है । शास्त्रोने मजदूरी या वेतनके सम्बन्धमें मुख्यरूपसे यही नियम माना है कि मालिक और नौकरका जो आपसी सम्मतिसे तय हुआ हो, वही उसकी मजदूरी है । भृतककी मिताक्षरामें इस प्रकार व्याख्या की है— मूल्येन यः कर्म करोति स भृतकः । ( याज्ञ० स्मृति, मिता० व्यव० १८३ ) मजदूरी या नौकरीको भृति शब्दसे कहा गया है । भृतिकी परिभाषा यों है— यत्र यादृशी भृतिः परिभाषिता स्वामिभृत्याभ्यां तादृशी तत्र भृतिर्भृत्येन लभ्यते । ( याज्ञ० स्मृ० वीरमित्रोदय टीका १९३ ) वहीं 'मिताक्षरा' में नारद-स्मृतिका यह वचन उद्धृत किया है— भृत्याय वेतनं दद्यात् कर्मस्वामी यथाकृतम् । आदौ मध्येऽवसाने वा कर्मणो यद्विनिश्चितम् ॥ ( नारद स्मृ० ६ । २ ) भृत्य एव स्वामीद्वारा निश्चित मूल्य ही वेतन है । हाँ, जहाँ वेतन विना निश्चित किये ही मालिक श्रम कराता है, वहाँ वाणिज्य, पशु तथा सस्य ( फसल ) से होनेवाले लाभका दसवाँ भाग नौकरको राजाद्वारा दिलाया जाना चाहिये— भृतिमपरिच्छिद्य य कर्म कारयति तं प्रत्याह— ( मिता० ) दाप्यस्तु दशमं भागं वाणिज्यपशुसस्यतः । अनिश्चित्य भृतिं यस्तु कारयेत् स महीक्षिता ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९४ ) खाली हल चलानेवाला उससे होनेवाली आमदनीसे तीसरा भाग पा सकता है । यदि उसे भोजन-वस्त्र भी मिलता हो, तो उसे लाभका पाँचवाँ भाग मिलना चाहिये— त्रिभागं पञ्चभागं वा गृह्णीयात् सीरवाहकः । भक्ताच्छादभृतः सीराद् भागं भुञ्जीत पञ्चमम् ॥ ( बृहस्पतिस्मृ० ) परतु जो नौकर देशकालानुसार विक्रय, कर्षण आदि कार्य ठीक ठीक नहीं करता और प्रकारान्तरसे लाभ उठाता है, वहाँ स्वामीकी इच्छा ही मुख्य है । अर्थात् उसे सम्पूर्ण वेतन नहीं देना चाहिये । अधिक लाभ करता है, तो दशमांश- से अधिक देना चाहिये— देशं कालं च योऽतीयाल्लाभं कुर्याच्च योऽन्यथा । तत्र स्यात स्वामिनश्छन्दोऽधिकं देयं कृतेऽधिके ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९५ )

३३४ मार्क्सवाद और रामराज्य अनेक मजदूर जहाँ मिलकर काम करते हैं, वहाँ उनके कामके अनुसार वेतन मिलना चाहिये । कोई नौकर दो आदमीका काम करे तो उसे दुगुना तथा कोई यदि एक आदमीसे भी कम करे तो उसे कुछ कम वेतन भी मिलना चाहिये । यथा निश्चय अथवा मध्यस्थद्वारा निर्णीत वेतन मिलना उचित है, सभीको समान नहीं— यो यावत् कुरुते कर्म तावत्तस्य तु वेतनम् । उभयोरप्यसाध्यं चेत् साध्यं कुर्याद्यथाश्रुतम् ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९६ ) गोपालन करनेवाले गोपालकी मजदूरीका रूप मनुने लिखा है कि 'जो भोजन-वस्त्र नहीं पाता, ऐसा गोपाल यदि दस गौओंका पालन करता हो, तो एक गायका दूध उसे मजदूरीके रूपमें मिलना चाहिये— गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद् दशतो वराम् । गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात् पालेऽभृते भृतिः ॥ ( मनु० ८ । २३१ ) राजकीय कर्मचारियोंके लिये दूसरे ढंगका भी वेतन है । दस ग्रामपर शासन करनेवालेके लिये एक कुलका लाभ मिलना चाहिये । बीस गाँवोंपर शासन करनेवालेको पाँच कुलका, शताध्यक्षको एक ग्राम एवं सहस्राध्यक्षको पुरका लाभ मिलना चाहिये । ग्रामवासी जो अन्न-पान, ईंधन आदि राजाको देते हैं, वह उस कर्मचारीको मिलना चाहिये । यह सब अधिकार, शिक्षा, योग्यता आदिके आधारपर समझना चाहिये— दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च । ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिः पुरम् ॥ ( मनु० ७ । ११९ ) कौटल्यने वेतन-निर्णयके प्रसगमे सूत्र कातनेके लिये कहा है कि 'सूतकी चिक्णता, स्थूलता, मध्यता आदि जानकर वेतन निर्धारण करे— श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । ( कौटलीय अर्थशास्त्र २ । २३ । ३ ) अच्छा काम देखकर वेतनसे अतिरिक्त तेल, उबटन आदि देकर मजदूरोंको सम्मानित करे—'सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात्' ( कौट० अर्थ० २ । २३ । ५ ) काममें कमी हो, तो वेतनमे कमी होनी चाहिये—'सूत्रह्रासे वेतनह्रासः' ( वही ७ ) । वेतनका समय बीत जानेपर मध्यम वेतन देना चाहिये—'वेतनकालातिपाते मध्यमः' ( वही १६ ) । तीसरे अधिकरणके १४ वें अध्यायमें कौटल्यने मजदूरोके सम्बन्धमे बहुत कुछ कहा है । उससे भी प्रायः मालिक एवं नौकरद्वारा वेतन और कामका परिणाम निश्चित होता है । इसीलिये कहा गया है कि मालिकद्वारा निर्धारित कामसे अधिक करनेपर उतनी मिहनत व्यर्थ ही समझनी चाहिये—'सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं मोघं कुर्यात्' ( ३ । १४ । १३ ) इस प्रकरणमें याजकों तथा ऋत्विजोंके वेतनपर भी विचार किया गया है ।

मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३३५ अतिरिक्त श्रम और मुनाफा मार्क्सवादियोंका कहना है कि 'मजदूरको मेहनतके फलका वह भाग जिसका दाम मजदूरको नहीं मिला मालिकका मुनाफा है।' मजदूर जितने समयतक मेहनत कर परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, उससे जितना भी वह अधिक करेगा, वह सब मालिकका मुनाफा होगा। यदि वह पाँच घंटे काम करके अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पूरा कर लेता है तो दिनभरके मेहनतके शेष घंटे मालिकके मुनाफेमें जाते हैं, वही अतिरिक्त श्रम है। अपनी श्रम-शक्तिको कायम रखनेके लिये मजदूरको जितना श्रम करना जरूरी है, उसमे जितना भी अधिक मजदूरको करना पड़ता है, वह आवश्यक या अतिरिक्त श्रम है। उसका दाम अतिरिक्त मूल्य है। यह अतिरिक्त श्रम एव अतिरिक्त मूल्य ही मालिकका मुनाफा है।' मार्क्सके आर्थिक सिद्धान्तोंकी यही आधारशिला है। उसके मतानुसार 'इस अतिरिक्त श्रम एवं अतिरिक्त दामको पानेका आन्दोलन ही मजदूर आन्दोलन है। इसके फलस्वरूप समष्टिवाद या समाजवाद स्थापित होगा। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति शक्तिभर परिश्रम करे और अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थोंको प्राप्त करे। इससे शोषणका अन्त होगा, किसीको अपनी इच्छा- विरुद्ध जीवन-निर्वाहके लिये विवश न होना पड़ेगा। फिर न उसके लिये नियन्त्रणकी जरूरत होगी, न शासन रहेगा और न सरकार रहेगी।' अतिरिक्त दामके सम्बन्धमें लेनिनका कहना है कि सौदेके विनिमयसे अतिरिक्त दाम (मुनाफा) प्राप्त नहीं हो सकता; क्योंकि उसे तो समान लागतके सौदोंको एक दूसरेसे बदला जाता है। सौदेका दाम न बढ़ने या घटनेसे भी अतिरिक्त दाम पैदा नहीं हो सकता। क्योंकि उसका तो इतना ही अर्थ होगा कि समाजके कुछ आदमियोंके हाथसे दाम निकलकर दूसरोंके हाथमें चला जायगा। समाजमें जो आज खरीदनेवाला है, वही कल बेचनेवाला और जो आज बेचनेवाला है, वही कल खरीदनेवाला बन जाता है। अतः अतिरिक्त दाम प्राप्त करनेके लिये पूँजीपतिको बाजारमें एक ऐसे सौदेकी खोज करनी पड़ती है, जिसे व्यवहारमें लाकर उसपर खर्च किये गये दामसे अधिक दाम प्राप्त किया जा सके। बाजारमें ऐसा सौदा मनुष्यकी श्रम-शक्ति ही है। मनुष्यकी श्रम-शक्तिका उपयोग है परिश्रम। परिश्रमका मूल है दाम। पूँजीपति मनुष्यकी मेहनतकी शक्तिको बाजारदामपर खरीद लेता है। दूसरे सब सौदोंकी तरह मनुष्यकी परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम भी उसे पैदा करनेके लिये आवश्यक सामाजिक श्रमसे निश्चित करना पड़ता है। मनुष्यकी मेहनत-शक्तिको उस

घंटेके लिये पूँजीपति उसे कामपर लगा देता है। मजदूर पाँच घंटे काम करके ही उतने दामका सौदा पैदा कर लेता है, जितना उसे दस घंटे काम करनेके बाद मिलता है । शेष पाँच घंटेमें मजदूर अतिरिक्त दाम या सौदा पैदा करता है, जो पूँजीपतिकी जेबमें जाता है। मार्क्सके मतानुसार अतिरिक्त श्रम या अतिरिक्त दाम ले सकना ही शोषणकी शक्ति और अधिकार है। समाजमें जहाँ कहीं शोषण होगा, इसी शक्ति एवं अधिकारके बलपर होगा। मनुष्यकी आदिम अवस्थामें पैदावारके साधन बहुत कमजोर थे; अतः दिनभर कठिन परिश्रमके बाद निर्वाहके लायक पदार्थ प्राप्त होते थे । उस समय मनुष्यद्वारा मनुष्यके शोषणकी गुंजाइश न थी । ज्यों-ज्यों पैदावारके साधनोंमें उन्नति होने लगी, मनुष्य पैदावार आसानीसे करने लगा और जितना उसके निर्वाहके लिये नितान्त आवश्यक था, उससे अधिक पैदा करने लगा; अर्थात् परिश्रमकी शक्तिको कायम रखनेके लिये जितना बिलकुल ही जरूरी था, उससे अधिक पैदा करने लगा तो यह पैदावार जमा होने लगी। यही धन हो गया और यही पैदावारका सबसे बड़ा साधन है।' इस कथनसे स्पष्ट है कि 'पैदावारके सबसे बड़ा साधन धनको उन्नत साधनके द्वारा व्यक्तिने स्वयं कमाया। ऐसा विकास होनेके बाद कुछ आदमियोंके परिश्रमका अतिरिक्त भाग दूसरोंके पास जमा होने लगा । वे अधिक साधन- सम्पन्न और बलवान् श्रेणीके बन गये।' परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे तो सिद्ध हो गया कि वस्तुके मूल्यका आधार श्रम ही नहीं; कच्चा माल, मशीन आदि भी है, और कच्चे मालके समान ही श्रम भी खरीदा जाता है। श्रमका मूल्य माँग और पूर्तिके आधारपर अथवा पंचायत या न्यायालयद्वारा निर्धारित किया जाना उचित है, और ऐसा होता भी था । भारतीय धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा आधुनिक भारतीय शासकोंके इतिहाससे भी यह सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें अतिरिक्त श्रम, अतिरिक्त मूल्यका कोई अस्तित्व ही नहीं ठहरता । अतएव शोषणकी कहानी भी अतिरंजित ही है। हाँ, यह अवश्य है कि भारतीय दृष्टिकोणसे यदि ८ घंटे काम करनेके लिये ८ हृष्ट-पुष्ट बैल आवश्यक होते हैं तो अवश्य ही एक मजदूरसे बराबर दस घंटे काम लेना अनुचित है । साथ ही पूँजी और मुनाफ़ाको ध्यानमें रखते हुए मजदूरोंका वेतन कम-से-कम इतना तो अवश्य ही होना चाहिये, जिससे मजदूरोंको उचित शिक्षा एवं स्वास्थ्यकी उन्नति हो सके। अर्थात् भारतीय दृष्टिकोणसे यदि पशुके सम्बन्धमें उसके स्वास्थ्य और कामके घंटोंका इतना ध्यान रखा जाता है, तो मनुष्यके लिये जो सर्वोच्च कोटिका प्राणी है, शिक्षा-स्वास्थ्यका ध्यान रखते हुए कामके घंटोंकी कमी और पारिश्रमिककी अधिकताका ध्यान होना स्वाभाविक ही है !

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अतः कामके घंटे और मजदूरीका निष्पक्ष न्यायालयद्वारा तय होना उचित है। पैदावारके साधनोकी उन्नति यदि दोष नहीं है तो उसका होना उचित ही है। और जो पैदावारके साधनोंकी उन्नति कराता है, उसे उसका फल भी मिलना उचित ही है। फिर दूसरेकी उन्नतिसे दूसरेके पेटमें दर्द हो, इसे सिवा ईर्ष्याके और दूसरा क्या कहा जा सकता है ? कामके घंटोमें कमी होनेसे अधिकाधिक लोगोंको काम मिलेगा, वेकारी घटेगी, इससे जनतामें क्रय-शक्ति बनी रहेगी, मालकी खपत बढ़ेगी, जिससे उत्पादनमें बाधा न पड़ेगी। जिन वस्तुओंका उत्पादन उपभोक्ताओंकी आवश्यकतासे अधिक होने लगे, उनपर प्रतिबन्ध लगाकर अन्य उपयोगी वस्तुओंके उत्पादन एव तदुपयोगी उत्पादन-साधनोंके निर्माणका प्रयत्न होना चाहिये। इससे सभीका हित है। अतः इसके अनुकूल सरकारी प्रोत्साहन, प्रेरणा तथा आवश्यक आदेश भी होना चाहिये। इस तरह वेकारी भी रुकेगी, मालके खपतमे भी बाधा नहीं पड़ेगी और उपभोक्ताओंको आवश्यक उपभोग-सामग्री भी मिल सकेगी। यान्त्रिक विकासमें भी बाधा नहीं पड़ेगी और