मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १५४ * | ६४९ |
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| नित्यमाराधितः श्रीमान् पृथुमूलः समुन्नतः ।<br>नाकरोत् सेवितुं मेरुरुपहारं पतिष्यतः ॥ ५७५<br><br>जलेऽप्येषा व्यवस्थेति संशयेताखिलं बुधः ।<br>दिनान्तानुगतो भानुः स्वजनत्वमपूरयत् ॥ ५७६<br><br>संध्याबद्धाञ्जलिपुटा मुनयोऽभिमुखा रविम् ।<br>याचन्त्यागमनं शीघ्रं निवार्यात्मनि भाविताम् ॥ ५७७<br><br>व्यजृम्भदथ लोकेऽस्मिन् क्रमाद् वैभावरं तमः ।<br>कुटिलस्येव हृदये कालुष्यं दूषयन्मनः ॥ ५७८ | नित्य सूर्यद्वारा आराधित, शोभाशाली, स्थूल मूल भागवाले एवं समुन्नत मेरुने गिरते हुए सूर्यकी सेवा करनेके लिये कोई उपहार नहीं समर्पित किया। जलमें भी यही व्यवस्था है—इन सभी विषयोंपर बुद्धिमान् पुरुष संशय करेंगे। दिनके अवसानका अनुगमन करनेवाले सूर्यने अपनत्वकी पूर्ति की। संध्याके समय हाथ जोड़े हुए मुनिगण सूर्यके सम्मुख उपस्थित हो आत्मामें उत्पन्न हुई (बिछोहकी) भावनाको रोककर पुनः शीघ्र ही आगमनकी याचना कर रहे हैं। इस प्रकार सूर्यके अस्त हो जानेपर सारे जगत्में रात्रिका अन्धकार क्रमशः उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे कुटिल मनुष्यके हृदयमें पाप मनको दूषित करते हुए फैल जाता है॥ ५७५—५७८ ॥ | | ज्वलत्फणिफणारत्नदीपोद्द्योतितभित्तिके ।<br>शयनं शशिसङ्घातशुभवस्त्रोत्तरच्छदम् ॥ ५७९<br><br>नानारत्नद्युतिलसच्चक्रचापविडम्बकम् ।<br>रत्नकिङ्किणिकाजालं लम्बमुक्ताकलापकम् ॥ ५८०<br><br>कमनीयचलल्लोलवितानाच्छादिताम्बरम् ।<br>मन्दिरे मन्दसञ्चारः शनैर्गिरिसुतायुतः ॥ ५८१<br><br>तस्थौ गिरिसुताबाहुलतामीलितकन्धरः ।<br>शशिमौलिसितज्योत्स्नाशुचिपूरितगोचरः ॥ ५८२<br><br>गिरिजाप्यसितापाङ्गी नीलोत्पलदलच्छविः ।<br>विभावर्या च सम्पृक्ता बभूवातितमोमयी ।<br>तामुवाच ततो देवः क्रीडाकेलिकलायुतम् ॥ ५८३ | तत्पश्चात् जिसकी दीवालें प्रभापूर्ण सर्पोंकी मणिरूपी दीपकोंसे उद्भासित हो रही थीं, ऐसे भवनमें शय्या बिछी थी, जिसपर चाँदनीकी राशि-जैसी उज्ज्वल चादर बिछी थी, नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्तिसे सुशोभित होनेके कारण वह इन्द्रधनुषकी विडम्बना कर रही थी, उसमें रत्ननिर्मित क्षुद्रघण्टिकाएँ तथा मोतियोंकी लम्बी-लम्बी झालरें लटक रही थीं और उसका ऊपरी भाग हिलते हुए कमनीय वितानसे आच्छादित था, ऐसी शय्यापर मन्दगतिसे चलते हुए भगवान् शंकर पार्वतीके साथ विराजमान हुए। उस समय उनका कंधा पार्वतीकी भुजलतासे संयुक्त था। चन्द्रभूषणकी उज्ज्वल एवं निर्मल प्रभा सर्वत्र फैल रही थी। कजरारे नेत्रोंवाली गिरिजाकी भी छवि नीले कमल-दलके समान थी। रात्रिसे संयुक्त होनेके कारण वे विशेषरूपसे तमोमयी दीख रही थीं। उस समय भगवान् शंकर पार्वतीसे क्रीडाकेलिकी कलासे युक्त वचन बोले ॥ ५७९—५८३ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भवमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥
१५८- वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शङ्करका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति
| ६५० | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ पचपनवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा पार्वतीके वर्णपर आक्षेप, पार्वतीका वीरकको अन्तःपुरका रक्षक नियुक्त कर पुनः तपश्चर्याके लिये प्रस्थान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शर्व उवाच<br>शरीरे मम तन्वङ्गि सिते भास्यसितद्युतिः।<br>भुजङ्गीवासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ ॥ १<br>चन्द्रातपेन सम्पृक्ता रुचिराम्बरया तथा।<br>रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे ॥ २<br>इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकण्ठा पिनाकिना।<br>उवाच कोपरक्ताक्षी भ्रुकुटीकुटिलानना ॥ ३ | शिवजीने (विवाहके बाद एक बार पार्वतीसे) कहा—कृशाङ्गी पार्वति! कृष्ण कान्तिसे युक्त तुम मेरे श्वेत शरीरमें लिपटनेपर चन्दन-वृक्षमें लिपटी हुई सीधी काली नागिन-जैसी दीखती हो। तुम कृष्णपक्षमें चाँदनीके पीछे काले आकाश तथा अँधेरी रात्रिकी तरह मेरी दृष्टिको दूषित कर रही हो। भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वती उनके गलेसे अलग हो गयीं। क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल हो गये। तब वे मुख और भौंहोंको टेढ़ी करके बोलीं॥ १—३॥ |
| देव्युवाच<br>स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परिभूयते।<br>अवश्यमर्थी प्राप्नोति खण्डनं शशिमण्डन ॥ ४<br>तपोभिर्दीर्घचरितैर्यच्च प्रार्थितवत्यहम्।<br>तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यवमानः पदे पदे ॥ ५<br>नैवास्मि कुटिला शर्व विषमा नैव धूर्जटे।<br>सविषस्त्वं गतः ख्यातिं व्यक्तं दोषाकराश्रयः ॥ ६<br>नाहं पूष्णोऽपि दशना नेत्रे चास्मि भगस्य हि।<br>आदित्यश्च विजानाति भगवान् द्वादशात्मकः ॥ ७<br>मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैर्दोषैर्मामर्धिक्षिपन्।<br>यत्त्वं मामाह कृष्णेति महाकालेति विश्रुतः ॥ ८<br>यास्याम्यहं परित्यक्त्वा चात्मानं तपसा गिरिम।<br>जीवन्त्या नास्ति मे कृत्यं धूर्तेन परिभूतया ॥ ९<br>निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं भवः।<br>उवाचाधिकसम्भ्रान्तिप्रणयोन्मिश्रया गिरा ॥ १० | देवीने कहा—चन्द्रभूषण! सभी लोग अपने द्वारा की गयी मूर्खताका दुष्परिणाम भोगते हैं। स्वार्थी मनुष्य जनसमाजमें अवश्य ही अपमानित होता है। दीर्घकालिक तपस्याद्वारा मैंने जिस मनोरथकी प्रार्थना की थी, उसीके परिणामस्वरूप मुझे यह पग-पगपर तिरस्कार प्राप्त हो रहा है। जटाधारी शंकर! (आपके कथनानुसार) न तो मैं कुटिल हूँ और न विषम ही हूँ, अपितु आप स्वयं स्पष्टरूपसे विषयुक्त अर्थात् विषयी और दोषोंके समूह (अथवा चन्द्रमा)-के आश्रयरूपसे प्रसिद्ध हैं। मैं पूषाके दाँत और भगके नेत्र भी नहीं हूँ। बारह भागोंमें विभक्त भगवान् सूर्य मुझे भलीभाँति जानते हैं। अपने दोषोंद्वारा मुझपर आक्षेप करते हुए आप मेरे सिरमें पीड़ा उत्पन्न कर रहे हैं। आपने मुझे जो 'कृष्णा' नामसे सम्बोधित किया है सो आप भी तो 'महाकाल' नामसे विख्यात हैं। अतः अब मैं जीवनका मोह त्यागकर तपस्या करनेके लिये पर्वतपर जाऊँगी; क्योंकि आप-जैसे धूर्तसे अपमानित होकर जीवित रहनेसे मैं अपना कोई प्रयोजन नहीं समझ रही हूँ। तब पार्वतीके इस प्रकार क्रोधके कारण तीखे अक्षरोंसे युक्त वचनको सुनकर भगवान् शंकर अतिशय प्रेमसे सनी हुई वाणीमें इस प्रकार बोले॥ ४—१०॥ |
| शर्व उवाच<br>अगात्मजासि गिरिजे नाहं निन्दापरस्तव।<br>त्वद्भक्तिबुद्ध्या कृतवांस्तवाहं नामसंश्रयम् ॥ ११ | शंकरजीने कहा—गिरिजे! तुम पर्वतकी पुत्री हो, अतः मैं तुम्हारी निन्दा करनेपर उतारू नहीं हूँ। यह तो मैंने तुम्हारे ऊपर भक्तिपूर्ण बुद्धिसे तुम्हारे नामका कारण बतलाया है। |
| * अध्याय १५५ * | ६५१ |
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| विकल्पः स्वस्थचित्तेऽपि गिरिजे नैव कल्पना।<br>यद्येवं कुपिता भीरु त्वं तवाहं न वै पुनः॥ १२<br>नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं शुचिस्मिते।<br>शिरसा प्रणतश्चाहं रचितस्ते मयाञ्जलिः॥ १३<br>स्नेहेनावमानेन निन्दितेनैति विक्रियाम्।<br>तस्मान्न जातु रुष्टस्य नर्मस्पृष्टो जनः किल॥ १४<br>अनेकैशचाटुभिर्देवी देवेन प्रतिबोधिता।<br>कोपं तीव्रं न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता॥ १५<br>अवष्टब्धमथास्फाल्य वासः शङ्करपाणिना।<br>विपर्यस्तालका वेगाद्यातुमैच्छत शैलजा॥ १६<br>तस्या व्रजन्त्याः कोपेन पुनराह पुरान्तकः।<br>सत्यं सर्वैरवयवैः सुतासि सदृशी पितुः॥ १७<br>हिमाचलस्य शृङ्गैस्तैर्मेघजालाकुलैर्नभः।<br>तथा दुरवगाह्योभ्यो हृदयेभ्यस्तवाशयः॥ १८<br>काठिन्याङ्कस्त्वमस्मभ्यं वनेभ्यो बहुधा गता।<br>कुटिलत्वं च वर्त्मभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि।<br>संक्रान्ति सर्वमेवैतत् तन्वङ्गि हिमभूधरात्॥ १९<br>इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलजा तदा।<br>कम्पकम्पितमूर्धा च प्रस्फुरद्दशनच्छदा॥ २०<br>उमोवाच<br>मा सर्वान् दोषदानेन निन्दान्यान् गुणिनो जनान्।<br>तवापि दुष्टसम्पर्कात्संक्रांतं सर्वमेव हि॥ २१<br>व्यालेभ्योऽधिकजिह्मात्वं भस्मना स्नेहबन्धनम्।<br>हृत्कालुष्यं शशाङ्कात्तु दुर्बोधित्वं वृषादपि॥ २२<br>तथा बहु किमुक्तेन अलं वाचा श्रमेण ते।<br>श्मशानवासात्रिर्भीस्त्वं नग्नत्वान्न तव त्रपा॥ २३<br>निर्घृणत्वं कपालित्वाद् दया ते विगता चिरम्।<br>इत्युक्त्वा मन्दिरात् तस्मान्निर्जगाम हिमाद्रिजा॥ २४<br>तस्यां व्रजन्त्यां देवेशगणैः किलकिलो ध्वनिः।<br>क्व मातर्गच्छसि त्यक्त्वा रुदन्तो धाविताः पुनः॥ २५ | गिरिजे! मेरे स्वस्थ चित्तमें भी तुम्हें विकल्पकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। भीरु! यदि तुम इस प्रकार कुपित हो गयी हो तो अब मैं पुनः तुम्हारे साथ परिहासकी बात नहीं करूँगा। शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़ दो। देखो, मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाये हूँ। जो प्रेमयुक्त अवमानना तथा व्याजनिन्दासे क्रुद्ध हो जाता है, उस व्यक्तिके साथ कभी भी परिहासकी बात नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार महादेवजीने अनेकों चाटुकारिताभरी बातोंसे पार्वतीको समझाया, परंतु सतीका वह उत्कट क्रोध शान्त नहीं हुआ; क्योंकि उस व्यङ्गसे उनका मर्मस्थल विद्ध हो गया था। तत्पश्चात् पार्वती शंकरजीके हाथसे पकड़े हुए अपने वस्त्रको छुड़ाकर बाल बिखेरे हुए वेगपूर्वक वहाँसे चली जानेकी चेष्टा करने लगीं। क्रोधावेशसे जानेके लिये उद्यत हुई पार्वतीसे त्रिपुरारिने पुनः कहा—‘तुम सचमुच ही सभी अवयवोंद्वारा अपने पिताके सदृश उनकी कन्या हो। जैसे हिमाचलके मेघसमूहसे व्याप्त ऊँचे शिखरोंके कारण आकाश दुर्गम्य हो जाता है, उसी तरह तुम्हारा हृदय भी दुःखगाह्य हृदयोंसे भी अत्यन्त कठोर है। तुम्हारे सभी चिह्न बहुधा वनोंकी अपेक्षा कठिनतासे परिपूर्ण हैं। तुम्हारी चालमें पहाड़ी मार्गोंसे भी बढ़कर कुटिलता है। तुम्हारा सेवन बर्फसे भी अधिक कठिन है। सूक्ष्माङ्गी पार्वती! ये सभी गुण तुम्हारे शरीरमें हिमाचलसे ही संक्रमित हुए हैं। शिवजीद्वारा इस प्रकार कही जानेपर पार्वतीका मस्तक क्रोधके कारण काँपने लगा और होंठ फड़कने लगे। तब वे पुनः शंकरजीसे बोलीं॥११—२०॥<br>उमाने कहा— भगवन्! आप अन्यान्य सभी गुणीजनोंमें दोष लगाकर उनकी निन्दा मत करें; क्योंकि आपमें भी तो सभी गुण दुष्टोंके संसर्गसे ही प्रविष्ट हुए हैं। आपमें सर्पोंके सम्पर्कसे अधिक टेढ़ापन, भस्मसे प्रेमहीनता, चन्द्रमासे हृदयकी कालिमा और वृषसे दुर्बोधता भर गयी है। आपके विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? वह तो केवल वचनका परिश्रम ही होगा। आप श्मशानमें निवास करनेके कारण निर्भीक हो गये हैं। नग्न रहनेके कारण आपमें लज्जा रह नहीं गयी है। कपाली होनेके कारण आप निर्मम हो गये हैं और आपकी दया तो चिरकालसे नष्ट हो गयी है। ऐसा कहकर पार्वती उस भवनसे बाहर निकल गयीं। उनको इस प्रकार जाती देखकर देवेशके गण (प्रमथ) किलकारी मारकर रोते हुए उनके पीछे दौड़े और कहने लगे—‘माँ! हमलोगोंको |
| ६५२ | * मत्स्यपुराण * |
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| विष्टभ्य चरणौ देव्या वीरको बाष्पगद्गदम्।<br>प्रोवाच मातः किंन्वेतत्क्व यासि कुपितान्तरा॥ २६<br><br>अहं त्वामनुयास्यामि व्रजन्तीं स्नेहवर्जिताम्।<br>नो चेत् पतिष्ये शिखरात् तपोनिष्ठे त्वयोज्झितः॥ २७<br><br>उन्नाम्य वदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना।<br>उवाच वीरकं माता शोकं पुत्रक मा कृथाः॥ २८<br><br>शैलाग्रात् पतितुं नैव न चागन्तुं मया सह।<br>युक्तं ते पुत्र वक्ष्यामि येन कार्येण तच्छृणु॥ २९<br><br>कृष्णेत्युक्त्वा हरेणाहं निन्दिता चाप्यनिन्दिता।<br>साहं तपः करिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयाम्॥ ३०<br><br>एष स्त्रीलम्पटो देवो यातायां मय्यनन्तरम्।<br>द्वाररक्षा त्वया कार्या नित्यं रन्ध्रान्ववेक्षिणा॥ ३१<br><br>यथा न काचित् प्रविशेद्योषिदत्र हरान्तिकम्।<br>दृष्ट्वा परां स्त्रियं चात्र वदेथा मम पुत्रक॥ ३२<br><br>शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनन्तरम्।<br>एवमस्त्विति देवीं स वीरकः प्राह साम्प्रतम्॥ ३३<br><br>मातुराज्ञामृताह्लादप्लाविताङ्गो गतज्वरः।<br>जगाम कक्ष्यां संद्रष्टुं प्रणिपत्य च मातरम्॥ ३४ | छोड़कर आप कहाँ जा रही हैं?' तत्पश्चात् वीरक देवीके दोनों चरणोंको पकड़कर बाष्पगद्गद वाणीमें बोला—'माँ! यह क्या हो गया ? आप क्रुद्ध होकर कहाँ जा रही हैं? तपोनिष्ठे! इस प्रकार स्नेह छोड़कर जाती हुई आपके पीछे मैं भी चलूँगा, अन्यथा आपके त्याग देनेपर मैं पर्वतशिखरसे कूदकर प्राण दे दूँगा ॥ २१–२७॥<br><br>तदनन्तर माता पार्वती अपने दाहिने हाथसे वीरकके मुखको ऊपर उठाकर बोलीं—'बेटा! शोक मत करो। तुम्हारा पर्वतशिखरसे कूदना या मेरे साथ चलना उचित नहीं है। पुत्र! मैं जिस कार्यसे जा रही हूँ, वह तुम्हें बतला रही हूँ, सुनो। मेरे अनिन्द्य होनेपर भी शंकरजीने मुझे 'कृष्णा' कहकर मेरी निन्दा की है। इसलिये अब मैं तपस्या करूँगी, जिससे गौर वर्णकी प्राप्ति कर सकूँ। मेरे चले जानेके बाद ये महादेव स्त्रीलम्पट न हो जायें, इसके लिये तुम्हें सभी छिद्रोंपर दृष्टि रखते हुए नित्य द्वारकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे यहाँ कोई स्त्री शंकरजीके निकट प्रवेश न करने पावे। बेटा! यहाँ किसी परायी स्त्रीको देखकर मुझे तुरंत सूचित करना। फिर उसके बाद जैसा उचित होगा, मैं शीघ्र ही उपाय कर लूँगी।' इसपर वीरकने देवीसे कहा—'माँ! ऐसा ही होगा।' इस प्रकार माताकी आज्ञारूपी अमृतके आह्लादसे आप्लावित अङ्गोंवाला वीरक शोकरहित हो माताके चरणोंमें प्रणाम कर अन्तःपुरकी रखवाली करनेके लिये चला गया॥ २८–३४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे देव्यास्तपोऽनुगमनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें देवीका तपके लिये अनुगमन नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५५॥
एक सौ छप्पनवाँ अध्याय
कुसुमामोदिनी और पार्वतीकी गुप्त मन्त्रणा, पार्वतीका तपस्यामें निरत होना, आडि दैत्यका पार्वतीरूपमें शंकरके पास जाना और मृत्युको प्राप्त होना तथा पार्वतीद्वारा वीरकको शाप
| सूत उवाच<br><br>देवीं सापश्यदायान्तीं सखीं मातृर्विभूषिताम्।<br>कुसुमामोदिनीं नाम तस्य शैलस्य देवताम्॥ १<br><br>सापि दृष्ट्वा गिरिसुतां स्नेहविक्लवमानसा।<br>क्व पुत्रि गच्छसीत्युच्चैरालिङ्ग्योवाच देवता॥ २ | सूतजी कहते हैं—'ऋषियो! आगे बढ़नेपर पार्वतीनै शृङ्गारसे विभूषित कुसुमामोदिनी (देवी)-को आते देखा, जो पार्वतीकी माता मेनाकी सखी और पर्वतराजकी प्रधान देवता थीं। उधर पार्वतीको देखकर कुसुमामोदिनीका भी मन स्नेहसे व्याकुल हो उठा। तब उन देवताने पार्वतीका आलिङ्गन कर उच्चस्वरसे पूछा—'बेटी! कहाँ जा रही |
| * अध्याय १५६ * | ६५३ |
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| सा चास्यै सर्वमाचख्यौ शंकरात्कोपकारणम्।<br>पुनश्चोवाच गिरिजा देवतां मातृसम्मताम्॥ ३<br><br>उमोवाच<br><br>नित्यं शैलाधिराजस्य देवता त्वमनिन्दिते।<br>सर्वतः संनिधानं ते मम चातीव वत्सला॥ ४<br><br>अतस्तु ते प्रवक्ष्यामि यद्विधेयं तदा धिया।<br>अन्यस्त्रीसम्प्रवेशस्तु त्वया रक्ष्यः प्रयत्नतः॥ ५<br><br>रहस्यत्र प्रयत्नेन चेतसा सततं गिरौ।<br>पिनाकिनः प्रविष्टायां वक्तव्यं मे त्वयानघे॥ ६<br><br>ततोऽहं संविधास्यामि यत्कृत्यं तदनन्तरम्।<br>इत्युक्ता सा तथेत्युक्त्वा जगाम स्वगिरिं शुभम्॥ ७<br><br>उमापि पितुरुद्यानं जगामाद्रिसुता द्रुतम्।<br>अन्तरिक्षं समाविश्य मेघमालामिव प्रभा॥ ८<br><br>ततो विभूषणान्यस्य वृक्षवल्कलधारिणी।<br>ग्रीष्मे पञ्चाग्निसंतप्ता वर्षासु च जलोषिता॥ ९<br><br>वन्याहारा निराहारा शुष्का स्थण्डिलशायिनी।<br>एवं साधयती तत्र तपसा संव्यवस्थिता॥ १० | हो?'' तत्पश्चात् गिरिजाने उन देवीसे शंकरजीके प्रति उत्पन्न हुए अपने क्रोधके सारे कारणोंका वर्णन किया और फिर मातृ-तुल्य हितैषिणी देवतासे इस प्रकार कहा॥ १—३॥<br><br>उमा बोलीं—'अनिन्दिते! आप मेरे पिता पर्वतराज हिमाचलकी देवता हैं, अतः आपका यहाँ नित्य निवास है। साथ ही मुझपर भी आपका अत्यन्त स्नेह है, इसलिये इस समय जो कार्य करना है उसे मैं आपके ध्यानमें ला रही हूँ। आपको इस पर्वतपर सावधान चित्तसे निरन्तर प्रयत्नपूर्वक ऐसी देखभाल करनी चाहिये कि यहाँ शिवजीके पास एकान्तमें कोई अन्य स्त्री प्रवेश न करने पाये। अनघे! यदि कोई स्त्री शंकरजीके पास प्रवेश करती है तो आपको मुझे तुरंत उसकी सूचना देनी चाहिये। उसके बाद जो कुछ करना होगा, उसका विधान मैं कर लूँगी। ऐसा कहे जानेपर वे 'तथेति'—ऐसा ही करूँगी' यों कहकर अपने मङ्गलमय पर्वतकी ओर चली गयीं। इधर गिरिराजकुमारी उमा भी तुरंत ही मेघसमूहमें चमकती हुई बिजलीकी तरह आकाशमार्गसे अपने पिताके उद्यानमें जा पहुँची। वहाँ उन्होंने आभूषणोंका परित्याग कर वृक्षोंका वल्कल धारण कर लिया। वे ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्नि तपती थीं, वर्षा-ऋतुमें जलमें निवास करती थीं और जाड़ेमें शुष्क बंजरभूमिपर शयन करती थीं। वनके फल-मूल ही उनके आहार थे तथा वे कभी-कभी निराहार ही रह जाती थीं। इस प्रकार साधना करती हुई वे वहाँ तपस्यामें संलग्न हो गयीं॥ ४—१०॥ |
| ज्ञात्वा तु तां गिरिसुतां दैत्यस्तत्रान्तरे बली।<br>अन्धकस्य सुतो दृप्तः पितुर्वधमनुस्मरन्॥ ११<br><br>देवान् सर्वान् विजित्याजौ बकभ्राता रणोत्कटः।<br>आडिर्नामान्तरप्रेक्षी सततं चन्द्रमौलिनः॥ १२<br><br>आजगामामररिपुः पुरं त्रिपुरघातिनः।<br>स तत्रागत्य ददृशे वीरकं द्वार्यवस्थितम्॥ १३<br><br>विचिन्त्यासीद्वरं दत्तं स पुरा पद्मजन्मना।<br>हते तदान्धके दैत्ये गिरिशेनामरद्विषि॥ १४<br><br>आडिश्चकार विपुलं तपः परमदारुणम्।<br>तमागत्याब्रवीद् ब्रह्मा तपसा परितोषितः॥ १५<br><br>किमाडे दानवश्रेष्ठ तपसा प्राप्तुमिच्छसि।<br>ब्रह्माणमाह दैत्यस्तु निर्मृत्यृत्वमहं वृणे॥ १६ | इसी बीच अन्धकासुरका पुत्र एवं बकासुरका भ्राता आडि नामक दैत्य जो बलवान्, घमंडी, रणमें दुःसह, देवताओंका शत्रु और निरन्तर शंकरजीके छिद्रान्वेषणमें निरत रहनेवाला था, पार्वतीको तपस्यामें संलग्न जानकर अपने पिताके वधका अनुस्मरण करते हुए युद्धस्थलमें सभी देवताओंको पराजित कर त्रिपुरहन्ता शंकरजीके नगरमें आ धमका। वहाँ आकर उसने वीरकको द्वारपर स्थित देखा। तब वह पूर्वकालमें ब्रह्माद्वारा दिये गये अपने वरदानके विषयमें सोच-विचार करने लगा। शंकरजीद्वारा देवद्रोही अन्धक दैत्यके मारे जानेपर आडिने बहुत दिनोंतक परम कठोर तप किया था। तब उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो ब्रह्माने उसके निकट आकर कहा था—'दानवश्रेष्ठ आडि! तुम तपस्याद्वारा क्या प्राप्त करना चाहते हो?' तब उस दैत्यने ब्रह्मासे कहा था—'प्रभो! मैं अमरताका वरदान चाहता हूँ'॥ ११—१६॥ |
१५९- स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति
६५४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| ब्रह्मोवाच<br>न कश्चिच्च विना मृत्युं नरो दानव विद्यते।<br>यतस्ततोऽपि दैत्येन्द्र मृत्युः प्राप्यः शरीरिणा ॥ १७<br>इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचाम्बुजसम्भवम्।<br>रूपस्य परिवर्तो मे यदा स्यात्पद्मसम्भव ॥ १८<br>तदा मृत्युर्मम भवेद्न्यथा त्वमरो ह्यहम्।<br>इत्युक्तस्तु तदोवाच तुष्टः कमलसम्भवः ॥ १९<br>यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति।<br>तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति ॥ २०<br>इत्युक्तोऽमरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः।<br>तस्मिन् काले तु संस्मृत्य तद्वधोपायमात्मनः ॥ २१<br>परिहर्त्तुं दृष्टिपथं वीरकस्याभवत्तदा।<br>भुजङ्गरूपी रन्ध्रेण प्रविवेश दृशः पथम् ॥ २२<br>परिहृत्य गणेशस्य दानवोऽसौ सुदुर्जयः।<br>अलक्षितो गणेशेन प्रविष्टोऽथ पुरान्तकम् ॥ २३<br>भुजङ्गरूपं संत्यज्य बभूवाथ महासुरः।<br>उमारूपी च्छलयितुं गिरिशं मूढचेतनः ॥ २४<br>कृत्वा मायां ततो रूपमप्रतर्क्यमनोहरम्।<br>सर्वावयवसम्पूर्णं सर्वाभिज्ञानसंवृतम् ॥ २५<br>कृत्वा मुखान्तरे दन्तान् दैत्यो वज्रोपमान् दृढान्।<br>तीक्ष्णाग्रान् बुद्धिमोहेन गिरिशं हन्तुमुद्यतः ॥ २६ | तब ब्रह्मा ने कहा था—'दानव! इस सृष्टिमें कोई भी मनुष्य मृत्युसे रहित नहीं है। दैत्येन्द्र! शरीरधारीको किसी-न-किसी प्रकारसे मृत्यु प्राप्त होती ही है। ऐसा कहे जानेपर दैत्यसिंह आदिने पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा था—'पद्मसम्भव! जब मेरे रूपका परिवर्तन हो जाय तभी मेरी मृत्यु हो, अन्यथा मैं अमर बना रहूँ।' उसके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उस समय कमलयोनि ब्रह्माने प्रसन्न होकर उससे कहा था कि 'ठीक है, जब तुम्हारे रूपका दूसरा परिवर्तन होगा, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं होगी।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह महाबली दैत्यपुत्र आदि अपनेको अमर मानने लगा। उस समय उसने अपनी मृत्युके उस उपायका स्मरणकर वीरकके दृष्टिमार्गको बचानेके लिये सर्पका रूप धारण कर लिया और एक बिलमें प्रविष्ट हो गया। फिर वह परम दुर्जय दानव गणेश्वर वीरकके दृष्टिपथको बचाकर उनसे अलक्षितरूपसे भगवान् शंकरके पास पहुँच गया। तदनन्तर उस मोहित चित्तवाले महासुर आदिने शंकरजीको छलनेके लिये सर्पका रूप त्यागकर उमाका रूप धारण कर लिया। उसने मायाका आश्रय लेकर पार्वतीके ऐसे अकल्पनीय एवं मनोहर रूपका निर्माण किया था, जो सभी अवयवोंसे परिपूर्ण तथा सभी लक्षणोंसे युक्त था। फिर वह दैत्य मुखके भीतर वज्रके समान सुदृढ़ और तीखे अग्रभागवाले दाँतोंका निर्माण कर मूर्खतावश शंकरजीका वध करनेके लिये उद्यत हुआ॥ १७–२६॥ |
| कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरान्तिकम्।<br>पापो रम्याकृतिश्चित्रभूषणाम्बरभूषितः ॥ २७ | तदनन्तर वह पापी दैत्य सुन्दर रूप एवं चित्र-विचित्र आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो उमाका रूप धारण कर शंकरजीके निकट गया। |
| तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तदाऽऽलिङ्ग्य महासुरम्।<br>मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवान्तरैः ॥ २८ | उसे देखकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। तब उन्होंने उस महासुरको सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे पार्वती मानते हुए उसका आलिङ्गन करके पूछा— |
| अपृच्छत् साधु ते भावो गिरिपुत्रि न कृत्रिमः।<br>या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनि ॥ २९<br>त्वया विरहितं शून्यं मन्यमानो जगत्त्रयम्।<br>प्राप्ता प्रसन्नवदना युक्तमेवंविधं त्वयि ॥ ३० | 'गिरिजे! अब तो मेरे प्रति तुम्हारा भाव उत्तम है न? बनावटी तो नहीं है? सुन्दरि! (ऐसा प्रतीत होता है कि) तुम मेरे अभिप्रायको जानकर ही यहाँ आयी हो; क्योंकि तुम्हारे बिना मैं त्रिलोकीको सूना-सा मान रहा था। अब जो तुम प्रसन्नतापूर्वक यहाँ आ गयी हो, तुम्हारे लिये ऐसा करना उचित ही है।' |
| * अध्याय १५६ * | ६५५ |
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| इत्युक्तो दानवेन्द्रस्तु तदाभाषत् स्मयञ्शनैः।<br>न चाबुध्यदभिज्ञानं प्रायस्त्रिपुरघातिनः॥ ३१<br><br>देव्युवाच<br>यातास्म्यहं तपश्चर्तुं वाल्लभ्याय तवातुलम्।<br>रतिश्च तत्र मे नाभूत्ततः प्राप्ता त्वदन्तिकम्॥ ३२<br><br>इत्युक्तः शङ्करः शङ्कां कांचिप्राप्यावधारयत्।<br>हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः॥ ३३<br><br>कुपिता मयि तन्वङ्गि प्रकृत्या च दृढव्रता।<br>अप्राप्तकामा सम्प्राप्ता किमेतत्संशयो मम॥ ३४<br><br>इति चिन्त्य हरस्तस्या अभिज्ञानं विधारयन्।<br>नापश्यद्वामपार्श्वे तु तदङ्गे पद्मलक्षणम्॥ ३५<br><br>लोमावर्तं तु रचितं ततो देवः पिनाकधृक्।<br>अबुध्यद्दानवीं मायामाकारं गूहयंस्ततः॥ ३६<br><br>मेढ्रे वज्रास्त्रमादाय दानवं तमसूदयत्।<br>अबुध्यद्वीरको नैव दानवेन्द्रं निषूदितम्॥ ३७<br><br>हरेण सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था शैलपुत्र्यै न्यवेदयत्॥ ३८<br><br>दूतेन मारुतेनाशुगामिना नगदेवता।<br>श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्तविलोचना।<br>अशपद्वीरकं पुत्रं हृदयेन विदूयता॥ ३९ | इस प्रकार कहे जानेपर दानवेन्द्र आडि मुसकराते हुए धीरे-धीरे बोला। वह त्रिपुरहन्ता शंकरजीद्वारा पार्वतीके शरीरमें लक्षित किये गये चिह्नको प्रायः नहीं जानता था॥ २७—३१॥<br><br>देवी (रूपधारी आडि)-ने कहा—'पतिदेव! आपके अतुलनीय पति-प्रेमकी प्राप्तिके अभिप्रायसे मैं तपस्या करने गयी थी, किंतु उसमें मेरा मन नहीं लगा, अतः पुनः आपके निकट लौट आयी हूँ। उसके ऐसा कहनेपर शंकरजीके मनमें कुछ शङ्का उत्पन्न हो गयी, परंतु उसे उन्होंने हृदयमें ही समाधान करके छिपा लिया। फिर वे मुसकराते हुए बोले—'सूक्ष्माङ्गि! तुम तो मुझपर कुपित होकर तपस्या करने गयी थी न? साथ ही तुम स्वभावसे ही सुदृढ़ प्रतिज्ञावाली हो, फिर बिना मनोरथ सिद्ध किये लौट आयी हो, यह क्या बात है? इससे तो मुझे संदेह हो रहा है।' ऐसा विचारकर शंकरजी पार्वतीके उस लक्षणका स्मरण करने लगे, जिसे उन्होंने पार्वतीके शरीरके बायें भागमें बालोंको घुमाकर पद्मके रूपमें बनाया था, परंतु वह उन्हें दिखायी न पड़ा।* तब पिनाकधारी महादेवने समझ लिया कि यह दानवी माया है। फिर तो उन्होंने अपने आकारको छिपाते हुए जननेन्द्रियमें वज्रास्त्रको अभिमन्त्रित करके उस दैत्यको मार डाला। इस प्रकार मारे गये दानवेन्द्र आडिकी बात वीरकको नहीं ज्ञात हुई। उधर इसके यथार्थ तत्त्वको न जाननेवाली हिमाचलकी देवता कुसुमामोदिनीने शंकरजीद्वारा स्त्रीरूपधारी दानवेश्वरको मारा गया देखकर अपने शीघ्रगामी दूत वायुद्वारा पार्वतीको इसकी सूचना भेज दी। वायुके मुखसे वह संदेश सुनकर पार्वती देवीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब वे दुःखी हृदयसे अपने पुत्र वीरकको शाप देते हुए बोलीं॥ ३२—३९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे आडिवधो नाम षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें आडिवध नामक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५६॥
* यह महा-सौभाग्यजनक चिह्न है। भगवान् विष्णु तथा अन्य भाग्यशालियोंके शरीरमें ऐसा चिह्न श्रीवत्स नामसे प्रसिद्ध है।
| ६५६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय
पार्वतीद्वारा वीरकको शाप, ब्रह्माका पार्वती तथा एकानंशाको वरदान, एकानंशाका विन्ध्याचलके लिये प्रस्थान, पार्वतीका भवनद्वारपर पहुँचना और वीरकद्वारा रोका जाना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देव्युवाच<br>मातरं मां परित्यज्य यस्मात् त्वं स्नेहविकलवात्।<br>विहितावसरैः स्त्रीणां शंकरस्य रहोविधौ॥ १<br>तस्मात् ते परुषा रूक्षा जडा हृदयवर्जिता।<br>गणेश क्षारसदृशी शिला माता भविष्यति॥ २<br>निमित्तमेतद् विख्यातं वीरकस्य शिलोदये।<br>सोऽभवत् प्रक्रमेणैव विचित्राख्यानसंश्रयः॥ ३<br>एवमुत्सृष्टशापाया गिरिपुत्र्यास्त्वनन्तरम्।<br>निर्जगाम मुखात् क्रोधः सिंहरूपी महाबलः॥ ४<br>स तु सिंहः करालास्यो जटाजटिलकन्धरः।<br>प्रोद्धूतलम्बलाङ्गूलो दंष्ट्रोत्कटमुखाटटः॥ ५<br>व्यावृत्तास्यो ललज्जिह्वः क्षामकुक्षिश्चिखादिषुः।<br>तस्याशु वर्तितुं देवी व्यवस्यत सती तदा॥ ६<br>ज्ञात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुराननः।<br>आजगामाश्रमपदं सम्पदामाश्रयं तदा।<br>आगम्योवाच देवेशो गिरिजां स्पष्टया गिरा॥ ७ | देवीने कहा—गणेश्वर वीरक! चूँकि तुमने मुझ माताका परित्याग कर स्नेहसे विकल हो शंकरजीके एकान्तमें अन्य स्त्रियोंको प्रवेश करनेका अवसर दिया है, इसलिये अत्यन्त कठोर, स्नेहहीन, मूर्ख, हृदयरहित एवं राख-सदृशी रूखी शिला तुम्हारी माता होगी। वीरकका शिलासे उत्पन्न होनेमें यही कारण विख्यात है। आगे चलकर वही शाप क्रमशः विचित्र कथाओंका आश्रयस्थान बन गया। इस प्रकार पार्वतीके शाप दे देनेके पश्चात् क्रोध उनके मुखसे महाबली सिंहके रूपमें बाहर निकला। उस सिंहका मुख विकराल था, उसका कंधा जटाओंसे आच्छादित था, उसकी लम्बी पूँछ ऊपर उठी हुई थी, उसके मुखके दोनों किनारे भयंकर दाढ़ोंसे युक्त थे, वह मुख फैलाये हुए जीभ लपलपा रहा था, उसकी कुक्षि दुबली-पतली थी और वह किसीको खा जानेकी टोहमें था। यह देखकर पार्वतीदेवी शीघ्र ही उसपर आरूढ़ होनेकी चेष्टा करने लगीं। तब उनके मनोगत भावको जानकर भगवान् ब्रह्मा उस आश्रमस्थानपर आये जो सभी सम्पदाओंका आश्रयस्थान था। वहाँ आकर देवेश्वर ब्रह्मा गिरिजासे स्पष्ट वाणीमें बोले॥ १—७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>किं पुत्रि प्राप्तुकामासि किमलभ्यं ददामि ते।<br>विरम्यतामतिक्लेशात्तपसोऽस्मान्मदाज्ञया॥ ८<br><br>तच्छ्रुत्वोवाच गिरिजा गुरुं गौरवगर्भितम्।<br>वाक्यं वाचा विरोद्गीर्णवर्णनिर्णीतवाञ्छितम्॥ ९ | ब्रह्माने कहा—पुत्रि! अब तुम मेरी आज्ञा मानकर इस अत्यन्त कष्टकर तपस्यासे विरत हो जाओ। बताओ, तुम क्या प्राप्त करना चाहती हो? मैं तुम्हें कौन-सी दुर्लभ वस्तु प्रदान करूँ? वह सुनकर गिरिजाने गौरवस्पद गुरुजन ब्रह्मासे अपने चिरकालसे निर्णीत मनोरथको स्पष्टाक्षरोंसे युक्त वाणीद्वारा व्यक्त करते हुए कहा॥ ८—९॥ |
| देव्युवाच<br>तपसा दुष्करेणाप्तः पतित्वे शङ्करो मया।<br>स मां श्यामलवर्णेति बहुशः प्रोक्तवान् भवः॥ १०<br>स्यामहं काञ्चनाकारा वाल्लभ्येन च संयुता।<br>भर्तुर्भूतपतेरङ्गेमेकतो निविशेऽङ्गवत्॥ ११ | देवी बोलीं—प्रभो! मैंने कठोर तपस्याके फलस्वरूप शंकरजीको पतिरूपमें प्राप्त किया है, किंतु वे मुझे बहुधा 'श्यामवर्णा—काले रंगकी' कहकर अपमानित करते रहते हैं। अतः मैं चाहती हूँ कि मेरा वर्ण सुवर्ण-सा गौर हो जाय, मैं उनकी परम वल्लभा बन जाऊँ और अपने भूतनाथ पतिदेवके शरीरमें एक ओर उन्हींके अङ्गकी तरह प्रविष्ट हो जाऊँ। |
| * अध्याय १५७ * | ६५७ |
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| तस्यास्तद् भाषितं श्रुत्वा प्रोवाच कमलासनः।<br>एवं भव त्वं भूयश्च भर्तुर्देहार्धधारिणी॥ १२<br><br>ततस्तत्याज भृङ्गाङ्गं फुल्लनीलोत्पलत्वचम्॥ १३<br><br>त्वचा सा चाभवद् दीप्ता घण्टाहस्ता त्रिलोचना।<br>नानाभरणपूर्णाङ्गी पीतकौशेयधारिणी॥ १४<br><br>तामब्रवीत्ततो ब्रह्मा देवीं नीलाम्बुजत्विषम्।<br>निशे भूधरजादेहसम्पर्कात्त्वं ममाज्ञया॥ १५<br><br>सम्प्राप्ता कृतकृत्यत्वमेकानंशा पुरा ह्यसि।<br>य एष सिंहः प्रोद्भूतो देव्याः क्रोधाद् वरानने॥ १६<br><br>स तेऽस्तु वाहनं देवि केतौ चास्तु महाबलः।<br>गच्छ विन्ध्याचलं तत्र सुरकार्यं करिष्यसि॥ १७<br><br>पञ्चालो नाम यक्षोऽयं यक्षलक्षपदानुगः।<br>दत्तस्ते किङ्करो देवि मया मायाशतैर्युतः॥ १८<br><br>इत्युक्ता कौशिकी देवी विन्ध्यशैलं जगाम ह।<br>उमापि प्राप्तसंकल्पा जगाम गिरिशान्तिकम्॥ १९ | पार्वतीके उस कथनको सुनकर कमलासन ब्रह्माने कहा—'ठीक है, तुम ऐसी ही होकर पुनः अपने पतिदेवके शरीरके अर्धभागको धारण करनेवाली हो जाओ।' ऐसा वरदान पाकर पार्वती ने अपने भ्रमर-सरीखे काले एवं खिले हुए नीले कमलके-से नीले चमड़ेको त्याग दिया। तब उनकी त्वचा उद्दीप्त हो उठी और वे तीन नेत्रोंसे भी युक्त हो गयीं। तदुपरान्त उन्होंने अपने शरीरको नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित कर पीले रंगकी रेशमी साड़ी धारण किया और हाथमें घण्टा ले लिया। तत्पश्चात् ब्रह्मा ने उस नीले कमलकी-सी कान्तिवाली देवीसे कहा—'निशे! तुम पहलेसे ही एकानंशा नामसे विख्यात हो और इस समय मेरी आज्ञासे पार्वतीके शरीरका सम्पर्क होनेके कारण तुम कृतकृत्य हो गयी हो। वरानने! पार्वतीदेवीके क्रोधसे जो यह सिंह प्रादुर्भूत हुआ है, वह तुम्हारा वाहन होगा और तुम्हारी ध्वजापर भी इस महाबलीका आकार विद्यमान रहेगा। अब तुम विन्ध्याचलको जाओ। वहाँ देवताओंका कार्य सिद्ध करो। देवि! जिसके पीछे एक लाख यक्ष चलते हैं, उस इस पञ्चाल नामक यक्षको मैं तुम्हें किंकरके रूपमें प्रदान कर रहा हूँ, यह सैकड़ों प्रकारकी मायाओंका ज्ञाता है।' ब्रह्माद्वारा ऐसा आदेश पाकर कौशिकी देवी विन्ध्यपर्वतकी ओर चली गयीं॥ १०—१८ १/२॥ | | प्रविशन्तीं तु तां द्वारादपकृष्य समाहितः।<br>रुरोध वीरको देवीं हेमवेत्रलताधरः॥ २०<br><br>तामुवाच च कोपेन रूपात्तु व्यभिचारिणीम्।<br>प्रयोजनं न तेऽस्तीह गच्छ यावन्न भेत्स्यसि॥ २१<br><br>देव्या रूपधरो दैत्यो देवं वञ्चयितुं त्विह।<br>प्रविष्टो न च दृष्टोऽसौ स वै देवेन घातितः॥ २२<br><br>घातिते चाहमाज्ञप्तो नीलकण्ठेन कोपिना।<br>द्वारेषु नावधानं ते यस्मात् पश्यामि वै ततः॥ २३<br><br>भविष्यसि न मद्द्वाःस्थो वर्षपूगान्यनेकंशः।<br>अतस्तेऽत्र न दास्यामि प्रवेशं गम्यतां द्रुतम्॥ २४ | इधर उमा भी अपना मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त कर शंकरजीके पास चलीं। वहाँ द्वारपर हाथमें सोनेका डंडा धारण किये हुए वीरक सावधानीपूर्वक पहरा दे रहा था। उसने प्रवेश करती हुई पार्वतीको दरवाजेसे खींचकर रोक दिया और गौर रूपसे दूसरी स्त्री-सी प्रतीत होनेवाली उनसे क्रोधपूर्वक कहा—'तुम्हारा यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है, अतः जबतक मैं तुम्हें पीट नहीं दे रहा हूँ, उससे पहले ही भाग जाओ। यहीं महादेवजीको छलनेके लिये एक दैत्य माता पार्वतीदेवीका रूप धारण कर प्रविष्ट हो गया था, जिसे मैं देख नहीं पाया था, किंतु महादेवजीने उसे यमलोकका पथिक बना दिया, उसे मारनेके बाद नीलकण्ठ शिवजीने क्रुद्ध होकर मुझे आज्ञा दी है कि अबसे तुम द्वारपर असावधानी मत करना। तभीसे मैं अच्छी तरह सजग होकर पहरा दे रहा हूँ। द्वारपर मेरे स्थित रहते हुए तुम अनेकों वर्षसमूहोंतक प्रविष्ट न हो सकोगी, इसलिये मैं तुम्हें भवनमें प्रवेश नहीं करने दूँगा। तुम शीघ्र ही यहाँसे चली जाओ'॥ १९—२४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कुमारसम्भवे वीरकशापो नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके कुमारसम्भव-प्रसङ्गमें वीरक-शाप नामक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५७॥
१६०- तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध
| ६५८ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
वीरकद्वारा पार्वतीकी स्तुति, पार्वती और शंकरका पुनः समागम, अग्निको शाप, कृत्तिकाओंकी प्रतिज्ञा और स्कन्दकी उत्पत्ति
| वीरक उवाच | **वीरकने कहा—**कमललोचने! मेरी स्नेहवत्सला माता पार्वती ने भी मुझे ऐसा ही आदेश दिया है, अतः कोई भी परायी स्त्री भवनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। वीरकद्वारा ऐसा कही जानेपर पार्वतीदेवी मनमें विचार करने लगीं कि वायुने मुझे जिस स्त्रीके विषयमें सूचना दी थी, वह स्त्री नहीं थी, प्रत्युत वह कोई दैत्य था। क्रोधके वशीभूत हो मैंने व्यर्थ ही वीरकको शाप दे दिया। क्रोधसे प्रेरित हुए मूर्खलोग प्रायः इसी प्रकार अकार्य कर बैठते हैं। क्रोध करनेसे कीर्ति नष्ट हो जाती है और क्रोध सुस्थिर लक्ष्मीका भी विनाश कर देता है। इसी कारण तत्त्वार्थको निश्चितरूपसे न जानकर मैंने अपने पुत्रको ही शाप दे दिया। जिनकी बुद्धि विपरीत अर्थको ग्रहण करती है, उन्हें विपत्तियाँ मिलती हैं। ऐसा विचारकर पार्वती कमल-सी कान्तिवाले मुखसे लज्जाका नाट्य करती हुई वीरकसे इस प्रकार कहने लगीं॥ १–५॥ | | एवमुक्त्वा गिरिसुता माता मे स्नेहवत्सला।<br>प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने॥ १<br><br>इत्युक्ता तु तदा देवी चिन्तयामास चेतसा।<br>न सा नारीति दैत्योऽसौ वायुर्मे यामभाषत॥ २<br><br>वृथैव वीरकः शप्तो मया क्रोधपरीतया।<br>अकार्यं क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमीरितैः॥ ३<br><br>क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हन्ति स्थिरां श्रियम्।<br>अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम्।<br>विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदोदयः॥ ४<br><br>संचिन्त्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा।<br>लज्जासज्जविकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा॥ ५ | | | देव्युवाच | **देवी बोलीं—**वीरक! तुम अपने मनमें मेरे प्रति संदेह मत करो। मैं ही हिमाचलकी पुत्री, शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी और तुम्हारी माता हूँ। बेटा! मेरे शरीरकी अभिनव शोभाके भ्रमसे तुम शङ्का मत करो। यह गौर कान्ति मुझे ब्रह्माने प्रसन्न होकर प्रदान की है। मुझे यह दैत्यद्वारा निर्मित वृत्तान्त ज्ञात नहीं था, अतः शंकरजीके एकान्तमें स्थित रहनेपर किसी अन्य नारीका प्रवेश (तुम्हारी असावधानीसे) जानकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया है। वह शाप तो अब टाला नहीं जा सकता, किंतु उससे उद्धारका उपाय तुम्हें बतला रही हूँ। तुम मनुष्य-योनिमें जन्म लेकर वहाँ अपना मनोरथ पूरा करके शीघ्र ही मेरे पास वापस आ जाओगे॥ ६–९॥ | | अहं वीरक ते माता मा तेऽस्तु मनसो भ्रमः।<br>शङ्करस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभूभृतः॥ ६<br><br>मम गात्रच्छविभ्रान्त्या मा शङ्कां पुत्र भावय।<br>तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना॥ ७<br><br>मया शप्तोऽस्यविदिते वृत्तान्ते दैत्यनिर्मिते।<br>ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शङ्करे रहसि स्थिते॥ ८<br><br>न निवर्तयितुं शक्यः शापः किंतु ब्रवीमि ते।<br>शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात्स त्वं कामसमन्वितः॥ ९ | | | सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर वीरक प्रसन्न मनसे उदय हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिवाली माता पार्वतीको सिर झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् बोला॥ १०॥ | | शिरसा तु ततो वन्द्य मातरं पूर्णमानसः।<br>उवाचोदितपूर्णेन्दुद्युतिं च हिमशैलजाम्॥ १० | |
| * अध्याय १५८ * | ६५९ |
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| वीरक उवाच<br>नतसुरासुरमौलिमिलन्मणि-<br>प्रचयकान्तिकरालनखाङ्किते।<br>नगसुते शरणागतवत्सले<br>तव नतोऽस्मि नतार्त्तिविनाशिनि॥ ११<br><br>तपनमण्डलमण्डितकन्धरे<br>पृथुसुवर्णसुवर्णनगद्युते।<br>विषभुजङ्गनिषङ्गविभूषिते<br>गिरिसुते भवतीमहमाश्रये॥ १२<br><br>जगति कः प्रणताभिमतं ददौ<br>झटिति सिद्धनुते भवती यथा।<br>जगति कां च न वाञ्छति शङ्करो<br>भुवनधृत्तनये भवतीं यथा॥ १३<br><br>विमलयौगविनिर्मितदुर्जय-<br>स्वतनुतुल्यमहेश्वरमण्डले।<br>विदलितान्धकबान्धवसंहतिः<br>सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता॥ १४<br><br>सितसटापटलोद्धतकन्धरा-<br>भरमहामृगराजस्थिता।<br>विकलशक्तिमुखानलपिङ्गलायत<br>भुजौघ विपिष्टमहासुरा ॥ १५<br><br>निगदिता भुवनैरिति चण्डिका<br>जननि शुम्भनिशुम्भनिषूदनी।<br>प्रणतचिन्तितदानवदानव-<br>प्रमथनैकरतिस्तरसा भुवि॥ १६<br><br>वियति वायुपथे ज्वलनोज्ज्वले-<br>ऽवनितले तव देवि च यद्वपुः।<br>तदजितेऽप्रतिमे प्रणमाम्यहं<br>भुवनभाविनि ते भववल्लभे॥ १७<br><br>जलधयो ललितोद्धतवीचयो<br>हुतवहद्युतयश्च चराचरम्।<br>फणसहस्रभृतश्च भुजङ्गमा-<br>स्त्वदभिधास्यति मय्यभयंकराः॥ १८<br><br>भगवति स्थिरभक्तजनाश्रये<br>प्रतिगतो भवतीचरणाश्रयम्।<br>करणजातमिहास्तु ममाचलं<br>नुतिलवाप्तिफलाशयहेतुतः ॥ १९ | वीरकने कहा—गिरिराजकुमारी! आपके चरण-नख प्रणत हुए सुरों और असुरोंके मुकुटोंमें लगी हुई मणिसमूहोंकी उत्कट कान्तिसे सुशोभित होते रहते हैं। आप शरणागतवत्सला तथा प्रणतजनोंका कष्ट दूर करनेवाली हैं। मैं आपके चरणोंमें नमस्कार कर रहा हूँ। गिरिनन्दिनि! आपके कन्धे सूर्य-मण्डलके समान चमकते हुए सुशोभित हो रहे हैं। आपकी शरीरकान्ति प्रचुर सुवर्णसे परिपूर्ण सुमेरु गिरिकी तरह है। आप विषैले सर्परूपी तरकससे विभूषित हैं, मैं आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। सिद्धोंद्वारा नमस्कार की जानेवाली देवि! आपके समान जगत्में प्रणतजनोंके अभीष्टको तुरंत प्रदान करनेवाला दूसरा कौन है? गिरिजे! इस जगत्में भगवान् शंकर आपके समान किसी अन्य स्त्रीकी इच्छा नहीं करते। आपने महेश्वर-मण्डलको निर्मल योगबलसे निर्मित अपने शरीरके तुल्य दुर्जय बना दिया है। आप मारे गये अन्धकासुरके भाई-बन्धुओंका संहार करनेवाली हैं। सुरेश्वरोंने सर्वप्रथम आपकी स्तुति की है। आप श्वेत वर्णकी जटा (केश)-समूहसे आच्छादित कंधेवाले विशालकाय सिंहरूपी रथपर आरूढ़ होती हैं। आपने चमकती हुई शक्तिके मुखसे निकलनेवाली अग्निकी कान्तिसे पीला पड़नेवाली लम्बी भुजाओंसे प्रधान-प्रधान असुरोंको पीसकर चूर्ण कर दिया है॥ ११—१५॥<br><br>जननि! त्रिभुवनके प्राणी आपको शुम्भ-निशुम्भका संहार करनेवाली चण्डिका कहते हैं। एकमात्र आप इस भूतलपर विनम्र जनोंद्वारा चिन्तना किये गये प्रधान-प्रधान दानवोंका वेगपूर्वक मर्दन करनेमें उत्साह रखनेवाली हैं। देवि! आप अजेय, अनुपम, त्रिभुवन-सुन्दरी और शिवजीकी प्राणप्रिया हैं, आपका जो शरीर आकाशमें, वायुके मार्गमें, अग्निकी भीषण ज्वालाओंमें तथा पृथ्वीतलपर भासमान है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ। रुचिर एवं भीषण लहरोंसे युक्त महासागर, अग्निकी लपटें, चराचर जगत् तथा हजारों फण धारण करनेवाले बड़े-बड़े नाग—ये सभी आपका नाम लेनेवाले मेरे लिये भयंकर नहीं दीख पड़ते। अनन्य भक्तजनोंकी आश्रयभूता भगवति! मैं आपके चरणोंकी शरणमें आ पड़ा हूँ। आपके चरणोंमें प्रणत होनेसे प्राप्त हुए थोड़े-से फलके कारण मेरा इन्द्रियसमुदाय आपके चरणोंमें अटल स्थान प्राप्त करे। |
१६१- हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश
६६० * मत्स्यपुराण *
| प्रशममेहि ममात्मजवत्सले <br> तव नमोऽस्तु जगत् त्रयसंश्रये। <br> त्वयि ममास्तु मतिः सततं शिवे <br> शरणगोऽस्मि नतोऽस्मि नमोऽस्तु ते॥ २० | पुत्रवत्सले! मेरे लिये पूर्णरूपसे शान्त हो जाइये। त्रिलोकीकी आश्रयभूता देवि! आपको नमस्कार है। शिवे! मेरी बुद्धि निरन्तर आपके चिन्तनमें ही लगी रहे। मैं आपके शरणागत हूँ और चरणोंमें पड़ा हूँ। आपको नमस्कार है॥१६-२०॥ |
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| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वीरकके इस प्रकार संस्तवन करनेपर पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं, तब वे अपने पति शिवजीके सुन्दर भवनमें प्रविष्ट हुईं। इधर द्वारपाल वीरकने शिवजीके दर्शनकी अभिलाषासे आये हुए देवोंको आदरपूर्वक ऐसा कहकर अपने-अपने घरोंको लौटा दिया कि ‘देवगण! इस समय मिलनेका अवसर नहीं है; क्योंकि भगवान् शंकर एकान्तमें पार्वतीदेवीके साथ क्रीडा कर रहे हैं।’ ऐसा कहे जानेपर वे जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर देवताओंके मनमें उतावली उत्पन्न हो गयी, तब उन्होंने शंकरजीकी चेष्टाका पता लगानेके लिये अग्निको भेजा। वहाँ जाकर अग्निदेवने शुकका रूप धारण किया और गवाक्षमार्गसे भीतर प्रवेश करके देखा कि शंकरजी गिरिजाके साथ शय्यापर विराजमान हैं। उधर देवेश्वर शंकरजीकी दृष्टि शुकरूपी अग्निपर पड़ गयी, तब महादेव कुछ क्रुद्ध-से होकर अग्निसे बोले। |
| प्रसन्ना तु ततो देवी वीरकस्येति संस्तुता। <br> प्रविवेश शुभं भर्तुर्भवनं भूधरात्मजा॥ २१ <br> द्वारस्थो वीरको देवान् हरदर्शनकाङ्क्षिणः। <br> व्यसर्जयत् स्वकान्येव गृहाण्यादरपूर्वकम्॥ २२ <br> नास्त्यत्रावसरो देवा देव्या सह वृषाकपिः। <br> निभृतः क्रीडतीत्युक्ता ययुस्ते च यथागतम्॥ २३ <br> गते वर्षसहस्रे तु देवास्त्वरितमानसाः। <br> ज्वलनं चोदयामासुर्ज्ञातुं शङ्करचेष्टितम्॥ २४ <br> प्रविश्य जालरन्ध्रेण शुकरूपी हुताशनः। <br> ददृशे शयने शर्वं रतं गिरिजया सह॥ २५ <br> ददृशे तं च देवेशो हुताशं शुकरूपिणम्। <br> तमुवाच महादेवः किञ्चित्कोपसमन्वितः॥ २६ | |
| शर्व उवाच | **शिवजीने कहा—**अग्ने! चूँकि तुमने ही यह विघ्न उपस्थित किया है, इसलिये इसका फल भी तुम्हें भोगना पड़ेगा। ऐसा कहे जानेपर अग्नि हाथ जोड़कर शंकरजीद्वारा आधान किये गये वीर्यको पी गये और उसे सभी देवताओंके शरीरमें विभक्त करके उन्हें पूर्ण कर दिया। तदनन्तर शंकरजीका वह तपाये हुए स्वर्णके समान कान्तिमान् वीर्य देवताओंका उदर फाड़कर बाहर निकल आया और शंकरजीके उस विस्तृत आश्रममें अनेकों योजनोंमें विस्तृत एवं निर्मल जलसे पूर्ण महान् सरोवरके रूपमें परिणत हो गया। उसमें स्वर्णकी-सी कान्तिवाले कमल खिले हुए थे और नाना प्रकारके पक्षी चहचहा रहे थे। तत्पश्चात् स्वर्णमय वृक्ष एवं अगाध जलसे सम्पन्न उस सरोवरके विषयमें सुनकर कुतूहलसे भरी हुई पार्वतीदेवी उस स्वर्णमय कमलसे भरे हुए सरोवरके तटपर गयीं और उसके कमलको सिरपर धारण करके जलक्रीडा करने लगीं। तत्पश्चात् पार्वतीदेवी सखीके साथ उस सरोवरके तटपर बैठ गयीं और उस सरोवरके कमलकी गन्धसे सुवासित स्वच्छ स्वादिष्ट जलको पीनेकी इच्छा करने लगीं। |
| यस्मात्तु त्वत्कृतो विघ्नस्तस्मात्त्वय्युपपद्यते। <br> इत्युक्तः प्राञ्जलिर्वह्निरपिबद् वीर्यमाहितम्॥ २७ <br> तेनापूर्यंत तान् देवांस्तत्तत्कायविभेदतः। <br> विपाट्य जठरं तेषां वीर्यं माहेश्वरं ततः॥ २८ <br> निष्क्रान्तं तप्तहेमाभं वितते शङ्कराश्रमे। <br> तस्मिन् सरो महज्जातं विमलं बहुयोजनम्॥ २९ <br> प्रोत्फुल्लहेमकमलं नानाविहगनादितम्। <br> तच्छ्रुत्वा तु ततो देवी हेमद्रुममहाजलम्॥ ३० <br> जगाम कौतुकाविष्टा तत्सरः कनकाम्बुजम्। <br> तत्र कृत्वा जलक्रीडां तदब्जकृतशेखरा॥ ३१ <br> उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीयूता। <br> पातुकामा च तत्तोयं स्वादु निर्मलपङ्कजम्॥ ३२ |
| * अध्याय १५८ * | ६६१ |
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| अपश्यत् कृत्तिकाः स्नाताः षडर्कद्युतिसन्निभाः ।<br>पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वोपस्थिता गृहम् ॥ ३३<br><br>हर्षादुवाच पश्यामि पद्मपत्रे स्थितं पयः ।<br>ततस्ता ऊचुरखिलं कृत्तिका हिमशैलजाम् ॥ ३४<br><br>कृत्तिका ऊचुः<br>दास्यामो यदि ते गर्भः सम्भूतो यो भविष्यति ।<br>सोऽस्माकमपि पुत्रः स्यादस्मन्नाम्ना च वर्तताम् ।<br>भवेल्लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने ॥ ३५<br><br>इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मद्गात्रसम्भवः ।<br>सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत् ॥ ३६<br><br>ततस्तां कृत्तिका ऊचुर्विधास्यामोऽस्य वै वयम् ।<br>उत्तमान्युत्तमाङ्गानि यद्येवं तु भविष्यति ॥ ३७<br><br>उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिन्दिताः ।<br>ततस्ता हर्षसम्पूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः ॥ ३८<br><br>तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम् ।<br>पीते तु सलिले तस्मिंस्ततस्तस्मिन् सरोवरे ॥ ३९<br><br>विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणां कुक्षिमुद्गतः ।<br>निष्चक्रामाद्भुतो बालः सर्वलोकविभासकः ॥ ४०<br><br>प्रभाकरप्रभाकारः प्रकाशकनकप्रभः ।<br>गृहीतनिर्मलोदग्रशक्तिशूलः षडाननः ॥ ४१<br><br>दीप्तो मारयितुं दैत्यान् कुत्सितान् कनकच्छविः ।<br>एतस्मात् कारणाद् देवः कुमारश्चापि सोऽभवत् ॥ ४२ | इतनेमें ही उनकी दृष्टि उस सरोवरमें स्नान कर निकली हुई छहों कृत्तिकाओंपर पड़ी जो सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रही थीं तथा कमलके पत्तेके दोनेमें उस सरोवरके जलको लेकर घरकी ओर जानेके लिये उद्यत थीं। तब पार्वतींने उनसे हर्षपूर्वक कहा—'मैं कमलके पत्तेमें रखे हुए जलको देख रही हूँ।' यह सुनकर उन कृत्तिकाओंने पार्वतीसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ २७-३४॥<br><br>कृत्तिकाओंने कहा—शुभानने! यह जल हमलोग आपको दे देंगी, किंतु यदि आप यह प्रतिज्ञा करें कि इस जलके पान करनेसे जो गर्भ स्थित होगा, उससे उत्पन्न हुआ बालक हमलोगोंका भी पुत्र कहलाये और हमलोगोंके नामपर उसका नामकरण किया जाय। वह बालक सभी लोकोंमें विख्यात होगा। इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने कहा—'भला जो मेरे समान सभी अङ्गोंसे युक्त होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होगा, वह आप लोगोंका पुत्र कैसे हो सकेगा?' तब कृत्तिकाओंने पार्वतीसे कहा—'यदि हमलोग इस बालकके उत्तम मस्तकोंकी रचना करेंगी तो यह वैसा हो सकता है।' उनके ऐसा कहनेपर पार्वतींने कहा—'अनिन्द्य सुन्दरियो! ऐसा ही हो।' तब हर्षसे भरी हुई कृत्तिकाओंने कमलके पत्तेमें रखे हुए उस जलको पार्वतीको समर्पित कर दिया और पार्वतींने भी उस सारे जलको क्रमशः पी लिया। उस जलके पी लेनेपर उसी सरोवरके तटपर पार्वतीदेवीकी दाहिनी कोखको फाड़कर एक अद्भुत बालक निकल पड़ा जो समस्त लोकोंको उद्भासित कर रहा था। उसकी शरीरकान्ति सूर्यके समान थी। वह स्वर्ण-सदृश प्रकाशमान तथा हाथोंमें निर्मल एवं भयावनी शक्ति और शूल धारण किये हुए था। उसके छः मुख थे। वह सुवर्णकी-सी छविसे युक्त हो उद्दीप्त हो रहा था और पापाचारी दैत्योंको मारनेके लिये उद्यत-सा दीख रहा था। इसी कारण वे देव 'कुमार' नामसे भी प्रसिद्ध हुए॥ ३५-४२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने कुमारसम्भवो नामाष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें कुमारसम्भव नामक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५८ ॥
६६२ * मत्स्यपुराण *
एक सौ उनसठवाँ अध्याय
स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! पुनः पार्वती देवीकी |
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| वामं विदार्य निष्क्रान्तः सुतो देव्याः पुनः शिशुः।<br>स्कन्दाच्च वदने वह्नेः शुकात् सुवदनोऽरिहा॥ १<br>कृत्तिकामेलनादेव शाखाभिः सविशेषतः।<br>शाखाभिधाः समाख्याताः षट्सु वक्त्रेषु विस्तृताः॥ २<br>यतस्ततो विशाखोऽसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः।<br>स्कन्दो विशाखः षड्वक्त्रः कार्तिकेयश्च विश्रुतः॥ ३<br>चैत्रस्य बहुले पक्षे पञ्चदश्यां महाबलौ।<br>सम्भूतावर्कसदृशौ विशाले शरकानने॥ ४<br>चैत्रस्यैव सिते पक्षे पञ्चम्यां पाकशासनः।<br>बालकाभ्यां चकारैकं मत्वा चामरभूतये॥ ५<br>तस्यामेव ततः षष्ठ्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः।<br>सर्वैरमरसंघातैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रभास्करैः॥ ६<br>गन्धमाल्यैः शुभैर्धूपैस्तथा क्रीडनकैरपि।<br>छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः॥ ७<br>अभिषिक्तो विधानेन यथावत् षण्मुखः प्रभुः।<br>सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम्॥ ८<br>पत्यर्थं देवदेवस्य ददौ विष्णुस्तदायुधान्।<br>यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्मै धनाधिपः॥ ९<br>ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम्।<br>ददौ क्रीडनकं त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्।<br>एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनुत्तमम्॥ १०<br>ददुर्मुदितचेतस्काः स्कन्दायादित्यवर्चसे॥ ११<br>जानुभ्यामवनीं स्थित्वा सुरसंघास्तमस्तुवन्।<br>स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः॥ १२ | बायीं कोखको फाड़कर दूसरा शिशु पुत्ररूपमें बाहर निकला। सर्वप्रथम अग्निके मुखमें वीर्यका क्षरण होनेके कारण वह बालक सुन्दर मुखवाला और शत्रुओंका विनाशक हुआ। उसके छः मुख हुए। चूँकि छहों मुखोंमें विस्तृत शाखा नामसे प्रसिद्ध कृतिकाओंकी शाखाओंका विशेषरूपसे मेल हुआ था, इसलिये वह बालक लोकोंमें 'विशाख' नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार वह स्कन्द, विशाख, षड्वक्त्र और कार्तिकेयके नामसे प्रख्यात हुआ। चैत्रमासके कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं तिथि (अमावास्या)-को विशाल सरपतके वनमें सूर्यके समान तेजस्वी एवं महाबली ये दोनों शिशु उत्पन्न हुए थे। पुनः चैत्रमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको पाकशासन इन्द्रने देवताओंके लिये कल्याणकारी मानकर दोनों बालकोंको सम्मिलित करके एकीभूत कर दिया। उसी मासकी षष्ठी तिथिको ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, सूर्य आदि सभी देवसमूहोंद्वारा सामर्थ्यशाली गुह (देव-सेनापतिके पदपर) अभिषिक्त किये गये। उस समय चन्दन, पुष्पमाला, माङ्गलिक धूप, खिलौना, छत्र, चँवरसमूह, आभूषण और अङ्गरागद्वारा भगवान् षण्मुखका विधिपूर्वक यथावत् अभिषेक किया गया था। इन्द्रने 'देवसेना' नामसे विख्यात कन्याको उन्हें पत्नीरूपमें प्रदान किया। भगवान् विष्णुने देवाधिदेव गुहको अनेकों आयुध समर्पित किया। कुबेर उन्हें दस लाख यक्ष प्रदान किये। अग्निने तेज दिया। वायुने वाहन समर्पित किया। त्वष्टाने खिलौना तथा स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाला एक मुर्गा प्रदान किया। इस प्रकार उन सभी देवताओंने प्रसन्न मनसे सूर्यके समान तेजस्वी स्कन्दको सर्वश्रेष्ठ परिवार प्रदान किया। तत्पश्चात् प्रधान-प्रधान देवताओंके समूह पृथ्वीपर घुटने टेककर उन वरदायक षण्मुखकी निम्नाङ्कित स्तोत्रद्वारा स्तुति करने लगे॥ १—१२॥ |
| * अध्याय १५९ * | ६६३ |
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| देवा ऊचुः<br>नमः कुमाराय महाप्रभाय<br>स्कन्दाय च स्कन्दितदानवाय।<br>नवार्कविद्युद्द्युतये नमोऽस्तु ते<br>नमोऽस्तु ते षण्मुख कामरूप॥ १३<br>पिनद्धनानाभरणाय भर्त्रे<br>नमो रणे दारुणदारुणाय।<br>नमोऽस्तु तेऽर्कप्रतिमप्रभाय<br>नमोऽस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम्॥ १४<br>नमोऽस्तु त्रैलोक्यभयापहाय<br>नमोऽस्तु ते बालकृपापराय।<br>नमो विशालामललोचनाय<br>नमो विशाखाय महाव्रताय॥ १५<br>नमो नमस्तेऽस्तु मनोहराय<br>नमो नमस्तेऽस्तु रणोत्कटाय।<br>नमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय<br>नमोऽस्तु केयूरधराय तुभ्यम्॥ १६<br>नमो धृतोदग्रपताकिने नमो<br>नमः प्रभावप्रणताय तेऽस्तु।<br>नमो नमस्ते वरवीर्यशालिने<br>कृपापरो नो भव भव्यमूर्ते॥ १७<br>क्रियापरा यज्ञपतिं च स्तुत्वा<br>विरेमुरेवं त्वमराधिपाद्याः।<br>एवं तदा षड्वदनं तु सेन्द्रा<br>मुदा सुतुष्टश्च गुहस्ततस्तान्।<br>निरीक्ष्य नेत्रैरमलैः सुरेशान्<br>शत्रून् हनिष्यामि गतज्वराः स्थ॥ १८ | **देवताओंने कहा—**कामरूप षण्मुख! आप कुमार, महान् तेजस्वी, शिवतेजसे उत्पन्न और दानवोंका कचूमर निकालनेवाले हैं। आपकी शरीर-कान्ति उदयकालीन सूर्य एवं बिजलीकी-सी है। आपको हमारा बारंबार नमस्कार प्राप्त हो। आप नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, जगत्के पालनकर्ता और रणभूमिमें भीषण दानवोंके लिये अत्यन्त भयंकर हैं, आपको प्रणाम है। सूर्य-सरीखे प्रतिभाशाली आपको अभिवादन है। गुह्य रूपवाले आप गुहको हमारा नमस्कार है। त्रिलोकीके भयको दूर करनेवाले आपको प्रणाम है। कृपा करनेमें तत्पर रहनेवाले बालरूप आपको अभिवादन है। विशाल एवं निर्मल नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। महान् व्रतका पालन करनेवाले आप विशाखको प्रणाम है। सामान्यतया मनोहर रूपधारी तथा रणभूमिमें भयानक रूपसे युक्त आपको बारंबार अभिवादन है। उज्ज्वल मयूरपर सवार होनेवाले आपको नमस्कार है। आप केयूरधारीको प्रणाम है। अत्यन्त ऊँचाईपर फहरानेवाली पताकाको धारण करनेवाले आपको अभिवादन है। प्रणतजनोंपर प्रभाव डालनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वश्रेष्ठ पराक्रमसे सम्पन्न हैं। आपको बारंबार प्रणाम है। मनोहर रूपधारिन्! हमलोगोंपर कृपा कीजिये। इस प्रकार देवराज इन्द्र आदि सभी क्रियापरायण देवगण जब हर्षपूर्वक यज्ञपति षडाननकी स्तुति करके चुप हो गये, तब परम प्रसन्न हुए गुह अपने निर्मल नेत्रोंसे उन सुरेश्वरोंकी ओर निहारकर बोले—'देवगण! मैं आपलोगोंके शत्रुओंका संहार करूँगा, अब आपलोग शोकरहित हो जायँ'॥ १३–१८॥ | | कुमार उवाच<br>कं वः कामं प्रयच्छामि देवता ब्रूत निर्वृताः।<br>यद्यप्यसाध्यं हृद्यं वो हृदये चिन्तितं परम्॥ १९<br>इत्युक्तास्तु सुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः।<br>सर्व एव महात्मानं गुहं तद्गतमानसाः॥ २०<br>दैत्येन्द्रस्तारको नाम सर्वामरकुलान्तकृत्।<br>बलवान् दुर्जयो दुष्टो दुराचारोऽतिकोपनः।<br>तमेव जहि हृद्योऽर्थ एषोऽस्माकं भयापह॥ २१ | **कुमारने पूछा—**देवगण! आपलोग निःसंकोच बतलायें कि मैं आपलोगोंकी कौन-सी अभिलाषा पूर्ण करूँ? वह उत्तम अभिलाषा, जिसे आपलोगोंने अपने हृदयमें चिरकालसे सोच रखा है, यदि दुःसाध्य भी होगी तो भी मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा। कुमारद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर सभी देवता उनके मनोऽनुकूल हो सिर झुकाकर महात्मा गुहसे बोले—'भय-विनाशक गुह! तारक नामवाले दैत्येन्द्रने सभी देवकुलोंका विनाश कर दिया है। वह बलवान्, दुर्जय, अत्यन्त दुष्ट, दुराचारी और अतिशय क्रोधी है, आप उसीका वध कीजिये। यही हमलोगोंकी हार्दिक अभिलाषा है।' |
| ६६४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामरपदानुगः।<br>जगाम जगतां नाथः स्तूयमानोऽमरेश्वरैः ॥ २२<br>तारकस्य वधार्थाय जगतः कण्टकस्य वै।<br>ततश्च प्रेषयामास शक्रो लब्धसमाश्रयः ॥ २३<br>दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम्।<br>स तु गत्वाब्रवीद् दैत्यं निर्भयो भीमदर्शनः ॥ २४<br>दूत उवाच<br>शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतो दिवस्पतिः।<br>तारकासुर तच्छ्रुत्वा घट शक्त्या यथेच्छया ॥ २५<br>यज्जगद्दालनादाप्तं किल्बिषं दानव त्वया।<br>तस्याहं शासकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये ॥ २६<br>श्रुत्वैतद् दूतवचनं कोपसंरक्तलोचनः।<br>उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः ॥ २७<br>तारक उवाच<br>दृष्टं ते पौरुषं शक्र रणेषु शतशो मया।<br>निस्त्रपत्वान्न ते लज्जा विद्यते शक्र दुर्मते ॥ २८<br>एवमुक्ते गते दूते चिन्तयामास दानवः।<br>नालब्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेवं हि चार्हति ॥ २९<br>जितः स शक्रो नाकस्माज्जायते संश्रयाश्रयः।<br>निमित्तानि च दुष्टानि सोऽपश्यद् दुष्टचेष्टितः ॥ ३०<br>पांसुवर्षमसृक्पातं गगनादवनीतले।<br>भुजनेत्रप्रकम्पं च वक्त्रशोषं मनोभ्रमम् ॥ ३१<br>स्वकान्तावक्त्रपद्मानां म्लानतां च व्यलोकयत्।<br>दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान्सोऽपश्यद् दुष्टवेदिनः ॥ ३२<br>तदचिन्त्यैव दितिजो न्यस्तचिन्तोऽभवत् क्षणात्।<br>यावद्गजघटाघण्टारणत्काररवोत्कटाम् ॥ ३३<br>तद्धतुरगसङ्घातक्षुण्णभूरेणुपिञ्जराम् ।<br>चञ्चलस्यन्दनोदग्रध्वजराजिविराजिताम् ॥ ३४ | देवताओंद्वारा ऐसा निवेदन किये जानेपर गुहने 'तथैति' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वे जगन्नाथ गुह देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए सम्पूर्ण देवगणोंके साथ जगत्के कण्टकस्वरूप तारकका वध करनेके लिये प्रस्थित हुए। तदुपरान्त सहायक उपलब्ध हो जानेपर इन्द्रने एक कठोर वचन बोलनेवाले दूतको दैत्यसिंह तारकके पास भेजा। वह भयंकर रूपधारी दूत दैत्यराजके पास जाकर निर्भय होकर बोला ॥ १९–२४॥<br><br>दूतने कहा—दैत्यकेतु तारकासुर! स्वर्गके अधीश्वर देवराज इन्द्रने तुम्हें कुछ संदेश कहला भेजा है, उसे सुनकर तुम शक्तिपूर्वक स्वेच्छानुसार प्रयत्न करो। (उन्होंने कहलाया है कि) 'दानव! जगत्का विनाश करके तुमने जो पाप कमाया है, तुम्हारे उस पापका शासन करनेके लिये मैं प्रस्तुत हूँ। इस समय मैं त्रिभुवनका राजा हूँ।' दूतकी ऐसी बात सुनकर तारकके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उसकी विभूति प्रायः नष्ट हो चुकी थी। तब उस दुष्टात्माने दूतसे कहा॥ २५–२७॥<br><br>तारक बोला—इन्द्र! मैंने रणभूमिमें सैकड़ों बार तुम्हारे पुरुषार्थको देख लिया है। दुर्बुद्धि इन्द्र! निर्लज्ज होनेके कारण तुम्हें ऐसा कहते हुए लज्जा नहीं आती। ऐसा उत्तर पाकर दूतके चले जानेपर दानवराज तारक विचार करने लगा कि किसी विशिष्टकी सहायता प्राप्त हुए बिना इन्द्र इस तरहकी बातें नहीं कह सकते; क्योंकि वे हमसे पराजित हो चुके हैं। पता नहीं, अकस्मात् उन्हें कहाँसे सहायता उपलब्ध हो गयी है। इसी बीच उस दुष्ट चेष्टावाले दानवको अनर्थसूचक निमित्त दीख पड़े। उसी समय आकाशसे भूतलपर धूलकी वर्षा होने लगी तथा रक्तपात होने लगा। उसकी भुजाएँ और नेत्र काँपने लगे। उसका मुख सूख गया और उसके मनमें घबराहट उत्पन्न हो गयी। उसे अपनी पत्नियोंके मुखकमल मलिन दीख पड़ने लगे तथा अनर्थकी सूचना देनेवाले भयंकर दुष्ट प्राणियोंके दर्शन हुए, किंतु इन सबका कुछ भी विचार न कर दैत्य तारक क्षणभरमें ही चिन्तारहित हो गया। इतनेमें ही अट्टालिकापर बैठे हुए दैत्यने आती हुई देवताओंकी सेनाको देखा जिसमें गजयूथोंके बजते हुए घंटोंका उत्कट शब्द हो रहा था। उसी प्रकार जो घोड़ोंकी टापोंसे पिसी हुई धूलसे आच्छादित होनेके कारण पीली दीख रही थी तथा चलते हुए रथोंके ऊपर फहराते हुए ध्वजसमूहों, |
| * अध्याय १५९ * | ६६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विमानैश्चाद्भुताकारैश्चलितामरचामरैः ।<br>तां भूषणनिबद्धां च किंनरोद्गीतनादिताम्॥ ३५<br>नानानाकतरूत्फुल्लकुसुमापीडधारिणीम् ।<br>विकोशशस्त्रपरिष्कारां वर्मनिर्मलदर्शनाम्॥ ३६<br>बन्द्युद्घुष्टस्तुतिरसां नानावाद्यनिनादिताम्।<br>सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत्॥ ३७ | डुलाये जाते हुए देवताओंके चँवरों और अद्भुत आकारवाले विमानोंसे सुशोभित थी। जो आभूषणोंसे विभूषित, किन्नरोंके गानसे निनादित, नाना प्रकारके स्वर्गीय वृक्षोंके खिले हुए पुष्पोंको मस्तकपर धारण करनेवाले सैनिकोंसे युक्त, म्यानरहित शस्त्रास्त्रोंसे परिष्कृत और निर्मल कवचोंसे युक्त थी, जिसमें वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई स्तुतियोंके शब्द सुनायी पड़ रहे थे और जो नाना प्रकारके बाजोंसे निनादित हो रही थी॥ २८–३७॥ |
| चिन्तयामास स तदा किंचिदुद्भ्रान्तमानसः ।<br>अपूर्वः को भवेद् योद्धा यो मया न विनिर्जितः ॥ ३८ | उसे देखकर तारकका मन कुछ उद्भ्रान्त हो उठा। तब वह विचार करने लगा कि यह कौन अपूर्व योद्धा हो सकता है, जिसे मैंने पराजित नहीं किया है। |
| ततश्चिन्ताकुलो दैत्यः शुश्राव कटुकाक्षरम्।<br>सिद्धवन्दिभिरुद्घुष्टमिदं हृदयदारणम् ॥ ३९ | इस प्रकार वह दैत्य जब चिन्तासे व्याकुल हो रहा था, उसी समय उसने सिद्ध-वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई यह कठोर अक्षरोंवाली एवं हृदयविदारिणी गाथा सुनी ॥ ३८-३९ ॥ |
| अथ गाथा<br>जयातुलशक्तिदीधितिपिञ्जर<br>भुजदण्डचण्डरणरभस ।<br>सुखद कुमुदकाननविकासनेन्दो कुमार<br>जय दितिजकुलमहोदधिवडवानल ॥ ४० | कुमार! अप्रमेय शक्तिकी किरणोंसे आपका वर्ण पीला हो गया है। आप अपने भुजदण्डोंसे प्रचण्ड युद्धका दृश्य उत्पन्न कर देनेवाले, भक्तोंके लिये सुखदायक, कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिये चन्द्रमा और दैत्यकुलरूप महासागरके लिये वडवानलके समान हैं, आपकी जय हो, जय हो। |
| षण्मुख मधुररवमयूररथ<br>सुरमुकुटकोटिघट्टितचरणनखाङ्कुरमहासन।<br>जय ललितचूड़ाकलापनवविमलदल-<br>कमलकान्त दैत्यवंशदुःसहदावानल ॥ ४१ | षण्मुख! मधुर शब्द करनेवाला मयूर आपका वाहन है, आपका सिंहासन देवताओंके मुकुटोंकी कोरसे संघट्टित चरणनखोंके अङ्कुरसे सुशोभित होता है, आपका रुचिर चूडासमूह नूतन एवं निर्मल कमलदलके सम्मेलनसे सुशोभित होता है, आप दैत्यवंशके लिये दुःसह दावानलके समान हैं, आपकी जय हो। |
| जय विशाख विभो जय<br>सकललोकतारक जय देवसेनानायक।<br>स्कन्द जय गौरीनन्दन घण्टाप्रिय<br>प्रिय विशाख विभो धृतपताकप्रकीर्णपटल।<br>कनकभूषण भासुरदिनकरच्छाय ॥ ४२ | ऐश्वर्यशाली विशाख! आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेवाले हैं, आपकी जय हो। देवसेनाके नायककी जय हो। स्कन्द! आप गौरीनन्दन और घंटाके प्रेमी हैं। ऐश्वर्यशाली प्रिय विशाख! आप हाथमें पताकासमूह धारण करनेवाले हैं और आपकी छवि स्वर्णमय आभूषण धारण करनेसे सूर्यके समान चमकीली है, आपकी जय हो। |
| जय जनितसम्भ्रम लीलालूनाखिलाराते<br>जय सकललोकतारक दितिजा सुरवर तारकान्तक।<br>स्कन्द जय बाल सप्तवासर<br>जय भुवनावलिशोकविनाशन ॥ ४३ | आप भय उत्पन्न करनेवाले और लीलापूर्वक सम्पूर्ण शत्रुओंके विनाशकर्ता हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंके उद्धारक तथा असुरवर दैत्य तारकके विनाशकारक हैं, आपकी जय हो। सप्तदिवसीय बालक स्कन्द। आप समस्त भुवनोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो ॥ ४०–४३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे रणोद्योगो नामैकोनषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें रणोद्योग नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५९ ॥
६६६ * मत्स्यपुराण *
एक सौ साठवाँ अध्याय
तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| श्रुत्वैतत्तारकः सर्वमुद्घुष्टं देववन्दिभिः।<br>सस्मार ब्रह्मणो वाक्यं वधं बालादुपस्थितम्॥ १<br><br>स्मृत्वा धर्मं ह्यवर्माङ्गः पदातिरपदानुगः।<br>मन्दिरात्र्निर्जगामाशु शोकग्रस्तेन चेतसा॥ २<br><br>कालनेमिमुखा दैत्याः संरम्भाद् भ्रान्तचेतसः।<br>योधा धावत गृहीत योजयध्वं वरूथिनीम्॥ ३<br><br>कुमारं तारको दृष्ट्वा बभाषे भीषणाकृतिः।<br>किं बाल योद्धुकामोऽसि क्रीड कन्दुकलीलया॥ ४<br><br>त्वया न दानवा दृष्टा यत्सङ्गरविभीषकाः।<br>बालत्वादथ ते बुद्धिरेवं स्वल्पार्थदर्शिनी॥ ५<br><br>कुमारोऽपि तमग्रस्थं बभाषे हर्षयन् सुरान्।<br>शृणु तारक शास्त्रार्थस्तव चैव निरूप्यते॥ ६<br><br>शास्त्रैरर्था न दृश्यन्ते समये निर्भयैर्भटैः।<br>शिशुत्वं मावमंस्था मे शिशुः कालभुजङ्गमः॥ ७<br><br>दुष्प्रेक्ष्यो भास्करो बालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः।<br>अल्पाक्षरो न मन्त्रः किं सुस्फुरो दैत्य दृश्यते॥ ८ | ऋषियो! देववन्दियोंद्वारा उद्घोषित वह सारा प्रसङ्ग सुनकर तारकको ब्रह्माद्वारा कही हुई बालकके हाथसे वध होनेवाली बातका स्मरण हो आया। तब वह कालधर्मका स्मरण कर कवचरहित अवस्थामें अकेले पैदल ही तुरंत अपने भवनसे बाहर निकल पड़ा। उस समय उसका चित्त शोकसे ग्रस्त था। उसने पुकारकर कहा—'अरे कालनेमि आदि प्रमुख दैत्य योद्धाओ! यद्यपि आतुरतावश तुमलोगोंका चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है, तथापि तुमलोग दौड़ो, इसे पकड़ लो और इस सेनाके साथ युद्ध करो।' तत्पश्चात् भयंकर आकृतिवाला तारक कुमारको देखकर बोला—'अरे बच्चे! क्या तुम युद्ध करना चाहते हो? यदि ऐसी बात है तो आओ और कन्दुकक्रीडाकी तरह खेलो। तुमने अभीतक रणभूमिमें भय उत्पन्न करनेवाले दानवोंको नहीं देखा है। बालक होनेके कारण तुम्हारी बुद्धि इस प्रकारके छोटे-मोटे प्रयोजनोंको देखनेवाली है अर्थात् दूरदर्शिनी नहीं है।' यह सुनकर कुमार भी देवताओंको हर्षित करते हुए आगे खड़े हुए तारकसे बोले—'तारक! सुनो, मैं तुम्हारे शास्त्रीय अर्थका निरूपण कर रहा हूँ। निर्भीक योद्धा समरभूमिमें शास्त्रीय प्रयोजनको नहीं देखते। तुम मेरे बालकपनकी अवहेलना मत करो। जैसे साँपका बच्चा कष्टकारक होता है और उदयकालीन सूर्यकी ओर भी नहीं देखा जा सकता, उसी तरह मैं दुर्जय बालक हूँ। दैत्य! थोड़े अक्षरोंवाला मन्त्र क्या महान् स्फूर्तिदायक नहीं देखा जाता?'॥ १—८॥ |
| कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेप मुद्गरम्।<br>कुमारस्तं निरस्याथ वज्रेणामोघवर्चसा॥ ९ | कुमार इस प्रकारकी बातें कह ही रहे थे कि दैत्यने उनपर मुद्गरसे आघात किया। तब कुमारने अपने अमोघ वर्चस्वी वज्रसे उसे निरस्त कर दिया। |
| ततश्चिक्षेप दैत्येन्द्रो भिन्दिपालमयोमयम्।<br>करेण तच्च जग्राह कार्तिकेयोऽमरारिहा॥ १० | तत्पश्चात् दैत्येन्द्रने उन पर लोहनिर्मित भिन्दिपाल चलाया, किंतु देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले कार्तिकेयने उसे हाथसे पकड़ लिया। |
| गदां मुमोच दैत्याय षण्मुखोऽपि खरस्वनाम्।<br>तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेऽचलराडिव॥ ११ | फिर षडाननने उस दैत्यके ऊपर घोर शब्द करती हुई गदा फेंकी। उस गदासे आहत हो वह दैत्य पर्वतराजकी तरह काँप उठा। |
| मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा षड्वदनं रणे।<br>चिन्तयामास बुद्ध्या वै प्राप्तः कालो न संशयः॥ १२ | तब उस दैत्यने षडाननको रणभूमिमें अजेय मान लिया और वह बुद्धिसे विचार करने लगा कि निश्चय ही मेरा काल आ पहुँचा है। |
१६२- प्रह्लादद्वारा भगवान् नरसिंहका स्वरूप-वर्णन तथा नरसिंह और दानवोंका भीषण युद्ध
| * अध्याय १६० * | ६६७ |
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| कुपितं तु यमालोक्य कालनेमिपुरोगमाः।<br>सर्वे दैत्येश्वरा जघ्नुः कुमारं रणदारुणम्॥ १३<br>स तैः प्रहारैरस्पृष्टो वृथाक्लेशो महाद्युतिः।<br>रणशौण्डास्तु दैत्येन्द्राः पुनः प्रासैः शिलीमुखैः॥ १४<br>कुमारं सामरं जघ्नुर्बलिनो देवकण्टकाः।<br>कुमारस्य व्यथा नाभूद् दैत्यास्त्रनिहतस्य तु॥ १५<br>प्राणान्तकरणो जातो देवानां दानवाहवः।<br>देवान्निपीडितान् दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत्॥ १६<br>ततोऽस्त्रैर्वारयामास दानवानामनीकिनीम्।<br>ततस्तन्निष्प्रतीकारैस्ताडिताः सुरकण्टकाः॥ १७<br>कालनेमिमुखाः सर्वे रणादासन् पराङ्मुखाः। | तदनन्तर रणमें भीषण कार्य करनेवाले उन कुमारको क्रुद्ध देखकर कालनेमि आदि सभी दैत्येश्वर उनपर प्रहार करने लगे, परंतु उन प्रहारोंका परम कान्तिमान् कुमारपर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। उनका शस्त्रास्त्र छोड़नेका श्रम व्यर्थ हो गया। पुनः युद्धनिपुण, देवकण्टक महाबली दैत्येन्द्र देवताओंसहित कुमारपर भाले और बाणोंसे प्रहार करने लगे। इस प्रकार दैत्यास्त्रोंद्वारा प्रहार करनेपर भी कुमारको कुछ भी पीड़ा न हुई। पर दानवोंका वह युद्ध जब देवताओंके लिये प्राणघातक-सा दीखने लगा, तब देवताओंको अत्यन्त पीड़ित देख कुमार क्रुद्ध हो उठे। फिर तो उन्होंने अपने अस्त्रोंके प्रहारसे दानवोंकी सेनाको खदेड़ दिया। उन अनिवार्य अस्त्रोंकी चोटसे कालनेमि आदि सभी देवकण्टक दानव घायल हो गये, तब वे युद्धसे विमुख हो भाग खड़े हुए॥९—१७ १/२॥ | | विद्रुतेष्वथ दैत्येषु हतेषु च समंततः॥ १८<br>ततः क्रुद्धो महादैत्यस्तारकोऽसुरनायकः।<br>जग्राह च गदां दिव्यां हेमजालपरिष्कृताम्॥ १९<br>जघ्ने कुमारं गदया निष्प्रभकनकाङ्गदः।<br>शरैर्मयूरं चित्रैश्च चकार विमुखान् सुरान्॥ २०<br>तथा परैर्महाभल्लैर्मयूरं गुहवाहनम्।<br>विभेद तारकः क्रुद्धः स सैन्येऽसुरनायकः॥ २१<br>दृष्ट्वा पराङ्मुखान् देवान् मुक्तरक्तं स्ववाहनम्।<br>जग्राह शक्तिं विमलां रणे कनकभूषणाम्॥ २२<br>बाहुना हेमकेयूररुचिरेण षडाननः।<br>ततो जवान्महासेनस्तारकं दानवाधिपम्॥ २३<br>तिष्ठ तिष्ठ सुदुर्बुद्धे जीवलोकं विलोकय।<br>हतोऽस्यद्य मया शक्त्या स्मर शस्त्रं सुशिक्षितम्॥ २४<br>इत्युक्त्वा च ततः शक्तिं मुमोच दितिजं प्रति।<br>सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा।<br>बिभेद दैत्यहृदयं वज्रशैलेन्द्रकर्कशम्॥ २५<br>गतासुः स पपातोर्व्यां प्रलये भूधरो यथा।<br>विकीर्णमुकुटोष्णीषो विस्रस्ताखिलभूषणः॥ २६ | तदनन्तर चारों ओर दैत्योंके इस प्रकार मारे जाने एवं पलायन कर जानेपर असुरनायक महादैत्य तारक क्रोधमें भर गया। तब तपाये हुए स्वर्णके बने हुए बाजूबंदको धारण करनेवाले उस दैत्यने स्वर्णसमूहसे विभूषित अपनी दिव्य गदा हाथमें ली और उस गदासे कुमारपर प्रहार किया। फिर मोर-पंखसे सुशोभित बाणोंके आघातसे देवताओंको युद्ध-विमुख कर दिया। तदुपरान्त क्रोधसे भरे हुए असुरनायक तारकने उस सेनामें दूसरे भल्ल नामक विशाल बाणोंसे गुहके वाहन मयूरको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार रणभूमिमें देवताओंको युद्धविमुख और अपने वाहन मयूरको खून उगलते देखकर षडाननने वेगपूर्वक अपने स्वर्णनिर्मित केयूरसे विभूषित हाथमें स्वर्णजटित निर्मल शक्ति ग्रहण की। तत्पश्चात् देव-सेनानायक कुमार दानवेश्वर तारकको ललकारते हुए बोले—'सुदुर्बुद्धे! खड़ा रह, खड़ा रह और जीवलोककी ओर दृष्टिपात कर ले। अपने भलीभाँति सीखे हुए शस्त्रका स्मरण कर ले। अब तू मेरी शक्तिद्वारा मारा जा चुका।' ऐसा कहकर उन्होंने उस दैत्यपर अपनी शक्ति छोड़ दी। कुमारके हाथसे छूटी हुई उस शक्तिने उनके केयूरके शब्दका अनुगमन करती हुई आगे बढ़कर उस दैत्यके हृदयको, जो वज्र और पर्वतके समान अत्यन्त कठोर था, विदीर्ण कर दिया। फिर तो वह प्राणरहित हो भूतलपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे प्रलयकालमें पर्वत धराशायी हो जाते हैं। उसकी पगड़ी और मुकुट छिन्न-भिन्न हो गये और सारे आभूषण पृथ्वीपर बिखर गये॥१८—२६॥ |
६६८ * मत्स्यपुराण *
| तस्मिन् विनिहते दैत्ये त्रिदशानां महोत्सवे।<br>नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत्॥ २७<br>स्तुवन्तः षण्मुखं देवाः क्रीडन्तश्चाङ्गनायुताः।<br>जग्मुः स्वानेव भवनान् भूरिधामान उत्सुकाः ॥ २८<br>ददुश्चापि वरं सर्वे देवाः स्कन्दमुखं प्रति।<br>तुष्टाः सम्प्राप्तसर्वेच्छाः सह सिद्धैस्तपोधनैः ॥ २९ | इस प्रकार उस दैत्यके मारे जानेपर देवताओंके उस महोत्सवके अवसरपर नरकोंमें भी कोई पापकर्मा प्राणी दुःखी नहीं था। परम तेजस्वी देवगण षडाननकी स्तुति करके अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित क्रीडा करते हुए उत्सुकतापूर्वक अपने-अपने गृहोंको चले गये। सभी इच्छाओंकी पूर्ति हो जानेके कारण सभी देवता परम संतुष्ट थे। वे जाते समय तपोधन सिद्धोंके साथ स्कन्दको वर देते हुए बोले ॥ २७-२९॥ |
|---|---|
| देवा ऊचुः<br>यः पठेत् स्कन्दसम्बद्धां कथां मर्त्यो महामतिः।<br>शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत् कीर्तिमान्नरः ॥ ३०<br>बह्वायुः सुभगः श्रीमान् कान्तिमाञ्छुभदर्शनः।<br>भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः ॥ ३१<br>संध्यामुपास्य यः पूर्वा स्कन्दस्य चरितं पठेत्।<br>स मुक्तः किल्बिषैः सर्वैर्महाधनपतिर्भवेत् ॥ ३२<br>बालानां व्याधिजुष्टानां राजद्वारं च सेवताम्।<br>इदं तत्परमं दिव्यं सर्वदा सर्वकामदम्।<br>तनुक्षये च सायुज्यं षण्मुखस्य व्रजेन्नरः॥ ३३ | देवताओंने कहा—जो महाबुद्धिमान् मरणधर्मा मनुष्य स्कन्दसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको पढ़ेगा, सुनेगा अथवा दूसरेको सुनायेगा, वह कीर्तिमान्, दीर्घायु, सौभाग्यशाली, श्रीसम्पन्न, कान्तिमान्, शुभदर्शन, सभी प्राणियोंसे निर्भय और सम्पूर्ण दुःखोंसे रहित हो जायगा। जो मनुष्य प्रातःकालिक संध्याकी उपासना करनेके बाद स्कन्दके चरित्रका पाठ करेगा वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर महान् धनराशिका स्वामी होगा। यह परम दिव्य स्कन्द-चरित बालकों, रोगियों और राजद्वारपर सेवा करनेवाले पुरुषोंके लिये सर्वदा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इसका पाठ करनेवाला मनुष्य शरीरान्त होनेपर षडाननकी सायुज्यताको प्राप्त हो जायगा ॥ ३०-३३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकवधो नाम षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तारकवध नामक एक सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १६०॥
एक सौ एकसठवाँ अध्याय
हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश
| ऋषय ऊचुः<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम्।<br>नरसिंहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! अब हमलोग दानवराज हिरण्यकशिपुका वध तथा भगवान् नरसिंहके पापविनाशक माहात्म्यको सुनना चाहते हैं (आप उसे हमें सुनाइये) ॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः।<br>दैत्यानामादिपुरुषश्चकार स महत्तपः ॥ २<br>दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च।<br>जलवासी समभवत् स्नानमौनधृतव्रतः ॥ ३ | सूतजी कहते हैं—विप्रवरो ! पूर्वकालमें कृतयुगमें दैत्योंके आदि पुरुष सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपुने महान् तप किया। उसने स्नान और मौनका व्रत धारण करके ग्यारह हजार वर्षोंतक जलमें निवास किया। |