मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४७ वायु, पूषा, वितथ, बृहत्क्षत ( कुछ ग्रन्थों में—गृहक्षत ), यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप ( वरुण ), असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति एवं दिति। केन्द्रस्थ ब्रह्मा के चारो ओर कोणों में आप, सावित्र, जय एवं रुद्र तथा मध्य में अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप ( इन्द्र ), मित्र, राजयक्ष्मा, पृथिवीधर एवं आपवत्स देवता स्थित रहते हैं। प्रायः वास्तु-ग्रन्थों में देवों का यही क्रम एवं संज्ञा प्रचलित है।
अथाष्टमोऽध्यायः ( बलिकर्म ) देवानां स्वपदस्थानां बलिकर्म विधीयते । सामान्याहत्यमार्गेण ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥१॥ अपने-अपने वास्तुपद में स्थित वास्तुदेवों का बलिकर्म ( पूजा एवं नैवेद्य ) होना चाहिये। इनका बलिकर्म सामान्य आहत्य मार्ग ( प्रत्येक देवता के अनुसार पूजा एवं नैवेद्य ) से करना चाहिये। बलिकर्म में ब्रह्मा आदि देवों की क्रमानुसार पूजा करनी चाहिये।।१।। ✵ आहत्यबलिः ✵ गन्धमाल्यैश्च धूपेन पयसा मधुसर्पिषा । पायसौदनलाजैश्च ब्रह्मस्थानं समर्चयेत् ॥२॥ पूजन-सामग्री एवं नैवेद्य—बलिकर्म में देवों को इस प्रकार क्रम देना चाहिये— ब्रह्मस्थान की पूजा गन्ध, माल्य, धूप, दूध, मधु, घी, खीर एवं धान के लावा से करनी चाहिये।।२।। आर्यके फलभक्ष्यं स्यान्माषान्नं च तिलानि च। विवस्वति विनिक्षिप्तं दधि दूर्वा च मित्रके ॥३॥ ( इसके पश्चात् ब्रह्मा के चारो ओर स्थित देवों की पूजा होती है।) आर्यक का बलिकर्म फलनिर्मित भोज्य पदार्थ, उड़द एवं तिल से करना चाहिये। विवस्वान् को दधि एवं मित्रक को दूर्वा प्रदान करना चाहिये।।३।। महीधरे भवेद् दुग्धमेवमन्तर्बलिः स्मृतः । पर्जन्यस्याज्यमैन्द्रस्य नवनीतं सपुष्पकम् ॥४॥ महीधर को दूध प्रदान करना चाहिये। इस प्रकार वास्तुमण्डल के भीतर केन्द्रस्थ देवों का बलिकर्म सम्पन्न होता है ( इसके पश्चात् बाह्य कोष्ठों के देवों का बलिकर्म होता है )। पर्जन्य को घी एवं ऐन्द्र को पुष्पसहित नवनीत प्रदान करना चाहिये।।४।। इन्द्रे कोष्ठं च पुष्पं च मधु कन्दाश्च भास्करे । सत्यके मधुकं दद्याद् भृशाय नवनीतकम् ॥५॥
अष्टमोऽध्यायः 卐 बलिकर्म ४९ इन्द्र को कोष्ठ एवं पुष्प, सूर्य को कन्द एवं मधु, सत्यक को मधु तथा भृश को नवनीत प्रदान करना चाहिये ।।५।। माषं रजनिचूर्णं च गगनस्य बलिं ददेत् । दुग्धाज्यं तगरं वह्नेः शिम्बान्नं पूष्णि पायसम् ।।६।। आकाश को उड़द एवं हरताल, अग्नि को दूध, घी एवं तगरपुष्प तथा पूषा को शिम्बान्न ( तरकारी ) एवं पायस प्रदान करना चाहिये ।।६।। कङ्क्वन्नं वितथे शीधु राक्षसे बलिरिष्यते । शिम्बान्नं कृसरं याम्ये गन्धर्वेऽखिलगन्धकम् ।।७।। वितथ को पका हुआ कङ्गु, राक्षस को मदिरा, यम को तरकारी एवं खिचड़ी तथा गन्धर्व को सुगन्धि बलिरूप में प्रदान करना चाहिये ।।७।। भृङ्गराजेऽब्धिमत्स्यः स्यान्मृषे मत्स्योदनं विदुः । निर्ऋतौ तैलपिण्याकं बीजं दौवारिके बलिः ।।८।। भृङ्गराज को समुद्र की मछली, मृष को मछली एवं भात, निर्ऋति को तेल में पका पिण्याक ( पिण्डी या मुठिया ) तथा दौवारिक को बीज की बलि देनी चाहिये ।।८।। सुग्रीवे मोदकं पुष्पदन्तके पुष्पतोयकम् । वरुणे पायसं धान्यं शोणितेनासुरे बलिः ।।९।। सुग्रीव को लड्डू, पुष्पदन्त को पुष्प एवं जल, वरुण को दूध एवं धान्य ( अन्न ) तथा असुर को रक्त प्रदान करना चाहिये ।।९।। सतिलं तण्डुलं शोषे रोगे स्याच्छुष्कमत्स्यकम् । स्विन्नं हारिद्रकं वायौ नागे मद्यं च लाजकम् ।।१०।। शोष को तिलयुक्त चावल, रोग को सूखी मछली, वायु को चर्बी एवं हरिद्रा ( हल्दी ) तथा नाग को मद्य एवं लावा प्रदान करना चाहिये ।।१०।। धान्यचूर्णं हि मुख्यस्य दधि सर्पिश्च सम्मतम् । गुलौदनं तु भल्लाटे सोमे दुग्धौदनं ददेत् ।।११।। मुख्य को अन्न का चूर्ण ( आटा ), दधि एवं घृत, भल्लाट को गुड़ में पका भात एवं सोम को दूध-भात प्रदान करना चाहिये ।।११।। शुष्कमांसं मृगे दद्याद् देवमातरि मोदकम् । उदितौ तिलभक्ष्येण क्षीरान्नं सर्पिरीशके ।।१२।। मृग को शुष्क मांस, देवमाता अदिति को लड्डू, उदिति को तिल-भोज्य एवं ईश मय०-४
५० मयमतम् को दूध में पका अन्न एवं घृत को बलिरूप में चढ़ाना चाहिये ।।१२।। लाजं धान्यं सविन्द्रस्य साविन्द्रे गन्धतोयकम् । बस्तमेदस्तथा मुद्गचूर्णमिन्द्रेन्द्रराजयोः ॥१३॥ लावा एवं धान्य सविन्द्र को, सुगन्धित जल साविन्द्र को, बकरी का मेद एवं मूँग का चूर्ण इन्द्र एवं इन्द्रराज को प्रदान करना चाहिये ।।१३।। रुद्रे रुद्रजये मांसं स्विन्नमापापवत्सयोः । कुमुदं मत्स्यमांसं च शङ्ककच्छपमांसकम् ॥१४॥ रुद्र एवं रुद्रजय को मांस तथा चर्बी, आप एवं आपवत्स को कुमुदपुष्प, मछली का मांस, शङ्कक ( शङ्ख के मध्य स्थित मांस ) एवं कछुये का मांस प्रदान करना चाहिये ।।१४।। मद्यमाज्यं चरक्यास्तु विदार्या लवणो बलिः । पूतनायास्तिलं पिष्टमन्याया मुद्गसारकम् ।।१५।। चरकी को मद्य एवं घृत, विदारी को लवण, पूतना को तिल एवं पिष्ट तथा पाप- राक्षसी को मूँग का सत्त्व प्रदान करना चाहिये ।।१५।। ✺ साधारणबलिः ✺ साधारणबलिः शुद्धभोजनं सघृतं दधि । सर्वेषामपि देवानां गन्धादीनि ददेत् क्रमात् ॥१६॥ सामान्य रूप से सभी देवों को प्रदान की जाने वाली बलि इस प्रकार है— साधारणं बलि घृत के सहित शुद्ध भोजन एवं दधि है। सभी देवों को क्रमशः गन्ध आदि प्रदान करना चाहिये ।।१६।। कन्यका वाऽथ वेश्या वा बलिधारणयोग्यकाः । अङ्गन्यासकरन्यासैः पूतचेता यथाक्रमम् ।।१७।। कन्या या वेश्या को बलि-पदार्थ धारण करने योग्य माना गया है। इन्हें अङ्गन्यास एवं करन्यास द्वारा पवित्र मन ( एवं शरीर ) वाली बनना चाहिये ।।१७।। ओङ्कारादिनमोऽन्तेन स्वस्वनामाभिधाय च । दत्वा पूर्वं जलं पश्चात् साधारणबलिं ददेत् ॥१८॥ वास्तुदेवों का क्रमानुसार नाम लेना चाहिये। उनके नाम से पूर्व 'ॐ' एवं नाम के पश्चात् 'नमः' लगाना चाहिये। उन्हें प्रथमतः जल एवं उसके पश्चात् साधारण बलि देनी चाहिये ।।१८।।
अष्टमोऽध्यायः बलिकर्म ५१ तत्तद्योग्यबलिं पश्चाद् देयं तोयं तथा बुधैः । ग्रामादीनां तु मण्डूकपदे परमशायिके ॥१९॥ इसके पश्चात् उनको विशिष्ट बलि प्रदान कर पीछे जल प्रदान करना चाहिये। विद्वानों के अनुसार ग्रामादि में मण्डूक वास्तुपद एवं परमशायिक वास्तुपद में भी बलि प्रदान करना चाहिये॥१९॥ सन्तर्प्य देवता ह्येवं पूर्वोक्तविधिना क्रमात् । विसर्जयेत्ततो देवान् विन्यासार्थं तु मन्त्रवत् ॥२०॥ इस प्रकार पूर्व में कही गयी विधि से देवों को उनके क्रम के अनुसार तृप्त करके उन्हें विधिपूर्वक विसर्जित करना चाहिये, जिससे वास्तुक्षेत्र का निर्माण करने के लिये विन्यास (भवननिर्माण की योजना) किया जा सके॥२०॥ ब्रह्माणं बाह्यदेवांश्च तत्तदुक्तपदे न्यसेत् । देवालयविधानार्थं द्वारार्थं ते प्रकीर्तिताः ॥२१॥ ब्रह्मा एवं बाह्य देवों को उनके-उनके स्थानों पर रखना चाहिये, जिससे देवालय एवं द्वार का विधान उनको ध्यान में रखते हुये किया जा सके॥२१॥ शेषांश्च निष्पदाः सर्वे रक्षार्थं तु निवेशिताः । एवं ग्रामादिषु प्रोक्तं रहस्यमिदमीरितम् ॥२२॥ पद से रहित शेष सभी देवों को वास्तु की रक्षा के लिये स्थान देना चाहिये। इसी विधि से ग्रामादि में भी देवों का विन्यास करना चाहिये। इस प्रकार वास्तु-पदविन्यास एवं वास्तुदेवों के पूजन के रहस्य का वर्णन किया गया है॥२२॥ कृतोपवासः स्थपतिः प्रभाते विशुद्धदेहोऽविकलं गृहीत्वा । विशेषसामान्यबलिं सुराणां यथोक्तनीत्या विदधीत सम्यक् ॥२३॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे बलिकर्मविधानो नामाष्टमोऽध्यायः प्रातःकाल से उपवास करते हुये स्थपति विशुद्ध शरीर एवं शान्त मन से वास्तु देवों की विशेष एवं सामान्य बलि को लेकर पूर्ववर्णित रीति से भली-भाँति पूजा करे एवं बलि प्रदान करे॥२३॥
अथ नवमोऽध्यायः ( ग्रामविन्यासः ) ग्रामादीनां मानं विन्यासं चापि वक्ष्यते विधिना। ग्रामयोजना—अब ग्राम आदि का नियमानुसार प्रमाण एवं विन्यास ( निर्माण- योजना ) का वर्णन किया जा रहा है। ✵ पुनर्मानोपकरणम् ✵ दण्डानां पञ्चशतं क्रोशं तद्द्विगुणमर्धगव्यूतम् ॥१॥ पुनः प्रमाण-चर्चा— पाँच सौ दण्डों का एक क्रोश एवं उसके दुगने ( दो क्रोश ) का एक अर्धगव्यूत मान होता है॥१॥ गव्यूतं तद्द्विगुणं ह्यष्टसहस्रं तु योजनं विद्यात्। अष्टधनुश्चतुरस्रा काकणिका तच्चतुर्गुणं माषम् ॥२॥ एक अर्धगव्यूत का दुगुना एक गव्यूत होता है। आठ हजार दण्ड का एक योजन होता है। आठ धनु ( दण्ड ) का चौकोर माप काकणिका एवं उसका चौगुना माप माष कहलाता है॥२॥ माषचतुर्वर्तनकं तत्पञ्चगुणं हि वाटिका कथिता। वाटिकया युगगुणिता ग्रामकुटुम्बावनिः श्रेष्ठाः ॥३॥ माष का चार गुना वर्तनक एवं पाँच गुना वाटिकासंज्ञक माप होता है। वाटिका का चार गुना स्थान ग्राम में एक परिवार के लिये उत्तम होता है॥३॥ एवं भूतगतमानं दण्डैस्तेषां तु वक्ष्यते मानम्। इस प्रकार दण्डमाप के द्वारा भूमि का मान होता है। उनका मान ( इस प्रकार ) कहा जा रहा है। ✵ ग्रामादिमानम् ✵ ग्रामस्य शतसहस्रैर्दण्डैः पर्यन्तमानमिदमुक्तम् ॥४॥ ग्रामादि का प्रमाण—( सबसे बड़े ) ग्राम का मान सौ हजार दण्ड कहा गया है॥४॥
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५३ विंशतिसहस्रदण्डात्तत्समवृद्ध्या तु पञ्चमानं स्यात् । ग्रामे विंशतिभागे कुटुम्बभूमिस्तदेकभागेन ॥५॥ बीस हजार दण्ड से प्रारम्भ कर सम संख्या में मानवृद्धि करते हुये ग्रामों के पाँच प्रकार के प्रमाण होते हैं। ग्राम के बीस भाग में एक भाग एक कुटुम्ब की भूमि होती है।।५।। दण्डैः पञ्चशतैर्वृद्धीनं ग्रामस्य मानमिदम् । तस्मात् पञ्चशतर्व्द्ध्या यावद्विंशत्सहस्रदण्डान्तम् ॥६॥ हीन ( सबसे छोटे ) ग्राम का मान पाँच सौ दण्ड का होता है। इससे प्रारम्भ कर पाँच सौ दण्ड बढ़ाते हुये बीस हजार दण्ड तक मान प्राप्त करना चाहिये।।६।। प्रोक्तं चत्वारिंशद्भेदं ग्रामस्य मानमिदम् । द्विसहस्रदण्डमानं सार्धसहस्रं सहस्रदण्डं च ॥७॥ ग्राम के चालीस भेद होते हैं। यह ग्राम का मान है। ( चौड़ाई में ) दो हजार दण्ड, एक हजार पाँच सौ दण्ड तथा हजार दण्ड ( ग्राम का मान है )।।७।। नवशतमथ सप्तशतं पञ्चशतं त्रिशतमिति च विस्तारम् । नगरस्य सहस्रादिद्विसहस्रान्तं च दण्डमानं स्यात् ॥८॥ नौ सौ, सात सौ, पाँच सौ एवं तीन सौ ( ग्राम का ) विस्तार होता है। नगर का दण्डमान एक हजार दण्ड से प्रारम्भ कर दो हजार दण्डपर्यन्त होता है।।८।। नगरस्याष्टसहस्रैर्दण्डैः पर्यन्तमानमिदम् । द्विद्विसहस्रक्षयतो द्विसहस्रान्तं चतुर्विधं मानम् ॥९॥ ( सबसे बड़े ) नगर का मान आठ हजार दण्ड होता है। दो-दो हजार दण्ड कम करते हुये नगर के चार प्रकार के मान प्राप्त होते हैं।।९।। ग्रामः खेटः खर्वटमथ दुर्गं नगरमिति च पञ्चविधम् । दण्डैस्तेषां मानं वक्ष्येऽहं त्रित्रिभेदभिन्नानाम् ॥१०॥ ग्राम, खेट, खर्वट, दुर्ग एवं नगर—ये पाँच प्रकार के ( वसति-विन्यास ) होते हैं। अब मैं ( मय ऋषि ) दण्ड के द्वारा प्रत्येक के तीन-तीन भेद कहता हूँ।।१०।। चतुरधिकषष्टिदण्डो ग्रामः स्याद्धीनहीनमिति कथितः । ग्रामस्य मध्यमस्य द्विगुणं त्रिगुणं तथोत्तमं प्रोक्तम् ॥११॥ छोटे में भी सबसे छोटा ग्राम चौंसठ दण्ड होता है। मध्यम ग्राम उसका दुगुना एवं उत्तम तीन गुना होता है।।११।।
५४ मयमतम् षट्पञ्चाशद्द्विशतं हीनं खेटं सविंशति त्रिशतम् । मध्यममुत्तममेवं सचतुरशीति त्रिशतदण्डम् ॥१२॥ छोटे खेट का माप दो सौ छप्पन, मध्यम खेट का तीन सौ बीस तथा उत्तम खेट का माप तीन सौ चौरासी दण्ड होता है।।१२।। अष्टौ चत्वारिंशच्चतुःशतं द्वादशं च पञ्चशतम् । षट्सप्ततिपञ्चशतं हीनं मध्योत्तमं च खर्वटकम् ॥१३॥ छोटे खर्वट का माप चार सौ अड़तालीस, मध्यम खर्वट का माप पाँच सौ बारह तथा उत्तम खर्वट का माप पाँच सौ छिहत्तर दण्ड कहा गया है।।१३।। चत्वारिंशत्षट्शतमधमं दुर्गं चतुःसप्तशतदण्डम् । मध्यममुत्तमदुर्गं सप्तशतं षष्टिरष्टौ हि ॥१४॥ कनिष्ठ दुर्ग छः सौ चालीस दण्ड, मध्यम दुर्ग सात सौ चार दण्ड एवं उत्तम दुर्ग सात सौ अड़सठ दण्ड का होता है।।१४।। द्वात्रिंशदष्टशतकं नगरं षण्णवत्यष्टशतदण्डम् । षष्टिर्नवशतमधमं मध्यममुत्कृष्टमिति यथासंख्यम् ॥१५॥ कनिष्ठ नगर आठ सौ बत्तीस दण्ड, मध्यम नगर आठ सौ छियानबे दण्ड तथा उत्तम नगर नौ सौ साठ दण्ड माप का होता है।।१५।। षोडशदण्डविवृद्ध्या प्रत्येकं नवविधं भवति । द्विगुणं त्रिपादमर्धं पादं तेषां मुखायतं विपुलात् ॥१६॥ सोलह दण्ड की वृद्धि करते हुये प्रत्येक के नौ भेद होते हैं। इनकी लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी, तीन चौथाई, आधी या चौथाई अधिक होती है।।१६।। व्यासषडष्टांशैकं चतुरस्रं वा यथेष्टं स्यात् । तस्मिन् विपुलायामे दण्डैरोजैः प्रमाणमात्तव्यम् ॥१७॥ अथवा छः या आठ भाग अधिक हो सकता है। इच्छानुसार इसकी लम्बाई-चौड़ाई समान भी हो सकती है। इनकी लम्बाई एवं चौड़ाई विषम दण्डसंख्या में होनी चाहिये।।१७।। शेषं वाटधरार्थं ग्रामादिषु सर्ववस्तुषु च । शेष का सम्बन्ध उस क्षेत्र से होता है, जिस पर निर्माणकार्य नहीं हुआ रहता। इस विधि का प्रयोग सभी ग्राम आदि वास्तुक्षेत्रों पर होता है। ✺ आयादि ✺ आयादिसम्पदर्थं वृद्धिं हानिं च यष्टिभिः कुर्यात् ॥१८॥
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५५ आयादि को प्राप्त करने के लिये दण्डों को बढ़ाया-घटाया जा सकता है।।१८।। आयव्ययर्क्षयोन्यायुभिरथ तिथिभिश्च वारैश्च। यजमानवस्तुनामजन्मर्क्षेणाविरोधिकं यत् ॥१९॥ जिस वास्तु का माप आय, व्यय, नक्षत्र, योनि, आयु, तिथि एवं वार के विपरीत न हो एवं न ही यजमान ( गृहस्वामी ) के नाम, जन्मनक्षत्र अथवा स्थान से विपरीत होना चाहिये ( कहने का तात्पर्य यह है कि ग्राम आदि वसतिविन्यास के सभी विचार- णीय बिन्दु गृहस्वामी एवं उसकी भूमि के अनुकूल होने चाहिये ) ।।१९।। तन्मानेन समेतं गृह्णीयात् सर्वसम्पत्तै। व्यासायामसमूहे वसुनिधिगुणिते दिनेशधर्महृते ॥२०॥ सभी प्रकार की सम्पत्तियों की प्राप्ति के लिये वास्तुक्षेत्र को उसके मान समेत ग्रहण करना चाहिये। वास्तुक्षेत्र के चौड़ाई एवं लम्बाई को जोड़ कर आठ से एवं नौ से गुणा करना चाहिये। प्राप्त गुणनफल में क्रमशः बारह एवं दश का भाग देना चाहिये।।२०।। आयव्ययमवशिष्टं रामघ्नेऽष्टापहृच्छेषम् । ध्वजधूमसिंहश्वावृषखरगजकाकाश्च योनिगणाः ॥२१॥ शेष संख्या से क्रमशः आय एवं व्यय का ज्ञान करना चाहिये। ( लम्बाई एवं चौड़ाई के योग में ) तीन से गुणा कर आठ से भाग देने पर जो शेष बचे, उससे योनियों की प्राप्ति होती है। ये योनियाँ ध्वज, धूम, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज एवं काक कही गई हैं।।२१।। अष्टौ योनय उदिता ध्वजहरिवृषहस्तिनः शुभदाः । पुनरपि वसुभिर्गुणिते त्रिनवाहृत्या फलं वयः शिष्टम् ॥२२॥ ( उपर्युक्त ) आठ योनियाँ कही गई हैं। इनमें ध्वज, सिंह, वृष एवं गज प्रशस्त हैं। पुनः ( लम्बाई एवं चौड़ाई के योग में ) आठ का गुणा कर सत्ताईस का भाग देने पर भागफल से वय का ज्ञान होता है।।२२।। नक्षत्रं परिणाहे त्रिंशद्ध्याप्ते तिथियमीशहृते । वारं सूर्यमुखं स्याद् बुद्ध्वैवं सर्ववस्तु करणीयम् ॥२३॥ लम्बाई एवं चौड़ाई के योग में तीस का भाग देने पर शेष संख्या से सौर दिनों का ज्ञान होता है। प्रथम वार रविवार होता है। सभी प्रकार के वास्तुओं में इसी प्रकार ज्ञात कर कार्य करना चाहिये।।२३।।
५६ मयमतम् आयाधिकमथ सुखदं व्ययमधिकं सर्वनाशं स्यात् । विपरीते तु विपत्त्यै तस्मात् सम्यक् परीक्ष्य कर्तव्यम् ॥२४॥ आय का अधिक होना सुखदायक होता है एवं व्यय का अधिक होना नाश का कारण होता है। इसके विपरीत होना विपत्तिकारक होता है। अतः भली-भाँति इसकी परीक्षा करने के पश्चात् ही कार्य करना चाहिये॥२४॥ ✱ विप्रसंख्या ✱ द्वादशसहस्रविप्रैर्यत्रिष्ठितमुत्तमोत्तमं ग्रामम् । दशसाहस्रैर्मध्यममध्यमं स्यादष्टसाहस्रैः ॥२५॥ ब्राह्मणों की संख्या — सर्वश्रेष्ठ ग्राम वह है, जहाँ बारह हजार ब्राह्मण हों। मध्यम ग्राम में दस हजार तथा छोटे ग्राम में आठ हजार ब्राह्मण होते हैं॥२५॥ सप्तसहस्रैर्विप्रैर्मध्यमोत्तममित्यभीष्टं स्यात् । षट्सहस्रैर्मध्यममध्यमं तु पञ्चसाहस्रैः ॥२६॥ सात हजार ब्राह्मण मध्यमोत्तम ग्राम में होते हैं। छः हजार ब्राह्मण मध्यम-
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५७ बारह एवं सोलह ब्राह्मण (आवास) की दृष्टि से क्षुद्रक ग्राम के दस भेद होते हैं। यदि ऐसा न हो तो एक से दस ब्राह्मण को भूमि दान में देना चाहिये।।३०।। एककुटुम्बिसमेतं कुटिकं स्यादेकभोगमिति कथितम् । तस्य सुखालयमिष्टं शेषाणां दण्डकादीनि ॥३१॥ जिस ग्राम में एक ब्राह्मण-परिवार रहता हो, उसे 'कुटिक' ग्राम तथा 'एकभोग' ग्राम कहते हैं। वहाँ 'सुकालय' प्रशस्त होता है तथा 'दण्डक' आदि अन्य ग्रामों में प्रशस्त होता है।।३१।। युग्मायुग्मविभागैर्द्विविधं स्यात् सर्ववस्तुविन्यासम् । युग्मे सूत्रपथं स्यादसमे पदमध्यमे च वीथी स्यात् ॥३२॥ अन्योन्यसङ्करश्चेदशुभं स्यात् सर्वजन्तूनाम् । सभी प्रकार के वास्तु-विन्यास दो विभागों—युग्म एवं अयुग्म (सम संख्या एवं विषम संख्या) में रक्खे जाते हैं। युग्म वास्तुविन्यास में सूत्रपथ से मार्गविन्यास एवं अयुग्म विन्यास में मध्यम पद से वीथी का विन्यास किया जाता है।।३२।। ✺ ग्रामनामानि ✺ दण्डकमपरं स्वस्तिकमित ऊर्ध्वं प्रस्तरं चैव ॥३३॥ पश्चात् प्रकीर्णकं स्यान्नन्द्यावर्तं परागमथ पद्मम् । स्याच्छ्रीप्रतिष्ठितेनैवाष्टविधं ग्राममुद्दिष्टम् ॥३४॥ ग्रामों के नाम—ग्राम आठ प्रकार के होते हैं—दण्डक, स्वस्तिक, प्रस्तर, प्रकीर्णक, नन्द्यावर्त, पराग, पद्म एवं श्रीप्रतिष्ठित।।३३-३४।। ✺ वीथिविधानम् ✺ सर्वेषां ग्रामाणां मङ्गलवीथ्यावृता बहिस्त्वबहिः । ब्रह्मस्थानं हृदितं तस्मिन् देवालयं तु वा पीठम् ॥३५॥ मार्ग-विधान—सभी ग्राम अन्दर एवं बाहर से मङ्गलवीथी से आवृत होते हैं। ग्राम के ब्रह्मस्थान (मध्य भाग) में देवालय या पीठ (देवों के निमित्त बना चबूतरा) होता है।।३५।। एकद्वित्रिचतुर्भिः पञ्चभिरपि कार्मुकैश्च मार्गततिः । प्राक्प्रत्यग्गतमार्गा ऋतुदण्डमहापथाख्यास्ते ॥३६॥ मार्गों की चौड़ाई एक, दो, तीन, चार या पाँच कार्मुक (दण्ड) होती है; किन्तु पूर्व से पश्चिम जाने वाले 'महापथ' संज्ञक मार्ग छः दण्ड चौड़े होते हैं।।३६।।
५८ मयमतम् मध्यमयुक्ता वीथी ब्रह्माख्या सैव नाभिः स्यात् । द्वारसमेता वीथी राजाख्या च द्विपाश्र्वतः क्षुद्रा ॥३७॥ ग्राम की मध्य-वीथी 'ब्रह्मवीथी' होती है। वही ग्राम की नाभि होती है। द्वार से युक्त वीथी 'राजवीथी' होती है। दोनों पार्श्वों में बनी वीथी 'क्षुद्रा' होती है।।३७।। सर्वाः कुट्टिमकाख्या मङ्गलवीथी तथैव रथमार्गम् । तिर्यग्द्वारसमेता नाराचपथा इति ख्याता । उत्तरदिङ्मुखमार्गाः क्षुद्रार्गलवामनाख्यपथाः ॥३८॥ सभी विथियाँ 'कुट्टिमका' संज्ञक होती हैं। इसी प्रकार मङ्गलवीथी 'रथमार्ग' कहलाती है। तिर्यग् द्वार ( प्रधान द्वार का सहायक द्वार ) युक्त वीथियाँ 'नाराचपथा' कहलाती हैं। उत्तर की ओर जाने वाले मार्ग 'क्षुद्र', 'अर्गल' एवं 'वामन' कहे जाते हैं।।३८।। ग्रामावृता मङ्गलवीथिकाख्या पुरावृता या जनवीथिका स्यात् । तयोस्तु रथ्याभिहिताभिधा स्यात् पुरातनैरन्यतमेष्वथैवम् ॥३९॥ ग्राम को घेरने वाली वीथी 'मङ्गलवीथिका' तथा पुर को आवृत करने वाली वीथी 'जनवीथिका' होती है। इन दोनों को 'रथ्या' भी कहा जाता है। प्राचीन विद्वानों के अनुसार अन्य मार्गों को भी इसी प्रकार समझना चाहिये।।३९।। ⁕ ग्रामभेदाः ⁕ द्विजकुलपरिपूर्णं वस्तु यन्मङ्गलाख्यं नृपवणिगभियुक्तं वस्तु यत्तत् पुरं स्यात् । तदितरजनवासं ग्राममित्युच्यतेऽस्मिन् मठमिति पठितं यत्तापसानां निवासम् ॥४०॥ ग्राम के भेद—ब्राह्मणों से परिपूर्ण वसति-विन्यास को 'मङ्गल' कहते हैं। राजा ( क्षत्रिय ) तथा व्यापारियों से युक्त स्थान 'पुर' कहलाता है। जहाँ अन्य जन निवास करते है, उसे 'ग्राम' कहते हैं। जहाँ तपस्वियों का निवास होता है, उसे 'मठ' कहते हैं।।४०।। प्रागुदगग्रं मार्गं ककनीकृतदण्डवत्तु तन्मध्ये ॥४१॥ द्वारचतुष्टययुक्तं दण्डकमिति भण्यते मुनिभिः । दण्डवदेका वीथी साप्येवं दण्डकं प्रोक्तम् ॥४२॥ पूर्व एवं उत्तर की ओर सीधी रेखा से बने हुये दण्ड के समान मार्ग होते हैं एवं
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५९ चार द्वारों से युक्त होते हैं। ऐसे ग्राम को मुनिजन दण्डक कहते हैं। जहाँ दण्ड के सदृश एक वीथी होती है, उसे भी 'दण्डक' ग्राम कहते हैं।।४१-४२।। नवपदयुक्ते ग्रामे परितो मार्ग पदस्य तस्य बहिः । तस्मात् प्रागुदगग्रात् प्राग्वीथी दक्षिणाग्रा सा ॥४३॥ नौ पदों से युक्त ग्राम में पद से बाहर चारो ओर एक मार्ग होता है। एक वीथी उत्तर-पूर्व से प्रारम्भ होकर पूर्व की ओर जाती है। वह दक्षिण से प्रारम्भ होती है।।४३।। तस्मात् प्राग्दक्षिणतो दक्षिणवीथी प्रतीचिमुखा । तस्मादवागपरतः पश्चिमवीथ्यग्रमुत्तरतः ॥४४॥ दक्षिण वीथी पूर्व-दक्षिण से प्रारम्भ होकर पश्चिम की ओर जाती है। दक्षिण से पश्चिम होकर जाने वाली वीथी उत्तर की ओर जाती है।।४४।। अपरोत्तरतस्तस्मादुत्तरवीथ्यां मुखं प्राच्याम् । एतत् स्वस्तिकमुदितं स्वस्त्याकृत्या चतुर्मार्गम् ॥४५॥ दूसरी वीथी उत्तर से प्रारम्भ होती है, इसलिये उत्तरवीथी है। इसका मुख पूर्व की ओर होता है। इस ग्राम को 'स्वस्तिक' कहा गया है। इसके चार मार्ग स्वस्तिक की आकृति के होते हैं।।४५।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैस्त्रिभिरुदग्ग्रैस्त्रिभिश्चतुर्भिरथो । पञ्चभिरपि षट्सप्तभिरपि युक्तं प्रस्तरं पञ्च ॥४६॥ 'प्रस्तर' ग्राम पाँच प्रकार के होते हैं। इसमें पूर्व से पश्चिम तीन मार्ग जाते हैं। उत्तर से जाने वाले मार्ग तीन, चार, पाँच, छः या सात होते हैं।।४६।। प्राग्ग्रैस्तु चतुर्भिर्द्वादशशिवपङ्क्तिनन्दवसुमार्गैः । उदग्ग्रैरभियुक्तं ह्येतत् प्रोक्तं प्रकीर्णकं पञ्च ॥४७॥ 'प्रकीर्णक' ग्राम पाँच प्रकार के होते हैं। इसमें चार मार्ग पूर्व से पश्चिम जाते हैं। उत्तर से बारह, ग्यारह, दस, नौ या आठ मार्ग जाते हैं।।४७।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैः पञ्चभिरुदग्ग्रैस्त्रयोदशभिः । त्रिःसप्तभिरथ तिथिभिः षोडशभिः सप्तदशभिरपि मार्गैः ॥४८॥ ( नन्द्यावर्त ग्राम का लक्षण इस प्रकार है- ) पाँच सड़कें पूर्व से पश्चिम की ओर जाती हैं। उत्तर दिशा से तेरह, इक्कीस, पन्द्रह, सोलह एवं सत्रह मार्गों द्वारा ( इस ग्राम का विन्यास किया जाता है )।।४८।। युक्तं नन्द्यावर्तं दिक्षु चतुर्द्वारसंयुक्तम् । नन्द्यावर्ताकृत्या बाह्ये द्वारैरबाह्यातो मार्गैः ॥४९॥
६० मयमतम् नन्द्यावर्त ग्राम (उपर्युक्त मार्गों से) युक्त होता है। यह नन्द्यावर्त आकृति का होता है। बाहर की ओर जाने वाले मार्गों के बाहर चारो दिशाओं में चार द्वार होते हैं।।४९।। युक्तानेकैकयुक्तं नन्द्यावर्ताभमिदमुदितम्। आद्यैरष्टादशभिर्द्वाविंशत्यङ्गकैरूदग्वक्त्रैः ॥५०॥ अनेक मार्गों के आपस में संयुक्त होने से अनेक मार्ग-संयोग (तिराहे, चौराहे आदि) बनते हैं। नन्द्यावर्त की आकृति के सदृश होने के कारण इस ग्राम को 'नन्द्यावर्त' कहते हैं। पराग ग्राम का लक्षण इस प्रकार है—यहाँ अठारह से बाईस संख्या तक मार्ग उत्तर से जाते हैं।।५०।। षड्भिः प्राङ्मुखमार्गैर्युक्तं ह्येतत् परागमिति कथितम्। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैः सप्तभिरुदगग्रैस्त्रिवेदशरैः ॥५१॥ छः मार्ग पूर्व से निकलते हैं। इस ग्राम को 'पराग' कहते हैं। (पद्म ग्राम में) पूर्व-पश्चिम में सात मार्ग होते हैं तथा उत्तर से तीन, चार, पाँच—।।५१।। षट्सप्तभिरपि युक्तैर्विंशतिभिः पञ्चधा पद्मम्। अष्टभिरथ पूर्वाग्रैरुदगग्रैः साष्टविंशतिभिः ॥५२॥ छः या सात मार्ग निकलते हैं तथा बीस मार्ग-संयोग बनते हैं। इस प्रकार 'पद्म'- ग्राम के पाँच भेद बनते हैं। (श्रीप्रतिष्ठित ग्राम में) आठ मार्ग पूर्व दिशा से तथा अट्ठाईस से प्रारम्भ कर—।।५२।। आद्यैर्द्धिः षोडशभिर्मार्गैरन्त्यैर्युतं यत्तु। तच्छ्रीप्रतिष्ठितं स्यादष्टविधं ग्राममुद्दिष्टम् ॥५३॥ बत्तीस संख्या तक मार्ग उत्तर दिशा से निकलते हैं। इसे 'श्रीप्रतिष्ठित' ग्राम कहते हैं। इस प्रकार आठ प्रकार के ग्राम होते हैं।।५३।। अथवा श्रीवत्सादिकमुपनेतव्यं तु विन्यासम्। सर्वेषां ग्रामाणां नाभिं न प्रोतयेन्मतिमान् ॥५४॥ अथवा 'श्रीवत्स' आदि अन्य ग्रामों का भी विन्यास करना चाहिये। सभी ग्रामों के नाभि (केन्द्र-स्थल) को बुद्धिमान व्यक्ति को विद्ध नहीं करना चाहिये।।५४।। ग्रामे वाऽथ गृहे वा दण्डच्छेदोऽपि नैव कर्तव्यः। सकलाद्यासनकान्तं विन्यासार्थं पदं बुधैर्ग्राह्यम् ॥५५॥ ग्राम अथवा गृह में दण्डच्छेद नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति को ग्राम
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६१ अथवा गृह के विन्यास हेतु सकल ( एकपद वास्तु ) से लेकर आसन ( एक हजार पद वास्तु ) तक ( किसी उपयुक्त ) पदविन्यास को ग्रहण करना चाहिये ।।५५।। क्षुद्रग्रामे मार्गाश्चत्वारश्चाष्ट मध्यमे ग्रामे । द्वादश षोडश मार्गा ग्रामेषूत्कृष्टकेषु मताः ।।५६।। छोटे ग्राम में चार मार्ग, मध्यम ग्राम में आठ मार्ग एवं उत्तम ग्राम में बारह अथवा सोलह मार्ग होते हैं ।।५६।। ❋ द्वाराणि ❋ भल्लाटे च महेन्द्रे राक्षसपादे तु पुष्पदन्तपदे । द्वारायतनस्थानं जलमार्गांश्चापि चत्वारः ।।५७।। द्वार — भल्लाट, महेन्द्र, राक्षस एवं पुष्पदन्त पद द्वारस्थापन के स्थान हैं तथा जलमार्ग भी चार हैं ।।५७।। वितथपदेऽथ जयन्ते सुग्रीवांशे च मुख्यदेवपदे । भृशपूषभृङ्गराजा दौवारिकशोषनागदितिजलदाः ।।५८।। जलमार्ग के चार वास्तु-पद वितथ, जयन्त, सुग्रीव एवं मुख्य हैं ! भृश, पूषा, भृङ्गराज, दौवारिक, शोष, नाग, दिति एवं जलद — ।।५८।। स्थानमुपद्वाराणामष्टौ देवा इमे कथिताः । त्रिकरं पञ्चकरं तत् सप्तकरं द्वारविस्तरम् ।।५९।। इन आठ वास्तुदेवों के पद उपद्वार के स्थान हैं। इन उपद्वारों का विस्तार तीन, पाँच या सात हस्त होता है ।।५९।। तारद्विगुणोत्सेधं चाध्यर्धं वाऽङ्घ्रिहीनं तत् । सर्वेषां ग्रामाणां परितः परिखा बहिश्च वप्राश्च ।।६०।। इन उपद्वारों की ऊँचाई उसकी चौड़ाई की दुगुनी, डेढ़ गुनी अथवा तीन चौथाई होनी चाहिये। सभी ग्रामों के चारो ओर बाहर परिखा ( खाई ) एवं वप्र ( प्राचीर, घेरने वाली भित्ति ) होनी चाहिये ।।६०।। ग्रामादयोऽपि नद्या दक्षिणतीरे तदन्वितायामाः । नवनववसुसुभागे मध्ये ब्राह्मं ततः परं दैवम् ।।६१।। नदी के दक्षिण तट पर उससे घिरे ग्राम ( उत्तम ) होते हैं। इक्यासी वास्तुपद एवं चौंसठ वास्तुपद-विन्यास से युक्त ग्राम का मध्य भाग ब्राह्मक्षेत्र एवं इसके पश्चात् दैव क्षेत्र होता है ।।६१।।
६२ मयमतम् मानुषमथ पैशाचं क्रमशः सङ्कल्प्य युक्त्या तु । दैविकमानुषभागे विप्राणां स्याद् गृहश्रेणी ॥६२॥ इसके पश्चात् मानुष एवं पैशाच क्षेत्र का निश्चय करना चाहिये। दैव एवं मानुष क्षेत्र में ब्राह्मणों के गृह होने चाहिये।।६२।। कर्मोपजीविनां स्यात्पैशाचे तत्र वा द्विजावासम् । तस्मिन् सुरगणभवनं क्रमशः प्रागादिषु स्थाप्यम् ॥६३॥ अपने कार्य के द्वारा अपनी आजीविका चलाने वालों का गृह पैशाच क्षेत्र में होना चाहिये अथवा वहाँ ब्राह्मणों का आवास होना चाहिये। उनके मध्य पूर्व आदि दिशाओं में क्रमानुसार देवालय की स्थापना करनी चाहिये।।६३।। ❋ प्रासादस्थानम् ❋ एतस्याभ्यन्तरे विप्रदेवतास्थापनं भवेत् । शिवहर्म्यं च ग्रामाणां समं बाह्येऽथवा भवेत् ॥६४॥ वास्तु-क्षेत्र के भीतर ब्राह्मण एवं देवता की स्थापना करनी चाहिये। शिवालय की स्थापना ग्राम के बाहर होनी चाहिये अर्थात् शिवालय की स्थापना इच्छानुसार ग्राम के भीतर या बाहर कहीं भी हो सकती है।।६४।। भृङ्गराजांशके वाऽपि पावके तु विनायकम् । ऐशांशे शिवहर्म्यं स्यात् सौम्ये वानान्तरेषु वा ॥६५॥ भृङ्गराज के या पावक के भाग पर विनायक का मन्दिर होना चाहिये। ईश के पद पर, सोम के पद पर अथवा अन्य किसी वास्तुपद पर शिवमन्दिर की स्थापना करनी चाहिये।।६५।। बाह्येऽस्य तु गृहश्रेणी मानेन विधिना कुरु । शैवानां परिवाराणां प्रोक्तं स्थानमिहोच्यते ॥६६॥ देवालय के बाहर गृहों की श्रेणी पूर्ववर्णित मान के अनुसार नियमपूर्वक होनी चाहिये। शिव के परिवार-देवताओं के स्थान का यहाँ वर्णन किया जा रहा है।।६६।। सूर्यपदे सौरं स्यादग्निपदे कालिकावेश्म । भृशभागे विष्णुगृहं याम्यायां षण्मुखस्थानम् ॥६७॥ सूर्य के वास्तुपद पर सूर्यदेवता का स्थान एवं अग्नि के पद पर कालिका का मन्दिर होना चाहिये। भृश के वास्तुपद पर विष्णुमन्दिर तथा यम के पद पर षण्मुख ( कार्तिकेय ) का मन्दिर होना चाहिये।।६७।।
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६३ भृशभागे मृगांशे तु नैर्ऋत्यां केशवालयम्। सुग्रीवांशे गणाध्यक्षः पुष्पदन्तपदेऽपि वा ॥६८॥ भृश, मृग या नैर्ऋत्य स्थान पर केशव का मन्दिर होना चाहिये। सुग्रीव के पद पर या पुष्पदन्त के पद पर गणाध्यक्ष ( गणेश ) का मन्दिर होना चाहिये।।६८।। आर्यकभवनं निर्ऋते वरुणे विष्णोर्विमानं स्यात्। स्थानकमासनशयनं धाम्येतास्मिन् क्रमेण चोर्ध्वतलात् ॥६९॥ आर्यक का भवन नैर्ऋत्य कोण में एवं विष्णु का विमान ( देवालय ) वरुण के पद पर होना चाहिये। मन्दिर में ऊपरी तल से क्रमशः विष्णु की स्थानक ( खड़ी ), आसन ( बैठी ) एवं शयन प्रतिमा होनी चाहिये।।६९।। अथवा मूलतलं घनमुपरितले स्थानकं प्रोक्तम्। सुगतालयमथ सुगले भृङ्गनृपे चैव जिनधाम ॥७०॥ अथवा भूतल पर बड़ी एवं भारी तथा ऊपरी तल पर स्थानक मुद्रा में विष्णुप्रतिमा होनी चाहिये। सुगल के पद पर सुगत ( बुद्ध ) की प्रतिमा एवं भृङ्गराज के पद पर जिन-देवालय होना चाहिये।।७०।। मदिरालयमथ वायौ मुख्ये कात्यायनीवासः । सोमे धनगृहं वा मातृणामालयं तत्र ॥७१॥ वायु के पद पर मदिरा का मन्दिर, मुख्य के पद पर कात्यायनी का मन्दिर, सोम के पद पर धनद ( कुबेर ) का मन्दिर अथवा मातृदेवियों का मन्दिर होना चाहिये।।७१।। ईशे शङ्करभवनं पर्जन्यांशे जयन्ते वा। सोमे धनदगृहं वा शोषपदे वा विधातव्यम् ॥७२॥ शिवालय ईश, पर्जन्य या जयन्त के पद पर, कुबेर का मन्दिर सोम अथवा शोष के पद पर निर्मित कराना चाहिये।।७२।। तत्र गजाननभवनं ह्यादितौ वा मातृकोष्ठं स्यात्। मध्ये विष्णोर्धिष्ण्यं तत्र सभामण्डपं प्रोक्तम् ॥७३॥ वहीं गणेश का भवन होना चाहिये। अथवा अदिति के पद पर मातृदेवियों का मन्दिर होना चाहिये। मध्य में विष्णु का मन्दिर होना चाहिये। वहीं सभामण्डप भी होना चाहिये—ऐसा कहा गया है।।७३।। ब्रह्मस्थानैशाने वाग्नेय्यां वा सभास्थानम्। तदुदक्पश्चिमभागे हरिसदनं दक्षिणे परतः ॥७४॥
६४ मयमतम् अथवा सभास्थल ब्रह्मा के पद पर ईशान कोण या आग्नेय कोण में होना चाहिये। विष्णुमन्दिर उत्तर-पश्चिम में अथवा दक्षिण में होना चाहिये।।७४।। क्रूरसमेतं कर्म प्रत्ययमथ पञ्च मध्ये तु। युग्मायुग्मपदे च ब्रह्मस्थानेऽष्टनवभागे ।।७५।। मध्य के पाँच पदों पर निर्माणकार्य दुःखकारक होता है। वास्तुमण्डल के युग्म पद से तथा अयुग्म पद (समसंख्या एवं विषमसंख्या) से निर्मित होने पर ब्रह्मस्थान आठ भाग एवं नौ भाग से निर्मित होना चाहिये।।७५।। व्यपनीयाजं भागं प्रागादिषु दिक्षु च क्रमशः। नलिनकभवनं स्वस्तिकनन्द्यावर्त्तौ प्रलीनकं चैव ।।७६।। यच्छ्रीप्रतिष्ठिताख्यं चतुर्मुखहर्म्यं तु पद्मसमम्। विष्णुच्छन्दविमानं त्रितलाद्द्वादशतलान्तम् ।।७७।। ब्रह्मा के भाग को छोड़ कर पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर क्रमशः नलिनक, स्वस्तिक, नन्द्यावर्त, प्रलीनक, श्रीप्रतिष्ठित, चतुर्मुख एवं पद्मसम भवन का निर्माण करना चाहिये। वहाँ तीन तल से लेकर बारह तलपर्यन्त विष्णुच्छन्द विमान का निर्माण होना चाहिये। बहिरप्येवं सौधं ग्रामादिषु तत्र विज्ञेयम्। स्थितमासीनं शयनं यत्र यदिष्टं तु तत्र तत्स्थाप्यम् ।।७८।। यह विष्णुमन्दिर ग्रामादि से बाहर भी हो सकता है। इसमें विष्णु की खड़ी, बैठी या शयन करती हुई मूर्ति स्थापित करनी चाहिये।।७८।। उत्कृष्टमध्यमाधमनीचादिकं क्रमेणैवम्। भवनं ग्रामेषूदितमिति नीचं चोत्तमे न स्यात् ।।७९।। ग्रामों में क्रमानुसार उत्कृष्ट, मध्यम, अधम एवं नीच आदि भवन होने चाहिये; किन्तु उत्तम ग्राम में नीच भवन नहीं होना चाहिये।।७९।। क्षुद्रे क्षुद्रविमानं यद्यत्रैवोचितं विधातव्यम्। त्रिचतुष्पञ्चतलं तद्धीने हीने च सामान्यम् ।।८०।। यदि ग्राम क्षुद्र हो तो वहाँ क्षुद्र विमान (छोटा मन्दिर) ही उचित है एवं वही बनाना चाहिये। तीन, चार एवं पाँच तल का देवालय हीन ग्राम में होना चाहिये तथा हीन ग्राम में सामान्य भवन होना चाहिये।।८०।। ग्रामे वा नगरे वोत्कृष्टे देवालयं तु नीचं चेत्। नीचा भवन्ति पुरुषाः स्त्रियोऽपि दुःशीलतां यान्ति ।।८१।।
नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६५ उत्कृष्ट ग्राम अथवा नगर में यदि नीच श्रेणी का देवालय हो तो वहाँ के पुरुषों में नीच प्रवृत्ति एवं स्त्रियों में दुःशीलता होती है।।८१।। तस्मात् सममधिकं वा तत्सङ्घ्येव प्रयोक्तव्या । हरिहरसदनं वास्तुकमन्यत् सर्वं यथेष्टं स्यात् ॥८२॥ इसलिये ग्राम अथवा नगर की श्रेणी के समान या अधिक श्रेणी का मन्दिर निर्मित होना चाहिये। हरिहर मन्दिर अथवा अन्य सभी वास्तुनिर्मिति यथोचित होनी चाहिये।।८२।। ❋ दौवारिकाः ❋ चण्डेश्वरः कुमारो धनदः काली च पूतना चैव । कालीसुतश्च खड्गी चैते दौवारिकाः प्रोक्ताः ॥८३॥ चण्डेश्वर, कुमार, धनद, काली, पूतना, कालीसुत तथा खड्गी—ये देवता दौवारिक कहे गये हैं।।८३।। प्राक्प्रत्यङ्मुखमैशं ग्रामादिषु तत्पराङ्मुखं शुभदम् । विष्णुगृहं सर्वमुखं ग्रामस्यान्तर्मुखं शुभदम् ॥८४॥ ग्राम आदि में पूर्वमुख या पश्चिममुख शिव का स्थान होना चाहिये। यदि उनका मुख ग्रामादि से बाहर की ओर हो तो प्रशस्त होता है। विष्णु का मुख सभी दिशाओं में हो सकता है; किन्तु उनका मुख यदि ग्राम की ओर हो तो शुभ होता है।।८४।। शेषं पूर्वाभिमुखं मातृणामुत्तराभिमुखम् । प्रत्यग्द्वारं सौरं गेहारम्भात् पुरामरावासम् ॥८५॥ शेष देवगण पूर्वमुख होने चाहिये। मातृदेवियों को उत्तरमुख स्थापित करना चाहिये। सूर्यमन्दिर का द्वार पश्चिममुख होना चाहिये। पुर आदि में मनुष्यों के गृह से पहले देवालयों का निर्माण कराना चाहिये।।८५।। ❋ वर्ज्यस्थानानि ❋ हृदये वंशस्थाने शूले सूत्रे च सन्धौ च । कर्णसिरायां षट्के नोक्तान्यमरालयादीनि ॥८६॥ त्याज्य स्थान—वास्तुमण्डल के हृदय, वंश, सूत्र, सन्धिस्थल तथा कर्णसिराओं— इन छः स्थलों पर देवालय आदि का निर्माण नहीं होना चाहिये।।८६।। ❋ श्रेणिस्थानम् ❋ गोशाला दक्षिणतश्चोत्तरदेशे तु पुष्पवाटी स्यात् । पूर्वद्वारोपान्ते पश्चिमत्तस्तापसावासम् ॥८७॥ मय०-५
६६ मयमतम् अन्य श्रेणी के भवन-स्थान— (पुर तथा ग्राम आदि के ) दक्षिण ओर गोशाला एवं उत्तर में पुष्पवाटिका होनी चाहिये। पूर्व या पश्चिम द्वार के निकट तपस्वियों का आवास होना चाहिये।।८७।। सर्वत्रैव जलाशयमिष्टं वापी च कूपञ्च। वैश्यानां दक्षिणतः परितः सदनं तु शूद्राणाम् ।।८८।। जलाशय, वापी एवं कूप सभी स्थानों पर होना चाहिये। वैश्यों का आवास दक्षिण में एवं शूद्रों का आवास चारो ओर होना चाहिये।।८८।। प्राच्यां वाऽप्युत्तरतो गेहं कुर्यात् कुलालानाम्। तत्रैव नापितानामन्यत्कर्मोपयुक्तानाम् ।।८९।। पूर्व अथवा उत्तर दिशा में कुम्हारों के गृह होने चाहिये। वहीं नाइयों का एवं अन्य हस्तकौशल वालों के भी गृह होने चाहिये।।८९।। मत्स्योपजीविनां स्याद्वासं वायव्यदेशे तु। पश्चिमदेशे मांसैरुपवृत्तीनां निवासः स्यात् ।।९०।। उत्तर-पश्चिम दिशा में मछुआरों का निवास होना चाहिये। पश्चिमी क्षेत्र में मांस से आजीविका चलाने वालों का निवास होना चाहिये।।९०।। तैलोपजीविनां चैवोत्तरदेशे गृहश्रेणिः। तेलियों के गृह उत्तर दिशा में होने चाहिये। ✺ गृहलक्षणम् ✺ धनुभिस्त्रिपञ्चसप्तभिरथ नवभिर्गृहावधिः प्रोक्तः ।।९१।। गृह के लक्षण—गृहों की चौड़ाई तीन, पाँच, सात या नौ धनुप्रमाण होनी चाहिये।।९१।। दण्डाभ्यामथ तस्मादायामं वर्धयेत् क्रमशः। व्यासद्विगुणावधिकं यावद् दैर्घ्यं गृहीतव्यम् ।।९२।। गृहों की लम्बाई चौड़ाई से क्रमशः दो-दो दण्ड बढ़ानी चाहिये। लम्बाई उतनी ही ग्रहण करनी चाहिये, जितनी कि चौड़ाई की दुगुनी से अधिक न हो जाय।।९२।। तत्रैव हस्तमानैर्गेहं कुर्याद् यथाविधिना। रुचकः स्वस्तिकमथवा नन्द्यावर्त्तञ्च सर्वतोभद्रम् ।।९३।। गृहों का निर्माण विधि के अनुसार हस्तप्रमाण से करना चाहिये। ये गृह रुचक, स्वस्तिक, नन्द्यावर्त और सर्वतोभद्र (किसी एक शैली के ) हो सकते हैं।।९३।।